926 करोड़ की डकैती, जो हो नहीं पाई – भाग 3

हताशा में आशा की किरण नजर आई पुलिस को

वारदात के दूसरे दिन पुलिस के अधिकारी और जवान सभी बिंदुओं पर विचार कर जांचपड़ताल करते रहे, लेकिन यह भी पता नहीं चल सका कि बदमाश किस रास्ते से वापस गए. दूसरे और तीसरे दिन भी पुलिस को बदमाशों के बारे में कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ नहीं लगा. इस बीच जयपुर से पुलिस की टीमें नागौर, पाली, अजमेर, भीलवाड़ा, सीकर व झुंझुनूं आदि जिलों में गईं और संदिग्ध बदमाशों की तलाश की.

9 फरवरी को जयपुर पुलिस को इस मामले में उम्मीद की कुछ किरणें नजर आईं. कई जगह फुटेज में नजर आया कि बदमाशों की इनोवा गाड़ी के पीछे वाली बाईं ओर की लाइट टूटी हुई थी. इसी वजह से गाड़ी चलने पर यह लाइट नहीं जलती थी. इसी आधार पर पुलिस जयपुर से अजमेर की ओर टोल नाकों पर ऐसी इनोवा कार की तलाश में जुटी रही.

इसी दिशा में पुलिस आगे बढ़ी तो पता चला कि दूदू के पास एक बार के बाहर इनोवा कार रुकी थी. वहां लगे सीसीटीवी कैमरों में कुछ लोगों की तसवीर आ गई थी. इन लोगों ने कानों में सोने की मुर्की पहन रखी थीं. चेहरे भी ढंके हुए नहीं थे. इस से यह अंदाजा लगाया गया कि बदमाश जोधपुर-पाली की तरफ के हो सकते हैं. दूदू में होटल पर रुकने के बाद यह गाड़ी ब्यावर की ओर चली गई थी.

इसी बीच जांचपड़ताल में पता चला कि एक्सिस बैंक में बदमाश जो कट्टे छोड़ गए थे, वे पाली जिले की रायपुर तहसील के बर गांव में एक दुकान से खरीदे गए थे. इन कट्टों पर बर गांव की परचून की दुकान का नाम लिखा था. पुलिस उस दुकानदार तक पहुंची. हालांकि दुकानदार से बदमाशों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली, लेकिन इस से यह अंदाजा जरूर लग गया कि बदमाशों का पाली जिले से कोई न कोई संबंध जरूर था.

पुलिस को बदमाशों की इनोवा कार की लोकेशन ब्यावर तक मिल गई थी. इस बीच महाराष्ट्र के नंबरों का पता चलने पर एक पुलिस टीम महाराष्ट्र भेजी गई. ब्यावर से पुलिस टीम सीसीटीवी फुटेज के आधार पर इनोवा कार का पीछा करते हुए जोधपुर तक पहुंच गई.

10 फरवरी को पाली जिले की पुलिस को कुछ जानकारियां मिलीं. इस के अगले  दिन 11 फरवरी को जोधपुर पुलिस कमिश्नरेट के महामंदिर थानाप्रभारी सीताराम को सूचना मिली कि जोधपुर के कुछ बदमाश कहीं बाहर कोई बड़ी वारदात कर के आए हैं.

आखिर पकड़ में आ ही गए लुटेरे

इस पर जोधपुर पुलिस की एक टीम बदमाशों की तलाश में जुटी और शाम तक 6 बदमाशों प्रकाश जटिया, पवन जटिया, धर्मेंद्र जटिया, जयप्रकाश जटिया, दिनेश लुहार और प्रमोद बिश्नोई को पकड़ लिया. ये छहों लोग जोधपुर के रहने वाले थे. जोधपुर पुलिस कमिश्नर अशोक कुमार राठौड़ ने इस की सूचना जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को दी. इस पर जयपुर से एक टीम रवाना हो कर रात को ही जोधपुर पहुंच गई.

पकड़े गए 6 बदमाशों से बाकी लुटेरों का भी पता चल गया. जयपुर व जोधपुर पुलिस उन की तलाश में जुट गई. 12 फरवरी को पुलिस ने 2 और बदमाशों को पकड़ लिया. इन में अनूप बिश्नोई को जोधपुर के बनाड इलाके से पकड़ा गया, जबकि झुंझुनूं के बदमाश विकास चौधरी को जैसलमेर से गिरफ्तार किया गया. विकास चौधरी आजकल जैसलमेर के शिकारगढ़ इलाके में रह रहा था.

लादेन था गिरोह का सरगना

इन बदमाशों से की गई पूछताछ में सामने आया कि लूट की योजना जोधपुर के ओसियां  के सिरमंडी निवासी हनुमान बिश्नोई उर्फ लादेन ने बनाई थी. लादेन ही इस गिरोह का सरगना है. लादेन ने जयपुर में एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच की रैकी कर रखी थी. तिजोरी के ताले तोड़ने के लिए उस ने प्रमोद बिश्नोई के सहयोग से जोधपुर की जटिया कालोनी के रहने वाले प्रकाश, पवन, धर्मेंद्र व जयप्रकाश को तैयार किया था.

तिजोरी तोड़ने के लिए ये बदमाश जोधपुर से ही औजार ले कर चले थे. हनुमान उर्फ लादेन इस योजना में प्रकाश बिश्नोई से बराबर का हिस्सा मांग कर पार्टनर बना था. बाकी बदमाशों को 20 हजार से 10 लाख रुपए तक का लालच दिया गया था. लादेन और प्रकाश ने अपने भाड़े के साथियों को यह नहीं बताया था कि जयपुर में बैंक लूटने जाना है. उन्हें बताया गया था कि जयपुर में हवाला की रकम लूटनी है.

5 फरवरी को लादेन के नेतृत्व में 15 बदमाश जोधपुर से 2 गाडि़यों में सवार हो कर जयपुर के लिए चले. उन्होंने रास्ते में जयपुर-अजमेर के बीच दूदू के पास एक गाड़ी छोड़ दी. इनोवा गाड़ी से सभी बदमाश उसी रात जयपुर पहुंचे और एक्सिस बैंक की चेस्ट ब्रांच पर धावा बोल दिया. बैंक में तैनात पुलिस कांस्टेबल के गोली चलाने से सभी बदमाश डर कर भाग निकले थे.

प्रकाश बिश्नोई जनवरी 2014 में राइकाबाग में रोडवेज बस स्टैंड पर रात्रि गश्त कर रहे पुलिस के एक एएसआई राजेश मीणा की हत्या का भी अभियुक्त था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. घटना के समय वह जमानत पर छूटा हुआ था.

पुलिस को लादेन के अन्य साथियों के नामपता चल गए हैं. कथा लिखे जाने तक जयपुर व जोधपुर पुलिस उस की तलाश में जुटी थी. गिरफ्तार किए गए आठों बदमाशों को पुलिस जोधपुर से जयपुर ले आई. बदमाशों से उन के साथियों और आपराधिक वारदातों के बारे में पूछताछ की गई.

सीताराम को किया गया सम्मानित

एक्सिस बैंक में लूट के प्रयास के दौरान उपयोग किए गए हथियारों के बारे में भी पता लगाया गया. गिरफ्तार व फरार बदमाशों का आपराधिक रिकौर्ड भी खंगाला गया. यह भी पता लगाया गया कि इस वारदात में बैंक के किसी नएपुराने कर्मचारी का सहयोग तो नहीं था.

देश की सब से बड़ी बैंक लूट की वारदात को विफल करने का हीरो कांस्टेबल सीताराम ही रहा. हालांकि जयपुर पुलिस ने वैज्ञानिक तरीकों से जांचपड़ताल के जरिए बदमाशों को पकड़ कर अपनी साख जरूर बचा ली.

यह भी दिलचस्प रहा कि 11 फरवरी को जोधपुर में जब 6 बदमाश पकड़े जा रहे थे, उसी समय जयपुर में राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा ने कांस्टेबल सीताराम को हैडकांस्टेबल के पद पर विशेष पदोन्नति दी. जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में आयोजित समारोह में पुलिस महानिदेशक ने कहा कि ड्यूटी के दौरान उत्कृष्ट कार्य कर के सीताराम ने राजस्थान पुलिस की शान बढ़ाई है.

राजस्थान के सीकर जिले के पूनियाणा गांव के रहने वाले सीताराम के मातापिता पढ़लिख नहीं सके थे. वे मेहनतमजदूरी करते थे. पिता टोडाराम व मां प्रेम ने अपने एकलौते बेटे सीताराम को अपना पेट काट कर पढ़ाया लिखाया. सीताराम ने सीनियर सेकैंडरी तक की पढ़ाई सीकर में दांतारामगढ़ से की. 12वीं में वह क्लास टौपर रहा. कालेज की पढ़ाई रेनवाल से की. मातापिता की ख्वाहिश थी कि सीताराम शिक्षक बन जाए. सीताराम ने बीएड करने के साथ शिक्षक बनने की तैयारी शुरू भी की थी, लेकिन तभी उस का कांस्टेबल भर्ती में चयन हो गया.

उस ने साल 2015 में नौकरी जौइन की. प्रोबेशन पीरियड पूरा होने के बाद उसे बैंक की चेस्ट ब्रांच में सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया गया था. डेढ़ साल पहले ही उस की शादी हुई थी. सीताराम के मातापिता और गांव के लोगों ही नहीं, आज राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल से ले कर पुलिस महानिदेशक तक सभी को उस पर गर्व है.

अपनों के खून से रंगे माला जपने वाले हाथ

सुबह के 7 बज रहे थे. सुबोध जायसवाल उस वक्त अपने घर के आंगन में कुरसी पर बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे. आसपास का वातावरण काफी शांत था. जायसवाल चाय का अंतिम घूंट पी कर खाली कप रखने वाले ही थे कि उन्हें किसी महिला की चीख सुनाई दी. अचानक कान में पड़ी चीख की तेज आवाज आते ही उन के हाथ से चाय का प्याला गिर पड़ा.

उन्होंने आने वाली चीख की ओर गरदन घुमा कर देखा. किंतु उस बारे में कुछ भी अंदाजा नहीं लग पाया. वह अभी अनुमान ही लगा रहे थे कि उन्हें फिर से एक और चीख सुनाई दी. इस बार चीख की आवाजें पहले से महीन, मगर तेज थीं.

वह चीख किसी बच्ची की थी. इसी के साथ चिल्लाने की आवाजें भी आने लगी थीं. दूसरी चीख से जायसवाल को अंदाजा लग गया था कि चीखनेचिल्लाने की आवाजें उन के साथ वाले मकान से ही आ रही हैं.

उस मकान में महेश तिवारी अपनी मां बीतन देवी, पत्नी नीतू तथा 4 बेटियों अपर्णा (15), सुवर्णा (11), अन्नपूर्णा (9) एवं कृष्णा (16) के साथ रहते थे. तिवारी मानसिक तौर पर अस्वस्थ चल रहे थे. उन का अधिकतर समय पूजापाठ में ही बीतता था.

वह अपने पड़ोसियों से अधिक मेलजोल नहीं रखते थे. उन के मकान की दीवारें चारों ओर से काफी ऊंची थीं. सुबोध जायसवाल अभी उन के बारे में सोच ही रहे थे कि वहीं से दोबारा बच्ची के चीखने की आवाज सुनाई दी. फिर तो उन से रहा नहीं गया.

तेज कदमों से वह अपने घर की छत पर चले गए. महेश तिवारी के मकान की ओर गरदन उठा कर झांकते हुए देखने की कोशिश की. वहां से उन के घर का जो दृश्य दिखा, वह होश उड़ाने वाला था. उन्होंने देखा कि महेश तिवारी के कपड़ों पर खून लगा है और वह हाथ में एक खून से सना चाकू लिए अपने घर में टहल रहा था.

सुबोध जायसवाल किसी अप्रिय घटना की आशंका से सिहर उठे. कहीं महेश ने अपने परिवार वालों के साथ कोई हिंसक वारदात न कर डाली हो. उन्होंने तुरंत इस बात की सूचना मोबाइल से पुलिस को दे दी और पड़ोसियों को आवाज दे कर अपने पास बुला लिया.

यह घटना उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के थाना रानीपोखरी के मोहल्ला नागाघेर की थी. बेहद चौंकाने वाली घटना 29 अगस्त, 2022 को घटित हुई थी.

रानीपोखरी थाने के एसएचओ शिशुपाल राणा इस की सूचना पाते ही थानेदार रघुवीर, कांस्टेबल वीर सिंह, सचिन मलिक के साथ मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित महेश तिवारी के घर जा पहुंचे. मकान अंदर से बंद था और उस के चारों ओर पड़ोसियों व अन्य लोगों की काफी भीड़ जुटी हुई थी.

पहले तो राणा ने इस घटना की बाबत सुबोध जायसवाल और अन्य पड़ोसियों से पूछताछ की. उस के बाद तिवारी के मकान का दरवाजा खटखटाया. काफी समय तक दरवाजा नहीं खुलने पर सिपाही वीर सिंह दीवार फांद कर घर में कूद गया और मेन गेट का दरवाजा खोल दिया.

फिर धड़धड़ाती पुलिस महेश के मकान में जा घुसी. अंदर का दृश्य दिल को झकझोर देने वाला था. टीशर्ट और सफेद धोती पहने करीब 55 साल की उम्र का एक आदमी हाथ में खून सना चाकू लिए निडरता से घूम रहा था. पुलिस के साथ मकान में घुस आए कुछ पड़ोसियों ने बताया कि वह आदमी महेश तिवारी है.

मकान में फर्श पर खून से लथपथ 5 लाशें पड़ी थीं. उन में 2 औरतों की लाशें थीं, जबकि 3 लड़कियों की थीं. पड़ोसियों की मदद से पुलिस ने लाशों की पहचान तिवारी की मां, पत्नी और 3 बेटियों के रूप में की. निर्भीकता से खड़े तिवारी को भी तुरंत हिरासत में ले लिया गया.

मकान में एक साथ इतनी संख्या में लाशें देख कर क्या पुलिसकर्मी और क्या सुबोध जायसवाल समेत दूसरे पड़ोसी, सभी हैरान हो गए. यह पूरी तरह से एक सामूहिक हत्याकांड का मामला था.

राणा ने तुरंत यह सूचना एसएसपी दिलीप सिंह कुंवर, एसपी (देहात) कमलेश उपाध्याय और सीओ अनिल शर्मा को दे दी.

थोड़ी ही देर बाद रानीपोखरी थाना अंतर्गत इस सामूहिक हत्याकांड की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम के वायरलैस पर प्रसारित होने लगी थी. घटनास्थल पर पुलिस छानबीन कर आवश्यक तथ्य जुटाने लगी थी.

महेश के घर की किचन में अधजली रोटियां पड़ी हुई थीं. पास में ही टिफिन बौक्स नीचे गिरे हुए थे. संभवत: वे उन की बेटियों के थे, जो स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थीं. महेश की मां की लाश के पास कुछ तह किए गए कपड़े रखे थे.

वारदात की नजाकत को समझते हुए एसएचओ शिशुपाल राणा ने महेश तिवारी को हिरासत में ले लिया था. शुरुआती पूछताछ में महेश ने जो कुछ बताया था, वह उस के द्वारा बदहवासी में दिया गया बयान ही था.

फिर भी उस से मिली जानकारी के अनुसार, राणा ने अनुमान लगाया कि सुबह करीब 6 बजे महेश की पत्नी नीतू बेटियां के लिए नाश्ते की तैयारी कर रही होंगी और बेटियां स्कूल जाने की तैयारी में होंगी. रसोई में लगा गैस सिलिंडर खत्म हो गया होगा और पूजाघर में पूजा कर रहे महेश को जब नीतू ने दूसरा गैस सिलिंडर लगाने को कहा होगा तो महेश भड़क उठा होगा.

इस बारे में महेश ने ही बताया कि जब वह पूजा पर बैठा हुआ था, तब वहां से उठ कर सिलिंडर बदलना संभव नहीं था. ऐसा करता, तब उस की पूजा में बाधा पहुंचती. इस कारण वह पत्नी पर नाराज हो गया था. जबकि उस की नाराजगी का जवाब पत्नी ने ताने से दिया था.

नीतू ने पति महेश को बड़ा पुजारी होने का ताना मारते हुए कहा कि इतना ध्यान तुम अगर अपने कामकाज पर देते तो घर में 4 पैसे भी आते. यह कहते हुए पत्नी ने उसे दिखावे का पुजारी भी कह डाला था. जैसे ही बकबक करती पत्नी ने कामचोर कहा, तब महेश और भी भड़क उठा था.

उस के बाद जो हुआ पत्नी को जरा भी अंदेशा नहीं था. महेश ने आंखें लाल करते हुए पुलिस को बताया था कि वह बौखलाया हुआ पूजा के आसन से उठा और तेजी से रसोई में जा घुसा. वहीं पड़े सब्जी की टोकरी से चाकू उठा लिया. संयोग से वह एक बड़ा और तेज धार वाला चाकू था. उस ने आव देखा न ताव, तुरंत नीतू की गरदन पर चला दिया. एक हाथ से उस के बाल खींचे और दूसरे हाथ से गला रेत डाला.

रसोई से शोरगुल सुन कर दूसरे कमरों से मां को बचाने बेटियां अपर्णा व अन्नपूर्णा रसोई में आ गईं. किंतु उस वक्त महेश पर तो हत्या का जुनून सवार था. तुरंत उस ने बेटियों पर भी चाकू से वार कर दिया. बेटियां बुरी तरह से जख्मी हो गईं. महेश ने उन का भी गला रेत डाला और कई वार शरीर पर भी किए.

अंत में उस ने अपनी मां बीतन देवी और विकलांग बेटी सुवर्णा का भी गला रेत डाला. सभी की चीखें बंद मकान के कमरे से होती हुई आसपास फैल गईं. सुबहसुबह की इस घटना के बारे में जब तक कोई कुछ समझ पाता, तब तक घर में पांचों की मौत हो चुकी थी और महेश बदहवास चाकू लिए इधरउधर टहलने लगा था.

एसएचओ शिशुपाल राणा घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे तभी एसएसपी दिलीप सिंह कुंवर, एसपी (देहात) कमलेश उपाध्याय और सीओ अनिल शर्मा आ गए थे.

सभी अधिकारियों ने वहां पहुंच कर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. उन्होंने भी वारदात के बारे में महेश तिवारी से पूछताछ की. फोरैंसिक टीम ने आवश्यक फोटोग्राफ लिए और खून के नमूने समेत चाकू और दूसरे अहम सामान को जांच के लिए इकट्ठा कर लिया.

तब तक मीडिया भी पहुंच चुकी थी और महेश तिवारी के कुछ रिश्तेदार भी आ गए थे. इस के बाद फोरैंसिक टीम ने मौके की फोटोग्राफी की और वहां पर पड़े खून के नमूने एकत्र कर लिए. सभी लाशों का पंचनामा तैयार कर लिया गया और आगे की काररवाई करते हुए उन्हें पोस्टमार्टम के लिए देहरादून के कोरोनेशन अस्पताल में भेज दिया गया.

अधिकारियों से मिले निर्देशानुसार एसएचओ शिशुपाल राणा ने सामूहिक हत्याकांड का मुकदमा एसआई रघुवीर कप्रवाण की ओर से महेश तिवारी के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया गया.

इस के बाद एसएचओ राणा को महेश की बड़ी बेटी कृष्णा के बारे में जानकारी मिली. कृष्णा उस वक्त अपनी बुआ के पास ऋषिकेश में थी. वहीं रह कर ओंकारानंद सरस्वती निलयम स्कूल में 10वीं की पढ़ाई कर रही थी.

इसी दौरान पुलिस ने महेश के अमेरिका में रह रहे भाई नरेश तथा स्पेन में रह रहे भाई उमेश को भी फोन से इस हत्याकांड की जानकारी दे दी. महेश का बड़ा भाई रमेश अपने पुश्तैनी गांव अतहरा, जिला बांदा, उत्तर प्रदेश में रहता है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मरने वालों की गरदन पर कई वार किए गए थे, जिस से  उन की सांस व भोजन की नलियां कट गई थीं. हालांकि शरीर के अन्य हिस्सों पर चाकू के जख्म के निशान पाए गए थे. सिर्फ विकलांग अन्नपूर्णा के पेट पर चाकू से वार किए गए थे.

पूछताछ में महेश ने अपना जुर्म स्वीकारते हुए बताया कि जब वह पत्नी पर चाकू से वार कर रहा था, तब उस की 2 बेटियां अन्नपूर्णा और अपर्णा ने बचाने की भी कोशिश की थी. मगर वह उन्हें परे धकेल कर पत्नी की मौत की नींद सुलाने में कामयाब हो गया था.

तिवारी परिवार के पांचों शवों का पोस्टमार्टम वारदात के दिन ही रात 7 बजे तक चला था. रात साढ़े 8 बजे तिवारी परिवार के कुछ नजदीकी रिश्तेदार और उन के भाई नरेश पोस्टमार्टम हाउस से लाशों को ले गए थे. उन का अगले दिन अंतिम संस्कार कर दिया गया था.

दूसरी ओर एसएचओ शिशुपाल राणा ने आरोपी महेश को उस का मैडिकल कराने के बाद कोर्ट में पेश कर दिया था, जहां से उसे देहरादून जेल भेज दिया गया.

इस जघन्य हत्याकांड के बारे में तिवारी परिवार के पड़ोसियों ने पुलिस को बताया कि महेश तंत्रमंत्र के चक्कर में रहता था. वह मानसिक तौर पर बीमार किस्म का व्यक्ति था. वह हमेशा डरा हुआ रहता था. उसे हमेशा लगता था कि कोई उसे मार डालेगा.

इस कारण जराजरा सी बात पर आक्रामक हो जाता था. शरीर से ताकतवर होने के कारण लोग उस की उग्रता को देख पीछे हट जाते थे.

इस सामूहिक हत्याकांड के बारे में एसपी (देहात) कमलेश उपाध्याय ने बताया कि महेश तिवारी का यह खूनी खेल लगभग 20 मिनट तक चला था. क्षेत्र का हर इंसान हैरान था कि माला जपने वाले के हाथों ने कैसे यह कत्लेआम कर दिया?

एसएचओ शिशुपाल राणा का कहना है कि हत्यारा महेश तिवारी मौके से कपड़े बदल कर भागने की फिराक में था, यदि वह मौके से पकड़ा नहीं जाता, तब उसे तलाशना मुश्किल हो जाता.

महेश तिवारी की बेटियां अपर्णा व अन्नपूर्णा काफी हंसमुख स्वभाव की थीं. दोनों पढ़ने में भी काफी होशियार थीं. महेश तिवारी के मकान में 10 साल पहले

कुछ समय योग की कक्षाएं भी चलती थीं, जिस में कुछ विदेशी भी योग सीखने आते थे.

महेश तिवारी की 2 बहनें श्याम भवानी व राम भवानी विवाहित हैं. महेश के परिवार का खर्च उस के विदेशों में रहने वाले दोनों भाई उठाते थे. रानीपोखरी स्थित यह मकान भी भाइयों द्वारा ही बनवाया गया था.

