Dehradun Crime: नादान उम्र की भूल

Dehradun Crime: नादान शालू की रवि राजपूत से दोस्ती हो गई, जिसे रवि प्यार समझ बैठा. परेशानी तब हुई, जब इस प्यार ने रवि को जुनूनी बना दिया. वह शालू को भगा कर अपनी दुनिया बसाना चाहता था. एक रात वह शालू को भगा ले जाने के इरादे से आया तो शालू ने इंकार कर दिया. दोनों की इस जिद में शालू की जान गई तो रवि अपराधी बन गया.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पौश कालोनी पाम सिटी में लोगों की एक से बढ़ कर एक कोठियां और फ्लैट्स हैं. इन्हीं कोठियों में से कोठी नंबर 91 के.के. अरोड़ा की है. खुशमिजाज शख्स के तौर पर पहचाने जाने वाले के. के. अरोड़ा पेशे से प्रौपर्टी डीलर थे. वह होटल कारोबार से भी जुड़े रहे हैं. हर शख्स चाहता है कि उस का परिवार खुश रहे, आर्थिक रूप से संपन्न अरोड़ा भी इस चाहत को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करते थे.

उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी के अलावा 2 बेटियां थीं, शालू व शालिनी और एक छोटा बेटा विशाल. शालू शहर के ही एक कालेज में इंटर की छात्रा थी. उस के दोनों भाईबहन भी पढ़ाई कर रहे थे. अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह परिवार बेहद खुशहाल था. किस की जिंदगी में खुशियों का सूरज कब रेशमी किरणें फैलाने लगे और कब शाम का रंग लाल हो कर दिल दहला जाए, कोई नहीं जानता. 21 जून, 2015 को विश्व योग दिवस मनाया जाना था. इसे ले कर शहर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाने थे. के. के. अरोड़ा को भी एक ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जाना था, जहां सामूहिक रूप से योगा किया जाना था. उस दिन वह भोर में करीब साढ़े 5 बजे जाग गए थे.

उन की कोठी चूंकि 2 मंजिला थी, लिहाजा सभी के सोने के लिए अलगअलग कमरे बने हुए थे. सुबहसुबह अरोड़ाजी कोठी की छत पर जा कर टहलने लगे. तब तक उन की पत्नी लक्ष्मी भी उठ कर बैडरूम से बाहर आ गई थीं. वह बड़ी बेटी शालू के कमरे की तरफ गईं. लेकिन वह अपने कमरे में नहीं थी. आमतौर पर हर रोज उस वक्त शालू सोती हुई मिला करती थी. बेटी को बिस्तर पर न पा कर लक्ष्मी थोड़ा चौंकीं. उन्हें नहीं पता था कि वह कहां चली गई थी. उन्होंने पति के पास पहुंच कर बताया कि शालू अपने कमरे में नहीं है.

अरोड़ा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘‘हो सकता है घूमने चली गई हो.’’

कालेज की छुट्टियां चल रही थीं. कभीकभी ऐसा भी होता था कि शालू मौर्निंग वाक पर निकल जाती थी. लक्ष्मी दूसरी बेटी शालिनी के पास गईं. तब तक वह जाग चुकी थी. उन्होंने उस से भी पूछा, ‘‘शालू कहीं नहीं दिख रही, तूने देखा है क्या उसे?’’ लेकिन शालिनी ने भी शालू को देखने की बात से इनकार किया.

वैसे तो यह मामूली सी बात थी. लेकिन बच्चे मातापिता की नजरों के सामने न हों या उन्हें बिना बताए कहीं चले जाएं तो चिंता हो ही जाती है. बेटियों के मामले में तो चिंता और बढ़ जाती है. लक्ष्मी को चिंता हुई तो वह ‘शालू शालू’ पुकारते हुए कोठी में दूसरी तरफ गईं. उसी वक्त अनायास उन की निगाह लौबी की ओर चली गई. वहां शालू खून के सैलाब में डूबी फर्श पर पड़ी थी. यह नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. उन्होंने आगे बढ़ कर ‘बेटीबेटी’ पुकारते हुए शालू को हिलायाडुलाया, उसे झिंझोड़कर देखा. लेकिन उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई.

बदहवास सी लक्ष्मी चिल्लाते हुए पति की तरफ दौड़ीं. वह भी दौड़ कर आए. बेटी को इस दशा में देख कर वह भी जड़वत रह गए. शालू का शव खून से लथपथ पड़ा हुआ था. इस खौफनाक मंजर ने लक्ष्मी की रुलाई को हृदयविदारक चीखों में तब्दील कर दिया. आसपड़ोस के लोगों ने चीखने और रोने की आवाज सुनी तो वे घरों से बाहर निकल आए. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो पहले से ही मौर्निंग वाक के लिए सड़क पर टहल रहे थे. वे भी अंदर आ गए. रक्तरंजित नजारा देख कर उन के कलेजे कांप गए. निस्संदेह किसी ने शालू की हत्या कर दी थी.

आननफानन में 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया गया. करीब 20 मिनट में एक गश्ती पीसीआर मौके पर पहुंच गई. यह इलाका थाना पटेलनगर में आता था. थानाप्रभारी पंकज गैरोला, वरिष्ठ उप निरीक्षक नत्थीलाल उनियाल तथा अन्य पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. घटना सनसनीखेज थी, सूचना मिलते ही एसएसपी पुष्पक ज्योति और एसपी सिटी अजय कुमार वगैरह भी वहां आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. 17 वर्षीया शालू 3 फुट की लौबी में पड़ी थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. उस का सिर फटा हुआ था और आसपास खून फैल कर जम गया था.

मौके पर काले व सफेद रंग का एक मर्दाना गमछा पड़ा था. संभवत वह कातिल का था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. एसएसपी के निर्देश पर क्राइम ब्रांच की फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुलाया गया. जांच में मदद के उद्देश्य से ट्रेनर पुलिसकर्मी ने प्रशिक्षित कुत्ते को घटनास्थल और लाश को सुंघा कर छोड़ दिया. वह छत व सीढि़यां उतर कर नीचे गया और टहल कर वापस आ गया. जाहिर है इस से कोई स्पष्ट अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.

क्राइम ब्रांच की टीम ने भी अपने हिसाब से घटनास्थल की जांच की. पुलिस ने परिजनों से भी औपचारिक पूछताछ की. मृतका के बहन और भाई गमगीन होने की वजह से बात करने की स्थिति में नहीं थे. सब से चौंकाने वाली बात यह थी कि शालू की हत्या का सैटरडे नाइट में परिवार के किसी सदस्य को पता तक नहीं लग सका था. किसी ने उस के चीखने की आवाज भी नहीं सुनी थी. यह बात थोड़ी अजीब लगने वाली थी. वैसे भी घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था.

शुरुआती जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं. एक तो यह कि सिर पर किसी चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला सीधेसीधे हत्या का था, न कि लूटपाट में हुई हत्या का. क्योंकि घर से कोई चीज गायब नहीं थी. तीसरा यह कि वारदात में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ था, जो घर की भौगोलिक स्थिति से भी परिचित था. यह भी संभव: हो सकता था कि बदमाश लूटपाट के इरादे से कोठी में घुसे हों और इसी बीच शालू लौबी में गई हो और उन्होंने उस की हत्या कर दी हो. इस के बाद वे बिना लूटपाट किए ही भाग गए हों. यह केवल अनुमान भर था.

प्राथमिक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने के. के. अरोड़ा की तहरीर पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ पटेलनगर थाने में भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. साथ ही शालू के शव को पोस्टमार्टम के लिए दून अस्पताल भिजवा दिया. इस केस की विवेचना एसएसआई नत्थीलाल उनियाल के सुपुर्द की गई. घटना का पता चलने पर डीआईजी संजय गुंज्याल के निर्देश पर एसएसपी पुष्पक ज्योति ने केस की जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में थाना पुलिस के अलावा सहसपुर थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट, प्रेमनगर थानाप्रभारी रवि कुमार सैनी, एसआई मनोज नैनवाल, नरोत्तम सिंह, विक्रम सिंह, कांस्टेबल अनिल, संदीप, सहदेव त्यागी, हितेश कुमार व आशीष राठी के अलावा क्राइम ब्रांच को शामिल किया गया.

पोस्टमार्टम के बाद शालू का शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया गया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने रिपोर्ट में बताया कि शालू की मृत्यु सिर पर हुए प्रहार के कारण अत्यधिक रक्तप्रवाह की वजह से हुई थी. उस के सिर की हड्डी भी टूटी पाई गई थी. पुलिस ने पड़ताल शुरू की. सुरक्षा के लिहाज से कालोनी के एंट्री गेट पर रात में एक सिक्योरिटी गार्ड रहता था. उस के मुताबिक घटना वाली रात 12 बजे के बाद कालोनी में किसी का आवागमन नहीं हुआ था. हालांकि कालोनी के कुछ घरों में सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे, परंतु उन के फोकस का दायरा सीमित था. कातिल बाहर से नहीं आया था तो शालू की हत्या किस ने की, यह अहम सवाल था.

पुलिस ने शालू के घर वालों से पुन: पूछताछ की तो उन्होंने रवि राजपूत नामक युवक पर अपना संदेह जताया. मृतका की बहन ने पुलिस को बताया कि नजदीक के एक फ्लैट में रहने वाला लड़का रवि राजपूत शालू को परेशान किया करता था. उस ने यह भी बताया कि मौकाएवारदात पर जो मर्दाना गमछा पाया गया है, उसे उस ने रवि के गले में कई बार देखा था. पुलिस ने रवि को शक के दायरे में रख कर जांच आगे बढ़ाई. पुलिस वहां पहुंची, जिस फ्लैट में रवि रहता था. पता चला कि रवि मूलरूप से हरियाणा के जिला करनाल के रहने वाले रूप सिंह का बेटा था. वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर चुका था.

उस फ्लैट में वह अपने ममेरे भाई ऋषिपाल के पास कभीकभी आ कर ठहरता था. ऋषिपाल मूलरूप से सहारनपुर के बड़गांव का रहने वाला था और प्रौपर्टी का काम करता था. उस वक्त वह भी लापता था. पुलिस ने शालू का मोबाइल हासिल किया तो उस में लौक लगा था. एक्सपर्ट से उस का लौक खुलवाया गया. उस में लेट नाइट की एक आखिरी काल थी. जांच में वह नंबर रवि का निकला. पुलिस ने शालू व रवि के नंबरों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. उन से साबित हुआ कि घटना वाली रात उस की न सिर्फ शालू से बातें हुई थीं, बल्कि आधी रात के बाद रवि की लोकेशन भी पाम सिटी में ही थी.

रवि पूरी तरह शक के दायरे में आ गया था. पुलिस टीम ने उस की सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने लोकेशन के आधार पर उसे उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह देहरादून से भागने की कोशिश कर रहा था. उस के साथ सुनील राणा व उस का दोस्त प्रताप सिंह भी थे. पुलिस तीनों को थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया तो एक चौंकाने वाली कहानी पता चली. रवि बचपन से ही जिद्दी और दबंग स्वभाव का युवक था. बुरे लड़कों की संगत में रह कर वह कालेज के लड़ाईझगड़ों में पड़ने लगा था. परिजनों ने उसे डांटाफटकारा, समझाया, लेकिन वह नहीं समझा. उस ने जैसेतैसे इंटरमीडिएट तो पास कर लिया, लेकिन इस से आगे वह न पढ़ा.

बेटा सुधर जाए इस उम्मीद में पिता ने 2015 में उसे देहरादून की पाम सिटी में रह रहे ऋषिपाल के पास भेज दिया था. उन्हें लगता था कि वह उस के साथ रह कर कोई काम करेगा तो सुधर जाएगा. रवि देहरादून आया तो उसे और भी आजादी मिल गई. वह शराब भी पीने लगा. उस के हावभाव से ले कर बातों में दबंगई होती थी. अपनी दबंगई के लिए वह अपने पास एक तमंचा भी रखता था. देहरादून में भी उस ने अपने कई दोस्त बना लिए थे. यहीं पर एक दिन राह से गुजरते हुए रवि की नजरें शालू से चार हो गईं. पहली ही नजर में शालू उस के दिल में उतर गई.

रवि उन युवाओं में से था, जो उम्र से पहले ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. वह चालाक किस्म का युवक था. एक दिन उस ने बहाने से शालू से बातचीत की और उस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. बड़े शहरों में लड़केलड़कियों के बीच यह कोई बड़ी बात नहीं होती. शालू ने भी बिना सोचेसमझे उस की दोस्ती स्वीकार कर ली. शालू ने अपनी छोटी बहन शालिनी को भी यह बात बता दी थी. कई बार की बातों और सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए दोनों एकदूसरे के संपर्क में बने रहे. शालू उस के मैसेज का जवाब दे देती थी. इस से उस के हौसले बढ़ गए. शालू खूबसूरत लड़की थी. रवि उसे अपना बनाने का सपना देखने लगा. उस ने एक दिन अपने प्यार का इजहार भी कर दिया, लेकिन शालू ने इनकार कर दिया.

रवि को लगा कि उस का इनकार सिर्फ दिखावा है, अंदर से शालू भी उस से प्यार करती है. दोनों की मेलमुलाकातें हुईं तो शालू के रिश्ते के एक भाई आशीष ने उन्हें देख लिया. उस ने शालू को डांटा, क्योंकि वह रवि की आवारगी जानता था. इस के बाद उन का मिलनाजुलना कम हो गया. दूसरी तरफ रवि शालू को पाने के सपने देखने लगा था. शालू जब उस से बात नहीं करती तो वह रास्ते में उसे रोकने की कोशिश कर के उसे परेशान करता. शालिनी इन बातों को जानती थी. फोन पर वह न केवल शालू के संपर्क में रहने लगा, बल्कि उसे मैसेज भी भेजा करता था. रवि के सिर पर प्यार का भूत सवार था. शालू ने उस के एकतरफा प्यार को जब ज्यादा तवज्जो नहीं दी तो उस ने अपनी एक फोटो इंटरनेट के जरिए उसे भेज दी.

उस फोटो में वह फांसी का फंदा हाथ में लिए नजर आ रहा था. उस ने लिखा था, ‘यदि तुम मुझ से प्यार नहीं करोगी तो मैं अपनी जान दे दूंगा.’ यह देख कर शालू उलझन में पड़ गई. वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से कोई मर जाए, तभी रवि का फोन आ गया. वह बोला, ‘‘अब बोलो, तुम मुझ से प्यार करती हो ना?’’

‘‘देखो, मैं कुछ नहीं कहना चाहती. तुम्हें जो समझना है समझो और हां प्लीज ऐसी कोई हरकत आगे से मत करना.’’

रवि ने उस की इन बातों को इकरार समझ लिया. उसे लगा कि शालू को उस की फिक्र है, इसलिए वह उसे मरने नहीं देना चाहती. इस के बाद वह उस के खयालों में ही खोया रहने लगा. अंजाम से बेखबर शालू उस के जुनून को समझ नहीं पाई. उस ने यह बातें अपने मातापिता को भी नहीं बताईं. यह उस की नादान उम्र का तकाजा था. अलबत्ता शालू ने रवि के फोटो भेजने वाली बात अपनी बहन शालिनी को जरूर बता दी थी. रवि को ले कर कोई बदनामी न हो, इसलिए शालू ने उस से थोड़ी दूरी बनाने की सोची. वह उस से कम बातें करने लगी. इस से रवि को लगा कि शायद वह अपने परिवार की वजह से ऐसा करती है.

उस के दिमाग में सुबहशाम, दिनरात शालू की ही छवि घूमती रहती थी. उसे देखे बिना उसे सुकून नहीं आता था. शालू से दोस्ती के किस्से उस ने अपने दोस्तों को भी सुना रखे थे. इसी बीच वह करनाल चला गया. वहां जाने के बाद उसे दूरियां बरदाश्त नहीं हुईं. शालू भले ही उसे तवज्जो नहीं देती थी, लेकिन अपनी तरफ से वह उसे बहुत प्यार करता था. शालू ने सोचा कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा और रवि उसे अपने दिमाग से निकाल कर अपने काम पर ध्यान देगा. उधर रवि के सिर पर शालू को पाने की जिद सवार हो गई थी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अब वह शालू को अपनी बना कर ही दम लेगा. इस के लिए रवि ने उसे भगाने की योजना बनाई.

उस ने सोचा कि शालू परिवार की मजबूरियों में कैद है, इसलिए वह उस से ज्यादा बात नहीं कर पाती. वह उस के सामने प्रस्ताव रखेगा तो वह उस के साथ खुशीखुशी चल देगी. उस ने यह बात अपने दोस्त सुनील व प्रताप को बताई कि वह एक लड़की से प्यार करता है और उसे भगा कर शादी करना चाहता है. रवि ने उन्हें बताया कि वह उसे हर सूरत में हासिल करना चाहता है. रवि की चाहत देख कर वे दोनों उस की मदद करने को तैयार हो गए. 19 जून की शाम रवि सुनील व प्रताप के साथ शालू को भगा ले जाने के इरादे से देहरादून आया. तीनों जीएसएम रोड स्थित एक होटल में रुके.

रवि अपने साथ एक तमंचा भी लाया था. उस ने सोचा था कि अगर शालू के घर वाले किसी वजह से रोकने की कोशिश करेंगे तो वह उन्हें डराधमका कर रोक देगा. अगली रात उस ने शालू को फोन कर के कहा, ‘‘शालू मुझे तुम से मिलना है.’’

‘‘अब रात में?’’ शालू चौंकी.

‘‘हां, मेरे पास वक्त कम है और तुम से नहीं मिला तो सच में मैं मर जाऊंगा. मुझे तुम से जरूरी बात करनी है.’’

‘‘क्या बात है? मोबाइल पर ही बता दो.’’

‘‘नहीं, मिल कर ही बताऊंगा और तुम्हें मेरी बात माननी होगी.’’

‘‘मानने वाली होगी तो ही मानूंगी ना, फिर ऐसी कौन सी बात है?’’

‘‘पहले मुझे आने दो.’’

‘‘तुम जानते हो यह गलत है और कोई गड़बड़ भी हो सकती है.’’

‘‘कुछ नहीं होगा मैं लेट नाइट आ जाऊंगा.’’ रवि ने कहा तो शालू सोच में डूब गई. वैसे भी उसे रवि की दोस्ती परेशान करने लगी थी और वह उस से पीछा छुड़ाने के बारे में सोच रही थी. वह रवि पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने इजाजत भी दे दी, ‘‘ठीक है, तुम आ जाना, मैं पिछला दरवाजा खोल दूंगी.’’

कोठी के पीछे की तरफ से भी एक छोटा खिड़कीनुमा दरवाजा था. इस भौगोलिक स्थिति को रवि जानता था. यह बात उसे शालू ही बता चुकी थी. रवि करीब एक बजे सुनील व प्रताप के साथ होटल से निकला. ये लोग पैदल चल कर कारगी चौक की ओर गए. उधर से ही पाम सिटी का रास्ता था. कालोनी में जाने के लिए उस ने मुख्य गेट नहीं चुना. वह जानता था कि शालू के भागने के बाद हंगामा मचेगा तो वह पकड़ा जा सकता है.

पाम सिटी कालोनी की चारदीवारी थी. उस के बाहर खेत व जंगल था. खेतों के रास्ते वे लोग दीवार फांद कर कालोनी में दाखिल हो गए. करीब डेढ़ बजे कोठी के पीछे पहुंच कर रवि ने शालू को फोन किया. उस ने चुपके से दरवाजा खोल दिया. तीनों अंदर आ गए. सुनील व प्रताप लौबी में ही खड़े रहे, जबकि शालू के साथ रवि ड्राइंगरूम में पहुंच गया. शालू ने उस से पूछा, ‘‘बोलो क्या बात है?’’

‘‘शालू मैं तुम्हें ले जाने के लिए आया हूं.’’

‘‘मतलब?’’ उस की बात सुन कर शालू चौंकी.

‘‘तुम्हें यहां से आजाद करा कर मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

सुन कर शालू के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे नहीं पता था कि रवि इतने बड़े ख्वाब देख चुका है.

‘‘पागल हो गए हो तुम?’’ शालू ने गुस्से में कहा.

‘‘तुम चाहे जो समझो, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा. तुम डरती किस से हो, मैं सब को देख लूंगा.’’ कहते हुए उस ने तैश में आ कर तमंचा निकाल कर शालू को दिखाया. लेकिन शालू ने उस के साथ जाने से इनकार कर दिया.

इस के बावजूद वह करीब एक घंटा उसे समझाता रहा. शालू नानुकूर करती रही. रवि जबरन प्यार हासिल करना चाहता था. उस ने मन ही मन सोच लिया कि या तो वह शालू को साथ ले जाएगा या हमेशा के लिए उस का किस्सा खत्म कर देगा. शालू समझ गई कि यह बिगड़ैल किस्म का युवक है, इसलिए उस से पीछा छुड़ाना ही बेहतर है. बात करतेकरते दोनों लौबी में आ गए. शालू ने उसे चले जाने को कहा.

रवि को अपनी योजना फेल होती नजर आई तो उस ने निर्णायक अंदाज में पूछा, ‘‘शालू आखिरी बार पूछ रहा हूं, तुम मेरे साथ चलोगी या नहीं?’’

शालू ने साफ इनकार कर दिया, ‘‘बिलकुल नहीं, तुम पागल हो गए हो.’’

‘‘मैं तुम्हें उठा कर ले जाऊंगा, फिर देखता हूं तुम्हारी मरजी कैसे चलेगी.’’ उस ने कहा तो शालू ने उसे चेतावनी भरे लहजे में जवाब दिया. ‘‘ऐसी गलती मत करना रवि, मैं शोर मचा कर तुम सब को अभी पकड़वा दूंगी समझे. अब तुम चुपचाप यहां से चले जाओ.’’

अपनी जिद पूरी न होते देख रवि गुस्से में आ गया. उस ने शालू को हाथ पकड़ कर खींचना चाहा तो शालू ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया. इस से वह आगबबूला हो गया. तब तक उस के साथी भी आ गए थे. रवि ने तमंचा निकाल कर उस की बट से शालू के सिर पर वार कर दिया. वार तेज था. खून बहा तो मामूली चीख के साथ वह सिर थाम कर नीचे बैठ गई. उस ने चिल्लाने की कोशिश की तो रवि ने उस का मुंह दबा दिया और नीचे गिरा दिया. फिर उस का सिर पकड़ कर फर्श में दे मारा. उस के साथियों ने शालू के हाथपैर पकड़ लिए. रवि तब तक उस का सिर पटकता रहा, जब तक कि उस की मौत नहीं हो गई. इस से उस का सिर बुरी तरह फट गया और आसपास खून फैल गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने रवि की निशानदेही पर तमंचा बरामद कर लिया. उस के साथियों का कहना था कि उन्हें नहीं पता था कि रवि इस तरह हत्या कर देगा. वह तो शालू को भगाने में उस का सहयोग करने के लिए उस के साथ चले आए थे. अगले दिन पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

शालू नादान उम्र में रवि जैसे सिरफिरे की दोस्ती में न पड़ी होती और उस की हरकतों के बारे में अपने पिता को बता दिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. रवि ने भी अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से प्यार के जुनून में खून से हाथ रंग कर अपना भविष्य खराब कर लिया. कथा लिखे जाने तक रवि व उस के साथियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर रही थी. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Dehradun Crime: मंगेतर की खातिर

Dehradun Crime: नीरज अपने जिगरी दोस्त राजेश की मंगेतर निशा को चाहने लगा था. राजेश के मना करने के बावजूद भी नीरज नहीं माना तो राजेश को अपने हाथ दोस्त के खून से रंगने ही पड़े.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की एक कालौनी है अंसल ग्रीन विहार. इसी कालोनी की एक कोठी में 6 सितंबर, 2015 की सुबह अफरातफरी मच गई. इस कोठी में किसी ने एक युवक की हत्या कर दी थी. वह कोठी दुबई गए हुए एक परिवार की थी, जिसे ज्ञानेंद्र वर्मा नाम के एक शख्स ने 2 सितंबर को ही किराए पर लिया था. ज्ञानेंद्र इस कोठी में एक पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट शुरू करने वाले थे. इस की तैयारी के लिए वहां फरनीचर आदि का काम चल रहा था.

हत्या की बात घर में काम करने वाली बाई मन्नू के आने के बाद पता चली थी. 6 सितंबर को सुबह के समय बाई मन्नू जब काम करने के लिए आई तो उसे कोठी का मेन गेट रोजाना की तरह बंद मिला. गेट खुलवाने के लिए मन्नू ने ज्ञानेंद्र की पत्नी स्वरांजलि वर्मा के मोबाइल पर फोन किया. स्वरांजलि पति के साथ पहली मंजिल पर सो रही थीं. फोन की घंटी की आवाज ने उन की नींद तोड़ दी. उन्होंने फोन की स्क्रीन पर मन्नू का नंबर देखा तो समझ गईं कि वह गेट पर आ गई है. गेट की चाबी ग्राउंड फ्लोर पर सो रहे नीरज के पास थी.

स्वरांजलि ने ऊपर से ही नीरज को गेट खोलने के लिए आवाज दी. कई बार आवाज लगाने के बाद भी नीरज के कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो वह खुद नीचे आईं और नीरज के कमरे का दरवाजा खटखटा कर आवाज देने लगीं. लेकिन इस के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला तो वह बुदबुदाने लगीं, ‘‘पता नहीं ऐसे घोड़े बेच कर क्यों सो रहा है.’’

उस कमरे का एक दरवाजा पीछे की तरफ भी था. वह खुला हुआ था. स्वरांजलि पिछले दरवाजे से कमरे में गईं तो देखा कि नीरज आैंधे मुंह कमरे के फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था. यह देख कर स्वरांजलि घबरा गईं. वह तेज कदमों से पति के पास पहुंचीं और उन्हें नींद से जगा कर बात बताई. पत्नी की बात सुन कर उन की नींद उड़ गई थी. वह पत्नी के साथ नीचे आए और उन्होंने भी उस के कमरे में झांका तो वास्तव में नीरज लहूलुहान फर्श पर पड़ा था. ज्ञानेंद्र वर्मा ने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दी.

इस के बाद ज्ञानेंद्र वर्मा व उन की पत्नी ने कालोनी में शोर मचा दिया. शोर सुन कर कुछ ही देर में कालोनी के तमाम लोग उस कोठी के पास जमा हो गए. यह कालोनी थाना राजपुर क्षेत्र में आती थी. इसलिए सुबहसुबह हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने कमरे में जा कर देखा तो वहां एक युवक की लाश खून से लथपथ फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. ज्ञानेंद्र वर्मा ने उस का नाम नीरज बताया. पूरे कमरे में खून ही खून था. सामने दीवार पर खून से लिखा था, ‘मेरी बहन से रेप किया है.’ इस के अलावा वहां पर तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, घर में इस्तेमाल होने वाले 2 चाकू पड़े थे.

देख कर लग रहा था कि इन्हीं सब चीजों से उस की हत्या की गई थी. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी पुष्पक ज्योति को दी तो वह भी नगर पुलिस अधीक्षक अजय सिंह को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया गया. खोजी कुत्ता लाश को सूंघने के बाद कोठी की बाउंड्री वाल के पास गया और भौंकने लगा. कुत्ते से हत्यारे के बारे में कोई क्लू नहीं मिला. लाश को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस की हत्या काफी खुन्नस में की थी. उस के गले पर, चेहरे, हाथ, छाती, पेट, सिर आदि पर 20 के करीब घाव थे. वहां पर जो चाकू पड़े थे, वे भी मुड़ गए थे. तवा और प्रेशर कुकर के ढक्कन पर भी खून के निशान थे.

तवे का हत्था टूटा हुआ था. लग रहा था कि हत्यारा कोई ऐसा आदमी रहा होगा, जो नीरज को अच्छी तरह जानता होगा. कोठी का गेट अंदर से बंद था तो हत्यारा कोठी से बाहर कैसे गया? यह जानने के लिए पुलिस ने कोठी का निरीक्षण किया तो कोठी की जो बाहरी दीवार थी, उस पर खून से सने पैरों के धब्बे दिखे, साथ ही दीवार के पास मृतक नीरज का आधार कार्ड मिला. लग रहा था कि हत्यारा शायद दीवार फांद कर गया होगा. क्योंकि खोजी कुत्ता भी वहीं जा कर भौंक रहा था.

घटनास्थल से सारे सबूत इकट्ठे करने के बाद पुलिस ने उस कोठी में किराए पर रह रहे ज्ञानेंद्र वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि उन का सरस्वती पौलिटैक्निक के नाम से एक शिक्षण संस्थान है. वह अब उस संस्थान को इस कोठी में शिफ्ट करने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि मृतक नीरज ने उन के यहां से ही इलैक्ट्रिकल का 3 साल का डिप्लोमा किया था. वह मुरादाबाद के लाइनपार क्षेत्र में प्रकाश नगर का था. नीरज एक अच्छा छात्र था, इसलिए उस से उन के पारिवारिक संबंध हो गए थे. अपने डिप्लोमा का प्रमाण पत्र लेने व काम की तलाश में वह 3 सितंबर को यहां आया था. यहां सामान आदि शिफ्ट कराने में भी नीरज ने काफी सहयोग किया था.

इसी बीच 4 सितंबर शुक्रवार को उन के ससुर की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. उन्हें कैंसर की शिकायत थी, तब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. उन्हें देखने के लिए वह पत्नी स्वरांजलि के साथ दिल्ली चले गए थे. 5 सितंबर शनिवार को नीरज ने उन्हें वाट्सएप से बताया कि उस के मामा का लड़का उस के पास आया हुआ है. एक रात रुक कर वह अगले दिन चला जाएगा. इस पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की. 5-6 सितंबर की रात एक, डेढ़ बजे मैं पत्नी के साथ दिल्ली से यहां लौट आए. कोठी का दरवाजा नीरज ने ही खोला था. थकान की वजह से पत्नी जल्द ही ऊपर के कमरे में सोने चली गईं.

उन्होंने अपने लिए खिचड़ी बनाई. खिचड़ी खा कर वह भी सोने के लिए कमरे में चले गए. मेन गेट की चाबी नीरज के पास ही थी. इसलिए सुबह के काम वाली बाई के आने के बाद गेट खोलने की जरूरत पड़ी तो पता चला कि नीरज कमरे में इस हालत में पड़ा है. ज्ञानेंद्र वर्मा से बात करने के बाद पुलिस ने नीरज की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और नीरज के घर वालों को खबर भेज कर देहरादून आने को कहा.

एसएसपी सुनयना ज्योति ने एसपी सिटी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी पंकज पोखरियालव अन्य तेजतर्रार पुलिसकर्मियों के अलावा साइबर सेल के इंचार्ज को भी शामिल किया. पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक नीरज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. दूसरा नीरज के यहां उस के मामा का जो लड़का आया था, उस पर भी शक हुआ. क्योंकि वारदात के बाद से वह गायब था. दीवार पर खून से जो मजमून लिखा था, उस से यही लग रहा था किसी लड़की के चक्कर में नीरज की हत्या की गई थी.

पुलिस ने नीरज के मामा के लड़के के बारे में जानकारी निकलवाई तो पता चला कि वह देहरादून आया ही नहीं था. फिर जो लड़का नीरज के पास आया था, वह कौन था? पुलिस यह जानने में जुट गई. सर्विलांस टीम ने नीरज की काल डिटेल्स की जांच की तो पता चला कि 3 सितंबर के बाद नीरज की एक नंबर पर 13 बार बात हुई थी. वह नंबर था राजेश सैनी का, जो मुरादाबाद के प्रकाशनगर का रहने वाला था और एक खास बात कि घटना के समय उस की लोकेशन भी राजपुर, देहरादून में ही थी. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो राजेश सैनी ने ही काल रिसीव की. उस ने बताया कि इस समय वह उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में है. पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ.

लिहाजा एसएसपी ने एक पुलिस टीम मुरादाबाद भेज दी. देहरादून पुलिस मुरादाबाद के मझोला थाने की पुलिस की मदद से 7 सितंबर को राजेश सैनी के घर प्रकाश नगर पहुंच गई. पुलिस को राजेश सैनी अपने घर की छत पर सोता मिल गया. जबकि वह खुद को हल्द्वानी में होने की बात बता रहा था. पुलिस ने उस से नीरज की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह इस तरह से चौंका, जैसे उसे कुछ पता ही न हो. थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल ने पूछा, ‘‘तुम तो कह रहे थे कि हल्द्वानी में हूं और निकले मुरादाबाद में. तुम यह झूठ क्यों बोले?’’

‘‘सर, मैं ने झूठ नहीं बोला. मैं पिछले 4-5 दिनों से हल्द्वानी में ही था. आज सुबह ही वहां से घर लौटा हूं.’’ राजेश ने सफाई दी.

‘‘इस दौरान तुम्हारी नीरज से फोन पर कोई बात हुई थी या नहीं?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘नहीं सर, मेरी उस से कोई बात नहीं हुई. दरअसल हल्द्वानी जा कर मैं काम में इतना व्यस्त हो गया कि उस से बात नहीं कर पाया.’’ राजेश ने जवाब दिया.

राजेश का जवाब सुन कर थानाप्रभारी समझ गए कि यह सरासर झूठ बोल रहा है, क्योंकि 5-6 सितंबर को उस के फोन की लोकेशन देहरादून में थी और उस ने अपने फोन से नीरज से कई बार बात भी की थी. इस के अलावा भी उस की नीरज से 13 बार बात हुई थी. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने राजेश से सख्ती  से पूछताछ की तो राजेश को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही देहरादून जा कर अपने खास दोस्त नीरज की हत्या की थी.

हत्यारा पुलिस के चंगुल में आ चुका था. उसे ले कर थानाप्रभारी देहरादून लौट आए. थाने में पूछताछ के दौरान राजेश ने अपने जिगरी दोस्त की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली. नीरज सैनी उत्तर प्रदेश के महानगर मुराराबाद के लाइनपार के मोहल्ला प्रकाशनगर की गली नंबर 3 का रहने वाला था. उस के पिता भूरा सिंह सैनी भारतीय खाद्य निगम में नौकरी करते हैं. भूरा सिंह के परिवार में पत्नी राजो के अलावा 4 बेटे थे, जिन में नीरज सैनी सब से छोटा था. नीरज ने देहरादून से सरस्वती पौलिटैक्निक से वर्ष 2013 में इलैक्ट्रिकल ट्रेड में डिप्लोमा किया था. यह पौलिटैक्निक ज्ञानेंद्र वर्मा चलाते थे.

नीरज मेहनती और अच्छे व्यवहार वाला था. इसलिए ज्ञानेंद्र वर्मा उस से बहुत प्रभावित थे. वह उसे अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे. बाद में ज्ञानेंद्र वर्मा का भी नीरज के घर आनाजाना हो गया था. नीरज भी जब कभी देहरादून आता तो उन के यहां ही रुकता था. नीरज की गली से एक गली पहले राजेश सैनी रहता था. एक ही मोहल्ले में रहने की वजह से राजेश और नीरज के बीच दोस्ती हो गई थी. और दोस्ती भी ऐसीवैसी नहीं, दांत काटी थी. दोनों का ही एकदूसरे के घर भी आनाजाना था. दोनों ही दोस्त अपने दिल की बातें एकदूसरे से शेयर करते थे.

करीब 6 महीने पहले राजेश के भाई रमेश की शादी नैनीताल में हुई थी. उसी दौरान वहीं निशा नाम की लड़की से राजेश का रिश्ता तय हो गया. उस शादी में नीरज भी गया था. निशा बेहद खूबसूरत थी. नीरज उसे मन ही मन चाहने लगा था. एक दिन उस ने राजेश को विश्वास में ले कर उस की मंगेतर निशा का फोन नंबर ले लिया. इस के बाद नीरज ने निशा से नजदीकी बढ़ाने के लिए संदीप राणा के नाम से फोन किया. उस ने यह भी बता दिया कि वह राजेश का दोस्त है. अपने होने वाले पति का जानकार होने की वजह से निशा उस से बातें कर लेती थी. फिर नीरज ने उसे मैसेज भी भेजने शुरू कर दिए. निशा को जो मैसेज भेजे जा रहे थे, उन का आशय वह समझ रही थी.

फिर एक दिन निशा ने यह बात राजेश को बताई कि संदीप राणा नाम का तुम्हारा कोई दोस्त उसे उल्टेसीधे मैसेज भेजता है. राजेश संदीप राणा नाम के किसी शख्स को जानता तक नहीं था. उस ने अपनी मंगेतर से संदीप राणा का फोन नंबर मांगा तो उस ने वह नंबर राजेश को दे दिया. नंबर देख कर राजेश चौंका, क्योंकि वह नंबर किसी और का नहीं, उस के जिगरी दोस्त नीरज का था. राजेश ने नीरज से शिकायत की तो उस ने झूठ बोलते हुए कहा कि उस ने मजे लेने के लिए निशा को फोन किए थे. इतना ही नहीं, उस ने राजेश से इस की माफी भी मांग ली. राजेश ने भी उसे माफ कर दिया.

इस के बाद नीरज ने निशा को फोन किया और शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘निशाजी, राजेश मेरा बचपन का दोस्त है. आप ने मेरे बारे में उसे बता कर अच्छा नहीं किया. आप ने मेरी बचपन की दोस्ती में दरार डाल दी. आप को पता है कि वह अब मुझ से नाराज है और बोल तक नहीं रहा. जब आप ने बात बता ही दी है तो मैं भी अपने बारे में बताना चाहता हूं कि मैं एक डिप्लोमा इंजीनियर हूं. मैं ने देहरादून से डिप्लोमा किया है. कुछ ही दिनों में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी, जबकि जिस राजेश के साथ तुम्हारी शादी तय हुई है, वह कुछ भी नहीं करता है.

‘‘देखो निशा, मैं आप को इसलिए फोन करता हूं कि आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो. आप मेरी अच्छी दोस्त हैं और फोन करना बंद मत करना.’’ नीरज ने इस तरह की लच्छेदार बातें कर के निशा को काफी प्रभावित कर लिया.

इस के बाद वह फिर से निशा को मैसेज भेजने और फोन कर के बातें करने लगा. निशा को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. निशा की नीरज से जो भी बातें होती थीं, वह उस ने अपने तक ही सीमित रखीं. उस ने राजेश को कुछ नहीं बताया, लेकिन राजेश को किसी तरह पता चल गया कि नीरज अब भी उस की मंगेतर से बातें करता है. तब उस ने निशा का सिम बदलवा दिया. लेकिन निशा ने अपना नया नंबर नीरज को दे दिया. यानी इन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहा. एक बार देर रात को राजेश ने मंगेतर निशा से बात करने के लिए उस का नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. उसी समय उस ने नीरज का नंबर मिलाया तो उस का नंबर भी व्यस्त मिला.

करीब आधेपौना घंटा तक दोनों के फोन व्यस्त रहने पर राजेश को शक हो गया कि वही दोनों आपस में बतिया रहे होंगे. इस से राजेश को विश्वास हो गया कि नीरज ने उस की मंगेतर का पीछा नहीं छोड़ा है. इसी बात को ले कर उस का नीरज से झगड़ा भी हो गया. यह बात घटना से 3-4 महीने पहले की है. इस बात को ले कर दोनों के बीच दरार पैदा हो गई थी. अब राजेश नीरज से रंजिश रखने लगा था. वह काफी परेशान था कि नीरज उस की बात क्यों नहीं मान रहा है. कुछ दिनों बाद नीरज ने राजेश को फिर से मना लिया.

घटना के करीब 10 दिन पहले राजेश ने नीरज से उस का मोबाइल फोन मांगते हुए कहा कि यार मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है. तेरे पास 2 मोबाइल हैं. मैं बाहर जा रहा हूं. 3-4 दिनों बाद वापस आऊंगा, तब तक के लिए मुझे अपना एक मोबाइल दे दे. दोस्ती की खातिर नीरज ने अपना एक मोबाइल राजेश को दे दिया. लेकिन नीरज ने उस में से अपना सिम निकाल कर कहा, ‘‘तुम इस में दूसरा सिम डाल लेना.’’

राजेश बोला, ‘‘यार, तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता. 3-4 दिनों की तो बात है. क्या फर्क पड़ता है.’’

‘‘यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि इस में मेरे फोन आएंगे.’’ नीरज बोला, ‘‘तुम नया सिम डाल लेना.’’

राजेश ने उस की एक न सुनी और जबरदस्ती उस का फोन सिम सहित ले गया.

नीरज के मना करने के बाद भी राजेश नीरज का सिमकार्ड सहित मोबाइल ले कर चला गया. राजेश ने सब से पहले नीरज के फोन की काल डिटेल्स और मेल बौक्स चैक किया. मैसेज बौक्स में उसे तमाम मैसेज मिले, जो निशा और नीरज ने एकदूसरे को भेजे थे. इस के अलावा काल डिटेल्स से यह भी पता लग गया कि उन दोनों ने कबकब और कितनी देर तक बातें की थीं.  यह देख कर राजेश का खून खौल गया कि जिस दोस्त ने उस से कसम खाई थी, वही उस की पीठ में छुरा घोंप रहा है. वह नीरज को दगाबाज समझने लगा.

राजेश ने उसी दिन ठान लिया कि अब वह नीरज को सबक जरूर सिखाएगा. इस के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अगले दिन राजेश ने नीरज का मोबाइल लौटा दिया. मोबाइल लौटाते समय राजेश ने उस से कहा, ‘‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे हो. मेरी निशा को अब भी फोन करते हो. मैं कहता हूं कि अब भी मान जाओ तो अच्छा रहेगा.’’

दोनों में फिर से कहासुनी हुई. नीरज बहुत चालाक था. उस ने किसी तरह राजेश को फिर से मना लिया.

नीरज ने देहरादून के जिस पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, वहां से उसे प्रमाण पत्र लेने 3 सितंबर को जाना था. 6 सितंबर को उस का देहरादून की ही एक निजी कंपनी में इंटरव्यू था. इसलिए उस ने राजेश से कह दिया कि अब देहरादून से लौट कर ही इस बारे में हम लोग बात करेंगे. यानी  3 सितंबर, 2015 को नीरज देहरादून चला गया. नीरज ने जिस इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, उस के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा ने अब अंसल ग्रीन विहार कालोनी में एक कोठी किराए पर ले ली थी. अपना इंस्टीट्यूट वह उसी कोठी में शिफ्ट कर रहे थे. सामान शिफ्ट कराने में नीरज ने भी ज्ञानेंद्र ने मदद की थी.

राजेश नीरज की रगरग से वाकिफ था. उसे उम्मीद थी कि वह उसे भले ही कितने वादे कर ले, लेकिन वह उस की मंगेतर से बात करना बंद नहीं करेगा. वह इसी असमंजस में था कि इस स्थिति में वह क्या करे. घुमाफिरा कर उस के दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि ऐसे दगाबाज दोस्त की तो एक ही सजा है, मौत.

यह खतरनाक निर्णय लेने के बाद वह भी 5 सितंबर की सुबह देहरादून के लिए चल पड़ा. देहरादून पहुंच कर राजेश ने नीरज को फोन किया, ‘‘नीरज, मैं भी देहरादून में ही हूं. तुम देहरादून में कौन सी जगह हो.’’

‘‘देखो राजेश, मैं इस समय व्यस्त हूं. मुरादाबाद आ कर ही बात हो सकेगी.’’ नीरज ने उसे टालते हुए कहा.

लेकिन राजेश भी कहां मानने वाला था. वह दोस्ती का वास्ता दे कर बोला, ‘‘देखो नीरज, मैं यहां पर अकेला बोर हो रहा हूं. देहरादून मेरा देखा हुआ नहीं है. जब तुम यहां पढ़ रहे थे तो तुम ने कितनी बार मुझे देहरादून बुलाया था और अब मैं आ गया हूं तो तुम मुंह फेर रहे हो.’’

नीरज राजेश की बातों में आ गया. वह बोला, ‘‘तुम इस समय कहां हो?’’

‘‘मैं घंटाघर पर हूं.’’

‘‘ठीक है, वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में वहीं पहुंचता हूं.’’ तब नीरज औटो से घंटाघर चला गया और राजेश को जाखन ले गया. वहां दोनों ने शराब पी और वहीं पर खाना खाया.

खाना खाने के बाद राजेश नीरज से बोला, ‘‘यार, शराब में मजा नहीं आया. थोड़ीथोड़ी और हो जाए तो अच्छा रहेगा.’’ तब राजेश ने एक अद्धा शराब और खरीद ली. राजेश ने कहा कि इसे तुम्हारे कमरे पर पीएंगे. उस समय इंस्टीट्यूट के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी के साथ दिल्ली गए हुए थे. वहां उन के ससुर की तबीयत खराब थी. नीरज वहां अकेला था. इसलिए नीरज राजेश को कमरे पर ले आया. वहीं पर दोनों ने शराब पी.

कोठी पर पहुंच कर नीरज ने फोन व मैसेज द्वारा अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा को बता दिया कि उस से मिलने उस के मामा का लड़का आया है. वह कल चला जाएगा. ज्ञानेंद्र ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि वह उस पर बहुत विश्वास करते थे. ज्ञानेंद्र ने नीरज को बता दिया था कि वह पत्नी के साथ आज रात को ही देहरादून लौट आएंगे. नीरज और राजेश दोनों आपस में बातें करते रहे. निशा को ले कर दोनों में तकरार भी हुई. राजेश घटना को अंजाम देने की योजना बनाता रहा. लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था, क्योंकि नीरज अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा के आने का इंतजार कर रहा था.

5-6 सितंबर की रात डेढ़ बजे ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी स्वरांजलि के साथ घर लौटे तो कोठी के गेट का ताला नीरज ने ही खोला. उन से चाय पीने के लिए पूछा तो उन्होंने मना कर दिया. उन्हें उस समय भूख लग रही थी. पत्नी पहली मंजिल पर अपने बैडरूम में चली गईं और वह खुद किचन में खिचड़ी बनाने लगे. तब नीरज उन्हीं के पास खड़ा बातें करता रहा. खिचड़ी खाने के बाद वह भी बैडरूम में जा कर सो गए. नीरज दिन भर का थका था. ज्ञानेंद्र के जाने के बाद वह भी अपने कमरे में चला गया.

जिस वक्त नीरज अपने सर से किचन में बातें कर रहा था, उस समय वह अपना मोबाइल कमरे में ही छोड़ गया था. तभी राजेश ने उस का मोबाइल चेक किया तो उस में फिर निशा को भेजे गए मैसेज मिले. यह देख कर राजेश का खून खौल गया. मैसेज पढ़ने के बाद उस ने उस का मोबाइल उसी जगह रख दिया, जहां से उठाया था. कमरे में आ कर नीरज जल्द ही सो गया, तभी राजेश ने शीशी में बची हुई शराब गटक ली. जब राजेश ने देख लिया कि नीरज गहरी नींद में सो गया है तो वह नीरज के तकिए पर सिर रख कर लेट गया. उसी समय उस ने नीरज को हिलाडुला कर देखा. जब उसे विश्वास हो गया कि नीरज गहरी नींद में है तो वह रसोई में गया और वहां से तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, सब्जी काटने वाले चाकू उठा कर कमरे में आ गया.

राजेश ने गहरी नींद में सोए नीरज के सिर पर तवे से भरपूर वार किया. नीरज हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने अपने सर ज्ञानेंद्र को आवाज दी. लेकिन कमरे में लगे शीशे के दरवाजों से आवाज बाहर नहीं जा सकी. नीरज दरवाजे की तरफ भागा तो राजेश ने पलंग पर पड़ी चुन्नी उस के गले में फंसा कर नीचे गिरा दिया. वह उस पर तवे से वार करने लगा. उस का सिर कट गया, जिस से उस की हिम्मत जवाब दे गई. तब नीरज ने राजेश से दया की भीख मांगी. लेकिन राजेश ने उसे नहीं बख्शा. उस के ऊपर खून सवार था. वह उसे हरगिज जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था.

इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार करने शुरू कर दिए. वह इतने गुस्से से वार कर रहा था कि मारतेमारते चाकू मुड़ गए. फिर उस ने प्रैशर कुकर के ढक्कन से वार किए. जब राजेश ने देखा वह मर चुका है तो उस ने नीरज के खून से दीवार पर लिख दिया, ‘मेरी बहन के साथ रेप किया है.’ उस समय रात के 3 बज रहे थे. दोस्त को मौत के घाट उतारने के बाद उस ने इत्मीनान से हाथपैर मुंह धोया और अपने साथ लाए कपड़े बदले. खून से सने कपडे़ उस ने पौलीथिन में बांध कर अपने बैग में रख लिए. अब वह वहां से भागना चाहता था.

वह कोठी के गेट पर पहुंचा तो वहां ताला लगा था. फिर वह दीवार फांद कर सीधा बसअड्डा पहुंचा. वहां से बस पकड़ कर हरिद्वार आया. फिर हरिद्वार से बस पकड़ कर मुरादाबाद पहुंच गया. घर आ कर उस ने अपनी मां को बस इतना बताया कि वह गर्जिया देवी मंदिर, रामनगर से आ रहा है. इस के बाद कमरे में जा कर सो गया. अगले दिन 7 सितंबर, 2015 को देहरादून पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

राजेश सैनी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. उसे 8 सितंबर, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है

 

UP Crime: मामूली बात पर

UP Crime: अरविंद और उन का परिवार मिलनसार स्वभाव का था. उन्होंने पड़ोस में रहने वाले एक युवक विपुल को इसलिए अपनी दुकान किराए पर देने से मना कर दिया कि किराए के लेनदेन से संबंध खराब हो सकते हैं. लेकिन विपुल ने इसे गलत तरीके से लेते हुए मन में रंजिश पाल ली. इस का नतीजा भी बहुत भयानक निकला.

6 सितंबर 2015 की शाम को अरविंद शर्मा बाहर से घर लौटे तो उन की पत्नी पूनम के चेहरे पर

परेशानी के भाव और आंखों में चिंता झलक रही थी. यह देख कर अरविंद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ पूनम, कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘परेशानी की ही बात है. लक्ष्य को बहुत देर हो गई. साइकिल ले कर गया था, अभी तक वापस नहीं आया.’’

‘‘इधर उधर घूम रहा होगा आ जाएगा.’’ वह हंसते हुए बोले.

‘‘पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है.’’ इस पर अरविंद पत्नी को आश्वस्त करते हुए बोले, ‘‘घबराओ नहीं, थोड़ा इंतजार कर लो, वह आ जाएगा.’’

पूनम चिंतामग्न हो कर बैठ गई.

अरविंद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शामली जनपद के रहने वाले थे. उन के पिता श्यामलाल शर्मा सेवानिवृत्त शिक्षक थे. कई साल पहले अरविंद का परिवार शामली से लगे मुजफ्फरनगर के थाना सिविल लाइन क्षेत्र की इंदिरा कालोनी में आ कर बस गया था. अरविंद खुद भी बेसिक शिक्षा विभाग में लिपिक के पद पर कार्यरत थे. उन के परिवार में पत्नी पूनम के अलावा 3 बच्चे थे. 2 बेटियां वर्णिका, वैष्णवी और 11 साल का बेटा लक्ष्य. लक्ष्य शहर के डीएवी पब्लिक स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ता था. परिवार में इकलौता बेटा होने की वजह से वह सब का लाडला था. श्यामलाल शर्मा परिवार को एकसूत्र में बांधे हुए थे. संस्कारी और मिलनसार परिवार था. व्यवहारकुशल श्यामलाल व उन के बेटे अरविंद को मोहल्ले में इज्जत की नजरों से देखा जाता था.

अरविंद सुबह औफिस जाते थे और शाम को घर आ जाते थे. 6 सितंबर को रविवार की वजह से घर पर ही थे, लेकिन दोपहर बाद किसी काम से बाहर चले गए थे. जब वह लौटे तो उन का एकलौता बेटा लक्ष्य घर पर नहीं था. लक्ष्य जिद कर के साइकिल ले कर बाहर चला जाता था, यह कोई नई बात नहीं थी. उस दिन भी वह साइकिल ले कर बाहर गया था. शाम का धुंधलका फैला, तो परिवार की चिंता बढ़ गई. अरविंद बेटे को ढूंढने के लिए बाहर सड़क की तरफ निकल गए, जबकि पूनम व उन की बेटियों ने आसपास के घरों में लक्ष्य को ढूंढा, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला.

लक्ष्य के लापता होने की खबर मोहल्ले में फैली तो लोग भी उसे ढूंढने में लग गए. वह कहां चला गया, इस बात को कोई नहीं जानता था. अरविंद का परिवार बेहद परेशान था. पूनम का बेटे के इंतजार में रोरो कर बुरा हाल था. हर आहट पर वह दरवाजे की तरफ देखतीं, उन्हें लगता कि बेटा आ गया है. लोगों ने हर तरफ लक्ष्य के बारे में पूछताछ भी की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. वह पूरी रात परेशानी में बीती. अगले दिन लक्ष्य के लापता होने की सूचना थाना सिविल लाइन में दे दी गई. थाना प्रभारी चंद्र किरण यादव ने उस की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अगले दिन का इंतजार किया, परंतु उस दिन भी वह वापस नहीं आया. इस से इस आशंका को बल मिला कि लक्ष्य का अपहरण कर लिया गया है.

हालांकि शर्मा परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए कोई उन के बेटे का अपहरण करे, लेकिन इस के और भी कई कारण हो सकते थे. पुलिस इस इंतजार में थी कि यदि लक्ष्य का अपहरण किया गया होगा, तो फिरौती के लिए फोन या पत्र जरूर आएगा. लेकिन पुलिस का यह अनुमान गलत साबित हुआ. इस तरह का कोई फोन परिवार के पास नहीं आया, तो यह मामला रंजिश का लगा. पुलिस ने अरविंद व उन के पिता से पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि वह सीधेसादे लोग हैं. किसी से रंजिश तो दूर उन का कभी किसी से झगड़ा तक नहीं हुआ था.

इस से पुलिस उलझन में पड़ गई. बहरहाल पुलिस ने लक्ष्य के फोटो लगे इश्तहार बनवाए और सभी थानों में भिजवा दिए, पर इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अगले कई दिनों तक भी जब लक्ष्य नहीं मिला, तो लोगों में गुस्सा पनपने लगा. लक्ष्य के घरवालों और शुभचिंतकों ने एकत्र हो कर एसएसपी के.बी. सिंह से मुलाकात की. एसएसपी ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को शीघ्र काररवाई के निर्देश दिए. एसपी (सिटी) प्रबल कुमार सिंह व एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने थाना पुलिस को सुरागसी में लगा दिया.

एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने अभी तक के जांच बिंदुओं पर विचारविमर्श भी किया. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हो न हो लक्ष्य को रंजिशन उठा कर मार दिया गया हो. वह साइिकल समेत लापता हुआ था, इस से जाहिर होता था कि वह विश्वास कर के किसी जानकार के साथ ही गया होगा. शर्मा परिवार रंजिश से इंकार कर रहा था, इसलिए इस थ्यौरी पर अविश्वास भी हो रहा था, फिर भी पुलिस अपने इस शक पर कायम रही.

चूंकि कुछ रंजिशें एक पक्षीय होती हैं, इसलिए पुलिस को लगा कि हो न हो मोहल्ले का ही कोई आदमी अरविंद या उन के परिवार से रंजिश रखता हो, इसलिए पुलिस ने आसपास के लोगों की फेहरिश्त तैयार की. इस फेहरिश्त में एक नाम विपुल सैनी का भी सामने आया. विपुल अरविंद के ही पड़ोसी जगलाल का बेटा था और डीजे (डिस्क जौकी) का काम करता था. पुलिस को पता चला कि उस की सोहबत अच्छी नहीं थी और वह आवारा व दबंग प्रवृत्ति का युवक था.

पुलिस अरविंद के घर पहुंची और उन से विपुल के बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वह भले ही बिगडै़ल प्रवृत्ति का युवक है, लेकिन उन के लिए अच्छा है. उन्होंने यह भी बताया कि लक्ष्य के लापता होने के बाद से विपुल लगातार उन के साथ उसे ढुंढवाने में साथ रहा है. आनेजाने वाले शुभचिंतकों को चाय पानी देने का जिम्मा भी उस ने ही संभाल रखा था. अगले दिन पुलिस को पता चला कि विपुल अपने घर से अचानक लापता हो गया है. पुलिस ने जब अरविंद से एक बार फिर से इस बारे में पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि विपुल को यह बात पता चल गई थी कि पुलिस उस के बारे में पूछताछ कर रही है. इस के तुरंत बाद अचानक लापता हो जाने से विपुल पूरी तरह शक के दायरे में आ गया.

पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल किया और उस की कालडिटेल्स के साथ पिछले कई दिनों की लोकेशन भी निकलवाई. नंबरों की जांच से पता चला कि लक्ष्य के लापता होने वाले दिन व रात 3 नंबरों पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस जांच में यह भी पता चल गया कि वह नंबर पंकज प्रजापति, कपिल और विक्की के नाम पर थे. इन में पंकज उसी कालोनी में रहता था, जबकि कपिल गांव अलमासपुर का और विक्की गांव गजावली का रहने वाला था.

लोगों से पूछताछ में पता चला कि ये तीनों कपिल के जिगरी दोस्त थे और उसी की तरह आवारा थे. चौंकाने वाली बात यह थी कि 6 सितंबर को विपुल व उस के दोस्तों की लोकेशन एक साथ थी. रात 12 बजे उन सभी की लोकेशन बागोवाली क्षेत्र में पाई गई. बागोवाली शहर की सीमा से सटा हुआ क्षेत्र था. पुलिस समझ गई कि लक्ष्य का राज इन्हीं चारों के बीच छिपा था. 15 सितंबर को पुलिस ने एकएक कर के विपुल, कपिल व पंकज को उठा लिया. जबकि विक्की पुलिस के हाथ नहीं लग सका पुलिस उन से कई घंटे तक घुमाफिरा कर पूछताछ करती रही, लेकिन उन्होंने लक्ष्य के अपहरण में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

अलबत्ता पुलिस इतना जरूर समझ गई कि तीनों बेहद शातिर युवक थे. अंतत: जब पुलिस ने अपना परपंरागत तरीका अपनाया, तो तीनों टूट गए. उन लोगों ने न केवल मासूम लक्ष्य का अपहरण किया था, बल्कि उस की हत्या कर के शव भी गन्ने के खेत में फेंक दिया था. पुलिस तीनों को ले कर उन के बताए स्थान पर पहुंची और उन की निशानदेही पर गन्ने के एक खेत से बोरे में बंद लक्ष्य का शव बरामद कर लिया, जो बुरी तरह सड़ चुका था. पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम लक्ष्य के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस के घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था.

लक्ष्य की हत्या से लोगों में जबर्दस्त आक्रोश था, इसलिए विपुल के घर पर पुलिस बल तैनात कर दिया गया. इस बीच उस के घर वाले लोगों के आक्रोश से डर का घर में ताला डाल कर फरार हो गए. पुलिस ने हत्यारोपियों से विस्तृत पूछताछ की. लक्ष्य की हत्या इतनी मामूली बात पर की गई थी कि पुलिस भी हतप्रभ रह गई. अरविंद के परिवार से विपुल के अच्छे रिश्ते थे. वह उन के पास अकसर आताजाता रहता था. इस नाते श्यामलाल से ले कर लक्ष्य तक सभी उसे अच्छी तरह जानते थे. विपुल बिगड़ैल और आवारा था, लेकिन चूंकि अरविंद से वह अच्छा व्यवहार करता था, इसलिए वह उसे अच्छा मानते थे.

अरविंद की एक खाली दुकान थी. उसे वह किराए पर देना चाहते थे. यह बात जब विपुल को पता चली, तो उस ने दुकान किराए पर देने के लिए कहा. अरविंद सुलझे हुए व्यक्ति थे. पड़ोस का मामला था, इसलिए वह कतई नहीं चाहते थे कि दुकान की किराएदारी को ले कर उन के बीच कोई मनमुटाव हो, इसलिए उन्होंने प्यार से दुकान देने से मना कर दिया. विपुल को उन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. यह बात उसे बेहद नागवार गुजरी और वह अंदर ही अंदर अरविंद से चिढ़ने लगा. उठतेबैठते, सोतेजागते उस के दिमाग में अरविंद के इनकार के शब्द गूंजते रहते. प्रवृत्ति अच्छी न हो और सोच फितरती हो, तो जलन की अग्नि और तेज हो जाती है. विपुल के साथ बिलकुल ऐसा ही हो रहा था.

उस की जलन की यह आग तब और भी बढ़ गई, जब उसे पता चला कि अरविंद ने अपनी दुकान एक अन्य युवक मोंटी को किराए पर दे दी है. विपुल को पता चला कि मोंटी अपनी दुकान का मुहूर्त 7 सितंबर को करेगा. विपुल ने मन ही मन में सोच लिया था कि चाहे जो भी हो वह दुकान का मुहूर्त नहीं होने देगा. अरविंद को वह ऐसा दर्द देगा कि जिंदगी भर नहीं भूल पाएगा. उस ने अपनी इस रंजिश को जाहिर नहीं होने दिया और उन से मेलभाव बनाए रखा. विपुल व उस के दोस्त कपिल की साझेदारी में कालोनी से थोड़ी दूरी पर डीजे की दुकान थी.

विपुल वहां अपने दोस्तों कपिल, पंकज व विक्की के साथ बैठ कर शराब पीता था. एक दिन ऐसी ही महफिल के दौरान उस ने अपने दोस्तों से सारी बात बता कर कहा, ‘‘मुझे मेरे पड़ोसी ने दुकान नहीं दी. मुझे उसे सबक सिखाना है.’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई.’’ उस के एक दोस्त ने कहा.

‘‘नहीं, मैं जीते जी आग में जल रहा हूं. तुम लोग मेरा साथ दो, मैं उस के इकलौते बेटे को खत्म कर दूंगा.’’ विपुल ने गुस्से से दांत पीसते हुए कहा. कभीकभी शराबियों की दोस्ती बहुत गहरी होती है. उन सब का बहुत गहरा याराना था. वे सब विपुल  का साथ देने को तैयार हो गए.

अंतत: उन्होंने 6 सितंबर को लक्ष्य को मारने की योजना बना ली. अगले दिन विपुल ने अपने दोस्तों को फोन कर दिया कि वे शाम को दुकान पर पहुंचकर इंतजार करें. वह बहाने से अरविंद के बेटे को ले आएगा. उधर विपुल घर आया और लक्ष्य के घर से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. 6 सितंबर को रविवार था. लक्ष्य पूरे दिन घर पर ही रहा. शाम को वह जिद कर के साइकिल ले कर निकल गया. विपुल बाहर नजरें गड़ाए हुए था. उसे पूरी उम्मीद थी कि लक्ष्य साइकिल से बाहर जरूर आएगा.

लक्ष्य पर नजर पड़ते ही विपुल की आंखों में चमक आ गई. वह पैदल चल कर कालोनी के बाहर वाले रास्ते पर चला गया, तब तक लक्ष्य राउंड पूरा कर के वापस आ रहा था. विपुल को देखते ही लक्ष्य ने नमस्ते की, तो उस ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘कहां घूम रहा है लक्ष्य?’’

‘‘कुछ नहीं भैया जी. साइकिल चलाने आया था.’’

‘‘चल आ मैं तुझे नया वीडियो गेम खिलाता हूं. मैं ने अपनी दुकान पर लगाया है.’’ वीडियो गेम की बात पर लक्ष्य खुश हो गया. वह मासूम उस की चालाकी को समझ नहीं पाया और उस के साथ चल दिया. विपुल उसे ले कर सीधे कपिल की दुकान पर पहुंचा. वहां कपिल, पंकज व विक्की पहले से ही मौजूद थे. वहां पहुंचते ही लक्ष्य ने जिज्ञासा से कहा. ‘‘भैया अब तो मैं आप की दुकान पर खेलने आया करूंगा, मम्मी पापा भी नहीं रोकेंगे. कहां है नया वीडियो गेम?’’

‘‘अभी दिखाता हूं.’’ कहने के साथ ही उस ने अपने दोस्तों को इशारा कर दिया. उन्होंने लक्ष्य का मुंह दबा कर उसे जकड़ लिया. मामूली बात पर अंधे हुए विपुल ने दुकान में पड़ी प्लास्टिक की रस्सी उठाई और लक्ष्य के गले में डाल कर कसनी शुरू कर दी. दम घ़ुटा तो लक्ष्य मौत के भय से छटपटा कर रह गया. उस ने उन के चंगुल से छूटने के लिए हाथ पैर चलाए, लेकिन किसी को उस पर दया नहीं आई.

विपुल ने रस्सी तब तक उस के गले में कसी, जब तक उस की सांसों की डोर नहीं टूट गई. हत्या के तुरंत बाद इन लोगों ने लक्ष्य के शव को एक बोरे में बंद कर के कोने में सामान के पीछे छिपा दिया. इस के बाद उन्होंने रात होने का इंतजार किया. तकरीबन 12 बजे इन लोगों ने बोरे को उठाया और मोटरसाइकिल से बागोवाली क्षेत्र में गन्ने के खेत में फेंक आए. विक्की ने लक्ष्य की साइकिल भी एक स्थान पर छिपा दी. विपुल ने घर आ कर उस दिन के बाद अरविंद के साथ लक्ष्य को ढुंढवाने का सफल नाटक किया. इतना ही नहीं वह परिवार व पुलिस जांच की टोह लेने के लिए अधिकांश उन के घर पर ही रहता था. अरविंद के जो भी मिलने वाले आते थे, उन्हें चाय आदि पिलाने का जिम्मा भी उस ने ही उठा लिया था.

किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि विपुल ऐसा बेहरम हो सकता है. बेटे के विछोह में पूनम व अरविंद की तड़प उसे सुकून दे रही थी. विपुल को जब एक दिन पता चला कि पुलिस उस के बारे में भी पूछताछ कर रही है, तो डर की वजह से वह लापता हो गया. यहीं से वह शक के दायरे में आया और पकड़ा गया. अगले दिन पुलिस ने चौथे हत्यारे विक्की को भी धर दबोचा. उस ने भी हत्या में शामिल होने की बात कुबूल ली. पुलिस को उस की निशानदेही पर लक्ष्य की साइकिल भी मिल गई. पुलिस ने कागजी औपचारिकताएं पूरी कर के चारों आरोपियों को लोगों के गुस्से और हमले की आशंका के मद्देनजर भारी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मामूली सी बात पर विपुल की बिगड़ैल प्रवृति और मन में उपजी रंजिश ने एक परिवार का चिराग बुझा दिया. उस ने यह रंजिश न रखी होती, तो लक्ष्य भी जीवित होता और उस का व उस के दोस्तों का भविष्य भी चौपट होने से बच जाता. लक्ष्य के परिजनों का कहना था कि यदि विपुल ने अपनी नाराजगी बताई होती, तो वह उसे दुकान दे देते. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime

Crime Story: हत्यारिन मां

Crime Story: मां खुद की जान जोखिम में डाल कर बच्चों को बचाती है. लेकिन राखी ऐसी मां है, जिस ने प्रेमी और 10 लाख रुपए की बीमे की रकम के लिए अपने ही बेटे की हत्या कर दी.

ससून डाक अस्पताल के डाक्टरों ने थाना विश्रामवाड़ी के सीनियर इंसपेक्टर पोपट सुपेकर को 11 साल के एक बच्चे के बारे में जो बताया, सुन कर वह हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत ड्यूटी पर तैनात महिला सबइंसपेक्टर शीतल लोमटे से प्राथमिकी दर्ज करा कर पूरी बात वरिष्ठ अधिकारियों को बताई. इस के बाद वह असिस्टैंट इंसपेक्टर सूर्यकांत मारोडे, शीतल लोमटे एवं कुछ सिपाहियों को साथ ले कर ससून डाक अस्पताल के लिए चल पड़े. ससून डाक अस्पताल थाना विश्रामवाड़ी से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए पुलिस की यह टीम 10 मिनट में वहां पहुंच गई.

अस्पताल पहुंच कर पोपट सुपेकर अस्पताल के डाक्टरों से मिले तो उन्होंने बच्चे की लाश दिखा कर पूरी बात बताई. लाश का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने बच्चे के साथ आई उस की मां से पूछताछ शुरू की. मां ने पुलिस को भी वही सब बताया, जो डाक्टरों को पहले बता चुकी थी.  पुलिस ने उस की बातों पर विश्वास न कर के अपनी औपचारिक काररवाई पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया और बच्चे की मां को साथ ले कर थाने आ गई. थाने में की गई पूछताछ में पता चला कि मृतक बच्चे की मां का नाम राखी बालपांडे था. मृतक बच्चा उस का एकलौता बेटा चैतन्य बालपांडे था.

पूछताछ में राखी जो बता रही थी, वह डाक्टरों द्वारा बताई घटना से बिलकुल मेल नहीं खा रहा था. राखी बारबार बयान बदल रही थी. इस का मतलब वह पुलिस को गुमराह कर रही थी. मजबूर हो कर पुलिस ने जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो आखिर वह टूट गई. उस ने अपने विकलांग बेटे की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद राखी ने बताया कि उसी ने अपने विकलांग बेटे चैतन्य की हत्या प्रेमी सुमित मोरे के साथ मिल कर की थी.

पुलिस ने तुरंत राखी के प्रेमी सुमित को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ में पता चला कि स्वच्छंदता से रहने, बिना रोकटोक मौजमस्ती करने और चैतन्य के लाखों रुपए के जीवन बीमा की रकम हथियाने के लिए उन्होंने उस की हत्या की थी. पुलिस ने अगले दिन यानी 8 अगस्त, 2015 को दोनों को महानगर के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के विस्तृत पूछताछ और सबूत जुटाने के लिए 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में चैतन्य की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

36 वर्षीया राखी बालपांडे मूलरूप से महाराष्ट्र की राजधानी नागपुर की रहने वाली थी. उस के परिवार में मां निला मानकर और एक बहन राधा मानकर थी. पिता की उस के बचपन में ही मौत हो गई थी. उस के बाद सारी जिम्मेदारियां मां निला पर आ गई थीं. निला सुलझी, समझदार और साहसी महिला थीं. पति की मौत के बाद वह जरा भी नहीं घबराईं, जबकि उस समय बेटियां छोटीछोटी थीं. उन्होंने दोनों बेटियों को पालापोसा ही नहीं, पढ़ालिखा कर इस काबिल बनाया कि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें.

राखी खुले विचारों वाली अति महत्वाकांक्षी लड़की थी. वह पढ़नेलिखने में होशियार थी, इसलिए हमेशा अच्छे नंबरों से पास हुई. उस ने नागपुर विश्वविद्यालय से माइक्रो बायोलौजी से बीएससी किया. जब वह बीएससी कर रही थी, तभी साथ पढ़ने वाले तरुण बालपांडे से उसे प्रेम हो गया. कालेज छोड़ने तक बात शादी तक पहुंच गई. लेकिन शादी के लिए न राखी के घर वाले तैयार थे, न तरुण के घर वाले. मजबूर हो कर दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली. यह सन 2000 की बात है. दोनों ही उच्चशिक्षित थे, इसलिए उन्हें प्रतिष्ठित कंपनियों में अच्छे वेतनों पर नौकरियां मिल गईं. दोनों ने किराए का अच्छा सा मकान ले लिया और आराम साथसाथ से रहने लगे.

सन 2002 में राखी ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने चैतन्य रखा. बच्चे के जन्म से दोनों बहुत खुश थे. लेकिन उन की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. इस की वजह यह थी कि बच्चे की एक टांग पोलियो से खराब हो गई. इस का दोष राखी ने तरुण को दिया. उस का मानना था कि तरुण ने अगर ध्यान दिया होता तो बच्चा पोलियो का शिकार न होता. बस, इस के बाद दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होने लगा. फिर एक दिन ऐसा भी आया जब राखी तरुण बालपांडे का घर छोड़ कर मां के घर आ गई. मां और बहन के काफी समझाने के बाद भी राखी पति के घर लौट कर नहीं गई. कुछ दिनों तक मां और बहन के साथ रहने के बाद राखी ने एक बार फिर नौकरी के लिए कोशिश शुरू कर दी.

उस की कोशिश रंग लाई और उसे पूना की किसी कंपनी में नौकरी मिल गई.  वह नागपुर छोड़ कर पूना आ गई. पूना में उस ने प्रतीकनगर में किराए का मकान लिया और अकेली ही रहने लगी. धीरेधीरे राखी की मकान मालिक से नजदीकियां बढ़ने लगीं तो उस ने तरुण बालपांडे को तलाक और बेटे चैतन्य को अपनी कस्टडी में लेने के लिए कानूनी नोटिस भेज दी. मकान मालिक और राखी की नजदीकियां कोई गुल खिलातीं, उस के पहले ही इस बात की जानकारी मकान मालिक की पत्नी को हुई तो उस ने हंगामा खड़ा कर दिया. उस ने राखी से अपना मकान तो खाली करवा ही लिया, उस के खिलाफ थाना विश्रामवाड़ी में पति के साथ अवैधसंबंधों और ससुर को ब्लैकमेल करने की शिकायत भी दर्ज करवा दी.

इस से राखी की काफी बदनामी हुई. उसे मकान तो खाली करना ही पड़ा, नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा. प्रतीकनगर का घर छोड़ने के बाद राखी ने एक प्रौपर्टी डीलर की मदद से पूना के वाकड़ेवाड़ी स्थित टिंगरेनगर के रोड नंबर 1 पर एसवी एन्क्लैव प्लौट नंबर 1 में सुनील मोरे का खाली फ्लैट किराए पर ले लिया. इस मकान में राखी अकेली नहीं रह रही थी. उस के साथ उस की मां निला और बहन राधा भी रहने आ गई थीं.

इस के अलावा लोक न्यायालय से उसे अपने विकलांग बेटे चैतन्य को भी साथ रखने की इजाजत मिल गई थी. वह भी उस के साथ रहने आ गया था. पढ़ाई के लिए राखी ने पूना के इंटर नैशनल इंगलिश स्कूल में उस का एडमिशन करवा दिया था. मांबहन के साथ होने की वजह से चैतन्य को कोई परेशानी नहीं हो रही थी. चैतन्य मां के साथ रह कर खुश था. राखी ही नहीं, मां निला और बहन राधा भी उस का खूब खयाल रखती थीं. उसे गाने का शौक था, इस के लिए वह प्रैक्टिस भी करता रहता था. वह इंडियन आयडल बनना चाहता था. उस ने इंडियन आयडल की प्रतियोगिता में 2 बार भाग भी लिया था, लेकिन सफल नहीं हो सका था.

राखी की बहन राधा चैतन्य का कुछ ज्यादा ही खयाल रखती थी. लेकिन उस की शादी हो गई तो चैतन्य का खयाल रखने वाला कोई नहीं रह गया. बहन के ससुराल जाने के बाद अचानक राखी का भी बेटे के प्रति व्यवहार बदल गया. वह एकदम से क्रूर हो गई. उस ने बेटे का स्कूल जाना भी बंद करा दिया. यही नहीं, उस पर तरहतरह के अत्याचार भी करने लगी. जिस राखी ने बेटे को ले कर पति को छोड़ दिया था, छोटीछोटी बातों को ले कर पड़ोसियों तक से लड़ जाती थी, आखिर वही राखी इतनी कठोर क्यों हो गई?

इस की वजह थी उस का प्रेमी सुमित मोरे, जो कुछ महीने पहले ही राखी के दिल में बस गया था. राखी सुमित मोरे के पीछे पागल हो चुकी थी. वह उस से शादी कर के अपनी नई दुनिया बसाना चाहती थी, जिस में चैतन्य रोड़ा बन रहा था. 28 वर्षीय सुमित पूना के पेखड़ा जेल रोड स्थित सैनिकनगर में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के पिता का नाम सुनील मोरे था, जो रिटायर हो चुके थे. राखी उसी के फ्लैट में किराए  पर रह रही थी. फ्लैट का किराया लेने अकसर सुमित ही आता था. इसी आनेजाने में राखी अविवाहित सुमित मोरे पर मर मिटी थी.

स्वस्थसुंदर शरीर, चौड़ी छाती, सशक्त बांहों के मालिक सुमित को देख कर राखी की कोमल भावनाएं एकदम से जाग उठी थीं. जबकि वह उस से 8 साल छोटा था. लेकिन वह मांबाप का एकलौता बेटा था. यह राखी के लिए और अच्छी बात थी. शायद इसीलिए वह उसे अपने करीब लाने की कोशिश में जुट गई थी. सुमित जब भी किराया लेने आता, राखी किसी न किसी बहाने उसे घंटों बैठाए रखती. आखिर कब तक राखी के मन की बात सुमित से छिपी रहती. वह भी जवान था, ऊपर से कुंवारा, इसलिए वह खुद को रोक नहीं पाया और उस की गोद में आ गिरा. उस ने राखी के मूक निमंत्रण को स्वीकार कर लिया. राधा और मां की वजह से घर में मौका नहीं मिलता था, इसलिए एक दिन वह राखी के औफिस पहुंच गया.

उस दिन राखी ने सुमित को कौफी ही नहीं पिलाई, बल्कि साथ में लंच भी किया. इस के बाद राखी ने सुमित को अपने फ्लैट पर उस समय बुलाया, जब वह अकेली थी. सफेद नाइटी में उस ने सुमित का स्वागत किया तो उस का दूधिया बदन देख कर वह आपा खो बैठा. लेकिन राखी उस से पहले ही बहक गई. सुमित के अंदर आते ही वह उस से बेल की तरह लिपट गई. इस के बाद बैडरूम में हवा का एक तेज झोंका आया और फिर जल्दी ही शांति छा गई. सुमित के प्यार में आकंठ डूबी राखी ने जब उस से शादी की बात कही तो उस ने तुरंत हामी भर दी. लेकिन उन की शादी में 2 परेशानियां थीं, एक तो अभी राखी का तलाक नहीं हुआ था, दूसरे सुमित चैतन्य को साथ नहीं रखना चाहता था.

तलाक के लिए राखी तरुण से मिली. उन का तलाक का मामला अदालत विचाराधीन था, जो तरुण की जिद की वजह से लटका हुआ था. तलाक के लिए राखी तरुण से 30 लाख रुपए मांग रही थी. लेकिन सुमित से बात होने के बाद वह 5 लाख रुपए में राजी हो गई. बाकी की रकम उस ने बाद में देने को कहा. लेकिन तरुण इस पर भी राजी नहीं था. इस के बाद बचा था चैतन्य. इस कांटे को निकालने में सुमित ने भी उस का साथ दिया. चैतन्य को ठिकाने लगाने में राखी को 2 फायदे थे. एक तो यह कि चैतन्य के न रहने पर वह सुमित के साथ आजादी से रह सकती थी और दूसरा फायदा यह था कि चैतन्य का 10 लाख रुपए का बीमा था, जो उस के न रहने पर उसी को मिलता, क्योंकि वही उस की नौमिनी थी.

यह बीमा तरुण ने चैतन्य के विकलांग होने की वजह से कराया था. इस की किस्तें भी वही जमा करा रहा था. चैतन्य से छुटकारा पाने के लिए राखी उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त करने लगी. उस का सोचना था कि इस तरह की प्रताणना से वह धीरेधीरे कमजोर हो जाएगा और खुद ही मौत के मुंह में समा जाएगा. इस में सुमित भी उस का साथ दे रहा था. यही सोच कर राखी चैतन्य पर तरहतरह के अत्याचार कर रही थी. उस का स्कूल जाना तो बंद ही करा दिया गया था, खानापीना भी बंद कर दिया गया.

पैर ठीक होने के बहाने उस से दोनों समय 4-4 घंटे व्यायाम कराया जाने लगा. पैर से लाचार चैतन्य व्यायाम न कर पाता तो उसे मारापीटा जाता, धमकाया जाता कि अगर उस ने कहना नहीं माना तो उसे स्टेशन पर बैठा कर भीख मंगवाई जाएगी. इस सब में सुमित भी राखी का पूरा साथ दे रहा था. उन की इन धमकियों से चैतन्य इतना डर गया था कि वह खिड़की से भी बाहर नहीं देखता था. फ्लैट के कोने में बैठा अपनी तकदीर पर आंसू बहाता रहता था. वह राखी से खाना तभी मांगता था, जब भूख हद से गुजर जाती थी. उस पर भी उसे भरपेट खाना नहीं मिलता था. जिस की वजह से दिनोंदिन उस का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था, जिसे देखदेख कर राखी और सुमित का चेहरा खिलता जा रहा था.

राखी की मां निला से यह सब देखा नहीं जाता था. वह जब भी इस का विरोध करती थीं, राखी और सुमित उन्हें डांट कर चुप करा देते थे. वह भी लाचार थीं. वह चैतन्य को अपने साथ नागपुर ले जाना चाहती थीं, लेकिन राखी और सुमित ने चैतन्य को तकलीफ देने और अपहरण में फंसाने की धमकी दे कर निला को अकेली ही नागपुर जाने के लिए विवश कर दिया था. निला के चले जाने के बाद राखी और सुमित को पूरी आजादी मिल गई थी. वे चैतन्य को शारीरिक और मानसिक रूप से तो परेशान कर ही रहे थे, उस के सामने ही शारीरिक संबंध बना कर उसे शर्मिंदा भी करते थे.

मां की इस करतूत से उस का चेहरा शरमा से झुक जाता था. इस से उसे मां से घृणा और नफरत हो गई थी. मौका मिलने पर वह सारी बातें नानी को बता कर वापस आने के लिए कहता था. चैतन्य की तकलीफें सुन कर निला का कलेजा कांप उठता था. लेकिन वह भी उस के लिए कुछ नहीं कर पा रही थी. जब उन से नहीं रहा गया तो उन्होंने सारी बात तरुण बालपांडे को बता दी. उन्होंने चैतन्य को अपने पास ले जाने की कोशिश की, लेकिन 10 लाख रुपयों का बीमा और तलाक का मामला इस में आड़े आ गया था.

तरुण जब तक इस विषय पर कुछ कर पाते, काफी देर हो चुकी थी. चैतन्य अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के बारे में किसी को कुछ बता न पाए, इस के लिए राखी उसे हमेशा कमरे में बंद कर के रखने लगी थी. 6 अगस्त को चैतन्य काफी उदास था. उस ने कुछ खायापीया भी नहीं था. राखी और सुमित से वह इतना डर गया था कि सुबह से बस एक ही रट लगाए था कि वह पापा के पास जाएगा. कई बार राखी के मना करने पर भी वह नहीं माना तो राखी को गुस्सा आ गया. उस ने खुद उसे जी भर कर तो मारापीटा ही, सुमित को बुला कर उस से भी बैट और कपड़ा धोने वाली मुंगरी से पिटवाया.

मार खा कर चैतन्य बेदम हो गया तो उसे उसी हालत में छोड़ कर वह औफिस चली गई. दिन भर उस ने औफिस का काम किया. मां, जिस के बारे में कहा जाता है कि वह ममतामयी होती है, उस के आंचल में दूध और आंखों में पानी होता है, वही मां अपने ही पेट से जन्मे बच्चे की काल बन गई. शाम को औफिस से निकल कर वह अपने प्रेमी सुमित के साथ एक परिचित वकील के यहां गई. वकील को उस ने बताया कि शरीर से काफी कमजोर उस का बेटा बाथरूम में फिसल कर गिर गया है. वह मरने की स्थिति में है. ऐसे में अगर वह मर जाता है तो उस के अंतिम संस्कार में कोई रुकावट तो नहीं आएगी, उस के इंश्योरैंस की रकम के लिए उन्हें क्या करना होगा?

‘‘पहले तो आप उस बच्चे को ले जा कर ससून डांक अस्पताल में भर्ती कराइए,’’ वकील ने कहा, ‘‘उस के बाद क्या होगा, देखा जाएगा.’’

वकील की सलाह पर जब दोनों घर पहुंचे तो चैतन्य को उन्होंने उसी हालत में पाया, जिस हालत में वे उसे छोड़ गए थे. निर्जीव पड़े चैतन्य को देख कर उन की हालत खराब हो गई. सुमित ने अपने 2 दोस्तों को फोन कर के बुलाया और उन की मदद से उसे ससून डाक अस्पताल ले गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने जब उन से पूछताछ की तो उन्होंने डाक्टरों को गुमराह करने के लिए वही सब बताया, जो वकील ने उन्हें बताया था.

लेकिन डाक्टरों को उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि चैतन्य का शरीर देख कर ही वे समझ गए थे कि ये झूठ बोल रहे हैं. दरअसल उस की किडनी, अंडकोश और शरीर पर गहरी चोटें आई थीं, इसी से वे जान गए थे कि बच्चे के साथ मारपीट की गई है. पुलिस का नाम सुन कर राखी और सुमित के होश उड़ गए. सुमित चुपचाप खिसक गया, जबकि राखी डाक्टरों के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए मामले को रफादफा कर के मृत्यु प्रमाण पत्र देने का आग्रह करने लगी. लेकिन डाक्टरों ने उस की एक नहीं सुनी और पुसिल को सूचना दे दी.

थाना विश्रामवाड़ी पुलिस ने पूछताछ के बाद चैतन्य की पिटाई में इस्तेमाल किए गए बैट और कपड़ा धोने वाली मुंगरी को बरामद कर के जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद चैतन्य की लाश उस के पिता तरुण बालपांडे को सौंप दी गई, जिस ने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पूछताछ और जरूरी साक्ष्य जुटा कर थाना विश्रामवाड़ी पुलिस ने राखी और सुमित के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर दोनों को दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों की जमानत नहीं हुई थी. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Assam Crime News: अंधविश्वास की आग में जिंदा जले दंपति

Assam Crime News: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जिस ने समाज को झकझोर कर रख दिया है. जादूटोना के चलते गांव के लोगों ने एक दंपति को जला कर मार डाला. आखिर क्या था इस जादूटोना का पूरा सच, जिस के लिए दंपति को जिंदा जला दिया गया? पूरा सच जानने के लिए पढ़िए आगे.

यह हैरान कर देने वाली घटना 30 दिसंबर, 2025 को असम के करबी आंगलोंग जिले में घटी.अंधविश्वास ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया. रात होवराघाट क्षेत्र के बेलोगुरी मुंडा गांव में ग्रामीणों ने जादूटोना के शक में गार्दी बिरोवा और उन की पत्नी मीरा बिरोवा को निशाना बनाया. अफवाहों से भड़की भीड़ ने पहले तेजधार हथियारों से दंपति पर हमला किया और फिर उन के घर में आग लगा दी. आग की लपटों में घिरे दोनों जिंदा जल गए. उन की चीखें गूंजती रहीं, लेकिन अंधविश्वास के आगे इंसानियत खामोश रही.

गांव वालों का मानना था कि यह दंपति जादूटोना करता था, जिस से गांव के लोगों को नुकसान पहुंच रहा था. इसी अंधविश्वास के कारण दोनों को निशाना बनाया गया.

इस दर्दनाक घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि गांव के लोग अंधविश्वास और अफवाहों पर भरोसा करते थे, जिस से उन्हें लगता था कि गांव में हो रही परेशानियों के पीछे यही दंपति जिम्मेदार है. फिलहाल पुलिस ने गांव वालों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत काररवाई की जा रही है. प्रशासन का कहना है कि अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके. Assam Crime News

Mumbai Crime: ममता की चोरी

Mumbai Crime: एक गलती कर के कल्पना अपनी गृहस्थी में आग लगा चुकी थी. बाद में उस ने आशुतोष दामले से दूसरी शादी कर ली. लेकिन यहां भी वह एक पेच में फंस गई. उस पेच से निकलने के लिए उस ने ममता की चोरी की, लेकिन…

मुंबई महानगर का सीएसटी एक ऐसा रेलवे स्टेशन है, जहां देश के हर कोने से आनेजाने वाले मुसाफिरों की भीड़भाड़ रहती है. मुसाफिरों की उसी भीड़ में एक परिवार अब्दुल करीम शेख का भी था, जो हैदराबाद जाने के लिए पिछले 3 दिनों से मुसाफिरखाने में ठहरा हुआ था. वह मुंबई महानगर से सटे जनपद ठाणे के उपनगर कल्याण का रहने वाला था और वहां लगने वाले पटरी बाजार में फड़ लगाता था. उस के परिवार में पत्नी रुखसाना के अलावा 2 बेटियां थीं. छोटी बेटी आरिजा 4 माह की थी. कुछ दिन पहले उस के साले को किसी आरोप में हैदराबाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, जिस की जमानत कराने के लिए यह परिवार हैदराबाद जाना चाहता था, लेकिन जाने के लिए उस के पास किराए तक के पैसे नहीं थे.

इस के लिए उस ने अपने एक परिचित सलीम से मदद मांगी थी तब सलीम ने उस से कहा था कि वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर आ कर पैसे दे देगा. लेकिन 2 दिन बीत जाने के बाद भी सलीम पैसे देने वहां नहीं आया था. उसी के इंतजार में वह मुसाफिरखाने में चादर बिछा कर लेटा हुआ था. वहां पर इंतजार करते हुए 2 दिन बीत गए. सलीम नहीं आया तो अब्दुल करीम की चिंता बढ़ती जा रही थी कि वह हैदराबाद कैसे जाए? उस ने तय कर लिया कि यदि सलीम कल तक पैसे ले कर नहीं आया तो वह हैदराबाद जाने वाली गाड़ी के जनरल डिब्बे में बिना टिकट बैठ कर चला जाएगा. यही सोच कर वह रात को सो गया. उसी चादर पर उस की पत्नी और बच्चे भी सो गए.

आधी रात के बाद अचानक उस की पत्नी रुखसाना की आंख खुली तो उस के होश उड़ गए. उस के बगल में सो रही उस की 4 महीने की बच्ची आरिजा गायब थी. उस ने उसी समय पति को उठाया. दोनों बेटी को इधरउधर देखने लगे. 4 महीने की बच्ची चल भी नहीं सकती थी जिस से समझा जाता कि कि वह इधरउधर चली गई होगी. आशंका यही थी कि कोई उसे उठा कर ले गया है. पतिपत्नी दोनों उसे स्टेशन पर ही इधरउधर ढूंढ रहे थे. रुखसाना रो रही थी, उस के रोने की आवाज सुन कर कुछ और लोगों की भी नींद टूट गई. छोटी बच्ची के गायब होने पर सभी हैरान थे. उस के साथ कुछ और लोग भी बच्ची को ढूंढने लगे. उन्हें ढूंढतेढूंढते सुबह हो चुकी थी. कुछ लोग रुखसाना को तसल्ली दे रहे थे.

स्टेशन पर रोने की आवाज और वहां की भीड़ को देख कर उधर से गुजर रहे राजकीय रेलवे पुलिस के 2 कांस्टेबल वहां आ गए. अब्दुल करीम शेख ने अपनी बेटी के गायब हो जाने की बात उन्हें बताई तो वह अब्दुल शेख को सीएसटी रेलवे स्टेशन से सटे लोहमार्ग जीआरपी थाने ले गए. यह घटना 24 अप्रैल, 2015 की थी. उन दोनों ने थानाप्रभारी शिवाजी शिंदे को पूरी जानकारी देने के बाद अब्दुल करीम की बेटी को तलाश करवाने की मांग की. थानाप्रभारी ने अब्दुल करीम की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद आश्वासन दिया कि वह उन की बेटी को जल्द से जल्द ढूंढने की कोशिश करेंगे. साथ ही उन्होंने इस मामले की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी.

ऐसी भीड़भाड़ वाली जगह से मांबाप के बीच से बच्ची का गायब होना वाकई एक गंभीर मामला था. इसलिए जीआरपी के कमिश्नर मधुकर पांडेय, एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोडे़ अंवुरे भी अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंच गईं. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की. लेकिन बच्ची किस ने चुराई, यह पता नहीं लग सका. तब पुलिस कमिश्नर से विचारविमर्श करने के बाद एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोड़े ने यह केस अपने हाथ में ले लिया. अब्दुल करीम शेख गरीब था. इस से इस बात की आशंका नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए बच्ची का अपहरण किया होगा. निस्संदेह यह किसी दुश्मन या फिर किसी बच्चा चोर गिरोह का काम हो सकता था.

अब्दुल करीम शेख से बात की गई तो उस ने किसी से कोई दुश्मनी और विवाद होने की बात से इनकार किया. इस से साफ हो गया कि यह काम किसी बच्चा चोर या फिर किसी निस्संतान महिला का है. इस के बाद पुलिस ने क्षेत्र के बच्चा चोर गिरोहों की तलाश शुरू कर दी. उन्होंने बच्ची की तलाश के लिए एक पुलिस टीम बनाई. जिस में पुलिस इंसपेक्टर माणिक साठे, योगेंद्र पांचे, असिस्टैंट इंसपेक्टर सुभाष रामण और उन के सहायक गांवकर, शोलके, निकम, पंवार, सालवी, महिला कांस्टेबल परकाले आदि को शामिल किया. उन्होंने सीएसटी रेलवे स्टेशन के सभी सीसीटीवी कैमरों को भी खंगालना शुरू कर दिया.

कैमरों की फुटेज से पुलिस को कुछ सुराग मिले. उस में एक महिला आरिजा को उस की मां रुखसाना के पास से उठा कर एक दूसरी महिला को देती हुई दिखी. दूसरी महिला उस बच्ची को अपनी गोदी में छिपा कर स्टेशन के मेन गेट से बाहर निकली और सामने से आती हुई टैक्सी पकड़ कर निकल गई. उस के जाने के बाद पहली महिला अपने एक साथी के साथ दूसरे गेट से निकल कर कोलकाता जाने वाली ट्रेन में बैठ गई. दोनों महिलाएं कहां से आई थीं और कहां चली गईं. यह पता लगाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर थी.

अब पुलिस का निशाना वह टैक्सी थी जिस में बैठ कर महिला बच्चे को ले कर गई थी. लेकिन मुंबई शहर में चल रही हजारों टैक्सियों में से उसे तलाशना आसान नहीं था. क्योंकि फुटेज में टैक्सी का नंबर भी दिखाई नहीं दे रहा था. पुलिस टीम इसे ले कर परेशान जरूर थी लेकिन निराश नहीं हुई. उन्होंने उस सीसीटीवी फुटेज की कई कौपियां कर के मुंबई सेंट्रल, कुर्ला और सीएसटी रेलवे स्टेशनों पर भी भेज दीं. इस के बाद पुलिस की अलगअलग टीमें इन स्टेशनों पर जा कर ड्राइवरों आदि से बच्ची को ले जाने वाली महिला के बारे में पूछने लगे. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई.

उसे जिस टैक्सी ड्राइवर की तलाश थी इत्तफाक से वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर ही मिल गया. दरअसल पुलिस ने उस ड्राइवर को जब बच्ची ले जाने वाली महिला की फोटो दिखाई तो वह उस महिला को पहचान गया. उस ने बताया कि उस ने उस औरत को मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में छोड़ा था. यह जानकारी पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस टीम मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी पहुंच गई. उस समय रात के लगभग 2 बज रहे थे. पूरा इलाका सुनसान था और लोग अपने घरों में सो रहे थे. टैक्सी ड्राइवर ने जिस जगह पर उस महिला को छोड़ा था, वहां 8-10 इमारतें थीं, जिन में 1100 से 1200 फ्लैट थे. टैक्सी से उतर कर वह महिला किस इमारत में और किस फ्लैट में गई, पता लगाना कठिन था.

रात के समय टीम को उन इमारतों के काफी लोगों की बातें सुननी और उन की नाराजगी झेलनी पड़ सकती थी. लेकिन पुलिस को यह काम रात में ही करना था क्योंकि सुबह होने पर वह महिला शायद कहीं भी जा सकती थी इसलिए लोगों के विरोध की परवाह न करते हुए पुलिस ने अपना बच्चा चोर ढूंढने का औपरेशन शुरू कर दिया. पुलिसकर्मी एकएक इमारत के फ्लैटों की कालबेल बजा कर उस महिला और बच्चे के बारे में पूछताछ करने लगे. पुलिस का यह औपरेशन रात भर चला लेकिन उस महिला का पता नहीं लगा जो बच्ची के साथ टैक्सी से वहां उतरी थी. सुबह करीब 7 बजे पुलिस की मेहनत रंग लाई.

वहीं के एक फ्लैट में रहने वाले डाक्टर माने ने बताया कि इस बारे में अधिक जानकारी तो मुझे नहीं है लेकिन कल रात इस इमारत में रहने वाले दामले परिवार के यहां एक बच्चे का नामकरण और वारसा की पार्टी का आयोजन किया गया था. हालांकि वारसा बच्चे के पैदा होने के बारहवें दिन होता है लेकिन उन के यहां जो बच्चा था वह 3-4 महीने का दिखाई पड़ रहा था. वह बच्चा कुछ बीमार सा भी लग रहा था. जब मैं ने उस बच्चे को करीब से देखने की कोशिश की तो उस की मां ने यह कह कर मना कर दिया था कि छूने से बच्चे को संक्रमण हो सकता है.

डाक्टर माने से दामले का फ्लैट नंबर मालूम कर के पुलिस उस के यहां पहुंच गई. कालबेल बजाने पर एक महिला ने अपनी आंखें मलते हुए दरवाजा खोला तो वह महिला पुलिस को देख कर घबराते हुए बोली, ‘‘कहिए, क्या बात है?’’

‘‘माफ करना मैडम, हम ने सुबहसुबह आप को तकलीफ दी. दरअसल हम लोग एक बच्ची ढूंढ रहे हैं, जो कल सुबह सीएसटी रेलवे स्टेशन से चोरी हो गई थी. हमें खबर मिली कि उस बच्ची को इसी कालोनी में एक औरत ले कर आई है.’’ महिला कांस्टेबल ने उस से कहा.

इस से पहले कि वह महिला कुछ जवाब देती तब तक फ्लैट में से ही एक आदमी निकल कर वहां आ गया. वह बोला, ‘‘बच्ची के विषय में हम लोग कुछ नहीं जानते. हमारे घर में एक छोटा सा लड़का है. जो अभी 12 दिन का हुआ है.’’

वह आदमी उस महिला का पति था.

‘‘आप बच्चे को हमें दिखा सकते हैं?’’ इंसपेक्टर माणिक साठे ने कहा.

यह सुन कर महिला का चेहरा सफेद पड़ गया. लेकिन उस के पति ने कह दिया, ‘‘ठीक है आप उस बच्चे को शौक से देख सकते हैं.’’ कहते हुए वह व्यक्ति पुलिस को फ्लैट के अंदर ले गया. महिला कांस्टेबल ने जब बच्चे को देखा और उस का डायपर हटाया तो वह हैरान रह गई क्योंकि वह बच्चा नहीं बल्कि बच्ची थी और वह भी 12 दिन की नहीं बल्कि 3-4 महीने की थी. साथ में खड़े अब्दुल करीम शेख ने उस बच्ची को पहचानते हुए कहा, ‘‘यही मेरी बच्ची है साहब.’’

पुलिस का यह औपरेशन सफल रहा.  पुलिस टीम भी खुश हो गई. 24 घंटों के अंदर ही बच्ची मिल गई थी. अब उस महिला से कुछ बोलते नहीं बन रहा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस ने अपना नाम कल्पना परमार आशुतोष दामले बताया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. औपरेशन सफल होने की जानकारी कमिश्नर मधुकर पांडेय को दी गई तो वह भी थाने आ गए. कल्पना परमार को मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 7 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान पता चला कि कल्पना परमार ने अपना दांपत्य जीवन बचाने और अपना सच छिपाने के लिए ही बच्ची चोरी करने जैसा जघन्य अपराध किया था. उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार से थी:

39 वर्षीय कल्पना परमार एक साधारण और सभ्य महिला थी. समाज में उस के परिवार की अच्छी प्रतिष्ठा थी. कल्पना के हाईस्कूल पास करते ही मातापिता ने अपने ही समाज के एक युवक के साथ उस का विवाह कर दिया था. अपने भविष्य के सारे सपनों को आंचल में समेट कर कल्पना अपनी ससुराल चली गई. ससुराल में वह काफी खुश थी क्योंकि वहां उसे किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी. पति की अच्छी नौकरी थी, इसलिए उस का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से चल रहा था. समय के साथ वह एक बेटे की मां भी बन गई. बेटे के जन्म के बाद परिवार में खुशी और बढ़ गई. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. कुछ दिनों बाद ही उस के परिवार में विवाद शुरू हो गया.

इस की वजह यह थी कि कल्पना अब और बच्चा नहीं चाहती थी. इसलिए उस ने ससुराल वालों को बिना बताए अपनी नसबंदी करवा ली. पति और सासससुर को जब यह पता चला तो उन्हें कल्पना की यह बात अच्छी नहीं लगी. इसी बात पर घर में विवाद रहने लगा. आखिरकार परिवारिक झगड़ा इतना बढ़ गया कि पति ने कल्पना को तलाक दे दिया. तलाक के बाद कल्पना मायके आ गई. कुछ दिनों बाद उस की मुलाकात आशुतोष दामले से मुंबई के एक अस्पताल में हुई थी. कल्पना उस अस्पताल में अपनी दवा लेने जाती थी. आशुतोष दामले उस अस्पताल में पर्यवेक्षक था. आशुतोष दामले अपने मातापिता और भाईबहन के साथ मुंबई के सायन इलाके में रहता था. उस की कहानी भी कल्पना जैसी ही थी.

उस का भी पत्नी से तलाक हो चुका था. पत्नी उसे छोड़ कर अपने मायके में रह रही थी. कल्पना परमार जब भी दवा लेने अस्पताल जाती तो आशुतोष दामले उस की काफी मदद करता और उस से सहानुभूति दिखाता था. उस की इसी आदत से कल्पना प्रभावित हो गई और उन के बीच दोस्ती हो गई. इसलिए उन की मुलाकातें बढ़ती गईं. यह दोस्ती प्यार में बदल गई. फिर वे साथसाथ घूमतेफिरते और मौजमस्ती करते. बात यहां तक पहुंच गई कि एक दिन दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. जब दोनों ने शादी की बात अपने घरवालों को बताई तो कल्पना के घरवाले इस रिश्ते से सहमत हो गए लेकिन आशुतोष के घरवालों ने मना कर दिया. पर कल्पना के प्यार में पागल आशुतोष ने अपने घरवालों की बात नहीं मानी और उस ने कल्पना के साथ कोर्ट मैरिज कर ली.

घरवालों को शादी की पता न लगे इस के लिए आशुतोष मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में एक फ्लैट किराए पर ले कर रहने लगा. अपने घरवालों को आशुतोष ने यह बता दिया था कि वह अधिक पैसा कमाने के लिए दूसरी जगह पार्टटाइम नौकरी करता है. समय अपनी गति से बीतता रहा. कल्पना और आशुतोष दामले का दांपत्य जीवन बड़े आराम से बीत रहा था. मगर कल्पना के प्यार भरे दांपत्य जीवन में भूकंप उस समय आया जब आशुतोष दामले ने कल्पना से अपनी बढ़ती हुई उम्र की चिंता जताते हुए बच्चे की इच्छा जताई. इतना सुन कर कल्पना एकदम से घबरा गई. क्योंकि वह अपनी नसबंदी करवा चुकी थी, जिस से वह अब कोई बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी.

नसबंदी करवा लेने की बात उस ने आशुतोष से छिपा रखी थी. नसबंदी के कारण ही उस का पहला दांपत्य जीवन टूट गया था. इसीलिए वह डर गई थी कि नसबंदी की बात जान कर कहीं आशुतोष भी उसे तलाक न दे दे. वह दूसरी बार अपना परिवार उजड़ने देना नहीं चाहती थी. औलाद के लिए आशुतोष दामले का बढ़ता दबाव देख कर कल्पना परेशान हो गई. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह आशुतोष को यह बात कैसे बताए कि वह उस की यह इच्छा पूरी नहीं कर सकती. अब वह ऐसा उपाय तलाशने लगी कि घर में बच्चा भी आ जाए और उस का परिवार भी बचा रहे. काफी सोचनेसमझने के बाद उस ने इस समस्या के समाधान का जो रास्ता निकाला वही रास्ता उसे जुर्म तक ले गया.

एक दिन कल्पना ने पति को बता दिया कि अब उस की इच्छा पूरी होने वाली है. वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. पत्नी के गर्भवती होने की बात जान कर आशुतोष खुश हो गया. वह कल्पना का और ज्यादा ध्यान रखने लगा. कल्पना भी समय के अनुसार अपनेआप को ढालने लगी थी. पूरे 9 महीने वह इस प्रकार से रही कि पति के अलावा आसपास वालों को भी उस पर कोई संदेह न हो. जैसेजैसे समय गुजरता जा रहा था, कल्पना अपने शरीर की बनावट भी वैसी ही कर रही थी. पेट आगे आने के लिए वह कपड़ों का सहारा ले रही थी. यह बात राज ही रहे, इस के लिए उस ने पति को अपने से दूर ही रखा. आसपास वालों को भी खुद को गर्भवती बताती थी.

बच्चे की डिलीवरी में जब कुछ दिन शेष रह गए तो अपना नाटक सफल बनाने के लिए वह चेकअप करवाने के बहाने बच्चे की तलाश में निकल जाती थी और हाल ही में जन्मे बच्चे को तलाश करती. इस बारे में उस ने 1-2 नर्सों से भी बात की. जब वहां बात नहीं बनी तो वह मुंबई के उन अनाथालयों में गई, जहां से बच्चे गोद लिए जाते थे. वहां उसे नवजात शिशु मिल तो रहे थे लेकिन उन के गोद लेने की प्रक्रिया जटिल थी. प्रक्रिया देख कर उस की हिम्मत पस्त हो गई. इस के बाद कल्पना ने उन महिलाओं से संपर्क किया, जो रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर छोटे बच्चे को ले कर भीख मांगती थीं. उन महिलाओं से उस ने बात की तो उन्होंने भी उसे अपना बच्चा देने से मना कर दिया.

उस की तथाकथित डिलीवरी का समय पूरा हो चुका था लेकिन अभी तक बच्चे के बारे में उस की किसी से बात नहीं बन पाई. वह परेशान हो गई कि अब वह पति को बच्चा कहां से ला कर देगी. कहीं से कोई बच्चा मिलता न देख आखिरकार उस ने कोई नवजात शिशु चोरी करने की योजना बनाई. उस ने सोचा कि कहीं न कहीं से उसे कोई नवजात मिल जाएगा तो वह किसी तरह उसे चुरा कर ले जाएगी. एक दिन वह घर से अस्पताल जाने को कह कर घर से निकल गई. पति अपनी ड्यूटी पर निकल गया. कल्पना ने उस दिन पति को फोन कर के यह खुशखबरी दे दी कि उस ने एक लड़के को जन्म दिया है.

बेटा पैदा होने की खबर पा कर आशुतोष दामले बहुत खुश हुआ. लेकिन उस दिन आशुतोष दामले का यह दुर्भाग्य ही था कि एक इमरजेंसी केस में 24 घंटे की ड्यूटी लग जाने की वजह से अपने बच्चे को देखने के लिए नहीं जा सका. अगले दिन वह पत्नी द्वारा बताए अस्पताल पहुंचा तो कल्पना उसे उस अस्पताल के बाहर ही मिल गई. पति को उस ने बताया कि बच्चा किसी खतरनाक बीमारी से ग्रस्त है. इसलिए डाक्टरों ने उसे 10-12 दिनों के लिए किसी दूसरे अस्पताल में भेज दिया है. डिलीवरी नार्मल हुई थी. इसलिए डाक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर घर जाने के लिए कह दिया. सीधेसाधे आशुतोष ने कल्पना की बातों पर विश्वास कर लिया और पत्नी के साथ घर लौट आया. अपने कामों में व्यस्त होने के कारण आशुतोष ने बच्चे का सारा काम पत्नी पर ही छोड़ दिया था.

इसी बीच कल्पना को बच्चे की व्यवस्था करनी थी. यह उस के लिए बड़ी ही मुश्किल घड़ी थी. बच्चा कहां से लाए यह समस्या उस के सामने अब भी खड़ी थी. अगर इन 10-12 दिनों में बच्चे का बंदोबस्त नहीं हुआ तब वह क्या करेगी. आखिरकार धीरेधीरे वह समय भी नजदीक आ गया, जब उसे बच्चा घर लाना था. उस दिन वह सुबहसुबह पति के साथ ही घर से बाहर निकली. बच्चा चोरी करने के इरादे से पहले वह विरार के एक मंदिर गई. लेकिन वहां भीड़भाड़ को देख कर वह घबरा गई. वहां अपनी दाल गलते हुए न देख वह विरार से सीधे ट्रेन पकड़ कर मुंबई के चर्चगेट स्टेशन आ गई. वहां से टैक्सी की और सीएसटी रेलवे स्टेशन पहुंच गई. अब तक काफी रात हो गई थी. लेकिन यहां भी उस की हिम्मत फेल हो गई थी.

अपने वादे के मुताबिक कल्पना को सुबह बच्चा ले कर घर पहुंचना था. परेशान कल्पना थक कर मुसाफिरखाने में खाली पड़ी एक बेंच पर बैठ गई. उसी बेंच पर कुछ समय बाद एक महिला और एक पुरुष आ कर बैठ गए. उस महिला ने कल्पना का उदास चेहरा देखा तो उस से बातचीत शुरू कर दी. उस ने कल्पना को अपना नाम सुनंदा और साथ में आए युवक को अपना देवर बताया था. सुनंदा पर विश्वास हो जाने के बाद कल्पना ने उसे अपनी दुखभरी कहानी सुना दी. उस की कहानी सुन कर उस महिला ने इधरउधर देखा. और निडर भाव में कहा, ‘‘देख तेरे सामने ही एक सुंदर सी बच्ची सोई हुई है. उस की मां तो जैसे घोड़े बेच कर सो रही है.

जा, उसे उठा ले और ले कर निकल जा. अगर तेरी हिम्मत नहीं पड़ रही है तो मुझे बता. मैं तेरी मदद कर दूंगी. लेकिन इस के बदले में तू मुझे क्या देगी? मुझे कोलकाता जाना है.’’

वह 4 महीने की बच्ची अब्दुल करीम शेख की थी जो अपनी मां रुखसाना के बगल में सो रही थी. कोई नवजात न मिलने पर कल्पना उस बच्ची को ही ले जाने के लिए तैयार हो गई. सुनंदा की यह बात सुन कर कल्पना कुछ समय तक खामोश रही. फिर बताया कि उस के पास इस समय सिर्फ 15 हजार रुपए हैं. सुनंदा ने कल्पना से वह 15 हजार रुपए लिए और इधरउधर देख कर रुखसाना की 4 माह की बच्ची को उठा कर उस की गोदी में डाल कर कहा, ‘‘अब तू जल्दी निकल जा यहां से. मैं भी निकलती हूं. मेरी ट्रेन जाने वाली है.’’

कल्पना बच्ची को गोदी में छिपा कर सीएसटी स्टेशन के मैन गेट से निकल कर टैक्सी द्वारा अपने घर पहुंच गई. सुनंदा नामक औरत अपने देवर के साथ दूसरे गेट से चली गई थी. कल्पना जिस समय बच्चे को ले कर घर पहुंची उस समय उस का पति आशुतोष दामले घर पर ही था. वह कल्पना को देख कर काफी खुश हुआ था. बच्चे के घर आने की खुशी में आशुतोष ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी और रात को बड़ी धूमधाम से बच्चे का वारसा और नामकरण की पार्टी का आयोजन किया. उस पार्टी में उस ने अपने जानपहचान वालों को भी बुलाया था. उस कार्यक्रम में उसी बिल्डिंग में रहने वाले डाक्टर माने का भी परिवार आया था.

कल्पना का सच तो सामने आ गया. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं लग सका कि सुनंदा नाम की महिला जिस ने बच्ची चुरा कर दी थी वह कहां की रहने वाली है. कल्पना से पूछताछ के बाद पुलिस ने सुनंदा का एक स्कैच तैयार करवा कर मुंबई तथा कोलकाता में सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवा दिए हैं ताकि उस के बारे में सुराग मिल सके. रिमांड अवधि पूरी होने से पहले ही पुलिस ने कल्पना परमार को न्यायालय में फिर से पेश किया जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस मामले में कल्पना के पति की कोई गलती नहीं थी इसलिए पुलिस ने उस के बयान ले कर उसे घर भेज दिया.

कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद पुलिस ने बच्ची उस के मांबाप को सुपुर्द कर दी. सुनंदा का अभी तक कोई पता नहीं चल सका. मामले की तफ्तीश सीनियर पुलिस इंसपेक्टर शिवाजी शिंदे कर रहे हैं. Mumbai Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jharkhand News: अंधविश्वास का खौफनाक अंजाम – डायन बताकर महिला से की गई मारपीट

Jharkhand News: एक ऐसी घटना सामने आई है, जिस में डायन बताकर एक महिला के साथ मारपीट की गई और उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई. आखिर क्यों एक महिला के साथ ऐसा गलत व्यवहार किया गया. इस महिला के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है, आइए जानते हैं, इस क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो आप को भी हैरान कर देगी.

यह सनसनीखेज घटना झारखंड के  सरायकेला खरसावां जिले के छोटा गम्हरिया गांव की है. यहां अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के चलते शीला महतो नाम की महिला को डायन बताकर उस के साथ बेरहमी से मारपीट की गई. डर के साए से जी रही पीड़िता शीला महतो ने मंगलवार को परिवार परामर्श केंद्र, कोलाबिस में शिकायत कर आरोप लगाया कि 15 नवंबर, 2025 की रात उस के पड़ोस में रहने वाले माया महतो, मंजू महतो, दिनेश महतो और महादेव महतो ने उस के घर में घुसकर लोहे के औजार से हमला किया था. इसी हमले से वह गंभीर रूप से घायल हो गई.

शीला महतो का कहना है कि आरोपियों ने उन्हें डायन करार देते हुए जान से मारने की धमकी भी दी. इस के साथ ही शीला के साथ उत्पीड़न लगातार जारी है. पिछले 2 दिनों से आरोपी उस के घर आ कर दुर्व्यवहार और धमकियां दे रहे हैं, जिस से वह और उस का परिवार दहशत में है.

पीड़िता शीला महतो ने परिवार परामर्श केंद्र में पद्मश्री से सम्मानित छुटनी महतो से मुलाकात की. इस के बाद केंद्र संचालिका ने मामले को गंभीरता से लिया और शीला महतो को कानूनी सहायता और सुरक्षा का आश्वासन भी दिया है.

उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं समाज के लिए बेहद चिंताजनक हैं और डायन प्रताड़ना कानून के तहत दोषियों पर सख्त काररवाई होनी चाहिए. मामले की जानकारी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को भेजी जा रही है.

इस घटना के बाद परिवार डरा हुआ है और ग्रामीणों ने भी इस घटना पर गहरी चिंता जताते हुए प्रशासन से तत्काल और कड़ी काररवाई की मांग की है. Jharkhand News

Hindi Stories: बस एक बेटा चाहिए

Hindi Stories: मेहनतमजदूरी कर के जीविका चलाने वाली शंकरी की 3 बेटियां थीं, चौथा बच्चा पेट में था. आखिर उस की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि वह बच्चे पर बच्चे पैदा किए जा रही थी. जिस तरह उस बूढ़े बरगद के पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था, उसी तरह उस के नीचे बायस्कोप लिए खड़ी उस औरत, जिस का नाम शंकरी था, की उम्र का भी अंदाजा लगाना आसान नहीं था. वह चला तो बायस्कोप रही थी, लेकिन उस का ध्यान लोहे के 4 पाइप खड़े कर के साड़ी से बने झूले में सो रही अपनी 2 साल की बेटी पर था.

अगर झूले में लेटी बेटी रोने लगती तो वह बायस्कोप जल्दीजल्दी घुमाने लगती. बायस्कोप देखने वाले बच्चे शोर मचाते तो वह कहती, ‘‘लगता है, बायस्कोप खराब हो गया है, इसीलिए यह तेजी से घूमने लगा है.’’

बायस्कोप का शो खत्म कर के शंकरी बेटी को गोद में ले कर चुप कराने लगती. लेकिन बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस से झगड़ने लगते. झगड़ते भी क्यों न, उन्होंने जिस आनंद के लिए पैसे दिए थे, वह उन्हें मिला नहीं था. औरत बच्चे के रोने का हवाला देती, फिर भी वे बच्चे न मानते. उन्हें तो अपने मनोरंजन से मतलब था, उस के बच्चे के रोने से उन्हें क्या लेनादेना था. शंकरी उन्हें समझाती, दोबारा दिखाने का आश्वासन भी देती, क्योंकि उसे भी तो इस बात की चिंता थी कि अगर उस के ये ग्राहक बच्चे नाराज हो गए तो उस की आमदनी बंद हो जाएगी. लेकिन उस की परेशानी यह थी कि वह बेटी को संभाले या ग्राहक. बेटी को भी रोता हुआ नहीं छोड़ा जा सकता था.

शंकरी के चेहरे पर मजबूरी साफ झलक रही थी. बच्चों की जिद पर मजबूरन उसे बच्ची को रोता छोड़ कर बायस्कोप के पास जाना पड़ता, क्योंकि बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस का ज्यादा देर तक इंतजार नहीं कर सकते थे. शंकरी की अपनी बच्ची रोती रहती और वह दूसरों के बच्चों का मनोरंजन कराती रहती. बच्ची रोरो कर थक जाती लेकिन वह उसे गोद में न ले पाती. वह उसे तभी गोद में उठा पाती, जब उस के ग्राहकों की भीड़ खत्म हो जाती. ग्राहकों के जाते ही वह दौड़ कर बच्ची को गोद में उठाती, प्यार करती और झट से साड़ी के पल्लू के नीचे छिपा कर दूध पिलाने लगती. तब उस के चेहरे पर जो सुकून होता, वह देखने लायक होता.

शंकरी ने बच्ची को प्यार करने के लिए अपना घूंघट थोड़ा खिसकाया तो थोड़ी दूर पर बेटी को मेला दिखाने आई संविधा की नजर उस के चेहरे पर पड़ी. उस का गोरा रंग धूप की तपिश से मलिन पड़ गया था. अभी भी गरम सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों के बीच से छनछन कर उस के चेहरे पर पड़ रही थीं. भूरे बालों को उस ने करीने से गूंथ कर मजबूती से बांध रखा था. आंखों में काजल की पतली लकीर, माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, गोल चेहरा, जिस में 2 बड़ीबड़ी आंखें, जो दूध पीते बच्चे को बड़ी ममता से निहार रही थीं. कभीकभी उस की आंखें बेचैनी से उस ओर भी घूम जातीं, जो उस का बायस्कोप देखने के लिए उस के इंतजार में खड़े थे.

जैसे ही बेटी ने दूध पीना बंद किया, शंकरी के चेहरे पर आनंद झलक उठा. बच्ची अभी भी उस की गोद में लेटी थी और अधखुली आंखों से उसे ताकते हुए अपनी नन्ही हथेलियों से उस के माथे और गालों को सहला रही थी. औरत ने गौर से बच्ची को देखा, उस के चेहरे पर आनंद की जगह दुख की बदली छा गई. उस की आंखों से आंसू की 2 बूंदें टपक पड़ीं, जो बच्चे के चेहरे पर गिरीं. उस ने जल्दी से साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछा. बच्ची अब तक नींद के आगोश में चली गई थी.

शंकरी ने तमाशा देखने वालों को देखा. वे सभी उसे ही ताक रहे थे. उस ने बहुत हलके से बच्ची को झूले में लिटाया. बरगद के नीचे मक्खियों और कीड़ों की भरमार थी, इसलिए बच्ची को उन से बचाने के लिए एक बारीक कपड़ा उस के चेहरे पर डाल दिया, जिस से बच्ची आराम से सोती रहे. जैसे ही वह बच्ची के पास से हटी, बच्ची फिर रोने लगी. उस के रोने से वह बेचैन हो उठी. उस ने बायस्कोप के पास से ही रोती बच्ची को देखा, लेकिन मजबूरी की वजह से वह उसे उठा नहीं सकी. बायस्कोप देखने वाले बच्चों से पैसे ले कर उन्हें बैठा दिया. बच्ची रोती रही, 1-2 बार तो ऐसा लगा जैसे उस की सांस रुक गई है, लेकिन वह रोतीरोती सो गई.

थोड़ी देर बाद एक छोटी लड़की, जो 4 साल के आसपास रही होगी, सो रही बच्ची के पास से गुजरती हुई शंकरी के पास आ कर उस की साड़ी का पल्लू मुंह में डाल कर लौलीपाप की तरह चूसने लगी. वह शायद शंकरी की झूले में लेटी बेटी से बड़ी थी. उस की लार से शंकरी की साड़ी का पल्लू गीला हो गया. शंकरी की यह दूसरी बेटी घुटने तक लाल रंग का फ्रौक पहने थी. उस के पैर धूल से अटे हुए थे, आंखें पीली, मैलेकुचैले बाल, जो बूढ़े टट्टू की पूंछ की तरह बंधे हुए थे. उन में से कुछ खुले बाल उस के मटमैले चेहरे पर बिखरे हुए थे. लड़की ने शंकरी से उस के कान में फुसफुसा कर कुछ कहा. उस ने ऐसा न जाने क्या कहा कि शंकरी ने खीझ कर उसे कोहनी से झटक दिया. लड़की रोते हुए जमीन पर लेट गई, जिस से उस का पूरा शरीर धूल से अट गया.

तमाशा देखने वाले बच्चे इन सभी चीजों से बेपरवाह और बेखबर अपनी आंखें बायस्कोप के छोटे से गोल शीशे पर जमाए बक्से के अंदर का नजारा देख रहे थे, जो शायद उन्हें कुछ इस तरह मजा दे रहा था, जैसे वे सिनेमाहाल में कोई फिल्म देख रहे हों. यह उन के जोश और दीवानगी से पता चल रहा था. झूले में लेटी बच्ची एक बार फिर रोने लगी. शंकरी ने बगल में जमीन पर लोट रही बेटी को 5 रुपए का सिक्का दिखाया तो वह तुरंत  उठ कर खड़ी हो गई और शरीर पर चिपकी धूल को झाड़ते हुए मां के हाथ से सिक्का झपट लिया. उस के चेहरे पर आंसुओं की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं. हाथ में सिक्का आते ही वह उत्साह और खुशी से उछलतीकूदती रोती हुई छोटी बहन के पास आई और उसे झूले से उठा कर अपनी छोटी सी कमर के सहारे गोद में ले कर थोड़ी दूरी पर स्थित एक छोटी सी दुकान की ओर चल पड़ी.

शंकरी बायस्कोप जरूर चला रही थी, लेकिन उस का ध्यान कहीं और ही था. उसी समय उस के पास एक अन्य लड़की आई, जिस की उम्र बामुश्किल 6 साल रही होगी. उस की पीली रंग की सलवारसमीज मैल की वजह से काली पड़ चुकी थी. कुछ पल मांबेटी आपस में कानाफूसी करती रहीं, उस के बाद वह लड़की वहीं मां के पास बैठ गई और अपने धूल भरे पैर मजे से हिलाने लगी. लेकिन उस की पीली आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. वह पैर हिलाते हुए वहां घूमने आए ताजा चेहरे वाले बच्चों और उन के मांबाप को ललचाई नजरों से ताक रही थी, क्योंकि वे अपने बच्चों की बड़ी से बड़ी इच्छाएं पूरी कर रहे थे.

तमाशा देखने वाले बच्चे जब चले गए तो वह आ कर मां के पास बैठ गई. मां उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकराई. बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस में देखे गए तमाशे के बारे में चर्चा करते हुए हंस रहे थे. उसी बीच हवा का एक ऐसा झोंका आया, जिस से उस औरत का आंचल उड़ गया. उस के उभरे हुए पेट पर संविधा की नजर पड़ी, शायद वह गर्भवती थी. संविधा ने उभार से अंदाजा लगाया, कम से कम 6 महीने का गर्भ रहा होगा. अपने कमजोर शरीर के पेट पर उस छोटे से उभार के साथ शंकरी मुश्किल से बेटी के साथ जमीन पर बैठ गई. उस की इस 6 साल की बेटी ने प्यार से उसे मां कहा तो वह बेटी की आंखों में झांकने लगी.

उसी समय धोतीकमीज पहने और सिर पर मैरून रंग की पगड़ी बांधे एक आदमी मांबेटी के पास आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही लड़की उसे बापू कह कर उस से चिपक गई और उस के गालों तथा मूंछों को सहलाने लगी. लेकिन उस आदमी ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह शंकरी से बातें करने में व्यस्त था. संविधा को समझते देर नहीं लगी कि वह आदमी शंकरी का पति है. वह आदमी उसी को देख रहा था, जबकि उस की नजरें अपने चारों ओर घूमते लोगों पर टिकी थीं. लड़की अपनी बांहें बापू के गले में डाल कर झूल गई तो वह उसे झटक कर उठ खड़ा हुआ और मेले की भीड़ में गायब हो गया.

लड़की संविधा के पास आ कर खड़ी हो गई. उस की नजरें उस के हाथ में झूल रही पौलीथिन में रखे चिप्स के पैकेट पर जमी थीं. वह उन चीजों को इस तरह ललचाई नजरों से देख रही थी, जैसे जीवन में कभी इन चीजों को नहीं देखा था. उस की तरसती आंखों में झांकते हुए संविधा ने चिप्स का पैकेट उसे थमाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

अब उस की नजरें संविधा की बेटी के लौलीपाप पर जम गई थीं, जिसे वह चूस रही थी. वह उसे इस तरह देख रही थी, जैसे उस की नजरें उस पर चिपक गई हों. संविधा ने उस का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कहा, ‘‘लौलीपाप खाओगी?’’

उस ने मुसकराते हुए हां में सिर हिलाया. संविधा ने पर्स में देखा कि शायद उस में कोई लौलीपाप हो, लेकिन अब उस में लौलीपाप नहीं था. संविधा को लगा, अगर उस ने लड़की से कहा कि लौलीपाप नहीं है तो उसे दुख होगा. इसलिए उस ने पर्स से 10 रुपए का नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘जाओ, अपने लिए लौलीपाप ले आओ.’’

लड़की मुसकराते हुए 10 रुपए के नोट को अमूल्य उपहार की तरह लहराती हुई मेले की ओर भागी. लड़की के जाते ही संविधा शंकरी को देखने लगी. वह काफी व्यस्त लग रही थी. वह बायस्कोप देखने वालों को शो दिखाते हुए सामने से गुजरने वालों को बायस्कोप देखने के लिए आवाज भी लगा रही थी. 4 साल की उस की जो बेटी अपनी छोटी बहन को ले कर गई थी, अब तक मां के पास वापस आ गई थी. उस ने बरगद के पेड़ के चारो ओर बने चबूतरे पर छोटी बहन को बिठाया और अपना हाथ मां के सामने कर दिया, जिस में वह खाने की कोई चीज ले आई थी. शायद वह उसे मां के साथ बांटना चाहती थी. अब तक बड़ी बेटी भी आ गई थी. उस ने भी अपनी मुट्ठी मां के सामने खोल कर अंगुली से संविधा की ओर इशारा कर के धीमे से कुछ कहा.

शंकरी ने संविधा की ओर देखा. नजरें मिलने पर वह मुसकराने लगी. उस परिवार को देखतेदेखते अचानक संविधा के मन में उस के प्रति आकर्षण सा पैदा हो गया तो उस के मन में उन लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गई. शायद शंकरी के लिए उस के दिल में दया पैदा हो गई थी. उस की स्थिति ही कुछ ऐसी थी, इसीलिए संविधा उस की कहानी जानना चाहती थी. धीरेधीरे संविधा शंकरी की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख शंकरी खड़ी हो गई. उसे लगा, शायद संविधा बेटी को बायस्कोप दिखाने आ रही है, इसलिए उस ने बायस्कोप का ढक्कन खोलने के लिए हाथ बढ़ाया. संविधा ने कहा, ‘‘मुझे इस मशीन में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो आप से मिलने आई हूं.’’

संविधा की इस बात से शंकरी को सुकून सा महसूस हुआ. वह चबूतरे पर खेल रही छोटी बेटी के पास बैठ गई. संविधा ने उस की तीनों बेटियों की ओर इशारा कर के पूछा, ‘‘ये तीनों तुम्हारी ही बेटियां हैं?’’

‘‘जी.’’ शंकरी ने जवाब दिया.

‘‘ये कितनेकितने साल की हैं?’’

शंकरी ने हर एक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘6 साल, 4 साल और सब से छोटी डेढ़ साल की है.’’

इस के बाद उस के उभरे हुए पेट पर नजरें गड़ाते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘शायद तुम फिर उम्मीद से हो?’’

‘‘जी.’’ उस ने लंबी सी सांस लेते हुए कहा.

‘‘कितने महीने हो गए?’’

‘‘6 महीने.’’

संविधा शंकरी को एकटक ताकते हुए उस की दुख भरी जिंदगी के बारे में सोचने लगी, शायद यह बच्चे पैदा करने को मजबूर है. यह कितनी तकलीफ में है. उस की परेशानियों को देखते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी उम्र कितनी होगी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रही तो नजरें झुका लीं.

संविधा को आघात सा लगा. उस ने उस के दुख और मजबूरी भरे जीवन की अपने शानदार और ऐशोआराम वाले जीवन से तुलना की, तब उसे लगा कि इस दुनिया में शायद दुख ज्यादा और सुख कम है. उस ने पूछा, ‘‘आप हर साल एक बच्चा पैदा कर के थकी नहीं?’’

‘‘इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है.’’ शंकरी ने ठंडी आह भरते हुए जवाब दिया.

‘‘आप बहुत बहादुर हैं. मेरे वश का तो नहीं है.’’

‘‘मेरी मजबूरी है. मेरे पति चाहते हैं कि उन का एक बेटा हो जाए, जिस से उन के परिवार का नाम चलता रहे.’’

‘‘नाम चलता रहे..?’’ संविधा ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा. उस पर उसे तरस भी आया. क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस के जो बच्चे थे, उन्हें ही वह ठीक से पालपोस सकती. जबकि सिर्फ नाम चलाने के लिए वह बच्चे पर बच्चे पैदा करने को तैयार थी. संविधा को झटका सा लगा था. वह उस से कहना चाहती थी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं रहा. दोनों बराबर हैं. उस की केवल एक ही बेटी है, जिस से वह और उस के पति खुश हैं. लड़कियां लड़कों से ज्यादा बुद्धिमान और प्रतिभाशाली निकल रही हैं. वे मातापिता की बेटों से ज्यादा देखभाल करती हैं. देखो न लड़कियां पहाड़ों पर चढ़ रही हैं, उन के कदम चांद पर पहुंच गए हैं.

लेकिन वह कह नहीं पाई. उस के मन में आया कि वह उस से पूछे कि अगर इस बार भी बेटी पैदा हुई तो..? क्या जब तक बेटा नहीं पैदा होगा, वह बच्चे पैदा करती रहेगी? अगर उसे बेटा पैदा ही नहीं हुआ तो वह क्या करेगी? इस तरह के कई सवाल संविधा के मन में घूम रहे थे. उस की गरीबी और बेटा पाने की चाहत के बारे में सोचते हुए उसे लगा, अगर यह इसी तरह बच्चे पैदा करती रही तो इस की हालत तो एकदम खराब हो जाएगी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘वह लोकगीत गाते हैं.’’ शंकरी ने कहा.

‘‘लोकगीतों का कार्यक्रम करते हैं?’’

‘‘नहीं, मेलों या गांवों में घूमघूम कर गाते हैं.’’

संविधा को याद आया कि जब वह मेले में प्रवेश कर रही थी तो कुछ लोग चादर बिछा कर ढोलक और हारमोनियम ले कर बैठे थे. वे लोगों की फरमाइश पर उन्हें लोकगीत और फिल्मी गाने गा कर सुना रहे थे.

संविधा समझ गई कि ये लोग कहीं बाहर से आए हैं. उस ने पूछा, ‘‘लगता है, तुम लोग कहीं बाहर से आए हो? अपना गांवघर छोड़ कर कहीं बाहर जाने में तुम लोगों को बुरा नहीं लगता?’’

‘‘हमारे पास इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है.’’

‘‘क्यों? जहां तुम लोग रहते हो, वहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है?’’

‘‘काम और कमाई होती तो हम लोग इस तरह मारेमारे क्यों फिरते?’’

‘‘लेकिन तुम लोग अपने यहां खेती भी तो कर सकते हो?’’ संविधा ने सुझाव दिया.

‘‘कैसे मैडम, हमारी सारी जमीनों पर दबंगों और महाजनों ने कब्जा कर लिया है. क्योंकि हम ने उन से जो कर्ज लिया था और उसे अदा नहीं कर पाए.’’

‘‘तुम लोगों ने अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों नहीं किया?’’

‘‘मैडम, हम बहुत कमजोर लोग हैं और वे बहुत शक्तिशाली. उन के पास पैसा भी है और ताकत भी. हम उन से दुश्मनी कैसे मोल ले सकते हैं.’’

‘‘लेकिन तुम लोग यह सब सह कैसे लेते हो?’’ ‘‘हम बहुत ही असहाय और बेबस लोग हैं.’’ शंकरी ने लंबी सांस ले कर जमीन पर खेल रही बच्ची का मुंह साड़ी के पल्लू से साफ करते हुए कहा.

संविधा के दिमाग में तमाम सवाल उठ रहे थे, लेकिन उसे लगा कि बुद्धिमानी इसी में है कि वह उस से उन सवालों को न पूछे. चेहरे से शंकरी अभी जवान लग रही थी, लेकिन हालात की वजह से चेहरा पीला और सूखा हुआ था. शायद ऐसा गरीबी और बच्चे पैदा करने की वजह से था. संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी कितने साल में हुई थी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, मगर नाकाम रही.

‘‘तुम यहां कब आई?’’

‘‘जब यह मेला शुरू हुआ.’’

‘‘तुम लोगों के दिन कैसे गुजरते हैं?’’

‘‘सुबह जहां रहते हैं, वहां की साफसफाई करते हैं. दोपहर को ही रात का भी खाना बना लेते हैं, क्योंकि हमारे पास उजाले की व्यवस्था नहीं है. उस के बाद अपने काम में लग जाते हैं. लड़कियां टोलियों में नाचनेगाने क काम करती हैं. शादीशुदा महिलाएं मेरी तरह बायस्कोप दिखाती हैं तो कुछ कठपुतली का नाच दिखाती हैं. कुछ मेहंदी लगाने का भी काम करती हैं.’’

संविधा ने इधरउधर देखा. दूरदूर तक कोई इमारत नहीं थी. मैदान पर मेले में आए दुकानदारों के तंबू लगे थे. मन में जिज्ञासा जागी तो उस से पूछा, ‘‘तुम पूरे दिन इसी तरह बिना आराम के काम करती हो. ऐसे में तुम्हारे बच्चों की देखभाल कौन करता है?’’

‘‘मेरी बड़ी बेटी इन दोनों बेटियों को संभाल लेती है.’’

‘‘इन का खानापीना और नहानाधोना?’’

‘‘बड़ी बेटी छोटी को नहला देती है, बीच वाली खुद ही नहा लेती है.’’

संविधा ने अपनी 8 साल की बेटी पर नजर डाली, उस के बाद शंकरी की एकएक कर के तीनों बेटियों को देखा. छोटी बेटी अभी भी मां के पास चबूतरे पर खेल रही थी. संविधा ने सोचते हुए एक लंबी सांस ली. कुछ देर वह शंकरी और उस की बेटियों को देखती रही. उस का दिल उन के लिए सहानुभूति से भर गया. उस ने पर्स से 10-10 रुपए के 2 नोट निकाले और खेल रही लड़कियों को थमा दिए. इस के बाद वह चलने लगी तो देखा, कुछ बच्चे उधर आ रहे थे. उन्हें आते देख कर शंकरी अपने बायस्कोप के पास जा कर खड़ी हो गई, लेकिन उस की नजरें चबूतरे पर खेल रही बेटी पर ही जमी थीं.

शाम को संविधा घर पहुंची तो उस के दिलोदिमाग में शंकरी और उस की बेटियां ही छाई थीं. वह भी एक औरत थी, इसलिए उस ने प्रार्थना की कि काश! उस के गमों का सिलसिला खत्म हो जाए और उस की इच्छा पूरी हो जाए. इस बार उसे बेटा पैदा हो जाए. Hindi Stories

अनुवाद: एम.एस. जरगाम

Social Crime: देह के दलदल में देश की दत्तक बेटियां

Social Crime: अंजना के होंठों पर गहरी लाल लिपस्टिक दूर से चमक रही थी. शैंपू और कंडीशनर से चमकते लहराते बाल, आंखों के सामने लटकती लटों के बीच चेहरा पाउडर और क्रीम के मेकअप से दमक रहा था. नए कपड़े के पहनावे में उस का यौवन खिल उठा था. एक दिन पहले ही वह मुंबई से अपने गांव आई थी. हाथ में पर्स लटकाए गांव की गलियों में इठलाती घूम रही थी. कलाई में खनकती नई चूडि़यों की आवाज से गांव के हर किसी की नजर बरबस उठ रही थी. उसे देखते ही सामने से आ रही गांव की सिलमिना ने टोका, ‘‘अरे अंजना, तू तो हीरोइन लग रही है. कब आई रे?’’

‘‘कल ही तो शाम को मुंबई से आई हूं, मैं तुम्हारे घर ही जा रही थी.’’ अंजना चहकती हुई बोली.

दोनों बचपन की सहेलियां थीं. प्यार से अंजना ने पूछा, ‘‘कैसी है रे तू?’’

यह सुन कर सिलमिना का चेहरा उतर गया. उदासी से आंखें नम हो गईं. धीरे से बोली, ‘‘अब तुम्हें क्या बताऊं अपनी हालत, देख ही रही हो. यहां न भरपेट खाने को मिलता है और न ही पहनने को अच्छे कपड़े. सब कुछ तो तुम जानती ही हो, बस तरसते हुए जी रही हूं.’’ सिलमिना बोली. अंजना ने उस के हाथों को पकड़ लिया, फिर गले लग गई. उस का ऐसा करना सिलमिना को अच्छा लगा. वह थोड़ी सहज हुई. बोली, ‘‘तू तो एकदम नहीं बदली!’’

‘‘वह सब छोड़, बता तू मेरे साथ मुंबई चलेगी?’’ अंजना ने अपनी सहेली सिलमिना से सीधा सवाल किया.

इस के लिए सिलमिना तैयार नहीं थी. वह उसे एकटक देखने लगी.

‘‘अरे, तू देखती क्या है यह देख मुझे, सब कुछ मुंबई में ही तो मिला है. अरे वहां स्वर्ग है, स्वर्ग.’’ अंजना बोली.

‘‘मैं तो चली चलूं, मगर मां का क्या होगा?’’ सिलमिना ने चिंता जताई.

‘‘मां की फिक्र तुम मत करो, मां के पास हर महीने पैसे भेज देना.’’ अंजना ने सुझाव दिया.

‘‘क्या, सचमुच ऐसा हो सकता है? मुझे वहां इतने पैसे मिल जाएंगे कि मैं मां को भी पैसे भेज सकती हूं.’’ सिलमिना बोली.

‘‘ और नहीं तो क्या?’’ अंजना बोली.

‘‘तो फिर जैसा तुम कहो मैं चलने को तैयार हूं.’’

अंजना से बात कर सिलमिना की आंखों में चमक आ गई थी. उसे अंजना ने एक अद्भुत आत्मविश्वास से भर दिया था. दोनों छत्तीसगढ़ के बीहड़ जंगलों में निवास करने वाली कोरवा समुदाय की थीं.

वहां के लोगों के पास कोई ठोस कामधंधा नहीं था, जिस से उन का पेट भर पाता और वे सामान्य जीवन गुजार पाते. ऐसे में सभी अभावग्रस्त दर्दभरी जिंदगी गुजार रहे थे. जब भी अंजना गांव आती थी, तब बहुत परिवारों के लिए वह आशा की किरण बन जाती. परिवार में बुजुर्ग मांबाप को लगता था कि उन की बेटी को दिल्ली या मुंबई में घरेलू नौकरानी का काम मिल जाएगा. सिलमिना अपनी सहेली अंजना के कहने पर मुंबई जाने के लिए तैयारी में जुट गई. उस के अलावा गांव की कुछ और लड़कियां भी तैयार हो गईं, जो आसपास के इलाके की थीं.

उन्हें अंजना ने विश्वास दिलाया था कि सभी को मुंबई या दिल्ली में काम मिल जाएगा. जो जहां जाना चाहे चल सकती है, उस की जानपहचान दोनों जगहों के काम दिलाने वाले खास लागों से है. उस के भरोसे पर 14 से 18 साल के उम्र की कुल 16 लड़कियां अच्छी जिंदगी की उम्मीद में गांव से महानगर के लिए निकल पड़ीं. उन्हें अंजना ने बताया कि महानगरों में घरेलू काम करने वाली लड़कियों की बहुत कमी है. घर में साफसफाई करने, कपड़ेलत्ते धोने और बरतन मांजने का काम करना होता है. उस के काम के हिसाब से महीने में पगार मिलता है.

खाने और रहने का इंतजाम मालकिन द्वारा ही किया जाता है. उस का पैसा नहीं लगाता है. बीचबीच में उपहार भी मिलता रहता है. किसी अतिथि के आने पर वे अलग से पैसे दे जाते हैं. यह सब अंजना समझा ही रही थी कि एक लड़की मधु पूछ बैठी, ‘‘दीदी और क्या करना होता है?’’

‘‘और क्या करना है, घर में बच्चे हों तो उन्हें खिलाओ, घुमाओ और आराम की जिंदगी गुजारो.’

‘‘इन सब के लिए कितने पैस मिल जाते हैं दीदी?’’ उत्सुकता से मधु ने पूछा.

‘‘पैसे बहुत मिलते हैं पगली. 5 हजार रुपए महीने तो मिलेंगे ही. उस में तुम्हें एक पैसा खर्च नहीं होगा. बाकी जो मैं ने और कुछ बताया, उस के अलावा है.’’ अंजना बोली.

‘‘क्या?’’ अंजना की बात सुन कर मधु की आंखें फटी की फटी रह गईं.

‘‘लेकिन तू अभी छोटी है इसलिए 3 हजार ही मिलेंगे.’’ यह सुन कर सभी लड़कियां हंसने लगीं.

मधु ने आंखें घुमाते हुए कहा, ‘‘दीदी मुझे भी पूरे पैसे दिलवाना, मैं 2 के बराबर अकेली ही काम कर दूंगी.’’

‘‘मधु, तुम चिंता नहीं करो वहां पहुंच कर तुम्हें लगेगा कि तुम कहां पहुंच गई हो. समझो स्वर्ग है स्वर्ग. और जिंदगी की सभी खुशियां मिलेंगी, मजे करोगी, मजे!’’ कहती हुई अंजना ने उस की गालों को थपथपा दिया.

इस तरह आकर्षक सपने दिखा कर अंजना अपने साथ 16 लड़कियों को मुंबई ले गई. वहां पहुंच कर उस ने लड़कियों को अपने खास लोगों को सौंप दिया, जहां से उन्हें काम के लिए भेजा जाना था. उस के बाद लड़कियों के साथ जो हुआ, वह सब उसे दिखाए गए सपने के काफी उलट था. मधु एक्का सांवली सी सुतवां नाकनक्श की आकर्षक किशोरी थी. उसे एक प्लाई शौप के मालिक ने अपने यहां नौकरी पर रख लिया था. महीने की पगार 4 हजार रुपए तय हुई थी. इसी तरह से 18 वर्षीया सिलमिना सिदार को आरटीओ एजेंट रमेश चंद्रा ने अपने घर में घरेलू नौकरानी के तौर पर 5 हजार के मासिक वेतन पर रख लिया था.

16 साल की प्रमिला मंझवार एक व्यापारी के घर पहुंच गई थी, जबकि 17 साल की सुनीता धनुहार एक कामकाजी महिला रजनी के यहां लग गई थी. इसी तरह से सभी लड़कियां कहीं न कहीं काम पर लगा दी गई थीं. मगर जैसेजैसे समय बीतता चला गया, लड़कियों के सपने टूटते चले गए. वे अमानवीय दौर से गुजरने लगीं. उन्हें घरपरिवार से बात करने की मनाही थी. उन में कुछ लड़कियां देह के धंधे पर उतरने को विवश हो गईं. उन्हें पूरी तरह से एहसास हो गया था कि वे पिंजरे में कैद हो कर रह गई हैं. उन की अशिक्षा किसी दुर्भाग्य से कम नहीं थी. उन्हें न तो किसी अधिकार के बारे में मालूम था और न ही सामने दीवारों और पोस्टरों पर लिखी पंक्तियों का अर्थ समझ पाती थीं.

एक दिन मधु एक्का को फोन करने का मौका मिल गया. उस ने अपने एक परिचित को फोन कर दिया. फोन पर उस ने एक सांस में सारी तकलीफें बयां कर डाली. परिचित ने यह बात अपने दोस्त को बताई. बात पूरे कोरवा में फैल गई और मामला पुलिस तक जा पहुंचा. पुलिस पर जांच का दबाव भारत सरकार के गृह मंत्रालय से पड़ा. इस का असर हुआ और सभी लड़कियों की बरामदगी हो गई. फिर उन्हें कोरवा उन के परिजनों को सौंप दिया गया. उन्होंने पुलिस और परिजनों को अपनी आपबीती सुनाई. उस के बाद जो देहव्यापार की दर्दनाक दास्तान सामने आई, उस की एक झलक इस प्रकार है.

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर, रायगढ़, जशपुर जिले में कोरवा जनजाति को राष्ट्रपति का संरक्षण प्राप्त है. उन्हें विशेष दरजा दे कर दत्तक संतान का दरजा दिया गया है. उन के जनजीवन को सुधारने के लिए सरकार की तरफ से कई योजनाएं चलाई गई हैं, फिर भी उन की आय में गिरावट बनी हुई है. उस समुदाय के बच्चे मुश्किल से 5वीं, 8वीं तक पढ़ पाते हैं. उन की जिंदगी एकदम से ठहरी हुई जंगली वातावरण सी उलझ गई है. यही कारण है कि उन पर महानगरों की प्लेसमेंट ऐजेंसियों की नजर टिकी रहती है. वे अपना निशाना कमसिन लड़कियों को बनाते हैं और उन्हें दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद आदि शहरों में नौकरी के बहाने अपने जाल में फंसा लेते हैं.

कहने को तो उन से घरेलू नौकरानी, मौल, प्राइवेट कंपनियां, औफिस में काम दिलवाने का वादा किया जाता है, लेकिन अधिकतर देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं. ऐसी ही एक लड़की ने बताया, ‘‘मैं काफी गरीब परिवार से हूं. मुंबई यही सोच कर गई थी कि हमें नौकरी से पैसा मिलेगा और शांति से जिंदगी गुजरेगी. लेकिन वहां देह बेचना पड़ा. इस बारे में हम किसी को बता भी नहीं सकते थे. इस का विरोध करना तो बहुत ही मुश्किल काम था. कई बार तो एक दिन में आधेआधे घंटे पर अलगअलग मर्द के साथ सोना पड़ा.’’

उस ने बताया कि कैसे उसे उस के जानपहचान वाले राजकुमार ने काम दिलाने के नाम पर दुर्गाबाई नाम की महिला के हाथों बेच दिया था. वह बिहार के रोहतास जिले की रहने वाली थी. उस ने उस की खूबसूरती और उभार वाले वदन को देख कर कीमत सवा लाख रुपए लगाई थी. इस काम में राजकुमार के साथ महेश और सरला नाम की युवती भी शामिल थे. दुर्गाबाई के पास छत्तीसगढ़ की 6 लड़कियां थीं, जिन्हें बाद में 5 जनवरी, 2021 को पुलिस ने बरामद किया था. दुर्गाबाई लड़कियों को ग्राहकों के पास भेजती थी. हर ग्राहक से उसे डेढ़ हजार से ढाई हजार रुपए तक मिलते थे, जबकि वह हर लड़की को उसी में से खर्चे के नाम पर 300 से 500 तक देती थी.

मुक्त करवाई गई एक लड़की ने बताया कि किस तरह से वह राजकुमार के जाल में फंसी. उसे पहले बिलासपुर से बिक्रमगंज लाया था. वहां महेश और सरला मिले थे. दोनों ने पतिपत्नी होने का परिचय दिया. वह उसे दुर्गाबाई के पास ले गए. महेश ने बताया कि वह उन की सास है और मुंबई में रहती हैं. उन के साथ उसे 6 महीने तक रहना होगा. बाद में दोनों जब वहां आ जाएंगे तब वह वापस आना चाहे तो आ सकती है. या फिर उन के साथ रहना चाहे तो रह सकती है. लड़की को उन की बातों में सच्चाई दिखी और वह दुर्गाबाई के साथ 27 दिसंबर, 2020 को मुंबई आ गई.

वहां उस ने देखा कि उसी के जिले की 7 और लड़कियां रह रही हैं. उन में से ही एक लड़की ने उस के कान में चुपके से बताया कि वह गलत जगह आ गई है. उस की किस्मत अच्छी थी कि एक सप्ताह बाद ही दुर्गाबाई के उस मकान पर पुलिस ने छापा मारा और वह दूसरी लड़कियों के साथ मुक्त करवा ली गई. मुक्त करवाई गई जशोपुर जिले की एक पीडि़ता की मां ने बताया कि उस की बच्ची को 15 हजार रुपए महीने पर आर्केस्ट्रा में काम दिलवाने के नाम पर ले गया था. उन्होंने बताया कि उस की बच्ची को नाचने का शौक था, इसलिए सोचा अच्छा काम है. पैसा मिलेगा और धीरेधीरे शोहरत मिलेगी तब बड़ा कलाकार भी बन सकती है.

वहां से उसे अंबिकापुर लाया गया. बाद में नशीली कोल्ड ड्रिंक्स पिला कर उत्तर प्रदेश में सोनभद्र जिला ले जाया गया. वहां बिंदास आर्केस्ट्रा ग्रुप के संचालक मनोज कुमार और अन्नू उर्फ गोलू को सौंप दिया गया. उन्होंने लड़की को छोटे से कमरे में बंद कर दिया. 3 दिन बीतने के बाद जब लड़की ने पूछा कि उस का प्रोग्राम कब होगा तब उन्होंने उस के साथ जबरदस्ती की और फिर सजासंवार कर एक ग्राहक के पास भेज दिया. इस तरह से वह कथित आर्केस्ट्रा ग्रुप की एक नई सैक्सवर्कर बना दी गई. उस की मां ने बताया कि लड़की 12 मई को किसी ग्राहक के पास भेजी जाने वाली थी. बताया गया था कि वहां उसे 6 लड़कियों के साथ एक निजी पार्टी में शामिल होना है. म्यूजिक पर नाचगाना करना होगा.

संयोग से इस पार्टी की जानकारी पुलिस को भी लग गई थी. पुलिस को किसी ने सूचना दी थी कि कोई बर्थडे सेलिब्रशन के बहाने ड्रग कारोबारियों से डील करने वाला है. लेकिन जब पुलिस ने वहां छापेमारी की तब वहां से 7 लड़कियां रंगेहाथों पकड़ी गईं. उन से पूछताछ होने पर आर्केस्ट्रा ग्रुप की आड़ में देहव्यापर का भंडाफोड़ हो गया. आर्केस्ट्रा संचालक भी पकड़े गए. उस के बाद पुलिस को नई जानकारी मिली. इस तरह देहव्यापार के दलाल कोरवा जनजाति की लड़कियों को किसी न किसी तरह से अपने जाल में फांस कर जिस्मफरोशी के धंधे में शामिल कर रहे हैं.

कहानी में कुछ नाम परिवर्तित हैं.  

थानाप्रभारी भी पकड़ा गया रंगरलियां मनाते हुए  देह व्यापार के ठिकानों पर पुलिस समयसमय पर छापे मारती रहती है. आमतौर पर इन ठिकानों से देह व्यापार में लिप्त युवतियां और महिलाओं के अलावा रंगरलियां मनाने आए लोग पकड़े जाते हैं. राजस्थान के शेखावाटी इलाके में चूरू में देह व्यापार के एक ठिकाने पर पुलिस ने छापा मारा तो वहां आबकारी पुलिस थाने का इंचार्ज भी रंगरलियां मनाते पकड़ा गया. वहां थानाप्रभारी को इस हालत में देख कर छापा मारने वाली पुलिस टीम भी चौंक गई.

दरअसल, इसी 24 जुलाई को चूरू की डीएसपी ममता सारस्वत ने बोगस ग्राहक को भेज कर शहर के अग्रसेन नगर में एक मकान पर छापा मारा. उस मकान में किराए पर रहने वाली  महिला सीमा मेघवाल ने बोगस ग्राहक के रूप में आए कांस्टेबल से रुपए ले लिए. बाद में कांस्टेबल का इशारा मिलने पर पुलिस ने उस मकान पर  दबिश दी. मकान में 3 युवतियां मिलीं. एक बंद कमरे में एक युवती और एक व्यक्ति आपत्तिजनक हालत में मिले. पुलिस ने चारों को पकड़ लिया. इन में सीमा के पास से 12 हजार रुपए भी बरामद हुए.

पुलिस थाने ला कर इन से पूछताछ की गई, तो पता चला कि पकड़ा गया व्यक्ति 40 वर्षीय रणवीर सिंह नायक चूरू में आबकारी निरोधक थाने का इंचार्ज था. उस का काम अवैध शराब पकड़ना था. पुलिस ने आबकारी विभाग के थानाप्रभारी रणवीर सिंह के अलावा तीनों युवतियों 35 साल की सीमा नायक, 30 साल की पियारू निशा और 30 साल की हलीमा इमरान को गिरफ्तार कर लिया. इन में पियारू निशा पश्चिम बंगाल और हलीमा इमरान मुंबई के ठाणे की रहने वाली निकली.

पूछताछ में पता चला कि चूरू के बास घंटेल की रहने वाली सीमा मेघवाल को उस के पति नेमीचंद मेघवाल ने छोड़ रखा था. वह कई महीनों से चूरू के अग्रसेन नगर में किराए का मकान ले कर रह रही थी और मुंबई व पश्चिम बंगाल सहित दूसरे राज्यों से नईनई खूबसूरत युवतियां बुला कर ग्राहकों को पेश करती थी. वह अपने ग्राहकों से एक से डेढ़ हजार रुपए तक लेती थी. सीमा वाट्सएप के जरिए अपना धंधा चलाती थी. ग्राहकों को वह वाट्सऐप पर लड़कियों की फोटो भेजती थी. पसंद आने पर रुपए तय करती थी.

गिरफ्तार युवतियों ने पुलिस को बताया कि वे पहले भी चूरू आ चुकी थीं. उन्हें एकडेड़ महीने के लिए अच्छी रकम दे कर बुलाया जाता था. सीमा  ने बताया कि वह समयसमय पर  दूसरे राज्यों से भी लड़कियां बुलाती  थी, ताकि ग्राहकों को नएनए चेहरे  मिल सकें.  पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

UP Crime News: ईंट से लगातार प्रहार कर ली पत्नी की जान

UP Crime News: घरपरिवार और समाज की बंदिशें तोड़ कर बबलू ने शादीशुदा रूबी से प्रेमविवाह किया था. 2 बच्चों के मांबाप दोनों के बीच ऐसी कौन सी वजह पैदा हो गई कि बबलू को पत्नी का हत्यारा बनना पड़ा…

थाना बर्रा के रहने वाले विशाल रफूगर ने सीटीआई नहर के करीब से बहने वाले नाले में बोरे में भरी एक युवती की लाश देखी, जिस का सिर बाहर निकल गया था. उस का क्षतविक्षत चेहरा साफ दिखाई दे रहा था, जिसे चीलकौए नोचनोच कर खा रहे थे. विशाल ने शोर मचाया तो देखतेदेखते वहां भीड़ एकत्र हो गई. किसी राहगीर ने सीटीआई के पास वाले नाले में एक महिला की लाश पड़ी होने की सूचना 100 नंबर पर दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना गोविंदनगर को दी गई. थाना गोविंदनगर की पुलिस आई जरूर लेकिन शव थाना बर्रा क्षेत्र में पड़े होने की बात कह कर लौट गई. नतीजतन 2 घंटे तक लाश नाले में पड़ी रही.

मामला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी में आया तो एसपी (पूर्वी) हरीशचंदर, सीओ (गोविंदनगर) ओमप्रकाश सिंह थाना बर्रा पुलिस के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस ने साक्ष्य एकत्र करने के लिए फोरेंसिक टीम को भी फोन कर के मौके पर बुला लिया था. पुलिस ने लाश वाले बोरे को नाले से बाहर निकाला. बोरे से लाश निकलवा कर निरीक्षण शुरू हुआ. मृतका की उम्र 30-35 साल रही होगी. वह नीले रंग की सलवार, हरे रंग की लैगिग, लाल कुरता, गुलाबी रंग का स्वेटर पहने थी. उस के पैर की अंगुलियों में बिछिया थीं. दाएं हाथ पर बबलू और ॐ गुदा हुआ था. कपड़ों और रूपरंग से लग रहा था कि मृतका किसी अच्छे परिवार से रही होगी.

शव देख कर ही लग रहा था कि किसी धारदार हथियार से उस की गरदन काटी गई थी. पहचान छिपाने के लिए मृतका का चेहरा बुरी तरह कुचला गया था. यही नहीं, उस के चेहरे पर तेजाब भी डाला गया था. हत्यारों ने मृतका के स्तन और अन्य कोमल अंगों पर भी गंभीर चोटें पहुंचाई थीं. इस से यही अंदाजा लगाया गया कि महिला की हत्या घृणा एवं क्रोध में की गई थी. घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करने के बाद थाना बर्रा के प्रभारी रामबाबू सिंह उसे अज्ञात महिला के शव की शिनाख्त कराने में जुट गए. आननफानन में शहर के सभी थानों से गुमशुदा महिलाओं की दर्ज सूचनाएं एकत्र कराई गईं. लेकिन शहर के थानों में दर्ज अज्ञात महिलाओं की गुमशुदगी की जानकारियों से मृतका का कोई सुराग नहीं मिल सका.  6 फरवरी को अचानक किसी ने पुलिस को फोन कर के सूचना दी कि 3 फरवरी, 2015 को सीटीआई नहर के पास नाले में मिली लाश कानपुर के सीसामऊ के रहने वाले बबलू की पत्नी रूबी की है. उस की हत्या में उस के पति बबलू की मुख्य भूमिका है. इसीलिए उस ने थाने में अपनी पत्नी रूबी की गुमशुदगी दर्ज नहीं करवाई.

इस सूचना की पुष्टि करने के लिए थानाप्रभारी रामबाबू सिंह पुलिस टीम के साथ सीसामऊ स्थित बबलू के घर जा पहुंचे. लेकिन वहां ताला लटका हुआ था. मामले की तह तक पहुंचने के लिए उन्होंने बबलू के पड़ोसियों से पूछताछ की. मोहल्ले वालों ने बताया कि जितेंद्र शुक्ला उर्फ बबलू किसी बैंक में चपरासी है. उस की पत्नी रूबी का चालचलन ठीक नहीं था. बबलू की गैरमौजूदगी में उस के घर कई लोग आतेजाते थे. एक बार बबलू ने रूबी को एक युवक के साथ घर में रंगरलियां मनाते हुए रंगेहाथों पकड़ लिया था. जिस के बाद मारपीट हुई थी और मामला थाने तक जा पहुंचा था. लेकिन रूबी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही थी. बबलू से उसे बच्चे थे, जिन के मोह की वजह से वह रूबी को छोड़ना नहीं चाहता था और उसे समझाबुझा कर लाइन पर लाना चाहता था.

लेकिन रूबी पर बबलू की बातों का कोई असर नहीं हो रहा था. वह बबलू के पीछे खुल कर रंगरलियां मनाती थी, जिस से वह काफी परेशान था. अचानक 31 जनवरी की रात को पता नहीं क्या हुआ कि रूबी और उस के बच्चे गायब हो गए. बबलू भी अपने घर पर ताला डाल कर कहीं चला गया. अब उस ने सिर मुड़वा लिया है और कभीकभी चोरीछिपे अपने घर आता है. मोहल्ले वालों से पूछताछ में यह बात भी सामने आई थी कि रूबी के हाथ पर बबलू का नाम और ‘ॐ’ गुदा हुआ था. इस से यह बात साफ हो गई कि सीटीआई नहर के पास नाले में मिली लाश रूबी की ही थी. मोहल्ले वालों से मिली जानकारी से पुलिस को पक्का विश्वास हो गया था कि रूबी की हत्या उस के पति बबलू ने ही करवाई है.

मोहल्ले वालों से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस लाश की शिनाख्त करवाने के लिए वनखंडेश्वर मंदिर, पीरोड पहुंची. वहां से पुलिस मंदिर के पुरोहित गणेशशंकर जोशी को हिरासत में ले कर थाना बर्रा लौट आई. थाने ला कर गणेशशंकर जोशी को मृतका की लाश के फोटो और कपड़े दिखाए गए. सारी चीजें देखने के बाद बबलू के पिता गणेशशंकर ने पुलिस को बताया कि लाश उस की बहू रूबी की ही है. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने गणेशशंकर जोशी से रूबी की हत्या की सच्चाई जानने का प्रयास किया.

जोशी ने बताया कि उस के 2 बेटे हैं, बबलू और धर्मेंद्र. बबलू बैंक औफ बड़ौदा, पनकी में चपरासी था. उस के 2 बच्चे थे 11 वर्षीय बेटा शिवा और 9 साल की बेटी प्रियंका. वह स्वयं वनखंडेश्वर मंदिर, थाना बजरिया से पुरोहितगीरी करते थे और वहीं एक कमरे में रहते थे. करीब 12 वर्ष पहले जितेंद्र उर्फ बबलू ने रूबी से प्रेमविवाह किया था. इसलिए उस ने उस के साथ अपने संबंध तोड़ लिए थे. बबलू अपनी पत्नी रूबी को ले कर 104/313 बड़ा चौराहा, सीसामऊ में रहता था. उस का घर आनाजाना बहुत कम था. 31 जनवरी को बबलू रात 10 बजे के लगभग अपने दोनों बच्चों को ले कर उस के पास आया था और यह कह कर उन्हें रखने को कहा था कि उस के ऊपर एक बड़ी मुसीबत आ पड़ी है.

उस ने बताया कि रूबी बैंक से रुपए निकाल कर घरगृहस्थी का सामान खरीदने के लिए शाम 4 बजे सीसामऊ बाजार के लिए निकली थी. लेकिन इतनी रात होने पर भी वह वापस नहीं आई थी.  उस ने पूरे कानपुर में छानबीन कर डाली, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. शायद वह चेन्नई चली गई हो. वह अपने छोटे भाई धर्मेंद्र को ले कर उसे ढूंढने चेन्नई गया है. इस के अलावा रूबी की हत्या के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है.

गणेशशंकर से पुलिस को जो भी जानकारी मिली, उस से पुलिस को पक्का विश्वास हो गया कि बबलू रूबी की हत्या के बारे में अच्छी तरह जानता है. यह भी संभव था कि वह खुद भी हत्या में शामिल हो या फिर उस ने हत्या अन्य लोगों से करवाई हो? इसी कारण बबलू पुलिस के सामने आने में डर रहा है. पुलिस मृतका के पति जितेंद्र उर्फ बबलू की तलाश में जगहजगह दबिश देने लगी. पुलिस ने हत्या का खुलासा जल्द से जल्द करने के लिए बबलू के मिलने के संभावित स्थानों पर छापे डाले, लेकिन वह पुलिस की पकड़ में नहीं आया. मजबूर हो कर पुलिस ने बजरिया थाना क्षेत्र में अपने मुखबिरों का जाल बिछा दिया.

9 फरवरी, 2015 की सुबह पुलिस को सूचना मिली कि रूबी का पति बबलू शास्त्री चौक के पास किसी के इंतजार में खड़ा है. सूचना मिलते ही थान बर्रा पुलिस ने बबलू को घेर कर पकड़ लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई. उस से पूछताछ शुरू हुई तो वह काफी देर तक पुलिस को बरगलाता रहा. लेकिन जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. उस ने जो कुछ बताया, वह इस तरह था.

जितेंद्र उर्फ बबलू 104/312 बड़ा चौराहा, सीसामऊ, थाना बजरिया, कानपुर में रहता था. वह बैंक औफ बड़ौदा में चपरासी था. करीब 12 साल पहले चंद मुलाकातों में ही उसे विजयनगर, कानपुर निवासी छोटे की पत्नी रूबी से प्यार हो गया था. धीरेधीरे जितेंद्र उर्फ बबलू और रूबी का प्यार ऐसे मुकाम पर पहुंच गया कि दोनों को एकदूसरे की दूरी खलने लगी. फलस्वरूप बबलू और रूबी ने घरपरिवार और सामाजिक मानमर्यादाओं को ताक पर रख कर घर से भाग कर प्रेमविवाह कर लिया. कुछ महीने लुकछिप कर रहने के बाद दोनों सीसामऊ मोहल्ले में खुल कर पतिपत्नी बन कर रहने लगे. कालांतर में दोनों के शिवा और प्रियंका 2 बच्चे हुए.

कुछ सालों तक रूबी ईमानदारी से जीवन जीती रही. उस के बाद उस के कदम बहकने लगे. उस ने पति की गैरमौजूदगी का लाभ उठा कर मोहल्ले के कुछ युवकों से अवैध संबंध बना लिए और घर में रंगरलियां मनाने लगी. इस से मोहल्ले में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब पत्नी की चरित्रहीनता और नएनए लड़कों के साथ गुलछर्रे उड़ाने की खबर बबलू को हुई तो सच्चाई जानने के लिए एक दिन वह अपनी बैंक ड्यूटी छोड़ कर घर आ गया. घर में उस ने रूबी को मोहल्ले के एक युवक के साथ रंगरलियां मनाते हुए रंगेहाथों पकड़ लिया.

उस दिन उस ने रूबी को जम कर मारापीटा और भविष्य में ऐसी कोई हरकत न करने की सख्त हिदायत दी, लेकिन इस से रूबी के चालचलन में कोई बदलाव नहीं आया. यह देख कर बबलू को रूबी से नफरत हो गई. बच्चों का भविष्य बरबाद न हो, यह सोच कर बबलू रूबी को हर तरह से समझाबुझा कर रास्ते पर लाने का प्रयास किया कि वह ईमानदारी भरा जीवन गुजारे, लेकिन रूबी पर इस का कोई असर नहीं हुआ. नतीजतन घरपरिवार और रिश्तेदारों के बीच बबलू की बदनामी होने लगी. दूसरी ओर रूबी स्वयं पर अंकुश लगाने को ले कर सख्त होने लगी और पति को मुंह पर जवाब देने लगी, जिस के चलते बबलू और रूबी में 2 बार जम कर मारपीट हुई.

रूबी ने इस की शिकायत थाने में की. लेकिन पुलिस ने इसे पतिपत्नी का मामला मान कर दोनों को समझाबुझा कर लौटा दिया. तीसरी बार बबलू ने बाहरी लड़कों को घर में बैठाने को ले कर रूबी को जम कर पीटा. इस बार भी पुलिस ने रूबी का पक्ष लिया और सही न्याय करने के बजाय दोनों का समझौता करा दिया. इस समझौते में तय हुआ कि रूबी अपने बच्चों के साथ अलग रहेगी और बबलू उसे 4 हजार रुपए महीने खर्च देगा. इस के बाद रूबी बबलू से 4 हजार रुपए प्रति माह लेती रही. इस के बाद रूबी ने बबलू को अपने पास रहने के लिए मजबूर कर दिया. इस तरह रूबी हर महीने बंधीबंधाई रकम ले कर पत्नी की तरह बबलू के साथ रहती भी रही और उसे पुलिस का डर दिखा कर पूरी तरह अपने कब्जे में किए रही. जरा भी कोई बात होती तो वह उसे जेल भिजवाने की धमकी दे देती.

इस सब के चलते बबलू गहरे तनाव में रहने लगा. इस स्थिति का फायदा उठा कर रूबी खुल कर मनमानी करने लगी. इतना ही नहीं, अब वह अपने चाहने वालों से पति के सामने ही मिलनेजुलने लगी. बबलू से जब पत्नी की हरकतें सही नहीं गईं तो उस ने रूबी को अपनी जिंदगी से हटाने का इरादा बना लिया. जितेंद्र शुक्ला उर्फ बबलू ने गोविंदनगर निवासी अपने खास दोस्त राधेश तिवारी से अपनी पत्नी रूबी की अय्याशी के बारे में पूरी बात बता कर कहा कि अब उस से रूबी की हरकतें बरदाश्त नहीं होतीं. घर में मेरी स्थित एक भड़ुए जैसी हो गई है. उस के कारनामे मुझ से देखे नहीं जा रहे हैं. मैं उस से अपना पिंड छुड़ाना चाहता हूं. वह उसे बातबात में जेल भिजवाने की धमकी देती है, अब वह उस की हत्या कर के ही जेल जाना चाहता है. बबलू की बात सुन कर राधेश तिवारी उस की मदद के लिए तैयार हो गया.

राधेश तिवारी समाचार पत्र विके्रता था. उस की काफी दूरदूर तक अच्छी जानपहचान थी. राधेश तिवारी ने गोविंदनगर में रहने वाले पेशेवर हत्यारे शुभम मौर्य से जितेंद्र जोशी उर्फ बबलू की मुलाकात करवा कर बातचीत करवाई. शुभम मौर्य से रूबी की हत्या का सौदा 30 हजार रुपए में तय हो गया. बबलू ने शुभम मौर्य को रूबी की हत्या के लिए 25 हजार रुपए एडवांस दे दिए. शेष 5 हजार रुपए रूबी की हत्या के बाद देना तय हुआ. योजना के मुताबिक, 31 जनवरी, 2015 की रात 10 बजे के लगभग राधेश तिवारी, शुभम मौर्य व उस का साथी विजय उर्फ पुच्ची बबलू के घर आ गए.

चारों ने घर पर ही देर रात तक शराब पी. उसी दौरान शुभम मौर्य के इशारे पर बबलू अपने बेटे शिवा और बेटी प्रियंका को यह कह कर घर के बाहर ले कर चला गया कि ‘आप लोग बैठो, मैं बच्चों को बाजार से नाश्ता दिलवा कर जल्द वापस आता हूं. जैसे ही बबलू बच्चों को ले कर घर से बाहर गया, शुभम मौर्य, राधेश तिवारी और विजय कमरे में बैठी रूबी के पास पहुंच गए और उसे दबोच कर उस का मुंह दबा लिया. विजय उस के सिर पर ईंट से वार करने लगा. विजय रूबी के सिर पर तब तक ईंट मारता रहा, जब तक वह मरणासन्न नहीं हो गई. इस के बाद विजय ने सूजे से रूबी के गले को बुरी तरह से गोद दिया.

बबलू बच्चों को पिता के घर छोड़ कर पुन: लौट आया. तब तक रूबी मर चुकी थी. योजना के मुताबिक रूबी की लाश की शिनाख्त मिटाने के लिए उस के चेहरे पर ईंटें मारमार कर बुरी तरह से कुचल दिया गया. चेहरे की शिनाख्त किसी परिस्थितियों में न हो सके, इस के लिए उस के चेहरे पर तेजाब भी डाला गया. इस के बाद रूबी के क्षतविक्षत शव को आननफानन में वाटरपू्रफ बोरे में भर कर अच्छी तरह सिल दिया गया. लाश को ठिकाने लगाने के लिए रात के अंधेरे में शुभम मौर्य फरजी नंबर की अपनी स्कूटी पर रूबी के लाश वाले बोरे को लाद कर विजय के साथ चला गया और उस बोरे को सीटीआई नहर के पास नाले में फेंक कर अपने घर चला गया.

जितेंद्र उर्फ बबलू ने पुलिस को बताया कि वह रूबी के मोहल्ले के लड़कों के साथ अवैधसंबंधों से त्रस्त था. रूबी तृप्ति इतनी कामांध हो गई थी कि समझाने के बाद भी वह नहीं मानती थी. इसलिए उस के सामने उस की हत्या करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था. इसलिए 30 हजार रुपए की सुपारी दे कर उस ने उस की हत्या करवा दी थी. पुलिस बबलू को अपने साथ गोविंदनगर के ब्लाक नंबर 10 ले गई. उस की निशानदेही पर राधेश तिवारी, विजय उर्फ पुच्ची, शुभम मौर्य को गिरफ्तार कर लिया गया. साथ ही लाश को ठिकाने लगाने में इस्तेमाल की गई स्कूटी, मृतका और उस के पति बबलू के मोबाइल भी बरामद कर लिए गए.

पूछताछ के बाद जांच अधिकारी ने उपर्युक्त चारों अभियुक्तों को भादंवि. की धारा 302, 201, 120बी के अंतर्गत चालान तैयार कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. इस तरह रूबी की बदचलनी की वजह से एक परिवार बरबाद हो गया. UP Crime News

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित