दो बहनों का संसार

अप्रैल, 2017 के पहले सप्ताह में पुलिस कमिश्नर दत्तात्रय पड़सलगीकर ने मुंबई के उपनगरीय पुलिस थानों का दौरा किया तो उपनगर कांदिवली पश्चिम के थाना चारकोप में दर्ज भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त मैनेजर प्रकाश गंगाराम वानखेड़े की गुमशुदगी की फाइल पर उन का ध्यान चला गया. उन्होंने उस फाइल का अध्ययन किया तो उन्हें लगा कि इस मामले की जांच ठीक से नहीं की गई है. उन्होंने वह फाइल जौइंट सीपी देवेन भारती को सौंपते हुए उस की जांच ठीक से कराने को कहा.

देवेन भारती को भी इस मामले की जांच में जांच अधिकारियों की लापरवाही दिखाई दी. वह कई सालों तक मुंबई क्राइम ब्रांच सीआईडी के प्रमुख रह चुके थे. उन्हें आपराधिक मामलों के खुलासे का अच्छाखासा अनुभव था. यह मामला एक साल पुराना था और बिना किसी नतीजे पर पहुंचे इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. फाइल का अध्ययन करने पर देवेन भारती को यह मामला संदिग्ध और रहस्यमय लगा तो उन्होंने सहायक अधिकारियों को बुला कर एक मीटिंग की और इस मामले की जांच उन्होंने अपने सब से विश्वस्त अधिकारी एसीपी श्रीरंग नादगौड़ा को सौंप दी.

श्रीरंग नादगौड़ा ने खुद के निर्देशन में थाना मालवणी के थानाप्रभारी दीपक फटांगरे के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में इंसपेक्टर बेले, एएसआई धार्गे, कान्हेरकर, एसआई जगताप, सिपाही उगले आदि को शामिल किया. थानाप्रभारी दीपक फटांगरे भी क्राइम ब्रांच की सीआईडी यूनिट में कई सालों तक काम कर चुके थे. शायद इसीलिए पुलिस अधिकारियों को उन पर पूरा भरोसा था. उन्होंने भी इस मामले को पूरी गंभीरता से लिया. इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर पहले तो उन्होंने फाइल का गहराई से अध्ययन किया, उस के बाद इस मामले की जांच महाराष्ट्र के जिला अहमदनगर की शिवाजी कालोनी की रहने वाली वंदना थोरवे के यहां से शुरू की.

दरअसल, वंदना गुमशुदा भारतीय स्टेट बैंक के मैनेजर प्रकाश वानखेड़े की पत्नी आशा वानखेड़े की बहन थी. आशा ने अपने एक बयान में अहमदनगर की शिवाजी कालोनी का जिक्र किया था. इसी कालोनी में आशा की बहन वंदना रहती थी.

27 अप्रैल, 2016 को कांदिवली के सेक्टर 6 स्थित आकाश गंगाराम हाऊसिंग सोसाइटी की रहने वाली आशा वानखेड़े ने थाना चारकोप में अपने पति प्रकाश वानखेड़े की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. गुमशुदगी दर्ज कराते समय उस ने बताया था कि उस के पति 12 अप्रैल, 2016 को घर से किसी काम से निकले तो अभी तक लौट कर नहीं आए. नौकरी से रिटायर होने के बाद वह इतने दिनों तक कभी बाहर नहीं रहे, इसलिए अब उसे उन की चिंता हो रही है.

प्रकाश वानखेड़े पढ़ेलिखे आदमी थे और अच्छी नौकरी से रिटायर हुए थे. उन की समाज में प्रतिष्ठा था. इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर थाना चारकोप के थानाप्रभारी श्री पाटिल ने तुरंत ड्यूटी पर मौजूद एसआई जगताप से डायरी बनवाई और इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को देने के साथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी. अधिकारियों के निर्देश पर थानाप्रभारी श्री पाटिल ने थाने में मौजूद पुलिस बल को कई टीमों में बांट कर प्रकाश वानखेड़े की तलाश में लगा दिया.

इस मामले में अपहरण जैसी कोई बात नहीं थी. क्योंकि अगर प्रकाश वानखेड़े का अपहरण हुआ होता तो अब तक उन की फिरौती के लिए फोन आ चुके होते. पुलिस का ध्यान दुर्घटना की ओर गया. थाना चारकोप पुलिस ने शहर के सभी थानों को वायरलैस मैसेज भेज कर इस बारे में पता किया. इस के बाद प्रकाश वानखेड़े के फोटो वाले पैंफ्लेट छपवा कर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवाए. दैनिक अखबारों में भी छपवाया गया. लेकिन इस सब का कोई नतीजा नहीं निकला.

पुलिस प्रकाश वानखेड़े के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर उस का अध्ययन कर रही थी कि तभी उन की गुमशुदगी की शिकायत के 2 सप्ताह बाद उन की पत्नी आशा ने थाने आ कर बताया कि उसे पता चला है कि उस के पति प्रकाश वानखेड़े 31 मई, 2016 को अहमदगनर की शिवाजी कालोनी में रहने वाली उस की छोटी बहन वंदना थोरवे के यहां थे. वह उस की बहन वंदना को कुछ पैसे देने गए थे.

चूंकि आशा ने ही इस मामले की शिकायत की थी, इसलिए पुलिस ने उस की बातों पर विश्वास कर लिया और इस के बाद इस मामले की जांच में सुस्ती आ गई. समय आगे बढ़ता रहा, हालांकि इस बीच जांच टीम ने कई बार आशा वानखेड़े से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस उस से मिल नहीं पाई. इस के बाद लगातार त्यौहार आते रहे, जिस की वजह से पुलिस इस मामले पर ध्यान नहीं दे पाई और एक तरह से यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया.

लेकिन अचानक 8 अप्रैल, 2017 को मुंबई के पुलिस कमिश्नर दत्तात्रय पड़सलगीकर की इस फाइल पर नजर पड़ी तो एक बार फिर इस मामले की जांच शुरू हो गई. पुलिस ने गुमशुदा प्रकाश वानखेड़े की पत्नी आशा को थाने बुलाया. लेकिन वह बहाना कर के थाने नहीं आई. ऐसा कई बार हुआ. इस बार पुलिस इस मामले को हल्के में नहीं लेना चाहती थी, इसलिए उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई.

पुलिस ने प्रकाश और आशा के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाने के साथसाथ लोकेशन भी निकलवाई तो जो जानकारी मिली, वह चौंकाने वाली थी. आशा ने अपने पति प्रकाश वानखेडे़ के गायब होने की जो तारीख बताई थी, उस के एक दिन पहले यानी 11 अप्रैल, 2016 को दोनों के मोबाइल फोन की लोकेशन एक साथ की मिल रही थी.

पतिपत्नी अहमदनगर की शिवाजी कालोनी में एक साथ थे. आशा की छोटी बहन वंदना थोरवे वहीं रहती थी. अगले दिन यानी 12 अप्रैल, 2016 को वंदना के मोबाइल की लोकेशन चारकोप स्थित आशा के घर की मिली थी.

जबकि पूछताछ में आशा ने पुलिस को स्पष्ट बताया था कि वंदना के पास कोई मोबाइल फोन नहीं है. वह मोबाइल फोन चला ही नहीं पाती. इस के बाद पुलिस ने आशा के फोन से वंदना का नंबर ले कर उसे फोन किया तो उस ने पुलिस से बात ही नहीं की, बल्कि यह भी बताया कि किस दिन प्रकाश वानखेड़े गायब हुए थे. जिस दिन वह गायब हुए थे, उस दिन वह मुंबई में बहन के घर थी. वह बड़ी बहन आशा को उस के घर ले आई थी.

मोबाइल फोन की लोकेशन से पुलिस को वंदना और आशा पर संदेह हुआ. इस के बाद एसीपी श्रीरंग नादगौड़ा के निर्देशन में थानाप्रभारी दीपक फटांगरे ने 12 अप्रैल, 2017 को संदेह के आधार  पर वंदना थोरवे को अहमदनगर स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस उसे गिरफ्तार कर थाना चारकोप ले आई. पुलिस ने उसे भले ही गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. वह जरा भी डरी या घबराई हुई नहीं थी. थाने में पूछताछ शुरू हुई तो वह पुलिस के हर सवाल का जवाब बड़े आत्मविश्वास से देती रही. वह खुद को इस मामले में निर्दोष और अनभिज्ञ बताती रही.

लेकिन पुलिस के पास अब तक काफी सबूत जमा हो चुके थे, इसलिए पुलिस उसे आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी. पुलिस ने उस से सबूतों के आधार पर सवाल पूछने शुरू किए तो वह जवाब देने में गड़बड़ाने लगी. धीरेधीरे पुलिस ने उसे ऐसा फांसा कि अंतत: बचाव का कोई उपाय न देख उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद वंदना ने प्रकाश वानखेड़े की गुमशुदगी का जो रहस्य बताया, वह चौंकाने वाला था. यही नहीं, उस ने अपने पति अशोक थोरवे की भी गुमशुदगी का रहस्य उजागर कर दिया. पता चला कि वह अपने प्रेमी नीलेश पंडित सूपेकर की मदद से बहनोई प्रकाश वानखेड़े की ही नहीं, अपने पति अशोक थोरवे की भी हत्या करा चुकी थी.

वंदना के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने मुंबई से आशा तथा सोलापुर से वंदना के प्रेमी नीलेश पंडित सूपेकर को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में तीनों ने प्रकाश वानखेड़े और अशोक थोरवे की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

आशा और वंदना महाराष्ट्र के जिला संगली की रहने वाली थीं. इन के पिता सहदेव खेतले मुंबई पुलिस में थे. वह सरकारी नौकरी में थे, परिवार छोटा था, इसलिए वह हर तरह से सुखी थे. उन के परिवार में सिर्फ 4 ही लोग थे. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. उन की पत्नी पार्वती संस्कारी गृहिणी थीं, इसलिए उन्होंने दोनों बेटियों को भी अच्छे संस्कार दिए थे. लेकिन समय के साथ उन के दिए सारे संस्कार दोनों बेटियों ने ताक पर रख दिए.

आशा और वंदना सयानी हुईं तो सहदेव को उन की शादी की चिंता हुई. वह दोनों बेटियों की शादी नौकरी करते हुए कर देना चाहते थे. उन्होंने किया भी ऐसा ही. उन्होंने आशा की शादी प्रकाश वानखेड़े से कर दी. प्रकाश वानखेड़े एसबीआई बैंक में नौकरी करते थे. शादी के बाद वह आशा के साथ मुंबई के उपनगर कांदिवली के चारकोप में रहने लगे थे.

बड़ी बेटी की शादी कर के सहदेव वंदना की भी शादी अहमदनगर की शिवाजी कालोनी के रहने वाले अशोक थोरवे से कर दी. अशोक का अपना कारोबार था. वंदना अपनी बड़ी बहन आशा से कुछ ज्यादा सुंदर और चंचल तो थी ही, महत्वाकांक्षी भी काफी थी. लेकिन तब उस के महत्वाकांक्षा की हत्या सी हो गई, जब उसे उस के मनपसंद का पति नहीं मिला.

वंदना कारोबारी या खेती करने वाले लड़के से शादी नहीं करना चाहती थी. वह भी बड़ी बहन आशा की तरह हैंडसम और अच्छी नौकरी वाला पति चाहती थी. लेकिन पिता ने उस के लिए ऐसा पति ढूंढ दिया था, जैसा वह बिलकुल नहीं चाहती थी. लेकिन शादी के बाद उस ने समझौता कर लिया था.

पर वंदना को तो अभी और परेशान होना था. शादी के कुछ सालों बाद वंदना के पति अशोक की तबीयत खराब रहने लगी. दिखाने पर डाक्टरों ने उसे जो बीमारी बताई, वह काफी गंभीर थी. इस के बाद वंदना का रहासहा धैर्य भी जवाब दे गया. पति के संपर्क में आने के बाद वंदना भी उस बीमारी की शिकार हो गई.

वंदना ने इस के लिए पिता को जिम्मेदार माना. इस के बाद इसी बात को ले कर वह अकसर पिता से लड़ाईझगड़ा करने लगी. बापबेटी का यह झगड़ा तभी खत्म हुआ, जब सहदेव की मौत हो गई. उन की मौत जहर से हुई थी. लेकिन तब यह पता नहीं चला था कि उन्हें जहर दिया गया था या उन्होंने खुद जहर पिया था.

पति की बीमारी की वजह से वंदना की आर्थिक स्थिति धीरेधीरे खराब होती गई, जिस के कारण उसे पति का इलाज कराने में परेशानी होने लगी थी. उस स्थिति में उस की मदद के लिए लोकहितवादी संस्था में काम करने वाला नीलेश पंडित सूपेकर आगे आया. वह भी उसी कालोनी में रहता था, जिस में वंदना रहती थी.

23 साल का नीलेश पंडित काफी स्मार्ट था. वह वंदना की हर तरह से मदद करने लगा. कहा जाता है कि जहां फूस और आग होगी, वहां शोले भड़केंगे ही. इस कहावत को वंदना और नीलेश पंडित ने चरितार्थ कर दिया. वंदना की मदद करतेकरते नीलेश उस के इतने करीब आ गया कि दोनों में मधुर संबंध बन गए.

काफी इलाज के बाद भी अशोक ठीक नहीं हुआ. बीमारी की वजह से वह काफी चिड़चिड़ा हो गया था. वह बातबात में वंदना को भद्दीभद्दी गालियां देता रहता था, जिस से परेशान हो कर वंदना और नीलेश पंडित ने एक खतरनाक फैसला ले लिया.

उन का सोचना था कि उन के इस फैसले से जहां अशोक थोरवे का कष्ट दूर हो जाएगा, वहीं उन्हें भी उस से मुक्ति मिल जाएगी. फिर क्या था, एक दिन अशोक थोरवे सो रहा था, तभी वंदना और नीलेश ने गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद शव को ठिकाने लगाने के लिए वंदना और नीलेश ने उसे एक प्लास्टिक की बोरी में भर दिया और रात में ही उसे ले जा कर बीड़ जनपद के अंभोरा पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले जंगल में फेंक दिया.

12 नवंबर, 2012 की सुबह थाना अंभोरा पुलिस ने अशोक थोरवे की लाश बरामद की थी. लेकिन काफी कोशिश के बाद भी लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर लाश को लावारिस मान कर अंतिम संस्कार कर दिया.

एक ओर जहां वंदना तरहतरह की परेशानियां झेल रही थी, वहीं आशा का दांपत्यजीवन काफी सुखमय था. उस के दांपत्य में दरार तब आई, जब प्रकाश वानखेड़े वंदना की मदद करने के बहाने उस का शारीरिक शोषण करने लगा. जब इस की जानकारी आशा को हुई तो उसे पति से नफरत सी हो गई. उस ने पति को खूब लताड़ा. इस से पतिपत्नी के बीच तनाव रहने लगा.

इस का नतीजा यह निकला कि पतिपत्नी एकदूसरे से दूर होते गए. इस की एक वजह यह भी थी कि प्रकाश आशा पर चरित्रहीनता का आरोप लगा कर उसे परेशान करने लगा था. सहनशक्ति की भी एक हद होती है. प्रकाश के लगातार परेशान करने से आशा की भी सहनशक्ति जवाब दे गई.

हार कर आशा ने अपनी परेशानी बहन वंदना को बताई तो उस ने कहा कि इस परेशानी से छुटकारा तो मिल जाएगा, लेकिन इस के लिए कुछ पैसे खर्च करने होंगे. वंदना ने उपाय बताया तो आशा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. लेकिन रोजरोज की परेशानी के बारे में सोचा तो आखिर उस ने बहन की बात मान ली. आशा ने सवा 2 लाख रुपए में पति प्रकाश वानखेड़े की जिंदगी का सौदा कर डाला.

अशोक थोरवे की हत्या कर के बच जाने से वंदना और नीलेश पंडित के हौसले बुलंद थे. उन्होंने जिस तरह अशोक की हत्या का राज हजम कर लिया था, सोचा उसी तरह इसे भी हजम कर जाएंगे. 5 साल बीत जाने के बाद भी पुलिस अशोक थोरवे के हत्यारों तक नहीं पहुंच पाई थी. वे उसी तरह प्रकाश वानखेड़े की भी हत्या कर के बच जाना चाहते थे. लेकिन दुर्भाग्य से इस में सफल नहीं हुए. एक साल बाद ही सही, आखिर सभी पकड़े गए.

आशा की सहमति मिलने के बाद वंदना और नीलेश पंडित ने प्रकाश वानखेड़े को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत वंदना ने अपने जीजा प्रकाश और बहन आशा को 10 अप्रैल, 2016 को पूजापाठ के बहाने अपने घर बुलाया. वंदना के बुलाने पर प्रकाश वानखेड़े खुशीखुशी आशा के साथ एक प्राइवेट कार से उस के घर पहुंच गए.

जिस समय वह वंदना के घर पहुंचे थे, उस समय रात के 8 बज रहे थे. घर पहुंचे प्रकाश का वंदना ने अच्छी तरह से स्वागत किया. योजना के अनुसार उन के खाने में नींद की गोलियां मिला दी गईं. जब वह सो गए तो 10-11 बजे आशा ने प्रकाश के पैर पकड़े तो वंदना ने दोनों हाथ. इस के बाद नीलेश ने गला दबा कर उन्हें मार डाला.

प्रकाश वानखेड़े की हत्या कर तीनों ने उन की लाश को बोरी में ठूंस कर भर दिया. इस के बाद नीलेश पंडित ने लाश की बोरी को स्कौर्पियो में रख कर कल्याण अहमदनगर हाईवे रोड पर स्थित जंगल में ले जा कर फेंक दिया. कुछ दिनों बाद अहमदनगर के थाना पारनेर पुलिस को प्रकाश का अस्थिपंजर मिला था.

प्रकाश की लाश ठिकाने लगा कर आशा बहन के साथ अपने घर आ गई. जब कई दिनों तक प्रकाश दिखाई नहीं दिया तो पड़ोसियों में कानाफूसी होने लगी. कुछ लोगों ने आशा से उन के बारे में पूछा भी. आशा भला उन लोगों को क्या बताती. पड़ोसियों की इस पूछताछ से घबरा कर उस ने खुद को बचाने के लिए थाना चारकोप में उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

पुलिस तुरंत तो नहीं, लेकिन साल भर बाद प्रकाश वानखेड़े की गुमशुदगी के रहस्य उजागर कर ही दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने आशा, वंदना और नीलेश पंडित को अहमदनगर के थाना पारनेर पुलिस को सौंप दिया.

वहां तीनों के खिलाफ प्रकाश वानखेड़े, अशोक थोरवे की हत्या और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज कर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में थे. थाना पारनेर पुलिस अब आशा और वंदना के पिता की रहस्यमय मौत की जांच कर रही है. पुलिस इस बात का पता लगा रही है कि उन्होंने आत्महत्या की थी या उन्हें जहर दे कर मारा गया था.

– कथा में सहदेव खेलते का नाम काल्पनिक है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

जिंदगी में दौलत ही सब कुछ नहीं होती

दर्शन सिंह पंजाब के जिला कपूरथला के गांव अकबरपुर स्थित अपनी आलीशान कोठी में परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी स्वराज कौर के अलावा 2 बेटे कमलजीत सिंह और संदीप सिंह थे. संपन्न परिवार वाले दर्शन सिंह के पास कई एकड़ उपजाऊ भूमि थी. पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने दोनों बेटों की शादी कर दी थी. बड़े बेटे कमलजीत सिंह की शादी उन्होंने अपने एक दोस्त की बेटी राजेंद्र कौर से और छोटे संदीप सिंह की राजदीप कौर के साथ की थी. दर्शन सिंह एक रसूखदार व्यक्ति थे, इसलिए उन का पूरे गांव में दबदबा था. पर कुछ साल पहले एक दुर्घटना में उन की मौत हो गई थी. उन की मौत के बाद उन की पत्नी स्वराज कौर अपने परिवार पर पति जैसा दबदबा कायम नहीं रख पाईं, खासकर दोनों बहुओं पर.

समय का चक्र अपनी गति से घूमता रहा. कमलजीत और संदीप सिंह 3 बच्चों के पिता बन गए. इस बीच कमलजीत सिंह अपने किसी रिश्तेदार की मदद से इंग्लैंड जा कर नौकरी करने लगा. कुछ समय बाद संदीप सिंह भी फ्रांस जा कर नौकरी पर लग गया.

बेटों के विदेश जाने के बाद स्वराज कौर ने खेती की जमीन ठेके पर दे दी थी. दोनों बेटे विदेश से हर महीने मोटी रकम घर भेज रहे थे. स्वराज कौर को बस एक चिंता थी कि उस के पोतापोती पढ़लिख कर काबिल बन जाएं.

विदेश में रह कर दोनों भाई पैसे कमाने में लगे थे तो इधर गांव में उन की पत्नियों के रंगढंग बदलने लगे थे. एक साल बाद जब छुट्टी ले कर दोनों भाई गांव लौटे तो अपनेअपने पति द्वारा लाए हुए महंगे व अत्याधुनिक उपहार देख कर राजेंद्र कौर और राजदीप कौर की आंखें चुंधियां गईं.

पति के मुंह से विदेशियों का रहनसहन, खानपान और वहां के लोगों की सभ्यता आदि के बारे में सुन कर देवरानीजेठानी का मन करता कि काश वे भी अपने पतियों के साथ विदेश में रहतीं. अपने मन की बात उन्होंने अपनेअपने पतियों से कह दी. लिहाजा दोनों भाइयों ने पत्नी और बच्चों को साथ ले जाने की व्यवस्था करनी शुरू कर दी.

उन्होंने उन के पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी. इस सब में समय तो लगता ही है. बहरहाल, यह सब ऐसा ही चलता रहा. साल, दो साल में कोई न कोई भाई छुट्टी ले कर गांव आता और अपनी मां, पत्नी और बच्चों से मिल कर लौट जाता.

स्वराज कौर बड़ी खुशी और शांति से परिवार की बागडोर संभालने में लगी रहती थीं. वह एक साधारण और धार्मिक विचारों वाली महिला थीं. जबकि उन की दोनों बहुएं बनठन कर रहती थीं. उन्होंने अपने आप को पूरी तरह से आधुनिकता के रंग में रंग लिया था. स्वराज कौर समयसमय पर उन्हें टोकते हुए सिख मर्यादा में रहने का पाठ पढ़ाया करती थीं. पर बहुओं ने उन की बात अनसुनी करनी शुरू कर दी तो स्वराज कौर ने भी उन की तरफ ध्यान देना बंद कर दिया.

पंजाब विधानसभा चुनाव 4 फरवरी, 2017 को होने थे, इसलिए पुलिसप्रशासन बड़ी मुस्तैदी से क्षेत्र में अमनशांति बनाए रखने में जुटा था. दिनांक 3/4 फरवरी की रात को स्वराज कौर की छोटी बहू राजदीप कौर ने उन्हें रात का खाना दिया. बड़ी बहू राजेंद्र कौर रसोई का काम निपटा कर बच्चों को सुलाने की तैयारी कर रही थी. उसी रात लगभग एक बजे किसी ने राजदीप कौर के कमरे का दरवाजा खटखटाया.

दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर राजेंद्र कौर की भी आंखें खुल गईं. दोनों ने अपनेअपने कमरे से बाहर आ कर देखा तो मारे डर के उन की चीख निकल गई. उन के कमरों के बाहर बरामदे में 12-13 लोग खड़े थे. सभी के मुंह पर कपड़ा बंधा था और उन के हाथों में चाकू, तलवार आदि हथियार थे. इस के पहले कि वे दोनों कुछ समझ पातीं, उन लोगों ने आगे बढ़ कर दोनों को दबोच लिया और धकेलते हुए उन्हें स्वराज कौर के कमरे में ले गए.

इस बीच 2 लोग मेनगेट के पास खड़े हो कर रखवाली करने लगे. 2-3 लोगों ने सोते हुए बच्चों को अपने कब्जे में कर लिया. स्वराज कौर के कमरे में पहुंचते ही उन बदमाशों ने राजेंद्र कौर और राजदीप कौर को मारनापीटना शुरू कर दिया. वे उन से अलमारी की चाबी मांग रहे थे. 2 लोगों ने राजेंद्र कौर और राजदीप कौर की पहनी हुई ज्वैलरी उतारनी शुरू कर दी.

शोरशराबा और मारपीट की आवाज सुन कर स्वराज कौर जाग गई थी. खुद को और अपनी दोनों बहुओं को हथियारबंद बदमाशों से घिरे हुए देख कर उन के होश उड़ गए. परिवार को संकट में देख वह दहाड़ते हुए अपने बैड से उठीं पर तब तक एक हमलावर ने लोहे की रौड उन के सिर पर दे मारी. स्वराज कौर के मुंह से आवाज तक न निकल पाई. वह बैड पर ही चारों खाने चित्त गिर पड़ीं.

तब डर की वजह से राजेंद्र कौर ने अलमारियों की चाबी का गुच्छा बदमाशों के हवाले कर दिया. बदमाश घर में लूटखसोट कर धमकाते हुए चले गए.

आधी रात के बाद हुई इस वारदात से राजेंद्र और राजदीप कौर बुरी तरह डर गईं. काफी देर तक दोनों दहशत में बुत बनी अपनी जगह खड़ी रहीं. जब होश आया तो राजदीप कौर ने बैड पर पड़ी सास स्वराज कौर की सुध ली और राजेंद्र कौर ने आंगन में खड़े हो कर सहायता के लिए चीखनाचिल्लाना शुरू कर दिया था.

शोर सुन कर वहां पड़ोसी जमा हो गए. लूट की बात सुन कर सभी हैरान थे. स्वराज कौर की नब्ज टटोलने पर पता चला कि उन की मौत हो चुकी है. चोटों के घाव उन के शरीर पर भी थे, पर वे इतने गंभीर न थे. तब तक गांव का सरपंच भी वहां आ गया था. सलाहमशविरा के बाद तय हुआ कि पुलिस को सूचना देने से पहले मृतका के भाई प्रीतपाल सिंह को सूचित कर दिया जाए.

प्रीतपाल सिंह जिला होशियारपुर के गांव मंसूरपुर में रहते थे. रात को 2 बजे फोन द्वारा जब उन्हें खबर दी गई तो वह अपनी पत्नी कुलदीप कौर को साथ ले कर उसी समय घर से निकले और सुबह तक बहन के गांव अकबरपुर पहुंच गए. उस से पहले सरपंच ने पुलिस को भी फोन कर दिया था.

हत्या की खबर सुन कर थानाप्रभारी गुरमीत सिंह सिद्धू टीम के साथ मौके पर आ गए. पुलिस ने जब स्वराज कौर की लाश का मुआयना किया तो उन के सिर पर बाईं ओर गहरा घाव था. उस में से खून निकलने के बाद सूख चुका था.

थानाप्रभारी ने दोनों बहुओं राजेंद्र कौर और राजदीप कौर से घटना के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने रोते हुए रात का पूरा वाकया बता दिया. पुलिस को उन की बात पर शक तो हुआ, पर उस समय गम का माहौल था, इसलिए उन से ज्यादा पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा. घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने राजेंद्र कौर और राजदीप कौर के बयान दर्ज किए तो दोनों के बयानों में कई पेंच दिखाई दे रहे थे. उन्होंने बताया कि लुटेरे घर से लगभग 7 तोले सोने के आभूषण और कुछ हजार रुपए की नकदी लूट ले गए हैं.

2 बातें थानाप्रभारी गुरमीत सिंह सिद्धू की समझ में नहीं आ रही थीं. एक तो मामूली लूट के लिए 12 लुटेरों का आना, दूसरे 12 लोग जब कहीं लूटमार करेंगे तो वहां अच्छाखासा हंगामा खड़ा हो जाना स्वाभाविक है, जबकि यहां किसी पड़ोसी को भी वारदात की भनक नहीं लगी थी. लुटेरों ने स्वराज कौर को तो जान से मार दिया था, जबकि उन की दोनों बहुओं को मामूली सी खरोंचें ही लगी थीं. थानाप्रभारी ने अज्ञात के खिलाफ हत्या और लूट की रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

थानाप्रभारी ने जांच टीम में एएसआई परमिंदर सिंह, हैडकांस्टेबल गुरनाम सिंह, नौनिहाल सिंह, रविंदर सिंह व लेडी हैडकांस्टेबल सुरजीत कौर को शामिल किया था.

प्रीतपाल सिंह ने भी पुलिस से शक जताया कि उन की बहन की हत्या लूट की वजह से नहीं, बल्कि किसी साजिश के तहत की गई है.

थानाप्रभारी ने अब तक की काररवाई के बारे में एसएसपी अलका मीणा और डीएसपी डा. नवनीत सिंह माहल को अवगत करा दिया था. इस के बाद मुखबिर ने थानाप्रभारी को जो सूचना दी, उस के आधार पर मृतका की दोनों बहुओं राजेंद्र कौर और राजदीप कौर को हिरासत में ले लिया गया और उन की निशानदेही पर गांव अकबरपुर के ही अंचल कुमार उर्फ लवली को भी हिरासत में ले लिया गया.

इन तीनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने स्वराज कौर की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में स्वराज कौर की हत्या और इस फरजी लूटपाट की जो कहानी सामने आई, वह परपुरुष की बाहों में सुख तलाशने वाली औरतों के अविवेक का नतीजा थी—

कमलजीत सिंह और संदीप सिंह के विदेश जाने के बाद स्वराज कौर के घर में नोटों की बारिश जरूर होने लगी थी, पर अपनेअपने पति से दूर होने पर दोनों बहुओं की हरीभरी जिंदगी में सूखा पड़ गया था. यानी उन्हें पैसा तो भरपूर मिल रहा था पर पति के प्यार को तरस रही थीं.

कमलजीत और संदीप दोनों ही बड़े मिलनसार थे. अपने और आसपास के गांवों में उन का अच्छा उठनाबैठना था. इस कारण उन के कई यारदोस्त थे, जो उन की गैरमौजूदगी में घर का हालचाल जानने आ जाते थे. दिखावे के लिए तो वे सब स्वराज कौर की खैरखबर जानने के लिए आते थे, पर हकीकत यह थी कि उन की नजरें राजदीप और राजेंद्र कौर पर थीं.

अकबरपुर का अंचल कुमार उर्फ लवली बड़ी बहू राजेंद्र कौर को चाहने लगा तो वहीं राजदीप की आंखें गांव जलालपुर, होशियारपुर के गुरदीप सिंह से लड़ गईं. कुछ ही दिनों में उन के बीच अवैध संबंध बन गए.

राजेंद्र कौर अपने प्रेमी अंचल कुमार को रोज रात के समय अपनी कोठी पर बुला लेती थी. गुरदीप का गांव जलालपुर दूर था, इसलिए वह रोज न आ कर सप्ताह में 2-3 बार राजदीप कौर के पास आता था.

चूंकि राजेंद्र कौर और अंचल कुमार का मिलनेमिलाने का सिलसिला चल रहा था, इसलिए राजेंद्र कौर अपनी सास स्वराज कौर के रात के खाने में नींद की गोलियां मिला देती थी, ताकि सास को कुछ पता न चले.

लाख सावधानियों के बाद भी स्वराज कौर को अपनी बहुओं के बदले व्यवहार पर संदेह होने लगा. वह बारबार उन से गैरपुरुषों से बातचीत करने से मना करती थीं. पर वे सास की बात पर ध्यान नहीं देतीं. करीब 4 सालों तक उन के संबंध जारी रहे. इस बीच राजदीप कौर का प्रेमी गुरदीप नौकरी के लिए विदेश चला गया.

स्वराज कौर को गांव के लोगों से बहुओं की बदचलनी की बातें पता चलीं तो उन्होंने दोनों बहुओं को बहुत डांटा. तब दोनों बहुओं ने सास से लड़ाई भी की. स्वराज कौर ने झगड़े की बात अपने भाई प्रीतपाल को भी बता दी थी, साथ ही उस ने बहुओं को धमकी दी कि बेटों के सामने वह उन का भांडा फोड़ देंगी.

सास की इस धमकी से राजेंद्र कौर डर गई. उस ने अंचल के साथ मिल कर सास की हत्या की ऐसी योजना बनाई, जो हत्या न लग कर कोई दुर्घटना लगे. इस काम के लिए अंचल ने अपने एक दोस्त गुरमीत को भी योजना में शामिल कर लिया. 3-4 फरवरी, 2017 की रात राजेंद्र कौर ने स्वराज के खाने में नींद की गोलियां कुछ ज्यादा मात्रा में मिला दीं.

रात करीब 12 बजे राजेंद्र कौर ने अंचल को फोन कर दिया तो वह अपने दोस्त के साथ सीधा राजेंद्र कौर के कमरे पर पहुंचा. उस समय राजदीप कौर भी वहीं थी. चारों स्वराज के कमरे में पहुंचे. राजदीप कौर ने सोती हुई सास की टांगें कस कर पकड़ लीं और राजेंद्र कौर ने दोनों बाजू काबू कर लिए.

तभी अंचल ने तकिया स्वराज के मुंह पर रख कर दबाया. फिर उन के गले में चुन्नी का फंदा डाल कर दोस्त के साथ उस फंदे को कस दिया. कुछ ही पलों में स्वराज की मौत हो गई. इस के बाद अंचल ने अपने साथ लाई हुई लोहे की रौड से स्वराज के सिर पर वार कर घायल कर दिया.

स्वराज की हत्या के बाद उन्होंने घर की अलमारियों से सामान निकाल कर कमरे में फैला दिया, ताकि देखने में मामला लूटपाट का लगे. राजेंद्र कौर और राजदीप ने घर में रखे करीब 7 तोले के आभूषण और कुछ हजार रुपए निकाल कर अंचल को दे दिए. इस के बाद अंचल ने दिखावे के लिए दोनों के शरीर पर कुछ खरोंचे मार दीं, जिस से किसी को शक न हो.

रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने लोहे की रौड, ज्वैलरी व रुपए भी बरामद कर लिए. पुलिस ने चौथे आरोपी संदीप को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने चारों अभियुक्तों से पूछताछ कर उन्हें 7 फरवरी, 2017 को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

अपनी मां की हत्या की खबर सुन कर कमलजीत सिंह और संदीप सिंह जब अपने गांव आए तो मां की मौत का उन्हें बड़ा दुख हुआ.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अधेड़ उम्र की चाहत

‘‘अब तक तो उन्हें घर आ जाना चाहिए था, दिन निकल चुका है… न तो इन्हें खाने की सुध है और न ही घर के कामकाज की, बस जंगल की रखवाली की ही फिक्र रहती है.’’ घर के आंगन में झाड़ू लगाते हुए पति जमुना प्रसाद के खयाल में डूबी शांति के मन में जो विचार आ रहे थे, वह बके जा रही थी.

झाड़ू लगाने के बाद वह दरवाजे पर आ कर पति की राह देखने लगी थी. जी नहीं माना तो बेटे संजय को आवाज लगाती हुई बोली, ‘‘जरा जा कर जंगल की ओर तो देख आते कि तुम्हारे बापू अभी तक आए क्यों नहीं?’’

मां की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि संजय ने मां की बात को काटते हुए तपाक से कहा, ‘‘तुम भी मां सुबहसुबह चिल्लाना शुरू कर देती हो. जानती हो न, बापू को कोई मिल गया होगा पीनेखाने वाला, सो लेट हो गए होंगे. आते होंगे न, क्यों शोर मचा रही हो.’’

जमुना वन विभाग में चौकीदार था.

बेटे की बात सुन कर शांति देवी शांत हो कर बैठ गई थी, लेकिन उस का मन नहीं मान रहा था. न जाने क्यों उसे रहरह कर मन में कुछ गलत खयाल आ रहे थे, जिस से उस का जी घबराने लगा था.

कुछ देर बीता था कि जब उस का मन नहीं लगा तो वह धीरे से उठी और जंगल की ओर चल दी. वह घर से तकरीबन 200 मीटर की दूरी पर पहुंची ही थी कि अचानक जंगल से लगे रास्ते के किनारे पति जमुना की लाश देख कर वह दहाड़े मार कर रोने लगी.

शांति की चीखपुकार सुन कर मौके पर ग्रामीण जमा होने लगे थे. जंगल में शांति के पति जमुना की लाश देख कर हर कोई हैरान और परेशान था. किसी को कुछ समझ में नहीं आ पा रहा था कि उस की हत्या किस ने कर दी. शांति भी रोने के सिवा कुछ बोल नहीं पा रही थी.

जंगल में वन विभाग के चौकीदार की लाश मिलने की यह खबर कानोकान होते हुए हलिया थाने तक पहुंच गई थी. यह खबर पा कर एसएचओ संजीव कुमार सिंह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुंच गए.

पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो किसी वजनी पत्थर से हत्या करने का शक हुआ. वह अधेड़ उम्र का था. मृतक के घर वालों ने उस की शिनाख्त जमुना के रूप में कर ली. थानाप्रभारी ने हत्या के संबंध में वहां मौजूद लोगों से बात करने के बाद इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

सूचना पा कर वन क्षेत्राधिकारी रामनारायण जैसल, स्क्वायड टीम प्रभारी पवन कुमार सिंह, संतोष कुमार के साथ वहां पहुंच गए. सभी अधिकारी घटनास्थल का निरीक्षण करने लगे.

इस के बाद उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भिजवा दी. फिर मृतक जमुना के बेटे धर्मेंद्र कुमार की तरफ से भादंवि की धारा 302, 201 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर के जांच शुरू कर दी थी. यह बात शनिवार 4 फरवरी, 2023 की है.

मृतक की पहचान पहले ही वन विभाग के चौकीदार जमुना प्रसाद धरिकार (58 वर्ष) निवासी ग्राम फुलयारी के रूप में हो चुकी थी. जमुना वन विभाग के हलिया वन रेंज अंतर्गत चौराबीट जंगल में पेड़पौधों की रखवाली करता था. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि उस की हत्या किन परिस्थितियों में किस ने और क्यों की है?

पूछताछ के दौरान मृतक के घर वाले भी कुछ बता पाने में जहां असमर्थ थे, वहीं आसपास के लोग भी इस मामले से साफ पल्ला झाड़ रहे थे. ऐसे में पुलिस के सामने हत्या के कारणों को ले कर कई जटिल सवाल खड़े हो रहे थे. फिर भी पुलिस छानबीन की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश में जुट गई थी.

मीरजापुर के एसपी संतोष कुमार मिश्रा ने एएसपी श्रीकांत प्रजापति, एएसपी (औपरेशन) महेश अत्री व सीओ (लालगंज) की निगरानी में स्वाट टीम प्रभारी राजेश चौबे, इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस प्रभारी, एसओजी प्रभारी माधव सिंह एवं थाना हलिया की पुलिस टीमें गठित कर घटना का जल्द से जल्द खुलासा कर अभियुक्तों की गिरफ्तारी करने के निर्देश दिए.

उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले के हलिया थाना क्षेत्र में एक गांव है फुलयारी. यहीं का रहने वाला जमुना प्रसाद धरिकार वन विभाग में चौकीदार (वाचर) था. उस की ड्यूटी हलिया वन रेंज के चौराबीट में थी. चौराबीट जमुना के घर से तकरीबन 200 मीटर की दूरी पर है, जहां वह रोज पेड़पौधों की रखवाली के लिए जाया करता था और शाम होने पर अपने घर लौट आता था. यह उस की दिनचर्या थी.

3 फरवरी, 2023 को भी वह अपनी ड्यूटी के लिए निकल गया था, जो काफी रात होने के बाद भी घर नहीं लौटा था. उस की दूसरे दिन 4 फरवरी, 2023 को सुबह लाश मिली थी.

मीरजापुर जिले का हलिया थाना जिला मुख्यालय से तकरीबन 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. हलिया थाना और हलिया वन रेंज दोनों ही जिले के अंतिम छोर पर स्थित होने के साथसाथ मध्य प्रदेश की सीमा से लगते हैं.

यह इलाका उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का सरहदी इलाका भी कहलाता है. अपराध के साथसाथ हलिया वन रेंज क्षेत्र में रहने वाले दुर्लभ वन्यजीवों के लिए भी यह क्षेत्र सुविख्यात है. यहां तेंदुआ, मगरमच्छ, हिरन, भालू, जंगली सूअर, सांभर, अजगर सहित कई अन्य वन्य जीव पाए जाते हैं. इन में कुछ दुर्लभ वन्यजीव भी हैं.

यह जंगल कभी शेर और चीते की आवाजों से गूंजा करता था. दूरदूर तक फैले हरेभरे घनघोर जंगल और पहाड़ के चलते यहां लकड़ी माफियाओं से ले कर शिकारियों की भी आहट होती रहती है. ऐसे में इस क्षेत्र में पुलिस के साथसाथ वन विभाग द्वारा जंगली जीव और पेड़पौधों की सुरक्षा की खातिर व्यापक पैमाने पर वाचर (चौकीदारों) की तैनाती की गई है, जो पेड़पौधों की सुरक्षा से ले कर जंगली जीवजंतुओं के शिकार तथा पेड़ों के कटान पर नजर रखते हैं.

ऐसे में पुलिस टीम को वाचर जमुना प्रसाद की हत्या में शिकारियों या वन माफियाओं की संलिप्तता को ले कर भी संदेह बना हुआ था. इस संदेह के 2 कारण थे. पहला यह था कि शुक्रवार को जमुना जब घर से 200 मीटर दूर पौधरोपण की देखभाल करने के लिए गया था तो जंगल से कुछ लोग जलावनी लकडि़यों को काट कर ले जा रहे थे. उस ने उन लोगों को पकड़ कर काटी गई लकडि़यां और उन्हें काटने में प्रयुक्त होने वाली कुल्हाड़ी आदि अपने कब्जे में ले कर घर भिजवा दी थी.

उस के बाद वह फिर देखभाल करने के लिए जंगल में चला गया था, जहां से काफी देर होने के बाद भी वह घर नहीं लौटा था. शाम ढलने के बाद रात हो गई थी लेकिन उस का कुछ अतापता नहीं चला था. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. ऐसे में उस का इंतजार करतेकरते घर वाले रात काफी होने पर सो गए थे.

दूसरे जमुना प्रसाद पर एक साल पहले हमला हुआ था, जिस की शिकायत उस ने हलिया थाने में की थी. घर वालों से मिली इस जानकारी को ध्यान में रखते हुए पुलिस टीम इस पर भी नजर गड़ाए हुए थी.

जमुना प्रसाद के घर वालों से मिली जानकारी और एसपी के निर्देशन में गठित पुलिस टीमों द्वारा इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस एवं भौतिक साक्ष्यों के आधार पर छानबीन की जा रही थी कि इसी बीच मुखबिर की एक सूचना ने पुलिस टीम को मानो डूबते को तिनके का सहारा देते हुए इस घटना के खुलासे के करीब पहुंचने की राह दिखाई.

एसएचओ संजीव कुमार सिंह इस केस को ले कर उलझे हुए थे कि तभी उन का एक खास मुखबिर उन के पास आ कर बोला, ‘‘साहब, आप के लिए एक बहुत खास सूचना ले कर आया हूं?’’

‘‘…तो फिर बोलो पहेलियां क्यों बुझा रहे हो?’’

‘‘हुजूर, आप जिस बात को ले कर उलझन में पड़े हुए हैं उस उलझी हुई कड़ी की दूसरी कड़ी मृतक के घर से ही सुलझ सकती है.’’ वह बोला.

मुखबिर के मुंह से इतनी बात सुन कर एसएचओ उस की ओर मुखातिब होते हुए बोले, ‘‘मतलब मैं नहीं समझा कि तुम क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘साहब, सीधी सी बात है जमुना प्रसाद की हत्या का राज तो उस के घर में ही छिपा हुआ है.’’

इस के बाद मुखबिर ने सारी जानकारी उन्हें दे दी. मुखबिर की इस सूचना से संजीव कुमार सिंह के चेहरे पर खुशी के भाव दिखाई देने लगे थे. यह बात 10 फरवरी, 2023 की है. इस के बाद पुलिस टीम ने मृतक जमुना के दोनों बेटों संजय कुमार (30 वर्ष), बुद्धसेन (20 वर्ष) व फूलचंद्र धरिकार (50 वर्ष) निवासी फुलयारी को हिरासत में ले लिया. इन से जमुना की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो इन्होंने जमुना की हत्या करने का अपराध कुबूल कर लिया.

पूछताछ के बाद जमुना की हत्या की जो कहानी खुल कर सामने आई, वह न केवल हैरान कर देने वाली थी, बल्कि बापबेटी के समान ससुर और बहू के रिश्ते को तारतार कर देने वाली निकली, जो इस प्रकार से है—

फुलयारी गांव के रहने वाले जमुना प्रसाद धरिकार (58) का 5 बेटों और 4 बेटियों का भरापूरा परिवार था. बेटों और बेटियों का घर बसा कर जमुना अपने परिवार के साथ राजीखुशी से रह रहा था.

बेटे जहां मेहनतमजदूरी कर घर चला रहे थे तो वह वन विभाग में वाचर (चौकीदार) था. खापी कर सुबह जाता था तो शाम ढले घर लौट आया करता था.

एक दिन की बात है. रोज की तरह जमुना जल्दी से तैयार हो कर घर से निकलने ही वाला था कि तभी उस की पत्नी उस के पास आ कर बोली, ‘‘बस 5 मिनट रुको, बहू खाना ले कर आ रही है. कुछ खा लो तब जाना. मैं भी बकरियों को घास खिलाने ले जा रही हूं.’’

पत्नी की बात सुन कर जमुना रुक गया था. शांति घर से बाहर निकली थी कि तभी बेटे संजय की पत्नी सुमन भोजन की थाली ले कर आ खड़ी हुई थी. बहू के हाथ में भोजन की थाली देख कर जमुना ने भी सोचा कि जब बहू खाना ले ही आई तो खा लेता हूं. इस के बाद वह खाना खाने के लिए नीचे जमीन पर बिछी चटाई पर बैठ गया.

जमुना के चटाई पर बैठते ही सुमन भोजन की थाली नीचे रखने के लिए झुकी ही थी कि उस की साड़ी का पल्लू पूरी तरह से सरक कर नीचे आ गया, जिस से उस के गदराए बदन को देखते ही जमुना के तनमन में विचलन होने लगी थी.

झट से साड़ी का पल्लू संभालते हुए सुमन मारे शर्म से लालपीली होती हुई कमरे में चली गई तो वहीं जमुना उसे एकटक देखता ही रह गया था. खाना खाने के बाद जमुना बहू को आवाज लगाते हुए जंगल की ओर निकल तो गया था, लेकिन उस के दिलोदिमाग में बहू का गदराया बदन, उस के उभार उसे चैन से रहने नहीं दे रहे थे.

सुमन भी उस पल को याद कर शर्म से लाल हुए जा रही थी तो कभी साड़ी का पल्लू दांतों से दबाए हुए मन ही मन हंस पड़ती थी. 2 दिन बीते थे कि अचानक सुमन का सामना ससुर जमुना से हुआ तो वह उसी पल को याद कर शर्म से पानीपानी हुए जा रही थी, जबकि जमुना उसे एकटक देखे जा रहा था.

उस दिन शाम के समय जमुना जब काम से लौटा तो बहू को पानी के लिए आवाज लगाई. जैसे ही सुमन ने पानी भरा गिलास ससुर के आगे बढ़ाया तो जमुना ने गिलास के साथ बहू के हाथों को भी थाम लिया था. झट से हाथ छुड़ा कर सुमन मुसकान बिखेरते हुए चली गई थी. बहू की बस यही अदा जमुना को दीवाना कर गई थी.

फिर क्या था, जमुना अब अवसर की तलाश में जुट गया था. कुछ ही दिन बीते थे कि एक रोज जमुना दोपहर में ही घर लौट आया.

बेटे जहां कामधंधे पर निकले थे तो वहीं पत्नी शांति भी छोटी बेटी व बहू के साथ खेतों की ओर गई थी. घर में अकेली सुमन ही थी. वह भी घर के कामकाज से खाली हो कर आंगन में नहाने के लिए बैठी थी.

चूंकि उस दिन अचानक से हवा तेज होने से ठंड का असर बढ़ गया था सो उस ने यही सोचा कि थोड़ा धूप कड़क हो जाए तो नहाया जाए. सुमन जैसै ही सारे कपड़े उतार कर सिर्फ पेटीकोट पहने नहाने को हुई थी कि तभी अचानक से ससुर आंगन में आ गया. सामने बहू को उस अवस्था में देख जहां उस की आंखें फटी रह गईं तो वहीं बहू सुमन ने अपने उभारों को दोनों हाथों से ढकने का प्रयास करते हुए गरदन झुका ली.

यह देख कर झट से जमुना पीछे मुड़ा और घर की किवाड़, जो आते वक्त खुला हुई थी, को बंद कर वापस लौट आया. बिना देर किए उस ने बहू सुमन को बांहों में भर लिया और उस के बदन को सहलाने लगा.

ससुर की इस हरकत का सुमन ने विरोध करते हुए उस की बांहों की जकड़न से छूटने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘ब..ब.. बाबूजी, ये क्या कर रहे हैं आप? हटिए, छोडि़ए…’’

सुमन का इतना कहना था कि जमुना ने अपनी बांहों के बंधन को और मजबूत करते हुए उस के अधरों को चूमना शुरू कर दिया.

‘‘बाबूजी छोडि़ए, कोई आ गया तो…’’

उस की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि जमुना बोला, ‘‘इस की फिक्र मत करो, मैं ने किवाड़ की कुंडी चढ़ा दी है, जिसे तू चढ़ाना भूल गई थी.’’

इतना कह कर उस ने सुमन को गोद में उठा लिया. पहले तो सुमन ससुर की बांहों से मुक्त होने के लिए हाथपैर मार रही थी, लेकिन धीरेधीरे उस ने हाथपैर मारने बंद किए तो जमुना भी उस की मौन सहमति को समझ गया. फिर आंगन में ही बिछी चारपाई पर ले जा कर सुमन को लिटा दिया. इस के बाद उस ने अपनी हसरतें पूरी कीं.

जिस्मों की प्यास बुझी तो दोनों अलग हुए. एक बार यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर यह चलता ही रहा. दोनों को जब भी समय मिलता, दो जिस्म एक जान हो जाते थे.

ससुरबहू की इस लुकाछिपी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया. किसी तरह बात पत्नी शांति के कानों से होते हुए बेटे संजय तक पहुंच गई थी. फिर क्या था, पूरे घर में भूचाल आ गया था.

इस बात को ले कर घर में आए दिन कलह होने लगी. अंत में वही हुआ, जिस की जमुना ने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी.

काफी समझाने, घर की इज्जत का हवाला देने के बाद भी जब जमुना नहीं माना तो बेटे संजय ने अपने भाई बुद्धसेन को यह बात बताई.

पिता की इस करतूत ने दोनों भाइयों के खून में उबाल ला दिया. फिर उन्होंने अपने दोस्त और पड़ोसी फूलचंद्र धरिकार के साथ मिल कर पिता को ठिकाने लगाने की योजना बनाई.

फिर योजना के अनुसार संजय कुमार ने अपने भाई बुद्धसेन व पड़ोसी फूलचंद्र धरिकार के साथ मिल कर घर पर ही पिता के सिर पर पत्थर से प्रहार कर हत्या कर दिया. किसी को शक न हो, इसलिए शव को घर से कुछ दूरी पर ले जा कर डाल दिया था और हत्या में प्रयुक्त पत्थर भी छिपा दिया.

पुलिस ने संजय कुमार, बुद्धसेन व फूलचंद्र धरिकार से पूछताछ के बाद इन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पत्थर भी बरामद कर लिया इस के बाद सभी आरोपियों को सक्षम न्यायालय में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया है.

एसपी संतोष कुमार मिश्रा ने केस का खुलासा करने वाली टीम को पुरस्कृत करने की घोषणा करने के साथ पीठ भी थपथपाई.       द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कुछ पात्रों के नाम काल्पनिक हैं

प्रेमी के कारण तनु ने भाई को मारा

आटासाटा सामाजिक रीति के अनुसार चित्तौड़गढ़ में भाई बहन महेंद्र और तनु की शादी की तारीखें इसी साल फरवरी की तय हो चुकी थीं. इस रीति के मुताबिक महेंद्र की जिस लड़की से शादी होनी थी, उस के भाई से तनु की शादी होनी तय हुई थी. दोनों की शादी के लिए तारीखें और विवाह कार्यक्रम नवंबर 2022 में ही तय हो गए थे. अब परिवार में सिर्फ रस्मों की अदायगी का इंतजार था.

तैयारियां शुरू हो गई थीं. महेंद्र ब्याह होने को ले कर खुश था. मन में शादी के लड्डू फूटने लगे थे. उस की शादी मनपसंद सुंदर लड़की से तय हुई थी. महेंद्र ने उसे शादी से पहले ही पसंद कर लिया था.

गोविंद मध्य प्रदेश के जिला मंदसौर के गांव राइका गरोठ के रहने वाले थे, जो इस समय भाटखेड़ा में रह रहे थे. उन के 3 बच्चों में बेटा महेंद्र के अलावा उस से छोटी 2 बेटियां तनु और तनिष्का थीं. उन का साधारण खातापीता परिवार था. वह कपड़े धुलाई का पुश्तैनी काम कर रहे थे.

इस शादी को ले कर पूरे परिवार में काफी खुशी का माहौल बन गया था. सभी के चेहरे पर चमक थी और वे शादी की तैयारियों में जुट गए थे. इस शादी को ले कर अगर किसी के मन में दुविधा या नापसंद की बात थी तो वह थी तनु.

जब से उस की शादी की तारीख तय हुई थी, तभी से उस के दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं और दिमाग में हलचल मची हुई थी. दरअसल, वह इस शादी को नहीं करना चाहती थी. हालांकि ऐसा भी नहीं था कि उस के मातापिता और भाई ने जो रिश्ता तय किया था, वह खोटा था. इस बारे में तनु ने पहले अपनी छोटी बहन से बात की. इस पर बहन ने तपाक से सुझाव दिया कि अगर उसे यह शादी पसंद नहीं है तो मां को बता दे.

तनु बड़ी हिम्मत कर मां आजोदिया बाई से बोली, ‘‘मां, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती हूं.’’

यह सुनते ही मां तड़ाक से बोलने लगी, ‘‘शादी नहीं करना चाहती है? क्यों नहीं करना चाहती है अभी? यह क्या बात हुई. तुम्हारे चलते महेंद्र कुंवारा बैठा रहेगा? और फिर तुम्हारी शादी होने के बाद ही तो छोटी बहन की शादी हो पाएगी? मैं देख रही हूं कि जब से तू ननिहाल से आई है, तेरे तो रंगढंग ही बदल गए हैं.’’

मां की तेज आवाज महेंद्र के कानों में भी पड़ी. वह तुरंत मां के पास आया और बोला, ‘‘क्या हो गया मां?’’

‘‘अरे देख तो इस छोरी के… इस के लक्षण ठीक न लागे सै… बोले सै अभी शादी ना करेगी… काहे ना करैगी?…ऐसे होवे सै का!… तू ही समझा इसे…बापू सुनेगा तो बहुत नाराज हो जावेगा… आ वह परिवार वाला का सोचेगा? समझा!’’

महेंद्र को समझते देर न लगी. वह भी मां के लहजे में बोल पड़ा, ‘‘माई सा, इसे मैं बहुत समझा चुका. इस का कुछ न होवेगा…हम सब की नाक कटावेगी छोरी.’’

‘‘नाक कटावेगी…तैं का बोले सैं?’’ मां आश्चर्य से बोली.

‘‘हां माई सा! छोरी के दू साल से नैन मटक्का चल रहे सै!… ओहे संग ब्याह रचैहें!…हमरे औ बापू से बोले के हिम्मत ना सै, तभी ताहे से विनती करै…!’’

महेंद्र की मां से बात हो ही रही थी. तनु तब किसी को कुछ न बोली और पैर पटकती हुई घर से बाहर चली गई. यह 3 साल पहले की बात है.

तनु उर्फ तनिष्का राइका भी भाई महेंद्र, मां आजोदिया बाई और छोटी बहन के साथ भाटखेड़ा में अपने मामा शांतिलाल राइका के यहां रह रही थी. वहीं धोबियों के मोहल्ले में गंगरार निवासी महावीर धोबी का भी घर है. उस का महेंद्र के पास आनाजाना शुरू हुआ, तब वह तनु को देखते ही उस पर फिदा हो गया था. बाद में तनु भी उसे प्यार करने लगी.

उन्हीं दिनों रक्षाबंधन का त्यौहार आया. महावीर ने होशियारी दिखाते हुए महेंद्र के सामने ही तनु की छोटी बहन से राखी बंधवा ली. उस वक्त तनु खुशी से बोल पड़ी, ‘‘यह बहुत अच्छा हुआ महेंद्र भैया, हमें एक और भाई मिल गया. आज से महावीर हम सभी का धर्मभाई बन गया है.’’

तनु और महावीर धर्मभाई और धर्मबहन की आड़ ले कर रासलीला में लगे रहे. उन के बीच फोन पर लगातार बातें होने लगीं.

एक दिन महेंद्र ने दोनों को चूमते हुए देख लिया था. वे घर में एकदूसरे से लिपटे हुए चूम रहे थे. उस वक्त तो महेंद्र किसी तरह से खुद को काबू में किया, लेकिन उस के जाते ही बहन पर बरस पड़ा, ‘‘तनु, तू हम सब की आंख में धूल झोंकै सै…अभी माई को बताता हूं.’’

‘‘ना ना वीरा! तैने गलत समझे!’’ तनु ने सफाई देनी चाही.

‘‘का गलत और का सही, सब कुछ आंखन के सामने सै…’’ महेंद्र बोला.

‘‘ना वीरा, ना! उस को थोड़ा पैसा चाहो. वही हम इंतजाम करे का वादो कियो…और वह खुशी में गले लाग गयो.’’ तनु मासूमियत से बोली.

महेंद्र भी बहन की बातों में आ गया. सिर्फ इतना पूछा उसे कितना पैसा चाहिए.

तनु ने कहा कि 40 हजार. महेंद्र तब बोला कि यह तो बहुत है. इस पर तनु उस की तारीफ करती हुई बोली कि वह कितना कुछ उन के लिए करता है. एक आवाज में मदद करने को आ जाता है. हम सभी उस पर भरोसा करते हैं.

महेंद्र भी जब ठंडे दिमाग से महावीर के बारे में सोचने लगा, तब उसे एहसास हुआ कि वह भी किसी न किसी रूप में उस के सहयोग के एहसान तले दबा हुआ है. उस ने उसे भी कोरोना के दौरान कामधंधा कम हो जाने की स्थिति में मदद पहुंचाई थी. महावीर उस के भी खास दोस्तों में से एक था.

भाई बन रहा था रुकावट

तनु से महावीर ने कर्ज के तौर पर 40 हजार रुपए लिए थे, जिस की जानकारी महेंद्र को भी थी. कई माह हो जाने के बाद भी जब महावीर ने कर्ज के पैसे तनु को वापस नहीं लौटाए, तब उस का तकादा महेंद्र भी करने लगा.

पैसे के लिए बारबार तकादा किए जाने के चलते महावीर ने महेंद्र के घर आनाजाना बंद कर दिया, लेकिन फोन पर तनु से बातचीत जारी रखी. उन के बीच प्रेम के साथसाथ एकदूसरे संग शादी रचाने की हूक उठी हुई थी. तनु को कर्ज के पैसे की चिंता नहीं थी. वह चाहती थी कि महावीर संग उस का ब्याह हो जाए. किंतु सामाजिक और पारिवारिक विसंगतियों के चलते उन की शादी में कई बाधाएं थीं.

सब से बड़ी बाधा उस के परिवार को ले कर ही थी. परिवार में महेंद्र की उज्जैन में शादी की बात चल रही थी. वे दहेज की बातें भी कर रहे थे, लेकिन जहां महेंद्र की शादी तय होने वाली थी, वहां के लड़की वालों ने एक शर्त रखी कि वह दहेज की रकम नहीं दे पाएंगे, किंतु आटासाटा में अपने बेटे की शादी उस परिवार की किसी लड़की से जरूर करना चाहेंगे.

यह बात महेंद्र के मातापिता को जम गई. उन्होंने तनु की शादी भी महेंद्र के साथसाथ तय कर दी. तनु किसी भी सूरत में वह शादी रोकना चाहती थी. जबकि आटासाटा में शादी तय होने का मतलब था, उस की शादी टूटती तो महेंद्र की शादी भी टूट जाती. जो महेंद्र कतई नहीं चाहता था.

तनु परेशान हो गई. बहन की सलाह पर उस ने मां से बात करने की कोशिश की, लेकिन सब से बड़ी बाधा महेंद्र ही बन गया.

तनु की तरह महावीर भी परेशान हो गया था. वह भी हर सूरत में तनु से ही शादी करना चाहता था. उस ने कुछ सोचविचार कर 11 नवंबर, 2022 को तनु के घर गया. महेंद्र से मिला. महेंद्र उसे कई हफ्ते बाद घर आया देख कर्ज के पैसे मांगते हुए बोला, ‘‘तूने जो उधार लिए, वह पैसे लौटा दे. हमारे घर में शादी होने वाली है.’’

महावीर सहम गया, लेकिन नरमी के साथ बोला, ‘‘देखो भाई, मेरे पास उतने पैसे नहीं हैं. वैसे मैं तुम से अपनी शादी की बात करने आया हूं. तू हां कर देगा तो मेरा कर्ज भी उतर जाएगा और मेरे साथ तुम्हारी बहन भी खुश हो जाएगी.’’

‘‘मैं समझ गया तू क्या चाहता है? लेकिन सुन, वह मेरे जीते जी तो नहीं होने वाला है.’’ महेंद्र की नाराजगी कम नहीं हुई थी.

‘‘तो फिर देख ले, मैं भी जिद्दी किस्म का इंसान हूं. जो ठान लेता हूं वह हासिल कर ही छोड़ता हूं.’’ यह कहता हुआ महावीर जाने लगा, लेकिन जातेजाते बोल गया कि वह ठंडे दिमाग से उस की बात पर सोचे. तनु की शादी उस के साथ होने में ही सब के लिए अच्छा होगा.

जब से महेंद्र को लगा कि उस की शादी तनु और महावीर के चलते रुक सकती है, तब उस ने शादी में और जल्दबाजी कर दी. पंडित से पंचांगपत्रा दिखा कर फटाफट तारीखें निकलवा लीं.

दूसरी तरफ इन सब चीजों से परेशान हो कर तनु और महावीर ने महेंद्र को ही रास्ते से हटाने का प्लान बना लिया. उन्होंने ऐसा प्लान बनाया, ताकि वे पकड़े भी न जाएं. वे अपने प्लान में सफल भी हो गए, लेकिन पुलिस की गहन जांच से बच नहीं पाए. यहां तक कि तनु भी अपने परिवार को काफी गुमराह करती रही, लेकिन उस का भेद जब खुला, तब भाई और बहन के बीच पवित्र प्रेम पर भी खून का दाग लग गया.

गंगरार कस्बे की पुलिस 5 दिसंबर, 2022 को तब चौकन्नी हो गई, जब वहां के एसएचओ शिवलाल मीणा को हनुमान मंदिर के पीछे की तरफ करीब 200 फीट गहरे कुएं में अज्ञात व्यक्ति का सिर कटा धड़ होने की सूचना मिली.

यह सूचना एक राहगीर ने उस में से आ रही दुर्गंध फैलने पर दी थी. पुलिस ने काररवाई शुरू की. पुलिस टीम ने पहले लाश को कुएं से निकलवाया. उस की शिनाख्त की जाने लगी, लेकिन बगैर सिर के उसे पहचानना आसान नहीं था. हालांकि अगले दिन उस का सिर भी बरामद कर लिया गया.

प्रेमी की खातिर भाई को निपटाया

शव की शिनाख्त भी नाटकीय ढंग से हो पाई. शव को जब फिनाइल से साफ किया गया तब मृतक की बांह पर कुछ लिखा दिखा, जो पढ़ने में नहीं आ रहा था. पुलिस ने टौर्च की लाइट में देख कर कमलेश राइका पढ़ लिया. वहीं खड़ा महावीर एकदम से यह बोल उठा कि यह कमलेश नहीं बल्कि महेंद्र राइका लिखा हुआ है. इस तरह नाम के सही ढंग से पढ़ने पर पुलिस को तभी महावीर पर शक हो गया और उस पर नजर रखी जाने लगी.

शव की पहचान महेंद्र राइका के रूप में हो जरूर गई थी, लेकिन उस की मौत के बारे में खुलासा होना बाकी था. एसपी राजन दुष्यंत और एएसपी अर्जुन सिंह ने इस केस को गंभीरता से लिया.

डीएसपी भवानी सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई गई. टीम में एसएचओ शिवलाल मीणा (थाना गंगरार), एएसआई नगजीराम, भैरूलाल, अमीचंद, हैडकांस्टेबल धर्मेंद्र, नरेंद्र व कांस्टेबल धर्मपाल, ओमप्रकाश, भीवाराम, माधवलाल, रोशनलाल, कालूराम, मनीष, वेदराम, राजेश, राजकुमार, कांस्टेबल राम अवतार, कमलेश, प्रवीण आदि को शामिल किया गया. टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए.

जांच के बाद टीम ने मृतक महेंद्र की बहन तनु, उस के प्रेमी महावीर समेत एक अन्य महेंद्र को हिरासत में ले लिया. तीनों से पुलिस द्वारा अलगअलग पूछताछ की गई. जल्द ही उन्होंने महेंद्र के मारे जाने की बात स्वीकार कर ली.

महावीर ने बताया कि इस हत्या की साजिश महेंद्र की बहन तनु ने रची थी और इस वारदात में उस का दोस्त गंगरार के ही रहने वाले पन्नालाल धोबी का बेटा महेंद्र धोबी समेत एक नाबालिग भी है.

पूछताछ में पता चला कि 12 नवंबर को तनु और उस की छोटी बहन को बुआ के घर बर्थडे पार्टी के लिए कोटा जाना था. महावीर ने दोनों बहनों को अपनी वैन से गंगरार से चित्तौड़ शहर तक छोड़ दिया. उस दिन तनु ने महावीर से कहा था कि कोटा से लौटने के दिन ही महेंद्र को मारना है.

16 नवंबर को तनु छोटी बहन के साथ कोटा से घर लौट रही थी. इस की जानकारी तनु ने अपने भाई महेंद्र को फोन पर दे कर कहा कि वह महावीर की बाइक ले कर हमें लेने के लिए गंगरार चौराहे पर आ जाए. उसी समय तनु ने महेंद्र की लोकेशन महावीर को बता दी. महेंद्र घर से पैदल ही गंगरार के लिए रवाना हो गया.

महावीर अपनी वैन ले कर भाटखेड़ा की तरफ गया. रास्ते में उसे महेंद्र मिल गया. उसे वैन में बैठा कर अपने साथ ले कर चल पड़ा. बातों में फंसाकर उसे गंगरार किले पर हनुमान मंदिर के पास ले गया. महेंद्र को गांजा पीने की आदत थी. इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए महावीर ने कहा कि अभी तनु के गंगरार चौराहे तक आने में वक्त लगेगा तो क्यों न 2-4 कश गांजे का ले लें.

इस पर महेंद्र राजी हो गया और उस के साथ किले की ओर चल पड़ा. इसी बीच महावीर ने अपने दोनों साथियों महेंद्र धोबी व नाबालिग को गांजा ले कर आने के लिए बोल दिया. वहां पर चारों ने मिल कर गांजा पीया और महेंद्र को सारणेश्वर महादेव मंदिर के आगे सुनसान जगह पर ले गए.

अंधेरा होने के बाद तीनों ने मिल कर गमछा (तौलिया) से महेंद्र का गला घोट दिया तथा लाश को ठिकाने लगाने के लिए बिजली के वायर से हाथ व पैर बांध दिए. आरोपियों ने बताया कि हत्या करने के बाद रात करीब 10-11 बजे लाश को किले पर ले जा कर किले के पीछे स्थित कुएं में डाल दिया और अपनेअपने घर चले गए. कुएं में डालने के समय महेंद्र का सिर उस के धड़ से अलग हो गया. लाश गिराने पर सिर धड़ से अलग होने की बात पुलिस के भी गले नहीं उतरी थी.

प्लान के बाद पकड़े जाने से बचने के लिए महेंद्र का फोन बंद कर दिया और 5 दिन बाद 21 नवंबर को महावीर अपने मोबाइल को गंगरार में रख कर महेंद्र के मोबाइल को ले कर चित्तौड़गढ़ से ट्रेन द्वारा मंदसौर चला गया. मंदसौर रेलवे स्टेशन पर उतर कर महाराणा प्रताप सर्किल के पास मोबाइल औन कर तनु को फोन किया. तनु से बातचीत करने के बाद फोन को फेंक दिया. फिर सीधा गंगरार आ गया.

महावीर सामान्य बना रहा. तनु के परिवार वालों से मिलताजुलता रहा. तनु ने अपनी मां और छोटी बहन को गुमराह करने के लिए कहा कि 21 नवंबर को महेंद्र ने उसे फोन किया था और वह मंदसौर की तरफ एक ट्रक में है, जबकि महेंद्र की हत्या 16 नवंबर, 2023 को ही हो चुकी थी.

इस तरह से महेंद्र हत्याकांड में शामिल चारों आरोपियों से पूछताछ करने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर दिया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.      द्य

प्रेमिका ने अपने बच्चे को मारा

बिजनौर जिले में एक कस्बा है नगीना. इसी कस्बे के भीड़भाड़ वाले इस इलाके में रात के 9 बजे एक युवती सड़क पर अचानक चिल्लाने लगी, ‘‘पकड़ो… पकड़ो… भाग गया… बदमाश भाग गया… ले कर भाग गया.’’

उस के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुन कर कुछ लोग उस के पास आ गए. पूछा, ‘‘अरे, क्या हुआ? क्यों चिल्ला रही हो?’’

‘‘बदमाश भाग गया… मेरा बच्चा ले कर भाग गया?’’ युवती बोली और सामने की ओर अंगुली उठा दी.

‘‘लेकिन उस ओर तो कोई नहीं दिख रहा और आगे का रास्ता भी बंद है.’’ एक व्यक्ति बोला.

‘‘अरे, वहीं पहले की गली में बाइक से भागा है बदमाश. मेरी गोद से बच्चा झपट्टा मार कर छीन ले गया,’’ युवती बोली और सिर पकड़ कर बैठ गई.

वहां मौजूद लोगों को हैरानी हुई. अभी तक राह चलती महिला के पर्स या गहने छीन कर भागने की बातें तो सुनी थीं, लेकिन बच्चा छीनने की बात पहली बार सुनने को मिली थी. एक व्यक्ति ने पूछा, ‘‘कितना बड़ा बच्चा था?’’

दूसरा बोला, ‘‘कौन लोग थे? कितने लोग थे? वे तुम्हारे जानने वाले थे…या कोई और?’’

‘‘आप लोग मुझ से ही सवाल करते रहोगे या कुछ करोगे भी,’’ देखने में अच्छीभली दिख रही युवती बिफरती हुई बोली.

उसी वक्त रात की गश्त पर निकली पुलिस कुछ लोगों की भीड़ देख कर पहुंच गई. पुलिस को लोगों ने युवती के साथ कुछ समय पहले की घटित घटना के बारे में बताया.

युवती ने भी पुलिस को वही सब बताया. वह अपने 6 महीने के बच्चे को गोद में लिए डाक्टर के पास जा रही थी. उस के पास अचानक एक बाइक आ कर रुकी. उस पर 2 लोग बैठे थे. वे हेल्मेट लगाए हुए थे. मेरे कुछ कहनेपूछने से पहले बाइक के पीछे बैठा बदमाश मेरी गोद से बच्चे को झपट्टा मार कर छीन लिया और फिर वे बाइक भगा ले गए.

‘‘तुम कहां से आ रही थी?’’ बाइक से गश्त लगाने वाली पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, लाहौरी सराय मोहल्ले से.’’ युवती बोली.

‘‘तुम्हारा क्या नाम है?’’

‘‘खुदशिया तामजी, लेकिन परिवार में मुझे अफशा के नाम से जानते हैं. वहां मेरी ससुराल है. मेरे बेटे का नाम अरहान है.’’ युवती ने बताया.

‘‘बाइक का नंबर देखा था?’’ पुलिस वाले का अगला सवाल था.

‘‘जी नहीं.’’

‘‘कैसी बाइक थी?’’

‘‘काले रंग की. उसे चलाने वाला जींस पहने हुए मटमैला शर्ट पहने हुए था. पीछे बैठे बदमाश ने भी उसी तरह के कपड़े पहन रखे थे.’’

युवती से पूरी जानकारी नोट कर गश्त लगाने वाली पुलिस ने तुरंत इस घटना की सूचना नगीना थाने को भेज दी. उस वक्त एसएचओ प्रिंस शर्मा थाने पर ही मौजूद थे. सूचना मिलते ही वह एसआई देवेंद्र सिंह, कुलदीप राणा और 2 सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी अफशा से पूछताछ की. वह एक ही रट लगाए हुए थी, ‘‘मेरे अरहान को बदमाश ले कर भाग गए.’’

पुलिस ने कर दी नाकेबंदी

उस के इस बयान पर उन्होंने भी बच्चे के अपहरण का मामला दर्ज कर लिया. एसएचओ ने इस घटना की जानकारी एसपी (बिजनौर) दिनेश सिंह और एसपी (सिटी) प्रवीन रंजन सिंह को भी दे दी. यह बात 31 अगस्त, 2022 की है.

एसपी का निर्देश पा कर थाना पुलिस हरकत में आ गई. आसपास के नाकों पर अपनी निगाह गड़ा दी. मामला बच्चे के अपहरण का था. प्रिंस शर्मा ने अपहृत बच्चे की मां अफशा से पूछा, ‘‘देखो, मुझ से कुछ मत छिपाना. तुम्हारी अगर किसी से दुश्मनी है तो साफसाफ उस के बारे में बताओ. उस की पूरी जानकारी दो, तभी हम बच्चे को वापस ला पाएंगे.’’

इस बारे में अफशा कुछ नहीं बोली. उस की चुप्पी पर उन्होंने फिर पूछा, ‘‘तुम्हारी हालत देख कर तो ऐसा नहीं लगता है कि बच्चे का अपहरण फिरौती के लिए किया गया है. फिर भी बताओ, तुम्हारी पारिवारिक स्थिति कैसी है? तुम्हारे शौहर क्या करते हैं? परिवार में कौनकौन है? तुम्हारे परिवार में कोई ऐसा तो नहीं, जिसे लंबे समय से कोई औलाद न हुई हो?’’

इतने सारे सवालों से अफशा घबरा गई. सामान्य होने पर बताया कि उस का शौहर नौकरी के लिए सऊदी गया हुआ है. शादी से पहले से वहीं रहता है. सिर्फ शादी करने के लिए 2 साल पहले आया था और शादी के तुरंत बाद वापस लौट गया था. वहां जाते ही कोरोना का लौकडाउन लग गया था. पूरे साल भर बाद आया और कुछ दिन रह कर फिर चला गया.

अफशा की बातों से एसएचओ समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बच्चे के अपहरण का क्या मकसद रहा होगा. उस की बातचीत से उन्हें उस के द्वारा गुमराह करने का भी संदेह हो रहा था. खैर, उस वक्त उसे बच्चा जल्द सकुशल वापस लाने का आश्वासन दे कर घर भेज दिया.

अगले दिन पहली सितंबर, 2022 की सुबह पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों को चैक करवाया. उन की फुटेज में अफशा दिख गई. उस के साथ एक 8-9 साल की लड़की भी थी. उस के हाथ में एक बच्चा भी था. अगली फुटेज में वह बच्चे को बहते नाले में फेंकती दिखाई दी, जो उस के घर से 200 मीटर दूर बारात घर के पास था.

पुलिस तुरंत नाले के पास जा पहुंची. बच्चा वहीं नाले में पड़ा मिल गया. वह बहते हुए पानी के साथ प्लास्टिक कचरे के सहारे किनारे पर अटका हुआ था. उसे तुरंत बाहर निकाला गया. वह मर चुका था.

एसएचओ को मामला समझते हुए देर नहीं लगी. उन्होंने अफशा को तुरंत पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. पुलिस उस के साथ सख्ती दिखाते हुए जबरदस्त झाड़ लगाई और सीसीटीवी फुटेज के बारे में जानकारी दी.

सच्चाई आई इस तरह सामने

कैमरे में उस की वीडियो रिकौर्डिंग देख कर वह डर गई. उस ने हाथ जोड़ लिए. वह महिला पुलिस के पैरों पर गिर कर रोने लगी. गिड़गिड़ाने लगी. उस की इस हालत को देख कर थोड़ी देर के लिए पुलिस समझ नहीं पाई कि उस का रोनाधोना बच्चे के मरने के कारण है या फिर उस की चोरी और हरकत पकड़े जाने की वजह से है.

वह जल्द ही सामान्य हो गई. एसएचओ ने उसे अपने सामने कुरसी पर बिठा कर सचसच बताने के लिए कहा.

अफशा के पछतावे के आंसू देख कर एसएचओ प्रिंस शर्मा ने कहा कि उस के सच बताने पर उस ने जो भी जुर्म किया होगा, उस की सजा कम हो सकती है. माफी भी मिल सकती है.

कहते हैं न मरता क्या नहीं करता. ऐसी स्थिति अफशा की थी. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया और सब कुछ बताने को तैयार हो गई. उस के बाद जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

अफशा निकाह कर 2 साल पहले अपनी ससुराल नगीना के लाहौरी सराय आई थी. उस का शौहर आसिफ बीते 5 सालों से सऊदी अरब में काम कर रहा था. वह बीचबीच में साल में एक बार घर आ जाता था और हफ्ते 2 हफ्ते रुक कर अपने काम पर चला जाता था. घटना के 6 माह पहले ही अफशा उस के बच्चे की मां बनी थी.

अफशा बच्चा पा कर बहुत खुश थी. उस का शौहर भी यह खबर सुन कर बहुत खुश हो गया. आसिफ की गैरमौजूदगी में आसिफ के परिवार वालों ने बच्चे के जन्म की खुशी में दावत का आयोजन किया था. उस समय उस का नाम अरहान रखा गया था. उस की वजह से पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई थी.

शौहर सऊदी में, बीवी कैसे संभाले जवानी

सिर्फ परिवार में किसी के आने का इंतजार तो आसिफ का था. उसे सऊदी में छुट्टी नहीं मिल पा रही थी. अफशा मन मसोस कर रह गई थी. उस के दिन तनहाई में बीत रहे थे. महीनों से पुरुष संसर्ग से वंचित थी. बच्चे के  जन्म के बाद उस का बदन और खिल उठा था. तंदुरुस्त दिखने लगी थी. देह की मांसलता, सुंदरता और सैक्स अपील किसी की निगाह में तुरंत आ जाती थी.

वैसे उस का मायका मुरादाबाद के ऊमरीकलां गांव में था. लेकिन मायके वाले मुरादाबाद के मंगल बाजार में रहते थे. शादी से पहले से ही अफशा पूरे मोहल्ले में इधरउधर घूमती रहने के चलते लड़कों के बीच चर्चित थी. कुछ लोगों को उस का चालचलन ठीक नहीं लगता था.

वहीं उस के चाहने वाले भी कम नहीं थे. उन्हीं में एक सलीम भी था, जो ऊमरीकलां का ही रहने वाला था. उस ने शादी से पहले अफशा से अपने दिल की बात कही थी, लेकिन तब तक उस का निकाह तय हो चुका था. सलीम उस का एक तरह से सच्चा प्रेमी था, उस ने अपनी प्रेमिका के अच्छे भविष्य और विदेश में नौकरी करने वाले पति के लिए अपने दिल पर पत्थर रख लिया था.

जबकि सच तो यह था कि सलीम और अफशा एकदूसरे के प्रेम को भूल नहीं पाए थे. सलीम अकसर अफशा की ससुराल लाहौरी सराय चला जाता था. वह मायके वालों की तरफ से परिवार से मिलता था और अफशा से अपने दिल की बातें किया करता था. सलीम अफशा के ससुराल वालों की नजर में भाईजान बना हुआ था. दोनों कई बार मौका देख कर नैनीताल आदि घूम आए थे. वहां उन्हें होटलों में ठहरने का मौका मिल गया था.

यह सिलसिला अफशा के मां बनने के बाद भी चलता रहा. उस के बाद से तो मानो ससुराल वालों की तरफ से उन दोनों को छूट मिल गई थी. एक बार सलीम बोला, ‘‘अरे यार, हम लोग कब तक ऐसे बहाने बना कर और छिपते हुए मिलते रहेंगे. मैं चाहता हूं कि तुम से निकाह कर हमेशा के लिए तुम्हें बना लूं.’’

‘‘अब कैसे मुमकिन है? मेरी गोद में आसिफ का बच्चा भी है.’’ अफशा बोली और बगल में बेफिक्री से सो रहे बच्चे पर एक नजर डाली.

‘‘उस के बारे में भी सोचता हूं.’’ सलीम यह कहता हुआ होटल के कमरे से बाहर निकल गया.

थोड़ी देर में ही कुछ खाने का सामान ले कर वापस लौट आया. उस वक्त अफशा बच्चे को दूध पिला रही थी. उस ने मजाक किया, ‘‘पूरे डेढ़ महीने बाद हमारा मिलना हुआ है. और तुम हो कि बच्चे में ही उलझी हो…’’

‘‘क्या करूं, यही मेरे दिल का टुकड़ा है.’’

‘‘और मैं?’’

‘‘अरे तुम तो मेरा दिल हो, जिस में मेरी जान बसती है,’’ अफशा भी सलीम से मजाकिया अंदाज में बोली.

‘‘हमारे आज के रोमांस का क्या होगा?’’ सलीम ने प्रश्न किया. तभी बच्चा रोने लगा. अफशा उसे चुप कराने लगी. लेकिन वह चुप ही नहीं हो रहा था.

‘‘हमारे प्यार में तुम्हारा बेटा ही बाधक बन गया है,’’ सलीम रोते बच्चे को देख कर बोला.

‘‘तो क्या करूं इस का? लगता है इसे कुछ तकलीफ है. कल सुबह डाक्टर को दिखाना होगा.’’

‘‘…और आज रात हमारी यूं ही कटेगी..’’ सलीम सांसें लेता हुआ बोला और वहीं पास बिछावन पर लेट गया. आधी रात को दोनों आलिंगनबद्ध थे कि बच्चा अचानक फिर से रोने लगा. ऐसे में उन का संसर्ग अधूरा रह गया. दोनों खिन्न हो गए. उन के चेहरे पर बच्चे को ले कर सवाल उभर आया था. सलीम ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘इस का कुछ करो वरना!’’

मिलन में खलल बना बच्चा

अगले रोज अफशा बच्चे के साथ ससुराल आ गई. सलीम भी अपने घर लौट गया. दोनों के मन पर एक बोझ बना हुआ था. अफशा से विदा होते हुए सलीम ने पूछा, ‘‘बच्चे को कहीं ठिकाने नहीं लगाया जा सकता?’’

इस पर कुछ बोले बगैर अफशा अपनी ससुराल आ गई, लेकिन उस के दिमाग में बच्चे को ठिकाने लगाने का सवाल बना रहा. सलीम के साथ गुजारी उस रात में बच्चे को ले कर आई बाधा उस के दिमाग से निकल ही नहीं रही थी. उस बारे में सोचसोच कर वह उलझती ही जा रही थी. एक तरफ विदेश में बैठा उस का शौहर था तो दूसरी तरफ उस पर प्यार न्यौछावर करने वाला प्रेमी सलीम. वह अफशा पर दिल खोल कर खर्च करता था. उस के लिए मर मिटने की कसमें खाता था.

शादीशुदा अफशा भी आशिकी में कुछ भी करने को तैयार थी. सलीम की बच्चे को ठिकाने लगाने वाली बात उस के दिमाग से निकल ही नहीं पा रही थी. इसी बीच दिमाग में एक सवाल उभरा, ‘‘कैसे?’’

इसी के साथ उस ने पास में सो रहे बच्चे पर एक नजर डाली. दिमाग में खुराफाती विचार आए और उस ने तुरंत एक योजना बना ली.

अगले पल ही उस ने सलीम को फोन किया और उसे साजिश की योजना बता दी. अफशा की योजना सुन कर सलीम भी उछल पड़ा. फोन पर ही बोला, ‘‘इस से तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.’’

योजना के मुताबिक, अफशा 31 अगस्त, 2022 की रात साढ़े 8 बजे बेरहम बन गई. दिल को मजबूत किया. इश्क का भूत उस के दिलोदिमाग पर इस कदर हावी था कि उस ने गहरी नींद में सो रहे बच्चे का गला दबा दिया. चंद मिनटों में ही बच्चा बेजान हो गया.

उस के बाद योजना के मुताबिक घर में काम करने वाली नौकरानी सुमैया से बच्चे को डाक्टर से दिखाने के लिए साथ चलने को बोली. घर से थोड़ी दूर पर जा कर उस ने नौकरानी को घर वापस जाने के लिए कहा.

नौकरानी के चले जाने के बाद अफशा ने मृत बच्चे को नाले में फेंक दिया. फिर उस ने योजना के मुताबिक थोड़ी दूर भीड़ वाली जगह पर जा कर बाइक सवार द्वारा बच्चा छीन कर ले भागने का शोर मचा दिया.

इस पूरे मामले की कहानी को पुलिस ने कलमबद्ध कर लिया और उस के बयानों के आधार पर अगली काररवाई शुरू कर दी. बच्चे अरहान के चाचा बिलाल ने अपनी भाभी अफशा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा दी. उस दिन पहली सितंबर, 2022 को उसे हिरासत में ले लिया गया.

कथा लिखे जाने तक उस का प्रेमी सलीम पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया था. पुलिस ने खुदशिया तामजी उर्फ अफशा से पूछताछ करने के बाद उसे कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.  द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित