पत्नी की खूनी साजिश : प्यार में पागल लड़की ने प्रेमी से करवाई पति की हत्या – भाग 2

इस की वजह यह थी कि डब्लू को रमेश सिंह से भाई की मौत का बदला लेना था. इस के लिए उस ने रमेश सिंह से दोस्ती गांठ ली. फिर एक दिन गांव के पास ही वह रमेश सिंह के साथ शराब पीने बैठा. उस ने जानबूझ कर रमेश सिंह को खूब शराब पिलाई.

जब रमेश सिंह नशे में बेकाबू हो गया तो डब्लू ने हंसिए से उस का गला धड़ से अलग कर दिया. इस के बाद रमेश सिंह का कटा सिर लिए वह मां के पास पहुंचा और सिर उन के सामने कर के बोला, ‘‘देखो मां, यही भैया का हत्यारा था. आज मैं ने इस के किए की सजा दे दी. इसे वहां भेज दिया, जहां इसे बहुत पहले पहुंच जाना चाहिए था.’’

यह सन 2011 की बात है.   इस के बाद रमेश सिंह का कटा सिर लिए डब्लू पूरे गांव में घूमा. डब्लू के दुस्साहस को देख कर गांव में दहशत फैल गई. पुलिस उस तक पहुंच पाती, उस से पहले ही वह रमेश सिंह का सिर फेंक कर फरार हो गया. लेकिन पुलिस के चंगुल से वह ज्यादा समय तक नहीं बच पाया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद डब्लू को लगा कि गांव के ही रहने वाले रमेश सिंह के करीबी पूर्व ग्रामप्रधान शातिर बदमाश अरुण सिंह उस की हत्या करवा सकते हैं. फिर क्या था, वह उन्हें ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगा.

25 अप्रैल, 2013 को किसी काम से अरुण सिंह अपनी मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे, तभी मचिया चौराहे पर घात लगा कर बैठे डब्लू ने गोलियों से भून डाला. घटनास्थल पर ही उन की मौत हो गई. उस समय तो वह फरार हो गया था, लेकिन बाद में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

बात उस समय की है, जब सुषमा कालेज में पढ़ती थी. संयोग से उसी कालेज में डब्लू भी पढ़ता था. चूंकि दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए कालेज आतेजाते अकसर दोनों की मुलाकात हो जाती थी. सुषमा खूबसूरत तो थी ही, डब्लू भी कम स्मार्ट नहीं था. साथ आनेजाने में ही दोनों में प्यार हो गया. सुषमा डब्लू के आपराधिक कारनामों के बारे में जानती थी, इस के बावजूद उस से प्यार करने लगी.

सुषमा और डब्लू की प्रेमकहानी जल्दी ही गांव वालों के कानों तक पहुंच गई. फिर तो इस की जानकारी सुरेंद्र बहादुर सिंह को भी हो गई. बेटी की इस करतूत से पिता का सिर शरम से झुक गया. उन्होंने सुषमा को डब्लू से मिलने के लिए मना तो किया ही, उस के घर से निकलने पर भी पाबंदी लगा दी. इस का नतीजा यह निकला कि एक दिन वह मांबाप की आंखों में धूल झोंक कर डब्लू के साथ भाग गई. इस के बाद दोनों ने मंदिर में शादी कर ली. यह 7-8 साल पहले की बात है.

crime story

सुषमा के भाग जाने से सुरेंद्र बहादुर सिंह की काफी बदनामी हुई. डब्लू आपराधिक प्रवृत्ति का था, इसलिए वह उस का कुछ कर भी नहीं सकते थे. फिर भी उन्होंने पुलिस के साथसाथ बिरादरी की मदद ली. पुलिस और बिरादरी के दबाव में डब्लू ने सुषमा को उस के घर वापस भेज दिया. सुषमा के घर वापस आने के बाद सुरेंद्र बहादुर सिंह ने उस के घर से बाहर जाने पर सख्त पाबंदी लगा दी.

संयोग से उसी बीच रमेश सिंह की हत्या के आरोप में डब्लू जेल चला गया तो सुरेंद्र बहादुर सिंह ने राहत की सांस ली. डब्लू की जो छवि बन चुकी थी, उस से वह काफी डरे हुए थे. वह जेल चला गया तो उन्होंने इस मौके का फायदा उठाया और आननफानन में सुषमा की शादी गोरखपुर के रहने वाले संपन्न और सभ्य देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विवेक प्रताप सिंह उर्फ विक्की से कर दी.

यह शादी इतनी जल्दी में हुई थी कि देवेंद्र प्रताप सिंह बहू के बारे में कुछ पता नहीं कर सके. जेल में बंद डब्लू को जब सुषमा की शादी के बारे में पता चला तो वह सुरेंद्र बहादुर सिंह पर बहुत नाराज हुआ. लेकिन वह सुषमा के पिता थे, इसलिए वह उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था. पर उस ने यह जरूर तय कर लिया था कि वह सुषमा को खुद से अलग नहीं होने देगा. इस के लिए उसे कुछ भी करना पड़े, वह करेगा.

सुषमा ने भले ही विवेक से शादी कर ली थी, लेकिन उस का तन और मन डब्लू को ही समर्पित था. हर घड़ी वह उसी के बारे में सोचती रहती थी. जल्दी ही वह विवेक के बेटे आयुष की मां बन गई. जनवरी, 2013 में जब डब्लू जमानत पर जेल से बाहर आया तो सुषमा से मिलने गोरखपुर स्थित उस की ससुराल पहुंच गया.

डब्लू को देख कर सुषमा बहुत खुश हुई. उस का प्यार उस के लिए फिर जाग उठा. इस के बाद वे किसी न किसी बहाने एकदूसरे से मिलने लगे. फोन पर तो बातें होती ही रहती थीं. उसी बीच 25 अप्रैल, 2013 को डब्लू ने पूर्वप्रधान अरुण सिंह की हत्या कर दी तो वह एक बार फिर जेल चला गया. इस बार वह 5 सालों बाद 18 मार्च, 2017 को जेल से बाहर आया तो एक बार फिर उस का सुषमा से मिलनाजुलना शुरू हो गया.

डब्लू बारबार सुषमा से मिलने आने लगा तो विवेक प्रताप सिंह को पत्नी के चरित्र पर संदेह हो गया. इस के बाद पतिपत्नी में अकसर झगड़ा होने लगा. वह डब्लू को अपने यहां आने से मना करने लगा. लेकिन सुषमा उस की एक नहीं सुनती थी. पत्नी के इस व्यवहार से विवेक काफी परेशान रहने लगा. रोजरोज के झगड़े से बेटा भी परेशान रहता था. डब्लू को ले कर पतिपत्नी में संबंध काफी बिगड़ गए. दोनों के बीच मारपीट भी होने लगी.

सुषमा विवेक की कोई बात नहीं मानती थी. रोजरोज के झगड़े से परेशान विवेक अपने दुख को किसी से न कह कर फेसबुक पर पोस्ट किया करता था. दूसरी ओर सुषमा भी पति से ऊब चुकी थी. अब वह उस से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगी. जब उस ने यह बात डब्लू से कही तो उस ने आश्वासन दिया कि उसे चिंता करने की जरूरत नहीं है. वह जब चाहेगा, उसे विवेक से छुटकारा दिलवा देगा. उस के बाद दोनों एक साथ रहेंगे.

टुकड़ों में बंटी औरत – भाग 2

एसपी राममूर्ति जोशी पहले भी अलवर में विभिन्न पदों पर रह चुके थे. इसलिए उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर भिवाड़ी और आसपास के इलाकों से पिछले दिनों लापता हुई महिलाओं का रिकौर्ड मंगवाया. इन महिलाओं की गुमशुदगी के बारे में जांचपड़ताल की गई, लेकिन ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से पुलिस को शव के टुकड़ों की शिनाख्त में मदद मिलती.

इलाके की सोसायटियों में पिछले दिनों मकान खाली कर जाने वाले किराएदारों का भी पता लगाया गया. इस के अलावा घटनास्थल के निकटवर्ती सांथलका गांव में पिछले दिनों मकान खाली करने
वाले किराएदारों और कंपनियों से अचानक नौकरी छोड़ने वाले महिलापुरुषों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए डोर टू डोर सर्वे किया गया.

यह काम भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था. पचासों पुलिस वाले इस काम में सुबह से शाम तक जुटे रहते. एसपी साहब इस काम में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते थे. वह हर संभव प्रयास से मृतका की शिनाख्त और कातिलों तक पहुंचना चाहते थे. इसलिए रोजाना शाम को एडिशनल एसपी और डीएसपी से रिपोर्ट लेते और उन्हें जरूरी निर्देश देते.

पुलिस को मिली जांच की राह

2 सप्ताह से भी ज्यादा समय तक चली इस भागदौड़ में पुलिस को पता चला कि गांव सांथलका की विनोद कालोनी में रहने वाले अमित गुप्ता और उस की पत्नी कोमल पिछले कुछ दिनों से बिना किसी को बताए अचानक कमरा खाली कर चले गए.पुलिस ने कालोनी के दूसरे लोगों से पूछताछ की, तो जानकारी मिली कि अमित और कोमल में आपस में झगड़ा होता रहता था. दोनों अलगअलग फैक्ट्रियों में काम करते थे. पुलिस को अमित का पता तो नहीं मिला. अलबत्ता यह जरूर पता लगा कि वह भरतपुर का रहने वाला है.

यह सुराग मिलने पर पुलिस को उम्मीद की कुछ किरण नजर आई. अब पुलिस अमित और कोमल को तलाशने में जुट गई. इसी दौरान 3 सितंबर को यूआईटी फेज थर्ड पुलिस थाने पर डाक से एक पत्र आया. पत्र में अमित गुप्ता ने अपनी पत्नी कोमल के गाय होने की बात लिखी थी.

पत्र में अमित का मोबाइल नंबर और कोमल का कानपुर का पता लिखा था.पुलिस ने मामले की पड़ताल करने के लिए अमित के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन वह स्विच्ड औफ मिला. चूंकि अमित और उस की पत्नी अचानक मकान खाली कर के गए थे और अब अमित ने खुद थाने आने के बजाय पत्र लिख कर अपनी पत्नी की गुमशुदगी की बात कही थी. इस से पुलिस को संदेह हुआ.

थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार ने एसपी राममूर्ति जोशी को पूरी बात बताई. जोशी को भी मामले में संदेह नजर आया. उन्होंने भी अमित के मोबाइल नंबर पर कई बार काल की. लेकिन उस का फोन हर बार स्विच्ड औफ मिला.मोबाइल स्विच्ड औफ होने से उस की लोकेशन का भी पता नहीं चल पा रहा था. सच्चाई का पता लगाने के लिए एसपी ने थानाप्रभारी को पत्र में लिखे कोमल के कानपुर के पते पर पुलिस टीम भेजने के निर्देश दिए.

भिवाड़ी से पुलिस टीम कानपुर में मीरपुर कैंट स्थित कोमल के घर पहुंची. वहां पूछताछ में पता चला कि कोमल की अपने परिजनों से 11 अगस्त के बाद से कोई बात नहीं हुई थी. उन्हें न तो कोमल का कुछ पता था और न ही अमित काकोमल के परिजनों ने पुलिस को बताया कि दोनों मियांबीवी में आए दिन झगड़ा होता था. यह भी बताया कि अमित ने कोमल से धोखे से शादी की थी. उन से यह जानकारी भी मिली कि अमित ने अपनी किसी महिला दोस्त की हत्या भी की थी. उन्हें शंका थी वह कोमल की भी हत्या कर सकता है.

कानपुर में कोमल के घर वालों से मिली जानकारी के बाद अमित पर पुलिस का शक पक्का हो गया. साथ ही यह अनुमान भी लग गया कि 14 अगस्त को खिदरपुर स्कूल के पास मिले शव के टुकड़े कोमल के ही हो सकते हैं. अब अमित को तलाशना जरूरी था, क्योंकि उसी से सारी सच्चाई का पता लग सकता था.

एसपी राममूर्ति जोशी ने भिवाड़ी पुलिस की साइबर सेल को अमित गुप्ता के मोबाइल नंबर का तकनीकी अनुसंधान करने का निर्देश दिया. साइबर सेल के हैड कांस्टेबल मोहनलाल, कांस्टेबल संदीप और नीरज ने अमित का मोबाइल लगातार स्विच्ड औफ मिलने पर उस की पुरानी काल डिटेल्स निकलवा कर उन का विश्लेषण किया. पुलिस ने इन काल डिटेल्स के आधार पर पहले से अमित के संपर्क में रहे लोगों से उस की पूरी जन्मकुंडली हासिल की.

तमाम प्रयासों के बाद पुलिस ने 7 सितंबर को अमित गुप्ता को भिवाड़ी के ही सांथलका इलाके से गिरफ्तार कर लिया. उसे पुलिस थाने ला कर पूछताछ की गई. पहले तो वह पुलिस को यह कह कर गुमराह करता रहा कि कोमल लापता है. मैं उस की तलाश कर रहा हूं. लेकिन कड़ाई से पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.पुलिस पूछताछ में कोमल की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

अमित गुप्ता राजस्थान के भरतपुर शहर का रहने वाला था. उस की शादी 13 दिसंबर, 2019 को कानपुर निवासी हरिप्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी कोमल से भरतपुर में हुई थी. कोमल की यह दूसरी शादी थी. उस की पहली शादी 2004 में कानपुर के संजय से हुई थी, लेकिन टीबी की बीमारी के कारण उस के पति संजय की 4 साल बाद 2008 में मौत हो गई थी.

औनर किलिंग के जरिए प्यार की बलि – भाग 2

जब दोनों पुलिस अधिकारियों ने उस के कोतवाली में आने का कारण पूछा, तब उस ने हिम्मत कर रीना के घर से लापता होने की आशंका जताई.

‘‘तुम कौन हो? रीना कौन है?’’ कोतवाल बिष्ट ने पूछा.

‘‘जी, मेरा नाम मोनू चौधरी है और रीना मेरी प्रेमिका अपने घर से लापता हो गई है,’’ मोनू बोला.

‘‘प्रेमिका? तुम को कैसे पता कि वह लापता है? …और वैसे भी तुम होते कौन हो उस के बारे में पता करने वाले?’’ एसएसआई अंकुर शर्मा बोले.

‘‘जी, वह मेरी प्रेमिका है. हम लोग शादी करने वाले हैं, लेकिन उस के घर वाले राजी नहीं हैं. हम एक ही बिरादरी के हैं और हमारा गोत्र एक ही है. इस कारण वे मान नहीं रहे हैं. मुझे डर है कि मेरी प्रेमिका को घर वालों ने कहीं गायब कर दिया है. उस का फोन 3 दिनों से बंद मिल रहा है. लीजिए आप भी इस नंबर पर मिला कर देख लीजिए.’’ मोनू ने मिन्नत की और मोबाइल नंबर लिखी परची कोतवाल साहब के सामने बढ़ा दी.

कोतवाली पुलिस के सामने यह अनोखा मामला था कि एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के लापता होने की शिकायत लिखवाने आया था, जबकि जिस के बारे में वह बता रहा था, उस के मातापिता या दूसरे घर वालों की तरफ से कोई शिकायत नहीं मिली थी.

कौन सही और कौन गलत होता है, इस की तहकीकात के लिए पहले रीना के फोन नंबर पर कोतवाल यशपाल सिंह बिष्ट ने काल की. फोन स्विच्ड औफ मिला. उस के बाद मोनू ने रीना के भाई रवि का फोन नंबर दिया. साथ ही बताया कि वही उस की और रीना की शादी का सब से अधिक विरोध करता था.

पुलिस ने उस नंबर पर भी काल की. बात होने लगी. कोतवाल ने पूछा कि क्या उस के परिवार की सदस्य रीना घर में है? वह उस से बात करना चाहता है.

दूसरी तरफ से गुस्से से भरी आवाज आई, ‘‘तुम कौन बोल रहे हो? रीना किसी से बात नहीं करना चाहती है.’’

‘‘मैं मोनू का दोस्त बोल रहा हूं. बहुत अर्जेंट है रीना से बात करना.’’ कोतवाल साहब ने अपनी पहचान छिपा कर कहा.

‘‘बहुत अर्जेंट है तो बोल दे मोनू को भी कि वह दोबारा फोन न करे, नहीं तो उसे भी वहीं भेज दूंगा जहां…’’ रीना का भाई पहले से और अधिक तीखी आवाज में बोलने लगा.

लेकिन कोतवाल यशपाल सिंह बिष्ट बीच में ही बोल पड़े, ‘‘भेज दूंगा… मतलब! रीना कहीं गई है क्या? बता दो न प्लीज, कहां गई है. मेरा दोस्त उसे याद कर बेहाल हो चुका है. ठीक से खाना भी नहीं खा रहा है.’’

‘‘खाना नहीं खा रहा है तब मैं क्या करूं? चल फोन रख.’’ इसी के साथ उस ने फोन कट कर दिया.

उस के बाद मोनू ने कोतवाल साहब का फोन ले कर दोबारा काल की, लेकिन इस बार उस ने स्पीकर औन कर रिकौर्डिंग का स्विच भी औन कर दिया. काल रिसीव करते ही रीना का भाई गालियां बकते हुए बोलने लगा, ‘‘हरामजादे, सुअर की औलाद! अबे चूतिया है क्या, जो मुझे सुबहसुबह तंग कर रहा है!’’

‘‘अरे रवि, मैं मोनू बोल रहा हूं.’’

‘‘अबे हरामजादे! तेरी बहन की… तू फोन बदलबदल कर काल करता है. लगता है तुझे भी वहीं भेजना पड़ेगा, जहां रीना को भेजा है.’’ गुस्से में रवि बोला.

‘‘कहां भेजा है उसे, बताओ तो मैं खुद चला जाता हूं.’’ मोनू ने विनती की.

‘‘तू वहां अकेले नहीं जा सकता. …और मेरे सिवाय और कोई भेज भी नहीं सकता.’’ रवि और भी गुस्से के तेवर के साथ बोला.

‘‘अबे तू नहीं जानता तेरी किस से बात हो रही है. तुम ने जो भी बका है, वह रिकौर्ड भी हो गया है. मैं लक्सर कोतवाली से बात कर रहा हूं. तूने अपनी बहन को कहां गायब कर दिया है, सचसच बता दे, वरना पुलिस को तलाश करना अच्छी तरह आता है.’’ मोनू भी उसी के लहजे में डांटते हुए बोला.

उस के बाद तुरंत कोतवाल बिष्ट ने भी रवि को डांट दिया और रीना के बारे में सहीसही जानकारी मांगी.

पुलिस और लक्सर कोतवाली सुनते ही रवि डर गया. हकलाता हुआ बोलने लगा, ‘‘जी, जी वह मोनू के साथ ही घर से 4-5 दिन पहले भाग गई थी, उस का पता नहीं है.’’

‘‘तो तुम ने अभी तक थाने में उस के लापता होने की शिकायत क्यों नहीं दर्ज करवाई?’’

इस का उस ने कोई जवाब नहीं दिया और फोन कट कर दिया. लक्सर पुलिस के सामने यह मामला कुछ अलग तरह का था. पुलिस रवि से बातें कर के यह समझ गई थी रीना खतरे में हो सकती है. इसलिए उस का पता लगाया जाना चाहिए.

मोनू से बात कर कोतवाल यशपाल सिंह बिष्ट ने रीना और रवि के बारे में कुछ और जानकारी जुटाई. मोनू रीना से कोर्टमैरिज करने के इंतजार में था. उस ने लक्सर पुलिस से रीना के बारे में पता लगाने की विनती की.

मोनू की बातें गौर से सुनने के बाद कोतवाल बिष्ट ने रीना की घर में मौजूदगी के बारे में मालूम करने के लिए चेतक पुलिस को तत्काल रीना के घर भेजा. जब पुलिस ने रीना के घर जा कर रीना के बारे में जानकारी की. रीना घर पर नहीं मिली. पुलिस ने रीना के घर वालों से उस के बारे में पूछताछ की तो उन से रीना के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं मिला.

चेतक पुलिस ने वापस कोतवाली पहुंच कर यह जानकारी कोतवाल यशपाल सिंह बिष्ट को दी. मामला चूंकि नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए बिष्ट ने इस मामले में एसपी (देहात) प्रमेंद्र डोवाल को सूचित कर दिया. उन के कहने पर बिष्ट ने रीना के लापता होने की शिकायत दर्ज कर ली.

शिकायत मोनू चौहान की ओर से भादंवि की धारा 365 के अंतर्गत 9 अगस्त, 2022 को दर्ज की गई. इस की जांच एसएसआई अंकुर शर्मा को सौंप दी गई.

77 पेज के सुसाइट नोट की दिल दहलाने वाली कहानी – भाग 2

रजिस्टर के 77 पेज में जो लिखा गया, वह हत्या और आत्महत्या की खतरनाक कहानी है. यह सुसाइड नोट दिल दहला देने वाला है. यह बताता है कि युवाओं में बढ़ते डिप्रेशन यानी अवसाद और हताशा के लक्षणों को नजरंदाज करने का अंजाम कितना खतरनाक हो सकता है.

क्षितिज की मां मिथिलेश उत्तर प्रदेश के झांसी जिले की रहने वाली थीं. उन की शादी दिल्ली के श्रीनिवास पाल से हुई, जो बिजली विभाग में कार्यरत थे. शादी के बाद मिथिलेश अपने पति के पास दिल्ली आ गईं. उन की एक बहन भी हैं, जो झांसी में अपने पति और बच्चों के साथ रहती हैं.

शादी के 14 साल बाद जब मिथिलेश की गोद भरी तो उन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. बेटे क्षितिज को पा कर पतिपत्नी बहुत खुश थे. वे प्यार से उसे सोनू कह कर पुकारते थे. श्रीनिवास ने बेटे की परवरिश में कोई कमी नहीं रखी.

बहुत प्यार दिया. अच्छे नामचीन स्कूल में पढ़ाया और उस से बहुत सारी उम्मीदें बांधी. मगर अफसोस कि वे अपनी उम्मीदों को पूरा होते नहीं देख सके. 10 साल पहले बीमारी के चलते उन की मौत हो गई.

पति का यूं अचानक चले जाना मिथिलेश पर गाज बन कर टूटा. वह बुरी तरह टूट गईं. हताशा और अकेलेपन ने उन्हें घेरा तो वह सत्संग और मंदिरों में सहारा तलाशने लगीं. वहीं श्रीनिवास का लाडला बेटा क्षितिज उर्फ सोनू पिता की अचानक मौत से सहम सा गया. 15 साल की नाजुक उम्र में जब उसे पिता के प्यार और मार्गदर्शन की सब से ज्यादा जरूरत थी, वह उसे छोड़ कर चले गए.

इस घटना ने क्षितिज को डरा दिया. वह सब से कटाकटा सा रहने लगा. स्कूल में भी वह अकेला और अन्य बच्चों से अलग रहता. उस का कोई दोस्त नहीं था. इस अकेलेपन ने उसे मानसिक रूप से तोड़ दिया, उसे दब्बू और डरपोक बना दिया.

वह टीचर के सवालों से डरने लगा. वह दोस्तों के हंसीमजाक से डरने लगा. यहां तक कि अपनी स्कूल बस में चढ़नेउतरने में भी उस के पांव कांपने लगे. वह न तो खेलों में हिस्सा लेता और न ही किसी एक्स्ट्रा एक्टिविटी में. बस अपने आप में ही गुमसुम रहता. धीरेधीरे सब उस से कटने लगे. उसे उस के हाल पर छोड़ दिया. इस बात का जिक्र क्षितिज ने अपने सुसाइड नोट में किया है.

दरअसल, क्षितिज साइकोलौजिकल डिसऔर्डर का शिकार हो चुका था. अपने हालात की वजह से डिप्रेशन में जा रहा था, मगर उस के इन लक्षणों को न उस के स्कूल के टीचर भांप सके और न घर में उस की मां.

उस ने लिखा, ‘मेरी मां मेरी उम्मीद थीं. पापा के जाने के बाद मां और मैं अकेले पड़ गए. मेरे पापा हम सब को ऐसे समय में छोड़ कर चले गए जब हमें सब से ज्यादा जरूरत थी. 10वीं कक्षा में था मैं उस समय, जब पापा की मौत हो गई.

‘बाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसओएल में एडमिशन लिया. लेकिन किस्मत धोखा दे गई. 2 बार फिसल गया. डिप्रेशन रहता है. एक रात, 2 रात, 3 रात, 5 रात तक जगा रहता हूं. कई बार बेहोश सा पड़ा रहता हूं. बीमारियां मेरे अंदर भरती जा रही हैं. मां कई बार टोकती थीं. मां भी हाई ब्लडप्रेशर से परेशान रहती थीं.’

क्षितिज पढ़ाई में पिछड़ने लगा. लगातार फेल होता रहा और अंत में उस ने पढ़ाई छोड़ दी. वह ज्यादा समय घर पर अपने कमरे में बंद रहने लगा. उस की मां उस से बारबार कोई काम करने या पढ़ाई करने को कहतीं, लेकिन अवसाद का शिकार क्षितिज मां की कोई बात पूरी नहीं कर पा रहा था.

सुसाइड नोट में उस ने लिखा है, ‘मेरी अच्छी परवरिश के लिए मां ने सिलाई भी की. मां कहती थी कुछ ट्यूशन कर लो. छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दो. सुन कर मैं डर गया था.’

क्षितिज अपने पापा को अपना हीरो समझता था. उन के जाने का घाव उस के दिल पर गहरा हुआ था. मां का अकेलापन और पिता के लिए उन का रोना उस से देखा नहीं जाता था. वह मां से भी बहुत प्यार करता था. पिता की पेंशन से दोनों का गुजारा किसी तरह चल रहा था, लेकिन उस की मां चिंताओं के कारण बीमार सी रहने लगी थीं.

उन की आंखों से कम दिखने लगा था. कभीकभी वह क्षितिज पर झुंझलाने लगतीं तो कभी बहुत प्यार लुटाती थीं. मगर एकदूसरे के दिलदिमाग में क्या चल रहा था, इस से दोनों ही अनभिज्ञ थे. दोनों अपनेअपने दुख के साथ अकेले थे.

क्षितिज ने तय कर लिया कि अब जीना नहीं है. वह मां को इस दुनिया में अकेला नहीं छोड़ना चाहता था. इसलिए उस ने उन की भी हत्या करने का प्रण कर लिया. पहली सितंबर को उस ने बाइक बांधने वाली डोरी निकाली और पलंग पर बैठी मां के पीछे से आ कर उन के गले में डोरी लपेट कर कस दी.

मिथिलेश छटपटाईं मगर अपना गला नहीं छुड़ा पाईं. कुछ ही देर में वह बेसुध हो कर एक ओर लुढ़क गईं. क्षितिज ने तुरंत मां का सिर अपनी गोद में रख कर उन का मुंह दबा लिया. चंद सेकेंड में मिथिलेश के प्राणपखेरू उड़ गए.

मां को मारने के बाद क्षितिज ने भागने या बचने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि वह आत्महत्या के उपाय सोचने लगा. मां के सिवा उस का कोई भी नहीं था. दरअसल, वह खुद मरना चाहता था मगर मां को दुनिया में अकेला छोड़ कर नहीं जाना चाहता था.

अपने 77 पेज के सुसाइड नोट में क्षितिज ने लिखा, ‘2 साल से मरना चाह रहा था. मैं मरने से पहले अपनी मां को उस दुख से आजाद करना चाहता हूं. हर इतवार को मां सत्संग में जाती थीं. इस बार भी (पिछले हफ्ते) मां जब आईं, थोड़ी हंसी भी हुई थी. मां की आंखों में जाला आ गया है, लगता है मोतियाबिंद है. अब तो मैं मर जाना चाहता हूं. गुरुवार है आज. बाइक की डोरी से मां का गला इसलिए घोटा ताकि मां को मरने से पीड़ा न हो.’

मां का गला घोटने के बाद क्षितिज ने रजिस्टर उठा लिया और लिखा, ‘जैसे ही मैं ने मां के गले में डोरी कसी, मां 4 से 5 सेकेंड में निढाल हो कर गिर गईं. मुझे पता था दिमाग में औक्सीजन नहीं पहुंचने पर मौत हो जाती है.

मां के गिरते ही मैं ने उन का सिर गोद में रख लिया. 8-10 मिनट तक गला दबा कर रखा. मैं मुंह दबा कर रोए जा रहा था. गुरुवार दिन भर और पूरी रात रोता रहा हूं. मुझे पापा की बहुत याद आ रही है. मरने के बाद भी मां की आंखें खुली थीं. मैं ने बंद करने की कोशिश की, मगर हो न सकीं.

‘शुक्रवार है आज. मां के शव को देखा नहीं जा रहा. मैं ने अपनी मां के चेहरे को गंगाजल से नहलाया है. उन के पास बैठ कर भगवत गीता का 18वां अध्याय पढ़ा. पूरी भगवत गीता नहीं पढ़ सका. मैं ने फिर गीता मां के सीने पर रख दी.’

शराबी की विनाश लीला – भाग 2

एसपी प्रशांत वर्मा ने सीओ (सिटी) कपिलदेव मिश्रा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिसे रामभरोसे की खोज में लगा दिया गया. पुलिस टीम ने कई शराब ठेकों पर उस की खोज की लेकिन उस का पता नहीं चला. पुलिस टीम रामभरोसे की खोज करते हुए जब जीटी रोड स्थित एक ढाबे पर पहुंची तो वह वहां बरतन साफ करते मिल गया. रामभरोसे को हिरासत में ले कर पुलिस टीम सदर कोतवाली लौट आई.

थानाप्रभारी रवींद्र कुमार श्रीवास्तव ने श्यामा के नशेड़ी पति रामभरोसे के पकड़े जाने की खबर पुलिस अधिकारियों को दी तो एसपी प्रशांत वर्मा और एएसपी राजेश कुमार कोतवाली आ गए. पुलिस अधिकारियों ने रामभरोसे को जब उस की पत्नी और 4 बेटियों द्वारा आत्महत्या करने की बात बताई तो उस के चेहरे पर पत्नी और बेटियों के खोने का कोई गम नहीं था.

पूछताछ में उस ने बताया कि उस की नशे की लत को ले कर घर में अकसर झगड़ा होता था. 3 दिन पहले उसका पत्नी से झगड़ा और मारपीट हुई थी. श्यामा ने जहर खा कर जान देने की धमकी भी दी थी, लेकिन उस ने नहीं सोचा था कि श्यामा सचमुच बेटियों के साथ जान दे देगी. वह ठंडी सांस ले कर बोला, ‘‘साहब, पूरा परिवार खत्म हो गया है, अगर कोई मुझे जहर ला कर दे दे तो मैं भी जहर खा कर मर जाऊंगा.’’

एएसपी राजेश कुमार ने रामभरोसे पर नफरत भरी निगाह डाली, फिर बोले, ‘‘रामभरोसे, तेरी क्रूरता और नशेबाजी की वजह से तेरी पत्नी व बेटियों ने अपनी जान दे दी. वह तो मर गई, लेकिन तुझे तिलतिल मरने को छोड़ गई. अब पश्चाताप के आंसू बहाने से कोई फायदा नहीं. तुझे तेरे कर्मों की सजा कानून देगा.’’

पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने थानाप्रभारी रवींद्र कुमार श्रीवास्तव को आदेश दिया कि रामभरोसे के विरुद्ध आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करने का मुकदमा दर्ज करें और उसे जेल भेज दें. रवींद्र कुमार श्रीवास्तव ने मृतका श्यामा के ससुर रामसागर को वादी बना कर रामभरोसे के खिलाफ भादंवि की धारा 309 के तहत मुकदमा दर्ज कर के उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के दौरान श्यामा की हताश जिंदगी के दुखद अंत की मार्मिक घटना प्रकाश में आई.

फतेहपुर जिले में एक गांव है नौगांव. इसी गांव के निवासी जयराम की बेटी थी श्यामा. बेटी सयानी हो गई तो 1996 में उस ने श्यामा की शादी रामभरोसे से कर दी.

रामभरोसे का परिवार फतेहपुर शहर के शांतिनगर मोहल्ले में रहता था. परिवार में उस के पिता रामसागर, मां गौरा के अलावा एक भाई दिनेश था.

रामसागर ट्रक ट्रैक्टर की कमानी की मरम्मत करने वाली दुकान पर काम करता था. उस ने रामभरोसे को भी उसी दुकान पर काम में लगा दिया था.

शादी के बाद अन्य औरतों की तरह श्यामा को भी पहले बेटे की चाहत थी. लेकिन उस की यह चाहत तो पूरी नहीं हुई. हां, उस की गोद में एक के बाद एक 4 बेटियां आ गईं. श्यामा की चारों बेटियां पिंकी, प्रियंका, वर्षा और रूबी भले ही किसी को न सुहाती हों, लेकिन उसे तो बेटों जैसी ही लगती थीं. बेटा न हो पाने से श्यामा की सास उस से नाराज रहने लगी थीं.

4-4 बच्चों का पालनपोषण कोई साधारण बात नहीं होती. श्यामा जब बच्चों के पालनपोषण में व्यस्त रहने लगी तो घरेलू कामों में उस का योगदान कम हो गया. काम न करने को ले कर श्यामा और उस की जेठानी सुषमा में झगड़ा होने लगा. वह श्यामा के रूपसौंदर्य से तो जलती ही थी, उस की बेटियों से भी नफरत करती थी. साथ ही सास के कान भी भरती रहती थी. सास सुषमा का पक्ष ले कर श्यामा को भलाबुरा कहती थी.

देवरानीजेठानी का झगड़ा बढ़ा तो घर में कलह ने पांव पसार लिए. रामभरोसे जब मां, भाभी और पत्नी के बीच पिसने लगा तो वह शराब पीने लगा. जिस दिन घर में कलह होती, उस दिन वह कुछ ज्यादा ही पी कर आता. श्यामा उसे टोकती तो वह उसे मारनेपीटने लगता.

नशे में वह मांबाप और भाईभौजाई को भी खूब खरीखोटी सुनाता. इतना ही नहीं, वह घर में तोड़फोड़ भी करता था. उस के उत्पात से पूरा घर सहम जाता था. धीरेधीरे पत्नीबच्चों को भूल कर रामभरोसे अपनी पूरी कमाई नशाखोरी में उड़ाने लगा था.

रोजरोज की कलह से आजिज आ कर रामसागर ने रामभरोसे को घर से अलग कर दिया. रहने के लिए उसे पड़ोस में ही एक कमरे बरामदे वाला मकान दे दिया. रामभरोसे अपनी पत्नी श्यामा और 4 बेटियों के साथ उसी एक कमरे वाले घर में रहने लगा.

लड़ाईझगड़े से निजात मिली तो श्यामा ने राहत की सांस ली. उस ने अपने विनम्र स्वभाव से पति को भी समझाया कि वह शराब पीना छोड़ दे और बेटियों की पढ़ाईलिखाई, पालनपोषण पर ध्यान दे. उस ने यह भी कहा कि वह कमाई का कोई दूसरा रास्ता खोजे, जिस से घरगृहस्थी ठीक से चल सके.

रामभरोसे शराबी जरूर था, लेकिन पत्नीबच्चों से उसे प्यार था. उस ने पत्नी की बात मान कर शराब पीनी छोड़ी तो नहीं, लेकिन कम जरूर कर दी. तब तक रामभरोसे कमानी मरम्मत का हुनर सीख चुका था. उस ने पिता के साथ काम करना छोड़ दिया और शांतिनगर स्थित एक गैराज में कमानी मरम्मत का काम करने लगा. गैराज से उसे अच्छी कमाई होने लगी.

पति कमाने लगा तो श्यामा की घरगृहस्थी सुचारू रूप से चलने लगी. वह पति की कमाई से पूर्णरूप से संतुष्ट न सही, पर असंतुष्ट भी नहीं थी. उस की बड़ी बेटी पिंकी शांतिनगर स्थित निरंकारी बालिका इंटर कालेज में पहले से पढ़ रही थी. अब उस ने प्रियंका, वर्षा और रूबी को भी इसी बालिका विद्यालय में दाखिल करा दिया.

श्यामा अपनी बेटियों का जीवन संवारना चाहती थी, इसलिए वह उन के पालनपोषण तथा पढ़ाईलिखाई पर खास ध्यान देने लगी. बेटियों की पढ़ाई का खर्च पूरा करने के लिए वह पड़ोस के एक धनाढ्य परिवार में खाना बनाने का काम करने लगी.

2 साल बाद : प्यार कैसे बना सजा – भाग 2

रोहित के भाई मोहित ने रिपोर्ट में आरोप लगाया कि करीब 2 साल पहले ज्योति मिश्रा ने उस के भाई रोहित यादव के साथ अंतरजातीय प्रेम विवाह किया था, जिस से ज्योति के घर वाले उस के भाई रोहित व भाभी ज्योति से बहुत नफरत करते थे, उन्होंने कई बार धमकियां भी दी थीं. इसी के चलते उन लोगों ने घटना को अंजाम दिया.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए उन के गांव में दबिश दी. लेकिन कोई भी आरोपी घर पर नहीं मिला. पुलिस ने बृजेश मिश्रा के परिवार के कुछ लोगों के साथ ही कई संदिग्धों को हिरासत में ले लिया. उन्हें कोतवाली ला कर पूछताछ की गई.

2 गांवों के बीच प्रेम विवाह को ले कर हुई इस खूनी घटना के बाद खुफिया विभाग भी सतर्क हो गया था. पुलिस दोनों गांव की स्थिति पर नजर बनाए हुए थी. जहां रोहित के घर पर मातम पसरा हुआ था, वहीं अंगौथा में आरोपी के घरों पर कोई नहीं था. दोनों गांवों में इस घटना के बाद से सन्नाटा पसरा हुआ था.

इस सनसनीखेज हत्याकांड के एक हफ्ते बाद भी पुलिस के हाथ खाली थे. पुलिस अब तक नामजद आरोपियों में से एक भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी.

हत्यारों द्वारा ज्योति पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर मार देने की खबर इलैक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया में प्रमुखता से छाने लगी, जिस से पुलिस पर दबाव बढ़ता जा रहा था, लेकिन पुलिस अपने काम में जुटी रही. उस की जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही थी.

पुलिस के अलावा सर्विलांस टीम, स्वाट टीम को भी आरोपियों की गिरफ्तारी के काम में लगाया गया. पुलिस की मेहनत रंग लाई और हत्याकांड के 3 नामजद आरोपियों को पुलिस ने दबिश के बाद उन के गांव के पास से गिरफ्तार कर लिया गया.

16 जुलाई, 2020 को पुलिस ने ज्योति हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. एसपी अजय कुमार पांडेय ने प्रैसवार्ता आयोजित कर इस हत्याकांड का खुलासा किया. पता चला कि इस हत्याकांड को सम्मान की खातिर सगे भाई और 2 चचेरे भाइयों ने अंजाम दिया था.

घटना में नामजद 5 आरोपियों में से पुलिस ने ज्योति के सगे भाई गुलशन मिश्रा तथा 2 चचेरे भाइयों राघवेंद्र मिश्रा व रघुराई मिश्रा को गिरफ्तार कर उन के कब्जे से 2 तमंचे व 5 कारतूस बरामद किए. तीनों हत्यारोपियों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. इस हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह थी—

थाना मैनपुरी के बृजपुरा और अंगौथा गांव अगलबगल हैं. बृजपुरा निवासी महेश सिंह के 2 बेटे व एक बेटी थी. बड़ा बेटा 25 वर्षीय रोहित यादव पशु पालन विभाग में नौकरी करता था. जबकि छोटा बेटा मोहित अभी बीएससी फर्स्ट ईयर में पढ़ रहा था.

वहीं अंगौथा निवासी बृजेश मिश्रा खेतीकिसानी करता था. गांव में उस की आटा चक्की भी थी. उस के 4 बेटे बेटियों में गुलशन व हिमांशु के अलावा ज्योति तीसरे नंबर की थी. गुलशन पिता के साथ आटा चक्की के काम में हाथ बंटाता था जबकि दूसरे नंबर का बेटा हिमांशु पुणे में नौकरी करता था.

रोहित यादव पशुपालन विभाग में अंगौथा मझरा स्थित पशु चिकित्सालय व कृत्रिम गर्भाधान केंद्र में कार्य करता था. इसी सिलसिले में उस का आसपास के गांवों में आनाजाना लगा रहता था. वह पशुओं के इलाज के सिलसिले में पड़ोसी गांव अंगौथा भी जाता था. एक दिन जिस घर के पशुओं के इलाज के लिए रोहित आया था, उसी घर में पड़ोस में रहने वाली ज्योति आई हुई थी.

रोहित की नजर उस पर पड़ी. ज्योति सुंदर लड़की थी. वह उस का अनगढ़ सौंदर्य देख ठगा सा रह गया. उस ने पहली नजर में ही उसे दिल में बसा लिया.

ज्योति को भी अहसास हो गया कि रोहित उसे चाहत की नजरों से देख रहा है. रोहित कसी हुई कदकाठी का जवान युवक था. उसे देख कर 22 वर्षीय ज्योति का दिल भी तेजी से धड़कने लगा था. रोहित जब भी ज्योति के गांव जाता उस की मुलाकात ज्योति से हो जाती. दोनों ही एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते थे. जब दो युवा मिलते हैं तो जिंदगी में नया रंग घुलने लगता है.

दोनों एकदूसरे से प्यार का इजहार करना चाहते थे. आखिर एक दिन ज्योति को मौका मिल ही गया. भाई और पिता आटा चक्की पर थे, मां घर के कामों में व्यस्त थी.

ज्योति ने जैसे ही रोहित को देखा वह उस के पास से निकली और चुपचाप उस के पास एक पर्ची गिरा दी. रोहित ने वह पर्ची उठा कर अपने पास रख ली. काम निपटाने के बाद रोहित ने रास्ते में पर्ची खोली तो उस में एक मोबाइल नंबर लिखा था. बिना देर किए रोहित ने वह नंबर डायल किया.

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘मैं ज्योति मिश्रा बोल रही हूं, आप कौन?’’इस पर उस ने जवाब दिया, ‘‘मैं रोहित यादव बोल रहा हूं. आप के गांव के मवेशियों के इलाज के लिए ताजाता रहता हूं.’’

‘‘जनाब, आप इलाज जानवरों का करते हैं और घायल इंसानों को कर देते हैं,’’ कह कर ज्योति खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘आप चिंता न करें, अब मुझे आप का फोन नंबर मिल गया है. अब आप बिलकुल ठीक हो जाओगी.’’ रोहित ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया.

अंकिता भंडारी मर्डर : बाप की सियासत के बूते बेटे का अपराध – भाग 2

पुष्पदीप की चिंता और बढ़ गई. अंकिता का भी कोई फोन नहीं आया था और न ही उस ने कोई मैसेज ही किया था. इस का क्या कारण हो सकता था, पुष्पदीप समझ नहीं पा रहा था. वह पूरी रात सो नहीं पाया और अंकिता के बारे में तरहतरह की बातें उस के दिमाग में आतीजाती रहीं.

अगले रोज उसे सोशल मीडिया के माध्यम से अंकिता भंडारी के रिजौर्ट से लापता होने की जानकारी मिली. ये सारी बातें अंकिता के फेसबुक फ्रैंड पुष्पदीप ने पुलिस को बताईं.

दरअसल, इस बारे में 19 सितंबर को उस के पिता वीरेंद्र भंडारी ने पौड़ी जिले के एसपी यशवंत सिंह को जा कर बताया था कि उस की बेटी अंकिता पिछले 2 दिनों से लापता हो गई है. इस की सूचना उन्होंने रिजौर्ट के मालिक पुलकित आर्य ने फोन पर दी थी.

उस ने यह भी बताया था कि अंकिता की गुमशुदगी की तहरीर राजस्व चौकी को भी दे दी गई है. इस पर जब वीरेंद्र भंडारी पुलकित से मिले, तब उस ने अंकिता के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं दिया था.

वीरेंद्र भंडारी की बात सुन कर सिंह ने पहले डीएम (पौड़ी) डा. विजय कुमार जोगदंडे से बात की. पर्वतीय क्षेत्र में राजस्व चौकी उन्हीं के क्षेत्र में आती है. इस पर सिंह को यह जानकारी मिली कि अंकिता की गुमशुदगी के बारे में राजस्व चौकी ने कोई भी काररवाई नहीं की थी.

यह सुन कर सिंह का माथा ठनका और उन्होंने वीरेंद्र भंडारी को थाना लक्ष्मण झूला भेज कर वहां के एसएचओ संतोष कुंवर को अंकिता की तलाश करने और उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकालने के आदेश दिए.

एसएचओ संतोष कुंवर ने 21 सितंबर, 2022 को अपनी टीम के साथ वंतरा रिजौर्ट पहुंच कर अंकिता के लापता होने के बारे में रिजौर्ट के मालिक पुलकित आर्य, मैनेजर सौरभ भास्कर तथा सहायक मैनेजर अंकित गुप्ता से पूछताछ शुरू की. वहां पूछताछ के दौरान तीनों ने अंकिता के लापता होने के बारे में किसी भी तरह की कोई ठोस जानकारी नहीं दी.

यहां तक कि उस के अचानक गायब हो जाने के बारे में कुछ नहीं बता सके. जब उन्होंने पुलिस के सवालों का सही तरह से जवाब नहीं दिया, तब पुलिस उन्हें लक्ष्मण झूला थाने ले आई. वहां भी उन से अंकिता के बारे में पूछताछ हुई.

पुलिस के सामने आ गईं सारी बातें

उन्होंने पुलिस के काफी दबाव के बावजूद वैसी कोई बात नहीं बताई, जिस से अंकिता के बारे में जानकारी मिल सके. अगले दिन लक्ष्मण झूला पुलिस को अंकिता के मोबाइल की काल डिटेल्स मिल गई. जिस से अंकिता के लापता होने के मामले में परदा उठने की उम्मीद दिख गई.

उस के मोबाइल का वह मैसेज मिल गया, जिस में 17 सितंबर को अपने फेसबुक फ्रैंड पुष्पदीप को कहा था कि यह बहुत गंदा रिजौर्ट है, यहां पर गलत काम होते हैं. जल्दी ही मैं ये नौकरी छोड़ दूंगी. मैं यहां आगे काम नहीं करूंगी.

इस के आलावा पुष्पदीप को किए गए एक वाट्सऐप चैट में अंकिता की वह बातें भी सामने आ गईं, जिस में उस ने बताया था कि उसे रिजौर्ट में वीआईपी गेस्ट को स्पैशल सर्विस देने के लिए कहा गया था.

कैसे उसे इस अतिरिक्त सेवा के लिए होटल मैनेजर ने वेतन के अलावा 10 हजार रुपए महीना देने की भी पेशकश की थी… किस तरह रिजौर्ट में ठहरे एक आदमी ने नशे की हालत में उसे गले लगा लिया था. इस का विरोध करने पर अंकित गुप्ता ने उसे कैसे शांत रहने का इशारा किया था.

अंकिता के मोबाइल की इस डिटेल से पुलिस के सामने रिजौर्ट की अंदरूनी सच्चाई का आभास हो गया. उस के बाद उस संबंध में काल डिटेल्स का हवाला देते हुए तीनों से दोबारा सख्ती से पूछताछ की गई. आखिरकार जब उन्होंने अंकिता के बारे में जो सच बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था.

उस के अनुसार उन्होंने अंकिता भंडारी को चीला पावर हाउस की शक्ति नहर में धक्का दे दिया था. ऐसा उन्होंने इसलिए किया था, क्योंकि अंकिता ने रिजौर्ट में होने वाले कुकर्मों और अय्याशी की पोल खोलने की धमकी दी थी. उस के बाद ही उन्होंने अंकिता को रास्ते से हटाने की योजना बनाई थी.

आक्रोशित भीड़ ने किया थाने का घेराव

योजनाबद्ध तरीके से 18 सितंबर को अंकिता को घुमाने के बहाने बाइक से चीला की शक्ति नहर पर ले गए थे. वहां पहले तीनों ने शराब पी थी. फिर अंकिता को शक्ति नहर के तेज बहाव में धक्का दे दिया था. देखते ही देखते वह अथाह पानी में बह गई थी.

इस के बाद तीनों वापस रिजौर्ट लौट आए थे. उन्हें तब तक इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि रिजौर्ट की गतिविधियों और अपनी मजबूरी के बारे में अंकिता अपने दोस्त को बता चुकी थी. उन्होंने पुलिस से बचने के लिए योजना बनाई थी.

पुलकित ने कुक से 4 लोगों का खाना बनाने को कहा था. पुलकित खुद ही अंकिता का खाना ले कर उस के कमरे में गया था, ताकि किसी को उस के लापता होने की जानकारी नहीं होने पाए. 19 सितंबर की सुबह तीनों ने अंकिता भंडारी के लापता होने की जानकारी सार्वजनिक कर दी थी. साथ ही इस बारे में क्षेत्र की राजस्व पुलिस को भी सूचित कर दिया था.

तीनों के द्वारा अंकिता को मौत के घाट उतारने के कबूलनामे के बयान सुन कर एसएचओ संतोष कुंवर हैरान रह गए. उन्होंने इस वारदात की सूचना एएसपी (पौड़ी) शेखर चंद सुयाल और एसपी (पौड़ी) यशवंत सिंह को दे दी. यह जानकारी पा कर अंकिता के पिता वीरेंद्र की हालत पागलों जैसी हो गई. वह दहाड़ मार कर थाने में ही रोने लगे.

पुलिसकर्मियों ने उन्हें ढांढस बंधाया और अपने साथ घटनास्थल पर ले जाने के लिए तैयार किया. थोड़ा सहज होने पर वीरेंद्र भंडारी ने इस की सूचना पौड़ी और देहरादून में रह रहे अपने कुछ रिश्तेदारों को भी दी.

देखते ही देखते 22 सितंबर, 2022 को 2 घंटे के भीतर वीरेंद्र के दरजनों रिश्तेदार थाना लक्ष्मण झूला पहुंच गए. उन्होंने अंकिता के साथ रिजौर्ट के संचालकों द्वारा किए गए उत्पीड़न को ले कर हंगामा खड़ा कर दिया.

एएसपी शेखर चंद सुयाल ने पहले अंकिता के रिश्तेदारों को शांत कराया. फिर अंकिता की तलाशी के लिए एसडीआरएफ की टीम बनाई गई. सभी ने पुलकित, सौरभ और अंकित द्वारा बताए घटनास्थल पर नहर में नाव से अंकिता की तलाश शुरू कर दी गई.

तब तक यह बात जंगल में आग की तरह पूरे शहर में फैल चुकी थी. रिजौर्ट का नाम आते ही खबर सनसनीखेज बन चुकी थी. पूरे शहर और प्रदेश में हंगामा खड़ा हो गया था.

एक तरफ चीला की शक्ति नहर में नावों द्वारा अंकिता की तलाशी के लिए सर्च औपरेशन चलाया जा रहा था और काल डिटेल्स को साक्ष्य मानते हुए तीनों आरोपियों के खिलाफ काररवाई  शुरू कर दी थी, दूसरी तरफ थाने के बाहर अंकिता के परिजन व रिश्तेदार चिल्लाचिल्ला कर आरोपियों को उन के हवाले करने की मांग कर रहे थे.

अंकिता के परिवार और रिश्तेदारों के मुताबिक वह एक मेधावी छात्रा और अनुशासित लड़की थी. वह एक होनहार छात्रा थी. उस ने 12वीं क्लास में 88 फीसदी अंक हासिल किए थे. वह बहुत ही अनुशासित और प्यारी थी.

उस ने स्कूली शिक्षा के बाद होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया था और उसे ऋषिकेश के पास स्थित इस रिजौर्ट में वैकेंसी के बारे में पता चलने पर वहां जौब के लिए आवेदन किया था.

17 महीने तक लाश में दिखी आस – भाग 2

अब तक रामदुलारी व उन का पूरा परिवार अंधविश्वास व मनोरोग विकार का शिकार बन गया था. सभी मानने लगे थे कि विमलेश कुमार कोमा में है और एक दिन जीवित हो जाएगा. पढ़ीलिखी तथा बैंक मैनेजर मिताली दीक्षित भी मनोरोगी बन गई थी. उसने भी मान लिया था कि पति कोमा में है और एक दिन वह जीवित हो जाएंगे.

वह रोज बैंक जाने से पहले पति का माथा छू कर बतियाती थी. सिरहाने बैठ कर उसे निहारती थी, उन के सिर पर हाथ फेरती थी और उसे बोल कर जाती थी कि जल्दी ही औफिस से लौट कर मिलती हूं.

भाई दिनेश व सुनील जब काम से लौटते थे तो विमलेश से उस का हालचाल पूछते थे. विमलेश की खामोशी के बावजूद वे उन्हें जीवित मान रहे थे.

मिताली को कचोट रही थी आत्मा

मिताली दीक्षित परिवार के प्रभाव में थी. इसलिए वह उन की हां में हां मिला रही थी. लेकिन उस की अंतरात्मा उसे कचोट रही थी. यही कारण था कि उस ने पति की मौत के 5 दिन बाद ही एक पत्र अहमदाबाद स्थित आयकर विभाग को भेज दिया था. पत्र में उस ने लिखा था कि विमलेश कुमार की मौत कोरोना से हो गई है. पेंशन संबंधी औपचारिकताओं का जल्दी से जल्दी निपटारा किया जाए.

आयकर विभाग ने पत्र के आधार पर प्रक्रिया शुरू कर दी थी कि तभी मिताली का एक और पत्र अहमदाबाद आयकर विभाग को प्राप्त हुआ. उस में लिखा था कि औक्सीमीटर से जांच में पति विमलेश की पल्स चलती हुई पाई गई है और वह जीवित है. इसलिए पेंशन व फंड भुगतान की प्रक्रिया को रोक दिया जाए. विभाग ने तब विमलेश की पेंशन, फंड समेत अन्य भुगतान की प्रक्रिया रोक दी.

इस के बाद आयकर विभाग ने विमलेश कुमार के मैडिकल बिल और सैलरी भुगतान संबंधी 7 पत्र पत्नी मिताली को भेजे. लेकिन मिताली ने कोई जवाब नहीं दिया.

दरअसल, जैसेजैसे समय बीतता गया वैसेवैसे विमलेश का शरीर काला पड़ता गया. शरीर जब पूरी तरह से सूख गया तो मिताली को यकीन हो गया कि अब शरीर में कुछ नहीं बचा. मिताली ने सासससुर को समझाने का प्रयास किया तो वे उस से झगड़ने लगे.

परेशान हो कर मिताली ने एक गुमनाम पत्र अहमदाबाद स्थित आयकर औफिस को भेजा, जिस में उस ने विमलेश की लाश घर पर होने की सनसनीखेज जानकारी दी. इस पत्र के मिलने के बाद आयकर विभाग में खलबली मच गई.

इस के बाद अहमदाबाद से जोनल एकाउंट्स की एक टीम विमलेश के कानपुर स्थित घर पहुंची. लेकिन परिजनों ने टीम को घर के अंदर घुसने नहीं दिया और न ही टीम को कोई जानकारी दी.

अहमदाबाद से आई टीम वापस लौट गई और फिर कानपुर आयकर विभाग को पत्र लिख कर शक जताया कि आयकर अधिकारी विमलेश कुमार की मौत हो चुकी है. कानपुर सीएमओ के जरिए इस की पुष्टि कराएं और जांच रिपोर्ट अहमदाबाद औफिस भिजवाएं.

इस पत्र के बाद कानपुर के आयकर अधिकारियों ने डीएम विशाख जी को सारी जानकारी दी और सीएमओ से विमलेश की जांच कराने का अनुरोध किया. चूंकि मामला पेचीदा था, सो डीएम ने सीएमओ को जांच का आदेश दिया.

डीएम के आदेश पर सीएमओ ने कराई जांच

कानपुर के सीएमओ आलोक रंजन ने तब 3 डाक्टरों की एक टीम जांच हेतु बनाई. इस टीम में डा. ए.वी. गौतम, डा. आशीष तथा डा. अविनाश को शामिल किया गया. सीएमओ ने टीम को निर्देशित किया कि विमलेश कुमार के जीवित या मृत्यु होने की जांच हैलट अस्पताल में ही होगी. अत: उन्हें अस्पताल ही लाया जाए.

23 सितंबर, 2022 की सुबह 11 बजे डाक्टरों की टीम विमलेश कुमार गौतम के घर पहुंची. टीम की मुलाकात विमलेश की मां रामदुलारी व पिता रामऔतार गौतम से हुई. लेकिन उन्होंने जांच कराने से साफ मना कर दिया और कहा कि उन के बेटे विमलेश की धड़कनें चल रही हैं. वह जिंदा है. इसी के साथ उन्होंने मिताली को भी सूचित कर दिया तो वह भी बैंक से घर आ गई.

डाक्टरों की टीम को जब विमलेश के घरवालों ने रोका तो उन्होंने जानकारी सीएमओ आलोक रंजन को दी. आलोक रंजन ने तब पुलिस कमिश्नर वी.पी. जोगदंड को जानकारी दी. उस के बाद जौइंट सीपी आनंद प्रकाश तिवारी, एडिशनल सीपी (वेस्ट) लाखन सिंह यादव तथा प्रभारी निरीक्षक संजय शुक्ला विमलेश के आवास पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घर के मुखिया रामऔतार गौतम तथा उन की पत्नी रामदुलारी से बात की और बेटे विमलेश का स्वास्थ परीक्षण कराने को कहा.

विमलेश की पत्नी मिताली तो पति का स्वास्थ परीक्षण कराने को राजी थी, लेकिन बाकी सदस्य टालमटोल कर रहे थे. काफी कहासुनी व पुलिस से झड़प के बाद सभी राजी हो गए.

पुलिस के साथ डाक्टरों की टीम ने उस कमरे में प्रवेश किया, जहां विमलेश तख्त पर लेटा था. विमलेश को देख कर पुलिस अफसर व डाक्टर हैरान रह गए.

विमलेश का शरीर पूरी तरह से सूख चुका था और काला पड़ गया था. मांस हड्डियों में चिपक गया था. लेकिन डाक्टर व पुलिस अफसर इस बात से हैरान थे कि कमरे से किसी प्रकार की बदबू नहीं आ रही थी और न ही उस के शव से.

डाक्टरों ने कर दिया मृत घोषित

डाक्टरों की टीम ने जांच कर घर वालों को बताया कि विमलेश की मौत हो चुकी है. वह भ्रम न पालें कि वह जिंदा है. इस पर परिवार वाले डाक्टरों से भिड़ गए और जांच को गलत ठहराने लगे.

उस के बाद विमलेश कुमार के शव को हैलट अस्पताल लाया गया और परिवार वालों के सामने ईसीजी किया गया. रिपोर्ट में सीधी लकीर दिख रही थी, फिर भी परिवार के लोग संदेह जताते रहे.

परिवार के लोग विमलेश के शव का पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहते थे. उन्होंने लिख कर भी दे दिया. पुलिस भी बला टालना चाहती थी. और वैसे भी कोई आपराधिक मामला नहीं बनता था सो पुलिस ने लिखित में ले कर घर वालों को शव सौंप दिया. इस के बाद घर वालों ने शव का अंतिम संस्कार भैरवघाट पर कर दिया.

17 माह तक घर में अफसर बेटे का शव रखने का मामला अखबारों में प्रकाशित हुआ तो लोग अवाक रह गए. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि मृत व्यक्ति का शव इतने दिनों तक रखा जा सकता है. टीवी चैनलों के माध्यम से यह मामला देशदुनिया में कई दिनों तक सुर्खियां बटोरता रहा.

कानपुर पुलिस भी हैरान थी कि ऐसी क्या वजह थी कि शव 17 महीने तक घर में रखा रहा. कहीं परिवार किसी तांत्रिक के चक्कर में तो नहीं फंसा था. कहीं अफसर का वेतन तो परिवार वाले नहीं हड़पना चाहते थे. कहीं पूरा परिवार अंधविश्वास या मनोरोग का शिकार तो नहीं हो गया था.

इन्हीं सब बिंदुओं की जांच के लिए जौइंट सीपी आनंद प्रकाश तिवारी ने जांच एडिशनल डीसीपी (वेस्ट) लाखन सिंह यादव को सौंपी.

लाखन सिंह यादव ने इस प्रकरण की बड़ी बारीकी से जांच की और परिवार के मुख्य सदस्यों से अलगअलग बात की. जांच में यही तथ्य निकला कि मां के अंधविश्वास में 17 माह तक विमलेश का शव घर में रखा रहा.

खराब औक्सीमीटर से हुई थी गलतफहमी

मातापिता के इस अंधविश्वास को पूरे घर ने अपना विश्वास बना लिया और उसी तरह से विमलेश की सेवा करने लगे.

श्री यादव ने घर के सामान की जांच की पर कोई लेप नहीं मिला. औक्सीजन सिलेंडर तथा तख्त की भी जांच की. जांच में यह बात सामने आई कि जो औक्सीमीटर विमलेश को लगाया गया था, वह खराब था. खराबी के कारण ही वह गलत रीडिंग बता रहा था. जांच से यह भी पता चला कि परिवार ने विमलेश का वेतन नहीं लिया था.

बहन की सौतन बनने की जिद – भाग 2

रंजिशन हत्या का हुआ अंदेशा

जांच से एक बात साफ हो चुकी थी कि इसे लूट अथवा छिनैती के लिए अंजाम नहीं दिया गया था और न ही मृतका और हत्यारों के बीच कोई लड़ाईझगड़े के निशान ही मिले थे. इस का मतलब साफ था कि हत्यारों का निशाना सिर्फ नेहा ही थी.

इस बाबत जब पुलिस ने मृतका के घर वालों से पूछा तो उन्होंने किसी से झगड़ा या दुश्मनी की बात से इंकार कर दिया. उन्होंने आगे कहा कि मिलनसार स्वभाव की नेहा पलभर में किसी को भी अपना बना लेती थी. ऐसे में भला किसी से उस की क्या दुश्मनी हो सकती है.

पुलिस की काररवाई रात के 2 बजे तक चली. नेहा सिंह की मां रिंकू देवी की लिखित तहरीर पर लोहिया नगर के एसएचओ अजीत प्रताप सिंह ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होते ही पुलिस ने जांच की काररवाई शुरू कर दी. इस के लिए सब से पहले नेहा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई गई.

नेहा की हत्या की खबर सुन कर उस के वहां शोक संवेदना जताने के लिए नातेरिश्तेदारों का जमावड़ा लग गया. बहन की हत्या की खबर सुन कर उस की मझली बहन निशा, उस का देवर कुंदन और निशा का पति श्याम कुमार भी आए थे. निशा का तो रोरो कर बुरा हाल था. आंखें सूज कर बड़ी हो गई थीं और लाल भी.

मृतका नेहा छोटी बहन निशा से बहुत प्यार करती थी, इसीलिए उस के गम में उस का रोरो कर बुरा हाल था.

बहन के देवर कुंदन पर हुआ शक

घटना के 10 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा था. नेहा के फोन की काल डिटेल्स में बड़ेबड़े व्यापारियों, बड़े अफसरों और तमाम प्रभावशाली लोगों के नंबर निकल कर सामने आए थे.

चूंकि नेहा जिस शोरूम में काम करती थी, वहां सोने, चांदी, हीरे और रत्नजडि़त गहने खरीदने बडे़बड़े लोग आते थे, इसलिए उसे अपने कस्टमरों के नंबर सेलफोन में सेव करने पड़ते थे. फिर भी पुलिस हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी थी.

काल डिटेल्स के अलावा पुलिस ने मुखबिर भी लगा दिए थे. इधर नेहा की बहन निशा का देवर कुंदन लोहिया नगर थाने में हर 2-4 दिन बाद हत्यारों के बारे में पता लगाने जरूर पहुंच जाता था कि हत्यारों की शिनाख्त हुई या नहीं. एसएचओ अजीत प्रताप सिंह हत्यारों को जल्द पकड़ लेने का आश्वासन दे कर उसे घर भेज देते थे.

कुंदन का बारबार थाने पहुंचना और नेहा के हत्यारों के बारे में बारबार पूछना पता नहीं क्यों एसएचओ को अटपटा सा लगने लगा था. उन की आंखों में वह शक के रूप में चढ़ गया था.

इसी बीच पुलिस के हाथों नेहा की सब से छोटी बहन अर्पिता का मोबाइल फोन लग गया. उस में कुछ आपत्तिजनक तसवीरें भी थीं और कुंदन की भी तसवीर दिखी, जो बारबार थाने पहुंच कर नेहा के हत्यारों के बारे में पूछता था.

काल डिटेल्स, अर्पिता के मोबाइल फोन से प्राप्त तसवीरों और कुछ वीडियो क्लिप्स से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि नेहा की हत्या प्रेम प्रसंग का नतीजा है. नेहा मझली बहन निशा के देवर कुंदन पर छोटी बहन अर्पिता से शादी का दबाव बना रही थी.

जांच के जरिए पुलिस को एक और चौंकाने वाली बात पता चली थी कि शादी से इंकार करने पर नेहा ने अपने कुछ परिचितों से कुंदन को पिटवाया भी था.

यही नहीं, उस ने उसे धमकी दी थी कि अगर उस ने अर्पिता से शादी नहीं की तो उस की तसवीरों और आपत्तिजनक वीडियो को सोशल मीडिया पर डाल देगी. इस से कुंदन बुरी तरह डर गया था. यह बात पुलिस ने छिपाए रखी ताकि कुंदन को पुलिस पर शक न हो और वह अपना काम करता रहे.

घटना के 24वें दिन पुलिस को बड़ी कामयाबी हाथ लगी. 2 जुलाई, 2022 को करीब 11 बजे कुंदन लोहिया नगर थाने में नेहा के हत्यारों के बारे में फिर से पता लगाने पहुंचा था. उस वक्त वह शराब के नशे  में धुत था. उस के पैर लड़खड़ा रहे थे.

इत्तफाक से एसएचओ अजीत प्रताप सिंह थाने में मौजूद थे और गश्त पर निकलने ही वाले थे कि वह पहुंच गया. कुंदन एसएचओ के उपस्थित होने के बारे में थाने के गेट पर तैनात प्रहरी से पूछ कर सीधा उन के औफिस में पहुंच गया.

‘‘नमस्कार साहब.’’ उन्हें देख कर उस ने कहा था.

‘‘नमस्कार…नमस्कार. आज इतनी जल्दी कैसे आना हुआ?’’ एसएचओ बोले.

खाली पड़ी कुरसी की ओर बैठने का इशारा किया तो वह कुरसी पर बैठ गया. एसएचओ अजीत सिंह ने उसे गौर से देखते हुए पूछा, ‘‘और बताइए, साहब. कैसे आना हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही. इधर से निकल रहा था तो सोचा आप से मिलता चलूं और यह भी पता लगा लूं कि नेहा के कातिलों के बारे में कोई क्लू मिला या नहीं?’’

‘‘अच्छा किया जो आप ने याद दिला दिया मुझे. हां जी, नेहा के हत्यारों के बारे में क्लू मिल गया है. ऐसा समझो कि कातिल मेरे सामने बैठा है.’’

एसएचओ की बात सुन कर कुंदन ऐसे उछला मानो उस की चोरी पकड़ी गई हो.

‘‘क…क्या मतलब है सर, आप का?’’ हकलाते हुए बोला था कुंदन, ‘‘नेहा के मर्डर में मेरा हाथ है?’’

‘‘ऐसा ही समझो,’’ अचानक से थानप्रभारी अजीत प्रताप सिंह के तेवर तल्ख हो गए थे, ‘‘बड़ी मुश्किल से फंदे में फंसे हो कुंदन. सारे सबूत तुम्हारे खिलाफ बोल रहे हैं.’’ सच उगलवाने के लिए उन्होंने एक पासा फेंका, ‘‘अब सच सीधी तरह उगल दो वरना सच उगलवाने के मेरे पास और भी तरीके हैं. अगर मैं ने उन हथकंडों को अपनाया तो तुम्हारे शरीर की हड्डियों के लिए बड़ी मुश्किल हो जाएगी.’’

दन ने उगल दी सच्चाई

एसएचओ अजीत प्रताप सिंह का इतना कहना था कि कुंदन का सारा नशा हिरन हो गया. माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं. कुंदन समझ गया कि अब बचना मुश्किल होगा. अगर सच नहीं बताया तो सचमुच उस के साथ सख्ती होगी.

फिर क्या था, उस ने एसएचओ के सामने घुटने टेक ही दिए, ‘‘हां, नेहा की मौत का मुझे कोई मलाल नहीं है. निशा भाभी और मैं ने मिल कर उसे मारा है. नेहा ने भाभी का पति छीन कर उन की सौतन बनना चाहा था और मुझे सरेराह बाजार में पिटवा कर ब्लैकमेल करना चाहा. बस हम ने मिल कर उसे मौत के घाट उतार दिया. हम ने अपने रास्ते के कांटे को हमेशा के लिए खत्म कर दिया.’’

फिर उस ने नेहा की हत्या की पूरी कहानी पुलिस के सामने उगल दी, जो करीब 22 दिनों से उलझी हुई थी.

कुंदन की निशानदेही पर बेगूसराय जिले के ही नयागांव थाने के ही एक गांव महमदपुर गौतम से उस की भाभी निशा को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में निशा ने बहन की हत्या कराने का अपना जुर्म कुबूल लिया.

तनिष्क ज्वैलर्स शोरूम की सेल्सगर्ल नेहा सिंह हत्याकांड का परदाफाश हो चुका था. सनसनीखेज हत्याकांड के 2 आरोपी कुंदन और निशा गिरफ्तार कर लिए गए थे. इस में तीसरा आरोपी मुकेश सिंह, जिस ने नेहा को गोली मारी थी, फरार था.

3 जुलाई, 2022 को एसपी योगेंद्र कुमार ने प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित की, जिस में मृतका की बहन निशा और कुंदन ने अपना अपराध कुबूल कर लिया.

इस के बाद दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में नेहा सिंह हत्याकांड की कहानी कुछ ऐसे सामने आई, जहां रिश्तों की उलझी हुई कमजोर कडि़यां मजबूती के लिए बेकरार थीं.