Bihar Crime: पति ने पत्नी की कराई प्रेमी से शादी

Bihar Crime: एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया, जहां एक महिला का अपने प्रेमी से प्रेमप्रंसंग चल रहा था. जब पति को पत्नी के प्रेम के बारे में पता चला तो उस ने पत्नी की शादी उस के प्रेमी से करवा दी. क्यों एक पति ने अपनी पत्नी को प्रेमी के हवाले किया. आखिर क्या थी इस घटना की वजह? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से, जो आप को बताएगी इस अनोखी घटना की पूरी जानकारी.

यह हैरान कर देने वाली वारदात  बिहार के रोहतास से सामने आई है, जहां धर्मेंद्र कुमार ने अपनी पत्नी मंजू देवी की शादी दोस्त से करवा दी. शादी गांव के ही एक मंदिर में संपन्न हुई. इस दौरान पंचायत के सरपंच, महिला के पेरेंट्स समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे. आप को बता दें कि दिनारा प्रखंड के नटवार गांव की रहने वाली मंजू की शादी जून 2021 में करमैनी गांव के धर्मेंद्र कुमार से हुई थी. दोनों का 4 साल का एक बच्चा भी है.

धर्मेंद्र कुमार अपनी पत्नी मंजू के साथ दिल्ली में रहता था. वहीं पति का दोस्त पास ही किराए के मकान में रहता था और अकसर उन के घर आताजाता था.  इस दौरान मंजू और उस युवक के बीच बातचीत और मुलाकातें बढ़ती गईं. इसी दौरान दोनों के बीच लव अफेयर शुरू हुआ. इस के बाद दोनों होली के समय गांव आए थे. कुछ दिनों बाद पति काम के सिलसिले में गुजरात चला गया. मंजू मायके में रहने लगी और प्रेमी युवक भी दिल्ली से गांव पहुंच गया.

इस के बाद दोनों फिर से मिलने लगे थे. देर रात को प्रेमी अपनी प्रेमिका मंजू से मिलने उस के घर आया, और दोनों एक ही कमरे में सोते पाए गए. इस के बाद फेमिली वालों ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया. इस के बाद पूरे गांव में रातभर हंगामा मच गया. इस कि सूचना मंजू के पति को भी दे दी गई. वह भी गुजरात से गांव के लिए चल दिया.

घटना के बाद रात को ही तत्काल गांव में पंचायत बुलाई गई थी. पंचायत ने दोनों पक्षों को बुलाकर पूरे मामले को सुलझाने की कोशिश शुरू की. मंजू और युवक अपने प्रेम संबंध पर अड़े रहे और किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं किया. सरपंच ने कहा कि महिला और युवक अब अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत करेंगे. हम ने दोनों पक्षों को समझाते हुए यह सुनिश्चित किया कि आगे किसी तरह का विवाद न उत्पन्न हो सके.

पंचायत ने रातभर चर्चा की, और दोनों के निर्णय को देखते हुए तय किया कि उन का विवाह कराना ही इस विवाद का अंतिम समाधान होगा. पंचायत ने यह भी तय किया कि महिला का 4 साल का बेटा अपनी मां के पास ही रहेगा, ताकि बच्चे की देखभाल में कोई कठिनाई न आए. धर्मेंद्र ने कहा, “मेरी पत्नी मंजू देवी और मेरा दोस्त डेढ़ साल से प्रेम संबंध में थे.  दोनों फोन पर बातचीत करते थे और छिपकर मिलते भी थे. दोनों को समझाया गया, लेकिन उन्होंने नहीं माना.  जब हद पार हो गई, तो दोनों की शादी करा दी गई.”

पंचायत ने विवाह का अंतिम निर्णय सुनाया. 20 मार्च, 2026 शुक्रवार सुबह दिनारा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर स्थित हनुमान मंदिर में दोनों का विवाह संपन्न हुआ. विवाह के दौरान मंजू का पहला पति भी मौजूद था और उस ने शादी के लिए सहमति दी. Bihar Crime

Crime Story: करोड़ो का घोटाला छिपाने के चक्कर में हत्या

Crime Story: राजू और गौरी शादी करना चाहते थे, लेकिन दोनों की जाति अलगअलग थीं, इसलिए गौरी के घर वालों ने उस की शादी राजू से नहीं की. तब दोनों ने साथसाथ मरने का फैसला कर लिया और…

मोहब्बत की आखिरी मंजिल शादी होती है, अधिकतर प्यार करने वालों का यही मानना है. प्यार करने वाले साथसाथ जीना चाहते हैं, लेकिन कभीकभी उन की यह चाहत सपना बन कर रह जाती है. समाज अपने लोगों को अपने नियमकायदे के अनुसार ही चलाना चाहता है. लेकिन प्रेम करने वालों को समाज की कहां परवाह होती है. आगरा को मोहब्बत की नगरी माना जाता है. इस की वजह यह है कि पूरी दुनिया को मोहब्बत का पैगाम देने वाला ताजमहल यहीं है. हजारों प्रेमी जोड़े हर साल इसे देखने आगरा आते हैं.

राजू और गौरी भी कई सौ किलोमीटर का सफर तय कर के प्रेम की इस इमारत को देखने आए थे. लेकिन उसे देखते ही उन्हें पता नहीं क्या हुआ कि वे आगरा से वापस नहीं जा सके? कर्नाटक के जिला गदग के कोन्नूर में रहता था हनुमंत का परिवार. राजू हनुमंत का बेटा था. राजू के अलावा हनुमंत की 2 संतानें और थीं. हनुमंत की टेलरिंग की दुकान थी. लोगों के कपड़े सिल कर वह परिवार को पालपोस रहा था. बेटा राजू जब हाईस्कूल से आगे नहीं पढ़ सका तो उस ने उसे भी अपने टेलरिंग के काम में लगा दिया. 2-3 सालों में काम सीख कर वह अच्छा टेलर बन गया. राजू खुद कमाने लगा तो बनठन कर रहने लगा.

राजू को गली की गौरी बचपन से ही बहुत अच्छी लगती थी. वह उस के घर से थोड़ा दूर रहती थी, इसलिए उस से कभी बातचीत का मौका नहीं मिला. वह उस की दुकान के सामने से ही स्कूल आतीजाती थी, इसलिए उस के स्कूल आतेजाते समय वह उसे देखने के लिए अपनी दुकान से बाहर आ कर खड़ा हो जाता था.

इसी तरह देखतेदेखते वह उसे मन ही मन चाहने लगा. लेकिन जब एक दिन गौरी उस की दुकान पर कपड़े सिलवाने आ गई तो उसे बात करने का भी मौका मिल गया. नाप लेने के बाद राजू ने पूछा, ‘‘क्या नाम लिखूं?’’

‘‘रघु, रघु लिख दो.’’ गौरी ने कहा.

‘‘तुम्हारा नाम रघु है?’’ राजू ने हैरानी से पूछा तो वह खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘मैं तुम्हें रघु दिखती हूं?’’

‘‘नहीं, यह तो लड़कों का नाम है. लेकिन तुम्हीं ने तो कहा है कि रघु लिख दो.’’

‘‘हां, कहा तो है, रघु मेरे मामा हैं. मेरा नाम तो गौरी है.’’ उस ने कहा.

‘‘यह तो बहुत अच्छा नाम है.’’ राजू तारीफ करते हुए बोला.

‘‘मेरी तरह मेरा नाम भी है.’’ कह कर गौरी फिर खिलखिला कर हंसी.

उस की यह हंसी राजू के दिल में उतरती चली गई. उस ने उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘गौरी, तुम सचमुच बहुत अच्छी हो.’’

उस की इस बात पर गौरी मुसकराई और चली गई. गौरी की निश्छल हंसी का राजू दीवाना सा हो गया. 4 दिनों बाद उस ने गौरी को सिले कपड़ों को ले जाने को कहा था, लेकिन वह अगले दिन से ही उस के आने का इंतजार करने लगा था. जिस अंदाज में राजू ने उस से बातें की थीं, उस से गौरी भी उस का मतलब समझ गई थी, लेकिन यह बात उस ने राजू को महसूस नहीं होने दी थी. दूसरी तरफ राजू ने सोच लिया था कि जैसे ही गौरी कपड़े लेने आएगी, वह अपने मन की बात उस से कह देगा. चौथे दिन शाम को गौरी राजू की दुकान पर आई तो संयोग से उस समय वह अकेला था. आते ही गौरी ने पूछा, ‘‘हमारे कपड़े सिल गए?’’

‘‘हां…हां सिल गए,’’ कह कर राजू ने शोकेस से कपड़े निकाल कर गौरी के सामने रख दिए. गौरी कपड़ों को देखने लगी तो राजू ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘अच्छे सिले हैं?’’

‘‘हां.’’ कह कर गौरी ने राजू को सिलाई के पैसे दिए और मुसकराती हुई चली गई. राजू मन की बात उस से कह नहीं पाया.

यह मुलाकात कोई खास नहीं थी. फिर भी गौरी के दिल में राजू की तसवीर उतर गई थी. 15 साल की गौरी का भावुक मन राजू की ओर खिंचता चला जा रहा था. राजू ने जो कहा था, वे बातें उस के दिमाग में घूम रही थीं. आतेजाते उन की नजरें टकराने लगीं. राजू की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह उस से मिलना चाहता था, लेकिन समझ नहीं पा रहा था कि कैसे मिले. उस के मन में इस बात का भी डर था कि कहीं वह बुरा न मान जाए.

हिम्मत कर के एक दिन राजू छुट्टी के समय गौरी के कालेज के समाने जा कर खड़ा हो गया. गौरी सहेलियों के साथ कालेज से निकली तो राजू को देख कर उस का दिल तेजी से धड़क उठा. राजू ने उसे एक तरफ आने का इशारा किया तो वह उस का इशारा समझ गई. वह अपनी सहेलियों से अलग हो कर राजू के पास आ गई. जैसे ही वह उस के पास आई, राजू ने उसे मोटरसाइकिल पर बैठने का इशारा किया. गौरी बैठ गई तो वह तेजी से चल पड़ा. गौरी ने कहा, ‘‘कहां जा रहे हो, मुझे घर जाना है?’’

‘‘चली जाना, आज मुझे तुम से कुछ कहना है.’’ राजू ने कहा तो गौरी ने हंसते हुए कहा, ‘‘यही न कि तुम मुझ से प्यार करते हो.’’

राजू ने बिना किसी संकोच के कहा, ‘‘गौरी, सचमुच मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

गौरी मुसकरा कर बोली, ‘‘मैं भी तो तुम से प्यार करती हूं.’’

राजू ने उसे हैरानी से देखा तो गौरी ने नजरें झुका लीं. यह थी गौरी और राजू के प्यार की शुरुआत. अकसर प्रेम करने वालों के प्यार की शुरुआत कुछ इसी तरह से होती है. लेकिन इस के बाद कभीकभी यही प्यार जीवन के लिए ऐसा नासूर बन जाता है कि जीवन ही लील लेता है. गौरी के पिता की मौत हो चुकी थी. वह अपनी मां शैला और बड़ी बहन रजनी के साथ अपने मामा रघु के घर रहती थी. पिता की मौत के बाद मामा उन्हें अपने साथ ले आए थे. रजनी बीएससी कर रही थी, जबकि गौरी दसवीं में पढ़ रही थी. इसी नादान उम्र में गौरी को राजू से प्यार हो गया था.

प्यार ऐसी चीज है, जिसे कितना छिपा कर रखा जाए, वह कभी न कभी समाज की नजरों में आ ही जाता है. राजू और गौरी की मुलाकातें मोबाइल के जरिए तय होने लगीं. दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. उन के प्यार को मंजिल मिल पाएगी, इस बात को ले कर उन्हें शक था. दरअसल, उन के रास्ते में सब से बड़ा रोड़ा था उन की जाति. गौरी कन्नड़ थी और राजू मराठी. दोनों को ही पता था कि समाज की नजरों में जैसे ही उन का प्यार आएगा, तूफान आ जाएगा. एक दिन गौरी ने राजू से कहा,

‘‘राजू अगर समाज ने हमारे संबंधों को कबूल नहीं किया तो हम क्या करेंगे?’’

राजू ने गौरी को भरोसा दिलाया कि दुनिया वाले कुछ भी कहें, वह उस का साथ हरगिज नहीं छोड़ेगा. दुनिया की कोई भी ताकत उसे जुदा नहीं कर सकेगी. दोनों साथ जिएंगे और साथ मरेंगे. प्यार की दीवानगी राजू के दिलोदिमाग पर छाने लगी तो उस का मन काम से उचट गया. एक दिन उस के पिता ने टोका, ‘‘क्या बात है बेटा, आजकल तुम्हारा मन काम में नहीं लग रहा है. कुछ दिनों से देख रहा हूं कि तुम दुकान से गायब हो जाते हो. कस्टमर भी परेशान होते हैं. बताओ क्या बात है?’’

‘‘कोई बात नहीं है पापा. बस ऐसे ही थोड़ा मन उचट गया था. लेकिन अब आप चिंता न करें, मैं काम पर पूरा ध्यान दूंगा.’’ राजू ने कहा.

इस के बाद वह गौरी से उस समय मिलता, जब दुकानदारी पर कोई असर न पड़ता. उस के मन में एक ही बात घूमा करती थी कि वह ऐसा क्या करे, जिस से उस के प्यार के बीच जाति न आए. उस का ध्यान फिल्म ‘एकदूजे के लिए’ की तरफ गया, जिस में नायक कमल हासन और नायिका रति अग्निहोत्री अलगअलग जाति के थे. फिल्म का ध्यान आते ही राजू ने सोच लिया कि वह भी उसी तरह अपने प्यार के लिए करेगा. लेकिन एक दिन गौरी की मां शैला ने उसे फोन पर हंसहंस कर बातें करते देखा तो उसे शक ही नहीं हुआ, बल्कि उसे लगा कि उस की किशोर बेटी इश्क की खतरनाक राह पर चल पड़ी है. शैला परेशान हो उठी. उस ने गौरी से पूछा तो उस ने झूठ बोल दिया.

कुछ दिनों बाद शैला के दूर के रिश्तेदार नीलकंठ ने उसे बताया कि उस ने गौरी को बाजार में राजू टेलर के साथ देखा है तो पूरी बात उस की समझ में आ गई. इस बार उस ने बेटी से सख्ती से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मम्मी, मैं राजू से प्यार करती हूं और वह भी मुझे बहुत चाहता है. हम दोनों शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘शादी, प्यार यह सब क्या कह रही है तू. तू जानती है तेरी उम्र क्या है? फिर वह हमारी जाति का भी तो नहीं है. इसलिए यह बात तू मन से निकाल दे. तेरी शादी उस से किसी भी तरह नहीं हो सकती.’’

‘‘मम्मी, राजू बहुत अच्छा लड़का है. तुम भी उस से बात करोगी तो वह तुम्हें भी पसंद आ जाएगा.’’ गौरी बोली.

छोटी सी लड़की के मुंह से ऐसी बातें सुन कर शैला हैरान रह गई. उस ने सख्ती से कहा, ‘‘गौरी, अब बहुत हो चुका. कल से तुम कालेज नहीं जाओगी.’’

‘‘क्यों मम्मी?’’ गौरी ने हैरानी से पूछा.

‘‘कह दिया न, नहीं जाना है तो नहीं जाना है.’’ कह कर शैला अपने काम में लग गई. शाम को शैला का भाई घर लौटा तो उसे शैला ने सारी बात बता दी.

भांजी के प्यार और शादी की जिद के बारे में सुन कर रघु चिंतित हो उठा. लेकिन उस ने बहन से कहा कि वह सब संभाल लेगा. अगले दिन रघु राजू की दुकान पर गया और उसे धमकाते हुए बोला, ‘‘तू गौरी का पीछा छोड़ दे, यही तेरे लिए अच्छा रहेगा.’’

‘‘मामा, मैं गौरी से प्यार करता हूं.’’

‘‘यह प्यारव्यार कुछ नहीं होता. अगर तू नहीं माना तो मुझे दूसरे तरीके से समझाना पड़ेगा.’’ रघु ने धमकाते हुए कहा.

जिस समय रघु राजू से बात कर रहा था, नीलकंठ ने उसे देख लिया. नीलकंठ ने तो पहले भी गौरी और राजू को बाजार में देखा था. वह भी रघु के पास आ गया. उस ने रघु से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, इसे मैं सभाल लूंगा.’’

इस के बाद नीलकंठ ने राजू को धमकाते हुए कहा, ‘‘तुम संभल जाओ, वरना तुम्हें जेल की हवा खिला दूंगा.’’

जेल का नाम आते ही राजू डर गया. क्योंकि वह नीलकंठ की दबंगई को जानता था. लेकिन गौरी को छोड़ना उस के लिए नामुमकिन था. उस ने उस के साथ जीनेमरने की कसमें जो खाई थीं.

नीलकंठ की दबंगई के कारण अब मोहल्ले में राजू और गौरी के प्यार के चर्चे कुछ ज्यादा ही होने लगे. परिवार वालों को बदनामी का डर सताने लगा. गौरी पर पाबंदियां भी लगने लगीं. पाबंदियों की वजह से वह प्रेमी से नहीं मिल पा रही थी. इस से दोनों बेचैन हो रहे थे. राजू जल्द ही गौरी से कोर्टमैरिज करना चाहता था, लेकिन समस्या यह थी कि अभी गौरी 16 साल की थी.

राजू ने गौरी से शादी करने की बात अपने घर में कही तो एक दिन राजू की मां अन्नपूर्णा और पिता हनुमंत रघु के घर गए. उन्होंने रघु से कहा कि अगर बच्चे एकदूसरे से प्यार करते हैं तो वे क्यों उन का विरोध कर रहे हैं. गौरी को अपने घर की बहू बनाने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं है.

‘‘लेकिन मुझे है.’’ रघु ने कहा, ‘‘क्योंकि हम दोनों की जाति अलग है. इसलिए यह संबंध कभी नहीं हो सकता.’’

राजू के मांबाप निराश हो कर वापस आ गए. अगले दिन गौरी ने राजू को फोन कर के कहा कि घर वाले उस के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं और जल्दी ही उस की शादी कर देना चाहते हैं. जबकि वह उसी से शादी करना चाहती है, क्योंकि वह उस के बिना जी नहीं सकती. राजू ने उसे विश्वास दिलाया कि कुछ भी हो, कोई उन दोनों को अलग नहीं कर सकता. वह चिंता न करे. इस समाज से कहीं दूर जा कर वह उस के साथ अपनी दुनिया बसाएगा. गौरी को राजू पर पूरा भरोसा था. वह अपने प्यार के साथ इस जालिम समाज से कहीं दूर चली जाना चाहती थी, जहां वह अपने सपनों की दुनिया बसा सके.

एक दिन राजू ने फोन कर के गौरी से कहा कि आगरा में ताजमहल है, जिसे बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की यादगार में बनवाया था. हम दोनों उसी ताज के साए में अपनी दुनिया बसाएंगे. गौरी उस के साथ चलने को तैयार हो गई. राजू ने गौरी को तैयार रहने को कह कर कहा कि वह कभी भी फोन कर के उसे आगरा चलने को कह सकता है. राजू जानता था कि जाति का यह अड़ंगा उसे कभी गौरी के साथ अपनी दुनिया बसाने नहीं देगा. गौरी के बालिग होने में अभी 2 साल बाकी थे. इस बीच कुछ भी हो सकता था. उसे सब से ज्यादा डर दबंग नीलकंठ का था, जो उसे किसी केस में फंसा कर जेल भिजवाने की धमकी दे रहा था.

6 अक्तूबर, 2015 को राजू और गौरी योजना बना कर घर से निकले और दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गए. उस समय राजू की जेब में 50 हजार रुपए थे. वह देश की राजधानी में गौरी के साथ अपनी दुनिया बसाना चाहता था, ताकि राजधानी की भीड़ में कोई उन्हें ढूंढ़ न पाए. दिल्ली पहुंच कर दोनों 3 दिनों तक एक होटल में रुके. वे ताज के दीदार को बेताब थे. 10 अक्तूबर की सुबह 11 बजे आगरा के नजदीक ईदगाह रेलवे स्टेशन पर उतरे. वहां से औटो कर के वे होटल ताज पैलेस गए, जहां कमरा नंबर 304 बुक कराया. होटल के रिसैप्शन पर राजू ने गौरी को अपना दोस्त बताया.

आगरा पहुंच कर दोनों बहुत खुश थे. उन की बरसों की तमन्ना पूरी होने वाली थी. ताजमहल को या तो उन्होंने किताबों में पढ़ा था या फिर फिल्मों में देखा था. अब वे अपनी आंखों से उस का दीदार करने वाले थे. होटल में फ्रैश होने के बाद दोनों एक औटो से ताजमहल देखने गए. ताजमहल परिसर में प्रवेश करने पर उन्हें लगा, जैसे सारा वातावरण प्यार की खुशबू से सराबोर है. ताज के सामने पार्क की हरीभरी मुलायम घास पर बैठ कर उन्होंने खाना खाया. उस के बाद राजू ने पूछा, ‘‘गौरी, अब आगे क्या करना है?’’

गौरी की मन:स्थिति अजीब सी थी. वह पहली बार घर से बाहर निकली थी. उम्र नादान थी और जीवन का कोई तजुरबा नहीं था. घर से निकल कर पीछे लौटने के सारे दरवाजे वह बंद कर आई थी. उस ने ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘मैं क्या जानूं.’’

25 साल के राजू की भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. उस के लिए अब एक ओर कुआं था तो दूसरी ओर खाई. घर वापसी का मतलब था जेल जाना. उसे लग रहा था कि नाबालिग लड़की को भगाने के जुर्म में उसे उम्रकैद की सजा हो सकती है. वह जानता था कि समाज उसे कभी माफ नहीं करेगा. इन्हीं सब बातों ने उसे निराश कर दिया. राजू गौरी का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘गौरी हम ने साथ जीनेमरने की कसमें खाई हैं, अगर हम साथ जी नहीं सकते तो साथ मर तो सकते हैं?’’

गौरी राजू की बात सुन कर हैरान रह गई. करीब एक साल से दोनों मोहब्बत कर रहे थे, गजब का जोश था राजू में. उस की जिंदादिली से प्रभावित हो कर ही वह उस के साथ दुनिया बसाने चली आई थी. लेकिन  ज राजू उसे कुछ थका हुआ सा लग रहा था. राजू ने आगे कहा, ‘‘शाहजहां और मुमताज की मोहब्बत उन की मौत के बाद अमर हो गई थी. शाहजहां ने मुमताज की विरह में जीवन के आखिरी दिन गुजारे थे. लेकिन हम दोनों खुशनसीब हैं कि साथसाथ हैं. अगर साथसाथ मौत को गले लगा लें तो अगले जनम में हम एक साथ रहेंगे.’’

गौरी को भी लगा कि इस दुनिया में जीने से अच्छा है कि एकदूसरे की बांहों में मर जाएं. समाज का डर जीने नहीं दे रहा है. दोनों घर से सैकड़ों मील दूर थे. कोई कुछ कहनेसुनने वाला नहीं था. उन्होंने एक भयानक फैसला ले लिया. रात करीब 8 बजे दोनों होटल पहुंचे और औटो वाले से उन्होंने सुबह आने को कहा कि कल कहीं और घूमने चलेंगे. दोनों बाहर से खाना पैक करा कर लाए थे, साथ में एक कोल्डड्रिंक की बोतल भी थी. इस के बाद उन्होंने कमरा अंदर से बंद किया तो उस रात उस कमरे में क्या हुआ, कोई नहीं जानता.

सुबह औटो वाले ने कमरा नंबर 304 का दरवाजा खटखटाया. लेकिन काफी देर तक अंदर से कोई आवाज नहीं आई. तब उस ने होटल के मैनेजर आशीष को इस बात की जानकारी दी. आशीष ने तुरंत थाना रकाबगंज पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही पुलिस आ गई और कमरे का दरवाजा तोड़ दिया. पुलिस अंदर पहुंची तो हैरान रह गई. पलंग पर 2 लाशें पड़ी थीं. टेबल पर पुलिस को कफ सीरप की 2 शीशियां मिलीं, जिन्हें जांच के लिए भेज दिया गया. दोनों ने कोल्डड्रिंक में शायद कोई जहरीला पदार्थ मिला कर पी लिया था. 2 गिलासों में कोल्डड्रिंक भी मिली थी. उन के सामान से एक सुसाइड नोट मिला. गौरी के हाथ पर लिखा था ‘लव यू राजू’.

पुलिस को उन के सामान में हुबली से हजरत निजामुद्दीन तक का ट्रेन टिकट मिला था.  सूचना पा कर सीओ असीम चौधरी और एसपी सिटी आर.के. सिंह भी आ गए थे. पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला था, वह कन्नड़ भाषा में था. उस सुसाइड नोट में दोनों ने अपनी मौत का जिम्मेदार नीलकंठ को ठहराया था. उस में लिखा था कि उसी के कारण वे घर छोड़ कर आगरा आए थे. उन्होंने नीलकंठ को कड़ी सजा देने की गुजारिश की थी और अपने घर वालों को तंग न करने का अनुरोध किया था.

सुसाइड नोट पर गौरी और राजू के दस्तखत के अलावा 2 मोबाइल नंबर भी लिखे थे. पुलिस को अभी तक यह नहीं मालूम था कि प्रेमी युगल कहां से आया था. पुलिस ने दिए गए मोबाइल नंबरों पर बात की तो पता चला कि वे नंबर कर्नाटक में रहने वाले अमृत के थे. अमृत राजू का मामा था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया राजू पड़ोसी लड़की के साथ कहीं भाग गया है. पुलिस ने दोनों के आत्महत्या करने की सूचना अमृत को दे दी. राजू और गौरी की मौत की सूचना पा कर राजू के घर हाहाकार मच गया. लेकिन गौरी का परिवार खामोश रहा. उस की मां शैला ने कहा कि उन के लिए तो गौरी उसी दिन मर गई थी, जिस दिन घर से भागी थी. गौरी के मामा ने शव लेने से भी इनकार कर दिया.

हनुमंत अपने दूसरे बेटे परशु के साथ आगरा आए. उन्होंने दोनों शवों की शिनाख्त की और उन का दाहसंस्कार आगरा के ताजगंज श्मशान घाट पर कर दिया. राजू और गौरी साथसाथ जी तो नहीं पाए, पर उन की चिताएं जरूर आसपास लगी थीं. हनुमंत को अपने जवान बेटे के खोने का गम था. वह तो बेटे को खुशियां देना चाहता था, पर जाति की दीवार ने उसे ऐसा गम दिया, जिसे वह पूरी जिंदगी नहीं भुला पाएगा. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News: उम्र के भंवरजाल में फंसी औरत

Crime News: 2 बच्चों की मां नीरू जब जवान हुई तो उस का पति बूढ़ा हो गया. इस स्थिति में उस के कदम बहक गए. इस का दुखद अंत यह हुआ कि बीवी के कत्ल में आज पति जेल में है.

रात के 12 बज रहे थे. अभी तक नीरू उर्फ नीलम घर नहीं लौटी थी. बीते 3 दिनों से यही क्रम चल रहा था. महावीर अग्रवाल ने पत्नी की गैरहाजिरी में खाना बना कर बेटी कोमल और बेटे हर्षित को खिला कर सुला दिया था. खुद खा कर पत्नी नीरू का खाना फ्रिज में रख दिया था. 4 लोगों के इस परिवार में बीते कई सालों से यही सिलसिला चला आ रहा था. महावीर के चेहरे पर कभी शिकन तक नहीं आई थी.

घर और कपड़ों की साफसफाई से ले कर चौकाचूल्हा तक के काम में वह पत्नी की मदद करता था. नीरू की गैरहाजिरी में वह अपने दोनों बच्चों को पिता के साथसाथ मां के स्नेह से भी सराबोर कर रहा था. दोनों बच्चों के चेहरे देख कर और उन्हें लाड़प्यार कर के वह दिन भर की दौड़धूप और घर के कामकाज की थकावट को भूल जाता था. राजस्थान के जिला श्रीगंगानगर के मोहल्ला प्रेमनगर के बने एक साधारण से घर में टीवी के सामने बैठा महावीर अग्रवाल पत्नी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. रात एक बजे के करीब नीरू घर में दाखिल हुई.

अस्तव्यस्त कपड़े, बिखरे बाल और पस्त बदन देख कर महावीर का माथा ठनका. वह कुछ कहता, उस से पहले ही नीरू बोल पड़ी, ‘‘क्या करूं यार, आज 3 जगहों के और्डर थे और एक दुलहन तो पौर्लर पर ही आ गई थी. अब 4-4 दुलहनों को सजाने में देर तो हो ही जाएगी.’’

नीरू ने देर होने की वजह बता दी. महावीर ने उस की इस सफाई पर ध्यान दिए बगैर कहा, ‘‘सुबह बात करेंगे. खाना फ्रिज में रखा है, मन हो तो खा लेना.’’

इतना कह कर महावीर अपने बिस्तर पर जा कर लेट तो गया, लेकिन उस की नींद आंखों से कोसों दूर थी. दोनों बच्चों के भविष्य, खस्ताहाल दुकानदारी और नीरू के संदिग्ध चालचलन को ले कर उस के दिमाग में तूफान चल रहा था. नीरू कपड़े बदल कर दूसरे कमरे में जा कर अपने बिस्तर पर लेट गई. उस ने खाना नहीं खाया था. महावीर को लगा, संभवत: वह किसी के यहां से मनपसंद खाना खा कर आई होगी. सुबह महावीर की आंख लगी तो वह देर से सो कर उठा. कोमल और हर्षित स्कूल जा चुके थे. नाश्ता कोमल ने बनाया था.

धूप चढ़े नीरू उठी तो महावीर ने 2 कप चाय बनाई. बिस्तर पर बैठी नीरू को चाय का कप पकड़ा कर महावीर उस के सामने पड़ी कुरसी पर बैठते हुए बोला, ‘‘देखो नीरू, तुम्हारा रवैया दिनबदिन असहनीय होता जा रहा है. तुम मेरी उपेक्षा कर रही हो, इस की मुझे रत्ती भर चिंता नहीं है. लेकिन बच्चों के लिए तो सोचो.’’

‘‘मैं ने क्या कर दिया भई. ब्यूटीपौर्लर चलता हूं. इन दिनों लगनें चल रही हैं. मैं ने तो आप को रात में ही बता दिया था कि 4 दुलहनों को तैयार करना है, घर आने में देर हो जाएगी.’’ नीरू ने कहा.

महावीर को पता था कि उस दिन शादियां नहीं थीं, नीरू रटारटाया बहाना बना कर झूठ बोल रही है. वह नहीं चाहता था कि नीरू बात का बतंगड़ बना कर झगड़ा करने लगे, इसलिए उस ने बड़े धैर्य से उसे समझाने की कोशिश की. महावीर ने कहा, ‘‘देखो नीरू, मुझे पता है कि दुकानदारी से जो कमाई हो रही है, उस से घर के खर्चे पूरे नहीं हो रहे हैं. दोनों बच्चों को अच्छा खिलाड़ी बनाने के लिए कोचिंग करानी है. ठीक से आमदनी न होने की वजह से मैं काफी परेशान रहता हूं. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं. तुम मेरी सहनशीलता की परीक्षा लेना बंद कर दो. किसी भी समय मेरे सब्र का बांध टूट सकता है. जिस दिन ऐसा हुआ, अनर्थ हो जाएगा.’’

महावीर ने ये बातें जिस तरह गिड़गिड़ाते हुए कही थीं, कोई भी समझदार औरत होती तो सिर ऊपर न उठाती. लेकिन नीरू उस की बात समझने के बजाय गुस्से में बोली, ‘‘यह गीदड़ भभकी किसी और  को देना. तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का खर्च पूरा करने के लिए ही तो मैं रातदिन खटती हूं. इस बात का एहसान मानने के बजाय तुम मुझे धमकी दे रहे हो. अपने मांबाप की तरह तुम भी मुझ पर शक करते हो. तुम जैसे निखट्टू के पल्ले बंध कर मेरा तो जीवन नरक हो गया है.’’

नीरू की इन जहरबुझी बातों से महावीर को भी गुस्सा आ गया. अपने 16 साल के वैवाहिक जीवन में महावीर पहली बार आपा खो बैठा. उस ने चाय का कप लिए नीरू के गालों पर तड़ातड़ 2 थप्पड़ रसीद कर दिए. नीरू तिलमिला उठी. भद्दी सी गाली देते हुए उस ने कहा, ‘‘तुम ने मेरे ऊपर हाथ उठाया है. अब देखो, मैं तुम्हें कैसा मजा चखाती हूं. मैं अभी मम्मी को फोन कर के बुलाती हूं. तुम्हारे शरीर में भूसा न भरवा दिया तो मेरा भी नाम नीरू नहीं.’’

नीरू इसी तरह बड़बड़ाती रही और महावीर घर से निकल गया. मोहल्ले के पार्क में पेड़ के नीचे लेटा महावीर भविष्य के तानेबाने बुनता रहा. उस के मोबाइल पर कई बार उस की सास चंपा देवी का फोन आया, लेकिन उस ने फोन रिसीव नहीं किया. उस की नजर में यह पतिपत्नी के बीच घटी एक मामूली घटना थी. नीरू ने नमकमिर्च लगा कर मां से शिकायत कर दी होगी. इसलिए वह उसे खरीखोटी सुनाने के लिए फोन कर रही होगी.

महावीर की सास चंपा देवी नीरू से भी ज्यादा तीखी थी. नीरू ने उन से कहा था कि उस से ब्याह कर के उस का जीवन नरक हो गया है, जबकि यह सरासर झूठ था. सही बात तो यह थी कि नीरू मजे लूट रही थी और उस की वजह से उसी की नहीं, पूरे परिवार का जीवन नरक हो चुका था. अंधेरा घिरने तक महावीर पार्क में ही पड़ा रहा. अब तक उस की सास ने न जाने कितनी बार फोन कर दिया था, पर उस ने फोन रिसीव नहीं किया था. रात 10 बजे वह घर पहुंचे तो दोनों बच्चे खापी कर सो चुके थे. किचन में मिला खाना खा कर महावीर लेट गया. नीरू अभी पौर्लर से नहीं लौटी थी.

अगले दिन सुबह महावीर थोड़ी देर से उठा. दोनों बच्चे स्कूल चले गए थे. नीरू अपने कमरे में घोड़े बेच कर सो रही थी. घर के थोड़ेबहुत काम निपटा कर महावीर पार्क में जा पहुंचा. नीरू परिवार की ही नहीं, अपने दोनों मासूम बच्चों की भी अनदेखी कर रही थी. उसे उन की जरा भी चिंता नहीं थी. यही सब सोचसोच कर उसे नीरू से नफरत सी होती जा रही थी. उस की सहनशीलता अंतिम पड़ाव पर जा पहुंची थी. तभी उस की सास चंपा देवी का फोन आ गया. महावीर ने जैसे ही फोन रिसीव किया, दूसरी ओर से चंपा देवी उसे डांटने लगी. अंत में उस ने उसे जेल भिजवाने तक की धमकी दे डाली. महावीर जवाब में तो कुछ नहीं बोला, लेकिन जेल भिजवाने की धमकी उस के दिमाग में बैठ गई.

महावीर के दिमाग में आया, वह तो वैसे भी जेल से बदतर जीवन जी रहा है. वही क्यों, उस के दोनों बच्चे, बूढ़े मांबाप भी एक तरह से जेल से भी गयागुजरा जीवन जीने को मजबूर हैं. उस समय महावीर जिन स्थितियों से गुजर रहा था, उस में सकारात्मक सोच मिलने पर वह संत बन सकता था और नकारात्मक सोच में शैतान. महावीर और उस के परिवार का दुर्भाग्य था कि उस समय उस के दिमग पर नकारात्मक सोच भारी हो गई. अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए उस ने एक भयानक निर्णय ले लिया. उस का सोचना था कि अब उसे जेल जाना ही है, सास भिजवाए या वह स्वयं चला जाए. अंत में उस ने खुद जेल जाने का निर्णय कर लिया.

खतरनाक निर्णय लेने के बाद महावीर ने खुद को काफी हलका महसूस किया. शायद उस का दिलोदिमाग विवेकहीन हो गया था. वह पार्क से उठा और सीधा घर पहुंचा. नहाधो कर 3 दिनों से बंद पड़ी अपनी स्पेयर पार्ट्स की दुकान पर पहुंचा. उसे अब दुकानदारी में कोई दिलचस्पी नहीं थी. शाम होने से पहले ही वह घर लौट आया. दोनों बच्चे घर पर ही थे. बच्चों की मनपसंद का खाना बना कर उन्हें प्यार से खिलाया और सुला दिया. इस के बाद खुद टीवी देखते हुए नीरू का इंतजार करने लगा.

देर रात नीरू घर लौटी तो महावीर ने उसे मुख्य द्वार पर ही रोक लिया. बरामदे में 2 कुरसी उस ने पहले से रख दी थी. उस ने नीरू का हाथ पकड़ कर एक कुरसी पर बिठा दिया और खुद सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया. इस के बाद उस के गाल पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘नीरू जो हो गया, अब उसे भूल जाओ. मैं अपनी गलती के लिए माफी मांगता हूं. अब इस परिवार को बचाना तुम्हारे हाथ में है. मैं तुम्हारा हर आदेश मानने को तैयार हूं. तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूंगा. बस तुम गलत आदतें छोड़ दो.’’

महावीर की इन बातों पर गंभीर होने के बजाय नीरू खिलखिला कर हंस पड़ी. इस के बाद व्यंग्य से बोली, ‘‘इस तरह की फालतू बातें मैं सुनने की आदी नहीं.’’

नीरू इतना ही कह पाई थी कि महावीर के सब्र का बांध टूट गया. वह उस पर एकदम से पिल पड़ा. उस ने नीरू के गले में पड़े दुपट्टे को लपेट कर कसना शुरू किया तो फिर तभी छोड़ा, जब वह मर कर कुर्सी से लुढ़क गई. पत्नी को मार कर महावीर ने उस की लाश को उठा कर बरामदे के कोने में बने स्टोर रूम में ले जा कर रख दिया और अपने बिस्तर पर जा कर सो गया. अगले दिन सुबह महावीर बच्चों से पहले उठ गया. बच्चों ने मम्मी के बारे में पूछा तो कहा कि वह ब्यूटीपौर्लर का सामान लेने बाहर गई है. उसी समय सास चंपा देवी का फोन आया तो उन से भी कह दिया कि वह बाहर गई है. बच्चे स्कूल चले गए तो महावीर बाजार गया और लोहा काटने की एक आरी खरीद लाया. मुख्य दरवाजा बंद कर के वह स्टोर रूम में घुस गया.

महावरी ने उस के दोनों पैर आरी से काट कर धड़ से अलग कर दिए. इस के बाद दोनों हाथों के पंजे काटे. दब्बू पति से जल्लाद बना महावीर अब तक थक गया था. उस के दिल में नीरू के प्रति पैदा नफरत बढ़ती जा रही थी. अब वह उस की लाश से बदला ले रहा था. इस के बाद उस ने कमरे में ताला बंद कर दिया और अगले दिन तक बच्चों के साथ सामान्य ढंग से रहता रहा. दोनों बच्चे रोज की तरह स्कूल चले गए. बच्चों के जाने के बाद महावीर कमरे में घुसा तो दोनों हाथ काट कर धड़ से अलग किए. इस के बाद उस ने सिर काट कर अलग किया. इस तरह नीरू की लाश 8 टुकड़ों में बंट गई. जबकि महावीर के चेहरे पर किसी तरह की शिकन या प्रायश्चित नहीं था.

इस बीच चंपा देवी ने महावीर को कई बार फोन कर के नीरू या बच्चों से बात करवाने के लिए कह चुकी थी. लेकिन हर बार उस ने नीरू के न लौटने और बच्चों के बाहर होने की बात कह कर सास को टरका दिया था. अब तक चंपा देवी को किसी अनहोनी की आशंका हो गई थी. इसलिए उस ने श्रीगंगानगर में ही रह रहे अपने दूसरे दामाद धर्मेंद्र अग्रवाल को फोन कर के नीरू के बारे में पता लगाने को कहा. महावीर ने उसे भी टरका दिया था. थकहार कर चंपा देवी ने फाजिल्का में रह रहे अपने भाई अमित को नीरू के बारे में पता लगाने के लिए श्रीगंगानगर भेजा, इसी के साथ वह खुद भी श्रीगंगानगर के लिए रवाना हो गई.

अमित अग्रवाल श्रीगंगानगर पहुंचे तो महावीर ने उन्हें भी गोलमोल जवाब दिया. हर्षित और कोमल घर में ताला बंद होने की वजह से पड़ोसी के यहां बैठे थे. अमित तुरंत सेतिया कालोनी स्थित पुलिस चौकी पहुंचे और अपनी भांजी नीरू के संदिग्ध परिस्थितियों में लापता होने की सूचना दी, लेकिन पुलिस ने उन की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया. तब अमित ने अपने कुछ रिश्तेदारों और परिचितों को इस मामले के बारे में बता कर मदद मांगी. जब सभी लोग महावीर के घर पहुंचे तो वहां से आने वाली असहनीय दुर्गंध से उन्हें आशंका हुई. अमित के साथ आए लोगों ने तुरंत कोतवाली पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी विष्णु खत्री दलबल के साथ महावीर के घर पहुंच गए.

उन्होंने इस बात की सूचना अधिकारियों को दी तो उन की सूचना पर एएसपी (शहर) शशि डोगरा, प्रशिक्षु आईपीएस चूनाराम भी घटनास्थल पहुंच गए. महावीर के पहुंचने पर कमरा खुलवाया गया तो पुलिस अधिकारी भी नफरत की वजह से मानवीय संवेदनाओं का वहशीपन भरा हश्र देख कर भौचक्के रह गए. पुलिस अधिकारियों ने नीरू की 8 टुकड़ों में बंटी लाश को कब्जे में ले लिया. महावीर ने अपना जुर्म कबूल लिया था, इसलिए पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. पुलिस घटनास्थल की काररवाई निपटा रही थी, तभी नीरू की मां चंपा देवी भी वहां पहुंच गई थीं.

कोतवाली पुलिस ने चंपा देवी की ओर से नीरू की हत्या का मुकदमा महावीर अग्रवाल के खिलाफ दर्ज कर लिया. यह 6 अप्रैल, 2015 की बात थी. चंपा देवी के बताए अनुसार, नीरू की हत्या 2 अप्रैल की रात 2 बजे के करीब की गई थी. उस ने तो हत्या के इस मामले में महावीर के पूरे परिवार को नामजद करा दिया था, लेकिन जांच में पता चला कि परिवार के बाकी लोगों से इन लोगों का बहुत पहले ही संबंध खत्म हो चुका था, इसलिए पुलिस ने बाकी लोगों को निर्दोष मान लिया. पुलिस पूछताछ में नीरू की हत्या की जो कहानी सामने आई थी, वह इस प्रकार थी—

पंजाब प्रदेश का एक जिला है फतेहगढ़ साहिब. इसी जिले की एक प्रमुख व्यावसायिक मंडी है गोविंदगढ़. यहीं आयरन मंडी में रहते थे शिवदयाल अग्रवाल. उन की बेटी नीलम उर्फ नीरू विवाह लायक हुई तो रिश्तेदारों के बताने पर उन्होंने अबोहर निवासी खुशीराम के बेटे महावीर से नीरू का विवाह कर दिया था. खुशीराम काफी संपन्न आदमी थे. महावीर भी खूब मेहनती और मिट्टी में सोना निकालने वाला था. लेकिन नीरू और महावीर की उम्र के बीच का फासला काफी लंबा था. नीरू 18 साल की थी, जबकि महावीर 35 साल का. लेकिन धनदौलत और वैभवशाली परिवार की चकाचौंध में दोगुनी उम्र का अंतर गौण हो गया था.

महावीर और नीरू के शुरुआती दिन बड़े अच्छे गुजरे. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन के दांपत्य में खटास आने लगी. उसी बीच खुशीराम को व्यापार में घाटा हुआ तो वह परिवार के साथ अबोहर से श्रीगंगानगर आ गए. शादी के 2 सालों बाद नीरू ने बेटी कोमल और उस के बाद बेटे हर्षित को जन्म दिया. महत्वाकांक्षी और स्वछंद विचारों वाली नीरू को संयुक्त परिवार में घुटन सी होती थी. इसलिए अलग रहने के लिए उस ने क्लेश शुरू कर दिया. महावीर ने किराए पर अलग मकान ले लिया और कमाई के लिए स्पेयर पार्ट्स का खुदरा व्यवसाय शुरू कर दिया. संजनेसंवरने का शौक रखने वाली नीरू ने अपने इस शौक को व्यावसायिक उपयोग करने की गरज से ब्यूटीपौर्लर खोल लिया.

नीरू का ब्यूटीपौर्लर चल निकला. पतिपत्नी, दोनों के कमाने से परिवार में बरकत होने लगी. नीरू और महावीर की उम्र में अंतर तो था ही, अब उन के विचारों में भी जमीनआसमान का अंतर आ गया था. स्वच्छंद जीवन जीने वाली नीरू को रोकटोक बहुत कस्टदायक लगता था. जबकि महावीर को इस तरह की आजादी बिलकुल पसंद नहीं थी. इस तरह विचारों के टकराव की वजह से पतिपत्नी में कलह रहने लगी. कहा जाता है कि श्रीगंगानगर में आने के बाद खुशीराम और उन की पत्नी मनोरीदेवी ने नीरू की आजादी से नाराज हो कर उस से पूरी तरह रिश्ता खत्म कर लिया था.

खुदगर्जी का जीवन जीने वाली नीरू अपने पति और बच्चों से अलगअलग होती गई. मांबाप के बीच होने वाली कलह और खींचतान से बच्चे भी परेशान रहते थे. उन्होंने अपने ढंग से दोनों को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन नीरू और महावीर के अपनेअपने जो अहम थे, उस की वजह से बात बन नहीं पाई और बात हत्या तक पहुंच गई. हत्या के इस मामले की जांच कोतवाली प्रभारी विष्णु खत्री ने स्वयं संभाली. पूछताछ में महावीर ने बताया कि नीरू की बदचलनी की वजह से वह परेशान हो चुका था. उस की सास चंपा देवी उसे जेल भिजवाने की धमकी देती रहती थी.

अगले दिन पुलिस ने महावीर को न्यायालय में पेश कर के पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने वह आरी बरामद कर ली, जिस से नीरू की लाश के टुकड़े किए गए थे. इस के बाद अन्य औपचारिकताएं पूरी कर के महावरी को पुन: न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. लोगों का कहना है कि इस हत्या की मुख्य वजह मियांबीवी के बीच की उम्र का अंतर था. शादी के समय नीरू 18 साल की थी, जबकि महावीर 35 साल का. नीरू जब पूरी तरह जवान हुई तो महावीर को बुढ़ापा आ गया, जिस की वजह से नीरूके कदम बहके तो बहकते ही चले गए. परिणामस्वरूप उसे असमय ही मरना पड़ा.

महावीर की बेटी कोमल और बेटा हर्षित पढ़ने में तो अच्छे हैं ही, बैडमिंटन और टेबल टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी हैं. अब मां का कत्ल हो गया और पापा मां के कत्ल के आरोप में जेल चले गए. दोनों बच्चों के लिए दुख की बात यह है कि उन्होंने दादादादी को मां की मौत और पिता के जेल जाने के बाद पहली बार देखा था. वहीं ननिहाल पक्ष वालों ने उन्हें अपने साथ ले जाने से साफ मना कर दिया था. ऐसे में इन होनहार बच्चों का क्या होगा?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News : डाक्टर ने की हैवानियत की हद पार

Crime News : गोरखपुर पुलिस लाइंस स्थित मनोरंजन कक्ष खबर नवीसों से खचाखच भरा हुआ था. सामने कुरसी पर स्पैशल  टास्क फोर्स (एसटीएफ) के आईजी अमिताभ यश और एसएसपी डा. सुनील गुप्ता बैठे हुए थे. चूंकि पत्रकार वार्ता का आयोजन आईजी यश ने किया था, इसलिए ये वार्ता और भी खास लग रही थी. पत्रकारों के मन में एक अजीब सा कौतूहल था. ऐसा लग रहा था जैसे एसटीएफ के हाथ कोई बड़ा मामला लगा है और उसी के खुलासे के लिए लखनऊ से आए अमिताभ यश ने प्रैस वार्ता आयोजित की हो.

थोड़ी देर बाद पत्रकारों के मन से कौतूहल के बादल छंट गए, जब उन के सामने 3 आरोपियों को कतारबद्ध खड़ा किया गया. उन में से एक आरोपी गोरखपुर शहर का जाना माना डाक्टर और आर्यन हौस्पिटल का संचालक डा. डी.पी. सिंह उर्फ धीरेंद्र प्रताप सिंह था.

वार्ता शुरू करते हुए एसटीएफ आईजी अमिताभ यश ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा, ‘‘यह पत्रकारवार्ता 6 महीने पहले 2 जून, 2018 को नेपाल के पोखरा से रहस्यमय तरीके से गायब हुई गोरखपुर की सरस्वतीपुरम कालोनी निवासी राजेश्वरी उर्फ राखी श्रीवास्तव केस से जुड़ी हुई है, जिस की लाश 4 जून, 2018 को पोखरा की एक गहरी खाई से बरामद की गई थी.’’

नेपाल पुलिस ने मृतका का पोस्टमार्टम करवाया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस का पेट फटने के कारण मौत की पुष्टि हुई थी. इधर 4 जून, 2018 को राखी के भाई अमर प्रकाश श्रीवास्तव ने बिहार के गया निवासी अपने बहनोई मनीष सिन्हा पर गोरखपुर के शाहपुर थाने में राखी के अपहरण और जान से मारने की धमकी का मुकदमा दर्ज करवाया था. मनीष सिन्हा ने खुद को बेगुनाह बताते हुए मामले की जांच एसटीएफ से कराए जाने की मांग की थी.

मुकदमे से संबंधित विवेचना की फाइल एसटीएफ के पास आई तो जांच शुरू की गई. नेपाल पुलिस ने भारतीय पुलिस से मृतका के फोटो साझा करते हुए केस का खुलासा करने में मदद मांगी थी. फोटो को एसटीएफ के तेजतर्रार सिपाही शुक्ला ने पहचान लिया. वह राखी श्रीवास्तव की तसवीर थी.

जांचपड़ताल में पता चला कि राखी श्रीवास्तव आर्यन हौस्पिटल के संचालक डा. डी.पी. सिंह की दूसरी पत्नी थी. 7 साल पहले दोनों ने आर्यसमाज मंदिर में शादी की थी. शादी के बारे में डाक्टर की पहली पत्नी ऊषा सिंह को जानकारी नहीं थी. जब जानकारी हुई तो परिवार में हड़कंप मच गया.

आगे चल कर डा. डी.पी. सिंह और राखी के बीच संबंधों को ले कर टकराव पैदा हो गया. राखी की उम्मीदें और डिमांड लगातार बढ़ती जा रही थीं. इस सब के चलते डाक्टर राखी से पीछा छुड़ाना चाह रहा था.

आईजी ने आगे बताया, ‘‘राखी ने शहर के कैंट थाने में डी.पी. सिंह के खिलाफ रेप और धमकी देने का मुकदमा भी दर्ज कराया था. हालांकि बाद में दोनों ने सुलह कर लिया था. फरवरी 2018 में राखी ने मनीष सिन्हा से दूसरी शादी कर ली थी, लेकिन इस के बावजूद डा. डी.पी. सिंह और राखी श्रीवास्तव के बीच रिश्ता बना रहा. इस के बावजूद राखी की डिमांड बढ़ती जा रही थी.

‘‘राखी की डिमांड से तंग आ कर डा. डी.पी. सिंह ने राखी की हत्या की साजिश रच डाली. बीते 4 जून, 2018 को राखी नेपाल के पोखरा घूमने गई थी. इस की जानकारी मिलने पर डा. डी.पी. सिंह अपने 2 कर्मचारियों देशदीपक निषाद और प्रमोद सिंह के साथ किराए की स्कौर्पियो से नेपाल गया. जहां उस ने राखी से मुलाकात कर उसे अपने झांसे में ले लिया.

‘‘डा. डी.पी. सिंह ने राखी को शराब पिलाई और नशे की गोली दे कर बेहोश कर दिया. बेहोशी की हालत में डी.पी. सिंह ने राखी को अपने दोनों कर्मचारियों के साथ पहाड़ी से नीचे खाई में फेंक दिया, जहां सिर और पेट में चोट आने से उस की मौत हो गई. बाद में डी.पी. सिंह अपने दोनों साथियों के साथ फरार हो गया. इस हाईप्रोफाइल मामले की जांच में स्थानीय पुलिस के साथ एसटीएफ भी लगी थी. ऐसे में गहराई से मामले की जांच किए जाने पर डा. डी.पी. सिंह और राखी के पहले के संबंधों की तह तक जाने पर हत्याकांड का खुलासा हो पाया.’’

पत्रकारों के पूछे जाने पर डा. डी.पी. सिंह और दोनों कर्मचारियों देशदीपक निषाद तथा प्रमोद सिंह ने अपना अपना जुर्म कबूल करते हुए राखी श्रीवास्तव हत्या में संलिप्तता स्वीकार ली. पत्रकारवार्ता के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया. अदालत ने तीनों आरोपियों को जेल भेजने का आदेश दिया. तब पुलिस ने तीनों को गोरखपुर जिला जेल भेज दिया. यह 21 दिसंबर, 2018 की बात है.

आरोपियों के इकबालिया बयान और पुलिस जांचपड़ताल के बाद इस केस की हाईप्रोफाइल प्रेम कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

गोरखपुर के कैंट थाना क्षेत्र की पौश कालोनी बिलंदपुर में विद्युत विभाग से सेवानिवृत्त इंजीनियर हरेराम श्रीवास्तव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में कुल जमा 6 सदस्य थे, जिन में 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन के चारों बच्चों में राजेश्वरी सब से छोटी थी. सब उसे प्यार से राखी कहते थे.

चारों भाईबहनों में राखी सब से अलग थी. उस के काम करने का तरीका, उठनेबैठने और पढ़नेलिखने का सलीका, बातचीत करने का अंदाज सब कुछ अलग था. परिवार में सब से छोटी होने की वजह से घर वाले उसे प्यार भी बहुत करते थे.

राखी मांबाप की दुलारी तो थी ही, बड़ा भाई अमर प्रकाश भी उसे बहुत चाहता था. बहन में जान बसती थी बड़े भाई अमर की. जिद्दी स्वभाव की राखी लाड़प्यार में भाई से जो मांगती थी, अमर कभी इनकार नहीं करता था.

राखी पर मोहित हो गया था डा. डी.पी. सिंह

सन 2006 की बात है. राखी के पिता हरेराम श्रीवास्तव बीमार थे. उन्हें इलाज के लिए आर्यन हौस्पिटल में इलाज के लिए भरती कराया गया था. यह हौस्पिटल घर के पास तो था ही, पूर्वांचल का जानामाना भी था. बेहतर इलाज और नजदीक समझते हुए अमर प्रकाश ने पिता को डा. डी.पी. सिंह के हौस्पिटल में भरती करा दिया. पिता की तीमारदारी के लिए घर वाले अस्पताल आतेजाते रहते थे. राखी भी आतीजाती थी.

करीब साढ़े 5 फीट लंबी राखी छरहरी तो थी ही ऊपर से गठीला बदन, गोरा रंग, गोलमटोल चेहरा, नागिन सी लहराती चोटी, झील सी गहरी आंखों से वह बला की खूबसूरत दिखती थी. डा. डी.पी. सिंह उर्फ डा. धीरेंद्र प्रताप सिंह की नजर जब राखी पर पड़ी तो उस का मन राखी में ही उलझ कर रह गया. एक तरह से वह उस के दिल में समा गई.

राखी प्राय: रोज ही पिता को देखने जाती थी. जब भी वह अस्पताल में होती तो डा. डी.पी. सिंह ज्यादा से ज्यादा समय उस के पिता के बैड के आसपास चक्कर लगाता रहता. राखी को यह देख कर खुशी होती कि डाक्टर उस के पिता के इलाज को ले कर गंभीर हैं. वह उन का कितना ध्यान रख रहा है.

2-3 दिन में ही राखी समझ गई कि डा. डी.पी. सिंह जब भी चैकअप के लिए पिता के बैड के आता है तो उस की नजरें पिता पर कम, उस पर ज्यादा टिकती हैं. उस की नजरों में आशिकी झलकती थी. डी.पी. सिंह भी गबरू जवान था. साथ ही स्मार्ट भी. पिता की तीमारदारी में डी.पी. सिंह की सहानुभूति देख कर राखी भी उस के आकर्षक व्यक्तित्व पर फिदा हो गई. वह भी डी.पी. सिंह को कनखियों से देखा करती थी. जब दोनों की नजरें आपस में टकरातीं तो दोनों ही मुसकरा देते.

राखी ने भी खोल दिया दिल का दरवाजा

कह सकते हैं कि राखी और डी.पी. सिंह दोनों के दिल एकदूसरे की चाहत में धड़कने लगे. अंतत: मौका देख कर एक दिन दोनों ने अपने अपने प्यार का इजहार कर दिया. बाली उमर की कमसिन राखी डी.पी. सिंह को दिल से मोहब्बत करने लगी जबकि डी.पी. सिंह राखी को दिल से नहीं, बल्कि उस की खूबसूरती से प्यार करता था.

कई दिनों के इलाज से हरेराम श्रीवास्तव स्वस्थ हो कर अपने घर लौट गए. पिता के हौस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद राखी किसी न किसी बहाने हौस्पिटल आ कर डी.पी. सिंह से मिलने लगी. सालों तक दोनों एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले प्यार के झूले पर पेंग बढ़ाते रहे. आलम यह हो गया कि एकदूसरे को देखे बिना दोनों को चैन नहीं मिलता था.

डा. डी.पी. सिंह के दिल के पिंजरे में कैद हुई राखी ने उस के अतीत में झांका तो उसे ऐसा लगा जैसे उस के पैरों तले जमीन खिसक गई हो. राखी के सपनों का महल रेत की दीवार की तरह भरभरा कर ढह गया. क्योंकि डी.पी. सिंह पहले से शादीशुदा था. उस ने यह बात छिपा कर रखी थी. राखी को जब यह सच्चाई दूसरों से पता चली तो उसे गहरा धक्का लगा. वह डाक्टर से नाराज हो कर गोंडा चली गई. वहां वह बीएड की पढ़ाई करने लगी.

डा. डी.पी. सिंह राखी के अचानक मुंह मोड़ लेने से तड़प कर रह गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि अचानक राखी उस से रूठ क्यों गई. डी.पी. सिंह से जब राखी की जुदाई बरदाश्त नहीं हुई तो उस ने राखी से बात की, ‘‘क्या बात है राखी, तुम अचानक रूठ कर क्यों गईं? जाने अनजाने में मुझ से कोई भूल हो गई हो तो मुझे माफ कर दो.’’

‘‘मैं माफी देने वाली कौन होती हूं,’’ राखी तुनक कर बोली.

‘‘अरे बाप रे बाप, इतना गुस्सा!’’ मुसकराते हुए डी.पी. सिंह ने कहा.

‘‘ये गुस्सा नहीं दिल की टीस है, जो आप ने दी है डाक्टर साहब.’’ राखी के चेहरे पर दिल का दर्द छलक आया.

आश्चर्य से डा. डी.पी. सिंह ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारे दिल को ऐसी कौन सी टीस दे दी कि तुम मुझ से रूठ गईं और शहर छोड़ कर चली गईं. तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुम से कितना प्यार करता हूं.’’

‘‘डाक्टर साहब, आप इतनी बड़ी बड़ी बातें कर रहे हो. ये बताओ, आप ने अपनी जिंदगी की इतनी बड़ी सच्चाई मुझ से क्यों छिपाई? आप ने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि आप शादीशुदा हो.’’

‘‘हां, यह सच है कि मैं शादीशुदा हूं. यह भी सच है कि मुझे तुम्हें यह सच्चाई पहले बता देनी चाहिए थी लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ बीच में बात काटते हुए राखी बोली.

‘‘बताने का मौका ही नहीं मिला,’’ डा. सिंह ने सफाई दी, ‘‘मैं तुम्हें अपने जीवन की यह सच्चाई बताने वाला था, लेकिन बताने का मौका नहीं मिला. इस बात का मुझे दुख है.’’

‘‘तो फिर अब यहां क्या लेने आए हैं?’’

‘‘अपने प्यार की भीख. मैं तुम से अपने प्यार की भीख मांगता हूं राखी. तुम मेरा प्यार मुझे लौटा दो. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता. फिर मैं यहां से चला जाऊंगा.’’

‘‘ठीक है, लेकिन मेरी भी एक शर्त है.’’ राखी बोली.

‘‘क्या शर्त है तुम्हारी?’’

‘‘यही कि आप को मुझ से शादी करनी होगी. मेरी यह शर्त मंजूर है तो बताओ?’’

‘‘मुझे तुम्हारी यह शर्त मंजूर है. मैं तुम से शादी करने के लिए तैयार हूं. शादी के बाद तुम्हें पत्नी की नजरों से बचा कर ऐसी जगह रखूंगा, जहां तुम पर किसी की नजर न पड़ सके.’’

राखी ने सभी गिलेशिकवे भुला दिए.

राखी बन गई डाक्टर की दूसरी पत्नी

सन 2011 के फरवरी में राखी और डा. डी.पी. सिंह ने परिवार वालों से छिप कर गोंडा जिले के आर्यसमाज मंदिर में प्रेम विवाह कर लिया. प्रेमी प्रेमिका दोनों पतिपत्नी बन गए. लेकिन यह बात राखी के परिवार वालों से ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रही.

राखी के पिता हरेराम श्रीवास्तव को बेटी द्वारा एक शादीशुदा आदमी से शादी करने की बात पता चली तो उन्हें गहरा सदमा पहुंचा. वह इस सदमे को सहन नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. उस के बाद राखी के परिवार वालों ने उस से हमेशा हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया.

शादी के बाद डी.पी. सिंह ने दूसरी पत्नी राखी के रहने के लिए गोरखपुर के शाहपुर क्षेत्र की पौश कालोनी सरस्वतीपुरम में एक आलीशान मकान खरीद दिया. राखी इसी मकान में रहती थी. हौस्पिटल से खाली होने के बाद डी.पी. सिंह राखी से मिलने उस के पास आता था. घंटों साथ बिता कर वह पहली पत्नी ऊषा सिंह के पास चला जाता था. उस के साथ कुछ समय बिता कर रात में राखी के पास आ जाता.

पहली पत्नी को पता चल गई डाक्टर की हकीकत 

डी.पी. सिंह की पहली पत्नी ऊषा सिंह देख समझ रही थी कि उस के पति के स्वभाव और रहनसहन में काफी तब्दीलियां आ गई हैं. वह उस में पहले की अपेक्षा कम दिलचस्पी ले रहा था. रात रात भर घर से गायब रहता था. वह रात में कहां जाता था, उसे कुछ भी नहीं बताता था. वह बताता भी तो क्या.

हालांकि वह जानता था कि जिस दिन यह सच पहली पत्नी ऊषा को पता चलेगा तो उस की खैर नहीं. आखिरकार डी.पी. सिंह का अंदेशा सच साबित हुआ. ऊषा को पति पर शक हो गया और उस ने पति की दिनचर्या की खोजबीन शुरू कर दी.

ऊषा से पति की सच्चाई ज्यादा दिनों नहीं छिप पाई. आखिर पूरा सच उस के सामने खुल कर आ गया. उस ने भी तय कर लिया कि अपने जीते जी वह अपने सिंदूर का बंटवारा हरगिज नहीं करेगी. या तो सौतन को मार देगी या खुद मर जाएगी.

इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच विवाद खड़ा हो गया. दूसरी औरत राखी को  ले कर ऊषा ने पति को आड़े हाथों लिया तो डी.पी. सिंह की बोलती बंद हो गई. वह हैरान था कि उस की सच्चाई पत्नी तक कैसे पहुंची, जबकि उस ने इस राज को काफी गहराई तक छिपा रखा था.

पत्नी के सामने सच्चाई आने के बाद डी.पी. सिंह की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई. वह न तो पत्नी को छोड़ सकता था और न प्रेमिका से पत्नी बनी राखी के बिना रह सकता था. उस की हालत 2 नावों के सवार जैसी थी. इस के बावजूद वह दोनों नावों को डूबने नहीं देना चाहता था. डी.पी. सिंह किसी निष्कर्ष पर पहुंचता, इस से पहले ही पहली पत्नी ऊषा ने डी.पी. सिंह के खिलाफ कैंट थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया.

भले ही ऊषा ने उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था, डी.पी. सिंह ने इस की कोई परवाह नहीं की. वजह यह थी कि राखी मां बनने वाली थी. राखी और डी.पी. सिंह दोनों इसे ले कर काफी खुश थे. आने वाले बच्चे के भविष्य को ले कर संजीदा थे. समय आने पर राखी ने हौस्पिटल में बेटी को जन्म दिया. लेकिन वह मां की गोद तक जाने से पहले ही दुनिया छोड़ गई. बेटी की मौत ने राखी को झकझोर कर रख दिया. नवजात शिशु की मौत का असर डी.पी. सिंह पर भी पड़ा.

डाक्टर को होने लगा गलती का पछतावा

डी.पी. सिंह को अपने किए का पश्चाताप होने लगा था. वक्त के साथ स्थितियां बदल गईं. उसे लगने लगा कि राखी की खूबसूरती महज एक छलावा था. असल जीवनसाथी तो ऊषा है. अब डा. डी.पी. सिंह अपनी भूल सुधारने के लिए पत्नी की ओर आकर्षित होने लगा. उस ने अपनी भूल सुधारने के लिए ऊषा से एक मौका मांगा, साथ ही वादा किया कि अब ऐसा कभी नहीं होगा.

पति के वादे पर ऊषा को भरोसा नहीं था. सालों तक वह उस की पीठ पीछे रंगरलियां मनाता रहा था. यहां तक कि उसे भनक तक नहीं लगने दी थी. यही सब सोच कर ऊषा ने उसे माफ नहीं किया बल्कि फैसला पति पर छोड़ दिया.

दूसरी ओर डी.पी. सिंह ने राखी से बिलकुल ही मुंह मोड़ लिया. डी.पी. सिंह में पहले से काफी बदलाव आ गया था. लेकिन राखी को यह मंजूर नहीं था कि उस का पति उसे छोड़ कर पहली पत्नी के पास जाए.

राखी ने डी.पी. सिंह को चेतावनी दे दी कि अगर वह उसे छोड़ कर पहली पत्नी के पास गया तो इस का परिणाम भुगतने को तैयार रहे. जब उस ने प्यार के लिए अपना घरबार सब छोड़ दिया तो वह रिश्ता तोड़ने से पहले अच्छी तरह सोच ले.

राखी की चेतावनी ने डा. डी.पी. सिंह के संपूर्ण अस्तित्व को हिला कर रख दिया. वह जानता था कि राखी जिद्दी स्वभाव की है, जो ठान लेती है, कर के रहती है. घरगृहस्थी को बचाने के लिए डी.पी. सिंह धीरेधीरे राखी से किनारा करने लगा.

राखी समझ गई थी कि डी.पी. सिंह उस से बचने के लिए किनारा कर रहा है. डी.पी. सिंह ने भले ही राखी से दूरी बनानी शुरू कर दी थी, लेकिन उस के खर्चे में कमी नहीं की थी. उसे वह उस की मुंहमांगी रकम देता था.

राखी मांगने लगी अपना हक

यह अलग बात है कि राखी रुपए नहीं, अपना पूरा हक चाहती थी. उसे दूसरी औरत बन कर रहना मंजूर नहीं था. वह पत्नी का पूरा अधिकार चाहती थी. जबकि डी.पी. सिंह पहली पत्नी ऊषा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था. राखी उस पर दबाव बनाने लगी थी कि वह ऊषा को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर उस के पास आ जाए. लेकिन डी.पी. सिंह ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया था.

राखी ने सोच लिया था कि वह तो बरबाद हो गई है, पर उसे भी इतनी आसानी से मुक्ति नहीं देगी. डाक्टर को सबक सिखाने के लिए साल 2017 के शुरुआती महीने में राखी ने राजधानी लखनऊ के चिनहट थाने में डा. डी.पी. सिंह के खिलाफ अपहरण और गैंगरेप का मुकदमा दर्ज करा दिया.

यही नहीं उस ने गोरखपुर के महिला थाने में भी डा. सिंह के खिलाफ महिला उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया. एक साथ 2-2 मुकदमे दर्ज होते ही डा. सिंह के होश उड़ गए. गैंगरेप का मुकदमा दर्ज होते ही डी.पी. सिंह की शहर ही नहीं, पूर्वांचल भर में थूथू होने लगी. इस के चलते हौस्पिटल बुरी तरह प्रभावित हो गया. मरीज उस के क्लीनिक पर आने से कतराने लगे.

गैंगरेप केस ने डी.पी. सिंह की इज्जत पर बदनुमा दाग लगा दिया था. लोग उसे हिकारत भरी नजरों से देखने लगे और उस पर अंगुलियां उठने लगीं. इस से उस की सामाजिक प्रतिष्ठा की खूब छिछालेदर हुई. अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए डी.पी. सिंह ने राखी से केस वापस लेने को कहा और उसे मुंहमांगी रकम देने का औफर दिया.

राखी ने उस के सामने सरस्वतीपुरम कालोनी की उस आलीशान कोठी की रजिस्ट्री अपने नाम कराने की शर्त रखी, जिस में वह रह रही थी. वह कोठी करोड़ों की थी. इस के लिए डी.पी. सिंह तैयार नहीं हुआ. उस ने बात टाल दी.

धी रेधीरे डा. डी.पी. सिंह का राखी से मोह खत्म हो गया. दोनों के बीच का प्यार टकराव में बदल गया. कल तक जिस राखी की गंध डी.पी. सिंह की रगों में खून के साथ बहती थी, अब वह दुर्गंध बन गई थी. टकराव की स्थिति में डी.पी. सिंह का जीना मुश्किल हो गया था. उस की पलपल की खुशियां छिन गई थीं. राखी द्वारा पैदा की गई दुश्वारियों से डी.पी. सिंह बौखला गया और उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगा.

राखी को हो गया फौजी मनीष से प्यार

इस बीच राखी के जीवन में एक नई कहानी की कड़ी जुड़ गई थी. सरस्वतीपुरम कालोनी में जहां राखी रहती थी, उसी के पड़ोस में मनीष कुमार श्रीवास्तव नाम का एक खूबसूरत और स्मार्ट युवक रहता था. वह आर्मी का जवान था और अपने एक रिश्तेदार के घर अकसर जाताआता था. वह मूलरूप से बिहार के गया जिले का रहने वाला था.

डी.पी. सिंह से रिश्ते खराब होने के बाद राखी अकेलापन दूर करने के लिए मनीष से नजदीकियां बढ़ाने लगी. मनीष भी राखी की खूबसूरती पर फिदा हो गया. थोड़ी मुलाकातों के बाद दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. अंतत: फरवरी 2018 में राखी और मनीष ने कोर्टमैरिज कर ली.

शादी के बाद राखी मनीष के साथ गया चली गई. उस ने मनीष से अपने अतीत की सारी बातें बता दीं. मनीष समझदार और सुलझा हुआ इंसान था. वह राखी को समझाता रहता था. मनीष को पत्नी की अतीत की कहानी सुन कर उस के साथ सहानुभूति हो गई. उस ने राखी को समझाया कि जो बीत गया, उसे याद करने से कोई फायदा नहीं है. उसे बुरा सपना समझ कर भुला दो.

राखी ने भले ही मनीष से शादी कर ली थी, लेकिन अपने पहले प्यार डी.पी. सिंह को अपने दिल से निकाल नहीं पाई थी. डा. डी.पी. सिंह जान चुका था कि राखी ने दूसरी शादी कर ली है. डी.पी. सिंह ही नहीं वरन राखी का बड़ा भाई अमर प्रकाश भी इस बात को जान चुका था कि राखी ने दूसरी शादी कर ली है. राखी के इस कृत्य पर उस ने बहन को काफी डांटाफटकारा भी था और समझाया भी था.

दरअसल परिवार वालों ने राखी से संबंध तोड़ लिए थे. एक अमर ही था जिसे राखी की परवाह थी. वह उसे अकसर फोन कर के उस का हालचाल पूछ लेता था. राखी के इस बार के कृत्य से वह दुखी था और उस ने राखी से बात करनी बंद कर दी थी.

इधर राखी डी.पी. सिंह को बारबार फोन कर के मकान की रजिस्ट्री अपने नाम कराने का दबाव बना रही थी. राखी के दबाव बनाने से डी.पी. सिंह परेशान हो गया था. उस का दिन का चैन और रात की नींद उड़ चुकी थी. इस मुसीबत से निजात पाने के लिए वह राखी को रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगा.

इस के लिए उस ने 5 बार योजना बनाई, लेकिन पांचों बार अपने मकसद में असफल रहा. अब आगे वह अपने मकसद में असफल नहीं होना चाहता था, इसलिए इस बार उस ने अपने हौस्पिटल के 2 कर्मचारियों देशदीपक निषाद और प्रमोद कुमार सिंह को पैसों का लालच दे कर साथ मिला लिया.

सब कुछ डा. डी.पी. सिंह की योजना के अनुसार चल रहा था. डी.पी. सिंह ने भले ही राखी से कन्नी काट ली थी, लेकिन राखी से फोन पर बात करनी बंद नहीं की थी. ऐसा वह राखी को विश्वास में लेने के लिए कर रहा था. राखी समझ रही थी कि डी.पी. सिंह अभी भी उस से प्यार करता है. राखी डी.पी. सिंह की इस योजना को समझ नहीं पाई. वह उस पर पहले जैसा ही यकीन करती रही.

31 मई, 2018 की बात है. राखी पति मनीष के साथ नेपाल के भैरहवा घूमने गई थी. 2 जून की सुबह पति से नजरें बचा कर उस ने डी.पी. सिंह को फोन कर के बता दिया कि वह भैरहवा घूमने आई है.

यह जान कर डी.पी. सिंह को लगा जैसे खुदबखुद उस की मुराद पूरी हो गई हो. वह जो चाह रहा था, वैसी स्थिति खुदबखुद बन गई. उस ने राखी से कहा कि वह भैरहवा में रुकी रहे. वह भी उस से मिलने आ रहा है. दूसरी ओर भैरहवा घूमने के बाद मनीष ने राखी से घर वापस चलने को कहा तो उस ने कुछ जरूरी काम होने की बात कह कर मनीष को अकेले ही घर वापस भेज दिया. मनीष अकेला ही गोरखपुर वापस लौट आया. वह कुछ दिनों की छुट्टी पर आया हुआ था.

डाक्टर ने रच ली थी खूनी साजिश

2 जून, 2018 को डा. डी.पी. सिंह, देशदीपक निषाद और प्रमोद कुमार सिंह के साथ स्कौर्पियो से नेपाल गया. नेपाल जाते हुए प्रमोद कुमार गाड़ी चला रहा था, जबकि देशदीपक निषाद ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठा था और डा. सिंह पिछली सीट पर.

दोपहर के समय ये लोग सोनौली (भारत-नेपाल सीमा) होते हुए नेपाल पहुंचे. प्रमोद कुमार ने सोनौली बौर्डर पार करते हुए भंसार बनवाया था. भंसार बनवाने के लिए प्रमोद के ड्राइविंग लाइसेंस की कौपी लगाई गई थी. भंसार नेपाल द्वारा लगाया जाने वाला एक टैक्स होता है जो भारत से नेपाल सीमा में आने वाले वाहनों पर लगता है.

नेपाल के भैरहवा में राखी सड़क पर बैग लिए खड़ी इंतजार करती मिली. राखी से डी.पी. सिंह की बात नेपाल के नंबर से हुई थी. डी.पी. सिंह ने अपना मोबाइल जानबूझ कर घर पर छोड़ दिया था, ताकि जांचपड़ताल के दौरान पुलिस उस पर शक न कर सके.

राखी ने बताया कि वह भैरहवा में सड़क किनारे अकेली खड़ी है. राखी डी.पी. सिंह के पास गाड़ी में बैठ गई. वहां से चारों लोग पोखरा के लिए निकले. इन लोगों ने बुटवल से थोड़ा आगे और पालपा से पहले नाश्ता किया.

सभी लोग बुटवल से लगभग 100 किलोमीटर आगे मुलंग में एक छोटे होटल में रुके. इन लोगों ने होटल में 2 रूम बुक किए थे. डी.पी. सिंह और राखी एक कमरे में ठहरे थे. इस के बाद सुबह लगभग 11 बजे ये लोग खाना खा कर पोखरा के लिए निकले.

शाम को लगभग 4-5 बजे सभी पोखरा पहुंचे और डेविस फाल घूमे. इस के बाद राखी ने शौपिंग की, फिर सभी ने पोखरा में ही नाश्ता किया. इस के बाद ये लोग पहाड़ के ऊपर सारंगकोट नामक जगह पर होटल में रुके. इस होटल में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे. डा. डी.पी. सिंह ने खुद इस होटल का चुनाव किया था. होटल में इन लोगों ने पहले चाय पी और बाद में शराब. राखी की चाय में डी.पी. सिंह ने एल्प्रैक्स का पाउडर मिला दिया था.

रात के लगभग 11 बजे दवा ने अपना असर दिखाया तो राखी की तबीयत खराब होने लगी. यह देख डा. डी.पी. सिंह ने इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं. उस ने राखी को लातघूंसों से जम कर मारापीटा. मारपिटाई में एक लात राखी के पेट में ऐसी लगी कि वह अर्द्धचेतना में चली गई. थोड़ी देर में उस की सांसें भी बंद हो गईं.

उस की मौत के बाद तीनों राखी की लाश को ले कर उसी रात पोखरा के लिए निकल गए. लाश की शिनाख्त न हो सके, तीनों शातिरों ने राखी का मतदाता पहचानपत्र, मोबाइल फोन, नेपाल रिचार्ज कार्ड कीमत 100 रुपए, सहित कई सामान अपने पास रख लिए थे.

इस के बाद इन लोगों ने राखी को गाड़ी से निकाला और पहाड़ से नीचे धक्का दे दिया और फिर नेपाल से वापस घर लौट आए.

3 जून, 2018 को झाड़ी से नेपाल पुलिस ने राखी की लाश बरामद की. लेकिन उस की शिनाख्त नहीं हुई. नेपाल पुलिस ने लाश का पोस्टमार्टम कराया तो राखी की मौत का कारण पेट फटना सामने आया. पोखरा पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

इधर मनीष पत्नी को ले कर परेशान था कि उस ने काम निपटा कर शाम तक घर वापस लौटने को कहा था, लेकिन न तो वह घर आई और न ही उस का फोन काम कर रहा था.

मनीष पर ही किया गया शक

मनीष फिर नेपाल के भैरहवा पहुंचा, जहां वह पत्नी के साथ रुका था. वहां जाने पर उसे पता चला कि राखी 2 जून को यहां से चली गई थी. इस के बाद वह कहां गई, किसी को पता नहीं था. 2 दिनों तक मनीष राखी को भैरहवा में खोजता रहा. जब वह नहीं मिली तो 4 जून को मनीष ने फोन कर के इस की सूचना राखी के बड़े भाई अमर प्रकाश श्रीवास्तव को दे दी.

अमर प्रकाश श्रीवास्तव ने राखी के पति मनीष कुमार श्रीवास्तव पर शक जताते हुए गोरखपुर के शाहपुर थाने में मनीष के खिलाफ बहन के अपहरण और जान से मारने की धमकी का मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने काररवाई करते हुए मनीष को गिरफ्तार कर लिया.

जांचपड़ताल में वह कहीं भी दोषी नहीं पाया गया. अंतत: पुलिस ने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. उधर नेपाल पुलिस ने लाश की शिनाख्त के लिए लाश की कुछ तसवीरें गोरखपुर आईजी जोन जयप्रकाश सिंह के कार्यालय भिजवा दीं. आईजी जोन ने इस की जिम्मेदारी आईजी एसटीएफ अमिताभ यश को सौंप दी. अमिताभ यश ने एसएसपी एसटीएफ अभिषेक सिंह को जांच सौंप दी.

मनीष ने खुद किया जांच में सहयोग

इस बीच मनीष ने आईजी से मिल कर राखी के लापता होने की जांच की मांग की और खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे से बरी करने की गुहार लगाई. मनीष के आवेदन पर एसटीएफ ने अपने विभाग के तेजतर्रार सिपाहियों यशवंत सिंह, अनूप राय, धनंजय सिंह, संतोष सिंह, महेंद्र सिंह आदि को लगाया.

एसटीएफ की जांचपड़ताल में राखी के मोबाइल की लोकेशन गुवाहाटी में मिली. फिर एक दिन अचानक राखी की डेडबौडी की फोटो सिपाही राजीव शुक्ला के सामने आई तो वह पहचान गया. इस क्लू ने डा. डी.पी. सिंह की साजिश का परदाफाश कर दिया. पुलिस ने जब डा. डी.पी. सिंह को गिरफ्तार कर के पूछताछ की तो सारी सच्चाई सामने आ गई.

डी.पी. सिंह के बयान के बाद उस के दोनों कर्मचारी देशदीपक निषाद और प्रमोद कुमार सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया. दोनों ने राखी की हत्या करने और डी.पी. सिंह का साथ देने का अपना जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए डी.पी. सिंह ने राखी के मोबाइल को गुवाहाटी भिजवा दिया था, ताकि पुलिस को लगे कि राखी जिंदा है और वह गुवाहाटी में है. लेकिन पुलिस ने उस के गुनाहों को बेपरदा कर दिया.

घटना के बाद डी.पी. सिंह ने राखी के दूसरे प्रेमी को फंसाने की योजना बनाई थी. लेकिन उस की यह योजना धरी का धरी रह गई. एसटीएफ ने डी.पी. सिंह और उस के साथियों के पास से राखी का मतदाता पहचान पत्र, मोबाइल फोन, 100 रुपए का नेपाल रिचार्ज कार्ड व अन्य सामान बरामद कर लिया. नेपाल पुलिस ने अपने यहां हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया था. डी.पी. सिंह और उस के दोनों साथियों पर दोनों देशों में एक साथ मुकदमा चलाया जाएगा. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story : घर में घुसकर कैंची से काटा प्रेमिका का गला

Love Story  विभा और रोहित ने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में साथसाथ स्ट्रगल किया था. वहीं दोनों में दोस्ती और तथाकथित प्यार हुआ. जब थकहार कर विभा अपने घर लौट आई तो रोहित ने उसे उसी के घर में बंधक बना कर 12 घंटे तक ऐसा हाईवोल्टेज ड्रामा किया कि…

जिस ने भी सुना, उस ने मिसरोद का रास्ता पकड़ लिया. कोई सिटी बस से गया तो कोई औटो से. किसी ने टैक्सी ली तो कुछ लोग अपने वाहन से मिसरोज जा पहुंचे. बीती 13 जुलाई की अलसुबह मिसरोद में कोई ऐसी डिस्काउंट सेल नहीं लगी थी, जिस में किसी जहाज के डूब जाने से कपड़ा व्यवसायी या निर्माता को घाटे में आ कर मुफ्त के भाव कपड़े बेचने पड़ रहे हों, बल्कि जो हो रहा था, वह निहायत ही दिलचस्प और अनूठा ड्रामा था, जिसे भोपाल के लोग रूबरू देखने का मौका नहीं चूकना चाहते थे. भोपाल होशंगाबाद रोड पर पड़ने वाला मिसरोद कस्बा अब भोपाल का ही हिस्सा बन गया है. इस इलाके में तेजी से जो रिहायशी कालोनियां विकसित हुई हैं, उन में से एक है फौर्च्यून डिवाइन सिटी.

इस कालोनी में खासे खातेपीते लोग रहते हैं. इन्हीं में से एक हैं बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) से रिटायर हुए एम.पी. श्रीवास्तव. एजीएम जैसे अहम पद से रिटायर्ड एम.पी. श्रीवास्तव ने वक्त रहते फौर्च्यून डिवाइन सिटी में फ्लैट ले लिया था. एम.पी. श्रीवास्तव नौकरी से तो रिटायर हो गए थे, लेकिन जवान हो गई दोनों बेटियां विभा और आभा की शादी की चिंता से मुक्त नहीं हो पाए थे. रिटायरमेंट के बाद उन का अधिकांश समय बेटियों के लिए योग्य वर ढूंढने में गुजर रहा था. साधनसंपन्न घर में सब कुछ था. साथ ही खुशहाल परिवार में 2 होनहार बेटियां और कुशल गृहिणी साबित हुई उन की पत्नी चंद्रा, जिन्हें पति से ज्यादा बेटियों के हाथ पीले होने की चिंता सताती थी.

13 जुलाई को श्रीवास्तवजी के फ्लैट नंबर 503 में जो चहलपहल हुई, उस की उम्मीद श्रीवास्तव दंपति ने सपने में भी नहीं की थी. ऐसी शोहरत जिस से हर शरीफ शहरी बचना चाहता है, कैसी और क्यों थी, पहले उस की वजह जान लेना जरूरी है. इस संभ्रांत संस्कारी कायस्थ परिवार की बड़ी बेटी का नाम विभा है, जिस की उम्र 31 साल है. विभा पढ़ाईलिखाई में तो होशियार है ही, साथ ही उस की पहचान उस के सांवले सौंदर्य की वजह से भी है. एमटेक करने के बाद महत्त्वाकांक्षी विभा ने बजाय नौकरी करने के मुंबई का रास्ता पकड़ लिया था. चाहत थी मौडल बनने की.

विभा महत्त्वाकांक्षी ही नहीं, बल्कि प्रतिभावान भी थी. इसी के चलते करीब 3 साल पहले एक समारोह में कायस्थ समाज ने उसे सम्मानित भी किया था. उसी साल विभा ने एक ब्यूटी कौंटेस्ट में भी हिस्सा लिया था, जिस में वह विजेता रही थी. इस सब से उत्साहित विभा को भी लगने लगा था कि अगर कोशिश की जाए तो उस के लिए सेलिब्रिटी बनना कोई मुश्किल काम नहीं है. उस ने अपनी यह इच्छा मांबाप को बताई तो उन्होंने उसे निराश नहीं किया. उन लोगों ने उसे मुंबई जाने की इजाजत दे दी.

मौडलिंग और फिल्मों में काम करने की सोच लेना तो आसान काम है, लेकिन ग्लैमर की इस दुनिया में अपना मुकाम बनाना हंसीखेल नहीं है. यह बात विभा को मुंबई जा कर समझ आई. लेकिन विभा हिम्मत हारने वालों में से नहीं थी. वह  काम हासिल करने के लिए लगातार संघर्ष करती रही. बोलचाल की भाषा में कहें तो वह स्ट्रगलर थी.  मुंबई में रोजाना हजारों स्ट्रगलर हाथ में एलबम लिए निर्मातानिर्देशकों और नामी कलाकारों के यहां धक्के खाते हैं. सचमुच दाद देनी होगी ऐसे नवोदित कलाकारों को, जो सुबह उठ कर देर रात तक चलते दौड़ते नहीं थकते. उस वक्त उन के जेहन में उन नामी कलाकारों के संघर्ष की छवि बसी होती है जो कभी उन्हीं की तरह स्ट्रगलर थे.

मीडिया भी ऐसे किस्से खूब बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है. मसलन देखो कल का चाय या फल बेचने वाला या फिर पेशे से कंडक्टर कैसे शोहरत के शिखर पर पहुंच गया और अब अरबों की दौलत का मालिक है. कामयाब होना है तो धक्के तो खाने ही पड़ेंगे, यह बात मुंबई पहुंचने वाला हर स्ट्रगलर जानता है. विभा भी जानती थी. स्ट्रगल के दौरान विभा की मुलाकात रोहित नाम के युवक से हुई जो खुद भी स्ट्रगलर था. मूलत: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ का रहने वाला रोहित भी छोटामोटा कलाकार था और किसी बड़े मौके की तलाश में था. विभा और रोहित की जानपहचान पहले दोस्ती में और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई, इस का अहसास दोनों को उस वक्त हुआ, जब रोहित ने विभा पर बेजा हक जमाना शुरू कर दिया.

छोटे शहरों की बनिस्बत मुंबई की दोस्ती और (Love Story) प्यार में फर्क कर पाना बेहद मुश्किल काम है. वजह यह कि फिल्म इंडस्ट्री में कोई वर्जना नहीं होती. वहां कलाकार की पहचान उस की कामयाबी के पैमाने से होती है, जबकि विभा और रोहित अभी कामयाबी के सब से निचले पायदान पर खड़े थे. कामयाबी की सोचना तो दूर की बात है, अभी उन के कदम जरा भी आगे नहीं बढ़ पाए थे. जमीन पर खड़ेखड़े ही विभा को अहसास हो गया था कि जितना उसे मिलना था, उतना मिल चुका. लिहाजा अब वापस भोपाल लौट जाए और मम्मीपापा जहां कहें, वहां शादी कर ले. वजह यह कि रोहित उस पर शादी के बाबत दबाव बनाने लगा था जो उस से बरदाश्त नहीं हो पा रहा था.

पर वापसी के पहले विभा ने एक आखिरी कोशिश इस सोच के साथ शौर्ट मूवी बना कर की थी कि अगर मूवी चल निकली तो आगे के रास्ते और किस्मत के दरवाजे खुदबखुद खुलते चले जाएंगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उलटे जो हुआ वह उस की बनाई रील का रीयल लाइफ में उतर आना था. अपनी बनाई मूवी में विभा ने अपनी पूरी कल्पनाशीलता, रचनात्मकता और प्रतिभा झोंक दी थी. इस मूवी की प्रोड्यूसर उस की छोटी बहन आभा थी. मूवी के कथानक के आधार पर उस ने उस का नाम फ्रायडे नाइट रखा था. फ्रायडे नाइट की कहानी मसालों से भरपूर थी, जिस की शूटिंग विभा ने अपने ही फ्लैट पर की थी. इस कहानी की मुख्य पात्र भी वही थी, जो एक लड़के से प्यार करने लगती है. लड़का विभा को धोखा दे देता है तो वह तिलमिला उठती है.

इस के पहले वह अपने प्रेमी के सामने रोतीगिड़गिड़ाती है, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता. एक वक्त ऐसा भी आता है, जब विभा की हालत पागलों जैसी हो जाती है और इसी गुस्से में वह एक सख्त फैसला ले लेती है. यह सख्त फैसला होता है अपने बेवफा प्रेमी का कत्ल कर देने का, जिसे वह एक शुक्रवार की रात को अंजाम देती है. विभा को लगा था कि उस की फिल्म बाजार में आते ही हाहाकार मचा देगी और बौलीवुड उसे हाथोंहाथ ले लेगा. अपनी फिल्म को ले कर विभा ने कई चैनलों के चक्कर लगाए, लेकिन उसे किसी ने भाव नहीं दिया. अंतत: उस ने 2 साल पहले इस फिल्म को यूट्यूब पर अपलोड कर दिया. यूट्यूब पर भी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं मिले. फ्रायडे नाइट को देखने वालों की संख्या मुश्किल से 5 अंकों में पहुंच पाई.

13 जुलाई को हजारों लोग विभा के पांचवीं मंजिल स्थित उस फ्लैट की तरफ उत्सुकता से देख रहे थे, जहां कभी फ्रायडे नाइट की शूटिंग हुई थी. इन में कितने ही लोग उस वीडियो को भी देख रहे थे जिसे रोहित ने वायरल किया था. इस वीडियो में रोहित लाल बनियान में नजर आ रहा था और विभा पलंग पर बेहोश पड़ी थी. वीडियो में रोहित गुहार लगाता नजर आ रहा था कि देखो पुलिस और विभा के घर वाले हम बच्चों पर कितना जुल्म ढा रहे हैं. रोहित के मुताबिक वह और विभा दोनों एकदूसरे से प्यार (Love Story) करते थे और शादी करना चाहते थे. लेकिन विभा के घर वाले इस के लिए तैयार नहीं थे. आज जब वह विभा से मिलने आया तो उन्होंने पुलिस बुला ली. पुलिस वालों ने दोनों की इतनी पिटाई की कि शरीर के कई हिस्सों से खून बह रहा है. उस ने बहता हुआ खून भी दिखाया.

वीडियो वायरल होने की देर थी कि लोग मुफ्त का तमाशा देखने मिसरोद की तरफ दौड़ पड़े. रोहित का यह कहना गलत नहीं था कि विभा के घर वालों ने पुलिस बुला ली है. पुलिस घटनास्थल पर मौजूद तो थी लेकिन यह सोच कर सकपकाई हुई थी कि इस सिचुएशन से कैसे निपटा जाए. मतलब यह कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी विभा की जान भी बच जाए और रोहित को गिरफ्तार भी कर लिया जाए.  दरअसल उस दिन सुबह करीब 7 बजे मिसरोद थाना इंचार्ज एस.के. चौकसे को एम.पी. श्रीवास्तव के फोन पर इत्तला दी थी कि रोहित नाम के एक युवक ने उन के फ्लैट में जबरन घुस कर उन की बड़ी बेटी विभा को फ्लैट के आखिरी कमरे में बंधक बना रखा है. उन्हें यह बात तब पता चली जब वह दूध लेने फ्लैट से बाहर निकले थे.

मामला गंभीर था और संभ्रांत कालोनी से ताल्लुक रखता था, इसलिए 3 सदस्यीय पुलिस टीम जल्द ही फार्च्यून डिवाइन सिटी पहुंच गई. पुलिस दल का नेतृत्व एसआई एस.एस. राजपूत कर रहे थे. उन्होंने सारा मामला समझ कर रोहित को बहलाफुसला कर काबू में करने की कोशिश की लेकिन वह कामयाब नहीं हुए. सुबहसुबह पुलिस को आया देख कालोनी के लोग विभा के घर के नीचे इकट्ठा हो कर माजरा समझने की कोशिश करने लगे थे. उन्हें इतना ही पता चल पाया कि श्रीवास्तवजी के घर कोई सिरफिरा घुस आया है, जिस ने उन की बड़ी बेटी को बंधक बना लिया है और तरहतरह की धमकियां दे रहा है.

रोहित को इस बात की आशंका थी कि विभा के मातापिता पुलिस को बुलाएंगे इसलिए वह सतर्क था. एम.पी. श्रीवास्तव उन की पत्नी चंद्रा और छोटी बेटी आभा हलकान थीं कि अंदर कमरे में विभा पर रोहित जाने क्याक्या जुल्म ढा रहा होगा. इस डर की वजह रोहित के हाथ में देसी कट्टे का होना था. एसआई राजपूत ने रोहित से बात करने की कोशिश की तो उस ने मोबाइल चार्जर की मांग की. राजपूत से चार्जर लेने के लिए रोहित ने दरवाजा थोड़ा खोला तो उन्होंने हाथ अड़ा कर पूरा दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन रोहित इस स्थिति के लिए तैयार था. उस ने कैंची से राजपूत के हाथ पर हमला कर दिया और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी. चोट से तिलमिलाए एसआई राजपूत ने हाथ वापस खींच लिया तो रोहित ने चार्जर ले कर कमरा फिर से बंद कर लिया.

पुलिस को आया देख विभा की हिम्मत बढ़ी और उस ने रोहित का विरोध किया. इस पर झल्लाए रोहित ने विभा के हाथ और गले पर कैंची से वार कर के उसे घायल कर दिया. खून बहने से विभा बेहोश हो गई तो उस ने उसे बिस्तर पर पटक दिया और इसी हालत में वीडियो शूट कर वाट्सऐप पर डाल दिया. इस वीडियो के वायरल होते ही भोपाल में हड़कंप मच गया. थोड़ी देर में पुलिस के आला अफसर भी मौके पर पहुंच गए. एसपी (साउथ) राहुल लोढा ने भी रोहित से बातचीत कर के उस की मंशा जाननी चाही. शुरू में तो वह बात करने से कतराता रहा लेकिन खामोश रहने से बात नहीं बन रही थी, इसलिए उस ने जल्द ही अपने दिल की बात जाहिर कर दी कि वह विभा से प्यार करता है और उस से शादी करना चाहता है.

इस दौरान पुलिस ने रोहित के पिता को भी खबर कर दी थी, इसलिए वह अलीगढ़ से भोपाल के लिए निकल गए थे. दरअसल, रोहित की एक शर्त यह भी थी कि वह अपने पिता के आने के बाद ही दरवाजा खोलेगा. यह पुलिस और प्रशासन का इम्तिहान था. वजह अपनी पर उतारू हो आया रोहित विभा को जान से भी मार सकता था. ऐसे में पुलिस वालों ने उस की हर बात मानने में ही भलाई समझी और लगातार उस से बात कर के उसे उलझाए रखा.

रोहित ने दूध मांगा तो वह भी उसे दिया गया, लेकिन वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं था, इसलिए दूध की बोतल छत से रस्सी से लटका कर दी गई. रोहित ने बोतल का दूध लेने से मना कर दिया क्योंकि उसे डर था कि कहीं उस में कोई नशीला या बेहोश कर देने वाला पदार्थ न हो. इस के बाद उस ने हर चीज पैक्ड मांगी जो उसे मुहैया कराई गई. उधर रोहित द्वारा जारी वीडियो में विभा लहूलुहान और बेहोश दिखाई दे रही थी, जिसे देख कर उस के मांबाप और बहन की चिंता बढ़ती जा रही थी. वीडियो में रोहित एसआई एस.एस. राजपूत को भी कोसता नजर आया. दोपहर होतेहोते स्थिति और विकट हो चली थी. रोहित कुछ समझने को तैयार नहीं था और बारबार विभा से शादी करने की रट लगाए जा रहा था. खाना और पानी भी उसे बालकनी से दिया गया था, जो उस की मांग के मुताबिक पैक्ड था.

जब खूब हल्ला मच गया तो शाम के करीब 5 बजे आला पुलिस अधिकारी हाइड्रोलिक मशीन के जरिए 5वीं मंजिल तक पहुंचे और रोहित से बातचीत की. हाइड्रोलिक मशीन पर राहुल लोढ़ा के साथ एसडीएम दिशा नागवंशी और एएसपी रामवीर यादव थे. इन लोगों ने खिड़की से रोहित से बात की और उसे भरोसा दिलाया कि उस की शादी विभा से करवा दी जाएगी, इस में कोई अड़चन इसलिए नहीं है क्योंकि दोनों बालिग हैं और शादी के लिए राजी हैं. राहुल लोढ़ा ने समझदारी से काम लेते हुए रोहित को आश्वस्त किया कि शादी रजिस्टर्ड होगी, क्योंकि एसडीएम भी उन के साथ हैं. चूंकि बंद कमरे में शादी नहीं करवाई जा सकती थी, इसलिए उन्होंने रोहित से बाहर आने के लिए कहा.

रोहित समझ तो रहा था कि यह पुलिस की चाल भी हो सकती है, लेकिन अब तक 12 घंटे गुजर चुके थे और वह थकने लगा था. वह बारबार विभा को धमका रहा था. होश में आ चुकी विभा की समझ में भी आ गया था कि इस सिरफिरे से छुटकारा पाने का एक ही तरीका है कि उस की बात मान ली जाए. मेरी नहीं हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा. अगर किसी और से शादी की तो मार डालूंगा, जैसे फिल्मी डायलौग बोलने वाले राहुल को थोड़ी तसल्ली तब हुई, जब विभा ने स्टांप पेपर पर शादी की सहमति दे दी. इधर पुलिस वाले भी कुछ इस तरह से पेश आ रहे थे, मानो बाहर आते ही दोनों की शादी करा देंगे. रोहित को लग रहा था कि वह प्यार की जंग जीत गया है, जमाना उस के सामने झुक गया है.

वह पूरी ठसक से बाहर निकल आया. इस के पहले उस ने कुछ मीडियाकर्मियों से वीडियो कालिंग के जरिए बात की और जीत का निशान अंगरेजी का ‘वी’ अक्षर बनाते हुए खुशी जाहिर की थी.  बाहर आते ही पुलिस ने सिरफिरे आशिक रोहित को गिरफ्तार कर लिया और विभा सहित उसे इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया, क्योंकि दोनों के शरीर से काफी खून बह चुका था. वहां गुस्से में मौजूद महिलाओं ने रोहित की जूतेचप्पलों और लातघूसों से खूब धुनाई की. इलाज के बाद रोहित को हिरासत में ले लिया गया और विभा को घर जाने दिया गया. अस्पताल में विभा ने बताया कि वह रोहित से प्यार नहीं करती, उस ने तो खुद के बचाव के लिए शादी के हलफनामे पर दस्तखत कर दिए थे.

विभा की मां चंद्रा ने खुलासा किया कि एक साल से रोहित विभा के पीछे पड़ा था और उसे तरहतरह से तंग कर रहा था. इसी साल होली के मौके पर 28 मार्च को भी वह उन के घर में घुस आया था, तब भी उस के हाथ में कट्टा था. इस की शिकायत थाने में लिखाई गई थी और पुलिस ने रोहित को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन बाद में उसे कोर्ट से जमानत मिल गई थी. इधर मथुरा तक आ गए रोहित के पिता रेशमपाल को जैसे ही ड्रामे के खात्मे की जानकारी मिली, वह वहीं से वापस लौट गए. उन्होंने यह जरूर बताया कि वह रोहित की बेजा हरकतों से आजिज आ चुके हैं. इसीलिए कुछ दिन पहले उन्होंने उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया था. गांव में प्रधानी के चुनाव के दौरान रोहित द्वारा शराब चुराए जाने की बात भी उन्होंने बताई.

रेशमपाल ने ईमानदारी से यह भी बताया कि रोहित ने कई दफा इस लड़की (विभा) से फोन पर उन की बात कराई थी. यानी लोगों का यह अनुमान गलत नहीं था कि मामला उतना एकतरफा नहीं था, जितना विभा बता रही थी. उस ने भले ही रोहित से प्यार की बात नहीं स्वीकारी, पर यह जरूर कह रही थी कि रोहित का असली चेहरा सामने आने के बाद उस ने उस से दूरियां बनानी शुरू कर दी थीं. जाहिर है माशूका की इसी बेरुखी से रोहित झल्लाया हुआ था. उसे विभा बेवफा नजर आने लगी थी, लेकिन वह उसे दिलोदिमाग से निकाल नहीं पा रहा था. गिरफ्तारी के दूसरे दिन रोहित पुलिस वालों से यह कहता रहा कि उन एसपी साहब को लाओ, जिन्होंने शादी करवाने का वादा किया था.

उस के मुंह से यह सुन कर सभी को उस पर हंसी भी आई और तरस भी. पुलिस वाले इस ड्रामे को थर्सडे नाइट कहते नजर आए, क्योंकि इस की शुरुआत गुरुवार 12 जुलाई से हुई थी.  श्रीवास्तव परिवार अभी सदमे से उबरा नहीं है और न ही लंबे समय तक उबर पाएगा. रोहित ने 12 घंटे जो ड्रामा किया, उस की दहशत उन के सिर चढ़ कर बोल रही है. खुद विभा आशंका जता रही है कि अगर रोहित को जमानत मिली तो वह फिर उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा. रोहित के पिता रेशमपाल का भी यही कहना है कि रोहित को जमानत नहीं मिलनी चाहिए. कथा लिखने तक रोहित को जमानत नहीं मिली थी, पर भोपाल के सीनियर वकीलों का कहना है कि कुछ देर से ही सही, उसे जमानत मिल ही जाएगी. इसलिए बदनामी झेल चुके श्रीवास्तव परिवार को संभल कर रहना चाहिए.

 

Murder Story : शादी का दबाव डालने लगी तो प्रेमी ने पैर से पिंकी का गला दबा दिया

पिंकी जैसी लड़कियां भले ही खुद पर कितना भी कौन्फीडेंस रखती हों, लेकिन सच्चाई यह है कि अपने कौन्फीडेंस की वजह से वे किसी न किसी के जाल में फंस ही जाती हैं. पिंकी सोचती थी कि वह जब चाहे रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर की हकीकत सामने ले आएगी. लेकिन उसे नहीं मालूम था कि वह मगरमच्छ है. आखिर वही हुआ जो…

मंजू गुप्ता अपने पति किशन गुप्ता के साथ समाधान दिवस पर कानपुर के थाना चकेरी पहुंची. उस समय एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा, एसपी (पूर्वी) सुरेंद्र कुमार दास, सीओ अजीत प्रताप सिंह और थानाप्रभारी अजय सेठ थाने में ही मौजूद थे. थाना परिसर में फरियादियों की भीड़ लगी थी और अधिकारी बारीबारी से उन की समस्याएं सुन कर निदान करने की कोशिश कर रहे थे. फरियादियों में नेताजी नगर निवासी मंजू गुप्ता भी थी. बारी आने पर जब वह एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा के सामने पहुंची तो अपनी लिखित फरियाद देते हुए फफक कर रो पड़ी. रोतेरोते उस ने कहा, ‘‘साहब, हमारी बेटी पिंकी उर्फ आंचल को घर से गायब हुए डेढ़ साल से ज्यादा हो चुका है लेकिन अभी तक उस का कुछ पता नहीं चला. पता नहीं वह जिंदा है भी या नहीं. उस की गुमशुदगी और अपहरण की रिपोर्ट थाने में दर्ज है.’’

एसएसपी मीणा ने मंजू गुप्ता को भरोसा दिया कि वह उस की बेटी पिंकी की खोज कराएंगे और वह जहां भी होगी, बरामद की जाएगी. आश्वासन पा कर मंजू गुप्ता पति के साथ घर वापस आ गई. हालांकि एसएसपी के आश्वासन पर उन्हें यकीन नहीं था, क्योंकि अब तक वे लोग आईजी, डीआईजी से ले कर डीएम व कमिश्नर तक की चौखट पर दस्तक दे चुके थे, पर किसी ने भी उन की मदद नहीं की थी. फिर भी एसएसपी के आश्वासन पर उन के मन में आशा की एक नई किरण तो जागी ही थी. यह बात 21 जुलाई, 2018 की है.

एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा ने पिंकी गुप्ता अपहरण मामले को गंभीरता से लिया. उन्हें इस बात का अफसोस था कि डेढ़ साल से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद पुलिस पिंकी को बरामद नहीं कर सकी थी. उन्होंने इस मामले को हैंडल करने की जिम्मेदारी एसपी सुरेंद्र कुमार दास को सौंपी. दास हाल ही में अंबेडकर नगर से पदोन्नत हो कर आए थे और एसपी (पूर्वी) बनाए गए थे. एसपी सुरेंद्र कुमार दास ने पिंकी अपहरण मामले को चुनौती के रूप में लिया. उन्होंने सीओ अजीत प्रताप सिंह, थानाप्रभारी अजय सेठ तथा चौकी इंचार्ज जगदीश सिंह को अपने औफिस बुला लिया. साथ बैठ कर सभी ने इस मामले पर गंभीरता से विचारविमर्श किया. इसी मीटिंग में तय हुआ कि पिंकी अपहरण मामले की जांच चौकी इंचार्ज जगदीश सिंह करेंगे. यह भी तय हुआ कि हर रोज की जांच से वह अधिकारियों को अवगत कराते रहेंगे.

24 जुलाई, 2018 को जांच की जिम्मेदारी मिलने के बाद जगदीश सिंह ने उसी दिन इस मामले की फाइल के पन्ने पलटते हुए अब तक हुई जांच के बारे में जानने की कोशिश की. पता चला कि पिंकी की गुमशुदगी दर्ज होने के बाद तत्कालीन दरोगा संजय यादव को जांच सौंपी गई थी. बाद में संजय यादव ने पिंकी की गुमशुदगी को अपहरण में तरमीम कर दिया था. इस के बाद दरोगा राघवेंद्र सिंह, सुजीत कुमार मिश्रा तथा मुरलीधर पांडेय ने जांच की. इस दरमयान 55 पर्चे काटे गए थे. लेकिन पिंकी का कहीं पता नहीं चला था. इस के बाद इस मामले की जांच जगदीश सिंह को सौंपी गई थी.

दरोगा जगदीश सिंह ने फाइल खंगाली तो कई बातों ने उन्हें चौंकाया पिंकी अपहरण केस की पूरी फाइल का अध्ययन करने के बाद जगदीश सिंह ने पिंकी की मां मंजू गुप्ता को चौकी बुलाया और उस से पूछताछ कर के उस का बयान दर्ज किया. मंजू ने बताया कि पिंकी उर्फ आंचल 27 सितंबर, 2016 को यह कह कर घर से निकली थी कि वह मैडिकल परीक्षण कराने उर्सला अस्पताल जाएगी. उसे थाना बाबूपुरवा की पुलिस ने बुलाया है. उस के बाद वह घर वापस नहीं लौटी थी. पता नहीं वह कहां और किस हाल में होगी.

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ जगदीश ने पूछा.

‘‘हां साहब, है.’’ मंजू ने जवाब दिया.

‘‘किस पर?’’

‘‘रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर तथा उस के दोस्त अनुज सिंह पर.’’

‘‘उन के खिलाफ तुम्हारे पास कोई सबूत है क्या?’’ जगदीश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, सबूत तो कोई नहीं है. पर शक जरूर है. दिखावे के लिए तो बउआ ठाकुर ने मेरी मदद की है लेकिन पिंकी के अपहरण का षडयंत्र उसी ने रचा है. उसी ने अपने दोस्तों की मदद से पिंकी का अपहरण किया है.’’

विवेचक जगदीश सिंह ने रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर के संबंध में जानकारी जुटाई तो पता चला कि बउआ ठाकुर शिवकटरा का रहने वाला है और क्षेत्र का दबंग आदमी है. वह डीएवी कालेज का छात्र नेता रहा था और उस ने छात्रसंघ का चुनाव भी लड़ा था. यह अलग बात है कि वह हार गया था. बउआ प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था, साथ ही वह वकील भी था. उस की गिनती दबंग वकीलों में होती थी. बउआ ठाकुर के दोस्त अनुज सिंह के बारे में सिंह ने जानकारी जुटाई तो पताचला कि वह केडीए कालोनी श्यामनगर का रहने वाला है और ट्रैवल एजेंसी चलाता है. उस का भी अपने क्षेत्र में दबदबा है. साथ ही उस की राजनीतिक गलियारों में पैठ भी है. बउआ ठाकुर से उस की गहरी दोस्ती है. दोनों साथ उठतेबैठते हैं और शराब की महफिल जमाते हैं.

बउआ ठाकुर और अनुज सिंह शक के घेरे में आए तो जगदीश सिंह ने पिंकी गुप्ता उर्फ आंचल के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा कर देखी. जिस दिन पिंकी गायब हुई थी, उस दिन उस की जिनजिन नंबरों पर बात हुई थी, उन नंबरों को जगदीश सिंह ने अलग पेपर पर लिख लिया. इस के बाद उन्होंने उन नंबरों पर काल कर के एकएक शख्स को थाने बुलाया और उन से पूछताछ की. बउआ ठाकुर आया संदेह के दायरे में इसी दौरान एक युवक जगदीश सिंह के हाथ लगा, जिस ने बताया कि 27 सितंबर, 2016 को उस ने पिंकी गुप्ता को छात्र नेता व अधिवक्ता बउआ ठाकुर और उस के दोस्त अनुज सिंह के साथ श्यामनगर में हाइवे पुल के नीचे कार में देखा था.

जगदीश सिंह ने इसी क्लू को आधार बनाया. उन्होंने सीधे अधिवक्ता बउआ ठाकुर पर हाथ डालना उचित नहीं समझा. सोचविचार कर उन्होंने पहले अनुज को उठाने का तानाबाना बुना. इस के लिए उन्होंने एसपी (पूर्वी) सुरेंद्र कुमार दास से संपर्क किया और सारी जानकारी देते हुए अनुज व बउआ को अलगअलग गिरफ्तार करने की अनुमति मांगी. एसपी ने जगदीश सिंह की जांच प्रगति के आधार पर दोनों की गिरफ्तारी की अनुमति दे दी, साथ ही सहयोग के लिए स्पैशल फोर्स भी मुहैया करा दी. इसी बीच विवेचक जगदीश सिंह को काल डिटेल्स से एक और चौंकाने वाली बात पता चली कि जिस दिन पिंकी बउआ व अनुज के साथ कार में देखी गई थी, उसी रात से तीनों के मोबाइल फोन स्विच्ड औफ हो गए थे. इस का मतलब उस रात कोई न कोई ऐसी अनहोनी जरूर हुई थी, जिस की वजह से तीनों को मोबाइल स्विच्ड करने पड़े थे. इस क्लू के आधार पर बउआ ठाकुर व अनुज सिंह पुलिस के रडार पर आ गए.

25 अगस्त, 2018 की रात दरोगा जगदीश सिंह ने एसपी (पूर्वी) द्वारा उपलब्ध कराई गई स्पैशल फोर्स की मदद से अनुज सिंह के केडीए कालोनी, श्यामनगर आवास पर छापा मारा. पुलिस छापे से घर में हड़कंप मच गया. घर वालों व पड़ोसियों ने अनुज की गिरफ्तारी का विरोध किया, लेकिन पुलिस ने किसी की एक नहीं सुनी और अनुज सिंह को गिरफ्तार कर थाना चकेरी ले आई. थाना चकेरी पर अनुज सिंह से पिंकी गुप्ता के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकरते हुए बोला, ‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता.’’

थानाप्रभारी अजय सेठ व सीओ अजीत प्रताप सिंह ने भी अनुज से हर तरह से पूछताछ की, लेकिन उस ने जुबान नहीं खोली. इस पर विवचेक जगदीश सिंह ने क्लू देने वाले आदमी से अनुज का सामना कराया. उसे देखते ही अनुज सिंह को पसीना आ गया. आखिर उसे जुबान खोलनी पड़ी. अनुज सिंह ने पुलिस को बताया कि पिंकी गुप्ता अब इस दुनिया में नहीं है. उस ने और बउआ ठाकुर ने पिंकी का अपहरण कर उसी दिन मार डाला था और उस का शव हमीरपुर ले जा कर यमुना नदी में फेंक दिया था. यह पूछे जाने पर कि पिंकी को क्यों मारा, अनुज बोला, ‘‘यह सब बउआ से पूछो. मैं ने तो दोस्ती के नाते उस का साथ दिया था.’’

आखिर खुल ही गया पिंकी की गुमशुदगी का भेद अनुज सिंह ने पिंकी की हत्या का खुलासा किया तो पुलिस सकते में आ गई. आननफानन में इंसपेक्टर अजय सेठ ने पिंकी की हत्या किए जाने की जानकारी एसपी (पूर्वी) सुरेंद्र कुमार दास व सीओ कैंट अजीत प्रताप सिंह को दे दी. अधिकारियों के निर्देश पर दबंग छात्र नेता, अधिवक्ता रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर के शिवकटरा, गांधीनगर स्थित घर पर भारी पुलिस बल के साथ छापा मारा गया. पुलिस उसे बंदी बना कर थाना चकेरी ले आई. बउआ ठाकुर की गिरफ्तारी की खबर छात्र नेताओं और वकीलों को लगी तो वे थाना चकेरी आ पहुंचे और हंगामा करने लगे. हंगामे की खबर पा कर एसपी सुरेंद्र कुमार दास व सीओ कैंट अजीत प्रताप सिंह भी आ गए. उन्होंने छात्र नेताओं और वकीलों से अपील की कि वे हंगामा न करें. अगर बउआ ठाकुर निर्दोष है तो उसे बाइज्जत छोड़ दिया जाएगा.

एसपी सुरेंद्र कुमार दास ने जब बउआ से पिंकी के संबंध में पूछताछ की तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब उस का सामना अनुज सिंह से करा कर बताया गया कि उस ने पिंकी की हत्या का राज उगल दिया है तो बउआ ने भी सिर झुका लिया. इस के बाद उस ने पिंकी की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. यही नहीं, दोनों ने हत्या में प्रयुक्त अर्टिगा कार भी बरामद करा दी. मंजू गुप्ता को जब पिंकी की हत्या हो जाने की खबर मिली तो वह थाना चकेरी पहुंच गई. उस ने हवालात में बंद बउआ से पूछा कि तुम तो पिंकी को बहुत चाहते थे, फिर उसे क्यों मार डाला? इस पर बउआ बोला, ‘‘तुम्हारी बेटी मुझे ब्लैकमेल कर के शादी का दबाव डालने लगी थी. आखिर क्या करता मैं?’’

चूंकि बउआ ठाकुर और अनुज सिंह ने पिंकी की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए विवेचक जगदीश सिंह ने दोनों को अपरहण की धारा 364, हत्या की धारा 302 और लाश गायब करने के लिए धारा 201 में नामजद कर विधिसम्मत बंदी बना लिया. पुलिस बउआ व अनुज को ले कर हमीरपुर गई, जहां दोनों ने पिंकी के शव को यमुना पुल के नीचे फेंका था. लेकिन पुलिस शव बरामद नहीं कर पाई. पुलिस यमुना किनारे स्थित थानों से अज्ञात शव के बारे में जानकारी जुटा कर पिंकी के शव की शिनाख्त कराने का प्रयास कराने लगी.

पिंकी कौन थी, वह बउआ ठाकुर के संपर्क में कैसे आई, बउआ ने उसे अपने प्यार के जाल में कैसे फंसाया और फिर उस की हत्या क्यों और कैसे की, यह सब जानने के लिए हमें पिंकी के अतीत को टटोलना पड़ेगा. आम लड़की से खास बनी पिंकी कानपुर महानगर के चकेरी थाना के अंतर्गत एक मोहल्ला है नेताजी नगर. इसी मोहल्ले में किशन गुप्ता अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी मंजू के अलावा केवल एक ही बेटी थी पिंकी उर्फ आंचल. किशन गुप्ता जीटी रोड पर अंडे का ठेला लगाता था. उस की पत्नी मंजू भी उस के काम में हाथ बंटाती थी. किशन जो कमाता था, उसी से परिवार का भरणपोषण होता था. मंजू गुप्ता की बेटी पिंकी उर्फ आंचल देखनेभालने में काफी सुंदर थी. उस ने जब जवानी की ओर कदम बढ़ाया तो उस का अंगअंग दमकने लगा. गोरी रंगत और खूबसूरत आंखों वाली पिंकी को जो भी देखता, आकर्षित हो जाता.

पिंकी गुप्ता का चचेरा भाई दिलीप गुप्ता भी नेताजी नगर में पिंकी के घर के पास रहता था. उस की अपने चाचा किशन व चाची मंजू से पटरी नहीं बैठती थी. दोनों के बीच अकसर छोटीमोटी बातों को ले कर झगड़ा होता रहता था. पिंकी इस झगड़े से बहुत परेशान रहती थी. मां का पक्ष ले कर कभीकभी वह दिलीप से भी भिड़ जाती थी, जिस से दिलीप उस से नाराज रहने लगा था. एक रोज पिंकी चचेरे भाई दिलीप की शिकायत ले कर एसएसपी औफिस जा रही थी, तभी रामादेवी चौराहे पर उस की मुलाकात अधिवक्ता रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर से हो गई. उस रोज टैंपो औटो की हड़ताल थी, जिस से पिंकी को सवारी नहीं मिल रही थी.

अधिवक्ता बउआ ठाकुर कचहरी जा रहा था, पुलिस कार्यालय भी कचहरी के पास ही था. बउआ ठाकुर ने पिंकी से कहा कि उस की कार में बैठ जाए, वह उसे पुलिस औफिस के सामने उतार देगा. पिंकी की मजबूरी थी, सो वह गाड़ी में बैठ गई. पिंकी खूबसूरत होने के साथसाथ बातूनी भी थी. रामादेवी चौराहे से पुलिस औफिस तक वह उस से बातें करती रही. एक मिनट के लिए भी उस का मुंह बंद नहीं हुआ. जिस तरह वह मुसकरामुसकरा कर बातें कर रही थी, उस से रीतेंद्र सिंह बहुत प्रभावित हुआ. पहली ही नजर में पिंकी उस के दिल में उतर गई. वह बैक मिरर में उस का चेहरा देखते हुए उस की बातों का जवाब देता रहा. बातोंबातों में उस ने पिंकी का मोबाइल नंबर भी ले लिया.

बउआ ने धीरेधीरे पांव आगे बढ़ा कर थाम लिया पिंकी का हाथ  पिंकी उर्फ आंचल से हुई पहली मुलाकात में ही बउआ जैसे उस का दीवाना हो गया. उस का फोन नंबर तो उस के पास था ही, इसलिए जब भी उस का मन करता, उस से फोन पर बात कर लेता. रीतेंद्र उर्फ बउआ ठाकुर शरीर से हृष्टपुष्ट व स्मार्ट था, सो पिंकी को भी उस से बातें करना अच्छा लगता था. धीरेधीरे उन दोनों के बीच दोस्ती हो गई. यही दोस्ती बाद में प्यार में बदल गई. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. एक दिन पिंकी के चचेरे भाई दिलीप के घर चोरी हो गई. दिलीप ने अपनी चाची मंजू व चचेरी बहन पिंकी के विरुद्ध थाना चकेरी में रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने मंजू के घर तलाशी ली तो चोरी का कुछ सामान बरामद हो गया.

पुलिस ने मांबेटी को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि मंजू चिल्लाती रही कि उस ने चोरी नहीं की है, बल्कि उसे साजिशन फंसाया गया है. लेकिन पुलिस ने एक नहीं सुनी और मंजू और उस की बेटी पिंकी को जेल भेज दिया.  प्रेमिका पिंकी के जेल जाने की बात अधिवक्ता बउआ ठाकुर को पता चली तो वह तिलमिला उठा. उस ने दौड़धूप कर के पिंकी व उस की मां मंजू की जमानत करा दी. इस दरम्यान दोनों को 14 दिन जेल में रहना पड़ा. चूंकि वकील बउआ ठाकुर ने मंजू की जमानत कराई थी, इसलिए वह उस के अहसान तले दब गई और उसे अपन हितैषी मानने लगी.

पिंकी का भी प्यार उमड़ पड़ा और वह बउआ को अपना सच्चा प्रेमी समझ बैठी. इस के बाद बउआ और पिंकी का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों साथसाथ घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने लगे. दोनों का शारीरिक मिलन भी होने लगा. रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर चकेरी थाना के शिवकटरा, गांधीग्राम में रहता था. वहां उस का अपना मकान था. वह छात्र जीवन से ही दबंग था. डीएवी कालेज में पढ़ाई के दौरान उस ने छात्र संघ का चुनाव भी लड़ा था, लेकिन वह हार गया था. बउआ प्रौपर्टी डीलिंग के साथसाथ वकालत भी करता था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी और वह क्षेत्र का दबंग व्यक्ति था.

मांबाप ने भी नहीं समझाया पिंकी को पिंकी, बउआ के प्यार में ऐसी दीवानी हुई कि वह उस के साथ शादी रचाने का ख्वाब देखने लगी. ख्वाब ही नहीं देखने लगी बल्कि उस पर शादी के लिए दबाव भी डालने लगी. जबकि बउआ शादीशुदा था. भला वह शादी के लिए कैसे राजी होता. पिंकी जब भी शादी का प्रस्ताव रखती, बउआ यह कह कर टाल देता कि अभी तो मौजमस्ती के दिन हैं. शादी की जल्दी क्या है.

अब तक पिंकी के मांबाप भी जान गए थे कि पिंकी और बउआ ठाकुर एकदूसरे को चाहते हैं. लेकिन उन्होंने कभी विरोध नहीं किया. इस का कारण यह था कि बउआ ठाकुर मंजू और किशन की हरसंभव मदद करता था.  मांबाप यह भी जानते थे कि अगर वे पिंकी को मना भी करेंगे तो भी वह बउआ का साथ नहीं छोड़ेगी. इसलिए उन्होंने पिंकी को बउआ ठाकुर के साथ आनेजाने की छूट दे दी थी. पिंकी का जब भी जी चाहता, बउआ के साथ चली जाती थी. इधर पिंकी के चचेरे भाई दिलीप को जब पता चला कि दबंग बउआ ठाकुर पिंकी के घर वालों की मदद कर रहा है तो उस ने भी बउआ से दोस्ती कर ली. जल्द ही दिलीप भी बउआ ठाकुर का खास बन गया. दिलीप की शराब पार्टी भी बउआ ठाकुर व उस के दोस्तों के साथ जमने लगी. पार्टी का खर्च दिलीप ही उठाता था.

जब पिंकी को बउआ ठाकुर और दिलीप की दोस्ती की जानकारी हुई तो वह बउआ से नाराज रहने लगी. उस ने बउआ के साथ आनाजाना भी कम कर दिया. अब वह बहुत अनुरोध करने पर ही उस के साथ जाती थी. दरअसल पिंकी को यह गवारा नहीं था कि उस का प्रेमी उस के पारिवारिक दुश्मन दिलीप से दोस्ती रखे. इसलिए वह बउआ से दूरी बनाने लगी थी. 19 जून, 2016 को पिंकी बाबूपुरवा कालोनी में रहने वाले किसी रिश्तेदार के घर जा रही थी, तभी ट्रांसपोर्ट चौराहे पर उसे बउआ ठाकुर मिल गया. उस ने पिंकी को साथ चलने को कहा. लेकिन उस ने साफ इनकार कर दिया. बउआ पिंकी को जबरदस्ती खींच कर कार में बिठाने लगा. इस पर पिंकी ने हंगामा खड़ा कर दिया, जिस से भीड़ जुट गई. भीड़ जुटते देख बउआ वहां से रफूचक्कर हो गया.

पिंकी ने बउआ ठाकुर के खिलाफ दर्ज कराया केस  इस के बाद पिंकी बदहवास हालत में थाना बाबूपुरवा पहुंची और उस ने रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर तथा अपने चचेरे भाई दिलीप के विरुद्ध छेड़छाड़, मारपीट, गालीगलौज, धमकी देने और पोक्सो ऐक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी. पिंकी ने चचेरे भाई दिलीप को सबक सिखाने के लिए रिपोर्ट में उस का नाम भी दर्ज कराया. बउआ ठाकुर को जब पिंकी द्वारा रिपोर्ट दर्ज कराने की जानकारी मिली तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने पिंकी पर दबाव डाला कि वह इस मामले को रफादफा कर दे. लेकिन पिंकी राजी नहीं हुई. वह सीधेसीधे ब्लैकमेलिंग पर उतर आई. उस ने बउआ ठाकुर से कहा कि वह समझौता तभी करेगी, जब वह उस से शादी कर लेगा. उस ने यह भी धमकी दी कि अगर उस ने शादी नहीं की तो वह उस की जिंदगी में भी जहर घोल देगी. इस के लिए वह उस की पत्नी को अपने और उस के अवैध संबंधों की जानकारी दे देगी.

पिंकी की धमकी से बउआ ठाकुर घबरा गया. वह जानता था कि पिंकी जिद्दी लड़की है, वह किसी भी हद तक जा सकती है. अत: गले की इस फांस को निकालने के लिए बउआ ने एक भयानक निर्णय ले लिया और समय का इंतजार करने लगा. इस बीच बउआ ठाकुर ने अपने अजीज दोस्त अनुज सिंह से भी मुलाकात की जो ट्रैवल एजेंसी चलाता था. वह केडीए कालोनी, श्यामनगर में रहता था. बउआ ने उसे अपनी परेशानी बताते हुए मदद मांगी तो अनुज राजी हो गया. बउआ ठाकुर वकील था. उस ने मामले को रफादफा करने के लिए एक शपथपत्र तैयार कर रखा था. वह इस शपथपत्र पर पिंकी से दस्तखत कराना चाहता था. लेकिन पिंकी इस के लिए राजी नहीं थी. उस ने पिंकी को समझौते के लिए मोटी रकम देने का भी लालच दिया, लेकिन वह टालमटोल करती रही.

पिंकी ने मौत की ओर खुद बढ़ाए कदम पिंकी ने बउआ के खिलाफ पोक्सो ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था. इस मामले में उम्र का पता लगाने के लिए पिंकी का मैडिकल होना था. बाबूपुरवा पुलिस ने 27 सितंबर, 2016 को उसे थाने बुलाया और मैडिकल कराने उर्सला अस्पताल ले गई. पिंकी के मैडिकल की जानकारी बउआ ठाकुर को हुई तो वह अपने दोस्त अनुज सिंह के साथ अर्टिगा कार ले कर कचहरी पहुंच गया. अर्टिगा कार अनुज के दोस्त गोलू की थी. यहीं से बउआ ठाकुर ने फोन कर के पिंकी को समझौते के लिए बुलाया. मैडिकल करा कर पिंकी कचहरी गेट पहुंची तो बउआ ने उसे काली स्क्रीन चढ़ी अर्टिगा कार में बैठा लिया. वहां से ये लोग छप्पनभोग चौराहा आए, जहां बउआ, पिंकी और अनुज ने नाश्ता किया. वहां से निकल कर उन की कार श्यामनगर हाइवे हो कर हमीरपुर रोड की ओर दौड़ने लगी.

कार अनुज चला रहा था, जबकि पीछे वाली सीट पर बउआ ठाकुर और पिंकी बैठे थे. रात करीब 8 बजे चलती कार में पिंकी और बउआ के बीच समझौते के लिए झगड़ा होने लगा. शातिरदिमाग बउआ ठाकुर ने समझौते के शपथ पत्र पर जबरदस्ती पिंकी के दस्तखत करा लिए और समझौते के लिए रुपए देते हुए वीडियो भी बना लिया.  इस के बाद बउआ ठाकुर ने पिंकी को बेरहमी से पीटा और कार में अपने पैरों के नीचे गिरा दिया. बाद में उस ने पैर से ही पिंकी का गला दबा कर उसे बेरहमी से मार डाला. पिंकी की सांसें थमने के बाद बउआ और अनुज हमीरपुर स्थित यमुना पुल पहुंचे. वहां बउआ ने अनुज की मदद से पिंकी की लाश उफनती यमुना में फेंक दी. फिर दोनों वापस घर लौट आए. बउआ ने पिंकी का मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया था और दोनों ने अपने मोबाइल स्विच्ड औफ कर दिए थे.

इधर 27 सितंबर, 2016 की रात तक जब पिंकी वापस नहीं लौटी तो उस की मां मंजू को चिंता हुई. वह रात भर पिंकी के इंतजार में जागती रही. दूसरे दिन वह पिंकी की गुमशुदगी दर्ज कराने थाना बाबूपुरवा जा ही रही थी कि बउआ ठाकुर आ गया. उस ने मंजू से कहा कि उस का पिंकी से समझौता हो गया है. समझौते के तौर पर 10 हजार रुपए ले कर वह वैष्णोदेवी के दर्शन करने गई है. हफ्ते भर में आ जाएगी. सबूत के तौर पर उस ने मंजू को शपथ पत्र तथा वीडियो दिखाया, जिस से मंजू को विश्वास हो गया. पिंकी जब हफ्ते भर बाद भी वापस नहीं लौटी और उस से फोन पर भी संपर्क नहीं हुआ तो मंजू ने बउआ से मदद मांगी. तब बउआ ने हमदर्द बन कर मंजू की तरफ से 12 नवंबर, 2016 को चकेरी थाने में पिंकी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होने के बाद दरोगा संजय यादव ने जांच की.

जांच के बाद उन्होंने गुमशुदगी को अपहरण में तरमीम कर दिया. बाद में एक के बाद एक कई अफसरों ने इस मामले की जांच की. लेकिन डेढ़ साल बाद भी पिंकी का कुछ पता नहीं चला. इस बीच बउआ ठाकुर मंजू का हमदर्द बन कर मंजू को पुलिस अधिकारियों की चौखट पर ले जाता रहा.  जिस से पुलिस को भी उस पर शक नहीं हुआ. मंजू की हमदर्दी का फायदा उठा कर बउआ ठाकुर ने समझौते का शपथ पत्र तथा पिंकी के अपहरण की रिपोर्ट कोर्ट में लगा कर अपने मारपीट, छेड़छाड़, धमकी व पोक्सो ऐक्ट के मामले को खत्म करा दिया. बउआ ठाकुर व अनुज सिंह निश्चिंत थे कि वे पुलिस की पकड़ में नहीं आएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उन के पाप का घड़ा फूट ही गया और पिंकी की हत्या का राज खुल गया.

दरअसल, 21 जुलाई 2018 को मंजू गुप्ता समाधान दिवस पर अपनी फरियाद ले कर थाना चकेरी पहुंच गई और एसएसपी अखिलेश कुमार मीणा के समक्ष पिंकी को बरामद करने की गुहार लगाई. एसएसपी के निर्देश और एसपी सुरेंद्र कुमार दास की मौनिटरिंग में जब दरोगा जगदीश सिंह ने जांच शुरू की तो एक महीने में ही पिंकी के अपहरण व हत्या का परदाफाश हो गया.

27 अगस्त, 2018 को थाना चकेरी पुलिस ने अभियुक्त रीतेंद्र सिंह उर्फ बउआ ठाकुर तथा अनुज सिंह को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से दोनों को जिला कारागार भेज दिया गया.

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्रेमिका के चक्कर में मारा गया भोगनाथ

कड़ाके की सर्दी हो और ऊपर से बरसात हो जाए तो सर्दी के तेवर और भी भयावह हो जाते हैं. रोज की तरह दोपहर को भोगनाथ बिट्टू के घर पहुंचा तो वह रजाई में लिपटी बैठी थी. दोनों एकदूसरे को देख कर मुसकराए, फिर हथेलियां रगड़ते हुए भोगनाथ बोला, ‘‘आज तो गजब की सर्दी है.’’

‘‘इसीलिए तो रजाई में दुबकी बैठी हूं,’’ बिट्टू बोली, ‘‘रजाई छोड़ने का मन ही नहीं कर रहा, लेकिन तुम इतनी ठंड में कहां घूम रहे हो?’’

‘‘घूम नहीं रहा, सुबह से तुम्हें देखा नहीं था, इसलिए रोज की तरह तुम से मिलने चला आया,’’ भोलानाथ ने जवाब दिया, ‘‘सोचा था, तुम आग ताप रही होगी तो मैं भी हाथ सेंक लूंगा, लेकिन यहां तो हालात दूसरे ही है. लगता है मुझ से ज्यादा तुम्हें गर्मी की जरूरत है. दूसरे तरीके से हाथ सेंक कर मुझे तुम्हारी ठंड दूर करनी होगी.’’  कहने के बाद भोगनाथ ने बिट्टू का चेहरा अपने हाथों में ले लिया.

बिट्टू ने एक झटके से अपना चेहरा अलग कर लिया और ठंडे हो गए गालों पर हथेलियां मलते हुए बोली, ‘‘हटो भी, कितने ठंडे हैं तुम्हारे हाथ, एकदम बर्फ जैसे.’’

‘‘बिट्टू, कुछ चीजें ठंडी जरूर लगती हैं, लेकिन उन की तासीर बड़ी गर्म होती है,’’ भोगनाथ ने चुहल की, ‘‘मेरी बात पर विश्वास न हो तो आजमा कर देख लो. 2 मिनट में मेरे हाथ तुम्हें गर्म तो लगने ही लगेंगे, खुद भी इतनी गर्म हो जाओगी कि रजाई शरीर से उतार फेंकोगी.’’

भोगनाथ के कथन का आशय समझ कर बिट्टू के गाल सुर्ख हो गए. वह उसे मीठी फटकार लगाते हुए बोली, ‘‘मैं तुम से कई बार कह चुकी हूं कि इस तरह की बातें मत किया करो. लेकिन तुम हो कि मानते ही नहीं.’’

भोगनाथ ने थोड़ा आगे की ओर झुक कर बिट्टू की आंखों में झांका, ‘‘तो फिर कैसी बातें किया करूं?’’

‘‘वैसी ही अच्छीअच्छी बातें, जैसे दूसरे प्रेमी करते हैं.’’

‘‘प्रेमियों की बात कहीं से भी शुरू हो, जिस्म पर ही पहुंच कर खत्म होती है.’’

‘‘भोग, अभी हमारी शादी नहीं हुई है.’’

‘‘शादी भी जल्दी हो जाएगी.’’

‘‘तब जो मन में आए, बातें कर लेना.’’

‘‘बातें तो अभी भी कर रहा हूं. शादी के बाद तो कुछ और करूंगा.’’

बिट्टू को उस की बातों में रस आने लगा. मुसकरा कर उस ने पूछा, ‘‘शादी के बाद क्या करोगे?’’

‘‘कह कर बताऊं या कर के?’’

‘‘फिर शुरू हो गए.’’

‘‘उकसा तो तुम ही रही हो,’’ भोगनाथ मुसकराया, ‘‘लगता है तुम्हारा मन डोल रहा है.’’

जवाब में मुंह खोलने के लिए बिट्टू ने मुंह खोला ही था कि तभी हवा का तेज झोंका बरसात की ठंडी फुहारों को खुले दरवाजे के भीतर तक ले आया. ठंड से बिट्टू और भोगनाथ दोनों के बदन सिहर उठे. बिट्टू ने रजाई को और मजबूती से लपेट लिया, ‘‘उफ! यह बारिश और यह ठंड आज किसी की जान ले कर ही मानेगी.’’

‘‘किसी की क्या, फिलहाल तो मेरी जान पर ही बनी हुई है.’’

‘‘वो कैसे?’’

‘‘तुम ने तो सर्दी से अपना बचाव कर रखा है, मैं खुले दरवाजे के सामने खड़ा ठंड से कांप रह हूं.’’

‘‘तो दरवाजा भेड़ कर तुम भी रजाई ओढ़ लो.’’ बिट्टू के मुंह से अनायास निकल गया. यह बात उस ने कैसे कह दी. वह खुद ही नहीं समझ पाई.

भोगनाथ को शायद इसी पल की प्रतीक्षा थी. बिट्टू ने उस से दरवाजा भेड़ने को कहा था, पर उस ने दरवाजा बंद कर के सिटकनी लगा दी. उस के पास आ कर बिटटू की रजाई में घुसने लगा, ‘‘बिट्टू, तुम कितनी गर्म हो. अपने जैसा मुझे भी गर्म कर दो न?’’

‘‘मेरी रजाई में तुम कहां घुसे आ रहे हो,’’ बिट्टू ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘कोई आ जाए तो मैं मुफ्त में बदनाम हो जाऊंगी.’’

‘‘इश्क की दुनिया में उन का ही नाम होता है, जो बदनाम होते हैं.’’

‘‘समझने की कोशिश करो भोग,’’ बिट्टू ने प्रतिरोध किया, ‘‘तुम लड़के हो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी.’’

‘‘मैं चाहता भी नहीं हूं कि कोई तुम्हारा मुंह देखे. तुम्हारा मुंह देखने के लिए मैं हूं न.’’ भोगनाथ ने रजाई के साथसाथ बिट्टू को भी जकड़ लिया. बिट्टू के बदन में ठंड की सिहरन दौड़ी तो पुरुष स्पर्श की मादक अनुभूति भी हुई.

गर्म रजाई और बिट्टू के तन की गरमी से भोगनाथ का शरीर सुलगने लगा. रजाई के भीतर से ही उस ने बिट्टू की कमर में हाथ डाल दिया. बिट्टू के तनमन में चिंगारियां सी चटखने लगीं. आनंद की उठती लहरों से उस की पलकें मुंदने लगीं और सांसों की रफ्तार तेज हो गई. दोनों चुप थे, लेकिन उन की शारीरिक गतिविधियां एकदूसरे से बहुत कुछ कह रही थीं. मस्ती में भर कर वह भोगनाथ को अपने ऊपर खींचने लगी. बिट्टू की देह को मस्त और बहकते देख कर भोगनाथ ने उसे निर्वस्त्र किया, फिर स्वयं भी निर्वस्त्र हो गया. इस के बाद दोनों एकदूसरे में समा गए.

कुछ देर में जब दोनों के तन की आग ठंडी हुई तो दोनों एकदूसरे की बांहों से आजाद हुए. उस के बाद ही बिट्टू को पता चला कि पुरुष संसर्ग कितना आनंददायक होता है.

उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के पिसावां थाना क्षेत्र के गांव सरवाडीह में भगौती रहता था. उस के परिवार में उस की पत्नी रामश्री और 2 बेटियां बिट्टू, सीमा और एक बेटा शोभित था. भगौती पिसावां कस्बे में एक दुकान पर लोहे की ग्रिल बनाने का काम करता था. भगौती को मिलने वाली मजदूरी से घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चल पाता था. घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी.

घर में बिट्टू भाईबहनों में सब से बड़ी थी. बात उस समय की है, जब बिट्टू की उम्र 16 साल थी. यौवन की दहलीज पर बिट्टू की खूबसूरती निखर गई थी.

भगौती के मकान से कुछ दूरी पर केदार रहता था. उस के परिवार में पत्नी जयरानी और 3 बेटों भोगनाथ, पिंटू और शिवा के अलावा 1 बेटी सविता थी. केदार मेहनतमजदूरी कर के  परिवार का भरणपोषण करता था. दोनों के घरों में काफी मेलजोल था और एकदूसरे के घर भी आनाजाना था.

आनेजाने के दौरान जवान होती बिट्टू पर भोगनाथ की नजर पड़ी तो उस की मदमस्त काया देख कर उस की नजरें उस पर जम गईं. जैसी लड़की की चाहत उस के दिल में थी, बिट्टू ठीक वैसी थी. बिट्टू का हसीन चेहरा उस की आंखों के रास्ते उस के दिल में उतरता चला गया.

घर के रास्ते पहले से खुले हुए थे. भोगनाथ की बिट्टू से खूब पटती थी. उस का कारण भी था, बिट्टू भी दिल ही दिल में भोगनाथ को पसंद करने लगी थी. धीरेधीरे वह भी उस की तरफ खिंचती चली गई. दोनों एकदूसरे से दिल ही दिल में प्यार करते थे. अपने प्यार का इजहार करने के लिए उन के पास पर्याप्त अवसर थे. इसलिए उन्हें न मोहब्बत के इजहार में वक्त लगा न इश्क के इकरार में.

गांव में मकान एक लाइन से बने थे. उन की छतें भी आपस में मिली हुई थीं. भोगनाथ अपने मकान से कई मकानों की छत फांद कर बिट्टू के पास पहुंच जाता था और छत पर बने कमरे में उस के साथ घंटों प्यार की मीठीमीठी बातें करता था.

प्रेम के हिंडोले में झूमती हुई बिट्टू कहती, ‘‘भोग, दिल तो मैं ने तुम्हें दे दिया है, पर तुम भी उस की लाज रखना. देखना कभी भूले से मेरा दिल न टूटे.’’

‘‘कैसी बात करती हो बिट्टू, तुम्हारा दिल अब मेरी जान है और कोई अपनी जान को यूं ही जाने देता है क्या?’’

‘‘इसी भरोसे पर तो मैं ने तुम से प्यार किया है. मनआत्मा से तुम्हें वरण कर के मैं 7 जन्मों के लिए तुम्हारी हो चुकी. देखना है कि तुम किस हद तक प्यार निभाओगे.’’

‘‘प्यार निभाने की मेरी कोई हद नहीं है. प्यार निभाने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’

बिट्टू ने इत्मीनान से सांस ली, ‘‘पता नहीं, वह दिन कब आएगा, जब मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी.’’

‘‘विश्वास रखो बिट्टू, हमारे प्यार को मंजिल मिलेगी.’’ बिट्टू का हाथ अपने हाथों में ले कर भोगनाथ बोला, ‘‘वैसे भी हमारी शादी में कोई अड़चन तो है नहीं, हमारा धर्म और जाति एक है. हमारा सामाजिकआर्थिक स्तर एक जैसा है. सब से बड़ी बात यह कि हम दोनों प्यार करते हैं.’’

भोगनाथ की बात तो बिट्टू को यकीन दिलाती ही थी, उसे खुद भी पूरा भरोसा था कि दोनों की शादी कोई अड़चन नहीं आएगी. इसलिए उसे अपने प्रेम व भविष्य के प्रति कभी नकारात्मक विचार नहीं आते थे. उसे पलपल भोगनाथ का इंतजार रहता था. भोगनाथ के आते ही वह खुली आंखों से भविष्य के सुनहरे सपने देखने लगती थी.

तन्हाई, दो जवां जिस्म और किसी के आने का कोई डर नहीं. यही भावनाओं के बहकने का पूरा वातावरण होता था. कभीकभी बिट्टू और भोगनाथ के दिल बहकने लगते थे, लेकिन बिट्टू जल्द ही संभल जाती और भोगनाथ को भी बहकने से रोक लेती थी. लेकिन एक वर्ष पूर्व कड़कड़ाती ठंड में वह सब तनहाई में हो गया, जो बिट्टू नहीं चाहती थी.

उस दिन दोपहर को बने शारीरिक संबंध में बिट्टू को ऐसा आनंद आया कि वह बारबार उस आनंद को पाने के लिए उतावली रहने लगी. भोगनाथ भी कम मतवाला नहीं था.

इसी दौरान एक दिन इत्तफाक से बिट्टू की अनस नाम के एक युवक से बात हुई. उस के बाद इन दोनों की प्रेम कहानी में एक नया मोड़ आ गया. सीतापुर की सीमा से सटे हरदोई जनपद के टडि़यावां थाना क्षेत्र के कस्बा गोपामऊ में नवी हसन रहते थे. नवी हसन के परिवार में पत्नी नाजिमा के अलावा 3 बेटे थे- साबिर, अनस और असलम.

नबी हसन की कस्बे में ही खाद की दुकान थी, जिस पर उस के साथ उस के बेटे अनस और असलम बैठते थे. साबिर किसी फैक्ट्री में काम करता था. अनस काफी खूबसूरत नौजवान था, साथ ही अविवाहित भी. उसे दोस्तों के साथ मौजमस्ती करने में काफी मजा आता था.

एक दिन सुहानी सुबह अनस उठ कर छत पर चला आया. छत की मुंडेर पर बैठ कर वह आसमान की तरफ निहार रहा था कि अचानक उस का मोबाइल बज उठा इतनी सुबह फोन करने वाला कोई दोस्त ही होगा, सोच कर अनस मोबाइल स्क्रीन पर बिना नंबर देखे ही बोला, ‘‘हां बोल?’’

‘‘जी, आप कौन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी युवती की आवाज सुनाई दी तो अनस चौंक पड़ा. उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उस ने तुरंत ‘सौरी’ कहते हुए कहा, ‘‘माफ करना, दरअसल मैं समझा इतनी सुबह कोई दोस्त ही फोन कर सकता है, इसलिए… वैसे आप को किस से बात करनी है, आप कौन बोल रही हैं?’’

‘‘मैं बिट्टू बोल रही हूं. मुझे भी अपनी दोस्त से बात करनी थी, लेकिन गलत नंबर डायल हो गया.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा करने से दोबारा गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘पूछताछ तो पुलिस वालों की तरह कर रहे हैं. 25 सवाल और सलाह भी.’’ कह कर बिट्टू जोर से हंसी.

‘‘अरे नहीं, मैं ने तो वैसे ही बोल दिया. दोस्त आप की, फोन भी आप का. आप चाहें नंबर सेव करें या न करें.’’

‘‘तो आप दार्शनिक भी हैं?’’ बिट्टू ने फिर छेड़ा.

‘‘नहीं नहीं, आम आदमी हूं.’’

‘‘किसी के लिए तो खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी अनस की थी. वह जोर से हंसा, फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताएं, मैं क्या करूं?’’ अनस ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल बिट्टू ने अपनी सहेली से बात करने के लिए नंबर मिलाया था, लेकिन गलत नंबर डायल होने से अनस का नंबर मिल गया था. लेकिन अनस की आवाज उसे भा गई थी. इस के बाद उस के दिल में फिर से अनस से बात करने की इच्छा हुई, लेकिन संकोचवश वह अपने आप को रोक लेती थी.

फिर एक दिन उस से रहा नहीं गया तो उस ने अनस का नंबर फिर मिला दिया. इस बार अनस भी जैसे उस के फोन का इंतजार कर रहा था. उसे इस बात का एहसास था कि बिट्टू उसे फिर से फोन जरूर करेगी. इस बार जब दोनों की बात हुई तो काफी देर तक चली. बिट्टू ने अपने बारे में बताया तो अनस ने भी अपने बारे में सब कुछ बता दिया. दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों एकदूसरे के प्रति अपनापन सा महसूस करने लगे. यह दिसंबर 2017 की बात है. फिर उन के बीच बराबर बातें होने लगीं. एक दिन दोनों ने रूबरू मिलने का फैसला कर लिया. दोनों मिले तो एकदूसरे को सामने पा कर काफी खुश हुए. बिट्टू काफी खुश थी.

उस ने भोगनाथ और अनस की तुलना की तो पाया कि भोगनाथ और अनस का कोई मुकाबला नहीं है. अनस भोगनाथ से ज्यादा खूबसूरत था और उस की आर्थिक स्थिति भी भोगनाथ से लाख गुना अच्छी थी. इसलिए वह भोगनाथ से दूरी बना कर अनस से नजदीकियां बढ़ाने लगी. अनस अपने आप चल कर आए मौके को भला कैसे गंवा देता. उसे भी बैठेबिठाए एक खूबसूरत युवती का साथ मिला तो वह भी बिट्टू का हो गया. समय के साथ दोनों की नजदीकियां इतनी बढ़ीं कि तन की दूरियां भी खत्म हो गईं. एक दिन दोनों के बीच शारीरिक रिश्ता भी कायम हो गया.

13 मई की शाम साढ़े 7 बजे भोगनाथ घर में बैठा खाना खा रहा था कि तभी उस के मोबाइल पर किसी की काल आई. वह पूरा खाना खाए बिना घर से चला गया. काफी रात होने पर भी वह नहीं लौटा तो घर वाले चिंता में पड़ गए. सुबह होने पर उस की काफी तलाश की गई लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. 16 मई की सुबह किसी राहगीर ने पिसावां थाने में डीह कबीरा बाबा के जंगल में किसी अज्ञात युवक की लाश पड़ी होने की सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी दिनेश सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

मृतक की उम्र 24-25 वर्ष रही होगी. उस के मुंह व गले पर कस कर अंगौछा बांधा गया था, जिस से दम घुटने से उस की मृत्यु हो गई थी. घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र थी. थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने उस की शिनाख्त कराई तो पता चला वह गांव सरवाडीह का भोगनाथ है. घटनास्थल सरवाडीह गांव के बाहर ही था. इसलिए गांव के लोग भी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने ही लाश की शिनाख्त की थी. पता चलते ही भोगनाथ का पिता केदार भी घर के अन्य सदस्यों के साथ वहां आ गया. भोगनाथ की लाश देख कर सब रोनेबिलखने लगे.

थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने केदार से कुछ आवश्यक पूछताछ की और फिर लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दी. केदार को साथ ले कर वह थाने आ गए. केदार की लिखित तहरीर पर उन्होंने अज्ञात के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. भोगनाथ के पास मोबाइल था, जो उस के पास से नहीं मिला था. केदार से भोगनाथ का मोबाइल नंबर ले कर थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने उसे सर्विलांस पर लगा दिया. इस के अलावा भोगनाथ के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स भी निकलवाई.

भोगनाथ को बुलाने के लिए जिस नंबर से काल की गई थी, उस नंबर की जब विस्तृत जानकारी जुटाई गई तो वह नंबर सरवाडीह निवासी बिट्टू का निकला. इस के बाद थानाप्रभारी दिनेश सिंह ने बिट्टू को हिरासत में ले कर महिला सिपाही की उपस्थिति में उस से सख्ती से पूछताछ की. उस ने भोगनाथ की हत्या का जुर्म स्वीकार करते हुए अपने 3 साथियों के नाम भी बता दिए.

इस के बाद बिट्टू के प्रेमी अनस को गिरफ्तार कर लिया गया. अनस के 2 दोस्त गोपामऊ निवासी विपिन और मोनू भी इस अपराध में शामिल थे. इस के बाद एसपी महेंद्र चौहान ने प्रैसवार्ता कर बिट्टू और अनस को मीडिया के सामने पेश किया. जब भोगनाथ ने बिट्टू को अपने से दूरी बनाते देखा तो उस ने पता किया. जल्द ही उसे पता चल गया कि बिट्टू उस से किए गए सारे वादे, रिश्तेनाते तोड़ कर उस से दूर होना चाहती है तो वह तिलमिला गया. ऐसे मौके के लिए ही उस ने अपने मोबाइल से बिट्टू के साथ अंतरंग पलों के फोटो खींच रखे थे.

भोगनाथ ने बिट्टू से मिल कर उसे धमकाया कि वह उस से दूर हुई तो उस के अश्लील फोटो सब को भेज देगा. फोटो के बल पर भोगनाथ उसे ब्लैकमेल कर के उस के साथ संबंध बनाने लगा. बिट्टू उस के हाथ का खिलौना बनने के लिए मजबूर थी. इसी बीच उस के घर वालों ने हरदोई जनपद के पिहानी थाना क्षेत्र के एक युवक से उस की शादी तय कर दी. शादी 29 जून को होनी थी. भोगनाथ की हरकतों से आजिज आ कर बिट्टू ने अनस से बात की. उस से कहा कि उस की जिंदगी में आने से पहले उस का एक दोस्त भोगनाथ था. भोगनाथ के पास उस के कुछ अश्लील फोटो हैं, जिन के सहारे वह उसे ब्लैकमेल करता है.

वैसे भी उस की शादी तय हो गई है. वह उस की शादी में अड़चन डाल सकता है. बिट्टू ने अनस से कहा कि भोगनाथ को ठिकाने लगाना पड़ेगा. इस के लिए मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूं. बिट्टू ने अनस से यह भी कहा कि भले ही उस की शादी हो रही हो, लेकिन उस के साथ संबंध हमेशा बने रहेंगे. अनस ने बिट्टू की परेशानी को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला कर लिया. उस ने अपने जिगरी दोस्तों विपिन और मोनू से मदद मांगी तो दोस्ती की खातिर दोनों अनस का साथ देने को तैयार हो गए. इस के बाद भोगनाथ को मारने की योजना बनाई गई.

योजनानुसार 13 मई को अनस ने एक मारुति वैगनआर कार बुक की. कार मालिक को उस ने बताया कि उसे दोस्तों के साथ एक तिलक समारोह में जाना है. कार में बैठ कर अनस अपने दोस्तों के साथ चल दिया. दूसरी ओर बिट्टू ने शाम साढ़े 7 बजे के करीब भोगनाथ को मिलने के लिए डीह कबीरा बाबा के जंगल में बुलाया. भोगनाथ उस समय खाना खा रहा था, लेकिन अपनी प्रेमिका के बुलाने पर वह खाना बीच में छोड़ कर तुरंत वहां पहुंच गया. वहां उसे बिट्टू मिली. योजना के अनुसार बिट्टू उसे अपनी प्यार भरी बातों में उलझाए रही.

दूसरी ओर अनस ने चुनी गई जगह से कुछ पहले हडियापुर गांव के पास ड्राइवर से यह कह कर कार रुकवा दी कि आगे का रास्ता खराब है. वह वहीं खड़ा हो कर उन के आने का इंतजार करे. इस के बाद अनस और उस के दोस्त पैदल ही कबीरा बाबा के जंगल पहुंचे. वहां पहुंच कर उन्होंने बिट्टू के साथ मौजूद भोगनाथ को दबोच लिया. फिर उस के गले में पड़े अंगौछे को रस्सी की तरह बना कर उस के मुंह में दबाते हुए उस के गले में फंदा बना कर कस दिया, इस से भोगनाथ चिल्ला न सका और गले पर कसाव बढ़ते ही उस का दम घुटने लगा. वह कुछ देर छटपटाया, फिर उस का शरीर शिथिल पड़ गया.

भोगनाथ को मौत के घाट उतारने के बाद बिट्टू छिपतेछिपाते हुए घर चली गई. अनस भी दोनों दोस्तों के साथ भागते हुए कार तक पहुंचा और ड्राइवर से बोला कि वह तेजी से कार चलाए जहां वह लोग गए थे, वहां उन का झगड़ा हो गया है. ड्राइवर ने यह सुन कर कार की गति बढ़ा दी. गोपामऊ पहुंच कर सब लोग अपने घर चले गए.

लेकिन अपने आप को ये लोग कानून की गिरफ्त में आने से नहीं बचा सके. उन के पास से भोगनाथ का मोबाइल और हत्या की साजिश में प्रयुक्त 2 मोबाइल फोन पुलिस ने उन से बरामद कर लिए.

29 मई, 2018 को पुलिस ने विपिन और मोनू को भी गिरफ्तार कर लिया. सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

साथ में मोहित शुक्ला

दुलहन पर लगा दांव : क्या माया और रवि की साजिश पूरी हो पाई

सुर्ख जोड़े में सजी नईनवेली दुलहन सुलेखा दोस्त जैसे पति रवि राउत को पा कर बहुत खुश थी. यौवन की दहलीज पर उस ने खुली आंखों से जो सपने देखे थे, वे साकार हो गए थे. सुलेखा 15 जुलाई, 2018 को ब्याह कर खुशीखुशी ससुराल आई थी. शादी के 6 दिन बीत जाने के बावजूद उस के हाथों पर पति के नाम की मेहंदी का रंग अभी भी ताजा था.

रवि राउत बिहार के जिला गया के थाना मुफस्सिल क्षेत्र में आने वाले शहीद ईश्वर चौधरी हाल्ट स्थित मोहल्ला कुर्मी टोला के रहने वाला था. उस के पिता श्यामसुंदर कपड़े के व्यापारी थे. गया में उन का कपड़े का काफी बड़ा कारोबार था, जो अच्छा चल रहा था. इस से अच्छी कमाई होती थी. श्यामसुंदर राउत के 3 बेटे थे, रवि, विक्की और शुक्कर. विक्की और शुक्कर पिता के व्यापार में सहयोग करते थे.

सुबह दोनों नाश्ता कर के पिता के साथ दुकान पर चले जाते थे और रात में दुकान बढ़ा कर उन्हीं के साथ घर लौटते थे. जबकि यारदोस्तों की संगत में रह कर रवि की आदतें बिगड़ गई थीं. उस की आदतें सुधारने के लिए श्यामसुंदर ने उस की शादी कर दी थी ताकि बहू के आने पर अपनी जिम्मेदारियों को समझ सके. बात 21 जुलाई, 2018 की रात की है. पढ़ीलिखी, समझदार सुलेखा ससुराल वालों को रात का भोजन करा कर पति के साथ फर्स्ट फ्लोर पर सोने चली गई. दिन भर की थकीहारी सुलेखा को बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई. रवि भी सो गया.

रवि तब अचानक नींद से उठ बैठा, जब उस के कानों में सुलेखा की दर्दनाक चीख पड़ी. नींद से जाग कर रवि ने पत्नी की ओर देखा तो सन्न रह गया. सुलेखा के गले से तेजी से खून बह रहा था. लगा जैसे किसी ने तेजधार हथियार से गला रेत कर उस की हत्या की कोशिश की हो. खून देख कर रवि बुरी तरह घबरा गया. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो उस ने चादर से सुलेखा का गला लपेट दिया, ताकि खून बहना बंद हो जाए. तभी अचानक रवि की नजर एक महिला पर पड़ी. वह अपना चेहरा कपड़े से ढंके हुए थी और उसी कमरे से निकल कर बाहर की ओर भाग रही थी. उस महिला से थोड़ी दूर आगे 2 और महिलाएं तेजी से भागी जा रही थीं.

इस से पहले कि नकाबपोश महिला भागने में सफल हो पाती, सुलेखा की चीख सुन कर उस के देवर विक्की और शुक्कर कमरे में आ गए थे. रवि और उस के दोनों भाइयों ने दौड़ कर नकाबपोश महिला को पकड़ लिया और लातघूसों से उस की जम कर पिटाई की. नकाबपोश महिला जब बेसुध हो गई तो विक्की ने उस के चेहरे से नकाब उतार दिया. नकाब हटते ही रवि, विक्की और शुक्कर तीनों दंग रह गए. वह महिला रवि के जानने वालों में थी, जिस का नाम माया था. वह सूढ़ीटोला में रहती थी.

उधर ज्यादा खून बहने से सुलेखा की हालत बिगड़ती जा रही थी. इस बीच रवि के भाई विक्की ने 100 नंबर पर फोन कर के इस घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी थी. कंट्रोलरूम से सूचना मिलते ही थाना मुफस्सिल के थानेदार कमलेश शर्मा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने हत्या की कोशिश करने वाली माया को आलाकत्ल ब्लेड के साथ गिरफ्तार कर लिया. सुलेखा की हालत बिगड़ती जा रही थी. रवि उसे इलाज के लिए मगध मैडिकल अस्पताल ले गया और इमरजेंसी वार्ड में भरती करा दिया. डाक्टरों ने उस का इलाज शुरू कर दिया. समय पर इलाज मिल जाने से सुलेखा बच गई. यह 15/16 जुलाई, 2018 की रात ढाई बजे की बात थी.

अगले दिन रवि राउत की नामजद लिखित तहरीर पर मुफस्सिल थाने में माया के खिलाफ 307 आईपीसी के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद थानेदार कमलेश शर्मा सुलेखा का बयान लेने मगध मैडिकल अस्पताल पहुंचे. सुलेखा ने कमलेश शर्मा को बताया कि रात एकडेढ़ बजे के करीब उस का पति रवि दरवाजा खोल कर बाहर चला गया था, तभी एक नकाबपोश औरत ने कमरे में घुस कर मुझ पर हमला बोल दिया. एक औरत कमरे के अंदर थी, जबकि दूसरी कमरे के दरवाजे के पास खड़ी थी.

वह वहीं से पूछ रही थी कि सुलेखा मरी या नहीं. मुझ पर नकाबपोश औरत ने न केवल हमला किया बल्कि मुझे तेजाब पिलाने की भी कोशिश की. लेकिन मेरी चीख सुन कर ऊपर आए मेरे देवरों ने मुझे बचा लिया. पकड़ी गई औरत ने अपना नाम माया बताया. जांच अधिकारी ने जब उस से हमले की वजह पूछी तो वह वजह बताने में असमर्थ रही. वह खुद हैरान थी कि माया ने उस की हत्या करने का प्रयास क्यों किया, जबकि वह उसे जानती तक नहीं थी. सुलेखा की बात सुन कर एसओ कमलेश शर्मा हैरान रह गए.

कमलेश शर्मा को सुलेखा के बयान ने परेशानी में डाल दिया था. इस का जवाब सिर्फ माया ही दे सकती थी या फिर सुलेखा का पति रवि राउत. माया महिला थाने के हवालात में बंद थी. कमलेश शर्मा ने थाने लौट कर आरोपी माया को महिला थाने से बुलवाया, फिर उस से पूछताछ की. माया का बयान सुन कर विवेचक शर्मा अवाक रह गए. माया ने पुलिस को बताया कि रवि और उस के बीच करीब 3 साल से प्रेम संबंध थे. दोनों एकदूसरे को प्यार करते थे, रवि उस से शादी करना चाहता था. लेकिन अपने घर वालों की वजह से वह ऐसा नहीं कर पाया. अपने बयान में माया एकएक राज से परदा उठाती गई

माया के बयान से इस मामले में एक दिलचस्प मोड़ आ गया. उस के बयान पर विश्वास कर के पुलिस जब रवि से पूछताछ करने मगध मैडिकल अस्पताल पहुंची तो रवि वहां नहीं था. उस की जगह सुलेखा के पास उस का छोटा भाई विक्की बैठा था. पुलिस ने जब विक्की से रवि के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि रवि घर पर होगा. एसओ कमलेश शर्मा ने रवि को अस्पताल बुलाने के लिए एक सिपाही उस के घर भेजा. सिपाही रवि के घर पहुंचा तो वह वहां भी नहीं था.

पूछने पर घर वालों ने बताया कि वह रात से अस्पताल से घर नहीं लौटा है. सिपाही ने लौट कर यह बात एसओ को बता दी. कमलेश शर्मा सोच में पड़ गए कि जब रवि न अस्पताल में है और न ही घर पर, तो वह कहां गया? इस का मतलब वह फरार हो चुका था. निस्संदेह पत्नी की हत्या के प्रयास के पीछे उस का भी हाथ था. उस के फरार होने से यह बात साफ हो गई कि माया ने जो बयान दिया था, वह सच था. अब इस गुत्थी को सुलझाने के लिए रवि की गिरफ्तारी जरूरी थी. हकीकत जानने के लिए पुलिस ने रवि के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स से पता चला कि रवि और माया के बीच बातें होती रहती थीं. घटना वाले दिन भी रवि और माया के बीच काफी देर तक बात हुई थी. इस डिटेल्स से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि रवि ने अपनी प्रेमिका माया के साथ मिल कर पत्नी की हत्या का षडयंत्र रचा था. लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया था. बहरहाल, सुलेखा ठीक हो कर अस्पताल से घर आ गई, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी रवि पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. इस बीच पुलिस ने माया को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. आखिरकार घटना के एक महीने बाद रवि उस वक्त पुलिस के हत्थे चढ़ गया, जब वह गया रेलवे स्टेशन से कहीं भागने के लिए ट्रेन के इंतजार में वेटिंग रूम में बैठा था.

पुलिस रवि को गिरफ्तार कर के थाने ले आई और सुलेखा की हत्या की योजना जानने के लिए उस से पूछताछ की. चाह कर भी रवि हकीकत को छिपा नहीं सका. उस ने पुलिस के सामने सच उगल दिया. पूछताछ में रवि ने अपनी और माया की प्रेम कहानी सिलसिलेवार बतानी शुरू की. माया मुफस्सिल थाना क्षेत्र के सूढ़ीटोला की रहने वाली थी. वह शादीशुदा और 3 बच्चों की मां थी. उस का पति मनोहर बाहर रह कर नौकरी करता था. वह 6 महीने या साल भर में एकाध बार ही घर आ कर कुछ दिन बिता पाता था.

माया भले ही 3 बच्चों की मां थी, लेकिन उस का शारीरिक आकर्षण खत्म नहीं हुआ था. उस का कसा हुआ शरीर और गोरा रंग पुरुषों को आकर्षित करने के लिए काफी था. सजसंवर कर माया जब घर से बाहर निकलती थी तो अनचाहे में लोगों की नजरें उस की ओर उठ ही जाती थीं. कभीकभी रवि माया के घर के सामने से हो कर घाटबाजार स्थित अपनी दुकान पर जाया करता था. एकदो बार का आमनासामना हुआ तो दोनों की नजरें टकरा गईं. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे. जल्दी ही वह समय भी आ गया, जब दोनों ने आकर्षण को प्यार का नाम दे दिया. इस प्यार को शारीरिक संबंधों में बदलते देर नहीं लगी. इस की एक वजह यह भी थी कि माया का पति परदेस में था और वह शारीरिक रूप से प्यार की प्यासी थी.

धीरेधीरे रवि और माया के प्यार के चर्चे पूरे सूढ़ीटोला में होने लगे. रवि घर से दुकान पर जाने की कह कर निकलता और पहुंच जाता माया के पास. जब तक वह दुकान पर पहुंचता, तब तक उस के दोनों भाई विक्की और शुक्कर दुकान पर पहुंच कर पिता के साथ काम में लग जाते. रवि देर से पहुंचता तो पिता श्यामसुंदर राउत उस से देर से आने की वजह पूछते, लेकिन वह चुप्पी साध लेता था. इस से श्यामसुंदर और भी परेशान हो जाते थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि रवि को आखिर हो क्या गया. उन्होंने उस के देर से आने का रहस्य पता लगाने का फैसला किया.

आखिरकार श्यामसुंदर ने जल्द ही सच का पता लगा लिया. पता चला उन का बड़ा बेटा रवि एक शादीशुदा और 3 बच्चों की मां माया के प्रेमजाल में फंसा है. बेटे की सच्चाई जान कर वह परेशान हो गए. उन्होंने रवि को माया से दूर रखने के बारे में सोचना शुरू किया. सोचविचार कर वह इस नतीजे पर पहुंचे कि रवि की शादी कर दी जाए तो वह माया को भूल जाएगा. उन्होंने रवि की शादी की बात चलाई तो बात बन गई. फलस्वरूप सुलेखा से रवि का रिश्ता तय हो गया.

रिश्ता तय हो जाने के बाद रवि जब कभी माया के घर के सामने से गुजरता तो उस से नजरें मिलाने के बजाय चुपचाप निकल जाता. रवि में अचानक आए बदलाव से माया परेशान हो गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक रवि को क्या हो गया, जो उस ने मुंह फेर लिया.

माया से रवि की जुदाई बरदाश्त नहीं हो पा रही थी. एक दिन वह रवि का रास्ता रोक कर उसे अपने घर ले आई. फिर उस ने रवि से पूछा, ‘‘तुम्हें अचानक ऐसा क्या हो गया जो मुझ से मुंह फेर लिया.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है माया.’’ रवि ने सहज भाव से कहा.

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है तो अचानक मुझ से मुंह क्यों मोड़ लिया?’’

‘‘माया, अब हमारा मिलना संभव नहीं है.’’ रवि ने नजरें झुका कर कहा.

‘‘क्यों, संभव नहीं है हमारा मिलना? मैं तुम से कितना प्यार करती हूं, जानते तो हो. फिर हमारा मिलना क्यों नहीं संभव है?’’

“‘क्योंकि मेरे घर वालों ने मेरी शादी करने का फैसला कर लिया है.’’

रवि का जवाब सुन कर माया के होश उड़ गए. माथे पर हाथ रख कर वह बिस्तर पर जा बैठी. कुछ देर दोनों के बीच खामोशी छाई रही.

उस खामोशी को माया ने ही तोड़ा, ‘‘आखिर क्या समझ रखा है तुम ने मुझे? मैं कोई खिलौना नहीं हूं कि जब चाहा, खेला और जब चाहा छोड़ दिया. मेरी जिंदगी बरबाद कर के तुम किसी और के साथ शादी रचाओगे? तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं ऐसा होने दूंगी? मेरे जीते जी ऐसा हरगिज नहीं हो सकता.’’

‘‘मेरी बात समझने की कोशिश करो, माया.’’ माया के सामने रवि हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘मैं घर वालों के सामने बेबस हूं. मुझे उन के सामने झुकना ही पड़ा.’’ रवि ने माया को समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम तो जानती हो, मैं भी तुम से कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जीने की कल्पना तक नहीं कर सकता.’’

‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती. तुम्हें जो भी करना हो करो, लेकिन मैं तुम्हारी शादी नहीं होने दूंगी.’’ माया ने रवि को धमकाया. रवि माया को काफी देर तक समझाता रहा. लेकिन माया ने रवि की शादी की बात स्वीकार नहीं की. उस ने खुल कर धमकी दी कि अगर उस ने किसी और से शादी की तो इस का अंजाम उसे भुगतना पड़ेगा. उस दिन के बाद से रवि ने न तो माया से बात की और न ही मिला. माया ने सपने में भी नहीं सोचा था कि रवि उसे धोखा देगा और किसी दूसरी लड़की से शादी रचा लेगा. उस की बेवफाई से माया घायल नागिन सी बन गई. उस के सीने में बदले की आग धधकने लगी. यह मई 2018 की बात थी.

माया रवि से बदला लेने के लिए भले ही घायल नागिन बन गई थी, लेकिन उस की जुदाई में उस से कहीं ज्यादा तड़प रही थी. रवि भी माया से मिलने के लिए विरह की आग में जल रहा था. अंतत: उस से रहा नहीं गया और एक महीने बाद वह माया के पास लौट आया. सारे गिलेशिकवे भुला कर माया ने उसे प्यार के आंचल में छिपा लिया ताकि उन के प्यार को जमाने की नजर न लग जाए.

रवि ने माया से कहा कि मांबाप की खुशी के लिए वह सुलेखा से शादी तो जरूर करेगा, लेकिन उसे कभी पत्नी का दर्जा नहीं देगा और मौका मिलते ही उसे सदा के लिए अपने रास्ते से हटा देगा. रवि की बात पर माया ने सहमति जता दी. रवि की शादी के बाद सुलेखा को रास्ते से हटाने के लिए माया शादी से पहले ही योजना बनाने में जुट गई. बहरहाल, वह दिन भी आ गया जिस का रवि और माया को इंतजार था. 15 जुलाई, 2018 को रवि की शादी सुलेखा के साथ हो गई. सुलेखा मायके से विदा हो कर ससुराल आ गई.

दूसरी ओर माया का आनाजाना बंद हो जाने से ईर्ष्या की आग में जल रही थी. रवि भले ही माया के पास नहीं जा रहा था, लेकिन फोन से दोनों की अकसर बातें हो जाती थीं. माया उसे बारबार उस का वादा याद दिलाती रहती थी. रवि उस से कह देता था कि जल्द ही अपना वादा पूरा करेगा. शादी के 4-5 दिन बाद रवि के घर से सब मेहमान चले गए. घर पूरी तरह खाली हो गया. 21 जुलाई, 2018 की दोपहर रवि चुपके से माया से मिलने उस के घर जा पहुंचा. उस वक्त घर में माया के अलावा कोई नहीं था. उस के तीनों बच्चे स्कूल गए हुए थे.

पहले तो दोनों ने मौके का भरपूर फायदा उठाया. फिर रवि और माया अपनी पहले से तैयार योजना पर बात की. रवि ने माया से कहा कि आज रात सुलेखा को हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया जाएगा. मेरे फोन का इंतजार करना. जैसे ही मैं फोन करूं, धारदार हथियार ले कर मेरे घर आ जाना. घर का दरवाजा खुला रहेगा. रात 10 बजे के करीब सुलेखा पति, सास, ससुर और देवरों को खाना खिला कर पति के साथ पहली मंजिल पर सोने चली गई. उसे क्या पता था कि आज की रात उस पर भारी पड़ने वाली है. खैर, पतिपत्नी बातें करतेकरते कब सो गए, पता ही नहीं चला.

रात 1 बजे के करीब रवि की आंखें खुल गईं. उस ने देखा, सुलेखा गहरी नींद में सो रही थी. रवि मोबाइल लेकर आहिस्ता से बिस्तर से नीचे उतरा और दरवाजा खोल कर बाहर चला गया. तभी सुलेखा की आंखें खुल गईं. उस ने पति से इतनी रात गए बाहर जाने के बारे में पूछा तो रवि ने कहा कि बाथरूम जाना है, अभी आता हूं. रवि घर से बाहर निकल आया और फोन कर के माया को बता दिया कि रास्ता साफ है, आ जाओ. थोड़ी देर बाद रवि बाहर से लौट आया और फिर सोने का नाटक करने लगा. करीब 30 मिनट बाद माया 2 महिलाओं के साथ रवि के घर पहुंच गई.

माया इन महिलाओं को सुरक्षा के लिए लाई थी. उन्हें उस ने बाहर ही रोक दिया था. माया स्वयं चुपके से सीढि़यों के सहारे रवि के कमरे में दाखिल हो गई. उसे रवि के घर का कोनाकोना पता था. सुलेखा रवि के बगल में सोई हुई थी. माया ने साथ लाए धारदार ब्लेड से सुलेखा के गले, चेहरे और आंख पर वार किए. साथ ही उस का गला दबाने का भी प्रयास किया. अचानक हुए हमले से सुलेखा के मुंह से दर्दनाक चीख निकल गई.

पत्नी की चीख सुन कर सोने का बहाना कर रहा रवि उठ बैठा. तब तक नीचे से रवि के दोनों भाई विक्की और शुक्कर ऊपर कमरे में पहुंच गए. विक्की और शुक्कर को देख माया डर गई, क्योंकि रवि का पूरा गेम ही उलटा पड़ गया था. जैसे ही माया वहां से भागी, विक्की और शुक्कर ने उसे दौड़ा कर पकड़ लिया और उसे मारनेपीटने लगे. किसी को शक न हो, सोच कर रवि भी भाइयों के साथ जा मिला और मौका देख कर माया को लातथप्पड़ मारने लगा.

माया के गिरफ्तार हो जाने के बाद उस से महिला थाने में एसओ विमला ने पूछताछ की. माया ने सुलेखा की हत्या की योजना का खुलासा कर दिया कि कैसे उस ने अपने प्रेमी रवि के साथ मिल कर सुलेखा की हत्या की योजना बनाई थी. उस के बयान पर पुलिस ने उस के प्रेमी और सुलेखा के पति रवि को पत्नी की हत्या की कोशिश करने का मुकदमा दर्ज कर के गिरफ्तार कर लिया.

कथा लिखे जाने तक दोनों प्रेमीप्रेमिका रवि राउत और माया जेल में बंद थे. बेटे की करतूत पर मांबाप को काफी दुख पहुंचा. स्वस्थ हो चुकी सुलेखा ससुराल से मायके लौट गई. उस रात माया के साथ आई 2 महिलाओं का पता नहीं चल सका.  ?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Murder Story : हाथपांव बांधकर काटा प्रेमिका का गला

इलाहाबाद (प्रयागराज) के वेणीमाधव मंदिर के आसपास का इलाका धनाढ्य लोगों का है. इसी इलाके की वेणीमाधव मंदिर वाली गली में उमा शुक्ला का परिवार रहता था. उन के 3 बच्चे थे, एक बेटा भोला और 2 बेटियां निशा और रचना. पति की मृत्यु के बाद परिवार को संभालने की जिम्मेदारी उमा ने ही उठाई. जब बेटा भोला बड़ा हो गया तो उमा शुक्ला को थोड़ी राहत मिली.

रचना उमा शुक्ला की छोटी बेटी थी, थोड़े जिद्दी स्वभाव की. उस दिन साल 2016 के अप्रैल की 16 तारीख थी. समय सुबह के 10 बजे. रचना जींस और टौप पहन कर कहीं जाने की तैयारी कर रही थी. मां ने पूछा तो बोली, ‘‘थोड़ी देर के लिए जाना है, जल्दी लौट आऊंगी.’’

उमा शुक्ला कुछ पूछना चाहती थीं, लेकिन रचना बिना मौका दिए अपनी स्कूटी ले कर बाहर निकल गई. बड़ी बेटी निशा पहले ही कालेज जा चुकी थी. थोड़ी देर में लौटने को कह कर रचना जब 2 घंटे तक नहीं लौटी तो उमा शुक्ला को चिंता हुई. उन्होंने फोन लगाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद तो उमा का फोन बारबार रिडायल होने लगा. उन्होंने रचना के कालेज फ्रैंड्स को भी फोन किए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. शाम होतेहोते जब बेटा भोला शुक्ला और बेटी निशा लौट आए तो उन्होंने सुबह गई रचना के अभी तक नहीं लौटने की बात बताई. निशा और भोला ने भी रचना का फोन ट्राई किया, उस के दोस्तों से भी पता किया लेकिन रचना का पता नहीं चला.

रचना को इस तरह लापता देख भोला ने थाना दारागंज में उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी. मां, बेटा और बहन निशा रात भर इस उम्मीद में जागते रहे कि क्या पता रचना आ जाए. अगले दिन 17 अप्रैल को अखबारों में एक खबर प्रमुखता से छपी कि प्रतापगढ़-वाराणसी मार्ग पर हथीगहां के पास एक लड़की की अधजली लाश मिली है. लाश का जो हुलिया बताया गया था, वह काफी हद तक रचना से मिलता था. यह खबर पढ़सुन कर उमा शुक्ला का कलेजा दहल गया. फिर भी मन में कहीं थोड़ी सी उम्मीद  थी कि संभव है, लाश किसी और की हो. कई बार निगाहें धोखा खा जाती हैं.

इसी के मद्देनजर भोला अलगअलग 4-5 अखबार खरीद लाया था ताकि खबरों और फोटो को ठीक से जांचापरखा जा सके. अखबारों में छपी खबर और फोटो में कोई फर्क नहीं था. इस से उमा शुक्ला और भोला इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि लाश रचना की है. इस पर मांबेटे सारे अखबार ले कर थाना दारागंज जा पहुंचे और तत्कालीन थानेदार विक्रम सिंह से मिले. उमा शुक्ला ने जोर दे कर विक्रम सिंह को बताया कि लाश उन की बेटी रचना की है और उस का हत्यारा है सलमान. उन्होंने यह भी कहा कि अगर सलमान को पकड़ कर ठीक से पूछताछ की जाए तो सच्चाई सामने आ जाएगी. लेकिन विक्रम सिंह हत्या के मामले में पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे, वह यह मान कर चल रहे थे कि रचना जिंदा भी तो हो सकती है. उन्होंने उन दोनों को समझा दिया कि हथिगहां में मिली लाश रचना की नहीं है. वह जिंदा होगी और लौट आएगी.

विक्रम सिंह ने उमा शुक्ला से एक लिखित शिकायत ले ली और मांबेटी को समझा कर घर भेज दिया. लेकिन आरोपी का नाम बताने के बावजूद पुलिस ने अगले 2-3 दिन तक रचना के मामले में कोई रुचि नहीं ली. इस पर उमा शुक्ला और भोला एसपी (सिटी) बृजेश श्रीवास्तव से मिले. दोनों ने उन्हें पूरी बात बताई तो बृजेश श्रीवास्तव ने थानाप्रभारी विक्रम सिंह को इस मामले में तुरंत काररवाई करने को कहा. इस का लाभ यह हुआ कि पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट को अपहरण की धाराओं 363, 366 में तरमीम कर के सलमान व अन्य को आरोपी बना दिया.

पुलिस का ढुलमुल रवैया

मुकदमा तो दर्ज हो गया, लेकिन पुलिस ने किया कुछ नहीं. आरोपी सलमान की गिरफ्तारी तो दूर पुलिस ने उस से पूछताछ तक नहीं की. इस की वजह भी थी. सलमान इलाहाबाद के रईस व्यवसायी साजिद अली उर्फ लल्लन का एकलौता बेटा था. पुलिस और नेताओं तक पहुंच रखने वाले लल्लन मियां अपने परिवार के साथ थाना दारागंज क्षेत्र के मोहल्ला बक्शी खुर्द में रहते हैं. उन के पास पैसा भी था और ऊपर तक पहुंच भी. बात 2015 की है. जब भी रचना किसी काम से घर से बाहर निकलती थी, तो इत्तफाकन कहिए या जानबूझ कर सलमान उस के सामने पड़ जाता था. जब भी वह खूबसूरत रचना को देखता तो उस पर फब्तियां कसता, छेड़छाड़ करता. उस समय उस के साथ कई दोस्त होते थे. यह सब देखसुन कर रचना चुपचाप निकल जाती थी.

सलमान के खास दोस्तों में मीरा गली का रहने वाला लकी पांडेय और सलमान का ममेरा भाई अंजफ थे. अंजफ पहले सलमान के पड़ोस में रहता था. बाद में उस का परिवार कर्नलगंज थाना क्षेत्र के बेलीरोड, जगराम चौराहा के पास रहने लगा था. तीनों हमप्याला, हमनिवाला थे. तीनों साथसाथ घूमते थे. लकी पांडेय और अंजफ सलमान के पैसों पर ऐश करते थे. रचना सलमान की आए दिन छेड़छाड़ से तंग आ गई थी. एक दिन उस ने मां को सलमान द्वारा छेड़ने की बात बता दी. किसी तरह यह बात भोला के कानों तक पहुंच गई. यह सुन कर उस के तनबदन में आग लग गई. उस ने बहन को परेशान करने वाले सलमान को सबक सिखाने की ठान ली.

एक दिन भोला ने सलमान को रास्ते में रोक कर उग्रता से समझाया, ‘‘जिस लड़की को तुम जातेआते छेड़ते हो, वो मेरी छोटी बहन है. अपनी आदत सुधार लो सलमान, तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा रहेगा. मैं तुम्हें पहली और आखिरी बार समझा रहा हूं.’’

सलमान को किसी ने पहली बार उसी के इलाके में धमकाया था. वह ऐसी धमकियों की चिंता नहीं करता था. भोला के चेताने पर भी सलमान पर कोई असर नहीं हुआ. अब राह में जातीआती रचना को वह पहले से ज्यादा तंग करने लगा. जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो रचना से सहन नहीं हुआ. उस ने सलमान के खिलाफ थाना दारागंज में छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. लेकिन सलमान के पिता साजिद अली की पहुंच की वजह से पुलिस उस पर हाथ डालने से कतराती रही. भोला के कहनेसुनने पर पुलिस ने दोनों पक्षों के बीच समझौता करा दिया.

समझौते के बाद भोला और उस की मां उमा शुक्ला ने बेटी की इज्जत की खातिर पिछली बातों को भुला दिया. लेकिन घमंडी सलमान इसे आसानी से भूलने वाला नहीं था. उस के मन में अपमान की चिंगारी सुलग रही थी. बहरहाल, मार्च 2017 में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी तो उमा शुक्ला को उम्मीद की किरण दिखाई दी. उम्मीद की इसी किरण के सहारे उमा शुक्ला ने योगी आदित्यनाथ को एक शिकायती पत्र भेजा. योगीजी ने उस पत्र का संज्ञान लिया और रचना शुक्ला अपहरण कांड की जांच स्पैशल टास्क फोर्स से कराने के आदेश दे दिए. थाना पुलिस ने रचना शुक्ला कांड की फाइल ठंडे बस्ते में डाल दी थी.

एसटीएफ ने रचना शुक्ला अपहरण कांड की जांच शुरू तो की, लेकिन बहुत धीमी गति से. फलस्वरूप नतीजा वही रहा ढाक के तीन पात. एसटीएफ भी यह पता नहीं लगा सकी कि रचना जिंदा है या मर चुकी. अगर जिंदा है तो 3 साल से कहां है या आरोपी ने उसे कहां छिपा रखा है. एसटीएफ की जांच की गति देख कर उमा शुक्ला का इस जांच से भी भरोसा उठ गया. अब उन के लिए न्यायालय ही एक आखिरी आस बची थी. उमा शुक्ला ने दिसंबर, 2019 के दूसरे सप्ताह में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की. याचिका में उन्होंने लिखा कि उन की बेटी का अपहरण हुए 4 साल होने वाले हैं. पुलिस अब तक बेटी के बारे में पता नहीं लगा सकी. आरोपी समाज में छुट्टे घूम रहे हैं.

हाईकोर्ट पहुंची उमा शुक्ला

हाईकोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लिया और 6 जनवरी, 2020 को एसएसपी एसटीएफ राजीव नारायण मिश्र और वर्तमान थानाप्रभारी दारागंज आशुतोष तिवारी को फटकार लगाई. साथ ही 15 दिनों के अंदर रचना शुक्ला के बारे में कारगर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया. हाईकोर्ट के आदेश के बाद एसएसपी राजीव नारायण मिश्र ने एएसपी नीरज पांडेय को आड़े हाथों लिया और काररवाई कर के जल्द से जल्द रिपोर्ट देने का सख्त आदेश दिया. कप्तान के सख्त रवैए से पुलिस ने रचना शुक्ला कांड से संबंधित पत्रावलियों का एक बार फिर से अध्ययन किया.

जांचपड़ताल में उन्होंने सलमान और उस के दोस्त लकी पांडेय को संदिग्ध पाया. अंतत: पुलिस ने 19 जनवरी, 2020 की सुबह सलमान और लकी पांडेय को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. दोनों को गुप्त स्थान ले जा कर पूछताछ की गई. शुरू में सलमान एएसपी नीरज पांडेय पर अपनी ऊंची पहुंच का रौब झाड़ने लगा, लेकिन उन के एक थप्पड़ में उसे दिन में तारे नजर आने लगे. सलमान उन के पैरों में गिर गया. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुए कहा, ‘‘सर, हमें माफ कर दीजिए. हम से बड़ी भूल हो गई. करीब 4 साल पहले मैं ने, लकी और अपने ममेरे भाई अंजफ के साथ मिल कर रचना की गला रेत कर हत्या कर दी थी. 4 साल पहले हथिगहां में मिली लाश रचना की ही थी.’’

इस के बाद सलमान परतदरपरत हत्या के राज से परदा उठाता चला गया. करीब 4 सालों से राज बनी रचना शुक्ला की हत्या हो चुकी थी. पता चला सलमान और रचना एकदूसरे को प्यार करते थे. सलमान ने अपनी इस तथाकथित प्रेमिका को मौत के घाट उतार दिया था. रचना शुक्ला के अपहरण और हत्या से परदा उठते ही एसएसपी एसटीएफ राजीव नारायण मिश्र ने अगले दिन यानी 20 जनवरी को पुलिस लाइंस में पत्रकारवार्ता आयोजित की. प्रैस वार्ता में उन्होंने पत्रकारों के सामने रचना शुक्ला के अपहरण और हत्या के आरोपियों सलमान और उस के दोस्त लकी पांडे को पेश किया.

पत्रकारों के सामने सलमान और लकी पांडेय ने अपना जुर्म कबूल किया. साथ ही पूरी घटना भी बताई और वजह भी. रचना की हत्या क्यों और कैसे की गई थी, उस ने इस का भी खुलासा किया. रचना की हत्या की यह कहानी कुछ यूं सामने आई. 19 वर्षीय रचना शुक्ला भाईबहनों में सब से छोटी थी. रचना खूबसूरत युवती थी. जितनी देर तक वह घर में रहती, उस का ज्यादातर समय आइना देखने में बीतता था. बक्शी खुर्द मोहल्ले के रहने वाले सलमान ने जब दूधिया रंगत वाली खूबसूरत रचना को जातेआते देखा तो वह उस पर मर मिटा. यह बात सन 2014 की है, तब रचना इंटरमीडिएट की छात्रा थी और उम्र थी 19 साल.

रचना उम्र के जिस पड़ाव को पार कर रही थी, वह ऐसी उम्र होती है, जब सहीगलत या अच्छेबुरे की जानकारी नहीं होती. रचना के लिए सलमान का प्यार शारीरिक आकर्षण से ज्यादा कुछ नहीं था. सलमान एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद था. उस के लिए पैसा कोई मायने नहीं रखता था. जब भी वह घर से बाहर निकलता, राह में कई चाटुकार दोस्त मिल जाते. उन की संगत में वह पैसे खर्च करता तो वे उसी का गुणगान करते. रसिक सलमान की दिली डायरी में कई ऐसी लड़कियों के नाम थे, जिन के साथ वह मौजमस्ती करता था. इस के बावजूद वह मुकम्मल प्यार की तलाश में था, जहां उस की जिंदगी स्थिर हो जाए. एक ठहराव हो. रचना को देखने के बाद सलमान को अपना सपना पूरा होता लगा. उसे जिस प्यार की तलाश थी, वह रचना पर आ कर खत्म हो गई.

सलमान का प्यार एकतरफा था, क्योंकि इस के लिए रचना ने अपनी ओर से हरी झंडी नहीं दी थी. बाद में जब उस ने सलमान की आंखों में अपने लिए प्यार देखा तो उस का दिल पसीज गया. सलमान घंटों उस के घर के पास खड़ा उस के दीदार के लिए बेताब रहता. रचना चुपकेचुपके सब देखती थी, आखिरकार उस का दिल भी सलमान पर आ गया और उस ने सलमान से इस बात का इजहार भी कर लिया.

पंछी की तरह फंस गई जाल में

फलस्वरूप दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों ने प्यार में जीनेमरने की कसमें खाईं. सलमान तो निश्चिंत था, लेकिन रचना को यह चिंता सता रही थी कि घर वाले उन दोनों के प्यार को स्वीकार करेंगे या नहीं, क्योंकि दोनों की जाति ही नहीं धर्म भी अलगअलग थे. रचना की मां उमा शुक्ला कट्टर हिंदू थीं. वह बेटी के इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करतीं. रचना ने सलमान को अपने मन की आशंका बता दी थी. वैसे भी बहुत कम लोग ऐसे हैं जो बेटे या बेटी की शादी दूसरे मजहब के लड़के या लड़की से करना चाहें. खैर, सलमान ने रचना को समझाया और सब कुछ वक्त पर छोड़ देने को कहा. साथ ही कहा कि हम जिएंगे भी एक साथ और मरेंगे भी एक साथ. सलमान की भावनात्मक बातें सुन कर रचना मन ही मन खुश हुई. इतनी खुश कि उस ने सलमान का गाल चूम लिया. सलमान कैसे पीछे रहता, उस ने रचना को बांहों में भर लिया.

सलमान से रचना सच्चे दिल से प्यार करती थी, लेकिन सलमान के मन में तो कुछ और ही चल रहा था. जिस दिन से उस ने रचना को अपनी बांहों में भरा था, उसी दिन से उस के मन में प्यार नहीं बल्कि वासना की आग धधकने लगी थी. रचना ने सलमान की आंखों में दहकती वासना को महसूस कर लिया था. उस ने उस से कह भी दिया था कि जो तुम मुझ से चाहते हो, वह शादी के पहले संभव नहीं है. मुझे ऐसी लड़की मत समझना, जो दौलत के लिए सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती हैं. जब से यह बात हुई थी, तब से रचना सलमान से थोड़ा बच कर रहने लगी थी. उस ने मिलना भी कम कर दिया था. सलमान यह सब सह नहीं पा रहा था. इस पर सलमान ने एक दांव खेला. उस ने अपने नाम पर एक स्कूटी खरीदी और रचना को गिफ्ट कर दी. यह देख रचना बहुत खुश हुई.

रचना स्कूटी ले कर घर पहुंची तो घर वाले यह सोच कर हैरान हुए कि उस के पास स्कूटी कहां से आई. घर वालों ने रचना से स्कूटी के बारे में पूछा तो उस ने झूठ बोल दिया कि एक दोस्त की है. कुछ दिनों के लिए वह शहर से बाहर गई है. उस ने स्कूटी मुझे चलाने के लिए दी है. जब वापस लौट आएगी, मैं उसे लौटा दूंगी. बात वहीं की वहीं रह गई. सलमान ने जो सोच कर रचना को स्कूटी दी थी, वह संभव नहीं हो पाया. स्कूटी हड्डी बन कर उस के गले में अटकी रह गई. महीनों बाद रचना ने प्यार का दम भरने वाले सलमान के सामने एक प्रस्ताव रखा. उस ने स्कूटी को अपने नाम पर स्थानांतरित कराने के लिए कहा तो सलमान उसे घुमाते हुए बोला, ‘‘जब हम दोनों एक होने वाले हैं तो स्कूटी चाहे तुम्हारे नाम हो या मेरे, क्या फर्क पड़ता है. वक्त आने दो स्कूटी तुम्हारे नाम करा दूंगा. चिंता क्यों करती हो.’’

सलमान की यह बात रचना की समझ में नहीं आई. वह अपनी मांग पर अड़ी रही. सलमान इस के लिए तैयार नहीं हुआ. साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले सलमान का नकली चेहरा सामने आ गया था. जिस वासना की चाहत में उस ने रचना को स्कूटी दी थी, उस रचना ने उस की आंखों में वासना की आग देख ठेंगा दिखा दिया. इस बात को ले कर दोनों के बीच विवाद भी हुआ. सलमान ने रचना को भलाबुरा कहा तो रचना भी पीछे नहीं रही. उस ने सलमान को उस के दोस्तों के सामने ही जलील किया. रचना यहीं चुप नहीं बैठी, उस ने सलमान के खिलाफ दारागंज थाने में छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज करा दिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद रचना और सलमान के बीच दूरियां बढ़ गईं. दोनों ने एकदूसरे से मिलना बात करना बंद कर दिया. रचना ने अपने घर वालों को बता दिया कि सलमान नाम का लड़का उसे छेड़ता है. बहन की बात सुन कर भाई भोला का खून खौल उठा. उस ने सलमान को धमका कर बहन की तरफ न देखने और उस से दूर रहने की हिदायत दे दी.

इंतकाम की आग

रचना ने सलमान के साथ जो किया, वह उसे काफी नागवार लगा. वह अपमान की आग में झुलस रहा था. उस ने यह कभी नहीं सोचा था, रचना उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत भी कर सकती है. तभी उस ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि जब तक वह रचना से अपने अपमान का बदला नहीं ले लेगा, तब तक उस के इंतकाम की आग ठंडी नहीं होगी. लेकिन सवाल यह था कि वह रचना से दोबारा कैसे मिले ताकि फिर से दोस्ती हो जाए और वह उसे विश्वास में ले कर अपना इंतकाम ले सके.

जैसेतैसे सलमान ने रचना तक अपना संदेश भिजवाया कि वह एक बार आ कर मिल ले. वह उस से मिल कर माफी मांगना चाहता है. रचना सलमान की बात मान गई और उसे माफ कर दिया. यही नहीं दोनों फिर से पहले की तरह मिलने लगे. सलमान यही चाहता भी था. उस ने रचना को अपने खतरनाक इरादों की भनक तक नहीं लगने दी. इस बीच 3-4 महीने बीत गए. रचना पर फिर से सलमान के इश्क का जादू चल गया. सलमान को इसी का इंतजार था. सलमान ने अपने दोस्तों लकी पांडेय और ममेरे भाई अंजफ से बात कर के रचना को रास्ते से हटाने की बात की. लकी और अंजफ उस का साथ देने को तैयार हो गए.

तीनों ने मिल कर योजना बनाई कि रचना को किसी तरह सलमान के घर बुलाया जाए और उस का काम तमाम कर के लाश नदी में फेंक दी जाए. इस से किसी को पता भी नहीं चलेगा और वे लोग पुलिस से भी बचे रहेंगे. योजना बन जाने के बाद सलमान ने 16 अप्रैल, 2016 की अलसुबह रचना को फोन कर के सुबह 10 बजे रेलवे स्टेशन पर मिलने के लिए कहा. अपनी स्कूटी ले कर रचना ठीक 10 बजे सलमान से मिलने स्टेशन पहुंच गई. सलमान वहां मौजूद मिला. उस ने रचना की स्कूटी प्रयागराज स्टेशन के स्टैंड पर खड़ी कर दी और उसे अपनी बाइक पर बैठा कर बक्शी खुर्द स्थित अपने घर ले गया. उस के घर में बेसमेंट था.

सलमान रचना को बेसमेंट में ले गया. वहां लकी और अंजफ पहले से मौजूद थे. उन्हें देख रचना खतरे को भांप गई. उस ने वहां से भागने की कोशिश की लेकिन उन तीनों ने उसे दौड़ कर पकड़ लिया और उस के हाथपांव रस्सी से बांध दिए. फिर सलमान ने चाकू से उस का गला रेत कर हत्या कर दी. लाश ठिकाने लगाने के लिए सलमान ने अपने मामा शरीफ को फोन किया. शरीफ फौर्च्युनर ले आया. चारों ने मिल कर लाश जूट के बोरे में भर दी. इस के बाद कपड़े से कमरे में फैला खून साफ कर दिया. रचना की लाश जूट की बोरी में भर कर फौर्च्युनर में लाद दी गई. सलमान और उस के मामा शरीफ सहित चारों लोग पहले नैनी की तरफ गए. इरादा था लाश को यमुना में फेंकने का, लेकिन 5 घंटे तक भटकने के बाद भी उन्हें मौका नहीं मिला.

इस के बाद ये लोग नवाबगंज की तरफ निकल गए. लेकिन वहां भी लाश को गंगा में फेंकने का मौका नहीं मिला. इन लोगों ने प्रयागराज की सीमा के पास प्रतापगढ़, वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर रचना की लाश हथिगहां के पास सड़क किनारे फेंक दी और सब लौट आए. इस के बाद सलमान बाइक से फिर वहां गया. उस के पास एक बोतल पैट्रोल था. उस ने रचना की लाश पर पैट्रोल डाला और आग लगा दी, ताकि लाश पहचानी न जा सके, लौट कर उस ने रचना की स्कूटी सोरांव के एक परिचित के गैराज में खड़ी कर दी. बाद में जो हुआ, जगजाहिर है. सलमान और उस के पिता ने पैसों के बल पर पुलिस को अपने पक्ष में कर लिया.

रचना के केस की पैरवी कर रहे उस के भाई भोला को साल 2018 में सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में फंसा कर जेल भिजवा दिया गया था. इस पर भी रचना के घर वालों ने हार नहीं मानी. रचना की छोटी बहन निशा शुक्ला ने पैरवी करनी शुरू की. आखिरकार हाईकोर्ट की चाबुक से पुलिस की नींद टूटी और आरोपियों को जेल जाना पड़ा. सलमान और लकी के गिरफ्तार होने के 3 दिनों बाद थाना दारागंज के थानेदार आशुतोष तिवारी ने अंजफ को और 20 दिनों बाद मामा शरीफ को दारागंज से गिरफ्तार कर लिया. करीब 4 सालों से जिस रचना शुक्ला की हत्या रहस्य बनी थी, आरोपियों की गिरफ्तारी से सामने आ गई.

अगर पुलिस पीडि़ता उमा शुक्ला की बातों पर विश्वास कर लेती तो घटना के दूसरे दिन ही चारों आरोपी गिरफ्तार हो जाते और इस समय अपने गुनाह की सजा काट रहे होते. बहरहाल, देर से ही सही आरोपी जेल की सलाखों के पीछे चले गए.

extramarital affair : प्रेमियों के लिए मचलने वाली विवाहिता

थोड़ी देर में रीना बस से बनमौर के लिए निकल चुकी थी. उधर उस का प्रेमी कुणाल वहां उस के इंतजार में था. रीना के बनमौर पहुंचने पर उसे बस स्टैंड पर ही कुणाल बाइक लिए खड़ा मिल गया. उसे देख कर रीना के चेहरे पर चमक आ गई. कुणाल ने सहजता से पूछा, ”कोई परेशानी तो नहीं हुई? किसी ने देखा तो नहीं?’’

रीना ने कुछ बोले बगैर कुणाल को अपना बैग पकड़ा दिया. कुणाल ने उसे अपनी गोद में रख कर दोनों हाथों से बाइक का हैंडल पकड़ कर बोला, ”बैठो, दुपट्टा संभाल लेना.’’

इसी के साथ रीना तुरंत बाइक पर बैठ गई. दोनों ने घर पहुंचने से पहले रास्ते में एक ढाबे पर खाना खाया और फिर कुणाल ने उस रात अपनी हसरतें पूरी कीं. रीना भी कुणाल का साथ पा कर निहाल हो गई. दोनों ने बिनब्याह के सुहागरात मनाई. रीना मध्य प्रदेश के भिंड जिले के इंगुरी गांव के रहने वाले साधारण किसान दशरथ भदौरिया की पत्नी थी. कजरारी आंखों वाली सुंदर पत्नी को पा कर दशरथ बेहद खुश था. रीना की इस खूबसूरती का दीवाना उस के पति दशरथ के अलावा एक और युवक कुणाल पांडे भी था.

वह इंगुरी का नहीं था, लेकिन रीना और दशरथ के पड़ोस में रहने वाले शुक्ला परिवार में उस का अकसर आनाजाना लगा रहता था. एक दिन उस की भी नजर रीना पर पड़ गई. तभी से वह उस का दीवाना हो गया था.

शादीशुदा होने के बावजूद क्यों बहकी रीना

पहली बार में ही दोनों के दिलोदिमाग में खलबली मच गई थी. उन्होंने एकदूसरे के प्रति खिंचाव महसूस किया था. कुणाल कुंवारा था, उस ने कुंवारेपन की कसक के साथ रीना की सुंदरता और कमसिन अदाओं को महसूस किया था. कुणाल के बांकपन और बलिष्ठ देह को देख कर रीना के दिमाग के तार भी झनझना उठे थे. दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं. गुदगुदी होने लगी थी. उस से मिलने को बेचैन हो गई थी, जबकि वह 7 साल की ब्याहता थी, 3 बच्चे थे. उस की कुछ हसरतें थीं, जो पूरी नहीं हो रही थीं. वह खुद को खूंटे से बंधी गाय ही समझती थी.

ऐसा लगता था जैसे उस के सारे मंसूबे धरे के धरे रह जाएंगे. जवानी यूं ही सरकती चली जाएगी. मनचाही खुशियां नहीं मिल पाएंगी. एक दिन कुणाल से मिलने के बाद तो उस का मन और भी बेचैन हो गया था. रीना और कुणाल के बीच पनपे प्यार के बढऩे का यह शुरुआती दौर था, किंतु जल्द ही दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए. यहां तक कि कुणाल उसे अपनी बाइक से जबतब पास के शहर ले कर जाने लगा. इस में उस के पति दशरथ की सहमति थी.

वह कुणाल को सिर्फ पड़ोसी शुक्लाजी का रिश्तेदार और अपना हमदर्द समझता था. इस वजह से वह कुणाल पर भरोसा करता था. जब भी रीना कुछ खरीदारी करने के लिए शहर जाने की बात कहती थी, तब वह उसे कुणाल के साथ जाने की अनुमति दे देता था. किंतु उसे इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि रीना क्या गुल खिला रही है.

कुणाल और रीना एकदूसरे को बेहद चाहने लगे थे. रीना अपना दिल पूरी तरह से कुणाल को सौंप चुकी थी. दूसरी तरफ दशरथ के साथ उस की जिंदगी उबाऊ बनती जा रही थी. घर में छोटीछोटी बातों को ले कर चिकचिक होने लगी थी. रीना जब कभी कुणाल के साथ किसी रेस्टोरेंट में एक साथ कोई पसंदीदा डिश खा रही होती, तब चम्मच से निवाले के साथसाथ अपनी सारी समस्याएं भी उस से साझा कर लेती थी. कुणाल उस के इसी प्रेम का दीवाना बन चुका था और उस के साथ अपनी हसरतें पूरी करने का हसीन सपना देखने लगा था. उस पर पैसा खर्च करने में जरा भी कंजूसी नहीं करता था.

कुणाल मध्य प्रदेश के औद्योगिक इलाके बनमौर में रहता था. वह वहीं एक कंपनी में काम करता था. रीना का गांव बनमौर से करीब 400 किलोमीटर दूर था. इस कारण उन का मिलनाजुलना महीने 2 महीने में ही हो पाता था, लेकिन वे फोन से अपने दिल की बातें करते रहते थे. कुणाल एक बार करीब 3 महीने बाद रीना से मिला था. तब बातोंबातों में रीना ने लंबे समय बाद मिलने के शिकायती लहजे में साथ रहने की बात रखी. कुणाल भी चुप रहने वाला नहीं था, झट से बोल पड़ा था, ”मैं तो हमेशा तैयार हूं. मेरे पास बनमौर आने का फैसला तुम्हें लेना है.’’

”पति को क्या कहूं?’’ रीना मासूमियत के साथ बोली.

”दशरथ को साफसाफ हमारे तुम्हारे प्रेम के बारे में बता दो.’’ कुणाल ने समझाया.

”लेकिन मैं कैसे कहूं उस से. कहने पर बच्चों का हवाला दे कर रोक देगा.’’ रीना बोली.

”तो फिर एक ही उपाय है,’’ कुणाल ने कहा.

”वह क्या?’’ रीना ने सवाल किया.

”उसे बिना बताए मेरे पास चली आओ… जब वह हम लोगों से मिलेगा, तब उसे हाथ जोड़ कर समझा देंगे.’’ कुणाल ने समझाया. उस के बाद वह बनमौर लौट गया.

रीना कई दिनों तक उलझी रही. कभी बच्चे का विचार सामने आ जाता था तो कभी पति के साथ गुजर रही रूखी जिंदगी. वह काफी उलझन में थी. उसे डर लगने लगा था कि घर छोड़ कर कुणाल के पास जाना कहीं भविष्य में उस के लिए कोई खतरा न बन जाए. काफी सोचविचार करने के बाद रीना ने एक रोज कुणाल को फोन कर कहा, ”आज दोपहर मैं ने घर की देहरी लांघने का फैसला कर लिया है.’’

रीना भदौरिया के इस फैसले पर कुणाल ने उसी वक्त आगे की योजना समझा दी. अगले रोज दोपहर के समय रीना तेजी से घरेलू काम निपटाने में लगी हुई थी. घर में कोई नहीं था. पति खेत पर गया हुआ था और बच्चे स्कूल जा चुके थे. वह बरतनों को साफ करने और करीने से रखने के बाद फटाफट अपने बैग में कपड़े ठूंसने लगी. पति की नजरों से बचा कर रखे गए कुछ पैसे भी बैग में संभाल कर रख लिए. फिर वह बस पकड़ कर प्रेमी कुणाल के पास पहुंच गई.

उधर दशरथ अपने बच्चे के साथ बेचैन था. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर रीना अचानक बिना कुछ बताए कहां चली गई. दशरथ रीना को बारबार फोन मिला रहा था, वह स्विच्ड औफ आ रहा था. दशरथ ने इटावा में रीना के मायके से संपर्क किया. वहां रीना के नहीं पहुंचने की जानकारी से वह बेचैन हो गया कि अखिर वह कहां चली गई? उस का फोन क्यों बंद आ रहा है?

दशरथ आसपास के लोगों से भी पत्नी के बारे में पूछताछ कर चुका था. ससुराल में कई बार फोन करने पर हर बार निराशा ही हाथ लगी थी. यहां तक कि शुक्लाजी के यहां जा कर कुणाल के आने के बारे में भी पूछा था. उन से मालूम हुआ था कि वह महीनों से उन के पास नहीं आया है. दशरथ समझ नहीं पा रहा था कि आखिर रीना कहां गई होगी? वह कुणाल के साथ जब भी कहीं जाती थी, तब उसे इस बारे में बता जरूर बता देती थी.

आखिरकार दशरथ पत्नी एक फोटो ले कर पावई थाने गया. उस ने एसएचओ राजेंद्र सिंह परिहार को पूरी बात बताई और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. एसएचओ ने उसी वक्त से रीना की तलाश शुरू कर दी. मामला शादीशुदा महिला की गुमशुदगी का था, इसे देखते हुए पहले भदौरिया परिवार के सभी सदस्यों समेत रीना का मोबाइल नंबर ले कर उन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने के बाद पता चला कि रीना की बीते दिनों एक अनजान फोन नंबर पर अधिक समय तक बातचीत हुई. वह नंबर कुणाल पांडे का था. इस के बाद दशरथ समझ गया कि जरूर वह कुणाल के पास ही गई होगी.

यह जानकारी मिलते ही दशरथ आटो स्टैंड पर पहुंचा और वहां मौजूद आटो चालकों को जब रीना का फोटो दिखाया तो वहां मौजूद हरिओम नाम के ड्राइवर ने रीना को पहचान लिया. उस ने बताया कि वह महिला उस के आटो में बैठ कर बसस्टैंड तक गई थी, लेकिन वहां से वह कहां के लिए गई होगी, इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है.

इस जानकारी के बाद दशरथ ने बस कंडक्टरों को रीना की फोटो दिखा कर पूछताछ की. उन्हीं में से ग्वालियर से बनमौर रूट पर चलने वाली एक बस के कंडक्टर ने बताया कि वह महिला बनमौर तक उस की बस में सवार हो कर गई थी. दशरथ ने थाने जा कर एसएचओ को सारी बात बताई. पवई पुलिस ने बनमौर बसस्टैंड से संबंधित थाने को इस की सूचना और रीना का फोटो भेज कर वहां लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज की जानकारी मांगी. जल्द ही एक फुटेज में रीना एक बाइक पर सवार दिख गई, जिसे एक नवयुवक ले जाता दिखाई दिया.

बाइक का नंबर और युवक का चेहरा भी दिख गया था. दशरथ ने उस की पहचान कुणाल के रूप में की. बाइक के नंबर की मदद से पुलिस दशरथ को ले कर कुणाल के पास पहुंच गई. वहां कुणाल और रीना मिल गए. दशरथ ने रीना को साथ चलने के लिए कहा, लेकिन उस ने उस के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया. पुलिस दोनों को थाने ले आई. वहां उन से की गई पूछताछ में रीना ने बताया कि वह अपनी मरजी से कुणाल के साथ आई है और आगे भी उसी के साथ रहना चाहती है.

पति दशरथ भदौरिया के हाथ क्यों रह गए खाली

दशरथ ने उसे बच्चों का हवाला देते हुए साथ चलने की विनती की, लेकिन रीना अपनी जिद पर अड़ी रही. पुलिस ने कागजी काररवाई कर रीना और उस के प्रेमी को छोड़ दिया. दशरथ को इस मामले में अदालती काररवाई की सलाह दी. मायूस दशरथ अपने घर लौट आया. दशरथ का दिल टूट गया और भारी मन से रीना को उस के प्रेमी के भरोसे छोड़ दिया. तीनों बच्चों को कुछ दिनों के लिए उन के ननिहाल भेज दिया.

रीना भदौरिया और कुणाल के लिए अच्छी बात यह हुई कि दशरथ के रूप में उन के प्यार की बाधा खत्म हो गई थी. कुणाल बनमौर में नौकरी करता था. उस ने अपनी आमदनी से रीना को खुशहाल जिंदगी देने का वादा किया, लेकिन उस ने विवाह की औपचारिकता पूरी नहीं की. न तो उस के साथ मंदिर में जा कर उस के गले में वरमाला डाली और न ही कोर्टमैरिज के लिए कोई पहल की. दोनों का दांपत्य जीवन लिवइन रिलेशन की बुनियाद पर टिक गया.

सब कुछ रीना की महत्त्वाकांक्षा के अनुरूप चलने लगा. रीना ने महसूस किया कि जैसे उसे खुशियों और आजादी के पंख लग गए हों. वह अपनी मनमरजी का जीवन गुजारने लगी थी. लेकिन कहते हैं न कि सुख की समय सीमा बहुत जल्द कम होने लगती है. ऐसा ही रीना के साथ भी हुआ. जब रोजीरोटी के लिए नौकरी और ड्यूटी को प्राथमिकता देने लगा, तब रीना ने कुछ अच्छा महसूस नहीं किया. उसे लगा कि जैसे उस की खुशियां कम हो रही हैं.

कुणाल के साथ रहते हुए उसे कई बार बोरियत भी महसूस होने लगी. कारण कुणाल सुबह 10 बजे खाना खा कर अपनी ड्यूटी पर चला जाता था और रात 8 बजे कमरे पर लौटता था. रीना का घर पर अकेले मन नहीं लगता था. वह खुले विचारों वाली थी. घूमनाफिरना, होटल में खाना खाना, पार्क, मौल आदि में जाने की आदत लगी हुई थी. उस में कमी आने से वह उदास रहने लगी थी. कुणाल अब छोटीछोटी बातों और घरेलू खर्च को ले कर रीना को जिम्मेदार ठहराने लगा था. रोजाना किसी न किसी बात को ले कर उन के बीच कहासुनी होने लगी थी.

घरेलू क्लेश से रीना दिन भर कमरे में अकेली पड़ी परेशान होती रहती थी. वह विचलित हो जाती थी कि आखिर अपनी पीड़ा किसे सुनाए. वहां कोई भी उस का हमदर्द नहीं था, जिसे अपने गम की बात सुनाए. दिल का दुखड़ा बताए. ऐसे में रीना को अपने लिए गए फैसले पर पछतावा होने लगा. अपने बच्चों और पति की याद भी उसे सताने लगी, लेकिन अब इतना सब हो जाने के बाद पति के पास वापस लौटना संभव नहीं था.

अपनी बदली हुई जिंदगी से निराश रीना की मुलाकात मार्केट में एक दिन सुरेंद्र धाकड़ नाम के युवक से हो गई. वह टैंपो चलाता था. उस की लच्छेदार और मीठी बातों ने रीना का मन मोह लिया था. अंत में रीना ने अपनी आदत के मुताबिक अपना नाम बताया और मोबाइल नंबर भी दे दिया. खुशमिजाज टैंपो वाले ने रीना का कुछ समय की यात्रा में ही दिल जीत लिया था.

कौन बना रीना का अगला प्रेमी

सुरेंद्र ठंडी हवा के झोंके की तरह रीना भदौरिया को छू कर चला गया था. उसे कई दिनों तक उस की बातें याद आती रहीं. एक रोज उस ने उसे फोन कर दिया. रीना उसे बसस्टैंड के मार्केट में आने के लिए बोली. सुरेंद्र तुरंत सौरी बोलता हुआ बोला, ”मैडम, मैं अभी ग्वालियर अपने कमरे पर हूं. आज में अपनी सेवा नहीं दे सकता. माफी चाहता हूं.’’

एक टैंपो चालक द्वारा इस तरह तमीज से बातें करना रीना के दिल को छू गया. 2 दिनों बाद सुरेंद्र एक बार फिर रीना को मार्केट में टकरा गया. कुछ घरेलू सामान के साथ रीना बाजार में सड़क के किनारे बैठी थी. वह खोई खोई थी. तभी सुरेंद्र ने अचानक उस के सामने टैंपो रोक दिया था. एक बार फिर उस रोज के लिए सौरी बोला और हालचाल पूछ बैठा. रीना अचानक सुरेंद्र को देख कर चौंक पड़ी. कुछ बोलने से पहले ही सुरेंद्र बोला, ”देवी मंदिर चलना है मैडम! आज वहां मेला लगता है. चलिए वहां घुमा लाता हूं. ज्यादा किराया नहीं लूंगा. वैसे भी खाली जा रहा हूं.’’

रीना से जिस मंदिर के बारे में पूछा, संयोग से वह उस के घर के रास्ते में ही आगे कुछ दूरी पर था. तुरंत ही वह सुरेंद्र के साथ जाने के लिए तैयार हो गई. उस दिन रीना ने महसूस किया कि उस के दिल की बात सुरेंद्र सुन सकता है. उस रोज नहीं चाहते हुए भी रीना मंदिर में कुछ समय सुरेंद्र के साथ रही. उस के साथ पूजा में हिस्सा लिया और पास के एक ढाबे में चायनाश्ता भी किया. यह सब सुरेंद्र को भी अच्छा लगा था.

रीना उस के साथ फोन पर भी बातें करने लगी. अपनी समस्याएं बताने लगी थी, जिस का सुरेंद्र दार्शनिक अंदाज में जवाब देने लगा था. एक दिन सुरेंद्र उसे ग्वालियर अपने कमरे पर ले गया. रीना के कदम पहले से ही बहके हुए थे. उसे हमेशा महसूस होता था कि वह प्यार की भूखी है. थोड़ी सी हमदर्दी मिलते ही उस ओर मुड़ जाती थी. प्यार पाने की यही लालसा उसे कुणाल तक खींच लाई थी. जब कुणाल से जी ऊबने लगा, तब वह सुरेंद्र में अपना प्यार तलाशने लगी. एक मर्द से दूसरे मर्द की बाहों में जाने के बाद मिलने वाली उपेक्षा और असफलता का उसे कोई मलाल नहीं होता था.

जल्द ही रीना और सुरेंद्र ग्वालियर के शील नगर में लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे. सुरेंद्र ने अपने मकान मालिक से रीना का परिचय पत्नी के रूप में करवाया. हालांकि इस फैसले को ले कर रीना को उस की एक सहेली ने काफी समझाया था कि वह गलत कर रही है. सुरेंद्र उस से 13 साल छोटा भी था. किंतु तब तक रीना पर सुरेंद्र के इश्क का भूत ठीक उसी तरह सवार हो चुका था, जिस तरह एक समय में वह कुणाल के इश्क की दीवानी बनी हुई थी.

रीना ने अपने नाबालिग बेटे दीपेश को भी ननिहाल से बुलवा लिया था. उसे सुरेंद्र पास की एक बेकरी में काम पर लगवा दिया था. वह दोपहर बेकरी पर जाता था और रात के 9 बजे सुरेंद्र उसे अपने साथ वापस कमरे पर ले आता था. कुछ दिनों तक सुरेंद्र ने रीना को अच्छी तरह से रखा. बाद में वह एकएक पैसे के लिए मोहताज रहने लगी. अब उसे कुणाल को छोड़ कर सुरेंद्र की बातों में आने का पछतावा होने लगा था. कुछ दिनों से रीना फिर से कुणाल के संपर्क में आ गई. उन के पुराने रिश्ते फिर से रंग भरने लगे. एकदूसरे के साथ जीवन भर निर्वाह करने के कसमेवादे करने लगे. रीना चाहत थी कि वह कुणाल के पास फिर से रहने लगे.

प्रेमी क्यों बना कातिल?

18 फरवरी, 2023 की दोपहर एक बजे के करीब सुरेंद्र शिवमंदिर में पूजा अर्चना कर के लौटा तो बेडरूम में रीना को कुणाल के साथ हंस हंस कर बातें करते सुन लिया. यह देखते ही उस का खून खौल उठा. रीना की बेवफाई और बेरुखी ने सुरेंद्र के गुस्से को हवा दे दी. वह रीना को गालियां देते हुए उस के साथ मारपीट करने लगा. इस पर रीना को भी गुस्सा आ गया. वह बोली, ”मैं तुझे छोड़ कर हमेशा के लिए अपने कुणाल के पास जा रही हूं.’’

रीना के मुंह से इतना सुनते ही सुरेंद्र भी गुस्से में बोल पड़ा, ”देखता हूं हरामजादी तू वहां कैसे जाती है.’’

रीना भी कहां चुप रहने वाली थी. वह सुरेंद्र के साथ बदतमीजी से पेश आने लगी. उसे गालियां देने लगी और  बोली, ”तो क्या तू मुझे जबरदस्ती जाने से रोकेगा, कान खोल कर सुन ले कि जहां मेरी मरजी होगी, मैं वहां जाऊंगी. जिस से मेरा मन मिलेगा, वहीं रहूंगी.’’

रीना का इतना कहना था कि सुरेंद्र ने उसे धमकी दी और बोला, ”रीना, जिद मत कर यही तेरे लिए बेहतर रहेगा. वरना मैं भी अच्छे के साथ अच्छा और बुरे के साथ बुरा हूं.’’

”कमीने शिवरात्रि के व्रत के दिन तूने मेरे साथ मारपीट की है. मैं अब किसी भी सूरत में तेरे पास एक भी पल के लिए नहीं रुकने वाली.’’

रीना भदौरिया की यह बात सुरेंद्र को बहुत ही बुरी लगी. उस ने उसे धक्का दे दिया. वह जमीन पर गिर पड़ी. इस बीच सुरेंद्र ने उस की साड़ी को उस के बदन से खींच कर गले में फंदा डाल दिया. वह तब तक साड़ी के फंदे को खींचता रहा,जब तक रीना बेसुध नहीं हो गई. उस के बाद सुरेंद्र मेला घूमने चला गया और रात के करीब 9 बजे उस के बेटे को ले कर कमरे पर आया. वहां रीना को मृत अवस्था में देख कर परेशान होने का नाटक किया. फिर उस ने अपने एक दोस्त कालू के माध्यम से एंबुलेंस बुलाई. उस पर रीना की लाश रखवा कर उस के गांव इंगुरी भेज दी. साथ में उस के बेटे दीपेश को भी बिठा दिया. सुरेंद्र ने इस की जानकारी रीना के पति दशरथ भदौरिया को फोन पर दे दी

लाश को गांव पहुंचने से पहले ही कुछ दूरी पर एंबुलेंस से उतरवा दी. दीपेश वहां से भागता हुआ अपने पिता दशरथ के पास गया और मम्मी की मृत्यु की सूचना दी. दशरथ घबराया हुआ लाश के पास पहुंच गया. उस ने जैसे ही रीना के कान से खून और गले पर किसी चीज से कसे जाने के निशान देखे तो उसे हत्या का शक हुआ. उस ने तुरंत पवई पुलिस को इस की सूचना दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच की तो मामला संदिग्ध नजर आया.

घटनास्थल ग्वालियर होने की वजह से पवई पुलिस ने रीना के शव को मृतका के परिजनों के साथ वापस ग्वालियर भेज दिया. मृतका के परिजन शव को ले कर ग्वालियर थाने पहुंचे तो पुलिस ने मामला दर्ज कर रीना का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. 19 फरवरी, 2023 की सुबह ग्वालियर थाने के एसएचओ राजेंद्र परिहार की टीम ने सुरेंद्र धाकड़ को जलालपुर फिल्टर प्लांट से गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली. इस टीम में एसआई रमाकांत उपाध्याय, हेमेंद्र राजपूत, योगेंद्र मावई, एएसआई हरिराम नागर शामिल थे. पुलिस के सामने उस ने अपने जुर्म स्वीकार कर लिया.

पूछताछ के बाद सुरेंद्र धाकड़ को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.