कथा लिखे जाने तक हत्यारोपी महेश तिवारी देहरादून जेल में बंद था. इस सामूहिक हत्याकांड की विवेचना एसएचओ शिशुपाल राणा द्वारा की जा रही थी.  द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मासूम किशोरी के साथ वहशीपन का नंगा नाच

घरों में अकेले रहना अब मासूमों के लिए ज्यादा मुफीद नहीं रहा है. चोरी के मकसद से आए चोरों ने मासूम किशोरी के साथ दर्दनाक और दिल दहला देने वाली घटना को अंजाम दिया और फरार हो गए.

यह घटना दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके में 4 अगस्त, 2020 को घटी. मांबाप तो हर रोज की तरह सुबह ही काम पर चले गए थे, वहीं बड़ी बहन भी दोपहर में काम पर चली गई थी. अनुमान है कि शाम के तकरीबन 4 बजे 12-13 साल की किशोरी कमरे में अकेली थी, तभी चोर चोरी के मकसद से घर में घुसे.

अजनबी शख्स को कमरे में देख किशोरी ने शोर मचाया, पर उस की चीख कमरे में ही दब गई. चुप कराने की कोशिश में चोरों ने उस के साथ दरिंदगी की. विरोध करने पर कैंची से उस के सिर और शरीर को बुरी तरह गोद डाला.

घायल होने के बाद भी किशोरी बड़ी बहादुरी से इन चोरों से काफी देर तक जूझती रही. खून से नहाई मासूम को आखिर मरा समझ कर आरोपी फरार हो गए.

काफी देर तक वह बच्ची कमरे में बेसुध रही, उस के बाद जैसेतैसे कमरे से घिसटते हुए वह बाहर आई और पड़ोसी के दरवाजे को खटखटा कर इशारे से खुद की हालत बयां करते हुए फिर बेहोश हो गई. उस के निजी अंगों से लगातार खून बह रहा था.

किशोरी की ऐसी बुरी हालत देख पड़ोसी भी सहम गए. तुरंत ही इस की सूचना पुलिस को दी गई. साथ ही, उस के मातापिता को भी इस हादसे के बारे में बताया गया.

सूचना मिलने पर पश्चिम विहार वेस्ट थाने की पुलिस आई और बच्ची को संजय गांधी अस्पताल में भरती कराया. उस के सिर और हिप्स में किसी धारदार हथियार से कई वार किए गए थे. डाक्टरों ने फौरन ही बच्ची के सिर व कटे हुए हिस्सों में टांके लगाए और हाथोंहाथ एम्स रेफर कर दिया.

किशोरी ने जो बयान दिया, उस के आधार पर इस वारदात में 2 लड़के शामिल हैं. पुलिस के मुताबिक, 13 साल की किशोरी अपने परिवार के साथ पीरागढ़ी में किराए के मकान में रहती है. परिवार मूल रूप से बिहार का रहने वाला है. जिस कमरे में परिवार रहता है, वह बिल्डिंग तीनमंजिला है. इस बिल्डिंग में छोटेछोटे तकरीबन 2 दर्जन कमरे बने हुए हैं. ज्यादातर आसपास की फैक्टरियों में लेबर का काम करते हैं. बच्ची के परिवार में मातापिता और एक बड़ी बहन है. वे सभी एक फैक्टरी में लेबर का काम करते हैं.

तकरीबन साढ़े 5 बजे फोन के जरीए पुलिस को सूचना मिली थी. आशंका है कि बच्ची के साथ 4 बजे के आसपास वारदात हुई.

शुरुआती जांच में उस मासूम किशोरी के साथ सैक्सुअल एसौल्ट की पुष्टि हुई.

पुलिस ने हत्या की कोशिश और पोक्सो एक्ट समेत कई धाराओं में केस दर्ज कर आरोपियों की तलाश में संभावित ठिकानों पर छापेमारी की. तकरीबन 36 घंटे बाद यानी 3 दिन बाद एक आरोपी को पकड़ने का पुलिस ने दावा किया.

पुलिस के मुताबिक, आरोपी ड्रग एडिक्ट है. उस पर पहले से ही चोरी के अलावा दूसरे आपराधिक मामले दर्ज हैं. इस के कारण वह जेल भी जा चुका है.

हाल ही में आरोपी जेल से बाहर आया था. जेल से छूटने के बाद पास के पार्क में ही आरोपी ठहरता था. पुलिस को आरोपी के बारे में सीसीटीवी कैमरे से सुराग हाथ लगा.

घटना को अंजाम दे कर आरोपी फरार होने के बाद आसपास की जगहों पर छिप रहा था. केस की पड़ताल में पुलिस ने क्रिमिनल अपराधियों की हिस्ट्रीशीट खंगाली. इस के अलावा जमानत पर छूट कर आए चोरउचक्कों की लोकेशन का पता किया. सीसीटीवी, पड़ोसियों और 100 से अधिक संदिग्धों से पूछताछ के बाद जांच की सूई इस आरोपी पर आ कर टिकी.

पुलिस के मुताबिक, वारदात के समय आरोपी नशे में था और चोरी के इरादे से कमरे में घुसा था. कमरे में अकेली बच्ची ने जब उसे टोका और शोर मचाने की कोशिश की तो  उस ने दबोच लिया.

आरोपी ने नशे में बेरहमी से लड़की पर कैंची से ताबड़तोड़ वार किए और उसे मरा हुआ समझ कर फरार हो गया.

पुलिस ने जब आरोपी को पकड़ा, तब उस के शरीर पर खरोंच के निशान पाए गए थे. इस से खुलासा यह हुआ कि बहादुर किशोरी ने जम कर मुकाबला किया.

वहीं दूसरी ओर जांच में जुटी टीम का मानना है कि मासूम बेसुध होने तक आरोपियों से मुकाबला करती रही. कमरे में बिखरा खून और पास ही पड़ी कैंची इस ओर इशारा कर रहे थे.

कैंची खून से सनी फर्श पर पड़ी थी. पास ही में सिलाई की मशीन रखी हुई थी. उसी सिलाई मशीन पर कैंची रखी थी. माता, पिता और बड़ी बहन हर रोज की तरह काम पर चले जाते थे. घर में किशोरी के पास मोबाइल फोन रहता था, पर वह बंद था.

मासूम किशोरी का एम्स में इलाज चल रहा है और वह जिंदगी और मौत से जूझ रही है. पर, उस ने अपने ऊपर हो रहे जुल्म का डट कर विरोध किया और उन से जम कर जूझी भी. वहीं जेल से छूट कर आए अपराधियों पर पुलिस का नकेल न कस पाना ऐसे अपराधों को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है.

लगता है, समाज में ओछी यानी गिरती हुई सोच और बदली मानसिकता पर लगाम लगा पाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है, तभी तो इनसानियत यों शर्मसार हो रही है. यही वजह है कि आएदिन मासूम बच्चियों व किशोरियों पर हमले की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं.

कुंवारे थे, कुंवारे ही रह गए – भाग 3

शादी कब और कहां होगी, यह वह बाद में बता देगी. उस ने यह भी कहा कि शादी से कुछ दिनों पहले दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के पास स्थित आश्रम में पहले लड़कियां दिखाई जाएंगी, उन में वे जिस लड़की को पसंद करेंगे, उसी से उन की शादी कराई जाएगी. जिन के लड़कों की शादी नहीं हुई थी, उन्हें यह सौदा बुरा नहीं लगा.

वे चंदा देने के लिए तैयार हो गए. इस के बाद अनीता तो चली गई, सुशीला और मोनू शादी कराने वाले लड़कों के घर वालों से चंदा वसूल करने लगे.

कुछ जगह चंदा लेने के लिए सुशीला और मोनू के साथ अनीता भी गई थी. इन में कुछ लोग ऐसे भी थे, जो किसी तरह गुजरबसर कर रहे थे. ऐसे लोगों ने बेटे की शादी के लिए कर्जा ले कर सुशीला को पैसे दिए.

रोहतक के राजबीर और मोहन के गांव बोहर में सुशीला की रिश्तेदारी थी. सुशीला ने उन के गांव जा कर ऐसे लोगों के बारे में पता किया, जो शादी करना चाहते थे. गांव में रिश्तेदारी होने की वजह से सुशीला पर विश्वास कर के मोहन ने 45 हजार तो राजबीर ने 50 हजार रुपए उसे दे दिए. इसी तरह खरखौदा के संदीप ने शादी के लिए सुशीला को 45 हजार रुपए दिए थे. उस के पास पैसे नहीं थे तो घर वालों ने उधार ले कर उसे 45 हजार रुपए दिए थे.

खरखौदा के ही सुरेश, अंशरूप, पवन, राजेंद्र, मुनेश, जौनी, राकेश और साबू, सोनीपत के अमित, रोहतक के गांव हुमायूंपुर के संतोष और लक्ष्मी, निलौठी के असीक और रामवीर, मोहाना के राजू, बोहर के सत्यनारायण, कृष्ण, मोहन, राजवीर और कुलदीप, रोहतक के गांव निडाना के रमेश, अनिल, धनाना के शिवकुमार, जींद के अमरजीत, संजीव, झज्जर के बहराना गांव के जगवीर सहित कई लोगों ने शादी के लिए सुशीला को पैसे दिए.

ठगी के शिकार सब से ज्यादा खरखौदा के ही हुए हैं. इन की संख्या 25 से भी ज्यादा है. खरखौदा का रहने वाला सुरेश कुमार खेती करता था. उस का दूध का भी धंधा था. घर में बुजुर्ग विधवा मां थी.

आखिर बूढी मां पर वह कब तक बोझ बना रहता. सुशीला ने उस की मां से कहा कि वह सुरेश की शादी अनाथाश्रम की लड़की से करा देगी. इस के लिए 45 हजार रुपए दान देने पड़ेंगे. घर में 10 हजार रुपए ही थे. बाकी के 35 हजार रुपए उस ने ब्याज पर ले कर दिए.

खरखौदा का संदीप सब्जीमंडी में सब्जी बेचता था. बूढ़ी मां की इच्छा थी कि संदीप की शादी हो जाए. कई लोगों ने सुशीला को अनाथाश्रम की लड़की से शादी कराने के लिए पैसे दिए थे, इसलिए संदीप की मां भी उस के झांसे में आ गई. कुछ पैसे घर में थे और कुछ पैसे उधार ले कर सुशीला को दे दिए थे.

इसी तरह खरखौदा के वार्ड नंबर 3 निवासी स्कूटर रिपेयरिंग का काम करने वाले जौनी की दादी ने उस की दुलहन के लिए दान के रूप में पैसे दिए थे. दादी ने सोचा था कि पोते की बहू आ जाएगी तो दो जून की रोटी मिलने लगेगी.

सुशीला और अनीता ने सभी से 27 दिसंबर को शादी कराने के लिए कहा था. कुछ लोगों से यह भी कहा था कि शादी से 10-11 दिन पहले उन्हें दिल्ली में लड़कियां दिखा दी जाएंगी. उन में से शादी के लिए लड़की पसंद कर लेना.

कुंवारों को टालती रही अनीता

लड़की दिखाने के लिए मोहाना गांव के रोहताश ने 16 दिसंबर को अनीता को फोन किया तो उस ने कहा कि अनाथाश्रम की लड़कियों की शादी में मदद करने के लिए कुछ विदेशी आने वाले थे, लेकिन बर्फबारी होने की वजह से वे नहीं आए. इसलिए अब लड़की दिखाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया है. अब 27 दिसंबर को सीधे सामूहिक विवाह ही होगा.

जिन लोगों ने अनीता और सुशीला को लड़की दिखाने के लिए फोन किया था, सभी से यही कह दिया गया. लड़कों ने सोचा कि लड़की नहीं दिखाई जा रही, कोई बात नहीं शादी तो हो जाएगी.

इस के बाद सभी को फोन कर के बता दिया गया कि 27 दिसंबर को दिल्ली में शादी होगी. इस के लिए दिल्ली से खरखौदा बस आएगी. उस बस से सभी लोग दिल्ली पहुंच जाना, जहां तीसहजारी कोर्ट के पास स्थित एक अनाथाश्रम में सभी की शादी होगी. 27 दिसंबर को जो हुआ, वह बताया ही जा चुका है.

यह सारी योजना अनीता की थी. सुशीला और मोनू एजेंट के रूप में काम कर रहे थे. शादी के नाम पर चंदे के रूप में वसूली गई रकम अनीता लेती थी. उस में से कुछ पैसे सुशीला और मोनू को मिलते थे.

पुलिस ने हिसाब लगाया तो इन लोगों ने शादी के नाम पर 40 से ज्यादा लड़कों से 25 से 30 लाख रुपए वसूले थे. पुलिस यह भी पता कर रही है कि इन लोगों के साथ और लोग तो नहीं थे. थानाप्रभारी वजीर सिंह ने ठगे गए युवकों को आश्वासन दिया है कि उन लोगों से पैसे वसूल कर उन के पैसे वापस कराने की कोशिश की जाएगी.

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दरअसल, सोनीपत के खरखौदा में लड़कों के हिसाब से लड़कियां बहुत कम हैं. इसी वजह से यहां सभी लड़कों की शादियां नहीं हो रही हैं.

मजे की बात यह है कि चुनाव के दौरान जींद जिले में कुंवारा संगठन बना था. उन्होंने शादी की उम्र पार करने वाले लड़कों की शादियां कराने की मांग उठाई थी. तब एक नेता ने बिहार से लड़कियां ला कर उन की शादी करवाने का आश्वासन दिया था.

दुलहन के नाम पर अनोखी ठगी

उत्तराखंड के बनबसा में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) की प्रभारी एसआई मंजू पांडेय को एक दिन एक व्यक्ति ने खास सूचना दी. उस ने बताया कि ऊधमसिंह नगर के खटीमा इलाके में कुछ लोग विवाह की चाह रखने वाले युवकों की शादी कराने के लिए लड़कियां उपलब्ध कराते हैं.

इस के एवज में वह उन से मोटी रकम वसूलते हैं. बाद में लड़कियां मौका मिलने के बाद वहां से लौट जाती हैं या फिर ठग गिरोह द्वारा अन्यत्र भेज दी जाती हैं.

एसआई मंजू पांडे ने यह जानकारी सीओ (टनकपुर) आर.एस. रौतेला को दी. सीओ आर.एस. रौतेला ने मंजू पांडेय के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में हैडकांस्टेबल लक्ष्मणचंद, रवि जोशी, कांस्टेबल गणेश सिंह के अलावा स्थानीय लोग और एनजीओ के लोग शामिल थे.

साथ ही उन्होंने योजना बना कर उन्हें अपने हस्ताक्षरयुक्त कुछ नोट व चैक दे दिए. इस के बाद एसआई मंजू पांडेय ने ठग गिरोह से किसी लड़के की शादी कराने के बारे में बात की.

निश्चित तारीख को चकरपुर मंदिर परिसर में शादी कराने की तैयारियों का नाटक करते हुए सीओ के हस्ताक्षर वाले चैक और नोट ठग गैंग के सदस्य को दे दिए. कुछ देर बाद खटीमा की ओर से 2 महिलाएं एक बाइक से वहां पहुंचीं. फिर एक महिला बस में सवार हो कर आई.

वह टनकपुर से आई थी. उन के पहुंचते ही विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं. उसी दौरान एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की दूसरी टीम वहां पहुंच गई. टीम ने पुरुष और तीनों महिलाओं को हिरासत में ले कर उन के पास से हस्ताक्षरयुक्त चैक और नोट अपने कब्जे में ले लिए.

पूछताछ में पता चला कि गिरोह में कलक्टर फार्म खटीमा की रहने वाली रजवंत कौर अपने बेटे सतनाम के साथ ठगी का यह धंधा कर रही थी. अन्य 2 महिलाओं में थाना नानकमता के गांव दहला निवासी गुरमीत कौर और टनकपुर की विष्णुपुरी कालोनी निवासी आरती कपूर थी. इन सभी के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 120बी, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से इन चारों को जेल भेज दिया गया.

भिखारी बनाने वाला खतरनाक गैंग – भाग 3

बिहार राज्य के सीवान जिला अंतर्गत एक गांव है-गोरिया कोठी पिपरा. इसी गांव में मुसाफिर मांझी अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे परवेश कुमार, रमेश कुमार तथा सुरेश कुमार थे.

मुसाफिर किसान था. उस के पास मात्र 3 बीघा उपजाऊ जमीन थी. जमीन की उपज से ही वह परिवार का भरणपोषण करता था. उस का बड़ा बेटा परवेश कृषि कार्य में उस का हाथ बंटाता था.

परवेश से छोटा रमेश था. वह तेज दिमाग का था. उस का मन किसानी में नहीं लगता था. मामूली पढ़ाई के बाद वह रोजीरोटी की तलाश में कानपुर आ गया था. यहां वह कई महीने तक भटकता रहा, उस के बाद उसे यशोदा नगर की एक प्लास्टिक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई.

नौकरी लग गई तो उस की शादी भी जल्दी हो गई. कुछ समय बाद वह अपनी पत्नी छठी देवी को भी कानपुर शहर ले आया और नौबस्ता थाना क्षेत्र के एस ब्लौक नाला रोड पर रहने लगा.

छोटे बेटे सुरेश का मन जब पढ़ाई से उचट गया तो मुसाफिर ने उसे किसानी के काम में लगा लिया. कुछ समय बाद सुरेश सीवान चला गया. वहां वह एक दुकान पर काम करने लगा और अच्छा पैसा कमाने लगा.

सुरेश जब कमाने लगा तो मुसाफिर ने उस का विवाह सीवान निवासी गोपी की बेटी गुलाबो के साथ कर दिया. शादी का सारा खर्चा मुसाफिर व उस के बेटे रमेश ने उठाया था.

शादी के एक साल बाद गुलाबो ने एक बेटी को जन्म दिया, लेकिन महीने भर बाद ही उस की मौत हो गई. बेटी की मौत का सदमा सुरेश को इस कदर लगा कि वह गम भुलाने के लिए शराब पीने लगा. धीरेधीरे वह शराब का लती बन गया.

पति का शराब पीना गुलाबो को बेहद खलता था, क्योंकि वह सारा पैसा शराब पीने में ही खर्च कर देता था. अपनी कमाई का एक भी पैसा न घर वालों को देता था और न ही पत्नी गुलाबो को.

शराब पीने को ले कर अब पतिपत्नी के बीच तल्खियां बढ़ने लगी थीं. दोनों के बीच झगड़ा और मारपीट भी होने लगी थी. पिता व भाइयों के समझाने के बावजूद वह मनमानी करता था.

पति की शराबखोरी और प्रताड़ना से जब गुलाबो आजिज आ गई तो वह उसे छोड़ कर मायके सीवान आ गई. कुछ माह बाद सुरेश पत्नी को लेने आया. लेकिन गुलाबो ने उस के साथ जाने से साफ इंकार कर दिया.

कालांतर में गुलाबो के प्रेम संबंध एक रिश्तेदार युवक से हो गए, बाद में उस ने उसी युवक से शादी कर ली और सुखमय जीवन व्यतीत करने लगी.

पत्नी ने साथ छोड़ा, तो सुरेश का मन गांव में नहीं लगा. वह गांव छोड़ कर अपने भाई रमेश के पास कानपुर शहर आ गया.

अपनी कमाई का आधा पैसा वह भाई के हाथ पर रखने लगा. शराब की लत अब भी उस की नहीं छूटी थी. इस को ले कर उसे भाई की फटकार भी सुननी पड़ती थी.

सुरेश मांझी मजदूर था. काम की तलाश में वह हर रोज सुबह 8 बजे किदवई नगर लेबर मंडी आ जाता था. काम मिल जाता तो ठीक वरना घर वापस लौट आता था.

अप्रैल, 2022 की बात है. एक रोज सुरेश मांझी काम की तलाश में लेबर मंडी में बैठा था. तभी एक आदमी उस के पास आ कर बैठ गया और बातचीत करने लगा. बातों में उलझा कर उस ने सुरेश को दिल्ली में नौकरी दिलवाने और अच्छा पैसा कमाने का लालच दिया. सुरेश उस के लालच में फंस गया.

दरअसल, सुरेश को अपने जाल में फंसाने वाला कोई और नहीं, भीख मंगवाने वाले गिरोह का सक्रिय सदस्य विजय नट था. वह मछरिया के गुलाबी बिल्डिंग के पास रहता था.

विजय नट कानपुर की लेबर मंडियों में सक्रिय रहता था. वहां वह 18 से 25 साल के युवकों को फंसाता था. फिर हाथपैर से अपंग बना कर भीख मंगवाने वाले गिरोह को बेच देता था. उस के गिरोह में उस की बहन तारा तथा बहनोई राजेश भी था.

विजय का एक रिश्तेदार राज नागर था. वह अपनी मां आशा के साथ किदवई नगर नटवन टोला में रहता था. लेकिन पिछले 3 साल से वह नांगलोई (दिल्ली) की कच्ची बस्ती में रहने लगा था. उस का कानपुर भी आनाजाना लगा रहता था.

राज नागर भी भीख मंगवाने वाले गिरोह का सदस्य था. वह विजय नट से युवकों को खरीदता था, फिर ऊंचे दाम पर दिल्ली के भीख मंगवाने वाले गिरोह को बेच देता था. कानपुर तथा उस के आसपास के क्षेत्र के कई युवकों को वह इस गिरोह को बेच चुका था.

सुरेश मांझी को अपने जाल में फंसाने के बाद विजय नट उसे अपने घर ले आया. यहां उस ने सुरेश को 2 दिन रखा और मीट मुरगे के साथ शराब पिलाई.

उस के बाद विजय सुरेश को अपने बहनबहनोई के डेरे पर झकरकटी ले आया. यहां आने के कुछ दिन बाद ही उस का उत्पीड़न शुरू हो गया. विजय की बहन तारा व बहनोई राजेश ने जुल्म की सारी हदें पार कर दीं.

सुरेश को भिखारी बनाने के लिए उन दोनों ने उस के हाथपैर के पंजे तोड़ दिए तथा उस की आंखों में कैमिकल डाल कर उसे अंधा बना दिया. यही नहीं, उन्होंने उस के शरीर को लोहे की गरम रौड से जगहजगह दागा तथा चेहरे पर उस की दाढ़ के पास कट लगा कर उस का चेहरा बिगाड़ दिया. इस के बाद वे दोनों सुरेश से भीख मंगवाने लगे.

लगभग 2 माह बाद विजय नट ने राज नागर व उस की मां आशा के हाथ सुरेश को 25 हजार रुपए में बेच दिया. राज नागर व आशा, सुरेश को गोरखधाम एक्सप्रेस से दिल्ली लाए और नांगलोई की कच्ची बस्ती में रखा.

इस के बाद वह सुरेश से भीख मंगवाने लगा. वह सुरेश को व्यस्ततम चौराहे पर छोड़ देता और उस पर निगरानी रखता. शाम तक जो पैसे मिलते, वह सब अपने पास रख लेता था.

राज नागर का संबंध भीख मंगवाने वाले दूसरे गिरोह से भी था. कुछ समय बाद उस ने सुरेश को दूसरे गिरोह को 70 हजार रुपए में बेच दिया.

अब दूसरा गिरोह सुरेश से भीख मंगवाने लगा. इस गिरोह ने फुटपाथ पर डेरे पर रहने की उस की व्यवस्था कर दी थी. इस डेरे में कई और लोग थे, जो भीख मांगते थे. गिरोह के सदस्य डेरे पर हर समय नजर रखते थे. सुरेश को ये लोग नांगलोई के व्यस्त चौराहे पर छोड़ देते.

रेड लाइट होने पर वह भीख मांगता था. उस की दशा देख कर लोग उसे 5-10 रुपए के नोट भीख में देते. इस तरह शाम तक वह हजार-2 हजार रुपया भीख में पा जाता. इस रकम को गिरोह के सदस्य अपने कब्जे में कर लेते थे.

डेरे पर सुरेश का उत्पीड़न भी किया जाता. उसे कम खाना दिया जाता तथा नशे का इंजेक्शन लगाया जाता. इस वजह से सुरेश कमजोर हो गया और वह बीमार पड़ गया. उस के शरीर के घावों में संक्रमण फैल गया और शरीर से बदबू भी आने लगी.

सुरेश भीख मांगने से लाचार हुआ तो गिरोह के सरगना की चिंता बढ़ गई. उस ने सुरेश को डाक्टर को दिखाया तो उस ने 40-45 हजार रुपए इलाज का खर्च बताया.

इस के बाद सरगना ने राज नागर को सारी बात बताई और सुरेश का इलाज किसी सरकारी अस्पताल में कराने की सलाह दी. साथ ही सुरेश के बदले किसी दूसरे युवक को देने का दबाव बनाया.

राज नागर ने तब विजय से बात की और जल्द ही किसी अन्य युवक को सौंपने की बात कही. विजय ने उसे आश्वासन दिया कि जल्दी ही उस का काम हो जाएगा.

इधर सुरेश की हालत बिगड़ी तो राज नागर और आशा उसे दिल्ली से कानपुर लाए और 30 अक्तूबर, 2022 की सुबह 4 बजे किदवई नगर चौराहा स्थित एक दुकान के बाहर छोड़ कर भाग गए.

पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 9 नवंबर, 2022 को आरोपी राज नागर व आशा को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

विजय नट ने अदालत में 5 दिसंबर, 2022 को आत्मसमर्पण कर दिया था जबकि तारा व राजेश फरार थे. पुलिस उन की तलाश में जुटी थी.

रमेश अपने भाई के इलाज से संतुष्ट नहीं था. उस का आरोप था कि उसे हैलट, उर्सला और कांशीराम अस्पताल के चक्कर लगवाए जा रहे थे. उस ने अपनी पीड़ा पार्षद प्रशांत शुक्ला को बताई तो वह मदद को आगे आए.

उन्होंने दिल्ली निवासी एक पत्रकार मित्र से बात की तो उन्होंने सुरेश मांझी के इलाज की व्यवस्था आई केयर चैरिटेबल अस्पताल, दरियागंज में करा दी. कथा लिखने तक सुरेश का इलाज इसी अस्पताल में हो रहा था. डाक्टरों ने बताया कि उस की एक आंख की रोशनी वापस आ सकती है.       द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

हीरे की ललक में उमड़े लोग – भाग 3

साढ़े 3 सौ रुपए के इनवैस्टमेंट से  लखपति बनने का सपना देख रहे बाबूलाल ने बताया, ‘‘इस पहाड़ी के ऊपर एक गुफा है, वहां लोगों को ब्लैक डायमंड जैसे पत्थर अधिक मिल रहे हैं. मेरे पास ऐसे करीब 50 पत्थर जमा हो चुके हैं. इन की जांच कराऊंगा. ब्लैक डायमंड हुआ तो ठीक नहीं तो सुनार प्रति कंकड़ 100 रुपए के हिसाब से खरीद लेगा तो यहां आनेजाने का अपना खर्च तो निकल ही जाएगा.’’

हीरा पा कर मालामाल हो चुके लोगों की कहानी

हीरा पाने की ललक में नदी की रेत मिट्टी छान रहे लोग बेमतलब ही अपना वक्त नहीं बरबाद कर रहे, बल्कि लोग एक आस ले कर यहां पहुंचते हैं. मई 2022 में ऐसे ही एक मजदूर प्रताप सिंह की किस्मत चमकी थी, जब प्रताप सिंह यादव नाम के एक मजदूर को जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.

प्रताप सिंह कुआं का रहने वाला है और उस की माली हालत ठीक नहीं थी. प्रताप यादव फरवरी में सरकारी हीरा कार्यालय गया और 4 गुणा 4 मीटर की एक जमीन हीरा खदान के लिए स्वीकृत करा ली. इस के बाद हीरा ढूंढने के लिए वह दिनरात मेहनत करने लगा.

3 महीने की कड़ी मेहनत ने उस की झोली में हीरा डाल दिया. इस तरह रातोरात गरीब मजदूर लखपति बन गया. हीरे का वजन 11.88 कैरट निकला. जिस की कीमत करीब 60 से 70 लाख रुपए आंकी गई. प्रताप ने इसे हीरा कार्यालय में जमा कर दिया है. प्रताप का कहना है कि हीरे की नीलामी से मिलने वाले पैसे से उस की आर्थिक स्थिति सुधारेगी और बच्चों की पढ़ाई और भरणपोषण का खर्च निकालेगा.

पन्ना में सब से बड़ा 44 कैरेट का हीरा वर्ष 1961 में रसूल मुहम्मद को मिला था. 67 साल बाद 2018 में 4 दोस्तों को 42 कैरेट से ज्यादा वजन का हीरा मिला था. यह हीरा उन्हें पटी की खदान में 9 अक्तूबर, 2018 को मिला था. इस खदान का पट्टा मोतीलाल प्रजापति के नाम पर था.

हीरा कार्यालय से मोतीलाल को इस हीरे के एवज में 2.25 करोड़ के लगभग कीमत मिली थी. पन्ना के बेनीसागर मोहल्ले में रहने वाले मोतीलाल अब भी हीरा खदानों में हीरा तलाशने का काम करते हैं. जब उन से पूछा गया कि करोड़ों का हीरा मिलने के बाद भी इस काम को नहीं छोड़ा तो उन का जबाब था, ‘‘मैं ने जो जिंदगी जी है, वो मेरे बच्चे न जिएं, उन को अच्छी शिक्षा देना और पढ़ाई कराना मेरा सपना है. इसी सपने को पूरा करने के लिए अब भी हीरा खदानों की खाक छान रहा हूं.’’

हीरा मिलने पर हो जाते हैं वारेन्यारे

47 साल के मोतीलाल 4 भाईबहनों में सब से बड़े हैं और केवल 10वीं तक की पढ़ाई उन्होंने की है. घर की माली हालत ठीक न होने से पढ़ाई बीच में छोड़ मजदूरी करनी पड़ी. अभी परिवार में मां, पत्नी के अलावा 2 बेटे व एक बेटी है.

मोतीलाल अपने 4 पार्टनरों के साथ 20 सालों से पटी की अलगअलग खदान में हीरे की खाक छानते रहे हैं. वे दोस्तों के साथ हीरापुर टपरियन की खदान में हीरे की तलाश में सुबह 5 बजे घर से निकल जाते हैं.

दोपहर बाद वहां से ईंट भट्ठे पर काम करने चले जाते हैं, वहां से शाम ढलने के बाद लौटते हैं.

मोतीलाल कहते हैं, ‘‘खदान में काम करते हुए 25 साल हो गए. पिछले साल उन्हें कम क्वालिटी का 5 कैरेट का हीरा मिला था. 1.62 लाख रुपए में नीलाम हुआ था. 11.50 प्रतिशत टैक्स कट गया था. शेष रकम 4 पार्टनरों में बंट गई.

इसी तरह 22 फरवरी, 2022 को पन्ना जिले की पटी की उथली हीरा खदान से किशोरगंज बड़ा बाजार में रहने वाले सुशील कुमार शुक्ला को 26.11 कैरेट का जैम क्वालिटी का हीरा मिला था.

सुशील कुमार शुक्ला हीरा मिलने की कहानी बताते हैं, ‘‘मैं 20 साल से बड़े भाई राजकिशोर शुक्ला के साथ हीरा पाने के लिए खुदाई कर रहा था, उस दिन हमारी किस्मत चमकी और हमें वो नायाब हीरा मिल गया.’’

नयापुवा पन्ना निवासी 45 साल के रामप्यारे विश्वकर्मा 16 साल की उम्र में छतरपुर से पन्ना आए थे. उन के बड़े भाई लोहा, पत्थर का काम करते थे. यहां आ कर उन्होंने साइकिल पंक्चर की दुकान खोल ली. बेटा भरत बाइक रिपेयरिंग करता है. 5 साल पहले पत्नी की बीमारी से मौत हो गई. 2 बेटियां हैं, बड़ी बेटी मोहिनी 12वीं में तो छोटी रोहिणी 6वीं में पढ़ रही है.

पिछले 30 सालों से वह भी हीरा तलाश रहे थे. उन की तलाश पूरी हुई 24 फरवरी, 2021 को जब उन्हें 14.9 कैरेट का हीरा मिला. उन की खदान में कुल 7 पार्टनर थे.

हीरे की नीलामी से 39 लाख रुपए मिले थे, जिसमें से हर एक के हिस्से में 5.57 लाख रुपए आए थे. रामप्यारे के हिस्से में मिले पैसे वे बेटियों की शादी के लिए जमा कर चुके हैं और अब भी हीरे की तलाश के लिए खदान जाते हैं.

मई 2022 में इटवां कला की रहने वाली चमेली बाई को 2.08 कैरेट का बेशकीमती हीरा कृष्ण कल्याणपुर पट्टी की उथली खदान से मिला था. चमेली बाई 10 साल से पन्ना में किराए के मकान में अपने परिवार के साथ रह रही हैं, लेकिन अभी तक मकान नहीं बनवा पाई.

इसी मकसद को ले कर उस ने फरवरी महीने में हीरा कार्यालय से हीरा खदान का पट्टा जारी कराया था. 200 रुपए के चालान में उसे 4×4 मीटर की खदान स्वीकृत हुई, जिस के बाद उस ने खदान में हीरा तलाशने का काम किया और मई के महीने में उसे 2.08 कैरेट का उज्ज्वल किस्म का हीरा मिला था.

ऐसे परखा जाता है असली हीरा

भारत करीब 3 हजार सालों से हीरे के उत्पादन में नंबर वन बना हुआ है. इंडियन ब्यूरो औफ माइंस की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हीरा मध्य प्रदेश के पन्ना जिले, आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा और कोल्लूर खान के अलावा छत्तीसगढ़ के देवभोग में मिलता है.

कोहिनूर नाम का प्रसिद्ध हीरा गोलकुंडा में ही मिला था, जो वर्तमान में ब्रिटेन के राजशाही मुकुट की शोभा बढ़ा रहा है. हीरा रासायनिक तौर पर कार्बन का ही रूप है, जो निष्क्रिय होने के साथ पानी में घुलनशील नहीं है. गुजरात के सूरत शहर में ज्यादातर हीरे को काटने और पौलिश करने का काम होता है. हीरे को

700 डिग्री तापमान से अधिक गर्म करने पर वह जल कर कार्बन डाई आक्साइड के रूप में बदल कर राख जैसा कोई अवशेष नहीं छोड़ता है.

हीरे की परख रखने वाले जौहरी बताते हैं कि असली हीरे के अंदर की बनावट ऊबड़खाबड़ होती है, लेकिन कृत्रिम या बनावटी हीरा अंदर से सामान्य दिखता है.

असली हीरे में कुछ न कुछ खांचे होते है जो बारह सौ गुणा ताकतवर माइक्रोस्कोप की मदद से देखे जा सकते हैं.

हीरे को अखबार पर रखें और उस के पार से अक्षरों को पढ़ने की कोशिश करें, अगर  टेढ़ी लकीरें दिखें तो हीरा नकली है. हीरे को पराबैंगनी किरणों में देखें, नीली आभा के साथ चमकता है तो हीरा असली है. यदि पीली हरी या स्लेटी रंग की आभा निकले तो यह मोइसा नाइट नाम का पत्थर है.

हीरा प्रकाश को रिफ्लेक्ट करता है. असली हीरा बहुत कठोर होता है. हीरे को रगड़ने पर किसी भी प्रकार की खरोंच नहीं आती है. एक गिलास में पानी ले कर उस में हीरा डालने पर असली हीरा अपने घनत्व की अधिकता के कारण पानी में डूब जाता है लेकिन नकली हीरा पानी में तैरने लगता है.

हीरे के कोणों से आरपार देखने पर इंद्रधनुष की तरह सातों रंग दिखाई दें तो समझिए हीरा असली है. जिस तरह चश्मे के ग्लास पर भाप चढ़ जाती हैं, उसी तरह अगर मुंह की भाप हीरे पर जम जाए तो समझो हीरा नकली है. असली हीरे पर नमी नहीं जमती है.

सरकार की उदासीनता की वजह से पन्ना में हीरा उद्योग बंद होने के कगार पर है. अधिकांश हीरा खदानें बंद हो गई हैं. ऐसे में रुंझ नदी में हीरा मिलने की खबर से पन्ना का हीरा अचानक फिर चर्चा में आ गया है.

सरकार को चाहिए कि पन्ना के हीरा उद्योग को संरक्षित करे और वन भूमि विवाद के कारण जो हीरा खदानें बंद हो गई हैं, उन्हें भी चालू कराया जाना चाहिए, जिस से गरीबों की रोजीरोटी और अमीरों का शौक हमेशा के लिए सुरक्षित रह सके.    द्य

उजले लोगों का ये है काला धंधा – भाग 2

यह गिरोह खूबसूरत लड़कियों की मदद से रईस लोगों को ब्लैकमेल करता है. इस गिरोह के लोग पहले तो रईस लोगों की पहचान करते हैं, उस के बाद उन्हें फंसाने के लिए उन की दोस्ती गिरोह की खूबसूरत लड़कियों से करा देते हैं. दोस्ती के लिए वे फार्महाउसों पर सेलिबे्रट पार्टियां आयोजित करते हैं. इन पार्टियों में पीनेपिलाने का दौर चलता है.

उसी बीच लड़कियां शिकार को अपने मोबाइल नंबर दे देती हैं और उन के नंबर ले लेती हैं. इस के बाद पहले बातचीत और उस के बाद मुलाकातों का दौर शुरू हो जाता है. कुछ ही मुलाकातों में लड़कियां अपने शिकार को अपनी सुंदरता के मोहपाश में इस कदर बांध लेती हैं कि वे उन के साथ हमबिस्तर होने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

शिकार को तड़पा कर लड़कियां हमबिस्तर होने का प्रोग्राम बनाती हैं. इस के लिए वे कई बार जयपुर से बाहर भी चली जाती हैं. रईसों के साथ उन के हमबिस्तर होने के समय गिरोह के सदस्य लड़की की मदद से गुप्त कैमरे से वीडियो क्लिपिंग बना लेते हैं. अगर इस में वे सफल नहीं हो पाते तो लड़कियां हमबिस्तर होने के बाद अपने अंतर्वस्त्र सुरक्षित रख लेती हैं.

इस के बाद उस रईस को धमकाने का काम शुरू होता है. लड़की अपने रईस शिकार को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी देती है. ज्यादातर मामलों में लड़कियां पुलिस में शिकायत कर भी देती हैं. इस के बाद फरजी पत्रकार और वकील का काम शुरू होता है. वे उस रईस को बदनामी का डर दिखा कर समझौता कराने की बात करते हैं. जरूरत पड़ने पर बीच में पुलिस वाले भी आ जाते हैं.

रईस अपनी इज्जत बचाने के लिए उन से सौदा करता है. रईस की हैसियत देख कर 10-12 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक मांगे जाते हैं. गिरोह के लोग शिकार पर दबाव बनाए रखते हैं. आखिर रईस को सौदा करना पड़ता है. उस से पैसे लाने का काम अलग लोग करते हैं.

आनंद शांडिल्य ने पुलिस को बताया था कि यह गिरोह जयपुर सहित राजस्थान के बड़े शहरों के नामचीन प्रौपर्टी व्यवसायियों, बिल्डरों, मोटा पैसा कमाने वाले डाक्टरों, ज्वैलर्स, होटल रिसौर्ट संचालक और ठेकेदार आदि को अपना शिकार बनाता. इस काले धंधे में एक एनआरआई युवती भी शामिल है.

गिरोह के लोग लड़की को प्लौट या फ्लैट खरीदने के बहाने प्रौपर्टी व्यवसाई अथवा बिल्डर के पास भेज कर उसे फांस लेते हैं. इसी तरह होटल रिसौर्ट संचालक के पास नौकरी के बहाने भेजा जाता है तो डाक्टर के पास इलाज के बहाने. सौदा होने के बाद युवती और उस के गिरोह के सदस्य स्टांप पर लिख कर देते हैं कि दुष्कर्म नहीं हुआ है.

इस के पहले जयपुर में कभी इस तरह का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया था. इसलिए एसओजी के लिए हकीकत जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण था. अधिकारियों ने आपस में सलाहमशविरा कर के एसओजी के आईजी एम.एन. दिनेश के निर्देशन में हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह की खोजबीन शुरू कर दी.

उसी बीच इस गिरोह से पीडि़त जयपुर के वैशालीनगर निवासी डा. सुनीत सोनी ने एसओजी में शिकायत कराई कि उन का वैशालीनगर में हेयर ट्रांसप्लांट का क्लीनिक है. कुछ महीने पहले एक लड़की हेयर ट्रांसप्लांट कराने के लिए उन की क्लीनिक में आई. तभी उन का उस लड़की से संपर्क हुआ. लड़की ने जल्दी ही उन्हें प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद दोनों पुष्कर गए और वहां एक रिसौर्ट में रुके. 2 दिनों बाद 2 लड़के मीडियाकर्मी बन कर आए और लड़की से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दे कर उन से एक करोड़ रुपए मांगे.

डाक्टर ने रुपए देने से मना किया तो लड़की ने उन के खिलाफ पुष्कर में दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करा दिया. जांच के बाद पुलिस ने डा. सुनीत सोनी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. डाक्टर करीब ढाई महीने तक जेल में रहे. इस बीच डाक्टर से गिरोह के वकील सहित अलगअलग लोगों ने संपर्क किया.

गिरोह के सदस्यों ने अदालत में लड़की के बयान बदलवाने के लिए डाक्टर से डेढ़ करोड़ रुपए की मांग की. आखिर सौदा एक करोड़ रुपए में तय हो गया. पैसे लेने के बाद गिरोह के लोगों ने लड़की के बयान बदलवा दिए. उस समय डा. सुनीत सोनी ने जयपुर के थाना वैशालीनगर में इस मामले की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन उस समय थाना पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की थी.

डा. सुनीत सोनी की शिकायत पर जांच करते हुए एसओजी ने 24 दिसंबर, 2016 को इस हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग करने वाले गिरोह का खुलासा किया. एसओजी ने गिरोह के 2 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की गई तो गिरोह में शामिल लड़कियों के बारे में पता चल गया. इन्हीं लोगों से गिरोह की एनआरआई लड़की रवनीत कौर उर्फ रूबी के बारे में पता चला था. इस के अलावा एक लड़की कल्पना उत्तराखंड की थी.

इस के बाद एसओजी इस पूरे गिरोह को गिरफ्तार करने में जुट गई. धीरेधीरे लोग पकड़े भी जाने लगे. एसओजी उत्तराखंड के ऊधमसिंहनगर से कल्पना को गिरफ्तार कर के जयपुर ले आई. पूछताछ में कल्पना ने बताया कि गिरोह ने उस की मदद से कई लोगों को अपने जाल में फांस कर मोटी रकम ऐंठी थी.

कल्पना से पूछताछ के बाद राजस्थान सशस्त्र पुलिस बल (आरएसी) के कांस्टेबल हरिकिशन को गिरफ्तार किया गया. उस ने गिरोह के लिए उत्तराखंड से अन्य कई लड़कियों को बुलाया था. कल्पना को भी वही लाया था.

गिरोह ने कल्पना को इस काम के लिए जो रकम देने का वादा किया था, वह रकम उसे नहीं मिली थी. इस के बाद उस ने गिरोह के सदस्य एक वकील को दुष्कर्म का केस दर्ज कराने की धमकी दी थी. इस से घबराए वकील ने कल्पना से सन 2015 में आमेर के एक मंदिर में शादी कर ली थी. वकील से शादी के बाद भी गिरोह कल्पना से हाईप्रोफाइल ब्लैकमेलिंग की वारदातों का काम लेता रहा.

कल्पना की गिरफ्तारी के बाद एसओजी का दल एनआरआई लड़की रवनीत कौर की तलाश में जुट गया. लेकिन समस्या यह थी कि अब तक रवनीत का गिरोह से पैसों के लेनदेन को ले कर विवाद हो गया था, जिस से वह गिरोह  से अलग हो गई थी. एसओजी को कहीं से जानकारी मिली कि रवनीत कोटा में है. जांच अधिकारियों को उस के फेसबुक एकाउंट का भी पता चल गया था.

इस के बाद एसओजी ने रवनीत के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उस का नंबर मिल गया तो एसओजी की टीम कोटा पहुंच गई और एक पुलिस इंसपेक्टर ने रवनीत को जयपुर के मीडियाकर्मी करण के नाम से फोन किया. इस के बाद उसे किस तरह पकड़ा गया, आप शुरू में पढ़ चुके हैं. रवनीत कौर उर्फ रूबी से पूछताछ में उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

27 साल की रवनीत कौर उर्फ रूबी हांगकांग में पैदा हुई थी. उस के पिता पंजाब के फरीदकोट के रहने वाले थे. वह कारोबार के सिलसिले में हांगकांग गए थे. वहां उन का कामधाम जम गया तो वहीं उन्होंने भारतीय मूल की महिला से शादी कर ली.

रवनीत सन 2008 में ओवरसीज कार्ड पर अपनी दादी के पास जालंधर रहने आई. जालंधर से वह सन 2012 में जयपुर आ गई और एक यूनिवर्सिटी से उस ने 3 साल के बीबीए कोर्स में एडमिशन ले लिया. उसी यूनिवर्सिटी में एमबीए कर रहे कोटा निवासी रोहित से उस की दोस्ती हो गई. रवनीत कौर को बीबीए की पढ़ाई रास नहीं आई तो उस ने 2 साल बाद पढ़ाई छोड़ दी.

इस बीच रवनीत बीचबीच में अपने मातापिता के पास हांगकांग भी जाती रही. सन 2013 के अंत में उस के मातापिता ने कनाडा के एक एनआरआई बिजनैसमैन से उस की शादी तय कर दी. रवनीत भी उस से शादी करने को तैयार थी. इस का कारण यह था कि उस समय तक रवनीत की कोटा के रहने वाले रोहित से केवल दोस्ती थी.

दोस्ती इतनी आगे नहीं बढ़ी थी कि वह उस से शादी के बारे में सोचती. उस ने मातापिता से कहा कि शादी में वह जयपुर का लहंगा पहनेगी और वहीं से शादी के अन्य कपड़े और ज्वैलरी ले कर आएगी.

मातापिता ने उसे जयपुर से लहंगा और अन्य सामान लाने के लिए 8 लाख रुपए दे दिए. जयपुर आ कर रवनीत के 8 लाख रुपए खर्च हो गए मातापिता से शादी के सामान के लिए लाए पैसे खर्च हो गए तो रवनीत परेशान हो उठी. इस बीच उस की शादी भी टूट गई तो वह जयपुर में ही नौकरी की तलाश करने लगी. तभी वह इस गिरोह के संपर्क में आई. यह सन 2014 की बात है. गिरोह के इशारे पर रवनीत ने 6-7 लोगों को अपनी सुंदरता के जाल में फांस कर करोड़ों की वसूली की. सब से पहले उस ने एक बिल्डर को अपने हुस्न का जलवा दिखा कर उस से एक गोल्फ क्लब में मीटिंग तय की.

926 करोड़ की डकैती, जो हो नहीं पाई – भाग 2

926 करोड़ रुपए थे लुटेरों के निशाने पर

रात को ही एक्सिस बैंक के अफसरों को मौके पर बुलाया गया. राजधानी जयपुर में बैंक लूटने के प्रयास की सूचना मिलने पर जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के आला अफसर रात को ही मौके पर पहुंच गए. बैंक के अफसरों ने बताया कि राजस्थान में एक्सिस बैंक की सभी शाखाओं में इसी चेस्ट ब्रांच से पैसा जाता है.

पूरे राज्य से जमा हो कर पैसा भी इसी चेस्ट ब्रांच में आता है. बैंक अफसरों से पुलिस अधिकारियों को पता चला कि इस चेस्ट ब्रांच में वारदात के समय 926 करोड़ रुपए रखे हुए थे. इतनी बड़ी रकम की बात सुन कर पुलिस अफसर हैरान रह गए.

अगर पुलिस कांस्टेबल सीताराम हिम्मत दिखा कर गोली नहीं चलाता तो शायद बदमाश बैंक लूटने में कामयाब हो जाते. अगर यह बैंक लुट जाती तो यह भारत की अब तक की सब से बड़ी बैंक डकैती होती. सीताराम के गोली चलाने से यह बैंक डकैती होने से बच गई थी.

कांस्टेबल सीताराम की ओर से बदमाशों को ललकारने के लिए चलाई गई गोली बैंक के सामने बाईं ओर एक मकान की खिड़की में जा कर लगी. गोली लगने से खिड़की का कांच टूटा तो मकान मालिक और उन के परिवार की नींद खुल गई. उन्होंने बाहर आ कर पता किया तो बैंक में डकैती के प्रयास का पता चला. तब तक पुलिस भी मौके पर पहुंच गई थी.

पुलिस ने रात को जयपुर से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर कड़ी नाकेबंदी करवा दी. 6 फरवरी को कांस्टेबल सीताराम की रिपोर्ट के आधार पर जयपुर के अशोक नगर थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

6 फरवरी को सुबह से पुलिस और एक्सिस बैंक के आला अफसरों का मौके पर जमावड़ा लगा रहा. जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने भी मौके पर पहुंच कर बैंक के सुरक्षा इंतजामों के बारे में जानकारी ली. पुलिस को जांचपड़ताल के दौरान 4 बड़े खाली कट्टे (बोरी) मिले. ये कट्टे बदमाश अपने साथ लाए थे, लेकिन गोली की आवाज सुन कर भागते समय छोड़ गए.

बदमाशों का पता लगाने के लिए पुलिस ने बैंक के अंदरबाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो पता चला कि बदमाश 7 सीटर इनोवा गाड़ी से आए थे. इस गाड़ी से 11 बदमाश बाहर निकले और 2 बदमाश अंदर ही बैठे रहे. बाहर निकले सभी बदमाशों के चेहरे ढंके हुए थे. इन में से 4-5 बदमाशों के हाथ में पिस्तौल और बाकी के हाथों में डंडे और सरिए थे. इस इनोवा का नंबर तो साफ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन राजस्थान के नागौर जिले की नंबर सीरीज जरूर नजर आ रही थी.

पुलिस की जांच में पता चला कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में लिमिट से करीब 3 सौ करोड़ रुपए ज्यादा रखे हुए थे. नियमानुसार बैंक को यह राशि रिजर्व बैंक में जमा करानी चाहिए थी. यह बात सामने आने पर करेंसी चेस्ट में सुरक्षा मापदंडों को ले कर चूक और लिमिट से ज्यादा कैश रखने के मामले में रिजर्व बैंक के महाप्रबंधक करेंसी पी.के. जैन ने एक्सिस बैंक से रिपोर्ट मांगी.

बहरहाल, एक्सिस बैंक में देश की सब से बड़ी डकैती टल गई थी. कांस्टेबल सीताराम की सूझबूझ से बदमाशों को भागना पड़ा. सीताराम जयपुर का हीरो बन गया था. सीताराम की सतर्कता और बहादुरी से 926 करोड़ रुपए की बैंक डकैती टल जाने पर जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा से बात की और कांस्टेबल सीताराम को पुरस्कृत करने की सिफारिश की.

पुलिस के लिए आसान नहीं था लुटेरों का सुराग ढूंढना

डकैती तो टल गई थी, लेकिन जयपुर पुलिस के लिए बैंक में घुसने वाले बदमाशों का पता लगाना सब से पहली चुनौती थी. इस के लिए पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अपने मातहत अधिकारियों की मीटिंग कर के वारदात के लिए आए बदमाशों का पता लगाने को कहा.

विचारविमर्श में यह बात सामने आई कि 7 सीटर इनोवा में 13 लोगों का बैठना आसान नहीं है. इस का मतलब बदमाशों के पास कोई दूसरा वाहन भी रहा होगा, लेकिन सीसीटीवी फुटेज में दूसरा वाहन नजर नहीं आ रहा था. इनोवा गाड़ी भी चोरी की होने या उस पर फरजी नंबर प्लेट होने की आशंका थी. इस बात पर भी विचार किया गया कि बैंक में वारदात करने से पहले बदमाशों ने रैकी जरूर की होगी. अगर उन्होंने रैकी की थी तो उन्हें इस बात का पता रहा होगा कि बैंक की इस चेस्ट ब्रांच में 3-4 पुलिसकर्मी हमेशा मौजूद रहते हैं.

एक सवाल यह भी उठा कि बदमाशों की संख्या करीब 13 थी और उन में 4-5 के पास पिस्तौल भी थी तो वे केवल एक गोली चलने से घबरा क्यों गए? बैंक में डकैती डालने की हिम्मत करने वाले बदमाश डर कर भागने के बजाय मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं. इस से संदेह हुआ कि बदमाश कहीं नौसिखिया तो नहीं थे. इस के अलावा बदमाशों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि बैंक में 926 करोड़ रुपए होंगे.

पुलिस ने वारदात की जानकारी मिलने के तुरंत बाद जयपुर से बाहर निकलने वाले रास्तों पर नाकेबंदी कर दी थी. फिर भी बदमाशों का कोई सुराग नहीं मिला था. इस से यह बात भी उठी कि बदमाश जयपुर शहर के ही रहने वाले तो नहीं हैं.

पचासों तरह के सवालों का हल खोजने के लिए पुलिस कमिश्नर ने 4 आईपीएस अधिकारियों के सुपरविजन में एक दर्जन टीमें गठित कीं. इन टीमों में सौ से ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. अलगअलग टीमों को अलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

पुलिस टीमों ने मुख्य रूप से बैंक कर्मचारियों और वहां तैनात गार्डों से पूछताछ, बैंक से रुपए लाने ले जाने वाली 3 निजी सिक्योरिटी एजेंसियों के मौजूदा और पुराने कर्मचारियों से पूछताछ, जयपुर से निकलने वाले रास्तों पर स्थित टोल नाकों पर सीसीटीवी फुटेज, जयपुर के आसपास हाइवे और कस्बों में स्थित होटल, ढाबों पर हुलिए के आधार पर बदमाशों की जानकारी हासिल करने, इस तरह की वारदात करने वाले गिरोहों की जानकारी जुटाने आदि बिंदुओं पर अपनी जांचपड़ताल शुरू की.

दूसरी ओर, पुलिस कमिश्नर ने रिजर्व बैंक में जयपुर के सभी पब्लिक सैक्टर और निजी सैक्टर के बैंक अधिकारियों, रिजर्व बैंक के अधिकारियों और गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की. इस मीटिंग में पुलिस कमिश्नर ने कहा कि सभी बैंक सुरक्षा व्यवस्था के बारे में रिजर्व बैंक की गाइडलाइन का पूरी तरह पालन करें.

इस के अलावा उन्होंने सुरक्षा के खास प्रबंधों के साथसाथ अलार्म और हौटलाइन की आवश्यक व्यवस्था करने को भी कहा. कैश लाने ले जाने से पहले मौकड्रिल करने की भी बात की. उन्होंने राय दी कि बैंक के सीसीटीवी कैमरे अपग्रेड किए जाएं, जिन में कम से कम 90 दिन का बैकअप होना चाहिए. अलार्म सिस्टम भी जरूर लगाए जाएं.

पैसों के लिए हनीट्रैप : लालच ने बनाया शिकार

23 नवंबर, 2020 की सुबह का वक्त था. मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ थाने के टीआई कमलेश सिंगार को थाने पहुंचे कुछ ही समय हुआ था कि पास के गांव रतनगढ़ से आए 2 लोग मोहन और धीरज ने उन से मिलने की इच्छा जाहिर की.

टीआई ने उन दोनों को केबिन में बुला लिया. मोहन की उम्र कोई 40-45 साल थी, जबकि उस के साथ आए युवक धीरज की उम्र मुश्किल से 22 साल रही होगी.

मोहन गांव में पंचायत स्तर की राजनीति से जुड़ा होने के कारण तेज था, इसलिए उस ने बिना लागलपेट के टीआई कमलेश सिंगार को साथ आए युवक धीरज के साथ हुई लूट की रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. लेकिन धीरज इज्जत के डर से रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाना चाहता था.

पूरे घटनाक्रम में मोहन भी जुड़ा हुआ था. इसलिए उस ने टीआई कमलेश सिंगार को पूरी घटना से अवगत करा दिया. इस के बाद टीआई ने मोहन की तरफ से एक अज्ञात युवती,  2 महिलाओं और 3 पुरुषों के खिलाफ लूट की रिपोर्ट दर्ज  कर ली.

22 वर्षीय अविवाहित धीरज रतनगढ़ का रहने वाला था. संपन्न परिवार के धीरज का बड़ा करोबार था. एक दिन उस के मोबाइल फोन पर किसी अज्ञात नंबर से फोन आया.

‘‘हैलो, कौन?’’ धीरज ने फोन रिसीव करते हुए पूछा.

‘‘आप दिनेशजी बोल रहे हैं?’’ किसी लड़की की मीठी सी आवाज आई.

‘‘जी नहीं, शायद आप ने गलत नंबर मिलाया है,’’ धीरज ने कहा.

‘‘मेरी किस्मत में हमेशा गलत डायलिंग क्यों लिखी है.’’ उस युवती ने गहरी सांस लेते हुए कहा तो धीरज को अजीब लगा.

उस से कुछ बोलते नहीं बना. वह चुप रहा तो उधर से फिर आवाज आई, ‘‘हैलो आप सुन रहे हैं न?’’

‘‘हांहां सुन रहा हूं. लेकिन मैं दिनेश नहीं हूं.’’

‘‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप का नाम दिनेश है या नहीं. मेरे लिए इतना ही काफी है कि आप ने कम से कम मेरा दर्द तो सुना, वरना इतनी बड़ी दुनिया में मेरा एक भी हमदर्द नहीं है.’’ वह बोली.

‘‘आप ऐसा क्यों सोचती हैं, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.’’ धीरज ने उसे तसल्ली देने वाले अंदाज में कहा.

‘‘पता नहीं कब होगा. मुझे तो लगता है कि सारी प्रौब्लम मेरे लिए ही हैं. मेरे पिता ने मुझे इतना पढ़ायालिखाया, लेकिन कुछ काम नहीं आया. खैर छोड़ो, आप क्यों मेरी कहानी सुन कर अपना समय खराब करेंगे.’’

‘‘अरे नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ धीरज ने जल्दी से कहा. उसे डर था कि कहीं वह फोन न काट दे.

‘‘आप सुनेंगे मेरे दर्द की दास्तान?’’

‘‘जी, बताइए. हो सकता है मैं आप के किसी काम आ सकूं.’’

‘‘तो ठीक है. मैं रात में आप को इसी नंबर पर फोन करूंगी. कहानी लंबी है, फिर रात की तनहाई में किसी अपने के सामने दिल खोल कर रख देने का सुख ही अलग होता है. अच्छा, यह बताओ कि आप की पत्नी तो गुस्सा नहीं करेंगी.’’

‘‘अभी मेरी शादी नहीं हुई है.’’ धीरज ने बताया.

‘‘अरे तो फिर किसी लड़की के दिल पर यूं प्यारभरा हाथ रखना आप ने कहां से सीखा. आप मेरी कहानी सुनने के लिए राजी हो गए तो मुझे लगा जैसे आप अभीअभी मेरे दिल को बहुत हौले से छू कर गुजरे हो.’’ वह बोली.

‘‘आप की शादी हो गई?’’ धीरज ने कुछ हिम्मत कर के पूछा.

‘‘इस तन की तो हो गई लेकिन दिल की नहीं हुई.’’

‘‘क्या मलतब?’’

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‘‘मतलब सीधा सा है यार. पति है, इसलिए मेरे शरीर को तो उस ने शादीशुदा बना दिया, लेकिन मेरे दिल को अब तक यह भरोसा नहीं दिला पाया कि वह मेरा पति है. अच्छा कोई आ जाएगा, बाकी बातें मैं रात में बताऊंगी, तुम अपनी तरफ से फोन मत करना मैं खुद कर लूंगी.’’

कहते हुए उस युवती ने काल डिसकनेक्ट कर दी तो धीरज ठगा सा खड़ा रह गया. उस का मन कर रहा था कि काश! अभी रात हो जाए और वह फिर उस युवती की मीठी आवाज सुने.

रात में उस युवती का फोन आ गया. वह बोली, ‘‘क्या कर रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं.’’ धीरज ने कहा.

‘‘धत मैं तो समझी थी कि तुम मुझे याद कर रहे होगे. सच कहूं तो आप से फोन पर बात करने के बाद से मैं लगातार आप को ही याद कर रही हूं.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘शायद इसी को पुराने जन्म का रिश्ता कहते हैं. हो सकता है, पिछले जन्म में आप मेरे रहे हो. इसलिए इस जन्म में भी मिल गए.’’

‘‘हां, हो सकता है.’’ धीरज ने थूक गटकते हुए कहा.

‘‘तो हमारे बीच इस जन्म में ये दूरी क्यों?’’

‘‘सब किस्मत की बात है.’’

‘‘सच कहा आप ने तभी तो नियति ने ऐसे पति के साथ बांध दिया जो दिन भर मेरे ऊपर अपने दिमाग की गरमी निकालता है और रात में अपने तन की. मेरी भावनाओं से तो जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं है. सच कहूं तो मेरा पति रात में तो मुझे केवल मशीन समझता है. आप समझ रहे हैं न, मैं क्या कहना चाहती हूं.’’

‘‘जी, समझ रहा हूं.’’

‘‘कैसे? आप की तो अभी शादी भी नहीं हुई. कहीं ऐसा तो नहीं कि बिना शादी के ही गर्लफ्रैंड ने ये सब सिखा दिया हो.’’

‘‘मेरी कोई गर्लफ्रैंड भी नहीं है.’’

‘‘तो मुझे समझ लो.’’

‘‘आप बनोगी मेरी फ्रैंड?’’

‘‘समझो बन गई. सच कहूं, अब आप मिल गए हो तो लगता है कि सब ठीक हो जाएगा. चंद पलों की इस बात में ही आप से मिलने का मन करने लगा है. आप मिलना चाहेंगे मुझ से?’’

‘‘जरूर.’’

‘‘कहां सब के सामने या कहीं अकेले में? ज्यादा परेशान तो नहीं करोगे न मुझे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो ठीक है, मैं 2-4 दिन में तुम से मिलने की कोशिश करती हूं.’’

उस के बाद काफी देर तक वह धीरज से मीठीमीठी बातें करती रही फिर दूसरे दिन फोन करने को कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

दूसरे दिन धीरज इंतजार करता रहा लेकिन उस का फोन नहीं आया. अगले दिन उस ने बताया कि उसे मौका नहीं मिल पाया, इसलिए फोन नहीं कर सकी. इस बार उस ने अगले दिन धीरज को मल्हारगढ़ बस स्टैंड पर मिलने को कहा. धीरज न केवल राजी हो गया बल्कि उस के बताए समय पर वहां पहुंच भी गया.

थोड़ी देर में लगभग 22 साल की एक खूबसूरत युवती उस से आ कर मिली और उसे मस्ती करने के नाम पर गाडगिल सागर डैम ले गई. डैम पर एकांत में वह युवती धीरज को अपने साथ शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में ले जाने लगी.

लेकिन इस से पहले कि बात ज्यादा आगे बढ़ती, मौके पर 2 महिलाएं और 2 युवक आ कर सीधे धीरज के साथ मारपीट करने लगे. महिलाएं उस पर आरोप लगा रहीं थी कि उस ने उन के परिवार की बहू को बिगाड़ दिया है. वह उस से अकेले में मिल कर शारीरिक संबंध बनाता है.

धीरज ने उन के सामने बहुत हाथपैर जोड़े, लेकिन वे उसे थाने ले जा कर बलात्कार का मामला दर्ज करवाने पर अड़े रहे. इसी बीच वहां से एक आदमी गुजरा, जिस ने पूरा मामला सुन कर दोनों पक्षों को समझाया कि थाने जाने से कोई फायदा नहीं है. यहीं आपस में मामला निपटा लो.

इस के लिए युवती के परिवार वालों ने धीरज से 5 लाख रुपए की मांग की. इतना ही नहीं, उन्होंने उसी समय धीरज की जेब में रखे 70 हजार रुपए छीन लिए. धीरज के पास 5 लाख रुपए नहीं थे, इसलिए मामला 3 लाख में सेट हो जाने पर धीरज ने तुरंत अपने दोस्त मोहन को फोन लगा कर 3 लाख रुपया ले कर बुलाया.

मोहन ने इस का कारण पूछा, लेकिन धीरज ने कुछ नहीं बताया. इसलिए अंधेरा होने तक मोहन धीरज के बताए स्थान पर पैसा ले कर तो आ गया मगर वह इस बात पर अड़ गया कि जब तक धीरज पैसों की जरूरत का कारण नहीं बताएगा, वह पैसे नहीं देगा.

लड़की और उस के साथियों ने धीरज की मोटरसाइकिल रख कर उसे अकेले ही मोहन के पास भेजा था. किसी तरह की बदमाशी दिखाने पर उन्होंने उसे बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाने का डर भी दिखाया था.

लेकिन जब मोहन बिना कारण जाने पैसे देने को राजी नहीं हुआ तो धीरज ने उसे पूरी बात बता दी. संयोग से इसी बीच धीरज के पास फिर बदमाशों का फोन आ गया. उन का कहना था कि जल्दी पैसे ले कर आओ वरना वे थाने जा कर मामला दर्ज करवा देंगे.

इस पर मोहन ने धीरज के हाथ से फोन छीन लिया और खुद को पुलिस इंसपेक्टर बताते हुए धमकी दी तो बदमाशों ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर लिया. अगले दिन मोहन धीरज को किसी तरह थाने ले कर आया, लेकिन धीरज रिपोर्ट लिखवाने को राजी नहीं हुआ तो मोहन ने अपनी तरफ से रिपोर्ट दर्ज करवा दी.

धीरज के साथ घटी लूट की घटना सुन कर टीआई कमलेश सिंगार को एक पुरानी घटना याद आ गई, जिस में इसी तरह से एक औरत ने 70 वर्षीय गांव के मुखिया को अपने जाल में फंसा कर उस से एक लाख 80 हजार रुपए लूट लिए थे.

इस से टीआई समझ गए कि यह किसी गिरोह का काम है, जो नियोजित योजना के तहत लोगों को इज्जत का डर दिखा कर लूटने हैं. इसलिए उन्होंने इस गिरोह को खत्म करने के लिए कमर कस ली. अगले दिन टीआई कमलेश सिंगार ने उसी नंबर पर फोन लगाया, जिस से वह युवती धीरज को फोन किया करती थी. युवती ने टीआई से उन का परिचय पूछा तो इंसपेक्टर सिंगार ने एक दिलफेंक युवक की तरह उस से बातें करते हुए उस के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया कि उस युवती ने ही कुछ दिन पहले उन्हें फोन किया था.

चूंकि युवती इस तरह से कई लोगों को फोन लगाती रहती थी, इसलिए वह टीआई कमलेश सिंगार के जाल में फंस गई. टीआई सिंगार को अपना नया शिकार जान कर युवती ने पहले तो उन के साथ काफी अश्लील बातें कीं, फिर अकेले में मिलने की जगह तय कर गिरोह के दूसरे सदस्यों को शिकार पर चलने के लिए बुला लिया. लेकिन उस गिरोह के लोगों को क्या मालूम था कि आज उन का पाला ऐसे पुलिस इंसपेक्टर से पड़ने वाला है जो खुद उन का शिकार करने शिकारी बन कर आया है.

थोड़ी देर में वही स्थिति बन गई जो धीरज के साथ बनी थी. फिर युवती के बाद साथ आए 2 पुरुष और एक महिला ने उन्हें घेरने की कोशिश की. फिर टीआई कमलेश सिंगार की टीम ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. सभी से पूछताछ की गई. पूछताछ के बाद 3 और महिलाओं व एक पुरुष को गिरफ्तार किया गया.

गिरोह में शामिल 22 साल की युवती पायल सब से ज्यादा तेजतर्रार थी. उस ने एक मुसलिम युवक से शादी की थी. गिरोह के लोग उस की बात मानते थे. उस ने अपने गिरोह से कह रखा था कि जब वह शिकार पर हो तो गिरोह के लोग उस के पास इशारे पर ही आएं.

क्योंकि शिकार पसंद आने पर पायल पहले उस युवक के साथ पूरी तरह संबंध बना कर अपना मन भरती थी, बाद में गिरोह की तिजोरी भरने के लिए बाकी सदस्यों को इशारा कर मौके पर बुला लेती थी.

गिरोह की बाकी महिला सदस्य हीराबाई, कुशालीबाई, नाथी उर्फ सुमन भी शिकार करने में माहिर थीं.

मल्हारगढ़ पुलिस ने इन महिलाओं के साथ कारूलाल उर्फ करण निवासी गोपालपुरा, गुलाम हैदर उर्फ भयू निवासी रामपुरा और श्यामलाल उर्फ समरथ निवासी सावन को भी गिरफ्तार कर इन के पास से धीरज और रामपुरा निवासी एक अन्य युवक से लूटे गए एक लाख रुपए बरामद किए.

गिरोह में जो 6 महिलाएं थीं, उन में से 3 की उम्र 20 से ले कर 24 साल और बाकी की 30-40 और 48 साल थी. ये ग्राहक की उम्र देख कर उस के सामने चारा बना कर डालने के लिए युवती चुनती थीं.

यदि शिकार जवान होता था तो तीनों युवतियों में से किसी एक को चारा बनाया जाता था और अगर शिकार अधेड़ होता तो फिर 30-40 साल वाली महिला सदस्य उस से प्रेमिका बन कर मिलती थीं.

पूछताछ करने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.