माँ का प्रेमी गया जान से

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के गांव नेखुआ बनवीरकाछ में 27 फरवरी, 2023 की सर्द रात को अचानक एक चीख सन्नाटे को चीरती हुई निकल गई थी. चीख काफी तेज थी. रात का पहला पहर ही था और गांव के लोग अपनेअपने घरों में सोने की तैयारी कर रहे थे. अचानक तेज चीख सुन कर कुछ लोग घरों से बाहर निकल आए.

“चीख किधर से आई?’’ एक व्यक्ति ने पड़ोसी से पूछा, जो हड़बड़ाता हुआ घर से बाहर निकला था. जवाब देने के बजाय उस ने भी सवाल कर दिया, ‘‘कौन चीखा?…क्या हुआ इतनी रात को?’’

“अरे लगता है, चीखने की आवाज खजांची के घर से आई है…’’ उसी वक्त तीसरा व्यक्ति बोल पड़ा.

“हां…हां… चलो, चल कर देखते हैं. न जाने क्या हुआ उस के घर पर?’’ पहला व्यक्ति बोला.

“लगता है कोई गिर पड़ा है.’’

“जो भी हुआ हो, चलो देखते हैं.’’ कहते हुए तीनों ग्रामीण खजांची वर्मा के घर की ओर जाने के लिए मुड़ गए .तभी उन्होंने खजांची के घर की तरफ से आते हुए कुछ लोगों को देखा. वे कितने लोग थे, गिनती नहीं कर पाए. उन्हें लगा कि वे भी चीख सुन कर ही उस के घर पर आए होंगे. लेकिन यह क्या वे तो अंधेरे में ही कहीं गुम हो गए. खजांची के घर जाने वाले ग्रामीण समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बात क्या है?

खजांची के बारे में जानने के लिए सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. थोड़ी देर में ही वे खजांची के घर के बाहर पहुंच गए. वहां सन्नाटा था. दरवाजा भी बंद था. अंधेरा भी था. कुछ पल ठिठक कर उन लोगों ने घर के भीतर से किसी के कराहने की आवाज सुनी.

लोगों ने बुलाई पुलिस

पहले तेजी से चीखने और अब कराहने की आवाज सुन कर सभी सशंकित हो गए. उन्हें कोई गड़बड़ी या अनहोनी की आशंका हुई. खजांची के घर के बाहर मौजूद ग्रामीणों के बीच खुसरफुसर होने लगी. आवाज देने पर भी घर से कोई बाहर निकल नहीं रहा था और वे रात होने के चलते घर के अंदर जा नहीं पा रहे थे. ऐसे में ग्रामीणों ने पुलिस को सूचना देना सही समझा. आपसी निर्णय के बाद उन्होंने लीलापुर थाने को किसी अनहोनी की आशंका की सूचना दे दी. कुछ देर बाद ही वहां पुलिस भी आ गई.

कुछ पुलिसकर्मियों के साथ पहुंचे एसएचओ एसएचओ सुभाष कुमार यादव ने पहले खजांची के घर के बाहर जमा लोगों से बात की. थाने में काल करने वाले से मामले की जानकारी ली. वहां मौजूद लोगों ने खजांची के घर में होने वाली गतिविधि के बारे में अनभिज्ञता जताई. आखिर में साथ आए सिपाहियों ने खजांची के बंद दरवाजे को खटखटाना शुरू किया. वे कुंडी को बारबार खडक़ा कर आवाज देने लगे. आवाज देने पर अंदर से एक घबराई हुई महिला की आवाज आई, ‘‘कौन है?’’

एसएचओ यादव ने अपना परिचय दे कर तुरंत दरवाजा खोलने को कहा. भीतर से दोबारा आवाज आई, ‘‘क्या.. पुलिस? इतनी रात को? क्या बात है साहब?’’

“हांहां! हमें सूचना मिली है कि तुम्हारे घर में कोई घटना हो गई है, इसलिए आना पड़ा. बाहर आओ, घर में कोई मर्द नहीं है क्या?’’ यादव के कहने पर दरवाजा थोड़ा खुला. अंदर से एक औरत झांकने लगी. बाहर खड़ी पुलिस ने बाहर से दरवाजे को धक्का दिया और पूरा दरवाजा खुल गया. दरवाजा खुलते ही एसएचओ यादव महिला पुलिस के साथ घर में घुस गए. उन के साथ कुछ ग्रामीण भी चले गए. अंदर का नजारा देख कर सभी हैरान रह गए.

वहां का माजरा देख कर कुछ पल के लिए सभी की सांसें थम सी गईं. सभी अवाक रह गए. घर में जमीन पर एक युवक मरणासन्न लहूलुहान पड़ा था, वह कराह रहा था. उस का एक हाथ कटा हुआ था और दोनों आंखें किसी नुकीली चीज से फोड़ी गई थीं. युवक की दशा देख कर एसएचओ ने फौरन उसे इलाज के लिए अस्पताल भिजवाने का इंतजाम करवाया. लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में युवक की मौत हो गई.

मृतक के भाई ने लिखाई रिपोर्ट

कुछ घंटे में ही खजांची के घर मरणासन्न युवक की बात पूरे गांव में फैल गई. जल्द ही उस की पहचान भी हो गई. वह कोई और नहीं, उसी गांव का 32 वर्षीय अभिनंदन सिंह था. इस खबर के फैलते ही अभिनंदन के घर वाले भी खजांची के घर आ गए. गांव का माहौल पूरी तरह से तनावपूर्ण हो गया था. पुलिस को अभिनंदन के घर वालों ने बताया कि उसे फोन कर खजांची के घर बुलाया गया था. मौका देख कर खजांची पत्नी समेत मौके से फरार हो गया. उन की तलाश की जाने लगी, लेकिन वे दोनों नहीं मिल पाए. दोनों की तलाशी के लिए पुलिस टीम लगा दी गई. इस के साथ ही यादव ने मामले की पूरी जानकारी उच्चाधिकारियों को भी दे दी. मौके की आवश्यक काररवाई करने के बाद वह थाने लौट आए.

पुलिस ने उसी रात मृतक अभिनंदन सिंह के बड़े भाई आनंद सिंह की तरफ से खजांची वर्मा, उस की पत्नी सपना, बेटे संजय वर्मा (28 साल), सपना के भाई व उस के साथियों शंकर वर्मा, सुरेश वर्मा, कमलेश वर्मा सहित 8 लोागें के खिलाफ भादंवि की धाराओं 147, 148, 149 और 302 के तहत रिपोर्ट लिखवा दी. लाश को भी पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. मामले की जानकारी पा कर एसपी (प्रतापगढ़) सतपाल अंतिल, एएसपी (पश्चिमी) रोहित मिश्रा ने मौके का मुआयना किया. पीडि़त परिवार से मिल कर सारी जानकारी हासिल की तो मामले की तह में प्रेम प्रसंग की बात सामने आई.

पुलिस अधिकारियों ने अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए फौरन टीमें गठित कर कड़े निर्देश जारी कर दिए. पुलिस टीम को तीसरे दिन ही सफलता मिल गई. एसएचओ यादव ने पहली मार्च, 2023 को मुखबिर की सूचना पर देवीघाट पुल भुवालपुर के पास से एक अधेड़ महिला के साथ युवक को पकड़ लिया. पूछताछ में पता चला कि औरत खजांची वर्मा की पत्नी सपना (50) और युवक उस का बेटा संजय वर्मा (28) था. वे बनवीर काछनेखुआ निवासी हैं. उन्हें थाने ला कर पूछताछ की गई. थोड़ी सख्ती के बाद ही उन्होंने अभिनंदन मर्डर केस का खुलासा कर दिया. उन्होंने अभिनंदन सिंह की हत्या की जो कहानी बताई, वह प्रेम और अपराध से जुड़ी थी. उन की कहानी इस प्रकार निकली—

अधेड़ उम्र में सपना को हुआ प्यार

उत्तर प्रदेश का प्रतापगढ़ जिला राजनैतिक और सामाजिक गतिविधियों की गहमागहमी से भरा रहने वाला इलाका है. वहीं नेखुआ बनवीरकाछ गांव में मिश्रित आबादी है. उन में खजांची वर्मा का भी परिवार रहता है. उसी गांव में अभिनंदन सिंह (32) भी अपने परिवार के साथ रहता था. वह 2 बच्चों का पिता भी था. दुबलेपतले कदकाठी का अभिनंदन खुशमिजाज और मिलनसार व्यक्तित्व का युवक था. वह सुखीसंपन्न परिवार से था. उस के खजांची के परिवार से भी अच्छे संबंध थे.

अभिनंदन की मुलाकात सपना से भी होती रहती थी. वह 50 की उम्र हो जरूर गई थी, लेकिन कदकाठी की वजह से 10 साल कम उम्र की दिखती थी. उस के बदन की कसक बरकरार थी. हर किसी के साथ गर्मजोशी के साथ मिलती थी. हंसहंस कर बातें करने और अपनी मनमोहिनी अदाओं से सब को लुभा लेती थी. अकसर जब वह हंसती थी, तब उस के चेहरे की रौनक और भी बढ़ जाती थी. खेती के काम में खेतों पर भी आतीजाती रहती थी.

गांव के कई युवा उसे प्यार से भाभी कह कर बुलाते थे. उन में अभिनंदन भी था. बात कुछ साल पहले की है, सपना खेतों से घर की ओर लौट रही थी, उस के सिर पर घास का गट्ïठर था. अचानक उसे सामने से अभिनंदन आता हुआ दिखा. गट्ïठर भारी था, सिर पर संभल नहीं रहा था. उस ने अभिनंदन से गट्ïठर नीचे उतारने के लिए मदद मांगी, ताकि थोड़ी देर पगडंडी पर बैठ कर सुस्ता ले. अभिनंदन ने उस की मदद की और सिर से घास का गट्ïठर उतार दिया. तभी वह थोड़ा लडख़ड़ा गई.

अभिनंदन ने उसे संभालते हुए पकड़ लिया. इसी दौरान उस का हाथ सपना के वक्षों से छू गया. सपना शरमा गई, लेकिन उस ने इस का जरा भी बुरा नहीं माना. अपना आंचल संभालती हुए मुसकरा दी. हालांकि ऐसा अभिनंदन से भी अनजाने में हुआ था. फिर उस ने जमीन पर बैठते हुए अभिनंदन को भी हाथ पकड़ कर बिठा लिया. अभिनंदन झिझकते हुए बैठ गया. थोड़ा सांस लेते हुए बोला, ‘‘बहुत भारी गट्ïठर था. इतना भारी मत लिया करो…गरदन में मोच आ सकती है.’’

“अरे क्या करूं, काम तो करना है. यह तो रोज का हो गया है.’’ सपना बोली.

“इस गट्ïठर के 2 बना दूं क्या?’’ अभिनंदन ने हमदर्दी जताई.

“अरे नहीं, थोड़ी देर बैठूंगी, उस के बाद सिर पर उठा देना…वैसे तुम कहां से आ रहे थे?’’ सपना बोली.

“कुछ काम के लिए बाजार चला गया था, वहीं से लौट रहा था.’’ अभिनंदन बोला.

“जब भी बाजार जाना हो तो मुझ से एक बार मिल लेना. मुझे भी कुछ मंगवाना होता है.’’

“तुम्हें बता दूंगा. कहो तो गट्ïठर सिर पर उठा कर रख दूं या घर तक पहुंचा दूं?’’ अभिनंदन का इतना कहना ही था कि सपना बोली, ‘‘क्या देवरजी, इतनी जल्दी जाने की क्यों पड़ी है. थोड़ी देर बैठते हैं. बाते करते हैं.’’

अभिनंदन उस के कहने पर वहीं बैठ गया. दोनों कुछ समय तक बैठे रहे. इधरउधर की बातें करते रहे. थोड़ी देर बाद अभिनंदन ने सपना के सिर पर गट्ïठर उठा दिया और लंबे कदमों से आगे बढ़ गया. सपना आवाज दे कर बोली, ‘‘शाम को घर पर आना तुम से कुछ काम है.’’

अवैध संबंधों की फैल गई बात

अभिनंदन को भी क्या सूझी शाम को सपना के घर जा धमका. सपना ने भी उस की खूब खातिरदारी की. जाने लगा तब हाथ में कुछ पैसे पकड़ाती हुई बाजार से अपने सामान की एक लिस्ट पकड़ा दी. अभिनंदन लिस्ट खोल कर पढऩे लगा, लेकिन हैंडराइटिंग समझ में नहीं आई, तब उसे पढ़ कर बताने को कहा. सपना उस की हाथ से लिस्ट ले कर पढऩे लगी. उस में उस के कुछ निजी इस्तेमाल के सामान थे. अभिनंदन ने झेंपते हुए लिस्ट अपनी जेब में रख ली और चला गया.

पहले दिन की 2 मुलाकातों ने सपना और अभिनंदन के दिल के तार झनझना दिए थे. उन के दिल में एकदूसरे की भावनाओं ने थोड़ी जगह बना ली थी. उस के बाद से दोनों जब भी मिलते, उन की मुलाकातें काफी हसीन और रंगीन बातों से शुरू होती थीं. बातोंबातों जब कभी अभिनंदन सपना के रूपरंग और मादकता की तारीफ करता, तब सपना इठलाने लगती थी. मस्त अदा से मजाकिया अंदाज में जवाब देती और अभिनंदन खुश हो जाता था. दोनों बहुत जल्द ही काफी खुल गए थे. मौका देख कर अभिनंदन ने सपना के साथ शारीरिक संबंध भी बना लिए.

सपना और शादीशुदा बालबच्चेदार अभिनंदन की उम्र में काफी अंतर था. अभिनंदन बांका युवक था, जबकि सपना अधेड़ उम्र की थी. दोनों यौन पिपासा से भरे हुए थे. बावजूद इस के दोनों को जब भी समय मिलता, 2 जिस्म एक जान हो जाया करते थे.

मां के प्रेमी का किया मर्डर

दोनों का मिलना दिनप्रतिदिन बढ़ता चला गया. नतीजा यह हुआ कि उन के इश्क के चर्चे गांव में एक कान से होते हुए दूसरे कान तक फैल गए. यह बात अभिनंदन और सपना के घरवालों के कानों तक भी जा पहुंची. फिर क्या था, अच्छाखासा विवाद खड़ा हो गया. वहीं दोनों का चोरीछिपे मिलना जारी रहा. इस की भनक जब खजांची और उस के बेटे संजय को लगी, तब वे बौखला गए. इस से निपटने के लिए दोनों ने एक गहरी साजिश रची.

उन्होंने सजिश के तहत ही 27 फरवरी, 2023 की रात अभिनंदन को सपना से फोन करवा कर बुला लिया. सपना भी बहुत बदनाम हो चुकी थी. वह भी अब अभिनंदन से पीछा छुड़ाना चाहती थी. उसे भी अपने पति और बेटे की साजिश की भनक लग गई थी. अभिनंदन सपना के बुलाने पर भागाभागा चला आया. घर वाले उस का इंतजार कर रहे थे. जैसे ही अभिनंदन आया, उस पर घर वालों ने मिल कर लाठी, डंडा, कुल्हाड़ी से वार कर दिया था, जिस से वह मरणासन्न हो गया था.

उसे ठिकाने लगाने की बात हो ही रही थी कि तभी गांव वालों को भनक लग गई थी और पुलिस मौके पर आ गई थी. पुलिस ने आरोपियों से पूछताछ करने के बाद उन की निशानदेही पर कुल्हाड़ी और डंडा, सफेद कपड़ा बरामद कर लिया गया. पुलिस ने दोनों मांबेटे को सक्षम न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायायिक हिरासत में ले कर जेल भेज दिया गया.

कहानी लिखे जाने तक पुलिस अन्य फरार हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी करने में जुटी हुई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 4

इस से रमित बुरी तरह डर गया. उस ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए निशा के पिता को चैक काट कर दे दिए. उस ने चैक तो दे दिए, लेकिन चैक देने के बाद वह परेशान रहने लगा. क्योंकि उस के खाते में पैसे नहीं थे. उसे पता था कि अगर चेक बाउंस हो गए तो एक और नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी. इसलिए उस ने इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने के लिए एक भयानक योजना बना डाली.

रोशनलाल के परिवार में गहरी पैठ होने की वजह से रमित उन के परिवार की हर गतिविधियों को जानता था. वह यह भी जानता था कि हर रविवार की सुबह रोशनलाल और निशा हैबोवाल स्थित राधास्वामी सत्संग भवन में सत्संग सुनने जाते हैं. रविवार को साप्ताहिक अवकाश होने की वजह से लुधियाना के सारे बाजार और उद्योग बंद रहते हैं. रमित की फैक्ट्री भी उस दिन बंद थी. इन्हीं बातों के मद्देनजर रमित ने शनिवार शाम यानी 21 अगस्त को रोशनलाल को फोन कर के कहा, ‘‘पापा, मैं कल सुबह एटीएम से रुपए निकाल कर आप को दे दूंगा. आप चैक बैंक में मत डालना.’’

अगले दिन सुबह जब रोशनलाल और निशा सत्संग के लिए जा रहे थे तो रास्ते में ही रमित ने उन्हें अपनी कार में बिठा लिया. हालांकि रोशनलाल ने बहुत कहा कि रुपए निकालने ही तो हैं, सत्संग के बाद निकाल लेंगे. लेकिन रमित ने यह कह कर उन्हें खामोश कर दिया कि वह पैसे दे देगा तो उस के सिर से बोझ उतर जाएगा.

रमित की गाड़ी दुगड़ी स्थित एटीएम पर रुकी. उस ने यह कह कर रोशनलाल को वहीं उतार दिया कि वह 10 मिनट वहीं रुकें, एटीएम कार्ड वह घर भूल आया है. झूठ बोल कर वह निशा को साथ ले कर सीधा फैक्ट्री पहुंचा. फैक्ट्री ले जा कर उस ने निशा को केबिन में बिठा दिया और पहले से खरीद कर रखा चाकू निकाल कर उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी.

निशा की हत्या कर के उस ने अपने 2 कर्मचारियों विजय व कुमार की मदद से निशा की लाश प्लास्टिक के एक बोरे में भरी और उन्हीं की मदद से वह बोरा कार की डिग्गी में रख कर जस्सियां के एक खाली प्लाट में फेंक आया. इस के बाद वह दुगड़ी स्थित एटीएम पर पहुंचा, जहां रोशनलाल खड़ा था. वह उसे भी कार में बैठा कर फैक्ट्री ले आया. निशा की तरह उस ने उस की भी हत्या कर दी और उस की लाश भी प्लास्टिक के बोरे में भर कर दोराहा नहर में फेंक दी.

बापबेटी की हत्या करने के बाद रमित कार से सीधा रोशनलाल के घर पहुंचा. कार उस ने मकान के पीछे वाली गली में खड़ी कर दी. इस के बाद वह मकान के भीतर गया. पहले वाले कमरे में शकुंतला बैठी थी. रमित ने चाकू निकाल कर उस पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया. वह ढेर हो गई. इस के बाद वह भीतर वाले कमरे में पहुंचा, जहां राजेश टीवी देख रहा था.

कमरे में पहुंचते ही उस ने सब से पहले टीवी की आवाज तेज की और फिर राजेश पर अचानक हमला बोल दिया. अचानक हमला हुआ था, फिर भी अपाहिज राजेश चीखाचिल्लाया. उस ने रमित का विरोध करते हुए आखिरी क्षणों तक उस के साथ संघर्ष किया. राजेश की हत्या करने के बाद रमित बाथरूम में हाथमुंह धोना चाहता था, लेकिन उसी समय मोहल्ले वालों ने बाहर का दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.

हड़बड़ाहट में वह चाकू वहीं छोड़ कर मकान के पिछले दरवाजे से भाग निकला. पूरे परिवार की हत्या करने के बाद वह पुन: फैक्ट्री आया, जहां उस ने हाथमुंह धोया. चार लोगों की हत्याएं करने में चाकू की कुछ खरोंचे उस के हाथ पर भी लग गई थीं. उस ने दुगड़ी की एक डिस्पेंसरी में जा कर हाथ पर पट्टी करवाई और फिर आगे के बारे में सोचने लगा. पर वह कुछ सोचता या करता, इस से पहले ही वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

पुलिस ने रमित भंडारी के साथ उस के दोनों कर्मचारियों को भी हिरासत में ले कर अगले दिन मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट परमिंदर कौर की अदालत में पेश कर के 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड की अवधि में रमित की निशानदेही पर जस्सियां से निशा की तथा दोराहा नहर के किनारे से रोशनलाल की लाश बरामद कर ली. पुलिस ने रमित की 2 कारें भी जब्त कर लीं. पुलिस ने 7-7 लाख रुपए के वे 2 चैक भी बरामद किए, जो रमित ने रोशनलाल को दिए थे. तलाशी लेने पर निशा के पर्स से डेढ़ लाख कैश भी मिला था.

इस तरह यह हत्याकांड पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह की देखरेख में एसीपी नरेंद्र रूबी व अन्य अधिकारियों की सूझबूझ से 24 घंटे के भीतर ही सुलझा लिया गया. एक तरह से इस में रुपए दे कर दुश्मन बनाने वाली बात हुई थी. रोशनलाल रमित को रुपए दे कर न उस की सहायता करता और न ही उस का परिवार यूं बेमौत मारा जाता. शायद सांप को दूध पिलाने का यही अंजाम होता है.

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 3

रमित की यह बात हमारे गले नहीं उतर रही थी. इस में कई ऐसे पेंच थे, जो समझ से बाहर थे. मैं ने रमित से पूछा, ‘‘अच्छा, यह बताओ कि इस वक्त निशा कहां है?’’

मेरे सवाल पर वह बौखला उठा और झल्ला कर बोला, ‘‘मैं क्या जानूं, भाग गई होगी अपने किसी यार के साथ.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ मैं ने पूछा तो रमित बोला, ‘‘जनाब ऐसी औरतें यही तो करती हैं. एक से दिल भर गया तो दूसरे के पास और दूसरे से भर गया तो तीसरे के पास.’’

‘‘वाह रमित कुमार.’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं ने तो तुम से केवल निशा के बारे में पूछा था और तुम ने पूरी रामायण सुना दी. खैर छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हें ब्लैकमेल तो निशा कर रही थी, फिर तुम ने उस की मां और भाई की हत्या क्यों की?’’

मेरे इस सवाल पर वह बगले झांकने लगा. मैं ने उसे चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘देखो, हमें सब पता है. अच्छा यही है कि तुम हमें पूरी बात सचसच बता दो, वरना तुम्हें फांसी के फंदे से कोई नहीं बचा सकता.’’

मेरी बात सुन कर उस ने गर्दन झुका ली. मैं इंसपेक्टर हरपाल सिंह, निर्मल सिंह और बिट्टन कुमार को साथ ले कर उस की मौसी की फैक्ट्री पहुंचा. वहां रमित की कार बाहर ही खड़ी थी. कार का बारीकी से मुआयना किया गया तो उस में कई जगह खून के धब्बे दिखाई दिए. ठीक वैसे ही खून के धब्बे फैक्ट्री के औफिस में भी मिले. फैक्ट्री की अच्छी तरह तलाशी लेने पर हमें एक लेडीज सैंडिल भी मिली. फैक्ट्री में 2 कर्मचारी मिले, जिन के नाम विजय प्रसाद और कुमार थे. विजय प्रसाद गहरी कोठी, थाना नोतन, जिला पश्चिमी चंपारण (बिहार) का रहने वाला था तो कुमार गांव मुकार, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश का रहने वाला था.

दोनों से पूछताछ करने पर इस दोहरे हत्याकांड के साथसाथ रिटायर्ड स्टेशन मास्टर रोशनलाल और उस की बेटी निशा की गुमशुदगी का रहस्य भी खुल गया. मेरे आदेश पर इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने विजय प्रसाद और कुमार को पुलिस हिरासत में ले लिया. रमित भंडारी को हम ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया था. अब तक की तफ्तीश, रमित भंडारी और फैक्ट्री से दबोचे गए दोनों कर्मचारियों से की गई पूछताछ के बाद इस जघन्य हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई, वह स्वार्थ के रिश्तों और विश्वास की नींव पर झूठ का महल खड़ा करने जैसी थी.

36 वर्षीया निशा काफी खूबसूरत, मिलनसार व हंसमुख स्वभाव की युवती थी. संभवत: उस का यही स्वभाव उस की और उस के परिवार की हत्या का कारण बना था. सीधीसादी निशा की बीए पास करने के बाद शादी हो गई थी. लेकिन पति से उस की नहीं बनी, जिस से जल्दी ही उस का तलाक हो गया था. निशा ने इसे भाग्य मान कर चुपचाप स्वीकार कर लिया और मन ही मन तय कर लिया कि अब वह कभी शादी नहीं करेगी. गुजरबसर के लिए उस ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली.

सन 2008 में जब निशा का परिवार चंद्रनगर, सुंदरनगर में रहता था, तभी अचानक एक दिन निशा की मुलाकात रमित भंडारी से हुई. रमित महत्त्वाकांक्षी, चतुरचालाक युवक था. उस ने शादीशुदा होते हुए भी अपनी शादी की बात निशा से छिपा ली थी. हालांकि निशा ने कभी शादी न करने का फैसला किया था. लेकिन रमित ने उस की सोई कामनाओं को जगा कर उस से शादी करने का वादा कर लिया. न चाहते हुए भी निशा धीरेधीरे रमित के आकर्षण में बंधती चली गई. जल्दी ही दोनों के बीच आंतरिक संबंध बन गए. एक दिन निशा ने रमित को अपने घर ले जा कर उस का परिचय अपने मातापिता से करवा दिया.

रोशनलाल के परिवार की समस्या यह थी कि उस के परिवार में कोई भी युवा पुरुष नहीं था. बेटा राजेश था भी तो अपाहिज था. इसीलिए पूरा परिवार रमित से खुश रहता था और उसे बेटे की तरह मानता था. निशा का भी सोचना था कि उस की अन्य बहनें दूर रहती थीं, अगर शादी के बाद रमित उस के मातापिता और अपाहिज भाई का खयाल रखेगा तो इस से अच्छा और क्या हो सकता था.

समय के साथ निशा और रमित के आपसी संबंध बन गए थे. सन् 2009 के अंत में रोशनलाल स्टेशन मास्टर से रिटायर हो गए थे. उन्हें रिटायरमेंट पर काफी रुपए मिले थे. कुछ दिनों बाद उन्होंने चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख रुपए में बेच दिया था. नया मकान लेने के बाद भी उन के पास 35-40 लाख रुपया बच गया था.

एक दिन जब रमित रोशनलाल के घर आया तो बहुत परेशान था. पूरे परिवार ने उस की परेशानी का कारण पूछा, पर उस ने कुछ नहीं बताया. बाद में उस ने निशा को अलग ले जा कर बताया, ‘‘निशा, मुझे बिजनैस में बहुत बड़ा घाटा हो गया है. बाजार का लाखों रुपया देना है. अगर मैं ने रुपए नहीं दिए तो मैं बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाऊंगा.’’

‘‘तुम्हें कितने रुपए चाहिए?’’ निशा ने पूछा तो रमित बोला, ‘‘यही कोई 40-45 लाख…’’

रमित की बात सुन कर निशा हतप्रभ रह गई. पल भर बाद वह कुछ सोच कर बोली, ‘‘रमित, पापा के पास 30-35 लाख रुपए होंगे, वे तुम्हें इनकार नहीं करेंगे. जब तुम्हारा बिजनैस ठीक हो जाए तो पापा के पैसे लौटा देना.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, पर मैं तुम्हारे पापा से रुपए नहीं मांगूगा. मुझे शर्म आती है.’’ रमित ने अभिनय करते हुए कहा तो निशा बोली, ‘‘ठीक है, तुम रुपए मत मांगना. रुपए मैं मांग लूंगी, पर तुम साथ तो चलो.’’

निशा के समझाने पर रमित उस के साथ चलने को तैयार हो गया. निशा ने जब अपने पिता रोशनलाल को रमित की परेशानी का कारण बताया तो वे हंसते हुए बोले, ‘‘तुम भी कमाल करते हो बेटा, यह घर तुम्हारा है. यहां की हर चीज पर तुम्हारा अधिकार है. रुपए मेरे पास बढ़ तो रहे नहीं हैं. तुम अपना काम निपटा लो. जब आ जाएं तो मुझे लौटा देना.’’

अगले दिन ही रोशनलाल ने रमित को 35 लाख रुपए कैश दे दिए. रुपए लेते समय उस ने वादा किया था कि वह एक महीने में रुपए लौटा देगा. लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी जब उस ने न तो पैसे लौटाए और न कभी इस विषय में बात की तो रोशनलाल और निशा को चिंता होने लगी. उसी बीच कहीं से निशा को पता चल गया कि रमित शादीशुदा है. उस ने उस से झूठ बोला था.

इस बात से निशा के दिल को बहुत ठेस पहुंची. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि पिता का पैसा वापस मिलने के बाद वह रमित से संबंध तोड़ लेगी. यह बात उस ने रमित से कह भी दी थी, लेकिन समस्या यह थी कि रमित पैसा लौटाने का नाम नहीं ले रहा था. इस पर निशा ने उसे धमकी देते हुए कहा कि अगर उस ने शराफत से उस के पिता का पैसा नहीं लौटाया तो वह अपने और उस के संबंधों की बात उस की मां और पत्नी को बता देगी.

                                                                                                                                         क्रमशः

मजे मजे की आशिकी में गयी जान

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 2

पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी, जिस के अनुसार मौत का कारण अधिक खून बह जाना था. फगवाड़ा से शकुंतला के मायके वाले आ गए थे. पोस्टमार्टम के बाद लाशें उन्हें सौंप दी गई थीं. मृतका के भाइयों ने दोनों लाशों का अंतिम संस्कार कर दिया था. मैं ने उन से भी पूछताछ की. उन्होंने केवल इतना ही बताया था कि रोशनलाल ने रिटायर होने के बाद चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख में बेचा था. नया मकान उन्होंने 35-40  लाख रुपए में खरीदा था.

कुछ पैसा उन्हें रिटायर होने पर मिला था. कुल मिला कर उन के पास करीब 35 लाख रुपए थे. रुपए उन्होंने कहां रखे थे या किसी को दिए थे, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. फलस्वरूप बात वहीं की वहीं रह गई. मैं ने सोचा था कि शायद मृतका के मायके वालों से काम की कोई बात पता चल जाएगी, पर मायूस ही होना पड़ा. घूमफिर कर हमारी नजर फिर रमित भंडारी पर ही जा कर टिक गई थी.

रमित ने आधा घंटे बाद आने को कहा था. मैं ने घड़ी देखी. अब तक पौन घंटा हो चुका था. मैं ने सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार से कहा कि वह रमित को फोन कर के पूछे. बिट्टन कुमार ने बताया कि उस ने 10 मिनट में आने को कहा है, लेकिन वह दस मिनट बाद भी नहीं आया. इस प्रकार 10-10 मिनट करतेकरते उस ने 2 घंटे बरबाद कर दिए. उधर पुलिस के सिर पर उच्च अधिकारियों की तलवार लटक रही थी.

मेरी टीम की जान सांसत में थी. मुझे रमित भंडारी पर गुस्सा आ रहा था. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो मैं ने भंडारी से मोबाइल पर खुद बात की. मैं ने उसे डांटते हुए कहा कि वह तुरंत मेरे औफिस पहुंचे. उस ने मुझ से भी 10 मिनट का समय मांगा. जब वह 10 मिनट तक नहीं आया तो मैं ने फिर फोन किया. लेकिन इस बार उस के फोन का स्विच बंद मिला. इस के बाद उस के फोन का स्विच हमेशा के लिए बंद हो गया.

रमित के इस व्यवहार से मुझे उस पर संदेह हुआ. मैं समझ गया कि वह जानबूझ कर पूछताछ से बचना चाहता था. मैं ने हरपाल सिंह से उस के फोन की लोकेशन पता करने को कहा. इंसपेक्टर हरपाल ने रमित के फोन की लोकेशन चैक करवाई तो उस की लोकेशन जस्सियां रोड, लुधियाना की मिली. इस से यह बात साफ हो गई कि वह हम से झूठ बोल रहा था. इस से उस पर हमारा संदेह और बढ़ गया.

अभी मैं और हरपाल सिंह इस मुद्दे पर बातें कर ही रहे थे कि सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने आ कर बताया कि रमित भंडारी अपनी मौसी की फैक्ट्री नैना क्वायर प्रोडक्ट्स में कहने को तो मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव था, लेकिन एक तरह से उस गद्दा फैक्ट्री का सर्वेसर्वा वही था. बिट्टन कुमार ने यह भी बताया कि रिटायर्ड स्टेशन मास्टर रोशनलाल की छोटी बेटी निशा से उस के मधुर संबंध थे. वह उस के घर खूब आताजाता था. रोशनलाल ने उसे अपना बेटा बना रखा था.

मेरे लिए यह जानकारी काफी थी. इस से मुझे पक्का यकीन हो गया था कि वह इस दोहरे हत्याकांड का रहस्य जरूर जानता होगा. इसीलिए पुलिस के सामने आने से कतरा रहा था. मुझे समय बेकार करना उचित नहीं लगा. इसलिए मैं ने इंसपेक्टर हरपाल सिंह को तुरंत पुलिस टीम के साथ घाघरा रोड पहुंचने को कहा.

एक टीम मैं ने एसीपी परमजीत सिंह पन्नू की अगुवाई में तैयार करवाई. रमित भंडारी हमें फैक्ट्री के पास ही मिल गया. उस से वहीं पूछताछ की गई. वह हमें बहकाने की कोशिश करने लगा. वह हर सवाल का जवाब घुमाफिरा कर दे रहा था. उस के चेहरे पर काफी उलझन और घबराहट के मिलेजुले भाव थे. बात करते हुए वह हकला भी रहा था. तभी अचानक मेरा ध्यान उस के हाथ की ओर चला गया. उस के हाथ पर ताजी पट्टी बंधी थी. मैं ने इस बारे में पूछा तो वह बोला, ‘‘ऐसे ही मामूली सी खरोंच आ गई थी. सावधानी के तौर पर मैं ने पट्टी बंधवा ली.’’

खरोंच कैसे और किस चीज से आई, यह वह नहीं बता सका. इस बातचीत के बाद मेरा शक विश्वास में बदलने लगा. मैं ने उसे अपने औफिस चलने को कहा.

औफिस आ कर इंसपेक्टर हरपाल सिंह और बिट्टन कुमार ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने शकुंतला और राजेश की हत्या की बात स्वीकार कर ली. मैं ने कारण पूछा तो उस ने कोई कारण नहीं बताया. लेकिन जब थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने बताया कि रिटार्यड स्टेशन मास्टर रोशनलाल की बेटी निशा उसे ब्लैकमेल कर रही थी. उस के अनुसार निशा के साथ उस के तीन सालों से अवैध संबंध थे. वह शादीशुदा था, जबकि निशा तलाकशुदा थी.

निशा बहुत ही खूबसूरत थी. पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे पर फिदा हो गए थे. दोनों के संबंध इतनी तेजी से परवान चढ़े कि रमित आए दिन उस के घर आनेजाने लगा. परिवार के लोगों को भी उस का आनाजाना अच्छा लगता था. शकुंतला तो उसे बेटाबेटा कहते नहीं थकती थी. निशा के साथ रमित के संबंधों की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. वे लोग अपने घर के छोटे से ले कर बडे़ कामों तक में रमित की सलाह लेने लगे थे.

रमित के अनुसार पिछले कुछ समय से निशा उसे ब्लैकमेल कर रही थी. वह कई बार उस की मांग पूरी भी कर चुका था. उस के घर वाले भी इस बात का फायदा उठा रहे थे. कुछ ही दिनों पहले निशा ने उस से 50 हजार रुपए की मांग की थी, लेकिन उस ने इतना पैसा देने से मना कर दिया था. शनिवार को निशा ने रमित की मां को फोन कर के कहा था कि वह उन्हें कुछ राज बताना चाहती है.

उसी दिन निशा ने फोन पर रमित को भी धमकी दी थी कि उस ने दोनों के निजी संबंधों की सीडी बनवा रखी है. अगर उस ने 50 हजार रुपए नहीं दिए तो वह उस सीडी को उस की मां और पत्नी को दे देगी. इसी बात से गुस्से में उस ने निशा से बदला लेने के लिए उस की मां और भाई की हत्या कर दी थी.

                                                                                                                                              क्रमशः

बेईमान प्यार : बेमौत मारा गया परिवार – भाग 1

22 अगस्त, 2010 की सुबह 10 बजे पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि हैबोवाल की दुर्गापुरी कालोनी की गली नंबर 5 के मकान नंबर- 7187/1 में 2 लोगों की हत्या हो गई है. सूचना मिलते ही थाना सलेम टाबरी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर निर्मल सिंह, सीआईए इंचार्ज इंसपेक्टर हरपाल सिंह, इंसपेक्टर दविंद्र कुमार, एसएचओ डिवीजन नंबर 4 तथा दुर्गापुरी पुलिसचौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार मेरे पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर पहुंच गए थे. जिस मकान में हत्याएं हुई थीं, उस के बाहर लोगों की काफी भीड़ लगी थी.

पड़ोसियों ने बताया कि उन्होंने सुबह लगभग साढ़े 9 बजे मकान के भीतर तेज चीखों की आवाजें सुनी थीं. चूंकि उस वक्त अंदर तेज आवाज में टीवी चल रहा था, इसलिए यह समझना मुश्किल था कि आवाजें टीवी की थीं या मकान में रहने वालों की. मकान का दरवाजा अंदर से बंद था. थोड़ी देर बाद जब पड़ोसियों को लगा कि चीखें टीवी की नहीं, बल्कि उस में रहने वालों की थीं तो उन्होंने मुख्य द्वार तोड़ कर भीतर जा कर देखा.

अंदर अलगअलग कमरों में 2 लाशें पड़ी थीं. इस के बाद घटना की सूचना पुलिस को दी गई थी. मैं ने मकान के भीतर जा कर देखा. एक कमरे में अधेड़ उम्र की महिला की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर तेजधार हथियार के कई घाव थे, जिस में से खून रिस रहा था. दूसरे कमरे में लगभग 40 वर्षीय एक व्यक्ति की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर भी तेजधार हथियार के घाव थे. वह विकलांग था. उस की व्हीलचेयर वहीं पास में उलटी पड़ी थी. देखने से ही लग रहा था कि विकलांग होने के बावजूद उस ने हत्यारों का विरोध किया था. दोनों को ही बड़ी बेरहमी से मारा गया था.

मैं ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. कमरे में रखा टीवी अभी भी चल रहा था. मेरे इशारे पर सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने टीवी बंद कर दिया. क्राइम टीम और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को भी बुलाया गया था, साथ ही डौग स्क्वायड को भी. जासूस कुत्ते लाश को सूंघ कर मकान के पिछवाड़े जा कर रुक गए. संभवत: हत्यारे वहां से किसी सवारी में बैठ कर गए थे.

मकान की अच्छी तरह छानबीन की गई. लूटपाट के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे. हत्याएं शायद आपसी रंजिश के कारण हुई थीं. टीवी के पास खून सना एक खंजरनुमा चाकू पड़ा था. मैं ने फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को उसे संभाल कर रखने के लिए कहा. हत्याएं शायद चाकू से की गई थीं. मैं पुलिस टीम के साथ मुआयना कर रहा था कि पड़ोसियों से पता चला कि यहां सिर्फ हत्याएं ही नहीं हुई थीं, बल्कि इस परिवार के 2 अन्य लोग लापता भी थे.

इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने पूछताछ के आधार पर मुझे बताया कि इस परिवार के मुखिया का नाम रोशनलाल था और वह रेलवे से रिटायर्ड था. इस के पहले यह परिवार चंद्रनगर में रहता था. रोशनलाल की पत्नी का नाम शकुंतला था. दोनों की 4 संतानें थीं, जिन में सब से बड़ी 47 वर्षीया बेटी स्वीटी शादीशुदा थी और इंग्लैंड में रहती थी. दूसरे नंबर का बेटा राजेश कुमार उर्फ राजू अपाहिज था, लेकिन घर में काम कर के लगभग 10 हजार रुपए महीना कमा लेता था.

तीसरे नंबर की बेटी सीमा भी शादीशुदा थी, लेकिन 3 साल पहले पीलिया से उस की मृत्यु हो चुकी थी. सब से छोटी 36 वर्षीया निशा थी. बीए पास निशा किसी प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थी. लगभग 2 महीने पहले इन लोगों ने अपना चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख रुपए में बेचा था. लगभग डेढ़ महीने पहले ही यह परिवार इस मकान में रहने आया था. यह मकान उन्होंने 40 लाख रुपए में खरीदा था. कत्ल शकुंतला और राजेश कुमार उर्फ राजू का हुआ था. जबकि रोशनलाल और निशा गायब थे.

मैं ने इंसपेक्टर निर्मल सिंह को आदेश दिया कि लाशों का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दें. साथ ही इंसपेक्टर हरपाल सिंह से कहा कि पड़ोसियों से पूछताछ कर के बापबेटी की तलाश में संभावित जगहों पर छापे मारें. जबकि सबइंस्पेक्टर बिट्टन कुमार को मैं ने अस्पतालों, बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन पर बापबेटी की तलाश करवाने तथा जिले के अन्य सभी थानों में उन का हुलिया बता कर वायरलैस मैसेज भिजवाने की जिम्मेदारी सौंपी.

चूंकि यह केस पुलिस कमिश्नर की नजर में आ गया था, इसलिए इन कामों से फारिग हो कर उन्हें रिपोर्ट देने मैं उन के औफिस पहुंच गया. मैं ने अपनी परेशानी बता कर उन से कहा, ‘‘सर, समस्या यह है कि यह परिवार मोहल्ले में नया है. पड़ोसियों को इन के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी नहीं है.’’

‘‘ठीक है, जैसा भी हो हर नजरिए से जांच करो. इस के लिए कई टीमें बना कर लगाओ. और हां, सब से जरूरी है बापबेटी का पता लगाना.’’

कमिश्नर साहब के पास से लौट कर मैं ने एक बार फिर घटनास्थल पर जा कर पड़ोसियों से पूछताछ की. काफी लंबी छानबीन के बाद काम की एक बात पता चली. मैं ने जब रोशनलाल के घर पर आनेजाने वाले लोगों की लिस्ट बनाई तो पता चला कि रमित कुमार भंडारी उर्फ रिकी नाम का एक युवक रोशनलाल के घर कुछ ज्यादा ही आताजाता था. मैं ने हरपाल सिंह से रमित के बारे पता लगाने को कहा.

हरपाल सिंह ने पता लगा कर बताया कि रमित कुमार भंडारी जस्स्यिं रोड, तरसेम कालोनी के मकान नंबर बी34/6614 में रहता था. वह रमित का मोबाइल नंबर भी ले आए थे. मेरे कहने पर सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने रमित को फोन किया, पर उस ने फोन नहीं उठाया. जब उसे कई बार फोन किया गया तो उधर से कंप्यूटराइज्ड आवाज आने लगी कि यह नंबर पहुंच के बाहर है.

काफी कोशिशों के बावजूद हमें तफ्तीश को आगे बढ़ाने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था. कह सकते हैं कि हम अंधेरे में तीर मार रहे थे. ऐसे में जांच आगे बढ़ाने के लिए हमें केवल रमित भंडारी ही एकमात्र सहारा नजर आ रहा था. हमारी सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं. इसलिए हम उस का नंबर मिलाते रहे.

आखिर उस ने फोन उठा लिया. सबइंस्पेक्टर बिट्टन कुमार ने उसे मेरे औफिस आने को कहा. उस ने बताया था कि उस समय वह जालंधर में है और आधे घंटे में हाजिर हो जाएगा. मैं अपने औफिस में बैठा उस का इंतजार करता रहा.

इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने कहीं से मृतका शकुंतला के मायके का पता ढूंढ़ निकाला था. उस के पिता जगतराम की फगवाड़ा में टेलरिंग की दुकान थी.  पता मिल गया तो इस घटना की सूचना मृतका के भाइयों अशोक, सुखविंदर और जसविंदर को दे दी गई थी.

                                                                                                                                             क्रमशः

मुझसे शादी करोगी?

25 सितंबर, 2020 की रात की बात है. रात 12 बजे 24 वर्षीय रेशमा शीलवंत चव्हाण अपनी मां के साथ देहू रोड पुलिस थाने पहुंची. रेखा शीलवंत मुंबई से 105 किलोमीटर दूर पूना शहर की रहने वाली थी. उन का घर आदर्श कालोनी में था. उन की कालोनी थाना देहू क्षेत्र में आता था. थाने की ड्यूटी पर मौजूद सबइंस्पेक्टर अशोक जगताप ने उन्हें सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया और उन के आने का कारण पूछा.

रेशमा चव्हाण ने अपने आने का जो कुछ कारण उन्हें बताया उसे सुन कर अशोक जगताप के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. उन्होंने बताया कि आधा घंटे पहले प्रशांत अपने 2 साथियों के साथ उन के घर आया था और उस ने उन की छोटी बहन प्रिया चव्हाण को अपने साथ चलने के लिए कहा.

प्रिया के मना करने पर वह उसे जबरन अपने साथ ले गया. सर, कुछ कीजिए. मुझे प्रशांत गायकवाड़ पर जरा भी भरोसा नहीं है. वह मेरी बहन प्रिया के साथ कुछ भी कर सकता है. उस की 2 माह की बेटी का रोरो कर बुरा हाल है. मामला काफी संगीन था. सबइंसपेक्टर अशोक जगताप ने रेशमा चव्हाण की तहरीर पर प्रिया चव्हाण के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया.

इस के साथ ही उन्होंने इस मामले की जानकारी थानाप्रभारी मनीष कल्याणकर इंसपेक्टर क्राइम पाडूरंग गोकणे, सबइंसपेक्टर छाया बोरकर के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी और रेशमा चव्हाण और उस की मां को आश्वासन दिया कि पुलिस जल्द से जल्द प्रिया को ढूंढ़ने की कोशिश करेगी.

वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में सबइंस्पेक्टर अशोक जगताप ने अपने सहायकों के साथ अपनी तफ्तीश की रूपरेखा तैयार की और प्रिया चव्हाण अपहरण की तफ्तीश शुरू कर दी. प्रशांत गायकवाड़ के मिलने की जहांजहां संभावना थी वहांवहां छापा मारा गया, लेकिन वह उन के हाथ नहीं लगा.

देहूरोड पुलिस अधिकारियों को मामले की तफ्तीश शुरू किए अभी 12 घंटे भी नहीं हुए थे कि पुलिस कंट्रोल रूम से उन्हें एक बुरी खबर मिली. 26 सितंबर, 2020 को दोपहर कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि आदर्शनगर कालोनी की खाड़ी के पानी में एक महिला का शव तैर रहा है. आदर्श नगर इलाका देहूरोड पुलिस थाने के अंतर्गत आता था. इसलिए मामले की जानकारी देहूरोड पुलिस थाने को दे दी गई थी.

सूचना मिलते ही देहू रोड पुलिस थाने के सबइंसपेक्टर अशोक जगताप अपने सहायकों के साथ तुरंत घटना स्थल पर पहुंच गए. चूंकि रेशमा चव्हाण ने अपनी बहन प्रिया के अपहरण की शिकायत पहले ही थाने में दर्ज करवा रखी थी, इसलिए पुलिस टीम ने रेशमा चव्हाण को सूचना दे कर शिनाख्त के लिए घटनास्थल पर बुला लिया.  शव को देखते ही रेशमा चव्हाण दहाड़ मार कर रोने लगी. इस से पुलिस टीम को समझते देर नहीं लगी कि खाड़ी में पड़ा शव प्रिया चव्हाण का ही है. रेशमा चव्हाण को सांत्वना देने के बाद प्रिया के शव को बाहर निकलवा कर उस का निरीक्षण किया गया.

सबइंस्पेक्टर अशोक जगताप अभी शव का निरीक्षण और वहां एकत्र भीड़ से पूछताछ कर ही रहे थे कि मामले की जानकारी पा कर थानाप्रभारी मनीष कल्याणकर, इंसपेक्टर पांडुरंग गोकणे, महिला सबइंसपेक्टर छाया वारेक के साथ मौका ए वारदात पहुंच गए थे. उन के साथ फौरेंसिक टीम भी आ गई थी. शव की फौरेंसिक जांच के बाद थानाप्रभारी मनीष कल्याणकर ने अपने सहायकों के साथ शव का सरसरी निगाह से निरीक्षण किया. फिर लाश को पोस्टमार्टम के लिए स्थानीय सिविल अस्पताल भेज कर थाने  लौट आए.

मामला अब और गंभीर हो गया था. प्रशांत गायकवाड़ पर अब तक प्रिया चव्हाण के अपहरण तक का ही आरोप था. अब उस के विरूद्ध हत्या का भी मामला दर्ज कर लिया गया. थाने के वरिष्ठ अधिकारियों ने विचार कर मामले की तफ्तीश इंसपेक्टर पांडुरंग गोकणे और सबइंस्पेक्टर अशोक जगताप को सौंप दी.

सबइंसपेक्टर अशोक जगताप इस की तफ्तीश पहले ही कर रहे थे. लेकिन प्रशांत गायकवाड़ उन के हाथ नहीं आया था. फिर भी वह निराश नहीं थे. उन्हें अपने मुखबिरों पर पूरा भरोसा था. 27 सितंबर, 2020 को उन के एक मुखबिर ने बताया कि प्रशांत गायकवाड़ आज रात 3 बजे के आसपास पूना थरगांव के डांगे चौक पर अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने के लिए आने वाला है.

सबइंसपेक्टर अशोक जगताप ने इस बात की जानकारी अपने वरीष्ठ अधिकारियों को दी और अपना जाल बिछा कर प्रशांत गायकवाड़ को हिरासत में ले लिया. पुलिस हिरासत में प्रशांत गायकवाड़ प्रिया अपहरण और हत्या के मामले में अपने आप को निर्दोष बता कर पुलिस को गुमराह करता रहा. लेकिन पुलिस की सख्ती के बाद वह ज्यादा देर न टिक सका. उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए प्रिया के अपहरण और हत्या के बारे में जो बताया वह काफी हैरान कर देने वाला था.

सूर्यकांत गायकवाड़ की गिनती पूना शहर के एक प्रतिष्ठित और संपन्न किसानों में होती थी. पूना शहर के देहूरोड पर शानदार बंगला और शहर के बाहर उन का एक फार्महाउस था. जहां उन की अच्छीखासी काश्तकारी थी. बंगले में सुखसुविधाओं की सारी चीजे मौजूद थीं. उन का बेटा प्रशांत बंगले में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था.

35 वर्षीय प्रशांत गायकवाड़ स्वस्थ सुंदर और महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह सूर्यकांत गायकवाड़ का एकलौता और लाड़ला बेटा था. उसे किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. प्रशांत की शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने थरगांव डांगे चौक पर रहने वाले अपने एक रिश्तेदार की बेटी से उस की शादी कर दी थी. समय के साथ वह 2 बच्चों का पिता बन गया. घर में सुंदर सुशील पत्नी होने के बावजूद जब वह किसी शादी प्रोग्राम था पार्टी में किसी संजीसंवरी युवती को देखता तो उस के मुंह में पानी आ जाता था और वह उसे पाने के लिए आतुर हो उठता था.

उस के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. 20 वर्षीय प्रिय शीलवंत चव्हाण जितनी सुंदर और खूबसूरत थी उतनी ही चंचल आधुनिक सभ्य समाज की युवती थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें तो करती थी लेकिन अपनी मर्यादा में रहती थी. उस की बातें हर किसी को मोह लेती थीं. उस के पिता की मौत हो चुकी थी. परिवार संपन्न था, वह अपनी बड़ी बहन रेशमा और मां के साथ रहती थी.

सजीसंवरी प्रिया को प्रशांत गायकवाड ने अपने एक दोस्त की शादी के समारोह में देखा था. प्रिया की खूबसूरती देख कर प्रशांत गायकवाड़ उस का दीवाना हो गया. प्रिया शादी समारोह में जब तक रही प्रशांत गायकवाड़ की निगाहें उस का पीछा करती रहीं. प्रिया और उस के परिवार से प्रशांत गायकवाड़ का परिचय उस के दोस्त ने करवाया तो प्रशांत प्रिया के करीब आने की कोशिश करने लगा.

शादी समारोह खत्म होने के बाद प्रशांत ने प्रिया और उस की मां बहन को अपनी कार में लिफ्ट दे कर उन के घर छोड़ दिया. रास्ते में प्रिया चव्हाण उस की मां और बहन रेशमा चव्हाण प्रशांत गायकवाड़ की बातों और व्यवहार से इस तरह प्रभावित हुईं कि उसे अपने घर चायनाश्ते पर बुला लिया. प्रिया और उस के परिवार वालों के इस प्रस्ताव पर प्रशांत गायकवाड़ के मन में लड्डू फूटने लगे. प्रशांत गायकवाड़ यही चाहता था.

वह दूसरे दिन ही प्रिया से मिलने उस के घर पहुंच जाना चाहता था. लेकिन किसी तरह अपने मन को काबू कर वह एक सप्ताह बाद प्रिया के घर पहुंचा. यह संयोग ही था कि उस समय प्रिया घर में अकेली थी. प्रशांत गायकवाड़ के लिए यह समय सोने पर सुहागा था. उसे ऐसे ही मौके की तो तलाश थी. प्रशांत ने प्रिया से अधिकतर इधरउधर की बातें की और अपने आप को अनमैरिड बता कर प्रिया का मोबाइल नंबर ले लिया.

प्रिया का मोबाइल नंबर लेने के बाद प्रशांत प्रिया को अक्सर फोन करने लगा. नतीजा यह हुआ कि प्रशांत गायकवाड़ की मीठी लुभावनी बातें प्रिया के मन में धीरेधीरे घर करने लगीं और वह उस की तरफ आकर्षित हो गईं. प्रशांत गायकवाड़ यही चाहता भी था. वह मौका देख कर प्रिया को अपनी कार में बैठा कर लंबे सफर पर ले जाता. दोनों मौल में जा कर शौपिंग करते. प्रिया को वह अच्छेअच्छे उपहार देता था.

प्रिया इस बात से अनभिज्ञ थी कि प्रशांत गायकवाड़ सिर्फ उस के शरीर का भूखा है. प्रशांत ने कई बार मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पार करने की कोशिश की, लेकिन प्रिया ने उसे रोक दिया. जब प्रशांत गायकवाड़ यह बात अच्छी तरह समझ गया कि प्रिया अपनी लक्ष्मण रेखा लांघने वाली नहीं है तो उस ने एक योजना के तहत अपनी पत्नी और बच्चों को उन के ननिहाल भेज कर प्रिया को जरूरी बात के लिए अपने बंगले पर बुलाया और नशे का शरबत पिला कर उस के साथ संबंध बनाए.

जब यह बात प्रिया को पता चली तो उसे नागवार लगा. बाद में जब यह बात प्रिया को मालूम हुई की प्रशांत गायकवाड़ शादीशुदा ही नहीं बल्कि 2 बच्चों का पिता भी है तो वह अपने आप को संभाल नहीं पाई और देहूरोड़ पुलिस थाने जा कर उस के विरूद्ध धोखा और बलात्कार की शिकायत दर्ज करवा दी. जिस से पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. यह मामला 2016 का था.

2 साल तक चले इस प्रकरण में जब प्रशांत गायकवाड़ को एहसास हो गया कि वह सजा के बिना नहीं बच सकता तो उस ने प्रिया से मेलमिलाप में ही अपनी भलाई समझी और प्रिया के घर जा कर उस से और उस की मांबहन से अपने किए की माफी मांगी. इतना ही नहीं, उस ने अपनी पत्नी को तलाक दे कर प्रिया से शादी करने का भी वादा किया. साथ ही उस ने मामले को वापस लेने की विनती भी की.

प्रशांत के अनुरोध पर प्रिया ने अपना भविष्य देखते हुए केश वापस ले कर प्रशांत गायकवाड़ को माफ कर दिया. वह पहले की तरह प्रशांत गायकवाड़ से मिलनेजुलने लगी. बीचबीच में जब प्रिया शादी की बात करती तो प्रशांत अपनी पत्नी से तलाक लेने का बहाना कर उसे टाल देता.समय अपनी गति से चलता रहा. प्रिया प्रशांत के बहकावे में आ कर अपने आप को भूल गई और गर्भवती हो गई. समय आने पर उस ने एक बच्ची को जन्म दिया.

बच्ची के जन्म के 2 माह बाद प्रिया ने जब अपनी शादी और बच्ची के भविष्य के लिए प्रशांत गायकवाड़ से बात की तो प्रशांत टालमटोल करता रहा. जिस से प्रिया और उस के परिवार वालों को उस की नीयत का पता चल गया. प्रिया की शादी और उस की बच्ची के हक का दबाव बनाने के लिए प्रिया की मां और बहन ने महिला संगठन का सहारा लिया.घटना के दिन जिस समय महिला संगठन प्रशांत गायकवाड़ के बंगले पर पहुंचा, उस समय प्रशांत घर पर नहीं था.

उन का सामना उस की पत्नी और बच्चों को करना पड़ा. संगठन की महिलाओं ने उसे जम कर लताड़ा. बंगले की खिड़की और बंगले में खड़ी कार के सारे शीशे तोड़ डाले और उस की पत्नी को चेतावनी दे कर निकल गईं कि अगर प्रशांत गायकवाड़ ने प्रिया से शादी नहीं की और बच्ची को पिता का नाम नहीं दिया तो दोबारा फिर आएंगी और अंजाम बुरा होगा.

पति प्रशांत के चरित्र और महिला संगठन की चेतावनी से उस की पत्नी बुरी तरह डर गई. उसे पति से नफरत हो गई. वह अपना सारा सामान और बच्चों को ले कर मायके जाने के लिए तैयार हो गई. शाम को प्रशांत गायकवाड़ घर आया तो घर की स्थित देख कर हैरान रह गया. पत्नी ने उसे आडे़ हाथों लेते हुए काफी खरीखोटी सुनाई और अपने दोनों बच्चों को ले कर उसी समय घर छोड़ कर मायके चली गई.

पत्नी के मायके जाने और अपने अपमान को वह सह नहीं सका. उस का खून खौल उठा और उस ने प्रिया चव्हाण के प्रति खतरनाक फैसला ले लिया. उस का मानना था कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी. रोजरोज की किटकिट खत्म हो जाएगी. अपने फैसले के अनुसार, प्रशांत गायकवाड़ ने अपने दो दोस्तों विक्रम रोकड़े और अभिजीत दड़े को अपनी मदद के लिए बुलाया और उन्हें अपने साथ ले कर रात को प्रिया चव्हाण के घर जा पहुंचा.

दोस्तों के साथ वह प्रिया को उठा कर आदर्श नगर कालोनी की खाड़ी के पास ले गया. उस ने प्रिया चव्हाण का गला दबा कर पहले उस की हत्या की और पहचान मिटाने के लिए वहां पड़े पत्थरों से उस के चेहरे को विकृत कर के खाड़ी के पानी में फेंक दिया. इस के बाद वह फरार हो गया.

प्रशांत सूर्यकांत गायकवाड़ से विस्तृत पूछताछ करने के बाद जांच अधिकारी अशोक जगताप ने उस के खिलाफ अपहरण के मुकदमे में धारा 302/201 और 364 और जोड़ दी. बाद में उन्होंने उस की निशानदेही पर उस के दोस्त के ठिकानों पर छापा मार कर विक्रम रोकड़े को तो अपनी गिरफ्त में ले लिया. लेकिन अभिजीत दड़े पुलिस टीम के पहुंचने के पहले ही फरार हो गया.

प्रशांत सूर्यकांत गायकवाड़ और विक्रम रोकड़े को पूना के मैट्रोपोलिटन मजिस्टै्रट के सामने पेश कर के यरवदा जेल भेज दिया गया. दोनों अभियुक्त जेल में हैं.

एयर होस्टेस का अधूरा प्यार

एक हत्या ऐसी भी

कत्ल का मुकदमा चल रहा हो तो उस का फैसला जानने के लिए काफी लोग उत्सुक रहते हैं. 12 मार्च, 2018 को चंडीगढ़ के सेशन जज बलबीर सिंह की अदालत के भीतरबाहर तमाम लोग एकत्र थे. वजह यह थी कि उन की अदालत में चल रहा कत्ल का एक मुकदमा अपने आखिरी पड़ाव पर आ पहुंचा था. लोग इस केस का फैसला सुनने को बेकरार थे.

इस केस की शुरुआत कुछ यूं हुई थी.

उस दिन किसी केस की छानबीन के सिलसिले में चंडीगढ़ के थाना सेक्टर-31 की महिला एसएचओ जसविंदर कौर अपने औफिस में मौजूद थीं. रात में ही करीब 45 वर्षीय शख्स ने आ कर उन से कहा, ‘‘मैडम, मेरा नाम दुर्गपाल है और मैं रामदरबार इलाके के फेज-2 के मकान नंबर 2133 में रहता हूं.’’

‘‘जी बताइए, थाने में कैसे आना हुआ, वह भी इस वक्त?’’ इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने उस व्यक्ति को गौर से देखते हुए पूछा.

‘‘ऐसा है मैडमजी,’’ खुद को दुर्गपाल कहने वाले शख्स ने बताना शुरू किया, ‘‘हम 4 भाई हैं और मैं सब से बड़ा हूं. मेरी मां शारदा देवी मेरे से छोटे भाई राजबीर के साथ ग्राउंड फ्लोर पर रहती हैं. फर्स्ट फ्लोर पर मेरा सब से छोटा भाई विजय रहता है. मैं और तीसरे नंबर का भाई उदयवीर अपनीअपनी फैमिली के साथ टौप फ्लोर पर रहते हैं.’’

‘‘ठीक है, आप समस्या बताइए.’’

‘‘मैडम, हमारे घर के टौप फ्लोर पर 4 कमरे हैं. वहां सीढि़यों की तरफ वाले 2 कमरे मेरे पास हैं और उस के आगे वाले 2 कमरे मेरे भाई उदयवीर के पास.’’

‘‘आप के मकान और कमरों की बात तो हो गई, वह बताइए जिस के लिए आप को थाने आना पड़ा?’’ थानाप्रभारी जसविंदर कौर ने अपना लहजा थोड़ा बदला. लेकिन उस शख्स ने जैसे कुछ सुना ही नहीं.

उस ने अपनी बात बेझिझक जारी रखी, ‘‘मेरा भाई उदयबीर अपनी पत्नी प्रतिभा के साथ रहता था. दोनों की शादी को अभी कुल डेढ़ साल हुआ है. 10 जून, 2017 को मेरे पिता जंडियाल सिंह की मौत हो गई थी. कल मैं और मेरे तीनों भाई कुछ रिश्तेदारों के साथ हरिद्वार में पिताजी की अस्थियों का विसर्जन कर के रात करीब साढ़े 8 बजे घर लौटे थे.’’

‘‘आगे बताइए,’’ अब इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने दुर्गपाल की बात में रुचि लेते हुए कहा.

‘‘हम लोग थकेहारे थे. घर आ कर खाना खाने के बाद सो गए थे. मैं घर के टौप फ्लोर पर बने कमरों के आगे गैलरी में सो रहा था. रात के एक बजे जब मैं गहरी नींद में था, तभी शोरशराबा सुन कर अचानक मेरी आंखें खुल…’’

दुर्गपाल की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि इंसपेक्टर जसविंदर कौर ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया. दरअसल, थानाप्रभारी के लिए कंट्रोलरूम से फोन आया था. इंसपेक्टर जसविंदर ने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से पीसीआर कांस्टेबल ओमप्रकाश था.

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उस ने कहना शुरू किया, ‘‘मैडम, रामदरबार इलाके से किसी के छत से गिराने की काल आई है. मौके पर पहुंच कर पता चला कि छत से गिरने वाले को अस्पताल ले जाया चुका था, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसे गिराने वाला फरार है. शुरुआती छानबीन में ही मामला कत्ल का लग रहा है, जिस के पीछे की वजह इश्क हो सकती है. केस आप के ही इलाके का है.’’

‘‘मरने वाले और मारने वाले के नाम वगैरह के बारे में पता चला?’’ इंसपेक्टर जसविंदर ने पूछा.

‘‘जी मैडम, सब पता कर लिया है. मरने वाले का नाम उदयवीर है और उसे छत से गिरा कर मारा है उस की पत्नी के कथित प्रेमी सतनाम ने.’’

‘‘ओके, तुम लोग अभी वहीं रुको, मैं पहुंचती हूं वहां.’’ कहते हुए इंसपेक्टर जसविंदर ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

उन्होंने सामने बैठे दुर्गपाल की ओर देख कर पूछा, ‘‘आप के भाई उदयवीर को सतनाम नामक शख्स ने छत से नीचे गिरा कर मार दिया और आप…’’

‘‘जी मैडम.’’ इंसपेक्टर जसविंदर की बात पूरी होने से पहले ही दुर्गपाल ने कहा.

‘‘तुम वहां रुकने के बजाय थाने चले आए?’’

‘‘मैडम, मैं ने तुरंत 100 नंबर पर फोन कर के घटना के बारे में बता दिया था. साथ ही आटोरिक्शा से भाई को सेक्टर-32 के सरकारी अस्पताल में पहुंचा भी दिया था. फिर यह सोच कर कि इस तरीके से पुलिस पता नहीं कब पहुंचेगी, मैं अपने दूसरे भाइयों को वहीं रुके रहने को बोल कर थाने चला आया.’’

‘‘कोई बात नहीं, पुलिस ने वहां पहुंच कर अपनी काररवाई शुरू कर दी है. तुम भी चलो हमारे साथ.’’ इस के बाद इंसपेक्टर जसविंदर कौर सबइंसपेक्टर राजवीर सिंह और सिपाही प्रमोद व नवीन के अलावा दुर्गपाल सिंह को साथ ले कर सरकारी गाड़ी से रामदरबार की ओर रवाना हो गईं.

घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र थी. पीसीआर वाले भी वहीं थे. उन से जरूरी जानकारी लेने के बाद उन्हें वहां से रुखसत कर दिया गया. साथ ही सिपाही नवीन को वहां तैनात कर के इंसपेक्टर जसविंदर कौर अन्य लोगों के साथ सेक्टर-32 के सिविल अस्पताल चली गईं.

वहां उदयवीर को पहले ही मृत घोषित किया जा चुका था. थाना पुलिस ने अपनी आगे की काररवाई शुरू कर दी. एसआई राजबीर सिंह शव का पंचनामा बनाने लगे और जसविंदर कौर ने दुर्गपाल से उस की तहरीर ले कर एफआईआर दर्ज करवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी. दुर्गपाल ने अपनी तहरीर के शुरुआती हिस्से में वही सब दोहराया, जो वह पहले ही थाने में थानाप्रभारी जसविंदर कौर को बता चुका था. आगे उस ने जो कुछ बताया, वह कुछ इस तरह था—

शोरशराबा सुन कर जब मेरी आंखें खुलीं तो मैं ने देखा कि बहलाना में रहने वाला एक लड़का सतनाम सिंह अपने हाथ में बेसबाल बैट पकड़े मेरे भाई उदयवीर से लड़ता हुआ छत पर जा पहुंचा था. वह उदयवीर से मारपीट करते हुए उसे घसीट कर छत पर ले गया था. बीचबीच में उदयवीर भी उस का मुकाबला करने का प्रयास करते हुए उस पर हाथपैर से वार कर रहा था.

यह सब देख मैं भी तेजी से उन के पीछे छत पर चला गया. तब तक वे दोनों लड़ते हुए कौर्नर के मकानों की छत पर जा पहुंचे थे. ऐसा इसलिए था कि हमारी लाइन के मकानों व बैकसाइड वाले मकानों की छतें आपस में मिली हुई हैं. जिस वक्त वे दोनों लड़ते हुए मकान नंबर 2088 की छत पर पहुंचे तो मैं भी उन्हें छुड़ाने के लिए वहां जा पहुंचा. अभी मैं उन से थोड़े फासले पर था, जब मेरे कानों में सतनाम की आवाज पड़ी.

वह मेरे भाई से कह रहा था कि प्रतिभा हमेशा से उस की प्रेमिका रही है, उसे मजबूरी में उस से शादी करनी पड़ी थी. अब वह उसे आजाद कर दे, वरना वह उस की (मेरे भाई उदयवीर की) जान ले लेगा.

इस से पहले कि मैं भाई की मदद के लिए उस के पास पहुंच पाता, वह दीवार के एक कोने की तरफ हुआ और तभी सतनाम ने मौका देख कर उसे धक्का दे कर नीचे गिरा दिया. सतनाम सिंह ने मेरे भाई की पत्नी प्रतिभा के साथ लव अफेयर के चलते मेरे भाई को रास्ते से हटाने के लिए जान से मार दिया. उस के खिलाफ मामला दर्ज कर के सख्त काररवाई की जाए.

उसी रोज यह प्रकरण थाना सेक्टर-31 में भादंवि की धाराओं 302 एवं 456 के तहत दर्ज हो गया. यह 14 जून, 2017 की बात है. मौके की अन्य काररवाइयां पूरी कर के थाने लौटने के बाद पुलिस ने सतनाम सिंह को काबू करने की योजनाएं बनानी शुरू कीं. वारदात को अंजाम देने के बाद वह मौके से फरार होने में सफल हो गया था. लेकिन अपराध कर के भागने के 8 घंटे के भीतर ही पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया.

अगले दिन अदालत से उस का कस्टडी रिमांड हासिल कर के उस से विस्तार से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह चंडीगढ़ के गांव बहलाना के मकान नंबर 74 का रहने वाला था. यहीं की रहने वाली लड़की प्रतिभा से उसे प्यार हो गया था. मगर यह एकतरफा प्यार था, जिस में प्रतिभा ने कभी कोई रुचि नहीं दिखाई थी.

सतनाम सिंह ने उसे अपनी प्रेमिका घोषित करते हुए उस का पीछा नहीं छोड़ा था. इस से प्रतिभा खुद तो परेशान थी ही, उस के घर वाले भी फिक्रमंद होने लगे थे. उन के मन में यह भय समा गया था कि कहीं सतनाम उन की बेटी को उठा न ले जाए. इस की वजह यह भी थी कि सतनाम अपराधी किस्म का लड़का था. आखिर प्रतिभा के घर वालों ने रामदरबार के रहने वाले उदयवीर से उस की शादी कर दी.

सतनाम के बताए अनुसार प्रतिभा के घर वालों का डर एकदम सही निकला. वह वाकई उन की लड़की को अपहृत करने के प्रयास में था. यह अलग बात है कि अभी तक उसे सफलता नहीं मिल पाई थी. प्रतिभा की शादी के बाद तो उस के लिए यह काम और भी मुश्किल हो गया था.

देखतेदेखते इस शादी को डेढ़ साल गुजर गया. लेकिन सतनाम इस बीच प्रतिभा को भूल नहीं पाया. इस बीच उस ने एक दुस्साहस भरा काम यह भी किया कि उदयवीर से मिल कर उस से सीधे ही कह दिया, ‘‘प्रतिभा मेरी प्रेमिका थी और हमेशा रहेगी. तुम ने उस की मजबूरी का फायदा उठा कर उस की इच्छा के विरुद्ध शादी की है. तुम्हारी भलाई इसी में है कि उस से तलाक ले कर उसे मेरे हवाले कर दो, वरना मुझे तुम्हारा खून करना पड़ेगा.’’

उदयवीर ने इस बारे में अपने भाइयों को भी बताया और प्रतिभा से भी बात की. प्रतिभा ने पति को समझाया कि उस का सतनाम से प्रेमप्यार जैसा कभी कोई रिश्ता नहीं था. वह उस के पीछे पड़ कर नाहक उसे परेशान करता था. इस पर उदयवीर ने सतनाम को फोन कर के उसे लताड़ दिया.

बकौल सतनाम उस ने भी तय कर लिया कि आगे उसे कुछ भी करना पड़े, वह प्रतिभा को उठा ले जाएगा. बस, मौका मिलने भर की देर थी. यह मौका भी उसे जल्दी ही मिल गया. उदयवीर के पिता का देहांत हो गया और उन की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने उसे अपने भाइयों व परिजनों के साथ हरिद्वार जाना पड़ा.

सतनाम ने पुलिस को बताया कि उसे 13 जून, 2017 की रात में प्रतिभा के घर पर अकेली होने की जानकारी मिली. आधी रात के बाद वह घर के पिछवाड़े से उस के पास जा पहुंचा. वहां जा कर देखा तो उस का पति भी उस की बगल में लेटा था. लेकिन सतनाम ने परवाह नहीं की और प्रतिभा के मुंह पर हाथ रख कर उसे कंधे पर लाद लिया. जब वह प्रतिभा को ले जाने लगा तो उदयवीर की आंखें खुल गईं. वह सतनाम पर झपटा तो प्रतिभा उस की पकड़ से छूट गई.

इस के बाद सतनाम और उदयवीर गुत्थमगुत्था हो गए. संभव था कि उदयवीर सतनाम पर हावी हो जाता और इस बीच उस के परिजन भी उस की मदद को आ जाते. लेकिन पता नहीं कैसे वहां पड़ा बेसबाल बैट सतनाम के हाथ लग गया और वह उसी से उदयवीर को पीटते हुए छत पर ले गया. वहां से सतनाम ने उसे नीचे गिरा दिया. वह मुंह के बल आ कर गिरा था.

