ठगी का नया मामला : 11 हजार जमा करो और हर महीने 4 हजार पाओ

इंसान की एक सब से बड़ी कमजोरी होती है लालच. कुछ लोग इंसान की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर उस की गाढ़ी कमाई इस तरह लूट लेते हैं कि उसे अपने लुटने का पता तब चलता है, जब वह स्वयं अपने हाथों से उसे अपना सब कुछ सौंप चुका होता है. दिल्ली के पीतमपुरा के रहने वाले रामवीर शर्मा की आटोपार्ट्स बनाने की फैक्ट्री थी. विभिन्न आटो कंपनियों के और्डर पर वह आटोपार्ट्स बना कर सप्लाई करते थे. काम अच्छा चल रहा था, इसलिए उन्हें किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी. सन 1988 से उन की यह फैक्ट्री मध्य दिल्ली के झंडेवालान में चल रही थी.

काम बढ़ने लगा तो उन्होंने और मशीनें लगाने की सोची. लेकिन फैक्ट्री की जो जगह थी, उस में और मशीनें नहीं लग सकती थीं. वह फैक्ट्री लगाने के लिए जगह की तलाश करने लगे. उन्हें हरियाणा के राई में एक बढि़या प्लौट मिल गया तो उसे खरीद कर उन्होंने झंडेवालान वाली फैक्ट्री को वहीं शिफ्ट कर दिया. अब फैक्ट्री में पहले से ज्यादा मशीनें लग गई थीं, इसलिए पहले से ज्यादा काम भी हो गया और आमदनी भी बढ़ गई. चूंकि वह और्डर का माल समय से पहले तैयार करा कर पहुंचा देते थे, इसलिए इस क्षेत्र में उन की अच्छीखासी साख बनी थी. इसी का नतीजा था कि उन्हें जरमन की एक आटो कंपनी का और्डर मिल गया. विदेशी कौन्ट्रैक्ट मिलने के बाद वह फूले नहीं समा रहे थे, क्योंकि पार्ट्स तैयार करने के लिए उन्हें अच्छे पैसे मिल रहे थे.

वह विदेशी आटो कंपनी के पार्ट्स तैयार कराने लगे. उस विदेशी कंपनी के साथ कुछ दिनों तो उन का तालमेल ठीक चला, लेकिन सन 2006-07 के दौरान उन्हें गर्दिश ने ऐसा घेरा कि वह उबर न सके. दरअसल वह जिस जरमन कंपनी के लिए आटोपार्ट्स तैयार करा रहे थे, किसी वजह से उस कंपनी ने तैयार माल लेने से मना कर दिया. उस माल को तैयार कराने में वह मोटी रकम खर्च कर चुके थे. जिस की वजह से उन्हें मोटा घाटा उठाना पड़ा. इंडिया की जिस आटो कंपनी के पार्ट्स वह तैयार करते थे, वह काम जरमन कंपनी से कौन्ट्रैक्ट होने के बाद उन्होंने बंद कर दिया था. काफी कोशिशों के बाद भी उन्हें इंडिया की भी किसी कंपनी से कोई और्डर नहीं मिल रहा था.

उन की आमदनी बंद हो चुकी थी, जबकि फैक्ट्री के कर्मचारियों के वेतन से ले कर अन्य मदों पर होने वाले खर्च जारी थे. इस के अलावा रामवीर शर्मा के अपने और घर के खर्च भी थे. वह सोचसोच कर परेशान हो रहे थे कि फैक्ट्री फिर से कैसे चले. एक समय ऐसा आया कि रामवीर शर्मा को फैक्ट्री बंद करनी पड़ गई. फैक्ट्री बंद होने के बाद वह कोई दूसरा काम करने की कोशिश करने लगे. उसी बीच उन की मुलाकात अनिल खत्री से हुई, जो पीतमपुरा के ही डी ब्लौक में रहता था. अनिल खत्री ने उन्हें स्पीक एशिया नाम की कंपनी के बारे में बताया. उस ने बताया कि स्पीक एशिया एक कंपनी है, जिस में 11 हजार रुपए जमा करने 4 हजार रुपए हर महीने एक साल तक मिलते रहेंगे.

11 हजार लगा कर एक साल तक 4 हजार रुपए महीने यानी साल भर में करीब 50 हजार रुपए कमाने की बात सुन कर रामवीर के कान खड़े हो गए. उन्हें स्कीम के बारे में जानने की उत्सुकता हुई. उन्होंने अनिल खत्री से इस स्कीम के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘स्पीक एशिया एक औनलाइन कंपनी है. इस में 11 हजार रुपए जमा करने पर कंपनी एक लौग इन आईडी और पासवर्ड देती है. उस आईडी पर कंपनी हर सप्ताह एक सर्वे भेजती है. वह सर्वे औनलाइन ही 5 मिनट में भर जाता है. सर्वे पूरा होने पर कंपनी एक हजार रुपए आप के एकाउंट में भेज देगी. इस तरह कंपनी एक साल में 52 सर्वे भेजेगी, जिन्हें भरने पर 52 हजार रुपए मिलेंगे.’’

इस इनकम के बारे में सुन कर रामवीर शर्मा को लालच आ गया. इतनी इनकम तो उन्हें अपनी आटोपार्ट्स की फैक्ट्री से भी नहीं होती थी. उन्हें स्कीम तो अच्छी लगी, लेकिन उन के मन में एक दुविधा थी कि पता नहीं जो इनकम अनिल बता रहे हैं, वह आती भी है या नहीं? उन्होंने अपनी संशय अनिल खत्री से बताई तो उस ने अपनी बैंक की पासबुक और स्टेटमेंट दिखाते हुए कहा, ‘‘शर्माजी, यहां कुछ भी गलत नहीं है. सब कुछ औनलाइन है. आप खुद ही देख लीजिए कि मैं अब तक इस कंपनी से कितना कमा चुका हूं.’’

वास्तव में अनिल खत्री के एकाउंट में सिंगापुर की एक बैंक से लाखों रुपए भेजने का रिकौर्ड था. बैंक पासबुक देखने के बाद रामवीर शर्मा को विश्वास हो गया कि कंपनी सर्वे के पैसे भेजती है. रामवीर शर्मा की बौडी लैंग्वेज देख कर अनिल खत्री ने कहा, ‘‘शर्माजी सोचनाविचारना बंद करो और जल्द ही काम चालू कर दो. आप अपनी क्षमता के मुताबिक जितनी आईडी चाहो, ले सकते हो. जितनी आईडी लोगे, उतना ज्यादा कमाओगे. सर्वे की एक दूसरी इनकम भी है, वह है जौइनिंग की. अपनी आईडी के नीचे तुम जितने नए लोगों को जोड़ोगे, हजार रुपए प्रति जौइनिंग मिलेगा.’’

रामवीर शर्मा अनिल खत्री को पहले से जानते ही थे, इसलिए उन्हें उस की बातों पर भरोसा हो गया. उन्होंने अनिल के माध्यम से 33 हजार रुपए जमा करा दिए. पैसे जमा करने के बाद रामवीर शर्मा को 3 लौग इन आईडी और पासवर्ड मिल गए. फिर उन की आईडी पर भी सर्वे आने शुरू हो गए. वह जल्दी से सर्वे भर कर खुश होते कि 11 हफ्ते में उन के द्वारा जमा कराए गए पैसे वापस आ जाएंगे. उस के बाद उन की कमाई ही कमाई है. रामवीर शर्मा के एकाउंट में सर्वे के पैसे आने लगे तो उन्हें तसल्ली हो गई. अनिल खत्री के कहने पर उन्होंने कई और आईडी ले लीं. अनिल खत्री उन्हें कंपनी की ओर से आयोजित किए जाने वाले सेमिनारों में भी ले जाने लगा. वहां पर वह उन की बड़ेबड़े लीडरों से मुलाकात भी कराता.

सन 2011 में कंपनी ने गोवा में एक सेमिनार का आयोजन किया. उस सेमिनार में हिंदुस्तान की तमाम बड़ी प्रोडक्ट बेस कंपनियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. उस सेमिनार के बाद कंपनी से जुड़े पेनलिस्टों में उत्साह भर गया. इस के बाद कंपनी की ओर से दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में एक बड़े सेमिनार का आयोजन किया गया. उस सेमिनार में कंपनी के शीर्ष लीडर मनोज कुमार शर्मा, रामनिवास पाल, रामसुमिरन पाल आदि आए. उन्होंने सेमिनार में आए लोगों को कंपनी की उन्नति और खुशहाली के बारे में बताया. चूंकि अनिल खत्री की गिनती दिल्ली में कंपनी के सीनियर लीडर के रूप में होती थी, इसलिए सेमिनार में आए अधिकांश लीडर उसे व्यक्तिगत रूप से जानते थे. वह सेमिनार इतना बड़ा था कि वहां पेनलिस्टों के बैठने के लिए सीटें भी कम पड़ गई थीं. इस सेमिनार से पेनलिस्टों में और जोश भर गया था.

अनिल खत्री रामवीर शर्मा की हैसियत के बारे में अच्छी तरह से जानता था, इसलिए सेमिनार खत्म होने के बाद उस ने रामवीर शर्मा की मुलाकात मनोज कुमार शर्मा, रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल से कराई. इन सभी लीडरों ने उन्हें और ज्यादा पैसे लगा कर और ज्यादा कमाने को कहा. पहले से ली गई आईडी पर रामवीर शर्मा के पैसे आ ही रहे थे, इसलिए उन की बातों में फंस कर उन्हें भी लालच आ गया और सोचा कि अगर वह मोटी रकम लगा देते हैं तो आमदनी और ज्यादा हो सकती है. रामवीर शर्मा ने अपनी सारी जमापूंजी, पत्नी के गहने बेच कर और अपने जानकारों से पैसे उधार ले कर करीब 25 लाख रुपए इकट्ठा कर के स्पीक एशिया कंपनी में लगा दिए. इतनी बड़ी रकम लगाने के बाद उन की आमदनी भी मोटी होने लगी.

तभी अचानक उन्हें मीडिया द्वारा जानकारी मिली कि स्पीक एशिया कंपनी लोगों का पैसा ले कर भाग गई है. यह सुनते ही वह सन्न रह गए. उन के अलावा जिन लोगों ने इस कंपनी में मोटी रकम लगाई थी, यह खबर सुन कर वे भी परेशान हो गए. सभी अपनेअपने सीनियर्स को फोन कर के मामले की सच्चाई जानने लगे. रामवीर शर्मा ने भी इस बारे में अनिल खत्री से बात की तो उस ने कहा कि ये सब विरोधियों द्वारा फैलाई जा रही अफवाहें हैं. इन पर ध्यान मत दो और अपना काम करते रहो. रामवीर शर्मा को अनिल खत्री ने समझा तो दिया, लेकिन उन के मन में संशय बना रहा. उन्हें अनिल की बात पर विश्वास नहीं हुआ. वह सर्वे भरते रहे, लेकिन वह तब हैरान रह गए, जब 18 मई, 2011 से सर्वे के पैसे उन के खाते में आने बंद हो गए.

उन्होंने अनिल खत्री से फिर संपर्क किया. उस ने एक बार फिर उन्हें समझाया कि कंपनी की वेबसाइट पर कुछ काम चल रहा है, जिस की वजह से यह प्रौब्लम आ रही है. उस ने कहा कि इतनी बड़ी कंपनी है और उस से लाखों लोग जुड़े हैं, इस तरह कंपनी एकदम से थोड़े ही बंद हो जाएगी. अब तक मीडिया से स्पीक एशिया द्वारा लोगों को ठगे जाने की खबरें लगातार आने लगी थीं. जून, 2011 में मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा और पाईघुनी थाने में कंपनी के संचालकों, अधिकारियों, लीडरों आदि के खिलाफ भांदंवि की धारा 406/34/120 बी के अलावा प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम (बैनिंग) एक्ट-1978 के सैक्शन 3, 4, 5, 6 के तहत मामला दर्ज हुआ तो कंपनी से जुड़े पेनलिस्टों में खलबली मच गई.

सब से ज्यादा वे पेनलिस्ट परेशान होने लगे, जिन्होंने कंपनी ने मोटी रकम लगा रखी थी और उन की वह रकम लौटी नहीं थी. रामवीर शर्मा अनिल खत्री के यहां पहुंचे तो उस ने बातें बना कर उन्हें टाल दिया. इस के बाद तो कंपनी के खिलाफ मुंबई, हैदराबाद, छत्तीसगढ़, रायगढ़, लखनऊ, गाजियाबाद, जैसे तमाम शहरों के अनेक थानों में कंपनी के संचालकों, अधिकारियों, लीडरों आदि के खिलाफ मामले दर्ज होने लगे. इस के बाद तो पुलिस स्पीक एशिया से जुड़े बड़े अधिकारियों, एजेंटों आदि की सरगर्मी से तलाश करने लगी. मुंबई में इस मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा कर रही थी तो छत्तीसगढ़ में स्पेशल इनवैस्टीगैशन सेल अभियुक्तों की तलाश में थी.

आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और स्पीक एशिया के बड़े लीडर रवि जनकराज खन्ना, शेख रईस लतीफ, राजीव मनमोहन मल्होत्रा, राहुल पन्नालाल शाह गिरफ्तार कर लिए गए. इन सभी से पूछताछ के बाद पुलिस ने स्पीक एशिया के सीईओ (इंडिया) तारक विमलेंदु वाजपेई को गिरफ्तार किया. इस के बाद तो मुंबई में स्पीक एशिया के फ्रेंचाइजी दीपांकर दुलालचंद सरकार, मेलविन रोनाल्ड क्रेस्टो, सौरभ सिंह, सुरेश बी. पधि, तबरेज लतीफ अंसारी, सईद अहमद माजगोंकर भी पुलिस गिरफ्त में आ गए. स्पीक एशिया के चार्टर्ड एकाउंटेंट और वित्त सलाहकार संजीव एस. डनडोना, कंपनी के वेब डिजाइनर और कौन्टेंट राइटर नयन कांतिलाल खंदोर, गुजरात और महाराष्ट्र के रीजनल मैनेजर आशीष विजय डंडेकर एवं अभिषेक एस. कुलश्रेष्ठ भी पुलिस से बच न सके.

पुलिस ने कंपनी के 200 से अधिक बैंक खाते सीज करा दिए थे, जिन में करीब 142 करोड़ रुपए जमा थे. इस के अलावा यूएई के भी कई बैंकों में कंपनी के खाते होने की जानकारी मिली. पुलिस को यह भी पता चला कि स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े वांछित लोग विदेश भागने की फिराक में हैं, इसलिए उन के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी करा दी. पुलिस को जांच में पता चला चुका था कि स्पीक एशिया कंपनी ने 24 लाख लोगों को झांसा दे कर 2276 करोड़ रुपए कमाए हैं. इस कंपनी की ग्लोबल सीईओ हरेंदर कौर सिंगापुर में बैठ कर काम को अंजाम दे रही थी. भारत में कंपनी के मुख्य कर्ताधर्ता मनोज कुमार शर्मा, रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल थे. ये सभी फरार चल रहे थे.

मुंबई पुलिस इन्हें भी सरगर्मी से तलाशने लगी. पुलिस मुंबई स्थित इन के ठिकानों पर गई तो ये फरार मिले. वहां पर रामनिवास की मर्सिडीज कार मिली, जिसे पुलिस ने बरामद कर लिया. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को गंभीरता लेते हुए कहा कि स्पीक एशिया कंपनी ने जिन लोगों के पैसे लिए हैं, वह उन्हें वापस करे. मुंबई आर्थिक अपराध शाखा को कहीं से सूचना मिली की रामनिवास पाल और उस के साथी दिल्ली या एनसीआर इलाके में हैं. मुंबई पुलिस कमिश्नर ने यह जानकारी दिल्ली पुलिस कमिश्नर से शेयर की और उन की गिरफ्तारी में सहयोग करने की मांग की. चर्चित और खास तरह के मामलों में अलगअलग शहरों की पुलिस संबंधित शहरों की पुलिस से जानकारी शेयर कर के अभियुक्तों की गिरफ्तारी में सहयोग करने की अपील करती है. इसी तरह के सहयोग की मांग मुंबई पुलिस ने दिल्ली पुलिस से की थी.

दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने मामला क्राइम ब्रांच को सौंपते हुए काररवाई करने के आदेश दिए. क्राइम ब्रांच के अतिरिक्त आयुक्त रविंद्र यादव ने क्राइम ब्रांच के उपायुक्त कुमार ज्ञानेश की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में स्पैशल औपरेशन स्क्वायड के एसीपी सुरेश कौशिक, इंसपेक्टर अशोक कुमार, संजीव कुमार, सबइंस्पेक्टर अशोक कुमार वेद, वीरेंद्र सिंह, चंदर प्रकाश, विवेक मंडोला, देवेंद्र सिंह, एएसआई जसवंत राठी, हेडकांस्टेबल देवेंद्र कुमार, संजीव कुमार हरविंदर, संजय, रविंदर पाल, कांस्टेबल सुरेंद, जमील, साजिद आदि को शामिल किया गया.

मुंबई पुलिस द्वारा दिए गए इनपुट के आधार पर दिल्ली क्राइम ब्रांच इन की तलाश करने लगी. पुलिस टीम को एक महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली कि रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल सगे भाई हैं. स्पीक एशिया से अरबों रुपए कमाने के बाद इन लोगों ने रीयल एस्टेट में पांव पसारने शुरू कर दिए हैं. इसी सिलसिले में वे अकसर दिल्ली आते रहते हैं. मुंबई पुलिस द्वारा इन की फोटो मिलने के बाद दिल्ली क्राइम ब्रांच ने अपने मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था. इसी बीच पुलिस को मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि रामसुमिरन पाल अपने एक साथी के साथ 25 नवंबर, 2013 की शाम को कनाट प्लेस स्थित रीगल पहुंचेगा. पुलिस टीम रीगल सिनेमा के आसपास बिना वर्दी के खड़ी हो गई.

शाम साढ़े 6 बजे के करीब रीगल सिनेमा के पास स्थित एक दुकान पर 2 शख्स टाई खरीदते हुए दिखे. एसीपी सुरेश कौशिक ने मुंबई पुलिस द्वारा दिए गए फोटो से उन के चेहरों का मिलान किया तो उन में से एक युवक का चेहरा फोटो से मिल रहा था. फिर क्या था, उन्होंने अपनी टीम को इशारा कर दिया. पुलिस टीम ने घेर कर दोनों युवकों को दबोच लिया. दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस औफिस आ गई. दोनों युवकों से पुलिस ने पूछताछ की तो वह पहले तो अपना नाम व पता फरजी बताते रहे, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे उन्हें सच उगलना ही पड़ा. उन में से एक युवक ने अपना नाम रामसुमिरन पाल और दूसरे ने सतीशसोहन पाल बताया. उन्होंने बताया कि वे स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े थे. रामसुमिरन पाल उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का रहने वाला था तो सतीशसोहन पाल दिल्ली के नजफगढ़ का.

रामसुमिरन पाल की गिरफ्तारी पर दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम फूली नहीं समा रही थी. क्योंकि वह स्पीक एशिया का भारत में मुख्य कर्ताधर्ता था. काफी कोशिशों के बाद भी मुंबई क्राइम ब्रांच उसे और उस के भाई रामनिवास पाल को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. सतीशसोहन पाल स्पीक एशिया का दिल्ली में मुख्य फें्रचाइजी था. उस ने भी स्पीक एशिया के नाम पर दिल्ली के हजारों लोगों से करोड़ों रुपए ठगे थे. पुलिस ने उन से जरूरी पूछताछ की. चूंकि इन के खिलाफ दिल्ली में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं थी. मुंबई के कई थानों में इन के खिलाफ मामले दर्ज थे, इसलिए इन की गिरफ्तारी की सूचना मुंबई क्राइम ब्रांच को दे दी गई.

इस के बाद दोनों ठगों को सीआरपीसी की धारा 41.1 बी (किसी दूसरे थाने के वांटेड आरोपी को गिरफ्तार करना) के तहत गिरफ्तार कर 26 नवंबर को पटियाला हाउस न्यायालय में ड्यूटी मजिस्ट्रेट पुनीथ पावा के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. रामसुमिरन पाल की गिरफ्तारी की खबर पा कर 27 नवंबर को मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम दिल्ली पहुंची और कोर्ट से दोनों ठगों को मुंबई ले गई. स्पीक एशिया के ठग रामसुमिरन पाल और सतीशसोहन पाल के गिरफ्तार होने की खबर जैसे ही फोटो सहित मीडिया में आई तो रामवीर शर्मा रामसुमिरन पाल को पहचान गए. उन के मन में भी स्पीक एशिया में लगाए गए पैसे पाने की उम्मीद जागी और वह दिल्ली क्राइम ब्रांच के डीसीपी कुमार ज्ञानेश के पास पहुंच गए.

उन्होंने डीसीपी को अनिल खत्री, मनोज कुमार शर्मा, रामसुमिरन पाल और रामनिवास पाल के उकसावे में आ कर स्पीक एशिया कंपनी में 25 लाख रुपए लगाए जाने की पूरी बात बताई. उन्होंने उक्त चारों ठगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग भी की. रामवीर शर्मा की शिकायत पर क्राइम ब्रांच थाने में उक्त चारों आरोपियों के खिलाफ एफआईआर संख्या 198 पर भादंवि की धारा 420, 406, 120-बी को तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े तमाम लोगों के खिलाफ भले ही देश के विभिन्न थानों में तमाम रिपोर्ट दर्ज थीं, लेकिन दिल्ली में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ था. पहली रिपोर्ट रामवीर शर्मा ने दर्ज कराई. मामला दर्ज होने के बाद दिल्ली क्राइम ब्रांच ने खुद भी इस मामले की जांच करनी शुरू कर दी.

रामसुमिरन पाल और सतीशसोहन पाल से पूछताछ में दिल्ली क्राइम ब्रांच को रामनिवास पाल के बारे में कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिली थीं. रामनिवास पाल वह शख्स था, जो स्पीक एशिया को भारत में लाया था. इतना ही नहीं, स्पीक एशिया के प्लान आदि सब उस के ही तैयार कराए थे. एक तरह से वह कंपनी का मास्टर माइंड था. इस मास्टर माइंड की तलाश के लिए क्राइम ब्रांच की एक टीम बंगलुरू रवाना हो गई. पुलिस को सूचना मिली थी कि वह वहां एक आईटी कंपनी में सलाहकार है. जिस कंपनी में वह काम कर रहा था, पुलिस को उस का पता मिल चुका था.

30 नवंबर, 2013 को दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम बंगलुरू पहुंच गई और व्हाइट फील्ड रोड इलाके से एक शख्स को हिरासत में ले लिया. लेकिन उस ने अपना नाम अभय सिंह चंदेल बताया. बातचीत के दौरान पुलिस को लगा कि अभय सिंह चंदेल नाम का यह शख्स झूठ बोल रहा है, इसलिए पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि वह रामनिवास पाल है और स्पीक एशिया कंपनी से जुड़ा था. बंगलुरू की स्थानीय अदालत में पेश कर के पुलिस ट्रांजिट रिमांड पर उसे दिल्ली ले आई. चूंकि स्पीक एशिया के इस मास्टर माइंड से पुलिस को विस्तार से पूछताछ करनी थी, इसलिए 2 दिसंबर, 2013 को उसे रोहिणी न्यायालय में ड्यूटी एमएम के समक्ष पेश कर के 9 दिसंबर तक का पुलिस रिमांड ले लिया गया.

पुलिस ने रामनिवास पाल से जब पूछताछ की तो स्पीक एशिया से उस के जुड़ने से ले कर ठगी तक की जो दिलचस्प कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. रामनिवास पाल मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के गांव नागरपाल का रहने वाला था. उस के पिता वेदराम एक किसान थे. रामनिवास पाल के अलावा वेदराम के 2 और बेटे थे, रामसुमिरन पाल और रजनीश पाल. रामनिवास पाल बीएससी कर रहा था, तभी उस का सेलेक्शन भारतीय वायु सेवा में एयरमैन (टेक्निकल) के पद पर हो गया था. यह सन 1991 की बात है. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उस की पोस्टिंग जोधपुर (राजस्थान) की हेलिकौप्टर यूनिट में हुई. बाद में उस का तबादला हैदराबाद हो गया. रामनिवास पाल महत्त्वाकांक्षी था. एयरफोर्स में 10 साल नौकरी के बाद वह कोई ऐसा काम करने की सोचने लगा, जिस में उसे मोटी कमाई हो.

इसलिए सन 2001 में अधिकारियों को बिना कोई सूचना दिए घर चला आया. एयरफोर्स ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. बाद में वह एयरफोर्स अधिकारियों के संपर्क में आया तो उसे कोर्टमार्शल के बाद नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. एयरफोर्स की नौकरी छोड़ने के बाद वह 2002 में मुंबई चला गया और बहुराष्ट्रीय बैंकों को सलाह देने के लिए स्मार्ट कनेक्ट नाम की कंपनी बनाई. इस के बाद वह टीवी कलाकार अमर उपाध्याय की कंपनी मिहिर विरानी मल्टी ट्रेड प्रा.लि. में निदेशक के रूप में काम करने लगा. यह कंपनी आयुर्वेदिक उत्पादों की बिक्री करती थी. कंपनी के प्रबंधन से विवाद हो जाने के बाद रामनिवास पाल ने नौकरी छोड़ दी. वहीं उस का संपर्क मनोज कुमार शर्मा से हुआ.

मनोज कुमार शर्मा डाइरेक्ट मार्केटिंग एसोसिएशन का अध्यक्ष था. रामनिवास बातचीत में दूसरों को प्रभावित करने में माहिर था, इसलिए मनोज से उस के अच्छे संबंध बन गए. वह मनोज की सारी कंपनियों का काम देखने लगा. इसी दौरान वह कुछ विदेशी कंपनियों के संपर्क में आया. रामनिवास पाल का छोटा भाई रामसुमिरन पाल मुंबई में ही एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था. उस ने मुंबई से मार्केटिंग में एमबीए किया था. रामनिवास पाल ने रामसुमिरन पाल को भी अपने काम में लगा लिया.

रामनिवास पाल ने मनोज कुमार शर्मा और रामसुमिरन पाल के साथ हालैंड की मैंगो यूनिवर्स, ऐड मैट्रिक्स, इटली की सेविन रिंग्स आदि मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों को भारत में लांच किया. इन कंपनियों में रामनिवास पाल कभी संरक्षक, कभी सलाहकार तो कभी कंपनी की योजनाएं बनाने व विकसित करने वाले की भूमिका में होता था. ये भारत के मध्यमवर्गीय लोगों की मानसिकता को जानते थे, इसलिए इन्होंने सन 2008 में सिंगापुर में रजिस्टर्ड एमएलएम कंपनी स्पीक एशिया को भारत में लांच किया. कंपनी का रजिस्ट्रेशन उन्होंने सिंगापुर, ब्राजील व इटली में भी कराया, लेकिन वहां बिजनेस स्टार्ट नहीं किया. कंपनी के प्लान, पेआउट, सर्वे आदि की रूपरेखा रामनिवास पाल ने ही तैयार की.

उसी ने ही स्पीक एशिया कंपनी के मल्टी लेवल मार्केटिंग स्कीम का डिजाइन तैयार किया. बड़ेबड़े महानगरों में उस ने कंपनी की फ्रैंचाइजी दे दी. 11 हजार रुपए जमा कर के 4 हजार रुपए हर महीने एक साल तक पाने के लालच में बड़ी तेजी से लोग इस से जुड़ने लगे. ज्यादा कमाने के लालच में कुछ लोगों ने कंपनी में लाखों रुपए लगा दिए. कंपनी अपने साथ जुड़ने वाले लोगों को पेनलिस्ट कहती थी. विश्वास जमाने के लिए कंपनी ने पेनलिस्टों के बैंक एकाउंटों में पैसे भी भेजने शुरू कर दिए. फिर क्या था, लोगों का कंपनी के प्रति इतना विश्वास बढ़ा कि कुछ ही दिनों में हिंदुस्तान भर में स्पीक एशिया के लाखों पेनलिस्ट बन गए. कंपनी को पेनलिस्टों से सैकड़ों करोड़ की आमदनी होने लगी.

वे फाइव स्टार होटलों में पेनलिस्टों के साथ मीटिंग करते और अलगअलग शहरों में बड़ेबड़े सेमिनारों में प्रभावशाली स्पीच देते. उन की लाइफस्टाइल और स्पीच से पेनलिस्ट बहुत प्रभावित होते. 2011 के मध्य हिंदुस्तान भर से करीब 24 लाख लोग स्पीक एशिया से जुड़ गए. मास्टर माइंड रामनिवास पाल जानता था कि यदि स्पीक एशिया के कार्यक्रम में फिल्मी कलाकारों को शामिल कर लिया जाए तो लोगों का कंपनी पर विश्वास और बढ़ेगा, जिस से उन की कमाई भी बढ़ेगी. तब उस ने 2011 में गोवा में एक बड़े सेमिनार का आयोजन किया. इस के लिए दिल्ली से गोवा तक एक विशेष टे्रन भी चलवाई. तब उस ने गोवा के ज्यादातर बड़े होटल भी बुक करा लिए थे. कई फिल्मी कलाकारों को भी वहां बुलाया था. बताया जाता है कि कंपनी ने इस सेमिनार के आयोजन पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च किए थे.

गोवा में हुए सेमिनार के बाद स्पीक एशिया कंपनी पर अंगुलियां उठने लगी थीं. अपना विश्वास बनाए रखने और लोगों को आकर्षित करने के लिए कंपनी ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में भी एक बड़े सेमिनार का आयोजन किया था. इस के बाद जून, 2011 में कंपनी से जुड़े लोग अंडरग्राउंड हो गए. यानी स्पीक एशिया कंपनी लोगों के 2276 करोड़ रुपए ले कर छूमंतर हो गई. जिन लोगों ने कंपनी में फरवरी, 2011 के बाद पैसे लगाए थे, वे घाटे में रहे. लोगों ने स्पीक एशिया के संचालकों के खिलाफ विभिन्न थानों में रिपोर्ट लिखानी शुरू कर दी.

मुंबई में इस मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा को सौंपी गई. मुंबई पुलिस संचालकों को खोजने लगी. चूंकि रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल ने इटली की सेवन रिंग्स इंटरनेशनल और हालैंड की ऐड मैट्रिक्स प्रा.लि. कंपनी भी खरीद ली थी, इसलिए इन्होंने स्पीक एशिया द्वारा 900 करोड़ रुपए मनी लांड्रिंग के जरिए सिंगापुर पहुंचा दिए. वहां से वे उस रकम को दुबई, इटली, यूके के जरिए दोबारा कंपनी के खाते में भारत ले आए.

पाल बंधुओं ने स्पीक एशिया की दिल्ली की फ्रेंचाइजी सतीशसोहन पाल को दी थी. सतीशसोहन पाल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट किया था. इस के बाद उस ने विभिन्न इंस्टीट्यूटों में काम करते हुए सन 2007 में मुंबई शिफ्ट हो गया था. वहीं पर वह रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल के संपर्क में आया और उन के साथ मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों में काम करने लगा. जब इन्होंने भारत में स्पीक एशिया कंपनी की शुरुआत की तो सतीशसोहन पाल ने दिल्ली की फ्रेंचाइजी ले ली और लोगों से करोड़ों रुपए इकट्ठे किए. यह पाल बंधुओं का बिजनैस एडवाइजर भी था.

स्पीक एशिया कंपनी के बंद होते ही सतीशसोहन पाल मलेशिया भाग गया था. वहां उस ने वेब एक्सल सौल्युशन कंपनी खरीद कर एमएलएम का बिजनेस शुरू किया. 2012 में अपने परिवार को भी मलेशिया ले गया और क्वालालामपुर में रहने लगा. वहां बैठे हुए भी वह भारत में मौजूद अपने शुभचिंतकों द्वारा पुलिस द्वारा स्पीक एशिया के खिलाफ की जा रही काररवाई के बारे में जानकारी लेता रहा. सन 2012 में पुलिस से बचते हुए रामसुमिरन पाल मलेशिया में सतीश के पास रुका था. सन 2013 में सतीश के परिवार के साथ वह दिल्ली लौट आया. चूंकि मुंबई पुलिस उस के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी कर चुकी थी. इसलिए वह काठमांडू तक प्लेन से आया और वहां से सड़क मार्ग से दिल्ली आया.

रामनिवास पाल और रामसुमिरन पाल ने स्पीक एशिया द्वारा कमाए गए पैसों से मुंबई, शाहजहांपुर, देहरादून आदि शहरों में प्रौपर्टी खरीदी थी. इन्होंने नेपाल और मलेशिया में भी अपने ठिकाने बना रखे थे. रामसुमिरन पाल पुलिस से बचने के लिए अपना हुलिया बदलता रहता था. वह कभी मूंछे रखता था तो कभी सिर मुंडवा लेता था. दाढ़ी बढ़ाने के साथ अचानक ही वह फ्रेंच कट में भी आ जाता था. रामसुमिरन पाल फिलहाल देहरादून में ससुराल पक्ष के लोगों के यहां रह रहा था. दूसरों की गाढ़ी कमाई ठग कर उस ने देहरादून में रीयल एस्टेट कारोबार में लगा दी थी. वहां पर उस के विला और डुप्लेक्स फ्लैट के प्रोजेक्ट चल रहे थे.

रीयल एस्टेट कारोबार के सिलसिले में ही वह दिल्ली आता रहता था. दिल्ली में वह एक फाइवस्टार होटल बनवाने के लिए जगह तलाश रहा था. 25 नवंबर, 2013 को भी वह सतीशसोहन पाल के साथ कनाट प्लेस दिल्ली आया था. उन्हें क्या पता था कि दिल्ली पुलिस भी उस के पीछे लगी है. इसी वजह से वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. रामनिवास पाल पुलिस से बचता हुआ बंगलुरू भाग गया. उस ने अपने परिजनों से फोन पर बात तक करनी बंद कर दी थी. वह व्हाइट फील्ड रोड इलाके में हुलिया और नाम बदल कर रह रहा था. वहां की एक आईटी कंपनी में वह सलाहकार के रूप पर काम कर रहा था. इस के अलावा वह मलेशिया की एक आईटी कंपनी के जरिए विभिन्न वेबसाइटों पर औनलाइन विज्ञापनों की लोकप्रियता प्रमाणपत्र वितरण संबंधी अपना बिजनेस प्लान तैयार कर रहा था.

इस कंपनी के जरिए वह देश भर में दोबारा से ठगी का मायाजाल फैलाना चाह रहा था. इस से पहले कि वह अपने मंसूबे पूरे करता, पुलिस की गिरफ्त में आ गया. रामनिवास पाल से पूछताछ के बाद पुलिस ने मुंबई की एक्सिस बैंक में खुले उस के 3 एकाउंट सीज कर दिए. 9 दिसंबर को उसे पुन: न्यायालय में पेश कर 14 दिसंबर तक का पुलिस रिमांड लिया. दिल्ली क्राइम ब्रांच ने मुंबई पुलिस की कस्टडी में रामसुमिरन पाल, सतीशसोहन पाल को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर फिर से पूछताछ की. स्पीक एशिया कंपनी से जुड़े लोगों के खिलाफ देश भर में अब तक 800 से भी ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं. पुलिस अब तक 17 ठगों को गिरफ्तार कर के 210 बैंक खाते सीज कर चुकी है. 150 के करीब संदिग्ध खातों की जांच की जा रही है. दिल्ली में रामवीर शर्मा द्वारा दर्ज कराए गए मामले के बाद क्राइम ब्रांच में स्पीक एशिया द्वारा ठगे गए लोगों के आने की संख्या बढ़ने लगी है. जिस से दिल्ली में गिरफ्तार होने वालों की संख्या बढ़ सकती है.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

 

 

धर्मभाई निकला कसाई

लोकगायक सुरेंद्र चंचल और जसवंत कौर ने कभी सोचा भी नहीं था कि उन का ड्राइवर मोहिंदर उन्हें हानि पहुंचाने वाला अपराध भी कर सकता है. लेकिन जब जसवंत कौर का यह धर्मभाई अपने असली रूप में आया तो उस ने…

 

लाश का सिर पूर्व की तरफ था, टांगें पश्चिम की ओर. आंखें बंद और मुंह खुला हुआ. दोनों पैर बिस्तर से नीचे लटके थे, जिन में जूती पहनी हुई थी. घटनास्थल को देख कर पहली ही नजर में लग रहा था कि अपराधियों को मृतका जानती थीं. उन्होंने बिस्तर से उठ कर पैरों में जूती पहनने के बाद इत्मीनान से मुख्य दरवाजे तक पहुंच कर कुंडी खोली होगी.

मृतका के सिर पर 2 गहरे घाव थे. खून बह कर बिस्तर पर फैल गया था. गरदन में सलवार का पोंहचा कस कर बंधा हुआ था. बैड पर ही करीब 8 वर्षीया लड़की की लाश भी पूर्व-पश्चिम दिशा में ही पड़ी थी. लाल रंग के ऊनी स्कार्फ से उस के गले पर भी कस कर गांठ बांध दी गई थी.

अंबाला के थाना बलदेवनगर के प्रभारी रामचंदर राठी ने फोन से मिली सूचना पर राजविहार क्षेत्र की उस कोठी में जा कर उक्त दर्दनाक मंजर देखा था. उस वक्त दिन के साढ़े 11 बज रहे थे.

कोठी के भीतरबाहर लोगों का हुजूम था.

‘‘थाने में फोन किस ने किया था?’’ राठी ने लोगों से पूछा.

‘‘जी सर, मैं ने किया था.’’ करीब 45 वर्ष के दिखने वाले एक सिख ने आगे आते हुए कहा.

उस ने खुद को राजविहार के साथ लगते गांव बरनाला पंजोखरा का सरपंच जसमेर सिंह बता कर आगे कहना शुरू किया, ‘‘अभी कुछ देर पहले मैं इधर से गुजर रहा था कि इस कोठी के सामने भीड़ देख कर रुक गया. दरियाफ्त करने पर कोठी में 2 कत्ल हो जाने का पता चला तो अपना फर्ज समझ कर मैं ने थाने में फोन कर दिया.’’

‘‘ठीक है, धन्यवाद. अब आप पुलिस की इतनी मदद करें कि अपनी तहरीर हमें दे दें, जिस पर एफआईआर दर्ज करवा कर हम अपनी काररवाई आगे बढ़ाएं.’’

इस के बाद राठी ने इस कांड की सूचना कंट्रोलरूम के माध्यम से फ्लैश करवा दी.

इधर जसमेर सिंह से तहरीर ले कर एफआईआर दर्ज करने के लिए थाने भिजवाई गई, उधर क्राइम टीम के इंचार्ज कुलविंदर सिंह व डौग स्क्वायड के हैंडलर महिंद्रपाल के अलावा पुलिस फोटोग्राफर महेंद्र सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. इन्होंने अपनी काररवाई शुरू की ही थी कि सीआईए इंसपेक्टर रिसाल सिंह और डीएसपी (मुख्यालय) करण सिंह भी वहां आ गए.

कुछ वक्त में सभी ने अपनी काररवाइयां पूरी कर लीं. प्रशिक्षित डौग मुख्य सड़क पर पहुंच कर रुक जाता था. लिहाजा यही अनुमान लगाया गया कि हत्यारे वारदात को अंजाम दे कर मुख्य सड़क तक पैदल गए होंगे और वहां से किसी वाहन पर सवार हो कर निकल भागे होंगे.

 

सीआरपीसी की धारा 174 के अंतर्गत काररवाई करते हुए दोनों लाशों का पंचनामा तैयार कर शवों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवाने के बाद राठी ने खून सने बिस्तर कपड़े वगैरह कब्जे में लेने की काररवाई की. फिर उपस्थित लोगों की सहायता से घटना के सूत्र जोड़ने शुरू किए.

वह मकान प्रसिद्ध लोकगायक जोड़ी सुरेंद्र सिंह चंचल और जसवंत कौर का था. मरने वाली बच्ची इन की 8 वर्षीया बेटी मनप्रीत कौर उर्फ श्रेया थी. 65 वर्षीया मृतक वृद्धा थीं जसवंत कौर की मां दलजीत कौर. गायक पतिपत्नी अपने ट्रुप के साथ अकसर दौरे पर रहा करते थे. पीछे नानीदोहती इस कोठी में अकेली रहती थीं. गायक जोड़ी उन दिनों भी अमेरिका गई हुई थी.

सिवाय इन चंद बातों के राठी को उस वक्त अन्य कोई जानकारी नहीं मिल पाई. घटनास्थल की काररवाई पूरी कर वह थाने लौट गए. तब तक थाने में सरपंच जसमेर सिंह की तहरीर के आधार पर भादंवि की धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज हो चुकी थी. पहली नजर में यह मामला लूटपाट के लिए हत्या का लग रहा था. मगर घर के किसी सदस्य के वहां मौजूद न होने से इस संबंध में फिलहाल निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता था.

मैं उन दिनों शिमला गया हुआ था. डीएसपी करण सिंह से मुझे इस हत्याकांड की जानकारी मिली तो मैं ने राठी को फोन कर के मामले में तेजी लाने और हत्यारों को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करने संबंधी दिशानिर्देश दिए. उस रोज राठी के लिए शायद इस से आगे बढ़ पाना संभव नहीं था. अलबत्ता अब तक के घटनाक्रम का विस्तृत ब्यौरा देने के साथसाथ वह आगे की काररवाई के बारे में भी मुझे विस्तार से बताता रहा.

इस के अगले दिन उस ने जो कुछ मुझे बताया, उस के अनुसार एक लड़का थाने में उस से मिलने आया था. उस ने अपना नाम रंजीत सिंह बताते हुए राठी से कहा था कि वह पटियाला में रहता है और अपनी बुआ जसवंत कौर व फूफा सुरेंद्र चंचल के साथ गानेबजाने का काम करता है. 2 दिन पहले जब उस के फूफा और बुआ को प्रोग्राम देने अमेरिका जाना था, वह पटियाला से पहले लुधियाना गया था और वहां से ड्राइवर मोहिंदर कुमार को साथ ले कर अंबाला आया था.

 

रंजीत द्वारा राठी को बताए अनुसार, फालतू सामान कोठी के कमरे में रखते समय बुआ ने उस की दादी दलजीत कौर को खर्चे के लिए 50 हजार रुपए नकद दिए थे. इस के बाद वह और मोहिंदर दिल्ली एयरपोर्ट तक के लिए टैक्सी करने अंबाला छावनी चले गए.

जब भी फूफा और बुआ को प्रोग्राम के लिए बाहर जाना होता था तो वह कार घर पर पार्क करवा कर ड्राइवर मोहिंदर को छुट्टी दे देते थे. कभीकभी वह वह कार अपने घर लुधियाना भी ले जाया करता था. उन दिनों वह एक रोज के लिए कार ले कर गया था. रंजीत के जरिए उसे वापस बुलवा लिया गया था.

‘‘कार घर पर पार्क कर के हम लोग टैक्सी से पालम एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए. गाड़ी में टैक्सी ड्राइवर के अलावा मोहिंदर, मैं और बुआ फूफा थे. फ्लाइट का समय होने पर फूफा और बुआ एयरपोर्ट के अंदर चले गए. टैक्सी वाले को भी हम ने फारिग कर दिया था.

फ्लाइट चली जाने पर मैं और मोहिंदर बस से अंबाला के लिए चल पड़े. इस से पहले विदा होते वक्त बुआ ने मोहिंदर और मुझ से कहा था कि हम पहले अंबाला बीबी (दलजीत कौर) के पास जा कर उन की जरूरतों की बाबत पूछे और उस के बाद ही कहीं और जाएं.’’ रंजीत ने राठी को बताया था.

 

उस के आगे बताए अनुसार मोहिंदर ने एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही अपनी मजबूरी जता दी थी कि उसे लुधियाना में जरूरी काम है सो वह अंबाला नहीं जा पाएगा. दिल्ली से हमें लुधियाना के रूट वाली बस मिल गई, जिस पर सवार हो कर रंजीत अंबाला के बलदेवनगर में उतर गया व मोहिंदर उसी बस से लुधियाना चला गया.

उसी शाम करीब 4 बजे दलजीत कौर से मुलाकात करने के बाद रंजीत पटियाला जाने के लिए जब बलदेवनगर स्टापेज से बस पर चढ़ा तो उसे लुधियाना की ओर से आने वाली बस से मोहिंदर उतरते दिखा. उसे देख कर उस के मन में यही बात आई कि वह बीबी से मिलने आया होगा.

मगर इस के अगले दिन उसे किसी से इस हत्याकांड की खबर मिली. उस ने अमेरिका फोन कर के फूफा और बुआ को घटना के बारे में बताया. यह दुखद समाचार सुनते ही फूफा ने उसे तुरंत अंबाला पहुंचने को कहा. साथ ही कहा कि जब तक वे लोग वापस नहीं आ जाते, लाशों का संस्कार न किया जाए.

राठी ने सीआरपीसी की धारा 161 के तहत रंजीत का बयान दर्ज कर लिया.

अगले दिन मैं भी शिमला से लौट आया. मैं ने देखा इस केस को ले कर अंबाला पुलिस की काफी किरकिरी हो रही थी. मेरे अंबाला पहुंचते ही अखबार वालों ने मुझे घेर लिया. वाकई यह केस हमारे लिए चुनौती बना हुआ था. उसी रोज मैं ने पुलिस की इमरजेंसी मीटिंग बुलाई. इस मीटिंग में जो अंतिम निष्कर्ष निकला, वह यही था कि किसी भी तरह मोहिंदर को राउंडअप कर के उस से पूछताछ की जाए.

मगर उस का पता किसी को मालूम नहीं था. रंजीत ने हमें उस के लुधियानावासी होने की जानकारी दी थी. फिर वह हमें वहां के एक घर में ले भी गया था, लेकिन मालूम पड़ा कि 2 दिन पहले वह यहां का अपना किराए का कमरा खाली कर के चला गया था. कहां गया था, इस की किसी को खबर नहीं थी. न ही किसी को उस के मुस्तकिल पते की जानकारी थी.

 

हमें लगा कि उस का पक्का पता सुरेंद्र चंचल अथवा जसवंत कौर के पास जरूर होगा. अब उन से फोन पर भी संपर्क नहीं हो पा रहा था. वे इंडिया के लिए निकल चुके थे. मोबाइल फोंस की तब तक शुरुआत नहीं हुई थी.

खैर, उसी दिन गायक दंपति अंबाला पहुंच गए. सब से पहले उन्होंने मुझ से ही संपर्क किया. मैं ने थाने में इन के भी 161 के बयान दर्ज करवा दिए.

ये लोग मूलरूप से लुधियाना के गोपालनगर के रहने वाले थे. अंबाला में उन का हवेलीनुमा मकान था. मगर आतंकवाद के दिनों में इन लोगों ने अंबाला के बलदेवनगर में अपना मकान बनवा लिया था.

दोनों व्यावसायिक सिंगर थे. प्रोग्राम देने के लिए उन्हें अकसर घर से बाहर जाना पड़ता था. इस के लिए उन्होंने अंबेसडर कार रखी हुई थी, जिसे मोहिंदर कुमार पुत्र मनोहरलाल निवासी गोराया, जालंधर चलाया करता था. इन दिनों वह लुधियाना में रहता था, जहां उस की पत्नी किसी फैक्ट्री में नौकरी करती थी.

 

गायक जोड़ी को जब प्रोग्राम देने विदेश जाना होता था, कार अंबाला वाले घर में पार्क कर दी जाती थी. किसी को भी यह कार चलाने की मनाही होती थी. इन दिनों मोहिंदर अपने परिवार के साथ लुधियाना चला जाया करता था. इस बार भी ऐसा ही हुआ था.

पिता के देहांत के बाद परिवार में होने वाले संपत्ति विवाद से परेशान हो कर पिछले कुछ समय से जसवंत कौर अपनी मां को अपने साथ रखे हुए थीं. उन की एकलौती बेटी स्थानीय कौनवेंट स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ती थी.

अपने बयान दर्ज करवाने के बाद गायक दंपति ने घर पहुंच कर चोरी गए सामान की सूची तैयार की. नकदी और गहने वगैरह मिला कर यह भारीभरकम चोरी का मामला था. हालांकि इन लोगों को इस नुकसान की बजाए परिवार के 2 सदस्यों के कत्ल हो जाने का गहरा सदमा था. वे यही गुहार लगाए हुए थे कि कातिलों को जल्दी से जल्दी पकड़ा जाए.

 

मैं ने मामले में रुचि लेते हुए उन लोगों को अपने औफिस में बुलवा कर हत्याकांड में किसी पर शक होने की बाबत पूछा. उन्होंने स्पष्ट रूप से तो कुछ नहीं कहा, अलबत्ता उन की बातों से यह जरूर लगा कि उन्हें मोहिंदर पर शक था. हमारे शक की सुई पहले ही उस तरफ जा रही थी. लिहाजा उन्हें साथ ले कर एक पुलिस पार्टी लुधियाना के अलावा कुछ अन्य जगहों पर भी भेजी गई, लेकिन मोहिंदर पुलिस के हत्थे न चढ़ा.

इस तरह 5 दिनों का समय और निकल गया, मगर हम लोग उसे पकड़ पाने में नाकाम रहे.

उन दिनों इस केस को ले कर यह चर्चा भी जोरों पर थी कि पंजाब के डीजीपी के.पी.एस. गिल के औपरेशन हीलिंग टच में इस गायक दंपति ने गिल के कंधे से कंधा मिला कर गांवगांव में जा कर अपनी कला बिखेरते हुए उन्हें अपना सहयोग दिया था. इस वजह से वे लोग भी आतंकवादियों की निगाहों में आ गए थे. हो सकता है कि उन के घर पर बरपा कहर आतंकवादियों की ही देन हो.

मगर हम लोग इसे आतंकी वारदात कतई नहीं मान रहे थे, इसलिए इस दिशा में हम ने कदम बढ़ाए ही नहीं. हम अपने पहले वाले प्रयासों से ही जुडे़ रहे.

हमारे प्रयास रंग लाए. आखिर हम ने लुधियाना के शिमलापुरी इलाके से मुखबिरी के आधार पर मोहिंदर को पकड़ लिया. उस ने छूटते ही कहा, ‘‘मेरी बहन बनी हुई है जसवंत कौर, मुझे पिछले कई सालों से राखी बांधती आ रही है. घर के सब लोग मुझ पर पूरा विश्वास करते थे. बीबी और श्रेया का कत्ल होने की बात मुझे अब आप लोगों से मालूम पड़ रही है.’’

मगर जब उसे अंबाला ला कर कस्टडी रिमांड में ले कर पूछताछ शुरू की गई तो उसे टूटते देर नहीं लगी. दोनों हत्याओं का अपराध कबूल करते हुए उस ने बताया कि लूटे गए रुपए व जेवरात उस की बीवी किरनबाला के पास थे. इस पर किरन को भी लुधियाना के एक घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे भी अदालत पर पेश कर के कस्टडी रिमांड हासिल करने के बाद हम ने पतिपत्नी से व्यापक पूछताछ की.

इस पूछताछ में जो कुछ उन्होंने हमें बताया, उस से इस डबल मर्डर के पीछे की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

 

किरनबाला की शादी लुधियाना के गांव अमरोली निवासी धर्मपाल के साथ हुई थी, जिस की 8 महीने बाद सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. इस के कुछ समय बाद ही किरन ने एक बेटे को जन्म दिया. इसे ले कर विधवा के रूप में वह अपने पिता के साथ लुधियाना में जा कर रहने लगी.

कुछ अरसा बाद पिता ने उस की शादी मोहिंदर कुमार से कर दी. गायक जोड़ी उन दिनों लुधियाना में ही रह रही थी, जिन के यहां मोहिंदर नौकरी करता था. मोहिंदर भले ही कार ड्राइवर था, लेकिन मालकिन जसवंत कौर ने उसे अपना धर्मभाई बना लिया था.

इस सिलसिले में मोहिंदर ने हमें बताया था कि धर्मभाई तो वह बन गया था, मगर जसवंत कौर ने धर्मभाई के नाम पर कम पैसों में ज्यादा काम लेने का सिलसिला बना लिया था. वह उसे कई बार अपने प्रोग्रामों में भी ले जाया करती थी, जहां इन लोगों के साथ पूरी रात जागने पर उसे 50 रुपए मिला करते थे.

किरनबाला के पास पहले से लड़का था, मोहिंदर से शादी के बाद 2 लड़कियां और हो गईं. हालांकि मियांबीवी दोनों कमाते थे तो भी इतनी कमाई न थी कि घर की गुजर सलीके से हो पाती. बकौल मोहिंदर उस की मालकिन के पास खूब पैसा था, लुटाती भी दोनों हाथों से थी मगर अपने व अपने परिवार पर. उस ने उन लोगों की समस्या को समझने का कभी प्रयास नहीं किया था. बस धर्मभाई कह कर ही अपना उल्लू साधती रहती थी.

मोहिंदर के बताए अनुसार, विदेश जाते वक्त महज कुछ दिनों के गुजारे के लिए जसवंत कौर ने अपनी मां के हाथ पर नोटों की गड्डियां रख दी थीं, जबकि उस से केवल यह बोला गया था कि धर्मभाई होने के नाते उसे उस की मां का पूरा ध्यान रखना होगा, भले ही उसे लुधियाना से कितनी बार भी अंबाला आना पड़े. इस के लिए जसवंत ने उसे 500 रुपए दिए थे.

बकौल मोहिंदर दिल्ली से लौटने के बाद वह पसोपेश में था. जसवंत कौर पर उसे गुस्सा था, साथ ही पैसों की जरूरत भी थी. आखिर एक योजना बना कर वह उस रोज रात के 11 बजे राजविहार वाली कोठी पर जा पहुंचा. हालांकि इस से पहले लुधियाना जा कर वह 4 बजे अंबाला भी आ आया था. मगर इधरउधर घूम कर टाइम पास कर के रात गहराने का इंतजार करता रहा था.

 

खैर, रात में 11 बजे कोठी पर पहुंच कर उस ने घंटी बजाई तो वृद्धा दलजीत कौर ने दरवाजा खोलते हुए उस से पूछा, ‘‘तुम! इतनी रात गए?’’

मोहिंदर ने बस खराब होने का बहाना बना दिया. मोहिंदर द्वारा हमें बताए अनुसार, इस के बाद दलजीत कौर ने उस से भीतर चल कर खाना खा लेने को कहा. इस पर खाना खा चुकने की बात कहते हुए उस ने दलजीत कौर से उस का एक काम कर देने को कहा. इस तरह बातचीत करते हुए वे दोनों भीतर चले गए.

भीतर श्रेया अभी जाग रही थी. वह बैड पर रजाई में दुबकी बैठी थी. सामने टीवी चालू था. दलजीत कौर भी उस के पास बैड के किनारे बैठ गईं.

 

बकौल मोहिंदर वह कुछ देर वहीं खड़ा टीवी पर आते दृश्यों को देखता रहा. फिर दलजीत कौर की ओर इत्मीनान से बढ़ते हुए बोला, ‘‘बीबी, मैं ने आप से कहा है कि आप मेरा एक काम कर दो.’’

‘‘हां, कहो क्या काम है?’’ दलजीत कौर ने सहज भाव से पूछा.

‘‘जसवंत ने चलते वक्त जो पैसा आप को दिया है, वह मुझे दे दो.’’

‘‘क्यों, तुम्हें इतने पैसों का क्या करना है?’’

‘‘और आप को इन रुपयों का क्या करना है?’’

‘‘मेरी बहुत सी जरूरतें हैं.’’

‘‘आप लोगों की ऐसी कोई खास जरूरत नहीं, जिस के लिए इतना पैसा चाहिए. मेरी जरूरतें आप से भी कहीं ज्यादा और अहम हैं.’’

‘‘तुम्हें तनख्वाह नहीं मिलती क्या? उस से अपनी जरूरतें पूरी किया करो. फिर प्रोग्राम पर जाने का अलग से पैसा मिलता है. खानेओढ़ने को भी अकसर यहां से मिल जाता है. तो और कौन सी जरूरतें रह गईं तुम्हारी?’’

‘‘देखो बीबी, रुपया चुपचाप मेरे हवाले कर दो. तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, मेरे कई काम संवर जाएंगे. न दिए तो तुम्हें मार डालूंगा और तुम्हारी इस नवासी को भी.’’

मोहिंदर के बताए मुताबिक, उस ने यह बात कहते वक्त श्रेया की ओर इशारा भी किया. वह अभी तक टीवी देखने में मस्त थी. बात उस के कानों में पड़ी तो उस ने पास पड़ा लकड़ी का सोटा उठा कर मोहिंदर पर वार कर दिया.

‘‘एक छोटी बच्ची से मुझे यह उम्मीद कतई न थी. फिर उस का दुस्साहस देख कर मैं एकबारगी चौंका, वहीं गुस्से से भी भर उठा. तेजी से पीछे घूम कर मैं ने सोटा श्रेया से छीन लिया. फिर उसी से दलजीत कौर व श्रेया पर दनादन वार करने लगा. दोएक दफा दोनों चीखीं, फिर उन की आवाजें गले में ही घुट कर रह गईं.

दोनों निढाल हो कर बैड पर गिर पड़ीं. सोटे के वार से दलजीत कौर का सिर 2 जगह से फट गया. उन दोनों के मर जाने का विश्वास मुझे हो गया था तो भी मैं ने पास पड़े स्कार्फ से श्रेया की ओर सलवार के पोंहचे से दलजीत कौर की गरदन बुरी तरह कस कर गला घोंट दिया. इस के बाद जो कुछ हाथ लगा, बैग में डाल लिया.

रात में ही मैं वापस लुधियाना जा कर लूटा गया सारा सामान और नकद पैसा अपनी घरवाली के हवाले कर आया. पहले तो वह घबराई, फिर रातोंरात अमीर बनते देख सहज हो गई. इस के बाद अगले ही दिन किराए का मकान छोड़ कर हम शिमलापुरी में रहने लग गए.’’ मोहिंदर ने हमें बताया.

पूछताछ के बाद हम लोगों ने मोहिंदर व उस की घरवाली की निशानदेही पर लूटा गया सारा सामान मय नकदी के बरामद कर लिया.

आगे की काररवाई के लिए विवेचक रामचंदर राठी ने  केस के अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट अभी अदालत में दाखिल नहीं की थी, तभी उस का तबादला कुरुक्षेत्र हो गया. उस की जगह आए इंसपेक्टर सुरेंद्र सिंह ने चालान तैयार कर अदालत में पेश कर दिया. इस के बाद मेरा ट्रांसफर भी अंबाला पुलिस चीफ से एसपी (क्राइम) के पद पर हो गया. केस सेशन कमिट हो कर अंबाला के सत्र न्यायालय में चलता रहा, जहां से मोहिंदर को उम्रकैद और उस की पत्नी किरनबाला को 3 साल कैद बामशक्कत की सजा हुई.

मुझे याद है कि एक दिन जब मैं मोहिंदर से पूछताछ कर रहा था तो उस ने मुझ से एक साथ 3 बातें बोली थीं, ‘‘साहब, आज जितनी भी ज्यादतियां हो रही हैं, सब रिश्तों के नाम पर ही होती हैं. जसवंत कौर ने मुझे अपना धर्मभाई बना कर जो मान बख्शा, उस रिश्ते की आड़ में वह मुझ से ज्यादतियां भी करती रही. ज्यादती और बेबसी की अगली सीढ़ी अपराध ही होती है जो मैं ने किया.’’

मुझ से कहे बिना न रहा गया था कि आधार कोई भी हो, अपराध तो अपराध है. अपराध को अंजाम देने के बाद अपराधी को उस अपराध की सजा तो भुगतनी ही पड़ती है.

कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

— बलजीत सिंह संधू    डीजीपी हरियाणा

 

 

पुलिस अफसर ने क्यों किए 2 मर्डर

वह सर्दी का महीना था तथा उस समय आसपास काफी कोहरा छाया हुआ था. कोहरा इतना घना था कि 50 मीटर की दूरी के बाद कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था. उस समय सुबह के 8 बज रहे थे. थाना झबरेड़ा (हरिद्वार) के एसएचओ अंकुर शर्मा उस वक्त नहा रहे थे. तभी उन्हें अपने बाथरूम के दरवाजे पर किसी के खटखटाने की आवाज सुनाई दी.

आवाज सुनते ही जल्दीजल्दी नहा कर वह बोले, ”कौन है?’’

तभी बाहर से उन के थाने के सिपाही मुकेश ने बताया, ”सर, गांव भिश्तीपुर के प्रधान जोगेंद्र का अभी फोन आया था, वह बता रहा था कि गांव भिश्तीपुर अकबरपुर झोझा की सड़क के नाले में एक लड़के की लाश पड़ी है. लाश के गले में खून के निशान उभरे हुए हैं.’’

”ठीक है मुकेश, मैं जल्दी तैयार हो कर आता हूं.’ शर्मा बोले.

इस के बाद अंकुर शर्मा जल्दीजल्दी तैयार होने लगे थे. सुबह होने के कारण उस वक्त थानेदार भी थाने में नहीं आए थे. मामला चूंकि हत्या का था, इसलिए एसएचओ ने देर करना उचित नहीं समझा.

इस के बाद उन्होंने इस हत्या की सूचना फोन द्वारा हरिद्वार के एसएसपी प्रमेंद्र डोबाल, एसपी (देहात) स्वप्न किशोर सिंह व सीओ (मंगलौर) विवेक कुमार को दी थी. फिर वह अपने साथ सिपाही मुकेश व रणवीर को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े. घटनास्थल थाने से महज 7 किलोमीटर दूर था, इसलिए उन्हें वहां पहुंचने में 15 मिनट लगे.

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      मृतक बच्चा राजा

घटनास्थल पर काफी भीड़ इकट्ठी थी. वहां पर नाले में एक लड़के का शव पड़ा हुआ था. मृतक की उम्र 15 साल के आसपास थी. पुलिस को देख कर वहां खड़ी भीड़ तितरबितर होने लगी थी. वहां खड़े लोगों से एसएचओ ने शव के बारे में पूछताछ करनी शुरू कर दी थी. यह घटना 9 फरवरी, 2024 को उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के थाना झबरेड़ा क्षेत्र में घटी थी.

वहां मौजूद लोगों ने उन्हें बताया था कि यह शव आज सुबह ही लोगों ने देखा था. ऐसा लग रहा है कि हत्यारों ने इस की हत्या कहीं और की होगी तथा हत्या करने के बाद शव को यहां फेंक दिया होगा. इस के बाद एसएचओ अंकुर शर्मा ने मौजूद लोगों से बच्चे की शिनाख्त करने को कहा था, मगर बच्चे की पहचान नहीं हो सकी थी.

इस के बाद पुलिसकर्मियों ने शव की जामातलाशी ली तो लड़के की शर्ट की जेब में पुलिस को एक टेलर का विजिटिंग कार्ड मिला था. उस टेलर की दुकान हरिद्वार के सिडकुल क्षेत्र में थी. पुलिस ने उस टेलर के पास जा कर संपर्क किया. लड़की की लाश के फोटो देखने के बाद टेलर ने भी इस बालक के शव को पहचानने में अपनी अनभिज्ञता जताई.

उधर मौके पर एसएसपी प्रमेंद्र डोबाल, एसओजी प्रभारी रविंद्र शाह व पुलिस के पीआरओ विपिन चंद पाठक भी फोरैंसिक टीम के साथ पहुंच गए थे.

कैसे हुई मृतक की शिनाख्त

लोगों से जानकारी मिलने के बाद एसएसपी इस नतीजे पर पहुंचे थे कि मृतक का कोई न कोई लिंक सिडकुल क्षेत्र से जरूर है. इस के बाद उन्होंने एसएचओ जरूरी काररवाई करने के निर्देश दिए. उन्होंने एसपी (देहात) स्वप्न किशोर सिंह की अध्यक्षता और सीओ विवेक कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में एसएचओ अंकुर शर्मा व एसओजी के इंसपेक्टर को शामिल किया. उन्होंने टीम को सिडकुल क्षेत्र में जा कर बच्चे की जानकारी करने के निर्देश दिए.

श्री डोबाल का निर्देश पा कर पुलिस टीम सिडकुल पहुंच गई थी. यहां पर पुलिस टीम ने बच्चे के फोटो कुछ दुकानदारों को दिखाए. पुलिस की कई घंटों की मशक्कत के बाद एक दुकानदार ने पुलिस को बताया कि यह फोटो 15 वर्षीय नरेंद्र उर्फ राजा की है, जो यहां अपनी दृष्टिहीन मां ममता के साथ रहता था. इस के बाद पुलिस टीम जब ममता के मकान पर पहुंची तो वहां परचून की दुकान चलाने वाला हेमराज मिला.

जब पुलिस ने हेमराज से ममता व उस के बेटे राजा के बारे में पूछताछ की तो हेमराज ने पुलिस को बताया, ”सर, यह मकान मैं ने ममता से पिछले महीने 20 लाख 70 हजार रुपए में खरीदा था. 3 दिन पहले ही ममता ने मकान खाली कर के मुझे कब्जा दिया है. कब्जा देते समय पुलिस लाइंस में तैनात एएसआई छुन्ना यादव व शहजाद नामक युवक भी ममता के साथ थे. मुझे कब्जा दे कर ममता व राजा छुन्ना यादव की न्यू आल्टो कार में बैठ कर गए थे.’’

पुलिस को जब यह जानकारी हुई तो सीओ विवेक कुमार व एसओजी प्रभारी रविंद्र शाह तुरंत ही पुलिस लाइंस पहुंचे और वहां से वे पूछताछ करने के लिए छुन्ना सिंह यादव को अपने साथ ले कर थाना झबरेड़ा आ गए.

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थाने में एसपी (देहात) स्वप्न किशोर सिंह व सीओ विवेक कुमार ने जब एएसआई छुन्ना सिंह से ममता व राजा के बारे में पूछताछ की तो वह पुलिस अधिकारियों को काफी देर तक वह इधरउधर की बातें बताता रहा. छुन्ना यादव कहता रहा कि ममता मेरी परिचित तो थी, मगर मुझे नहीं मालूम कि वह अब कहां है?

इस के बाद जब एसपी (देहात) स्वप्न किशोर ने सख्ती से छुन्ना सिंह से उस की नई आल्टो कार के बारे में पूछा तो वह कोई संतोषजनक उत्तर न दे सका.

तभी एसपी स्वप्न किशोर ने छुन्ना सिंह से कहा, ”देखो छुन्ना, तुम्हें पता है कि पुलिस के सामने मुरदे भी बोलने लग जाते हैं. इसलिए या तो तुम हमें सीधी तरह से राजा की मौत की सच्चाई बता दो, नहीं तो हम तुम्हारे साथ वह सब करेंगे, जो पुलिस अपराधियों के साथ करती है.’’

एएसआई ने ऐसे कुबूला जुर्म

एसपी साहब की इन बातों का छुन्ना यादव के ऊपर जादू की तरह असर हुआ और वह पुलिस को राजा की हत्या की सच्चाई बताने को तैयार हो गया था. फिर छुन्ना यादव ने पुलिस को राजा की हत्या की जो कहानी बताई, उसे सुन कर वहां मौजूद सभी पुलिस अधिकारियों के होश उड़ गए.

एएसआई छुन्ना यादव ने बताया था कि वह 9 फरवरी, 2024 को अपनी नई आल्टो कार में राजा व उस की नेत्रहीन मां ममता को बैठा कर मंगलौर हाईवे की ओर लाया था.

इसी बीच मैं और मेरे दोस्त शहजाद व विनोद ममता का सिडकुल वाला मकान हेमराज को 20 लाख 70 हजार रुपए में बिकवा चुके थे. ममता की रकम को हड़पने के लिए हम तीनों ने मांबेटे की हत्या की योजना बनाई.

योजना के मुताबिक हम तीनों जब मांबेटे को कार में बैठा कर ले जा रहे थे तो चलती कार में हम तीनों ने शहजाद के गमछे से पहले ममता का गला घोंट कर उसे मार डाला था, फिर इस के बाद हम ने नरेंद्र उर्फ राजा का गला घोंट कर उस की हत्या कर दी थी. गला घोंटते वक्त मांबेटा चलती कार में चीखतेचिल्लाते रहे.

दोनों की हत्या करने के बाद हम ने पहले थाना मंगलौर के अंतर्गत लिब्बरहेड़ी नहर पटरी की झाडिय़ों में ममता के शव को फेंक दिया था. इस के बाद 15 वर्षीय राजा की लाश गांव भिश्तीपुर रोड के नाले में फेंक दी थी. दोनों मांबेटे के शवों को ठिकाने लगा कर तीनों लोग आराम से वापस अपनेअपने घर चले गए थे.

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एएसआई छुन्ना यादव के इस अपराध से जहां एक ओर पुलिस की छवि धूमिल हुई थी तो दूसरी ओर छुन्ना जैसे वरदीधारियों से आम जनता में पुलिस पर विश्वास डगमगाने जैसे हालात हो गए थे. इस के बाद एसपी (देहात) स्वप्न किशोर ने छुन्ना की इस करतूत की जानकारी एसएसपी प्रमेंद्र डोबाल को दे दी.

एक नहीं की थीं 2-2 हत्याएं

श्री डोबाल ने वरदी को दागदार करने वाले छुन्ना सिंह यादव के खिलाफ तुरंत कानूनी काररवाई करने तथा छुन्ना की निशानदेही पर मंगलौर की लिब्बरहेड़ी नहर पटरी की झाडिय़ों से ममता का शव बरामद करने के निर्देश एसएचओ अंकुर शर्मा व एसओजी प्रभारी रविंद्र शाह को दिए. दोनों अधिकारी छुन्ना यादव को ले कर लिब्बरहेड़ी नहर पटरी पर पहुंच गए.

छुन्ना यादव ने वह जगह पुलिस को दिखाई, जहां उस ने अपनी आल्टो कार से ममता के शव को फेंका था. छुन्ना की निशानदेही पर पुलिस ने ममता के शव को झाडिय़ों से बरामद कर लिया. शव बरामद होने के बाद अंकुर शर्मा ने ममता के शव का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए राजकीय जे.एन. सिन्हा स्मारक अस्पताल भेज दिया.

ममता का शव बरामद होने के बाद एसओजी प्रभारी रविंद्र शाह अपने साथियों अशोक, रविंद्र खत्री, राहुल, नितिन व महीपाल के साथ इस दोहरे हत्याकांड के शेष बचे 2 आरोपियों शहजाद व विनोद की गिरफ्तारी हेतु निकल पड़े थे. हालांकि छुन्ना यादव की गिरफ्तारी की जानकारी शहजाद व विनोद को मिल चुकी थी. तब वह किसी सुरक्षित स्थान पर छिपने की योजना बना रहे थे.

इस से पहले कि वे दोनों फरार होते, एसओजी टीम ने उन्हें हिरासत में ले लिया था. इस के बाद एसओजी टीम ने शहजाद निवासी गांव अकबरपुर झोझा तथा विनोद निवासी मोहल्ला सराय ज्वालापुर को हिरासत में ले लिया था. पुलिस टीम उन्हें ले कर थाना झबरेड़ा आ गई थी.

वहां पुलिस ने इन तीनों आरोपियों का आमनासामना कराया था. फिर तीनों आरोपियों ने पुलिस के सामने ममता व राजा की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. आरोपियों से पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो  कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

छुन्ना यादव उत्तर प्रदेश के शहर औरैया के गांव राठा के रहने वाले भोलानाथ यादव का बेटा है. इस समय वह हरिद्वार पुलिस लाइन में एएसआई के पद पर तैनात है. साल 1995 में वह उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर भरती हुआ था. सन 2000 में जब उत्तर प्रदेश से काट कर उत्तराखंड का पुनर्गठन हुआ तो छुन्ना यादव उत्तराखंड पुलिस में चला गया. बाद में उस का प्रमोशन होता गया तो वह एएसआई बन गया. वर्ष 2011 से 2014 तक मैं यातायात पुलिस हरिद्वार में तैनात रहा था. शहजाद से पिछले 4 सालों से उस की दोस्ती थी.

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मृतका ममता

पिछले साल शहजाद ने छुन्ना यादव को ममता नामक महिला से मिलवाया था, जो अपने 15 वर्षीय बेटे राजा के साथ मोहल्ला सूर्यनगर सिडकुल (हरिद्वार) में रहती थी. ममता मूलरूप से कस्बा कांठ, जिला मुरादाबाद की रहने वाली थी. वह दृष्टिहीन थी. पिछले साल ममता मुरादाबाद से अपनी पुश्तैनी प्रौपर्टी बेच कर सिडकुल में मकान खरीद कर रहने लगी थी.

मुन्ना और शहजाद का अकसर ममता के घर पर आनाजाना लगा रहता था. इसी दौरान दोनों को यह पता चल गया कि किसी दूर के रिश्तेदार तक का ममता के पास आनाजाना नहीं है. इस से इन के मन में लालच आ गया था.

पुलिस वाले के मन में ऐसे जन्मा अपराध

इस के बाद छुन्ना यादव ने शहजाद के साथ मिल कर ममता का मकान बिकवा कर वह रकम हड़पने की योजना बनाई. छुन्ना ने ममता को उस का मकान बिकवा कर उसे रुड़की में मकान खरीदवाने का झांसा दिया.

चूंकि ममता उस की बातों पर विश्वास करती थी, इसलिए उस की बात वह मान गई थी. फिर उस ने व शहजाद ने ममता के पड़ोसी किनारा दुकानदार हेमराज को 20 लाख 70 हजार रुपए में मकान बिकवा दिया था और अधिकांश रकम दोनों शातिरों ने कब्जे में कर ली थी.

ममता के मकान बेचने से मिली रकम में से छुन्ना ने नई आल्टो कार खरीद ली थी. 9 फरवरी, 2024 को ममता को मकान खाली कर हेमराज को कब्जा देना था.

योजना के मुताबिक 9 फरवरी की सुबह को छुन्ना और शहजाद आल्टो कार से उसी समय ममता के घर पहुंचे. उसी समय शहजाद का बेटा भी वहां मिनी ट्रक ले कर आ गया था. उन्होंने ममता के घर का सामान उस मिनी ट्रक में रख कर मकान खाली कर दिया था.

शहजाद का बेटा वहां से मिनी ट्रक ले कर चला गया. छुन्ना ने ममता को आल्टो कार में अगली सीट पर बैठा लिया था. पिछली सीट पर शहजाद व नरेंद्र उर्फ राजा बैठ गए थे. कार ले कर वह रोशनाबाद की ओर चले थे तो रास्ते में उन्हें विनोद भी मिल गया था. छुन्ना ने कार रोक कर उसे भी पीछे बैठा लिया था. इस के बाद वे लोग हर की पौड़ी पहुंचे थे. यहां पर ममता व राजा नहाने लगे थे. उसी दौरान उन तीनों ने कार में बैठ कर शराब पी थी.

शाम को जब कुछ अंधेरा छाने लगा तो हम लोग कार ले कर रुड़की की ओर चल पड़े थे. जब कार रुड़की से पुरकाजी की ओर जा रही थी तो अचानक शहजाद ने अपने गमछे का फंदा बना लिया था और कार में आगे बैठी ममता के गले में डाल कर उस का गला घोंट दिया था.

राजा ने शोर मचाते हुए विरोध किया तो शहजाद और विनोद ने उसे दबोच लिया. ममता के दम तोडऩे के बाद शहजाद व विनोद ने उसी गमछे से नरेंद्र उर्फ राजा का भी गला घोंट कर उसे मार डाला था. फिर उन्होंने ममता के शव को लिब्बरहेड़ी गंगनहर पटरी की झाडिय़ों में फेंक कर भिश्तीपुर की ओर चले गए थे.

रकम बांट कर रह रहे थे बेखौफ

इस के बाद उन्होंने राजा के शव को भिश्तीपुर के एक नाले में फेंक दिया था. ममता व राजा के शवों को ठिकाने लगाने के बाद उन्होंने ममता के मकान को बेचने में मिली रकम को आपस में बांट लिया था और अपने अपने घरों को लौट गए थे.

तीनों आरोपियों छुन्ना यादव, शहजाद व विनोद से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने आईपीसी की धाराओं 302, 201, 34 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया था.

वैसे तो ममता के बुरे दिनों की शुरुआत तब से शुरू हो गई थी, जब से वह शहजाद व छुन्ना यादव के संपर्क में आई थी. उस वक्त शहजाद सिडकुल के मोहल्ला सूर्यनगर में ममता के घर के पास ही किराए के कमरे में रहता था.

इस हत्याकांड के मास्टरमाइंड छुन्ना यादव ने पुलिस को बताया था कि ममता अपनी रकम हड़पने की शिकायत पुलिस से भी कर सकती थी, इसलिए उस ने ममता व उस के बेटे की हत्या की साजिश रची थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ममता व राजा उर्फ नरेंद्र की मौत का कारण गला घोंटने से हुई मौत बताया गया है. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने ममता पत्नी मुनेश व राजा के शवों को सिडकुल निवासी उन के दूर के रिश्तेदार को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पहलवानी के नाम पर दहशतगर्दी

सत्तर के दशक की बात है. जगह थी उत्तर प्रदेश का जिला खुर्जा. वहां के सब्जी बेचने वाले एक  परिवार के 2 भाई गूंगा पहलवान और अनवर लंगड़ा काम की तलाश में दिल्ली आए थे. दोनों अंगूठाछाप थे, इसलिए उन्होंने दिल्ली की आजादपुर मंडी में सब्जी बेचने का पुश्तैनी धंधा शुरू किया. बाद में उन्होंने यही काम दिल्ली के दरियागंज इलाके में जमा लिया. काम तो जम गया, लेकिन उन की मंजिल कुछ और ही थी. ऐसी मंजिल जिस तक जुर्म की काली राह से ही पहुंचा जा सकता था.

हालांकि यह साफतौर पर नहीं कहा जा सकता कि वे इस स्याह रास्ते पर पहली बार कब चले थे. पर 14 अक्तूबर, 1986 में जब एक सब्जी बेचने वाले ने ही जबरन वसूली की शिकायत पुलिस से की तो पता चला कि वे दोनों पहले से ही जबरन वसूली के गोरखधंधे में उतर चुके थे.

बताया जाता है कि गूंगा पहलवान और अनवर लंगड़ा जब दरियागंज छोड़ कर ओखला गए थे, तभी उन्होंने प्रोटैक्शन मनी के नाम पर ओखला सब्जीमंडी में गैरकानूनी उगाही का धंधा शुरू कर दिया था. गूंगा पहलवान का असली नाम मोहम्मद उमर था. उस पर 13 और उस के भाई अनवर पर 15 पुलिस केस दर्ज होने की बात सामने आई है.

जुर्म का यह पौधा देखते ही देखते बड़ा पेड़ बन गया. एकएक कर के इन दोनों भाइयों के परिवार वाले भी इस धंधे में हिस्सेदार बनते गए. 23 सदस्यों वाले इस परिवार में 13 सदस्यों पर करीब सवा सौ आपराधिक मामले दर्ज हैं.

गैरकानूनी उगाही का धंधा अब उन का फैमिली बिजनैस बन चुका था. 55 साल के गूंगा पहलवान और 52 साल के अनवर लंगड़ा ने 5 साल पहले इस कारोबार से रिटायरमैंट ले लिया है. उन के रिटायरमैंट के बाद उन के 9 बेटों ने इस धंधे की कमान अपने हाथों में ले ली. 2 नाबालिग बेटे भी जुर्म की राह पर चल चुके हैं.

पुलिस से पता चला कि उमर और अनवर पहले स्थानीय स्तर पर पहलवानी करते थे. तब उन के बेटे बौडी बिल्डिंग करते थे. अपने गठीले बदन से वे लोगों पर रौब जमाने लगे थे. 21 जुलाई, 2017 की रात 2 बजे गूंगा पहलवान के बेटे राशिद ने ओखला सब्जीमंडी में सब्जी बेचने वाले नरेश चंद से उगाही मांगी थी. नरेश ने जब उसे पैसे नहीं दिए तो राशिद ने कांच की बोतल नरेश के सिर पर मारी, जिस से उस का सिर फट गया था.

नरेश की शिकायत पर अमर कालोनी पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया. काफी कोशिश के बाद भी जब राशिद नहीं मिला तो पुलिस ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया.

इसी बीच 5 जनवरी, 2018 को राशिद ओखला मंडी आया तो उस ने वहीं पर 3 सब्जी बेचने वालों धर्मेंद्र, रणवीर सिंह और कपिल से चाकू के बल पर लूटपाट की. वारदात कर के वह फरार हो गया.

राशिद की गिरफ्तारी के लिए एसीपी जगदीश यादव ने थानाप्रभारी उदयवीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में एसआई आरएस डागर को शामिल किया गया. 21 जनवरी, 2018 को टीम को मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि आरोपी राशिद श्रीनिवासपुरी के एक फिटनैस जिम में आने वाला है.

पुलिस टीम वहां पहले ही मुस्तैद हो गई. जैसे ही राशिद वहां पहुंचा, उसे दबोच लिया गया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने वारदात को अंजाम देने की बात स्वीकार कर ली.

10 अक्तूबर, 2016 की देर रात पुलिस को सूचना मिली कि कुछ बदमाश सब्जीमंडी के कारोबारियों से जबरदस्ती उगाही कर रहे हैं. जब तक पुलिस वहां पहुंची, तब तक बदमाश फरार हो गए. बाद में पता चला कि जो बदमाश भागे थे, वह और कोई नहीं अनवर लंगड़ा और उस के 3 बेटे सलमान, शाहरुख और इमरान थे.

पुलिस ने तलाश जारी रखी और अनवर लंगड़ा के तीनों बेटों को अलगअलग इलाकों से गिरफ्तार कर लिया, लेकिन अनवर हाथ नहीं आया. इस के बावजूद पुलिस ने उस की तलाश जारी रखी और 5 दिसंबर, 2016 को उसे ओखला रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तार कर लिया.

अपने जुर्मों को छिपाने के लिए मोहम्मद उमर और अनवर लंगड़ा ने दिखावे के लिए ओखला की होलसेल मार्केट में 2 दुकानें खरीद रखी हैं. वहां के लोग बताते हैं कि उमर खुद को उस मार्केट का चेयरमैन बताता है. इन पहलवान भाइयों और इन के परिवार वालों से श्रीनिवासपुरी क्षेत्र के लोग आंतकित रहते थे. और तो और क्षेत्र में अगर कहीं लड़ाईझगड़ा हो जाता तो उमर या अनवर के बेटों में से किसी न किसी की संलिप्तता जरूर निकलती थी.

श्रीनिवासपुरी रैजीडैंट वेलफेयर एसोसिएशन ने भी कई बार थाने में इन लोगों के खिलाफ शिकायत की थी. पुलिस ने अनवर के अनवर लंगड़ा बनने के बारे में बताया कि सन 1990 में जब वह तिहाड़ जेल में बंद था, तब एक बार उस ने वहां से भागने की कोशिश की थी. मजबूरी में पुलिस को उस पर फायरिंग करनी पड़ी, जिस से एक गोली उस के दाएं पैर में लग गई थी. तब से अनवर के नाम के साथ लंगड़ा जुड़ गया.

इस ‘क्रिमिनल फैमिली’ की एक और खास बात यह है कि इस के ज्यादातर सदस्य पढ़ेलिखे नहीं हैं. उमर और अनवर के कुल 19 बच्चे हैं, जिन में से कोई 5वीं फेल है तो कोई तीसरी फेल. 9 बच्चे तो बिलकुल अनपढ़ हैं.

नजफगढ़ से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर दिल्ली देहात का एक गांव है ढिचाऊं कलां. इस गांव में रामनिवास उर्फ रामी पहलवान रहता था. उस के पास खेती की अच्छी जमीन थी. उस का एक पहलवान भतीजा था कृष्ण. कृष्ण का उन दिनों गांव कराला के रहने वाले जयबीर कराला से झगड़ा चल रहा था. जयबीर कराला पड़ोसी गांव मितराऊं के रहने वाले बलराज का गहरा दोस्त था.

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कृष्ण पहलवान

एक दिन मौका पा कर कृष्ण पहलवान ने अपने साथियों के साथ मिल कर जयबीर कराला की हत्या कर दी. इस के बदले में सन 2002 में रामनिवास उर्फ रामी पहलवान और उस के दोस्त रोहताश की हत्या कर दी गई.

कृष्ण पहलवान को शक था कि उस के चाचा की हत्या में उन के पड़ोसी सूरज प्रधान का हाथ है. बताया जाता है कि सूरज पुलिस का मुखबिर था. कृष्ण पहलवान इस हत्या का बदला लेने के लिए मौका तलाशने लगा.

बलराज के एक चाचा थे, जिन की शादी नहीं हुई थी. उन की ढांसा रोड पर तकरीबन 15 बीघा जमीन थी. उस जमीन को उन्हीं के गांव का बलवान फौजी जोता करता था. जब बलराज के चाचा की मौत हो गई तो उस के पिता सूरत सिंह ने बलवान फौजी से वह जमीन खाली करने के लिए कहा.

तब तक जमीन का वह टुकड़ा बेशकीमती हो चुका था. बलवान फौजी उस जमीन को छोड़ना नहीं चाहता था. उस ने मौके का फायदा उठाने का फैसला किया और मदद के लिए वह बलराज के दुश्मन कृष्ण पहलवान के पास पहुंच गया.

किसी तरह यह बात बलराज को पता चल गई. बलराज ने इस बारे में अपने पहलवान भाई अनूप को बताया. फिर एक योजना के तहत सन 1997 में अनूप पहलवान और उस के दोस्त संपूरण ने बलवान फौजी और उस के साले अनिल को घेर लिया. वे दोनों गांव ढिचाऊं कलां जा रहे थे. तभी उन लोगों ने इन सालेबहनोई पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं. इस हमले में अनिल की मौत हो गई, जबकि बलवान फौजी को गंभीर चोटें आईं. लेकिन वह बच गया.

इस वारदात ने बलवान फौजी के जवान बेटे कपिल को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया. वह कृष्ण पहलवान के साथ ही काम करने लगा. इस के बाद 3 अप्रैल, 1998 को गांव ककरोला में बलराज को घेर कर ढेर कर दिया गया.

बलराज के मरने के बाद गैंग की कमान बलराज के भाई अनूप पहलवान ने संभाल ली. 12 जुलाई, 1998 को अनूप पहलवान ने मौका देख कर कपिल के पिता बलवान फौजी और कृष्ण पहलवान के रिश्तेदार और दोस्तों समेत 6 लोगों का कत्ल कर दिया.

उस समय कपिल जेल में बंद था. 13 सितंबर, 1999 को वह जेल से बाहर आया. उसी दिन अनूप गैंग ने कपिल के भाई कुलदीप उर्फ गुल्लू की हत्या कर दी. कपिल ने भी उसी दिन इस हत्या का बदला ले लिया और उस ने अनूप के भतीजे यशपाल को मार गिराया. इस के बाद वह फरार हो गया.

इतनी हत्याएं होने के बाद भी कृष्ण पहलवान का अपने चाचा रामनिवास उर्फ रामी पहलवान की हत्या का बदला पूरा नहीं हुआ था. 20 फरवरी, 2002 को ढिचाऊं कलां से एक बारात सोनीपत के जगमेंद्र सिंह के यहां गई थी, उन की बेटी पिंकी की शादी थी.

बारात दुलहन के घर की तरफ जा ही रही थी कि एक खबर के बाद गाजेबाजे बंद कराने पड़ गए. वजह, जनवासे के पास ही 3 लाशें पड़ी थीं. वे लाशें सूरज प्रधान, उस के बेटे सुखबीर और दिचाऊं कलां के ही नारायण सिंह की थीं. यह वही सूरज प्रधान था, जिस के बारे में कृष्ण पहलवान को पुलिस का मुखबिर होने का शक था.

इस के बाद साल 2003 में अनूप पहलवान रोहतक कोर्ट में एक मुकदमे के सिलसिले में पेश होने आया था. पुलिस सिक्योरिटी के बीच कृष्ण पहलवान गैंग के एक शार्पशूटर महावीर डौन ने अनूप पर गोलियां दाग दीं और उस ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

अनूप पहलवान की हत्या के बाद तकरीबन 10 साल तक इस गैंगवार में शांति का माहौल रहा. इस बीच कृष्ण पहलवान का भाई भरत सिंह राजनीति में आ चुका था. वह सन 2008 में विधायक बन गया था, लेकिन बाद में 2013 का चुनाव वह हार गया.

भरत सिंह मर्डर केस के आरोपी

29 मार्च, 2015 को भरत सिंह की हत्या कर दी गई. इस से पहले सन 2012 में भी उस पर हमला किया गया था, पर तब वह बच गया था. बाद में पता चला कि यह हत्या उसी के गांव के रहने वाले उदयवीर उर्फ काले ने कराई थी. उदयवीर सूरज प्रधान का बेटा है. उस ने अपने पिता, भाई और चाचा की हत्या का बदला लिया था.

देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो अपने शारीरिक दम पर, आसान शब्दों में कहें तो ‘पहलवान‘ कहलवा कर जुर्म की दुनिया में कदम रख देते हैं और कभीकभी तो वे इतने बड़े गैंग बना लेते हैं कि अपने इलाके में डर का पर्याय बन जाते हैं.

परमीत डबास

2-4 आपराधिक वारदातों को अंजाम देने के बाद ऐसे लोग शस्त्र लाइसैंस ले लेते हैं, ताकि इन का रौब बरकरार रहे. न जाने कितने पहलवाननुमा लोग हथियार लिए धड़ल्ले से घूमते देखे जा सकते हैं. इस तरह के लोग ही शादीब्याह में गोलियां चला कर हादसों को न्यौता देते हैं. रोडरेज में भी ऐसे ही लोग गोलियां चलाते हैं.

हथियार और उसे चलाने की हिम्मत ऐसे लोगों को दूसरे बड़े अपराध करने को उकसाती है. जल्दी अमीर बनने की चाहत भी ऐसे लोगों को अपराध करने का बढ़ावा देती है.

इस मसले पर मशहूर पहलवान चंदगीराम के बेटे पहलवान जगदीश कालीरमन, जो खुद मेरठ उत्तर प्रदेश के डीएसपी पद पर कार्यरत हैं और देश के नामचीन पहलवान और कोच हैं, ने बताया, ‘‘हमारे समाज के पहलवानों को ले कर अपनी अलग धारणा बनी हुई है. कोई भी हट्टाकट आदमी अगर ट्रैक सूट पहन लेता है तो लोग उसे पहलवान कहने लगते हैं. भले ही वह किसी भी खेल कुश्ती, जूडो, कबड्डी, बौडीबिल्डिंग आदि से जुड़ा हो या न जुड़ा हो.

‘‘जबकि खिलाड़ी बेहद अनुशासित होते हैं. वे अपने खेल, उस की प्रैक्टिस और अपने बेहतर भविष्य के लिए समाज तक से कट जाते हैं. फिर वे जुर्म की राह पर कैसे जा सकते हैं?

‘‘जुर्म से जुड़े ऐसे अपराधियों की अगर उपलब्धियों की बात की जाए तो वे न के बराबर मिलती हैं. हां, कई बार बेरोजगारी या दूसरी वजहों से खिलाड़ी भी अपराध की राह पकड़ लेते हैं, लेकिन उन का प्रतिशत बहुत कम होता है और ऐसे ही लोगों की वजह से ‘पहलवान’ शब्द के साथसाथ पहलवानों की इमेज भी खराब होती है.’’

‘अर्जुन अवार्ड’ विजेता पहलवान कोच कृपाशंकर बिश्नोई के मुताबिक, ‘‘अपराधियों ने पहलवान शब्द का मतलब ही बदल दिया है. बहुत से अपराधी पहलवानों ने कुश्ती तो छोडि़ए, किसी भी खेल में भारत की बड़े स्तर  पर नुमाइंदगी तक नहीं की होती है. वे तो लोकल अपराधी होते हैं. मैं ने तो खुद लोगों से कह दिया है कि आप मुझे ‘पहलवान’ संबोधन से न बुलाया करें. मेरा मानना है कि पहलवान शब्द का इस्तेमाल चैंपियन कुश्ती खिलाड़ी के लिए किया जाना चाहिए, गुंडेबदमाशों या तानाशाह लोगों के लिए नहीं.’’

बहुत बार ऐसा भी होता है कि बिल्डर या प्रौपर्टी डीलर वगैरह अपने पैसे की उगाही के लिए छुटभैये पहलवानों से मदद मांगते हैं ताकि डराधमका कर लोगों से वसूली कर सकें. जब उन में इस तरह पैसा छीनने की आदत पनपने लगती है तो धीरेधीरे वे अपना गैंग बना लेते हैं.

इस तरह के लोग खेल और समाज दोनों के लिए खतरा हैं. पुलिस को इन के खिलाफ कड़ी से कड़ी काररवाई करनी चाहिए ताकि ‘पहलवान’ शब्द की गरिमा बनी रहे.

हरियाणा का जज नियुक्ति घोटाला

पंचकूला के ऐतिहासिक नगर पिंजौर की वकील सुमन कुमारी प्रैक्टिस करने के साथसाथ जज बनने की तैयारी भी कर रही थीं. इस के लिए वह चंडीगढ़ के सेक्टर-24 स्थित ज्यूरिस्ट एकेडमी से कोचिंग ले रही थीं. यह एकेडमी उन्होंने मई, 2017 में जौइन की थी. यहीं पर सुनीता और सुशीला नाम की युवतियां भी कोचिंग लेने आती थीं. सुशीला पंचकूला के सेक्टर-5 की रहने वाली थी, जबकि सुनीता चंडीगढ़ में ही रहती थी.

सुशीला और सुनीता पिछले कई सालों से सरकारी नौकरियों के लिए तैयारी कर रही थीं, लेकिन इन में से कोई भी नौकरी से संबंधित परीक्षा पास नहीं कर पा रही थी.

वैसे भी दोनों एवरेज स्टूडेंट की श्रेणी में आती थीं, कोचिंग सेंटर द्वारा लिए जाने वाले वीकली टेस्टों में दोनों के बहुत कम नंबर आते थे. इस के बावजूद इन का हौसला कभी पस्त नहीं हुआ था. दोनों अपने प्रयासों में निरंतर लगी हुई थीं. इन का सपना कोई बड़ी सरकारी नौकरी हासिल करना था.

रोजाना एक ही जगह आनेजाने की वजह से सुमन की इन लड़कियों से जानपहचान हो गई थी. तीनों ने अपने मोबाइल नंबर भी आपस में एक्सचेंज कर लिए थे. सुशीला वकील सुमन से ज्यादा मिक्सअप हो गई थी.

एकेडमी में कोचिंग कर रहे अन्य युवकयुवतियों की तरह ये तीनों भी अपनेअपने ढंग से तैयारी करते हुए सुनहरे भविष्य के सपने बुन रही थीं. वकील सुमन के साथ अब सुनीता और सुशीला का भी सपना जज की कुरसी पर बैठने का बन गया था.

हरियाणा की अदालतों में 109 जजों की नियुक्ति होनी थी. इस के लिए 20 मार्च, 2017 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा विभिन्न समाचारपत्रों में एक विज्ञापन छपवाया गया, जिस के हिसाब से 16 जुलाई, 2017 को प्रारंभिक परीक्षा होनी थी. वांछित औपचारिकताएं पूरी कर के हजारों आवेदकों के साथसाथ इन तीनों युवतियों ने भी इस परीक्षा के लिए आवेदन किया.

सब के रोल नंबर समय पर आ गए, जिन के साथ परीक्षा सेंटरों की सूची भी संलग्न थी. ये सेंटर चंडीगढ़ के विभिन्न शिक्षा संस्थानों में थे.

वक्त के साथ जून का अंतिम सप्ताह आ गया. न्यायालय में जज नियुक्ति के प्रतिष्ठित एग्जाम एचसीएस (जुडिशियल) के परीक्षार्थी अपनी तैयारी में जीजान से जुटे थे. एकेडमी वाले भी इन की तैयारी करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. कानून के विद्वान जानकारों द्वारा तैयार करवाए गए रिकौर्डेड लेक्चर तक उपलब्ध करवाए जा रहे थे.

27 जून को सुमन किसी कारण से एकेडमी नहीं आ पाई थीं. अगले रोज उन्होंने सुशीला को फोन कर के कहा, ‘‘कल के लेक्चर की रिकौर्डिंग भिजवा दे यार.’’

‘‘नो प्रौब्लम, अभी भिजवाए देती हूं.’’ सुशीला ने बेपरवाह लहजे में कहा.

इस के बाद सुमन के वाट्सऐप पर एक औडियो क्लिप आ गई. खोलने पर मालूम हुआ कि वह कोई लेक्चर न हो कर एक ऐसा वार्तालाप था, जो 2 महिलाओं के बीच हो रहा था. इन में एक आवाज सुशीला की ही लग रही थी.

सुमन को लालच में फंसाने की कोशिश की गई

इस बातचीत को सुमन ने ध्यान से सुना तो यह बात सामने आई कि कोई महिला सुशीला को जज बनने का आसान और पक्का रास्ता बता रही थी. वह महिला कह रही थी कि उस ने पक्का इंतजाम कर रखा है. डेढ़ करोड़ रुपया खर्च करने पर उस के पास संबंधित प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही पहुंच जाएगा. उस में दिए गए प्रश्नों की तैयारी कर के वह प्रारंभिक परीक्षा में अच्छी पोजीशन के साथ पास हो जाएगी. इस तरह वह मेन एग्जाम के लिए क्वालीफाइ कर लेगी.

बाद में समयसमय पर उसे शेष 5 परीक्षाओं के प्रश्नपत्र भी मुहैया करवा दिए जाएंगे, जिन की तैयारी करने के बाद वह मुख्य परीक्षा में भी अच्छे मार्क्स हासिल कर लेगी. इस के बाद इंटरव्यू में कैसे भी अंक मिलें, उसे नियुक्ति पत्र देने से कोई नहीं रोक सकेगा. इस तरह महज डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर के वह जज का प्रतिष्ठित पद हासिल कर लेगी. इस के बाद तो ऐश ही ऐश हैं.

बातचीत में इस महिला ने यह भी कहा कि महंगी कोचिंग ले कर दिनरात मेहनत करने का कोई फायदा नहीं, जजों के सभी पद पहले ही बिके होते हैं.

मैं तो यही सब करने जा रही हूं, तुम चाहो तो किसी भी तरह पैसों का इंतजाम कर के अपनी नौकरी पक्की कर सकती हो. बाद में जिंदगी भर कमाना. समाज में जो प्रतिष्ठा बनेगी सो अलग. इतना जान लो कि मिडल क्लास से अपर क्लास में शिफ्ट होने में देर नहीं लगेगी.

यह सब सुन कर सुमन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. अगर यह बात सच थी तो वह कभी जज नहीं बन सकती थीं. इतनी बड़ी रकम जुटा पाने की बात तो वह सपने में भी नहीं सोच सकती थीं. न तो प्रैक्टिस से उन्हें इतनी कमाई हो रही थी और न ही वह किसी अमीर घराने से संबंध रखती थीं. वह केवल अपनी कड़ी मेहनत के बूते पर जज बनने का सपना संजोए थीं.

सुमन ने इस बारे में सुशीला को फोन किया. उन की बात सुनते ही सुशीला बोली, ‘‘ओह सौरी, यह औडियो गलती से चला गया. तुम इसे अभी के अभी डिलीट कर दो. मैं भी डिलीट कर रही हूं.’’

‘‘ठीक है, कर देती हूं, लेकिन तुम मुझे लेक्चर वाली औडियो भेज दो.’’

‘‘अभी भेजती हूं, चिंता मत करो.’’ कहने के तुरंत बाद सुशीला ने पिछले दिन के लेक्चर की औडियो भेज दी.

वांछित औडियो का क्लिप तो सुमन को मिल गया लेकिन सुशीला ने गलती से भेजी गई औडियो को अपने फोन से डिलीट नहीं किया. यह औडियो उन के फोन की गैलरी में सुरक्षित थी. बाद में उन्होंने उसे कई बार सुना. जितनी बार सुना, उतनी बार वह परेशान होती रहीं. उन के भीतर यह डर गहराता जा रहा था कि ऐसे तो वह कभी जज नहीं बन पाएंगी.

2 दिन बाद सुमन की मुलाकात सुशीला से हुई तो उन्होंने उस औडियो की चर्चा छेड़ दी. इस पर सुशीला ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘यह बात तो गलत है मैडम, जब मैं ने आप से कहा था कि गलती से चली गई औडियो को डिलीट कर दो तो आप को उसे डिलीट कर देना चाहिए था.’’

‘‘अरे नहीं नहीं,’’ बात संभालने का प्रयास करते हुए सुमन ने स्पष्टीकरण दिया, ‘‘तुम्हारे कहने के बाद मैं ने उसी समय वह औडियो डिलीट कर दी थी. लेकिन उसे डिलीट करने से पहले लेक्चर के मुगालते में मैं ने उस बातचीत को सुन ही लिया था.’’

‘‘सुन लिया तो कोई बात नहीं, लेकिन इस बारे में किसी को कुछ बताया तो नहीं न?’’

‘‘मैं ने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया. लेकिन सुशीला, मैं तुम से एक बात की जानकारी चाहती हूं.’’

‘‘किस बात की?’’

‘‘यही कि क्या यह काम डेढ़ करोड़ दे कर ही हो सकता है, कुछ कम पैसे दे कर नहीं?’’

सुमन के इस सवाल का जवाब देने के बजाय सुशीला ने इधरउधर देखते हुए उल्टा उन्हीं से प्रश्न किया, ‘‘तुम इंटरेस्टेड हो क्या?’’

सुमन को अपनी मेहनत बेकार जाती लग रही थी

‘‘देखो सुशीला, सीधी सी बात है. इतनी बड़ी पोस्ट हासिल करने का सपना हजारों लोग देख रहे हैं. मैं भी उन्हीं में से एक हूं. लेकिन अगर उस औडियो में आई बातें सही हैं तो सच बता दूं कि मैं इतने पैसों का इंतजाम नहीं कर सकती. डेढ़ करोड़ रुपया बहुत होता है यार.’’

‘‘अब जब बात खुल ही गई है तो सीधेसीधे बता देती हूं कि यहां यही सब चल रहा है. फिर यह कोचिंग क्या मुफ्त में मिल रही है? मोटी फीस अदा करनी पड़ती है हर महीने. किताबों पर कितना खर्च हो रहा है. एकेडमी तक आनाजाना क्या फ्री में हो जाता है? सौ बातों की एक बात यह है कि सारी मेहनत और किया गया तमाम खर्च गड्ढे में चले जाना है.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यही कि जज की ऊंची कुरसी पर बैठना है तो यह इनवैस्टमेंट करना ही पड़ेगा. इस के बाद जिंदगी भर इस पोस्ट से कमाना ही है, बड़ा रुतबा मिलेगा, सो अलग. इतने बड़े काम के लिए डेढ़ करोड़ रुपया भला कौन सी बड़ी रकम है.’’

‘‘हमारे जैसे लोगों के लिए है न.’’ सुमन ने मायूस होते हुए कहा.

इस पर सुशीला चुप रह कर सोचने की मुद्रा में आ गई. कुछ देर सोचने के बाद उस ने सुमन का हाथ अपने हाथों में ले कर सधे हुए शब्दों में कहना शुरू किया, ‘‘देखो सुमन, तुम बहुत नाइस और मेहनती हो. मैं दिल से चाहती हूं कि अपने मकसद में कामयाब होते हुए जज की कुरसी तक पहुंचो. लेकिन तुम्हारी मजबूरी मुझे साफ दिख रही है. चलो, मैं कुछ करती हूं, तुम्हें रिलीफ दिलवाने के लिए.’’

इस के बाद इस बारे में दोनों के बीच होने वाली बात यहीं खत्म हो गई.

सुशीला के पति हरियाणा में सबइंसपेक्टर हैं. सुशीला पति को साथ ले कर 12 जुलाई को पिंजौर गई. मार्केट में एक जगह रुक कर उस ने सुमन को फोन कर के वहां बुलाया.

वह आ गईं तो सुशीला ने उन से सीधेसीधे कहा, ‘‘प्रश्नपत्र की कौपी सुनीता के पास है. उस ने यह कौपी डेढ़ करोड़ में खरीदी है. जो औडियो मैं ने गलती से तुम्हें भेज दिया था, उस में मेरी उसी से बात हो रही थी. सुनीता से मिल कर मैं ने तुम्हारे बारे में बात की है.’’

‘‘तो क्या कहा उस ने?’’ सुमन ने धड़कते दिल से पूछा.

‘‘देखो, मेरी बात का बुरा मत मानना, यह काम मुफ्त में तो होगा नहीं. आप 10-10 लाख कर के पैसे देती रहो. हर बार के 10 लाख पर तुम्हें प्रश्नपत्र में से 5-6 सवाल नोट करवा दिए जाएंगे. काम एकदम गारंटी वाला है, लेकिन बिना पैसों के होने वाला नहीं है. इतना जान लो कि इस तरह की सुविधा भी केवल तुम्हें दी जा रही है, वरना एकमुश्त डेढ़ करोड़ रुपया देने वालों की लाइन लगी है. पक्के तौर पर जज की पोस्ट उन्हीं लोगों से भरी जानी है.’’ सुशीला ने बताया.

‘‘ठीक है सुशीला, मैं सोचती हूं इस बारे में.’’ सुमन ने मायूस होते हुए कहा.

‘‘सोच लो, बस इस बात का ध्यान रखना कि टाइम बहुत कम है. एक बार मौका हाथ से निकल गया तो सिवाय पछताने के कुछ हासिल नहीं होगा.’’

एक तरह से चेतावनी देने के बाद सुशीला अपने पति के साथ वापस चली गई. कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था सुमन को, पैसा उन के पास था नहीं

सुमन इस सब से काफी अपसेट सी हो गई थी. जितने जोशोखरोश से वह परीक्षा की तैयारी कर रही थी, अब उस तरह पढ़ाई कर पाना उस के लिए मुश्किल हो गया था. उस का मन यह सोचसोच कर अवसाद से भरता जा रहा था कि जब जजों की नियुक्ति पैसा दिए जाने के बाद ही होनी है तो फिर इस तरह जीतोड़ मेहनत करने का क्या फायदा. इस तरह 2 दिन का वक्त और निकल गया. 15 जुलाई को सुशीला ने सुमन को फोन कर के दोपहर 2, ढाई बजे चंडीगढ़ के सेक्टर-17 स्थित सिंधी रेस्टोरेंट पहुंचने को कहा.

निर्धारित समय पर सुमन वहां पहुंच गईं. वहां सुशीला के साथ सुनीता भी थी. इन लोगों ने रेस्टोरेंट के फर्स्ट फ्लोर पर बैठ कर बातचीत शुरू की. सुनीता ने कहा कि वह सुमन का काम डेढ़ करोड़ की बजाय केवल 1 करोड़ में कर देगी, सीधे 50 लाख का फायदा.

सुमन के लिए यह कतई संभव नहीं था. फिर भी उन्होंने जैसेतैसे 10 लाख रुपयों का इंतजाम कर के सुनीता से संपर्क किया, लेकिन उस ने एक भी प्रश्न दिखाने से मना कर दिया. सुमन ने सुशीला से मिल कर उसे बताया कि पता नहीं क्यों सुनीता उस पर शक करते हुए अजीब ढंग से बात कर रही थी.

अब टाइम नहीं बचा था. अगले रोज पेपर था. सुशीला व सुनीता के साथ सुमन ने भी परीक्षा दी.

सुमन पढ़ाई में होशियार थीं, वह पेशे से वकील भी थीं. फिर भी रिजल्ट घोषित होने पर जहां सुमन को निराशा मिली, वहीं सुशीला और सुनीता इस टफ एग्जाम को क्लीयर कर गईं. यह बात भी सामने आई कि सुनीता सामान्य वर्ग में और सुशीला रिजर्व कैटेगरी में न केवल प्रथम आई थीं, बल्कि दोनों इतने ज्यादा अंक हासिल किए थे, जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

सुमन को इस परीक्षा के उत्तीर्ण न होने का इतना दुख नहीं था, जितना अफसोस इस बात का था कि जैसा सुशीला ने कहा था, वैसा ही हुआ था. यह एक बड़ी ज्यादती थी, जिस के बल पर जिंदगी में ऊंचा उठने के काबिल लोगों के भविष्य से सरेआम खिलवाड़ किया जा रहा था.

सुमन ने इस मुद्दे पर काफी गहराई से सोचा. उन के पास न केवल सुशीला द्वारा गलती से भेजी गई औडियो क्लिप थी, बल्कि बाद में भी उस के साथ हुई बात की कई टेलीफोनिक काल्स थीं, जो उन्होंने रेकौर्ड की थीं. आखिर उन से रहा नहीं गया और जुटाए गए सबूतों के साथ उन्होंने इस संबंध में अपनी एक याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दायर कर दी. यह याचिका हाईकोर्ट के वकील मंजीत सिंह के माध्यम से दाखिल की गई थी.

आखिर सुमन ने उठा ही लिया कानूनी कदम

हाईकोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए इस की गोपनीय तरीके से गहन जांच करवाई तो यह बात सामने आई कि इस घोटाले में मुख्यरूप से हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार डा. बलविंदर कुमार शर्मा शामिल थे. उन्हीं के पास परीक्षापत्र थे, जिन में से एक की कौपी करवा कर उन्होंने सुनीता को मुहैया करवा दी थी.

सुनीता सुशीला से मिल कर परीक्षार्थियों से संपर्क कर के डेढ़ करोड़ रुपयों में इस डील को अंतिम रूप देने लगी थी. रजिस्ट्रार का पद जज के पद के समानांतर होता है.

अपनी गहन छानबीन के बाद हाईकोर्ट ने इस मामले में डा. बलविंदर कुमार शर्मा, सुनीता और सुशीला के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर के इन्हें गिरफ्तार करने की संस्तुति दे दी.

इस तरह 19 सितंबर, 2017 को चंडीगढ़ के सेक्टर-3 स्थित थाना नौर्थ में भादंवि की धाराओं 409, 420 एवं 120बी के अलावा भ्रष्टाचार अधिनियम की धाराओं 8, 9, 13(1) व 13(2) के तहत तीनों आरोपियों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज हो गई.

हाईकोर्ट के आदेश पर ही इस केस की जांच के लिए चंडीगढ़ पुलिस के नेतृत्व में स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम का गठन कर दिया गया. इस एसआईटी में डीएसपी कृष्ण कुमार के अलावा थाना नौर्थ की महिला एसएचओ इंसपेक्टर पूनम दिलावरी को भी शामिल किया गया था. एफआईआर दर्ज हो जाने के बाद डा. बलविंदर कुमार को उन के पद से हटा दिया गया. 28 दिसंबर, 2017 को उन के अलावा सुनीता को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

डा. बलविंदर जहां जज के पद का रुतबा हासिल किए हुए थे, वहीं सुनीता भी वकालत करती थी. लिहाजा पुलिस द्वारा इन से सख्त तरीके से पूछताछ करना संभव नहीं था. मनोवैज्ञानिक आधारों पर ही पूछताछ कर के इन्हें न्यायिक हिरासत में भिजवा दिया गया. सुशीला अभी तक पकड़ में नहीं आई थी.

14 जनवरी, 2018 को उसे भी उस के पंचकूला स्थित आवास से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे अदालत में पेश कर के कस्टडी रिमांड में लिया गया. पुलिस ने उस से गहनता से पूछताछ की.

आज जहां हर केस की एफआईआर पुलिस की वेबसाइट पर उपलब्ध हो जाती है, इस मामले को सेंसेटिव केस की संज्ञा देते हुए इस की एफआईआर जगजाहिर नहीं की गई थी. पुलिस पत्रकारों से बचते हुए इस केस की छानबीन का काम निहायत होशियारी से करती रही. इस मामले में किस ने कितना पैसा लिया, किस ने दिया और किस से कितना रिकवर किया गया, आदि मुद्दों की जानकारी पुलिस ने सामने नहीं आने दी.

हाईकोर्ट के आदेश पर जज के पद की यह प्रारंभिक परीक्षा पहले ही रद्द कर दी गई थी. थाना पुलिस ने तीनों अभियुक्तों के खिलाफ अपनी 2140 पेज की चार्जशीट अदालत में पेश कर दी है. अन्य केसों के आरोपियों की तरह इस केस के आरोपी भी अपने को बेकसूर कह रहे हैं. किस का क्या कसूर रहा, इस घोटाले में किस की क्या भूमिका रही, इस का उत्तर तो केस का फैसला आने पर ही मिल पाएगा.

बहरहाल, जज जैसे अतिप्रतिष्ठित पद के साथ भ्रष्टाचार का ऐसा खिलवाड़ किसी त्रासदी से कम नहीं.

न्यूड फोटो से ब्लैकमेलिंग

सेजल ने अपनी छोटी बहन को वाट्सऐप से एक स्क्रीन शौट भेज कर मैसेज किया, जिस में उस की न्यूड फोटो को वायरल करने की धमकी दे कर पैसे मांगने की बातचीत थी. यही नहीं, उस ने स्टेटस भी लगाया था कि उस के साथ फ्रौड हुआ है. बहन के मोबाइल पर स्टेटस और उस के द्वारा भेजा गया मैसेज देख कर छोटी बहन ने तुरंत सेजल से बात की थी.

तब सेजल ने बताया था कि कुछ दिनों पहले उस ने बैंक लोन की जानकारी के लिए अपने मोबाइल में कैशमाय ऐप डाउनलोड किया था, उसी समय उस ने ऐप की सारी कंडीशन एक्सेप्ट कर ली थीं. इस के बाद उस के फोन ने एक्सेस दे दिया था.

कहने का मतलब यह है कि इस तरह उस का फोन हैक हो गया था. इस के कुछ दिनों बाद उस के वाट्सऐप पर उस की न्यूड फोटो भेज कर धमकी दी गई थी कि अगर उस ने जितने पैसे मांगे जा रहे हैं, उतने पैसे नहीं दिए तो उस का यह फोटो उस के सभी रिश्तेदारों और मित्रों को तो भेज ही दिया जाएगा, सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिया जाएगा.

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              सेजल

अपने न्यूड फोटो देख कर सेजल घबरा गई थी. उस ने कई बार औनलाइन ट्रांजैक्शन के जरिए पैसे मांगने वालों को करीब 45 हजार 5 सौ रुपए भेज चुकी थी, पर वे तो अभी भी पैसे की मांग कर रहे थे.

गुजरात का सूरत शहर साडिय़ों के लिए जाना जाता है. यहां साडिय़ां तैयार करने के लिए छोटीछोटी तमाम फैक्ट्रियां हैं, इसलिए पूरे देश से लोग यहां रोजीरोटी की तलाश में आते हैं.

अपनी नौकरी की वजह से ही मूलरूप से गुजरात के कोसंबा के रहने वाले दौलतभाई परमार का 25 साल पहले सूरत तबादला हुआ तो फिर वह यहीं के हो कर रह गए थे. वह इनकम टैक्स विभाग में नौकरी करते थे. सूरत के ही जहांगीरपुरा में उन्होंने अपना मकान बना लिया था, जहां वह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी जागृतिबेन के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था.

दौलतभाई के बच्चों में सेजल सब से बड़ी थी. बड़ी होने की वजह से मम्मीपापा की लाडली थी. फिर वह पढऩे में भी बहुत अच्छी थी, इसलिए मम्मीपापा उसे जान से ज्यादा प्यार करते थे.

सेजल ने वनिता विश्राम स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई की थी. 12वीं में उस की स्कूल में तीसरी रैंक आई थी. इस के बाद उस ने नवयुग कालेज से बीएससी किया. सेजल इतनी ब्राइट स्टूडेंट थी कि कालेज में उस की पहली रैंक आई थी.

इस के बाद उस ने वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी से कैमिस्ट्री में एमएससी किया, जहां उस की सेकेंड रैंक आई थी. अच्छी रैंक आने के कारण उसे इसी यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिल गई थी. अपनी नौकरी करते हुए वह पीएचडी भी कर रही थी. पीएचडी का उस का एक साल पूरा हो गया था. 14 मार्च को उस का पीएचडी का रिजल्ट आया, जिस में वह पास हो गई थी. वह बहुत खुश थी.

लेकिन अगले दिन ही उस की खुशी उडऩछू हो गई, क्योंकि ब्लैकमेलर ने उस के न्यूड फोटो वायरल करने की धमकी दे कर मोटी धनराशि की मांग की.

सेजल बहुत परेशान हो गई. उस ने यह बात अपनी बहन को बताई तो छोटी बहन के कहने पर सेजल ने थाना रांदेर जा कर अपने ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. उस ने थाना रांदेर पुलिस को वे नंबर भी दिए थे, जिन से उसे मैसेज आ रहे थे. पता चला कि वे सभी नंबर पाकिस्तान की आईडी के थे.

रेलवे लाइनों में मिली प्रोफेसर की लाश

उसी दिन यानी 15 मार्च को पिता दौलतभाई की नौकरी के 30 साल पूरे हुए थे, जिस के उपलक्ष्य में उन्होंने औफिस में तो मिठाई बांटी ही थी, सेजल के कहने पर वह घर भी मिठाई ले कर आए थे. घर में खुशी का माहौल था.

सब ने साथ बैठ कर मिठाई खाई थी. तब ऐसा कुछ भी नहीं लग रहा था कि सेजल परेशान है. उस ने पिता से तो क्या, घर में छोटी बहन के अलावा किसी अन्य से भी अपने ब्लैकमेल होने के बारे में कोई बात नहीं की थी.

खूबसूरत सेजल की बढिय़ा नौकरी थी. वेतन भी अच्छाखासा था. वह घर से ही यूनिवर्सिटी जाती थी. 16 मार्च, 2023 को भी सेजल सफेद सलवार और सफेद कुरता पहन कर यूनिवर्सिटी जाने के लिए उसी तरह घर से निकली थी, जिस तरह रोजाना निकलती थी. पर उस दिन वह घर लौट कर नहीं आई.

दोपहर के बाद उस के भाई हर्ष परमार के पास रेलवे पुलिस का फोन आया कि वीर नर्मद दक्षिण यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर सेजल परमार ने उत्राण और कोसाद रेलवे स्टेशन के बीच सौराष्ट्र एक्सप्रैस के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली है.

यह खबर हर्ष ने जब घर वालों को बताया तो घर वालों पर तो आफत ही टूट पड़ी. पूरा परिवार बिलखबिलख कर रोने लगा. रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी दौड़े आए. वजह जान कर सभी को दुख हुआ. क्योंकि सेजल ऐसी लड़की थी, जो सब की चहेती थी.

खास रिश्तेदारों को भी सूचना दी गई. दौलतभाई औफिस में थे. सूचना पाते ही अपने कुछ सहयोगियों के साथ वह घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

इधर हर्ष अपनी मां, छोटी बहन, कुछ पड़ोसियों और नजदीकी रिश्तेदारों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गया. सब ने पहुंच कर लाश की शिनाख्त की. रेलवे पुलिस ने घटनास्थल की अपनी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए सूरत के सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

सेजल की आत्महत्या का मुकदमा रेलवे पुलिस ने दर्ज कर जांच शुरू की. सेजल के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था. रेलवे थाना पुलिस को पूछताछ में पता चला कि 2 दिन पहले सेजल ने सूरत के थाना रांदेर में एक रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिस में उस ने लिखाया था कि कोई उसे न्यूड फोटो वायरल करने की धमकी दे कर पैसे वसूल रहा है.

रेलवे पुलिस को जब पता चला कि यह ब्लैकमेलिंग का मामला है और इस की रिपोर्ट पहले से ही थाना रांदेर मे दर्ज है तो उन्होंने सेजल की आत्महत्या का जो मुकदमा दर्ज किया था, उसे थाना रांदेर को ट्रांसफर कर दिया.

प्रोफेसर को ससुराल वाले क्यों करते थे टौर्चर

थाना रांदेर के एसएचओ इंसपेक्टर अतुल सोनारा इस मामले की जांच में लगे ही थे. उन्हें तो पहले से ही पता था कि यह ब्लैकमेलिंग का मामला है. उन्होंने घर वालों से पूछताछ शुरू की. पूछताछ में पता चला कि सेजल का विवाह 3 साल पहले 9 दिसंबर, 2021 को सूरत के ही एक परिवार में हुआ था. पर उस का पति विवाह के 3 महीने बाद ही उस पर बदचलनी का आरोप लगा कर अस्पताल ले जाने के बहाने मायके छोड़ गया था.

ससुराल वाले उस पर डिवोर्स के लिए दबाव डाल रहे थे. सास ने महिला थाने में सेजल पर चीटिंग का मुकदमा भी दर्ज कराया था, जिस के लिए सेजल को थाने जा कर बयान भी दर्ज कराना पड़ा था. इस तरह ससुराल वाले सेजल को प्रताडि़त करने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहे थे.

पर मायके वालों ने सेजल को तनाव में नहीं आने दिया. सभी लोग हर तरह से उस का सहयोग कर रहे थे. वीर नर्मद दक्षिण यूनिवर्सिटी में उसे असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी मिल ही चुकी थी. वह 12 बजे तक एमएससी के बच्चों को केमिस्ट्री पढ़ाती थी. उस के बाद अपनी पीएचडी की पढ़ाई करती थी. यूनिवर्सिटी वह अकेली ही आतीजाती थी.

वह अपने काम पर पूरा ध्यान दे रही थी. इसलिए ससुराल वालों के परेशान करने के बावजूद उस ने कभी थाने में शिकायत नहीं दर्ज कराई थी. डिवोर्स का भी मुकदमा इसलिए नहीं किया था कि उसे बारबार थाने या कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे, जिस से उस की पढ़ाई का नुकसान होगा. वह पढ़ाई पूरी करने के बाद डिवोर्स लेना चाहती थी.

सेजल के घर वालों ने आरोप लगाया था कि यह सब सेजल के पति ने कराया होगा. क्योंकि वह सेजल को परेशान करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

वैसे भी सेजल को बदनाम करने के लिए सभी से कहता था कि सेजल भाग गई है. उसी ने सेजल को न्यूड फोटो वायरल करने धमकी दिलाई होगी. क्योंकि सेजल ने आत्महत्या करने से पहले उसे 3 फोन किए थे, पर उस ने फोन नहीं उठाया था. अगर उस ने फोन उठा लिया होता तो शायद सेजल जिंदा होती.

पुलिस ने जब इस मामले की गहराई से जांच की तो पता चला कि सेजल की ससुराल वाले सेजल के साथ कैसा भी व्यवहार करते रहे हों, पर इस मामले में उन का कोई हाथ नहीं है.

सेजल के साथ यह जो ब्लैकमेलिंग हो रही थी, इस की उन्हें जानकारी थी, क्योंकि ब्लैकमेलर्स ने सेजल का मोर्फ किया हुआ फोटो उस के पति को भी भेजा था.

उस ने वह फोटो अपने घर वालों को दिखाया भी था, पर इस की जानकारी न तो सेजल को दी थी, न ही उस के घर वालों को. उस ने सेजल की आत्महत्या के बाद भी किसी को नहीं बताया था कि उस के पास सेजल का मोर्फ किया हुआ फोटो आया था.

पाकिस्तानी नंबरों की क्या थी हकीकत

जब सेजल के ससुराल वाले बेगुनाह दिखे तो पुलिस ने उन नंबरों के माध्यम से जांच आगे बढ़ाने का फैसला किया, जिन से सेजल को मैसेज भेजे जा रहे थे. पता चला कि तीनों नंबर पाकिस्तान के थे.

पुलिस को इन नंबरों पर शक हुआ. क्योंकि सेजल ने जिस आईडी पर पैसे भेजे थे, वे इंडिया की थीं. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि जिन पाकिस्तानी नंबरों से फोन किया जा रहा था, वे वर्चुअली बनाए गए हैं. वे सेजल की मौत के बाद भी मैसेज कर के पैसे भेजने के लिए कह रहे थे. इतना ही नहीं, वे पुलिस को भी इस तरह गालियां दे रहे थे, जैसे उन्हें पुलिस का जरा भी डर न हो.

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यह पूरा मामला सोशल मीडिया से जुड़ा था, इसलिए सूरत के पुलिस कमिश्नर अजय तोमर ने इस मामले में थाना पुलिस की मदद के लिए पुलिस की साइबर टीम को भी लगा दिया. इस मामले को डीसीपी हर्षद मेहता खुद हैंडिल कर रहे थे.

साइबर विभाग ने जब आईपी एड्रेस की जांच की तो सारे नंबरों की लोकेशन बिहार की मिली. इस के बाद गुजरात पुलिस की एक टीम बिहार के जिला जमुई गई. बिहार का यह नक्सली इलाका है. तब भेष बदल कर स्थानीय पुलिस की मदद से सूरत की पुलिस ने 5 मई, 2023 को जमुई के केवली गांव से 3 लोगों अभिषेक कुमार, रोशन कुमार और सौरभ राज को गिरफ्तार किया.

पूछताछ में अभियुक्तों ने बताया कि वे मात्र 10वीं पास हैं. उन्होंने औनलाइन सर्च द्वारा फोन हैक करना सीखा और घर से दूर खेतों में या जंगलों में बैठ कर लोगों को मोर्फ की गई न्यूड फोटो भेज कर वायरल करने की धमकी दे कर पैसे वसूल करते हैं.

वे किसी के फोन में एप्लिकेशन भेज कर औफर देते हैं. तमाम कंडीशन एक्सेप्ट करने के बाद मोबाइल एक्सेस दे देता है. इस के बाद उस की फोटो को मोर्फ कर के न्यूड फोटो भेज कर धमकी दे कर पैसे वसूलते हैं.

ऐसा ही उन्होंने सेजल के साथ भी किया था. सेजल ने कुछ पैसे भेजे भी थे. लेकिन वे तो लाखों रुपए मांग रहे थे. जब सेजल ने उतने पैसे देने से मना किया तो उस पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने मोर्फ किया गया उस का न्यूड फोटो उस के पति को ही नहीं, उस के दोस्तों को भी भेज दिया था.

पति के पास उस का न्यूड फोटो पहुंच गया है, इस बात की जानकारी सेजल को हो गई थी. ससुराल वाले उसे ऐसे ही बदनाम कर रहे थे. अब उन्हें बदनाम करने के लिए सेजल की न्यूड फोटो भी मिल गई थी. अगर उन्होंने उस की फोटो वायरल कर दी तो वह और उस के घर वाले समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगे.

सेजल ने पति को यही बताने के लिए कई बार फोन किया था, पर उस ने फोन उठाया ही नहीं था. तब इज्जत बचाने के लिए सेजल ने ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली थी.

पुलिस ने गिरफ्तार तीनों अभियुक्तों के पास से लैपटाप, प्रिंटर, कीबोर्ड, फिंगर प्रिंट मशीन और करीब 15 हजार आधार कार्ड की फोटोस्टेट कौपियां जब्त की थीं.

ये लोगों को लोन की किस्त भरने के नाम पर फंसाते थे और उन का फोन हैक कर के न्यूड फोटो भेज कर धमका कर पैसा वसूल करते थे. गिरफ्तार अभियुक्तों को स्थानीय अदालत में पेश कर के ट्रांजिट रिमांड पर सूरत लाया गया.

अभिषेक, रोशन कुमार और सौरभ से पूछताछ में पता चला कि इस मामले में यही 3 लोग शामिल नहीं हैं. रिमांड के दौरान पूछताछ में इन के पाकिस्तान कनेक्शन का पता चला. इन के साथ रेशम कुमार, लकबीर ट्रेडर्स, जूही शेख और शांतनु जोंघले भी यही काम कर रहे थे. इन सभी के नंबर बिहार से गिरफ्तार अभियुक्तों से मिल गए थे.

गैंग में शामिल थीं 2 महिलाएं

पुलिस को अन्य लोगों की लोकेशन तो नहीं मिली, पर जूही शेख की लोकेशन मिल गई थी. वह आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा स्ट्रीट के पांजा सेंटर में रहती थी. उसे गिरफ्तार करने के लिए सूरत पुलिस की एक टीम भेजी गई. इस टीम में 6 सदस्य शामिल थे, जिस में 2 महिलाएं थीं और 4 पुरुष. इस टीम का नेतृत्व खुद एसीपी बी.एम. चौधरी कर रहे थे.

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                               आरोपी जूही शेख

विजयवाड़ा पहुंच कर पुलिस टीम ने लोकेशन तो ट्रेस कर ली, पर यह पता नहीं चल पा रहा था कि जूही रहती किस घर में है. दूसरी सब से बड़ी समस्या यह थी कि वह मुसलिम बहुल इलाका था.

तब सूरत से गए पुलिसकर्मियों ने स्थानीय पुलिस की मदद से अपने नाम बदल कर मुसलिमों जैसे कपड़े पहने और किराए का मकान ढ़ूंढऩे के बहाने जूही की तलाश शुरू की. वे कभी पतिपत्नी बन कर लोगों से मकान के बारे में पूछते थे तो कभी भाईबहन बन कर. पुलिस 3 दिनों तक जूही का पता लगाने के लिए भटकती रही.

तीसरे दिन जैसे ही जूही की सही लोकेशन मिली, पुलिस ने उसे धर दबोचा. पुलिस जिस समय उसे गिरफ्तार करने पहुंची, वह बाथरूम में घुस कर मोबाइल का डाटा डिलीट कर रही थी. तलाशी में उस के पास 3 मोबाइल फोन, 2 बैंकों की पासबुकें और 72 यूपीआई एड्रेस मिले थे. पता चला कि उस के कुल 7 बैंक एकाउंट थे. उसे भी स्थानीय अदालत में पेश कर के ट्रांजिट रिमांड पर सूरत लाया गया.

जूही को सूरत ला कर अदालत में पेश किया गया, जहां से पूछताछ के लिए उसे रिमांड पर लिया गया. फोन तथा ईमेल आईडी की जांच से पता चला कि वह आसानी से कर्ज चुकाने के नाम पर लोगों को ठगती थी और वह यहां से जो पैसे वसूलती थी, उस का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में बैठे अपने आका जुल्फिकार को डिजिटल करेंसी बिटकौइन के माध्यम से भेजती थी.

डीसीपी हर्षद मेहता ने बताया कि जूही शेख एप्लीकेशन के माध्यम से सैक्सटौर्शन की बदौलत रोजाना 50 से 60 हजार रुपए की ठगी कर रही थी. यह काम वह पिछले 5-6 सालों से कर रही थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

Muthoot Finance से करोड़ों के सोने की लूट का मास्टरमाइंड

  21जुलाई, 2017 की बात है. जयपुर पुलिस उस दिन कुछ ज्यादा ही चाकचौबंद थी. उस दिन भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 3 दिन के दौरे पर जयपुर आ रहे थे.

इसी के मद्देनजर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल उस दिन जल्दी उठ गए थे. उन्होंने अपने मातहत वरिष्ठ अधिकारियों को वायरलैस और फोन पर आवश्यक निर्देश दिए ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी की कोई गुंजाइश न रहे. सीआईडी, इंटेलीजेंस और पुलिस की विशेष शाखा के जवान अपनेअपने मोर्चे पर नजरे जमाए हुए थे. शहर के प्रमुख मार्गों पर पुलिस ने नाकेबंदी कर रखी थी ताकि आपराधिक प्रवृत्ति के लोग बाहर से शहर में आ न सकें.

दोपहर करीब पौने 2 बजे के आसपास पुलिस कमिश्नर अग्रवाल जब अपने औफिस में बैठे थे, तभी उन्हें जयपुर शहर में एक बड़ी वारदात की सूचना मिली. मातहत अधिकारियों ने बताया कि मानसरोवर में मुथूट फाइनैंस की शाखा में दिनदहाड़े डकैती हुई है. 4 बदमाश करोड़ों रुपए का सोना और लाखों रुपए नकद लूट ले गए हैं.

वारदात की सूचना मिलने पर पुलिस कमिश्नर खीझ उठे. शहर में सभी प्रमुख जगहों पर पुलिस तैनात होने के बावजूद बदमाश करोड़ों रुपए का सोना लूट ले गए थे. खास बात यह थी कि जयपुर में दिनदहाड़े बैंक लूट के 28 घंटे बाद ही गोल्ड लूट की बड़ी वारदात हो गई थी. पुलिस कमिश्नर ने अपने गुस्से पर काबू पाते हुए अधिकारियों को तुरंत मौके पर भेजा. साथ ही शहर के सभी मार्गों पर कड़ी नाकेबंदी कराने के भी निर्देश दिए.

मुथूट फाइनैंस की शाखा जयपुर के मानसरोवर इलाके में रजतपथ चौराहे पर पहली मंजिल पर है. उस दिन दोपहर करीब एक बजे की बात है. उस समय लंच शुरू होने वाला था. मुथूट के कार्यालय में मैनेजर सत्यनारायण तोषनीवाल अपने केबिन में बैठे थे. बंदूकधारी गार्ड दीपक सिंह गेट पर खड़ा था. कर्मचारी टीना शर्मा एवं मीनाक्षी अपने काउंटरों पर बैठी थीं. 2 ग्राहक नंदलाल गुर्जर और घनश्याम खत्री भी मुथूट के औफिस में मौजूद थे. मुथूट के उस औफिस में कुल 5 कर्मचारी थे. उस दिन एक कर्मचारी फिरोज छुट्टी पर था.

इसी दौरान एक युवक मुथूट के कार्यालय में आया. युवक ने सिर पर औरेंज कलर की कैप लगा रखी थी. उस ने अपने गले में पहनी एक चेन महिला कर्मचारी मीनाक्षी को दिखाई और कहा कि सोने की इस चेन के बदले मुझे लोन चाहिए, कितना लोन मिल सकता है?

मीनाक्षी उस युवक को दस्तावेज लाने की बात कह रही थी, तभी हेलमेट पहने 2 युवक अंदर आए. इन के तुरंत बाद चेहरे पर रूमाल बांधे तीसरा युवक अंदर गेट के पास आ कर खड़ा हो गया. उन तीनों युवकों के आने पर चेन दिखा रहा वह युवक भी उन के साथ हो गया.

उन में से हेलमेटधारी बदमाशों ने पिस्तौल निकाल ली और वहां मौजूद कर्मचारियों और ग्राहकों को धमका कर चुपचाप एक कोने में बैठने को कहा. इतनी देर में गेट के पास चेहरे पर रूमाल बांधे खड़े बदमाश ने गार्ड दीपक सिंह से उस की बंदूक छीन ली और उसे जमीन पर बैठने को कहा. बदमाशों के डर से गार्ड चुपचाप नीचे बैठ गया.

कर्मचारियों व ग्राहकों को धमकाने के बाद पिस्तौल लिए एक बदमाश मैनेजर तोषनीवाल के पास पहुंचा. बदमाश ने उन की कनपटी पर पिस्तौल तानते हुए स्ट्रांगरूम की चाबी मांगी. मैनेजर ने चिल्लाते हुए अपने केबिन से निकल कर भागने की कोशिश की, लेकिन गेट पर खड़े बदमाश ने उन से मारपीट की और बंदूक दिखा कर अंदर धकेल दिया. साथ ही गोली मारने की धमकी भी दी.

खुद को चारों तरफ से घिरा देख कर भी मैनेजर ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने बदमाशों को गुमराह करने के लिए कहा, ‘‘मेरे पास एक ही चाबी है. स्ट्रांगरूम 2 चाबियों से खुलता है. दूसरी चाबी कैशियर के पास है, वह बैंक गया हुआ है.’’

बदमाशों ने मैनेजर से एक ही चाबी ले कर स्ट्रांगरूम खोलने की कोशिश की. मामूली कोशिश के बाद स्ट्रांगरूम खुल गया तो 2 बदमाशों ने स्ट्रांगरूम का सोना और नकदी निकाल कर अपने साथ लाए एक बैग में भर ली. 2 बदमाश जब स्ट्रांगरूम से बैग में सोना भर रहे थे तो मैनेजर ने बदमाशों से खुद को बीमार बताते हुए बाथरूम जाने देने की याचना की. इस पर बदमाशों ने मैनेजर को बाथरूम जाने दिया. मैनेजर सत्यनारायण तोषनीवाल ने बाथरूम में घुसते ही अंदर से गेट बंद कर लिया.

कंपनी के बाथरूम में इमरजेंसी अलार्म लगा हुआ था, मैनेजर ने वह अलार्म बजा दिया. साथ ही उन्होंने बाथरूम से ही मुथूट फाइनैंस कंपनी के जयपुर के ही एमआई रोड स्थित कार्यालय और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन भी कर दिया. अलार्म बजने पर दोपहर करीब 1.22 बजे चारों बदमाश सोना व नकदी ले कर तेजी से सीढि़यों से नीचे उतर कर चले गए. बाद में पता चला कि बदमाश 2 मोटरसाइकिलों पर आए थे और मोटरसाइकिलों पर ही चले गए थे.

सूचना मिलने पर डीसीपी क्राइम डा. विकास पाठक, एसीपी देशराज यादव के अलावा मानसरोवर थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. एफएसएल टीम और डौग स्क्वायड को भी मौके पर बुला लिया गया. पुलिस ने जांचपड़ताल की. कर्मचारियों व वारदात के दौरान मौजूद रहे ग्राहकों से पूछताछ की.

पुलिस ने मौके पर एक काउंटर से दस्ताने बरामद किए. ये दस्ताने एक बदमाश छोड़ गया था. मैनेजर ने स्ट्रांगरूम और अन्य नकदी का हिसाबकिताब लगाने के बाद प्रारंभिक तौर पर पुलिस अधिकारियों को बताया कि बदमाश 31 किलोग्राम सोना और 3 लाख 85 हजार रुपए नकद लूट ले गए थे.

मैनेजर ने पुलिस को बताया कि अलार्म बज जाने से लुटेरे करीब 10 करोड़ रुपए कीमत का 35 किलो सोना नहीं ले जा सके थे. वारदात के समय स्ट्रांगरूम में 65 किलो से ज्यादा सोना रखा था. लुटेरे अपने साथ 2-3 बैग लाए थे, लेकिन वे एक बैग में ही सोना भर पाए थे, तभी अलार्म बज गया और जल्दी से भागने के चक्कर में वे बाकी सोना छोड़ गए.

मुथूट कंपनी की इस शाखा से करीब ढाई हजार ग्राहक जुडे़ हुए थे. लुटेरे इन में से करीब एक हजार ग्राहकों का सोना ले गए थे. हालांकि बाद में कंपनी के अधिकारियों ने सारा रिकौर्ड देखने के बाद बताया कि लूटे गए सोने का वजन करीब 27 किलो था.

वारदात के बाद मुथूट की महिला कर्मचारी टीना शर्मा बहुत डरी हुई थी. गर्भवती टीना शर्मा वारदात के बारे में पुलिस को बताते हुए रोने लगी. कर्मचारियों में से मीनाक्षी ने बताया कि बदमाश बोलचाल से उत्तर प्रदेश या हरियाणा के लग रहे थे. उन में एक की उम्र करीब 35 साल थी, जबकि बाकी लुटेरे 25 से 30 साल के थे.

मानसरोवर के भीड़भाड़ वाले इलाके में दिनदहाड़े इतनी बड़ी लूट हो गई, लेकिन किसी को इस का पता तक नहीं चला. इस का कारण यह था कि मुथूट फाइनैंस के पहली मंजिल स्थित औफिस में पहुंचने के लिए सीढि़यां दुकानों के पीछे से हैं. मानसरोवर में रजतपथ चौराहे के कौर्नर पर 2 मंजिला इमारत में ग्राउंड फ्लोर पर भारतीय स्टेट बैंक की शाखा और कपड़ों के शोरूम हैं. पहली मंजिल पर मणप्पुरम गोल्ड लोन कंपनी और एक तरफ मुथूट फाइनैंस के औफिस हैं. यह पूरा इलाका भीड़भाड़ वाला है.

पुलिस ने मुथूट फाइनैंस कार्यालय में तथा आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले. इन फुटेज में सब से पहले अंदर आए औरेंज टोपी वाले बदमाश का चेहरा साफ नजर आ रहा था. बाकी तीनों बदमाशों की कदकाठी और हावभाव ही नजर आए थे. आसपास की फुटेज से पता चला कि बदमाश 2 मोटरसाइकिलों से आए थे. उन की मोटरसाइकिलों पर नंबर नहीं थे. इन्हीं मोटरसाइकिलों से वे सोना और नकदी ले कर भाग गए थे.

मुथूट के औफिस से लूटपाट के बाद सीढि़यों से उतरते हुए बदमाशों ने स्ट्रांगरूम की चाबी फेंकी थी. चाबी को सूंघ कर पुलिस के डौग ने बदमाशों का उन की गंध के आधार पर पीछा किया.

डौग स्क्वायड रजतपथ चौराहे से मध्यम मार्ग से हो कर स्वर्णपथ चौराहे पर पहुंचा. वहां से वह न्यू सांगानेर रोड की तरफ गया, लेकिन कुछ देर पहले तेज बारिश होने से वहां पानी भर गया था. इस से डौग स्क्वायड को बदमाशों की आगे की गंध नहीं मिल सकी. बदमाशों की तलाश में पुलिस ने शहर में चारों तरफ कड़ी नाकेबंदी कराई, लेकिन लुटेरों का कोई सुराग नहीं मिला. कंपनी के गार्ड को थाने ले जा कर पुलिस ने पूछताछ की, लेकिन उस से भी कुछ खास जानकारी नहीं मिली. अंतत: पुलिस ने उसे छोड़ दिया. पुलिस ने कंपनी के अन्य कर्मचारियों की भूमिका की भी जांचपड़ताल की.

दूसरी ओर, लूट की वारदात होने के बाद मुथूट फाइनैंस में सोने के जेवर रख कर लोन लेने वाले ग्राहकों का तांता लग गया. ये ग्राहक अपने सोने के जेवर लूटे जाने की बात से चिंतित थे. इस पर कंपनी के अधिकारियों ने ग्राहकों को बताया कि लूटे गए सोने का बीमा करवाया हुआ है. किसी भी ग्राहक का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा.

मुथूट फाइनैंस से करीब 8 करोड़ का सोना और इस से एक दिन पहले आदर्श नगर के राजापार्क में धु्रव मार्ग स्थित यूको बैंक की तिलक नगर शाखा में हुई 15 लाख रुपए की लूट ने जयपुर पुलिस की नींद उड़ा दी थी.

पुलिस ने बदमाशों की तलाश में जयपुर शहर सहित आसपास के जिलों में नाकेबंदी कराई, लेकिन बदमाशों का पता नहीं चला. पुलिस ने अनुमान लगाया कि लुटेरे जयपुर-आगरा हाईवे या जयपुर-दिल्ली हाईवे पर हो कर निकल भागे थे.

इन दोनों हाईवे की दूरी बैंक से दो-ढाई किलोमीटर है. जिस तरीके से वारदात हुई थी, उस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि बदमाशों ने कई दिन रैकी होगी. यह भी अनुमान लगाया गया कि बदमाशों के कुछ अन्य सहयोगी भी थे, जो बाहर खडे़ रह कर नजर रखे हुए थे.

पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने मातहत अधिकारियों की बैठक कर वारदात का पता लगाने के लिए विशेष टीम का गठन किया. मुथूट फाइनैंस में हुई 8 करोड़ के सोने की लूट का राज फाश करने की जिम्मेदारी डीसीपी क्राइम डा. विकास पाठक, डीसीपी साउथ योगेश दाधीच और एसओजी के एएसपी करण शर्मा के नेतृत्व वाली टीम को सौंपी गई. पुलिस ने पूरे राजस्थान सहित उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व हरियाणा पुलिस से लूट और डकैती की वारदातों और उन्हें अंजाम देने वाले गिरोहों की जानकारी मांगी.

पुलिस को शक था कि वारदात करने वाले बदमाश लूटे गए सोने को कहीं किसी कंपनी में गिरवी न रख दें. पुलिस राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों में संचालित ऐसी कंपनियों से संपर्क बनाए हुए थे. जयपुर में कुछ साल पहले गोल्ड लोन फर्म में हुई डकैती के लूटे गए सोने को बदमाशों ने दूसरी गोल्ड लोन कंपनी में गिरवी रख कर रकम ले ली थी.

दिलचस्प बात यह है कि देश का करीब 47 प्रतिशत सोना केरल की 3 कंपनियों मुथूट फाइनैंस, मणप्पुरम फाइनैंस व मुथूट फिनकौर्प के पास है. सितंबर 2016 तक इन कंपनियों के पास 263 टन सोना था. सोने की कीमत 7 खरब 36 अरब 40 करोड़ रुपए आंकी गई थी. इन में मुथूट फाइनैंस की गोल्ड होल्डिंग करीब 150 टन है. यह सोना कई अमीर देशों के स्वर्ण भंडार से भी ज्यादा है. मणप्पुरम फाइनैंस के पास 65.9 टन एवं मुथूट फिनकौर्प के पास 46.88 टन सोना होने का अनुमान है. जबकि भारत की कुल गोल्ड होल्डिंग 558 टन है.

देश की सब से बड़ी गोल्ड फाइनैंसिंग कंपनी के रूप में पहचान रखने वाली मुथूट फाइनैंस कंपनी की विभिन्न शाखाओं में 4 साल के दौरान लूट व डकैती की 7 वारदातें हुई हैं. इन में करीब डेढ़ क्विंटल सोना लूटा गया है. सन 2013 में 21 फरवरी को लखनऊ में इस कंपनी की शाखा से 6 करोड़ रुपए से ज्यादा का करीब 20 किलो सोना लूटा गया था. सन 2015 में 22 फरवरी को ढाई करोड़ रुपए से अधिक के करीब 10 किलो सोने की डकैती हुई. वर्ष 2016 में 30 जनवरी को पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले में 9 करोड़ रुपए मूल्य का 30 किलो सोना लूटा गया.

पिछले साल ही 16 मई, 2016 को पंजाब के पटियाला में करीब 3 करोड़ रुपए के 11 किलो सोने की लूट हुई. 28 दिसंबर, 2016 को हैदराबाद में 12 करोड़ रुपए का करीब 40 किलो सोना लूटा गया. 23 फरवरी, 2017 को पश्चिम बंगाल के पूर्वी कोलकाता स्थित बेनियापुकुर में 5 करोड़ से ज्यादा के करीब 20 किलो सोने की डकैती हुई.

जयपुर पुलिस ने 21 जुलाई, 2017 को मुथूट फाइनैंस की शाखा से करीब 27 किलो सोना लूटने के मामले में 21 अगस्त, 2017 को बिहार की राजधानी पटना से 3 आरोपियों शुभम उर्फ सेतू उर्फ शिब्बू भूमिहार, पंकज उर्फ बुल्ला यादव और विशाल कुमार उर्फ विक्की उर्फ रहमान यादव को गिरफ्तार किया. ये तीनों आरोपी बिहार के वैशाली जिले के हाजीपुर के रहने वाले थे. इन लोगों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने यह वारदात गिरोह के सरगना सुबोध उर्फ राजीव और अन्नू उर्फ राहुल के साथ मिल कर की थी. लूट का सोना सुबोध के पास था.

  योजना के अनुसार, इन लोगों ने 3 जुलाई को जयपुर आ कर मुथूट की शाखाओं की रैकी की. इस में मानसरोवर की शाखा को वारदात के लिए चुना गया. इस के बाद वारदात के लिए उन्होंने आगरा से एक नई और एक पुरानी मोटरसाइकिल खरीदी. इस के बाद वारदात से 5 दिन पहले राजस्थान के टोंक जिले के कस्बा निवाई पहुंच कर शुभम, पंकज व विशाल ने खुद को नेशनल हाईवे बनाने वाली कंपनी का अधिकारी बता कर निवाई में साढ़े 4 हजार रुपए महीना किराए पर मकान लिया था.

निवाई में उन्होंने दिल्ली से एक कार मंगवाई. यह पुरानी कार 40 हजार रुपए में खरीदी गई थी. 21 जुलाई को कार व चालक को निवाई में छोड़ कर वहां से 2 मोटरसाइकिलों पर सवार हो कर विशाल, सुबोध, अन्नू व शुभम जयपुर में मानसरोवर स्थित मुथूट फाइनैंस की शाखा पर पहुंचे.

सब से पहले विशाल अंदर घुसा. फिर सुबोध, अन्नू व शुभम अंदर गए. सुबोध व अन्नू ने बैग में सोना भरा. वारदात के बाद भागने के लिए इन्होंने पहले ही गूगल मैप देख कर रूट तय कर लिया था. वारदात के बाद विशाल व सुबोध एक मोटरसाइकिल से निवाई पहुंचे और कार में सोना रख कर पटना चले गए.

अन्नू व शुभम दूसरी मोटरसाइकिल से जयपुर से अजमेर पहुंचे और हाईवे पर बाइक छोड़ कर बस से आगरा गए. आगरा से ये लोग पटना चले गए. रैकी करने जयपुर आने और वारदात के बाद पटना में व्यवस्था संभालने में पंकज जुटा हुआ था. इस वारदात के लिए सुबोध ने अन्नू को 8 लाख रुपए, विशाल को 5 लाख और शुभम को एक लाख रुपए दिए थे.

3 आरोपियों की गिरफ्तारी के 2 दिन बाद पुलिस ने चौथे आरोपी अन्नू को यूपी की एसटीएफ की मदद से झारखंड के धनबाद से पकड़ लिया. बाद में 20 जनवरी, 2018 को जयपुर पुलिस ने पटना एसटीएफ की मदद से मुथूट फाइनैंस से सोना लूट के मास्टरमाइंड सुबोध सिंह उर्फ राजीव को पकड़ लिया. उस की निशानदेही पर 15 किलो सोना बरामद किया गया. सुबोध ने नागपुर व कोलकाता में भी डकैती की वारदातें करना कबूल किया.

पुलिस का मानना है कि वह करीब 15 साल से इस तरह की वारदातें कर रहा है. उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक व छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों की पुलिस उसे तलाश रही थी. इस से पहले वह छत्तीसगढ़ में पकड़ा जा चुका था. 10-12 साल पहले सुबोध ने चेन्नै में बैंक लूटा था, तब वहां की पुलिस ने मुठभेड़ में उस के 3-4 साथी मार दिए थे, लेकिन सुबोध बच गया था.

सुबोध की निशानदेही पर पुलिस ने वह कार भी बरामद कर ली, जिस में सोना रख कर वह निवाई से पटना गया था. सुबोध के भाई रणजीत सिंह पर बिहार में हजारों लोगों से ठगी करने का आरोप है.

सुबोध पटना जिले का टौपर स्टूडेंट था. 10वीं में उस के 94 प्रतिशत अंक आए थे, लेकिन उसे नेपाल में कैसीनो जाने का शौक लग गया, जिस में वह लाखों रुपए हार गया था. इस के बाद उस ने लूट की वारदातें शुरू कीं. फिर गिरोह बना कर बैंक व गोल्ड लोन कंपनियों में डकैती डालने लगा. अब उस की महत्त्वाकांक्षा बिहार में चुनाव लड़ने की थी.

2 फरवरी को पुलिस ने इस मामले में पटना के रहने वाले छठे आरोपी राजसागर को गिरफ्तार कर लिया. वह लग्जरी कारों से अपने साथियों को घटनास्थल पर छोड़ने व वारदात के बाद वापस ले जाने का काम करता था. उस के खिलाफ लूट व डकैती के कई मामले दर्ज हैं. राजसागर ही सुबोध को कार से निवाई से पटना ले गया था.     द्

   —कथा पुलिस सूत्रों व विभिन्न रिपोर्ट्स पर आधारित

कौन समझेगा इनके दर्द को?

भोपाल के करोंद इलाके में रहने वाली 20 वर्षीय रानी (बदला हुआ नाम) के पिता की मौत एक साल पहले हुई थी. पिता के साथसाथ आमदनी का जरिया भी खत्म हो गया तो घर में फांकों की नौबत आ गई. खुद रानी ही नहीं बल्कि उस के 8 भाईबहन भी एक वक्त भूखे सोने को मजबूर हो गए. बड़े भाई ने प्राइवेट नौकरी कर ली पर उसे इतनी पगार नहीं मिलती थी कि घर के सभी सदस्य भर पेट खाना खा सकें.

ऐसे में रानी को लगा कि उसे भी कुछ काम करना चाहिए. सोचविचार कर वह नौकरी की तलाश में घर से बाहर निकली. रानी खूबसूरत भी थी और जवान भी, लेकिन नामसमझ नहीं थी. नौकरी के नाम पर हर किसी ने उस से जो चाहा, वह थी उस की जवानी. जहां भी वह काम मांगने जाती, मर्दों की निगाह उस के गठीले जिस्म पर रेंगने लगती थी. कम पढ़ीलिखी रानी को पहली बार समझ आया कि किसी भी अकेली जरूरतमंद लड़की के लिए सफेदपोश लोगों से अपनी आबरू सलामत रख पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.

काम की तलाश में दरबदर घूमने के बाद जब वह शाम को थकीहारी घर लौटती तो भाईबहनों के लटके, भूखे और मुरझाए चेहरे उस की चाल देख कर ही नाउम्मीद हो उठते थे. वे समझ जाते थे कि आज भी खाली पेट पानी पी कर सोना पड़ेगा. भाई की पगार से मुश्किल से 10-12 दिन का ही राशन आ पाता था. घर के दीगर खर्चे भी खींचतान कर चलते थे.

नाते रिश्तेदारों और जानपहचान वालों ने तो पिता की मौत के साथ ही नाता तोड़ लिया था. रानी अब उन लोगों की ज्यादा गलती नहीं मानती, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि पैसा ही सब कुछ है. जबकि पैसा उतनी आसानी से नहीं मिलता, जितना आसान सोच कर लगता है. यह दुनिया बड़ी हिसाब किताब वाली है, जो पैसे देता है वह बदले में कुछ न कुछ चाहता भी है.

एक असहाय बेसहारा लड़की के पास देने के लिए जो कुछ होता है, वह रानी ने अपनी कीमत पर देना शुरू किया तो उस पर पैसा बरसने लगा.

भूख से बिलबिलाते जिन भाईबहनों को देख रानी का कलेजा मुंह को आ जाता था, उन के पेट उस की कमाई से भरने लगे तो रानी को सुकून देने वाला अहसास हुआ. घर में अब खानेपीने की कमी नहीं थी.

न तो बड़े भाई ने पूछा, न ही किसी और ने. फिर भी समझ हर किसी ने लिया कि रानी कैसे और कहां से इतना पैसा लाती है कि उस के पास महंगे कपड़े और मेकअप का सामान आने लगा है.

काम की तलाश के दौरान रानी को कई तरह के तजुरबे हुए थे. तमाम नए लोगों से उस की जानपहचान भी हो गई थी. उन में से एक था कपिल नाम का शख्स, जिस ने बहुत अपनेपन से उसे यह समझाने में कामयाबी पा ली थी कि यूं अकेली काम की तलाश में दरदर भटकोगी तो लोग नोच खाएंगे. इस से तो बेहतर है कि लोग जो चाहते हैं, उसे बेचना शुरू कर दो. इस से जल्द ही मालामाल हो जाओगी.

कपिल उसे भरोसे का और समझदार आदमी लगा तो उस ने मरती क्या न करती की तर्ज पर देह व्यापार के लिए हामी भर दी. कपिल अपने वादे पर खरा उतरा और देखते ही देखते वह हजारों में खेलने लगी.

बीती 29 दिसंबर को कपिल ने उसे बताया कि टीकमगढ़ से उस के कुछ दोस्त आने वाले हैं और एक दिन रात के एवज में उसे इतनी रकम देंगे, जितनी वह महीने भर में कमा पाती है.

सौदा 14 हजार रुपए में तय हुआ. हालांकि कपिल और उस के दोस्तों की बेताबी देख रानी ज्यादा पैसे मांग रही थी. लेकिन कपिल इस से ज्यादा देने को तैयार नहीं हुआ तो वह इतने में ही मान गई. उस के लिए यह सौदा घाटे का नहीं था.

साल की दूसरी आखिरी शाम यानी 30 दिसंबर को जब पूरी दुनिया नए साल के जश्न की तैयारियों में लगी थी, तब रानी कपिल के बताए मिसरोद इलाके के शीतलधाम अपार्टमेंट के फ्लैट पर पहुंच गई, जहां कपिल सहित 3 और मर्द बेचैनी से उस का इंतजार कर रहे थे. रानी तो यही सोचसोच कर खुश थी कि एक झटके में 14 हजार रुपए मिल जाएं तो वह 2-4 दिन घर पर आराम करेगी और भाईबहनों के साथ वक्त बिताएगी.

रात भर चारों ने जैसेजैसे चाहा, वैसेवैसे उस ने उन्हें खुश किया, पर साल की आखिरी सुबह रानी पर भारी पड़ी. सुबहसुबह ही मिसरोद पुलिस ने दबिश दे कर देह व्यापार के इलजाम में उन पांचों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

ऐसे पुलिस छापों के बारे में रानी ने काफी कुछ सुन रखा था पर वास्ता पहली बार पड़ा था. थाने में जैसे ही उसे मीडिया वालों से बात करने का मौका मिला तो उस ने अपनी गरीबी और बदहाली की दास्तां बयां कर दी, जिस से किसी ने हमदर्दी नहीं जताई.

रानी कोई पहली या आखिरी लड़की नहीं थी जो अपनी मजबूरियों के चलते अपना और अपने घर वालों का पेट पालने के लिए देह व्यापार की दलदल में उतरी थी. ऐसी लड़कियों की तादाद अकेले भोपाल में 25 हजार से ऊपर आंकी जाती है, जो पार्टटाइम या फुलटाइम यह धंधा करती हैं.

पिछले साल अक्तूबर में भोपाल के ही एक मसाजपार्लर में पड़े छापे में 2 और लड़कियों की आपबीती रानी से ज्यादा जुदा नहीं है. 24 वर्षीय मधु (बदला नाम) इस मसाजपार्लर में ग्राहकों की मालिश करती थी. सच यह भी है कि ग्राहक खुद पहल करता था तो वाजिब दाम पर वह जिस्म बेचने को भी तैयार हो जाती थी.

मधु छापे वाले दिन थाने में खड़ी थरथर कांप रही थी. उसे चिंता अपनी कम अपने अपाहिज पिता की ज्यादा थी, जिन्हें रोजाना शाम को दवा और खाना वही देती थी. रानी की तरह ही झोपड़ेनुमा मकान में रहने वाली मधु अपने अपाहिज पिता के इलाज और पेट भरने के लिए इस धंधे में आई थी, जिसे अपने धंधे की बाबत किसी से न कोई गिलाशिकवा था और न ही वह इसे गलत मानती थी.

इसी छापे में पकड़ी गई 26 वर्षीय सुचित्रा (बदला नाम) को उस के शौहर ने छोड़ दिया था. मायके वालों ने कुछ दिन तो उसे रखा पर शौहर से सुलह की गुंजाइश खत्म होते देख उसे आए दिन ताने दिए जाने लगे.

खुद सुचित्रा को भी लग रहा था कि उसे किसी दूसरे पर बोझ नहीं बनना चाहिए. लिहाजा वह भी रानी और मधु की तरह जोशजोश में काम की तलाश में निकल पड़ी. 4 हजार रुपए महीने की पगार पर एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी मिली, पर जल्द ही उसे समझ आ गया कि नौकरी तो कहने भर की है. अगर वक्त पर पैसा चाहिए तो जैसा ब्यूटीपार्लर चलाने वाली कह रही है, वैसा करना पड़ेगा. इस के बाद उस ने नौकरी छोड़ दी.

इस पर घर वालों ने फिर ऐतराज जताया तो उस ने भी मसाजपार्लर में नौकरी कर ली, जहां उसे 15 हजार रुपए देने की बात कही गई थी. 15 हजार रुपए के एवज में क्याक्या करना है, यह बात सुचित्रा से छिपी नहीं थी. लिहाजा वह मालिश के साथसाथ बाकी सब भी करने लगी, जिस से उसे 10-12 हजार रुपए मिलने लगे थे. अब घर वालों की शिकायतें दूर हो गई थीं, पर जब छापे में वह पकड़ी गई तो उन्होंने उस से कन्नी काट ली.

मधु और सुचित्रा को थाने में पुलिस अफसर लताड़ती रहीं कि ऐसी ही लड़कियों ने औरतों को बदनाम कर रखा है, जो दूसरे कामधंधों के बजाय देहव्यापार करने लगती हैं.

उस वक्त तो दोनों चुप रहीं पर बाद में बताया कि ये लोग हमारा दर्द नहीं समझेंगी. हम ने पहले ईमानदारी से ही कोशिश की थी. इज्जत से नौकरी करना चाहा था, लेकिन हर जगह हम पर सैक्स के लिए या तो दबाव बनाया गया था या फिर लालच दिया गया.

सुचित्रा बताती है कि कोई लड़की नहीं चाहती कि वह इस पेशे में आए लेकिन समाज मर्दों का है और वे एक ही चीज चाहते हैं. हर कोई हमारी मजबूरी का फायदा उठाना चाहता है और हम उन की मंशा पूरी न करें तो नौकरी से निकाल दिया जाता है. कोई हमें बहनबेटियों की तरह इज्जत नहीं देता, जिस की हम उम्मीद भी नहीं करतीं.

मधु और सुचित्रा को मसाजपार्लर महफूज लगा, जहां देहव्यापार करना मजबूरी या दबाव की बात नहीं थी बल्कि मरजी की बात थी. यहां मालिश कराने काफी बड़ी हस्तियां आती हैं और थोड़ी देर की मौजमस्ती के एवज में 2-4 हजार रुपए ऐसे दे जाती हैं, जैसे पैसा वाकई हाथ का मैल हो.

ये तीनों फिर पुराने धंधे में आ गई हैं. पैसा इन की जरूरत भी है और मजबूरी भी. दूसरी तरफ ये मर्दों की जरूरत हैं जो इन पर पैसा न्यौछावर करने को तैयार बैठे रहते हैं.

देहव्यापार को बुरी नजर से क्यों देखा जाता है और इसे सिर्फ बुरी नजर से क्यों नहीं देखा जाना चाहिए, इस पर आए दिन बहस होती रहती हैं और आगे भी होती रहेंगी, लेकिन मधु, रानी और सुचित्रा का दर्द हर कोई नहीं समझ सकता. अगर वे इस पेशे में नहीं आतीं तो मुफ्त में लुटतीं और इस के बाद भी खाली पेट रहतीं.

रानी अपने भाईबहनों को भूख से तिलमिलाते नहीं देख पा रही थी तो इस में उस का कोई कसूर नहीं. मधु अपने पिता के लिए मसाजपार्लर में काम कर रही थी और सुचित्रा के निकम्मे और नशेड़ी पति को कोई दोषी नहीं ठहरा रहा था, जिस ने धक्के दे कर बीवी को घर से बाहर कर के दरदर की ठोकरें खाने को छोड़ दिया था. ऐसे में तय कर पाना मुश्किल है कि ये लड़कियां फिर और क्या करतीं?

बेटी बनी मां बाप की शादी की गवाह

25 अक्तूबर, 2017 को धौलपुर के आर्यसमाज मंदिर में एक शादी हो रही थी. इस शादी में हैरान करने वाली बात यह थी कि वहां न लड़की के घर वाले मौजूद थे और न ही लड़के के घर वाले. इस से भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस लड़के और लड़की की शादी हो रही थी, उन की ढाई साल की एक बेटी जरूर इस शादी में मौजूद थी.

इस शादी में लड़की के घर वालों की भूमिका बाल कल्याण समिति धौलपुर के अध्यक्ष अदा कर रहे थे तो इसी संस्था के अन्य सदस्य लड़के के घर वालों तथा बाराती की भूमिका अदा कर रहे थे. इस के अलावा कुछ अन्य संस्थाओं के कार्यकर्ता भी वहां मौजूद थे.

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दरअसल, इस के पीछे जो वजह थी, वह बड़ी दिलचस्प है. राजस्थान के भरतपुर का रहने वाला 19 साल का सचिन धौलपुर के कोलारी के रहने वाले अपने एक परिचित के यहां आताजाता था. उसी के पड़ोस में अनु अपने मांबाप के साथ रहती थी. लगातार आनेजाने में सचिन और अनु के बीच बातचीत होने लगी.

ऐसे परवान चढ़ा दोनों का प्यार

15 साल की अनु को सचिन से बातें करने में मजा आता था. चूंकि दोनों हमउम्र थे, इसलिए फोन पर भी उन की बातचीत हो जाती थी. इस का नतीजा यह निकला कि उन में प्यार हो गया. मौका निकाल कर दोनों एकांत में भी मिलने लगे.

जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी अनु सचिन पर फिदा थी. उस ने तय कर लिया था कि वह सचिन से ही शादी करेगी. ऐसा ही कुछ सचिन भी सोच रहा था. जबकि ऐसा होना आसान नहीं था. इस के बावजूद उन्होंने हिम्मत कर के अपने अपने घर वालों से शादी की बात चलाई.

सचिन ने जब अपने घर वालों से कहा कि वह धौलपुर की रहने वाली अनु से शादी करना चाहता है तो उस के पिता ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘कमाता धमाता कौड़ी नहीं है और चला है शादी करने. अभी तेरी उम्र ही क्या है, जो शादी के लिए जल्दी मचाए है. पहले पढ़लिख कर कमाने की सोच, उस के बाद शादी करना.’’

सचिन अभी इतना बड़ा नहीं हुआ था कि पिता से बहस करता, इसलिए चुप रह गया.

दूसरी ओर अनु ने अपने घर वालों से सचिन के बारे में बता कर उस से शादी करने की बात कही तो घर के सभी लोग दंग रह गए. क्योंकि अभी उस की उम्र भी शादी लायक नहीं थी. उन्हें चिंता भी हुई कि कहीं नादान लड़की ने कोई ऐसा वैसा कदम उठा लिया तो उन की बड़ी बदनामी होगी. उन्होंने अनु को डांटाफटकारा भी और समझाया भी. यही नहीं, उस पर घर से बाहर जाने पर पाबंदी भी लगा दी गई.

घर वालों की यह पाबंदी परेशान करने वाली थी, इसलिए अनु ने सारी बात प्रेमी सचिन को बता दी. उस ने कहा कि उस के घर वाले किसी भी कीमत पर उस की शादी उस से नहीं करेंगे. जबकि अनु तय कर चुकी थी कि उस की राह में चाहे जितनी भी अड़चनें आएं, वह उन से डरे बिना सचिन से ही शादी करेगी.

घर वालों के मना करने के बाद कोई और उपाय न देख सचिन और अनु ने घर से भागने का फैसला कर लिया. लेकिन इस के लिए पैसों की जरूरत थी. सचिन ने इधरउधर से कुछ पैसों का इंतजाम किया और घर से भागने का मौका ढूंढने लगा.

दूसरी ओर अनु के घर वालों को लगा कि उन की बेटी बहक गई है, वह कोई गलत कदम उठा सकती है. हालांकि उस समय उस की उम्र महज 15 साल थी, इस के बावजूद उन्होंने उस की शादी करने का फैसला कर लिया. इस से पहले कि वह कोई ऐसा कदम उठाए, जिस से उन की बदनामी हो, उन्होंने उस के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया.

यह बात अनु ने सचिन को बताई. सचिन अपनी मोहब्बत को किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहता था, इसलिए योजना बना कर एक दिन अनु के साथ भाग गया. अनु को घर से गायब देख कर घर वाले समझ गए कि उसे सचिन भगा ले गया है. अनु के पिता अपने शुभचिंतकों के साथ थाने पहुंचे और सचिन के खिलाफ अपहरण और पोक्सो एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

मामला नाबालिग लड़की के अपहरण का था, इसलिए पुलिस ने तुरंत काररवाई शुरू कर दी. धौलपुर के कोलारी का रहने वाला सचिन का जो परिचित था, उस से पूछताछ की गई. उसे साथ ले कर पुलिस भरतपुर स्थित सचिन के घर गई, लेकिन वह वहां नहीं मिला.

पुलिस ने उस के घर वालों से भी पूछताछ की, पर उन्हें सचिन और अनु के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. सचिन की जहांजहां रिश्तेदारी थी, पुलिस ने वहांवहां जा कर जानकारी हासिल की. सभी ने यही बताया कि सचिन उन के यहां नहीं आया है.

सचिन का फोन नंबर भी स्विच्ड औफ था. पुलिस के पास अब ऐसा कोई जरिया नहीं था, जिस से उस के पास तक पहुंच पाती. इधरउधर हाथपैर मारने के बाद भी पुलिस को सफलता नहीं मिली तो वह धौलपुर लौट आई.

पुलिस को महीनों बाद भी न मिला दोनों का सुराग

अनु के गायब होने से उस के मातापिता बहुत परेशान थे. उन्हें चिंता सता रही थी कि उन की बेटी पता नहीं कहां और किस हाल में है. पुलिस में रिपोर्ट वे करा ही चुके थे. जब पुलिस उसे नहीं ढूंढ सकी तो उन के पास ऐसा कोई जरिया नहीं था कि वे उसे तलाश पाते. महीना भर बीत जाने के बाद भी जब अनु के बारे में कहीं से कोई खबर नहीं मिली तो वे शांत हो कर बैठ गए.

पुलिस को भी लगने लगा कि सचिन और अनु किसी दूसरे शहर में जा कर रह रहे हैं. पुलिस ने राजस्थान और उत्तर प्रदेश के सभी थानों में दोनों का हुलिया भेज कर यह जानना चाहा कि कहीं उस हुलिए से मिलतीजुलती डैडबौडी तो नहीं मिली है.

सचिन उत्तर प्रदेश के इटावा का मूल निवासी था और उस के ज्यादातर रिश्तेदार उत्तर प्रदेश में ही रहते थे. इसलिए वहां के थानों को भी सूचना भेजी गई थी. इस से भी पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली.

समय बीतता रहा और पुलिस की जांच अपनी गति से चलती रही. थानाप्रभारी ने हिम्मत नहीं हारी. वह अपने स्रोतों से दोनों प्रेमियों के बारे में पता करते रहे. एक दिन उन्हें मुखबिर से जानकारी मिली कि सचिन अनु के साथ इटावा में रह रहा है.

यह उन के लिए अच्छी खबर थी. अपने अधिकारियों को सूचित करने के बाद वह पुलिस टीम के साथ मुखबिर द्वारा बताए गए इटावा वाले पते पर पहुंच गए. मुखबिर की खबर सही निकली. सचिन और अनु वहां मिल गए. लेकिन उस समय अनु 7 महीने की गर्भवती थी. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया और उन्हें धौलपुर ले आई.

पुलिस ने दोनों को न्यायालय में पेश किया, जहां अनु ने अपने प्रेमी सचिन के पक्ष में बयान दिया. अनु के मातापिता को बेटी के मिलने पर खुशी हुई थी. वे उसे लेने के लिए कोर्ट पहुंचे. बेटी के गर्भवती होने की बात जान कर भी उन्होंने अनु से घर चलने को कहा. पर अनु ने कहा कि वह मांबाप के घर नहीं जाएगी. वह सचिन के साथ ही रहेगी.

चूंकि सचिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए न्यायालय ने उसे जेल भेजने के आदेश दे दिए थे. घर वालों के काफी समझाने के बाद भी जब अनु नहीं मानी तो कोर्ट ने उसे बालिका गृह भेज दिया. अनु 7 महीने की गर्भवती थी, इसलिए बालिका गृह में उस का ठीक से ध्यान रखा गया. समयसमय पर उस की डाक्टरी जांच भी कराई जाती रही. वहीं पर उस ने बेटी को जन्म दिया. बेटी के जन्म के बाद भी अनु की सोच नहीं बदली, वह प्रेमी के साथ रहने की रट लगाए रही.

सचिन जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आ गया था. उसे जब पता चला कि अनु ने बेटी को जन्म दिया है और वह अभी भी बालिका गृह में है तो उसे बड़ी खुशी हुई. वह उसे अपने साथ रखना चाहता था. इस बारे में उस ने वकील से सलाह ली तो उस ने कहा कि जब तक उस की उम्र 18 साल नहीं हो जाएगी, तब तक शादी कानूनन मान्य नहीं होगी. अनु ने तय कर लिया था कि जब तक वह बालिग नहीं हो जाएगी, वह बालिका गृह में ही रहेगी.

अनु अपनी बेटी के साथ वहीं पर दिन बिताती रही. उस के घर वालों ने उस से मिल कर उसे लाख समझाने की कोशिश की, पर वह अपनी जिद से टस से मस नहीं हुई. उस ने साफ कह दिया कि वह सचिन को हरगिज नहीं छोड़ सकती.

बाल कल्याण समिति, धौलपुर के अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह परमार को जब अनु और सचिन के प्रेम की जानकारी हुई तो वह इन दोनों से मिले. इन से बात करने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि वह इन की शादी कराएंगे, ताकि इन की बेटी को भी मांबाप दोनों का प्यार मिल सके. वह भी अनु के बालिग होने का इंतजार करने लगे.

16 अक्तूबर, 2017 को अनु की उम्र जब 18 साल हो गई तो उसे आशा बंधी कि लंबे समय से प्रेमी से जुदा रहने के बाद अब वह उस के साथ रह सकेगी. अब तक उस की बेटी करीब ढाई साल की हो चुकी थी. उसे भी पिता का प्यार मिलेगा.

सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों ने कराया दोनों का विवाह

अनु के बालिग होने पर धौलपुर की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह परमार ने उन के विवाह की तैयारियां शुरू कर दीं. इस बारे में उन्होंने भरतपुर की बाल कल्याण समिति और सामाजिक संस्था प्रयत्न के पदाधिकारियों से बात की. वे भी इस काम में सहयोग करने को तैयार हो गए.

अनु धौलपुर की थी और बिजेंद्र सिंह परमार भी वहीं के थे, इसलिए उन्होंने तय किया कि वह इस शादी में लड़की वालों का किरदार निभाएंगे. जबकि सचिन भरतपुर का था, इसलिए बाल कल्याण समिति, भरतपुर के पदाधिकारियों ने वरपक्ष की जिम्मेदारियां निभाने का वादा किया.

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हैरान करने वाली इस शादी का आयोजन धौलपुर के आर्यसमाज मंदिर में किया गया. इस मौके पर विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों के अलावा पुलिस अधिकारी भी मौजूद थे. तमाम लोगों की मौजूदगी में सचिन और अनु की शादी संपन्न हुई. शादी में उन की ढाई साल की बेटी भी मौजूद थी.

सामाजिक संस्था प्रयत्न के एडवोकेसी औफिसर राकेश तिवाड़ी ने बताया कि उन का मकसद था कि ढाई साल के बच्चे को उस के मातापिता का प्यार मिले और अनु को भी समाज में अधिकार मिल सके.

सचिन और अनु दोनों वयस्क हैं. वे अपनी मरजी से जीवन बिताने का अधिकार रखते हैं. यह शादी सामाजिक दृष्टि से भी उचित है. अब वे अपना जीवन खुशी से बिता सकते हैं. खास बात यह रही कि इस शादी में वर और कन्या के घर का कोई भी मौजूद नहीं था.

वहां मौजूद सभी लोगों ने वरवधू को आशीर्वाद दिया. शादी के बाद सचिन अनु को अपने घर ले गया. सचिन के घर वालों ने अनु को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया. अनु भी अपनी ससुराल पहुंच कर खुश है.

गर्लफ्रेंड को जीबी रोड बेचने आए प्रेमी ने की एसएचओ से डील

दिल्ली के थाना कमला मार्केट के थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका के सरकारी मोबाइल फोन पर  लगातार ऐसी काल्स आ रही थीं, जिस में फोन करने वाला अपने बारे में कुछ न बता कर उन से ही पूछता था कि आप कौन हैं और कहां से बोल रहे हैं? जब वह उसे अपने बारे में बताते तो फोन करने वाला तुरंत काल डिसकनेक्ट कर देता.

शुरुआत में तो वह यही समझ रहे थे कि शायद किसी से गलत नंबर लग जा रहा है. पर जब रोजाना ही अलगअलग नंबरों से ऐसी काल्स आने लगीं तो उन्हें शक हुआ. क्योंकि फोनकर्ता पुलिस का नाम सुनते ही फोन काट देता था. वह यह जानना चाहते थे कि आखिर फोन करने वाला कौन है और वह चाहता क्या है. क्योंकि एक ही फोन पर लगातार रौंग काल आने की बात गले नहीं उतर रही थी.

इस के बाद उन के पास एक अनजान नंबर से काल आई तो उन्होंने फोन करने वाले से झूठ बोलते हुए कहा, ‘‘मैं अशोक बोल रहा हूं, आप कौन हैं और किस से बात करनी है?’’

‘‘जी, मैं ने जीबी रोड फोन मिलाया था.’’ उस ने कहा.

जीबी रोड दिल्ली का बदनाम रेडलाइट एरिया है. लेकिन अब इस का नाम बदल कर श्रद्धानंद मार्ग हो गया है. यहां पर मशीनरी पार्ट्स का बड़ा मार्केट है और उन्हीं दुकानों के ऊपर तमाम कोठे हैं, जहां सैकड़ों की संख्या में वेश्याएं धंधा करती हैं. रोड का नाम कागजों में भले ही बदल गया है, लेकिन लोगों की जबान पर आज भी जीबी रोड ही रटा हुआ है.

जैसे ही उस आदमी ने जीबी रोड का नाम लिया, थानाप्रभारी उस के फोन करने का आशय समझ गए. वह बात को आगे बढ़ाते हुए बोले, ‘‘आप ने सही जगह नंबर मिलाया है. मैं वहीं से बोल रहा हूं. बताइए, किसलिए फोन किया है?’’

‘‘मैं वहां पूरी रात एंजौय करना चाहता हूं, कितना खर्च आएगा.’’ उस ने पूछा.

इस बात पर थानाप्रभारी को गुस्सा तो बहुत आया कि वह पुलिसिया भाषा में उसे सही खुराक दे दें, लेकिन उन्होंने गुस्सा जाहिर करना उचित नहीं समझा. उन्होंने बड़े प्यार से कहा, ‘‘आप यहां आ जाइए. जिस लड़की को पसंद करेंगे, उसी के हिसाब से पैसे बता दिए जाएंगे. आप जब यहां आएंगे तो मैं यकीन दिलाता हूं कि खुश हो कर ही जाएंगे. आप यहां मार्केट में आने के बाद मेरे इसी नंबर पर फोन कर देना, मैं किसी को भेज दूंगा.’’

इतना कह कर थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘वैसे एक बात यह बताओ कि मेरा यह नंबर आप को कहां से मिला?’’

‘‘यह नंबर एक सैक्स साइट पर था. मैं जीबी रोड की एक वीडियो देख रहा था. उसी में यह फोन नंबर था. वहीं से ले कर मैं आप को फोन कर रहा हूं.’’ उस आदमी ने कहा.

सैक्स साइट पर पुलिस का फोन नंबर होने की बात पर थानाप्रभारी चौंके. जब नंबर वहां है तो ऐसे ही लोगों के फोन आएंगे. चूंकि उन की फोन पर बातचीत जारी थी, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘मैं तो यह सोच रहा था कि यह नंबर हमारे किसी कस्टमर ने आप को दिया होगा.’’

‘‘नहीं, कस्टमर ने नहीं दिया, सैक्स साइट से ही लिया है.’’ उस ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, आप जब आएं तो मुझे बता देना. अच्छी व्यवस्था करा दूंगा.’’ उन्होंने कहा और काल डिसकनेक्ट कर दिया.

इस तरह के फोन काल्स से थानाप्रभारी परेशान थे. इस से बचने के 2 ही रास्ते थे. पहला यह कि वह अधिकारियों से बात कर इस नंबर के बदले कोई दूसरा नंबर ले लें और दूसरा यह कि जिस सैक्स साइट पर उन का यह नंबर डाला गया है, वहां से यह नंबर हटवा दें.

इंटरनेट पर सैक्स से संबंधित तमाम साइटें हैं. यह फोन नंबर पता नहीं किस साइट पर है. फिर भी थानाप्रभारी ने गूगल पर कई साइट्स खोजीं, लेकिन उन्हें अपना नंबर नहीं मिला. जिस फोन नंबर से उन के पास फोन आया था, उन्होंने उसी नंबर को रिडायल किया. पर वह नंबर स्विच्ड औफ पाया गया. उन्होंने सोचा कि अब की बार इस तरह का किसी का फोन आएगा तो उस से साइट का नाम भी पूछ लेंगे.

19 नवंबर, 2017 को भी थानाप्रभारी अपने औफिस में बैठे थे, तभी सुबह करीब पौने 9 बजे उन के मोबाइल पर किसी ने फोन कर के पूछा, ‘‘क्या आप जीबी रोड से बोल रहे हैं?’’

यह सुन कर थानाप्रभारी झुंझलाए लेकिन खुद पर काबू पाते हुए उन्होंने फोन करने वाले से कहा, ‘‘हां, मैं वहीं से बोल रहा हूं. कहिए, कैसे याद किया?’’

‘‘दरअसल, बात यह है कि मेरे पास एक न्यू ब्रैंड टैक्सी है. मैं उसे बेचना चाहता हूं.’’ उस आदमी ने धीरे से कहा.

चूंकि जीबी रोड थाना कमला मार्केट इलाके में ही है. यहां पर टैक्सी धंधा करने वाली महिला को कहते हैं, इसलिए वह समझ गए कि यह किसी लड़की का सौदा करना चाहता है. जो लड़की या महिला यहां लाई जाती है, वह यहीं की हो कर रह जाती है.  उस आदमी की बात से लग रहा था कि वह इस क्षेत्र का पुराना खिलाड़ी है, क्योंकि वह कोड वर्ड का प्रयोग कर रहा था. उस लड़की की जिंदगी बचा कर थानाप्रभारी उस गैंग तक पहुंचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘यह बताओ कि टैक्सी किस हालत में है?’’

‘‘एकदम न्यू ब्रैंड है. बस यह समझ लो कि वह अभी सड़क पर भी नहीं उतरी है.’’ उस ने कहा, ‘‘वह केवल 15 साल की है.’’

15 साल की है तो उसे जरूर प्रेमजाल में फांस कर या नौकरी के बहाने लाया गया होगा. उस की नीयत को भांप कर थानाप्रभारी ने उस से बातचीत जारी रखी, ‘‘ठीक है, हम उसे खरीद लेंगे.’’

‘‘कितने रुपए देंगे उस टैक्सी के?’’ वह बोला.

‘‘देखो भाई, हम बिना देखे उस के दाम कैसे बता सकते हैं. अच्छा, यह बताओ कि वह है कैसी? आप हमें उस के फोटो वगैरह दिखाइए, उस के बाद ही बताया जाएगा.’’

‘‘वह एकदम स्लिम है और लंबाई करीब 5 फुट है.’’ उस ने बताया, ‘‘मैं उस के फोटो भी दिखा दूंगा. कोई लफड़ा तो नहीं होगा.’’

‘‘लफड़ा किस बात का. देखो, तुम्हें बेचना है और हमें खरीदना तो इस में लफड़े की कोई बात ही नहीं है.’’

‘‘आप को एक बात ध्यान रखना है कि किसी भी तरह वह लड़की अपने घर वालों को फोन न कर पाए. अगर उस ने फोन कर दिया तो हम दोनों ही फंसेंगे.’’ उस ने आशंका जताते हुए कहा.

‘‘यहां आने के बाद किसी का भी घर लौटना मुमकिन नहीं होता. और तो और बाद में जब तुम भी यहां आओगे तो वह तुम्हें भी यहां नहीं दिखेगी.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘तुम से मिलने मैं आ जाऊंगा, तभी बात करते हैं.’’

‘‘ठीक है आ जाना, पर तुम यहां कोठे पर मत आना, क्योंकि इस तरह के सौदे बाहर ही होते हैं. दूसरी जगह कहां मिलना है, इस बारे में हम फोन कर के तय कर लेंगे.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

इस पूरी बातचीत में थानाप्रभारी सुनील ढाका ने यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह पुलिस अधिकारी हैं. वह कोठों के दलालों की स्टाइल में ही बात करते रहे.

इस के बाद भी उस दिन 3-4 बार उसी आदमी ने फोन कर इस संबंध में बात की. इस बातचीत में उस ने तय कर लिया कि कल वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आएगा और वहां बैठ कर आपस में बात की जाएगी.

‘‘ठीक है, तुम वहां आ जाना. मैं 2 लड़कों गुलाब और सुंदर को भेज दूंगा. लड़की का फोटो वगैरह देख कर वे डील फाइनल कर लेंगे. इस के बाद तुम लड़की ले आना और वहीं हम तुम्हें पैसे दे देंगे.’’ थानाप्रभारी ने कहा. इसी के साथ उन्होंने गुलाब का फोन नंबर भी उसे दे दिया.

थानाप्रभारी ने इस मामले की जानकारी एसीपी अमित कौशिक और डीसीपी मंजीत सिंह रंधावा को दे दी. मामला एक लड़की की जिंदगी उजड़ने से बचाना था, इसलिए डीसीपी ने कहा कि वह बातचीत में ऐहतियात बरतें. लड़की बेचने वालों को किसी तरह का शक नहीं होना चाहिए, वरना गड़बड़ हो सकती है.

डीसीपी के निर्देश के बाद सुनील कुमार ढाका ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से उन के पास लड़की का सौदा करने वाले का फोन आया था. उस फोन की लोकेशन गुड़गांव की आ रही थी.

20 नवंबर को थानाप्रभारी उस आदमी से फोन द्वारा संपर्क में रहे. उस ने बताया कि वह दिल्ली के लिए मैट्रो से चल पड़ा है. शाम 4, साढ़े 4 बजे तक वह नई दिल्ली पहुंच जाएगा.

‘‘ठीक है, तुम नई दिल्ली मैट्रो स्टेशन पहुंचो, मेरे दोनों लड़के गुलाब और सुंदर वहां पहुंच जाएंगे. तुम उन से बात कर लेना.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उसे अपने कांस्टेबल गुलाब का फोन नंबर दे दिया था, इसलिए वह गुलाब के संपर्क में आ गया. उस ने बताया कि वे 2 लोग आ रहे हैं और शाम साढ़े 4 बजे मैट्रो के गेट नंबर-4 के बाहर मिलेंगे. कांस्टेबल सुंदर और गुलाब मैट्रो के गेट नंबर 4 के बाहर खड़े हो गए.

मैट्रो ट्रेन से उतरने के बाद उस आदमी ने गुलाब से बात की तो गुलाब ने बताया कि वह मैट्रो के गेट नंबर 4 पर खड़ा है. कुछ देर बाद वहां 2 युवक पहुंचे. उन्होंने अपने नाम अमर और रंजीत बताए. अमर गुलाब से बातें करने लगा और रंजीत वहां से कुछ दूर जा कर खड़ा हो गया. अमर ने अपने मोबाइल फोन में उस लड़की की फोटो गुलाब को दिखाई, जिस का सौदा करना था. 15 साल की वह लड़की वास्तव में खूबसूरत थी. अमर ने उस लड़की के साढ़े 3 लाख रुपए मांगे.

‘‘साढ़े 3 लाख तो बहुत ज्यादा है. मैं कल ही बंगाल से 70-70 हजार में 2 लड़कियां लाया हूं. भाई, जो मुनासिब है ले लो.’’ गुलाब ने कहा.

‘‘देखिए, मेरे पास इस के अलावा 5 लड़कियां और हैं. अगर सही पैसों में तुम से डील हो जाती है तो सारी की सारी तुम्हें ही दे दूंगा.’’ अमर ने कहा.

‘‘हमारे पास भी आल इंडिया से लड़कियां आती हैं. हमारे आदमी हर स्टेट में हैं. वे हम से जुड़ कर मोटी कमाई कर रहे हैं. तुम भी ऐसा कर सकते हो.’’

दोनों ही तरफ से लड़की का मोलभाव होने लगा. अंत में बात 2 लाख 30 हजार रुपए में तय हो गई. अमर ने कहा कि वह लड़की को यहीं ले आएगा और किसी बहाने से उसे छोड़ कर चला जाएगा.

गुलाब और सुंदर अमर और रंजीत से इस तरह बातचीत कर रहे थे, जैसे वे सचमुच में पक्के धंधेबाज हों. गुलाब ने उन के साथ सेल्फी ली और एक दुकान पर बैठ कर चायनाश्ता भी किया. कुछ ही देर की बातचीत में वे सब एकदूसरे से घुलमिल गए. अमर ने बताया कि वह कल 11-12 बजे के बीच लड़की को यहां ले आएगा. लौटते समय गुलाब ने अमर को एक हजार रुपए थमा दिए.

‘‘ये पैसे किस बात के?’’ अमर ने पूछा.

‘‘इन्हें ऐसे ही रख लो. इतनी दूर से आए हो, किराएभाड़े के लिए हैं. घबराओ मत, इन्हें मैं सौदे की रकम से नहीं काटूंगा. वह पैसे तो लड़की के मिलते ही तुम्हें हाथोंहाथ दे दूंगा.’’ गुलाब ने कहा.

इस के बाद अमर और रंजीत मैट्रो से ही वापस चले गए.  कांस्टेबल गुलाब ने विश्वास बनाए रखने के लिए उन से यह भी नहीं पूछा कि वे कहां से आए हैं. अगले दिन दोपहर डेढ़ बजे अमर ने फोन कर के गुलाब से कहा, ‘‘आप लोग गुड़गांव बसअड्डे पर आ जाइए. यहीं पर लड़की भी दिखा दूंगा और पैसे ले कर सौंप भी दूंगा.’’

थानाप्रभारी ने कांस्टेबल गुलाब से पहले ही कह दिया था कि डील करते समय वह किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं करेंगे. उन से खरीदार की तरह ही बातचीत करें. इसी बात को ध्यान में रखते हुए गुलाब ने उस दिन गुड़गांव आने से मना कर दिया.

उन्होंने कहा कि हम आज गुड़गांव नहीं आ सकते, क्योंकि आज उन्हें अपने एक रिश्तेदार के यहां शादी में जाना है. अगर ज्यादा जल्दी हो तो वे लड़की को ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आ जाएं.

कुछ देर सोच कर अमर ने कहा, ‘‘ठीक है, आप लोग कल ही गुड़गांव आ जाइए.’’

‘‘हां, यही ठीक रहेगा.’’ गुलाब ने उस की बात का समर्थन करते हुए कहा.

अमर सुनील कुमार ढाका और गुलाब से फोन पर दिन में कईकई बार बातें कर रहा था, लेकिन अगले दिन यानी 21 नवंबर को उन के पास अमर का कोई फोन नहीं आया. इस से थानाप्रभारी को आशंका हुई कि कहीं उसे उन के पुलिस होने की भनक तो नहीं लग गई.

यदि ऐसा हुआ तो गड़बड़ हो जाएगी. अगर उस ने किसी तरह लड़की कोठे पर पहुंचा दिया तो वहां लड़की को तलाश पाना मुश्किल हो जाएगा.

वह गुलाब से इसी मुद्दे पर बात कर रहे थे कि तभी 11 बजे के करीब अमर का फोन आ गया. उस ने कहा, ‘‘आप लोग गुड़गांव आ जाइए. मैं बसअड्डे के पास आप का इंतजार करूंगा. यहीं पर आप लड़की को देख लेना.’’

थानाप्रभारी ने एएसआई विजय, कांस्टेबल गुलाब और सुंदर को निर्देश दे कर गुड़गांव भेज दिया. तीनों गुड़गांव पहुंच गए. रास्ते भर गुलाब अमर से फोन पर बातचीत करते रहे.

जब वह वहां पहुंचे तो अमर और उस का साथी बसअड्डे के पास ही खड़े मिले. चूंकि वे गुलाब और सुंदर को ही जानते थे, इसलिए एएसआई विजय बसअड्डे के पास एक दुकान पर खड़े हो गए. गुलाब ने अमर से लड़की के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि वह अभी उसे ले कर नहीं आया है. उस ने मोबाइल फोन में लड़की के कुछ अन्य फोटो उन्हें दिखाए.

इस बार उस के मोबाइल में लड़की के अलगअलग तरह के फोटो थे. उस ने कहा कि वह लड़की को यहीं ले आता है, वे यहीं पैसे दे कर लड़की को ले जाएं.

‘‘लेकिन अभी हम पैसे नहीं लाए हैं. ऐसी बात थी तो पहले बता देते, हम पैसे ले कर आते. अब बताइए, क्या करें.’’ गुलाब ने कहा.

‘‘करना क्या है, हम चाह रहे थे कि यह मामला आज ही निपट जाए.’’ अमर ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, आज नहीं तो कल निपट जाएगा. लेकिन हम चाहते हैं कि लड़की को ले कर तुम दिल्ली आ जाओ. पैसे वहीं मिल जाएंगे.’’

अगले दिन 22 नवंबर, 2017 को अमर अपने दोस्त और उस लड़की को ले कर मैट्रो से दिल्ली के लिए निकल पड़ा. दिल्ली के लिए निकलने से पहले उस ने गुलाब को फोन कर के बता दिया.

कांस्टेबल गुलाब ने यह बात थानाप्रभारी को बता दी. थानाप्रभारी ने एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई दिनेश कुंडू, एएसआई सर्वेश, विजय, कांस्टेबल गुलाब, सुंदर, महिला कांस्टेबल मधु को शामिल किया. गवाही के लिए वह किसी स्थानीय आदमी को साथ रखना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने मोहम्मद हफीज उर्फ बबलू प्रधान से बात की और उसे अपनी टीम के साथ नई दिल्ली मैट्रो स्टेशन पर ले गए.

चूंकि अमर ने मैट्रो के गेट नंबर 4 के पास मिलने को कहा था, इसलिए उस गेट के आसपास सभी पुलिसकर्मी तैनात हो गए.

दिल्ली पहुंच कर अमर ने गुलाब को फोन किया तो गुलाब अपने साथी सुंदर के साथ वहां पहुंच गए. वह अमर को पहचानते थे, इसलिए मैट्रो के गेट नंबर 4 के पास उन्होंने अमर को खड़े देखा तो वह उस से बड़ी गर्मजोशी से मिले.

उन्होंने उसे 20 हजार रुपए दे कर बाकी के पैसे लड़की सौंपते समय देने को कहा. वहां अमर अकेला था. उस ने लड़की को अपने साथी रंजीत के साथ वहां से थोड़ी दूरी पर खड़ी कर दिया था.

अमर जल्द ही अपनी बकाया की रकम ले कर लड़की को उन के हवाले कर वहां से खिसक जाना चाहता था, इसलिए वह गुलाब को उस जगह ले गया, जहां रंजीत के साथ लड़की खड़ी थी. लड़की को देख कर गुलाब ने अपने सिर को खुजाया. यह उन का इशारा था. इस के बाद थानाप्रभारी सहित उन की टीम के सदस्य वहां पहुंच गए. उन्होंने अमर और उस के साथी को हिरासत में ले लिया.

गुलाब और सुंदर को जीबी रोड कोठे का दलाल समझने वाले अमर और रंजीत को जब पता चला कि वे दलाल नहीं, बल्कि पुलिस वाले हैं तो उन के होश उड़ गए. जिस मनीषा नाम की लड़की को वे बेचने लाए थे, उसे महिला कांस्टेबल मधु ने अपनी हिफाजत में ले लिया.

थाने ले जा कर जब अमर और रंजीत से पूछताछ की गई तो पता चला कि वे दोनों बिहार के रहने वाले थे और वह लड़की भी बिहार की थी.

लड़की को अपने प्यार के जाल में फांस कर उसे रेडलाइट एरिया में बेचने की कोशिश करने की उन्होंने जो कहानी बताई, वह बहुत ही हैरान कर देने वाली थी—

24 साल का अमर मूलरूप से बिहार के सुपौल जिले के इरारी गांव के रहने वाले लक्ष्मण का बेटा था. इसी गांव के रहने वाले रंजीत शाह से उस की अच्छी दोस्ती थी. अमर दिल्ली और गुड़गांव में पहले नौकरी कर चुका था.

मई, 2017 की बात है. अमर बिहार के मोतिहारी जिले में अपने एक जानकार के यहां आयोजित भोज में गया था. वहीं पर मनीषा से उस की मुलाकात हुई. 15 साल की मनीषा खूबसूरत के साथ हंसमुख भी थी. वह भी परिवार के साथ उसी भोज में आई थी. पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे से काफी प्रभावित हुए. उसी दौरान उन्होंने अपने फोन नंबर एकदूसरे को दे दिए.

भोज से घर लौटने के बाद अमर के दिलोदिमाग में मनीषा ही घूमती रही. अगले दिन मन नहीं लगा तो उस ने मनीषा को फोन लगा दिया. दोनों में औपचारिक बातें हुईं. इस के बाद उन के बीच बातों का सिलसिला शुरू हो गया. धीरेधीरे बातों का दायरा बढ़ता गया और वह प्यार के बंधन में बंधते गए. दोनों ही एकदूसरे को इतना चाहने लगे कि उन्होंने शादी करने का फैसला ले लिया.

इस के बाद योजना बना कर दोनों 15 अक्तूबर, 2017 को अपनेअपने घरों से भाग निकले. 15 साल की मनीषा अपना घर छोड़ कर मोतिहारी रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई, जहां अमर अपने दोस्त रंजीत के साथ उस का इंतजार कर रहा था.  मोतिहारी से तीनों दिल्ली आ गए. दिल्ली से मैट्रो द्वारा गुड़गांव पहुंच गए. चूंकि गुड़गांव से अमर और रंजीत अच्छी तरह वाकिफ थे, इसलिए गुड़गांव सेक्टर-10 के शक्तिनगर में रह रहे अपने जानकार की मदद से एक कमरा किराए पर ले लिया.

चूंकि अमर ने मनीषा से शादी करने का वादा किया था, इसलिए अपने ही कमरे में 2 दोस्तों के सामने उस ने मनीषा से शादी कर ली. अग्नि के फेरे लगा कर पर मनीषा की मांग में सिंदूर भर दिया. इस के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

शादी के बाद अमर ने मनीषा को बताया कि वह शादीशुदा तो है ही, उस का एक बच्चा भी है. इस पर मनीषा ने हैरानी से कहा, ‘‘तुम ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?’’

‘‘तुम ने कभी पूछा ही नहीं, इसलिए मैं ने नहीं बताया. लेकिन तुम परेशान मत होओ, भले ही मैं शादीशुदा हूं, तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. पहली पत्नी से मेरा एक बच्चा है. एक बच्चा मैं तुम से चाहता हूं. मैं वादा करता हूं कि तुम्हें हर तरह से खुश रखने की कोशिश करूंगा.’’ अमर ने कहा.

मनीषा बिना सोचेसमझे ऐसा कदम उठा चुकी थी जो उस के लिए नुकसानदायक साबित हुआ था. वह अमर से शादी कर चुकी थी. इसलिए घर वापस जाना उस ने जरूरी नहीं समझा. लिहाजा उस ने तय कर लिया कि अब चाहे जो भी हो, वह अमर के साथ ही रहेगी. आगे जो होगा, देखा जाएगा. वह अमर के साथ हंसीखुशी से रहने लगी.

15-20 दिनों बाद अमर का मनीषा से मन भर गया. अब मनीषा उसे गले की हड्डी लगने लगी. वह उस से छुटकारा पाना चाह रहा था. इस बारे में उस ने दोस्त रंजीत से बात की. उसे अकेली छोड़ कर वह जा नहीं सकता, क्योंकि बाद में मनीषा द्वारा पुलिस से शिकायत करने पर उस के फंसने की आशंका थी. अगर वह उस की हत्या कर देता तो भी उस के जेल जाने की आशंका थी.

ऐसे में रंजीत ने उसे कोठे पर बेचने की सलाह दी. कोठे पर जाने के बाद कोई भी लड़की बाहर नहीं आ सकती और इस में उन्हें अच्छीखासी रकम भी मिल जाती. दोस्त का यह आइडिया अमर को पसंद आ गया. उन्होंने जीबी रोड के कोठों का नाम सुना था. वे उसे दिल्ली के जीबी रोड के किसी कोठे पर बेचना चाहते थे.

वे ऐसे किसी दलाल को नहीं जानते थे, जो उन का यह काम करा देता. वे सीधे कोठे पर यह सोच कर नहीं जा रहे थे कि सौदा न पटने पर कहीं कोठे वाली पुलिस से पकड़वा न दे. लिहाजा वे मनीषा को कोठे पर बेचने का कोई और तरीका खोजने लगे.

आजकल ज्यादातर लोगों के पास स्मार्टफोन है, जिन पर इंटरनेट का खूब प्रयोग होता है. इस स्मार्टफोन ने लोगों को स्मार्ट बना दिया है. उन्हें कोई भी जानकारी चाहिए, झट गूगल पर सर्च करने बैठ जाते हैं. रंजीत के दिमाग में जाने क्या आया कि वह गूगल पर सैक्स से संबंधित साइट्स खोजने लगा. इस के बाद उस ने यूट्यूब पर जीबी रोड रेडलाइट एरिया से संबंधित वीडियो देखीं.

एक वीडियो में जीबी रोड के कोठों के अंदर के दृश्य भी दिखाए गए थे. वीडियो देखते देखते रंजीत की नजर दीवार पर लिखे एक फोन नंबर 8750870424 पर गई, जहां लिखा था कि कोई भी समस्या या शिकायत इस नंबर पर करें.

यह फोन नंबर दिल्ली के कमला मार्केट थाने के थानाप्रभारी का था. यह फोन नंबर मध्य जिला के डीसीपी ने इस आशय से जीबी रोड के कोठों पर लिखवाया था कि किसी जरूरतमंद लड़की से जबरदस्ती धंधा कराए जाने पर वह इस नंबर पर शिकायत कर सके.

रंजीत को यह जानकारी नहीं थी कि यह नंबर पुलिस का है. उस ने सोचा कि यह कोठे के संचालक का होगा. दोनों दोस्तों ने तय कर लिया कि इस फोन नंबर पर बात कर के वे मनीषा को बेचने की कोशिश करेंगे.

रंजीत ने अमर को यह बात पहले बता दी थी कि मनीषा का सौदा जितने रुपयों का होगा, उस में से एक लाख रुपए वह लेगा. इन रुपयों को खर्च करने का प्लान भी उस ने बना लिया था. रंजीत ने तय कर लिया था कि वह कोई पुरानी कार खरीद कर अपने घर ले जाएगा. इस के बाद अमर ने उसी नंबर पर फोन किया.

जैसे ही अमर ने पूछा कि आप जीबी रोड से बोल रहे हैं तो थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका ने हां कह दिया. क्योंकि इस से पहले भी उन के पास ऐसी कई काल आ चुकी थीं. उन्होंने अमर से ऐसे बात की, जैसे वह किसी कोठे के संचालक हों.

उन की इसी समझदारी पर मनीषा कोठे पर बिकने से बच गई. उन्होंने अमर और रंजीत के खिलाफ भादंवि की धारा 120बी, 363, 366ए, 376, 370 और पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. उन्हें गिरफ्तार कर 23 नवंबर, 2017 को न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी कपिल कुमार के समक्ष पेश कर एक दिन का रिमांड लिया.

रिमांड अवधि में पूछताछ करने के बाद उन्हें फिर से 24 नवंबर को कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने मनीषा को चाइल्ड वेलफेयर सोसायटी भेज दिया.

थानाप्रभारी के इस कार्य की पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक, डीसीपी मंदीप सिंह रंधावा ने भी सराहना की है. उन्होंने इसे एक सच्ची समाजसेवा बताया. मनीषा बिहार के मोतिहारी जिले के लौकी थानाक्षेत्र की थी. लिहाजा थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका ने इंटरनेट से मोतिहारी के एसएसपी औफिस का नंबर हासिल किया. फिर उन्होंने एसएसपी औफिस से थाना लौकी का फोन नंबर लिया.

वहां के थानाप्रभारी रामचंद्र चौपाल को उन्होंने मनीषा के बरामद होने की सूचना दी तो उन्होंने बताया कि मनीषा एक गरीब परिवार की है. घर वालों ने उस के भाग जाने की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई थी.

बहरहाल, थानाप्रभारी रामचंद्र चौपाल ने मनीषा के घर वालों को मनीषा के दिल्ली से बरामद होने की जानकारी दे दी. कथा संकलन तक मनीषा के घर वाले दिल्ली नहीं पहुंच सके थे. मामले की जांच थानाप्रभारी सुनील कुमार ढाका कर रहे हैं.

जीबी रोड के कोठे में लिखे इस फोन पर भले ही किसी शोषिता ने पुलिस से शिकायत न की हो, पर इस नंबर ने एक लड़की को शोषित होने से जरूर बचा लिया. देश भर के सभी रेडलाइट एरिया में यदि स्थानीय पुलिस के नंबर इसी तरह प्रसारित किए जाएं तो और भी तमाम लड़कियां देह व्यापार के धंधे में जाने से बच सकती हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. मनीषा परिवर्तित नाम है.