Crime News: मासूम बच्चों का सीरियल किलर – पुलिस की गिरफ्त में

Crime News: सीरियल किलर रविंद्र एकएक कर के करीब 40 मासूमों के साथ कुकर्म कर उन की हत्याएं कर चुका था. निशा की हत्या करने के बाद यदि वह अपनी मां के प्रेमी सन्नी को फंसाने की कोशिश न करता तो शायद अब भी गिरफ्तार नहीं हो पाता.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव के नजदीक जैननगर में काफी बड़ी झुग्गी बस्ती है. यह इलाका बेगमपुर थाने के अंतर्गत आता है. इसी बस्ती के रहने वाले संतोष कुमार की 6 वर्षीया बेटी निशा रोजाना की तरह 14 जुलाई को भी नित्य क्रिया के लिए सूखी नहर की तरफ गई थी. सुबह 6 बजे घर से निकली निशा जब आधापौने घंटे बाद भी घर नहीं लौटी तो मां पुष्पा देवी चिंतित हुई. चिंता की बात इसलिए थी क्योंकि निशा को तैयार हो कर 7 बजे स्कूल के लिए निकलना था. वह नजदीक के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. कुछ देर और इंतजार करने के बाद भी वह नहीं आई तो पुष्पा बेटी को देखने के लिए सूखी नहर की तरफ चली गई.

पुष्पा ने सूखी नहर की तरफ जा कर बेटी को ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली. उधर आनेजाने वाली महिलाओं और बच्चों से भी उस ने बेटी के बारे में पता किया, पर कोई भी उस की बच्ची के बारे में नहीं बता सका. तब परेशान हो कर वह घर लौट आई. उस ने यह बात पति संतोष को बताई तो वह भी परेशान हो गया. अब तक बेटी के स्कूल जाने का समय हो गया था. मियांबीवी एक बार फिर बेटी को ढूंढने निकल गए. उन के साथ पड़ोसी भी उन की मदद के लिए गए थे. एक, डेढ़ घंटे तक वह बेटी को इधरउधर ढूंढते रहे, लेकिन उस का पता नहीं चल सका.

बस्ती के लोग इस बात से हैरान थे कि आखिर घर और सूखी नहर के बीच से बच्ची कहां गायब हो गई? संतोष की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह बच्ची को कहां ढूंढे? आखिर वह पड़ोसियों को ले कर थाना बेगमपुर पहुंचा. थानाप्रभारी रमेश सिंह उस दिन छुट्टी पर थे. थाने का चार्ज अतिरिक्त थानाप्रभारी जगमंदर दहिया संभाले हुए थे. संतोष कुमार ने उन्हें बेटी के गुम होने की बात बताई.

बच्ची की उम्र 6 साल थी, इसलिए पुलिस यह भी नहीं कह सकती थी कि वह अपने किसी प्रेमी के साथ चली गई होगी. दूसरे बच्ची के पिता की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. संतोष ने बताया था कि उस की किसी से कोई दुश्मनी वगैरह नहीं थी. इन सब बातों को देखते हुए पुलिस को यही लग रहा था कि या तो बच्ची खेलतेखेलते कहीं चली गई है या फिर उसे बच्चा चुराने वाला कोई गैंग उठा ले गया है.

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में तमाम बच्चे रहस्यमय तरीके से गायब हो रहे थे. इसी बात को ध्यान में रख कर उन्होंने उसी समय निशा के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी और इस की जांच हेडकांस्टेबल शमशेर सिंह को सौंप दी. बच्ची के अपहरण का मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद दिल्ली के समस्त थानों में उस का हुलिया बता कर वायरलैस से सूचना दे दी गई. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया कुछ पुलिसकर्मियों के साथ उस जगह पर पहुंच गए, जहां से बच्ची लापता हुई थी. उन्होंने संतोष के घर से ले कर सूखी नहर तक का निरीक्षण किया. उसी दौरान उन्होंने कुछ लोगों से बात भी की, लेकिन उन्हें ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस के सहारे लापता बच्ची का पता लगाया जा सकता.

वह उधर की झाडि़यों में भी यह सोच कर खोजबीन करने लगे कि कहीं किसी बहशी दरिंदे ने उसे अपना शिकार न बना लिया हो. क्योंकि आए दिन बच्चों के साथ कुकर्म करने जैसे मामले सामने आते रहते थे. झाडि़यों में भी उन्हें कुछ नहीं मिला. संतोष के घर से करीब 50 मीटर की दूरी पर एक निर्माणाधीन इमारत दिखाई दे रही थी. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया ने अपने आसपास खड़े बस्ती वालों से उस इमारत के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह बिल्डिंग किसी जैन की है, लेकिन पिछले काफी दिनों से इस के निर्माण का काम रुका हुआ है.

जिज्ञासावश वह उस बिल्डिंग की तरफ चल दिए. जैननगर की गली नंबर 6 में निर्माणाधीन उस 3 मंजिला बिल्डिंग में जब वह घुसे तो एक कमरे में उन्हें एक बच्ची निर्वस्त्र हालत में पड़ी मिली. वह मृत अवस्था में थी. उन के साथ मौजूद संतोष उस बच्ची को देख कर चीख पड़ा. वह उसी की बेटी निशा थी. बच्ची का निचला हिस्सा खून से सना हुआ था. उस के कपड़े पास पड़े हुए थे. निशा की हालत देख कर इंसपेक्टर दहिया समझ गए कि यह किसी दरिंदे की शिकार बनी है. निशा की हत्या की खबर सुन कर बस्ती के सैकड़ों लोग थोड़ी देर में वहां जमा हो गए. इंसपेक्टर दहिया ने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों के अलावा क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम व फोरैंसिक टीम को भी दे दी.

कुछ देर बाद बाहरी दिल्ली के डीसीपी विक्रमजीत, डीसीपी-2 श्वेता चौहान, एसीपी ऋषिदेव कराला भी जैननगर पहुंच गए. डीसीपी ने मौके पर क्राइम ब्रांच को भी बुलवा लिया. क्राइम इन्वैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीम भी मौके से सबूत जुटाने लगी. इन टीमों का काम निपटने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उसी बिल्डिंग में दूसरी मंजिल पर एक ड्राइविंग लाइसेंस और ट्रांसपोर्ट से संबंधित कुछ कागज मिले. पुलिस ने वह सब अपने कब्जे में ले लिया.

लाश का मुआयना करने पर यही लग रहा था कि किसी ने उस बच्ची के साथ गलत काम कर के उस का गला घोंट दिया है. निशा की हत्या पर बस्ती के लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. इस से पहले कि वे कोई आक्रामक कदम उठाते, पुलिस ने उन्हें समझाबुझा कर शांत कर दिया. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुल्तानपुरी के संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल भेज दिया.

इस मामले को सुलझाने के लिए डीसीपी विक्रमजीत ने एसीपी ऋषिदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर जगमंदर दहिया, एएसआई सुरेंद्रपाल, हेडकांस्टेबल नरेंद्र कुमार, कांस्टेबल टी.आर. मीणा आदि को शामिल किया गया. जिस बिल्डिंग में निशा की लाश मिली थी, उसी बिल्डिंग में पुलिस को जो ड्राइविंग लाइसेंस और कागजात मिले थे, उन की जांच शुरू की गई. ड्राइविंग लाइसेंस पर सन्नी पुत्र सुरेंद्र कुमार नाम लिखा था. उस पर जो पता लिखा था, वह कराला के जैननगर का ही था. यानी यह पता वही था, जहां मरने वाली बच्ची रहती थी.

खैर, पुलिस सन्नी के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पता चला कि वह डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती है. जब पुलिस अस्पताल पहुंची तो जानकारी मिली कि सन्नी को कुछ देर पहले ही डिस्चार्ज कर दिया गया था. लिहाजा उलटे पांव पुलिस जैननगर लौट आई. सन्नी घर पर ही मिल गया. उस के हाथपैर और शरीर के अन्य भागों पर चोट लगी हुई थी. पुलिस ने 14 जुलाई को ही सन्नी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कल रात पड़ोस के ही रविंद्र, उस के भाई सुनील और उस के दोस्त हिमांशु ने उस की खूब पिटाई की थी. पिटाई करने के बाद रविंद्र उस की जेब से मोबाइल, ड्राइविंग लाइसेंस, पैसे आदि निकाल कर ले गया था. मुझे उम्मीद है कि उसी ने यह सब किया होगा.

रविंद्र का घर सन्नी के घर के पास ही था. पुलिस उस के घर गई तो वह और उस के भाई में से कोई नहीं मिला. घर पर मौजूद उस के पिता ने पुलिस को बताया कि दोनों भाई अपने किसी दोस्त के यहां गए हुए हैं. पुलिस उस के पिता को हिदायत दे कर चली आई. पुलिस ने रविंद्र के बारे में छानबीन की तो जानकारी मिली कि पिछले साल उस ने बेगमपुर थानाक्षेत्र में ही एक बच्चे के साथ कुकर्म कर के उस की गला काट कर हत्या कर दी थी. इस की रिपोर्ट थाना बेगमपुर में ही भादंवि की धारा 363/307/377 के तहत लिखी गई थी. इस मामले में वह गिरफ्तार हुआ था. गिरफ्तारी के 6 महीने बाद सन्नी के पिता सुरेंद्र सिंह ने उस की जमानत कराई थी. तब वह जेल से बाहर आया था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को रविंद्र पर शक हुआ. उस का जो मोबाइल नंबर पुलिस को मिला था, वह स्विच्ड औफ था. पुलिस टीम रविंद्र को सरगर्मी से तलाशने लगी. 2 दिन बाद एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने 16 जुलाई, 2015 को उसे थाना क्षेत्र के ही सुखवीरनगर बस स्टौप से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब रविंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने निशा की हत्या का जुर्म तो स्वीकार कर ही लिया, इस के अलावा उस ने ऐसा खुलासा किया कि पुलिस हैरान रह गई.

उस ने बताया कि वह निशा की तरह तकरीबन 40 बच्चों की हत्या कर चुका है. पुलिस तो केवल मर्डर के एक केस को खोलने के लिए रविंद्र को तलाश रही थी, लेकिन वह इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, पता नहीं था. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उन्होंने उसी समय डीसीपी विक्रमजीत को यह जानकारी दी तो आधे घंटे के अंदर वह भी बेगमपुर थाने पहुंच गए.

एक लाश और ड्राइविंग लाइसेंस ने ऐसे गुनाह से परदा उठा दिया था, जिसे सुन कर इंसानियत भी शर्मशार हो जाए. उस ने डीसीपी के सामने रोंगटे खड़ी कर देने वाली बच्चों की हत्या की जो कहानी बताई, वह नोएडा के निठारी कांड से कम नहीं थी. रविंद्र ने बताया कि वह बच्चों की हत्या करने के बाद ही उन से कुकर्म करता था. उस के खुलासे पर डीसीपी भी चौंके. 24 साल के रविंद्र ने एक के बाद एक कर के करीब 40 बच्चों की हत्या करने और सैक्स एडिक्ट बनने की जो कहानी बताई, वह दिल को झकझोरने वाली थी.

रविंद्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के कस्बा गंज डुंडवारा के रहने वाले ब्रह्मानंद का बेटा था. रविंद्र के अलावा उस के 3 और बेटे थे. ब्रह्मानंद प्लंबर का काम करता था, इसलिए उस की हैसियत ऐसी नहीं थी कि वह बच्चों को पढ़ा सकता. लिहाजा जब उस के 2 बेटे बड़े हुए तो वह उन से भी मजदूरी कराने लगा. बेटे कमाने लगे तो उस के घर की माली हालत सुधरने लगी. उसी दौरान सन 1990 में गंज डुंडवारा में दंगा भड़क गया तो ब्रह्मानंद अपनी पत्नी मंजू और बच्चों को ले कर दिल्ली आ गया.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव में उस की जानपहचान के तमाम लोग रहते थे. लिहाजा वह भी उन के साथ कराला में रहने लगा. उस समय मंजू गर्भवती थी. कुछ दिनों बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रविंद्र रखा. घर में सब से छोटा होने की वजह से वह सब का प्यारा था. ब्रह्मानंद्र अपने बाकी बच्चों को तो पढ़ा नहीं सका था, लेकिन वह रविंद्र को पढ़ाना चाहता था. जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो उस ने उस का दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया. लेकिन मोहल्ले के बच्चों की संगत में पड़ कर वह पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. वह नशा करने वाले बच्चों की संगत में पड़ गया, जिस से वह भी चरस, गांजा आदि पीने लगा. घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने उसे डांटा भी, लेकिन वह नहीं माना.

रविंद्र नहीं पढ़ा तो ब्रह्मानंद उसे अपने साथ काम पर ले जाने लगा. लेकिन उस की आदत तो दोस्तों के साथ घूमने की थी. पिता के साथ मेहनत का काम भला वह क्यों करता. इसलिए वह पिता के साथ भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका. उसे जब खर्च के लिए पैसों की जरूरत होती, वह अपनी जानपहचान वाले ड्राइवर सन्नी के साथ हेल्परी करने चला जाता. सन्नी उसी के पड़ोस में रहता था और वह ट्रेलर चलाता था. उस का ट्रेलर मुंडका मैट्रो स्टेशन के निर्माण के कार्य में लगा हुआ था. रविंद्र वहां से जो भी कमाता, अपने नशा के शौक पर उड़ा देता था.

सन 2008 की बात है. उस समय रविंद्र करीब 17 साल का था. एक बार वह आधी रात को दोस्तों से फारिग हो कर अपने घर लौट रहा था. उस ने कराला में एक झुग्गी के बाहर मांबाप के साथ सो रही बच्ची को देखा. उस बच्ची की उम्र कोई 6 साल थी. उस बच्ची को देख कर रविंद्र की कामवासना जाग उठी. वह चुपके से गहरी नींद में सो रही उस बच्ची को उठा ले गया. बच्ची के मांबाप को पता ही नहीं चला कि उन की बेटी उन के पास से गायब हो चुकी है. रविंद्र उस बच्ची को सूखी नहर की तरफ ले गया. जैसे ही उस ने उस बच्ची को जमीन पर लिटाया वह जाग गई.

खुद को सुनसान और अंधेरे में देख कर वह डर गई. वहां उस के मांबाप की जगह एक अनजान आदमी था. वह रोने लगी तो रविंद्र ने डराधमका कर उसे चुप करा दिया. उस के बाद उस ने उस के साथ कुकर्म किया. बच्ची दर्द से चिल्लाने लगी तो उस ने उस का मुंह दबा दिया. कुछ ही देर में वह बेहोश हो गई. भेद खुलने के डर से उस ने बच्ची की  गला दबा कर हत्या कर दी और अपने घर चला गया. अगली सुबह झुग्गी के बाहर सो रहे दंपति को जब अपनी बेटी गायब मिली तो वह उसे खोजने लगे. उसी दौरान उन्हें सूखी नहर में बेटी की लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे वहां पहुंचे. इस मामले की थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई, लेकिन पुलिस केस को नहीं खोल सकी.

केस न खुलने से रविंद्र की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सन 2009 में बाहरी दिल्ली के ही विजय विहार, रोहिणी इलाके से 6-7 साल के एक लड़के को बहलाफुसला कर वह सुनसान जगह पर ले गया और कुकर्म करने के बाद उस की हत्या कर दी. इस मामले को भी पुलिस नहीं खोल सकी. रविंद्र को अपनी कामवासना शांत करने का यह तरीका अच्छा लगा. क्योंकि वह 2 हत्याएं कर चुका था और दोनों ही मामलों में वह सुरक्षित रहा, इस से उस के मन का डर निकल गया. इस के बाद वह कंझावला इलाके में एक बच्ची को बहलाफुसला कर सुनसान जगह पर ले गया और उस के साथ कुकर्म कर के उस की हत्या कर दी.

वह कोई एक काम जम कर नहीं करता था. कभी गाड़ी पर हेल्परी का काम करता तो कभी बेलदारी करने लगता. नोएडा के सेक्टर-72 में वह एक बिल्डिंग में काम कर रहा था. वहां भी उस ने अपने साथ काम करने वाली महिला बेलदारों की 2 बच्चियों को अलगअलग समय पर अपनी हवस का शिकार बनाया. वह उन बच्चियों को चौकलेट दिलाने के लालच में गेहूं के खेत में गया. वहीं पर उस ने उन की गला दबा कर हत्या कर दी थी.

उस के पिता ब्रह्मानंद का दिल्ली आने के बाद अपने गांव जाना नहीं हो पाता था, लेकिन रविंद्र कभीकभी अपने गांव जाता रहता था. खानदान के और लोग भी दिल्ली और नोएडा चले आए थे. रविंद्र जब भी गांव जाता, गंज डुंडवारा के पास गांव नूरपुर में अपनी मौसी मुन्नी देवी के यहां ठहरता था. वहीं पास के ही बिरारपुर गांव में उस की बुआ कृपा देवी का घर था. कभीकभी वह उन के यहां भी चला जाता था. उस की हैवानियत वहां भी जाग उठी तो उस ने वहां भी अलगअलग समय पर 2 बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया.

अब तक रविंद्र सैक्स एडिक्ट हो चुका था. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह अपने शिकार को तलाशता रहता. बच्चे उस का शिकार आसानी से बन जाते थे, इसलिए वे उस का सौफ्ट टारगेट बन जाते थे. ज्यादातर वह झुग्गीझोपडि़यों या गरीब परिवारों के बच्चों को ही निशाना बनाता था, ताकि वे लोग ज्यादा कानूनी काररवाई न कर सकें. इस तरह उस ने दिल्ली के निहाल विहार, मुंडका, कंझावला, बादली, शालीमार बाग, नरेला, विजय विहार, अलीपुर हरियाणा के बहादुरगढ़, फरीदाबाद, उत्तर प्रदेश के सिकंदराऊ, अलीगढ़ आदि जगहों पर 6 से 9 साल के करीब 40 लड़केलड़कियों को अपना निशाना बनाया. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह कुकर्म के बाद हर बच्चे की हत्या कर देता था. ज्यादातर के साथ उस ने मारने के बाद कुकर्म किया था.

उस ने कई बच्चों की लाशें ऐसी जगहों पर डाली थी कि पुलिस भी उन्हें बरामद नहीं कर सकी. 4 जून, 2014 को उस ने अपने दोस्त राहुल के साथ अपनी ही बस्ती जैननगर के कृष्ण कुमार के 6 साल के बेटे शिबू को सोते हुए उठा लिया. दोनों उसे आधा किलोमीटर दूर सुनसान जगह पर ले गए और उस के साथ कुकर्म किया. राहुल नाई था. वह अपने साथ उस्तरा भी ले गया था. बाद में उस ने उसी उस्तरे से उस का गला काट कर लाश सूखी गटर में डाल दिया था. बच्चे को गटर में डालते हुए उन्हें किसी ने देख लिया था. उन दोनों ने तो यही समझा था कि शिबू मर चुका है, लेकिन वह जीवित था. अगले दिन जब खोजबीन हुई तो वह सूखी गटर में पड़ा मिला.

जिस शख्स ने रविंद्र और राहुल को देखा था, उसी ने अगले दिन पुलिस को सब बता दिया. नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने रविंद्र और राहुल को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. रविंद्र जिस सन्नी के साथ ट्रेलर पर हैल्परी करता था, उसी सन्नी के रविंद्र की मां मंजू से अवैधसंबंध थे. बेटे के जेल जाने के बाद मंजू परेशान हो गई. वह बेटे की जमानत की कोशिश में लग गई. कहसुन कर उस ने सन्नी के पिता सुरेंद्र से बेटे की जमानत करवा ली. लिहाजा 20 मई, 2015 को रविंद्र जेल से बाहर आ गया.

बात 13 जुलाई, 2015 की है. मंजू अपने घर में अकेली थी. उस ने फोन कर के अपने प्रेमी सन्नी को घर पर बुला लिया. दोनों अपनी हसरतें पूरी करते, अचानक रविंद्र घर आ गया था. सन्नी उस समय मंजू से बातें कर रहा. इसलिए रविंद्र को उस पर कोई शक वगैरह नहीं हुआ. रविंद्र के आने के बाद मंजू और सन्नी की योजना खटाई में पड़ती नजर आ रही थी. बेटे को बाहर भेजने के लिए मंजू ने घर में पड़ा टेप रिकौर्डर रविंद्र को देते हुए कहा कि वह उसे ठीक करा लाए. मां के कहने पर रविंद्र टेप रिकौर्डर ठीक कराने चला गया.

बेटे के जाते ही मंजू और सन्नी अपनी हसरतें पूरी करने लगे, लेकिन मैकेनिक की दुकान बंद होने की वजह से रविंद्र जल्द ही वापस लौट आया. घर का दरवाजा बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा नहीं खुला, फिर वह गली में जा कर खड़ा हो गया. उधर दरवाजा खटखटाने पर मंजू और सन्नी की कामलीला में व्यवधान पड़ गया. फटाफट दोनों ने कपड़े पहने और सन्नी दरवाजा खोल कर चला गया. सन्नी रविंद्र को नहीं देख सका. अपने घर से सन्नी को निकलता देख रविंद्र का माथा घूम गया. वह समझ गया कि उस की मां के साथ सन्नी का जरूर कोई चक्कर चल रहा है.

उस ने उसी समय तय कर लिया कि वह सन्नी को सबक सिखा कर रहेगा. उस ने यह बात अपने भाई सुनील को बताई तो सुनील का भी सन्नी के प्रति खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने सन्नी के खिलाफ योजना बना ली. इस योजना में रविंद्र ने अपने दोस्त हिमांशु को भी शामिल कर लिया. उसी दिन शाम को रविंद्र ने सन्नी से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि वह इस समय मुंडका में है. योजना को अंजाम देने के लिए रविंद्र, हिमांशु और सुनील को ले कर मुंडका पहुंच गया. सन्नी उन्हें वहीं मिल गया. सन्नी के साथ उन्होंने एक जगह बैठ कर शराब पी. सन्नी पर जब थोड़ा नशा चढ़ गया तो उसी दौरान तीनों ने सन्नी की जम कर पिटाई की और रविंद्र ने उस की जेब से उस का मोबाइल फोन और ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य कागजात निकाल लिए.

रविंद्र ने सन्नी को जिंदा जलाने के लिए उसी की मोटरसाइकिल से पेट्रौल निकाल कर उसी के ऊपर छिड़क दिया. लेकिन सुनील ने उसे आग लगाने से रोक दिया. सुनील यह कहते हुए भाई को समझा दिया कि अभी इस के लिए इतनी ही सजा काफी है. अगर यह अब भी नहीं मानेगा तो इसे दुनिया से ही मिटा देंगे. उसी वक्त मौका मिलते ही सन्नी वहां से खेतों की तरफ भाग गया. सन्नी की बाइक ले कर रविंद्र, सुनील और हिमांशु अपने घर चले गए.

सन्नी रात भर खेतों में ही रहा. डर की वजह से वह घर तक नहीं गया. सुबह होने पर वह अपने घर गया और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी. तब पुलिस ने सन्नी को रोहिणी के डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती कराया और रविंद्र, सुनील व हिमांशु के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. 14 जु़लाई को सुबह 6 बजे के करीब रविंद्र नित्य क्रिया के लिए घर से निकला, तभी उस ने रास्ते में संतोष की 6 साल की बेटी निशा को अकेली जाते हुए देखा. वह भी नित्य क्रिया के लिए जा रही थी. उसे अकेली देख कर उस का शैतानी दिमाग जाग उठा. उस ने उस बच्ची को 10 रुपए दिए और किसी बहाने से उसे वहां से 50 मीटर की दूरी पर स्थित निर्माणाधीन इमारत में ले गया.

वह इमारत खाली पड़ी थी. नादान बच्ची उस के इरादों को नहीं समझ पाई. उस ने अन्य बच्चों की तरह निशा के साथ भी कुकर्म कर के उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. शातिर दिमाग रविंद्र ने इस बच्ची के मामले में सन्नी को फंसाने के लिए सन्नी का ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य कागजात उसी इमारत की दूसरी मंजिल पर डाल दिए, ताकि पुलिस सन्नी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दे. रविंद्र ने सन्नी को फंसाने का जाल तो अच्छी तरह बिछाया था, पर अपने जाल में वह खुद फंस जाएगा, ऐसा उस ने नहीं सोचा था. आखिर वह पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया.

रविंद्र से पूछताछ के बाद डीसीपी भी हैरान रह गए कि यह एक के बाद एक 40 वारदातें करता गया और पुलिस को पता तक नहीं चला. अगर यह क्रूर हत्यारा अब भी नहीं पकड़ा जाता तो न मालूम कितने और बच्चों को अपना निशाना बनाता. बहरहाल, पुलिस ने 17 जुलाई को रविंद्र को रोहिणी जिला न्यायालय के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव के समक्ष पेश किया. रविंद्र ने पुलिस को बताया था कि वह लगभग 40 बच्चों को अपना शिकार बना कर उन की हत्या कर चुका है. ये सारी वारदातें उस ने दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों में भी की थीं.

घटनास्थल का सत्यापन और केस से संबंधित सबूत जुटाने के लिए उस से और ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी थी. इसलिए पुलिस ने कोर्ट से उस का 7 दिनों का रिमांड मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. रिमांड मिलने के बाद पुलिस रविंद्र को उन जगहों पर ले गई, जहांजहां उस ने वारदातों को अंजाम दिया था. रविंद्र ने पुलिस को अलगअलग जगहों पर ले जा कर 27 केसों की पुष्टि करा दी. बाकी केसों के बारे में उसे खुद को ध्यान नहीं रहा कि उस ने कहां वारदात की थी. जिन जगहों पर वारदात कराने की उस ने पुष्टि कराई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के थाने में संपर्क किया तो पता चला कि उन में से केवल 15 केसों की ही अलगअलग थानों में रिपोर्ट दर्ज हुई थी.

पुलिस किसी और बच्चे की लाश बरामद नहीं कर पाई. इस की वजह यह थी कि उसे वारदात को अंजाम दिए काफी दिन बीत चुके थे, जिस से अनुमान यही लगाया गया कि बच्चों की लाशें जंगली जानवरों द्वारा या अन्य वजह से नष्ट हो गईं. जैसेजैसे सीरियल किलर रविंद्र की क्रूरता के खुलासे लोगों को पता लगते गए, उन का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. दिल्ली और आसपास के क्षेत्र के जिन गायब हुए बच्चों का कोई सुराग नहीं लग रहा था, उन के मांबाप भी यही सोचने लगे कि कहीं उन का बच्चा भी रविंद्र का शिकार तो नहीं हो गया. वे भी थाना बेगमपुर पहुंचने लगे.

रिमांड अवधि खत्म होने से पहले पुलिस ने 23 जुलाई, 2015 को जब रविंद्र को फिर से न्यायालय में पेश किया गया तो उसे देखने के लिए कोर्ट में और कोर्ट से बाहर तमाम लोग जमा हो गए. वे सभी गुस्से से भरे थे. वे उसे जनता के सुपुर्द करने की मांग करने लगे, ताकि उस क्रूर हत्यारे को अपने हाथों से सजा दे सकें. भारी पुलिस सुरक्षा के बीच उसे कोर्ट में पेश किया गया.  अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने रविंद्र को जेल भेजने के आदेश दिए. पुलिस जब उसे कोर्ट से बाहर ले जा रही थी, तभी वकीलों ने रविंद्र पर हमला कर उस की पिटाई शुरू कर दी. बड़ी मशक्कत से पुलिस ने उसे बचाया. इस के बाद बार एसोसिएशन के सचिन ने ऐलान कर दिया कि कोई भी वकील वहशी दरिंदे का मुकदमा नहीं लड़ेगा.

कथा संकलन तक रविंद्र जेल में बंद था. रविंद्र के घर वालों ने भी कह दिया कि वह उस की जमानत की पैरवी नहीं करेंगे. बहरहाल रविंद्र को जानने वाले सभी लोग उस के कारनामे से आश्चर्यचकित हैं. सीधासादा दिखने वाला रविंद्र इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, ऐसी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. जांच अधिकारी इंसपेक्टर जगमंदर दहिया उस के केसों से संबंधित ज्यादा से ज्यादा सबूत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इस सीरियल किलर को उस के गुनाहों की उसे सजा मिल सके. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime: प्रेमिका का सिर कलम

Love Crime: पति जौनी को छोडऩे के बाद 30 वर्षीय उमा को 25 वर्षीय बिलाल से मोहब्बत हो गई थी. उस के बाद वह लिवइन रिलेशन में रहने लगी. फिर एक दिन जंगल में उमा की सिरविहीन और निर्वस्त्र लाश मिली. उमा की जब किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो आखिर किस ने और क्यों किया उस का मर्डर? पढ़ें, लव क्राइम की यह हैरतंगेज कहानी.

उमा को खत्म करने की बिलाल की योजना किसी कागज पर नहीं थी, वह उस के दिमाग में बनी एक अंधेरी भूलभुलैया थी. उस ने सोचा कि पहले उमा को भरोसे में लिया जाए, फिर उसे सुनसान जगह ले जा कर उसे खत्म किया जाए. फिर उस की लाश के टुकड़े कर अलगअलग फेंक दिया जाए. इस से उस की शिनाख्त भी नहीं हो पाएगी और यह राज भी राज ही बन कर रह जाएगा. प्रेमिका को ठिकाने लगाने का बिलाल ने यही प्लान बना लिया.

14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की शादी होने जा रही थी. बारात उतराखंड के रुड़की जानी थी. लेकिन इस निकाह में बिलाल की हिंदू प्रेमिका बाधा बन सकती थी और ऐसे में उस ने प्रेमिका उमा को रास्ते से हटाने का प्लान तैयार कर लिया था.

बिलाल ने अपनी शादी से ठीक 8 दिन पहले यानी 6 दिसंबर को उस ने उमा से कहा, ”चलो, कहीं घुमा कर लाता हूं.’’

उस के खौफनाक इरादों से अनजान उमा राजी हो गई. शाम का वक्त था, अंधेरा हो चला था. उमा रोमांच महसूस कर रही थी, जबकि उस के मन में कुछ और ही चल रहा था. 6 दिसंबर, 2025 को शाम करीब 6 बजे स्विफ्ट कार ले कर वह उमा के कमरे पर गया था. बोला, ”सरप्राइज है, चलो तुम्हें बाहर घुमा कर लाता हूं.’’

हथिनीकुंड बैराज में यूपी और हरियाणा को जोडऩे वाला पुल है. वह उसी रास्ते से कार लाया. पहले हिमाचल की तरफ कार घुमाई, फिर उस ने पहले हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब की तरफ कार मोड़ ली. उमा लगातार उस से बातें किए जा रही थी. वह उसे प्यारभरे अंदाज में उस की बातों का जवाब दे रहा था. दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था.

रात के करीब 8 बज गए थे. रात का स्याह अंधेरा छा गया था. कलेसर नैशनल पार्क से गुजर रहे थे. नैशनल हाइवे से गाडिय़ां आजा रही थीं. उस दिन शनिवार था. वीकेंड पर अकसर पर्यटक इस इलाके में ज्यादा घूमने जाते हैं. उस ने कहा कि कोई होटल देखते हैं, वहां शाम बिताएंगे. पांवटा में रूम तलाशने की कोशिश की, लेकिन पर्यटक काफी थे. कहीं कोई कमरा किराए पर नहीं मिला. उसे डर लगा कि कहीं पकड़ा न जाए. अचानक प्लान बदल दिया.

इस के बाद उस ने हरियाणा की सीमा की तरफ कार मोड़ ली. बोला कि चलो, जंगल की तरफ चलते हैं, उधर भी अच्छे होटल हैं. उमा तो उस पर आंखें मूंद कर भरोसा करती थी, इसलिए राजी हो गई. कलेसर जंगल के एरिया से निकलते ही आबादी शुरू हो जाती है. यहां प्रतापनगर के गांव बहादुरपुर की सीमा से पहले ही उस ने कार रोक ली. उमा ने पूछा कि कार क्यों रोक दी?

उस ने कहा कि आबादी आने वाली है. सीट बेल्ट लगाना जरूरी है. यह बहाना बना कर वह पिछली सीट पर चला गया. उस वक्त उमा अगली सीट पर बैठी अपनी धुन में मस्त थी. तभी अचानक (25 वर्षीय) बिलाल ने 30 वर्षीय प्रेमिका उमा के गले में सीट बेल्ट डाल दी और गला घोंटने लगा. उमा के पास बचने या चिल्लाने का ज्यादा मौका नहीं था. उमा का शरीर बेजान हो गया. उसे मरा मान बिलाल तुरंत अगली सीट पर आया. उस ने कार आगे बढ़ा दी. करीब आधा किलोमीटर दूर गया तो सामने गांव बहादुरपुर की लाइटें नजर आने लगीं.

बिलाल को अब शव ठिकाने लगाने की जल्दी थी. उस के मन में पकड़े जाने का भी डर था, इसलिए उस ने गरदन से सिर काटने की सोची. साथ में वह मीट काटने वाला छुरा ले कर आया था. लाश को सड़क किनारे खेतों में बनी पौपुलर की नर्सरी में ले गया. वहां सिर धड़ से अलग किया और लाश के कपड़े उतार लिए, ताकि उस की पहचान न हो. कटे सिर और उतारे गए कपड़ों को पौलीथिन के थैले में डाल कर अगली सीट पर रख लिया. सिर कटी लाश उस ने वहीं छोड़ दी थी.

उस वक्त रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे होंगे. अब उसे ऐसी जगह की तलाश थी, जहां सिर व कपड़े फेंक सके ताकि शिनाख्त की संभावना न बचे. बिलाल ने सिर फेंकने के लिए इसी जगह को चुना. यहां सिर फेंकने के बाद बिलाल ने कार घुमाई और हथिनीकुंड बैराज के पुल से होते हुए अपने घर चला गया.

बिलाल ने मर्डर के बाद घर पहुंच कर सब से पहले अपना मोबाइल फारमेट कर दिया, जिस से कि उस के मोबाइल में उमा की फोटो और कौन्टैक्ट नंबर सब डिलीट हो गए. आधी रात के बाद बिलाल सो गया और सुबह फेमिली वालों से कहा कि अब निकाह की तैयारियों में रहूंगा. अब कहीं नहीं जाऊंगा.’’ योजना पर अमल कर के उस ने उमा की जिंदगी हमेशा के लिए खत्म कर दी. यह मामला हरियाणा के यमुनानगर और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से जुड़ा एक सनसनीखेज हत्याकांड है, जिस में प्रेम प्रसंग, लिवइन रिलेशनशिप और शादी के दबाव के चलते बेरहमी से हत्या की गई है.

सहारनपुर के हलालपुर गांव में एक परिवार रहता है. उस परिवार की उमा 18 साल की हो चुकी थी. उस की जवानी अब फूल की तरह पूरी तरह खिल चुकी थी. उमा के घर से सिर्फ 2-4 घर छोड़ कर  एक 19 साल का युवक जौनी रहता था. पेशे से मजदूर था और रंगाईपुताई का काम किया करता था. जौनी मामूली सा विकलांग था. उस की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि कोई उस की कमजोरी पर ध्यान ही नहीं देता. जौनी मेहनती और हंसमुख था.

उमा के घर में रंगाईपुताई का काम चल रहा था. उमा के पापा ने जौनी को बुलाया था, क्योंकि वह पड़ोस में ही रहता था. पहली बार जब जौनी उमा के घर आया तो वह सीढ़ी पर चढ़ कर दीवारों को रंग रहा था. विकलांग होने के बावजूद वह बड़े सलीके से काम कर रहा था, जैसे कोई कलाकार अपनी पेंटिंग बना रहा हो. उमा उस वक्त घर में थी. बचपन से ही वो जौनी को ‘जानी वाकर’ कह कर चिढ़ाती थी और जौनी मुसकरा कर उस की कलाई पकड़ लेता. दोनों साथ खेलते हुए बड़े हुए.

परंपरा, मानवता और पड़ोसी होने के नाते वह चाय ले कर किचन से बाहर आई और जौनी को देखा. उस के माथे पर पसीने की बूंदें, हाथों में ब्रश और चेहरे पर एक हलकी मुसकान.

”ओए जौनी, ले चाय पी ले,’’ उमा ने शरमाते हुए कहा.

जौनी ने मुड़ कर देखा और उस की आंखें उमा की मासूमियत पर ठहर गईं.

”धन्यवाद, उमा. लेकिन मैं तो मजदूर हूं.’’ उस ने हंसते हुए कहा.

”मजदूर को भी हमारी परंपरा के अनुसार दिन में 2 बार चाय पिलाते हैं.’’

उमा की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि वह छोटीछोटी बातों से प्रभावित हो जाती थी. जौनी की सादगी और मेहनत ने उसे छू लिया. उस दिन से दोनों की बातचीत शुरू हुई. बचपन की पुरानी यादें, यही सब बातों के विषय होते. धीरेधीरे ये मुलाकातें रोमांटिक रंग लेने लगीं. इस के बाद उन की मुलाकातें भी होने लगीं. जौनी उमा को अपनी जिंदगी की कहानियां सुनाता, कैसे वह विकलांग होने के बावजूद कभी हारा नहीं, कैसे वह सपने देखता है एक बेहतर जिंदगी के. उमा उस की ताकत से प्रभावित होती और उसे चूमती, पहले गाल पर, फिर होंठों पर.

उन के चुंबन में एक जुनून था, जैसे दोनों की आत्माएं मिल रही हों. जौनी की मजबूत बांहें उमा को घेर लेतीं और उमा की नरम अंगुलियां उस के बालों में घूमतीं. वे घंटों बातें करते, हंसते और कभीकभी चुपके से एकदूसरे को छूते, एक स्पर्श जो बिजली सी दौड़ाता.

जौनी ने उमा का हाथ पकड़ा और बोला, ”उमा, तुम मेरी जिंदगी हो. मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’

उमा ने उस के सीने पर सिर रखा और कहा, ”जौनी, तुम्हारी कमजोरी मेरी ताकत है. हम साथ हैं, हमेशा.’’

उन का रोमांस अब गहरा हो गया था. उमा और जौनी के बीच का प्यार एक खामोश नदी की तरह बहता था. गहरा, शांत और हर किसी की नजरों से छिपा हुआ.

शादी के दिन हुई फरार

रातें उन की थीं. जब मोहल्ला सो जाता, उमा अपनी छत पर आती. जौनी दीवार फांद कर उस के पास पहुंच जाता. ऐसे ही 5 साल गुजर गए. 5 साल की अनगिनत रातें, अनकही बातें, चुराए गए चुंबन और वो सांसें जो सिर्फ एकदूसरे के लिए रुकी थीं. उमा के फेमिली वाले उमा की शादी के लिए बहुत चिंतित थे. आखिरकार एक लड़का उमा के लिए फेमिली वालों ने पसंद कर के शादी तय कर दी. यह बात सन 2010 की है. सभी धार्मिक औपचारिकताओं के बाद बारात आने की तारीख तय हो गई. अभी तक उमा की तरफ से किसी तरह का कोई विरोध फेमिली वालों के सामने नहीं आया.

सूरज की पहली किरणों ने अभीअभी गांव की सड़कों को छुआ था, जब उमा के घर में हलचल मच गई. आज वह दिन था, जिस का इंतजार पूरे परिवार को था. उमा की शादी. लेकिन कमरे में सन्नाटा था. जब मां ने दरवाजा खटखटाया और भीतर झांका तो पल भर में सब कुछ समझ में आ गया. अलमारी खुली थी, कुछ कपड़े गायब थे, उमा भी गायब थी. दुलहन का लहंगा बिस्तर पर बिखरा पड़ा था. मेज पर रखा वह छोटा सा कागज, ‘मम्मी, हम मजबूर थे. माफ करना.’

जौनी और उमा, 2 प्रेमी दिल, रात की आड़ में घर से निकल चुके थे. उन के पैरों की धूल अब दूर किसी अनजान रास्ते पर उड़ रही थी, जहां प्यार की उड़ान ने परिवार की इज्जत को पीछे छोड़ दिया था. पापा की आंखें फैल गईं, भाई दौड़ कर बाहर निकले. ”कहां गई वो? जौनी भी गायब है!’’ चाचा की आवाज कांप रही थी.

पूरे गांव में तलाश शुरू हो गई. कुएं के पास, मंदिर में, बस स्टैंड पर. सभी रिश्तेदार मिल कर तलाश कर रहे थे. पड़ोसी जुट गए, फोन घूमने लगे. उन के मुंह से एक ही बात निकली, ‘भाग गए दोनों…’

ये शब्द हवा में जहर की तरह फैल गए, उमा के पापा का चेहरा पीला पड़ गया, मम्मी रोरो कर बेहाल हो रही थी.

‘उमा और जौनी की प्यार की आग में सब जल गया. अब इज्जत का क्या होगा?’ सोच कर पापा ने सिर थाम लिया.

तभी मामामामी आगे आए. उन की आवाज कांपी, पर नीयत मजबूत थी. दोनों ने उमा की मम्मी और पापा को समझाया. कहा, ”हम हैं आप के साथ. चिंता की कोई बात नहीं है. मेरी बेटी है. अगर आप कहें तो आज हम उमा की जगह अपनी बेटी को विदा कर देंगे. पूरे समाज में आप की इज्जत का सवाल है. यह त्याग हम कर सकते हैं.’’

दोनों में से किसी ने आंखें उठा कर नहीं देखा. अब हर तरफ फुसफुसाहटें थीं. उमा की मम्मी आंसू पोंछते हुए बोली, ”भाभी, क्या करूं? मेरी बेटी ने तो हमें डुबो दिया. बारात लौट गई तो गांव में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’

आंसू बिना आवाज के गिरते रहे. मां ने एक पल को भाई की ओर देखा और फिर धीरे से सिर हिला दिया. समय बीतता गया, सूरज चढ़ता गया. बारात की धुन दूर से सुनाई देने लगी. ढोल की थाप, शहनाई की मधुर स्वरलहरियां. दूल्हा, घोड़ी पर सजाधजा, मुसकराता हुआ आ रहा था अनजान इस तूफान से. घर के दरवाजे पर बारात रुकी. बारात आई. ढोलनगाड़ों की आवाज ने उस खालीपन को ढक लिया, जो आंगन में पसरा था. स्वागत हुआ, आवभगत निभाई गई. सभी के चेहरे पर नकली मुसकानें थीं, पर आंखों में प्रश्न.

परंपराएं चलीं, फेरों का समय आया. मामा की बेटी लाल जोड़े में आई. कांपती नहीं, बल्कि विश्वास से भरी थी. फेमिली वालों के चेहरे पर मुसकान चिपकी हुई थी, लेकिन आंखें बता रही थीं कि दिल टूटा हुआ है.

पापा ने आगे बढ़ कर दूल्हे का स्वागत किया, ”आओ जी, स्वागत है!’’

बाहर बारात नाच रही थी, अंदर फैसला हो चुका था. मामामामी की बेटी को बुलाया गया. वह हैरान थी, लेकिन परिवार की इज्जत के लिए तैयार हो गई.

”अगर इस से सब की लाज बचती है तो मैं कर लूंगी,’’ उस ने धीरे से कहा.

मेकअप किया गया. उमा का ही लहंगा पहनाया गया. अब  मंडप सजा, पंडितजी मंत्र पढऩे लगे. दूल्हे को बताया गया कि ‘परिवार की रस्म है, दुलहन का नाम बदल गया.’ वह मुसकराया. शायद अनजान, शायद समझदार. फेरों के समय उमा की मम्मी की आंखों से आंसू बह रहे थे, खुशी के नहीं, दर्द के. पापा ने दुलहन का हाथ दूल्हे को सौंपा, मन में उमा की याद थी, ‘बेटी, तू जहां भी है, खुश रह,’ उन्होंने मन ही मन कहा.

इस तरह अपनी इज्जत की आरती को बचा कर इस घर से उमा की जगह उस की ममेरी बहन को विदा कर दिया गया. शादी संपन्न हुई. बारात विदा हुई. लेकिन घर में सन्नाटा था. रात को जब सब सो गए तब उमा की मम्मी ने पति से कहा, ”क्या हम ने सही किया?’’

उन्होंने सिर हिलाया, ”हां, इज्जत बचाई. लेकिन दिल टूटा है. जौनी और उमा, काश वे समझते.’’

इस अप्रत्याशित मोड़ ने एक नई कहानी शुरू की, दर्द की, बलिदान की और उम्मीद की.

निर्वस्त्र मिली लाश

हरियाणा के यमुनानगर के प्रताप नगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत एक गांव पड़ता है बहादुरपुर. 7 दिसंबर, 2025 की सुबह के करीब  9 बजे के आसपास इसी बहादुरपुर गांव के एक व्यक्ति ने प्रताप नगर थाने में फोन कर कहा, ”साहब, मेरे गांव के बाहर पौपुलर की एक नर्सरी है. एक महिला की डैडबौडी पड़ी है, जिस का न तो वहां पर सिर मौजूद है और न ही उस के शरीर पर कोई कपड़ा मौजूद है.’’

एसएचओ नरसिंह गुर्जर को जैसे ही सूचना मिली, वह फौरन अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पर पहले से ही काफी तादाद में लोग मौजूद थे. पुलिस भीड़ को हटा कर डैडबौडी के पास पहुंची. डैडबौडी को देखने के बाद खुद पुलिस भी एकदम से चौंक गई. पुलिस ने घटनास्थल का बड़ी बारीकी से मुआयना किया, लेकिन महिला का सिर बरामद नहीं हुआ.

पर सवाल यह था कि आखिरकार वह मरने वाली महिला कौन थी? घटनास्थल पर काफी सारे लोग मौजूद थे. उन सभी से पूछताछ की, पर कोई भी व्यक्ति उस डैडबौडी की शिनाख्त नहीं कर सका. घटनास्थल पर कोई ऐसा डौक्यूमेंट्स और न ही कोई ऐसा पहचानपत्र मिला, जिस से उस मरने वाली महिला के बारे में कुछ पता चल सके. उस के शरीर पर भी कहीं कोई टैटू, नाम या अन्य कोई चिह्नï या गुदा नहीं था.

पुलिस ने डैडबौडी को अपने कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. एसएचओ नरसिंह गुर्जर ने तुरंत अपने उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी. यमुनानगर के एसपी कुलदीप गोयल घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया गया. पुलिस ने अज्ञात अपराधियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद केस की जांचपड़ताल शुरू कर दी. 72 घंटे का समय बीत जाने के बावजूद मृतका की शिनाख्त नहीं हुई तो इस सिरविहीन धड़ का अंतिम संस्कार सेवा समिति के माध्यम से करा दिया गया.

एसपी कुलदीप गोयल ने केस का खुलासा करने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया. साथ ही सर्विलांस टीम, फोरैंसिक टीम, डौग स्क्वायड सभी अपनीअपनी तरह से प्रयास करने में जुट गए, ताकि इस हत्याकांड का खुलासा हो सके. यह एक तरह से ब्लाइंड मर्डर था और इस का पता चल पाना मुश्किल हो रहा था. एसपी कुलदीप गोयल ने एसआईटी के हैड डीएसपी रजत गुलिया को नियुक्त किया था. रजत गुलिया के नेतृत्व में पुलिस ने प्रयास करने शुरू कर दिए. 500 से ज्यादा  सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए. पुलिस द्वारा उन्हें बारबार देखा जा रहा था.

इस केस की जांचपड़ताल करते हुए 3 दिन का समय गुजर गया, लेकिन पुलिस के हाथ कोई सबूत नहीं मिला. 3 दिनों के बाद पुलिस फिर से उस घटनास्थल पर गई. जब आसपास के लोगों से पूछताछ की तो बहादुरपुर गांव के ही रहने वाले एक व्यक्ति ने पुलिस से कहा कि साहब मैं दावे के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन ठीक एक दिन पहले 6 दिसंबर, 2025 को रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे इस रोड पर मैं ने एक कार को देखा था. मुझे उस कार का नंबर तो याद नहीं है, लेकिन उस कार के नंबर प्लेट पर यूपी का नंबर लिखा हुआ था.

निकाह से पहले अरेस्ट

पुलिस ने इसी को आधार बना कर जब इस केस की जांचपड़ताल करते हुए आगे जा कर जब रोड पर लगे हुए सीसीटीवी की फुटेज को चैक किया तो आखिरकार एक सीसीटीवी में वह कार जाते हुए दिखाई दी. उस का नंबर भी साफसाफ दिखाई दे गया. पुलिस गाड़ी के उस नंबर के माध्यम से उस के मालिक तक पहुंच गई. कार के मालिक से पता चला कि उस गाड़ी के ड्राइवर का नाम बिलाल है, जो मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के नकुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत टिडोली गांव का रहने वाला है.

13 दिसंबर, 2025 को शाम के करीब 7 बजे के आसपास हरियाणा की पुलिस अपनी टीम के साथ बिलाल के घर पहुंच गई. उस दिन बिलाल की छोटी बहन की बारात आई हुई थी. कुछ बाराती चले गए थे. कुछ बाराती वहां मौजूद थे. उस वक्त बिलाल की बहन की विदाई का कार्यक्रम चल रहा था. बड़ी संख्या में पुलिस बल देख कर घर में अफरातफरी मच गई. पुलिस ने बिलाल के अब्बा फुरकान से संपर्क किया. उन से पूछा कि आज तुम्हारे यहां क्या फंक्शन है? उन्होंने बता दिया कि आज उन की बेटी की विदाई हो रही है.

पुलिस के कहने पर फुरकान ने अपने बेटे बिलाल को पुलिस के सामने पेश कर दिया.  पुलिस वालों ने जब उस से सवाल करने शुरू किए तो बिलाल सवालों के जवाब नहीं दे पा रहा था. सर्दी में भी उसे पसीना आने लगा. फुरकान समझ गया कि कुछ न कुछ उस के बेटे ने गड़बड़ की है. तभी बिलाल ने वहां से भागने की कोशिश की. उसे पता नहीं था कि चारों तरफ से वह पुलिस से घिरा हुआ है.

पुलिस ने बिलाल को गिरफ्तार कर लिया. तभी काफी संख्या में मौजूद रिश्तेदार पुलिस का विरोध करने लगे. सभी रिश्तेदार जानना चाहते थे कि बिलाल को पुलिस क्यों गिरफ्तार करने आई है. तब पुलिस ने उन्हें बता दिया कि इस ने एक महिला की हत्या की है. पुलिस उसे गिरफ्तार कर लौट आई. थाने में जब उस महिला की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने उमा नाम की महिला की हत्या कर उस की सिरविहीन लाश हरियाणा के यमुना नगर क्षेत्र में डाल दी थी और उस का सिर हरियाणा हिमाचल प्रदेश के बौर्डर पर कलेसर जंगल में एक खाई में डाल दिया था.

पुलिस ने रविवार 14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की निशानदेही पर हरियाणा हिमाचल के बौर्डर पर कलेसर जंगल में स्थित लालढांग की खाई से उमा का सिर बरामद किया गया. हालांकि वहां छुरा बरामद नहीं हुआ. पुलिस ने अदालत में पेश कर के बिलाल को 4 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. रिमांड अवधि पर उस ने पुलिस को उमा की हत्या करने की जो कहानी बताई, वह हैरान करने वाली निकली—

हमदर्दी ने प्यार जगाया

बिलाल 4 भाईबहन हैं. वह पहले ट्रक और डंपर चलाता था. इन दिनों कार की ड्राइविंग कर रहा था. पेशेवर तरीके से कार की बुकिंग कर के यात्रियों को उन की बताई हुई मंजिल तक पहुंचाता था. रोज की तरह उस दिन भी वह एक फैक्ट्री में किसी सवारी को छोडऩे आया था. फैक्ट्री के गेट के बाहर एक महिला बेंच पर बैठी हुई थी. करीब 30 साल की, उस का चेहरा पीला था. आंखों में थकान और बेचैनी साफ झलक रही थी.

बिलाल का ध्यान उस पर चला गया. वह आदतन संवेदनशील था. उस ने पास जा कर उस से धीरे से पूछा, ”आप ठीक तो हैं? कुछ परेशान लग रही हैं.’’

महिला ने कमजोर सी मुसकान के साथ कहा, ”बुखार आ रहा है, सिर घूम रहा है. इसी फैक्ट्री में काम करती हूं. छुट्टी ले कर घर जा रही थी. चला नहीं गया, इसलिए अकेली बैठी हूं. अगर हो सके तो मुझे गंगोत्री कालोनी में घर तक छोड़ दीजिए.’’

घर पहुंचने पर बिलाल ने मैडिकल स्टोर से ला कर बुखार की दवा भी खिला दी. 2 घंटे में बुखार उतर गया तो बिलाल अपने घर चला गया. अगले कुछ दिनों में बिलाल हालचाल पूछने आने लगा. कभी दवा लाता, कभी फल. बातचीत का सिलसिला बढ़ा तो अहसासों की गरमाहट भी. दोनों ने अपनेअपने संघर्ष, अकेलापन और सपने साझा किए. उमा को बिलाल की सादगी और ईमानदारी भा गई और बिलाल को उमा की समझदारी और आत्मसम्मान.

एक दिन उमा ने बिलाल को अपनी जिंदगी की दुखभरी कहानी सुनाई. 13 साल पहले की बात है. मैं ने अपने पड़ोस के एक युवक जौनी के साथ भाग कर शादी की थी. मेरे एक बेटा भी है, जो अपने पापा के साथ रहता है. घर से बाहर 10 साल हम ने इधरउधर बिताए. उस के बाद हम लौट कर सहारनपुर आ गए. मेरे फेमिली वालों ने मुझ से संबंध खत्म कर दिए थे.

सहारनपुर आने पर मैं अपने पति के साथ  रमजानपुर में रहती थी. मैं काफी गुरबत में समय बिता रही थी. मोहल्ले के ही एक युवक से मेरा संपर्क हुआ. उस ने मुझे सहारनपुर में एक फैक्ट्री में नौकरी दिला दी. एक मोहल्ले के ही होने के कारण कभीकभी मैं उस के साथ चली जाती और कभीकभी वापसी में भी हम साथसाथ ही आ जाते. इस से पति मेरे ऊपर शक करने लगा. मैं ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन पति जौनी के दिमाग से शक दूर नहीं हुआ.

इस बात को ले कर हम दोनों के बीच झगड़ा होने लगा. दिलों में खटास पैदा हो गई. मैं ने गंगोत्री में किराए पर मकान लिया और पति से अलग इस किराए के मकान में अकेली रहने लगी. बात तलाक तक पहुंच गई. इस तरह हम दोनों के बीच संबंध विच्छेद हो गया. कुछ दिनों बाद युवक ने फैक्ट्री से काम छोड़ दिया. मेरा संपर्क उस से टूट गया. पति ने मेरी कभी कोई खबर नहीं ली. इस तरह मैं अकेली पड़ गई.

मैं एक दिन अपने पति के कमरे पर अपने बेटे से मिलने के इरादे से गई. पता चला कि वह मकान खाली कर के अपने गांव वापस चला गया है. उमा की आंखों में आंसू आ गए. दोनों एकदूसरे के करीब आए. उन के दिलों में एक नई गरमाहट जाग रही थी. धीरेधीरे मामला प्यार में बदल गया.

सहारनपुर की गलियों में एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी 2 अकेले दिलों के मिलन की. बिलाल और उमा अब साथ थे. वे लिवइन में रहने लगे. बिलाल अपने घर कोई न कोई बहाना बना कर उमा के साथ रातें बिताया करता था. घर का सारा खर्च बिलाल ही उठाता था.

परिजनों ने तोड़ा संबंध

बिलाल को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने सब से पहले उस से सवाल किया कि यह महिला कौन है और इस की हत्या क्यों की? बिलाल ने पुलिस को अपनी मोहब्बत की शुरुआत की सारी कहानी बता दी. सिर को भी पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया. शेष धड़ का तो पहले ही पोस्टमार्टम हो चुका था. सिरविहीन धड़ लावारिस घोषित हो जाने के कारण सेवा समिति ने बगैर सिर के अज्ञात मान कर पश्चिम यमुना नहर के पास श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया था.

क्योंकि अब उमा की शिनाख्त हो गई थी. उस के परिवार का पता लग गया था, इसलिए पुलिस पोस्टमार्टम के बाद सिर को ले कर उमा के गांव हलालपुर पहुंची तो उस का भाई टिंकू मिला. टिंकू ने बताया कि साहब करीब 15 साल पहले उमा की शादी हो रही थी. हम लोगों को पता ही नहीं चला, जिस दिन उस की बारात आने वाली थी, उसी दिन मौका पाते ही वो जौनी के साथ घर से भाग गई थी. उसी रात हम ने फैसला ले लिया था कि हम अब उमा को कभी याद नहीं करेंगे. उमा से हमारा कोई वास्ता नहीं है. उमा से हमारा कोई रिश्तानाता नहीं है.

पुलिस वाले जब उस का सिर ले कर पहुंचे तो इंसानियत के नाते टिंकू ने पुलिस वालों और रिश्तेदारों के कहने पर सिर का अंतिम संस्कार कर दिया. गांव के लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि आखिरकार यह सब कैसे हो गया. फिर पुलिस उस के पति जौनी के पास गई. जौनी बोला कि मुझे पता चला है कि वह किसी बिलाल नाम के युवक के साथ रह रही थी. उस ने ही उस का कत्ल कर दिया है. जौनी ने कहा कि मुझे उस के मर्डर का दुख तो है, लेकिन मेरा उस से कोई वास्ता या सरोकार नहीं रहा. कानूनन मेरा उमा से तलाक हो चुका था.

बिलाल इस समय जेल में है. पुलिस का दावा है कि उस ने सारे सबूत एकत्र कर लिए हैं. आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी. Love Crime

 

 

Dehradun Crime: नादान उम्र की भूल

Dehradun Crime: नादान शालू की रवि राजपूत से दोस्ती हो गई, जिसे रवि प्यार समझ बैठा. परेशानी तब हुई, जब इस प्यार ने रवि को जुनूनी बना दिया. वह शालू को भगा कर अपनी दुनिया बसाना चाहता था. एक रात वह शालू को भगा ले जाने के इरादे से आया तो शालू ने इंकार कर दिया. दोनों की इस जिद में शालू की जान गई तो रवि अपराधी बन गया.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पौश कालोनी पाम सिटी में लोगों की एक से बढ़ कर एक कोठियां और फ्लैट्स हैं. इन्हीं कोठियों में से कोठी नंबर 91 के.के. अरोड़ा की है. खुशमिजाज शख्स के तौर पर पहचाने जाने वाले के. के. अरोड़ा पेशे से प्रौपर्टी डीलर थे. वह होटल कारोबार से भी जुड़े रहे हैं. हर शख्स चाहता है कि उस का परिवार खुश रहे, आर्थिक रूप से संपन्न अरोड़ा भी इस चाहत को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करते थे.

उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी के अलावा 2 बेटियां थीं, शालू व शालिनी और एक छोटा बेटा विशाल. शालू शहर के ही एक कालेज में इंटर की छात्रा थी. उस के दोनों भाईबहन भी पढ़ाई कर रहे थे. अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह परिवार बेहद खुशहाल था. किस की जिंदगी में खुशियों का सूरज कब रेशमी किरणें फैलाने लगे और कब शाम का रंग लाल हो कर दिल दहला जाए, कोई नहीं जानता. 21 जून, 2015 को विश्व योग दिवस मनाया जाना था. इसे ले कर शहर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाने थे. के. के. अरोड़ा को भी एक ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जाना था, जहां सामूहिक रूप से योगा किया जाना था. उस दिन वह भोर में करीब साढ़े 5 बजे जाग गए थे.

उन की कोठी चूंकि 2 मंजिला थी, लिहाजा सभी के सोने के लिए अलगअलग कमरे बने हुए थे. सुबहसुबह अरोड़ाजी कोठी की छत पर जा कर टहलने लगे. तब तक उन की पत्नी लक्ष्मी भी उठ कर बैडरूम से बाहर आ गई थीं. वह बड़ी बेटी शालू के कमरे की तरफ गईं. लेकिन वह अपने कमरे में नहीं थी. आमतौर पर हर रोज उस वक्त शालू सोती हुई मिला करती थी. बेटी को बिस्तर पर न पा कर लक्ष्मी थोड़ा चौंकीं. उन्हें नहीं पता था कि वह कहां चली गई थी. उन्होंने पति के पास पहुंच कर बताया कि शालू अपने कमरे में नहीं है.

अरोड़ा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘‘हो सकता है घूमने चली गई हो.’’

कालेज की छुट्टियां चल रही थीं. कभीकभी ऐसा भी होता था कि शालू मौर्निंग वाक पर निकल जाती थी. लक्ष्मी दूसरी बेटी शालिनी के पास गईं. तब तक वह जाग चुकी थी. उन्होंने उस से भी पूछा, ‘‘शालू कहीं नहीं दिख रही, तूने देखा है क्या उसे?’’ लेकिन शालिनी ने भी शालू को देखने की बात से इनकार किया.

वैसे तो यह मामूली सी बात थी. लेकिन बच्चे मातापिता की नजरों के सामने न हों या उन्हें बिना बताए कहीं चले जाएं तो चिंता हो ही जाती है. बेटियों के मामले में तो चिंता और बढ़ जाती है. लक्ष्मी को चिंता हुई तो वह ‘शालू शालू’ पुकारते हुए कोठी में दूसरी तरफ गईं. उसी वक्त अनायास उन की निगाह लौबी की ओर चली गई. वहां शालू खून के सैलाब में डूबी फर्श पर पड़ी थी. यह नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. उन्होंने आगे बढ़ कर ‘बेटीबेटी’ पुकारते हुए शालू को हिलायाडुलाया, उसे झिंझोड़कर देखा. लेकिन उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई.

बदहवास सी लक्ष्मी चिल्लाते हुए पति की तरफ दौड़ीं. वह भी दौड़ कर आए. बेटी को इस दशा में देख कर वह भी जड़वत रह गए. शालू का शव खून से लथपथ पड़ा हुआ था. इस खौफनाक मंजर ने लक्ष्मी की रुलाई को हृदयविदारक चीखों में तब्दील कर दिया. आसपड़ोस के लोगों ने चीखने और रोने की आवाज सुनी तो वे घरों से बाहर निकल आए. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो पहले से ही मौर्निंग वाक के लिए सड़क पर टहल रहे थे. वे भी अंदर आ गए. रक्तरंजित नजारा देख कर उन के कलेजे कांप गए. निस्संदेह किसी ने शालू की हत्या कर दी थी.

आननफानन में 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया गया. करीब 20 मिनट में एक गश्ती पीसीआर मौके पर पहुंच गई. यह इलाका थाना पटेलनगर में आता था. थानाप्रभारी पंकज गैरोला, वरिष्ठ उप निरीक्षक नत्थीलाल उनियाल तथा अन्य पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. घटना सनसनीखेज थी, सूचना मिलते ही एसएसपी पुष्पक ज्योति और एसपी सिटी अजय कुमार वगैरह भी वहां आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. 17 वर्षीया शालू 3 फुट की लौबी में पड़ी थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. उस का सिर फटा हुआ था और आसपास खून फैल कर जम गया था.

मौके पर काले व सफेद रंग का एक मर्दाना गमछा पड़ा था. संभवत वह कातिल का था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. एसएसपी के निर्देश पर क्राइम ब्रांच की फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुलाया गया. जांच में मदद के उद्देश्य से ट्रेनर पुलिसकर्मी ने प्रशिक्षित कुत्ते को घटनास्थल और लाश को सुंघा कर छोड़ दिया. वह छत व सीढि़यां उतर कर नीचे गया और टहल कर वापस आ गया. जाहिर है इस से कोई स्पष्ट अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.

क्राइम ब्रांच की टीम ने भी अपने हिसाब से घटनास्थल की जांच की. पुलिस ने परिजनों से भी औपचारिक पूछताछ की. मृतका के बहन और भाई गमगीन होने की वजह से बात करने की स्थिति में नहीं थे. सब से चौंकाने वाली बात यह थी कि शालू की हत्या का सैटरडे नाइट में परिवार के किसी सदस्य को पता तक नहीं लग सका था. किसी ने उस के चीखने की आवाज भी नहीं सुनी थी. यह बात थोड़ी अजीब लगने वाली थी. वैसे भी घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था.

शुरुआती जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं. एक तो यह कि सिर पर किसी चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला सीधेसीधे हत्या का था, न कि लूटपाट में हुई हत्या का. क्योंकि घर से कोई चीज गायब नहीं थी. तीसरा यह कि वारदात में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ था, जो घर की भौगोलिक स्थिति से भी परिचित था. यह भी संभव: हो सकता था कि बदमाश लूटपाट के इरादे से कोठी में घुसे हों और इसी बीच शालू लौबी में गई हो और उन्होंने उस की हत्या कर दी हो. इस के बाद वे बिना लूटपाट किए ही भाग गए हों. यह केवल अनुमान भर था.

प्राथमिक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने के. के. अरोड़ा की तहरीर पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ पटेलनगर थाने में भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. साथ ही शालू के शव को पोस्टमार्टम के लिए दून अस्पताल भिजवा दिया. इस केस की विवेचना एसएसआई नत्थीलाल उनियाल के सुपुर्द की गई. घटना का पता चलने पर डीआईजी संजय गुंज्याल के निर्देश पर एसएसपी पुष्पक ज्योति ने केस की जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में थाना पुलिस के अलावा सहसपुर थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट, प्रेमनगर थानाप्रभारी रवि कुमार सैनी, एसआई मनोज नैनवाल, नरोत्तम सिंह, विक्रम सिंह, कांस्टेबल अनिल, संदीप, सहदेव त्यागी, हितेश कुमार व आशीष राठी के अलावा क्राइम ब्रांच को शामिल किया गया.

पोस्टमार्टम के बाद शालू का शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया गया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने रिपोर्ट में बताया कि शालू की मृत्यु सिर पर हुए प्रहार के कारण अत्यधिक रक्तप्रवाह की वजह से हुई थी. उस के सिर की हड्डी भी टूटी पाई गई थी. पुलिस ने पड़ताल शुरू की. सुरक्षा के लिहाज से कालोनी के एंट्री गेट पर रात में एक सिक्योरिटी गार्ड रहता था. उस के मुताबिक घटना वाली रात 12 बजे के बाद कालोनी में किसी का आवागमन नहीं हुआ था. हालांकि कालोनी के कुछ घरों में सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे, परंतु उन के फोकस का दायरा सीमित था. कातिल बाहर से नहीं आया था तो शालू की हत्या किस ने की, यह अहम सवाल था.

पुलिस ने शालू के घर वालों से पुन: पूछताछ की तो उन्होंने रवि राजपूत नामक युवक पर अपना संदेह जताया. मृतका की बहन ने पुलिस को बताया कि नजदीक के एक फ्लैट में रहने वाला लड़का रवि राजपूत शालू को परेशान किया करता था. उस ने यह भी बताया कि मौकाएवारदात पर जो मर्दाना गमछा पाया गया है, उसे उस ने रवि के गले में कई बार देखा था. पुलिस ने रवि को शक के दायरे में रख कर जांच आगे बढ़ाई. पुलिस वहां पहुंची, जिस फ्लैट में रवि रहता था. पता चला कि रवि मूलरूप से हरियाणा के जिला करनाल के रहने वाले रूप सिंह का बेटा था. वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर चुका था.

उस फ्लैट में वह अपने ममेरे भाई ऋषिपाल के पास कभीकभी आ कर ठहरता था. ऋषिपाल मूलरूप से सहारनपुर के बड़गांव का रहने वाला था और प्रौपर्टी का काम करता था. उस वक्त वह भी लापता था. पुलिस ने शालू का मोबाइल हासिल किया तो उस में लौक लगा था. एक्सपर्ट से उस का लौक खुलवाया गया. उस में लेट नाइट की एक आखिरी काल थी. जांच में वह नंबर रवि का निकला. पुलिस ने शालू व रवि के नंबरों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. उन से साबित हुआ कि घटना वाली रात उस की न सिर्फ शालू से बातें हुई थीं, बल्कि आधी रात के बाद रवि की लोकेशन भी पाम सिटी में ही थी.

रवि पूरी तरह शक के दायरे में आ गया था. पुलिस टीम ने उस की सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने लोकेशन के आधार पर उसे उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह देहरादून से भागने की कोशिश कर रहा था. उस के साथ सुनील राणा व उस का दोस्त प्रताप सिंह भी थे. पुलिस तीनों को थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया तो एक चौंकाने वाली कहानी पता चली. रवि बचपन से ही जिद्दी और दबंग स्वभाव का युवक था. बुरे लड़कों की संगत में रह कर वह कालेज के लड़ाईझगड़ों में पड़ने लगा था. परिजनों ने उसे डांटाफटकारा, समझाया, लेकिन वह नहीं समझा. उस ने जैसेतैसे इंटरमीडिएट तो पास कर लिया, लेकिन इस से आगे वह न पढ़ा.

बेटा सुधर जाए इस उम्मीद में पिता ने 2015 में उसे देहरादून की पाम सिटी में रह रहे ऋषिपाल के पास भेज दिया था. उन्हें लगता था कि वह उस के साथ रह कर कोई काम करेगा तो सुधर जाएगा. रवि देहरादून आया तो उसे और भी आजादी मिल गई. वह शराब भी पीने लगा. उस के हावभाव से ले कर बातों में दबंगई होती थी. अपनी दबंगई के लिए वह अपने पास एक तमंचा भी रखता था. देहरादून में भी उस ने अपने कई दोस्त बना लिए थे. यहीं पर एक दिन राह से गुजरते हुए रवि की नजरें शालू से चार हो गईं. पहली ही नजर में शालू उस के दिल में उतर गई.

रवि उन युवाओं में से था, जो उम्र से पहले ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. वह चालाक किस्म का युवक था. एक दिन उस ने बहाने से शालू से बातचीत की और उस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. बड़े शहरों में लड़केलड़कियों के बीच यह कोई बड़ी बात नहीं होती. शालू ने भी बिना सोचेसमझे उस की दोस्ती स्वीकार कर ली. शालू ने अपनी छोटी बहन शालिनी को भी यह बात बता दी थी. कई बार की बातों और सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए दोनों एकदूसरे के संपर्क में बने रहे. शालू उस के मैसेज का जवाब दे देती थी. इस से उस के हौसले बढ़ गए. शालू खूबसूरत लड़की थी. रवि उसे अपना बनाने का सपना देखने लगा. उस ने एक दिन अपने प्यार का इजहार भी कर दिया, लेकिन शालू ने इनकार कर दिया.

रवि को लगा कि उस का इनकार सिर्फ दिखावा है, अंदर से शालू भी उस से प्यार करती है. दोनों की मेलमुलाकातें हुईं तो शालू के रिश्ते के एक भाई आशीष ने उन्हें देख लिया. उस ने शालू को डांटा, क्योंकि वह रवि की आवारगी जानता था. इस के बाद उन का मिलनाजुलना कम हो गया. दूसरी तरफ रवि शालू को पाने के सपने देखने लगा था. शालू जब उस से बात नहीं करती तो वह रास्ते में उसे रोकने की कोशिश कर के उसे परेशान करता. शालिनी इन बातों को जानती थी. फोन पर वह न केवल शालू के संपर्क में रहने लगा, बल्कि उसे मैसेज भी भेजा करता था. रवि के सिर पर प्यार का भूत सवार था. शालू ने उस के एकतरफा प्यार को जब ज्यादा तवज्जो नहीं दी तो उस ने अपनी एक फोटो इंटरनेट के जरिए उसे भेज दी.

उस फोटो में वह फांसी का फंदा हाथ में लिए नजर आ रहा था. उस ने लिखा था, ‘यदि तुम मुझ से प्यार नहीं करोगी तो मैं अपनी जान दे दूंगा.’ यह देख कर शालू उलझन में पड़ गई. वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से कोई मर जाए, तभी रवि का फोन आ गया. वह बोला, ‘‘अब बोलो, तुम मुझ से प्यार करती हो ना?’’

‘‘देखो, मैं कुछ नहीं कहना चाहती. तुम्हें जो समझना है समझो और हां प्लीज ऐसी कोई हरकत आगे से मत करना.’’

रवि ने उस की इन बातों को इकरार समझ लिया. उसे लगा कि शालू को उस की फिक्र है, इसलिए वह उसे मरने नहीं देना चाहती. इस के बाद वह उस के खयालों में ही खोया रहने लगा. अंजाम से बेखबर शालू उस के जुनून को समझ नहीं पाई. उस ने यह बातें अपने मातापिता को भी नहीं बताईं. यह उस की नादान उम्र का तकाजा था. अलबत्ता शालू ने रवि के फोटो भेजने वाली बात अपनी बहन शालिनी को जरूर बता दी थी. रवि को ले कर कोई बदनामी न हो, इसलिए शालू ने उस से थोड़ी दूरी बनाने की सोची. वह उस से कम बातें करने लगी. इस से रवि को लगा कि शायद वह अपने परिवार की वजह से ऐसा करती है.

उस के दिमाग में सुबहशाम, दिनरात शालू की ही छवि घूमती रहती थी. उसे देखे बिना उसे सुकून नहीं आता था. शालू से दोस्ती के किस्से उस ने अपने दोस्तों को भी सुना रखे थे. इसी बीच वह करनाल चला गया. वहां जाने के बाद उसे दूरियां बरदाश्त नहीं हुईं. शालू भले ही उसे तवज्जो नहीं देती थी, लेकिन अपनी तरफ से वह उसे बहुत प्यार करता था. शालू ने सोचा कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा और रवि उसे अपने दिमाग से निकाल कर अपने काम पर ध्यान देगा. उधर रवि के सिर पर शालू को पाने की जिद सवार हो गई थी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अब वह शालू को अपनी बना कर ही दम लेगा. इस के लिए रवि ने उसे भगाने की योजना बनाई.

उस ने सोचा कि शालू परिवार की मजबूरियों में कैद है, इसलिए वह उस से ज्यादा बात नहीं कर पाती. वह उस के सामने प्रस्ताव रखेगा तो वह उस के साथ खुशीखुशी चल देगी. उस ने यह बात अपने दोस्त सुनील व प्रताप को बताई कि वह एक लड़की से प्यार करता है और उसे भगा कर शादी करना चाहता है. रवि ने उन्हें बताया कि वह उसे हर सूरत में हासिल करना चाहता है. रवि की चाहत देख कर वे दोनों उस की मदद करने को तैयार हो गए. 19 जून की शाम रवि सुनील व प्रताप के साथ शालू को भगा ले जाने के इरादे से देहरादून आया. तीनों जीएसएम रोड स्थित एक होटल में रुके.

रवि अपने साथ एक तमंचा भी लाया था. उस ने सोचा था कि अगर शालू के घर वाले किसी वजह से रोकने की कोशिश करेंगे तो वह उन्हें डराधमका कर रोक देगा. अगली रात उस ने शालू को फोन कर के कहा, ‘‘शालू मुझे तुम से मिलना है.’’

‘‘अब रात में?’’ शालू चौंकी.

‘‘हां, मेरे पास वक्त कम है और तुम से नहीं मिला तो सच में मैं मर जाऊंगा. मुझे तुम से जरूरी बात करनी है.’’

‘‘क्या बात है? मोबाइल पर ही बता दो.’’

‘‘नहीं, मिल कर ही बताऊंगा और तुम्हें मेरी बात माननी होगी.’’

‘‘मानने वाली होगी तो ही मानूंगी ना, फिर ऐसी कौन सी बात है?’’

‘‘पहले मुझे आने दो.’’

‘‘तुम जानते हो यह गलत है और कोई गड़बड़ भी हो सकती है.’’

‘‘कुछ नहीं होगा मैं लेट नाइट आ जाऊंगा.’’ रवि ने कहा तो शालू सोच में डूब गई. वैसे भी उसे रवि की दोस्ती परेशान करने लगी थी और वह उस से पीछा छुड़ाने के बारे में सोच रही थी. वह रवि पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने इजाजत भी दे दी, ‘‘ठीक है, तुम आ जाना, मैं पिछला दरवाजा खोल दूंगी.’’

कोठी के पीछे की तरफ से भी एक छोटा खिड़कीनुमा दरवाजा था. इस भौगोलिक स्थिति को रवि जानता था. यह बात उसे शालू ही बता चुकी थी. रवि करीब एक बजे सुनील व प्रताप के साथ होटल से निकला. ये लोग पैदल चल कर कारगी चौक की ओर गए. उधर से ही पाम सिटी का रास्ता था. कालोनी में जाने के लिए उस ने मुख्य गेट नहीं चुना. वह जानता था कि शालू के भागने के बाद हंगामा मचेगा तो वह पकड़ा जा सकता है.

पाम सिटी कालोनी की चारदीवारी थी. उस के बाहर खेत व जंगल था. खेतों के रास्ते वे लोग दीवार फांद कर कालोनी में दाखिल हो गए. करीब डेढ़ बजे कोठी के पीछे पहुंच कर रवि ने शालू को फोन किया. उस ने चुपके से दरवाजा खोल दिया. तीनों अंदर आ गए. सुनील व प्रताप लौबी में ही खड़े रहे, जबकि शालू के साथ रवि ड्राइंगरूम में पहुंच गया. शालू ने उस से पूछा, ‘‘बोलो क्या बात है?’’

‘‘शालू मैं तुम्हें ले जाने के लिए आया हूं.’’

‘‘मतलब?’’ उस की बात सुन कर शालू चौंकी.

‘‘तुम्हें यहां से आजाद करा कर मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

सुन कर शालू के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे नहीं पता था कि रवि इतने बड़े ख्वाब देख चुका है.

‘‘पागल हो गए हो तुम?’’ शालू ने गुस्से में कहा.

‘‘तुम चाहे जो समझो, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा. तुम डरती किस से हो, मैं सब को देख लूंगा.’’ कहते हुए उस ने तैश में आ कर तमंचा निकाल कर शालू को दिखाया. लेकिन शालू ने उस के साथ जाने से इनकार कर दिया.

इस के बावजूद वह करीब एक घंटा उसे समझाता रहा. शालू नानुकूर करती रही. रवि जबरन प्यार हासिल करना चाहता था. उस ने मन ही मन सोच लिया कि या तो वह शालू को साथ ले जाएगा या हमेशा के लिए उस का किस्सा खत्म कर देगा. शालू समझ गई कि यह बिगड़ैल किस्म का युवक है, इसलिए उस से पीछा छुड़ाना ही बेहतर है. बात करतेकरते दोनों लौबी में आ गए. शालू ने उसे चले जाने को कहा.

रवि को अपनी योजना फेल होती नजर आई तो उस ने निर्णायक अंदाज में पूछा, ‘‘शालू आखिरी बार पूछ रहा हूं, तुम मेरे साथ चलोगी या नहीं?’’

शालू ने साफ इनकार कर दिया, ‘‘बिलकुल नहीं, तुम पागल हो गए हो.’’

‘‘मैं तुम्हें उठा कर ले जाऊंगा, फिर देखता हूं तुम्हारी मरजी कैसे चलेगी.’’ उस ने कहा तो शालू ने उसे चेतावनी भरे लहजे में जवाब दिया. ‘‘ऐसी गलती मत करना रवि, मैं शोर मचा कर तुम सब को अभी पकड़वा दूंगी समझे. अब तुम चुपचाप यहां से चले जाओ.’’

अपनी जिद पूरी न होते देख रवि गुस्से में आ गया. उस ने शालू को हाथ पकड़ कर खींचना चाहा तो शालू ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया. इस से वह आगबबूला हो गया. तब तक उस के साथी भी आ गए थे. रवि ने तमंचा निकाल कर उस की बट से शालू के सिर पर वार कर दिया. वार तेज था. खून बहा तो मामूली चीख के साथ वह सिर थाम कर नीचे बैठ गई. उस ने चिल्लाने की कोशिश की तो रवि ने उस का मुंह दबा दिया और नीचे गिरा दिया. फिर उस का सिर पकड़ कर फर्श में दे मारा. उस के साथियों ने शालू के हाथपैर पकड़ लिए. रवि तब तक उस का सिर पटकता रहा, जब तक कि उस की मौत नहीं हो गई. इस से उस का सिर बुरी तरह फट गया और आसपास खून फैल गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने रवि की निशानदेही पर तमंचा बरामद कर लिया. उस के साथियों का कहना था कि उन्हें नहीं पता था कि रवि इस तरह हत्या कर देगा. वह तो शालू को भगाने में उस का सहयोग करने के लिए उस के साथ चले आए थे. अगले दिन पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

शालू नादान उम्र में रवि जैसे सिरफिरे की दोस्ती में न पड़ी होती और उस की हरकतों के बारे में अपने पिता को बता दिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. रवि ने भी अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से प्यार के जुनून में खून से हाथ रंग कर अपना भविष्य खराब कर लिया. कथा लिखे जाने तक रवि व उस के साथियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर रही थी. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Dehradun Crime: मंगेतर की खातिर

Dehradun Crime: नीरज अपने जिगरी दोस्त राजेश की मंगेतर निशा को चाहने लगा था. राजेश के मना करने के बावजूद भी नीरज नहीं माना तो राजेश को अपने हाथ दोस्त के खून से रंगने ही पड़े.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की एक कालौनी है अंसल ग्रीन विहार. इसी कालोनी की एक कोठी में 6 सितंबर, 2015 की सुबह अफरातफरी मच गई. इस कोठी में किसी ने एक युवक की हत्या कर दी थी. वह कोठी दुबई गए हुए एक परिवार की थी, जिसे ज्ञानेंद्र वर्मा नाम के एक शख्स ने 2 सितंबर को ही किराए पर लिया था. ज्ञानेंद्र इस कोठी में एक पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट शुरू करने वाले थे. इस की तैयारी के लिए वहां फरनीचर आदि का काम चल रहा था.

हत्या की बात घर में काम करने वाली बाई मन्नू के आने के बाद पता चली थी. 6 सितंबर को सुबह के समय बाई मन्नू जब काम करने के लिए आई तो उसे कोठी का मेन गेट रोजाना की तरह बंद मिला. गेट खुलवाने के लिए मन्नू ने ज्ञानेंद्र की पत्नी स्वरांजलि वर्मा के मोबाइल पर फोन किया. स्वरांजलि पति के साथ पहली मंजिल पर सो रही थीं. फोन की घंटी की आवाज ने उन की नींद तोड़ दी. उन्होंने फोन की स्क्रीन पर मन्नू का नंबर देखा तो समझ गईं कि वह गेट पर आ गई है. गेट की चाबी ग्राउंड फ्लोर पर सो रहे नीरज के पास थी.

स्वरांजलि ने ऊपर से ही नीरज को गेट खोलने के लिए आवाज दी. कई बार आवाज लगाने के बाद भी नीरज के कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो वह खुद नीचे आईं और नीरज के कमरे का दरवाजा खटखटा कर आवाज देने लगीं. लेकिन इस के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला तो वह बुदबुदाने लगीं, ‘‘पता नहीं ऐसे घोड़े बेच कर क्यों सो रहा है.’’

उस कमरे का एक दरवाजा पीछे की तरफ भी था. वह खुला हुआ था. स्वरांजलि पिछले दरवाजे से कमरे में गईं तो देखा कि नीरज आैंधे मुंह कमरे के फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था. यह देख कर स्वरांजलि घबरा गईं. वह तेज कदमों से पति के पास पहुंचीं और उन्हें नींद से जगा कर बात बताई. पत्नी की बात सुन कर उन की नींद उड़ गई थी. वह पत्नी के साथ नीचे आए और उन्होंने भी उस के कमरे में झांका तो वास्तव में नीरज लहूलुहान फर्श पर पड़ा था. ज्ञानेंद्र वर्मा ने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दी.

इस के बाद ज्ञानेंद्र वर्मा व उन की पत्नी ने कालोनी में शोर मचा दिया. शोर सुन कर कुछ ही देर में कालोनी के तमाम लोग उस कोठी के पास जमा हो गए. यह कालोनी थाना राजपुर क्षेत्र में आती थी. इसलिए सुबहसुबह हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने कमरे में जा कर देखा तो वहां एक युवक की लाश खून से लथपथ फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. ज्ञानेंद्र वर्मा ने उस का नाम नीरज बताया. पूरे कमरे में खून ही खून था. सामने दीवार पर खून से लिखा था, ‘मेरी बहन से रेप किया है.’ इस के अलावा वहां पर तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, घर में इस्तेमाल होने वाले 2 चाकू पड़े थे.

देख कर लग रहा था कि इन्हीं सब चीजों से उस की हत्या की गई थी. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी पुष्पक ज्योति को दी तो वह भी नगर पुलिस अधीक्षक अजय सिंह को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया गया. खोजी कुत्ता लाश को सूंघने के बाद कोठी की बाउंड्री वाल के पास गया और भौंकने लगा. कुत्ते से हत्यारे के बारे में कोई क्लू नहीं मिला. लाश को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस की हत्या काफी खुन्नस में की थी. उस के गले पर, चेहरे, हाथ, छाती, पेट, सिर आदि पर 20 के करीब घाव थे. वहां पर जो चाकू पड़े थे, वे भी मुड़ गए थे. तवा और प्रेशर कुकर के ढक्कन पर भी खून के निशान थे.

तवे का हत्था टूटा हुआ था. लग रहा था कि हत्यारा कोई ऐसा आदमी रहा होगा, जो नीरज को अच्छी तरह जानता होगा. कोठी का गेट अंदर से बंद था तो हत्यारा कोठी से बाहर कैसे गया? यह जानने के लिए पुलिस ने कोठी का निरीक्षण किया तो कोठी की जो बाहरी दीवार थी, उस पर खून से सने पैरों के धब्बे दिखे, साथ ही दीवार के पास मृतक नीरज का आधार कार्ड मिला. लग रहा था कि हत्यारा शायद दीवार फांद कर गया होगा. क्योंकि खोजी कुत्ता भी वहीं जा कर भौंक रहा था.

घटनास्थल से सारे सबूत इकट्ठे करने के बाद पुलिस ने उस कोठी में किराए पर रह रहे ज्ञानेंद्र वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि उन का सरस्वती पौलिटैक्निक के नाम से एक शिक्षण संस्थान है. वह अब उस संस्थान को इस कोठी में शिफ्ट करने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि मृतक नीरज ने उन के यहां से ही इलैक्ट्रिकल का 3 साल का डिप्लोमा किया था. वह मुरादाबाद के लाइनपार क्षेत्र में प्रकाश नगर का था. नीरज एक अच्छा छात्र था, इसलिए उस से उन के पारिवारिक संबंध हो गए थे. अपने डिप्लोमा का प्रमाण पत्र लेने व काम की तलाश में वह 3 सितंबर को यहां आया था. यहां सामान आदि शिफ्ट कराने में भी नीरज ने काफी सहयोग किया था.

इसी बीच 4 सितंबर शुक्रवार को उन के ससुर की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. उन्हें कैंसर की शिकायत थी, तब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. उन्हें देखने के लिए वह पत्नी स्वरांजलि के साथ दिल्ली चले गए थे. 5 सितंबर शनिवार को नीरज ने उन्हें वाट्सएप से बताया कि उस के मामा का लड़का उस के पास आया हुआ है. एक रात रुक कर वह अगले दिन चला जाएगा. इस पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की. 5-6 सितंबर की रात एक, डेढ़ बजे मैं पत्नी के साथ दिल्ली से यहां लौट आए. कोठी का दरवाजा नीरज ने ही खोला था. थकान की वजह से पत्नी जल्द ही ऊपर के कमरे में सोने चली गईं.

उन्होंने अपने लिए खिचड़ी बनाई. खिचड़ी खा कर वह भी सोने के लिए कमरे में चले गए. मेन गेट की चाबी नीरज के पास ही थी. इसलिए सुबह के काम वाली बाई के आने के बाद गेट खोलने की जरूरत पड़ी तो पता चला कि नीरज कमरे में इस हालत में पड़ा है. ज्ञानेंद्र वर्मा से बात करने के बाद पुलिस ने नीरज की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और नीरज के घर वालों को खबर भेज कर देहरादून आने को कहा.

एसएसपी सुनयना ज्योति ने एसपी सिटी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी पंकज पोखरियालव अन्य तेजतर्रार पुलिसकर्मियों के अलावा साइबर सेल के इंचार्ज को भी शामिल किया. पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक नीरज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. दूसरा नीरज के यहां उस के मामा का जो लड़का आया था, उस पर भी शक हुआ. क्योंकि वारदात के बाद से वह गायब था. दीवार पर खून से जो मजमून लिखा था, उस से यही लग रहा था किसी लड़की के चक्कर में नीरज की हत्या की गई थी.

पुलिस ने नीरज के मामा के लड़के के बारे में जानकारी निकलवाई तो पता चला कि वह देहरादून आया ही नहीं था. फिर जो लड़का नीरज के पास आया था, वह कौन था? पुलिस यह जानने में जुट गई. सर्विलांस टीम ने नीरज की काल डिटेल्स की जांच की तो पता चला कि 3 सितंबर के बाद नीरज की एक नंबर पर 13 बार बात हुई थी. वह नंबर था राजेश सैनी का, जो मुरादाबाद के प्रकाशनगर का रहने वाला था और एक खास बात कि घटना के समय उस की लोकेशन भी राजपुर, देहरादून में ही थी. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो राजेश सैनी ने ही काल रिसीव की. उस ने बताया कि इस समय वह उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में है. पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ.

लिहाजा एसएसपी ने एक पुलिस टीम मुरादाबाद भेज दी. देहरादून पुलिस मुरादाबाद के मझोला थाने की पुलिस की मदद से 7 सितंबर को राजेश सैनी के घर प्रकाश नगर पहुंच गई. पुलिस को राजेश सैनी अपने घर की छत पर सोता मिल गया. जबकि वह खुद को हल्द्वानी में होने की बात बता रहा था. पुलिस ने उस से नीरज की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह इस तरह से चौंका, जैसे उसे कुछ पता ही न हो. थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल ने पूछा, ‘‘तुम तो कह रहे थे कि हल्द्वानी में हूं और निकले मुरादाबाद में. तुम यह झूठ क्यों बोले?’’

‘‘सर, मैं ने झूठ नहीं बोला. मैं पिछले 4-5 दिनों से हल्द्वानी में ही था. आज सुबह ही वहां से घर लौटा हूं.’’ राजेश ने सफाई दी.

‘‘इस दौरान तुम्हारी नीरज से फोन पर कोई बात हुई थी या नहीं?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘नहीं सर, मेरी उस से कोई बात नहीं हुई. दरअसल हल्द्वानी जा कर मैं काम में इतना व्यस्त हो गया कि उस से बात नहीं कर पाया.’’ राजेश ने जवाब दिया.

राजेश का जवाब सुन कर थानाप्रभारी समझ गए कि यह सरासर झूठ बोल रहा है, क्योंकि 5-6 सितंबर को उस के फोन की लोकेशन देहरादून में थी और उस ने अपने फोन से नीरज से कई बार बात भी की थी. इस के अलावा भी उस की नीरज से 13 बार बात हुई थी. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने राजेश से सख्ती  से पूछताछ की तो राजेश को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही देहरादून जा कर अपने खास दोस्त नीरज की हत्या की थी.

हत्यारा पुलिस के चंगुल में आ चुका था. उसे ले कर थानाप्रभारी देहरादून लौट आए. थाने में पूछताछ के दौरान राजेश ने अपने जिगरी दोस्त की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली. नीरज सैनी उत्तर प्रदेश के महानगर मुराराबाद के लाइनपार के मोहल्ला प्रकाशनगर की गली नंबर 3 का रहने वाला था. उस के पिता भूरा सिंह सैनी भारतीय खाद्य निगम में नौकरी करते हैं. भूरा सिंह के परिवार में पत्नी राजो के अलावा 4 बेटे थे, जिन में नीरज सैनी सब से छोटा था. नीरज ने देहरादून से सरस्वती पौलिटैक्निक से वर्ष 2013 में इलैक्ट्रिकल ट्रेड में डिप्लोमा किया था. यह पौलिटैक्निक ज्ञानेंद्र वर्मा चलाते थे.

नीरज मेहनती और अच्छे व्यवहार वाला था. इसलिए ज्ञानेंद्र वर्मा उस से बहुत प्रभावित थे. वह उसे अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे. बाद में ज्ञानेंद्र वर्मा का भी नीरज के घर आनाजाना हो गया था. नीरज भी जब कभी देहरादून आता तो उन के यहां ही रुकता था. नीरज की गली से एक गली पहले राजेश सैनी रहता था. एक ही मोहल्ले में रहने की वजह से राजेश और नीरज के बीच दोस्ती हो गई थी. और दोस्ती भी ऐसीवैसी नहीं, दांत काटी थी. दोनों का ही एकदूसरे के घर भी आनाजाना था. दोनों ही दोस्त अपने दिल की बातें एकदूसरे से शेयर करते थे.

करीब 6 महीने पहले राजेश के भाई रमेश की शादी नैनीताल में हुई थी. उसी दौरान वहीं निशा नाम की लड़की से राजेश का रिश्ता तय हो गया. उस शादी में नीरज भी गया था. निशा बेहद खूबसूरत थी. नीरज उसे मन ही मन चाहने लगा था. एक दिन उस ने राजेश को विश्वास में ले कर उस की मंगेतर निशा का फोन नंबर ले लिया. इस के बाद नीरज ने निशा से नजदीकी बढ़ाने के लिए संदीप राणा के नाम से फोन किया. उस ने यह भी बता दिया कि वह राजेश का दोस्त है. अपने होने वाले पति का जानकार होने की वजह से निशा उस से बातें कर लेती थी. फिर नीरज ने उसे मैसेज भी भेजने शुरू कर दिए. निशा को जो मैसेज भेजे जा रहे थे, उन का आशय वह समझ रही थी.

फिर एक दिन निशा ने यह बात राजेश को बताई कि संदीप राणा नाम का तुम्हारा कोई दोस्त उसे उल्टेसीधे मैसेज भेजता है. राजेश संदीप राणा नाम के किसी शख्स को जानता तक नहीं था. उस ने अपनी मंगेतर से संदीप राणा का फोन नंबर मांगा तो उस ने वह नंबर राजेश को दे दिया. नंबर देख कर राजेश चौंका, क्योंकि वह नंबर किसी और का नहीं, उस के जिगरी दोस्त नीरज का था. राजेश ने नीरज से शिकायत की तो उस ने झूठ बोलते हुए कहा कि उस ने मजे लेने के लिए निशा को फोन किए थे. इतना ही नहीं, उस ने राजेश से इस की माफी भी मांग ली. राजेश ने भी उसे माफ कर दिया.

इस के बाद नीरज ने निशा को फोन किया और शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘निशाजी, राजेश मेरा बचपन का दोस्त है. आप ने मेरे बारे में उसे बता कर अच्छा नहीं किया. आप ने मेरी बचपन की दोस्ती में दरार डाल दी. आप को पता है कि वह अब मुझ से नाराज है और बोल तक नहीं रहा. जब आप ने बात बता ही दी है तो मैं भी अपने बारे में बताना चाहता हूं कि मैं एक डिप्लोमा इंजीनियर हूं. मैं ने देहरादून से डिप्लोमा किया है. कुछ ही दिनों में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी, जबकि जिस राजेश के साथ तुम्हारी शादी तय हुई है, वह कुछ भी नहीं करता है.

‘‘देखो निशा, मैं आप को इसलिए फोन करता हूं कि आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो. आप मेरी अच्छी दोस्त हैं और फोन करना बंद मत करना.’’ नीरज ने इस तरह की लच्छेदार बातें कर के निशा को काफी प्रभावित कर लिया.

इस के बाद वह फिर से निशा को मैसेज भेजने और फोन कर के बातें करने लगा. निशा को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. निशा की नीरज से जो भी बातें होती थीं, वह उस ने अपने तक ही सीमित रखीं. उस ने राजेश को कुछ नहीं बताया, लेकिन राजेश को किसी तरह पता चल गया कि नीरज अब भी उस की मंगेतर से बातें करता है. तब उस ने निशा का सिम बदलवा दिया. लेकिन निशा ने अपना नया नंबर नीरज को दे दिया. यानी इन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहा. एक बार देर रात को राजेश ने मंगेतर निशा से बात करने के लिए उस का नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. उसी समय उस ने नीरज का नंबर मिलाया तो उस का नंबर भी व्यस्त मिला.

करीब आधेपौना घंटा तक दोनों के फोन व्यस्त रहने पर राजेश को शक हो गया कि वही दोनों आपस में बतिया रहे होंगे. इस से राजेश को विश्वास हो गया कि नीरज ने उस की मंगेतर का पीछा नहीं छोड़ा है. इसी बात को ले कर उस का नीरज से झगड़ा भी हो गया. यह बात घटना से 3-4 महीने पहले की है. इस बात को ले कर दोनों के बीच दरार पैदा हो गई थी. अब राजेश नीरज से रंजिश रखने लगा था. वह काफी परेशान था कि नीरज उस की बात क्यों नहीं मान रहा है. कुछ दिनों बाद नीरज ने राजेश को फिर से मना लिया.

घटना के करीब 10 दिन पहले राजेश ने नीरज से उस का मोबाइल फोन मांगते हुए कहा कि यार मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है. तेरे पास 2 मोबाइल हैं. मैं बाहर जा रहा हूं. 3-4 दिनों बाद वापस आऊंगा, तब तक के लिए मुझे अपना एक मोबाइल दे दे. दोस्ती की खातिर नीरज ने अपना एक मोबाइल राजेश को दे दिया. लेकिन नीरज ने उस में से अपना सिम निकाल कर कहा, ‘‘तुम इस में दूसरा सिम डाल लेना.’’

राजेश बोला, ‘‘यार, तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता. 3-4 दिनों की तो बात है. क्या फर्क पड़ता है.’’

‘‘यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि इस में मेरे फोन आएंगे.’’ नीरज बोला, ‘‘तुम नया सिम डाल लेना.’’

राजेश ने उस की एक न सुनी और जबरदस्ती उस का फोन सिम सहित ले गया.

नीरज के मना करने के बाद भी राजेश नीरज का सिमकार्ड सहित मोबाइल ले कर चला गया. राजेश ने सब से पहले नीरज के फोन की काल डिटेल्स और मेल बौक्स चैक किया. मैसेज बौक्स में उसे तमाम मैसेज मिले, जो निशा और नीरज ने एकदूसरे को भेजे थे. इस के अलावा काल डिटेल्स से यह भी पता लग गया कि उन दोनों ने कबकब और कितनी देर तक बातें की थीं.  यह देख कर राजेश का खून खौल गया कि जिस दोस्त ने उस से कसम खाई थी, वही उस की पीठ में छुरा घोंप रहा है. वह नीरज को दगाबाज समझने लगा.

राजेश ने उसी दिन ठान लिया कि अब वह नीरज को सबक जरूर सिखाएगा. इस के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अगले दिन राजेश ने नीरज का मोबाइल लौटा दिया. मोबाइल लौटाते समय राजेश ने उस से कहा, ‘‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे हो. मेरी निशा को अब भी फोन करते हो. मैं कहता हूं कि अब भी मान जाओ तो अच्छा रहेगा.’’

दोनों में फिर से कहासुनी हुई. नीरज बहुत चालाक था. उस ने किसी तरह राजेश को फिर से मना लिया.

नीरज ने देहरादून के जिस पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, वहां से उसे प्रमाण पत्र लेने 3 सितंबर को जाना था. 6 सितंबर को उस का देहरादून की ही एक निजी कंपनी में इंटरव्यू था. इसलिए उस ने राजेश से कह दिया कि अब देहरादून से लौट कर ही इस बारे में हम लोग बात करेंगे. यानी  3 सितंबर, 2015 को नीरज देहरादून चला गया. नीरज ने जिस इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, उस के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा ने अब अंसल ग्रीन विहार कालोनी में एक कोठी किराए पर ले ली थी. अपना इंस्टीट्यूट वह उसी कोठी में शिफ्ट कर रहे थे. सामान शिफ्ट कराने में नीरज ने भी ज्ञानेंद्र ने मदद की थी.

राजेश नीरज की रगरग से वाकिफ था. उसे उम्मीद थी कि वह उसे भले ही कितने वादे कर ले, लेकिन वह उस की मंगेतर से बात करना बंद नहीं करेगा. वह इसी असमंजस में था कि इस स्थिति में वह क्या करे. घुमाफिरा कर उस के दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि ऐसे दगाबाज दोस्त की तो एक ही सजा है, मौत.

यह खतरनाक निर्णय लेने के बाद वह भी 5 सितंबर की सुबह देहरादून के लिए चल पड़ा. देहरादून पहुंच कर राजेश ने नीरज को फोन किया, ‘‘नीरज, मैं भी देहरादून में ही हूं. तुम देहरादून में कौन सी जगह हो.’’

‘‘देखो राजेश, मैं इस समय व्यस्त हूं. मुरादाबाद आ कर ही बात हो सकेगी.’’ नीरज ने उसे टालते हुए कहा.

लेकिन राजेश भी कहां मानने वाला था. वह दोस्ती का वास्ता दे कर बोला, ‘‘देखो नीरज, मैं यहां पर अकेला बोर हो रहा हूं. देहरादून मेरा देखा हुआ नहीं है. जब तुम यहां पढ़ रहे थे तो तुम ने कितनी बार मुझे देहरादून बुलाया था और अब मैं आ गया हूं तो तुम मुंह फेर रहे हो.’’

नीरज राजेश की बातों में आ गया. वह बोला, ‘‘तुम इस समय कहां हो?’’

‘‘मैं घंटाघर पर हूं.’’

‘‘ठीक है, वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में वहीं पहुंचता हूं.’’ तब नीरज औटो से घंटाघर चला गया और राजेश को जाखन ले गया. वहां दोनों ने शराब पी और वहीं पर खाना खाया.

खाना खाने के बाद राजेश नीरज से बोला, ‘‘यार, शराब में मजा नहीं आया. थोड़ीथोड़ी और हो जाए तो अच्छा रहेगा.’’ तब राजेश ने एक अद्धा शराब और खरीद ली. राजेश ने कहा कि इसे तुम्हारे कमरे पर पीएंगे. उस समय इंस्टीट्यूट के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी के साथ दिल्ली गए हुए थे. वहां उन के ससुर की तबीयत खराब थी. नीरज वहां अकेला था. इसलिए नीरज राजेश को कमरे पर ले आया. वहीं पर दोनों ने शराब पी.

कोठी पर पहुंच कर नीरज ने फोन व मैसेज द्वारा अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा को बता दिया कि उस से मिलने उस के मामा का लड़का आया है. वह कल चला जाएगा. ज्ञानेंद्र ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि वह उस पर बहुत विश्वास करते थे. ज्ञानेंद्र ने नीरज को बता दिया था कि वह पत्नी के साथ आज रात को ही देहरादून लौट आएंगे. नीरज और राजेश दोनों आपस में बातें करते रहे. निशा को ले कर दोनों में तकरार भी हुई. राजेश घटना को अंजाम देने की योजना बनाता रहा. लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था, क्योंकि नीरज अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा के आने का इंतजार कर रहा था.

5-6 सितंबर की रात डेढ़ बजे ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी स्वरांजलि के साथ घर लौटे तो कोठी के गेट का ताला नीरज ने ही खोला. उन से चाय पीने के लिए पूछा तो उन्होंने मना कर दिया. उन्हें उस समय भूख लग रही थी. पत्नी पहली मंजिल पर अपने बैडरूम में चली गईं और वह खुद किचन में खिचड़ी बनाने लगे. तब नीरज उन्हीं के पास खड़ा बातें करता रहा. खिचड़ी खाने के बाद वह भी बैडरूम में जा कर सो गए. नीरज दिन भर का थका था. ज्ञानेंद्र के जाने के बाद वह भी अपने कमरे में चला गया.

जिस वक्त नीरज अपने सर से किचन में बातें कर रहा था, उस समय वह अपना मोबाइल कमरे में ही छोड़ गया था. तभी राजेश ने उस का मोबाइल चेक किया तो उस में फिर निशा को भेजे गए मैसेज मिले. यह देख कर राजेश का खून खौल गया. मैसेज पढ़ने के बाद उस ने उस का मोबाइल उसी जगह रख दिया, जहां से उठाया था. कमरे में आ कर नीरज जल्द ही सो गया, तभी राजेश ने शीशी में बची हुई शराब गटक ली. जब राजेश ने देख लिया कि नीरज गहरी नींद में सो गया है तो वह नीरज के तकिए पर सिर रख कर लेट गया. उसी समय उस ने नीरज को हिलाडुला कर देखा. जब उसे विश्वास हो गया कि नीरज गहरी नींद में है तो वह रसोई में गया और वहां से तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, सब्जी काटने वाले चाकू उठा कर कमरे में आ गया.

राजेश ने गहरी नींद में सोए नीरज के सिर पर तवे से भरपूर वार किया. नीरज हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने अपने सर ज्ञानेंद्र को आवाज दी. लेकिन कमरे में लगे शीशे के दरवाजों से आवाज बाहर नहीं जा सकी. नीरज दरवाजे की तरफ भागा तो राजेश ने पलंग पर पड़ी चुन्नी उस के गले में फंसा कर नीचे गिरा दिया. वह उस पर तवे से वार करने लगा. उस का सिर कट गया, जिस से उस की हिम्मत जवाब दे गई. तब नीरज ने राजेश से दया की भीख मांगी. लेकिन राजेश ने उसे नहीं बख्शा. उस के ऊपर खून सवार था. वह उसे हरगिज जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था.

इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार करने शुरू कर दिए. वह इतने गुस्से से वार कर रहा था कि मारतेमारते चाकू मुड़ गए. फिर उस ने प्रैशर कुकर के ढक्कन से वार किए. जब राजेश ने देखा वह मर चुका है तो उस ने नीरज के खून से दीवार पर लिख दिया, ‘मेरी बहन के साथ रेप किया है.’ उस समय रात के 3 बज रहे थे. दोस्त को मौत के घाट उतारने के बाद उस ने इत्मीनान से हाथपैर मुंह धोया और अपने साथ लाए कपड़े बदले. खून से सने कपडे़ उस ने पौलीथिन में बांध कर अपने बैग में रख लिए. अब वह वहां से भागना चाहता था.

वह कोठी के गेट पर पहुंचा तो वहां ताला लगा था. फिर वह दीवार फांद कर सीधा बसअड्डा पहुंचा. वहां से बस पकड़ कर हरिद्वार आया. फिर हरिद्वार से बस पकड़ कर मुरादाबाद पहुंच गया. घर आ कर उस ने अपनी मां को बस इतना बताया कि वह गर्जिया देवी मंदिर, रामनगर से आ रहा है. इस के बाद कमरे में जा कर सो गया. अगले दिन 7 सितंबर, 2015 को देहरादून पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

राजेश सैनी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. उसे 8 सितंबर, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है

 

UP Crime: मामूली बात पर

UP Crime: अरविंद और उन का परिवार मिलनसार स्वभाव का था. उन्होंने पड़ोस में रहने वाले एक युवक विपुल को इसलिए अपनी दुकान किराए पर देने से मना कर दिया कि किराए के लेनदेन से संबंध खराब हो सकते हैं. लेकिन विपुल ने इसे गलत तरीके से लेते हुए मन में रंजिश पाल ली. इस का नतीजा भी बहुत भयानक निकला.

6 सितंबर 2015 की शाम को अरविंद शर्मा बाहर से घर लौटे तो उन की पत्नी पूनम के चेहरे पर

परेशानी के भाव और आंखों में चिंता झलक रही थी. यह देख कर अरविंद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ पूनम, कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘परेशानी की ही बात है. लक्ष्य को बहुत देर हो गई. साइकिल ले कर गया था, अभी तक वापस नहीं आया.’’

‘‘इधर उधर घूम रहा होगा आ जाएगा.’’ वह हंसते हुए बोले.

‘‘पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है.’’ इस पर अरविंद पत्नी को आश्वस्त करते हुए बोले, ‘‘घबराओ नहीं, थोड़ा इंतजार कर लो, वह आ जाएगा.’’

पूनम चिंतामग्न हो कर बैठ गई.

अरविंद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शामली जनपद के रहने वाले थे. उन के पिता श्यामलाल शर्मा सेवानिवृत्त शिक्षक थे. कई साल पहले अरविंद का परिवार शामली से लगे मुजफ्फरनगर के थाना सिविल लाइन क्षेत्र की इंदिरा कालोनी में आ कर बस गया था. अरविंद खुद भी बेसिक शिक्षा विभाग में लिपिक के पद पर कार्यरत थे. उन के परिवार में पत्नी पूनम के अलावा 3 बच्चे थे. 2 बेटियां वर्णिका, वैष्णवी और 11 साल का बेटा लक्ष्य. लक्ष्य शहर के डीएवी पब्लिक स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ता था. परिवार में इकलौता बेटा होने की वजह से वह सब का लाडला था. श्यामलाल शर्मा परिवार को एकसूत्र में बांधे हुए थे. संस्कारी और मिलनसार परिवार था. व्यवहारकुशल श्यामलाल व उन के बेटे अरविंद को मोहल्ले में इज्जत की नजरों से देखा जाता था.

अरविंद सुबह औफिस जाते थे और शाम को घर आ जाते थे. 6 सितंबर को रविवार की वजह से घर पर ही थे, लेकिन दोपहर बाद किसी काम से बाहर चले गए थे. जब वह लौटे तो उन का एकलौता बेटा लक्ष्य घर पर नहीं था. लक्ष्य जिद कर के साइकिल ले कर बाहर चला जाता था, यह कोई नई बात नहीं थी. उस दिन भी वह साइकिल ले कर बाहर गया था. शाम का धुंधलका फैला, तो परिवार की चिंता बढ़ गई. अरविंद बेटे को ढूंढने के लिए बाहर सड़क की तरफ निकल गए, जबकि पूनम व उन की बेटियों ने आसपास के घरों में लक्ष्य को ढूंढा, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला.

लक्ष्य के लापता होने की खबर मोहल्ले में फैली तो लोग भी उसे ढूंढने में लग गए. वह कहां चला गया, इस बात को कोई नहीं जानता था. अरविंद का परिवार बेहद परेशान था. पूनम का बेटे के इंतजार में रोरो कर बुरा हाल था. हर आहट पर वह दरवाजे की तरफ देखतीं, उन्हें लगता कि बेटा आ गया है. लोगों ने हर तरफ लक्ष्य के बारे में पूछताछ भी की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. वह पूरी रात परेशानी में बीती. अगले दिन लक्ष्य के लापता होने की सूचना थाना सिविल लाइन में दे दी गई. थाना प्रभारी चंद्र किरण यादव ने उस की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अगले दिन का इंतजार किया, परंतु उस दिन भी वह वापस नहीं आया. इस से इस आशंका को बल मिला कि लक्ष्य का अपहरण कर लिया गया है.

हालांकि शर्मा परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए कोई उन के बेटे का अपहरण करे, लेकिन इस के और भी कई कारण हो सकते थे. पुलिस इस इंतजार में थी कि यदि लक्ष्य का अपहरण किया गया होगा, तो फिरौती के लिए फोन या पत्र जरूर आएगा. लेकिन पुलिस का यह अनुमान गलत साबित हुआ. इस तरह का कोई फोन परिवार के पास नहीं आया, तो यह मामला रंजिश का लगा. पुलिस ने अरविंद व उन के पिता से पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि वह सीधेसादे लोग हैं. किसी से रंजिश तो दूर उन का कभी किसी से झगड़ा तक नहीं हुआ था.

इस से पुलिस उलझन में पड़ गई. बहरहाल पुलिस ने लक्ष्य के फोटो लगे इश्तहार बनवाए और सभी थानों में भिजवा दिए, पर इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अगले कई दिनों तक भी जब लक्ष्य नहीं मिला, तो लोगों में गुस्सा पनपने लगा. लक्ष्य के घरवालों और शुभचिंतकों ने एकत्र हो कर एसएसपी के.बी. सिंह से मुलाकात की. एसएसपी ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को शीघ्र काररवाई के निर्देश दिए. एसपी (सिटी) प्रबल कुमार सिंह व एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने थाना पुलिस को सुरागसी में लगा दिया.

एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने अभी तक के जांच बिंदुओं पर विचारविमर्श भी किया. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हो न हो लक्ष्य को रंजिशन उठा कर मार दिया गया हो. वह साइिकल समेत लापता हुआ था, इस से जाहिर होता था कि वह विश्वास कर के किसी जानकार के साथ ही गया होगा. शर्मा परिवार रंजिश से इंकार कर रहा था, इसलिए इस थ्यौरी पर अविश्वास भी हो रहा था, फिर भी पुलिस अपने इस शक पर कायम रही.

चूंकि कुछ रंजिशें एक पक्षीय होती हैं, इसलिए पुलिस को लगा कि हो न हो मोहल्ले का ही कोई आदमी अरविंद या उन के परिवार से रंजिश रखता हो, इसलिए पुलिस ने आसपास के लोगों की फेहरिश्त तैयार की. इस फेहरिश्त में एक नाम विपुल सैनी का भी सामने आया. विपुल अरविंद के ही पड़ोसी जगलाल का बेटा था और डीजे (डिस्क जौकी) का काम करता था. पुलिस को पता चला कि उस की सोहबत अच्छी नहीं थी और वह आवारा व दबंग प्रवृत्ति का युवक था.

पुलिस अरविंद के घर पहुंची और उन से विपुल के बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वह भले ही बिगडै़ल प्रवृत्ति का युवक है, लेकिन उन के लिए अच्छा है. उन्होंने यह भी बताया कि लक्ष्य के लापता होने के बाद से विपुल लगातार उन के साथ उसे ढुंढवाने में साथ रहा है. आनेजाने वाले शुभचिंतकों को चाय पानी देने का जिम्मा भी उस ने ही संभाल रखा था. अगले दिन पुलिस को पता चला कि विपुल अपने घर से अचानक लापता हो गया है. पुलिस ने जब अरविंद से एक बार फिर से इस बारे में पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि विपुल को यह बात पता चल गई थी कि पुलिस उस के बारे में पूछताछ कर रही है. इस के तुरंत बाद अचानक लापता हो जाने से विपुल पूरी तरह शक के दायरे में आ गया.

पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल किया और उस की कालडिटेल्स के साथ पिछले कई दिनों की लोकेशन भी निकलवाई. नंबरों की जांच से पता चला कि लक्ष्य के लापता होने वाले दिन व रात 3 नंबरों पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस जांच में यह भी पता चल गया कि वह नंबर पंकज प्रजापति, कपिल और विक्की के नाम पर थे. इन में पंकज उसी कालोनी में रहता था, जबकि कपिल गांव अलमासपुर का और विक्की गांव गजावली का रहने वाला था.

लोगों से पूछताछ में पता चला कि ये तीनों कपिल के जिगरी दोस्त थे और उसी की तरह आवारा थे. चौंकाने वाली बात यह थी कि 6 सितंबर को विपुल व उस के दोस्तों की लोकेशन एक साथ थी. रात 12 बजे उन सभी की लोकेशन बागोवाली क्षेत्र में पाई गई. बागोवाली शहर की सीमा से सटा हुआ क्षेत्र था. पुलिस समझ गई कि लक्ष्य का राज इन्हीं चारों के बीच छिपा था. 15 सितंबर को पुलिस ने एकएक कर के विपुल, कपिल व पंकज को उठा लिया. जबकि विक्की पुलिस के हाथ नहीं लग सका पुलिस उन से कई घंटे तक घुमाफिरा कर पूछताछ करती रही, लेकिन उन्होंने लक्ष्य के अपहरण में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

अलबत्ता पुलिस इतना जरूर समझ गई कि तीनों बेहद शातिर युवक थे. अंतत: जब पुलिस ने अपना परपंरागत तरीका अपनाया, तो तीनों टूट गए. उन लोगों ने न केवल मासूम लक्ष्य का अपहरण किया था, बल्कि उस की हत्या कर के शव भी गन्ने के खेत में फेंक दिया था. पुलिस तीनों को ले कर उन के बताए स्थान पर पहुंची और उन की निशानदेही पर गन्ने के एक खेत से बोरे में बंद लक्ष्य का शव बरामद कर लिया, जो बुरी तरह सड़ चुका था. पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम लक्ष्य के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस के घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था.

लक्ष्य की हत्या से लोगों में जबर्दस्त आक्रोश था, इसलिए विपुल के घर पर पुलिस बल तैनात कर दिया गया. इस बीच उस के घर वाले लोगों के आक्रोश से डर का घर में ताला डाल कर फरार हो गए. पुलिस ने हत्यारोपियों से विस्तृत पूछताछ की. लक्ष्य की हत्या इतनी मामूली बात पर की गई थी कि पुलिस भी हतप्रभ रह गई. अरविंद के परिवार से विपुल के अच्छे रिश्ते थे. वह उन के पास अकसर आताजाता रहता था. इस नाते श्यामलाल से ले कर लक्ष्य तक सभी उसे अच्छी तरह जानते थे. विपुल बिगड़ैल और आवारा था, लेकिन चूंकि अरविंद से वह अच्छा व्यवहार करता था, इसलिए वह उसे अच्छा मानते थे.

अरविंद की एक खाली दुकान थी. उसे वह किराए पर देना चाहते थे. यह बात जब विपुल को पता चली, तो उस ने दुकान किराए पर देने के लिए कहा. अरविंद सुलझे हुए व्यक्ति थे. पड़ोस का मामला था, इसलिए वह कतई नहीं चाहते थे कि दुकान की किराएदारी को ले कर उन के बीच कोई मनमुटाव हो, इसलिए उन्होंने प्यार से दुकान देने से मना कर दिया. विपुल को उन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. यह बात उसे बेहद नागवार गुजरी और वह अंदर ही अंदर अरविंद से चिढ़ने लगा. उठतेबैठते, सोतेजागते उस के दिमाग में अरविंद के इनकार के शब्द गूंजते रहते. प्रवृत्ति अच्छी न हो और सोच फितरती हो, तो जलन की अग्नि और तेज हो जाती है. विपुल के साथ बिलकुल ऐसा ही हो रहा था.

उस की जलन की यह आग तब और भी बढ़ गई, जब उसे पता चला कि अरविंद ने अपनी दुकान एक अन्य युवक मोंटी को किराए पर दे दी है. विपुल को पता चला कि मोंटी अपनी दुकान का मुहूर्त 7 सितंबर को करेगा. विपुल ने मन ही मन में सोच लिया था कि चाहे जो भी हो वह दुकान का मुहूर्त नहीं होने देगा. अरविंद को वह ऐसा दर्द देगा कि जिंदगी भर नहीं भूल पाएगा. उस ने अपनी इस रंजिश को जाहिर नहीं होने दिया और उन से मेलभाव बनाए रखा. विपुल व उस के दोस्त कपिल की साझेदारी में कालोनी से थोड़ी दूरी पर डीजे की दुकान थी.

विपुल वहां अपने दोस्तों कपिल, पंकज व विक्की के साथ बैठ कर शराब पीता था. एक दिन ऐसी ही महफिल के दौरान उस ने अपने दोस्तों से सारी बात बता कर कहा, ‘‘मुझे मेरे पड़ोसी ने दुकान नहीं दी. मुझे उसे सबक सिखाना है.’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई.’’ उस के एक दोस्त ने कहा.

‘‘नहीं, मैं जीते जी आग में जल रहा हूं. तुम लोग मेरा साथ दो, मैं उस के इकलौते बेटे को खत्म कर दूंगा.’’ विपुल ने गुस्से से दांत पीसते हुए कहा. कभीकभी शराबियों की दोस्ती बहुत गहरी होती है. उन सब का बहुत गहरा याराना था. वे सब विपुल  का साथ देने को तैयार हो गए.

अंतत: उन्होंने 6 सितंबर को लक्ष्य को मारने की योजना बना ली. अगले दिन विपुल ने अपने दोस्तों को फोन कर दिया कि वे शाम को दुकान पर पहुंचकर इंतजार करें. वह बहाने से अरविंद के बेटे को ले आएगा. उधर विपुल घर आया और लक्ष्य के घर से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. 6 सितंबर को रविवार था. लक्ष्य पूरे दिन घर पर ही रहा. शाम को वह जिद कर के साइकिल ले कर निकल गया. विपुल बाहर नजरें गड़ाए हुए था. उसे पूरी उम्मीद थी कि लक्ष्य साइकिल से बाहर जरूर आएगा.

लक्ष्य पर नजर पड़ते ही विपुल की आंखों में चमक आ गई. वह पैदल चल कर कालोनी के बाहर वाले रास्ते पर चला गया, तब तक लक्ष्य राउंड पूरा कर के वापस आ रहा था. विपुल को देखते ही लक्ष्य ने नमस्ते की, तो उस ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘कहां घूम रहा है लक्ष्य?’’

‘‘कुछ नहीं भैया जी. साइकिल चलाने आया था.’’

‘‘चल आ मैं तुझे नया वीडियो गेम खिलाता हूं. मैं ने अपनी दुकान पर लगाया है.’’ वीडियो गेम की बात पर लक्ष्य खुश हो गया. वह मासूम उस की चालाकी को समझ नहीं पाया और उस के साथ चल दिया. विपुल उसे ले कर सीधे कपिल की दुकान पर पहुंचा. वहां कपिल, पंकज व विक्की पहले से ही मौजूद थे. वहां पहुंचते ही लक्ष्य ने जिज्ञासा से कहा. ‘‘भैया अब तो मैं आप की दुकान पर खेलने आया करूंगा, मम्मी पापा भी नहीं रोकेंगे. कहां है नया वीडियो गेम?’’

‘‘अभी दिखाता हूं.’’ कहने के साथ ही उस ने अपने दोस्तों को इशारा कर दिया. उन्होंने लक्ष्य का मुंह दबा कर उसे जकड़ लिया. मामूली बात पर अंधे हुए विपुल ने दुकान में पड़ी प्लास्टिक की रस्सी उठाई और लक्ष्य के गले में डाल कर कसनी शुरू कर दी. दम घ़ुटा तो लक्ष्य मौत के भय से छटपटा कर रह गया. उस ने उन के चंगुल से छूटने के लिए हाथ पैर चलाए, लेकिन किसी को उस पर दया नहीं आई.

विपुल ने रस्सी तब तक उस के गले में कसी, जब तक उस की सांसों की डोर नहीं टूट गई. हत्या के तुरंत बाद इन लोगों ने लक्ष्य के शव को एक बोरे में बंद कर के कोने में सामान के पीछे छिपा दिया. इस के बाद उन्होंने रात होने का इंतजार किया. तकरीबन 12 बजे इन लोगों ने बोरे को उठाया और मोटरसाइकिल से बागोवाली क्षेत्र में गन्ने के खेत में फेंक आए. विक्की ने लक्ष्य की साइकिल भी एक स्थान पर छिपा दी. विपुल ने घर आ कर उस दिन के बाद अरविंद के साथ लक्ष्य को ढुंढवाने का सफल नाटक किया. इतना ही नहीं वह परिवार व पुलिस जांच की टोह लेने के लिए अधिकांश उन के घर पर ही रहता था. अरविंद के जो भी मिलने वाले आते थे, उन्हें चाय आदि पिलाने का जिम्मा भी उस ने ही उठा लिया था.

किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि विपुल ऐसा बेहरम हो सकता है. बेटे के विछोह में पूनम व अरविंद की तड़प उसे सुकून दे रही थी. विपुल को जब एक दिन पता चला कि पुलिस उस के बारे में भी पूछताछ कर रही है, तो डर की वजह से वह लापता हो गया. यहीं से वह शक के दायरे में आया और पकड़ा गया. अगले दिन पुलिस ने चौथे हत्यारे विक्की को भी धर दबोचा. उस ने भी हत्या में शामिल होने की बात कुबूल ली. पुलिस को उस की निशानदेही पर लक्ष्य की साइकिल भी मिल गई. पुलिस ने कागजी औपचारिकताएं पूरी कर के चारों आरोपियों को लोगों के गुस्से और हमले की आशंका के मद्देनजर भारी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मामूली सी बात पर विपुल की बिगड़ैल प्रवृति और मन में उपजी रंजिश ने एक परिवार का चिराग बुझा दिया. उस ने यह रंजिश न रखी होती, तो लक्ष्य भी जीवित होता और उस का व उस के दोस्तों का भविष्य भी चौपट होने से बच जाता. लक्ष्य के परिजनों का कहना था कि यदि विपुल ने अपनी नाराजगी बताई होती, तो वह उसे दुकान दे देते. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime

Crime Story: हत्यारिन मां

Crime Story: मां खुद की जान जोखिम में डाल कर बच्चों को बचाती है. लेकिन राखी ऐसी मां है, जिस ने प्रेमी और 10 लाख रुपए की बीमे की रकम के लिए अपने ही बेटे की हत्या कर दी.

ससून डाक अस्पताल के डाक्टरों ने थाना विश्रामवाड़ी के सीनियर इंसपेक्टर पोपट सुपेकर को 11 साल के एक बच्चे के बारे में जो बताया, सुन कर वह हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत ड्यूटी पर तैनात महिला सबइंसपेक्टर शीतल लोमटे से प्राथमिकी दर्ज करा कर पूरी बात वरिष्ठ अधिकारियों को बताई. इस के बाद वह असिस्टैंट इंसपेक्टर सूर्यकांत मारोडे, शीतल लोमटे एवं कुछ सिपाहियों को साथ ले कर ससून डाक अस्पताल के लिए चल पड़े. ससून डाक अस्पताल थाना विश्रामवाड़ी से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए पुलिस की यह टीम 10 मिनट में वहां पहुंच गई.

अस्पताल पहुंच कर पोपट सुपेकर अस्पताल के डाक्टरों से मिले तो उन्होंने बच्चे की लाश दिखा कर पूरी बात बताई. लाश का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने बच्चे के साथ आई उस की मां से पूछताछ शुरू की. मां ने पुलिस को भी वही सब बताया, जो डाक्टरों को पहले बता चुकी थी.  पुलिस ने उस की बातों पर विश्वास न कर के अपनी औपचारिक काररवाई पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया और बच्चे की मां को साथ ले कर थाने आ गई. थाने में की गई पूछताछ में पता चला कि मृतक बच्चे की मां का नाम राखी बालपांडे था. मृतक बच्चा उस का एकलौता बेटा चैतन्य बालपांडे था.

पूछताछ में राखी जो बता रही थी, वह डाक्टरों द्वारा बताई घटना से बिलकुल मेल नहीं खा रहा था. राखी बारबार बयान बदल रही थी. इस का मतलब वह पुलिस को गुमराह कर रही थी. मजबूर हो कर पुलिस ने जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो आखिर वह टूट गई. उस ने अपने विकलांग बेटे की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद राखी ने बताया कि उसी ने अपने विकलांग बेटे चैतन्य की हत्या प्रेमी सुमित मोरे के साथ मिल कर की थी.

पुलिस ने तुरंत राखी के प्रेमी सुमित को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ में पता चला कि स्वच्छंदता से रहने, बिना रोकटोक मौजमस्ती करने और चैतन्य के लाखों रुपए के जीवन बीमा की रकम हथियाने के लिए उन्होंने उस की हत्या की थी. पुलिस ने अगले दिन यानी 8 अगस्त, 2015 को दोनों को महानगर के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के विस्तृत पूछताछ और सबूत जुटाने के लिए 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में चैतन्य की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

36 वर्षीया राखी बालपांडे मूलरूप से महाराष्ट्र की राजधानी नागपुर की रहने वाली थी. उस के परिवार में मां निला मानकर और एक बहन राधा मानकर थी. पिता की उस के बचपन में ही मौत हो गई थी. उस के बाद सारी जिम्मेदारियां मां निला पर आ गई थीं. निला सुलझी, समझदार और साहसी महिला थीं. पति की मौत के बाद वह जरा भी नहीं घबराईं, जबकि उस समय बेटियां छोटीछोटी थीं. उन्होंने दोनों बेटियों को पालापोसा ही नहीं, पढ़ालिखा कर इस काबिल बनाया कि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें.

राखी खुले विचारों वाली अति महत्वाकांक्षी लड़की थी. वह पढ़नेलिखने में होशियार थी, इसलिए हमेशा अच्छे नंबरों से पास हुई. उस ने नागपुर विश्वविद्यालय से माइक्रो बायोलौजी से बीएससी किया. जब वह बीएससी कर रही थी, तभी साथ पढ़ने वाले तरुण बालपांडे से उसे प्रेम हो गया. कालेज छोड़ने तक बात शादी तक पहुंच गई. लेकिन शादी के लिए न राखी के घर वाले तैयार थे, न तरुण के घर वाले. मजबूर हो कर दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली. यह सन 2000 की बात है. दोनों ही उच्चशिक्षित थे, इसलिए उन्हें प्रतिष्ठित कंपनियों में अच्छे वेतनों पर नौकरियां मिल गईं. दोनों ने किराए का अच्छा सा मकान ले लिया और आराम साथसाथ से रहने लगे.

सन 2002 में राखी ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने चैतन्य रखा. बच्चे के जन्म से दोनों बहुत खुश थे. लेकिन उन की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. इस की वजह यह थी कि बच्चे की एक टांग पोलियो से खराब हो गई. इस का दोष राखी ने तरुण को दिया. उस का मानना था कि तरुण ने अगर ध्यान दिया होता तो बच्चा पोलियो का शिकार न होता. बस, इस के बाद दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होने लगा. फिर एक दिन ऐसा भी आया जब राखी तरुण बालपांडे का घर छोड़ कर मां के घर आ गई. मां और बहन के काफी समझाने के बाद भी राखी पति के घर लौट कर नहीं गई. कुछ दिनों तक मां और बहन के साथ रहने के बाद राखी ने एक बार फिर नौकरी के लिए कोशिश शुरू कर दी.

उस की कोशिश रंग लाई और उसे पूना की किसी कंपनी में नौकरी मिल गई.  वह नागपुर छोड़ कर पूना आ गई. पूना में उस ने प्रतीकनगर में किराए का मकान लिया और अकेली ही रहने लगी. धीरेधीरे राखी की मकान मालिक से नजदीकियां बढ़ने लगीं तो उस ने तरुण बालपांडे को तलाक और बेटे चैतन्य को अपनी कस्टडी में लेने के लिए कानूनी नोटिस भेज दी. मकान मालिक और राखी की नजदीकियां कोई गुल खिलातीं, उस के पहले ही इस बात की जानकारी मकान मालिक की पत्नी को हुई तो उस ने हंगामा खड़ा कर दिया. उस ने राखी से अपना मकान तो खाली करवा ही लिया, उस के खिलाफ थाना विश्रामवाड़ी में पति के साथ अवैधसंबंधों और ससुर को ब्लैकमेल करने की शिकायत भी दर्ज करवा दी.

इस से राखी की काफी बदनामी हुई. उसे मकान तो खाली करना ही पड़ा, नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा. प्रतीकनगर का घर छोड़ने के बाद राखी ने एक प्रौपर्टी डीलर की मदद से पूना के वाकड़ेवाड़ी स्थित टिंगरेनगर के रोड नंबर 1 पर एसवी एन्क्लैव प्लौट नंबर 1 में सुनील मोरे का खाली फ्लैट किराए पर ले लिया. इस मकान में राखी अकेली नहीं रह रही थी. उस के साथ उस की मां निला और बहन राधा भी रहने आ गई थीं.

इस के अलावा लोक न्यायालय से उसे अपने विकलांग बेटे चैतन्य को भी साथ रखने की इजाजत मिल गई थी. वह भी उस के साथ रहने आ गया था. पढ़ाई के लिए राखी ने पूना के इंटर नैशनल इंगलिश स्कूल में उस का एडमिशन करवा दिया था. मांबहन के साथ होने की वजह से चैतन्य को कोई परेशानी नहीं हो रही थी. चैतन्य मां के साथ रह कर खुश था. राखी ही नहीं, मां निला और बहन राधा भी उस का खूब खयाल रखती थीं. उसे गाने का शौक था, इस के लिए वह प्रैक्टिस भी करता रहता था. वह इंडियन आयडल बनना चाहता था. उस ने इंडियन आयडल की प्रतियोगिता में 2 बार भाग भी लिया था, लेकिन सफल नहीं हो सका था.

राखी की बहन राधा चैतन्य का कुछ ज्यादा ही खयाल रखती थी. लेकिन उस की शादी हो गई तो चैतन्य का खयाल रखने वाला कोई नहीं रह गया. बहन के ससुराल जाने के बाद अचानक राखी का भी बेटे के प्रति व्यवहार बदल गया. वह एकदम से क्रूर हो गई. उस ने बेटे का स्कूल जाना भी बंद करा दिया. यही नहीं, उस पर तरहतरह के अत्याचार भी करने लगी. जिस राखी ने बेटे को ले कर पति को छोड़ दिया था, छोटीछोटी बातों को ले कर पड़ोसियों तक से लड़ जाती थी, आखिर वही राखी इतनी कठोर क्यों हो गई?

इस की वजह थी उस का प्रेमी सुमित मोरे, जो कुछ महीने पहले ही राखी के दिल में बस गया था. राखी सुमित मोरे के पीछे पागल हो चुकी थी. वह उस से शादी कर के अपनी नई दुनिया बसाना चाहती थी, जिस में चैतन्य रोड़ा बन रहा था. 28 वर्षीय सुमित पूना के पेखड़ा जेल रोड स्थित सैनिकनगर में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के पिता का नाम सुनील मोरे था, जो रिटायर हो चुके थे. राखी उसी के फ्लैट में किराए  पर रह रही थी. फ्लैट का किराया लेने अकसर सुमित ही आता था. इसी आनेजाने में राखी अविवाहित सुमित मोरे पर मर मिटी थी.

स्वस्थसुंदर शरीर, चौड़ी छाती, सशक्त बांहों के मालिक सुमित को देख कर राखी की कोमल भावनाएं एकदम से जाग उठी थीं. जबकि वह उस से 8 साल छोटा था. लेकिन वह मांबाप का एकलौता बेटा था. यह राखी के लिए और अच्छी बात थी. शायद इसीलिए वह उसे अपने करीब लाने की कोशिश में जुट गई थी. सुमित जब भी किराया लेने आता, राखी किसी न किसी बहाने उसे घंटों बैठाए रखती. आखिर कब तक राखी के मन की बात सुमित से छिपी रहती. वह भी जवान था, ऊपर से कुंवारा, इसलिए वह खुद को रोक नहीं पाया और उस की गोद में आ गिरा. उस ने राखी के मूक निमंत्रण को स्वीकार कर लिया. राधा और मां की वजह से घर में मौका नहीं मिलता था, इसलिए एक दिन वह राखी के औफिस पहुंच गया.

उस दिन राखी ने सुमित को कौफी ही नहीं पिलाई, बल्कि साथ में लंच भी किया. इस के बाद राखी ने सुमित को अपने फ्लैट पर उस समय बुलाया, जब वह अकेली थी. सफेद नाइटी में उस ने सुमित का स्वागत किया तो उस का दूधिया बदन देख कर वह आपा खो बैठा. लेकिन राखी उस से पहले ही बहक गई. सुमित के अंदर आते ही वह उस से बेल की तरह लिपट गई. इस के बाद बैडरूम में हवा का एक तेज झोंका आया और फिर जल्दी ही शांति छा गई. सुमित के प्यार में आकंठ डूबी राखी ने जब उस से शादी की बात कही तो उस ने तुरंत हामी भर दी. लेकिन उन की शादी में 2 परेशानियां थीं, एक तो अभी राखी का तलाक नहीं हुआ था, दूसरे सुमित चैतन्य को साथ नहीं रखना चाहता था.

तलाक के लिए राखी तरुण से मिली. उन का तलाक का मामला अदालत विचाराधीन था, जो तरुण की जिद की वजह से लटका हुआ था. तलाक के लिए राखी तरुण से 30 लाख रुपए मांग रही थी. लेकिन सुमित से बात होने के बाद वह 5 लाख रुपए में राजी हो गई. बाकी की रकम उस ने बाद में देने को कहा. लेकिन तरुण इस पर भी राजी नहीं था. इस के बाद बचा था चैतन्य. इस कांटे को निकालने में सुमित ने भी उस का साथ दिया. चैतन्य को ठिकाने लगाने में राखी को 2 फायदे थे. एक तो यह कि चैतन्य के न रहने पर वह सुमित के साथ आजादी से रह सकती थी और दूसरा फायदा यह था कि चैतन्य का 10 लाख रुपए का बीमा था, जो उस के न रहने पर उसी को मिलता, क्योंकि वही उस की नौमिनी थी.

यह बीमा तरुण ने चैतन्य के विकलांग होने की वजह से कराया था. इस की किस्तें भी वही जमा करा रहा था. चैतन्य से छुटकारा पाने के लिए राखी उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त करने लगी. उस का सोचना था कि इस तरह की प्रताणना से वह धीरेधीरे कमजोर हो जाएगा और खुद ही मौत के मुंह में समा जाएगा. इस में सुमित भी उस का साथ दे रहा था. यही सोच कर राखी चैतन्य पर तरहतरह के अत्याचार कर रही थी. उस का स्कूल जाना तो बंद ही करा दिया गया था, खानापीना भी बंद कर दिया गया.

पैर ठीक होने के बहाने उस से दोनों समय 4-4 घंटे व्यायाम कराया जाने लगा. पैर से लाचार चैतन्य व्यायाम न कर पाता तो उसे मारापीटा जाता, धमकाया जाता कि अगर उस ने कहना नहीं माना तो उसे स्टेशन पर बैठा कर भीख मंगवाई जाएगी. इस सब में सुमित भी राखी का पूरा साथ दे रहा था. उन की इन धमकियों से चैतन्य इतना डर गया था कि वह खिड़की से भी बाहर नहीं देखता था. फ्लैट के कोने में बैठा अपनी तकदीर पर आंसू बहाता रहता था. वह राखी से खाना तभी मांगता था, जब भूख हद से गुजर जाती थी. उस पर भी उसे भरपेट खाना नहीं मिलता था. जिस की वजह से दिनोंदिन उस का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था, जिसे देखदेख कर राखी और सुमित का चेहरा खिलता जा रहा था.

राखी की मां निला से यह सब देखा नहीं जाता था. वह जब भी इस का विरोध करती थीं, राखी और सुमित उन्हें डांट कर चुप करा देते थे. वह भी लाचार थीं. वह चैतन्य को अपने साथ नागपुर ले जाना चाहती थीं, लेकिन राखी और सुमित ने चैतन्य को तकलीफ देने और अपहरण में फंसाने की धमकी दे कर निला को अकेली ही नागपुर जाने के लिए विवश कर दिया था. निला के चले जाने के बाद राखी और सुमित को पूरी आजादी मिल गई थी. वे चैतन्य को शारीरिक और मानसिक रूप से तो परेशान कर ही रहे थे, उस के सामने ही शारीरिक संबंध बना कर उसे शर्मिंदा भी करते थे.

मां की इस करतूत से उस का चेहरा शरमा से झुक जाता था. इस से उसे मां से घृणा और नफरत हो गई थी. मौका मिलने पर वह सारी बातें नानी को बता कर वापस आने के लिए कहता था. चैतन्य की तकलीफें सुन कर निला का कलेजा कांप उठता था. लेकिन वह भी उस के लिए कुछ नहीं कर पा रही थी. जब उन से नहीं रहा गया तो उन्होंने सारी बात तरुण बालपांडे को बता दी. उन्होंने चैतन्य को अपने पास ले जाने की कोशिश की, लेकिन 10 लाख रुपयों का बीमा और तलाक का मामला इस में आड़े आ गया था.

तरुण जब तक इस विषय पर कुछ कर पाते, काफी देर हो चुकी थी. चैतन्य अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के बारे में किसी को कुछ बता न पाए, इस के लिए राखी उसे हमेशा कमरे में बंद कर के रखने लगी थी. 6 अगस्त को चैतन्य काफी उदास था. उस ने कुछ खायापीया भी नहीं था. राखी और सुमित से वह इतना डर गया था कि सुबह से बस एक ही रट लगाए था कि वह पापा के पास जाएगा. कई बार राखी के मना करने पर भी वह नहीं माना तो राखी को गुस्सा आ गया. उस ने खुद उसे जी भर कर तो मारापीटा ही, सुमित को बुला कर उस से भी बैट और कपड़ा धोने वाली मुंगरी से पिटवाया.

मार खा कर चैतन्य बेदम हो गया तो उसे उसी हालत में छोड़ कर वह औफिस चली गई. दिन भर उस ने औफिस का काम किया. मां, जिस के बारे में कहा जाता है कि वह ममतामयी होती है, उस के आंचल में दूध और आंखों में पानी होता है, वही मां अपने ही पेट से जन्मे बच्चे की काल बन गई. शाम को औफिस से निकल कर वह अपने प्रेमी सुमित के साथ एक परिचित वकील के यहां गई. वकील को उस ने बताया कि शरीर से काफी कमजोर उस का बेटा बाथरूम में फिसल कर गिर गया है. वह मरने की स्थिति में है. ऐसे में अगर वह मर जाता है तो उस के अंतिम संस्कार में कोई रुकावट तो नहीं आएगी, उस के इंश्योरैंस की रकम के लिए उन्हें क्या करना होगा?

‘‘पहले तो आप उस बच्चे को ले जा कर ससून डांक अस्पताल में भर्ती कराइए,’’ वकील ने कहा, ‘‘उस के बाद क्या होगा, देखा जाएगा.’’

वकील की सलाह पर जब दोनों घर पहुंचे तो चैतन्य को उन्होंने उसी हालत में पाया, जिस हालत में वे उसे छोड़ गए थे. निर्जीव पड़े चैतन्य को देख कर उन की हालत खराब हो गई. सुमित ने अपने 2 दोस्तों को फोन कर के बुलाया और उन की मदद से उसे ससून डाक अस्पताल ले गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने जब उन से पूछताछ की तो उन्होंने डाक्टरों को गुमराह करने के लिए वही सब बताया, जो वकील ने उन्हें बताया था.

लेकिन डाक्टरों को उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि चैतन्य का शरीर देख कर ही वे समझ गए थे कि ये झूठ बोल रहे हैं. दरअसल उस की किडनी, अंडकोश और शरीर पर गहरी चोटें आई थीं, इसी से वे जान गए थे कि बच्चे के साथ मारपीट की गई है. पुलिस का नाम सुन कर राखी और सुमित के होश उड़ गए. सुमित चुपचाप खिसक गया, जबकि राखी डाक्टरों के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए मामले को रफादफा कर के मृत्यु प्रमाण पत्र देने का आग्रह करने लगी. लेकिन डाक्टरों ने उस की एक नहीं सुनी और पुसिल को सूचना दे दी.

थाना विश्रामवाड़ी पुलिस ने पूछताछ के बाद चैतन्य की पिटाई में इस्तेमाल किए गए बैट और कपड़ा धोने वाली मुंगरी को बरामद कर के जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद चैतन्य की लाश उस के पिता तरुण बालपांडे को सौंप दी गई, जिस ने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पूछताछ और जरूरी साक्ष्य जुटा कर थाना विश्रामवाड़ी पुलिस ने राखी और सुमित के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर दोनों को दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों की जमानत नहीं हुई थी. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Assam Crime News: अंधविश्वास की आग में जिंदा जले दंपति

Assam Crime News: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जिस ने समाज को झकझोर कर रख दिया है. जादूटोना के चलते गांव के लोगों ने एक दंपति को जला कर मार डाला. आखिर क्या था इस जादूटोना का पूरा सच, जिस के लिए दंपति को जिंदा जला दिया गया? पूरा सच जानने के लिए पढ़िए आगे.

यह हैरान कर देने वाली घटना 30 दिसंबर, 2025 को असम के करबी आंगलोंग जिले में घटी.अंधविश्वास ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया. रात होवराघाट क्षेत्र के बेलोगुरी मुंडा गांव में ग्रामीणों ने जादूटोना के शक में गार्दी बिरोवा और उन की पत्नी मीरा बिरोवा को निशाना बनाया. अफवाहों से भड़की भीड़ ने पहले तेजधार हथियारों से दंपति पर हमला किया और फिर उन के घर में आग लगा दी. आग की लपटों में घिरे दोनों जिंदा जल गए. उन की चीखें गूंजती रहीं, लेकिन अंधविश्वास के आगे इंसानियत खामोश रही.

गांव वालों का मानना था कि यह दंपति जादूटोना करता था, जिस से गांव के लोगों को नुकसान पहुंच रहा था. इसी अंधविश्वास के कारण दोनों को निशाना बनाया गया.

इस दर्दनाक घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि गांव के लोग अंधविश्वास और अफवाहों पर भरोसा करते थे, जिस से उन्हें लगता था कि गांव में हो रही परेशानियों के पीछे यही दंपति जिम्मेदार है. फिलहाल पुलिस ने गांव वालों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत काररवाई की जा रही है. प्रशासन का कहना है कि अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके. Assam Crime News

Mumbai Crime: ममता की चोरी

Mumbai Crime: एक गलती कर के कल्पना अपनी गृहस्थी में आग लगा चुकी थी. बाद में उस ने आशुतोष दामले से दूसरी शादी कर ली. लेकिन यहां भी वह एक पेच में फंस गई. उस पेच से निकलने के लिए उस ने ममता की चोरी की, लेकिन…

मुंबई महानगर का सीएसटी एक ऐसा रेलवे स्टेशन है, जहां देश के हर कोने से आनेजाने वाले मुसाफिरों की भीड़भाड़ रहती है. मुसाफिरों की उसी भीड़ में एक परिवार अब्दुल करीम शेख का भी था, जो हैदराबाद जाने के लिए पिछले 3 दिनों से मुसाफिरखाने में ठहरा हुआ था. वह मुंबई महानगर से सटे जनपद ठाणे के उपनगर कल्याण का रहने वाला था और वहां लगने वाले पटरी बाजार में फड़ लगाता था. उस के परिवार में पत्नी रुखसाना के अलावा 2 बेटियां थीं. छोटी बेटी आरिजा 4 माह की थी. कुछ दिन पहले उस के साले को किसी आरोप में हैदराबाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, जिस की जमानत कराने के लिए यह परिवार हैदराबाद जाना चाहता था, लेकिन जाने के लिए उस के पास किराए तक के पैसे नहीं थे.

इस के लिए उस ने अपने एक परिचित सलीम से मदद मांगी थी तब सलीम ने उस से कहा था कि वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर आ कर पैसे दे देगा. लेकिन 2 दिन बीत जाने के बाद भी सलीम पैसे देने वहां नहीं आया था. उसी के इंतजार में वह मुसाफिरखाने में चादर बिछा कर लेटा हुआ था. वहां पर इंतजार करते हुए 2 दिन बीत गए. सलीम नहीं आया तो अब्दुल करीम की चिंता बढ़ती जा रही थी कि वह हैदराबाद कैसे जाए? उस ने तय कर लिया कि यदि सलीम कल तक पैसे ले कर नहीं आया तो वह हैदराबाद जाने वाली गाड़ी के जनरल डिब्बे में बिना टिकट बैठ कर चला जाएगा. यही सोच कर वह रात को सो गया. उसी चादर पर उस की पत्नी और बच्चे भी सो गए.

आधी रात के बाद अचानक उस की पत्नी रुखसाना की आंख खुली तो उस के होश उड़ गए. उस के बगल में सो रही उस की 4 महीने की बच्ची आरिजा गायब थी. उस ने उसी समय पति को उठाया. दोनों बेटी को इधरउधर देखने लगे. 4 महीने की बच्ची चल भी नहीं सकती थी जिस से समझा जाता कि कि वह इधरउधर चली गई होगी. आशंका यही थी कि कोई उसे उठा कर ले गया है. पतिपत्नी दोनों उसे स्टेशन पर ही इधरउधर ढूंढ रहे थे. रुखसाना रो रही थी, उस के रोने की आवाज सुन कर कुछ और लोगों की भी नींद टूट गई. छोटी बच्ची के गायब होने पर सभी हैरान थे. उस के साथ कुछ और लोग भी बच्ची को ढूंढने लगे. उन्हें ढूंढतेढूंढते सुबह हो चुकी थी. कुछ लोग रुखसाना को तसल्ली दे रहे थे.

स्टेशन पर रोने की आवाज और वहां की भीड़ को देख कर उधर से गुजर रहे राजकीय रेलवे पुलिस के 2 कांस्टेबल वहां आ गए. अब्दुल करीम शेख ने अपनी बेटी के गायब हो जाने की बात उन्हें बताई तो वह अब्दुल शेख को सीएसटी रेलवे स्टेशन से सटे लोहमार्ग जीआरपी थाने ले गए. यह घटना 24 अप्रैल, 2015 की थी. उन दोनों ने थानाप्रभारी शिवाजी शिंदे को पूरी जानकारी देने के बाद अब्दुल करीम की बेटी को तलाश करवाने की मांग की. थानाप्रभारी ने अब्दुल करीम की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद आश्वासन दिया कि वह उन की बेटी को जल्द से जल्द ढूंढने की कोशिश करेंगे. साथ ही उन्होंने इस मामले की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी.

ऐसी भीड़भाड़ वाली जगह से मांबाप के बीच से बच्ची का गायब होना वाकई एक गंभीर मामला था. इसलिए जीआरपी के कमिश्नर मधुकर पांडेय, एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोडे़ अंवुरे भी अन्य पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंच गईं. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की. लेकिन बच्ची किस ने चुराई, यह पता नहीं लग सका. तब पुलिस कमिश्नर से विचारविमर्श करने के बाद एडिशनल पुलिस कमिश्नर रूपाली खैरमोड़े ने यह केस अपने हाथ में ले लिया. अब्दुल करीम शेख गरीब था. इस से इस बात की आशंका नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए बच्ची का अपहरण किया होगा. निस्संदेह यह किसी दुश्मन या फिर किसी बच्चा चोर गिरोह का काम हो सकता था.

अब्दुल करीम शेख से बात की गई तो उस ने किसी से कोई दुश्मनी और विवाद होने की बात से इनकार किया. इस से साफ हो गया कि यह काम किसी बच्चा चोर या फिर किसी निस्संतान महिला का है. इस के बाद पुलिस ने क्षेत्र के बच्चा चोर गिरोहों की तलाश शुरू कर दी. उन्होंने बच्ची की तलाश के लिए एक पुलिस टीम बनाई. जिस में पुलिस इंसपेक्टर माणिक साठे, योगेंद्र पांचे, असिस्टैंट इंसपेक्टर सुभाष रामण और उन के सहायक गांवकर, शोलके, निकम, पंवार, सालवी, महिला कांस्टेबल परकाले आदि को शामिल किया. उन्होंने सीएसटी रेलवे स्टेशन के सभी सीसीटीवी कैमरों को भी खंगालना शुरू कर दिया.

कैमरों की फुटेज से पुलिस को कुछ सुराग मिले. उस में एक महिला आरिजा को उस की मां रुखसाना के पास से उठा कर एक दूसरी महिला को देती हुई दिखी. दूसरी महिला उस बच्ची को अपनी गोदी में छिपा कर स्टेशन के मेन गेट से बाहर निकली और सामने से आती हुई टैक्सी पकड़ कर निकल गई. उस के जाने के बाद पहली महिला अपने एक साथी के साथ दूसरे गेट से निकल कर कोलकाता जाने वाली ट्रेन में बैठ गई. दोनों महिलाएं कहां से आई थीं और कहां चली गईं. यह पता लगाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर थी.

अब पुलिस का निशाना वह टैक्सी थी जिस में बैठ कर महिला बच्चे को ले कर गई थी. लेकिन मुंबई शहर में चल रही हजारों टैक्सियों में से उसे तलाशना आसान नहीं था. क्योंकि फुटेज में टैक्सी का नंबर भी दिखाई नहीं दे रहा था. पुलिस टीम इसे ले कर परेशान जरूर थी लेकिन निराश नहीं हुई. उन्होंने उस सीसीटीवी फुटेज की कई कौपियां कर के मुंबई सेंट्रल, कुर्ला और सीएसटी रेलवे स्टेशनों पर भी भेज दीं. इस के बाद पुलिस की अलगअलग टीमें इन स्टेशनों पर जा कर ड्राइवरों आदि से बच्ची को ले जाने वाली महिला के बारे में पूछने लगे. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई.

उसे जिस टैक्सी ड्राइवर की तलाश थी इत्तफाक से वह सीएसटी रेलवे स्टेशन पर ही मिल गया. दरअसल पुलिस ने उस ड्राइवर को जब बच्ची ले जाने वाली महिला की फोटो दिखाई तो वह उस महिला को पहचान गया. उस ने बताया कि उस ने उस औरत को मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में छोड़ा था. यह जानकारी पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस टीम मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी पहुंच गई. उस समय रात के लगभग 2 बज रहे थे. पूरा इलाका सुनसान था और लोग अपने घरों में सो रहे थे. टैक्सी ड्राइवर ने जिस जगह पर उस महिला को छोड़ा था, वहां 8-10 इमारतें थीं, जिन में 1100 से 1200 फ्लैट थे. टैक्सी से उतर कर वह महिला किस इमारत में और किस फ्लैट में गई, पता लगाना कठिन था.

रात के समय टीम को उन इमारतों के काफी लोगों की बातें सुननी और उन की नाराजगी झेलनी पड़ सकती थी. लेकिन पुलिस को यह काम रात में ही करना था क्योंकि सुबह होने पर वह महिला शायद कहीं भी जा सकती थी इसलिए लोगों के विरोध की परवाह न करते हुए पुलिस ने अपना बच्चा चोर ढूंढने का औपरेशन शुरू कर दिया. पुलिसकर्मी एकएक इमारत के फ्लैटों की कालबेल बजा कर उस महिला और बच्चे के बारे में पूछताछ करने लगे. पुलिस का यह औपरेशन रात भर चला लेकिन उस महिला का पता नहीं लगा जो बच्ची के साथ टैक्सी से वहां उतरी थी. सुबह करीब 7 बजे पुलिस की मेहनत रंग लाई.

वहीं के एक फ्लैट में रहने वाले डाक्टर माने ने बताया कि इस बारे में अधिक जानकारी तो मुझे नहीं है लेकिन कल रात इस इमारत में रहने वाले दामले परिवार के यहां एक बच्चे का नामकरण और वारसा की पार्टी का आयोजन किया गया था. हालांकि वारसा बच्चे के पैदा होने के बारहवें दिन होता है लेकिन उन के यहां जो बच्चा था वह 3-4 महीने का दिखाई पड़ रहा था. वह बच्चा कुछ बीमार सा भी लग रहा था. जब मैं ने उस बच्चे को करीब से देखने की कोशिश की तो उस की मां ने यह कह कर मना कर दिया था कि छूने से बच्चे को संक्रमण हो सकता है.

डाक्टर माने से दामले का फ्लैट नंबर मालूम कर के पुलिस उस के यहां पहुंच गई. कालबेल बजाने पर एक महिला ने अपनी आंखें मलते हुए दरवाजा खोला तो वह महिला पुलिस को देख कर घबराते हुए बोली, ‘‘कहिए, क्या बात है?’’

‘‘माफ करना मैडम, हम ने सुबहसुबह आप को तकलीफ दी. दरअसल हम लोग एक बच्ची ढूंढ रहे हैं, जो कल सुबह सीएसटी रेलवे स्टेशन से चोरी हो गई थी. हमें खबर मिली कि उस बच्ची को इसी कालोनी में एक औरत ले कर आई है.’’ महिला कांस्टेबल ने उस से कहा.

इस से पहले कि वह महिला कुछ जवाब देती तब तक फ्लैट में से ही एक आदमी निकल कर वहां आ गया. वह बोला, ‘‘बच्ची के विषय में हम लोग कुछ नहीं जानते. हमारे घर में एक छोटा सा लड़का है. जो अभी 12 दिन का हुआ है.’’

वह आदमी उस महिला का पति था.

‘‘आप बच्चे को हमें दिखा सकते हैं?’’ इंसपेक्टर माणिक साठे ने कहा.

यह सुन कर महिला का चेहरा सफेद पड़ गया. लेकिन उस के पति ने कह दिया, ‘‘ठीक है आप उस बच्चे को शौक से देख सकते हैं.’’ कहते हुए वह व्यक्ति पुलिस को फ्लैट के अंदर ले गया. महिला कांस्टेबल ने जब बच्चे को देखा और उस का डायपर हटाया तो वह हैरान रह गई क्योंकि वह बच्चा नहीं बल्कि बच्ची थी और वह भी 12 दिन की नहीं बल्कि 3-4 महीने की थी. साथ में खड़े अब्दुल करीम शेख ने उस बच्ची को पहचानते हुए कहा, ‘‘यही मेरी बच्ची है साहब.’’

पुलिस का यह औपरेशन सफल रहा.  पुलिस टीम भी खुश हो गई. 24 घंटों के अंदर ही बच्ची मिल गई थी. अब उस महिला से कुछ बोलते नहीं बन रहा था. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उस ने अपना नाम कल्पना परमार आशुतोष दामले बताया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस थाने ले आई. औपरेशन सफल होने की जानकारी कमिश्नर मधुकर पांडेय को दी गई तो वह भी थाने आ गए. कल्पना परमार को मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के 7 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान पता चला कि कल्पना परमार ने अपना दांपत्य जीवन बचाने और अपना सच छिपाने के लिए ही बच्ची चोरी करने जैसा जघन्य अपराध किया था. उस की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार से थी:

39 वर्षीय कल्पना परमार एक साधारण और सभ्य महिला थी. समाज में उस के परिवार की अच्छी प्रतिष्ठा थी. कल्पना के हाईस्कूल पास करते ही मातापिता ने अपने ही समाज के एक युवक के साथ उस का विवाह कर दिया था. अपने भविष्य के सारे सपनों को आंचल में समेट कर कल्पना अपनी ससुराल चली गई. ससुराल में वह काफी खुश थी क्योंकि वहां उसे किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी. पति की अच्छी नौकरी थी, इसलिए उस का दांपत्य जीवन हंसीखुशी से चल रहा था. समय के साथ वह एक बेटे की मां भी बन गई. बेटे के जन्म के बाद परिवार में खुशी और बढ़ गई. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. कुछ दिनों बाद ही उस के परिवार में विवाद शुरू हो गया.

इस की वजह यह थी कि कल्पना अब और बच्चा नहीं चाहती थी. इसलिए उस ने ससुराल वालों को बिना बताए अपनी नसबंदी करवा ली. पति और सासससुर को जब यह पता चला तो उन्हें कल्पना की यह बात अच्छी नहीं लगी. इसी बात पर घर में विवाद रहने लगा. आखिरकार परिवारिक झगड़ा इतना बढ़ गया कि पति ने कल्पना को तलाक दे दिया. तलाक के बाद कल्पना मायके आ गई. कुछ दिनों बाद उस की मुलाकात आशुतोष दामले से मुंबई के एक अस्पताल में हुई थी. कल्पना उस अस्पताल में अपनी दवा लेने जाती थी. आशुतोष दामले उस अस्पताल में पर्यवेक्षक था. आशुतोष दामले अपने मातापिता और भाईबहन के साथ मुंबई के सायन इलाके में रहता था. उस की कहानी भी कल्पना जैसी ही थी.

उस का भी पत्नी से तलाक हो चुका था. पत्नी उसे छोड़ कर अपने मायके में रह रही थी. कल्पना परमार जब भी दवा लेने अस्पताल जाती तो आशुतोष दामले उस की काफी मदद करता और उस से सहानुभूति दिखाता था. उस की इसी आदत से कल्पना प्रभावित हो गई और उन के बीच दोस्ती हो गई. इसलिए उन की मुलाकातें बढ़ती गईं. यह दोस्ती प्यार में बदल गई. फिर वे साथसाथ घूमतेफिरते और मौजमस्ती करते. बात यहां तक पहुंच गई कि एक दिन दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. जब दोनों ने शादी की बात अपने घरवालों को बताई तो कल्पना के घरवाले इस रिश्ते से सहमत हो गए लेकिन आशुतोष के घरवालों ने मना कर दिया. पर कल्पना के प्यार में पागल आशुतोष ने अपने घरवालों की बात नहीं मानी और उस ने कल्पना के साथ कोर्ट मैरिज कर ली.

घरवालों को शादी की पता न लगे इस के लिए आशुतोष मानखुर्द उपनगर की म्हाणा कालोनी में एक फ्लैट किराए पर ले कर रहने लगा. अपने घरवालों को आशुतोष ने यह बता दिया था कि वह अधिक पैसा कमाने के लिए दूसरी जगह पार्टटाइम नौकरी करता है. समय अपनी गति से बीतता रहा. कल्पना और आशुतोष दामले का दांपत्य जीवन बड़े आराम से बीत रहा था. मगर कल्पना के प्यार भरे दांपत्य जीवन में भूकंप उस समय आया जब आशुतोष दामले ने कल्पना से अपनी बढ़ती हुई उम्र की चिंता जताते हुए बच्चे की इच्छा जताई. इतना सुन कर कल्पना एकदम से घबरा गई. क्योंकि वह अपनी नसबंदी करवा चुकी थी, जिस से वह अब कोई बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी.

नसबंदी करवा लेने की बात उस ने आशुतोष से छिपा रखी थी. नसबंदी के कारण ही उस का पहला दांपत्य जीवन टूट गया था. इसीलिए वह डर गई थी कि नसबंदी की बात जान कर कहीं आशुतोष भी उसे तलाक न दे दे. वह दूसरी बार अपना परिवार उजड़ने देना नहीं चाहती थी. औलाद के लिए आशुतोष दामले का बढ़ता दबाव देख कर कल्पना परेशान हो गई. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह आशुतोष को यह बात कैसे बताए कि वह उस की यह इच्छा पूरी नहीं कर सकती. अब वह ऐसा उपाय तलाशने लगी कि घर में बच्चा भी आ जाए और उस का परिवार भी बचा रहे. काफी सोचनेसमझने के बाद उस ने इस समस्या के समाधान का जो रास्ता निकाला वही रास्ता उसे जुर्म तक ले गया.

एक दिन कल्पना ने पति को बता दिया कि अब उस की इच्छा पूरी होने वाली है. वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. पत्नी के गर्भवती होने की बात जान कर आशुतोष खुश हो गया. वह कल्पना का और ज्यादा ध्यान रखने लगा. कल्पना भी समय के अनुसार अपनेआप को ढालने लगी थी. पूरे 9 महीने वह इस प्रकार से रही कि पति के अलावा आसपास वालों को भी उस पर कोई संदेह न हो. जैसेजैसे समय गुजरता जा रहा था, कल्पना अपने शरीर की बनावट भी वैसी ही कर रही थी. पेट आगे आने के लिए वह कपड़ों का सहारा ले रही थी. यह बात राज ही रहे, इस के लिए उस ने पति को अपने से दूर ही रखा. आसपास वालों को भी खुद को गर्भवती बताती थी.

बच्चे की डिलीवरी में जब कुछ दिन शेष रह गए तो अपना नाटक सफल बनाने के लिए वह चेकअप करवाने के बहाने बच्चे की तलाश में निकल जाती थी और हाल ही में जन्मे बच्चे को तलाश करती. इस बारे में उस ने 1-2 नर्सों से भी बात की. जब वहां बात नहीं बनी तो वह मुंबई के उन अनाथालयों में गई, जहां से बच्चे गोद लिए जाते थे. वहां उसे नवजात शिशु मिल तो रहे थे लेकिन उन के गोद लेने की प्रक्रिया जटिल थी. प्रक्रिया देख कर उस की हिम्मत पस्त हो गई. इस के बाद कल्पना ने उन महिलाओं से संपर्क किया, जो रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर छोटे बच्चे को ले कर भीख मांगती थीं. उन महिलाओं से उस ने बात की तो उन्होंने भी उसे अपना बच्चा देने से मना कर दिया.

उस की तथाकथित डिलीवरी का समय पूरा हो चुका था लेकिन अभी तक बच्चे के बारे में उस की किसी से बात नहीं बन पाई. वह परेशान हो गई कि अब वह पति को बच्चा कहां से ला कर देगी. कहीं से कोई बच्चा मिलता न देख आखिरकार उस ने कोई नवजात शिशु चोरी करने की योजना बनाई. उस ने सोचा कि कहीं न कहीं से उसे कोई नवजात मिल जाएगा तो वह किसी तरह उसे चुरा कर ले जाएगी. एक दिन वह घर से अस्पताल जाने को कह कर घर से निकल गई. पति अपनी ड्यूटी पर निकल गया. कल्पना ने उस दिन पति को फोन कर के यह खुशखबरी दे दी कि उस ने एक लड़के को जन्म दिया है.

बेटा पैदा होने की खबर पा कर आशुतोष दामले बहुत खुश हुआ. लेकिन उस दिन आशुतोष दामले का यह दुर्भाग्य ही था कि एक इमरजेंसी केस में 24 घंटे की ड्यूटी लग जाने की वजह से अपने बच्चे को देखने के लिए नहीं जा सका. अगले दिन वह पत्नी द्वारा बताए अस्पताल पहुंचा तो कल्पना उसे उस अस्पताल के बाहर ही मिल गई. पति को उस ने बताया कि बच्चा किसी खतरनाक बीमारी से ग्रस्त है. इसलिए डाक्टरों ने उसे 10-12 दिनों के लिए किसी दूसरे अस्पताल में भेज दिया है. डिलीवरी नार्मल हुई थी. इसलिए डाक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर घर जाने के लिए कह दिया. सीधेसाधे आशुतोष ने कल्पना की बातों पर विश्वास कर लिया और पत्नी के साथ घर लौट आया. अपने कामों में व्यस्त होने के कारण आशुतोष ने बच्चे का सारा काम पत्नी पर ही छोड़ दिया था.

इसी बीच कल्पना को बच्चे की व्यवस्था करनी थी. यह उस के लिए बड़ी ही मुश्किल घड़ी थी. बच्चा कहां से लाए यह समस्या उस के सामने अब भी खड़ी थी. अगर इन 10-12 दिनों में बच्चे का बंदोबस्त नहीं हुआ तब वह क्या करेगी. आखिरकार धीरेधीरे वह समय भी नजदीक आ गया, जब उसे बच्चा घर लाना था. उस दिन वह सुबहसुबह पति के साथ ही घर से बाहर निकली. बच्चा चोरी करने के इरादे से पहले वह विरार के एक मंदिर गई. लेकिन वहां भीड़भाड़ को देख कर वह घबरा गई. वहां अपनी दाल गलते हुए न देख वह विरार से सीधे ट्रेन पकड़ कर मुंबई के चर्चगेट स्टेशन आ गई. वहां से टैक्सी की और सीएसटी रेलवे स्टेशन पहुंच गई. अब तक काफी रात हो गई थी. लेकिन यहां भी उस की हिम्मत फेल हो गई थी.

अपने वादे के मुताबिक कल्पना को सुबह बच्चा ले कर घर पहुंचना था. परेशान कल्पना थक कर मुसाफिरखाने में खाली पड़ी एक बेंच पर बैठ गई. उसी बेंच पर कुछ समय बाद एक महिला और एक पुरुष आ कर बैठ गए. उस महिला ने कल्पना का उदास चेहरा देखा तो उस से बातचीत शुरू कर दी. उस ने कल्पना को अपना नाम सुनंदा और साथ में आए युवक को अपना देवर बताया था. सुनंदा पर विश्वास हो जाने के बाद कल्पना ने उसे अपनी दुखभरी कहानी सुना दी. उस की कहानी सुन कर उस महिला ने इधरउधर देखा. और निडर भाव में कहा, ‘‘देख तेरे सामने ही एक सुंदर सी बच्ची सोई हुई है. उस की मां तो जैसे घोड़े बेच कर सो रही है.

जा, उसे उठा ले और ले कर निकल जा. अगर तेरी हिम्मत नहीं पड़ रही है तो मुझे बता. मैं तेरी मदद कर दूंगी. लेकिन इस के बदले में तू मुझे क्या देगी? मुझे कोलकाता जाना है.’’

वह 4 महीने की बच्ची अब्दुल करीम शेख की थी जो अपनी मां रुखसाना के बगल में सो रही थी. कोई नवजात न मिलने पर कल्पना उस बच्ची को ही ले जाने के लिए तैयार हो गई. सुनंदा की यह बात सुन कर कल्पना कुछ समय तक खामोश रही. फिर बताया कि उस के पास इस समय सिर्फ 15 हजार रुपए हैं. सुनंदा ने कल्पना से वह 15 हजार रुपए लिए और इधरउधर देख कर रुखसाना की 4 माह की बच्ची को उठा कर उस की गोदी में डाल कर कहा, ‘‘अब तू जल्दी निकल जा यहां से. मैं भी निकलती हूं. मेरी ट्रेन जाने वाली है.’’

कल्पना बच्ची को गोदी में छिपा कर सीएसटी स्टेशन के मैन गेट से निकल कर टैक्सी द्वारा अपने घर पहुंच गई. सुनंदा नामक औरत अपने देवर के साथ दूसरे गेट से चली गई थी. कल्पना जिस समय बच्चे को ले कर घर पहुंची उस समय उस का पति आशुतोष दामले घर पर ही था. वह कल्पना को देख कर काफी खुश हुआ था. बच्चे के घर आने की खुशी में आशुतोष ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी और रात को बड़ी धूमधाम से बच्चे का वारसा और नामकरण की पार्टी का आयोजन किया. उस पार्टी में उस ने अपने जानपहचान वालों को भी बुलाया था. उस कार्यक्रम में उसी बिल्डिंग में रहने वाले डाक्टर माने का भी परिवार आया था.

कल्पना का सच तो सामने आ गया. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं लग सका कि सुनंदा नाम की महिला जिस ने बच्ची चुरा कर दी थी वह कहां की रहने वाली है. कल्पना से पूछताछ के बाद पुलिस ने सुनंदा का एक स्कैच तैयार करवा कर मुंबई तथा कोलकाता में सार्वजनिक स्थानों पर चिपकवा दिए हैं ताकि उस के बारे में सुराग मिल सके. रिमांड अवधि पूरी होने से पहले ही पुलिस ने कल्पना परमार को न्यायालय में फिर से पेश किया जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस मामले में कल्पना के पति की कोई गलती नहीं थी इसलिए पुलिस ने उस के बयान ले कर उसे घर भेज दिया.

कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद पुलिस ने बच्ची उस के मांबाप को सुपुर्द कर दी. सुनंदा का अभी तक कोई पता नहीं चल सका. मामले की तफ्तीश सीनियर पुलिस इंसपेक्टर शिवाजी शिंदे कर रहे हैं. Mumbai Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jharkhand News: अंधविश्वास का खौफनाक अंजाम – डायन बताकर महिला से की गई मारपीट

Jharkhand News: एक ऐसी घटना सामने आई है, जिस में डायन बताकर एक महिला के साथ मारपीट की गई और उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई. आखिर क्यों एक महिला के साथ ऐसा गलत व्यवहार किया गया. इस महिला के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है, आइए जानते हैं, इस क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो आप को भी हैरान कर देगी.

यह सनसनीखेज घटना झारखंड के  सरायकेला खरसावां जिले के छोटा गम्हरिया गांव की है. यहां अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के चलते शीला महतो नाम की महिला को डायन बताकर उस के साथ बेरहमी से मारपीट की गई. डर के साए से जी रही पीड़िता शीला महतो ने मंगलवार को परिवार परामर्श केंद्र, कोलाबिस में शिकायत कर आरोप लगाया कि 15 नवंबर, 2025 की रात उस के पड़ोस में रहने वाले माया महतो, मंजू महतो, दिनेश महतो और महादेव महतो ने उस के घर में घुसकर लोहे के औजार से हमला किया था. इसी हमले से वह गंभीर रूप से घायल हो गई.

शीला महतो का कहना है कि आरोपियों ने उन्हें डायन करार देते हुए जान से मारने की धमकी भी दी. इस के साथ ही शीला के साथ उत्पीड़न लगातार जारी है. पिछले 2 दिनों से आरोपी उस के घर आ कर दुर्व्यवहार और धमकियां दे रहे हैं, जिस से वह और उस का परिवार दहशत में है.

पीड़िता शीला महतो ने परिवार परामर्श केंद्र में पद्मश्री से सम्मानित छुटनी महतो से मुलाकात की. इस के बाद केंद्र संचालिका ने मामले को गंभीरता से लिया और शीला महतो को कानूनी सहायता और सुरक्षा का आश्वासन भी दिया है.

उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं समाज के लिए बेहद चिंताजनक हैं और डायन प्रताड़ना कानून के तहत दोषियों पर सख्त काररवाई होनी चाहिए. मामले की जानकारी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को भेजी जा रही है.

इस घटना के बाद परिवार डरा हुआ है और ग्रामीणों ने भी इस घटना पर गहरी चिंता जताते हुए प्रशासन से तत्काल और कड़ी काररवाई की मांग की है. Jharkhand News

Hindi Stories: बस एक बेटा चाहिए

Hindi Stories: मेहनतमजदूरी कर के जीविका चलाने वाली शंकरी की 3 बेटियां थीं, चौथा बच्चा पेट में था. आखिर उस की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि वह बच्चे पर बच्चे पैदा किए जा रही थी. जिस तरह उस बूढ़े बरगद के पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था, उसी तरह उस के नीचे बायस्कोप लिए खड़ी उस औरत, जिस का नाम शंकरी था, की उम्र का भी अंदाजा लगाना आसान नहीं था. वह चला तो बायस्कोप रही थी, लेकिन उस का ध्यान लोहे के 4 पाइप खड़े कर के साड़ी से बने झूले में सो रही अपनी 2 साल की बेटी पर था.

अगर झूले में लेटी बेटी रोने लगती तो वह बायस्कोप जल्दीजल्दी घुमाने लगती. बायस्कोप देखने वाले बच्चे शोर मचाते तो वह कहती, ‘‘लगता है, बायस्कोप खराब हो गया है, इसीलिए यह तेजी से घूमने लगा है.’’

बायस्कोप का शो खत्म कर के शंकरी बेटी को गोद में ले कर चुप कराने लगती. लेकिन बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस से झगड़ने लगते. झगड़ते भी क्यों न, उन्होंने जिस आनंद के लिए पैसे दिए थे, वह उन्हें मिला नहीं था. औरत बच्चे के रोने का हवाला देती, फिर भी वे बच्चे न मानते. उन्हें तो अपने मनोरंजन से मतलब था, उस के बच्चे के रोने से उन्हें क्या लेनादेना था. शंकरी उन्हें समझाती, दोबारा दिखाने का आश्वासन भी देती, क्योंकि उसे भी तो इस बात की चिंता थी कि अगर उस के ये ग्राहक बच्चे नाराज हो गए तो उस की आमदनी बंद हो जाएगी. लेकिन उस की परेशानी यह थी कि वह बेटी को संभाले या ग्राहक. बेटी को भी रोता हुआ नहीं छोड़ा जा सकता था.

शंकरी के चेहरे पर मजबूरी साफ झलक रही थी. बच्चों की जिद पर मजबूरन उसे बच्ची को रोता छोड़ कर बायस्कोप के पास जाना पड़ता, क्योंकि बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस का ज्यादा देर तक इंतजार नहीं कर सकते थे. शंकरी की अपनी बच्ची रोती रहती और वह दूसरों के बच्चों का मनोरंजन कराती रहती. बच्ची रोरो कर थक जाती लेकिन वह उसे गोद में न ले पाती. वह उसे तभी गोद में उठा पाती, जब उस के ग्राहकों की भीड़ खत्म हो जाती. ग्राहकों के जाते ही वह दौड़ कर बच्ची को गोद में उठाती, प्यार करती और झट से साड़ी के पल्लू के नीचे छिपा कर दूध पिलाने लगती. तब उस के चेहरे पर जो सुकून होता, वह देखने लायक होता.

शंकरी ने बच्ची को प्यार करने के लिए अपना घूंघट थोड़ा खिसकाया तो थोड़ी दूर पर बेटी को मेला दिखाने आई संविधा की नजर उस के चेहरे पर पड़ी. उस का गोरा रंग धूप की तपिश से मलिन पड़ गया था. अभी भी गरम सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों के बीच से छनछन कर उस के चेहरे पर पड़ रही थीं. भूरे बालों को उस ने करीने से गूंथ कर मजबूती से बांध रखा था. आंखों में काजल की पतली लकीर, माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, गोल चेहरा, जिस में 2 बड़ीबड़ी आंखें, जो दूध पीते बच्चे को बड़ी ममता से निहार रही थीं. कभीकभी उस की आंखें बेचैनी से उस ओर भी घूम जातीं, जो उस का बायस्कोप देखने के लिए उस के इंतजार में खड़े थे.

जैसे ही बेटी ने दूध पीना बंद किया, शंकरी के चेहरे पर आनंद झलक उठा. बच्ची अभी भी उस की गोद में लेटी थी और अधखुली आंखों से उसे ताकते हुए अपनी नन्ही हथेलियों से उस के माथे और गालों को सहला रही थी. औरत ने गौर से बच्ची को देखा, उस के चेहरे पर आनंद की जगह दुख की बदली छा गई. उस की आंखों से आंसू की 2 बूंदें टपक पड़ीं, जो बच्चे के चेहरे पर गिरीं. उस ने जल्दी से साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछा. बच्ची अब तक नींद के आगोश में चली गई थी.

शंकरी ने तमाशा देखने वालों को देखा. वे सभी उसे ही ताक रहे थे. उस ने बहुत हलके से बच्ची को झूले में लिटाया. बरगद के नीचे मक्खियों और कीड़ों की भरमार थी, इसलिए बच्ची को उन से बचाने के लिए एक बारीक कपड़ा उस के चेहरे पर डाल दिया, जिस से बच्ची आराम से सोती रहे. जैसे ही वह बच्ची के पास से हटी, बच्ची फिर रोने लगी. उस के रोने से वह बेचैन हो उठी. उस ने बायस्कोप के पास से ही रोती बच्ची को देखा, लेकिन मजबूरी की वजह से वह उसे उठा नहीं सकी. बायस्कोप देखने वाले बच्चों से पैसे ले कर उन्हें बैठा दिया. बच्ची रोती रही, 1-2 बार तो ऐसा लगा जैसे उस की सांस रुक गई है, लेकिन वह रोतीरोती सो गई.

थोड़ी देर बाद एक छोटी लड़की, जो 4 साल के आसपास रही होगी, सो रही बच्ची के पास से गुजरती हुई शंकरी के पास आ कर उस की साड़ी का पल्लू मुंह में डाल कर लौलीपाप की तरह चूसने लगी. वह शायद शंकरी की झूले में लेटी बेटी से बड़ी थी. उस की लार से शंकरी की साड़ी का पल्लू गीला हो गया. शंकरी की यह दूसरी बेटी घुटने तक लाल रंग का फ्रौक पहने थी. उस के पैर धूल से अटे हुए थे, आंखें पीली, मैलेकुचैले बाल, जो बूढ़े टट्टू की पूंछ की तरह बंधे हुए थे. उन में से कुछ खुले बाल उस के मटमैले चेहरे पर बिखरे हुए थे. लड़की ने शंकरी से उस के कान में फुसफुसा कर कुछ कहा. उस ने ऐसा न जाने क्या कहा कि शंकरी ने खीझ कर उसे कोहनी से झटक दिया. लड़की रोते हुए जमीन पर लेट गई, जिस से उस का पूरा शरीर धूल से अट गया.

तमाशा देखने वाले बच्चे इन सभी चीजों से बेपरवाह और बेखबर अपनी आंखें बायस्कोप के छोटे से गोल शीशे पर जमाए बक्से के अंदर का नजारा देख रहे थे, जो शायद उन्हें कुछ इस तरह मजा दे रहा था, जैसे वे सिनेमाहाल में कोई फिल्म देख रहे हों. यह उन के जोश और दीवानगी से पता चल रहा था. झूले में लेटी बच्ची एक बार फिर रोने लगी. शंकरी ने बगल में जमीन पर लोट रही बेटी को 5 रुपए का सिक्का दिखाया तो वह तुरंत  उठ कर खड़ी हो गई और शरीर पर चिपकी धूल को झाड़ते हुए मां के हाथ से सिक्का झपट लिया. उस के चेहरे पर आंसुओं की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं. हाथ में सिक्का आते ही वह उत्साह और खुशी से उछलतीकूदती रोती हुई छोटी बहन के पास आई और उसे झूले से उठा कर अपनी छोटी सी कमर के सहारे गोद में ले कर थोड़ी दूरी पर स्थित एक छोटी सी दुकान की ओर चल पड़ी.

शंकरी बायस्कोप जरूर चला रही थी, लेकिन उस का ध्यान कहीं और ही था. उसी समय उस के पास एक अन्य लड़की आई, जिस की उम्र बामुश्किल 6 साल रही होगी. उस की पीली रंग की सलवारसमीज मैल की वजह से काली पड़ चुकी थी. कुछ पल मांबेटी आपस में कानाफूसी करती रहीं, उस के बाद वह लड़की वहीं मां के पास बैठ गई और अपने धूल भरे पैर मजे से हिलाने लगी. लेकिन उस की पीली आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. वह पैर हिलाते हुए वहां घूमने आए ताजा चेहरे वाले बच्चों और उन के मांबाप को ललचाई नजरों से ताक रही थी, क्योंकि वे अपने बच्चों की बड़ी से बड़ी इच्छाएं पूरी कर रहे थे.

तमाशा देखने वाले बच्चे जब चले गए तो वह आ कर मां के पास बैठ गई. मां उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकराई. बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस में देखे गए तमाशे के बारे में चर्चा करते हुए हंस रहे थे. उसी बीच हवा का एक ऐसा झोंका आया, जिस से उस औरत का आंचल उड़ गया. उस के उभरे हुए पेट पर संविधा की नजर पड़ी, शायद वह गर्भवती थी. संविधा ने उभार से अंदाजा लगाया, कम से कम 6 महीने का गर्भ रहा होगा. अपने कमजोर शरीर के पेट पर उस छोटे से उभार के साथ शंकरी मुश्किल से बेटी के साथ जमीन पर बैठ गई. उस की इस 6 साल की बेटी ने प्यार से उसे मां कहा तो वह बेटी की आंखों में झांकने लगी.

उसी समय धोतीकमीज पहने और सिर पर मैरून रंग की पगड़ी बांधे एक आदमी मांबेटी के पास आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही लड़की उसे बापू कह कर उस से चिपक गई और उस के गालों तथा मूंछों को सहलाने लगी. लेकिन उस आदमी ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह शंकरी से बातें करने में व्यस्त था. संविधा को समझते देर नहीं लगी कि वह आदमी शंकरी का पति है. वह आदमी उसी को देख रहा था, जबकि उस की नजरें अपने चारों ओर घूमते लोगों पर टिकी थीं. लड़की अपनी बांहें बापू के गले में डाल कर झूल गई तो वह उसे झटक कर उठ खड़ा हुआ और मेले की भीड़ में गायब हो गया.

लड़की संविधा के पास आ कर खड़ी हो गई. उस की नजरें उस के हाथ में झूल रही पौलीथिन में रखे चिप्स के पैकेट पर जमी थीं. वह उन चीजों को इस तरह ललचाई नजरों से देख रही थी, जैसे जीवन में कभी इन चीजों को नहीं देखा था. उस की तरसती आंखों में झांकते हुए संविधा ने चिप्स का पैकेट उसे थमाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

अब उस की नजरें संविधा की बेटी के लौलीपाप पर जम गई थीं, जिसे वह चूस रही थी. वह उसे इस तरह देख रही थी, जैसे उस की नजरें उस पर चिपक गई हों. संविधा ने उस का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कहा, ‘‘लौलीपाप खाओगी?’’

उस ने मुसकराते हुए हां में सिर हिलाया. संविधा ने पर्स में देखा कि शायद उस में कोई लौलीपाप हो, लेकिन अब उस में लौलीपाप नहीं था. संविधा को लगा, अगर उस ने लड़की से कहा कि लौलीपाप नहीं है तो उसे दुख होगा. इसलिए उस ने पर्स से 10 रुपए का नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘जाओ, अपने लिए लौलीपाप ले आओ.’’

लड़की मुसकराते हुए 10 रुपए के नोट को अमूल्य उपहार की तरह लहराती हुई मेले की ओर भागी. लड़की के जाते ही संविधा शंकरी को देखने लगी. वह काफी व्यस्त लग रही थी. वह बायस्कोप देखने वालों को शो दिखाते हुए सामने से गुजरने वालों को बायस्कोप देखने के लिए आवाज भी लगा रही थी. 4 साल की उस की जो बेटी अपनी छोटी बहन को ले कर गई थी, अब तक मां के पास वापस आ गई थी. उस ने बरगद के पेड़ के चारो ओर बने चबूतरे पर छोटी बहन को बिठाया और अपना हाथ मां के सामने कर दिया, जिस में वह खाने की कोई चीज ले आई थी. शायद वह उसे मां के साथ बांटना चाहती थी. अब तक बड़ी बेटी भी आ गई थी. उस ने भी अपनी मुट्ठी मां के सामने खोल कर अंगुली से संविधा की ओर इशारा कर के धीमे से कुछ कहा.

शंकरी ने संविधा की ओर देखा. नजरें मिलने पर वह मुसकराने लगी. उस परिवार को देखतेदेखते अचानक संविधा के मन में उस के प्रति आकर्षण सा पैदा हो गया तो उस के मन में उन लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गई. शायद शंकरी के लिए उस के दिल में दया पैदा हो गई थी. उस की स्थिति ही कुछ ऐसी थी, इसीलिए संविधा उस की कहानी जानना चाहती थी. धीरेधीरे संविधा शंकरी की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख शंकरी खड़ी हो गई. उसे लगा, शायद संविधा बेटी को बायस्कोप दिखाने आ रही है, इसलिए उस ने बायस्कोप का ढक्कन खोलने के लिए हाथ बढ़ाया. संविधा ने कहा, ‘‘मुझे इस मशीन में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो आप से मिलने आई हूं.’’

संविधा की इस बात से शंकरी को सुकून सा महसूस हुआ. वह चबूतरे पर खेल रही छोटी बेटी के पास बैठ गई. संविधा ने उस की तीनों बेटियों की ओर इशारा कर के पूछा, ‘‘ये तीनों तुम्हारी ही बेटियां हैं?’’

‘‘जी.’’ शंकरी ने जवाब दिया.

‘‘ये कितनेकितने साल की हैं?’’

शंकरी ने हर एक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘6 साल, 4 साल और सब से छोटी डेढ़ साल की है.’’

इस के बाद उस के उभरे हुए पेट पर नजरें गड़ाते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘शायद तुम फिर उम्मीद से हो?’’

‘‘जी.’’ उस ने लंबी सी सांस लेते हुए कहा.

‘‘कितने महीने हो गए?’’

‘‘6 महीने.’’

संविधा शंकरी को एकटक ताकते हुए उस की दुख भरी जिंदगी के बारे में सोचने लगी, शायद यह बच्चे पैदा करने को मजबूर है. यह कितनी तकलीफ में है. उस की परेशानियों को देखते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी उम्र कितनी होगी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रही तो नजरें झुका लीं.

संविधा को आघात सा लगा. उस ने उस के दुख और मजबूरी भरे जीवन की अपने शानदार और ऐशोआराम वाले जीवन से तुलना की, तब उसे लगा कि इस दुनिया में शायद दुख ज्यादा और सुख कम है. उस ने पूछा, ‘‘आप हर साल एक बच्चा पैदा कर के थकी नहीं?’’

‘‘इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है.’’ शंकरी ने ठंडी आह भरते हुए जवाब दिया.

‘‘आप बहुत बहादुर हैं. मेरे वश का तो नहीं है.’’

‘‘मेरी मजबूरी है. मेरे पति चाहते हैं कि उन का एक बेटा हो जाए, जिस से उन के परिवार का नाम चलता रहे.’’

‘‘नाम चलता रहे..?’’ संविधा ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा. उस पर उसे तरस भी आया. क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस के जो बच्चे थे, उन्हें ही वह ठीक से पालपोस सकती. जबकि सिर्फ नाम चलाने के लिए वह बच्चे पर बच्चे पैदा करने को तैयार थी. संविधा को झटका सा लगा था. वह उस से कहना चाहती थी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं रहा. दोनों बराबर हैं. उस की केवल एक ही बेटी है, जिस से वह और उस के पति खुश हैं. लड़कियां लड़कों से ज्यादा बुद्धिमान और प्रतिभाशाली निकल रही हैं. वे मातापिता की बेटों से ज्यादा देखभाल करती हैं. देखो न लड़कियां पहाड़ों पर चढ़ रही हैं, उन के कदम चांद पर पहुंच गए हैं.

लेकिन वह कह नहीं पाई. उस के मन में आया कि वह उस से पूछे कि अगर इस बार भी बेटी पैदा हुई तो..? क्या जब तक बेटा नहीं पैदा होगा, वह बच्चे पैदा करती रहेगी? अगर उसे बेटा पैदा ही नहीं हुआ तो वह क्या करेगी? इस तरह के कई सवाल संविधा के मन में घूम रहे थे. उस की गरीबी और बेटा पाने की चाहत के बारे में सोचते हुए उसे लगा, अगर यह इसी तरह बच्चे पैदा करती रही तो इस की हालत तो एकदम खराब हो जाएगी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘वह लोकगीत गाते हैं.’’ शंकरी ने कहा.

‘‘लोकगीतों का कार्यक्रम करते हैं?’’

‘‘नहीं, मेलों या गांवों में घूमघूम कर गाते हैं.’’

संविधा को याद आया कि जब वह मेले में प्रवेश कर रही थी तो कुछ लोग चादर बिछा कर ढोलक और हारमोनियम ले कर बैठे थे. वे लोगों की फरमाइश पर उन्हें लोकगीत और फिल्मी गाने गा कर सुना रहे थे.

संविधा समझ गई कि ये लोग कहीं बाहर से आए हैं. उस ने पूछा, ‘‘लगता है, तुम लोग कहीं बाहर से आए हो? अपना गांवघर छोड़ कर कहीं बाहर जाने में तुम लोगों को बुरा नहीं लगता?’’

‘‘हमारे पास इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है.’’

‘‘क्यों? जहां तुम लोग रहते हो, वहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है?’’

‘‘काम और कमाई होती तो हम लोग इस तरह मारेमारे क्यों फिरते?’’

‘‘लेकिन तुम लोग अपने यहां खेती भी तो कर सकते हो?’’ संविधा ने सुझाव दिया.

‘‘कैसे मैडम, हमारी सारी जमीनों पर दबंगों और महाजनों ने कब्जा कर लिया है. क्योंकि हम ने उन से जो कर्ज लिया था और उसे अदा नहीं कर पाए.’’

‘‘तुम लोगों ने अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों नहीं किया?’’

‘‘मैडम, हम बहुत कमजोर लोग हैं और वे बहुत शक्तिशाली. उन के पास पैसा भी है और ताकत भी. हम उन से दुश्मनी कैसे मोल ले सकते हैं.’’

‘‘लेकिन तुम लोग यह सब सह कैसे लेते हो?’’ ‘‘हम बहुत ही असहाय और बेबस लोग हैं.’’ शंकरी ने लंबी सांस ले कर जमीन पर खेल रही बच्ची का मुंह साड़ी के पल्लू से साफ करते हुए कहा.

संविधा के दिमाग में तमाम सवाल उठ रहे थे, लेकिन उसे लगा कि बुद्धिमानी इसी में है कि वह उस से उन सवालों को न पूछे. चेहरे से शंकरी अभी जवान लग रही थी, लेकिन हालात की वजह से चेहरा पीला और सूखा हुआ था. शायद ऐसा गरीबी और बच्चे पैदा करने की वजह से था. संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी कितने साल में हुई थी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, मगर नाकाम रही.

‘‘तुम यहां कब आई?’’

‘‘जब यह मेला शुरू हुआ.’’

‘‘तुम लोगों के दिन कैसे गुजरते हैं?’’

‘‘सुबह जहां रहते हैं, वहां की साफसफाई करते हैं. दोपहर को ही रात का भी खाना बना लेते हैं, क्योंकि हमारे पास उजाले की व्यवस्था नहीं है. उस के बाद अपने काम में लग जाते हैं. लड़कियां टोलियों में नाचनेगाने क काम करती हैं. शादीशुदा महिलाएं मेरी तरह बायस्कोप दिखाती हैं तो कुछ कठपुतली का नाच दिखाती हैं. कुछ मेहंदी लगाने का भी काम करती हैं.’’

संविधा ने इधरउधर देखा. दूरदूर तक कोई इमारत नहीं थी. मैदान पर मेले में आए दुकानदारों के तंबू लगे थे. मन में जिज्ञासा जागी तो उस से पूछा, ‘‘तुम पूरे दिन इसी तरह बिना आराम के काम करती हो. ऐसे में तुम्हारे बच्चों की देखभाल कौन करता है?’’

‘‘मेरी बड़ी बेटी इन दोनों बेटियों को संभाल लेती है.’’

‘‘इन का खानापीना और नहानाधोना?’’

‘‘बड़ी बेटी छोटी को नहला देती है, बीच वाली खुद ही नहा लेती है.’’

संविधा ने अपनी 8 साल की बेटी पर नजर डाली, उस के बाद शंकरी की एकएक कर के तीनों बेटियों को देखा. छोटी बेटी अभी भी मां के पास चबूतरे पर खेल रही थी. संविधा ने सोचते हुए एक लंबी सांस ली. कुछ देर वह शंकरी और उस की बेटियों को देखती रही. उस का दिल उन के लिए सहानुभूति से भर गया. उस ने पर्स से 10-10 रुपए के 2 नोट निकाले और खेल रही लड़कियों को थमा दिए. इस के बाद वह चलने लगी तो देखा, कुछ बच्चे उधर आ रहे थे. उन्हें आते देख कर शंकरी अपने बायस्कोप के पास जा कर खड़ी हो गई, लेकिन उस की नजरें चबूतरे पर खेल रही बेटी पर ही जमी थीं.

शाम को संविधा घर पहुंची तो उस के दिलोदिमाग में शंकरी और उस की बेटियां ही छाई थीं. वह भी एक औरत थी, इसलिए उस ने प्रार्थना की कि काश! उस के गमों का सिलसिला खत्म हो जाए और उस की इच्छा पूरी हो जाए. इस बार उसे बेटा पैदा हो जाए. Hindi Stories

अनुवाद: एम.एस. जरगाम