सेक्टर-32 के सिविल अस्पताल के डा. मंडर रामचंद सने व डा. गौरव कुमार ने उदयवीर के शव का पोस्टमार्टम किया. उन्होंने उस के जिस्म पर छोटीबड़ी 10 चोटों का उल्लेख करते हुए मौत का कारण मानसिक आघात और फेफड़ों का बायां हिस्सा नष्ट होना बताया.

खैर, कस्टडी रिमांड की अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने सतनाम को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया. इस के बाद समयावधि के भीतर उस के विरुद्ध आरोपपत्र तैयार कर 8 गवाहों की सूची के साथ प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी गीतांजलि गोयल की अदालत में पेश कर दिया. इस के बाद यह केस सेशन कमिट हो कर चंडीगढ़ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश बलवीर सिंह की अदालत में विधिवत रूप से चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को गौर से सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से जांच करने के बाद बचावपक्ष के वकील व पब्लिक प्रौसीक्यूटर के बीच हुई बहस के मुद्दों पर भी पूरा ध्यान दिया.

बहस के दौरान पब्लिक प्रौसीक्यूटर राजेंद्र सिंह ने दूसरे की औरत को अपना बनाने की एवज में उस के पति का कत्ल करने को ले कर जहां इसे अमानवीय एवं घिनौना अपराध बताया, वहीं बचावपक्ष के वकील यादविंदर सिंह संधू ने अपनी दलील से अभियोजन पक्ष का रुख पलटने का प्रयास किया. वकील संधू का कहना था कि मृतक के पिता की मौत के बाद संपत्ति विवाद को ले कर उस का अपने भाइयों से झगड़ा हो गया था. उन्होंने ही उसे छत से गिरा कर मौत के घाट उतारा है. सतनाम सिंह को इस केस में नाहक फंसा दिया है.

लेकिन एक अलग बात यह भी रही कि जहां अभियोजन पक्ष की ओर से 8 गवाह अदालत में पेश हुए, वहीं बचावपक्ष एक गवाह भी पेश नहीं कर पाया. बहरहाल, माननीय न्यायाधीश बलवीर सिंह ने 12 मार्च, 2018 को अभियुक्त सतनाम सिंह को भादंवि की धाराओं 302 एवं 456 का दोषी करार देते हुए अपना फैसला सुना दिया. इस केस में दी जाने वाली सजा की घोषणा 14 मार्च, 2018 को की गई.

14 मार्च को दोषी को सजा सुनाए जाने से पहले सजा के मुद्दे को सुना गया. दोषी ने बताया कि उस की मां की मौत हो चुकी है और अपने वृद्ध पिता हरबंस सिंह का वही अकेला सहारा है. वैसे भी वह अपनी बीए की पढ़ाई कर रहा था, जो पूरी कर के उसे नौकरी की तलाश करनी थी. इसलिए उसे कम से कम सजा सुनाई जाए.

जज साहब ने यह सब शांति से सुना, मगर उसी दिन दोपहर बाद अपना 27 पृष्ठ का फैसला सुनाते हुए दोषी सतनाम सिंह को धारा 302 के तहत उम्रकैद व 5 हजार रुपए जुरमाने और धारा 456 के अंतर्गत एक साल कैद की सजा सुनाई. दोषी ने जुरमाना भरने में अपने को असमर्थ बताया तो उस की कैद की सजा में 6 महीने की बढ़ोत्तरी कर दी गई.

जिस दिन सतनाम सिंह को न्यायिक हिरासत के तहत जेल भेजा गया था, तब से वह चंडीगढ़ की बुड़ैल जेल में ही बंद था. उस की जमानत नहीं हो पाई थी. अब उसे अदालत के फैसले के बाद फिर से उसी जेल में भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों एवं अदालत के फैसले पर आधारित

प्यार नहीं जुनून में हुए खून

राजमिस्त्री का काम करने वाले विजयपाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की दुनिया में ऐसा भयानक तूफान आएगा कि उस में सब कुछ नष्ट हो जाएगा. विजयपाल बचपन से ही अपनी ननिहाल गांव हसनपुर नंगला, पलवल, हरियाणा में रहता था. लगभग 22 साल पहले उस की शादी उत्तर प्रदेश के जिला गौतमबुद्ध नगर के कस्बा जेवर की राधा के साथ हुई थी.

राधा दुलहन बन कर हसनपुर आ गई तो विजयपाल के जीवन में बहार आई. शादी के बाद चूंकि खर्चे बढ़ गए थे, इसलिए वह अब और ज्यादा मेहनत करने लगा था. फिर राधा ने पूनम को जन्म दिया. पिता बन चुके विजयपाल के पैर जमीन पर ही नहीं पड़ते थे. सभी कुछ अच्छा हो रहा था.

एक आम आदमी की तरह विजयपाल दिन भर मेहनत करता और रात में उसी बिल्डिंग में अपने मजदूरों के साथ सो जाता. वह दूरदराज के ठेके लेने के कारण कईकई दिनों तक घर नहीं आ पाता था. पर उसे विश्वास था कि उस की पत्नी बच्चों की परवरिश भलीभांति कर लेगी.

समय बीतता गया और पूनम के अलावा राधा 4 और बच्चों की मां बन गई. अब विजयपाल को घर के बढ़ते खर्चे और बच्चों की पढ़ाई की चिंता होने लगी. पिछले कुछ दिनों से राधा पति से जिद करने लगी थी कि हरियाणा में रहने से तो अच्छा है कि उन्हें अब अपनों के बीच रहना चाहिए, क्योंकि विजयपाल जो अपने नानानानी के यहां रहता था, वे भी चल बसे थे. पत्नी की बात विजयपाल की भी समझ में आ गई.

उस ने अपने एक दोस्त से बात की, जो अलीगढ़ जिले के गांव सालपुर में रहता था. दोस्त ने उस से कहा कि वह उस के रहने और काम की व्यवस्था कर देगा. दोस्त से बात करने के बाद विजय ने राहत की सांस ली. वह कुछ साल पहले अपनी पत्नी और बच्चों के साथ गांव सालपुर में आ कर बस गया. यह गांव अलीगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर है. वहीं आसपास वह मकान बनाने के ठेके लेने लगा.

सालपुर से विजय की ससुराल करीब 25 किलोमीटर दूर थी. अत: विजयपाल इस बात से भी आश्वस्त था कि उस का परिवार अब अपनों के काफी करीब है. यह मानवीय सोच है कि हर कोई अपनों से सहायता और सहयोग की उम्मीद रखता है पर अपनों के बीच आने का फैसला विजयपाल को इतना महंगा पड़ेगा, उस ने कभी भी नहीं सोचा था.

विजयपाल अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता था. उस की बड़ी बेटी पूनम पढ़ाई में काफी अच्छी थी. काम की वजह से विजयपाल कईकई दिनों बाद ही घर आ पाता था.

उस के पीछे उस के घर में क्या हो रहा था, उसे कुछ पता नहीं था. वह एकदो दिन के लिए घर आता तो उसे घर पर सब कुछ सामान्य ही दिखता था. इस से उसे लगता कि सब कुछ ठीक चल रहा है. पर घर पर उस की बड़ी बेटी पूनम का अपनी मां राधा से जो टकराव पैदा हो गया था, वह आने वाले वक्त में क्या गुल खिलाएगा, यह कोई नहीं जान सका था.

4-5 साल पहले विजय का परिवार सालपुर में आ कर बस गया था. तब से पूनम यह महसूस कर रही थी कि उस की मां जब चाहे तब अपने मायके चली जाती है. कभीकभी पूनम को अपनी मां की हरकतों पर शक होता, लेकिन अभी वह बहुत छोटी थी इसलिए मां से कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी इतना ही नहीं, वह मां के बारे में पिता को कुछ नहीं बता पाती थी. पर उस के मन में मां के प्रति नफरत के बीज अंकुरित हो चुके थे.

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पूनम ने इंटरमीडिएट की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास करने के लिए अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया था, पर समय कब करवट ले ले, पता ही नहीं चलता. पूनम पिछले कुछ समय से गांव में पड़ोस में रहने वाले प्रवेश कुमार को पसंद करने लगी थी. वह बीए तृतीय वर्ष में पढ़ रहा था. पढ़ाई के साथसाथ वह एक कोचिंग सेंटर में नौकरी भी करता था.

पूनम की मेहनत रंग लाई. उस ने इंटरमीडिएट की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर ली और उसे भी उसी कोचिंग सेंटर में काम मिल गया, जहां प्रवेश पढ़ाता था. पूनम भी एक तरह से अब एक टीचर बन गई थी.

पूनम और प्रवेश धीरेधीरे काफी करीब आने लगे थे. घर के माहौल से तंग आ कर पूनम जब प्रवेश कुमार के साथ थोड़ा समय बिता लेती तो खुद को सामान्य महसूस करती. पर प्रवेश को लगता कि पूनम किसी बात को ले कर परेशान रहती है. अभी तक पूनम और उस के बीच इतनी नजदीकियां नहीं थीं कि वह उस के मन की बात समझ पाता.

दरअसल पिछले कुछ समय से पूनम ने अपनी मां के व्यवहार में काफी बदलाव देखा. एक दिन जब वह कोचिंग सेंटर से घर लौटी तो देखा प्रताप उर्फ डिंपल और उस का भाई प्रभात उस के घर में बैठे हुए थे और उस की मां उन के साथ हंसहंस कर बातें कर रही थी. उन दोनों को देख कर पूनम सीधे अपने कमरे में चली गई तो राधा ने उस के कमरे में आ कर कहा, ‘‘क्या पढ़ाईलिखाई ने इतनी भी तमीज नहीं सिखाई कि मामा लोगों को नमस्ते भी कर लो.’’

‘‘कौन मामा?’’ पूनम ने गुस्से में कहा, ‘‘वो मेरे मामा कैसे हो सकते हैं, मैं सब कुछ जानती हूं मम्मी, तुम इन्हीं से मिलने के लिए जेवर जाती हो.’’

‘‘हां तो क्या मैं अपने मुंहबोले भाइयों से मिल भी नहीं सकती.’’

‘‘मुंहबोले भाई! मम्मी क्यों हमें धोखा दे रही हो. मैं इन्हें अच्छी तरह जानती हूं और फिर तुम्हारे क्या भाई नहीं हैं जो तुम ने इन को भाई बना लिया. देखो मम्मी, तुम जेवर जाती हो, खूब जाओ, पर इन का यहां आनाजाना मुझे पसंद नहीं है.’’ पूनम ने मन में दबी बात कह डाली. बेटी की बात सुन कर राधा हैरान रह गई और बाहर आ कर उस ने प्रताप से कहा, ‘‘पूनम काफी थकी हुई है, इसलिए मैं तुम लोगों के लिए चाय बना कर लाती हूं.’’

प्रताप उर्फ डिंपल और प्रभात सालियान निवासी खुशीराम के बेटे थे. खुशीराम बीडीओ था. प्रताप और प्रभात दोनों ही वैद्य थे, साथ ही दोनों भाई तंत्रमंत्र क्रियाओं से बीमार लोगों का इलाज करने का भी दावा करते थे. प्रभात ने तो मथुरा के गांव बाजना में किराए का मकान ले कर अपना धंधा जमा लिया था जबकि प्रताप ने सालपुर में अपनी दुकान खोल ली थी.

उस दिन के बाद दोनों भाइयों का राधा के पास आनाजाना होने लगा. वे उस की आर्थिक मदद भी करते रहते थे. राधा के उन दोनों भाइयों के साथ अवैध बन गए थे. पूनम को ये दोनों भाई फूटी आंख नहीं भाते थे. उस ने मां से कह भी दिया था कि इन का घर में आनाजाना ठीक नहीं है. पर मां ने उसे डांटते हुए कह दिया कि वह उस के जीवन में दखल न दे और केवल अपने काम से काम रखे.

मां की हरकतें पूनम के दिलोदिमाग में हलचल मचाए हुए थीं. ऐसे में वह क्या करे, यह उस की समझ में नहीं आ रहा था. पर हद तो तब हो गई जब एक दिन प्रताप ने पूनम के पास आ कर अचानक उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘हम में क्या बुराई है, जो तुम हम से दूर भागती हो?’’

प्रताप की इस हरकत पर पूनम को गुस्सा आ गया. वह अपनी मां से चिल्ला कर बोली, ‘‘मम्मी, अपने इस भाई को समझा लो वरना बहुत बुरा होगा.’’

प्रताप ने हैरानी से पूनम को देखा और बोला, ‘‘बड़ी चरित्रवान बनती है. तू क्या समझती है कि हमें तेरे बारे में कुछ पता नहीं है.’’

‘‘क्या पता है तुम्हें? और पता भी होगा तो फिर क्या कर लोगे तुम? देखो, जो तुम मेरी मां के भाई बनने का ढोंग कर रहे हो, वो सब मैं अच्छी तरह जानती हूं. तुम दोनों भाई मेरे परिवार से दूर ही रहो तो अच्छा है नहीं तो मैं अपने पापा को सब बता दूंगी.’’ पूनम गुस्से में बोली.

पूनम के तेवर देख प्रताप स्तब्ध रह गया लेकिन पूनम की बात पर उस की मां को गुस्सा आ गया. राधा ने पूनम को 2-4 तमाचे जड़ दिए. वह बोली, ‘‘तूने 2-4 किताबें क्या पढ़ लीं, अपनी औकात ही भूल गई.’’ पूनम भी कहां चुप रहने वाली थी. उस ने मां को फिर चेताया, ‘‘मम्मी, इन दोनों भाइयों से तुम दूर ही रहो तो अच्छा होगा वरना एक दिन तुम्हारे चालचलन ही हमें ले डूबेंगे.’’

उस दिन प्रताप और प्रभात तो वहां से चले गए पर जल्द ही उन्हें पता चल गया कि पूनम गांव के ही प्रवेश कुमार नाम के एक युवक से प्यार करती है. वे समझ गए कि प्रवेश ही पूनम की ताकत है. दोनों भाइयों को लगा कि राधा के साथ उन का जो खेल चल रहा है, उस में पूनम और प्रवेश कुमार सब से बड़ी बाधा हैं और वे दोनों उन के लिए खतरा हो सकते हैं. इसलिए जरूरी है कि उन दोनों को बदनामी का डर दिखा कर दूर कर दिया जाए.

एक दिन प्रवेश कुमार ने पूनम से कहा, ‘‘कल मुझे प्रताप ने रास्ते में रोक कर कहा था कि तू हमारी भांजी पूनम से मिलनाजुलना छोड़ दे वरना जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

उस की बात पर मुझे गुस्सा आ गया था. तब मैं ने उस का गिरेबान पकड़ कर कह दिया था कि तुम दोनों भाई किस नीयत से राधा आंटी के पास जाते हो, इस की जानकारी मुझे है, पर पूनम को तुम दोनों ने कोई नुकसान पहुंचाने की कोशिश की तो मैं तुम दोनों को छोड़ूंगा नहीं.

‘‘मेरे तेवर देख कर प्रताप को शायद महसूस हो गया कि अगर राधा के साथ बने अवैध संबंधों की पोल खुल गई तो उन की सभी जगह बदनामी होगी. फिर उन की तंत्रमंत्र और वैद्य की दुकान भी बंद हो जाएगी. इस के बाद प्रताप मुझे देख लेने की धमकी दे कर चला गया.’’

प्रवेश ने अपनी प्रेमिका पूनम से कहा कि वह इन दोनों भाइयों से सतर्क रहे और अगर ये दोनों तुम्हें तंग करें तो तुम अपनी मां से शिकायत जरूर करना. इन से डरने की जरूरत नहीं है. पूनम जानती थी कि मां से शिकायत कर के कोई फायदा नहीं, क्योंकि वह जब मां के सामने ही उस के साथ छेड़छाड़ कर रहे थे तो उस समय भी मां ने उन से कुछ नहीं कहा था. इसलिए पूनम मां से चिढ़ती थी. पूनम ने तय कर लिया कि ऐसे माहौल में उसे खुद ही सतर्क रहना होगा.

मांबेटी दोनों के बीच काफी रस्साकशी चल रही थी. एक दिन राधा ने पूनम से कहा, ‘‘प्रवेश के साथ तेरी दोस्ती हमें पसंद नहीं है. वह अच्छा लड़का नहीं है.’’ गुस्से में भरी पूनम ने तय कर लिया कि इस बार वह अपने पापा को सब कुछ बता देगी पर काफी सोचविचार के बाद उसे लगा कि यदि मां ने उन्हें प्रवेश के साथ उस के संबंधों की बात बता दी तो पापा क्या करेंगे, इस की कल्पना करना भी मुश्किल था.

विजयपाल अपने घर से काफी दूर रह कर काम कर रहा था. उसे नहीं मालूम था कि उस के घर में क्या चल रहा है. मां और बहन की लड़ाई में छोटे बच्चे भी काफी सहमे रहते थे. इसी बीच एक रात प्रताप और प्रभात राधा के घर में ही रुक गए. तब पूनम ने राधा से कहा, ‘‘मां, ये तुम्हारे भाई लोग यहां रात में क्या कर रहे हैं?’’

राधा ने कहा, ‘‘तुझे शायद यह पता नहीं है कि जिन मामा लोगों से तू नफरत करती है न, वही हमारी जरूरतें पूरी कर रहे हैं. तेरे बाप जितने पैसे भेजते हैं, उस से घर का खर्च नहीं चल पाता.’’

‘‘मम्मी, तुम बहुत बुरी हो.’’ कह कर पूनम अपने कमरे में चली गई पर उस दिन प्रताप का इरादा कुछ दूसरा ही था. खाना खाने के बाद वह पूनम का हाथ पकड़ कर उस के साथ छेड़छाड़ करने लगा. गुस्से में भरी पूनम ने मां से कहा, ‘‘यही हैं तुम्हारे भाई. जैसा ये तुम्हारे साथ करते हैं, वही मेरे साथ करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगी.’’

कह कर पूनम ने एक जोरदार थप्पड़ प्रताप के गाल पर जड़ दिया. इस के बाद उस ने अपने कमरे में जा कर अंदर से कुंडी लगा ली. वह खूब रोई. फिर उस ने अपने प्रेमी प्रवेश को फोन कर के सारी बात बता दी.

पूनम की इज्जत खतरे में है, यह सोच कर प्रवेश गुस्से में भर उठा. वह सोचने लगा कि ऐसे में उसे क्या करना चाहिए. अगले दिन प्रताप प्रवेश को रास्ते में मिल गया. उस ने प्रवेश से कहा, ‘‘तू हमारी भांजी से दूर नहीं रहा तो तेरे लिए बहुत बुरा होगा. तेरे 10 अप्रैल को होने वाले इम्तिहान से पहले ही हम तुझे ऐसी सजा देंगे कि तू याद रखेगा. याद रखना कि हम तुझे इम्तिहान में नहीं बैठने देंगे.’’

प्रवेश की समझ में यह आने लगा था कि यदि वह खामोशी से बैठा रहा तो जरूर दोनों मौका पाते ही उसे कोई बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं. प्रवेश ने उसी समय तय कर लिया कि उस की प्रेमिका पर बुरी नजर रखने वालों को वह जिंदा नहीं छोड़ेगा.

इस के बाद उस ने एक देशी कट्टा और कारतूसों का इंतजाम किया. उस के सिर पर खून सवार था. वह पूनम से बहुत प्यार करता था. दोनों एक ही जाति के थे. अत: दोनों अपनी दुनिया बसाना चाहते थे. ऐसे में कोई उस की प्रेमिका के साथ छेड़छाड़ करे, यह बरदाश्त करना उस के लिए बहुत मुश्किल था.

पूनम मां और उस के मुंहबोले भाइयों से परेशान थी. चूंकि दोनों भाई उस की मां के प्रेमी थे, इसलिए वह उन के खिलाफ कुछ भी सुनना नहीं चाहती थी. प्रवेश ने जो योजना बना रखी थी, उस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. उस के सिर पर तो खून सवार था.

27-28 मार्च, 2018 की रात को वह बिना किसी को कुछ बताए अपनी मोटरसाइकिल से मथुरा जिले के बाजना में पहुंच गया, जहां प्रभात उर्फ मोनू अपना क्लिनिक चलाता था और गांधी चबूतरा स्थित मुरारीलाल के मकान में किराए पर रहता था. सुबह 4 बजे के करीब प्रवेश ने प्रभात के दरवाजे पर दस्तक दी तो प्रभात ने दरवाजा खोला. सामने प्रवेश को देखते ही उसे पसीना आ गया. वह डर के मारे अंदर की ओर भागा. प्रवेश भी उस के पीछे भागा. भागते हुए ही उस ने प्रभात पर फायर कर दिया.

गोली की आवाज सुन कर सुबहसुबह टहलने के लिए जाने वाले लोग इकट्ठा हो गए. उन्हें देख कर प्रवेश वहां से भाग निकला. उसी समय किसी ने पुलिस को सूचना दे दी तो पुलिस भी वहां पहुंच गई. गोली लगने से घायल हो चुके प्रभात को वह एस.एन. मैडिकल कालेज ले गई. पुलिस ने अस्पताल में उसे भरती कर आवश्यक काररवाई शुरू कर दी.

लेकिन प्रवेश को अभी 2 खून और करने थे. वह मोटरसाइकिल से कुछ ही देर में राधा के घर पहुंच गया, जहां प्रताप उर्फ डिंपल और राधा आंगन में ही सो रहे थे. उस ने पहले गहरी नींद में सोए प्रताप को गोली मारी. गोली की आवाज से राधा की नींद खुल गई. प्रवेश को देख कर वह जान बचाने के लिए बाहर की ओर भागी पर प्रवेश ने उस के बाल पकड़ कर उस के सिर से तमंचा सटा कर उसे भी गोली मार दी.

फायरिंग की आवाज से पूरा मोहल्ला जाग गया और प्रवेश अपनी मोटरसाइकिल तेजी से चला कर कोतवाली टप्पल पहुंच गया,जहां मौजूद मुंशी से उस ने कहा कि कोतवाल साहब को बुलाओ, मुझे उन से बात करनी है. प्रवेश के हाथ में तमंचा देख कर मुंशी समझ गया कि यह कोई अपराध कर के आया है.

मुंशी ने उस का तमंचा एक तरफ रखवा कर उसे सामने की बेंच पर बैठा दिया. फिर मुंशी ने थानाप्रभारी प्रदीप कुमार सिंह को फोन कर के सारी बात बता दी. कुछ ही देर में थानाप्रभारी वहां आ गए. प्रवेश कुमार ने उन से कहा, ‘‘साहब, मैं 2 खून कर के आ रहा हूं. तीसरा मरा है या बच गया, मुझे पता नहीं.’’

उस समय प्रवेश के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. थानाप्रभारी ने उस से पूछताछ की तो उस ने उन्हें सारी कहानी बता दी. इस के बाद थानाप्रभारी ने उसे हिरासत में ले लिया और वाकए से अपने उच्चाधिकारियों को भी सूचित कर दिया. इस के बाद थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए, जहां हायतौबा मची हुई थी. प्रताप उर्फ डिंपल की खून से लथपथ लाश चारपाई पर पड़ी हुई थी और राधा का शव आंगन में पड़ा हुआ था.

घटना की जानकारी मिलते ही आईजी डा. संजीव गुप्ता, एसएसपी राजेश पांडे, एसपी (देहात) यशवीर सिंह और खैर के विधायक अनूप सिंह भी मौके पर पहुंच गए.पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. पुलिस ने इस बारे में गांव वालों से भी पूछताछ की लेकिन गांव वाले मुंह खोलने को तैयार नहीं थे. पर मुखबिरों के जरिए पुलिस के सामने सारी कहानी आ गई.

सूचना मिलने पर घर पहुंचे विजयपाल से जब पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि उसे कुछ पता नहीं कि उस के घर में क्या खिचड़ी पक रही थी. घटना के 3 दिन बाद मृतक प्रताप उर्फ डिंपल के भाई राहुल ने इस हत्याकांड में राधा की बेटी पूनम की साजिश होने की बात बताई. उस ने यह भी कहा कि उस के भाइयों के राधा के साथ नाजायज संबंध होने वाली बात सरासर गलत है.  उस के भाइयों ने तो प्रवेश को पूनम से दूर रहने की चेतावनी दी थी.

एसएसपी ने बताया कि यह बात जांच के बाद ही पता चल सकेगी कि इस दोहरे हत्याकांड में पूनम की कोई भूमिका है भी या नहीं. पुलिस जांच में यह बात सामने आ चुकी थी कि प्रवेश ने मथुरा जा कर जिस प्रभात उर्फ मोनू को गोली मार कर घायल किया था, वह आपराधिक छवि वाला है. अलीगढ़ की क्राइम ब्रांच की टीम नौहझील (बाजना) की पुलिस के साथ मिल कर जांच कर रही थी.

   – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित