UP Crime News : सामने आया बोतल बाबा का पाखंड

UP Crime News. हरिओम यादव से बोतल बाबा बने पाखंडी ने सुनियोजित तरीके से कानपुर देहात के गांवों में अपने चमत्कार का खूब प्रचार किया, जिस से उस के आश्रम में पीडि़तों की भीड़ जुटने लगी थी. उसे रोजाना हजारों रुपए की आमदनी होने लगी. समस्या निदान के बहाने वह महिलाओं को अपनी हवस का शिकार इस तरह बनाता कि

हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा कुछ देर आंख बंद कर कोई मंत्र बुदबुदाता रहा, फिर उस ने आंखें खोलीं और एक भरपूर नजर सामने बैठी खूबसूरत रेखा पर डाली. फिर वह रेखा के ससुर सालिग राम की ओर मुखातिब हुआ, ”आप नींबू, चाकू और एक गिलास पानी लाइए. अभी पता चल जाएगा कि आप की बहू पर किसी मायावी शक्ति का साया है या वह शारीरिक व्याधि से पीडि़त है.’’

सालिग राम तांत्रिक बाबा की आज्ञा का पालन करते हुए किचन से नींबू, चाकू व एक गिलास पानी ले आए. तांत्रिक ने गिलास का पानी हाथ में लिया और मंत्र बुदबुदाते हुए कई फूंक मारे फिर रेखा से कहा कि इस पानी को पी लो.

इस के बाद उस ने जेेब से तह किया हुआ रूमाल निकाला फिर रूमाल से चाकू को कई बार हौलेहौले पोंछा. तत्पश्चात उस ने कोई अस्पष्ट सा मंत्र बुदबुदाना शुरू किया. सालिग राम तथा उस के परिवार वालों की आंखें तब हैरानी से भर गईं, जब उन्होंने देखा कि नींबू को काटने के बाद उस में नीबू के रस की जगह रक्त टपकने लगा है.

”इस का मतलब है तुम्हारी बहू शारीरिक व्याधि का शिकार नहीं है. बल्कि उस पर कोई शैतानी साया है. उसे भगाने के लिए अनुष्ठान करना होगा, तब वह बिलकुल ठीक हो जाएगी.’’ हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा ने कहा.

”मेरी बहू ठीक हो जाएगी न बाबाजी?’’ सालिग राम हाथ जोड़ कर बोले.

”बिलकुल हो जाएगी. लेकिन आप को वही करना होगा, जो मैं कहूंगा.’’

”हम वैसा ही करेंगे बाबाजी, ”सालिग राम हाथ जोड़ कर बोले, ”आप बताइए क्या करना होगा?’’

”तुम्हें अपनी बहू को हमारे चैन का पुरवा स्थित हरिधाम आश्रम में लाना होगा. वहां अनुष्ठान व पूजा करनी होगी. इस पूजा में मेरे साथ तुम्हारी बहू रेखा होगी. पूजा एकांत कमरे में होगी तथा रेखा को केवल साफ धुला हुआ रंगीन वस्त्र पहनना होगा. इस पूजा के बाद रेखा एकदम ठीक हो जाएगी. अनुष्ठान में लगभग 40 हजार का खर्च आएगा. उस का इंतजाम तुम्हें करना होगा.’’

सब के चेहरे पर अब एक आशा की झलक नाचने लगी थी. केवल रेखा खुद को असहज महसूस कर रही थी. यह बात 6 जून, 2026 की है. रेखा के मायके व ससुराल वालों ने 40 हजार रुपयों का इंतजाम कर बाबा को थमा दिए. बाबा ने तब उन्हें अनुष्ठान के लिए 15 जून, 2026 को अमावस्या के दिन आश्रम आने को कहा.

उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद के फफूंद थाना अंतर्गत एक गांव है-मटेरा. इसी गांव में राजकुमार सपरिवार रहते थे. उस के परिवार में पत्नी ऊषा के अलावा 2 बेटियां रेखा व पूनम थीं. राजकुमार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे. वेतन से परिवार का भरणपोषण करते थे.

बड़ी बेटी रेखा सयानी हुई तो राजकुमार ने उस का विवाह फफूंद कस्बा निवासी सालिग राम के बड़े बेटे रघुवीर के साथ कर दिया. सालिग राम के 2 अन्य बेटे रामवीर व सुखवीर थे, जो उस के साथ ही किराए के मकान में रहते थे और प्राइवेट नौकरी करते थे.

रेखा पढ़ीलिखी, खूबसूरत सुशील युवती थी. उस ने ससुराल आते ही घर संभाल लिया था. रेखा की सास जानकी, सरल स्वभाव की बहू पा कर बेहद खुश थी. रेखा पति का ख्याल तो रखती ही थी, सासससुर व दोनों देवरों का भी खयाल रखती थी. हंसीखुशी से 2 साल बीत गए. इन 2 वर्षों में रेखा ने एक बेटे अमन को जन्म दिया. अमन के जन्म से घर में खुशियां छा गईं.

रेखा नहीं हो रही ठीक

बेटे के जन्म के बाद जब घर खर्च बढ़ा तो रेखा का पति रघुवीर कमाने के लिए कोटा (राजस्थान) चला गया. वहां वह वेल्डिंग का काम करने लगा. कमाई का पैसा वह हर महीने अपनी पत्नी रेखा को भेजता. रेखा इन पैसों से अपने बच्चों का पालनपोषण करती और जो पैसा बचता, सास को थमा देती. रघुवीर खास त्यौहारों पर ही घर आता था. महीने भर पत्नी के साथ रहता, फिर काम पर चला जाता था.

सब कुछ ठीक चल रहा था कि जुलाई 2025 में एक रोज रेखा गश खा कर कमरे में गिर गई. रेखा के देवर सुखवीर व रामवीर उसे डौक्टर के पास ले गए. डौक्टर ने उसे दवाई दी और घर भेज दिया. लेकिन दवा से रेखा ठीक नहीं हुई. वह दिन पर दिन कमजोर होने लगी. नींद में उसे डरावने सपने भी आने लगे. कभीकभी वह नींद में बड़बड़ाने भी लगी. उसे न अब खाने का होश रहता न लाज शर्म का.

बहू रेखा की यह हालत देख कर सालिग राम व उनकी पत्नी जानकी घबरा गई. उन्होंने बेटे रघुवीर को कोटा से घर बुलवा लिया. इस के बाद रेखा को एक के बाद एक औरैया व कानपुर के कई डौक्टरों से इलाज कराया गया.

कोई डौक्टर उसे मानसिक रोगी बताता तो कोई साधारण बुखार व कमजोरी बता कर दवा देता रहा. डौक्टरों के इलाज का असर यह हुआ कि रेखा कभी स्वस्थ दिखती और सामान्य व्यवहार करती, लेकिन कभी अनापशनाप बकनेझकने लगती और बिना बताए घर से भाग भी जाती थी.

रेखा को ले कर अब ससुराल वाले परेशान रहने लगे थे. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करें, क्या न करें. अड़ोसपड़ोस के गांव में झाडफ़ूंक करने वाले तांत्रिकों से भी वह रेखा की झाडफ़ूंक करा चुके थे, लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था. रेखा अब अपने बच्चों के साथ कभी ससुराल तो कभी मायके में आ कर रहने लगी थी.

एक रोज सालिग राम कानपुर (देहात) जनपद के कस्बा भोगनीपुर में रहने वाले एक रिश्तेदार के घर गए. वहां उन्हें रिश्तेदार के मार्फत हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा के चमत्कारी कारनामों की जानकारी हुई.

प्रभावित हो कर सालिग राम ने हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा से मुलाकात की. बाबा का विशाल आश्रम और पीडि़तों की संख्या देख कर सालिग राम प्रभावित हुए. उन्होंने बाबा को अपनी समस्या बताई और बाबा को घर आने का आग्रह किया. बाबा ने उन का आग्रह स्वीकार कर लिया.

रेखा उन दिनों अपने मायके में थी. सालिग राम ने अपने बेटे रामवीर को भेज कर रेखा को अपने घर बुलवा लिया. सालिग राम ने कहा, ”बहू, कल हरिओम सरकार उर्फ बोतल बाबा हमारे घर आ रहे हैं. वह पहुंचे हुए तांत्रिक बाबा हैं. मुझे विश्वास है कि वह तुम्हें जरूर ठीक कर देंगे.’’

6 जून, 2026 की दोपहर हरिओम सरकार उर्फ बोतल बाबा फफूंद कस्बा स्थित सालिग राम के घर पहुंचा. खूबसूरत और जवान रेखा को देख कर उस के मन में वासना जाग उठी. उस ने घर के सभी सदस्यों को चमत्कार दिखा कर कहा कि रेखा पर काली साया है. षडयंत्र के तहत उस ने रेखा को अपने आश्रम बुलाया और अनुष्ठान व पूजा करने की बात कही.

रेखा ने बचाई इज्जत

15 जून, 2026 की दोपहर रेखा अपने देवर रामवीर व सुखवीर के साथ बाइक से चैन का पुरवा गांव स्थित बाबा के आश्रम पहुंची. बाबा उस समय समागम में बैठा पीडि़तों से बात कर रहा था. रेखा को देख कर वह मुसकराया और बोला, ”आ गई तुम. आज तुम संतुष्ट हो कर ही आश्रम से जाओगी.’’

कुछ देर बाद हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा कमरे में पहुंचा और अनुष्ठान के बहाने रेखा को कमरे के अंदर बुलाया. रेखा के पहुंचते ही बाबा ने कमरा अंदर से बंद कर लिया.

उस ने रेखा को अपने सामने बैठाया और बोतल के पानी में फूंक मार कर उस के शरीर पर छिड़का. इस के बाद वह उस के शरीर को गौर से निहारने लगा. उस की नजरें देख कर रेखा असहज हो उठी. उस की आंखों से आंसू टपकने लगे.

हरिओम यादव ने आगे बढ़ कर रेखा के आंसू पोंछ दिए और स्नेह से उस की पीठ थपथपाने लगा, ”अरे, तुम रो रही हो, मुझ पर भरोसा रखो.’’ कहतेकहते हरिओम का हाथ रेखा की पीठ को सहलातेसहलाते कमर तक पहुंच गया.

औरत पुरुष के स्पर्श मात्र से ही जान जाती है कि उस स्पर्श में कौन सी नीयत छिपी है. रेखा भी बाबा हरिओम यादव की नीयत भांप गई. वह झटके से उठ खड़ी हुई, ”आप बाबा हैं, पराई औरत पर बुरी नजर डालने में शर्म नहीं आती?’’

”कैसी बातें करती हो रेखा,’’ बाबा भी उठ खड़ा हुआ, ”क्या तुम्हें अपनी जान प्यारी नहीं. अपनी जान बचाने के लिए क्या तुम इतना भी बरदाश्त नहीं कर सकती?’’

”नहीं. मैं अपनी इज्जत से खिलवाड़ नहीं कर सकती.’’ रेखा गुस्से से बोली.

बाबा ठहाका लगा कर हंसा. उस की आंखों में वासना के लाललाल डोरे तैरने लगे. बाबा ने लपक कर रेखा को दबोच लिया और उस के नाजुक अंगों को मसलने लगा. रेखा ने विरोध किया तो वह और वहशी बन गया. वह रेखा के शरीर से कपड़े खींचने लगा और संबंध बनाने की कोशिश करने लगा.

रेखा समझ गई कि बाबा पर वासना का भूत सवार है. वह उस की इज्जत लूटना चाहता है. अत: बचाव में उस ने बाबा को एक जोरदार धक्का दिया. बाबा लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. उस के बाद वह कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर आ गई. उस ने वहां मौजूद लोगों को बताया कि बाबा ने पहले छेडख़ानी की फिर दुष्कर्म का प्रयास किया.

रेखा कुछ और बताती उस के पहले ही हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा हाथ में रस्सी का कोड़ा लिए कमरे से बाहर आया और बोला, ”इस महिला पर भूत सवार है. भूत उस से डर कर भाग रहा है. इसलिए महिला भी भाग रही है. अब उस का भूत उतारना जरूरी है.’’

इस के बाद बाबा ने अपने शिष्य (भतीजे) दीपक, कुंदन व उस के देवरों रामवीर व सुखवीर से कहा कि महिला को पकड़ो. बाबा के आदेश पर उन सब ने रेखा को पकड़ लिया.

उस के बाद बाबा रेखा के समीप पहुंचा और उस के बाल पकड़ कर कोड़े से पिटाई करने लगा. वह पिटाई के दौरान रेखा से पूछता कि बता उस के साथ कितने भूत हैं. उन के नाम बता, लेकिन रेखा डर के मारे चुप रही. बाबा बारबार नाम पूछ कर कभी कोड़े तो कभी चाकू जैसी नुकीली चीज से उस के हाथपैर और कमर पर वार करता रहा.

इस बीच रेखा बाबा के हाथ जोड़ती रही और बख्श देने की गुहार लगाती रही. बाबा के शिष्य दीपक, कुंदन व रेखा के देवरों ने भी उस की पिटाई की. मार खातेखाते रेखा जब बेहोश हो गई, तभी बाबा ने उसे छोड़ा. उस के बाद उस के देवर उसे ले कर घर आ गए.

रेखा के मन में बारबार बाबा को सबक सिखाने के लिए गुस्सा उमड़ रहा था. वह सारी बात पुलिस को बताना चाहती थी ताकि वह पाखंडी बाबा किसी अन्य महिला को अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश न करे, लेकिन सासससुर ने उसे यह कह कर रोक दिया कि पुलिस में जाने से हमारे ही परिवार की बदनामी होगी.

रेखा उस वक्त तो चुप हो गई, लेकिन तांत्रिक के प्रति उस के मन में नफरत की आग सुलगती रही. आखिर में उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा कर बाबा को सबक सिखाने की ठान ली. उस ने अपने ऊपर हुए जुल्म की सारी दास्तां अपने मांबाप को भी बताई तथा मदद मांगी.

इधर बाबा हरिओम यादव को आभास हो गया था कि रेखा पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा सकती है. अत: पुलिस से बचने के लिए बाबा अपने भतीजे दीपक व कुंदन के साथ फरार हो गया. आश्रम के बाहर सजने वाली दुकानें भी बंद हो गईं. फरियादी भी लौटने लगे.

बोतल बाबा हुआ अरेस्ट

18 जून, 2026 की सुबह 10 बजे रेखा बाबा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने थाना देवराहट पहुंची. उस समय थाने में इंसपेक्टर सौरभ राणा मौजूद थे. रेखा ने उन्हें तांत्रिक व उस के शिष्यों द्वारा अपने साथ किए गए कुकृत्यों की सारी कहानी शुरू से अंत तक बता दी.

रेखा से सारी बातें सुनने के बाद इंसपेक्टर सौरभ राणा ने रेखा की तहरीर पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 316, 351, 115 व 74 के तहत हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा, उस के शिष्य दीपक, कुंदन, रेखा के देवर रामवीर, सुखवीर व 5 अन्य लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होते ही सौरभ राणा ने बाबा के चैन का पुरवा गांव स्थित आश्रम पर छापा मारा, लेकिन बाबा हाथ नहीं आया. वह शिष्यों के साथ आश्रम से फरार था.

19 जून, 2026 की दोपहर देवराहट इंसपेक्टर सौरभ राणा क्षेत्रीय गश्त पर थे, तभी उन्हें एक खास मुखबिर से पता चला कि आरोपी बाबा हरिओम यादव अपने भतीजे दीपक के साथ जल्लापुर गांव के पास मौजूद है.

मुखबिर की इस सूचना पर श्री राणा पुलिस दल के साथ जल्लापुर गांव पहुंचे और सड़क किनारे खड़े बाबा हरिओम यादव और उस के भतीजे दीपक को हिरासत में ले लिया. पुलिस ने पुखरायां सीएचसी में बाबा का मैडिकल परीक्षण कराया, फिर उसे पुलिस मुख्यालय लाया गया.

यहां पर एसपी श्रद्धा नरेंद्र पांडेय, एएसपी आलोक प्रसाद तथा सीओ (भोगनीपुर) राजीव सिरोही ने हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा से घटना के संबंध में विस्तृत पूछताछ की.

पूछताछ में बाबा हरिओम यादव ने कहा कि उस पर महिला द्वारा लगाए गए सारे आरोप झूठे हैं. उसे सुनियोजित ढंग से फंसाया गया है. औरैया जनपद के दिबियापुर कस्बा निवासी भाजपा नेता आशीष द्विवेदी ने उसे फंसाया है. देख लेने की धमकी भरा उन का फोन भी आया था. वह सनातनी बाबा है. सनातनियों को सताया जा रहा है.

लेकिन आशीष द्विवेदी का कहना है कि बाबा हरिओम पाखंडी है. वह कथित चमत्कार दिखा कर लोगों को बेवकूफ बनाता है. वह तंत्रमंत्र की दुकान चला कर 20 रुपए का पानी बेचता है और 250 रुपएकी आश्रम में प्रवेश फीस हर पीडि़त से वसूलता है. इस तरह वह रोजाना हजारों रुपए की कमाई करता है. महिला से उन का कोई लेनादेना नहीं है.

हरिओम यादव कौन था? वह स्वयंभू बाबा कैसे बना? महिला ने उस के पाखंड और धूर्तता का परदाफाश कैसे किया? यह सब जानने के लिए हम बाबा के अतीत की ओर चलते हैं.

उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर (देहात) जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर थाना देवराहट अंतर्गत एक गांव है-चैन का पुरवा. इसी गांव में फूलसिंह यादव सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 2 बेटे थे हरिओम व पुत्तीलाल. फूलसिंह काश्तकार था. उस के पास 10-12 बीघा जमीन थी, जिस में अच्छी उपज होती थी.

हरिओम बना बोतल बाबा

फूलसिंह का बड़ा बेटा हरिओम यादव बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी था. उस के सपने ऊंचे थे. वह अपने पिता के साथ खेतों पर काम करता था. हालांकि उस का मन खेतीकिसानी में नहीं लगता था. पढ़ाईलिखाई में भी वह फिसड्ïडी था.

किसानी से मन हटा तो वह कानपुर देहात की अकबरपुर तहसील में बैठने लगा. तहसील में वह लोगों के आय, जाति व निवास प्रमाण पत्र बनवाने का काम करने लगा तथा अकबरपुर कस्बे में ही एक किराए का कमरा ले कर रहने लगा. प्रमाण पत्र बनवाने में वह रोजाना 500-600 रुपए कमा लेता था.

वर्ष 2015 की बात है. चैत्र माह की नवरात्र में एक रोज हरिओम यादव भगवा वस्त्र धारण कर गांव आया. उस ने आवाज दे कर लोगों को चैपाल पर इकट्ठा किया, फिर बोला, ”गांव वालो, मेरी बात गौर से सुनो. रात में मेरे सपने में काली मां आई थी. उन्होंने आदेश दिया है कि वह काम करो, जिस के लिए तुम ने जन्म लिया है.’’

इस के बाद हरिओम यादव गांव में ही रहने लगा. उस ने गांव के बाहर अपनी जमीन पर काली माता का मंदिर बनवाया और पूजापाठ करने लगा. वह लोगों की समस्याएं सुन कर उन की मदद करने लगा. इस तरह 2 साल में ही हरिओम यादव आसपास के गांवों में फेमस हो गया.

उस ने प्रचारप्रसार के लिए अपने भतीजे दीपक व कुंदन को भी शामिल कर लिया. ये दोनों बेरोजगारों की टोली के साथ उस के चमत्कारों का प्रचारप्रसार करने लगे.

जिस जगह हरिओम यादव ने काली मां का मंदिर बनवाया था, उस के आसपास उस ने 8 बीघा भूमि पर आश्रम बनवा लिया तथा बड़ा सा भव्य गेट लगवा लिया. आश्रम का नाम दिया ‘हरिधाम आश्रम’.

8 अगस्त, 2022 को हरिओम यादव ने गांव में बड़ा आयोजन किया. हरिधाम आश्रम के उद्ïघाटन के लिए उस ने हनुमानगढ़ी के भरतदास महाराज, कर्पूरी सेना के अध्यक्ष श्याम नारायण और इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज डा. आई.एम. कुद्दूसी को बुलाया.

आश्रम के उद्घाटन के बाद हरिओम यादव हर मंगलवार व शनिवार को आश्रम में दरबार लगाने लगा. लोगों के सामने वह सिंहासन पर बैठता था. इस में वह कभी दूल्हे के कपड़े पहनता तो कभी धोतीकुरते में आता.

धीरेधीरे उस के आश्रम में सैकड़ों लोग दूरदराज से आने लगे और हरिओम महाराज के जयकारे लगाने लगे. इस तरह हरिओम यादव स्वयंभू बाबा बन गया. चूंकि वह बोतल के पानी में फूंक मार कर इलाज करता था, अत: वह हरिओम सरकार उर्फ बोतल बाबा के नाम से लोगों के बीच चर्चित हो गया.

आश्रम में आने वाले हर पीडि़त को बाबा तक पहुंचने के लिए पहले 20 रुपए की पानी की बोतल खरीदनी पड़ती, उस के बाद 100 रुपए की प्रवेश फीस की परची कटानी पड़ती. बाद में प्रवेश फीस 250 रुपए हो गई. इस तरह बाबा की हर रोज हजारों रुपए की कमाई हो जाती.

पाखंड का फैलाया जाल

हरिओम सरकार उर्फ बोतल बाबा 3 तरह से लोगों को ठीक करने का दावा करता. पहला, बोतल में फूंक मार कर पानी को अमृत बनाने का दावा, कहता इसे पीने से बीमारी ठीक हो जाएगी. दूसरा, सेब पर फूंक मार कर दावा करता कि संतानहीन महिला इसे खा कर गर्भधारण करेगी और पुत्र ही होगा और तीसरा, फिच्चफिच्च की आवाज निकाल कर शरीर से दर्द खींच लेने का दावा.

इस के अलावा बाबा कैंसर, टीबी जैसी घातक बीमारी को भी ठीक करने का दावा करता था.

बोतल बाबा के इन दावों के बावजूद यदि कोई पीडि़त कहता कि उसे फायदा नहीं हुआ तो बाबा कहता कि तुम्हारे ऊपर काला साया है. विशेष पूजा करवानी होगी. बाबा के साथ रहने वाले लोग पूजा सामग्री लिखते और वही आश्रम से ही इसे खरीदना होता था. सामग्री की कीमत 5 से 10 हजार रुपए के बीच होती. कभी किसी पीडि़त से बाबा पूजा के नाम पर 20 से 40 हजार का सौदा भी कर लेता.

हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा आश्रम में आने वाले पीडि़तों को प्रभावित करने के लिए समयसमय पर चमत्कारिक गतिविधियां भी करता रहता था. यह चमत्कार वह अपने ही आदमियों के सहयोग से करता था.

एक रोज कुछ लोग एक महिला को ले कर आए और बताया कि महिला बीमार थी. डौक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया है. उस रोज आश्रम में भीड़ थी. बाबा ने उस महिला पर पहले फूंक मार कर जल छिड़का फिर बोला, ”मैं न बाबा हूं, न भगत और न ही तांत्रिक. न मेरा कोई गुरु है, न कोई कंठीमाला पहनता हूं. ये जो सूर्य है और ये जो काली मां है, यही मेरे गुरू हैं.’’

इस के बाद हाथ से जादू दिखाने जैसी हरकत करने लगा. फिर लेटी हुई महिला उठ गई. लोग जयजयकार करने लगे.

इसी तरह जालौन की रहने वाली आरती अपने पति के साथ आश्रम आई. संतान की चाह में वह आई थी. बाबा ने आरती से सेब मंगाया, फिर फूंक मार कर मंत्र पढ़ा. इस के बाद सेब आरती की झोली में फेंकतेे हुए बोला, ”चाहे कमी तुझ में हो या तेरे पति में, जा भिखारिन तुझे पुत्र प्राप्त होगा. इसे एकांत में बैठ कर खाना.’’

भोगनीपुर की रागिनी गृहकलह व गृह दोष से परेशान थी. समस्या के निदान के लिए वह बाबा के आश्रम आई. बाबा ने बोतल के पानी में फूंक मार कर उसे दिया और कहा कि इस पानी को पी ले. बचे हुए पानी को घर में छिड़कना तथा घर के लोगों को पिलाना. सब ठीक हो जाएगा.

हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा का पाखंड चरम पर था. वह लोगों को तंत्रमंत्र के बहाने ठग रहा था. लेकिन उस के पाखंड और कुकृत्य का परदाफाश तब हुआ, जब बाबा ने फफूंद कस्बा की रहने वाली महिला रेखा को काली साया दूर करने के बहाने अपने आश्रम में बुला कर अनुष्ठान के बहाने उस से छेड़छाड़ की तथा शारीरिक संबंध बनाने का प्रयास किया.

20 जून, 2026 को पुलिस ने हरिओम यादव उर्फ बोतल बाबा तथा दीपक से पूछताछ के बाद उन्हें कानपुर (देहात) की माती कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस प्रयासरत थी. UP Crime News

—कथा मेें महिला पात्रों के नाम काल्पनिक हैं.

Chhattisgarh Serial Killer : 8 हत्याएं करने वाला सीरियल किलर

Chhattisgarh Serial Killer. बलौदाबाजार जिले के खरवे गांव में 4 महीने के दौरान हुई 8 रहस्यमयी मौतों ने पूरे इलाके को दहला दिया. गांव के लोग इन मौतों को प्राकृतिक मौत मानते रहे, लेकिन पुलिस ने जब इस की तह में जा कर जांच की तो मामला कुछ और ही सामने आया. एक के बाद एक की गई सुनियोजित 8 हत्याओं में आखिर किस का हाथ था?

46 साल का रामसहाय जायसवाल खरवे गांव में अपने घर पर ही किराना दुकान चलाता था. घर में 5 लोगों के परिवार में उस की पत्नी, 2 बेटे और एक बहू रहती थी. रामसहाय की फितरत ऐसी थी कि वह लोगों के द्वारा भलाबुरा कहने पर सामने तो कुछ नहीं कहता था, मगर दिल में दुश्मनी की गांठ बांध लेता था.

पिछले कुछ दिनों से उस के दिमाग में जिस खतरनाक चाल को अंजाम देने का खेल चल रहा था, उस का अंदाजा किसी को रत्ती भर भी नहीं था. गांव के रहने वाले बद्री पटेल, बुढालू साहू, बुधराम जायसवाल के साथ कुछ लोग और थे, जो रामसहाय को फूटी आंख भी नहीं सुहाते थे.

छत्तीसगढ़ के जिला बलौदाबाजार के गांवों में शराब की बोतल को आधाआधा साझा करने की भी अनोखी परंपरा है. इसी परंपरा को इसी जिले के खरवे गांव निवासी रामसहाय ने हथियार बना कर अपने मंसूबों को पूरा करने का फैसला किया.

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6 फरवरी, 2026 की शाम जब कुछ अंधेरा हो गया तो रामसहाय ने अपनी दुकान की अलमारी में रखी देशी शराब की बोतल निकाली और धीरेधीरे आधी बोतल पी ली. उस के बाद ढक्कन लगा कर आधी बोतल उस ने फिर से अलमारी में रख दी.

उस दिन शाम को जब बद्री पटेल उस की किराना दुकान पर पहुंचा तो रामसहाय ने चहकते हुए उस का स्वागत करते हुए कहा, ”जय जौहार पटेल साब, आओ बैठो. आज सही समय पर आए हो. तुम्हारी खिदमत में दारू की आधी बोतल बचा कर रखा हूं.’’

”रामसहाय भाई, आज बड़े मेहरबान हो रहे हो मुझे पर, क्या बात है मिजाज तो ठीक है तुम्हारा?’’ बद्री पटेल ने हैरत से देखते हुए कहा.

”पटेल साब, तुम्हीं तो पहले शराब पिलाने का आग्रह करते थे तो दोस्ती बढ़ाने के लिए मेरी तरफ से पेशकश है, कल को तुम्हारी तरफ से सत्कार स्वीकार कर लूंगा.’’ रामसहाय ने कुटिल मुसकान लाते हुए कहा.

छत्तीसगढ़ में एक कहावत बेहद प्रचलित है ‘दम भाई तो सगा भाई.’ मुफ्त की शराब के लिए तो पियक्कड़ दुश्मन के साथ भी पीने बैठ जाते हैं. बद्री पटेल भी रामसहाय के आग्रह को ठुकरा न सका. किराना दुकान की ओट में बैठ कर बद्री पटेल आधी बोतल शराब गटक गया.

घर जा कर बद्री पटेल ने खाना खाया तो उस की तबियत बिगड़ गई. बद्री पटेल की पत्नी ने आसपास के लोगों को बुलाया तो कुछ लोग उसे अस्पताल ले जाने लगे.

योजना हुई सफल

तभी खबर पा कर रामसहाय भी वही पहुंच गया. उस ने लोगों को बताया, ”घबराने की जरूरत नहीं है, बद्री ने ज्यादा शराब पी ली है, उसे सुला दो, सुबह तक नशा उतर जाएगा तो अपने आप ठीक हो जाएगा.’’

बद्री को घर में सुला कर सभी लोग अपनेअपने घरों को चले गए. सुबह होते ही बद्री की मौत हो गई. पूरा गांव इकट्ठा हो गया और बद्री के क्रियाकर्म की तैयारी में जुट गए.

रामसहाय ने बद्री के घर पहुंच कर शोक संवेदना व्यक्त की और वह बद्री के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ. फेमिली वालों के निर्णय के अनुसार बद्री पटेल को जमीन में दफना दिया गया.

6 फरवरी, 2026 को हुई बद्री पटेल की मौत को गांव वाले भुला ही नहीं पाए थे कि 20 फरवरी, 2026 को गांव के सामाजिक कामों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले बुढालू साहू की जान चली गई. इस के बाद 12 मार्च को बुधराम जायसवाल और 20 मार्च को गांव के 5 बार सरपंच रहे छत्तूराम साहू और 31 मार्च को गांव के नवयुवक विनोद साहू की मौत हो गई.

छोटे से गांव में लगातार हो रही इन मौतों ने गांव वालों को चिंता में डाल दिया था. लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इन मौतो की असली वजह क्या है?

बुधराम जायसवाल रामसहाय का चचेरा भाई था. सबसे हैरानी की बात यह रही कि बुधराम की हत्या करने के बाद भी रामसहाय उस के अंतिम संस्कार और दशगात्र जैसे सभी धार्मिक कर्मकांडों में शामिल हुआ. उस ने परंपरा के अनुसार सिर भी मुंडवाया और परिजनों के बीच सामान्य व्यवहार करता रहा. इसी कारण किसी को उस पर शक नहीं हुआ.

करीब 800 की आबादी वाला खरवे गांव 2 हिस्सों में बंटा हुआ है. एक पुराना खरवे, जो नदी किनारे बसा छोटा गांव है, वहीं दूसरा हिस्सा नया खरवे है, जहां गांव के कई परिवार करीब एक किलोमीटर दूर जा कर बस गए हैं. विकास की मुख्यधारा से दूर इस गांव में लोग इसे किसी के टोना टोटका से जोड़ कर भी देख रहे थे. कुछ लोग भूत प्रेत जैसे अंधविश्वास में लगे हुए थे.

लोगों ने अब शांति पाठ कराने वाले बैगाओं को अपने घर में बुलाना शुरू कर दिया था. कम पढ़ेलिखे गांव के लोगों का मानना था कि घरों में भूतप्रेत बाधा से मुक्ति पाने के लिए शांति पाठ कराना जरूरी है, लेकिन हद तो तब हो गई जब 28 अप्रैल, 2026 को शांति पूजा कराने वाले बैगा गजानंद मांझी की मौत हो गई.

बैगा की मौत ने तोड़ा भ्रम

गजानंद मांझी ने गांव में शांति पूजा कराई थी. 28 अप्रैल को गजानंद को शराब दी गई थी. उस दिन दोपहर में गजानंद घर पर सो रहा था. गांव का मोहनलाल जायसवाल उस के घर शराब ले कर पहुंचा. घर पर गजानंद की पत्नी साधना मौजूद थी तो साधना ने गजानंद को सोते से जगा दिया.

मोहनलाल शराब की बोतल दे कर अपने घर चला गया. बाद में गजानंद ने कोल्ड ड्रिंक में शराब मिला कर पी ली. शराब पीने के कुछ देर बाद उन्होंने रोटी का निवाला मुंह में रखा ही था कि अचानक वह जमीन पर ही लुढ़क गया. यह देख कर पत्नी साधना घबरा गई.

इस के बाद गजानंद को अस्पताल ले जाया गया, जहां उस की मौत हो गई. गजानंद की मातमपुरसी में आए मोहनलाल जायसवाल ने बताया कि रामसहाय जायसवाल ने अपनी दुकान पर बुला कर शराब की बोतल उसे दे कर कहा था कि इसे गजानंद मांझी को देना.

खरवे गांव का मुख्य गुड़ी चौक गांव का सबसे व्यस्त और प्रमुख जगह है. नदी, खेत और अन्य दैनिक कार्यों के लिए आनेजाने वाले अधिकांश लोगों का रास्ता इसी चौक से हो कर गुजरता है. रामसहाय जायसवाल का घर और किराना दुकान भी इसी जगह पर थी. चौक में दुकान होने के कारण रामसहाय का गांव के लोगों से संपर्क बना रहता था.

गांव के ज्यादातर लोग अकसर दुकान या घर के सामने से गुजरते तो रामसहाय लोगों को आवाज दे कर बुला लेता था और उन से बातचीत कर पूरे गांव की खोज खबर रखता था. यही वजह है कि गांव के लगभग सभी लोग उसे अच्छी तरह जानते और पहचानते थे.

अगले दिन 29 अप्रैल, 2026 को गांव के सक्रिय कार्यकर्ता चैतूराम साहू की मौत हो गई. गांव में दहशत थी और सभी मौतों में एक बात कौमन थी कि जिन लोगों की मौत हुई थी, उस दिन उन्होंने शराब पी थी. यह जानते हुए भी लोग शराब पीना नहीं छोड़ रहे थे.

करीब 15 दिन बीत गए गांव में कोई मौत नहीं हुई थी. गांव वालों का डर खत्म हो रहा था तभी 14 मई, 2026 को गांव के मेहतरू साहू की मौत ने गांव में फिर से दहशत फैला दी. मेहतरू साहू गांव में घर घर शांति पूजा पाठ करवाने में सहयोग कर रहा था.

उसी दिन वह नदी में नहाने गया था. उसी दौरान रामसहाय जायसवाल का बेटा रुद्रेश्वर भी वहां मौजूद था. नहाते समय मेहतरू की अचानक तबीयत बिगड़ गई और वह बेहोश हो गया.

हालत गंभीर होता देख रुद्रेश्वर ने अन्य लोगों की मदद से उसे तुरंत बाइक पर बैठा कर अस्पताल पहुंचाया. इलाज के दौरान मेहतरू साहू की मौत हो गई. बाद में गांव के कुछ लोगों के जरिए पता चला कि मेहतरू को भी रामसहाय जायसवाल ने आधी शराब पीने के लिए दी थी.

रामसहाय पर हुआ शक

लगातार हो रही मौतों से चिंतित गांव के लोगों ने खरवे गांव में एक बैठक का आयोजन किया. 14 मई को मेहतरू साहू की मौत के बाद हुई इस बैठक में मौतों के कारणों को ले कर चर्चा हुई. चर्चा के दौरान गांव के कार्तिक नाम के नौजवान ने पंचायत के सामने बताया कि उसे भी 14 अप्रैल को उस के दोस्त प्रमोद साहू ने शराब दी थी. शराब पीते ही उसे उस का स्वाद कड़वा लगा और कुछ ही देर में उस के पेट में तेज दर्द शुरू हो गया.

जब तक वह कुछ समझ पाता उसे उल्टियां होने लगीं और वह बेहोश हो गया. लेकिन करीब आधे घंटे बाद में वह होश में आ गया. जब गांव वालों ने प्रमोद से पूछा तो उस ने बताया, ”रामसहाय जायसवाल ने उसे आधी शराब की बोतल देते हुए कहा था कि यह बोतल कार्तिक को दे देना.’’

प्रमोद का मन बोतल देख कर शराब पीने का हो रहा था, मगर उस ने खुद शराब नहीं पी और वही शराब कार्तिक को दे दी थी. कार्तिक और प्रमोद की बातों से गांव वालों ने अन्य घटनाओं के एक जैसे पैटर्न को देख कर रामसहाय जायसवाल पर संदेह जताया.

ग्रामीणों ने की शिकायत

जून महीने की 6 तारीख को गांव के लोग इकट्ठे हो कर कसडोल पुलिस थाना पहुंचे और टीआई प्रवीण मिंज को पूरे घटनाक्रम की विस्तार से जानकारी दी. बलौदा बाजार जिले के एसपी ओ.पी. शर्मा और कसडोल एसडीओपी के.के. वासनिक को पूरे मामले की जानकारी दी गई तो उन्होंने एक जांच टीम का गठन कर दिया.

जांच टीम को पड़ताल के दौरान गांव में हुई सभी मौतों में एक ही तरह का पैटर्न देखने को मिला. स्थानीय लोगों से पूछताछ में भी यह बात सामने आई कि संदेही रामसहाय जायसवाल ने इन लोगों को शराब दी थी. इसी आधार पर जांच को आगे बढ़ाया गया.

ग्रामीणों की शिकायत और शुरुआती जांच के बाद पुलिस ने प्रशासनिक अनुमति ले कर दफन किए गए शवों को बाहर निकालने का फैसला किया. 13 जून को पुलिस, तहसीलदार और फोरैंसिक साइंस लैब (एफएसएल) की संयुक्त टीम खरवे गांव पहुंची.

अधिकारियों की मौजूदगी में जेसीबी मशीन से कब्रों को खोदा गया और शवों को बाहर निकाला गया. यह दृश्य गांव के लोगों के लिए बेहद असामान्य था. बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भीड़ मौके पर मौजूद थी और पूरी काररवाई को अपनी आंखों से देख रही थी. प्रशासन ने पूरी प्रक्रिया को कानूनी और वैज्ञानिक तरीके से पूरा कराया.

फरवरी से मई महीने के बीच गांव में लगातार शराब पीने वाले लोगों की मौत हुई है. सभी लोग एक ही व्यक्ति के संपर्क में आने के बाद शराब पीते थे और बाद में उन की मौत हुई. पहले इन मौतों की कोई औपचारिक शिकायत या पोस्टमार्टम नहीं कराया गया था. गांव के लोग कबीर पंथ को मानते हैं. इसलिए वे शवों को जलाने के बजाय दफनाते हैं.

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पोस्टमार्टम के लिए इन्हीं कब्रों को दोबारा खोदा गया और जांच के बाद शवों को फिर से दफना दिया गया. लेकिन ग्रामीणों की शिकायत के बाद यह काररवाई की गई. मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए शवों को कब्र से निकाल कर फोरैंसिक जांच के लिए भेजा गया.

पुलिस ने खेला माइंड गेम

पुलिस ने रामसहाय जायसवाल से पूछताछ शुरू की, मगर रामसहाय 2 दिन तक पुलिस से यही कहता रहा, ”साब, मैं तो उन का सब का भाई था. मैं ही मरने वालों को अस्पताल ले गया, मैं ने ही उन का कफनदफन किया, मैं रोया भी, इतना ही नहीं मैं ने सब को सांत्वना दी. कुछ लोग व्यक्तिगत दुश्मनी की वजह से मुझ पर झूठे इलजाम लगा रहे हैं.’’

2 दिन तक रामसहाय पुलिस को इसी तरह चकमा देता रहा. चेहरे पर कोई डर नहीं, कोई पछतावा नहीं, बस एक साइको किलर जैसी अजीब सी निश्चिंतता थी.

जब रामसहाय टूट नहीं रहा था, तब एसपी ओ.पी. शर्मा ने एसडीओपी कौशल किशोर वासनिक और पूरे पुलिस टीम के साथ मिल कर एक रणनीति बनाई. रणनीति के तहत यह तय किया गया कि रामसहाय से सीधे पूछताछ नहीं, पहले उसे भरोसा दिला कर दोस्त बनाना होगा.

इस के बाद टीआई प्रवीण मिंज ने रामसहाय से सहानुभूति दिखाते हुए कहा, ”रामसहाय, तुम भले आदमी हो. हम जानते हैं कि तुम ने जिन के साथ भलाई की, उन्हीं से तुम्हें बहुत ताने मिले, बहुत गालियां मिलीं, लेकिन हम पुलिस वाले भी मजबूर हैं, इसलिए तुम्हें पुलिस थाना ले आए.’’

रामसहाय को जब पुलिस की सहानुभूति मिली तो उस ने सारी शिकायतें गिनानी शुरू कर दीं. रामसहाय अपने दिल के दर्द को बताते हुए बोला, ”साब, बद्री पटेल मुझे रोज गाली देता था. छत्तूराम साहू की मेरी बीवी पर बुरी नजर थी. चैतूराम से मैं ने कर्ज लिया था, मगर उसे धीरज नहीं थी, बारबार ब्याज के पैसे मांग रहा था.’’

”मगर रामसहाय, मान गए हम तुम्हें बड़ी चालाकी से तुम ने दुश्मनों को ठिकाने लगा दिया. जरा हमें भी तो बताओ, यह सब तुम ने कैसे किया? किसी को पता क्यों नहीं चला?’’ टीआई बोले.

रामसहाय को ऐसा लगा जैसे पुलिस उस की तारीफ कर रही है, फिर क्या था रामसहाय ने बता दिया कि आठों लोगों को किस तरह शराब की बोतल में सुहागा मिला कर मौत के मुंह में धकेल दिया.

कुत्ते पर किया ट्रायल

रामसहाय जायसवाल नहाने के लिए रोज ही गांव की नदी पर जाता था. एक दिन नदी किनारे उस ने एक शिकारी को चिडिय़ा का शिकार करते हुए देखा. शिकारी ने मरी हुई मछली के मुंह में कुछ डाला और उसे जमीन पर फेंक दिया. कुछ ही देर में एक चिडिय़ा ने वह मछली खा ली और एक मिनट के भीतर ही चिडिय़ा मर गई.

यह देख कर ही रामसहाय के मन में अपने शिकार को फांसने का आइडिया आया था. उस दिन रामसहाय शिकारी के नजदीक पहुंचा और शिकारी से बोला, ”भैया, आप के पास यह कौन सा जादू है कि पल भर में ही चिडिय़ा का शिकार कर लिया.’’

शिकारी ने बताया, ”यह कोई जादूवादू नहीं है. मेरे पास यह जो ‘सुहागा’ नाम का पदार्थ है, उसे मरी हुई मछली के मुंह में डाल देता हूं. मछली के मुंह में फंसे इस सुहागा को जब चिडिय़ा खाती है, तो उस के जहर से वह तुरंत मर जाती है.’’ शिकारी ने हाथ में एक पैकेट में रखे सुहागा को दिखाते हुए कहा.

रामसहाय को यह सुहागा का करिश्मा अपने दुश्मनों को खत्म करने का कारगर हथियार समझ आया. रामसहाय ने सोचा, ‘अगर चिडिय़ा इतनी आसानी से मर सकती है, तो इंसान क्यों नहीं?’

रामसहाय ने शिकारी से विनती करते हुए कहा, ”भैया मेरे घर और दुकान में चूहों ने नाक में दम कर रखा है. चूहों ने दुकान का सामान कुतर कर मेरा धंधा चौपट कर दिया है, थोड़ा सा सुहागा मुझे भी दे दो.’’

शिकारी ने रामसहाय की बातों पर भरोसा कर उसे सुहागा दे दिया. रामसहाय ने पहले सुहागा के जहर को किसी इंसान पर नहीं आजमाया. इस के लिए उस ने एक आवारा कुत्ते को चुना. उस ने सुहागा मिला बिसकुट अपने गांव के एक आवारा कुत्ते को खिलाया.

कुत्ते ने जैसे ही सुहागा को खाया और देखते ही देखते वह मर गया. यह देख कर रामसहाय को पक्का यकीन हो गया कि सुहागा का जहर किसी इंसान को मारने के लिए बड़ा कारगर है.

वह अब यह मान कर चल रहा था कि अब वह किसी को भी मार सकता था, बिना पकड़े. उस ने तय कर लिया कि, जिसे मारना है, पहले उस से दोस्ती करूं, फिर शराब पिलाऊं और उस में सुहागा मिलाऊं, जिस से किसी को उस पर शक न हो.

खुद सुना दी दास्तान

पुलिस टीम के सामने रामसहाय ने 8 लोगों को शराब में जहर मिला कर अलगअलग कारणों से उन की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया. रामसहाय ने पहला शिकार 6 फरवरी को बद्री पटेल को बनाया था. बद्री अकसर ही रामसहाय के साथ गालीगलौज करता था और शराब पिलाने के लिए दबाव बनाता था. रामसहाय ने बद्री को पुरानी बातें भुला कर पहले भरोसे में लिया, उस के बाद सुहागा मिली शराब बद्री को दी, जिसे पी कर बद्री की मौत हो गई.

पहले शिकार से मिली सफलता से रामसहाय का हौसला बढ़ा और उस ने दूसरा निशाना बुढ़ालु को बनाया. बुढ़ालु रामसहाय और उस की समाज को गाली देता था. 2023 के विधानसभा चुनाव के समय रामसहाय और बुढ़ालू का झगड़ा हुआ था, तभी से उन के बीच विवाद चल रहा था. रामसहाय ने 20 फरवरी को बुढ़ालू को भी सुहागा मिला कर शराब पिलाई और उस की मौत हो गई.

12 मार्च को रामसहाय ने अपना तीसरा शिकार छत्तूराम को बनाया. छत्तूराम रामसहाय की पत्नी पर बुरी नजर रखता था, जिस का बदला लेने के लिए शराब में सुहागा मिला कर पिलाने से छत्तूराम की भी मौत हो गई.

बुधराम के साथ रामसहाय की जमीन के लेनदेन और समाजिक रूप से पुरानी रंजिश चल रही थी. ठीक उसी पैटर्न में शराब में सुहागा मिला कर पिलाने से बुधराम को मौत की नींद सुला दिया.

लोगों को जहर दे कर लगातार मारने की घटना और किसी को कोई शंका नहीं होने पर रामसहाय का हौसला बढ़ता जा रहा था. रामसहाय ने अगला शिकार विनोद कुमार को बनाया गया, जो उस के साथ लगातार गालीगलौज किया करता था. उस से बदला लेने के लिए सुहागा मिला कर शराब पीने के लिए आरोपी द्वारा दिया गया, जिसे पीने से विनोद कुमार की भी मौत 31 मार्च को कसडोल अस्पताल में हो गई.

इसी तरह शांति पूजा कराने वाले गजानंद की मौत 28 अप्रैल को हो गई. रामसहाय का मानना था कि गजानंद उस पर बैगा गुनिया करता था, जिस की वजह से वह कर्जमुक्त नहीं हो पा रहा था और उस के जीवन में सुखशांति नहीं थी.

रामसहाय ने चैतूराम से 50 हजार रुपए कर्ज लिया था. चैतूराम रामसहाय से समय पर ब्याज की रकम की मांग करता था. यह बात रामसहाय को नागवार लगती थी. ब्याज की रकम से निजात पाने के लिए रामसहाय ने चैतूराम को मारने की योजना बनाई. उस ने चैतूराम को 29 अप्रैल को शराब में सुहागा मिला कर दिया, जिसे पीने से चैतूराम की भी मौत हो गई.

2023 में चुनाव के समय रामसहाय का मेहतरू राम से झगड़ा हुआ था, तब मेहतरू ने रामसहाय के साथ मारपीट की थी. इसी का बदला लेने के लिए 14 मई को मेहतरू राम को भी सभी लोगों की तरह शराब में सुहागा मिला कर रामसहाय द्वारा दिया गया, जिसे पीने से महेतरू की भी मौत हो गई. Punjab Serial Killer

Jharkhand Crime: 3 साल की बच्ची से दुष्कर्म, आरोपी को बचाने की कोशिश

Jharkhand Crime.गुमला में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है. वहां 3 साल की मासूम से दुष्कर्म के बाद मामले को दबाने की कोशिश की गई. पंचायत ने आरोपी पर जुरमाना लगाया और उस के पैसे से जश्न मनाया, लेकिन पुलिस ने काररवाई कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया.

3 साल की बच्ची से रेप में पंचायत का यह शर्मनाक फैसला सुन कर हर कोई हैरान है.
झारखंड के गुमला जिले के पलमा गांव में 3 साल की बच्ची से रेप के मामले में आरोपी पर एक लाख रुपए का जुरमाना लगाया. रिपोर्ट्स के अनुसार, फिर आरोपी से मिले 20 हजार रुपए की चिकन और शराब पार्टी की गई. इस के बाद दुष्कर्म की घटना को दबाने का प्रयास किया गया.

पंचायत के फैसले के बाद आरोपी ने 20 हजार रुपए दिए. उस पैसे से पंचायत के सदस्यों ने मीट के साथ दारू की पार्टी की. जबकि आरोपी को एक सप्ताह के अंदर 80 हजार रुपये और देने का फरमान सुनाया.
गांव में जब दुष्कर्म की घटना के बाद जश्न मन रहा था, तभी पुलिस गांव पहुंची और आरोपी सुनील लोहरा को गिरफ्तार कर लिया.

बात शनिवार की शाम 4 बजे की है. सुनील लोहरा गांव की ही एक महिला के घर पहुंचा. घर में महिला अपनी 3 वर्षीय बेटी के साथ थी. तभी सुनील ने महिला से कहा कि लाओ तुम्हारी बेटी को मैं पकड़ लेता हूं. तुम अपना काम करो.

महिला ने अपनी बच्ची उसे दे दी. इस के बाद सुनील लोहरा बच्ची को कमरे में ले गया. जहां उस ने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया.

जब बच्ची खून से लथपथ हो कर रोने लगी तो उस की मां कमरे में गई और बच्ची की हालत देख कर उसे मामले को समझते देर न लगी. तभी सुनील वहां से रफू चक्कर हो गया. वह महिला भागते हुए पंचायत के सदस्यों के पास पहुंची, और बच्ची के साथ दरिंदगी करने की सारी जानकारी दे दी.

इस के बाद मामला पंचायत के पास पहुंचा. पंचायत के कुछ सदस्यों ने मामले को गांव में ही दबाने की योजना बनाई.

पहले बच्ची को एक निजी डॉक्टर को दिखाया गया. इस के बाद रविवार को गांव में पंचायत आयोजित की गई. जिस में मामले को दबाने के लिए आरोपी पर एक लाख रुपए का जुरमाना लगाया गया.

थाना घाघरा के एसएचओ मोहन कुमार ने बताया कि सूचना मिली थी कि 3 साल की बच्ची के साथ दरिंदगी के मामले को पंचायत कर गांव वाले दबाने का प्रयास कर रहे हैं. गांव के दबाव के चलते मामला थाने तक नहीं पहुंच रहा था. इसी दौरान गांव के एक व्यक्ति ने पुलिस को यह सूचना दी, जिस के बाद पुलिस ने गांव जा कर पीड़िता की मां के बयान पर एफआईआर दर्ज कर ली है और आरोपी को गिरफ्तार भी कर लिया गया है.

रविवार को पुलिस टीम जिस वक्त गांव पहुंची, उस वक्त आरोपी द्वारा पंचायत को दिए गए जुरमाने के 20 हजार रुपए से गांव में पार्टी मनाई जा रही थी. पुलिस ने पार्टी मना रहे आरोपी को गिरफ्तार कर लिया. वहीं पीड़िता बच्ची की मां का बयान लिया.

अरंगी पंचायत के मुखिया लोदो एक्का ने कहा है कि पलमा गांव में एक बच्ची से दुष्कर्म के बाद कुछ लोगों ने बैठक की थी. इस बैठक की मुझे कोई सूचना नहीं दी गई. जब पुलिस गांव पहुंची और मामला उजागर हुआ, तब मुझे गांव में बैठक करने की सूचना मिली.

-साक्षी जायसवाल

Karawal Nagar Murder: अपनी ही गलती से बना हत्यारा

Karawal Nagar Murder. राहुल ने खुशबू से प्यार भी किया और प्रेम विवाह भी, लेकिन घर वालों से छिपा कर. इस से अनभिज्ञ घर वालों ने जब उस की शादी तय कर दी तो वह सच्चाई नहीं बता सका. फलस्वरूप उस की दूसरी शादी होने के साथ ही खुशबू की हत्या की भूमिका बन गई.

22 नवंबर, 2013 की शाम को राजकुमार अपने घर की पहली मंजिल पर साफसफाई करने गया तो उसे वहां कुछ बदबू महसूस हुई. वह इधरउधर देखने लगा. जिस तरफ से बदबू आ रही थी, वह उसी

तरफ बढ़ गया. बालकनी से होते हुए राजकुमार एक कमरे के पास पहुंचा तो वहां बदबू और बढ़ गई. वह समझ गया कि बदबू शायद उसी कमरे से आ रही है. उस कमरे में बाहर से ताला बंद था, क्योंकि उस में रहने वाला किराएदार राहुल 3 दिनों पहले अपनी पत्नी खुशबू को ले कर कहीं चला गया था.

कमरे से आने वाली बदबू किसी चूहे वगैरह के मरने की नहीं लग रही थी. किसी गड़बड़ी की आशंका से राजकुमार डर गया. वह सीधासादा आदमी था, इसलिए उस ने तुरंत 100 नंबर पर फोन कर दिया. पुलिस को जो काल मिली थी. उस में पता— मकान नंबर बी-13/1 बी, गली नंबर-3, अंबिका विहार, करावलनगर बताया गया था.

पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना करावलनगर को दे दी, साथ ही पीसीआर वैन भी बताए गए पते पर पहुंच गई. यह शाम करीब साढ़े 6 बजे की बात है. राजकुमार पुलिस वालों को पहली मंजिल पर स्थित उस कमरे पर ले गया, जिस में से बदबू आ रही थी.

चूंकि कमरे में बाहर से ताला बंद था, इसलिए पुलिस भी नहीं समझ पाई कि बदबू किस चीज की है. पीसीआर की काल मिलने पर थाना करावलनगर से एएसआई कविराज शर्मा और कांस्टेबल कृष्ण पाल को बताए गए पते पर भेजा गया. थाना पुलिस के पहुंचने तक राजकुमार के घर के पास काफी लोग जमा हो चुके थे. सभी तरहतरह के कयास लगा रहे थे. कविराज शर्मा ने भी उस कमरे के पास जा कर देखा, जिस में से दुर्गंध आ रही थी. कमरे पर लगे ताले को उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के आने से पहले छेड़ना उचित नहीं समझा.

उस कमरे में दरवाजे के ऊपर एक रोशनदान था. उस रोशनदान से कमरे में झांका जा सकता था. कविराज ने एक सीढ़ी मंगाई और उस पर चढ़ कर कमरे में झांक कर देखा. कमरे में घुप्प अंधेरा होने की वजह से कुछ दिखाई नहीं दिया. उन्होंने रोशनदान से टौर्च की रोशनी डाल कर अंदर देखा तो फर्श पर पड़े खून के साथसाथ एक बड़ा सा बैग भी दिखाई दिया. कविराज शर्मा माजरा समझ गए. उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को मौके पर बुला लिया.

क्राइम टीम द्वारा बंद दरवाजे के फोटो वगैरह लेने के बाद कविराज शर्मा ने कमरे का ताला तोड़ा. जब दरवाजा खोला गया तो बदबू के भभके ने सभी को नाक बंद करने के लिए मजबूर कर दिया. अंदर कमरे में फर्श पर एक बड़ा सा लालकाले रंग का बैग रखा था. फर्श पर खून फैला था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. बेड पर बिछी चादर और वहां रखी रजाई पर भी खून के धब्बे दिखाई दे रहे थे. बेड पर चूडि़यों के टुकड़े पड़े थे. यह सब देख कर यही लगा कि इस बैग में किसी की लाश ही होगी.

बैग की चेन खुली थी. अंदर प्लास्टिक का एक बोरा रखा था. बोरा बैग से बाहर निकाला गया तो उस में से खून रिस रहा था. बोरा को खोला गया तो उस में से एक युवती की लाश निकली, जिस की गरदन कटी हुई थी. लाश सड़ चुकी थी. लाश देख कर राजकुमार ने बताया कि यह राहुल की बीवी खुशबू है. चूंकि राहुल वहां से गायब था, इसलिए यह बात साफ हो गई कि पत्नी की हत्या राहुल ने ही की है.

एएसआई कविराज ने इस मामले की सूचना थानाप्रभारी लेखराज सिंह को दी तो वह इंसपेक्टर अरविंद प्रताप सिंह और सबइंसपेक्टर जफर खान को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल का मुआयना कर के मकान मालिक राजकुमार गिरि से पूछताछ की. राजकुमार ने बताया कि राहुल शर्मा अपनी पत्नी खुशबू के साथ 15 अप्रैल, 2013 से वहां रह रहा था. 19 नवंबर को जब वह नीचे गैलरी में खड़ा था, तभी उस ने राहुल को जीने से उतरते देखा था.

पूछने पर राहुल ने बताया था कि खुशबू की बहन की डिलीवरी होनी है, इसलिए वह अपनी बहन के यहां जा रही है. वह आगे चली गई है. 19 तारीख के बाद राहुल वापस नहीं लौटा था. आज जब वह ऊपर की साफसफाई करने गया तो बदबू महसूस हुई. तब उस ने इस की सूचना पुलिस को दे दी थी.

घनास्थल की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए गुरु तेग बहादुर अस्पताल भेज दी और हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

इस केस को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी लेखराज सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में इंस्पेक्टर अरविंद प्रताप सिंह, सबइंसपेक्टर जफर खान, सहायक सबइंसपेक्टर कविराज शर्मा, कांस्टेबल कृष्णपाल और दयानंद आदि को शामिल किया गया.

पुलिस को राजकुमार से पता चला कि राहुल को अंबिका विहार के रहने वाले उस के एक परिचित उमेश ने किराए पर रखवाया था. इस से पहले राहुल के यहां किराए पर रहता था. पुलिस ने उमेश से संपर्क किया तो उस के पास से राहुल का फोन नंबर और पता मिल गया. वह लोनी क्षेत्र के गांव हाजीपुर वेहटा का रहने वाला था.

पुलिस ने राहुल का फोन मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. हत्या करने के बाद कोई व्यक्ति घर पर मिले, ऐसा कम ही संभव होता है. फिर भी राहुल के बारे में पता लगाने के लिए पुलिस उस के गांव हाजीपुर वेहटा गई. पुलिस ने गोपनीय रूप से राहुल के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह घर पर नहीं है. इसी पूछताछ में पुलिस को एक चौंकाने वाली बात पता चली.

चौंकाने वाली बात यह थी कि राहुल शर्मा ने 20 नवंबर को बुलंदशहर की एक लड़की से शादी की थी और यह शादी घर वालों की मरजी से सामाजिक रीतिरिवाज से हुई थी. सवाल यह था कि राजकुमार दिल्ली में खुशबू नाम की जिस लड़की के साथ रहता था, वह कौन थी?

बहरहाल पुलिस टीम दिल्ली लौट आई. पुलिस राहुल के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा कर बराबर वाच कर ही रही थी. 23 नवंबर की शाम को पता चला कि राहुल के फोन की लोकेशन करावलनगर चौक के आसपास है. राजकुमार गिरि राहुल को पहचानता था, इसलिए पुलिस टीम उसे अपने साथ ले कर करावलनगर चौक पहुंच गई.

पुलिस टीम सादा कपड़ों में थी. वह काफी देर तक राजकुमार को इधरउधर टहलाती रही. इसी बीच राजकुमार की नजर चाय की एक दुकान पर गई. राहुल शर्मा वहां एक बैंच पर बैठा चाय पी रहा था. राजकुमार के इशारे पर पुलिस टीम ने उसे दबोच लिया. थाने ला कर जब उस से खुशबू की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बड़ी ही आसानी से हत्या की बात कुबूल ली. उस से पूछताछ के बाद एक दिलचस्प कहानी पता चली.

राहुल शर्मा के पिता आदेश कुमार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 ही बच्चे थे. बेटा राहुल और एक बेटी. हालांकि उन का छोटा सा परिवार था, लेकिन वह परिवार को हर तरह से खुश देखना चाहते थे. इसी चाह में वह गढ़मुक्तेश्वर से लोनी चले आए. लोनी में वह इसलिए आए, क्योंकि यह दिल्ली की सीमा से सटा हुआ था. उन्होंने सोचा था कि वहां रह कर अपने लिए दिल्ली में कोई कामधंधा खोज लेंगे.

थोड़ी कोशिश के बाद उन की दिल्ली होमगार्ड में नौकरी लग गई. शुरू में तो उन्हें होमगार्ड का काम करते हुए अच्छा लगा, लेकिन 5-6 सालों बाद ही इस काम से ऊबने लगे. वजह यह थी कि इस से उन्हें अच्छी आमदनी नहीं हो पाती थी. अब तक उन्होंने लोनी के पास के गांव वेहटा हाजीपुर वेहटा में मकान भी बना लिया था.

उन्होंने वेहटा रेलवे स्टेशन के नजदीक प्रौपर्टी डीलिंग की दुकान खोल ली. ड्यूटी से लौटने के बाद वह दुकान पर बैठते थे. उन का बेटा राहुल बड़ा हो चुका था, इसलिए पिता की गैरमौजूदगी में वह दुकान संभालता था.

आदेश कुमार का प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा जम गया तो उन्होंने होमगार्ड की नौकरी छोड़ दी और पूरे समय दुकान पर बैठने लगे. उन की मेहनत रंग लाने लगी. आमदनी बढ़ने लगी तो उन्होंने अपने प्रौपर्टी के बिजनैस को नए आयाम देने शुरू कर दिए. लोनी के नजदीक ही उन्होंने कई एकड़ जमीन खरीद ली. उस जमीन पर उन्होंने अपने बेटे के नाम पर ‘राहुल विहार’ नाम की कालोनी बसानी शुरू कर दी.

एकलौता बेटा होने की वजह से राहुल घर में सब का चहेता था. उसे सब आंखों पर बिठाए रखते थे. हाजीपुर वेहटा गांव में ही खुशबू नाम की एक खूबसूरत लड़की रहती थी. नजदीकी बढ़ाने के लिए गांव के कई लड़के उस पर डोरे डालने की कोशिश करते थे लेकिन वह उन्हें कतई लिफ्ट नहीं देती थी. इस की वजह यह थी कि वह राहुल शर्मा को चाहती थी.

जवान होने के बावजूद राहुल शर्मा अन्य लड़कों की तरह मटरगश्ती करता नहीं घूमता था, बल्कि अपना पूरा ध्यान प्रौपर्टी डीलिंग के काम में लगाता था. खुशबू राहुल के नजदीक आने की जुगत लगाती रहती थी. बताया जाता है कि एक दिन खुशबू राहुल की दुकान पर पहुंची और अपने एक जानकार का मकान बिकवाने के लिए राहुल से बात की. बातचीत के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर भी दे दिए.

इस मुलाकात के बाद दोनों के बीच फोन पर बातें होने लगीं. धीरेधीरे राहुल को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. दोनों एकदूसरे के करीब आने लगे और उन की प्रेम कहानी शुरू हो गई. उन के बीच होने वाली बातों का दायरा सिमटता गया. जल्दी ही स्थिति यह हो गई कि जब तक वे रोजाना बातें नहीं कर लेते, उन्हें चैन नहीं आता था. बाद में राहुल उसे दिल्ली घुमाने के लिए भी ले जाने लगा. इसी दौरान उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे.

दोनों ही बालिग थे, इसलिए उन्होंने शादी कर के ताउम्र साथ रहने का फैसला कर लिया. इस तरह कई सालों तक उन के प्रेम संबंधों की घर वालों को भनक नहीं लगी. लेकिन गांव के तमाम लोग उन के बारे में जानते थे. लिहाजा गांव वालों के मुंह से होती हुई यह बात राहुल के घर वालों के कानों तक भी पहुंच गई.

अपने एकलौते बेटे के बारे में जान कर आदेश कुमार परेशान हो उठे. उन्होंने उस की किसी अच्छे घर से शादी करने के सपने संजो रखे थे. उन्हें बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि बेटा ऐसा कदम उठा सकता है. उन्होंने राहुल को समझाया तो उस ने पिता से झूठ बोल दिया, ‘‘मेरे बारे में जो भी बातें उड़ रही हैं, वे सरासर झूठी हैं. मेरा किसी लड़की से कोई संबंध नहीं है. और रही बात शादी की तो आप अपनी मरजी से किसी भी लड़की से मेरी शादी करा सकते हैं.’’

बेटे की बात सुन कर आदेश कुमार को लगा कि गांव वाले यूं ही राहुल के बारे में अफवाह उड़ा रहे हैं. उन्हें यह पता नहीं चल सका था कि बेटे ने उन के सामने कितनी चालाकी से झूठ बोला है. आदेश कुमार को बेटे पर पूरा विश्वास था, इसलिए वह उस के लिए लड़की देखने लगे.

उधर पिता से बातें करने के बाद राहुल समझ गया कि उस के प्रेमसंबंधों की भनक घर वालों को लग गई है, इसलिए उस ने खुशबू से मिलने में एहतियात बरतनी शुरू कर दी. चूंकि गांव में भी उस के संबंधों की चर्चा थी इसलिए उस ने खुशबू के साथ रहने की दूसरी युक्ति सोची.

खुशबू एक सामान्य परिवार से थी. राहुल से प्रेमसंबंध की बात उस ने अपनी मां को बता रखी थी. राहुल एक अच्छे परिवार का इकलौता लड़का था. इसलिए मां ने भी सोचा था कि उस के साथ बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी.  उस की खुशहाल जिंदगी को ध्यान में रखते हुए मां ने भी खुशबू का विरोध नहीं किया. इस तरह खुशबू बेधड़क अपने प्रेमी से मिलती रही.

एक दिन राहुल ने आदेश कुमार से कहा, ‘‘पापा, एक जानकार के जरिए मेरी गुड़गांव स्थित सैमसंग कंपनी में नौकरी लग रही है. आप तो औफिस में बैठते ही हैं, इसलिए मैं नौकरी ज्वाइन कर लेता हूं.’’

‘‘तुम्हें नौकरी की क्या जरूरत है? अपना अच्छाखासा काम है, इसे ही आगे बढ़ाओ.’’ आदेश कुमार ने कहा तो राहुल बोला, ‘‘कुछ दिनों में नौकरी कर के भी देख लेता हूं. बाहर जाने से तजुर्बा मिलेगा, रात की शिफ्ट में काम कर के मैं सुबह को घर आ जाया करूंगा.’’

राहुल के जिद करने पर आदेश कुमार ने स्वीकृति दे दी.

दरअसल राहुल घर वालों की नजरों में एक अच्छा बेटा बने रहने के लिए उन का विश्वास बनाए रखना चाहता था. इसलिए उस ने उत्तरपूर्वी दिल्ली के करावलनगर के अंबिका विहार में रामकुमार के यहां किराए पर एक कमरा ले लिया और खुशबू के साथ रहने लगा. मकान मालिक को उस ने खुशबू को अपनी पत्नी बताया था. इसी बीच दोनों ने एक मंदिर में शादी भी कर ली थी. राहुल रात में किराए के कमरे पर खुशबू के साथ रहता था और सुबह अपने घर चला जाता था.

राहुल ने घर वालों को बता रखा था कि उस की ड्यूटी रात की शिफ्ट में है. उस मकान में 11 महीने रहने के बाद वह पास में ही उमेश के घर रहने लगा. लेकिन उमेश का मकान उसे पसंद नहीं आया तो उस ने 15 दिनों बाद ही मकान बदल दिया और 15 अप्रैल, 2013 से वह अंबिका विहार की गली नंबर- 3 में राजकुमार गिरि के यहां रहने लगा.

खुशबू की अपने घर वालों से फोन पर अकसर बात होती रहती थी. खुशबू ने अपनी मां को बता दिया था कि राहुल ने अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ उस से शादी की है, इसलिए घर वाले अभी नाराज हैं. उस की मां सोचती थी कि एक न एक दिन जब घर वालों का गुस्सा शांत हो जाएगा तो वह खुशबू को बहू के रूप में स्वीकार कर लेंगे.

खुशबू राहुल के साथ खुश थी. राहुल भी उस का हर तरह से खयाल रख रहा था. उधर राहुल के घर वालों ने उस के लिए उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक लड़की देख ली थी. उन्होंने जब इस बारे में राहुल से बात की तो वह यह नहीं कह सका कि वह किसी और से प्यार करता है. वह बुलंदशहर वाली लड़की शिखा से शादी न करने की बात भी नहीं कह सका.

दोनों तरफ से जांचपरख के बाद राहुल का रिश्ता शिखा से तय हो गया. खुशबू को इस की भनक तक नहीं लगी. शिखा से शादी तय हो जाने के बाद राहुल असमंजस में पड़ गया, क्योंकि वह खुशबू से पहले ही शादी कर चुका था. उस की स्थिति यह थी कि वह न तो खुशबू को शिखा से शादी तय होने की बात बता सकता था और न ही घर वालों को खुशबू के बारे में बता पा रहा था. चालाकी दिखा कर वह जो खुशहाल जिंदगी जीने के सपने देख रहा था, अब वह उसी चालाकी के भंवर में फंस चुका था. कुछ नहीं सूझा तो वह उस भंवर से निकलने के उपाय खोजने लगा.

एक दिन उस ने खुशबू से कहा, ‘‘खुशबू मैं एक समस्या में फंसा हुआ हूं और समस्या भी ऐसी है, जिसे तुम ही सुलझा सकती हो.’’

यह सुन कर खुशबू ने चौंक कर पूछा, ‘‘क्या समस्या है, बताओ?’’

‘‘तुम तो जानती हो कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं. घर वालों की मरजी के बिना भी मैं तुम्हारे साथ रह रहा हूं. उन्हें तुम्हारे साथ रहने का तो पता नहीं है. इसलिए उन्होंने मेरे लिए बुलंदशहर में कोई लड़की देख कर मेरा रिश्ता पक्का कर दिया है. 16 नवंबर को उन्होंने सगाई का दिन भी तय कर दिया है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं?’’

शादी की बात सुनते ही खुशबू सन्न रह गई. जिस की खातिर उस ने अपना घर त्यागा, वही किसी और का हो जाएगा, यह उस ने सोचा भी नहीं था. उस ने सोचा कि राहुल की जिस लड़की के साथ शादी होने जा रही है, उस से उस का रिश्ता एक दिन में तो तय नहीं हुआ होगा.

राहुल को इस की पहले से ही जानकारी रही होगी, लेकिन उस ने यह बात उस से छिपाए रखी. इसलिए वह बोली, ‘‘राहुल ऐसी बात तो नहीं है कि घर वालों ने तुम्हारी मरजी के बिना शादी तय कर दी हो. जब तुम से पूछा होगा तो तुम्हें शादी के लिए मना कर देना चाहिए था. लेकिन तुम ने ऐसा नहीं किया.’’

‘‘खुशबू, मैं चाह कर भी घर वालों की बात का विरोध नहीं कर सका. लेकिन तुम थोड़ी सूझबूझ से काम लो तो समस्या का हल निकल सकता है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘इस का एक ही तरीका है कि शादी होने के बाद तुम भी उसे स्वीकार लो. यानी दोनों साथ रहो.’’

कोई भी औरत नहीं चाहती कि उस के पति को कोई दूसरी औरत बांटे, इसलिए राहुल की बात सुन कर खुशबू भड़क उठी, ‘‘राहुल, तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि दोनों एक साथ रहेंगी. यह हरगिज नहीं हो सकता. तुम एक बात और जान लो, 16 तारीख को जो तुम्हारी सगाई है, वह हरगिज नहीं होगी. उस दिन तुम घर नहीं जाओगे.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो? मेरे घर न पहुंचने पर हंगामा हो जाएगा.’’

‘‘और गए तो यहां हंगामा हो जाएगा. अब खुद ही सोच लो कि क्या करना है?’’

खुशबू के सख्त तेवर देख कर राहुल परेशान हो गया. उस ने खुशबू को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह जिद पर अड़ी रही.

उसी दौरान राहुल ने तय कर लिया कि वह अपने घर वालों की इज्जत हरगिज खराब नहीं होने देगा, भले ही उसे खुशबू को रास्ते से क्यों न हटाना पड़े. इसी के मद्देनजर उस ने खुशबू को रास्ते से हटाने की योजना तैयार कर ली. योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वह बाजार से एक छुरा भी खरीद लाया.

16 नवंबर, 2013 को राहुल के तिलक का कार्यक्रम निश्चित था. उस के कार्यक्रम में किसी तरह की कोई अड़चन न पड़े, इसलिए उस ने तिलक के कार्यक्रम से पहले ही खुशबू को ठिकाने लगाना उचित समझा. 15 नवंबर की शाम को खाना खाने के बाद खुशबू और राहुल सोने के लिए बिस्तर पर लेटे थे. थोड़ी देर बाद खुशबू को तो नींद आ गई, लेकिन राहुल की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वह रात गहराने का इंतजार कर रहा था.

जब उसे लगा कि मकान मालिक वगैरह सो चुके हैं तो उस ने गहरी नींद में सोई खुशबू के गले पर छुरे से वार किया. एक ही बार में खुशबू की सांस की नली कट गई और वह छटपटाने लगी. वह छटपटाती हुई बेड से नीचे गिर गई और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

पत्नी को ठिकाने लगाने के बाद राहुल ने राहत की सांस ली और बाथरूम में जा कर खून से सने हाथपैर धोए. इस के बाद चादर से लाश ढंक कर वह सुबह को अपने गांव चला गया. उसी दिन उस के तिलक का कार्यक्रम था, जिस में उस के सभी सगेसंबंधी इकट्ठा हुए थे. उस कार्यक्रम में भी वह पूरी तरह सामान्य रहा. उस ने किसी को जरा भी महसूस नहीं होने दिया कि वह कोई बड़ा अपराध कर के आया है.

लाश को छिपाने के लिए राहुल 19 नवंबर को बाजार से खेलने का सामान रखने वाला एक बड़ा सा बैग खरीद कर अंबिका विहार वाले कमरे पर पहुंच गया. खुशबू की लाश को उस ने चादर में लपेट कर प्लास्टिक के एक बोरे में भर कर बंद कर दिया. उस बोरे को उस ने साथ लाए बैग में रख दिया. उस ने सोचा था कि शादी के बाद उस बैग को कहीं ठिकाने लगा देगा.

19 नवंबर को पत्नी की लाश को बैग में रखने के बाद वह शाम को कमरे का ताला लगा कर जीने से उतर ही रहा था कि उसी समय उसे मकान मालिक राजकुमार गिरि मिल गया. उस ने राहुल को अकेले जाते देखा तो उस ने वैसे ही खुशबू के बारे में पूछ लिया. इस पर राहुल ने कहा कि खुशबू की बहन की डिलीवरी होने वाली है, वह आगे निकल गई है. उसे उस की बहन के यहां छोड़ने जा रहा है.

मकान मालिक ने उस की बात पर विश्वास कर लिया. उसे क्या पता था कि उस का किराएदार उस के कमरे में एक बड़ा अपराध कर चुका है. अंबिका विहार से राहुल सीधे अपने गांव पहुंचा. अगले दिन 20 नवंबर को बड़ी धूमधाम के साथ उस की बारात बुलंदशहर पहुंची और वह शिखा को दुलहन बना कर घर ले आया.

राहुल निश्चिंत था कि पुलिस उस तक नहीं पहुंच सकेगी. 22 नवंबर को राजकुमार जब पहली मंजिल पर सफाई करने के लिए पहुंचा तो उसे बदबू महसूस हुई. क्योंकि बोरे में बंद लाश सड़ने लगी थी. राजकुमार की सूचना पर पुलिस उस के घर पहुंची और लाश के बारे में पता लगा. 23 नवंबर को राहुल खुशबू की लाश को ठिकाने लगाने के लिए अंबिका विहार वाले कमरे पर पहुंचा. जब वह करावलनगर में चौक के पास एक दुकान पर बैठा चाय पी रहा था, तब उसे यह पता नहीं था कि पुलिस उस के पीछे लगी हुई है. इसलिए पुलिस ने उसे आसानी से गिरफ्तार कर लिया.

राहुल शर्मा से पूछताछ के बाद जांच अधिकारी इंसपेक्टर अरविंद प्रताप सिंह ने 24 नवंबर को उसे कड़कड़डूमा कोर्ट में मुख्य महानगर दंडाधिकारी रविंद्र वेदी के समक्ष पेश कर उसे एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में पुलिस ने राहुल को उन जगहों पर ले जा कर तसदीक की, जहां से उस ने छुरा और बैग आदि खरीदे थे. फिर 25 नवंबर, 2013 को उसे पुन: अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया.

पति के जेल जाने के बाद शिखा की आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. उसे क्या पता था कि दुलहन बनने की जो खुशी वह मन में समेटे हुए थी, वह हाथ की मेहंदी धूमिल होने से पहले ही काफूर हो जाएगी. इस के बाद भी उसे उम्मीद है कि राहुल जल्द ही जेल से बाहर आ जाएगा.

(कहानी में शिखा परिवर्तित नाम है)

—कथा पुलिस सूत्रों एवं जनचर्चा पर आधारित

UP Honor Killing : मोहब्बत की सजा मौत

UP Honor Killing. नाजिम और आयशा ने प्रेम ही नहीं किया, बल्कि निकाह की भी पूरी तैयारी कर ली थी. इस के लिए दोनों के मांबाप भी तैयार थे. लेकिन आयशा के भाई इमरान ने इस निकाह को रोकने के लिए जो किया, वह बिलकुल ही जायज नहीं था.

उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना धूमनगंज के थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर अपने कार्यालय में जैसे ही आ कर बैठे, एक बुजुर्ग उन के सामने आ कर खड़ा हो गया. उन्होंने उस की ओर देखा तो वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम मोहम्मद आरिफ है. मैं दामूपुर गांव का रहने वाला हूं. मेरा 26 वर्षीय बेटा नाजिम 14 सितंबर की सुबह 10 बजे घर से काम पर जाने के लिए निकला था. शाम को वह घर नहीं लौटा तो मैं उस की तलाश करने लगा. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. आज सुबह 5 बजे गांव में शोर मचा कि सुमित पाल के बाजरे के खेत में एक लड़के की लाश पड़ी है. मैं ने वहां जा कर देखा तो वह मेरे बेटे नाजिम की लाश थी. उस में से बदबू आ रही थी. साहब, मैं उसी की रिपोर्ट दर्ज कराने आया हूं.’’

सुबहसुबह हत्या की खबर से थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर का दिमाग चकरा गया. उन्होंने स्वयं को संभाल कर मोहम्मद आरिफ से पूछा, ‘‘बता सकते हो कि तुम्हारे बेटे की हत्या किस ने की होगी?’’

‘‘जी मेरे ही गांव के मोहम्मद इब्राहीम के बेटे इमरान ने यह काम किया है. साहब, मेरा बेटा नाजिम उस की बहन आयशा से प्यार करता था. वह उस से निकाह करना चाहता था. जबकि इमरान को यह पसंद नहीं था.’’

आरिफ की सूचना पर थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर ने अपराध संख्या-520/2013 पर भादंवि की धारा 302/364/201 के तहत मोहम्मद इब्राहीम के बेटे इमरान तथा 2 अन्य  लोगों, इमरान के मौसेरे भाई उस्मान और दोस्त सुफियान के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा कर अपने साथ एसएसआई उमाशंकर यादव, एसआई जीतेंद्र बहादुर सिंह, एसआई (टे्रनिंग) संगीता सिंह तथा कुछ सिपाहियों को ले कर गांव दामूपुर के लिए रवाना हो गए.

पुलिस बल के साथ इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर दामूपुर गांव के उस बाजरे के खेत पर जा पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश निर्वस्त्र थी. देखने से ही लग रहा था कि हत्या गला दबा कर की गई थी. उस के बाद उसे चाकुओं से भी गोदा गया था. यह हत्या भी कहीं दूसरी जगह की गई थी. उस के बाद लाश को यहां ला कर फेंका गया था. लाश से तेज दुर्गंध आ रही थी.

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद अभियुक्तों को गिरफ्तार करने दामूपुर गांव जा पहुंचे. लेकिन वहां कोई नहीं मिला.

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर अभियुक्त इमरान की बहन आयशा, अम्मी परवीन बेगम तथा अब्बा इब्राहीम को पूछताछ के लिए थाने ले आए. पूछताछ में इब्राहीम और उन की पत्नी ने बताया कि न तो उन्होंने यह हत्या की है और न ही उन्हें हत्यारों के बारे में कुछ पता है.

इस के बाद इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने आयशा को अलग ले जा कर पूछताछ की तो उस ने नाजिम से अपना प्रेमसंबंध स्वीकार करते हुए बताया, ‘‘मेरे भाई इमरान ने मेरी मौसी के बेटे उस्मान और दोस्त सुफियान के साथ मिल कर नाजिम की हत्या की है. इमरान ने मुझ से निकाह करने का आश्वासन दे कर नाजिम को शनिवार की रात घर बुलाया. उसी रात तीनों ने नाजिम की गला दबा कर और चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी. आधी रात के बाद गांव में सन्नाटा पसर गया तो वे नाजिम की लाश को गांव के बाहर बाजरे के खेत में फेंक आए थे.’’

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने इमरान के पिता इब्राहीम को रोक कर आयशा और उस की मां परवीन बेगम को घर भेज दिया था. यह 16 सितंबर की बात है.

19 सितंबर को सूरज ने अभी पूरी तरह आंखें खोली भी नहीं थी कि इब्राहीम के घर की महिलाओं के चीखचीख कर रोने की आवाज से पूरा गांव जाग गया. गांव वाले इब्राहीम के घर पहुंचे तो पता चला कि उस की बेटी आयशा ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है.

गांव वालों के कहने पर परवीन बेगम ने इस घटना की सूचना थाना धूमनगंज पुलिस को दी. इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर को परवीन बेगम की बातों पर कतई विश्वास नहीं हुआ. फिर भी उन्होंने उस के बताए अनुसार अपराध संख्या-529/2013 पर भादंवि की धारा 309 के तहत मुकद्दमा दर्ज करा कर साथियों के साथ दामूपुर स्थित इब्राहीम के घर जा पहुंचे.

आयशा की लाश मकान की पहली मंजिल बने कमरे में दरवाजे के ऊपर के रोशनदान से रस्सी के सहारे लटक रही थी. इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने लाश का निरीक्षण करने के दौरान देखा कि लटक रही लाश के पैर फर्श को छू रहे थे. शरीर पर 2 जगहों पर जले के निशान थे. कपड़ों से मिट्टी के तेल की गंध आ रही थी. वहीं मिट्टी के तेल का डिब्बा भी पड़ा था.

स्थितियों से यही लग रहा था कि पहले उस पर मिट्टी का तेल डाल कर जला कर मारने का प्रयास किया गया था. किसी वजह से इरादा बदल गया तो गला दबा कर उस की हत्या कर दी गई. उस के बाद लाश को रस्सी के सहारे लटका कर आत्महत्या का रूप दे दिया गया. पुलिस ने जब हत्या की शंका व्यक्त की लेकिन घर वाले यह बात मानने को तैयार नहीं थे.

इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने लाश को नीचे उतरवा कर आवश्यक काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल भिजवा दिया. अब उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रतीक्षा थी.

पोस्टमार्टम के बाद आयशा की लाश अंतिम संस्कार के लिए उस के घर वालों को सौंप दी गई. इंसपेक्टर रामसूरत को पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मिली तो उन का शक विश्वास में बदल गया, क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आयशा की मौत एंटीमार्टम इंजरी स्ट्रांगग्यूलेशन यानी गला दबा कर हत्या करना बता रही थी.

इस बीच इंसपेक्टर रामसूरत सोनकर ने इस मामले में अपने मुखबिरों से बहुत सारी जानकारियां प्राप्त कर ली थीं. प्राप्त जानकारियों के अनुसार आयशा के भाई को उस रात गांव में देखा गया था. चर्चा थी कि आयशा नाजिम की हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता कर मुख्य गवाह बन गई थी, इसीलिए उसे उस के भाई ने मार दिया था.

अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए थाना धूमनगंज पुलिस ने ताबड़तोड़ छापे मारने शुरू किए. परिणामस्वरूप 20 सितंबर को पुलिस ने इमरान के मौसेरे भाई उस्मान को गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद अगले दिन पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस के बाद 28 सितंबर को आयशा का भाई इमरान भी पुलिस गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने पूछताछ कर के अगले दिन उसे भी अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में इमरान और उस्मान ने नाजिम और आयशा की हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह प्रेमसंबंध और औनर किलिंग की निकली.

इलाहाबाद के थाना धूमनगंज के गांव दामूपुर में मोहम्मद आरिफ अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 6 बेटे थे. बेटों में नाजिम सब से छोटा था. वह मकानों में मार्बल लगाने का ठेका लेता था, जिस से वह अच्छीखासी कमाई कर रहा था. जबकि मोहम्मद आरिफ गांव में ही पान की दुकान चलाते थे.

इसी गांव के रहने वाले मोहम्मद इब्राहीम मोटर मैकेनिक थे. जीटी रोड चौफटका पर उस की अपनी दुकान थी. घर में पत्नी परवीन बेगम के अलावा 3 बेटे और 4 बेटियां थीं. 18 वर्षीया आयशा तीसरे नंबर पर थी. एकहरे बदन की गोरीचिट्टी आयशा देखने में ठीकठाक लगती थी.

आयशा के भाई इमरान की नाजिम से खूब पटती थी. उन की यह दोस्ती बचपन की थी. नाजिम का उस के घर भी आनाजाना था. इसी आनेजाने में आयशा को नाजिम कब पसंद आ गया, उसे खुद ही पता नहीं चला. नाजिम आयशा को 1-2 दिन दिखाई न देता तो वह बेचैन हो उठती. उस की आंखें नाजिम के दीदार को तड़पने लगतीं.

जल्दी ही नाजिम को आयशा की इस तड़प का अहसास हो गया. यही वजह थी कि जिस आग में आयशा जल रही थी, उसी आग मे नाजिम भी जलने लगा. वह जब भी आयशा के घर आता, चाहतभरी नजरों से उसे देखता रहता.

ऐसे में ही किसी दिन आयशा और नाजिम को तनहाई में मिलने का मौका मिला तो दोनों के दिल की तड़प होठों पर आ गई. नाजिम ने आयशा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘आयशा, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. जी चाहता है मैं तुम्हें हमेशा देखता रहूं.’’

‘‘नाजिम, मेरा भी यही हाल है.’’ आयशा उस के नजदीक आकर बोली, ‘‘मेरा भी मन करता है कि हर पल तुम्हें ही देखती रहूं, तुम से खूब बातें करूं, तुम्हारे साथ घूमूं. तुम मेरे दिलोदिमाग में रचबस गए हो. दिन में चैन नहीं मिलता तो रातों को नींद नहीं आती. बस, तुम्हारी ही यादों में खोई रहती हूं.’’

आयशा अपनी बात कह ही रही थी कि नाजिम ने उसे अपनी बांहों में भींच लिया. इस के बाद धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. गुपचुप तौर पर दोनों कभी घर में तो कभी घर के बाहर रात के अंधेरों में मिलनेजुलने लगे. आयशा जब भी नाजिम से मिलती, अपने प्यार की दुनिया बसाने का स्वप्न उस के सीने पर सिर रख कर देखती.

आयशा नाजिम पर कुछ इस कदर दीवानी हुई कि एक दिन अपना सबकुछ उस के हवाले कर दिया. इस के बाद नाजिम ने उसे भरोसा दिलाया कि दुनिया भले ही इधर से उधर हो जाए, लेकिन वह उसे इधर से उधर नहीं होने देगा. वह उसी से निकाह करेगा. प्यारमोहब्बत कोई छिपने की चीज तो है नहीं, यही वजह थी कि नाजिम और आयशा की मोहब्बत का भी खुलासा हो गया. गांव में उन की मोहब्बत की चर्चाएं होने लगीं.

यह खबर इब्राहीम और उस के बेटे इमरान तक भी पहुंच गई. बहन की इस करतूत से इमरान को आग सी लग गई. वह आयशा पर नजर रखने लगा. उस ने आयशा का घर से निकलना बंद करा दिया. इस के बाद उस ने नाजिम को भी धमकाया, ‘‘खबरदार, अब कभी आयशा से मिलने की कोशिश की तो अंजाम बहुत बुरा होगा.’’

लेकिन नाजिम और आयशा की मोहब्बत इतनी गहरी हो चुकी थी कि इमरान की कोई भी कोशिश सफल नहीं हुई. किसी न किसी बहाने आयशा और नाजिम मिल ही लेते थे. ऐसे ही पलों में एक दिन आयशा ने कहा, ‘‘नाजिम, मेरे भाईजान इमरान को हमारी मोहब्बत पर सख्त ऐतराज है. वह नहीं चाहते कि मैं तुम से मिलूं. उन्होंने मुझ पर इतनी सख्ती कर दी है कि तुम से मिलना मेरे लिए मुश्किल हो गया है. गांव में भी हमारी मोहब्बत के चर्चे आम हो गए हैं. वैसे मेरी अम्मी और अब्बू को हमारी मोहब्बत पर ज्यादा ऐतराज नहीं है. अगर तुम अपने अब्बू को निकाह के लिए मेरे अब्बू के पास भेजो तो बात बन सकती है.

नाजिम को आयशा की बात उचित लगी. उस ने आयशा को आश्वासन दिया कि घर पहुंचते ही वह अम्मीअब्बू से निकाह की बात करेगा. नाजिम ने कहा ही नहीं, बल्कि घर आते ही बात भी की. तब अगले ही दिन उस के अब्बू आयशा के अब्बू इब्राहीम से मिलने उन के कारखाने पर जा पहुंचे. उन्होंने उन से आयशा और नाजिम के निकाह की बात की तो पहले तो इब्राहीम ने मना कर दिया. लेकिन बाद में कहा, ‘‘देखो आरिफ भाई, मुझे तो इस निकाह से कोई ऐतराज नहीं है. लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि इमरान इस निकाह के लिए तैयार नहीं होगा. फिर भी मैं घर में बात चलाऊंगा.’’

इमरान को जब पता चला कि आयशा के निकाह के लिए नाजिम के अब्बू उस के अब्बू के पास आए थे तो वह स्वयं को रोक नहीं सका और जा कर नाजिम से झगड़ा करने लगा. तब गांव के कुछ लोगों ने उसे समझाबुझा कर शांत किया. कहीं कुछ उलटासीधा न हो जाए, यह सोच कर गांव के कुछ बुजुर्गों ने इकट्ठा हो कर इमरान को समझाया कि नाजिम खाताकमाता है, आयशा भी बालिग हो चुकी है, इसलिए दोनों का निकाह करने में उसे परेशानी किस बात की है? कोई ऊंचनीच हो, इस से बेहतर है कि दोनों का निकाह कर दिया जाए. बुजुर्गों के सामने तो इमरान कोई विरोध नहीं कर सका, लेकिन दिल से वह इस निकाह के लिए तैयार नहीं हुआ.

आयशा और नाजिम की मोहब्बत की उम्र 2 साल से अधिक हो चुकी थी. लाख कोशिश कर के भी इमरान आयशा और नाजिम को अलग नहीं कर सका. बुजुर्गों के समझाने के बाद नाजिम और आयशा को लगने लगा था कि अब उन का निकाह हो जाएगा. इस की वजह यह थी कि दोनों के अम्मीअब्बू राजी थे. बात सिर्फ इमरान की थी. उन्हें विश्वास था कि एक न एक दिन वह भी मान जाएगा.

15-20 दिनों तक इमरान ने भी विरोध नहीं किया तो आयशा और नाजिम को लगा कि अब सारी रुकावटें दूर हो गई हैं. जबकि आयशा ने जो किया था, उस से इमरान अंदर ही अंदर सुलग रहा था. वह किसी भी कीमत पर आयशा का निकाह नाजिम से नहीं होने देना चाहता था. इस के लिए जब उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने गुपचुप तरीके से साजिश रच डाली. इस साजिश में उस ने अपने मौसेरे भाई उस्मान, जो बेगम बाजार, बमरौली का रहने वाला था तथा अपने दोस्त सुफियान को विश्वास में ले कर शामिल कर लिया.

पूरी योजना तैयार कर के इमरान ने 14 सितंबर, शनिवार को बहन से कहा, ‘‘आयशा, मुझे लगता है कि नाजिम तुझे खुश रखेगा. इसलिए तेरा निकाह उस से कर देना ही ठीक है. ऐसा करो, आज रात 9 बजे नाजिम को फोन कर के तुम घर पर बुला लो. निकाह कब और कैसे किया जाए, बात कर लेते हैं.’’

इमरान की बात सुन कर आयशा को यकीन नहीं हुआ. इसलिए उस ने कहा, ‘‘भाईजान, आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं,’’ इमरान ने विश्वास दिलाते हुए कहा, ‘‘जब घर के सभी लोग तैयार हैं तो मैं ही तेरी खुशी में टांग क्यों अड़ाऊं?’’

इमरान में बदलाव देख कर आयशा खुश हो उठी. उस ने कहा, ‘‘भाईजान, मैं अभी नाजिम को फोन किए देती हूं. वह काम से लौटते हुए सीधे अपने घर आ जाएगा.’’

इस के बाद आयशा ने अपने मोबाइल फोन से नाजिम को फोन कर के कहा, ‘‘नाजिम, आज काम से लौटते समय तुम सीधे मेरे घर आ जाना. इमरान भाई मान गए हैं. वह तुम से बात कर के निकाह की तारीख पक्की करना चाहते हैं.’’

आयशा ने अपनी यह बात पूरे विश्वास के साथ कही थी, इसलिए नाजिम ने हामी ही नहीं भरी, बल्कि ठीक समय पर वह उस के घर आ गया. इमरान उस से बड़ी आत्मीयता से मिला. नाजिम को उस ने ऊपर के कमरे में ले जा कर बैठा दिया. उस कमरे में पहले से ही उस्मान और सुफियान बैठे थे. नाजिम उन्हें जानता था, इसलिए उन से बातें करने लगा. नाजिम को नाश्ता भी कराया गया. इस के बाद निकाह कब और कैसे किया जाए, इस पर बातचीत होने लगी. रात 11 बजे तक निकाह के बारे में बहुत सी बातें तय हो गईं. इस के बाद इमरान ने कहा, ‘‘नाजिम, अम्मी तुम्हारे लिए भी खाना बना रही हैं, खाना खा कर जाना.’’

नाजिम को लगा कि अब सब ठीक हो गया है, इसलिए उस ने हामी भर ली. अब तक गांव में सन्नाटा पसर गया था. दिन भर का थकामांदा नाजिम लापरवाह चारपाई पर बैठा था, इसी का फादया उठा कर उस्मान और सुफियान ने अचानक नाजिम के हाथपैर पकड़ लिए तो इमरान ने झपट कर नाजिम का गला पकड़ लिया और दबाने लगा. छटपटा कर नाजिम ने प्राण त्याग दिए. वह जिंदा न रह जाए, इस के लिए उस पर चाकू से भी वार किए गए. इस के बाद रात में ही नाजिम की लाश गांव के बाहर बाजरे के खेत में बीचोबीच फेंक दी गई.

काम हो जाने के बाद सुफियान और उस्मान अपनेअपने घर चले गए. आयशा, उस की अम्मी और अब्बू तथा घर के अन्य लोग नाजिम की हत्या होते देखते रहे, लेकिन डर के मारे कोई विरोध नहीं कर सका. आयशा ने कुछ कहना चाहा तो इमरान चीख कर बोला, ‘‘खबरदार, अगर किसी ने कुछ भी बोलने या कहने की हिम्मत की तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. उस का भी वही हाल कर दूंगा, जो मैं ने नाजिम का किया है.’’

घर वालों को धमका कर इमरान उस कमरे में गया, जिस में उस ने नाजिम की हत्या की थी. उस की साफसफाई कर के सुबह से पहले ही घरवालों को बिना कुछ बताए वह भी फरार हो गया.

3 दिनों तक नाजिम के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चला. 18 सितंबर को जब लाश से दुर्गंध आने लगी तो कुछ लोग खेत के भीतर यह देखने के लिए घुसे कि दुर्गंध किस चीज की आ रही है. तब नाजिम की हत्या का पता चला.

मोहम्मद आरिफ की सूचना पर पुलिस इमरान और साथियों को गिरफ्तार नहीं कर सकी तो दबाव बनाने के लिए इमरान के अम्मीअब्बू तथा बहन आयशा को थाने ले आई थी. पूछताछ के बाद थानाप्रभारी रामसूरत सोनकर ने इब्राहीम को थाने में रोक कर परवीन बेगम और आयशा को घर भेज दिया.

इमरान को साथियों से पता चल गया था कि आयशा ने नाजिम की हत्या की एकएक बात पुलिस को बता दी है. यही नहीं, वह अदालत में भी यह कहने को तैयार है कि नाजिम की हत्या उस के भाई इमरान ने अपने मौसेरे भाई उस्मान तथा दोस्त सुफियान के साथ मिल कर की है.

आयशा चश्मदीद गवाह थी. अगर वह अदालत में गवाही देती तो इमरान और उस के साथियों को सजा निश्चित थी. इसलिए इमरान को लगा कि किसी भी तरह आयशा को रोका जाए. वह उसी रात छिपतेछिपाते घर आया और आयशा को समझाने लगा कि वह उस के खिलाफ गवाही न दे. लेकिन आयशा अपनी जिद पर अड़ी थी. क्योंकि उस के प्रेमी को मारा गया था. उस ने कहा, ‘‘दुनिया भले ही इधर से उधर हो जाए, मैं अपनी बात से नहीं डिगूंगी. अदालत में मैं वही कहूंगी, जो मैं ने आंखों से देखा है.’’

इस के बाद इमरान को इतना गुस्सा आया कि उस ने तय कर लिया कि इसे मार देना ही ठीक है. उस ने मिट्टी के तेल का डिब्बा उठाया और उस पर तेल डालने लगा. आयशा जान बचाने के लिए चीखते हुए भागी. तब उसे लगा कि अगर उस ने आग लगाई तो यह शोर मचा देगी. शोरशराबा न हो, यह सोच कर उस ने आयशा को पकड़ा और अपने दोस्त जहीद की मदद से उस का गला दबा कर मार दिया. इस के बाद हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए उस ने आयशा की लाश को रस्सी का फंदा बना कर दरवाजे के ऊपर बने रोशानदान से लटका दिया और अपने साथी जहीद के साथ घर से भाग गया.

कथा लिखे जाने तक नाजिम की हत्या में शामिल तीसरे अभियुक्त सुफियान तथा आयशा की हत्या में शामिल जहीद को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए जगहजगह छापे मार रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Superstition: अंधविश्वास ने ली पिता पुत्र की जान

Superstition: अंधविश्वास हमारे समाज में अमरवेल की तरह फल फूल रहा है.और इसको खाद पानी देने का काम धर्म के ठेकेदार पंडो , पुजारियों के द्वारा बखूबी किया जा रहा है. समाज में फैले तरह-तरह के अंधविश्वास लोगों की जेब से  रुपए पैसे तो ऐंठते  ही हैं, साथ ही जरा सी असावधानी की वजह से जान माल का नुक़सान भी कर रहे हैं.अंधविश्वास के शिकार दलित, पिछड़ों के साथ पढ़े लिखे  नौकरी पेशा लोग भी हो रहे हैं.

एक ऐसा ही ताजा मामला मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में देखने को मिला है. लोगों को न्याय देने जज की कुर्सी पर बैठने वाले एक अंधविश्वासी शख्स की नासमझी ने अपने साथ अपने पुत्र की जान भी गंवा दी. बताया जा रहा है कि  जज के एक महिला मित्र से संबंधों की बजह से परिवार में कलह चल रही थी, जिससे छुटकारा पाने जज साहब तंत्र मंत्र के चक्कर में पड़ गये.

बैतूल  जिला न्यायालय में पदस्थ अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी  और इसके दो बेटे अभियान राज त्रिपाठी, और  छोटा बेटा आशीष राज त्रिपाठी ने  20 जुलाई 2020 को रात्रि 10.30 बजे के लगभग एक साथ बैठकर डायनिंग टेबल पर  खाना खाया. कुछ समय बाद अचानक वे तीनों उल्टीयां करने लगे . जिस भोजन में परोसी ग‌ई रोटियों की बजह  से तीनों की तबीयत खराब हुई ,वह  जज साहब की पत्नी श्रीमती भाग्य त्रिपाठी ने तैयार की थी.

जज साहब की पत्नी ने दोपहर की बची  रोटियां खाई थी, इस कारण उन्हें कुछ नहीं हुआ.  21  एवं 22 जुलाई  तक जज साहब और इनके बेटो का इलाज न्यायाधीश आवास परिसर बैतूल में ही  चलता रहा. 23 जुलाई को जिला चिकित्सालय के चिकित्सक डॉ. आनद मालवीय की सलाह पर  जज साहब व इनके दोनो बेटों को पाढर अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया गया.

छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी की तबीयत में सुधार होने के कारण वह घर पर ही रहे .25 जुलाई को शाम के समय जज साहब एवं इनके बड़े बेटे अभियान राज त्रिपाठी की तबीयत अचानक ज्यादा खराब होने से  इन्हे नागपुर के प्रतिष्ठित एलेक्सिसी अस्पताल ले जाया गया . जहां अस्पताल के चिकित्सको ने अभियान राज त्रिपाठी को मृत घोषित किया. और जज श्री महेन्द्र त्रिपाठी जी का ईलाज चलता रह . 26 जुलाई को प्रातः 04.30 बजे के लगभग जज महेन्द्र त्रिपाठी  की भी मौत हो गई.

दोनो पिता पुत्र की मृत्यु के बाद नागपुर के  मानकापुर पुलिस थाने में एफआईआर  जज के छोटे बेटे आशीष राज त्रिपाठी ने दर्ज कराते हुए पुलिस को बताया कि नागपुर आते समय उसके पिता महेन्द्र त्रिपाठी ने रास्ते में उसे बताया था कि उनकी किसी परिचित महिला संध्या सिह ने उन्हें  किसी पंडित से पूजा पाठ करवा कर  गेहूं का आटा दिया था और कहा था कि आटा घर के आटे में मिलाकर खाना बनाना . उसी आटे से तैयार रोटी खाने के बाद फुड पाईजनिग से उसके पापा और भाई की मौत हो गई.

न्यायिक क्षेत्र का मामला होने से पुलिस अधीक्षक द्वारा सम्पूर्ण जांच पड़ताल हेतु विशेष कार्य दल का गठन किया गया . इसी संदर्भ में जज महेन्द्र कुमार त्रिपाठी के घर से 20 जुलाई को प्रयुक्त शेष आटे के पैकेट को जप्त कर जांज के लिए लैब भेजा गया. लैब से आई रिपोर्ट में आटे में जहर मिले होने की पुष्टि हुई. पुलिस की जांच में जो कहानी सामने आई वह चौकाने वाली थी.

मूलतः रीवा निवासी श्रीमति संध्या सिंह विगत कई वर्षों से छिन्दवाडा में रहकर एन.जी.ओ चलाती है . महिलाओं को कानूनी सलाह देने जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की वजह से जज महेन्द्र त्रिपाठी से नजदीकियां हो गई थी . चूंकि जज बैतूल में अकेले रहते थे, तो अक्सर दोनों की मेल मुलाकात होती रहती थी संध्या जज साहब से रूपए पैसों की मांग भी करने लगी थी.

लाक डाउन की बजह से जज साहब की पत्नी व वेटों के बैतूल आ जाने के कारण से संध्या विगत चार माह से जज  से नहीं मिल पा रही थी. परेशान होकर  उसने छिन्दवाड़ा में अपने ड्रायवर संजू , संजू के फूफा देवीलाल  चन्द्रवशी  और बाबा रामदयाल के साथ मिलकर एक योजना बनाई.   योजना के अनुसार श्रीमति संध्या सिंह ने बैतूल आकर  जज साहब से उनके घर से आटा मंगवाया और वही आटा पन्नी में भरकर बाबा उर्फ रामदयाल को दिया गया .

दो दिन  बाद बाबा उर्फ रामदयाल ने आटे में जहर मिला कर संध्या को दे दिया. 20 जुलाई को  सर्किट हाउस बैतूल में संध्या और जज ने एकांत में मुलाकात की.  संध्या सिंह ने बाबा की पूजा वाला जहरीला आटा जज साहब को देते हुए कहा-

“बाबा ने इस‌ आटे को तंत्र मंत्र से सिद्ध किया है, इसकी रोटी खाने से सारी परेशानियां दूर हो जायेगी और हमारा मिलना जुलना आसान हो जाएगा.”

घर आकर  इसी तंत्र मंत्र वाले आटे को जज साहब ने घर में रखे आटे के डिब्बे में मिला दिया.  इसी आटे की रोटी खाने के बाद जज साहब और इनके दोनो बेटो की तबीयत खराब हुई और अंत में जज  महेन्द्र कुमार त्रिपाठी और इनके बड़े बेटे श्री अभियान राज त्रिपाठी की मौत हो गई .

एक पढ़ें लिखे उच्च पद पर काम करने वाले जज की यह कहानी बताती है कि हम किस तरह आंख मूंदकर तंत्र मंत्र और चमत्कारों पर विश्वास करने लगते हैं. अपनी गर्लफ्रेंड के प्यार में अंधे कानूनी पढाई वाले जज ने कैसे विश्वास कर लिया कि बाबा द्वारा दिए गए इस आटे के टोटके से  घर की परेशानियां दूर हो जायेगी.

आज भी विज्ञान के युग में भले ही हम आधुनिक तकनीक का उपयोग कर अपने आपको माडर्न समझने लगे हैं, परन्तु हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं हुई है. जब हमारे देश के वैज्ञानिक चंद्रयान की सफलता के लिए पूजा पाठ और हवन करते हो, देश के रक्षा मंत्री राफेल विमान की नारियल और नींबू से पूजा करते हों,तो फिर समाज के दूसरे वर्ग से क्या उम्मीद की जा सकती हैं.

अंधविश्वास का आलम ये है रोज सोशल मीडिया पर देवी देवताओं की पोस्ट वाले मेसैज 5 ग्रुप में फारवर्ड करने की अपील पर हम बिना सोचे समझे भेड़ चाल चलने लगते हैं. ज्ञान विज्ञान और समाज को जागरूक करने  वाली पत्रिकाओं को पढ़ने की रूचि लोगों की खत्म होती जा रही है.

ऐसे में दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं सरिता, सरस सलिल, मुक्ता, गृहशोभा समाज में फैले पाखंड और अंधविश्वास के प्रति समाज को जागरूक करने का काम कर रही हैं. इसी तरह सत्यकथा और मनोहर कहानियां जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित अपराध कथाओं में यह सीख प्रमुखता से दी जाती है कि अपराध का अंजाम सुखद नहीं होता. नशा, अंधविश्वास, धार्मिक आडंबर और अपराध पैसे से तंगहाली लाकर हमें  बर्बाद की ओर ले जाते हैं. Superstition

Social Crime: बेटे के लिए बलि चढ़ी मां

Social Crime: ठाणे जिले के अंतर्गत आता है वसई का धानीव बाग गांव. 17 नवंबर, 2013 को यहां से सोपारा फाटा की तरफ जानेवाले रास्ते के किनारे झाडि़यों में एक अंजान महिला की लाश पड़ी मिली. इस सिरविहीन लाश के पास एक गाउन और एक गद्दी पड़ी हुई थी. धानीव गांव के लोगों को जब झाडि़यों में बिना सिर वाली लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो तमाम गांव वाले वहां पहुंच गए. गांव वालों ने यह जानकारी मुखिया अविनाश पाटिल को दी तो वह भी वहां आ गए.

गांव का मुखिया होने के नाते अविनाश पाटिल ने फोन कर के महिला की लाश मिलने की जानकारी थाना वालीव पुलिस को दे दी. सुबहसुबह खबर मिलते ही वालीव के वरिष्ठ पुलिस इंसपेक्टर राजेंद्र मोहिते पुलिस टीम के साथ मुखिया द्वारा बताई उस जगह पर पहुंच गए, जिस जगह पर लाश पड़ी थी. राजेंद्र मोहिते ने वहां का बारीकी से निरीक्षण किया तो वहां काफी मात्रा में खून फैला हुआ था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. वहीं पर एक चौकी के पास पूजा का कुछ सामान भी रखा था.

इस से उन्होंने अनुमान लगाया कि किसी तांत्रिक वगैरह ने सिद्धि साधना या अन्य काम के लिए महिला की बलि चढ़ाई होगी.महिला की गरदन को उन्होंने आसपास काफी तलाशा, लेकिन वह नहीं मिली. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने अपर पुलिस अधिक्षक संग्राम सिंह निशाणदार और उपविभागीय अधिकारी प्रशांत देशपांडे को फोन द्वारा इस की जानकारी दी. उक्त दोनों अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

चूंकि मृतका का सिर नहीं मिल पा रहा था, इसलिए घटनास्थल पर मौजूद लोगों में से कोई भी उस अधेड़ उम्र की शिनाख्त नहीं कर सका. बहरहाल, पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को जे.जे. अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखवा दिया और उच्चाधिकारियों के निर्देश पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या और अन्य धाराओं के तहत रिपोर्ट दर्ज कर जरूरी काररवाई शुरू कर दी.

महिला की हत्या क्यों और किस ने की, यह पता लगाने के लिए उस की शिनाख्त होनी जरूरी थी. वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजेंद्र मोहिते के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई गई, जिस में सहायक पुलिस इंसपेक्टर आव्हाड तायडे, सहायक सबइंसपेक्टर प्रकाश सावंत, हवलदार सुभाष गोइलकर, पुलिस नायक अशोक चव्हाण, कांस्टेबल अनवर, मनोज चव्हाण, शिवा पाटिल, 2 महिला कांस्टेबल फड और पाटिल को शामिल किया गया.

पुलिस टीम लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश में लग गई. सब से पहले टीम ने सिरविहीन महिला की लाश के फोटो मुंबई के समस्त थानों में भेज कर यह जानने की कोशिश की कि कहीं किसी थाने में इस कदकाठी की महिला की गुमशुदगी तो दर्ज नहीं है. इस के अलावा उन्होंने पूरे जिले में सार्वजनिक जगहों पर महिला की शिनाख्त के संबंध में पैंफ्लेट भी चिपकवा दिए. पुलिस टीम को इस केस पर काम करते हुए करीब 3 हफ्ते बीत गए, लेकिन लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी.

8 दिसंबर, 2013 को उदय गुप्ता नाम का एक व्यक्ति भिवंडी के शांतीनगर थाने पहुंचा. उस ने बताया कि उस की मां कलावती गुप्ता पिछले महीने की 17 तारीख से लापता है. शांति नगर थाने के नोटिस बोर्ड पर वालीव थाना क्षेत्र में मिली एक अज्ञात महिला की सिरविहीन लाश की फोटो लगी हुई थी. इसलिए थानाप्रभारी ने उदय गुप्ता से कहा, ‘‘पिछले महीने वालीव थाना क्षेत्र में एक अज्ञात महिला की लाश मिली थी, जिस का फोटो नोटिस बोर्ड पर लगा हुआ है. आप उस फोटो को देख लीजिए.’’

उदय गुप्ता तुरंत नोटिस बोर्ड के पास गया और वहां लगे फोटो को देखने लगा. उन में एक फोटो पर उस की नजर पड़ी. उस फोटो को देख कर उदय गुप्ता रुआंसा हो गया. क्योंकि उस की मां फोटो में दिखाई दे रही महिला की कद काठी से मिलतीजुलती थी और वैसे ही कपड़े पहने हुए थी. उस तसवीर के नीचे वालीव थाने का फोन नंबर लिखा था.  उदय गुप्ता तुरंत वालीव थाने जा कर वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजेंद्र मोहिते से मिला और अपनी मां के गायब होने की बात बताई. राजेंद्र मोहिते उदय गुप्ता को जे.जे. अस्पताल ले गए.

मोर्चरी में रखी लाश और उस के कपड़े जब उदय गुप्ता को दिखाए गए तो वह फूटफूट कर रोने लगा. उस ने लाश की पहचान अपनी मां कलावती गुप्ता के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस का अगला काम हत्यारों तक पहुंचना था. उदय गुप्ता ने यह सूचना अपने पिता रामआसरे गुप्ता को दे दी थी. खबर मिलते ही वह वालीव थाने पहुंच गए थे.

वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक राजेंद्र मोहिते ने घर वालों से पूछा कि कलावती गुप्ता जब घर से निकली थी तो उस के साथ कौन था. उदय ने बताया, ‘‘उस दिन मां एक परिचित रामधनी यादव के साथ गई थी. उस के बाद वह वापस नहीं लौटी. हम ने रामधनी से पूछा भी था, लेकिन उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था.’’

रामधनी यादव सांताकु्रज क्षेत्र स्थित गांव देवी में रहता था. पुलिस टीम ने पूछताछ के लिए रामधनी यादव को उठा लिया. उस से कलावती गुप्ता की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि कलावती गुप्ता की बलि चढ़ाई गई थी और इस में कई और लोग शामिल थे. उस से की गई पूछताछ में कलावती गुप्ता की बलि चढ़ाए जाने की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी.

55 वर्षीया कलावती गुप्ता मुंबई के सांताकु्रज (पूर्व) के वाकोला पाइप लाइन के पास गांवदेवी में रहती थी. उस के 2 बेटे थे उदय गुप्ता और राधेश्याम गुप्ता. राधेश्याम विकलांग था और अकसर बीमार रहता था. बेटे की वजह से कलावती काफी चिंतित रहती थी. एक दिन पास के ही रहने वाले रामधनी ने उसे सांताकु्रज की एअर इंडिया कालोनी क्षेत्र के कालिना में रहने वाले ओझा सर्वजीत कहार के बारे में बताया.

बेटा ठीक हो जाए, इसलिए वह रामधनी के साथ ओझा के पास गई. इस के बाद तो वह हर मंगलवार और रविवार को रामधनी के साथ उस तांत्रिक के पास जाने लगी. सिर्फ कलावती का बेटा ही नहीं, बल्कि रामधनी की बीवी भी बीमार रहती थी. रामधनी उसे भी उस तांत्रिक के पास ले जाता था. रामधनी का एक भाई था गुलाब शंकर यादव. गुलाब की बीवी बहुत तेजतर्रार थी. वह किसी न किसी बात को ले कर अकसर उस से झगड़ती रहती थी. जिस से घर में क्लेश रहता था. घर का क्लेश किसी तरह खत्म हो जाए, इस के लिए गुलाब भी उस तांत्रिक के पास जाता था.

एक दिन तांत्रिक सर्वजीत कहार ने रामधनी और गुलाब को सलाह दी कि अगर वह किसी इंसान की बलि चढ़ा देंगे तो सारी मुसीबतें हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी. दोनों भाई अपने घर में सुखशांति चाहते थे, लेकिन बलि किस की चढ़ाएं, यह बात उन की समझ में नहीं आ रही थी.

इसी बीच उन के दिमाग में विचार आया कि कलावती की ही बलि क्यों न चढ़ा दी जाए. कलावती सीधीसादी औरत थी, साथ ही वह खुद भी तांत्रिक के पास जाती थी. इसलिए वह उन्हें आसान शिकार लगी. यह बात उन लोगों ने तांत्रिक से बताई. चूंकि बलि देना तांत्रिक के बस की बात नहीं थी, इसलिए उस ने अपने फुफेरे भाई सत्यनारायण, उस के बेटे पंकज नारायण और श्यामसुंदर से बात की तो वे यह काम करने के लिए तैयार हो गए.

15 नवंबर, 2013 को सांताकु्रज के वाकोला इलाके में रहने वाले गुलाब शंकर यादव के घर तांत्रिक सर्वजीत कहार, श्यामसुंदर, सत्यनारायण, पंकज और रामधनी ने एक मीटिंग कर के योजना बनाई कि कलावती की कब और कहां बलि देनी है. उन्होंने बलि चढ़ाने के लिए मुंबई से काफी दूर नालासोपारा के वसई इलाके में स्थित मातामंदिर को चुना. इसी के साथ तांत्रिक ने रामधनी को पूजा के सामान की लिस्ट भी बनवा दी.

अगले दिन 16 नवंबर, 2013 को रामधनी कलावती गुप्ता के घर पहुंच गया. उस ने उस से कहा कि अगर उसे अपने बेटे की तबीयत हमेशा के लिए ठीक करनी है तो आज नालासोपारा स्थित माता के मंदिर में होने वाली पूजा में शामिल होना पड़ेगा. यह पूजा तांत्रिक सर्वजीत ही कर रहे हैं. बेटे की खातिर कलावती तुरंत रामधनी के साथ चलने को तैयार हो गई. रामधनी कलावती को ले कर पहले अपने भाई गुलाब यादव के घर गया.

वहां योजना में शामिल अन्य लोग भी बैठे थे. कलावती को देख कर वे लोग खुश हो गए और पूजा का सामान और कलावती को ले कर सीधे नालासोपारा स्थित मंदिर पहुंच गए. वहां पहुंच कर ओझा ने एक गद्दी डाल कर उस पर पूजा का सारा सामान रख कर मां काली की पूजा करनी शुरू कर दी. उस ने कलावती के हाथ में भी एक सुलगती हुई अगरबत्ती दे दी तो वह भी पूजा करने लगी.

थोड़ी देर में तांत्रिक इस तरह से नाटक करने लगा, जैसे उस के अंदर देवी का आगमन हो गया हो. वहां मौजूद अन्य लोग तांत्रिक के सामने हाथ जोड़ कर अपनीअपनी तकलीफें दूर करने को कहने लगे. रामधनी ने कलावती से कहा कि वह भी सिर झुका कर देवी से अपनी परेशानी दूर करने को कहे. भोलीभाली कलावती को क्या पता था कि सिर झुकाने के बहाने उस की बलि चढ़ाई जाएगी.

उस ने जैसे ही तांत्रिक के चरणों में सिर झुकाया, श्यामसुंदर गुप्ता ने पीछे से उस के बाल कस कर पकड़ते हुए चाकू से उस की गरदन पर वार कर दिया. चाकू लगते ही कलावती खून से लथपथ हो कर तड़पने लगी. वहां मौजूद अन्य लोगों ने उसे कस कर दबोच लिया और उसी चाकू से उस की गरदन काट कर धड़ से अलग कर दी.

कलावती की बलि चढ़ा कर रामधनी और उस का भाई खुश हो रहे थे कि अब उन के यहां की सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी. वे कलावती की कटी गरदन को वहां से दूर डालना चाहते थे, ताकि उस की लाश की शिनाख्त न हो सके. उन लोगों ने उस की गरदन को अपने साथ लाई गई काले रंग की प्लास्टिक की थैली में रख लिया. तत्पश्चात वह थैली मुंबई अहमदाबाद राजमार्ग पर स्थित वासाडया ब्रिज से नीचे पानी में फेंक दी.

रामधनी से पूछताछ के बाद पुलिस ने कलावती गुप्ता की हत्या में शामिल रहे अन्य अभियुक्तों, तांत्रिक सर्वजीत कहार, श्यामसुंदर जवाहर गुप्ता, सत्यनारायण और पंकज को भी गिरफ्तार कर उन की निशानदेही पर कलावती का सिर, हत्या में प्रयुक्त चाकू और अन्य सुबूत बरामद कर लिए. पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.

ढोंगी तांत्रिक, पाखंडी आए दिन लोगों को अपने चंगुल में फांसते रहते हैं. इन के चंगुल में फंस कर अनेक परिवार बर्बाद हो चुके हैं. ऐसे तांत्रिकों, पाखंडियों पर शिकंजा कसने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने जादूटोना प्रतिबंध विधेयक पारित किया था.

यह विधेयक पिछले 18 सालों से विवादों से घिरा हुआ था. लेकिन इस बिल को पारित हुए एक दिन भी नहीं बीता था कि 55 वर्षीय कलावती गुप्ता की बलि चढ़ा दी गई. सरकार को चाहिए कि इस बिल को सख्ती के साथ अमल में लाए, ताकि तांत्रिकों, पाखंडियों पर अंकुश लग सके. Social Crime

Hindi Crime Story: मालकिन की इज्जत के साथ खेलता नौकर

Hindi Crime Story: शराब को भले ही सामाजिक बुराई माना जाता हो, लेकिन देश में शराब का अरबों का कारोबार चलता है. शाम ढलते ही शहरों के मयखानों, बार और नाइट क्लब आबाद होने लगते हैं.  शाम के तकरीबन साढ़े 7 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में नौचंदी थाना क्षेत्र के सूरजकुंड स्थित एक कैंटीननुमा मयखाने में शराब पीने वालों की भीड़ लगनी शुरू हो चुकी थी.

लोग मेजों पर खानेपीने का सामान सजाए बैठे थे. किनारे की एक मेज पर आमनेसामने 2 युवक बैठे शराब की चुस्कियां ले रहे थे. तभी अचानक 2 युवक उन के पास आ कर खड़े हो गए. उन के हाथों में पिस्तौलें थीं. उन में से एक युवक हवाई फायर करते हुए चिल्लाया, ‘‘अगर किसी ने भी शोरशराबा किया या भागा तो जिंदा नहीं बचेगा.’’

युवक की इस हरकत से वहां का माहौल दहशतजदा हो गया. लोग सकते में आ गए. कोई कुछ समझ पाता उस से पहले ही दोनों युवकों में से एक ने आमनेसामने बैठे युवकों में से एक ने उस के सिर, सीने और पेट को निशाना बना कर गोलियां चला दीं. गोलियां लगते ही युवक कुरसी पर लुढ़क गया.

इस के बाद दोनों युवक चले गए. टेबल पर रखा उस युवक का मोबाइल भी वे अपने साथ ले गए थे. गोलियां चलने से वहां अफरातफरी मच गई थी. किसी ने छिप कर जान बचाई तो किसी ने भाग कर. मृत युवक के साथ बैठा युवक भी भाग खड़ा हुआ था.

इसी बीच किसी व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दे दी थी. वारदात की सूचना पा कर पुलिस भी वहां पहुंच गई. निरीक्षण में पता चला युवक मर चुका है. पूछताछ में जानकारी मिली कि दोनों हमलावर मोटरसाइकिल से आए थे. उन्होंने मृतक पर करीब 25 राउंड गोलियां चलाई थीं. मारा गया युवक अपने साथी के साथ पल्सर मोटरसाइकिल नंबर यूपी-15 बीए-4351 से आया था, जो बाहर खड़ी थी.

घटनास्थल से पुलिस को कारतूस के कई खोखे मिले. मृतक की शिनाख्त तुरंत नहीं हो सकी. उस के सीने, पेट और सिर पर 10 से ज्यादा गोलियों के निशान थे, लेकिन वहां किसी अन्य व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई थी. इस का मतलब हमलावर सिर्फ उसे ही मारने आए थे. जिस तरह उस पर गोलियां चलाई गई थीं, इस का मतलब था कि हत्यारे उसे किसी भी कीमत पर जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे.

पुलिस को मृतक की जेबों की तलाशी में एक पर्स मिला, जिस में मिलें कागजों के आधार पर उस की शिनाख्त जुहेब आलम उर्फ साहिल खान के रूप में हुई. पुलिस ने पर्स में मिले पते पर उस की हत्या की सूचना दी तो थोड़ी देर में उस के घर वाले रोतेबिलखते हुए वहां आ पहुंचे.

पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक जुहेब शहर के ही थाना लालकुर्ती क्षेत्र के मैदा मोहल्ला स्थित जफर बिल्डिंग में रहने वाले सुलतान का बेटा था. उस के 2 भाई और थे, जुहेब एमबीए था और करीब 5 सालों से हापुड़ रोड स्थित कीर्तिका पब्लिकेशन में बतौर एकाउंटैंट नौकरी करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे तक ही घर लौट पाता था.

जिस तरह उस की हत्या की गई थी, उस से यही लगता था कि उस की किसी से गहरी रंजिश थी. पुलिस ने उस के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से भी जुहेब या परिवार की रंजिश होने से साफ मना कर दिया. लेकिन यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी, क्योंकि कोई तो वजह थी, जिस के चलते उस का कत्ल किया गया था.

पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल से भी पूछताछ की. उन्होंने भी अपनी जानकारी में जुहेब की किसी से रंजिश होने की बात से इनकार कर दिया. उन्होंने बताया था कि उस दिन जुहेब शाम करीब साढ़े 6 बजे उन के यहां से निकला था. कैंटीन में उस के साथ गया दूसरा युवक कौन था, इस की जानकारी पुलिस को नहीं मिल सकी. कत्ल का राज उस युवक के सीने में दफन हो सकता था.

यह 20 फरवरी, 2017 की घटना थी. इस मामले में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ और एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने घटना के खुलासे के लिए डीएसपी विकास जायसवाल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. जिस में थानाप्रभारी मोहन सिंह, सबइंसपेक्टर अफसर अली, हैडकांस्टेबल धर्मराज, कांस्टेबल सतीश और राकेश को शामिल किया गया.

पुलिस के हाथ ऐसा कोई सबूत नहीं लगा, जिस से कत्ल का राज खुल पाता. सभी पहलुओं पर गौर किया गया तो सुई मृतक के मोबाइल पर जा कर अटक गई. हत्यारे जुहेब का मोबाइल फोन अपने साथ ले गए थे. मतलब उस के मोबाइल में कोई गहरा राज छिपा था. यह मामला प्रेमप्रसंग का लग रहा था, अगले दिन पुलिस ने उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स की छानबीन से पता चला कि जुहेब का नोएडा की रहने वाली किसी युवती से संबंध था. दोनों की अकसर बातें होती रहती थीं. युवती दूसरे संप्रदाय की थी. पुलिस की एक कड़ी मिली तो उस ने जांच आगे बढ़ाई. हत्या की वजह यह प्रेमप्रसंग भी हो सकता था. संभवत: मोबाइल फोन में युवती के फोटोग्राफ रहे होंगे, इसीलिए हत्यारे उसे अपने साथ ले गए थे. एक पुलिस टीम नोएडा गई और उस ने युवती को खोज निकाला.

पूछताछ में पता चला कि युवती और जुहेब का संपर्क सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए हुआ था. बाद में दोनों में बातें होने लगी थीं. जुहेब उस से मिलने नोएडा भी जाया करता था. इस बात की जानकारी घर वालों को हुई तो युवती का अलग संप्रदाय की होने की वजह से खासा हंगामा हुआ.

फरवरी के पहले सप्ताह में जुहेब नोएडा गया तो युवती के घर वालों ने उसे काफी डांटाफटकारा. जुहेब ने उस वक्त भविष्य में उस से किसी तरह का संबंध न रखने का वादा किया. लेकिन वह उस से संबंध तोड़ नहीं सका. इन सब बातों से पुलिस को युवती के घर वालों पर शक हुआ. बेटी के संबंधों से नाराज हो कर वे हत्या करा सकते थे.

पुलिस ने उन से गहराई से पूछताछ की, लेकिन उम्मीदों पर तब पानी फिर गया, जब उन्होंने जुहेब को डांटने फटकारने की बात तो स्वीकारी, लेकिन हत्या में किसी भी तरह का हाथ होने से मना कर दिया. तथ्यों की कसौटी पर उन के बयान खरे पाए गए तो पुलिस खाली हाथ लौट आई.

पुलिस ने अपना ध्यान जुहेब के मोबाइल फोन पर केंद्रित किया. पुलिस यह जान कर हैरान रह गई कि वह अपने मोबाइल में 3 सिमकार्ड का इस्तेमाल करता था. पुलिस ने उस के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस की दोस्ती कई लड़कियों और महिलाओं से थी. एक चौंकाने वाली बात यह पता चली कि उस की जिस नंबर पर सब से अधिक बातें होती थीं, वह पब्लिकेशन हाउस की मालकिन का था. पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल की पत्नी नेहा (परिवर्तित नाम) से पूछताछ की.

नेहा ने बताया कि चूंकि उन का ज्यादातर काम जुहेब ही संभालता था इसीलिए उस की जुहेब से अकसर बातें होती थीं. पुलिस उस के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई, क्योंकि दोनों के बीच देर रात तक लंबीलंबी बातें होती थीं. इस का राज नेहा ही बता सकती थी. इस का मतलब कुछ ऐसा जरूर था, जिसे नेहा छिपा रही थी. पुलिस ने 3 अन्य महिलाओं से भी पूछताछ की,  जिन से जुहेब की बातचीत होती थी.

इस के बाद पुलिस को शक हुआ कि जुहेब की हत्या के तार अग्रवाल परिवार से ही जुड़े हैं. पुलिस अभी तक जुहेब के उस साथी तक नहीं पहुंच सकी थी, जिस के साथ वह उस दिन शराब पी रहा था. वह कातिलों से मिला हुआ भी हो सकता था. संभव था कि उसे योजना बना कर वहां लाया गया हो और हत्यारों को इस की सूचना दे दी गई हो.

पुलिस ने रास्तों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई तो एक फुटेज में जो युवक उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठा नजर आया, उस की पहचान असब उर्फ बिट्टू के रूप में हुई. वह पब्लिकेशन हाउस में बतौर ड्राइवर नौकरी करता था. खास बात यह थी कि घटना के बाद उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था.

अब तक अग्रवाल परिवार पूरी तहर शक के घेरे में आ गया था. अपनी मालकिन से नजदीकियां जुहेब की हत्या की वजह हो सकती हैं, यह सोच कर पुलिस ने अमित अग्रवाल से पूछताछ की. लेकिन उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस ने नेहा के युवा बेटे मयंक अग्रवाल की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना के समय उस का मोबाइल फोन बंद था, जबकि सीसीटीवी फुटेज के हिसाब से वह पब्लिकेशन के औफिस में ही था.

घटना के समय मोबाइल का बंद होना संदेह पैदा करता था. पुलिस ने जुहेब के कई दोस्तों से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि जुहेब की नेहा से न केवल खासी नजदीकियां थीं, बल्कि वह उस पर काफी मेहरबान रहती थी.

आखिर 24 फरवरी को पुलिस ड्राइवर असब तक पहुंच ही गई. उसे कस्टडी में ले लिया गया, साथ ही पुलिस ने पूछताछ के लिए मयंक अग्रवाल को भी कस्टडी में ले लिया. दोनों से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो ऐसा सच समने आया, जिसे जान कर पुलिस हैरान रह गई. महत्वाकांक्षी जुहेब जल्दी से जल्दी आगे बढ़ने की चाहत में बड़ी भूल कर बैठा था. वह घर की इज्जत और दौलत, दोनों से खेल रहा था. उस का यही खेल उस की जान पर भारी पड़ा.

अगले दिन पुलिस ने प्रैसवार्ता कर के पूरे मामले का खुलासा कर दिया. दरअसल, पब्लिकेशन हाउस में नौकरी के दौरान जुहेब की नेहा से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस की भी एक वजह थी. अमित अग्रवाल काम के सिलसिले में अकसर शहर से बाहर आतेजाते रहते थे. बेटा बाहर रह कर पढ़ रहा था. ऐसे में औफिस की जिम्मेदारी नेहा संभालती थी. यही नहीं, पब्लिकेशन के कागजों के अनुसार, मालकिन भी वही थी. वह आजादखयाल महिला थीं, जबकि जुहेब महत्त्वाकांक्षी और लच्छेदार बातों का बाजीगर था.

उस का यही अंदाज नेहा को भा गया. दोनों की उम्र में करीब 20 साल का फासला था. लेकिन आगे बढ़ने की ललक में जुहेब ने उम्र का फासला नजरअंदाज कर दिया था. वह जानता था कि कंपनी की असली मालकिन नेहा है, इसलिए मजे से नौकरी करने और आगे बढ़ने के लिए नेहा को अपने पक्ष में करना जरूरी है.

नेहा जितनी ज्यादा मेहरबान होगी, उस की जिंदगी में उतनी ही खुशियां आएंगी. यही सब सोच कर वह नेहा पर डोरे डालने लगा. उस की बातों में नेहा को भी रस आने लगा था. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में जुहेब नेहा का दिल जीतने में कामयाब हो गया.

जुहेब ने चालाकी दिखाई थी, लेकिन नेहा को तो समझदारी दिखाते हुए सतर्क हो जाना चाहिए था. पर वह खुद भी अंजाम की परवाह किए बिना उस के रंग में रंगने लगी थी. दोनों की बातें और मुलाकात रोज होती ही होती थी. इस के अलावा वे फोन पर भी बातें और चैटिंग करने लगे. भूल कुछ पलों के निर्णय पर निर्भर होती है. गलत निर्णयों के नतीजे बाद में कितने अच्छे और बुरे निकलेंगे, इस बात को पहले कोई नहीं सोचता. एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूट गई. इस के बाद यह आए दिन का सिलसिला बन गया.

समय अपनी गति से चलता रहा. अमित को दोनों की नजदीकियों पर शक हुआ. जुहेब का आचरण उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने उसे नौकरी से निकालने का प्रयास किया. लेकिन हर बार नेहा ढाल बन कर खड़ी हो गई.

कहते हैं कि अनैतिक संबंध छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. जब सब को यकीन हो गया कि दोनों के बीच अनैतिक संबंध हैं तो परिवार कलह का अखाड़ा बन गया. बात बढ़ती देख नेहा ने वादा किया कि वह अपनी गलती को सुधारने का प्रयास करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

कुछ दिनों की खामोशी के बाद दोनों फिर से मिलनेजुलने लगे, उन की राह गलत है, दोनों ही जानते थे, लेकिन अपने संबंधों को वे प्यार का नाम दे कर खुश थे. जुहेब की वजह से एक हंसतेखेलते परिवार में तूफान उठ खड़ा हुआ था. उसे ले कर घर में हमेशा तनाव रहने लगा था. अमित ने कई बार जम कर विरोध किया लेकिन जब स्थितियों में परिवर्तन नहीं आया तो एक दिन उन्होंने आत्महत्या के इरादे से अपने हाथ की नसें काट लीं. लेकिन समय से मिले उपचार की वजह से उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा.

जुहेब और नेहा, दोनों ही बदलने को तैयार नहीं थे. नेहा की मेहरबानियों का असर यह हुआ कि जुहेब की न सिर्फ तनख्वाह बढ़ती गई, बल्कि उस का ओहदा भी बढ़ता गया. एक साल पहले की बात है.

नेहा का बेटा मयंक एमबीए की पढ़ाई कर के घर लौट आया और उस ने बिजनैस संभालना शुरू कर दिया. वह दूर था तो उसे कुछ पता नहीं था. लेकिन घर आ कर उसे वे बातें भी पता चलने लगीं जो नहीं पता चलनी चाहिए थीं. सब कुछ जान कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई, वह जुहेब से नफरत करने लगा.

मयंक ने जुहेब की कई गलतियां पकड़ीं. जुहेब एकाउंटैंट था. हिसाबकिताब की सभी बारीकियां उस के हाथों में थीं. उस की नजर में जुहेब कंपनी को चूना लगा रहा था. उस ने नेहा से उस की शिकायतें कीं, लेकिन वह एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देती थी. एक दिन मयंक ने अपनी मां से इस मुद्दे पर स्पष्ट कहा, ‘‘जब आप को पता है कि जुहेब गलत है और वह कंपनी को चूना लगा रहा है तो उसे हटाने में क्या बुराई है? मैं उसे फूटी आंख नहीं देखना चाहता.’’

‘‘चाहती तो मैं भी यही हूं, लेकिन…’’ नेहा ने अपनी बात अधूरी छोड़ी तो मयंक ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘तुम जानते हो कि कंपनी का सारा काम उसे पता है. लेनदारियां भी उसे मालूम हैं. उसे हटाया गया तो कंपनी को काफी नुकसान हो सकता है. तुम पूरी तरह काम संभाल लो, उस के बाद उसे बाहर कर देंगे.’’

मां की बात सुन कर मयंक सोच में पड़ गया. एक हद तक उन की बात ठीक भी थी. कई सालों में जुहेब कंपनी के हिसाबकिताब की सभी बारीकियां जान गया था. नेहा की तरफ से उसे मिली छूट का ही नतीजा था कि वह बड़े हिसाब अपने हाथों में रखता था.

पूछने या कहने पर भी वह मयंक या उस के पिता को हिसाब नहीं देता था. बात भी उतनी ही बताता था, जितनी वह जरूरी समझता था. जोर देने पर वह मयंक के साथ मारपीट करने तक पर उतारू हो जाता था.

मयंक को शक था कि उस ने कंपनी में लाखों का घोटाला किया है. ऐसे में मयंक की तिलमिलाहट और बढ़ गई. जुहेब शानदार लाइफ स्टाइल में जीता था. एक दिन नेहा के मोबाइल में मयंक ने जुहेब की चैटिंग देख ली. दोनों की बातें शर्मसार करने वाली थीं. मयंक खून का घूंट पी कर रह गया. सब कुछ जान कर भी वह कुछ नहीं कर पा रहा था.

घर में आए दिन झगड़ा होता रहता था. जुहेब के प्रति मयंक के मन में नफरत तो थी ही, यह नफरत तब और बढ़ गई जब नेहा ने उसे गिफ्ट में स्कूटी दी. मयंक को लगा कि अगर वक्त रहते उस ने कुछ नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं, जब जुहेब उस के परिवार को न सिर्फ बर्बाद कर देगा, बल्कि बिजनैस पर भी कब्जा कर लेगा.

इज्जत और दौलत की बर्बादी वह अपनी आंखों से देख रहा था. उसे लगा कि जब तक जुहेब का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया जाएगा तब तक मां सुधरने वाली नहीं है. आखिर उस ने मन ही मन एक खतरनाक निर्णय ले लिया.

मयंक का एक मौसा था राजू उर्फ किशनपाल. वह मुजफ्फरनगर जिले के थाना रामराज क्षेत्र के गांव देवल का रहने वाला था. वह आपराधिक और दबंग प्रवृति का था. मयंक ने सारी बातें उसे बता कर जुहेब को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने को कहा तो वह बोला, ‘‘झगड़े की जड़ जुहेब को हटाने के लिए पेशेवर लोगों का इंतजाम करना होगा.’’

‘‘जो उचित लगे, आप करें जितना भी खर्चा होगा, मैं देने को तैयार हूं.’’ मयंक ने कहा.

राजू की पहचान ऐसे कई लोगों से थी, जो पैसे ले कर हत्या करते थे. उस ने मेरठ के शास्त्रीनगर के रहने वाले सारिक और नदीम से बात कर के उन्हें जुहेब की हत्या के लिए तैयार कर लिया. इस के बाद सभी ने मिल कर हत्या की योजना बना डाली.

योजना के तहत 20 फरवरी की सुबह राजू मेरठ आ कर मयंक से मिला. मयंक जानता था कि जुहेब और असब के बीच दोस्ती है, इसलिए उस ने असब को भी योजना में शामिल करने का फैसला किया. उस ने असब को औफिस से बाहर बुलवाया और उसे रुपयों का लालच दे कर अपने साथ शामिल कर लिया. तय हुआ कि असब जुहेब को सही ठिकाने पर ले कर जाएगा और फोन कर के राजू को इस बारे में बताएगा.

योजनानुसार राजू शूटरों के पास चला गया. सारिक और उस के साथी के पास पहले से ही हथियार थे. दिन में असब ने जुहेब से शाम को पीनेपिलाने की बात कही तो वह खुशीखुशी तैयार हो गया.

शाम को दोनों मोटरसाइकिल से शराब के ठेके पर पहुंचे तो असब ने फोन कर के राजू को सटीक जानकारी दे दी. इस के बाद राजू शूटर सारिक और नदीम के साथ वहां पहुंचा और चालाकी से जुहेब की पहचान करा दी. इस के बाद उन्होंने वारदात को अंजाम दे दिया.

असब वहां से निकला और बाहर आ कर राजू तथा शूटरों से मिला. शूटरों ने उसे एक पिस्टल छिपा कर रखने के लिए दी और खुद चले गए. असब भी अपने मोबाइल का स्विच औफ कर के घर चला गया.

मयंक ने सोचा था कि योजनाबद्ध तरीके से काम करने की वजह से पुलिस इस मामले में उलझ कर रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. जुहेब और नेहा की नासमझी से 2 परिवारों पर मुसीबत आ गई. जुहेब को अपनी जान गंवानी पड़ी तो नेहा के बेटे मयंक को जेल जाना पड़ा. समय रहते अगर दोनों सुधर गए होते तो यह नौबत नहीं आती.

असब की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त 32 बोर का पिस्टल और कारतूस बरामद कर लिए. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों में से किसी की जमानत नहीं हो सकी थी. फरार आरोपियों की सरगर्मी से तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Suspense Story: साजिश जो छिप न सकी

Suspense Story: पंजाब के जिला संगरूर के गांव लखोवाल निवासी शेर सिंह पहली अक्तूबर, 2017 को थाना भवानीगढ़ के अंतर्गत पड़ने वाली पुलिस चौकी पहुंचे. उन्होंने चौकीइंचार्ज एएसआई गुरमीत सिंह को एक लिखित तहरीर देते हुए कहा कि मैं कल सुबह अपने बेटे यादविंदर के साथ अपने खेतों पर काम करने के लिए गया था. खेतों के नजदीक ही एक प्लाईवुड फैक्ट्री थी. कुछ देर बाद उसी फैक्ट्री में काम करने वाले शिवकुमार और राम नरेश हमारे पास खेत पर आ गए.

शिवकुमार और रामनरेश दिन भर खेतों पर साथ ही रहे. रात करीब 9 बजे मैं ने और मेरे बेटे ने उन दोनों को अपनी मोटरसाइकिलों से प्लाईवुड फैक्ट्री छोड़ दिया. उन्हें छोड़ कर मैं अपने बेटे के साथ घर की ओर लौट रहा था तभी कोई ट्रक बेटे की मोटरसाइकिल में पीछे से टक्कर मार कर भाग गया. उस समय रात के यही कोई साढ़े 9 बज रहे थे, इसलिए मैं ट्रक का नंबर भी नहीं देख पाया.

यादविंदर खून से लथपथ सड़क पर पड़ा तड़पने लगा. फोन करने के बाद जब अस्पताल की एंबुलेंस वहां पहुंची तो उसे नाभा अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. यादविंदर के पास उस समय एक मोबाइल फोन था. वह मौके पर ही कहीं खो गया. शेर सिंह ने उस अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ कानूनी काररवाई किए जाने की मांग की.

शेर सिंह की इस सूचना पर चौकीइंचार्ज गुरमीत सिंह ने भादंसं की धारा 279, 304ए के तहत अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी. पुलिस ने काफी कोशिश की, लेकिन घटना के 3-4 महीने बाद भी वह उस ट्रक चालक को नहीं ढूंढ पाई. लिहाजा इस केस की जांच वहां से सीआईए के इंचार्ज इंसपेक्टर विजय कुमार को ट्रांसफर कर दी गई.

शुरूशुरू में इंसपेक्टर विजय कुमार को भी इस केस में कोई सफलता मिलती नजर नहीं आई, पर उन्हें मामले की तह तक तो पहुंचना ही था सो उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. साथ ही अपने खास मुखबिरों को इस काम पर लगाने के बाद मृतक के पिता शेर सिंह से भी पूछताछ की. इस बार शेर सिंह ने बताया कि उन्हें संदेह है कि उस के बेटे यादविंदर की मृत्यु दुर्घटना में नहीं हुई थी, बल्कि उस की हत्या की गई थी.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ इंसपेक्टर विजय कुमार ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘‘आप ने तो अपने बयानों में लिखवाया था कि उस की मौत एक्सीडेंट से हुई थी. आप के बयानों के अनुसार एक अंजान ट्रक चालक के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखी गई थी. अगर ऐसी बात थी तो आप ने यह सब पहले क्यों नहीं बताया था. इस प्रकार गलतबयानी कर के आप ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की है.’’

‘‘साहबजी, दरअसल किसी ने मुझे उस रात खबर दी थी कि यादविंदर का एक्सीडेंट हो गया है और उस की लाश सड़क पर पड़ी है. खबर सुनते ही मैं मौके पर पहुंचा तो बेटा तड़प रहा था. वहीं उस की मोटरसाइकिल भी पड़ी थी. फोन कर के मैं ने एंबुलेंस बुलाई और उसे नाभा के अस्पताल ले गया था.

‘‘पहली अक्तूबर को मैं ने पुलिस चौकी के एसआई गुरमीत सिंह को जो बयान दिया था, वह किसी के कहने पर दिया था, जबकि सच्चाई यह है कि मैं ने ट्रक वाले को नहीं देखा था.

‘‘सच्चाई यह है कि उस समय बेटे की लाश देख कर मैं अपना होश खो बैठा था. लोग जैसा कह रहे थे, मैं वैसा ही कर रहा था. अब मैं पूरी तरह ठीक हूं. मुझे उम्मीद है कि मेरे बेटे की किसी ने हत्या कर मामले को एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की है.’’

शेर सिंह की बात सुनने के बाद इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस मामले की जांच शुरू कर दी. जांच की शुरुआत उन्होंने शेर सिंह के घर से ही की. उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि कहीं यादविंदर या शेर सिंह की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. इस काम में उन्होंने अपने मुखबिरों को भी लगा दिया.

इस बीच एक मुखबिर ने इंसपेक्टर विजय कुमार को खबर दी कि शेर सिंह के परिवार की नूरपुर गांव के रहने वाले जसवंत सिंह उर्फ जस्सा के साथ दुश्मनी थी. दुश्मनी की वजह क्या थी, यह बात मुखबिर नहीं बता सका.

जस्सा के साथ शेर सिंह की क्या दुश्मनी थी, यह जानने के लिए उन्होंने शेर सिंह को सीआईए औफिस बुलाया तो शेर सिंह ने बताया, ‘‘साहब, जस्सा से उस की ऐसी कोई खास दुश्मनी नहीं है. बस खेतों के पानी को ले कर एकदो बार उस से कहासुनी जरूर हो गई थी.’’

शेर सिंह के हावभाव और बातों से इंसपेक्टर विजय कुमार समझ गए कि वह कुछ छिपा रहा है या जानबूझ कर वह सच नहीं बताना चाहता. और फिर खेतों के पानी को ले कर तो गांवों में अकसर छोटेमोटे झगड़े होते ही रहते हैं. इस के पीछे कोई किसी का कत्ल नहीं करता. बात जरूर कोई और ही रही होगी.

बहरहाल, इंसपेक्टर विजय को किसी ऐसे आदमी की तलाश थी जो जस्सा और शेर सिंह के बीच चल रही दुश्मनी की सही वजह का पता लगा सके. थोड़ी कोशिश के बाद उन्हें एक ऐसी चतुर औरत मिल गई. वह न केवल जसवंत सिंह उर्फ जस्सा और शेर सिंह के परिवारों के बीच की दुश्मनी का पता लगा सकती थी बल्कि उन की कुंडली भी खंगाल सकती थी.

इंसपेक्टर विजय ने उसे कुछ ईनाम देने का लालच दिया तो वह यह काम करने के लिए तैयार हो गई. काम सौंपे जाने के कुछ दिनों बाद उस औरत ने सब पता लगाने के बाद उन्हें जो कुछ बताया, उस में उन्हें सच्चाई दिखाई दी. उस औरत ने बताया कि जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की वजह खेतों का पानी नहीं था बल्कि जस्सा की खूबसूरत बेटी थी. जस्सा की एक बेटी थी कल्पना, जिस की सुंदरता की चर्चा आसपास के गांवों में भी थी. उस के चाहने वालों की लंबी फेहरिस्त थी.

शेर सिंह के बेटे यादविंदर की नजर जब उस पर पड़ी तो पहली नजर में ही वह उस का दीवाना हो गया था. लड़की के अन्य चाहने वालों की तरह वह भी उस के घर के इर्दगिर्द चक्कर लगाने लगा था. यादविंदर भी अच्छाखासा गबरू नौजवान था. वह पढ़ालिखा भी था और अच्छे घर से ताल्लुक रखता था, पर कल्पना ने उसे कभी लिफ्ट नहीं दी. वह भी एक अच्छे परिवार की संस्कारी लड़की थी.

प्यार वगैरह के फालतू चक्करों में वह नहीं पड़ना चाहती थी. इसलिए यादविंदर क्या उस ने किसी भी लड़के को भाव नहीं दिया. लेकिन यादविंदर किसी न किसी तरह उस के नजदीक पहुंचने की कोशिश करता रहा. कल्पना के घर के चक्कर लगाने की यादविंदर की दिनचर्या सी बन गई थी. कल्पना की झलक पाने या उस से बात करने के चक्कर में वह उस के घर के कई चक्कर रोजाना लगाता था. जब वह उसे रास्ते में मिल जाती तो वह उस के साथ छेड़छाड़ करे बिना नहीं मानता था.

1-2 बार तो कल्पना के पिता जस्सा ने यादविंदर को अपनी बेटी के साथ छींटाकशी करते देख लिया था. तब उन्होंने उसे चेतावनी दे कर छोड़ दिया था. पर यादविंदर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. एक रोज तो यादविंदर ने हद ही कर दी. उस ने कल्पना का रास्ता रोक कर उस का हाथ पकड़ कर बात करने की कोशिश की. कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी. उस ने यह सारी बात अपने पिता जसवंत सिंह को बता दी. पानी सिर से इतना ऊंचा पहुंच जाएगा, इस बात का अंदाजा शायद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा को नहीं था.

बेटी के मुंह से यादविंदर की करतूतें सुन कर जस्सा का खून खौल उठा. वह सीधा शेर सिंह के घर गया. उस ने यादविंदर को ही नहीं, बल्कि शेर सिंह को भी खरीखोटी सुनाई. बापबेटे की उस ने गांव वालों के सामने ही बेइज्जती की और बाद में चलते समय उस ने शेर सिंह को यह भी धमकी दी कि अगर उस ने अपने बेटे पर लगाम नहीं लगाई तो वह उस के टुकड़ेटुकड़े कर देगा.

यह धमकी जस्सा ने पूरे गांव के सामने दी थी, पर इंसपेक्टर विजय कुमार को गांव वालों ने यह बात नहीं बताई थी. बहरहाल, जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की असली वजह इंसपेक्टर विजय कुमार को पता चल चुकी थी. उन्होंने जस्सा को पूछताछ के लिए सीआईए औफिस बुलवा लिया. उन्होंने उस से यादविंदर की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने खुद को निर्दोष बताया. उस ने कहा, ‘‘साहब, आप को शायद गलतफहमी हुई है. यादविंदर की हत्या नहीं हुई, बल्कि उस का एक्सीडेंट हुआ था.’’

‘‘बकवास बंद करो.’’ इंसपेक्टर विजय ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘हमें सब मालूम है कि यादविंदर का एक्सीडेंट हुआ था या अपनी बेटी के चक्कर में तुम ने मिल कर उस की हत्या की थी. यह सारी सच्चाई मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

इंसपेक्टर विजय की घुड़की के बाद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा और रोते हुए कहने लगा, ‘‘साहबजी, मैं यादविंदर की हत्या नहीं करना चाहता था पर जब बात इज्जत पर बन आई तो मजबूरन मुझे यह कदम उठाना पड़ा.’’

इस के बाद उस ने यादविंदर के एक्सीडेंट के रहस्य से परदा उठाते हुए उस की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

यादविंदर काफी समय से जस्सा की बेटी कल्पना को छेड़छेड़ कर परेशान कर रहा था. जस्सा ने उसे प्यार से और धमका कर हर तरह से समझा कर देख लिया था पर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. जस्सा ने उस के पिता शेर सिंह को भी चेतावनी दी पर यादविंदर पर किसी बात का असर नहीं हुआ था. उल्टे यादविंदर कल्पना को धमकी देता था कि यदि उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे उठा कर ले जाएगा.

30 सितंबर, 2017 की रात यादविंदर कल्पना से बातचीत करने के लिए उस के घर की तरफ चक्कर लगाने के लिए आया था. इत्तफाक से उस समय जस्सा भी अपने घर के बाहर खड़ा था. यादविंदर को देखते ही उस के तनबदन में आग लग गई. उस जलती हुई आग पर तेल खुद यादविंदर ने ही डाला. वह जस्सा के घर के बाहर खड़ा हो कर अपनी बाइक का हौर्न बजाने लगा. जस्सा ने यादविंदर को अपने पास बुला लिया और प्यार से बातें करते हुए उसे अपने खेतों की ओर ले गया.

उस समय जस्सा के साथ उस का भतीजा मनदीप सिंह मनी व नौकर सुखविंदर सिंह उर्फ काला भी था. अपने खेत में पहुंचने के बाद यादविंदर को सबक सिखाने की नीयत से तीनों ने जम कर उस की पिटाई की. उन का इरादा यादविंदर की हत्या करने का नहीं था पर अंधाधुंध पिटाई करने से यादविंदर की मौत हो गई. यादविंदर की मौत के बाद तीनों घबरा गए और इस हत्या से बचने के उपाय सोचने लगे.

अंत में तीनों ने मिल कर यादविंदर की हत्या को एक्सीडेंट का रूप देने की योजना बनाई और उस की लाश और मोटरसाइकिल अपनी ट्रौली पर लाद कर नाभा रोड पर चन्नो गांव के पास ला कर सड़क पर फेंक दिया. उस की लाश उधर से गुजरने वाले किसी वाहन से कुचल गई थी. फिर जस्सा ने ही किसी से यादविंदर का एक्सीडेंट होने की सूचना शेर सिंह के पास पहुंचा दी थी.

शेर सिंह चन्नो गांव के करीब गया तो बेटे की लहूलुहान लाश देख कर घबरा गया. फिर वह उसे एंबुलेंस से नाभा अस्पताल ले गया था. जस्सा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने अन्य आरोपी मनदीप सिंह और सुखविंदर उर्फ काला को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों को अदालत में पेश कर उन्हें 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

रिमांड अवधि में उन की निशानदेही पर कुछ सबूत भी हासिल किए. बाद में उन्हें पुन: न्यायालय में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया. पुलिस को यह मामला सुलझाने में भले ही 8 महीने लग गए, लेकिन साजिश का खुलासा कर के आरोपियों को जेल पहुंचा दिया. Suspense Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कल्पना परिवर्तित नाम है.

Crime Stories: बदनामी सह न सकी बदनाम औरत

Crime Stories: फिलिप्स हर उस बदनाम गली और अड्डे पर हो आया था, जहां अकसर जाया करता था.  लेकिन कहीं भी उस का मन घंटे भर तो क्या, पल भर भी बैठने को नहीं हुआ. रंगीनमिजाज फिलिप्स ने किसी एक का हो कर रहना सीखा ही नहीं था. 30 साल का होने के बावजूद उस ने शादी नहीं की थी. शादी की उस ने जरूरत ही नहीं महसूस की, क्योंकि वह 15-16 साल का था, तभी से बदनाम गलियों का चक्कर लगाने लगा था.

सारा दिन वह मेहनत कर के जो भी कमाता था, उस का एक बड़ा हिस्सा बदनाम औरतों के साथ कुछ समय गुजार कर खर्च कर देता था. तभी तो वह हर बदनाम गली की हर बदनाम औरत का नाम ही नहीं, उस के शरीर की नापतौल भी बता सकता था.

फिलिप्स में एक आदत यह थी कि वह जिस औरत के साथ एक बार समय गुजार लेता था, उस के पास दोबारा नहीं जाता था. जब उन गलियों में उसे कोई नई औरत बैठने को नहीं मिली तो वह बीयर बार चला गया.  बीयर बार में शराब के 4-5 बड़े पैग गले से नीचे उतरे तो वहां भी उस का मन नहीं लगा, बल्कि उस की इच्छा और बढ़ गई. वहां की बारगर्ल्स के अधखुले अंगों को देख कर उस का मन और बेचैन हो उठा. मन तो किया, उन्हीं में से किसी को साथ बैठने का औफर दे दे, लेकिन वे ऐसा काम नहीं करती थीं, इसलिए वह उन्हें सिर्फ छू कर रह गया था.

फिलिप्स अभी कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि उस की नजर एक साइबर कैफे पर पड़ी. वह साइबर कैफे में घुस गया और वहां एक कंप्यूटर के सामने जा बैठा. उस ने वहां कालगर्ल्स की साइटें खोल कर खंगालनी शुरू कीं. उस की मेहनत रंग लाई और उस की पसंद की एक कालगर्ल मिल गई.

वह हसीन तो थी ही, उस की अदाएं भी कातिल थीं. उस के शरीर पर 2 ही कपड़े थे, एक ब्रा और दूसरी पैंटी. गोरे रंग पर गुलाबी रंग के ये दोनों कपड़े खूब फब रहे थे. फिलिप्स की नजर स्क्रीन पर उभरे फोटो से हट ही नहीं रही थी. मन कर रहा था, हाथ डाल कर खींच ले. साइट पर दिए विवरण को पढ़ कर फिलिप्स जैसे उस में डूबा जा रहा था. अंत में लिखा था, ‘अगर दीदार करना है तो एक पल का भी इंतजार न करें. तुरंत दिए मोबाइल नंबर पर फोन करें.’

दिए गए मोबाइल नंबर पर फिलिप्स ने फोन किया तो दूसरी ओर से एक मीठी और सैक्सी आवाज आई, ‘‘बहुत देर कर दी, इतनी देर तक क्या सोचते रहे? सोचविचार में कितने हसीन पल गंवा दिए? मेरे बारे में तो सब जान ही लिया है. अब कीमत सुन लो. एक घंटे के मात्र 3 सौ डौलर, ज्यादा नहीं हैं न? जन्नत की सैर के लिए यह रकम कोई ज्यादा नहीं है.’’

‘‘मुझे यह कीमत मंजूर है. तुम कहां मिलोगी?’’ फिलिप्स ने पूछा.

‘‘मेरे यहां ही आ जाओ. पता है—द हाउस विद लाइट्स औन. और हां, अब देर मत करो. मैं इंतजार कर रही हूं.’’

‘‘आप ने अपना नाम तो बताया ही नहीं?’’ फिलिप्स ने पूछा.

‘‘वैसे नाम की क्या जरूरत है. लेकिन आप पूछ रहे हैं तो बता देती हूं, मुझे ब्रांडी कहते हैं.’’ इतना कह कर दूसरी ओर से फोन काट दिया गया.

फिलिप्स तो कब से बेचैन था. पैसे उस की जेब में थे ही, उस ने टैक्सी पकड़ी और द हाउस विद लाइट्स औन पहुंच गया. यह शहर से थोड़ा हट कर एक कम रिहायशी इलाके में बनी आलीशान कोठी थी. सड़क पर ज्यादा भीड़भाड़ भी नहीं थी. कोठी के नीचे जरूर कुछ नौजवान टहल रहे थे.

कोठी नाम के एकदम अनुरूप थी. लाइट हलकी जरूर थी, पर जगमगा रही थी. देख कर यही लग रहा था कि यहां कभी रात होती ही नहीं.  फिलिप्स अंदर घुसते हुए सहमा सा था. वह अंदर पहुंचा तो उस के कानों में मिठास घोलने वाले ये शब्द पड़े, ‘‘लगता है पेनीलोपे, तुम यहां खुश नहीं हो?’’

यही आवाज फिलिप्स ने फोन पर सुनी थी. उस ने खुली खिड़की से अंदर झांका. संगमरमर के फर्श पर संगमरमर सी काया वाली एक लड़की बैठी थी. शायद वही पेनीलोपे थी. उस की बगल में एक औरत और बैठी थी. उसी से फिलिप्स की बात हुई थी. वह ब्रांडी थी. वह पेनीलोपे के गुलाबी गाल पर अंगुलियां फेरते हुए कह रही थी, ‘‘पता नहीं क्यों तुम्हें यहां अच्छा नहीं लग रहा? अरे यहां नएनए आशिक तो आते ही हैं, मोटी कमाई भी होती है.’’

‘‘लेकिन मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘पेनीलोपे! तुम अपनी कीमत समझो? तुम जिस से शादी करोगी, वह भी तुम्हें नोचेगा, खसोटेगा. बदले में क्या देगा, दो जून की रोटी और तन के कपड़े. जबकि यहां जो चाहोगी, वह मिलेगा.’’ ब्रांडी ने कहा.

‘‘तुम बहुत खराब हो मैम.’’ पेनीलोपे शरमाते हुए बोली. शायद उस पर ब्रांडी की बातों का जादू चल गया था.

‘‘वह तो हूं.’’ ब्रांडी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अब देर मत करो, जल्दी से तैयार हो जाओ. लोग आते ही होंगे.’’

ब्रांडी की बात पूरी ही हुई थी कि नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘मैम, फिलिप्स नाम का एक लड़का आप से मिलने आया है.’’

‘‘ठीक है, उसे मेरे कमरे में भेज दो.’’ कह कर ब्रांडी अपने कमरे की ओर बढ़ गई. ब्रांडी का कमरा किसी जन्नत से कम नहीं था. कमरे के बीचोबीच बेड पड़ा था, जो बेहद कीमती था. उस के सिरहाने एक छोटी सी टेबल रखी थी, जिस पर सुगंधित मोमबत्ती जल रही थी. हलका उत्तेजक संगीत बज रहा था. मोमबत्ती की हलकी रोशनी में पारदर्शी गाउन पहने ब्रांडी लेटी थी.

उसे देख कर फिलिप्स की आंखें हैरत से फटी रह गई थीं. उसे ब्रांडी नहीं, जन्नत दिखाई दे रही थी. वह होश खो बैठा. उसे आगे बढ़ने का होश ही नहीं रहा. उसे ठगा सा देख ब्रांडी ने कहा, ‘‘एक घंटे के लिए मैं तुम्हारी हो चुकी हूं, जिस की कीमत तुम अदा कर चुके हो. अब दूर खड़े क्या देख रहे हो, करीब आ जाओ.’’

फिलिप्स जैसे ही बेड के नजदीक पहुंचा, ब्रांडी ने उसे खींच लिया. फिलिप्स बेड पर गिर पड़ा. उसे बांहों में भर कर ब्रांडी ने कहा, ‘‘मेरा नाम ही ब्रांडी नहीं है, मुझ में ब्रांडी जैसा नशा भी है. जहां भी होंठ रखोगे, मदहोश हो जाओगे.’’

फिलिप्स को लगा, उस की खोज पूरी हो चुकी है. वह जिस काम के लिए ब्रांडी के पास आया था, पूरा होने के बाद ब्रांडी ने कहा, ‘‘आप मेरी सेवा से खुश तो हैं?’’

‘‘उम्मीद से ज्यादा.’’ फिलिप्स ने कहा.

‘‘और चुकाई गई कीमत से भी ज्यादा.’’ ब्रांडी ने कहा तो फिलिप्स को हंसी आ गई. उसी के साथ ब्रांडी भी हंसने लगी.

एक कालगर्ल के अड्डे पर दोबारा न जाने वाले फिलिप्स की रातें अब ब्रांडी की कोठी पर बीतने लगीं. इस की वजह यह थी कि उस की यह इच्छा यहीं पूरी हो जाती थी. उसे यहीं रोजरोज नई लड़कियां मिल जाती थीं.

लेकिन एक रात फिलिप्स ब्रांडी की ‘द हाउस विद लाइट्स औन’ कोठी पर पहुंचा तो उसे वहां एक पुलिस जीप खड़ी दिखाई दी. वह काफी देर उस जीप के जाने का इंतजार करता रहा. जब वह काफी देर तक नहीं गई तो वह लौट गया. अगले दिन वह गया तो ब्रांडी ने बताया कि पुलिस उसे पकड़ने आई थी. लेकिन उसे ले जाने के बजाय हुस्न और दौलत ले कर चली गई.

ब्रांडी ने उसे बताया कि जब पुलिस उस के यहां आई तो ब्रांडी और उस के साथ की लड़कियां हाथों में डौलर की गड्डियां लिए उन के सामने आ खड़ी हुईं. उस समय उन के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था.

उस हालत में पुलिस वाले अपनी वर्दी का फर्ज और आने का मकसद भूल गए. डौलरों को जेब के हवाले किया और लड़कियों के साथ कमरों में घुस गए. 3-4 घंटे गुजार कर वे जैसे आए थे, उसी तरह खाली हाथ लौट गए. लेकिन उस के कुछ दिनों बाद ही एक बार फिर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. इस बार ब्रांडी की कोई चाल कामयाब नहीं हुई. दरअसल ब्रांडी के खिलाफ काफी शिकायतें हो चुकी थीं. इसलिए यह मामला अंडर कवर डिटेक्टिव एजेंसी के पास पहुंच गया था.

किसी ने फोन द्वारा पुलिस को सूचना दी थी कि शाम ढलते ही जैसे द हाउस विद लाइट्स औन कोठी में लाइट जलती है, बाहर गाडि़यों की लाइन लग जाती है. नएनए लोग गाडि़यों से आते हैं और घंटे-2 घंटे रुक कर चले जाते हैं. उस में रहने वाली ब्रांडी ने एलीक्स 38डी नाम से वेबसाइट बना रखी है. एलीक्स उस का दूसरा नाम है. उस के नाम के साथ जो 38 लगा है, वह उस की ब्रा का साइज है. इस साइट पर कालगर्ल्स की फोटो के साथ उन के साथ रात गुजारने की कीमत भी लिखी है.

उस व्यक्ति के अलावा भी कुछ अन्य लोगों ने शिकायतें की थीं. उन लोगों का भी यही कहना था कि ब्रांडी के यहां गलत काम होता है. उस के यहां तरहतरह के लोग आते हैं. उस की वजह से उन का जीना दूभर हो गया है. क्रिसमस की रात उस के यहां ऐसा जश्न मनाया गया था कि उस की कोठी के आगेपीछे दूरदूर तक पैर रखने की जगह नहीं थी. जश्न शाम से शुरू हुआ था तो सुबह 4 बजे तक चला था.

इस के अलावा एक महिला ने शिकायत की थी कि उस का अय्याश पति ब्रांडी के घर हर रात 3 से 5 सौ डौलर खर्च कर के आता है. घर आ कर कहता है कि उसे जो सुख वहां मिलता है, कहीं और नहीं मिल सकता. कई शिकायतें हो गई थीं, इसलिए पुलिस को सख्त काररवाई करनी पड़ी.

पहले छापे में मिली नाकामी को ध्यान में रख कर इस बार ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारियों की टीम को ब्रांडी के घर भेजा गया था.   छापे में ब्रांडी के अलावा 3 अन्य कालगर्ल्स पकड़ी गई थीं. इन के साथ तमाम आपत्तिजनक सामान भी बरामद किया गया था. पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर ब्रांडी चिल्लाचिल्ला कर कह रही थी, ‘‘न तो मैं कालगर्ल हूं और न ही ऐसा कोई रैकेट चलाती हूं. यह सब मेरे पति ने मुझ से बदला लेने के लिए किया है. मुझे झूठे इलजाम में फंसाया जा रहा है. मैं जेल नहीं जाऊंगी. इस से बेहतर है मैं मर जाऊं.’’

पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी और हथकड़ी पहना दी. अदालत से उसे जेल भेज दिया गया. मगर मानसिक हालत ठीक न होने की वजह से उसे जल्दी ही जमानत मिल गई. जमानत पर छूट कर घर आते ही उस ने जो कहा था, कर दिखाया. उस ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली.

ब्रांडी मर गई, मगर उस की कहानी खत्म नहीं हुई. उस का अतीत वाकई चौंका देने वाला था. उस का असली नाम ब्रिटन था. बचपन से ही वह कुशाग्र बुद्धि थी.

हर कक्षा में अव्वल आने वाली ब्रिटन खेलकूद में भी आगे रहती थी. अखबारों में वह लेख भी लिखती थी. उस ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से जीव विज्ञान और समाज विज्ञान से डिग्री लेने के बाद इलाइट यूनिवर्सिटी से पीएचडी किया था. उस के नाम के साथ डाक्टर जैसा सम्मानित शब्द जुड़ गया तो उसे मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई. तब वह 30 साल की थी.

न जाने क्यों ब्रिटन ने 1999 में यूनिवर्सिटी की नौकरी से इस्तीफा दे दिया. सन 2002 में उस की मुलाकात इसामु तुबीयामी से हुई. यह मुलाकात इंटरनेट के माध्यम से हुई थी. जल्दी ही दोनों एकदूसरे को समझ गए तो प्यार की राह पर चल पड़े. प्यार गहराया तो दोनों ने शादी कर ली. लेकिन उन का दांपत्य सुखी नहीं रहा. इस की वजह यह थी कि इसामु जैसा दिखता था, वैसा था नहीं. वह हिंसक प्रवृत्ति का था.

एकांत के क्षणों में इसामु ब्रिटन को तरहतरह की यातनाएं दे कर अपनी विकृत यौन कुंठा को संतुष्ट करता था. यही नहीं, उसे मारतापीटता भी था. उस की इन्हीं हरकतों से तंग आ कर शादी के मात्र 6 महीने बाद ही ब्रिटन ने उस से तलाक ले लिया.

उस समय ब्रिटन के पास कोई नौकरी नहीं थी. आमदनी का कोई जरिया न होने की वजह से किसी की सलाह पर उस ने कालगर्ल का धंधा अपना लिया. पहले ही दिन एक ही ग्राहक से उसे इतनी कमाई हो गई कि वह उतना पूरे महीने बच्चों को पढ़ा कर नहीं कमा पाती थी.  ब्रिटन को अच्छी कमाई के साथ देह की संतुष्टि का यह पेशा इतना अच्छा लगा कि वह पूरी तरह से इस धंधे से जुड़ गई. उस ने अपने अलगअलग नाम रख लिए. कहीं वह ब्रांडी होती थी तो कहीं एलीक्स.

यही नहीं, वह जहां कालगर्ल रैकेट चलाने वाली एक कुख्यात मैडम रिंग से जुड़ी थी, वहीं उस ने अपनी वेबसाइट भी बना डाली. जिस का नाम रखा— एलीक्स 38डी. इस से उस का धंधा इतना चमका कि उस ने एक आलीशान कोठी खरीद ली. जरूरतमंद लड़कियों को सब्जबाग दिखा कर देह के धंधे से खूब दौलत बटोरने लगी. वह आम लोगों की ही नहीं, कई नामीगिरामी राजनैतिक हस्तियों की भी रातें रंगीन करती थी.

ब्रिटन उर्फ ब्रांडी भले ही गलत काम कर रही थी, लेकिन वह बेहद भावुक थी. यही वजह थी कि धंधे का खुलासा होने और पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर उस ने आत्मग्लानि के चलते आत्महत्या कर ली थी.   ब्रिटन द्वारा आत्महत्या करने पर उसी रैकेट की डी.सी. मैडम ने कहा था कि उस ने कायरतापूर्ण कदम उठाया है.  संयोग देखो, आगे चल कर डी.सी. मैडम को भी यही कदम उठाना पड़ा.

डी.सी. मैडम का पूरा नाम था डीबोराह जीन पालफ्रे. वह देह के धंधे की कुख्यात और मास्टरमाइंड खिलाड़ी थी. जवानी में डीबोराह ने अपनी खूबसूरत देह से अकूत दौलत कमाई थी. तब वह कई बार पकड़ी भी गई थी.

लेकिन जब जवानी ढल गई तो उस के ग्राहकों की संख्या एकदम से घट गई. इस के बाद उस ने ‘पामेला मार्टिन ऐंड एसोसिएट्स’ नाम की एक एस्कार्ट एजेंसी खोल ली. उस की इस एजेंसी में ऐसी तमाम जवान खूबसूरत लड़कियां थीं, जो मजबूरी की मारी थीं या फिर ऐश की जिंदगी जीने के लिए कुछ भी करने को तैयार थीं.

रैकेट में वह डी.सी. मैडम के नाम से प्रसिद्ध थी. उन्हीं लड़कियों की बदौलत उस ने अपनी पहुंच ऊपर तक बना ली थी. राजनैतिक गलियारों में भी उस के नाम की धमक थी. कई राजनीतिज्ञ अपनी रात रंगीन करने के लिए उस की सेवा लिया करते थे. वह उन के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी दिखाई देने लगी थी, जिस से उस का धंधा और चमक उठा था.

58 वर्षीया डी.सी. मैडम सालों तक देह का अपना यह धंधा इन्हीं पहुंच के दम पर चलाती रही. लेकिन जब भारी दबाव पड़ा तो 15 अप्रैल, 2008 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

उस की गिरफ्तारी के बाद पता चला कि 24 जुलाई, 2007 को उस ने वाशिंगटन पौलीटिकल ग्रुप के सीनेटर डेविड विट्टर के लिए अपने रैकेट की एक कालगर्ल भेजी थी, जबकि अदालत में सुनवाई के दौरान वह चीखचीख कर कह रही थी, ‘‘मुझ पर देह व्यापार का इलजाम लगाना गलत है. किसी ने दुश्मनी की वजह से मुझे फंसाया है.’’

लेकिन उस की यह आवाज सुबूतों के बोझ तले दब कर रह गई थी. उस पर यह भी आरोप था कि 15 अप्रैल, 2008 को उस ने एक मेल के जरिए अपने इस काले धंधे के काले धन को अवैध रूप से विदेशी बैंक में जमा कराया था. तब उस ने सफाई में कहा था कि अब तक वह शरम के मारे चुप थी, लेकिन अब खुल कर बोलेगी. वह उन राजनीतिज्ञों के नाम उजागर करेगी, जिन की उस ने रातें रंगीन कराई थीं.

उसी के जुबान खोलने पर सीनेटर विट्टर को अदालत में तलब किया गया था. उस ने विटनेस बौक्स में खड़े हो कर स्वीकार किया कि डी.सी. मैडम कालगर्ल रैकेट चलाती थी और उस ने उस के रैकेट की एक कालगर्ल के साथ एक रात बिताई थी.

इस के बाद डी.सी. मैडम कुछ बोल नहीं सकी, क्योंकि सुबूत सामने था. लेकिन इस के बावजूद भी वह यही कहती रही, ‘‘यह झूठ है. मैं ने कितने भी जुर्म किए हों, पर मैं जेल में कदम नहीं रखूंगी.’’

और वाकई उस ने जेल में कदम नहीं रखा. 1 मई, 2008 को वह अपनी 76 वर्षीया मां बलान्ये पालफ्रे से मिलने गई तो वहां से जिंदा नहीं लौटी. उस का परिवार टारपोन स्प्रिंग्स, फ्लोरिडा के जिस मोबाइल होम में रहता था, पुलिस को उस से उस का शव मिला था. उस ने नायलौन की रस्सी का फंदा गले में डाल कर आत्महत्या कर ली थी.

पहले प्रोफेसर ब्रिटन और अब डी.सी. मैडम द्वारा आत्महत्या कर लेने के बाद वाशिंगटन की राजनीतिक हस्तियों ने राहत की सांस ली. क्योंकि वे जिंदा रहतीं तो उन के नाम उजागर कर सकती थीं, जो अपनी रातें रंगीन करने के लिए उन की सहायता लिया करते थे. Crime Stories