True Crime: मोह में मिली मौत – विदेश जाने का चढ़ा खुमार

True Crime: 19 जनवरी, 2022 को अमेरिका से लगी कनाडा सीमा के पास मिनेसोटा राज्य के एमर्शन शहर के नजदीक कनाडा की ओर मेनिटोबा रौयल कैनेडियन माउंटेन पुलिस (आरसीएमपी) ने अमेरिका में चोरीछिपे यानी अवैध रूप से घुस रहे 7 लोगों को गिरफ्तार किया था. इन लोगों से पता चला कि इन के 4 लोग और थे, जो पीछे छूट गए हैं. पीछे छूट गए लोगों की तलाश में जब आरसीएमपी के जवानों ने सीमा की तलाशी शुरू की तो उन्हें सीमा के पास बर्फ में ढके 4 शव मिले. आरसीएमपी के जवानों ने जिन 7 लोगों को गिरफ्तार किया था, वे गुजरात के गांधीनगर के आसपास के रहने वाले थे. इस से उन जवानों ने अंदाजा लगाया कि ये मृतक भी शायद उन्हीं के साथी होंगे.

बर्फ में जमी मिली चारों लाशों में एक  पुरुष, एक महिला, एक लड़की और एक बच्चे की लाश थी. ये लाशें सीमा से 10 से 13 मीटर की दूरी पर कनाडा की ओर पाई गई थीं. मेनिटोबा रायल कैनेडियन पुलिस ने लाशों की तलाशी ली तो उन के पास मिले सामानों में बच्चे के उपयोग में लाया जाने वाला सामान मिला था. अंदाजा लगाया गया कि इन की मौत ठंड से हुई है. बर्फ गिरने की वजह से उस समय वहां का तापमान माइनस 35 डिग्री सेल्सियस था. अगले दिन जब यह समाचार वहां की मीडिया द्वारा प्रसारित किया गया तो भारत के लोग भी स्तब्ध रह गए थे.

खबर में मृतकों के गुजरात के होने की संभावना व्यक्त की गई थी, इसलिए उस समय गुजरात से कनाडा गए लोगों के भारत में रहने वाले परिजन बेचैन हो उठे. सभी लोग कनाडा गए अपने परिजनों को फोन करने लगे. उसी समय गांधीनगर की तहसील कलोल के गांव डिंगुचा के रहने वाले बलदेवभाई पटेल का बेटा जगदीशभाई पटेल भी अपनी पत्नी, बेटी और बेटे के साथ कनाडा गया था. इसलिए उन्हें चिंता होने लगी कि कहीं उन का बेटा ही तो सीमा पार करते समय हादसे का शिकार नहीं हो गए. उन का बेटे से संपर्क भी नहीं हो रहा था. सच्चाई का पता लगाने के लिए उन्होंने कनाडा स्थित दूतावास को मेल किया, पर कुछ पता नहीं चला. पता चला 9 दिन बाद.

पुलिस को चारों लाशों की पहचान कराने में 9 दिन लग गए थे. 9 दिन बाद 27 जनवरी, 2022 को आरसीएमपी की ओर से रोब हिल द्वारा अधिकृत रूप से भारतीय उच्चायोग को सूचना दी गई कि चारों मृतक भारत के गुजरात राज्य के जिला गांधीनगर के डिंगुचा गांव के रहने वाले थे. चारों मृतक एक ही परिवार के थे. उन की पहचान बलदेवभाई पटेल के बेटे जगदीशभाई पटेल (39 साल), बहू वैशाली पटेल (37 साल), पोती विहांगी पटेल (11 साल) और पोते धार्मिक पटेल (3 साल) के रूप में हुई थी. यह परिवार 12 जनवरी को कनाडा जाने की बात कह कर घर से निकला था और वहां पहुंच कर फोन करने की बात कही थी.

यह परिवार उसी दिन कनाडा के टोरंटो शहर पहुंच गया था. इस के बाद यह परिवार 18 जनवरी को मैनिटोबा प्रांत के इमर्शन शहर पहुंचा था और 19 जनवरी को पूरे परिवार की लाशें मेनिटोबा प्रांत से जुड़ी अमेरिका कनाडा सीमा पर कनाडा सीमा में 12 मीटर अंदर मिली थीं. दूसरी ओर जब पता चला कि यह परिवार अवैध रूप से अमेरिका में घुस रहा था तो गुजरात के डीजीपी आशीष भाटिया ने पटेल परिवार को गैरकानूनी रूप से विदेश भेजने से जुड़े लोगों से ले कर पूरी जांच की जिम्मेदारी सीआईडी क्राइम ब्रांच की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग ब्रांच को सौप दी. जिस के लिए डिप्टी एसपी सतीश चौधरी के नेतृत्व में टीम गठित कर जांच शुरू भी कर दी गई थी.

विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने भी इस घटना को गंभीरता से लिया. जिस की वजह से भारत, अमेरिका और कनाडा की जांच एजेसियां इस मामले की संयुक्त रूप से जांच करने लगीं. पता चला है कि अमेरिका की पुलिस ने डिंगुचा गांव के पटेल परिवार के 4 सदस्यों सहित 11-12 अन्य लोगों को अवैध रूप से सीमा पार कराने के आरोप में फ्लोरिडा के स्टीव शैंड नामक एजेंट को गिरफ्तार किया था. चारों लाशें कनाडा में थीं. अंतिम संस्कार के लिए के लिए जब उन्हें भारत लाने की बात चली तो पता चला कि एक लाश लाने में करीब 40 लाख रुपए का खर्च आएगा. मतलब करोड़ों का खर्च था. इसलिए तय हुआ कि चारों मृतकों का अंतिम संस्कार कनाडा में ही करा दिया जाए.

और फिर किया भी यही गया. चारों मृतकों का अंतिम संस्कार वहीं करा दिया गया. चूंकि अमेरिका, कनाडा में पटेल बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं, इसलिए मृतकों का अंतिम संस्कार करने में कोई दिक्कत नहीं आई थी. क्योंकि इस परिवार की मदद के लिए पटेल समाज आगे आ गया था. इतना ही नहीं, अमेरिका और कनाडा के रहने वाले पटेलों ने जगदीशभाई पटेल के परिवार के लिए 66 हजार डालर की रकम इकट्ठा भी कर के भेज दी है. जगदीशभाई पटेल गुजरात के जिला गांधीनगर की तहसील कलोल के गांव डिंगुचा के रहने वाले थे. उन के पिता बलदेवभाई पटेल पत्नी मधुबेन और बड़े बेटे महेंद्रभाई पटेल के साथ डिंगुचा में ही रहते हैं. उन के साथ ही बड़े बेटे का परिवार भी रहता है.

बलदेवभाई गांव के संपन्न आदमी थे. उन के पास अच्छीखासी जमीन, इसलिए उन्हें किसी चीज की कमी नहीं थी. बड़े बेटे महेंद्रभाई की शादी पहले ही हो गई थी. जगदीश भी गांव के स्कूल में नौकरी करने लगा तो पिता ने उस की भी शादी कर दी. शादी के बाद जब जगदीशभाई को बिटिया विहांगी पैदा हुई तो वह बेटी की पढ़ाई अच्छे से हो सके, इस के लिए पत्नी वैशाली और बेटी विहांगी को ले कर कलोल आ गए थे. जगदीश ने गांव की अपनी स्कूल की नौकरी छोड़ दी थी. कलोल में परिवार के खर्च के लिए उन्होंने बिजली के सामानों की दुकान खोल ली थी. कलोल आने के बाद उन्हें बेटा धार्मिक पैदा हुआ था. सब कुछ बढि़या चल रहा था. बेटी विहांगी 11 साल की हो गई थी तो बेटा 3 साल का हो गया था. इस बीच उन्हें न जाने क्यों विदेश जाने की धुन सवार हो गई.

दरअसल, गुजरात और पंजाब में विदेश जाने का कुछ अधिक ही क्रेज है. डिंगुचा गांव में करीब 7 हजार की जनसंख्या में से 32 सौ से 35 सौ के आसपास लोग विदेश में रहते हैं. इसी वजह से इस गांव के लोगों में विदेश जा कर रहने का बड़ा मोह है.

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ऐसा ही मोह जगदीश के मन में भी पैदा हो गया था. तभी तो वह एक लाख डालर (75 लाख) रुपए खर्च कर के एजेंट के माध्यम से अमेरिका जाने को तैयार हो गए थे. वह चले भी गए थे, पर उन के और उन के परिवार का दुर्भाग्य ही था कि बौर्डर पर बर्फ गिरने लगी और उन का पूरा परिवार ठंड की वजह से काल के गाल में समा गया. यह कोई पहली घटना नहीं है. इस तरह की अनेक हारर स्टोरीज इतिहास के गर्भ में छिपी हैं. मात्र कनाडा ही नहीं, मैक्सिको की सीमा से भी लोग गैरकानूनी रूप से अमेरिका में प्रवेश करते हैं. आज लाखों पाटीदार (पटेल) यूरोप और अमेरिका में रह रहे हैं.

अमेरिका विश्व की महासत्ता है. सालों से गुजरातियों ने ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों के लोगों में अमेरिका जाने का मोह है. क्योंकि अमेरिका में कमाने के तमाम अवसर हैं. गुजरात के पटेल सालों से अमेरिका जा कर रह रहे हैं. अमेरिका की 32 करोड़ की आबादी में आज 20 लाख से अधिक भारतीय हैं, जिन में 10 लाख लोग पाटीदार हैं. गैरकानूनी रूप से किसी को भी अमेरिका ही नहीं बल्कि किसी भी देश में नहीं जाना चाहिए. कलोल के पास के डिंगुचा गांव के पटेल परिवार की करुणांतिका जितना हृदय को द्रवित करने वाली है, उतनी ही आंखें खोलने वाली भी है.

एक समय अमेरिका में 10 लाख रुपए में गैरकानूनी रूप से प्रवेश हो जाता था. लेकिन अब यह एक करोड़ तक पहुंच गया है. इस धंधे को कबूतरबाजी कहा जाता है. इस तरह के कबूतरबाज रोजीरोटी की तलाश और अच्छे जीवन की चाह रखने वाले गुजराती परिवारों के साथ धोखेबाजी करते हैं और इस के लिए तमाम एजेंट गुजरात में भी हैं. अमेरिका या कनाडा से फरजी स्पांसर लेटर्स मंगवा कर विजिटर वीजा पर उन्हें अमेरिका में प्रवेश करा देते हैं और फिर वे सालों तक गैरकानूनी रूप से अमेरिका में रहने के लिए संघर्ष करते रहते हैं. उन्हें कायदे की नौकरी न मिलने की वजह से होटलों या रेस्टोरेंट में साफसफाई या वेटर की नौकरी करनी पड़ती है.

यह एक तरह से दुर्भाग्यपूर्ण ही है. सोचने वाली बात यह है कि जो लोग करोड़ों रुपए खर्च कर के चोरीछिपे अमेरिका जाते हैं, वे 50 या सौ करोड़ की आसामी नहीं होते. वे बेचारे वेटर और क्वालिटी लाइफ की तलाश में अपना मकान, जमीन या घर के गहने बेच कर जाते हैं. इस की वजह यह होती है कि देश में उन के लिए नौकरी नहीं होती. वे बच्चों को अच्छी शिक्षा या अच्छा इलाज दे सकें, उन के पास इस की व्यवस्था नहीं होती. ऐसा ही कुछ सोच कर जगदीशभाई ने भी 75 लाख रुपए खर्च किए. पर उन का दुर्भाग्य था कि अच्छे जीवन की तलाश में उन्होंने जो किया, वह उन का ही नहीं, उन के पूरे परिवार का जीवन लील गया.

रोजगार और अच्छे भविष्य के लिए गुजराती अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में जान को खतरे में डाल कर गैरकानूनी रूप से घुसते हैं. जब इस बारे में पता किया गया तो जो जानकारी मिली, उस के अनुसार एजेंट को पैसा वहां पहुंचने के बाद मिलता है. गुजरात से हर साल हजारों लोग गैरकानूनी रूप से विदेश जाते हैं. इस में उत्तर गुजरात तथा चरोतर के पाटीदार शामिल हैं. विदेश जाने की चाह रखने वाले परिवार मात्र आर्थिक ही नहीं, सामाजिक और शारीरिक यातना भी सहन करते हैं. इस समय इमिग्रेशन की दुनिया में कनाडा का बोलबाला है. जिन्हें कनाडा हो कर अमेरिका जाना होता है या कनाडा में ही रहना होता है, उन के लिए कनाडा के वीजा की डिमांड होती है. इस समय जिन एजेंटों के पास कनाडा का वीजा होता है, उस में स्टीकर के लिए वे ढाई लाख रुपए की मांग करते हैं.

गैरकानूनी रूप से विदेश जाने के लिए सब से पहले समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति से बात की जाती है. अगर कोई स्वजन विदेश में है तो उस से सहमति ली जाती है. इस के बाद तांत्रिक से दाना डलवाने यानी धागा बंधवाने का भी ट्रेंड है. तांत्रिक की मंजूरी के बाद एजेंट को डाक्यूमेंट सौंप दिए जाते हैं. यहां हर गांव का एजेंट तय है. एजेंट समाज की संस्था या मंडल से संपर्क करता है. मंडल या संस्था एक व्यक्ति या परिवार का हवाला लेता है, जहां रुपए की डील तय होती है. अगर समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति एजेंट का हवाला नहीं लेता तो जमीन, घर लिखाया जाता है. एक व्यक्ति का एक करोड़ रुपया और कपल का एक करोड़ 30 लाख रुपया एजेंट लेता है. अगर बच्चे या अन्य मेंबर हुए तो यह रकम बढ़ जाती है.

डील के बाद समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति की भूमिका शुरू होती है. समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति रुपए की जिम्मेदारी लेता है तो एजेंट डाक्यूमेंट का काम शुरू करता है. यह स्वीकृति किसी भी कीमत पर बदल नहीं सकती. अगर बदल गई तो समाज में परिवार की बहुत बेइज्जती होती है. एजेंट पहले कानूनी तौर पर वीजा के लिए आवेदन करता है. रिजेक्ट होने के बाद गैरकानूनी रूप से खेल शुरू होता है. जिस देश के लिए वीजा आन अराइवल होता है, उस देश के लिए प्रोसेस शुरू होता है. वहां पहुंचने पर विदेशी एजेंट मनमानी शुरू कर देता है. महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तक करता है.

कभीकभी तो रातदिन सौ किलोमीटर तक पैदल चलाता है. माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में सुनसान जंगलों और बर्फ पर संघर्ष करना पड़ता है. अगर कोई ग्रुप से छूट गया या पीछे रह गया तो उस का इंतजार नहीं किया जाता. उसे उस के हाल पर छोड़ दिया जाता है. जैसा जगदीशभाई और उन के परिवार के साथ हुआ. इस स्थिति में कभीकभी मजबूरी में बर्फ, जंगल या फायरिंग रेंज में आगे बढ़ना पड़ता है. ऐसे में अमेरिकी बौर्डर पर पहुंच कर 3 औप्शन होते हैं. पहला औप्शन है अमेरिकी सेना के समक्ष सरेंडर कर देना. दूसरा औप्शन होता है कि वह अपने देश में सुरक्षित नहीं है और तीसरा औप्शन है कि अमेरिका में अपने सोर्स से छिपे रहना.

इस के बाद कंफर्मेशन होने के बाद पेमेंट होता है. अमेरिका में कदम रखते ही दलाल एक फोन करने देता है. समाज के उस प्रतिष्ठित व्यक्ति से सिर्फ ‘पहुंच गया’ कहने दिया जाता है. इस कंफर्मेशन के बाद भारत में दलाल को रुपए मिल जाते हैं. समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति को 5 से 10 प्रतिशत मिला कर देने की डील होती है. पास में पैसा न हो और अमेरिका जाना हो तो समाज की मंडली से आर्थिक मदद मिलती है. अमेरिका पहुंच कर रकम मंडल में जमा करा दी जाती है. करीब 100 करोड़ जितनी रकम का हवाला पड़ गया है. ईमानदारी ऐसी कि यह रकम समय पर अदा कर दी जाती है. ऐसा ही कुछ जगदीशभाई पटेल के भी मामले में हुआ था. पर वह अमेरिका में कदम नहीं रख पाए.

अमेरिका-कनाडा की सीमा पर काल के गाल में समाए जगदीशभाई पटेल और उन के परिवार वालों के लिए 7 फरवरी, 2022 को उन के गांव डिंगुचा में शोक सभा का आयोजन किया गया. जगदीशभाई और उन के परिवार के लिए पूरा देश दुखी है. पर इस हादसे के बाद क्या कबूतरबाजी बंद होगी? कतई नहीं. लोग इसी तरह जान जोखिम में डाल कर विदेश जाते रहेंगे. क्योंकि विदेश का मोह है ही ऐसा. True Crime

Crime Story : पत्नियों की अदला बदली – पैसे वालों का खेल

Crime Story : नए साल में दूसरे रविवार का दिन था. तारीख थी 9 जनवरी. कोट्टायम जिले के करुक्चल थाने में करीब 30 वर्षीया रमन्ना (बदला हुआ नाम) सुबहसुबह अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने आई थी. उस ने थानाप्रभारी से कहा, ‘‘साहब, मुझे पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करानी है.’’ यह सुनते ही चाय पीते हुए थानाप्रभारी झल्ला गए. उन्होंने समझा कि कोई घरेलू हिंसा या दहेज आदि का मसला होगा. महिला की आगे की बातें सुनने के बजाय उन्होंने उसे डपट दिया, ‘‘जाओ, घर जाओ और पति या घर के किसी सदस्य को साथ ले कर आना. सुबहसुबह पति से झगड़ कर आ गई हो. समझा दूंगा उसे…’’

रमन्ना वहीं खड़ीखड़ी थानाप्रभारी को चाय पीते देखती रही. थानाप्रभारी फिर बोले, ‘‘समझदार दिखती हो. पढ़ीलिखी भी लगती हो. घरेलू झगड़े को क्यों बाजार में लाना चाहती हो?’’

‘‘साहबजी, आप जो समझ रहे हैं, बात वह नहीं है. किसी लेडी पुलिस से मेरी शिकायत लिखवा दीजिए. ‘भार्या माट्टल’ की शिकायत है.’’

रमन्ना की गंभीरता भरी बातों के साथ मलयाली शब्द भार्या माट्टल सुन कर थानाप्रभारी चौंक गए. इन शब्दों का अर्थ था बीवियों की अदलाबदली. दरअसल, ये 2 शब्द पुलिस के लिए अपराध की गतिविधियों में शामिल थे. भार्या माट्टल यानी वाइफ स्वैपिंग या बीवियों की अदलाबदली.

उन्होंने महिला को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा. उस के बैठने पर पूछा, ‘‘चाय पियोगी, मंगवाऊं?’’

‘‘हां,’’ कहते हुए सिर हिला दिया.

थानाप्रभारी ने कांस्टेबल को आवाज लगाई, ‘‘अरे, सुनो जरा एक कप चाय और लाना. और हां, एसआई मैडम को भी डायरी ले कर बुला लाना.’’

थोड़ी देर में एक लेडी पुलिस सबइंसपेक्टर थानाप्रभारी के पास आ चुकी थीं. चाय की एक प्याली भी महिला के सामने रखी थी. थानाप्रभारी ने उसे पीने के लिए इशारा किया और लेडी एसआई को उस की शिकायत लिखने को कहा. फिर वह कुरसी से उठ खड़े हुए. जातेजाते पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘रमन्ना.’’

‘‘टाइटल क्या है?’’

‘‘नायर…रमन्ना नायर.’’

‘‘ठीक है, तुम आराम से चाय पियो और मैडम को पूरी बात बताओ,’’ यह कह कर थानाप्रभारी वहां से चले गए.

थोड़ी देर बाद थानाप्रभारी, लेडी एसआई और दूसरे पुलिसकर्मियों की मीटिंग हुई. तब तक रमन्ना थाने में ही ठहरी रही.

रमन्ना ने जो बात महिला एसआई को बताई थी, वह बड़ी गंभीर थी. सुन कर थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित हो गए थे कि क्या एक पति ऐसा भी कर सकता है. उन्होंने यह जानकारी डीएसपी (कांगनचेरी) आर. श्रीकुमार को दी तो डीएसपी ने इस मामले में उचित काररवाई करने के निर्देश दिए. थानाप्रभारी ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम बनाई. आरोपियों की गिरफ्तारियां भी जरूरी थी, ताकि मामले की तह तक पहुंचा जा सके.

मामला बेहद संवेदनशील था. संभ्रांत व्यक्तियों के चरित्र हनन, निजी संबंधों के साथसाथ पार्टनर एक्सचेंज रैकेट के अलावा अननेचुरल सैक्स से भी जुड़ा हुआ था. इसी शिकायत में मैरिटल रेप भी शामिल था. उल्लेखनीय है कि इस से पहले केरल के कायमकुलम में भी साल 2019 में ऐसा ही मामला सामने आ चुका था. उन दिनों कायमकुलम से 4 लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी. उस वक्त भी गिरफ्तार लोगों में से एक की पत्नी ने ही शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसे पति ने ही 2 लोगों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया था. पति ने उसे दूसरे अजनबियों के साथ सोने के लिए दबाव बनाया था.

रमन्ना द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत भी काफी चौंकाने वाली थी. उस ने पति के खिलाफ शिकायत लिखवाई थी कि वह पति के दबाव में आ कर दूसरे मर्दों के साथ सोने को विवश हो गई थी, जबकि पति के साथ प्रेम विवाह हुआ था. शिकायत में यह भी कहा कि उस के साथ अप्राकृतिक सैक्स भी किया गया. एक समय में 3 मर्दों के साथ हमबिस्तर होना पड़ा. इसे अनैतिक यौनाचार की भाषा में गु्रप सैक्स कहना ज्यादा सही होगा. इस तरह से वह पति के अतिरिक्त कुल 9 अलगअलग मर्दों के सैक्स की सामग्री बन चुकी थी. वे सारे मर्द उस के पति के दोस्त थे. रमन्ना ने साफ लहजे में कहा कि पति को इस के बदले में पैसे मिले थे.

कोट्टायम जिले की पुलिस ने मामले को काफी गंभीरता से लेते हुए तुरंत छापेमारी की योजना बनाई और देखते ही देखते 7 लोगों को धर दबोचा. उस के बाद जो बड़े पैमाने पर सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ, वह काफी सनसनीखेज और चौंकाने वाला था. उस की पूरे देश में चर्चा होने लगी.

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एक के बाद एक हुई गिरफ्तारियों के बाद एक बड़े सैक्स रैकेट का परदाफाश हुआ, जो सोशल साइट के विभिन्न प्लेटफार्मों के जरिए पतियों के ग्रुप द्वारा चलाए जा रहे थे. रिपोर्ट के मुताबिक करुक्चल में 7 लोगों को बीवियों की अदलाबदली के आरोप में 9 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था. उन में रमन्ना का पति भी था. गिरफ्तार किए गए लोग केरल के अलाप्पुझा, कोट्टायम और एर्नाकुलम के रहने वाले हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इस रैकेट में बाकायदा वाट्सऐप पर ग्रुप बनाए गए थे, जिस से सैकड़ों लोग जुड़े हुए थे. इसी ग्रुप में आगे की योजना बनाई जाती थी. हैरानी की बात यह भी थी कि इस ग्रुप में केरल के एलीट क्लास के कई लोग भी शामिल थे.

इस पूरे मामले की तहकीकात के बाद चांगनचेरी के डिप्टी एसपी आर. श्रीकुमार ने बताया कि पहले तो वे इन ग्रुप्स में शामिल हो कर एकदूसरे से मिलते थे. बाद में निर्धारित ठिकाने पर सैक्स के लिए जुटते थे. इस के पीछे एक बड़ा रैकेट है. इस में कई और दूसरे लोगों की तलाश भी की जा रही है. पुलिस के अनुसार महिलाओं सहित भले ही कुछ समान विचारधारा वाले हों, लेकिन कुछ महिलाओं को उन के पतियों ने इस में जबरदस्ती शामिल कर रखा था. गिरफ्तार लोगों ने पूछताछ में बताया कि वे पहले टेलीग्राम और दूसरे मैसेंजर ग्रुप्स में शामिल होते हैं, और फिर 2 या 3 कपल आपस में मुलाकात करते हैं. इस के बाद महिलाओं की अदलाबदली होती है.

इन गिरफ्तारियों के बाद पुलिस ने ‘पार्टनर एक्सचेंज रैकट’ की तह में जा कर पता लगाया. पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि ‘पार्टनर एक्सचेंज रैकेट’ के नेटवर्क का मुख्य आधार टेलीग्राम और मैसेंजर ऐप था, जिस में एक गिरोह के 1000 से अधिक कपल बताए जा रहे हैं. उन के द्वारा सैक्स के लिए बड़े स्तर पर महिलाओं की अदलाबदली की जा रही थी. इस रैकेट में पैसों का भी औनलाइन लेनदेन होता है. कई लोग पैसों के लिए अपनी पत्नियों को सिंगल पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करते हैं, जबकि इस सैक्स में 2-3 पुरुष ही होते हैं.

पुलिस को जांच में पता चला कि इस रैकेट में राज्य के हर हिस्से के लोग शामिल थे, जिन में अधिकतर सदस्य धनवान और सुखीसंपन्न थे. सवाल सामान्य लोगों के जेहन में उठता रहता है कि पत्नियों की अदलाबदली क्यों और कैसे? वाइफ स्वैपिंग का एक पुराना इतिहास बहुपत्नी प्रथा के जमाने से रहा है. किंतु इस ने नए रूपरंग में 80-90 के दशक में एक यौन आनंद के तौर पर पैर पसारना शुरू कर दिया था. हालांकि इस में संभ्रांत किस्म के कपल ही शामिल हुए. इस के लिए उन्होंने बाकायदा पार्टियों का सहारा लिया. केरल का मामला भी बीवियों की अदलाबदली का ही है, लेकिन इसे पतियों ने कमाई का धंधा बना दिया, जिस में बीवी के नाम पर दूसरी सैक्स वर्कर को भी शामिल कर लिया गया था.

केरल की शिकायतकर्ता महिला रमन्ना की लव मैरिज हुई थी. खुशहाल जिंदगी गुजर रही थी. 2 बच्चे भी हुए. सब कुछ अच्छा चल रहा था. इस बीच पति की गल्फ में नौकरी लगी और वह विदेश चला गया. वहां पति को वाइफ स्वैपिंग के बारे में पता लगा. जब वापस केरल लौटा तब उस ने इस बारे में अपनी पत्नी को बताया. पत्नी ने इनकार कर दिया, लेकिन पति नहीं माना. उस ने काफी मना किया कि वह किसी और के साथ सैक्स नहीं करेगी, लेकिन पति के दबाव में आ कर ऐसा करने को राजी हो गई. पति द्वारा खुद को मारने की धमकी के इमोशनल ब्लैकमेलिंग के चलते न चाहते हुए भी मान गई.

उस के बाद से पति के दोस्तों के साथ सैक्स करने का सिलसिला शुरू हो गया. इस खेल के शुरू होते ही पति ने उसे डराधमका कर इसे कारोबार बना लिया. विरोध करने पर पति दूसरों के साथ किए गए उस के सैक्स वीडियो परिवार को दिखाने की धमकी दे दी. एक रोज पानी सिर से ऊपर तब चला गया, जब पति ने एक साथ 3 पुरुषों के साथ सैक्स करने के लिए भेज दिया. अप्राकृतिक सैक्स की पीड़ा से उस का शरीर जितना जख्मी हुआ, उस से कहीं अधिक उस का अंतरमन पीडि़त हो गया. और उस ने पति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी.

रमन्ना ने यह भी बताया कि उस जैसी कई पत्नियों को उन की इच्छा के विरुद्ध ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया, जो आत्महत्या कर सकती हैं. यहां तक कि उन पर ऐसा करने के लिए जबरन दबाव बनाया जाता है. इस स्तर पर जांच में पुलिस ने भी पाया कि डाक्टरों और वकीलों के अलावा कई पेशेवर इन सोशल मीडिया ग्रुप में शामिल थे और उन्होंने अपनी फरजी पहचान बना रखी थी. इन में से कई ग्रुप में 5,000 से अधिक सदस्य शामिल थे, जहां से ग्राहक मिलते थे. सभी फेक अकाउंट के साथ जुड़े हुए थे. इन में सिंगल लोगों को दूसरे सदस्यों की पत्नियों को शेयर करने के लिए मोटी रकम देनी पड़ती थी.

केरल के लिए वाइफ स्वैपिंग का मामला कोई नया नहीं है. इस के पहले भी साल 2013 में नेवी अफसरों की पत्नियों की अदलाबदली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे. यह घटना साल 2012 की है, जब एक लेफ्टिनेंट की पत्नी ने पति और सीनियर अफसर पर सैक्सुअल-मेंटल हैरेसमेंट और वाइफ स्वैपिंग के गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि बाद में कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलने की वजह से मामला शांत पड़ गया था. दरअसल अपने पति को बचाने के लिए कोई भी महिला किसी और के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाती है. लेकिन इस बार के नए मामले में पूरी तरह से एक बड़ा गिरोह सक्रिय हो चुका था. केरल में यह सब पिछले 3 सालों से चल रहा था.

बौक्स एक नजर वाइफ स्वैपिंग पर वाइफ स्वैपिंग ही बीवियों की अदलाबदली है, जो पतिपत्नी की रजामंदी से होता है. सैक्स के दौरान बीवियां बदलने का चलन गैरकानूनी और गैर सामाजिक हो कर भी छिपे रूप में बना हुआ है. अब लोगों ने इसे पैसा कमाने का एक जरिया भी बना लिया है. इस में सैक्शुअल रिलेशनशिप बनाने के लिए बीवियों को एक रात या फिर कुछ रातों के लिए अदलाबदली कर लिए जाते हैं. इसे अपनाने के कई तरीके अपनाए जाते हैं, जिस में लकी ड्रा महत्त्वपूर्ण होता है. इस के लिए कपल एक ही जगह पर जुटते हैं और अपनीअपनी गाडि़यों की चाबी एक जगह डाल देते हैं. फिर अंधेरे में सब एकएक कर चाबी उठाते हैं. ऐसे में हर किसी के हाथ में किसी और की चाबी आ जाती है.

जिसे जो चाबी हाथ लगती है वह उस की बीवी के साथ सैक्स करने के लिए आजाद होता है. इसी तरह से हर व्यक्ति दूसरे की बीवी को ले कर अलगअलग कमरों में चले जाते हैं. कुछ मामले में यह खेल एक ही हाल में एक साथ ग्रुप सैक्स के रूप में भी होता है. मजे की बात यह है इस के लिए बीवियां भी पहले से मन बनाए होती हैं.

इस से जुड़े लोगों का तर्क होता है कि ऐसा कर वे एकदूसरे की सैक्शुअल डिजायर को पूरी करते हैं. कुछ कपल्स का मानना है कि इस से उन के वैवाहिक जीवन की नीरसता में ताजगी वापस आ जाता है. दोनों में इस बात का कोई मलाल नहीं होता है कि दूसरे की पार्टनर के साथ सैक्स कर चुके हैं. इसे वे प्यार के नजरिए से नहीं, बल्कि सैक्स की अनुभूति के रूप में लेते हैं. इसे वैसे लोगों के लिए वरदान कहा जाता है, जो कभी एक वक्त में एक रिलेशन में नहीं रह पाते हैं.

बताया जाता है कि वाइफ स्वैपिंग की शुरुआत 16वीं सदी से बताई जाती है. सब से पहले जौन डी और एडवर्ज केल ने वाइफ स्वैपिंग की थी. ये दोनों ही ब्लैक मैजिक करते थे या कहें खुद को सेल्फ डिक्लेयर्ड स्पिरिट मीडियम बताते थे. इस स्वैपिंग में जौन की पत्नी जेन प्रेगनेंट भी हो गई थी. अधिकतर पश्चिमी देशों में यह आम बात हो चुकी है. भारत में इसे यौन अपराध की श्रेणी में रखा गया है. खासकर  भारतीय समाज में तो यह किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है. चाहे आपसी रजामंदी हो या नहीं.

वाइफ स्वैपिंग को यदि एक शादीशुदा महिला की इच्छा के बगैर कराया जाए और एक से अधिक लोगों के साथ संबंध बनाने पर मजबूर किया जाए तो मजबूर कराने वाले लोगों पर आईपीसी की धारा 323, 328, 376, 506 के तहत केस दर्ज किया जाता है. यदि उत्पीडि़त महिला की आपबीती पुलिस नहीं सुने, तो 156 (3) सीआरपीसी में जुडीशियल मजिस्ट्रैट के सामने एप्लिकेशन दे कर ऊपर दी गई धाराओं में एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दिए जा सकते हैं.

इस मामले में पति पर रेप की धारा (376 आईपीसी) छोड़ कर बाकी सभी धाराओं में काररवाई की जा सकती है. सारे अपराध गैरजमानती होते हैं और इन अपराधों में महिला के सिर्फ यह कहने पर कि उस के साथ बिना सहमति के जोरजबरदस्ती से संबंध बनाए गए हैं, उस की गिरफ्तारी की जा सकती है. ऐसे अधिकतर मामलों में यह एक ट्रायल का विषय होता है, जिस में गवाही और क्रौस एग्जामिनेशन के बाद अदालत आरोपियों को सजा दे सकती है, या फिर सजा दे कर बरी भी कर सकती है.

उदाहरण के लिए यदि स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के लिए दंड के संबंध में 328 आईपीसी का इस्तेमाल होता है, जिस में नशीले पेय की मदद से महिला से शारीरिक संबंध स्थापित किया गया हो तो अधिकतम 10 साल तक की सजा और जुरमाना किया जा सकता है. इसी तरह से 376डी आईपीसी में गैंगरेप के मामलों में सजा मिलती है. इस कृत्य में शामिल हर व्यक्ति को न्यूनतम 20 साल तक की सजा मिल सकती है. Crime Story

Real Crime Story : ठग भाभियों की टोली – महिलाऐं हुई ठगी का शिकार

Real Crime Story : ‘‘आओआओ, भाभी बहुत दिनों बाद आई हो, आओ.’’ कह कर सरिता कुर्रे ने सुनीता साहू उर्फ कुमकुम का स्वागत करते हुए ड्राइंग रूम में बैठाया.

‘‘बहन, मैं इधर से गुजर रही थी तुम्हारी याद आ गई. सोचा, तुम्हारा हालचाल ले लूं और हो सके तो तुम्हें भी मालामाल करवा दूं.’’ सुनीता साहू उर्फ  कुमकुम ने बड़े ही मीठे स्वर से सरिता कुर्रे से कहा.

अपने मालामाल होने की बात सुन कर के सरिता कुर्रे चौकन्नी हो गई. उस ने कहा, ‘‘भाभी, क्या बात है कैसे मालामाल करोगी भला बताओ तो!’’

इस पर कुमकुम ने बिंदास हो कर कहा, ‘‘आप को सोना चाहिए क्या, बताओ. असली गोल्ड बहुत ही कम पैसों में?’’

‘‘अच्छा भाभी, भला वो कैसे?’’ सविता कुर्रे ने आश्चर्य व्यक्त किया.

‘‘देखो, मैं तो चाहती हूं कि मेरे जितने भी जानपहचान वाले हैं, वे इस का फायदा उठा लें. मेरे कुछ ऐसे लोगों से संबंध हैं कि हमें बहुत सस्ते में सोना मिल सकता है. कुछ लोग तो मालामाल हो भी गए हैं.’’

यह सुन कर सरिता की बांछें खिल गईं. मोहक अदा से उस ने कहा, ‘‘ऐसा है तो बताओ मैं भी सोना ले लूं.’’

‘‘बताऊंगी, बताती हूं थोड़ा चैन की सांस तो ले लेने दो.’’ कह कर कुमकुम सरिता कुर्रे के  यहां ड्राइंगरूम में आराम से पसर कर बैठ गई.

सरिता कुर्रे ने सुनीता साहू उर्फ कुमकुम की अब खूब आवभगत करनी शुरू कर दी. उस के लिए किचन से कुछ मीठा, नमकीन ले आई और पूछा, ‘‘क्या पियोगी चाय या ठंडा?’’

कुमकुम ने सहज भाव से कहा, ‘‘बहन तकलीफ मत करो, जो घर में है चलेगा.’’ और आराम से बैठ कर के मिठाई पर हाथ साफ करने लगी.

चायपानी करने के बाद सुनीता उर्फ कुमकुम ने रहस्यमय स्वर में सरिता कुर्रे से कहा, ‘‘अभी सोने का दाम क्या चल रहा है तुम्हें मालूम है?’’

‘‘हां, कुछकुछ तो पता है लगभग 40 हजार रुपए तोले का रेट हो गया है.’’

‘‘हां, तुम सही कह रही हो. आज के समय में 42 हजार रुपए तोला का मार्केट भाव है. तुम्हें पता है मैं कितने में दिलवा सकती हूं.’’

‘‘बताओ, कितने में मिल जाएगा.’’ उत्सुकतावश सरिता ने कहा.

‘‘अगर मैं आप को 25 से 28 हजार रुपए तोला सोना दिलवा दूं तो बताओ, कैसा रहेगा?’’

यह सुन कर के सरिता कुर्रे खुशी से उछल पड़ी और बोली, ‘‘ऐसा है तो मैं 30 लाख रुपए का सोना ले लूंगी.’’

‘‘ठीक है, तुम पैसे का इंतजाम करो. मगर हां सुनो, यह बात ज्यादा हल्ला नहीं करने की है. हमें चुपचाप फायदा उठा लेना है.’’

यह सुन कर के कुमकुम गंभीर हो गई और सिर हिलाते हुए सहमति से उस ने कहा, ‘‘तुम सही कह रही हो, दीवारों के भी कान होते हैं. मैं ध्यान रखूंगी किसी को भी नहीं बताऊंगी. मगर तुम मुझे जल्द से जल्द सोना दिलवा दो.’’

‘‘हां बहन, सोने में ही इनवैस्ट करना सब से समझदारी का काम है. अब देखो न 5 साल पहले 20 हजार रुपए तोला सोना हुआ करता था. आज इतना महंगा हो गया है और हर साल और भी ज्यादा महंगा होता जाएगा.’’

सरिता कुर्रे सुनीता साहू उर्फ कुमकुम की बातों से सहमत थी. वह महसूस कर रही थी कि सुनीता उस का बहुत भला करने आई है. उस ने फिर भी जिज्ञासावश पूछा, ‘‘भाभी, आखिर तुम मुझे इतना सस्ता सोना कहां से और कैसे दिलओगी.’’

‘‘अब सुनो, मैं बताती हूं तुम से क्या छिपाना. तुम तो मेरी बहन जैसी हो, क्या है कि तुम ने मणप्पुरम गोल्ड का नाम सुना है. यह एक बैंक है, जो लोगों का सोना गिरवी रख कर के उन्हें पैसे लोन देता है. कुछ जरूरत के मारे, बेचारे लोग यहां पैसा लेते हैं, अपना सोना भी गिरवी रख देते हैं और फिर बाद में छुड़ा नहीं पाते. मैं तुम को बताऊं मेरा एक भाई इसी कंपनी में काम करता है. बस जो लोग अपना सोना यहां से नहीं ले पाते, उसे सेटिंग कर के हम सस्ते में ले लेते हैं. अब तुम इस बात को किसी को बताना नहीं, नहीं तो तुम्हारा खेल बिगड़ जाएगा.’’

सविता कुर्रे ने यह बात सुनी तो उसे पूरी तरह विश्वास हो गया कि सुनीता साहू उर्फ कुमकुम की एकएक बात सौ फीसदी सही है.

चलतेचलते कुमकुम ने कहा, ‘‘ तुम  रुपए की व्यवस्था जितनी जल्दी हो सके कर लो. फिर देखना कैसे तुम्हें मैं मालामाल करवा दूंगी.’’

सुनीता उर्फ कुमकुम चली गई. मगर सरिता कुर्रे की तो मानो रातों की नींद उड़ गई. वह रात भर सोचती रही कि किस तरह वह आने वाले समय में सोना खरीद लेगी और मालामाल हो जाएगी. रात भर जागजाग के उस ने अपने सारे बैंक बैलेंस के रुपयों की गिनती लगानी शुरू कर दी.

उस ने जोड़ा तो उस के पास विभिन्न खातों में लगभग 40 लाख रुपए का अमाउंट होने का अंदाजा हो गया. उस ने मन ही मन निर्णय किया कि कल ही 1-2 बैंक से 8-10 लाख  रुपए इकट्ठा कर के कुमकुम को पहली किस्त में दे कर के सोना ले लेगी. उस ने सोचा एक साथ दांव लगाना ठीक नहीं, पहले कम पैसे दे कर के देख लो क्या होता है.

सरिता को अपनी होशियारी पर नाज हो आया. वह सोचने लगी कि यही सही रहेगा एक साथ 40 लाख रुपए का सोना लेना और रुपए देना ठीक नहीं रहेगा. कहीं कोई गड़बड़ हो गई तो…

उस ने यह बात अपने पति को भी नहीं बताई और सोचा कि पहले 10 लाख रुपए का सोना मैं अपने हाथ ले लूं फिर पतिदेव को बताऊंगी तो वह भी कितने खुश होंगे.

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के गांव खमतराई में सविता कुर्रे अपने परिवार के साथ रहती थी. यहीं पास ही भनपुरी में सुनीता साहू उर्फ कुमकुम हाल ही में उड़ीसा नवापारा से आ कर रहने लगी थी. अपने अच्छे व्यवहार से आसपास के लोगों से हिलमिल कर सब की भाभी बन गई थी.

दूसरे दिन सरिता कुर्रे अपने स्थानीय बैंक पहुंची और वहां से 7 लाख रुपए निकलवा कर के घर आ कर सुनीता साहू को फोन लगाया और उसे बताया, ‘‘भाभी, पैसों का इंतजाम हो गया है. तुम कब आओगी?’’

यह सुन कर सहज भाव से कुमकुम ने कहा, ‘‘मैं अभी तो कहीं व्यस्त हूं. शाम को आती हूं.’’

सरिता कुर्रे बहुत बेचैन थी. दोपहर को एक दफा और फोन कर के कुमकुम से बात की और आश्वस्त हो गई कि शाम को 4 बजे कुमकुम आएगी और ठीक शाम को 4 बजे कुमकुम घर पर आ पहुंची तो मानो सरिता कुर्रे की खुशी का ठिकाना नहीं था.

कुमकुम के साथ पूर्णिमा और प्रतिभा गीता महानंदा नामक 2 महिलाएं भी थीं. कुमकुम ने उन का भी सरिता से परिचय कराया और बताया कि ये मेरी सहेलियां हैं और मेरी मदद करती हैं.

तीनों महिलाओं ने सरिता को ऊंचेऊंचे ख्वाब दिखा करके कहा तुम्हारे कितना पैसा है बताओ.

इस पर सरिता ने 7 लाख रुपए ला कर के उन के सामने रख दिया और कहा, ‘‘अभी इतने ही रुपए की व्यवस्था हुई है. मुझे इतने का सोना दिलवा दो.’’

‘‘अच्छी बात है हम तुम्हें कल 7 लाख रुपए का सोना दिलवा देंगी.’’

यह कह कर कुमकुम ने 7 लाख रुपए अपने पास रखे और सरिता कुर्रे को आश्वस्त कर तीनों चली गईं.

यह मार्च, 2019 का महीना था. इस दरमियान सरिता कुर्रे कई दिनों तक सुनीता साहू का इंतजार करती रही. फोन पर बात होती तो वह कहती, ‘‘बहन, मैं अचानक शहर से बाहर चली गई हूं 2 दिन बाद आ रही हूं, तुम बिलकुल चिंता मत करो. यह समझो कि बैंक में पैसा तुम्हारा सुरक्षित है.’’

सरिता कुर्रे को इस तरह बारबार विश्वास दिलाया जाता रहा. इस दरमियान खुद कुमकुम ने सरिता को फोन किया और उसे भरोसा दिलाती रही.

एक दिन अचानक सुनीता साहू उर्फ कुमकुम अनुसइया, पूर्णिमा, प्रतिभा गीता महानंद इन 4 महिलाओं के साथ घर आई और बोली,  ‘‘बहन, तुम तनिक भी चिंता न करो. कहो तो अभी तुम्हें मैं पैसे लौटा दूंगी, बैंक का मामला है, लो तुम खुद बैंक कर्मचारी से बात कर लो.’’

यह सुन कर के सरिता कुर्रे को ढांढस बंधा. कुमकुम ने उसे एक नंबर दिया जोकि मणप्पुरम बैंक के एक अधिकारी शेखर का बताया गया. सरिता कुर्रे ने बात की तो बताया गया कि वह मणप्पुरम गोल्ड लोन बैंक का अधिकारी बोल रहा है. सरिता ने जब सुनीता साहू के बारे में पूछा तो उधर से जवाब मिला, ‘‘हां, हम उस को जानते हैं. उस का हमारे यहां 85 तोला सोना गिरवी रखा हुआ है जो सुरक्षित है.’’

बैंक अधिकारी शेखर से बात करने के बाद सरिता के टूटते मन को ढांढस बंधा. उसे सुकून महसूस हुआ. जब सुनीता ने देखा कि सरिता कुर्रे निश्चिंत हो गई है तो उस ने कहा, ‘‘बहन, देखो मैं तुम्हारे लिए कुछ सोना लाई हूं. इसे अभी रख लो बाकी मैं 82 तोला तुम्हें और जल्दी दे दूंगी. मैं पैसे की व्यवस्था कर रही हूं सारा पैसा दे कर के एक साथ पूरा सोना में बैंक से ले लूंगी.’’

इतना सुनते ही सरिता बोली, ‘‘अब मुझे तुम पर पूरा विश्वास हो गया है. बताओ, तुम्हें कुल कितना पैसा वहां जमा करना है?’’

इस पर सुनीता ने कहा, ‘‘मुझे 14 लाख रुपए और चाहिए इस के बाद मैं सारा गोल्ड मणप्पुरम गोल्ड लोन ब्रांच से छुड़वा लूंगी.’’

सुनीता को सरिता ने आश्वस्त किया, ‘‘ठीक है, ऐसा है तो रुपए का मैं इंतजाम कर देती हूं.’’

दूसरे दिन सरिता कुर्रे ने अपने पति व घर के अन्य लोगों को बताए बगैर बैंक से सारे रुपए निकाले और शाम को जब कुमकुम अपनी महिला मंडली के साथ आई तो 14 लाख रुपए उस के सामने रख दिए गए.

यह देख कर के सुनीता ने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘बहन, यह तुम ने बहुत अच्छा किया. अब मैं ये पैसे जमा कर के सारा सोना कल ही बैंक से छुड़वा कर के तुम्हें दे दूंगी.’’ यह कह कर  सुनीता वहां से चली गई.

दूसरे दिन जब सरिता कुर्रे ने फोन किया तो सुनीता ने कहा, ‘‘मैं ने पैसे जमा कर दिए हैं. बस, थोड़ी सी प्रक्रिया बाकी है. जैसे ही गोल्ड हाथ आएगा मैं आ कर के तुम्हें सौंप दूंगी.’’

2-3 दिन ऐसे ही गुजर गए. कोई न कोई बहाना बना कर के सुनीता साहू उसे टाल रही थी. अब सरिता कुर्रे की चिंता बढ़ती चली गई. एक दिन अचानक उस की एक सहेली रमा  ने कहा, ‘‘देखो, कैसेकैसे ठग पैदा हो गए हैं. कवर्धा में सोना दिलाने के नाम पर कुछ महिलाओं ने ठगी की है, मामला पुलिस तक पहुंच गया है.’’

यह सुन कर सरिता कुर्रे पसीनापसीना हो गई और सोचने लगी कि क्या सचमुच ऐसा हुआ है? क्या वह भी कुमकुम के हाथों ठग ली गई है? उस ने रमा से कहा, ‘‘बहन, कुमकुम कैसी महिला है?’’

इस पर हंसते हुए रमा ने कहा, ‘‘सुना है कुमकुम रोज पति बदलती है. अभी चौथे पति के साथ रह रही है. उस का रंगढंग मुझे ठीक नहीं लगता, क्यों क्या बात है?’’

‘‘अब क्या बताऊं, एक दिन कुमकुम आई थी और मुझ से पैसे मांग रही थी कुछ लाख रुपए.’’ सरिता कुर्रे ने बात छिपाते हुए कहा.

‘‘लाखों रुपए! उस की औकात है कुछ लाख रुपए गिनने की?’’  रमा ने व्यंग्यभाव से  कहा, ‘‘देखो, कुमकुम जैसी महिलाओं पर तुम एक पैसे का भी भरोसा नहीं करना.’’

महिला मित्र रमा की बातें सुन कर के सविता कुर्रे की आंखें खुल गईं. उस ने सारी बातें रमा को बताईं और उस से सलाहमशविरा किया.

सरिता कुर्रे उसी दोपहर रमा के साथ अचानक सुनीता साहू के घर भनपुरी पहुंच गई. सुनीता घर पर ही थी. सरिता ने कहा, ‘‘कहां है मेरा सोना, कब दोगी, कितने दिन हो गए.’’

यह सुन कर के सुनीता साहू ने उसे अपने पास बैठाया और कहा, ‘‘बहन, मुझे कुछ समय दो.’’

‘‘मैं और कितना समय दूं. मैं कुछ नहीं जानती, मुझे मेरा सोना दो नहीं तो मैं पुलिस में जा रही हूं.’’ सरिता कुर्रे ने साफसाफ चेतावनी देते हुए कहा.

यह सुन कर के सुनीता साहू मुसकराई और बोली, ‘‘यह तुम बहुत बड़ी गलती करोगी, पुलिस भला हमारा क्या कर लेगी.’’

इतने में घर के भीतर से 2-3 पुरुष बाहर आए. ये थे पति मुकेश चौबे, उस के दोस्त सिंधु वैष्णव, बंटी उर्फ शेखर. इन लोगों ने सरिता से बातचीत में साफसाफ कहा, ‘‘तुम पैसे भूल जाओ. क्या सबूत है कि तुम ने पैसे दिए हैं?’’

यह सुन कर सरिता कुर्रे मानो आसमान से जमीन पर आ गिरी. उस ने तड़प कर कहा, ‘‘तुम लोग इस तरीके से झूठ पर उतर आओगे, मैं ने सोचा नहीं था.’’

सरिता ने सुनीता साहू की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम मुझे अगर आज पैसे नहीं दोगी तो ठीक नहीं होगा.’’ और यह कह कर के सरिता रमा के साथ घर से चली गई.

दिन बीतता चला गया, जब उसे लगा कि वह बुरी तरीके से ठग ली गई है तो उस की आंखों के आगे अंधेरा घिर आया.

अगले दिन सरिता कुर्रे सहेली रमा के साथ  थाना खमतराई पहुंची और रिपोर्ट दर्ज कराई. उस ने थानाप्रभारी को बताया कि वह शिवानंद नगर सेक्टर-1 खमतराई रायपुर में रहती है. फरवरी, 2019 में सुनीता उर्फ कुमकुम साहू के साथ अन्य महिलाएं उस के घर आईं तथा उसे सस्ते दाम में सोना देने का प्रस्ताव रखा. कुछ दिन बाद वह सभी दोबारा आईं तथा 85 तोला सोना 28 हजार रुपए प्रति तोला देने की बात की.

इस तरह से उन्होंने उस से सोना दिलाने के नाम पर कुल 22 लाख 70 हजार रुपए ठग लिए.

सोना देने के नाम पर लाखों रुपए की ठगी की घटना को डीआईजी एवं एसएसपी अजय यादव ने गंभीरता से लेते हुए एएसपी (सिटी) लखन पटले, एसपी (सिटी उरला) अक्षय कुमार एवं थानाप्रभारी खमतराई विनीत दुबे को आरोपियों की गिरफ्तारी हेतु आवश्यक दिशानिर्देश दिए.

आरोपियों की गिरफ्तारी में लगी टीम ने आरोपियों की खोजबीन शुरू कर दी. आखिर पुलिस को आरोपी सुनीता साहू उर्फ कुमकुम, पी. अनुसुईया राव, पूर्णिमा साहू, प्रतिभा मिश्रा एवं गीता महानंद को गिरफ्तार करने में सफलता मिल गई. उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ में पता चला कि सुनीता साहू उर्फ कुमकुम उड़ीसा के जिला नवापारा की है. सिर्फ छठवीं कक्षा तक पढ़ी है.

उस की जब पति से नहीं बनी तो उसे छोड़ कर रायपुर आ गई और यहां महेश राव से विवाह कर लिया.

कुछ समय बाद जब उस से भी नहीं पटी तो तीसरा पति बनाया और वर्तमान में चौथे पति मुकेश चौबे के साथ वह रह रही थी और उस का जीवन ऐश के साथ बीत रहा था. रोज गहने और कपड़े खरीदती, महंगी शराब पीती थी.

अपने गिरोह के पुरुष सदस्य को मणप्पुरम कंपनी का कर्मी बताते हुए उस से मोबाइल फोन पर बात करा दी जाती थी, जिस से शिकार आसानी से इन पर भरोसा कर इन के झांसे में आ जाते थे.

आरोपियों द्वारा जिला कवर्धा में भी इसी तरीके से लोगों को सस्ते दाम में सोना देने का झांसा दे कर लगभग 17 लाख रुपए की ठगी की गई थी.

कथा लिखे जाने तक पुलिस द्वारा घटना में शामिल सुनीता साहू उर्फ कुमकुम सहित 5 महिला आरोपियों व उस के चौथे पति मुकेश चौबे सहित एक पुरुष साथी मुश्ताक को गिरफ्तार कर लिया था तथा शेष आरोपियों की पतासाजी कर उन के छिपने के हर संभावित स्थानों में लगातार छापेमारी कर उन की गिरफ्तारी के हरसंभव प्रयास किए जा रहे थे.

महिलाओं के ठग गिरोह की सरगना सुनीता साहू ने रामेश्वर नगर की रहने वाली नरगिस बेगम को अपनी बेटी रानी के एक्सीडेंट की झूठी कहानी सुना कर इमोशनल किया था. सुनीता साहू ने सोना फाइनेंस कंपनी में गिरवी होने की बात कही. बारबार बेटी की इमोशनल कहानी सुन कर नरगिस उस की बात में आ गई और कुमकुम को 2 लाख रुपए दे दिए.

पैसा नहीं मिला तो नरगिस बेगम ने मणप्पुरम गोल्ड लोन बैंक में जा कर गिरवी रखे जेवर के बारे में पता किया तो ठगी के राज से परदा उठ गया.

वहां बताया गया कि कुमकुम का कोई जेवर गिरवी था ही नहीं. नरगिस को यह समझते देर नहीं लगी कि कुमकुम ने उसे ठग लिया है.

पुलिस की जांच में सामने आया कि कुमकुम इस के पहले भी जिला कवर्धा में पैसा डबल करने की फरजी स्कीम चला चुकी है. कवर्धा में वह 17 लाख की हेराफेरी कर चुकी है.

शातिर कुमकुम हर साल अपना पता बदल लिया करती थी. पुलिस यह भी पता लगा रही है कि 4 शादियां करने के पीछे की असल वजह क्या है, दूसरी तरफ ठग भाभियों के गैंग का शिकार हुई महिलाएं अपने रुपयों के वापस मिलने की आस में हैं.

इसी तरह पुलिस ने जांच में पाया कि आरोपियों द्वारा सोना दिलाने के नाम पर  इंदु सिंह से 2 लाख 77 हजार रुपए, नरगिस साखरे से ढाई लाख रुपए, अनिता वर्मा से साढ़े 5 लाख रुपए, मिसेज चौहान से एक लाख 70 हजार रुपए तथा अन्य लोगों को बैंक में रखे सोना को सस्ते में दिलाने के नाम से कुल 35 लाख 18 हजार रुपए की ठगी की गई थी.

खमतराई पुलिस ने 28 जून, 2021 को आरोपी ठग महिलाओं के खिलाफ भादंवि की धारा 420, 34 के तहत गिरफ्तार कर उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां माननीय न्यायालय द्वारा इन ठग महिलाओं को सेंट्रल जेल रायपुर भेज दिया गया.

पटवारी की दुधारी तलवार से बच कर रहना

‘साहब, मैं कभी पाकिस्तान तो क्या, प्रदेश के किसी दूसरे जिले में भी नहीं गया. जैसेतैसे कर के मैं अपने परिवार की गाड़ी खींच रहा हूं.’’ हाथ बांधे सुलेमान बाड़मेर के तत्कालीन एसडीएम की अदालत में गिड़गिड़ा रहा था. यह सन 1975 के शुरुआती दिनों की बात है.

‘‘सुलेमान, तुम्हारे इलाके के पटवारी ने रिपोर्ट दी है कि तुम कुछ दिनों पहले अनाधिकृत रूप से पाकिस्तान भाग गए थे. इसलिए तुम्हारी पुश्तैनी कृषि भूमि को राजस्थान टीनेंसी एक्ट के तहत जब्त किए जाने की काररवाई विचाराधीन है.’’ उपखंड अधिकारी ने कहा.

सुलेमान फिर गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, पाकिस्तान भाग जाने का आरोप झूठा है. हां, उन दिनों मैं रोजीरोटी के लिए परिवार के साथ कहीं दूसरी जगह जरूर चला गया था. पटवारीजी ने मेरे बारे में झूठी रिपोर्ट दी है. गरीब होने के कारण मैं उन की सेवा नहीं कर सकता. इसीलिए उन्होंने नाराज हो कर झूठ लिख दिया है.’’

एसडीएम सुलेमान की फाइल फिर से पलटने लगे. तहसीलदार के निर्णय के खिलाफ सुलेमान ने एसडीएम की अदालत में अपील की थी. आखिरकार एसडीएम ने सुलेमान की गैरहाजिरी में उस की 24 बीघा कृषि भूमि को जब्त कर सरकारी घोषित कर दिया था. तारीख पेशी की जानकारी नहीं होने के कारण सुलेमान उस दिन अदालत में नहीं था.

सुलेमान को जब यह जानकारी मिली तो उसे बड़ा धक्का लगा. उस ने अपनी व्यथा अपने पड़ोसी चौथमल को बताई. चौथमल उस के साथ हुई नाइंसाफी से द्रवित हो उठा. उस ने सुलेमान को राजस्थान हाईकोर्ट जाने की सलाह दी. इतना ही नहीं, वह सुलेमान के साथ जोधपुर स्थित हाईकोर्ट गया और एसडीएम के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में अपील दायर कर दी. वहां भी कई सालों तक केस चला.

अंत में वहां का फैसला भी सुलेमान के पक्ष में नहीं आया. इस के बाद चौथमल ने हाईकोर्ट की ही डबल बेंच में अपील दाखिल करा दी.

पिछले महीने खंडपीठ के माननीय न्यायाधीश गोविंद माथुर और एस.पी. शर्मा ने सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि किसी नागरिक के देश में किसी अन्य क्षेत्र में चले जाने से उस के खिलाफ टीनेंसी एक्ट की काररवाई अनुचित है. आदेश सुनते ही सुलेमान की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

राजस्व विभाग के अंतिम छोर के प्यादे ‘पटवारी’ की गलत रिपोर्ट के कारण गरीब सुलेमान 40 सालों तक अदालतों के धक्के खाता रहा. यह तो पटवारी के क्रियाकलापों की बानगी मात्र है, लेकिन राजस्थान के ही हनुमानगढ़ के पटवारी ने अधिकारियों व अन्य लोगों से सांठगांठ कर के फरजीवाड़े का जो खेल खेला, सुन कर आप जरूर चौंक जाएंगे.

देहातों में आज भी बरसों पुरानी एक लोकोक्ति प्रचलित है, ‘ऊपर करतार, नीचे पटवार’. यहां पटवार का मतलब पटवारी यानी लेखपाल से है. लेखपाल राजस्व महकमे का प्यादा होता है. ब्रिटिश हुकूमत काल में कृषि संबंधी लेखाजोखा व लगान वसूली अमीन करता था, जो पटवारी का ही पर्याय होता था. तहसील के मामलों में पटवारी की जांच आख्या को महत्त्वपूर्ण माना जाता है. अपने स्वार्थ की वजह से कुछ पटवारी अपनी कलम से स्याह को सफेद और सफेद को स्याह करने से नहीं चूकते.

राजस्थान प्रदेश का एक जिला है हनुमानगढ़. इसी जिले की पीलीबंगा तहसील का गांव है पड़ोपल बारानी. 10-12 हजार की आबादी वाले इस गांव की कृषि भूमि किलाबंदी के अभाव में आज भी खसरों में समाहित है. इस क्षेत्र में कभी घग्घर नदी का बहाव था, जिस से क्षेत्र की लाल व दोमट मिट्टी बारानी होने के बावजूद बहुत उपजाऊ है. इसी कारण यहां की कृषि भूमि जिले के और क्षेत्रों की अपेक्षा कुछ महंगी है.

सन 2012 के आसपास का वाकया है. इस क्षेत्र में पटवारी संजीव मलिक की नियुक्ति हुई. कहा जाता है कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने वाले संजीव की पहुंच राष्ट्रीय स्तर की एक राजनीतिक पार्टी के आला पदाधिकारियों तक थी. शातिरदिमाग संजीव मलिक की ऊंची महत्त्वाकांक्षाएं थीं. अपने क्षेत्र की सरकारी भूमि खाली देख कर उस की आंखें चमक उठीं. वह भूमि उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी नजर आ रही थी.

पर वह सोने के अंडे देने वाली मुरगी उसे उच्चाधिकारियों के सहयोग के बिना मिलनी असंभव थी. इस बेशकीमती कृषि भूमि के सहारे उस ने करोड़पति बनने का सपना संजो लिया था. इस के लिए उस ने दिमागी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए.

अधिकारियों से संबंध बनाने के लिए उस ने अपने घर पर एक पार्टी का आयोजन किया, जिस में कानूनगो से ले कर एसडीएम तक को आमंत्रित किया. कुल मिला कर 15 मेहमान जुटे.

भोज छोटा था, पर मकसद बहुत ऊंचा था. शाही दावत के रूप में आयोजित इस भोज में संजीव ने शराब और कबाब की भी व्यवस्था की थी. सभी मेहमानों ने इस भोज की जी खोल कर प्रशंसा की.

दावत खाने के बाद विदा होते समय एक अधिकारी ने संजीव का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘भई मान गए संजीव, तुम्हारी जिंदादिली को. तुम्हारा प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. सचमुच मजा आ गया.’’

‘‘साहब, यह आप की ही कृपा का फल है और उम्मीद है कि इस नाचीज पर भविष्य में भी आप की कृपा बनी रहेगी.’’ उचित अवसर देख कर संजीव ने साहब का हाथ दबाते हुए दिल की मंशा जाहिर कर दी.

‘‘हां..हां… क्यों नहीं, कल सुबह औफिस में आ जाना. बैठ कर बातें करेंगे.’’ अधिकारी ने कहा.

संजीव का फेंका गया दूसरा पांसा भी सटीक पड़ा था. अगले दिन संजीव अपने अधिकारी के औफिस चला गया. दोनों में आधे घंटे तक गुफ्तगू होती रही. संजीव ने अपनी सोच जाहिर की तो साहब ने उस पर अपनी मौन स्वीकृति दे दी. पटवारी संजीव की भावी योजना में साहब की सीधे कोई भूमिका नहीं थी. केवल उन्हें चुप रहते हुए अपनी आंखें बंद रखनी थीं.

इस के बाद पटवारी संजीव ने अधिकारियों से सांठगांठ कर फरजी तरीके से भू आवंटन करना शुरू कर दिया. जो कोई उस का विरोध करता, वह मोटे गिफ्ट दे कर उस का मुंह बंद कर देता.

राजस्व विभाग में कामयाबी मिलने के बाद संजीव मलिक ने अगला कदम बैंकिंग प्रबंधन में पैठ बढ़ाने के लिए उठाया. शातिर संजीव ने एकदो व्यापारी मित्रों के सहयोग से इलाके के बैंक मैनेजरों को पटा लिया. वर्तमान में देश के सभी राष्ट्रीयकृत व सहकारी बैंक किसानों को उन की जोत वाली कृषि भूमि पर ऋण उपलब्ध करवा रहे हैं. हर बैंक का कृषक ऋण का कोटा निश्चित होता है. इसी का फायदा संजीव ने उठाया.

संजीव की सांठगांठ से बैंककर्मियों को दोहरा लाभ हो रहा था. एक तो उन का ऋण आवंटन का कोटा सहजता से पूरा हो रहा था, ऊपर से जेब भी गरम हो रही थी. जिस खेती की जमीन पर बैंक लोन देती थी, बैंककर्मी उस का सत्यापन बैंक में बैठेबैठे ही पूरा कर के रिपोर्ट लगा देते थे.

संजीव मलिक ने शुरू में अपने खासमखास छुटभैया नेता ओमप्रकाश व उस के भाई के सहयोग से भरोसेमंद ग्राहकों को फांसा. बाद में उस के नेटवर्क में अन्य क्षेत्रीय राजनेता भी जुड़ गए. संजीव ने ओमप्रकाश व उस के भाई के नाम 56 बीघा कृषि भूमि इंद्राज कर के उन्हें खातेदार घोषित किया. इतना ही नहीं, दोनों ही भाइयों के नाम से 10 लाख 29 हजार रुपए व साढ़े 8 लाख रुपए का कृषि ऋण भी एक बैंक से दिला दिया.

इसी प्रकार खसरा नंबर 1236 में मात्र 2 बिस्वा (1 बीघा का दसवां हिस्सा) रकबा राजकीय दर्ज था. पर लेखपाल से मिलीभगत कर इस खसरा में 40 बीघा रकबा दर्ज दिखा कर दोनों भाइयों के नाम 20-20 बीघा खातेदारी घोषित कर दी गई.

राजस्थान में प्रदेश सरकार राजस्व विभाग की सहायता से समयसमय पर जायज भूमिहीन कृषकों को भूमि आवंटन व निर्धारित दर से भूमि विक्रय करती है. भू आवंटन हेतु एसडीएम की अध्यक्षता में गठित कमेटी भू आवंटन करती है. क्षेत्र के भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो), हलका पटवारी से संबंधित भूमि व कृषक की रिपोर्ट से संतुष्ट होने पर एसडीएम किसान को भू आवंटन करता है.

इस आवंटन का इंद्राज पटवार परत व सरकार परत में इंतकाल के रूप में दर्ज किया जाता है. इंतकाल की प्रक्रिया पूरी होने के साथ किसान भूमि का मालिकाना हक पा जाता है. पटवार परत जिसे आम बोलचाल में बही कहते हैं, वह पटवारी के पास तहसील कार्यालय में रहती है.

पटवारी के चोले में छिपा संजीव मलिक अब भू माफिया बन चुका था. अपेक्षित स्तर पर मिल रहे सहयोग के बल पर वह फरजी भू आवंटन से बेशुमार दौलत कमा रहा था. सन 2015 के अगस्त माह का वाकया है. क्षेत्र का एक किसान हेतराम संजीव मलिक से मिला. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘पटवारीजी, गरीब आदमी हूं. मुझे भी एक मुरब्बा खातेदारी अलाट करवा दो.’’

‘‘देखो हेतराम, एक मुरब्बा का रेट 7 लाख है. तुम गरीब आदमी हो, इसलिए तुम्हारे 5 लाख लगेंगे. पैसे ले आओ, तुम्हारा काम कर दूंगा.’’

‘‘साहब, 5 लाख तो दूर, मेरे पास तो एक लाख भी नहीं हैं.’’

‘‘देखो हेतराम, पैसे ऊपर तक देने पड़ते हैं. तुम जैसे भी हो, पैसों की व्यवस्था कर लो. बाद में तुम्हें बैंक से केसीसी दिला दूंगा. इस से तुम्हारी जेब में 2-3 लाख ज्यादा आ जाएंगे.’’ संजीव ने कहा.

हेतराम ने जैसेतैसे कर मोटे ब्याज पर रुपए ले कर पटवारी को सौंप दिए. एक पखवाड़े में ही हेतराम एक मुरब्बा कृषि भूमि का मालिक बन गया. पटवारी संजीव मलिक ने हेतराम को उसी जमीन पर 8 लाख रुपए का लोन भी दिलवा दिया था. उस में से उस ने अपने हिस्से के 5 लाख रुपए ले लिए.

समय गुजरता रहा और पटवारी के ग्राहकों की संख्या बढ़ती रही. सूची में क्षेत्र के लोगों के अलावा एकचौथाई कृषक खातेदारी अधिकारों से वंचित हैं. ऐसे कृषकों को बैंकों के कृषि लोन या अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता था.

जब उन लोगों को पता चला कि पटवारी संजीव जरूरतमंद व्यक्तियों के बजाए अन्य लोगों को लाभ पहुंचा रहा है तो उन्होंने खातेदारी अधिकार के लिए आंदोलन शुरू कर दिया. अप्रैल, 2016 के दूसरे पखवाड़े में शुरू हुए इस आंदोलन में किसानों ने खातेदारी के साथसाथ पटवारी संजीव के कारनामे की जांच व तबादले की मांग भी जोड़ दी.

आंदोलन उग्र होता, इस से पहले ही जिला प्रशासन हरकत में आ गया. तत्कालीन जिलाधिकारी रामनिवास ने इस पूरे मामले की जांच मोहर के एडीएम सुखवीर सिंह चौधरी को सौंप दी. एडीएम ने व्यापक स्तर पर हुए भू घोटाले की जांच हेतु 2 जांच टीमें गठित कीं. पहली टीम में इंसपेक्टर राम सिंह मंद्रा के साथ पटवारी जसवंत सिंह, विनोद कुमार तथा दूसरी में इंसपेक्टर देवीलाल धिंपा के साथ हंसराज व राजकुमार को शामिल किया गया.

जांच टीमों ने सन 2005 से ले कर 2015 तक के तमाम खातों व जमा बंदियों की जांच की. जांच के दौरान पता चला कि आवंटित खसरों में अनुचित रूप से कांटछांट कर अन्य किसानों के नाम जोड़ दिए गए थे. फरजी स्तर पर खातेदारी अधिकार रेवडि़यों की तरह बांटे गए थे.

एडीएम सुखवीर सिंह ने बारीकी से जांच कर 40 पेज की रिपोर्ट तैयार कर के जिलाधिकारी के सामने प्रस्तुत की. रिपोर्ट के अनुसार, पटवारी व अन्य ने अनधिकृत रूप से 41 खाते जोड़े थे. कंप्यूटराइज जमा बंदियों में संविदाकर्मी उमाराम व संजीव मलिक के फरजीवाड़े को इंसपेक्टर उमाराम द्वारा आंखें मूंद कर तसदीक किए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में था.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सन 1998 से ले कर 2001 तक की पटवार परत/सरकार परत कार्यालय में नहीं मिली. रकबा उपलब्ध नहीं होने के बावजूद फरजी ढंग से पटवार परत में कांटछांट व ओवरराइटिंग कर के किसानों को भू आवंटन किया गया.

जिलाधिकारी ने जांच रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार पीलीबंगा को 9 कर्मचारियों व 67 लाभान्वितों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाने के आदेश दिए. इन में 5 महिलाएं भी थीं. इस जांच रिपोर्ट में पीलीबंगा के तत्कालीन उपखंड अधिकारी व तहसीलदार की भूमिका पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी.

पीलीबंगा के तत्कालीन तहसीलदार बसंत सिंह ने 23 अप्रैल, 2016 को थाने में भू अभिलेख निरीक्षक (कानूनगो) बनवारीलाल, जगदीश बैन, बृजलाल शर्मा, मदनलाल, उमाराम व 4 पटवारियों संजीव, वेदप्रकाश, रामचंद्र व ओमप्रकाश ताखर सहित 76 लोगों के विरुद्ध भांदंवि की धारा 420, 409, 467, 468, 471, 167 व 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

एक आरोपी महिला कृषक चंद्रावली जाट जो एक क्षेत्रीय नेताजी की मां है, को 8 खसरों में लगभग 65 बीघा रकबा आवंटित किया गया था. इस रकबे पर लाखों रुपए का कृषि लोन भी लिया गया था.

मुकदमा दर्ज होते ही राजस्व विभाग ने पटवारी संजीव मलिक को अपदस्थ कर दिया था. पर संजीव मलिक राजस्थान उच्च न्यायालय में राजनीतिक द्वेष का हवाला दे कर राहत पाने में सफल हो गया. मुकदमा दर्ज होते ही नामजद लोगों की नींद उड़ गई. संजीव मलिक के कृत्य से आहत किसानों ने अप्रैल में ही उच्च न्यायालय की शरण ली.

माननीय उच्च न्यायालय ने सुनवाई के बाद अक्तूबर, 2016 में जांच अधिकारी सीओ पीलीबंगा को तलब कर लिया. उच्च न्यायालय के दखल के बाद धीमी गति से चल रही पुलिस जांच में तेजी आ गई. सीओ विजय मीणा के निर्देश पर एएसआई हंसराज, हैडकांस्टेबल लिघमन, सुरेंद्र, अमीलाल व बलतेज सिंह ने नामजद पटवारी संजीव मलिक व उमाराम गिरदावर को उन के निवास स्थान से 3 दिसंबर, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

10 दिसंबर को इसी टीम ने पटवारी के सहायक श्रीचंद मेघवाल व संविदाकर्मी उदाराम को भी गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार आरोपियों से व्यापक पूछताछ के बाद न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया.

पटवारी संजीव मलिक ने जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित पौश इलाके ड्रीमलैंड सोसाइटी में एक भव्य बंगला बनवाया था. कहा जाता है कि उस के बंगले पर लग्जरी गाडि़यों का आनाजाना लगा रहता था. यह भी कहा जाता है कि बीसियों लाख रुपयों से बने उस के बाथरूम तक में एसी लगे हुए थे. कृषि भूमि आवंटन के फ्रौड में करोड़ों बनाने वाला साईं भक्त संजीव मलिक अपने 3 साथियों के साथ जेल में बंद है.

हजारों बीघा कृषि भूमि के फरजी आवंटन के इस सिलसिले में कमाए गए लाखों रुपयों की बंदरबांट ऊपर से नीचे तक हुई है. कई राजनेताओं पर भी आरोप लग रहे हैं. पूर्व में जिलाधिकारी हनुमानगढ़ ने सभी आवंटन रद्द करने के आदेश जारी किए थे.

पुलिस जांच मात्र राजस्व विभाग के निचले पायदान के कार्मिकों व नामजद किसानों के इर्दगिर्द घूम रही है. विभाग के आला अधिकारी अभी भी जांच से कोसों दूर हैं. जांच उन बैंककर्मियों की भी होनी चाहिए, जिन्होंने फरजी कागजातों के आधार पर खुले हाथों से लाखों के कृषि लोन मंजूर कर बंदरबांट की. पीडि़त किसानों ने राज्य सरकार से इस महाघोटाले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है.      ?

– कथा राजस्व व पुलिस सूत्रों के आधार पर

नीरज बवाना : ऐसे बना जुर्म का खलीफा

जिस के खौफ के किस्से दिल्ली के जर्रेजर्रे में गूंजते हैं. जिस के गुर्गे उसे एनसीआर में जुर्म का खलीफा कहते हैं. बात उस नीरज बवाना की, जिस ने जुर्म की दुनिया में तहलका मचा रखा है. हम उस की क्राइम कुंडली का कच्चा चिट्ठा आप के सामने खोल कर रख देंगे. साथ ही यह भी बताएंगे कि 17 साल पहले नीरज बवाना ने कैसे क्राइम की एबीसीडी सीखी और जुर्म की दुनिया की मास्टर डिग्री उसे कहां से मिली.

दिल्ली में एक जिला है आउटर. इसी जिले में स्थित है बवाना. बवाना के ही रहने वाले प्रेम सिंह सेहरावत के घर में 5 अगस्त, 1988 को नीरज का जन्म हुआ. नीरज ने 16 साल की उम्र में किताबें छोड़ कर बंदूकें थाम लीं और जुर्म की दुनिया का साम्राज्य खड़ा करने लगा.

नीरज ने बचपन से एक ही शौक पाला, लोगों से दुश्मनी मोल लेना और झगड़े खरीदना. आगे चल कर उस का नाम पड़ गया नीरज बवाना. नीरज बवाना के खिलाफ देश में एकदो नहीं, बल्कि 4 राज्यों में 100 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं.

प्रेम सिंह सेहरावत चाहते थे कि नीरज बड़ा हो कर कोई बिजनैस करे, लेकिन नीरज ने जैसे अपराध के बिजनैस को करने की बचपन से ही ठान ली थी. पहले लोगों से झगड़ा करना, झगड़ा खरीदना, दुश्मनी मोल लेना और फिर घर आ कर पिता से मार खाना, ये तो जैसे उस की हर रोज की बात हो गई थी.

क्राइम की दुनिया में आना नीरज के लिए कोई रिस्क नहीं था, बल्कि उसे दिख रहा था बेशुमार पैसा, पौवर और पौलिटिक्स. इसलिए उस ने क्राइम की दुनिया में कदम रखा.

प्रेम सिंह डीटीसी में बस कंडक्टर थे. वह हमेशा यही चाहते थे नीरज किसी तरह गलत लड़कों की संगत छोड़ कर कोई ढंग का काम कर ले. लेकिन नीरज ने वही किया, जो उस के दिल ने चाहा. वह एक जाट फैमिली से था, इसलिए जाति की दबंगई ने भी उसे क्राइम की दुनिया में बढ़ने को प्रेरित किया.

नीरज का बड़ा भाई पंकज सेहरावत सब से पहले क्राइम की दुनिया में कूदा. साल 2004 में उस ने लूट, डकैती और हत्या जैसे संगीन मामलों को अंजाम दिया. उस का छोटा भाई नीरज ठीक उस के पीछेपीछे चलते हुए क्राइम की दुनिया में कूद पड़ा.

नीरज बवाना के बारे में एक और बात कही जाती है. साल 2004 में उसे बड़े भाई के साथ एक अपराध के मामले में जेल हो गई. वहां से जमानत पर बाहर आया तो साल 2005 में वह फिर से अवैध हथियार रखने के आरोप में जेल गया.

फजलुर्रहमान को मानता था गुरु

तिहाड़ जेल में इस बार जाना उस की जिंदगी का टर्निंग पौइंट साबित हुआ. तिहाड़ जेल से ही उस ने क्राइम की दुनिया में सिक्का जमाने की शुरुआत की. जेल में ही नीरज बवाना की मुलाकात फजलुर्रहमान से हुई. फजलुर्रहमान पर आरोप था कि वह अंडरवर्ल्ड डौन दाऊद इब्राहिम का आदमी है.

फजलुर्रहमान ने इसी तिहाड़ जेल में नीरज बवाना को इस बात की ट्रेनिंग दी कि क्राइम की दुनिया में अपनी हुकूमत का कैसे विस्तार करना है. नीरज बवाना फजलुर्रहमान को अपना गुरु मान चुका था. फजलुर्रहमान ने इस बात का भरोसा दिलाया था कि वह उसे जुर्म की दुनिया का एक्सटौर्शन किंग बना देगा.

नीरज बवाना इस समय तिहाड़ जेल में बंद है. वह तिहाड़ जेल से ही गुर्गों के जरिए अपना गैंग चला रहा है. उस के गैंग में करीब 300 लोग हैं. जिस में 2 दरजन से ज्यादा शार्प शूटर हैं.

नीरज बवाना और दूसरे गैंग दिल्ली और आसपास के इलाकों में वर्चस्व की लड़ाई में अकसर खूनी खेल खेलते रहते हैं.

नीरज को जरायम की दुनिया में एक और नाम से जाना जाता है नीरज बवानिया. 4 मई, 2021 को दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में सुशील कुमार की मदद करने वाले इसी नीरज बवानिया गिरोह के लोग थे. हत्याकांड के बाद पुलिस ने एक स्कौर्पियो बरामद की थी, जिस का कनेक्शन नीरज बवाना के मामा से बताया गया.

नीरज बवाना ने साल 2004 में जुर्म की दुनिया में पहला कदम रखा. उस के बाद साल 2005 आतेआते उस ने सुरेंद्र मलिक उर्फ नीतू दाबोदा गैंग से हाथ मिला लिया. कहा जाता है उस समय तक नीतू दाबोदा गैंग ने जुर्म की दुनिया में अच्छाखासा मुकाम हासिल कर लिया था. नीतू दाबोदा गैंग का मुख्य काम होता था, लूट डकैती और हत्या जैसी वारदातों को अंजाम देना.

साल 2010 तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा. तब तक नीरज बवाना जुर्म की दुनिया में एक फ्रैशर की तरह था. लेकिन साल 2011 आतेआते सूरत बदल गई. 2011 में नीरज के दोस्त सोनू पंडित की दाबोदा गैंग में एंट्री हुई. गैंग में सोनू पंडित के आने के बाद नीतू दाबोदा और नीरज बवाना के बीच दूरियां बढ़ती गईं.

नीतू को यह लगने लगा था कि सोनू नीरज को उस के खिलाफ भड़का रहा है और दोनों मिल कर उस की हत्या कर सकते हैं. इसी असुरक्षा की भावना के चलते नीतू दाबोदा ने सोनू पंडित की हत्या करवा दी. यहीं से नीतू दाबोदा और नीरज बवाना के रास्ते अलगअलग हो गए और देखते ही देखते यह रंजिश खूनी रंजिश में बदल गई.

कहते हैं जितनी गहरी दोस्ती होती है, कभीकभी उस से कहीं ज्यादा गहरी दुश्मनी हो जाती है. जैसे ही नीतू दाबोदा गैंग और नीरज बवाना के बीच रंजिश शुरू हुई, वैसे ही नीरज ने नीतू दाबोदा गैंग के लोगों को चुनचुन के मारना शुरू कर दिया और देखते ही देखते उस ने पूरे गैंग का सफाया कर दिया.

इसी बीच नीतू दाबोदा पुलिस एनकाउंटर में ढेर कर दिया गया. यानी नीरज बवाना के रास्ते का पत्थर खुदबखुद हट चुका था.

नीतू दाबोदा गैंग का मुख्य था सुरेंद्र. सुरेंद्र जैसे ही मारा गया, नीरज बवाना का एकछत्र राज हो गया. उस के बाद नीरज बवाना और उस का गैंग दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता चला गया.

विधायक से मांगी 50 लाख की रंगदारी

नीरज बवाना ने इस के बाद लूट, हत्या, डकैती, अपहरण, फिरौती आदि का एक नया कारोबार शुरू किया. वह जिस कारोबार पर हाथ रखता तो समझिए मिट्टी सोना बन जाती.

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नीरज एक्सटौर्शन के फील्ड में भी उतर चुका था. साल 2012 के मई महीने में दिल्ली के नरेला से ही तत्कालीन विधायक सत्येंद्र राणा को फोन पर धमकी दी गई. फोन करने वाले ने अपना नाम नीरज बवाना बताया और 50 लाख रुपए की डिमांड की. जिस की शिकायत विधायक राणा ने थाने में दर्ज करवा दी.

साल 2014 में नीरज ने सोनू पंडित की हत्या में शमिल संदीप टकेसर को मरवा दिया.

नीतू दाबोदा के मरने के बाद दाबोदा गैंग की कमान पारस, गोल्डी और प्रदीप भोला के हाथ में आ गई थी. साल 2014 और महीना अप्रैल का था. दिल्ली के रोहिणी कोर्ट कैंपस में ही प्रदीप भोला की पेशी के दौरान ही हत्या का प्लान बनाया.

कोर्ट परिसर में 10 बदमाश हत्या के लिए तैनात किए गए. सारे शूटर दाखिल भी हो गए, लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. यहां तो नीरज बवाना नाकाम हो गया, लेकिन वह बदले की आग में जल रहा था.

जेल में बने फिर से नए दोस्त

इस के बाद 2014 के दिसंबर महीने में नीरज बवाना का साथी अमित भूरा देहरादून जेल में बंद था. एक हत्या के आरोप में बागपत कोर्ट में उस की सुनवाई होनी थी. इसी सुनवाई के लिए देहरादून जेल से बागपत कोर्ट पुलिस कस्टडी में लाया जा रहा था.

रास्ते में 10 से 12 लोग एक एसयूवी में भर कर आए. पुलिस के ऊपर मिर्ची स्प्रे और गोलीबारी कर दी और अमित भूरा को भगा कर अपने साथ ले गए. इस के साथ ही पुलिस से 2 एके-47 राइफल भी लूट कर ले गए. इस मामले में भी नीरज बवाना का नाम सामने आया था.

दिल्ली पुलिस ने दूसरे राज्यों की पुलिस के साथ मिल कई सर्च औपरेशन चलाए, जिस में पुलिस ने नीरज बवाना के 35 साथियों को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन एक नीरज बवाना था जो पुलिस के हाथ नहीं आ रहा था. इस समय तक नीरज बवाना मोस्टवांटेड अपराधी बन चुका था.

आखिर 7 अप्रैल, 2015 को सुबह 4 बजे नीरज बवाना को उस के एक साथी मोहम्मद राशिद के साथ दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. जेल में नीरज ने नवीन बाली, राहुल काला, सुनील राठी और अमित भूरा से दोस्ती की, जोकि बाद में उस के गिरोह का हिस्सा बन गए. नवीन बाली तो नीरज का दाहिना हाथ बन गया था.

कई नाकामियों के बाद नीरज बवाना के लिए पहली कामयाबी का मौका आ चुका था. तारीख थी 25 अगस्त, 2015. पुलिस पेशी के बाद कोर्ट परिसर से नीरज बवाना को ले कर जा रही थी और उस जेल वैन में 2 बदमाश पहले से मौजूद थे, नीतू दाबोदा गैंग के प्रदीप भोला और पारस गोल्डी.

नीरज बवाना ने अपने शूटर्स को पहले से ही इत्तिला कर दी थी कि वैन में प्रदीप और पारस भी होंगे. नीरज ने अपने प्रमुख साथी राहुल काला के साथ मिल कर प्रदीप भोला और पारस गोल्डी को मौत की नींद सुला दिया.

नीरज बवाना के लिए दूसरा मौका अप्रैल, 2017 में आया, जब रोहिणी जेल के बाहर नीतू दाबोदा के खास को भी नीरज बवाना ने मरवा दिया. अप्रैल 2017 में रोहिणी जेल के बाहर हुई इस घटना से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस तरह नीरज बवाना के शूटर्स काम कर रहे थे.

क्योंकि नीरज बवाना 2015 से ही जेल में बंद था. जबकि शूटर्स बाहर अपराध की दुनिया में लगातार जबरदस्त तरीके से उस का नाम फैला रहे थे. नीरज बवाना एक के बाद एक अपने घोर दुश्मनों को अपने रास्ते से हटाता जा रहा था.

क्राइम के अलावा नीरज बवाना को 2 और चीजों का बहुत शौक है. पहली शराब और दूसरी अफीम. नीरज बवाना ने अपने दाहिने हाथ पर राधास्वामी का टैटू भी गुदवा रखा है. नीरज कभी भी वेजिटेरियन खाना पसंद नहीं करता और सारी सुविधाएं उसे जेल के अंदर मिल जाती हैं यानी अफीम, शराब और नौन वेजिटेरियन खाना.

नीरज जितनी अच्छी हरियाणवी बोलता है, उतनी अच्छी हिंदी भी बोलता है और उतनी ही अच्छी वह अंगरेजी भी बोल लेता है.

साल 2015 में नीरज का बड़ा भाई और उस की मां दोनों ही इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर अवैध हथियारों और कारतूसों के साथ पकड़े गए थे. वह इन अवैध हथियारों और कारतूसों को कोलकाता ले जाने की कोशिश कर रहे थे.

साल 2019 में नीरज बवाना ने अपनी चचेरी बहन और उस के बौयफ्रैंड अमित की हत्या करवाने की कोशिश की. इस कोशिश में अमित तो मारा गया, लेकिन चचेरी बहन बुरी तरह घायल हो गई. कहा जाता है कि नीरज बवाना दोनों के प्रेम प्रसंग और उन के रिश्ते से नाराज था, इसीलिए दोनों को मरवा देना चाहता था.

नीरज बवाना देश की सब से सुरक्षित तिहाड़ जेल में बैठा हुआ है. वह तिहाड़ से ही अपने साम्राज्य को औपरेट कर रहा है. वह जब जहां, जैसा चाहता है, वैसा करता है. क्योंकि उस के गुर्गे बाहर एक्टिव हैं और मोर्चे पर हैं.

कहा जाता है कि डी कंपनी ने छोटा राजन को मारने के लिए नीरज बवाना को सुपारी दी थी. जेल अधिकारियों ने इस की भनक लगते ही जेल की सुरक्षा बढ़ा दी थी और छोटा राजन को जेल के दूसरे बैरक में शिफ्ट कर दिया था.

सिद्धू मूसेवाला से थी खास दोस्ती

चर्चा यह है कि वर्तमान में नीरज बवाना का दुश्मन नंबर एक है लारेंस बिश्नोई. दोनों पर मकोका लगा हुआ है. दोनों को ही तिहाड़ जेल के 2 अलगअलग हाई सिक्योरिटी बैरक में रखा गया है.

लारेंस बिश्नोई और उस के साथ कालेज में छात्र राजनीति से अब तक साथ निभाने वाले दोस्त गोल्डी बराड़ का प्रसिद्ध पंजाबी सिंगर और कांग्रेस नेता सिद्धू मूसेवाला की हत्या कराने में भी नाम आ रहा है.

मूसेवाला नीरज बवाना का खास था. मूसेवाला की हत्या की खबर मिली तो नीरज बवाना बिफर पड़ा. उस ने 2 दिन में मूसेवाला के हत्यारों को मारने की धमकी दे डाली.

इस धमकी से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया. पंजाब और दिल्ली में गैंगवार की आंशका जताई जाने लगी.

अब देखना है कि दिल्ली का सब से बड़ा गैंगस्टर नीरज बवाना अपनी धमकी को कैसे अमल में लाता है और अपना बदला पूरा कर पाता है कि नहीं.

दूसरी ओर मूसेवाला की हत्या की जांच कर रही पुलिस के लिए नीरज बवाना की धमकी भी सिरदर्द बन गई है. आगे क्या होगा ये तो अभी भविष्य के गर्भ में छिपा है.

कन्हैयालाल मर्डर केस : क्रूरता की कहानी, हरकत तालिबानी – भाग 3

जांच में यह भी मालूम हुआ कि 2611 नंबर की यह बाइक सन 2013 में खरीदी गई थी और रियाज अत्तारी ने अपनी पसंद का 2611 नंबर लेने के लिए आरटीओ में एक हजार रुपए चुकाए थे. यह आरोपियों के जेहादी जहर को दर्शाता है.

बहरहाल, कन्हैयालाल के आरोपियों के खिलाफ एनआईए ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम ‘यूएपीए’ के अधीन मुकदमा दर्ज कर लिया है. साथ ही हत्या के मामले में सीमा पार से जुड़े तार का पता लगाने के लिए डिजिटल सबूत की भी जांच की जा रही थी.

एनआईए ने अपनी एफआईआर संख्या आरसी 27/2022 में कत्ल की धारा के अलावा आईपीसी 452,153ए,153बी, 295ए के साथ साथ सेक्शन 16, 18 और यूएपीए की धारा 20 को भी शामिल किया है. एनआईए ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि इस पूरे मामले को सोचीसमझी साजिश और पूरी प्लानिंग के साथ अंजाम दिया गया.

एनआईए ने कन्हैयालाल की हत्या की साजिश में शामिल रहे 2 और आरोपियों मोहसिन और आसिफ को भी गिरफ्तार कर लिया. चारों आरोपियों को भारी सुरक्षा के बीच एनआईए कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें अजमेर की हाईसिक्योरिटी जेल भेज दिया गया.

उदयपुर में टेलर कन्हैयालाल के मर्डर का खून अभी सूखा भी नहीं था कि महाराष्ट्र के अमरावती जिले में उसी के जैसी एक और खबर सामने आ गई. हत्या की यह घटना 21 जून की है, लेकिन इस का कारण भी नूपुर के समर्थन में विवादित बयान की पोस्ट ही है.

उमेश प्रह्लादराव कोल्हे (54) की अमरावती के श्याम चौक क्षेत्र के घंटाघर के पास रात करीब साढ़े 10 बजे चाकू से गरदन काट दी थी. पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपी समेत 7 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है. उमेश कोल्हे एक मैडिकल स्टोर चलाते थे. वह 21 जून की रात को बेटे संकेत और बहू वैष्णवी के साथ अलगअलग बाइक पर अपने घर लौट रहे थे. तभी घात लगा कर बैठे हमलावरों ने उन की गरदन पर पीछे से चाकू से हमला कर दिया था.

इस हमले के बारे में पुलिस ने जब तहकीकात की, तब मालूम हुआ कि उमेश कोल्हे ने एक वाट्सऐप ग्रुप पर नूपुर शर्मा के समर्थन में एक पोस्ट सोशल मीडिया पर शेयर की थी. संयोग से उस ग्रुप में एक मुसलिम सदस्य भी जुड़ा हुआ था.

पुलिस को इस का खुलासा गिरफ्तार किए गए आरोपियों में से एक से हुआ. उस ने पुलिस को बताया कि उन के मुताबिक यह पैगंबर मोहम्मद का अपमान था. इसलिए उन की हत्या की गई.

पुलिस उपायुक्त विक्रम साली के अनुसार, मृतक के बेटे संकेत की तहरीर पर पुलिस ने यूएपीए कानून की धारा 16, 18 और 80 के अलावा भादंवि की धारा 302, 153ए, 153बी के तहत केस दर्ज करने के बाद 23 जून को 2 आरोपियों मुदस्सिर अहमद और शाहरुख पठान (25) को गिरफ्तार किया था.

उन से पूछताछ में 4 अन्य लोगों के भी इस हत्याकांड में शामिल होने की बात सामने आई थी. जिन में से अब्दुल तौफीक (24) शोएब खान (22) और आतिब रशीद (22) को बीते 25 जून को गिरफ्तार किया गया.

तब तक एक अन्य आरोपी अहमद फिरोज उर्फ यूसुफ खान और मुख्य आरोपी इरफान फरार था. बाद में इरफान शेख भी 7वें आरोपी के तौर पर 3 जुलाई, 2022 को गिरफ्तार कर लिया गया. एनजीओ चलाने वाला इरफान फरार होने की फिराक में था, तभी पुलिस ने उसे दबोच लिया था.

इस मामले में उमेश के भाई महेश कोल्हे ने भी चौंकाने वाला एक खुलासा किया. उस ने बताया कि हत्याकांड में शामिल यूसुफ खान अमरावती में वेटेरनरी डाक्टर है और उमेश से उस की अच्छी दोस्ती थी. यूसुफ मैडिकल पर आ कर दवाएं खरीदता था. यही नहीं, कई बार वह उमेश के घर भी आया था.

यूसुफ डाक्टरों और मैडिकल वालों के उस वाट्सऐप ग्रुप में था, जिस में उमेश ने नूपुर शर्मा के समर्थन वाला पोस्ट फारवर्ड किया था.

उमेश की पोस्ट को यूसुफ ने ही शेख इरफान तक पहुंचाया था. उस ने कहा कि देखो यह हमारे धर्म के खिलाफ बोलने वाली नूपुर का समर्थन कर रहा है और आप लोग उस की दुकान से दवा खरीदते हैं.

उस के बाद इरफान उत्तेजित हो गया था और हत्याकांड की साजिश रची थी, जिस की गिरफ्तारी नागपुर से हुई थी. उस ने हत्याकांड को अंजाम देने के लिए हत्यारों को 10-10 हजार रुपए एवं एक कार का इंतजाम भी किया था. उमेश कोल्हे की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन के गले पर 5 इंच चौड़ा, 7 इंच लंबा और 5 इंच गहरा जख्म था. इस से पता चलता है कि हत्यारों में कितना आक्रोश भरा था.

एनआईए का कहना है कि इस का मकसद देश में एक वर्ग के लोगों को दहशतजदा करना था. उदयपुर और अमरावती के मामलों की एनआईए गहनता से जांच कर रही है.

पाकिस्तान के दावतएइसलामी का क्राइम कनेक्शन एनआईए की जांच में पता चला कि रियाज अत्तारी का निकाह पाकिस्तान के दावत ए इसलामी संगठन की ओर से ही करवाया गया था. तभी से उस ने अपने नाम के साथ संगठन के संस्थापक का टाइटल अत्तारी जोड़ लिया था.

इस संगठन के बारे में पता चला कि इस की बुनियाद धार्मिक कार्यों के लिए रखी गई थी, जो बाद में जेहादी गतिविधियों में शामिल हो गया.

कन्हैया लाल की हत्या के मामले में दावत ए इसलामी संगठन का नाम सामने आया है. साथ ही कन्हैया लाल की हत्या के आरोपियों की पाकिस्तान से कनेक्शन की बात राजस्थान के गृह राज्यमंत्री तक ने की है.

अधिकारियों के अनुसार कन्हैया लाल की हत्या के आरोप में गिरफ्तार एक अभियुक्त गौस मोहम्मद 8 साल पहले पाकिस्तान गया था. वह वहां से फोन करता था.  मोहम्मद गौस कराची स्थित दावत ए इसलामी के दफ्तर जा चुका है. दावत ए इसलामी एक सुन्नी इसलामिक संगठन है. इस का गठन पाकिस्तान में 1981 में मोहम्मद इलियास अत्तार कादरी ने किया था.

कराची स्थित दावत ए इसलामी अपनी पहचान एक गैरराजनीतिक संस्था के तौर पर जाहिर करता है. संस्था के मुताबिक, यह संगठन दुनिया भर में मुसलमानों के धार्मिक ग्रंथ कुरान और पैगंबर मोहम्मद की बातों का प्रचार करता है.

दावत ए इसलामी वेबसाइट के मुताबिक, मोहम्मद इलियास अत्तार कादरी ने संस्था की स्थापना लोगों को अल्लाह के बताए रास्ते पर चलने, इसलाम की सीख देने और समाज की गंदगी को साफ करने के उद्देश्य से की थी. स्थापना के बाद से ही संस्था सुन्नी मुसलमानों के बरेलवी समुदाय के हजारों लोगों को सीख दे चुकी है. इस की गतिविधियां भले ही हिंसक मामलों से नहीं जुड़ी रही हों और संस्था के प्रमुख ने किसी भी सार्वजनिक मंच से कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया हो, लेकिन उन के विचारों से जेहादी भावना भड़कने की आशंका बनी रहती है.

पिछले कुछ सालों में इस समुदाय के अंदर भी पैगंबर मोहम्मद को ले कर कट्टरपंथ बढ़ा है. यहां तक कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के जुर्म में मुमताज कादरी को फांसी दिए जाने के बाद बरेलवी संगठनों में कट्टरपंथ बढ़ा. वे हिंसक होने लगे हैं.

मुमताज कादरी, जो सलमान तासीर के अंगरक्षक थे, ने 2011 में उन की हत्या कर दी थी क्योंकि उन्हें लग रहा था कि सलमान तासीर ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया है. जब कादरी को 2016 में फांसी दी गई, तब उन के जनाजे में बरलेवी समुदाय के हजारों लोग शामिल हुए थे.

बताते हैं कि दावत ए इसलामी का राजस्थान में नेटवर्क है. इस संगठन ने इस साल लगभग एक महीने में राजस्थान के कुछ सीमावर्ती गांवों और कस्बों से 20 लाख रुपए का चंदा इकट्ठा किया था.

कन्हैयालाल मर्डर केस : क्रूरता की कहानी, हरकत तालिबानी – भाग 2

दोनों निहत्थे दोस्तों ने अपनी बाइक से उन की बाइक का पीछा किया. भनक लगने पर आरोपियों ने अपनी बाइक की स्पीड बढ़ा दी. शक्ति सिंह और प्रह्लाद भी उचित दूरी से उन के पीछे चलते रहे और वह पुलिसकर्मी बाबूसिंह और डीएसपी राजेंद्र सिंह को जानकारी देते रहे.

चालीस मील रोड से दोनों भीम रोड की तरफ मुड़ गए. भीम-ब्यावर रोड पर पुलिस पहले से खड़ी थी. युवकों ने पुलिस को इशारा किया, पुलिस ने आरोपियों को चलती बाइक से गिरा कर दबोच लिया. दोनों दोस्तों ने आरोपियों का करीब 20 किलोमीटर तक पीछा किया था.

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जांबाज शक्ति सिंह और प्रह्लाद सिंह चूड़ावत की इस बहादुरी की आम लोगों ने ही नहीं बल्कि पुलिस ने भी तारीफ की और मुख्यमंत्री से दोनों को सम्मानित करने और पुलिस में सेवा लेने की मांग की. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दोनों को अपने औफिस में बुला कर सम्मानित किया. हत्यारोपी मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद को हिरासत में ले कर पुलिस ने पूछताछ की.

वैसे आरोपी मोहम्मद रियाज मूलत: भीलवाड़ा के आसींद का रहने वाला बताया जाता है, लेकिन वह उदयपुर के खांजीपीर में किराए के मकान में रहता था. वह वेल्डिंग और जमीन के लेनदेन के काम से जुड़ा हुआ था. गौस मसजिद में खिदमत का काम करता था.

अभियुक्तों पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया और मामले की जांच के लिए एसओजी एडीजी अशोक राठौड़ के निर्देशन में एसआईटी का गठन किया गया.

राजस्थान के गृह राज्यमंत्री राजेंद्र सिंह यादव ने बताया कि एक अभियुक्त गौस मोहम्मद 2014 में पकिस्तान के कराची गया था और पिछले 2-3 सालों से पकिस्तान में 8-10 नंबरों पर फोन करता रहा है. गौस कराची में 45 दिनों तक रहने के अलावा नेपाल भी गया था. इस के बाद 2018-19 में अरब के देशों में गया था.

इसी तरह से राजस्थान के डीजीपी मोहन लाठर का कहना था कि गौस कराची स्थित दावत ए इस्लामी संगठन से जुड़ा हुआ है. यह एक सुन्नी इसलामी संगठन है.

मामला संवेदनशील होने के कारण अभियुक्तों के खिलाफ एनआईए ने जांच शुरू कर दी.

कन्हैयालाल साहू (40) के परिवार में उस के 2 बेटों मे एक 21 साल का यश और दूसरा 18 साल का तरुण है. यश बीकौम सेकेंड ईयर में पढ़ाई कर रहा है, जबकि तरुण बी फार्मा के फर्स्ट ईयर में है.

पति की मौत के गम में डूबी पत्नी यशोदा के अनुसार कन्हैयालाल को पिछले 7-8 दिन से धमकियां मिल रही थीं. लोग दुकान में आ कर धमकी दे रहे थे. इस वजह से वह रोजाना दुकान नहीं जा रहे थे. 1-2 दिन में दुकान जा कर देख आते थे.

नूपुर के समर्थन में पोस्ट शेयर करने के बाद से ही उन्हें धमकियां मिल रही थीं. उन्हें इस बात का भय था कि उन की हत्या हो सकती है.

पत्नी ने पुलिस पर आरोप लगाया कि पुलिस अगर समय रहते काररवाई करती तो उन के पति जिंदा होते. यशोदा का कहना है 8 जून से ही वह दहशत में थे. इसी दिन उन के मोबाइल पर एक विवादित पोस्ट का मामला सामने आया था.

कन्हैयालाल ने इस की शिकायत खुद पुलिस से की और बताया कि गेम खेलते वक्त उस के बच्चे से गलती से विवादित कंटेंट पोस्ट हो गया.

10 जून, 2022 को कन्हैयालाल की दुकान पर कुछ लोगों ने आ कर काल करने के बहाने से उस का फोन ले लिया और बताया कि उस में कुछ विवादित मैटर पोस्ट हो गया है. इस के बाद कन्हैयालाल ने उस पोस्ट को डिलीट कर दिया.

बात यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि 11 जून को कन्हैयालाल के पड़ोसी नाजिम ने उस के खिलाफ थाने में मामला दर्ज करवा दिया. इस शिकायत पर धनमंडी थाने की पुलिस ने उसे फोन कर बताया कि उस के खिलाफ एक रिपोर्ट दर्ज की गई है. कन्हैयालाल जब थाने पहुंचा, तब मालूम हुआ कि उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाने वाला उस का पड़ोसी नाजिम है. विवादित पोस्ट के चलते उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

इस मामले में 12 जून को जमानत मिल गई, लेकिन अगली पेशी की तारीख 29 जून तय की गई थी. जमानत मिलने के बाद कन्हैयालाल का जीना और भी दूभर हो गया था. कारण, उस ने 13 जून को पाया कि कुछ लोग उस के दुकान की रेकी कर रहे हैं. साथ ही उसे फोन पर सिर कलम करने की धमकी भी मिली.

इस बाबत कन्हैयालाल ने 15 जून को धनमंडी थाने में शिकायत दी. उस में उस ने लिखा कि पड़ोसी नाजिम समेत 4-5 लागों ने उस के नाम और नंबर वायरल कर दिए हैं. वे दुकान नहीं खोलने की धमकी दे रहे हैं. शिकायत में उस ने यह भी आशंका जताई कि वे उसे जान से मार सकते हैं.

इस शिकायत पर उसी दिन पुलिस ने कन्हैयालाल और नाजिम को थाने बुला कर उन के बीच समझौता करवा दिया. दोनों पक्षों के बीच सुलह समझौते के तहत कन्हैया ने पुलिस को लिख कर दिया कि अब वह कानूनी काररवाई नहीं चाहता.

इस पर पुलिस ने कन्हैया को 16 जून को सलाह दी कि वह अगले कुछ दिनों तक वह दुकान न खोले और अपनी दुकान में सीसीटीवी कैमरे लगवा ले.

कन्हैया ने पुलिस की सलाह मानते हुए वैसा ही किया. दुकान बंद रखी और सीसीटीवी कैमरे लगवा लिए. उस के बाद 18 जून को पुलिस ने कन्हैया को कहा कि वह अब दुकान खोल सकता है. अगले रोज 19 जून को कन्हैया ने दुकान खोली. दुकान में अपना रुटीन का काम किया. इस बीच थाने से एक सिपाही ने मौके का जायजा भी लिया.

कन्हैया को 20-24 जून के दौरान 2 बार धमकियां मिलीं. उस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. उस ने समझा कि पुलिस से समझौता हो चुका है. किंतु 25 जून को दुकान पर एक महिला और पुरुष आ कर धमकी दे गए. उन्होंने कहा कि तुझे जमीन में गाड़ देंगे. इस धमकी के बाद कन्हैयालाल परेशान हो गया. फिर वह दुकान पर 28 जून को ही गया.

कन्हैयालाल की हत्या के मामले में पुलिस की जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए. जांचकर्ताओं के अनुसार दोनों हमलावरों की योजना कुछ और थी. वे कन्हैया को उस के घर में घुस कर मारना चाहते थे. घर का सही पता नहीं चल पाने के कारण उन्होंने दुकान में हत्या को अंजाम दे दिया.

जांच करने वाली टीम को यह भी पता चला है कि जिन हमलावरों ने टेलर कन्हैयालाल की हत्या की थी, वे पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे. दोनों आरोपी नूपुर शर्मा के बयान के बाद से ही कुछ बड़ा करने की प्लानिंग कर रहे थे.

अब तक हुए खुलासे के मुताबिक दोनों हत्यारे कन्हैयालाल की लाइव हत्या करना चाहते थे ताकि इन की इस हरकत से एक समुदाय में दहशत फैल सके और ये अपने धर्म के हीरो बन जाएं. रियाज और मोहम्मद गौस ने बताया कि हत्या करने के बाद वे उदयपुर के सापेटिया इलाके में स्थित शोएब के औफिस गए.

शोएब के औफिस में बैठ कर दोनों ने हथियार के साथ कबूलनामे वाला वीडियो बनाया था और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. इसी औफिस से 17 जून को बनाया गया वीडियो भी वायरल किया गया था. पुलिस को इसी औफिस से हथियार भी मिले.

रियाज और मोहम्मद गौस ऐसे कई वाट्सऐप ग्रुप से जुड़े हुए थे, जिस में पाकिस्तान समेत कई और दूसरे देशों के लोग शामिल थे और ये सभी कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोग थे. इस ग्रुप में हमेशा भड़काने वाले बयान दिए जाते थे.

गौस मोहम्मद अपने मातापिता और परिवार वालों के साथ किशन पोल इलाके के एक मकान में रहता था. दूसरा आरोपी मोहम्मद रियाज उदयपुर में 20 सालों के दौरान कई मकानों में किराए पर रहा. अकसर वो किराए का घर बदलता रहा.

कन्हैयालाल हत्याकांड की गहन जांच के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी एनआईए ने 10 अधिकारियों की टीम बनाई तो वहीं राजस्थान सरकार की ओर से एसआईटी का गठन किया गया.  एसआईटी में एसओजी एडीजी अशोक राठौड़, एटीएएस आईजी प्रफुल्ल कुमार एवं एक एसपी और एडिशनल एसपी शामिल किए गए.

इसी के साथ सरकार ने एसपी और आईजी के समेत 4 पुलिस अधिकारियों को इसलिए सस्पेंड कर दिया, क्योंकि उन्होंने समय रहते कन्हैयालाल को मिली धमकियों के संदर्भ में पहल करने में अनदेखी की.

डीजीपी लाठर के आदेश पर एएसपी (सिटी) अशोक मीणा, सीओ (ईस्ट) जरनैल सिंह, सीओ (वेस्ट) जितेंद्र आंचलिया, सूरजपोल एसएचओ लीलाधर मालवीय के सस्पेंड किए जाने से पहले धानमंडी एसएचओ गोविंद सिंह और एएसआई भंवरलाल सस्पेंड कर दिए गए थे. उन्हें भी इसलिए सस्पेंड किया गया, क्योंकि उन्होंने कन्हैयालाल की तरह ही एक व्यापारी को हत्या की धमकी मिलने के बावजूद कोई काररवाई नहीं की.

एनआईए को मिले जिन पक्के सबूतों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाने की उम्मीद बनी, उन में एक बाइक का नंबर 2611 है, जबकि दूसरा सबूत दोनों आरोपियों के भागने का सीसीटीवी फुटेज है. इस के अलावा कन्हैयालाल के खून से सना बड़ा चाकू और उसे बनाने वाली फैक्ट्री के साथसाथ उन के द्वारा कत्ल के वक्त और उस के बाद बनाए गए वीडियो के सबूत पर्याप्त हैं.

कन्हैयालाल मर्डर केस : क्रूरता की कहानी, हरकत तालिबानी – भाग 1

भाजपा से निष्कासित पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मोहम्मद को ले कर की गई टिप्पणी को ले कर उपजा विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा. धर्म विशेष के लोगों ने जितने क्रूर तरीके से उदयपुर में कन्हैयालाल और अमरावती में उमेश प्रह्लादराव कोल्हे की हत्या की है, इस से यही लग रहा है कि उन के अंदर नफरत की आग किस तरह दहक रही है.

इन घटनाओं की गूंज देश से ले कर विदेश तक में सुनी गई. दोनों जघन्य हत्याकांड का कनेक्शन, आतंकी संगठन के साथसाथ हिंदूमुसलिम समाज, राजनीतिक गलियारे और धर्म की रोटियां सेंकने वाले धर्मांधों तक से जुड़ गया.

सामान्य दिनों की तरह ही मंगलवार 28 जून, 2022 का दिन भी था, किंतु कन्हैयालाल साहू ने 6 दिनों से बंद अपनी टेलरिंग की दुकान खोली थी. मुसलिम बहुल इलाका भूतमहल (मालदास स्ट्रीट) के पास ‘सुप्रीम टेलर्स’ नाम से उस की दुकान थी. जबकि वह उदयपुर के गोवर्धन विलास इलाके में रहता था. उस की दुकान में और दूसरे कारीगर गिरीश शर्मा और राजकुमार भी काम करते थे. उस दिन वे भी दुकान पर आ कर अपनेअपने काम में जुट गए गए थे.

उस रोज कन्हैया अपनी दुकान के अगले हिस्से में कपड़ों की कटिंग का काम कर रहा था. शाम के करीब 3 बजे थे. गिरीश शर्मा दुकान के भीतरी हिस्से में सिलाई के काम में लगा हुआ था. वह पिछले 10 सालों से उस की दुकान में काम कर रहा था. उस के साथ दूसरा कारीगर राजकुमार भी सिलाई कर रहा था.

वैसे वे वहां से बाहर से आनेजाने वालों को देख सकते थे. उस दिन 2 मुसलिम युवक दुकान पर आए. उन में एक कन्हैयालाल से बोला, ‘‘मास्टरजी, झब्बा वाला पायजामा सिल दोगे क्या?’’

‘‘हांहां भई क्यों नहीं, बिलकुल सिलेंगे.’’ कन्हैयालाल ने पेशेवराना अंदाज कहा.

‘‘अच्छे वाले कपड़े आप के पास होंगे न?’’ वह युवक बोला.

‘‘हां है न, अभी दिखाता हूं.’’ कहते हुए कन्हैयालाल सामने रैक पर रखे कपड़े की थान निकालने लगा.

तभी साथ आया दूसरा युवक बोल पड़ा, ‘‘अरे इस में देखना क्या है, जो पायजामे के लायक तुम्हें अच्छा लगे उसी को निकाल दो. और हां, मेरा कुरता भी टाइट करवाना है. बहुत ढीला है.’’

‘‘क्यों नहीं भाई. यह सफेद वाला गरमी के लिए अच्छा रहेगा.‘‘ कन्हैयालाल बोला.

‘‘ठीक है, मैं उधर आ जाता हूं, मेरा नाप ले लो.’’ पायजामा सिलवाने वाला युवक बोला.

कन्हैयालाल ने उस के पायजामे की नाप लेने के लिए गरदन में लटका फीता निकाल लिया. तभी उस युवक के साथ आए दूसरे युवक ने अपने मोबाइल से दोनों की वीडियो बनानी शुरू कर दी.

‘‘ठीक से वीडियो बनइयो गौस! यूट्यूब पर डालनी है. इन भाईजान की दुकान वायरल करनी है, ताकि ग्राहकों की लाइन लग जाए.’’ युवक बोला.

‘‘भाई रियाज, देखना एकदम झक्कास वीडियो बनाऊंगा. तभी तो पब्लिक जानेगी झब्बेवाले पायजामे की नाप कैसे ली जाती है… और पायजामा कैसे सिला जाता है…’’ हाथ में मोबाइल लिए हुए गौस बोला.

कन्हैयालाल जैसे ही नाप लेने के लिए नीचे की ओर झुका वैसे ही रियाज ने अपनी कमर में छिपा कर लाए तेजधार और चौड़े फन का चाकू निकाल उस की गरदन से सटा दिया और डपटते हुए गाली के साथ बोला, ‘‘रुक साले! हम ने क्या कहा था तेरा सिर धड़ से अलग कर दूंगा. यह ले और कर उस… (भद्दी गालियां) का समर्थन…साले हरामी की औलाद, हमारे धर्म को भलाबुरा कहता है… मादर…(गालियों की बौछार)’’

कन्हैयालाल अचानक गरदन से सटे चाकू को देख कर समझ गया कि जिस का उसे डर था वही हुआ. मुंह से चीख निकल गई. टेबल पर से कैंची गिरने और स्टूल लुढ़कने की आवाज और चीख सुन कर कारीगर राजकुमार तेजी से सिलाई का काम छोड़ कन्हैयालाल की तरफ भागा.

तब तक उस युवक ने कन्हैयालाल की गरदन रेत डाली थी. वह लहूलुहान हो गया था. वहीं जमीन पर गिर पड़ा था. इस के बाद भी उस ने चाकू से कन्हैया पर कई वार किए. राजकुमार ने बीचबचाव किया किंतु रियाज ने उस पर भी कातिलाना हमला कर दिया. वह भी घायल हो गया और अपना बचाव करता हुआ दुकान से बाहर आ गया. बाहर निकल कर ‘बचाओ बचाओ’ चिल्लाने लगा.

तब तक कन्हैयालाल की हत्या की जा चुकी थी. उस का रक्तरंजित शरीर जमीन पर गिर गया था. उस की घटनास्थल पर ही मौत हो गई. यह जघन्य हत्याकांड उदयपुर के धनमंडी थानाक्षेत्र में हुआ.

कन्हैयालाल की हत्या की खबर जल्द ही बाजार में फैल गई और डर की वजह से लोगों ने दुकानें बंद कर दीं.

हत्या के बाद दोनों मुसलिम युवक मोटरसाइकिल से फरार हो गए. कुछ समय बाद ही कन्हैयालाल हत्याकांड का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. वीडियो में दोनों युवकों को साफसाफ देखा और पहचाना जा सकता है.

हत्यारों ने इस जघन्य वारदात का वीडियो एक घोषणा के साथ वायरल किया था. वीडियो के अनुसार कन्हैयालाल पर आधा दरजन से अधिक वार कर दिए थे. वहीं हत्यारों ने उस की गरदन रेत दी थी. वीडियो में दोनों हाथों में छुरे ले कर अपना जुर्म कुबूल करते दिखे.

वीडियो में हत्यारे हथियार पर खून और चेहरे पर हंसी के साथ दिख रहे थे. जिस में वे कहते हैं, ‘मैं मोहम्मद रियाज अंसारी और ये हमारे गौस मोहम्मद भाई, उदयपुर के अंदर जो माता स्टेट वाला है उस का सिर कलम कर दिया है.’ आगे मजहबी नारा लगाते हुए कहता है, ‘हम जिएंगे आप के लिए और मरेंगे आप के लिए.’

हत्याकांड के बाद दोनों ने एक और वीडियो बनाया. उसे भी सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया. जिस में उन्होंने टेलर कन्हैयालाल की हत्या को कुबूल कर लिया. वीडियो में उन्होंने यह भी दावा किया कि यह हत्या बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद पर की गई गलत टिप्पणी का बदला है.

यही नहीं, हमलावर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गरदन काटने और नूपुर शर्मा को धमकी देते हुए कहता है, ‘ये नरेंद्र मोदी सुन ले, आग तूने लगाई है और बुझाएंगे हम. इंशाअल्लाह मैं रब से दुआ करता हूं कि यह छुरा तेरी गरदन तक भी जरूर पहुंचेगा और उस ‘कुतिया’ तक भी पहुंचेगा. उदयपुर वालो, नारा लगाओ गुस्ताखे नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा… दुआओं में याद रखना.’

उदयपुर पुलिस तत्पर तब हुई, जब हत्याकांड का वीडियो मीडिया में वायरल हो गई. जबकि पुलिस की डायरी में कन्हैयालाल को मिली धमकियों की शिकायतें पहले से ही दर्ज थीं.

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट कर कन्हैयालाल की जघन्य हत्या की भर्त्सना की, साथ ही इस घटना में शामिल सभी अपराधियों के खिलाफ कठोर काररवाई करने का आश्वासन दिया. उन्होंने दूसरे ट्वीट में एक अपील भी की कि इस घटना का वीडियो शेयर कर माहौल खराब करने का प्रयास न करें. उन का कहना था कि वीडियो शेयर करने से अपराधी का समाज में घृणा फैलाने का उद्देश्य सफल होगा.

कन्हैयालाल की हत्या के बाद लोगों में आक्रोश भर गया. हिंदू संगठनों के अलावा अन्य लोग भी सड़कों पर उतर आए. वे हत्यारों को फांसी देने की मांग कर रहे थे. भीड़ को देख कर प्रशासन के भी हाथपैर फूल गए. पुलिस ने पूरे क्षेत्र में धारा 144 लगा दी और इंटरनेट सेवा भी बंद करा दी ताकि लोग भड़काऊ सामग्री का प्रचार न कर सकें.

प्रदेश के हालात को देखते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की. उन्होंने 29 जून की शाम को ही एक सर्वदलीय बैठक बुलाई, लेकिन उस बैठक में भारतीय जनता पार्टी का कोई बड़ा नेता नहीं पहुंचा. बैठक में सभी ने इस मामले की जांच एनआईए से कराने पर सहमति जताई.

दोनों हत्यारों के फोटो मीडिया में प्रचारित हो चुके थे, इसलिए पूरे राजस्थान की पुलिस अलर्ट हो गई थी. हत्यारों को दबोचने में राजसमंद के 2 जांबाज युवकों शक्ति सिंह और प्रह्लाद सिंह चूड़ावत की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही. राजसमंद पुलिस को सूचना मिली कि दोनों आरोपी बाइक से भीलवाड़ा-देवगढ़ इलाके की तरफ गए हैं. चालीस मील नाम से प्रसिद्ध इस मार्ग पर न तो सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और न ही यहां पुलिस थाना या चौकी है.

ऐसे में भीम थाने के कांस्टेबल बाबूसिंह ने अपने जानकार शक्ति सिंह को फोन किया. शक्ति सिंह और प्रह्लाद कई मामलों में पुलिस की पहले भी मदद करते रहे हैं. बाबूसिंह ने बता दिया कि हत्यारे 2611 नंबर की बाइक पर हैं.

इस के बाद दोनों दोस्तों ने सूरजपुरा बसअड्डे पहुंच कर नजर रखनी शुरू कर दी. जैसे ही उक्त नंबर की बाइक पर 2 युवक आते दिखाई दिए, उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस ने उन से कहा कि हम अभी दूर हैं, तुम उन पर नजर रखो.