Suspense Story: साजिश जो छिप न सकी

Suspense Story: पंजाब के जिला संगरूर के गांव लखोवाल निवासी शेर सिंह पहली अक्तूबर, 2017 को थाना भवानीगढ़ के अंतर्गत पड़ने वाली पुलिस चौकी पहुंचे. उन्होंने चौकीइंचार्ज एएसआई गुरमीत सिंह को एक लिखित तहरीर देते हुए कहा कि मैं कल सुबह अपने बेटे यादविंदर के साथ अपने खेतों पर काम करने के लिए गया था. खेतों के नजदीक ही एक प्लाईवुड फैक्ट्री थी. कुछ देर बाद उसी फैक्ट्री में काम करने वाले शिवकुमार और राम नरेश हमारे पास खेत पर आ गए.

शिवकुमार और रामनरेश दिन भर खेतों पर साथ ही रहे. रात करीब 9 बजे मैं ने और मेरे बेटे ने उन दोनों को अपनी मोटरसाइकिलों से प्लाईवुड फैक्ट्री छोड़ दिया. उन्हें छोड़ कर मैं अपने बेटे के साथ घर की ओर लौट रहा था तभी कोई ट्रक बेटे की मोटरसाइकिल में पीछे से टक्कर मार कर भाग गया. उस समय रात के यही कोई साढ़े 9 बज रहे थे, इसलिए मैं ट्रक का नंबर भी नहीं देख पाया.

यादविंदर खून से लथपथ सड़क पर पड़ा तड़पने लगा. फोन करने के बाद जब अस्पताल की एंबुलेंस वहां पहुंची तो उसे नाभा अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. यादविंदर के पास उस समय एक मोबाइल फोन था. वह मौके पर ही कहीं खो गया. शेर सिंह ने उस अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ कानूनी काररवाई किए जाने की मांग की.

शेर सिंह की इस सूचना पर चौकीइंचार्ज गुरमीत सिंह ने भादंसं की धारा 279, 304ए के तहत अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी. पुलिस ने काफी कोशिश की, लेकिन घटना के 3-4 महीने बाद भी वह उस ट्रक चालक को नहीं ढूंढ पाई. लिहाजा इस केस की जांच वहां से सीआईए के इंचार्ज इंसपेक्टर विजय कुमार को ट्रांसफर कर दी गई.

शुरूशुरू में इंसपेक्टर विजय कुमार को भी इस केस में कोई सफलता मिलती नजर नहीं आई, पर उन्हें मामले की तह तक तो पहुंचना ही था सो उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. साथ ही अपने खास मुखबिरों को इस काम पर लगाने के बाद मृतक के पिता शेर सिंह से भी पूछताछ की. इस बार शेर सिंह ने बताया कि उन्हें संदेह है कि उस के बेटे यादविंदर की मृत्यु दुर्घटना में नहीं हुई थी, बल्कि उस की हत्या की गई थी.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ इंसपेक्टर विजय कुमार ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘‘आप ने तो अपने बयानों में लिखवाया था कि उस की मौत एक्सीडेंट से हुई थी. आप के बयानों के अनुसार एक अंजान ट्रक चालक के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखी गई थी. अगर ऐसी बात थी तो आप ने यह सब पहले क्यों नहीं बताया था. इस प्रकार गलतबयानी कर के आप ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की है.’’

‘‘साहबजी, दरअसल किसी ने मुझे उस रात खबर दी थी कि यादविंदर का एक्सीडेंट हो गया है और उस की लाश सड़क पर पड़ी है. खबर सुनते ही मैं मौके पर पहुंचा तो बेटा तड़प रहा था. वहीं उस की मोटरसाइकिल भी पड़ी थी. फोन कर के मैं ने एंबुलेंस बुलाई और उसे नाभा के अस्पताल ले गया था.

‘‘पहली अक्तूबर को मैं ने पुलिस चौकी के एसआई गुरमीत सिंह को जो बयान दिया था, वह किसी के कहने पर दिया था, जबकि सच्चाई यह है कि मैं ने ट्रक वाले को नहीं देखा था.

‘‘सच्चाई यह है कि उस समय बेटे की लाश देख कर मैं अपना होश खो बैठा था. लोग जैसा कह रहे थे, मैं वैसा ही कर रहा था. अब मैं पूरी तरह ठीक हूं. मुझे उम्मीद है कि मेरे बेटे की किसी ने हत्या कर मामले को एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की है.’’

शेर सिंह की बात सुनने के बाद इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस मामले की जांच शुरू कर दी. जांच की शुरुआत उन्होंने शेर सिंह के घर से ही की. उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि कहीं यादविंदर या शेर सिंह की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. इस काम में उन्होंने अपने मुखबिरों को भी लगा दिया.

इस बीच एक मुखबिर ने इंसपेक्टर विजय कुमार को खबर दी कि शेर सिंह के परिवार की नूरपुर गांव के रहने वाले जसवंत सिंह उर्फ जस्सा के साथ दुश्मनी थी. दुश्मनी की वजह क्या थी, यह बात मुखबिर नहीं बता सका.

जस्सा के साथ शेर सिंह की क्या दुश्मनी थी, यह जानने के लिए उन्होंने शेर सिंह को सीआईए औफिस बुलाया तो शेर सिंह ने बताया, ‘‘साहब, जस्सा से उस की ऐसी कोई खास दुश्मनी नहीं है. बस खेतों के पानी को ले कर एकदो बार उस से कहासुनी जरूर हो गई थी.’’

शेर सिंह के हावभाव और बातों से इंसपेक्टर विजय कुमार समझ गए कि वह कुछ छिपा रहा है या जानबूझ कर वह सच नहीं बताना चाहता. और फिर खेतों के पानी को ले कर तो गांवों में अकसर छोटेमोटे झगड़े होते ही रहते हैं. इस के पीछे कोई किसी का कत्ल नहीं करता. बात जरूर कोई और ही रही होगी.

बहरहाल, इंसपेक्टर विजय को किसी ऐसे आदमी की तलाश थी जो जस्सा और शेर सिंह के बीच चल रही दुश्मनी की सही वजह का पता लगा सके. थोड़ी कोशिश के बाद उन्हें एक ऐसी चतुर औरत मिल गई. वह न केवल जसवंत सिंह उर्फ जस्सा और शेर सिंह के परिवारों के बीच की दुश्मनी का पता लगा सकती थी बल्कि उन की कुंडली भी खंगाल सकती थी.

इंसपेक्टर विजय ने उसे कुछ ईनाम देने का लालच दिया तो वह यह काम करने के लिए तैयार हो गई. काम सौंपे जाने के कुछ दिनों बाद उस औरत ने सब पता लगाने के बाद उन्हें जो कुछ बताया, उस में उन्हें सच्चाई दिखाई दी. उस औरत ने बताया कि जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की वजह खेतों का पानी नहीं था बल्कि जस्सा की खूबसूरत बेटी थी. जस्सा की एक बेटी थी कल्पना, जिस की सुंदरता की चर्चा आसपास के गांवों में भी थी. उस के चाहने वालों की लंबी फेहरिस्त थी.

शेर सिंह के बेटे यादविंदर की नजर जब उस पर पड़ी तो पहली नजर में ही वह उस का दीवाना हो गया था. लड़की के अन्य चाहने वालों की तरह वह भी उस के घर के इर्दगिर्द चक्कर लगाने लगा था. यादविंदर भी अच्छाखासा गबरू नौजवान था. वह पढ़ालिखा भी था और अच्छे घर से ताल्लुक रखता था, पर कल्पना ने उसे कभी लिफ्ट नहीं दी. वह भी एक अच्छे परिवार की संस्कारी लड़की थी.

प्यार वगैरह के फालतू चक्करों में वह नहीं पड़ना चाहती थी. इसलिए यादविंदर क्या उस ने किसी भी लड़के को भाव नहीं दिया. लेकिन यादविंदर किसी न किसी तरह उस के नजदीक पहुंचने की कोशिश करता रहा. कल्पना के घर के चक्कर लगाने की यादविंदर की दिनचर्या सी बन गई थी. कल्पना की झलक पाने या उस से बात करने के चक्कर में वह उस के घर के कई चक्कर रोजाना लगाता था. जब वह उसे रास्ते में मिल जाती तो वह उस के साथ छेड़छाड़ करे बिना नहीं मानता था.

1-2 बार तो कल्पना के पिता जस्सा ने यादविंदर को अपनी बेटी के साथ छींटाकशी करते देख लिया था. तब उन्होंने उसे चेतावनी दे कर छोड़ दिया था. पर यादविंदर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. एक रोज तो यादविंदर ने हद ही कर दी. उस ने कल्पना का रास्ता रोक कर उस का हाथ पकड़ कर बात करने की कोशिश की. कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी. उस ने यह सारी बात अपने पिता जसवंत सिंह को बता दी. पानी सिर से इतना ऊंचा पहुंच जाएगा, इस बात का अंदाजा शायद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा को नहीं था.

बेटी के मुंह से यादविंदर की करतूतें सुन कर जस्सा का खून खौल उठा. वह सीधा शेर सिंह के घर गया. उस ने यादविंदर को ही नहीं, बल्कि शेर सिंह को भी खरीखोटी सुनाई. बापबेटे की उस ने गांव वालों के सामने ही बेइज्जती की और बाद में चलते समय उस ने शेर सिंह को यह भी धमकी दी कि अगर उस ने अपने बेटे पर लगाम नहीं लगाई तो वह उस के टुकड़ेटुकड़े कर देगा.

यह धमकी जस्सा ने पूरे गांव के सामने दी थी, पर इंसपेक्टर विजय कुमार को गांव वालों ने यह बात नहीं बताई थी. बहरहाल, जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की असली वजह इंसपेक्टर विजय कुमार को पता चल चुकी थी. उन्होंने जस्सा को पूछताछ के लिए सीआईए औफिस बुलवा लिया. उन्होंने उस से यादविंदर की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने खुद को निर्दोष बताया. उस ने कहा, ‘‘साहब, आप को शायद गलतफहमी हुई है. यादविंदर की हत्या नहीं हुई, बल्कि उस का एक्सीडेंट हुआ था.’’

‘‘बकवास बंद करो.’’ इंसपेक्टर विजय ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘हमें सब मालूम है कि यादविंदर का एक्सीडेंट हुआ था या अपनी बेटी के चक्कर में तुम ने मिल कर उस की हत्या की थी. यह सारी सच्चाई मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

इंसपेक्टर विजय की घुड़की के बाद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा और रोते हुए कहने लगा, ‘‘साहबजी, मैं यादविंदर की हत्या नहीं करना चाहता था पर जब बात इज्जत पर बन आई तो मजबूरन मुझे यह कदम उठाना पड़ा.’’

इस के बाद उस ने यादविंदर के एक्सीडेंट के रहस्य से परदा उठाते हुए उस की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

यादविंदर काफी समय से जस्सा की बेटी कल्पना को छेड़छेड़ कर परेशान कर रहा था. जस्सा ने उसे प्यार से और धमका कर हर तरह से समझा कर देख लिया था पर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. जस्सा ने उस के पिता शेर सिंह को भी चेतावनी दी पर यादविंदर पर किसी बात का असर नहीं हुआ था. उल्टे यादविंदर कल्पना को धमकी देता था कि यदि उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे उठा कर ले जाएगा.

30 सितंबर, 2017 की रात यादविंदर कल्पना से बातचीत करने के लिए उस के घर की तरफ चक्कर लगाने के लिए आया था. इत्तफाक से उस समय जस्सा भी अपने घर के बाहर खड़ा था. यादविंदर को देखते ही उस के तनबदन में आग लग गई. उस जलती हुई आग पर तेल खुद यादविंदर ने ही डाला. वह जस्सा के घर के बाहर खड़ा हो कर अपनी बाइक का हौर्न बजाने लगा. जस्सा ने यादविंदर को अपने पास बुला लिया और प्यार से बातें करते हुए उसे अपने खेतों की ओर ले गया.

उस समय जस्सा के साथ उस का भतीजा मनदीप सिंह मनी व नौकर सुखविंदर सिंह उर्फ काला भी था. अपने खेत में पहुंचने के बाद यादविंदर को सबक सिखाने की नीयत से तीनों ने जम कर उस की पिटाई की. उन का इरादा यादविंदर की हत्या करने का नहीं था पर अंधाधुंध पिटाई करने से यादविंदर की मौत हो गई. यादविंदर की मौत के बाद तीनों घबरा गए और इस हत्या से बचने के उपाय सोचने लगे.

अंत में तीनों ने मिल कर यादविंदर की हत्या को एक्सीडेंट का रूप देने की योजना बनाई और उस की लाश और मोटरसाइकिल अपनी ट्रौली पर लाद कर नाभा रोड पर चन्नो गांव के पास ला कर सड़क पर फेंक दिया. उस की लाश उधर से गुजरने वाले किसी वाहन से कुचल गई थी. फिर जस्सा ने ही किसी से यादविंदर का एक्सीडेंट होने की सूचना शेर सिंह के पास पहुंचा दी थी.

शेर सिंह चन्नो गांव के करीब गया तो बेटे की लहूलुहान लाश देख कर घबरा गया. फिर वह उसे एंबुलेंस से नाभा अस्पताल ले गया था. जस्सा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने अन्य आरोपी मनदीप सिंह और सुखविंदर उर्फ काला को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों को अदालत में पेश कर उन्हें 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

रिमांड अवधि में उन की निशानदेही पर कुछ सबूत भी हासिल किए. बाद में उन्हें पुन: न्यायालय में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया. पुलिस को यह मामला सुलझाने में भले ही 8 महीने लग गए, लेकिन साजिश का खुलासा कर के आरोपियों को जेल पहुंचा दिया. Suspense Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कल्पना परिवर्तित नाम है.

Crime Stories: बदनामी सह न सकी बदनाम औरत

Crime Stories: फिलिप्स हर उस बदनाम गली और अड्डे पर हो आया था, जहां अकसर जाया करता था.  लेकिन कहीं भी उस का मन घंटे भर तो क्या, पल भर भी बैठने को नहीं हुआ. रंगीनमिजाज फिलिप्स ने किसी एक का हो कर रहना सीखा ही नहीं था. 30 साल का होने के बावजूद उस ने शादी नहीं की थी. शादी की उस ने जरूरत ही नहीं महसूस की, क्योंकि वह 15-16 साल का था, तभी से बदनाम गलियों का चक्कर लगाने लगा था.

सारा दिन वह मेहनत कर के जो भी कमाता था, उस का एक बड़ा हिस्सा बदनाम औरतों के साथ कुछ समय गुजार कर खर्च कर देता था. तभी तो वह हर बदनाम गली की हर बदनाम औरत का नाम ही नहीं, उस के शरीर की नापतौल भी बता सकता था.

फिलिप्स में एक आदत यह थी कि वह जिस औरत के साथ एक बार समय गुजार लेता था, उस के पास दोबारा नहीं जाता था. जब उन गलियों में उसे कोई नई औरत बैठने को नहीं मिली तो वह बीयर बार चला गया.  बीयर बार में शराब के 4-5 बड़े पैग गले से नीचे उतरे तो वहां भी उस का मन नहीं लगा, बल्कि उस की इच्छा और बढ़ गई. वहां की बारगर्ल्स के अधखुले अंगों को देख कर उस का मन और बेचैन हो उठा. मन तो किया, उन्हीं में से किसी को साथ बैठने का औफर दे दे, लेकिन वे ऐसा काम नहीं करती थीं, इसलिए वह उन्हें सिर्फ छू कर रह गया था.

फिलिप्स अभी कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि उस की नजर एक साइबर कैफे पर पड़ी. वह साइबर कैफे में घुस गया और वहां एक कंप्यूटर के सामने जा बैठा. उस ने वहां कालगर्ल्स की साइटें खोल कर खंगालनी शुरू कीं. उस की मेहनत रंग लाई और उस की पसंद की एक कालगर्ल मिल गई.

वह हसीन तो थी ही, उस की अदाएं भी कातिल थीं. उस के शरीर पर 2 ही कपड़े थे, एक ब्रा और दूसरी पैंटी. गोरे रंग पर गुलाबी रंग के ये दोनों कपड़े खूब फब रहे थे. फिलिप्स की नजर स्क्रीन पर उभरे फोटो से हट ही नहीं रही थी. मन कर रहा था, हाथ डाल कर खींच ले. साइट पर दिए विवरण को पढ़ कर फिलिप्स जैसे उस में डूबा जा रहा था. अंत में लिखा था, ‘अगर दीदार करना है तो एक पल का भी इंतजार न करें. तुरंत दिए मोबाइल नंबर पर फोन करें.’

दिए गए मोबाइल नंबर पर फिलिप्स ने फोन किया तो दूसरी ओर से एक मीठी और सैक्सी आवाज आई, ‘‘बहुत देर कर दी, इतनी देर तक क्या सोचते रहे? सोचविचार में कितने हसीन पल गंवा दिए? मेरे बारे में तो सब जान ही लिया है. अब कीमत सुन लो. एक घंटे के मात्र 3 सौ डौलर, ज्यादा नहीं हैं न? जन्नत की सैर के लिए यह रकम कोई ज्यादा नहीं है.’’

‘‘मुझे यह कीमत मंजूर है. तुम कहां मिलोगी?’’ फिलिप्स ने पूछा.

‘‘मेरे यहां ही आ जाओ. पता है—द हाउस विद लाइट्स औन. और हां, अब देर मत करो. मैं इंतजार कर रही हूं.’’

‘‘आप ने अपना नाम तो बताया ही नहीं?’’ फिलिप्स ने पूछा.

‘‘वैसे नाम की क्या जरूरत है. लेकिन आप पूछ रहे हैं तो बता देती हूं, मुझे ब्रांडी कहते हैं.’’ इतना कह कर दूसरी ओर से फोन काट दिया गया.

फिलिप्स तो कब से बेचैन था. पैसे उस की जेब में थे ही, उस ने टैक्सी पकड़ी और द हाउस विद लाइट्स औन पहुंच गया. यह शहर से थोड़ा हट कर एक कम रिहायशी इलाके में बनी आलीशान कोठी थी. सड़क पर ज्यादा भीड़भाड़ भी नहीं थी. कोठी के नीचे जरूर कुछ नौजवान टहल रहे थे.

कोठी नाम के एकदम अनुरूप थी. लाइट हलकी जरूर थी, पर जगमगा रही थी. देख कर यही लग रहा था कि यहां कभी रात होती ही नहीं.  फिलिप्स अंदर घुसते हुए सहमा सा था. वह अंदर पहुंचा तो उस के कानों में मिठास घोलने वाले ये शब्द पड़े, ‘‘लगता है पेनीलोपे, तुम यहां खुश नहीं हो?’’

यही आवाज फिलिप्स ने फोन पर सुनी थी. उस ने खुली खिड़की से अंदर झांका. संगमरमर के फर्श पर संगमरमर सी काया वाली एक लड़की बैठी थी. शायद वही पेनीलोपे थी. उस की बगल में एक औरत और बैठी थी. उसी से फिलिप्स की बात हुई थी. वह ब्रांडी थी. वह पेनीलोपे के गुलाबी गाल पर अंगुलियां फेरते हुए कह रही थी, ‘‘पता नहीं क्यों तुम्हें यहां अच्छा नहीं लग रहा? अरे यहां नएनए आशिक तो आते ही हैं, मोटी कमाई भी होती है.’’

‘‘लेकिन मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘पेनीलोपे! तुम अपनी कीमत समझो? तुम जिस से शादी करोगी, वह भी तुम्हें नोचेगा, खसोटेगा. बदले में क्या देगा, दो जून की रोटी और तन के कपड़े. जबकि यहां जो चाहोगी, वह मिलेगा.’’ ब्रांडी ने कहा.

‘‘तुम बहुत खराब हो मैम.’’ पेनीलोपे शरमाते हुए बोली. शायद उस पर ब्रांडी की बातों का जादू चल गया था.

‘‘वह तो हूं.’’ ब्रांडी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अब देर मत करो, जल्दी से तैयार हो जाओ. लोग आते ही होंगे.’’

ब्रांडी की बात पूरी ही हुई थी कि नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘मैम, फिलिप्स नाम का एक लड़का आप से मिलने आया है.’’

‘‘ठीक है, उसे मेरे कमरे में भेज दो.’’ कह कर ब्रांडी अपने कमरे की ओर बढ़ गई. ब्रांडी का कमरा किसी जन्नत से कम नहीं था. कमरे के बीचोबीच बेड पड़ा था, जो बेहद कीमती था. उस के सिरहाने एक छोटी सी टेबल रखी थी, जिस पर सुगंधित मोमबत्ती जल रही थी. हलका उत्तेजक संगीत बज रहा था. मोमबत्ती की हलकी रोशनी में पारदर्शी गाउन पहने ब्रांडी लेटी थी.

उसे देख कर फिलिप्स की आंखें हैरत से फटी रह गई थीं. उसे ब्रांडी नहीं, जन्नत दिखाई दे रही थी. वह होश खो बैठा. उसे आगे बढ़ने का होश ही नहीं रहा. उसे ठगा सा देख ब्रांडी ने कहा, ‘‘एक घंटे के लिए मैं तुम्हारी हो चुकी हूं, जिस की कीमत तुम अदा कर चुके हो. अब दूर खड़े क्या देख रहे हो, करीब आ जाओ.’’

फिलिप्स जैसे ही बेड के नजदीक पहुंचा, ब्रांडी ने उसे खींच लिया. फिलिप्स बेड पर गिर पड़ा. उसे बांहों में भर कर ब्रांडी ने कहा, ‘‘मेरा नाम ही ब्रांडी नहीं है, मुझ में ब्रांडी जैसा नशा भी है. जहां भी होंठ रखोगे, मदहोश हो जाओगे.’’

फिलिप्स को लगा, उस की खोज पूरी हो चुकी है. वह जिस काम के लिए ब्रांडी के पास आया था, पूरा होने के बाद ब्रांडी ने कहा, ‘‘आप मेरी सेवा से खुश तो हैं?’’

‘‘उम्मीद से ज्यादा.’’ फिलिप्स ने कहा.

‘‘और चुकाई गई कीमत से भी ज्यादा.’’ ब्रांडी ने कहा तो फिलिप्स को हंसी आ गई. उसी के साथ ब्रांडी भी हंसने लगी.

एक कालगर्ल के अड्डे पर दोबारा न जाने वाले फिलिप्स की रातें अब ब्रांडी की कोठी पर बीतने लगीं. इस की वजह यह थी कि उस की यह इच्छा यहीं पूरी हो जाती थी. उसे यहीं रोजरोज नई लड़कियां मिल जाती थीं.

लेकिन एक रात फिलिप्स ब्रांडी की ‘द हाउस विद लाइट्स औन’ कोठी पर पहुंचा तो उसे वहां एक पुलिस जीप खड़ी दिखाई दी. वह काफी देर उस जीप के जाने का इंतजार करता रहा. जब वह काफी देर तक नहीं गई तो वह लौट गया. अगले दिन वह गया तो ब्रांडी ने बताया कि पुलिस उसे पकड़ने आई थी. लेकिन उसे ले जाने के बजाय हुस्न और दौलत ले कर चली गई.

ब्रांडी ने उसे बताया कि जब पुलिस उस के यहां आई तो ब्रांडी और उस के साथ की लड़कियां हाथों में डौलर की गड्डियां लिए उन के सामने आ खड़ी हुईं. उस समय उन के तन पर एक भी कपड़ा नहीं था.

उस हालत में पुलिस वाले अपनी वर्दी का फर्ज और आने का मकसद भूल गए. डौलरों को जेब के हवाले किया और लड़कियों के साथ कमरों में घुस गए. 3-4 घंटे गुजार कर वे जैसे आए थे, उसी तरह खाली हाथ लौट गए. लेकिन उस के कुछ दिनों बाद ही एक बार फिर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. इस बार ब्रांडी की कोई चाल कामयाब नहीं हुई. दरअसल ब्रांडी के खिलाफ काफी शिकायतें हो चुकी थीं. इसलिए यह मामला अंडर कवर डिटेक्टिव एजेंसी के पास पहुंच गया था.

किसी ने फोन द्वारा पुलिस को सूचना दी थी कि शाम ढलते ही जैसे द हाउस विद लाइट्स औन कोठी में लाइट जलती है, बाहर गाडि़यों की लाइन लग जाती है. नएनए लोग गाडि़यों से आते हैं और घंटे-2 घंटे रुक कर चले जाते हैं. उस में रहने वाली ब्रांडी ने एलीक्स 38डी नाम से वेबसाइट बना रखी है. एलीक्स उस का दूसरा नाम है. उस के नाम के साथ जो 38 लगा है, वह उस की ब्रा का साइज है. इस साइट पर कालगर्ल्स की फोटो के साथ उन के साथ रात गुजारने की कीमत भी लिखी है.

उस व्यक्ति के अलावा भी कुछ अन्य लोगों ने शिकायतें की थीं. उन लोगों का भी यही कहना था कि ब्रांडी के यहां गलत काम होता है. उस के यहां तरहतरह के लोग आते हैं. उस की वजह से उन का जीना दूभर हो गया है. क्रिसमस की रात उस के यहां ऐसा जश्न मनाया गया था कि उस की कोठी के आगेपीछे दूरदूर तक पैर रखने की जगह नहीं थी. जश्न शाम से शुरू हुआ था तो सुबह 4 बजे तक चला था.

इस के अलावा एक महिला ने शिकायत की थी कि उस का अय्याश पति ब्रांडी के घर हर रात 3 से 5 सौ डौलर खर्च कर के आता है. घर आ कर कहता है कि उसे जो सुख वहां मिलता है, कहीं और नहीं मिल सकता. कई शिकायतें हो गई थीं, इसलिए पुलिस को सख्त काररवाई करनी पड़ी.

पहले छापे में मिली नाकामी को ध्यान में रख कर इस बार ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारियों की टीम को ब्रांडी के घर भेजा गया था.   छापे में ब्रांडी के अलावा 3 अन्य कालगर्ल्स पकड़ी गई थीं. इन के साथ तमाम आपत्तिजनक सामान भी बरामद किया गया था. पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर ब्रांडी चिल्लाचिल्ला कर कह रही थी, ‘‘न तो मैं कालगर्ल हूं और न ही ऐसा कोई रैकेट चलाती हूं. यह सब मेरे पति ने मुझ से बदला लेने के लिए किया है. मुझे झूठे इलजाम में फंसाया जा रहा है. मैं जेल नहीं जाऊंगी. इस से बेहतर है मैं मर जाऊं.’’

पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी और हथकड़ी पहना दी. अदालत से उसे जेल भेज दिया गया. मगर मानसिक हालत ठीक न होने की वजह से उसे जल्दी ही जमानत मिल गई. जमानत पर छूट कर घर आते ही उस ने जो कहा था, कर दिखाया. उस ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली.

ब्रांडी मर गई, मगर उस की कहानी खत्म नहीं हुई. उस का अतीत वाकई चौंका देने वाला था. उस का असली नाम ब्रिटन था. बचपन से ही वह कुशाग्र बुद्धि थी.

हर कक्षा में अव्वल आने वाली ब्रिटन खेलकूद में भी आगे रहती थी. अखबारों में वह लेख भी लिखती थी. उस ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से जीव विज्ञान और समाज विज्ञान से डिग्री लेने के बाद इलाइट यूनिवर्सिटी से पीएचडी किया था. उस के नाम के साथ डाक्टर जैसा सम्मानित शब्द जुड़ गया तो उसे मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई. तब वह 30 साल की थी.

न जाने क्यों ब्रिटन ने 1999 में यूनिवर्सिटी की नौकरी से इस्तीफा दे दिया. सन 2002 में उस की मुलाकात इसामु तुबीयामी से हुई. यह मुलाकात इंटरनेट के माध्यम से हुई थी. जल्दी ही दोनों एकदूसरे को समझ गए तो प्यार की राह पर चल पड़े. प्यार गहराया तो दोनों ने शादी कर ली. लेकिन उन का दांपत्य सुखी नहीं रहा. इस की वजह यह थी कि इसामु जैसा दिखता था, वैसा था नहीं. वह हिंसक प्रवृत्ति का था.

एकांत के क्षणों में इसामु ब्रिटन को तरहतरह की यातनाएं दे कर अपनी विकृत यौन कुंठा को संतुष्ट करता था. यही नहीं, उसे मारतापीटता भी था. उस की इन्हीं हरकतों से तंग आ कर शादी के मात्र 6 महीने बाद ही ब्रिटन ने उस से तलाक ले लिया.

उस समय ब्रिटन के पास कोई नौकरी नहीं थी. आमदनी का कोई जरिया न होने की वजह से किसी की सलाह पर उस ने कालगर्ल का धंधा अपना लिया. पहले ही दिन एक ही ग्राहक से उसे इतनी कमाई हो गई कि वह उतना पूरे महीने बच्चों को पढ़ा कर नहीं कमा पाती थी.  ब्रिटन को अच्छी कमाई के साथ देह की संतुष्टि का यह पेशा इतना अच्छा लगा कि वह पूरी तरह से इस धंधे से जुड़ गई. उस ने अपने अलगअलग नाम रख लिए. कहीं वह ब्रांडी होती थी तो कहीं एलीक्स.

यही नहीं, वह जहां कालगर्ल रैकेट चलाने वाली एक कुख्यात मैडम रिंग से जुड़ी थी, वहीं उस ने अपनी वेबसाइट भी बना डाली. जिस का नाम रखा— एलीक्स 38डी. इस से उस का धंधा इतना चमका कि उस ने एक आलीशान कोठी खरीद ली. जरूरतमंद लड़कियों को सब्जबाग दिखा कर देह के धंधे से खूब दौलत बटोरने लगी. वह आम लोगों की ही नहीं, कई नामीगिरामी राजनैतिक हस्तियों की भी रातें रंगीन करती थी.

ब्रिटन उर्फ ब्रांडी भले ही गलत काम कर रही थी, लेकिन वह बेहद भावुक थी. यही वजह थी कि धंधे का खुलासा होने और पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर उस ने आत्मग्लानि के चलते आत्महत्या कर ली थी.   ब्रिटन द्वारा आत्महत्या करने पर उसी रैकेट की डी.सी. मैडम ने कहा था कि उस ने कायरतापूर्ण कदम उठाया है.  संयोग देखो, आगे चल कर डी.सी. मैडम को भी यही कदम उठाना पड़ा.

डी.सी. मैडम का पूरा नाम था डीबोराह जीन पालफ्रे. वह देह के धंधे की कुख्यात और मास्टरमाइंड खिलाड़ी थी. जवानी में डीबोराह ने अपनी खूबसूरत देह से अकूत दौलत कमाई थी. तब वह कई बार पकड़ी भी गई थी.

लेकिन जब जवानी ढल गई तो उस के ग्राहकों की संख्या एकदम से घट गई. इस के बाद उस ने ‘पामेला मार्टिन ऐंड एसोसिएट्स’ नाम की एक एस्कार्ट एजेंसी खोल ली. उस की इस एजेंसी में ऐसी तमाम जवान खूबसूरत लड़कियां थीं, जो मजबूरी की मारी थीं या फिर ऐश की जिंदगी जीने के लिए कुछ भी करने को तैयार थीं.

रैकेट में वह डी.सी. मैडम के नाम से प्रसिद्ध थी. उन्हीं लड़कियों की बदौलत उस ने अपनी पहुंच ऊपर तक बना ली थी. राजनैतिक गलियारों में भी उस के नाम की धमक थी. कई राजनीतिज्ञ अपनी रात रंगीन करने के लिए उस की सेवा लिया करते थे. वह उन के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी दिखाई देने लगी थी, जिस से उस का धंधा और चमक उठा था.

58 वर्षीया डी.सी. मैडम सालों तक देह का अपना यह धंधा इन्हीं पहुंच के दम पर चलाती रही. लेकिन जब भारी दबाव पड़ा तो 15 अप्रैल, 2008 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

उस की गिरफ्तारी के बाद पता चला कि 24 जुलाई, 2007 को उस ने वाशिंगटन पौलीटिकल ग्रुप के सीनेटर डेविड विट्टर के लिए अपने रैकेट की एक कालगर्ल भेजी थी, जबकि अदालत में सुनवाई के दौरान वह चीखचीख कर कह रही थी, ‘‘मुझ पर देह व्यापार का इलजाम लगाना गलत है. किसी ने दुश्मनी की वजह से मुझे फंसाया है.’’

लेकिन उस की यह आवाज सुबूतों के बोझ तले दब कर रह गई थी. उस पर यह भी आरोप था कि 15 अप्रैल, 2008 को उस ने एक मेल के जरिए अपने इस काले धंधे के काले धन को अवैध रूप से विदेशी बैंक में जमा कराया था. तब उस ने सफाई में कहा था कि अब तक वह शरम के मारे चुप थी, लेकिन अब खुल कर बोलेगी. वह उन राजनीतिज्ञों के नाम उजागर करेगी, जिन की उस ने रातें रंगीन कराई थीं.

उसी के जुबान खोलने पर सीनेटर विट्टर को अदालत में तलब किया गया था. उस ने विटनेस बौक्स में खड़े हो कर स्वीकार किया कि डी.सी. मैडम कालगर्ल रैकेट चलाती थी और उस ने उस के रैकेट की एक कालगर्ल के साथ एक रात बिताई थी.

इस के बाद डी.सी. मैडम कुछ बोल नहीं सकी, क्योंकि सुबूत सामने था. लेकिन इस के बावजूद भी वह यही कहती रही, ‘‘यह झूठ है. मैं ने कितने भी जुर्म किए हों, पर मैं जेल में कदम नहीं रखूंगी.’’

और वाकई उस ने जेल में कदम नहीं रखा. 1 मई, 2008 को वह अपनी 76 वर्षीया मां बलान्ये पालफ्रे से मिलने गई तो वहां से जिंदा नहीं लौटी. उस का परिवार टारपोन स्प्रिंग्स, फ्लोरिडा के जिस मोबाइल होम में रहता था, पुलिस को उस से उस का शव मिला था. उस ने नायलौन की रस्सी का फंदा गले में डाल कर आत्महत्या कर ली थी.

पहले प्रोफेसर ब्रिटन और अब डी.सी. मैडम द्वारा आत्महत्या कर लेने के बाद वाशिंगटन की राजनीतिक हस्तियों ने राहत की सांस ली. क्योंकि वे जिंदा रहतीं तो उन के नाम उजागर कर सकती थीं, जो अपनी रातें रंगीन करने के लिए उन की सहायता लिया करते थे. Crime Stories

Crime Story: क्रूरता की इंतिहा

Crime Story: जमाना कितना भी आगे बढ़ गया हो, देश में कितना ही तकनीकि विकास हो गया हो, लोग चाहे कितने ही शिक्षित बन गए हों पर कुछ लोग अपनी मानसिकता से अंधविश्वासी बने हुए हैं. इसीलिए गलीनुक्कड़ पर दुकान जमाए बैठे नीमहकीम, मुल्लामौलवी और तांत्रिक उन्हें अब भी चंद पैसों के लिए अपने जाल में फंसा ही लेते हैं.

ये लोग अंधविश्वासी लोगों का न केवल शोषण करते हैं बल्कि कभीकभी उन के हाथों ऐसा अपराध करवा देते हैं, जिस की वजह से उन्हें अपनी सारी जिंदगी सलाखों के पीछे काटनी पड़ती है. हाल ही में पंजाब की एक महिला तांत्रिक ने एक महिला को अपने सम्मोहन के जाल में फांस कर ऐसा जघन्य अपराध करा दिया, जिसे सुन कर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं.

पंजाब में थाना सदर बटाला के अंतर्गत एक गांव है काला नंगल. 32 वर्षीय बलविंदर सिंह उर्फ बिंदर अपनी 27 वर्षीय पत्नी जसबीर कौर के साथ इसी गांव में रहता था. वैसे बलविंदर सिंह मूलरूप से अमृतसर के गांव अकालगढ़ दपिया का निवासी था. लेकिन अपनी शादी के बाद वह अपनी पत्नी को साथ ले कर अपनी ननिहाल काला नंगल में रहने लगा था.

इस गांव में उस के नाना गुरनाम सिंह, मामा संतोख सिंह और बड़ा मामा जगतार सिंह रहते थे. उस के ननिहाल वाले कोई अमीर आदमी नहीं थे. बस मेहनतमजदूरी कर अपना परिवार चलाने वाले लोग थे. बिंदर भी उन के साथ खेतों में मेहनतमजदूरी करने लगा. बिंदर के मामा के साथ उन की पत्नियां भी खेतों में काम करने जाया करती थीं. ताकि घर में ज्यादा पैसे आए. उन के देखादेखी बिंदर की पत्नी भी उन के साथ काम करने जाती थी.

बिंदर के पड़ोस में पूर्ण सिंह का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी जोगिंदर कौर के अलावा बेटा हरप्रीत सिंह, उस की पत्नी रविंदर कौर, बेटी नीतू अमन और राजिंदर कौर थीं. हालांकि नीतू और राजिंदर कौर दोनों ही शादीशुदा थीं पर वह अधिकतर अपने मायके में ही डेरा जमाए रहती थीं. ये सब लोग उन्हीं के खेतों के साथ वाले खेत में काम करते थे, जिस में बिंदर और उस के मामामामी काम किया करते थे, यह भी कहा जा सकता है कि ये दोनों परिवार साथसाथ काम करते थे.

27 अप्रैल, 2019 की बात है. सुबह के लगभग 11 बजे का समय था. कुछ लोग उस समय खेतों में काम पर लगे हुए थे तो कुछ लोग पेड़ों के नीचे बैठे सुस्ता रहे थे.

बिंदर का मामा संतोख सिंह, उस की पत्नी कंवलजीत कौर, मामा जगतार सिंह और बिंदर की पत्नी जसबीर कौर साथ बैठे इधरउधर की बातें कर रहे थे कि उन के बीच बैठी जसबीर कौर अचानक गायब हो गई.

उन लोगों ने सोचा शायद वह लघुशंका के लिए गई होगी और किसी ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया. सब अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए थे. शाम के 5 बजे यानी छुट्टी का समय हो गया पर तब तक जसबीर कौर किसी को दिखाई नहीं दी. अब पूरे परिवार को चिंता ने घेर लिया कि आखिर सब के बीच जसबीर कहां गायब हो गई. जसबीर कौर इन दिनों गर्भवती थी. उसे सातवां महीना चल रहा था.

सब ने मिल कर सोचा कि कहीं तबीयत खराब होने के कारण वह घर तो नहीं चली गई. घर पहुंचने पर पता चला कि वह वहां भी नहीं थी. उसे फिर पूरे गांव में ढूंढा गया पर उस का कहीं पता नहीं चला.

जसबीर के मायके और अन्य रिश्तेदारियों में भी उसे तलाशा गया. कुल मिला कर रातभर की खोज के बाद भी जसबीर का कहीं सुराग नहीं लगा. अगली सुबह 28 अप्रैल को सब लोगों ने थाना सदर बटाला जा कर जसबीर कौर के रहस्यमय तरीके से लापता होने की सूचना दी. पुलिस ने जसबीर कौर का फोटो ले कर उस की तलाश शुरू कर दी.

जसबीर कौर के लापता होने की वजह किसी की समझ में नहीं आ रही थी, क्योंकि न तो वो पैसे वाले लोग थे जो कोई फिरौती के लिए उस का अपहरण करता और न ही जसबीर कौर चालू किस्म की औरत थी. वह बेहद शरीफ औरत थी.

सरपंच परजिंदर सिंह और साबका सरपंच नवदीप सिंह भी यही सोचसोच कर हैरान थे. पुलिस और बिंदर के परिजन अपनेअपने तरीके से जसबीर की तलाश में जुटे  थे. इसी दौरान किसी ने सरपंच नवदीप सिंह और बिंदर को बताया कि जसबीर के गायब होने वाले दिन यानी 27 अप्रैल को उसे पूर्ण सिंह की पत्नी जोगिंदर कौर और पड़ोसन राजिंदर कौर के साथ उन के घर की तरफ जाते देखा गया था.

इस बात का पता चलते ही सरपंच नवदीप सिंह कुछ गांव वालों के साथ पूर्ण सिंह के घर पहुंचे और जसबीर के बारे में पूछा.

उस समय घर पर पूर्ण सिंह, उस की पत्नी जोगिंदर कौर, बेटा गुरप्रीत, उस की बहू रविंदर कौर और दोनों बेटियां नीतू व राजिंदर कौर मौजूद थीं. उन्होंने बताया कि जसबीर कौर दोपहर को उन के घर आई तो जरूर थी पर 3 बजे वापस अपने घर चली गई थी. जसबीर कौर का पता लगने की जो आशा दिखाई दे रही थी वह जोगिंदर कौर के बताने से बुझ गई थी.

जसबीर की तलाश फिर से शुरू की गई. पर न जाने क्यों सरपंच नवदीप को ऐसा लगने लगा कि जसबीर के गायब होने का राज पूर्ण सिंह और उस का परिवार जानता है. यही बात बिंदर और उस के दोनों मामाओं को भी खटक रही थी. आखिर 29 अप्रैल, 2019 को शाम को सरपंच नवदीप और परजिंदर  के साथ पूरे गांव ने पूर्ण सिंह के घर पर धावा बोल दिया.

उन्होंने उस के घर के चप्पेचप्पे की तलाशी लेनी शुरू कर दी. उन्हें घर में एक जगह बड़ा संदूक दिखाई दिया. वह संदूक कमरों के पीछे पशुओं के बाड़े के पास पड़ा था. संदूक पर मक्खियां भिनभिना रही थीं और उस में से अजीब सी दुर्गंध आ रही थी.

सरपंच नवदीप ने बढ़ कर जब उस संदूक को खोल कर देखा तो उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. संदूक में जसबीर कौर की लाश थी जो जगहजगह से कटी हुई थी. थोड़ी ही देर में यह खबर गांव भर में फैल गई. पूरा गांव पूर्ण सिंह के घर की ओर दौड़ने लगा.

बिंदर ने सरपंच नवदीप सिंह के साथ थाना बटाला जा कर इस की सूचना एसएचओ हरसंदीप सिंह को दी. एसएचओ तुरंत एएसआई बलविंदर सिंह, सितरमान सिंह, लेडी एएसआई अंजू बाला, लेडी हवलदार जसविंदर कौर, बलजीत कौर, हवलदार दिलबाग, सुखजीत सिंह, लखविंदर सिंह, सिपाही जगदीप सिंह और सुखदेव सिंह को साथ ले कर पूर्ण सिंह के घर पहुंच गए.

मौके पर पहुंच कर पुलिस ने सब से पहले जसबीर कौर की लाश अपने कब्जे में ली. इस के बाद पूर्ण सिंह उस की पत्नी जोगिंदर कौर, बेटे की पत्नी रविंदर कौर तथा एक महिला तांत्रिक जगदीशो उर्फ दीशो को गिरफ्तार कर लिया.

इस हत्याकांड से जुड़े अन्य 3 आरोपी नीतू, अमन और राजिंदर कौर फरार होेने में कामयाब हो गए थे. एसएचओ हरसंदीप सिंह ने एसपी बटाला एच.एस. हीर, डीएसपी बलबीर सिंह को भी घटना की सूचना दे दी थी.

कुछ देर में दोनों पुलिस अधिकारी क्राइम टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. मृतका जसबीर कौर का पेट चीरा हुआ था. वह 7 महीने की गर्भवती थी. पुलिस ने जब लाश बरामद की तो उस के पेट से बच्चा गायब था.

इस बारे में पुलिस के साथ आरोपियों से पूछताछ की गई तो प्रथम पूछताछ में ही रविंदर कौर ने अपना अपराध स्वीकर कर लिया. उस ने बताया कि उस के परिवार के लोगों ने मृतका का पेट चीर कर उस के गर्भ से बच्चा निकाला था. इन लोगों ने गर्भवती महिला के पेट को चीर कर गर्भ से बच्चा निकालने की जो कहानी बताई वह वास्तव में रोंगटे खडे़ कर देने वाली निकली.

इस कहानी की मुख्य अभियुक्ता रविंदर कौर की शादी लगभग 12 साल पहले हुई थी. उस के 4 बच्चे थे. रविंदर कौर बचपन से ही आजादखयाल की महत्त्वाकांक्षी औरत थी. वह अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीना चाहती थी. उसे अपने ऊपर किसी भी तरह की बंदिश पसंद नहीं थी.

अपने स्वार्थपूर्ति के लिए रिश्ते बदलना, बनाना उस का मनपसंद खेल था. करीब 6 साल पहले जब उस की आंख पूर्ण सिंह के बेटे हरप्रीत सिंह के साथ लड़ीं तो वह अपने चारों बच्चों सहित अपने पुराने पति को अलविदा कह कर हरप्रीत सिंह की पत्नी बन उस के घर आ गई थी.

अब इसे रविंदर की बदकिस्मती कहें या उस की ढलती उम्र समझें अथवा नए पति हरप्रीत सिंह की शारीरिक कमी. बात कुछ भी रही हो पर हरप्रीत के साथ शादी के 5 साल बीत जाने के बाद भी वह उस के बच्चे की मां नहीं बन पाई थी. बच्चा न जनने के कारण उस की सास जोगिंदर कौर हर समय उसे कोसती रहती और ताने देती थी. जिस कारण रविंदर कौर बड़ी परेशान थी.

एक बार उस की एक खास सहेली ने उसे बताया कि पास के गांव में जगदीशो उर्फ दीशो नाम की महिला तांत्रिक रहती है, जिस के आशीर्वाद से कई बांझ औरतों की गोद हरी हुई है. तुम उस के पास चलो.

सहेली के कहने पर रविंदर कौर तांत्रिक दीशो से मिली. दीशो कुछ टाइम तक अपनी ढोंग विद्या से उस से पैसे ऐंठ कर उल्लू बनाती रही. अंत में उस ने स्पष्ट कह दिया ‘‘रविंदर तुम्हारी कोख पर ऐसे जिन्न का साया है जो अब कभी तुम्हें मां नहीं बनने देगा. हां एक तरीका है अगर तुम उसे कर सको तो मैं तुम्हें बताऊं?’’

‘‘मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’ रविंदर कौर बोली.

‘‘तो सुनो, अपने अड़ोसपड़ोस में कोई ऐसी औरत तलाश करो जो गर्भवती हो और तुम अभी कुछ दिन अपने घर से बाहर मत निकलना. अपने बारे में यह बात भी फैला दो कि तुम गर्भ से हो. इस के बाद क्या करना है यह मैं तुम्हें बाद में बताऊंगी.’’ दीशो ने सलाह दी.

दीशो के कहने पर रविंदर कौर ने वैसा ही किया. साथ ही यह बात अपनी सास और ननदों को भी बता दी. उन्हीं दिनों जसबीर कौर गर्भवती थी. यह बात रविंदर कौर ने तांत्रिक दीशो को बता दी. दीशो ने फिर एक भयानक योजना बनाई.

घटना वाले दिन रविंदर कौर पड़ोस के खेतों में काम कर रही जसबीर को इशारे से बुला कर वह उसे अपने घर ले गई. उस ने जसबीर को बताया था कि एक बड़ी देवी उन के घर आई हुई है. वह उस से आशीर्वाद ले ले ताकि उस का बच्चा सहीसलामत पैदा हो.

जसबीर नीयत की साफ थी और भोली भी. रविंदर कौर की बातों को वह समझ नहीं पाई और उस के घर चली गई. वहां पहले से ही रविंदर कौर के परिवार के सब लोग मौजूद थे. सो समय व्यर्थ न करते हुए सब ने किसी तरह जसबीर को अपने कब्जे में ले कर दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

दम घुटते ही जसबीर एक ओर लुढ़क गई. वह मर चुकी थी. तभी तांत्रिक दीशो ने अपने साथ लाए सर्जिकल ब्लेड से उस का पेट चीर कर पेट का शिशु बाहर निकाल लिया. शिशु को गोद में ले कर जब देखा तो पता चला कि जसबीर कौर के साथसाथ वह भी मर चुका है. मां और बच्चे की मौत के बाद उन सब के हाथपैर फूल गए.

अब क्या किया जाए? सब के सामने अब यही एक प्रश्न था. काफी सोचविचार के बाद तय किया गया कि शिशु के शव को घर में बनी सीढि़यों के नीचे गाड़ दिया जाए और जसबीर की लाश कमरे के बाहर रखे संदूक में छिपा दिया जाए.

बाद में मौका मिलने पर जसबीर की लाश के टुकड़े कर नहर में बहा देंगे. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं लगेगी कि जसबीर कहां गई. बाद में यह अफवाह फैला देंगे कि वह अपने किसी यार के साथ भाग गई होगी.

एसएचओ हरसंदीप सिंह ने भादंवि की धारा 302, 313, 316, 201 और 120 बी के तहत पूर्ण सिंह, जोगिंदर कौर, रविंदर कौर, गुरप्रीत सिंह, नीतू, अमन और राजिंदर कौर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर चारों अभियुक्तों पूर्ण सिंह, उस की पत्नी जोगिंदर कौर, बेटे की पत्नी रविंदर कौर और महिला तांत्रिक जगदीशो उर्फ दीशो को गिरफ्तार कर पहली मई को अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान इस हत्याकांड की मुख्य आरोपी रविंदर कौर की निशानदेही पर ड्यूटी मजिस्ट्रैट अजय पाल सिंह और नायब तहसीलदार तथा पुलिस के उच्च अधिकारियों व गांव वालों की मौजूदगी में उन के घर में सीढि़यों के नीचे दफनाए गए मृतका जसबीर के शिशु को जमीन खोद कर बाहर निकला. फिर मांबेटे का शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवाया गया. अन्य 3 दोषियों की निशानदेही पर घर से खून सने कपडे़ और सर्जिकल ब्लेड बरामद कर लिया गया.

बहरहाल जो 4 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, उन्हें सीखचों के पीछे से बाहर आने का मौका कब मिलेगा, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. वह बाहर आ पाएंगे या नहीं, किसी को पता नहीं है. अदालत से उन्हें कितनी सजा मिलती है, यह भी अभी भविष्य के गर्भ में है.

लेकिन इतना तय है कि समाज में अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरे तक जमी हुई हैं. ये जड़ें कैसे और कब उखड़ सकेंगी, कोई नहीं जानता. Crime Story

Suspense Story: परफेक्ट मर्डर

Suspense Story: संविधा कोई साधारण नहीं, बल्कि खूबसूरती की ऐसी मूरत थी कि जो भी उसे देखता तो देखता ही रह जाता था. इस के विपरीत उस ने शादी कुरूप युवक हेमंत जोशी से की थी. दोनों की गृहस्थी हंसीखुशी से चल रही थी कि इसी बीच उन्हीं की सोसायटी में रहने वाले शरद दीवान नाम के व्यक्ति ने संविधा का परफेक्ट तरीके से मर्डर कर दिया. कौन था शरद दीवान और उस ने खूबसूरत अप्सरा संविधा का मर्डर क्यों किया?

अहमदाबाद के थाना नरोडा में तब सन्नाटा सा पसर गया, जब हेमंत जोशी ने एसआई हर्षद जाडेजा के सामने चीखते हुए कहा, ”मैं कल दोपहर से इस थाने के चक्कर काट रहा हूं, एक आप हैं कि मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दे रहे. कल सुबह से लापता हुई मेरी पत्नी आज तक नहीं लौटी. प्लीज साहब, कम से कम आप मेरी बात सुन तो लीजिए.’’

थाने में हेमंत की बात कोई सुनने के बजाय पुलिसकर्मी उस का मजाक उड़ा रहे थे. हेमंत ने एक बार फिर विनती करते हुए कहा, ”प्लीज सर, मैं आप से हाथ जोड़ कर रिक्वेस्ट कर रहा हूं. संविधा का पता लगा दीजिए. कहीं वह किसी मुसीबत में न हो?’’

”देखो भाई, पहली बात तो यह है कि अभी तुम्हारी पत्नी को घर से गए 24 घंटे भी नहीं हुए हैं. 24 घंटे पूरे होने के बाद ही हम तुम्हारी रिपोर्ट दर्ज कर के उस की तलाश शुरू करेंगे. कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी पत्नी तुम से परेशान हो कर किसी के साथ भाग गई हो.’’ एसआई हर्षद जाडेजा ने हैडकांस्टेबल जिग्नेश पटेल की ओर देखते हुए कहा.

”सर, मैं एक बार आप से फिर कह रहा हूं, संविधा मेरे साथ बहुत खुश थी. हम दोनों में आज तक कभी कोई झगड़ा तक नहीं हुआ. ऐसे में वह मुझ से परेशान हो कर किसी के साथ क्यों भागेगी.’’ हेमंत हाथ जोड़ कर थोड़ी ऊंची आवाज में बोला.

”इतनी ऊंची आवाज में क्यों बोल रहा है भाई?’’ थोड़ी दूर पर बैठे एक सिपाही ने कहा.

”सौरी सर, आप लोग वह काम कीजिए, जिस काम के लिए मैं आया हूं. आप लोग हमारे व्यक्तिगत जीवन को बीच में क्यों ला रहे हैं?’’ हेमंत ने कहा.

”ऐसे मामलों में ऐसा ही होता है, जब दोनों में से कोई एक घर छोड़ कर चला जाता है. तुम खुद को देखो और अपनी पत्नी को देखो. ऐसे में वह भागेगी नहीं तो और क्या करेगी.’’ एसआई जाडेजा ने हंसते हुए कहा.

”अगर ऐसी कोई बात होती तो पहली बात तो वह मुझ से शादी ही न करती. फिर किसी कारणवश कर भी लेती तो पहले ही छोड़ कर चली गई होती. अब तो 2 बच्चे भी हो गए हैं.’’ हेमंत जोशी ने कहा.

”थोड़ी देर से अक्ल आई होगी. सर, मेरी तो समझ में यही नहीं आ रहा है कि इतनी खूबसूरत औरत ने 10 साल इस तरह की शक्लसूरत वाले आदमी के साथ कैसे बिता दिए.’’  कह कर हैडकांस्टेबल जोर से हंसा.

”तब न सही, अब मिल गया होगा बेचारी को उसे वह सुख देने लायक होगा, जो पति नहीं दे सका. इसलिए भाग गई.’’ एसआई जाडेजा ने कहा तो हेमंत को इन पुलिस वालों पर गुस्सा तो बहुत आया, पर वह मजबूर था. घर पर उस के 2 छोटेछोटे बच्चे इंतजार कर रहे थे.

वह तेजी से पलटा और दरवाजे की ओर बढ़ा. तभी एसएचओ मनोहर सिंह झाला ने थाने में प्रवेश किया. हेमंत के चेहरे को ही देख कर उन्होंने भांप लिया था कि इस आदमी के साथ कुछ गड़बड़ है. हेमंत को पीछे आने का इशारा कर वह अपने चैंबर की ओर बढ़े. एसएचओ को देख कर पूरे स्टाफ ने उन्हें सैल्यूट किया. अंदर अपनी कुरसी पर बैठ कर एसएचओ मनोहर सिंह ने हेमंत को सामने पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ”कहिए, क्या बात है? आप काफी परेशान लग रहे हैं?’’

”जी सर, मेरी वाइफ कल दोपहर को घर से निकली है तो अभी तक लौट कर नहीं आई है. थाने में गुमशुदगी तो दर्ज कर ली गई है, पर कोई काररवाई नहीं हो रही है. सभी कह रहे हैं कि जो कुछ भी होगा 24 घंटे बाद ही होगा. सर, उसे तलाशने के बजाय यहां पर सभी मेरा और मेरी पत्नी का मजाक ऊपर से उड़ा रहे हैं.’’ बड़ी विनम्रता से हेमंत ने कहा.

”आप का नाम?’’ एसएचओ ने पूछा.

”हेमंत जोशी.’’

”रहते कहां हो?’’

”सर, हरियाली सोसायटी में.’’

”करते क्या हो?’’

”जी, एक मशीन बनाने वाली कंपनी में सुपरवाइजर हूं.’’

”रिपोर्ट तो दर्ज हो ही चुकी है. ऐसा करो, अपनी पत्नी की एक फोटो दे दो. मैं देखता हूं, क्या हो सकता है.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

”सर, एक फोटो मैं दरोगाजी को दे चुका हूं,’’ उस ने शर्ट की जेब से पत्नी की एक फोटो निकाल कर एसएचओ को भी दी.

पलभर वह उस फोटो को देखते ही रह गए. फिर उन्होंने पूछा, ”यह तुम्हारी पत्नी की ही फोटो है?’’

”सर, कहीं आप भी तो वही नहीं सोच रहे हैं, जो बाकी लोग सोच रहे हैं कि इस लंगूर के हाथ यह हूर की परी कैसे लग गई.’’ हेमंत ने कहा.

”बात तो तुम ने सही कही, पर मैं ने अभी तक तो यह नहीं सोचा. फिर भी वाकई तुम्हारी पत्नी बहुत सुंदर है. इस के साथ कुछ भी हो सकता है. बहरहाल, मुझ से जो भी हो सकेगा, मैं वह करूंगा. पूरी कोशिश करूंगा कि तुम्हारी पत्नी तुम्हें मिल जाए.’’ कह कर एसएचओ ने हेमंत की पत्नी की फोटो अपने मोबाइल से खींच ली.

हेमंत उठने लगा तो उन्होंने कहा, ”अपना और अपनी पत्नी का मोबाइल नंबर तो लिखवा दो. तुम्हारी पत्नी तो अपना मोबाइल ले कर गई होगी.’’

”जी नहीं, वह अपना मोबाइल फोन घर पर ही छोड़ गई है.’’ कह कर हेमंत ने अपना और संविधा का मोबाइल नंबर एसएचओ को लिखवा दिया. उस के बाद वह उन से अनुमति ले कर बाइक से घर की ओर चल पड़ा.

रास्ते में आते हुए उस के दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगीं. पौलीटेक्निक करने के बाद हेमंत जोशी को एक मशीन बनाने वाली कंपनी में नौकरी मिल गई तो उस के लिए रिश्ते आने लगे थे. वैसे तो उस के पास सब कुछ था, पर उस की शक्लसूरत ऐसी थी कि जल्दी कोई उसे पसंद ही नहीं करता था. पर संयोग से हेमंत को ऐसी खूबसूरत पत्नी मिली कि देखने वाले दांतों तले अंगुली दबा लेते थे. उसे शादी वाला दिन याद आ गया था. जब संविधा को देख कर उस के दोस्त हैरान रह गए थे. उस के दोस्तों ने उसे ताना मारते हुए कहा भी था कि उस की तो लौटरी लग गई. कहां कोई लड़की उसे पसंद ही नहीं कर रही थी और अब लंगूर के हाथ हूर की परी लग गई.

तभी संजय ने कहा, ”कुछ तो गड़बड़ है, तभी तो इतनी सुंदर भाभीजी ने इस लंगूर को गले लगाया है.’’

यह सुन कर हेमंत का खून खौल उठा था, क्योंकि उस ने सीधे उस की पत्नी पर लांछन लगाया था. हेमंत उठ कर संजय का कौलर पकडऩा चाहता था. पर संविधा ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ”छोडि़ए न, जिसे जो कहना है, कहने दीजिए. आप शांति से बैठिए.’’

संविधा के यह कहने पर हेमंत शांति से बैठ गया था. सुहागरात को जब हेमंत कमरे में आया तो उस के दिमाग में दोस्तों द्वारा कही बातें गूंज रही थीं. कमरे में आ कर वह संविधा के पास पलंग पर बैठने के बजाय खिड़की के पास जा कर खड़ा हो गया. उस के इस व्यवहार से संविधा घबरा गई. पलंग से उठ कर वह उस के पास जा कर बोली, ”क्या बात है, आप ठीक तो हैं न? मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’’

पलट कर हेमंत ने संविधा की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ”संविधा, अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?’’

संविधा ने मुसकराते हुए कहा, ”भला आप की बात का क्यों बुरा मानूंगी. आप को जो पूछना हो, पूछिए.’’

”आप इतनी खूबसूरत हैं. आप को तो कोई भी हैंडसम लड़का मिल सकता था. फिर आप ने मुझ से क्यों शादी की?’’

”आप हैंडसम नहीं हैं क्या?’’ हेमंत के करीब आ कर संविधा ने कहा.

”संविधा, मैं ने जो पूछा है, यह उस का जवाब नहीं है.’’

”खूबसूरती की परिभाषा सभी की अलगअलग होती है. कुछ लोगों को शरीर की खूबसूरती पसंद होती है तो कुछ लोग मन की खूबसूरती देखते हैं. मन की खूबसूरती ही, असली खूबसूरती है. शरीर की खूबसूरती तो सिर्फ देखने के लिए होती है. आप का मन खूबसूरत है, इसलिए मैं ने आप को चुना.

”पिछले साल आप ने अपनी बुआ की बेटी की शादी में जिस तरह मदद की थी, उस के बारे में जान कर लगा कि आप मन से बहुत दयालु हैं. इसलिए जब आप की बुआ ने आप के रिश्ते की बात की तो मैं मना नहीं कर सकी. क्योंकि आप जैसा सुलझा और समझदार पति जिसे मिल जाए, वह भाग्यशाली ही होगा.’’ संविधा बोली.

हेमंत ने गौर से संविधा को देखते हुए पूछा, ”आप पर किसी तरह का दबाव या मजबूरी तो नहीं थी न?’’

”दबाव था तो नहीं, पर अब है कि जिस का मन इतना खूबसूरत है, उस का प्यार करने का अंदाज कितना खूबसूरत है.’’ संविधा ने प्यार से मुसकराते हुए कहा.

हेमंत ने मुसकराते हुए संविधा को सीने से लगा लिया और फिर दोनों एकदूसरे में समा गए.

संविधा ने जैसे हेमंत की जिंदगी ही बदल दी थी. उस के प्यार ने हेमंत को जैसे एक नई दिशा दी थी. हेमंत जो अपनी शक्लसूरत की वजह से लोगों के बीच जाने से बचता था, अब वह बेझिझक लोगों के बीच आताजाता था. हालांकि उस की हंसी उड़ाने वाले अभी मौका नहीं छोड़ते थे. इस की सब से बड़ी वजह थी संविधा की खूबसूरती, जो उस के जाननेपहचानने वालों को अभी भी नहीं पच रही थी. पर अब इस बात को ले कर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.

समय के साथ उस के घर 2 बच्चे पैदा हुए, बड़ी बेटी निकिता और छोटा बेटा नीतेश. दोनों ही बच्चे अपनी मम्मी पर गए थे, इसलिए वही नहीं, पूरा परिवार खुश था कि अच्छा हुआ कोई बच्चा हेमंत को नहीं पड़ा. दुनिया कुछ भी कहती रही हो, पर संविधा की समझदारी की वजह से सब बढिय़ा चल रहा था. आज भी लोग हेमंत को उस की पत्नी की खूबसूरती को ले कर ताने मारते थे और मजाक उड़ाते थे, पर अब वह खुश रहता था. किसी की बात को दिल पर नहीं लेता था.

पर उस की इस खुशी को न जाने किस की नजर लग गई. एक दिन संविधा घर से तैयार हो कर निकली तो लौट कर नहीं आई. दोपहर से ही हेमंत ने उस की तलाश शुरू कर दी, पर कहीं कोई पता नहीं चला. हेमंत ने तुरंत थाने जा कर उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा दी थी कि पुलिस भी उस की तलाश में लग जाएगी तो जल्दी उस का पता चल जाएगा. उसे चिंता थी कि संविधा किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गई है, क्योंकि समय बहुत खराब चल रहा है.

अब तक हेमंत घर पहुंच गया था. दोनों बच्चे उसी का इंतजार कर रहे थे. पत्नी के गायब होने के बाद उस ने पेरेंट्स को भी फोन कर के बुला लिया था. दूसरी ओर इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला ने संविधा की गुमशुदगी को गंभीरता से लिया था. उन्होंने अपने स्टाफ के उन लोगों को खूब खरीखोटी सुनाई थी, जिन्होंने हेमंत की हंसी उड़ाई थी. औफिस का काम निपटा कर वह महिला सिपाही जयंती मेहता को साथ ले कर संविधा की गुमशुदगी वाले मामले की जांच के लिए निकल पड़े थे.

जब वह कृष्णानगर स्थित हरियाली सोसायटी के गेट पर पहुंचे तो गेट के बगल में स्थित किराने की दुकान के सामने गाड़ी रोक दी. गाड़ी से उतर कर वह जयंती के साथ किराने की दुकान पर पहुंचे तो पुलिस वालों को देख कर दुकानदार थोड़ा घबरा गया. इंसपेक्टर झाला ने मोबाइल में संविधा का फोटो दिखाते हुए पूछा, ”इन्हें पहचानते हो?’’

”जी सर, यह इसी सोसायटी में रहने वाली संविधा मैडम हैं. हेमंत जोशी की पत्नी.’’

”इन्हें आखिरी बार कब देखा था?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

दुकानदार पहले ही घबराया था. इस सवाल पर वह डर गया. माथे पर आए पसीने को पोंछते हुए उस ने कहा, ”परसों सुबह, मैडम दुकान पर सामान लेने आई थीं.’’

”कितने बजे आई थी?’’ इंसपेक्टर ने अगला सवाल किया.

”यही कोई 10 बजे के आसपास. कुछ सामान खरीदना था, जिसे बंधवा कर रख गई थीं. थोड़ी देर बाद ले जाने के लिए कहा था.’’

”इस का मतलब वह कहीं बाहर जा रही थीं. वह अकसर इसी तरह सामान बंधवा कर रख जाती थीं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”सर, ऐसा लगभग सभी करते हैं. सामान बंधवा कर हम से पहुंचाने के लिए कह देते हैं. जब समय मिलता है, हम सामान पहुंचा देते हैं.’’ दुकानदार ने कहा.

दुकानदार के यह कहने पर जयंती ने मुसकराते हुए पूछा, ”क्या आप सभी के घर सामान पहुंचाने जाते हैं?’’

इंसपेक्टर झाला और दुकानदार जयंती की ओर देखने लगे. जयंती की इस बात पर जहां इंसपेक्टर झाला को हंसी आ गई थी, वहीं दुकानदार झेंप गया था. इस की वजह यह थी कि दुकानदार काफी मोटा था. जयंती ने विनम्रता से कहा, ”आप मेरी बात का बुरा मत मानना. मेरे कहने का मतलब यह है कि आप ने सामान पहुंचाने के लिए कोई लड़का रखा है?’’

”जी, एक लड़का है मगन. वह अभी किसी का सामान पहुंचाने गया है, पर देखो तो अभी लौट कर नहीं आया है. इस की बड़ी खराब आदत है, जहां जाता है, वहीं का हो कर रह जाता है. उस की बातें ही नहीं खत्म होतीं.’’ दुकानदार ने घड़ी की ओर देखते हुए कहा.

”उस की उम्र कितनी होगी?’’ जयंती ने पूछा.

”यही कोई 25 साल.’’ दुकानदार ने कहा.

”अच्छा, यह बताओ कि जब संविधा मैडम सामान लेने नहीं आईं तो तुम्हें अजीब नहीं लगा? फिर तुम ने क्या किया?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”सर, अजीब तो लगा था. क्योंकि वह जितनी देर में आने को कह कर जाती थीं, उस से पहले ही आ जाती थीं. पर जब कल वह नहीं आईं तो मैं ने सामान उन के पति हेमंतभाई को पकड़ा दिया था.’’

”इस का मतलब सामान हेमंत ले गए. क्या वह रोज दोपहर को घर आते हैं?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”नहीं सर, कल संविधा मैडम नहीं आई, इसलिए हेमंत सर घर आए होंगे.’’ दुकानदार ने बताया.

”मैडम नहीं आईं तो तुम ने उन्हें बताया था?’’

”नहीं सर, शायद मोनिका मैडम ने बता कर बुलाया होगा.’’ दुकानदार ने कहा.

”यह मोनिका कौन हैं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”सर, उन्हीं की लाइन में 2 घर छोड़ कर रहती हैं. दोनों परिवारों में खूब पटती है.’’

”ठीक है, और कुछ पूछना होगा तो फिर तुम्हारे पास आऊंगा.’’ कह कर इंसपेक्टर झाला सोसायटी के गेट की ओर बढ़ गए. 5 मिनट बाद वह हेमंत के घर के सामने खड़े थे.

घंटी बजाई तो दरवाजा हेमंत ने ही खोला. हेमंत का घर काफी सुंदर और सजा हुआ था. हर चीज बहुत व्यवस्थित ढंग से रखी थी. जयंती ने तारीफ करते हुए कहा, ”संविधा ने घर को बड़ी खूबसूरती से सजाया है.’’

”संविधा को इन चीजों का बहुत शौक था,’’ हेमंत ने कहा.

”हेमंतजी, आप को किस ने बताया कि संविधा घर लौट कर नहीं आई है, जिस की वजह से तुम्हें दोपहर को घर आना पड़ा?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”पड़ोस में रहने वाले मोनिका और शरद से हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं. हमारे और उन के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, इसलिए मोनिका और संविधा साथ ही बच्चों को लेने स्कूल जाती हैं. उस दिन घर पर ताला लगा देख कर मोनिकाजी अकेली ही चली गईं. स्कूल की छुट्टी हुए घंटों बीत गए और संविधा नहीं आई तो मोनिकाजी ने मुझे फोन किया.’’ हेमंत ने उस दिन जो हुआ था, जानकारी दी.

”हेमंत क्या हम मोनिका और शरद से मिल सकते हैं?’’ इंसपेक्टर झाला ने कहा तो हेमंत ने तुरंत मोनिका और शरद को बुलाने के लिए बेटी को भेज दिया.

घर में तमाम फोटो लगे थे. जयंती वे फोटो देख रही थी. संविधा सचमुच बहुत खूबसूरत थी. हर फोटो में उस का चेहरा कुछ अलग ही चमक रहा था. फोटो से ही लग रहा था कि वह एक जिंदादिल महिला थी. जयंती ने थोड़ीबहुत पूछताछ हेमंत के बच्चों से की. उन से पूछताछ करने की वजह यह थी कि हेमंत पत्नी पर शक तो नहीं करता था और इस बात को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहा हो. पर बच्चों ने उस के सवालों के जो जवाब दिए, उस से उसे लगा कि ऐसा कुछ भी नहीं था.

शरद और मोनिका आ गए थे. उन के साथ उन के बच्चे भी थे. मोनिका सामान्य कदकाठी वाली महिला थी. सांवला रंग, तीखे नैननक्श, लंबे बाल और वजन भी शरीर के हिसाब से ठीक ही लग रहा था. न वह मोटी थी और न ही छरहरी. उस का पति शरद दीवान लंबातगड़ा, सुगठित शरीर और साफ रंग का काफी हैंडसम था. उसे देख कर लग रहा था कि वह कहीं जाने की तैयारी में था. मोनिका और शरद के आते ही हेमंत ने कहा, ”सर, यह हमारे पड़ोसी शरद दीवान और यह उन की पत्नी मोनिकाजी हैं.’’

मोनिका और शरद ने हाथ जोड़ कर इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला और जयंती चौधरी को नमस्ते किया. इंसपेक्टर झाला ने दोनों को गौर से देखते हुए कहा, ”मैं आप लोगों का थोड़ा समय लूंगा. संविधा के गायब होने के सिलसिले में.’’

”सर, पहले से पता होता तो मैं आज मीटिंग का कार्यक्रम ही न बनाता. पर अब तो जाना ही पड़ेगा. फिर भी आप जो पूछना चाहते हैं, पूछ लीजिए.’’ शरद ने अपनी समस्या बताते हुए कहा.

”जिस दिन संविधा गायब हुई थी, आप कितने बजे घर आए थे?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”सर, इन लोगों ने मुझे शाम 5 बजे फोन किया था. उस के तुरंत बाद मैं औफिस से निकल गया था और पौने 6 बजे घर आ गया था.’’ शरद ने कहा.

”घर आ कर आप ने क्या किया?’’

”घर आते ही मैं हेमंत के साथ संविधा की तलाश में लग गया था. इन्होंने अपने सारे रिश्तेदारों और संविधा के परिचितों तथा सहेलियों को फोन कर ही लिया था. इसलिए हम दोनों पहले थाने गए. वहां संविधा के गायब होने की सूचना दे कर उस की तलाश में लग गए. पूरी रात हम दोनों इधरउधर दौड़ते रहे.’’ शरद ने कह कर हेमंत की ओर देखा तो उस ने हां में सिर हिलाते हुए कहा, ”जी सर, शरद और मोनिका ने मेरी मदद ही नहीं की, बल्कि मुझे और बच्चों को संभाला भी.’’

”ठीक है शरदजी, अब आप जा सकते हैं,’’ इंसपेक्टर झाला ने कहा.

”मोनिकाजी, पता चला है कि आप संविधा की बहुत अच्छी सहेली थीं?’’ इस बार सवाल कांस्टेबल जयंती मेहता ने किया था.

”जी, हम दोनों का रिश्ता बहन जैसा था. इसीलिए हम दोनों एकदूसरे के पति को जीजू कहते थे. हम दोनों हर त्योहार एक साथ मनाते थे. कहीं बाहर जाना होता था तो साथ ही जाते थे,’’ मोनिका ने कहा.

”तब तो शौपिंग भी साथसाथ करती रही होंगीं?’’

”जी हां, हम शौपिंग भी साथ ही करते थे,’’ मोनिका ने कहा.

”यह बात मैं ने इसलिए पूछी थी कि आप के कानों में जो झुमके हैं, वे संविधा की फोटो वाले झुमके से हूबहू मिलते हैं.’’ जयंती ने कहा तो मोनिका थोड़ा झेंप गई.

मोनिका के झुमकों को देख कर जयंती की नजरें ठिठक गईं. उस ने सहज स्वर में कहा, ”आप कह रही थीं कि ये झुमके आप ने बाजार से खरीदे हैं?’’

मोनिका ने मुसकराते हुए कहा, ”जी हां, बस यूं ही पसंद आ गए थे.’’

”कब खरीदे?’’

”यही… 2-3 दिन पहले.’’

इंसपेक्टर मनोहर सिंह झाला ने हलकी मुसकान के साथ जयंती की ओर देखा. दोनों को अब यह समझ में आ गया था कि कुछ न कुछ तो छिपाया जा रहा है.

”ठीक है,’’ इंसपेक्टर बोले, ”अगर कुछ और याद आए तो बताइएगा. वैसे आप दोनों को चिंता करने की जरूरत नहीं है, संविधा जरूर मिल जाएगी.’’

जयंती ने शरद और मोनिका के बच्चों से भी बातचीत करतेकरते थोड़ीबहुत जानकारी ले ली थी. मोनिका के बच्चों ने बताया था कि संविधा आंटी और उन के पापा में खूब पटती थी. संविधा जब भी उन के घर आती थीं, पापा उन के पास ही बैठे रहते थे. उन से खूस हंसहंस कर बातें करते थे. मोनिका ने राहत की सांस ली. पर उस की आंखों में एक पल के लिए जो डर झलका था, उसे जयंती ने साफ भांप लिया था.

अगले दिन सुबहसुबह थाना नरोडा पुलिस को फोन द्वारा सूचना मिली थी कि शहर के बाहर बहने वाले नाले के किनारे की झाडिय़ों में किसी महिला का शव पड़ा है. वह इलाका थाना नरोडा के अंतर्गत ही आता था.  इंसपेक्टर झाला महिला सिपाही जयंती एवं कुछ अन्य सिपाहियों को साथ ले कर फौरन मौके पर जा पहुंचे थे. शव की हालत देख कर ही लग रहा था कि इस की मौत लगभग 3 दिन पहले हुई थी. चेहरा सूजा हुआ था, पर पहचान में आ रहा था. वह संविधा की लाश थी.

हेमंत को जब यह खबर दी गई तो वह बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. दोनों बच्चे फूटफूट कर रोने लगे थे. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर हेमंत और उस के बच्चों को सांत्वना दे कर घर भेजा. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल की जांच कर के जरूरी सबूत जुटा लिए थे. फोरैंसिक टीम को घटनास्थल पर जूतों के निशान के अलावा कार के पहियों के भी निशान मिले थे. इंसपेक्टर झाला को अब यह मामला मिसिंग का नहीं, बल्कि हत्या का लग रहा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया था कि संविधा की मौत गला दबाने से हुई थी. जब उसे मारा गया था, समय दोपहर के 2 से 3 बजे के बीच का था. मजे की बात यह थी कि उस के शरीर पर किसी भी तरह के संघर्ष का कोई निशान नहीं था.

इस का मतलब था कि संविधा उस व्यक्ति को जानती थी, जिस ने उसे गला दबा कर मारा था. पुलिस की जांच शुरू हुई. संविधा का मोबाइल घर पर ही मिला था. इस के अलावा हेमंत के घर एक बटन वाला मोबाइल भी मिला था. इंसपेक्टर झाला ने संविधा के दोनों मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि संविधा के उस छोटे वाले मोबाइल से सिर्फ एक ही नंबर पर बात होती थी. इंसपेक्टर झाला ने जब उस नंबर के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह नंबर शरद का था. इस के बाद उन्हें संविधा की हत्या का रहस्य खुलता नजर आया.

उन्होंने शरद के मोबाइल की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. जांच में पता चला कि वह नंबर शरद के नाम पर नहीं, बल्कि उस की पत्नी मोनिका के भाई विक्रम के नाम पर था, लेकिन उस का उपयोग शरद ही कर रहा था.

अब शक की सुई सीधे मोनिका और शरद की ओर घूम गई. इंसपेक्टर झाला ने दोनों को थाने बुलाया. उन्होंने शरद से पूछा, ”शरदजी, आप के दोस्त की पत्नी की हत्या हो गई है. आप ने बताया था कि आप उस की तलाश में रात भर हेमंत के साथ थे?’’

”जी हां सर, मैं उन के साथ ही था.’’

”तो फिर आप यह बताइए कि आप की लोकेशन उस दिन दोपहर सवा 2 बजे शहर के बाहर बहने वाले नाले के पास की क्यों थी?’’

शरद के चेहरे का रंग उड़ गया था. उस ने हकलाते हुए कहा, ”वह तो बस ऐसे ही. मैं उधर से गुजर रहा था तो मैं वहां पान खाने के लिए रुक गया था.’’

”पान खाने के लिए नहीं रुके थे शरद, आप के जूतों के निशान भी लाश के पास मिले हैं. यही नहीं, आप की कार के टायरों के निशान भी वहां मिले हैं.’’

शरद के पसीने छूट गए. जयंती ने हाथ में थामी फाइल बंद करते हुए कहा, ”आप का झूठ बोलना बेकार है. जो भी है, सचसच बता दो.’’

फिर पूछताछ शुरू हुई. शुरू में शरद ने कुछ नहीं कहा. लेकिन जब पुलिस ने मोनिका के झुमके, विक्रम का मोबाइल नंबर और गली के एक बच्चे का बयान (जिस ने देखा था कि मनीष की गाड़ी उसी दिशा में गई थी). इस के अलावा एक सबूत और था.

दरअसल, जयंती जब संविधा के फोटो देख रही थी, तभी उस ने उस के कानों में जो झुमके देखे थे, उन में सामने की एक लटकन टूटी थी. मोनिका से बात करते समय वही झुमका उस ने उस के कान में देखा था. जबकि मोनिका उस समय वे झुमके नहीं पहने थी. ये सारे सबूत इंसपेक्टर झाला ने शरद दीवान के सामने रखे तो वह टूट गया. उस ने कहा, ”हां, मैं ने ही संविधा की हत्या की थी.’’

”क्यों?’’ इंसपेक्टर झाला ने पूछा.

”क्योंकि वह मुझे छोडऩा चाहती थी. कालेज के समय से हमारा रिश्ता था. हम दोनों विवाह करना चाहते थे, पर हम दोनों के ही घर वाले नहीं माने. हम दोनों ने अलगअलग विवाह तो कर लिया, पर एकदूसरे को भुला नहीं सके. संविधा ने हेमंत से इसलिए विवाह किया था, ताकि उसे पति से कभी प्यार न हो.

”उसे हेमंत से कभी प्यार नहीं रहा, पर वह प्यार करने का ऐसा दिखावा करती रही कि हेमंत को कभी उस पर शक नहीं हुआ. हेमंत यही समझता रहा कि उस के कुरूप होने के बावजूद वह उस से बहुत प्यार करती है.

”हम दोनों को मिलने में परेशानी न हो, इसलिए मैं ने हेमंत के घर के पास ही हरियाली सोसायटी में अपने लिए घर खरीदा था. हमें मिलने में परेशानी न हो, इसलिए मैं ने मोनिका से संविधा की दोस्ती करा दी थी.

”लेकिन इधर वह मिलने से कतराने लगी थी. जबकि मैं उस के बगैर अब रह नहीं सकता था. मैं उस से कहने लगा था कि वह हेमंत को छोड़ दे. जबकि उस का कहना था कि बच्चों के लिए वह हेमंत को नहीं छोड़ सकती.

”उस दिन सोसायटी से निकलने के बाद मैं संविधा को अपने नए फ्लैट पर ले गया. हम दोनों वहीं मिलते थे. वहां जब मैं ने उस से साथ आने के लिए कहा तो उस ने मना करते हुए कहा, ‘शरद, अब बहुत हो गया. तुम अपनी पत्नी के पास लौट जाओ.’

”उस की इस बात पर मुझे गुस्सा आ गया. मैं ने उसे बांहों में भर लिया. वह खुद को छुड़ाने लगी. जबकि उस समय मेरी इच्छा उस के साथ सैक्स करने की थी. जिस के लिए वह राजी नहीं थी.

”मैं ने उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की. इसी कोशिश में उस का गला दब गया और उस की मौत हो गई. उस के बाद उस की लाश को ले जा कर वहां फेंक दिया, क्योंकि वह जगह सुनसान थी.

”हत्या जैसा अपराध मैं ने कभी किया नहीं, इसलिए मुझे बहुत डर लग रहा था. मैं जल्दी से जल्दी लाश से छुटकारा पाना चाहता था, इसलिए उस के शरीर के सारे गहने उतार कर शहर के बाहर बहने वाले नाले की किनारे की झाडिय़ों में फेंक दिए थे. उस समय वहां बनी झोपडिय़ों में रहने वाले मजदूर काम पर होते हैं. झोपडिय़ों में केवल बच्चे ही रहते हैं.’’

मोनिका, जो अब तक चुप बैठी थी, यह सब सुन कर फूट पड़ी, ”मैं सब जानती थी. पर मैं अपने बच्चों की खातिर चुप रही. संविधा ने मेरा घर तोड़ा, मेरा पति छीना… कुदरत का न्याय देखो, वही मारी गई.’’

इंसपेक्टर झाला ने दोनों को हिरासत में ले लिया. क्योंकि मोनिका ने संविधा की हत्या वाली बात छिपाई थी. थाने से लौटते समय झाला ने कहा, ”हेमंत जोशी को सबूत चाहिए था कि उस की पत्नी उसे छोड़ कर नहीं गई, बल्कि मारी गई. पर शायद यह सच्चाई उस के लिए और ज्यादा दर्दनाक होगी.’’

जयंती ने धीरे से कहा, ”सर, परफेक्ट मर्डर कोई नहीं होता. झूठ चाहे कितना भी सुंदर हो, सच की एक किरण उसे चीर ही देती है.’’

2 हफ्ते बाद हेमंत अपने बच्चों के साथ घर के बाहर खड़ा था. संविधा की तसवीर के आगे दीया जल रहा था. उस की आंखों में आंसू थे, पर चेहरे पर सुकून था. अब उसे किसी जवाब की तलाश नहीं थी, क्योंकि वह जान चुका था कि सच चाहे जितना भयानक हो, सत्य ही सब से बड़ा न्याय है. Suspense Story

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Best Crime Story: मजबूरी में बनी कोठे की जीनत

Best Crime Story: मैनब नेपाल के जिला लुंबिनी की रहने वाली थी. उस की शादी पटना के मोहल्ला धोबीघाट  निवासी आरिफ से हुई थी. आरिफ और उस के 2 बच्चे थे. लगभग 4 साल पहले की बात है, मैनब अपने मायके जाने के लिए ससुराल से निकली. उस के साथ उस के दोनों बच्चे भी थे. जनसेवा जननायक एक्सप्रेस से वह बस्ती रेलवे स्टेशन पर उतर गई, क्योंकि वहां से उसे बस पकड़ कर लुंबिनी जाना था.

जब तक मैनब की ट्रेन बस्ती पहुंची, तब तक रात हो चुकी थी. मैनब ने बच्चों के साथ नाश्ता वगैरह किया और अपना सामान प्लेटफार्म के एक कोने में रख कर बच्चों को वहीं सुला दिया. वह खुद इधरउधर टहल कर रात गुजारने की कोशिश करने लगी.

24 साल की मैनब को देख कर यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वह 2 बच्चों की मां होगी. उस का छरहरा बदन, गोरा रंग किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता था. रेलवे स्टेशन पर मौजूद जावेद की नजर मैनब पर पड़ी तो उस की आंखों में चमक आ गई. वह मैनब से बात करने का कोई बहाना तलाशने लगा. जावेद चालू किस्म का आदमी था.

वह किसी ऐसे ही शिकार की तलाश में था. इसलिए अकेली महिलाओं से बात करने का हुनर अच्छी तरह जानता था. उस ने बिना किसी परिचय, बिना किसी भूमिका के मैनब के पास जा कर पूछा, ‘‘इतनी रात में स्टेशन पर परेशान सी घूम रही हो, कहीं जाना है क्या?’’

जावेद का हमदर्दी भरा लहजा देख कर मैनब ने कह दिया, ‘‘मुझे नेपाल जाना है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है, कैसे जाऊं?’’

जावेद पहले ही समझ चुका था कि वह अकेली और इस जगह से अनजान है. इसलिए उस ने इस मौके का फायदा उठाने की सोच ली थी. जावेद बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही पुरानी बस्ती थाने के मोहल्ला रसूलपुर का रहने वाला था. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास स्थित देह की मंडी में उस का आनाजाना लगा रहता था. मैनब की नासमझी का लाभ उठाने के लिए उस ने उसे देहव्यापार की मंडी में पहुंचाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने मन ही मन योजना भी बना ली.

अपनी उसी योजना के मद्देनजर उस ने मैनब से कहा,  ‘‘देखो, नेपाल जाने के लिए तुम्हें बस पकड़नी पड़ेगी. बसअड्डा यहां से थोड़ी दूर है. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें वहां छोड़ दूंगा. रात भर स्टेशन पर पड़े रहने का कोई फायदा नहीं है. तुम्हें अकेली देख कर पुलिस वाले अलग तंग करेंगे. बेहतर होगा, अभी निकल जाओ. नेपाल के लिए बसें जाती रहती हैं. सुबह तक अपने मायके पहुंच जाओगी.’’

अकेलेपन की वजह से मैनब पहले ही घबराई हुई थी. जावेद की हमदर्दी से वह पिघल गई. बिना सहीगलत का अंदाजा लगाए वह परेशान से स्वर में बोली, ‘‘ठीक है, मैं बच्चों को ले लेती हूं. आप हमें बसअड्डे पहुंचा दीजिए, बड़ी मेहरबानी होगी.’’

बच्चों का नाम सुन कर जावेद ने आश्चर्य से उस की ओर देखा. वह उसे अकेला समझ रहा था. उस ने मैनब से पूछा, ‘‘तुम्हारे बच्चे भी हैं? तुम्हें देख कर तो ऐसा लगता जैसे तुम्हारी शादी हालफिलहाल ही हुई होगी?’’

अपनी तारीफ हर इंसान को अच्छी लगती है. जावेद का कमेंट सुन कर मैनब को भी अच्छा लगा. बातचीत हुई तो परिचय के नाम पर दोनों ने अपनेअपने नाम एकदूसरे को बता दिए. मैनब को यह जान कर अच्छा लगा कि उस की मदद करने वाला भी मुसलमान है. वह न तो भेड़ की खाल में छिपे भेडि़ए को समझ पाई और न यह कि गलत और गंदे लोगों का कोई ईमान धर्म नहीं होता.

मैनब अपने बच्चों को साथ ले कर उस के साथ जाने को तैयार हो गई. जावेद उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर बसअड्डे ले गया. वहां जा कर पता चला कि सिद्धार्थनगर होते हुए ककहरा बौर्डर के लिए बस सुबह 7 बजे जाएगी.

जावेद इस बात को अच्छी तरह जानता था कि बस सुबह जाती है. वह मैनब को जानबूझ कर बसअड्डे ले गया था. बस नहीं मिली तो उस ने मैनब से कहा, ‘‘तुम मेरे साथ चलो, रात को आराम कर के सुबह चली जाना. मैं तुम्हें बस में बैठा दूंगा.’’

मैनब उस पर भरोसा कर के उस के घर आ गई. घर पर जावेद ने उसे चाय पिलाई, जिस में नशीली दवा मिली हुई थी. चाय पी कर उसे नींद आ गई. तब तक उस के बच्चे भी सो चुके थे. नींद के आगोश में डूबी मैनब और भी सुंदर दिख रही थी. जावेद उस के यौवन का स्वाद लेने के लिए बेचैन हो उठा. नशे की हालत में मैनब कुछ समझ नहीं पाई. वह जावेद का साथ देती गई. वह 2 बच्चों की मां जरूर थी, पर उस के बदन की गरमी किसी को भी पिघला सकती थी.

सुबह को जब मैनब का नशा टूटा और वह नींद से जागी तो उसे सब कुछ समझ में आ गया. लेकिन अब वह कुछ नहीं कर सकती थी. वह जावेद से बस अड्डे पहुंचाने की जिद करने लगी. इस पर जावेद ने समझाया, ‘‘तुम कुछ दिन हमारे साथ रह कर पैसा कमा लो, फिर मायके चली जाना. तुम खूबसूरत हो, जवान भी. तुम पर पैसे लुटाने वाले मैं ढूंढ लाऊंगा. यहां रहोगी तो पटना और नेपाल की गरीबी से भी पीछा छूट जाएगा. हम तुम्हारे बच्चों का यहीं के स्कूल में दाखिला करा देंगे.’’

मैनब इस के लिए तैयार नहीं थी. उस ने घरेलू मारपीट से तंग आ कर पति का साथ और घर छोड़ कर मायके में रहने का फैसला किया था. वहीं वह जा भी रही थी. लेकिन बीच रास्ते में यह मुसीबत आ गई थी. मैनब चूंकि घरेलू युवती थी, इसलिए वह जावेद की बात मानने के लिए तैयार नहीं हुई. जबकि वह उसे सोने की अंडा देने वाली मुर्गी मान चुका था. उस ने मैनब को बस्ती की देहव्यापार मंडी में उतारने की योजना बना ली थी.

इसी योजना के तहत उस ने उसे अपने जाल में फंसाया. इस के लिए उस ने मोहरा बनाया उस के बच्चों को. जब मैनब समझाने से नहीं मानी तो जावेद ने उस पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए. वह उस के साथ मनमानी करता, नशे की गोलियां खिला कर ज्यादा से ज्यादा नशे में रखने की कोशिश करता. इस से भी बात नहीं बनती तो उस के बच्चों को मार डालने की धमकी देता.

एक हफ्ते तक किए गए अत्याचारों से मैनब टूट गई. अपने बच्चों की खातिर अंतत: वह अपनी देह बेचने को राजी हो गई. इस के बाद जावेद ने उसे पूरी तरह तैयार कर के देहव्यापार की मंडी में उतार दिया. बाजारू लड़कियों के बीच रह कर वह भी जल्दी ही उन की तरह ग्राहक फंसाने के लटकेझटके सीख गई.

वह शाम ढलते ही मेकअप कर के सड़क किनारे खड़ी हो जाती. जावेद उस के लिए ग्राहक ले आता. मैनब कमाने लगी तो जावेद ने उसे एक कमरा अलग से किराए पर दिलवा दिया. वह उसी कमरे में रहने लगी. जावेद ने उस के दोनों बच्चों को स्कूल में दाखिल करवा दिया. उन्हें वह अपने साथ अपने घर में रखता था, ताकि उस की डोर उस के हाथ में रहे.

उधर जब नेपाल के रहने वाले मैनब के पिता हबीब को यह चला कि उस की बेटी अपनी ससुराल से नाराज हो कर मायके के लिए निकली थी तो उसे आश्चर्य हुआ. क्योंकि वह मायके नहीं पहुंची थी. मैनब के पिता हबीब ने आरिफ से बात की तो उस ने किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी. उस ने दो टूक कह दिया कि मैनब उस के लिए मर चुकी है.

पति भले ही कितना भी निष्ठुर क्यों न हो जाए, पिता अपनी बेटी को कभी नहीं भूल सकता. हबीब का मैनब के साथ बहुत लगाव था. हबीब ने उसे तलाश करने की बहुत कोशिश की, पर वह कहीं नहीं मिली. उधर जावेद के जाल में फंसी मैनब दिनरात वहां से भागने के मंसूबे बनाती रहती थी. लेकिन जावेद ने उस के बच्चों को उस से अलग अपने कब्जे में रख कर उस के पर काट दिए थे.

वेश्या बाजार में काम करने वाली औरतें 3-4 माह में एक बार सरकारी अस्पताल में यौन रोगों की जांच कराने के लिए जाती थीं. एक बार मैनब भी उन के साथ अस्पताल जाने लगी तो उस ने बच्चों की बीमारी का वास्ता दे कर उन्हें भी साथ ले लिया था. उस का इरादा चुपचाप भाग जाने का था. लेकिन पता नहीं कैसे जावेद को उस के मंसूबे का पता चल गया. उस ने मैनब को अस्पताल से बाहर निकलते ही पकड़ लिया. इस के बाद उस ने मैनब को बुरी तरह मारापीटा.

कुछ दिनों के बाद मैनब ने फिर से भागने की योजना बनाई, लेकिन  इस बार भी वह पकड़ी गई. इस के बाद भी वह वहां से भागने की कोशिश करती रही, पर कामयाब नहीं हो सकी. देखतेदेखते करीब साढ़े 4 साल गुजर गए. मैनब जब नरक भोग रही थी, तभी एक दिन उस के साथ रात गुजारने के लिए लुंबिनी का रहने वाले श्यामप्रसाद आया. श्यामप्रसाद की बहन बस्ती में ब्याही थी.

श्याम जब भी बस्ती आता था, वहां की धंधा करने वाली औरतों के पास जरूर जाता था. उस दिन इत्तेफाक से वह मैनब के पास पहुंच गया था. श्याम के बातचीत करने के तौर तरीके से मैनब समझ गई कि वह उस के ही इलाके का रहने वाला है. उस ने उसे अपनी पूरी कहानी बताई.

मैनब की कहानी सुन कर श्याम को बहुत दुख हुआ. उस ने मैनब से वादा किया कि वह उस के पिता को तलाश कर रहेगा. श्याम मैनब से उस के पिता का नामपता ले कर लुंबिनी आया और उस के पिता हबीब से मिला. उस ने उन्हें मैनब के बारे में कुछ न बता कर उन का फोन नंबर ले लिया. उस ने सोचा था कि इस बार जब वह बस्ती जाएगा तो उन की मैनब से सीधी बात करा देगा.

मौका निकाल कर श्याम बस्ती आया. इस बार उस ने फोन कर के सीधे मैनब से ही मिलने का वक्त तय किया. मिलने पर उस ने उसे सारी बात बताई. साथ ही कहा भी कि वह उसे उस के पिता से मिला कर रहेगा. उस ने मैनब से शारीरिक संबंध बनाने से भी मना कर दिया. बातोंबातों में श्याम ने मैनब के पिता को फोन लगा दिया.

पिता की आवाज सुन कर मैनब खुद पर काबू नहीं रख सकी. वह फोन पर ही फफक कर रोने लगी. कुछ देर तो हबीब को समझ ही नहीं आया कि वह क्या करे? फिर उस ने खुद को संभाल कर बेटी को दिलासा दी. हबीब बूढ़ा जरूर हो चुका था, पर बेटी से मिलने की इच्छा ने उसे अलग तरह की ताकत दे दी थी. वह बोला, ‘‘बेटी, तू परेशान मत हो, मैं जल्दी ही बस्ती आऊंगा तुम्हें लेने. अब तुम्हें वहां कोई नहीं रोक पाएगा.’’

पिता की बातों से मैनब को भरोसा होने लगा कि अब वह उस नरक से निकल जाएगी. हां उसे शातिर दिमाग जावेद से जरूर डर लग रहा था. साथ ही वह यह सोच कर भी डर रही थी कि कहीं उस की वजह से उस का बूढ़ा बाप किसी मुश्किल में न पड़ जाए. एक बार तो उस ने सोचा भी कि पिता को मना कर दे और अपनी बाकी की जिंदगी उसी दलदल में निकाल दे. लेकिन अपने बच्चों के बारे में सोच कर वह हर तरह का खतरा उठाने को तैयार हो गई.

जनवरी, 2014 के पहले सप्ताह में हबीब मैनब को तलाश करने के लिए बस्ती की देहव्यापार मंडी में आ पहुंचा. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही बसा वेश्या बाजार पुरानी पतली गलियों में बने छेटेछोटे बदबूदार कमरों से भरा हुआ था. दोपहर के समय हबीब इस बस्ती में गया. वह मैनब को तलाशने के लिए जानबूझ कर श्याम का सहारा नहीं लेना चाहता था. उसे डर था कि कहीं उस की मौजूदगी से जावेद को शक न हो जाए.

हबीब जब वेश्या बाजार की तरफ जाने लगा तो उस का जमीर साथ नहीं दे रहा था. बुढापे में उसे वेश्या बाजार में जाना ठीक नहीं लग रहा था. लेकिन इस के अलावा उस के पास कोई रास्ता भी नहीं था. कई लोगों ने उसे व्यंग्य भरी नजरों से देखा भी, लेकिन उस ने उन की परवाह नहीं की.

वेश्या बाजार में आदमी की उम्र नहीं, पैसा देखा जाता है. हबीब ने भी पैसे दिखाने शुरू किए तो देहजीवा उस के करीब आने लगीं. हबीब उन से बात करता और आगे बढ़ जाता. इस तरह उस ने कई दिन मंडी में इधरउधर घूमते निकाल दिए. वेश्या बाजार में बेटी की तलाश में भटकते एक पिता को ग्राहक बन कर घूमना पड़ रहा था.

बस्ती के वेश्या बाजार में हर उम्र की औरतें देह व्यापार करती हैं. ये सभी औरतें खुद को एकदूसरी से ज्यादा जवान और कमउम्र की समझती हैं. कई बार वह उम्रदराज पुरुषों का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकतीं. कई जगह हबीब का भी मजाक उड़ाया गया. लेकिन उस ने परवाह नहीं की.

2 दिन इसी तरह निकाल गए. तीसरे दिन हबीब को मैनब दिख गई. बाजार की बात थी, इसलिए हबीब ने उसे इशारा कर के अपने पास बुलाया और ग्राहक की तरह बात की. मैनब ने भी पिता से उसी अंदाज में बात की और उन्हें ले कर अपने कमरे में आ गई. अकेले में वह पिता से लिपट कर फूटफूट कर रोई. बेटी का हालत देख हबीब ने सोचा कि क्यों न वह अपने बल पर ही मैनब को बाहर ले जाए.

उस ने अपनी यह इच्छा मैनब को भी बताई तो उस ने समझाया, ‘‘आप नहीं जानते, यहां गुंडों का राज है. किसी को जरा सा भी शक हो गया तो मुझे कहीं ऐसी जगह छिपा देंगे कि पता भी नहीं चल पाएगा.’’

‘‘बेटी, तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें कल यहां से बाहर निकाल ले जाऊंगा.’’ कह कर हबीब वहां से बाहर आ गया. बाहर आ कर वह सीधे पुरानी बस्ती थाने गया. बस्ती का वेश्या बाजार इसी थानाक्षेत्र में आता है. लोगों ने हबीब को बताया था कि पुरानी बस्ती थाने के थानाप्रभारी प्रदीप सिंह तुम्हारी बेटी को वेश्या बाजार से बाहर निकालने का काम कर सकते हैं.

हबीब थानाप्रभारी प्रदीप सिंह के पास गया और उन के पैर पकड़ कर पूरी दास्तान बताई. प्रदीप सिंह ने हबीब की बात सुन कर बस्ती के एसपी वी.पी. श्रीवास्तव से संपर्क किया. उन्होंने आदेश दिया कि तुरंत काररवाई करें. इस के बाद प्रदीप सिंह ने पुलिस फोर्स के साथ 11 जनवरी, 2014 को बस्ती के वेश्या बाजार पर छापा मारा.

नतीजतन मैनब और उस के बच्चों को देहव्यापार कराने वालों के चंगुल से बाहर निकाल लिया गया. पुलिस ने मैनब से पूछ कर देहव्यापार कराने वाले रसूलनगर मोहल्ले के जावेद को भी पकड़ लिया. उस के खिलाफ अनैतिक देहव्यापार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भेज दिया गया.

वेश्या बाजार से आजाद होने के बाद मैनब ने बताया कि उस ने वहां 4 साल से ज्यादा समय तक नरक जैसी जिंदगी गुजारी थी. हर रोज उस के शरीर को 5-10 ग्राहकों द्वारा रौंदा और नोचाखसोटा जाता था. वह तो जिल्लतभरी जिंदगी से बाहर निकल आई, पर अभी भी वहां उस की जैसी कई और लड़कियां हैं. मैनब ने बताया कि वहां जो लड़की आती है, वह पूरी तरह से दलालों के चंगुल में फंस कर रह जाती है.

शुरू में उसे नशे की गोलियां खिला कर मारपीट कर इस धंधे में उतरने के लिए तैयार किया जाता है. बाद में मजबूर हो कर उसे उन की बात माननी पड़ती है. यहां नेपाल और बिहार की गरीब और लाचार लड़कियों को लाया जाता है. उस की किस्मत अच्छी थी कि देर से ही सही, पर बच गई. उस के पिता बहुत अच्छे हैं, जिन्होंने यहां रहने के बाद भी मुझे अपना लिया.

मैनब के पिता हबीब ने बताया कि उस ने तो अपनी बेटी को मरा समझ कर भुला दिया था. उस की बेटी इस स्थिति में मिलेगी, उस ने कभी सोचा भी नहीं था.

मैनब के बरामद होने के बाद बस्ती के एसपी वी.पी. श्रीवास्तव ने इस वेश्या बाजार को जबरन देहव्यापार का अड्डा नहीं बनने देने का संकल्प लिया और एक मुहिम चला कर दलालों को वहां से खदेड़ने की शुरुआत कर दी. देखने वाली बात यह है कि वह कब तक अपना संकल्प पूरा कर पाते हैं. मैनब अपने पिता के साथ अपने घर नेपाल चली गई है, जहां वह मेहनतमजदूरी कर के अपनी जिंदगी का बोझ खुद उठाएगी और अपने बच्चों को पालेगी. Best Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और मैनब की बातचीत पर आधारित. कहानी में कुछ नाम बदल दिए गए हैं.

Crime Story Hindi: खुल गया महंत की हत्या का राज

Crime Story Hindi: 20 जून, 2014 को सुबह से ही भीषण गरमी थी. सुबह के 11 बजे के आसपास उत्तराखंड के जिला हरिद्वार के कुंभ मेला  नियंत्रण कक्ष के बाहर काफी भीड़ जमा थी. क्योंकि थोड़ी देर बाद वहां हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डा. सदानंद दाते 2 साल पहले महानिर्वाणी अखाड़े के श्रीमहंत सुधीर गिरि हत्याकांड का खुलासा करने वाले थे. इसलिए वहां के साधुसंत, राजनेता, पत्रकार और अन्य लोग तरहतरह की चर्चाएं कर रहे थे.

श्रीमहंत की हत्या 14 अप्रैल, 2012 की रात को उस समय हुई थी, जब वह कार से हरिद्वार से गांव बेलड़ा स्थित अपने महानिर्वाणी अखाड़े जा रहे थे.  38 वर्षीय युवा श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या हुए 2 साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका था, मगर उन के हत्यारों का पुलिस को पता नहीं चल सका था. इसलिए संत समाज में पुलिस के प्रति काफी रोष था. हत्या के वक्त रुड़की के थानाप्रभारी कुलदीप सिंह असवाल थे, जो काफी तेजतर्रार थे. उन्होंने भी इस मामले में दरजनों संदिग्धों से पूछताछ की थी. सर्विलांस के माध्यम से भी उन्होंने हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने की कोशिश की थी, मगर उन्हें सफलता नहीं मिली थी.

इस के बाद इस केस को सुलझाने के लिए थाना ज्वालापुर, पथरी, कनखल के थानाप्रभारियों और देहरादून की एसटीएफ टीम को लगाया गया था, लेकिन वे भी पता नहीं लगा सके थे कि श्रीमहंत का हत्यारा कौन है. मीडिया ने भी इस मामले को काफी उछाला था, फिर भी यह केस नहीं खुल सका था. इस मामले के खुलने की किसी को कोई उम्मीद भी नहीं थी.

अब 2 साल बाद जैसे ही लोगों को श्रीमहंत सुधीर गिरि के हत्यारों के गिरफ्तार होने की जानकारी मिली साधुसंतों, पत्रकारों के अलावा आम लोग भी कुंभ मेला नियंत्रण कक्ष के बाहर जमा हो गए थे. सभी के मन में हत्यारों के बारे में जानने की उत्सुकता थी. एसएसपी ने जब मौजूद लोगों के सामने महंत के हत्यारे की घोषणा की तो सभी दंग रह गए. क्योंकि पुलिस ने जिस आदमी का नाम बताया था, वह एक कंस्ट्रक्शन कंपनी का मालिक था और वह श्रीमहंत सुधीर गिरि के अखाड़े में मुंशी भी रह चुका था. उस का नाम था आशीष शर्मा.

आशीष शर्मा ने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या जो कहानी पुलिस को बताई थी, वह इस प्रकार थी. सुधीर गिरि का जन्म पुरानी रुड़की रोड स्थित दौलतपुर गांव के रहने वाले दर्शन गिरि के यहां हुआ था. दर्शन गिरि गांव में खेतीबाड़ी करते थे. उन के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. बच्चों को उस ने खेतीकिसानी से दूर रख कर उन्हें उच्च शिक्षा हासिल कराई.

पढ़लिख कर बड़े बेटे प्रदीप की रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला (पंजाब) में नौकरी लग गई. दोनों बेटियों की वह शादी कर चुके थे. कहते हैं कि पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं. सुधीर गिरि का साधुसंतों के प्रति लगाव बचपन से ही था. वर्ष 1981 में इन के पिता दर्शन गिरि ने उन्हें पढ़ने के लिए कनखल, हरिद्वार के एक स्कूल में भेजा तो सुधीर स्कूल से लौटने के बाद शाम को महानिर्वाणी अखाड़े के मंदिर में जरूर जाते थे.

उस समय वह बाबा हनुमान के सान्निध्य में रह कर मंदिर की देखरेख करते थे. हनुमान बाबा के सान्निध्य में रहने की वजह से सुधीर गिरि पर धीरेधीरे संन्यास का रंग चढ़ने लगा. उन का संसार, समाज और रिश्तेनाते से मोह भंग होने लगा.

सुधीर गिरि ने एक दिन अपने पिता से स्पष्ट कह भी दिया कि वह जल्द ही संन्यास ले लेंगे. यह सुन कर पिता हैरान रह गए. उन्होंने बेटे को समझाया. बाद में मां भी बेटे के सामने गिड़गिड़ाई, लेकिन सुधीर गिरि ने जिद नहीं छोड़ी. सुधीर गिरि के इस फैसले से घर में कोहराम मच गया. भाईबहनों और रिश्तेदारों ने भी सुधीर गिरि को समझाया और संन्यास न लेने की सलाह दी.

सुधीर गिरि ने सब की बात अनसुनी कर दी. बात सितंबर, 1988 की है. उस समय सुधीर गिरि की उम्र मात्र 13 साल थी और वह उस समय कक्षा 8 में पढ़ रहे थे. उसी दौरान वह अचानक घर से गायब हो गए. सुधीर गिरि के अचानक गायब होने से घर वाले परेशान हो गए. उन्होंने आसपास के क्षेत्रों व हरिद्वार के अखाड़ों में उन की काफी तलाश की. लेकिन सुधीर गिरि का कहीं भी पता नहीं चला. पिता दर्शन गिरि ने जब हनुमान बाबा से पूछा तो उन्होंने कहा कि सुधीर गिरि ने उन से दीक्षा तो ली थी, मगर इस समय वह कहां है, उन्हें मालूम नहीं.

घर वालों के जेहन में एक सवाल यह भी उठ रहा था कि कहीं उस की किसी ने हत्या तो नहीं कर दी. बहरहाल काफी खोजबीन के बाद भी जब सुधीर गिरि का कोई सुराग नहीं मिला तो घर वाले थकहार कर बैठ गए. 10 साल बाद दर्शन गिरि को कहीं से पता चला कि सुधीर गिरि कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के एक आश्रम में है और उस ने संन्यास ले लिया है. दर्शन गिरि परिवार सहित बेटे से मिलने कुरुक्षेत्र के आश्रम पहुंचे तो पहले सुधीर गिरि ने अपने परिजनों से मिलने से ही मना कर दिया.

किसी तरह जब मां व बहनें उस से मिलीं तो उन्होंने उन से साफ कह दिया कि अब उन्होंने संन्यास ले लिया है, इसलिए उन का इस समाज व संसार से कोई नाता नहीं है. यह सुनते ही मां और बहनों की आंखों में आंसू आ गए. वह उस से वापस घर चलने के लिए गिड़गिड़ाने लगीं. लेकिन सुधीर गिरि पर उन के गिड़गिड़ाने का कोई असर नहीं पड़ा.

सुधीर गिरि ने अंत में यही कहा, ‘‘संन्यास ले कर मैं ने कुछ ऐसा नहीं किया, जिस से परिवार की प्रतिष्ठा को धब्बा लगे. इसलिए मेरी आप लोगों से विनती है कि आप अब मेरा पीछा करना और मुझे खोजना बंद कर दें.’’

इतना कह कर सुधीर गिरि आश्रम के अंदर चले गए. परिजन रोतेबिलखते घर लौट गए.

इस के बाद सुधीर गिरि लगभग 6 सालों तक कुरुक्षेत्र में रहे. फिर वह हरिद्वार स्थित अखाड़े में रहने लगे. वह महंत हो गए तो उन के नाम के साथ श्रीमहंत जुड़ गया. श्रीमहंत सुधीर गिरि ज्यादातर अखाड़े की प्रौपर्टी की देखरेख में व्यस्त रहते थे. वह अकसर अखाड़े के संतों द्वारा जमीन बेचने का विरोध करते थे. अखाड़े में प्रौपर्टी डीलरों के आने पर उन्हें ऐतराज रहता था, इसलिए वह अपने अखाड़े में किसी प्रौपर्टी डीलर को घुसने नहीं देते थे.

इसी अखाड़े में आशीष शर्मा उर्फ टुल्ली काम करता था. वह कनखल के रहने वाले सुभाष शर्मा का बेटा था. अखाड़े की काफी जमीनजायदाद थी. आशीष का काम अखाड़े की आयव्यय का ब्यौरा रखना था. सालों पहले आशीष ने अखाड़े के संतों से कुछ जमीन सस्ते में खरीद कर महंगे दामों में बेच दी थी. इस के बाद वह कुछ प्रौपर्टी डीलरों व बिल्डरों से भी जुड़ गया था. सन 2004 में जब श्रीमहंत सुधीर गिरि गुरु हनुमान बाबा इस अखाड़े से जुड़े तो उन्होंने अखाड़े की जमीन बेचने का विरोध किया. इसी बात को ले कर एक बार आशीष और हनुमान बाबा की बहस हुई तो आशीष को अखाड़े से निकाल दिया गया.

सन 2006 में आशीष दोबारा अखाड़े में आया, तो उसे अखाड़े का मुंशी बना दिया गया. कुछ दिनों बाद आशीष ने अखाड़े की एक प्रौपर्टी को बेचने की बात चलाई तो हनुमान बाबा ने इस का विरोध किया. सन 2010 के कुंभ मेले के दौरान गुरु हनुमान के शिष्य श्रीमहंत सुधीर गिरि को अखाड़े का सचिव बनाया गया तो उन्होंने भी अखाड़े की जमीन बेचने का विरोध करना शुरू कर दिया. इस के एक साल बाद आशीष ने अपनी मरजी से अखाड़े की नौकरी छोड़ दी. प्रौपर्टी के धंधे में आशीष करोड़ों के वारेन्यारे कर चुका था.

आशीष पहले से ही श्रीमहंत से रंजिश रखता था, क्योंकि उन के विरोध की वजह से वह अखाड़े की जमीन नहीं बेच पाया था. इस के अलावा उसे इस बात का भी डर था कि कहीं श्रीमहंत उस के कारनामों की पुलिस प्रशासन के सामने पोलपट्टी न खोल दे, इसलिए आशीष उर्फ टुल्ली ने श्रीमहंत की हत्या कराने की ठान ली.

श्रीमहंत की हत्या करवाने के लिए आशीष ने मुजफ्फरनगर की सरकुलर रोड निवासी प्रौपर्टी डीलर हाजी नौशाद से संपर्क किया. हाजी नौशाद ने आशीष की मुलाकात इम्तियाज और महताब से कराई, जो शूटर थे. दोनों ही शूटर मुजफ्फरनगर में रहते थे. वे दोनों मुजफ्फरनगर के बदमाश थे. 9 लाख रुपए में श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या की बात तय हो गई.

उस वक्त श्रीमहंत कभी कनखल तो कभी बेलड़ा स्थित महानिर्वाणी अखाड़े में रहते थे. दोनों शूटर कई महीने तक आशीष के साथ बतौर ड्राइवर रहे और श्रीमहंत की रेकी करते रहे. 14 अप्रैल, 2012 को रात 8 बजे श्रीमहंत सुधीर गिरि हरिद्वार से गांव बेलड़ा स्थित महानिर्वाणी अखाड़े जा रहे थे. दोनों शूटर उन का पीछा कर रहे थे. जैसे ही श्रीमहंत की कार रुड़की के निकट बेलड़ा गांव के बाहर पहुंची, दोनों शूटरों ने उन पर फायरिंग कर के उन की हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद दोनों शूटर वापस मुजफ्फरनगर चले गए. फिर कुछ महीने बाद ये शूटर हरिद्वार आ कर आशीष के साथ प्रौपर्टी के धंधे में लग गए. आशीष का प्रौपर्टी का धंधा अच्छा चल रहा था. उस ने एक कंस्ट्रक्शन कंपनी भी बना ली थी. इम्तियाज और महताब को आशीष 25-25 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन देता था. इन दोनों शूटरों को उस ने अपने पास इसलिए रख रखा था कि विवाद वाली प्रौपर्टी का सौदा करने में उन का उपयोग कर सके.

मामला एक महंत की हत्या का था, इसलिए पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया. तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों के अलावा एसटीएफ ने भी श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या के मामले को सुलझाने की भरसक कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. जांच अधिकारियों को आशीष उर्फ टुल्ली पर शक तो हुआ था. लेकिन अपनी ऊंची पहुंच की वजह से बच गया था. पुलिस जब भी उस से सख्ती से पूछताछ करती, वह अपनी ऊंची पहुंच के बल पर विवेचना अधिकारी को ही बदलवा देता था.

श्रीमहंत की हत्या को तकरीबन 2 साल बीत चुके थे, इसलिए आशीष और दोनों शूटर निश्चिंत हो गए थे. आशीष इन शूटरों के जरिए देहरादून की एक प्रौपर्टी को हथियाने की योजना बना रहा था. श्रीमहंत की हत्या के बाद तत्कालीन क्षेत्रीय सांसद हरीश रावत अफसोस जताने कनखल स्थित महानिर्वाणी अखाड़े गए थे. उस वक्त हरीश रावत ने इस हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने की मांग तत्कालीन बहुगुणा सरकार से की थी. उत्तराखंड में राजनैतिक बयार बदलने पर हरीश रावत प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो संत समाज में श्रीमहंत सुधीर गिरि हत्याकांड खुलने की आस जागी.

अखिल भारतीय दशनाम गोस्वामी समाज के मीडिया प्रभारी प्रमोद गिरि ने 14 जून, 2014 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत को पत्र लिख कर श्रीमहंत की हत्या की सीबीआई जांच कराने की मांग की. प्रमोद गिरि के इस पत्र का जादू की तरह असर हुआ. पत्र पढ़ते ही मुख्यमंत्री हरीश रावत को अपने वे शब्द याद आ गए जो उन्होंने महानिर्वाणी आश्रम में कहे थे. इसलिए उन्होंने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या का राज खोलने के लिए प्रदेश पुलिस मुख्यालय को सख्त निर्देश दिए, साथ ही उन्होंने यह हिदायत भी दी कि इस केस की तफतीश करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कोई दबाव न बनाया जाए.

एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस हत्याकांड की जांच के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसपी (सिटी) एस.एस. पंवार, रुड़की के थानाप्रभारी योगेंद्र चौधरी, हरिद्वार के एसओजी प्रभारी नरेंद्र बिष्ट व रुड़की के एसओजी प्रभारी मोहम्मद यासीन को शामिल किया. टीम का निर्देशन एसपी (देहात) अजय सिंह कर रहे थे. केस की फाइल का विस्तृत अध्ययन करने के बाद टीम को आशीष शर्मा उर्फ टुल्ली पर शक हुआ.

तब एसपी (सिटी) एस.एस. पंवार ने आशीष शर्मा को अपने कार्यालय में बुला कर सख्ती से पूछताछ की तो इस हत्या पर पड़ा परदा हट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि श्रीमहंत की हत्या उसी ने कराई थी. इस के बाद उस ने हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता दी. आशीष से पूछताछ के बाद पुलिस ने 20 जून, 2014 को मुजफ्फरनगर से हाजी नौशाद, इम्तियाज और मेहताब को भी गिरफ्तार कर लिया.

तीनों आरोपियों को हरिद्वार ला कर गहन पूछताछ की गई. पूछताछ में इम्तियाज और महताब ने पुलिस को बताया कि उन की मुलाकात हाजी नौशाद ने ही आशीष शर्मा से कराई थी. उसी के कहने पर उन्होंने श्रीमहंत सुधीर गिरि की हत्या की थी. थानाप्रभारी योगेंद्र चौधरी ने चारों आरोपियों के बयान दर्ज कर लिए. उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त पिस्टल, एक देशी तमंचा और भारी मात्रा में कारतूस भी बरामद किया गया.

इंसपेक्टर योगेंद्र सिंह चौधरी ने बताया कि इस प्रकरण में आशीष से जुड़े कुछ नेताओं, पत्रकारों  और पुलिस वालों के नाम भी सामने आ रहे हैं. केस में अगर उन की संलिप्तता पाई जाती है तो सुबूत जुटा कर उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. पूछताछ और सुबूत जुटा कर सभी अभियुक्तों को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Bihar News: कथावाचक बन गया रेपिस्ट

Bihar News: धर्मग्रंथों की कहानियां, श्लोक और ज्ञान की मीठीमधुर बातें करने वाले कथावाचक श्रवण दास को नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप में जेल जाना पड़ा. एक पल में उस की महाज्ञानी, संत और धार्मिक छवि ध्वस्त हो गई. ललाट पर गाढ़े चंदन का लेप लगाने वाले इस पाखंडी की करतूतें इतनी वायरल हो रही हैं कि…

बिहार में मिथलांचल के शहर दरभंगा का श्रवण दास जब माता जानकी सीता की मार्मिक पीड़ा का वर्णन करने लगता, तब सामने बैठी सैकड़ों महिला श्रोताओं की आंखें नम हो जाती थीं. अधिकतर के मन में सीता के त्याग, तपस्या, ताकत और तप को ले कर तरहतरह के सवाल उठते थे. कुछ औरतें प्रश्न पूछ कर अपने मन को तसल्ली दे लेती थीं, जबकि कुछ के मन में सीता को ले कर बने सवाल उमड़तेघुमड़ते रहते थे.

उन्हीं श्रोताओं में रोशनी भी थी, जो अपनी मम्मी के साथ कथा सुनने के लिए अकसर जाती थी. वह कथावाचक श्रवण दास की छवि से काफी प्रभावित थी. उन के बोलने की शैली, लच्छेदार बातें, मधुर आवाज के साथ चेहरे के हावभाव और वेशभूषा को टकटकी लगाए देखती रहती थी. उस के मन में भी कई प्रश्न थे. उस बारे में जब मम्मी से पूछती, तब मम्मी का जवाब होता गुरुजी से ही मालूम करना होगा.

जून की गरमी का महीना चल रहा था. तारीख 3 जून, 2023. श्रवण दास महाराज का कथावाचन का कार्यक्रम समाप्त हो चुका था. सभी श्रोता प्रसाद ले कर अपनेअपने घर की ओर लौट रहे थे. रोशनी अपनी मम्मी के साथ एक किनारे खड़ी थी. उन दोनों को श्रवण दास से अलग से मिलना था. दरअसल, उस रोज कथावाचन के दौरान रोशनी ने ऐसा प्रश्न पूछ लिया था कि जिस का जवाब देने में श्रवण दास असहज महसूस करने लगा था. उस वक्त किसी तरह से तो उस ने रामायण और धार्मिक बातों के आधार पर प्रश्न का घुमाफिर कर जवाब दे दिया था, लेकिन रोशनी उस के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुई थी और निराशा का भाव लिए हुए अपनी जगह पर बैठ गई थी.

यह बात श्रवण दास ने भी महसूस की थी. हालांकि श्रवण दास ने यह भी कहा कि इस प्रश्न का जवाब विस्तार से समझाने में अधिक समय लग सकता है, जिस से कथावाचन कार्यक्रम में रुकावट आ जाएगी. इसी के साथ श्रवण दास ने अपनी कथा की कड़ी को आगे बढ़ा दिया था. थोड़ी देर में ही रोशनी और उस की मम्मी के पास पीले वस्त्र धारण किए हुए एक व्यक्ति आया. उस ने उन से धीमी आवाज में कहा, ”तुम्हें कथावाचन के बाद गुरुजी ने मिलने के लिए कहा है.’’

यह सुन कर रोशनी के चेहरे पर चमक आ गई थी, लेकिन उस की मम्मी चिंतित हो गई थी. आशंका हुई कि उसे गुरुजी की डांट सुननी पड़ेगी. कारण, कथा के समय बीच में कोई कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं करता है. उस ने सोच लिया था कि गुरुजी के पैरों पर गिर कर रोशनी की इस गलती की माफी मांग लेगी. यही कारण था कि मांबेटी एक किनारे खड़ी हो कर सभी श्रोताओं के जाने का इंतजार कर रही थीं. जल्द ही उन्हें उसी व्यक्ति ने आवाज दी और आने का इशारा किया, जिस ने उन्हें इंतजार करने को कहा था.

ऐसे फंसी नाबालिग

सहमते हुए मांबेटी उन के पास गईं. कुछ पल में दोनों श्रवण दास के सामने थे. युवा चेहरा, छरहरे बदन पर पीले रंग के वस्त्र, ललाट पर लगा हल्दी और चंदन का लेप साथ में लाल रंग का टीका! गजब का आकर्षण था. रोशनी अपने सामने श्रवण दास को देख कर हतप्रभ थी. जिस कथावाचक को वह दूर से मंच पर देखती थी, वह उस के सामने बैठा था. वह मंत्रमुग्ध हो गई थी, जबकि उस की मम्मी ‘गुरुजी माफ कऽ दिअ, बच्ची छै, आब किछु नहि पुछत (माफ कर दीजिए, बच्ची है, अब कुछ नहीं पूछेगी).’ मैथली भाषा में बोलती हुई झट से श्रवण दास के पैरों पर गिर पड़ी.

”अरेअरे! ऐसा मत करो माई! आप मुझ से बड़ी हो! बच्ची है…अभी प्रश्न नहीं पूछेगी तो कब पूछेगी. ज्ञान के लिए प्रश्न पूछना जरूरी है. मुझे खुशी हुई कि किसी ने तो कुछ पूछा. उस में हिम्मत है, तभी तो मन में आए प्रश्न पूछती है. मन में दबा कर नहीं रखती है.’’

”जी गुरुजी.’’

”माई! आप तो यहां रोजाना आती हैं. लगता है यहीं आसपास में रहती हैं. आप से एक मदद चाहिए.’’ श्रवण दास विनम्रता से बोला.

”जी गुरुजी, बताइए न! हम से जो होगा, जरूर करूंगी.’’

”हमें रहने के लिए भाड़े का कमरा चाहिए. यहां रहने में परेशानी होती है. कोई आप की नजर में हो तो दिलवा दो. जो भाड़ा होगा मिल जाएगा, लेकिन सेपरेट होना चाहिए.’’

”पता करूंगी गुरुजी,’’ रोशनी की मां बोली और वहां से जाने लगी. गुरुजी ने उसे प्रसाद दिया और जल्दी पता करने के लिए बोला.

मांबेटी प्रसन्न मन से घर लौट आईं. घर पहुंचते ही रोशनी मम्मी से बोली, ”मम्मी, गुरुजी को अपने मकान के पीछे वाला कमरा दे दो. वहां जाने का रास्ता भी अलग से है…उधर लैट्रीन बाथरूम भी बना है.’’

”अरे हां बेटी, यह तो हमारे ध्यान में नहीं आया.’’

”गुरुजी को फोन कर दो, आज ही आ कर कमरा देख लेंगे.’’ रोशनी सुझाव देती हुई बोली. उसी वक्त रोशनी की मम्मी ने मंदिर में लिखे नंबर पर फोन किया. वह नंबर गुरुजी के शिष्य का था. उसे उन्होंने भाड़े के कमरे के बारे में बताया और कमरा देखने के लिए गुरुजी को आने के लिए कह दिया. शिष्य ने तुरंत उन की बात श्रवण दास से करवा दी. वह अगले रोज दिन में कमरा देखने के लिए रोशनी के घर पहुंच गया. कमरा उसे पसंद आया और उस की अच्छी तरह से साफसफाई करवा कर 2 दिनों बाद वहां आ कर रहने लगा.

इस तरह श्रवण दास महाराज की सनातनी संत की जिंदगी रोशनी के घर के पिछवाड़े बने कमरे में गुजरने लगी. रोशनी और उस की मम्मी इस बात से आनंदित हो गए थे कि उन के घर में ही गुरुजी का वास हो गया है. वह जब चाहे दर्शन प्राप्त कर सकती है. जल्द ही श्रवण दास भी रोशनी और पूरे परिवार के लोगों के साथ घुलमिल गया. घर पर उस की वेषभूषा सामान्य व्यक्ति की तरह ही होती थी. उस के व्यक्तित्व में गजब का आकर्षण था. सब कुछ सामान्य चल रहा था. रोशनी का खानेपीने की चीजों को ले कर श्रवण दास के कमरे पर अकसर आनाजाना होने लगा था.

दोनों के बीच बातचीत होने लगी थी. वे धर्म आस्था की बातों के साथसाथ देशदुनिया, पढ़ाईलिखाई, मोबाइल, रील्स और समाज में चल रही घटनाओं की भी बातें करने लगे थे. रोशनी श्रवण दास की बोलने की शैली और हर बात को समझाने के तरीके की कायल बन चुकी थी. रोशनी को जब कभी लगता कि उस के मन में चल रहे किसी प्रश्न का जवाब नहीं मिल रहा है तो तुरंत श्रवण दास से उस का उत्तर जानने के लिए पहुंच जाती थी. उस के प्रश्नों को सुन कर श्रवण दास भी अचंभित हो जाता था.

वह अकसर माता सीता और उन के स्वयंवर, वीरता और श्रीराम द्वारा त्याग से जुड़े ऐसेऐसे सवाल पूछती थी, जिन का श्रवण दास को जवाब देते नहीं बनता था. रोशनी कई बार इतनी गूढ़ बातें कर देती थी कि उस का हल श्रवण दास को ‘जनक संवाद’ पुस्तक में भी नहीं मिलता था.

प्रैग्नेंसी से बढ़ी चिंता

इसी बीच कब रोशनी और श्रवण दास एकदूसरे के दिल के करीब आ गए, उन्हें पता भी नहीं चला. दोनों काफी समय तक अकेले में बातें करने लगे. रोशनी को लगता कि वह श्रवण दास से ज्ञान की बातें सीख रही है, जबकि उस के सामने होने पर श्रवण दास के दिल की धड़कनें एक आम नवयुवक की तरह धड़कने लगती थीं. दोनों की जानपहचान भले ही धार्मिकता और सनातनी आस्था के माध्यम से हुई हो, लेकिन उन की भावनाएं ‘आग’ और ‘सूखे खेर’ की तरह ही थी, जिन का संसर्ग होना स्वाभाविक था. …और हुआ भी ऐसा ही, वे खुद को रोक नहीं पाए.

इस की जानकारी रोशनी को तब हुई, जब उसे महसूस हुआ कि वह गर्भस्थ हो चुकी है. उस ने इस बारे में श्रवण दास को बताया. श्रवण दास ने उसे चुप रहने को कहा. कुछ गोलियों का पत्ता उसे पकड़ाते हुए कहा कि इसे नियमित लेती रहना, सब कुछ ठीक हो जाएगा. रोशनी समझ गई कि गोलियां गर्भावस्था रोकने की हैं और घरपरिवार की इज्जत का खयाल रखते हुए उस का नियमित सेवन करने लगी. किंतु इस बात से भी डर गई कि घर में किसी को पता चलेगा, तब इस का वह क्या जवाब देगी. उस ने श्रवण दास से अपनी चिंता जताई.

श्रवण दास ने उसे अपने विश्वास में ले लिया कि वह जल्द ही उस के साथ शादी कर लेगा, लेकिन इस के लिए उस की उम्र नहीं है. कानून के अनुसार वह नाबालिग है. उस के बालिग होते ही वह उस के साथ कोर्ट मैरिज करेगा. इस आश्वासन पर वह चुप लगा गई. किंतु चिंता में घुलने लगी. कई महीने गुजर गए. उदास रहने लगी. सेहत में गिरावट आ गई. उस की मम्मी ने एक दिन उस के कमजोर दिखने का कारण पूछ लिया. मम्मी की ममता और स्नेह के आगे रोशनी खुद को रोक नहीं पाई. मम्मी की गोद में सिर छिपा कर सिसकने लगी. मम्मी ने प्यार से पुचकारा, तब उस ने आपबीती सुना दी.

यह सुनते ही मम्मी स्तब्ध रह गई. उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि जिसे वह गुरु मानती थी, वह उस की बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करेगा. वह परेशान हो गई. वह क्या करे और क्या नहीं? कुछ समझ में नहीं आ रहा था. एक तरफ उस की बेटी और परिवारसमाज की इज्जत का सवाल था, दूसरी तरफ गुरु की लोकप्रियता थी. इसी उधेड़बुन में कई महीने गुजर गए. किंतु पानी जब उस के सिर से निकलने लगा, तब उस ने श्रवण दास के गुरु मौनी बाबा से इस बारे में बात की. मौनी बाबा ने इस का समाधान निकालने के बजाए उसे ही धमका दिया और चुप रहने को कहा.

रोशनी और श्रवण दास का आपसी मामला फरवरी, 2024 से शुरू हुआ, उस के बाद करीब डेढ़ साल बीत गए. रोशनी को काफी रक्तस्राव होने से तबीयत अचानक बिगड़ गई. वह मरणासन्न हालत में पहुंच गई थी. किसी तरह से उस की जान बच पाई.

जब मामला हद से बाहर हो गया, तब रोशनी की मम्मी लहेरियासराय के महिला थाने में गई. वहां गुरु श्रवण दास के खिलाफ लिखित शिकायत की. दरभंगा के प्रसिद्ध कथावाचक श्रवण दास और उस के गुरु रामउदित दास उर्फ मौनी बाबा के खिलाफ गंभीर आरोपों के साथ मामले का विस्तार से विवरण दिया.  उस की शिकायत के आधार पर महिला थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई. दोनों के खिलाफ पोक्सो एक्ट की धारा 4/6/64(1) सहित बीएनएस की धारा 351(2), 352, 89 और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

बाबा हुआ अरेस्ट

इस की जानकारी डीएसपी (सदर) राजीव कुमार को दी गई. इस के साथ ही कथावाचक की गिरफ्तारी के लिए दरभंगा के एसएसपी जगुनाथ रेड्ïडी ने एक एसआईटी टीम का गठन किया, जिस की कमान दरभंगा (सदर) के डीएसपी राजीव कुमार को सौंप दी गई. जांच की जिम्मेदारी संभालते ही उन्होंने तुरंत एफएसएल टीम से भी जांच शुरू करवा दी. पीडि़ता का मैडिकल करवाया गया. उस के बाद महिला थाने की एसएचओ मनीषा कुमारी और लहेरियासराय थाने की संयुक्त टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर हाउसिंग बोर्ड कालोनी से 17 जनवरी, 2026 को कथावाचक श्रवण दास को गिरफ्तार कर लिया.

पचाढ़ी मठ के महंत और राम जानकी मंदिर, बलभद्रपुर के महंत रामउदित दास के शिष्य एवं कथावाचक श्रवण दास पर एक नाबालिग लड़की से शादी का झांसा दे कर लंबे समय तक शारीरिक शोषण का आरोप लगाया था. उन्हीं दिनों लड़की ने मामले से जुड़े कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर जारी कर दिए थे, जिन में कथावाचक के साथ बंद कमरे में शादी से जुड़े दृश्य भी सामने आए थे.

रोशनी की मम्मी द्वारा महिला थाने में दी गई तहरीर में आरोप लगाया कि कथावाचक श्रवण दास ने मेरी नाबालिग बेटी रोशनी को बहलाफुसला कर शादी का झांसा दिया और करीब एक साल तक उस के साथ दुष्कर्म करता रहा. इस दौरान बेटी गर्भवती हो गई, जिस के बाद आरोपी ने 2 बार दवा खिला कर गर्भपात कराया.  इस से बेटी को अत्यधिक रक्तस्राव हुआ और उस की हालत गंभीर हो गई. बाद में उसे अस्पताल में भरती कराया, जहां इलाज के बाद उस की जान बच सकी.

तहरीर में यह भी उल्लेख किया गया कि श्रवण दास ने हमारे घर में ही किराए पर कमरा ले रखा था. घर में किसी के नहीं होने पर वह नाबालिग के साथ दुष्कर्म करता था. इस बारे में हम ने जब महंत मौनी बाबा से शिकायत की, तब तब उन्होंने बेटी के बालिग होने पर शादी कराने का आश्वासन दिया. सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में श्रवण दास और नाबालिग रोशनी की बंद कमरे में शादी दिखाई देती है. इस बारे में आरोप लगा कि 29 नवंबर, 2024 को महंत मौनी बाबा ने श्रवण दास की शादी गुपचुप तरीके से करवा दी और पीडि़ता के परिजनों पर मामला दर्ज नहीं कराने का दबाव बनाया.

यह भी आरोप लगाया गया कि कथावाचक ने अश्लील फोटो और वीडियो बना कर पीडि़ता को जान से मारने की धमकी दी. साथ ही 8 से 10 लोगों के साथ घर पर आ कर केस न करने का दबाव बनाया गया. श्रवण दास महाराज के नाम से मशहूर हो चुके चर्चित कथावाचक का असली नाम श्रवण ठाकुर है. वह दरभंगा के बिरौल थाना क्षेत्र के पर्री गांव का निवासी है, लेकिन उस ने लहेरियासराय थाना क्षेत्र अंतर्गत पचाढ़ी छावनी के रामजानकी मंदिर में अपना ठौरठिकाना बना रखा था. साथ में उस के गुरु मौनी बाबा भी रहते थे.

बताया जाता है कि श्रवण दास 8 साल की उम्र में घर छोड़ कर मौनी बाबा के पास आ गया था. हालांकि इस के बाद उस ने पढ़ाईलिखाई की और उस ने पीएचडी तक की पढ़ाई की है. पिछले 10 साल से वह कथावाचन कर रहा है. उस की पहचान बड़े संत कथावाचक के रूप में हो गई थी. वह कथाओं, दानदक्षिणा व चमत्कारों के दावों से लोगों को आकर्षित कर लेता था. स्थानीय लोगों और कुछ शिष्यों को उस के आचरण, धन के लेनदेन और कथित चमत्कारों पर पहले से शक हो गया था. जब उस की गतिविधियों पर लोगों ने गहरी नजर डाली, तब उस की कई बातें काल्पनिक और भ्रामक पाई गईं.

वह कहने को तो संन्यास जीवन गुजारने वाला संत था, लेकिन वास्तविक जीवन में इस के उलटा था. एकदम से सामान्य जीवन गुजारने वाले व्यक्ति से भी भिन्न था. दान में मिले पैसों का गलत इस्तेमाल करता था. सभी पैसे अपने निजी जीवन को बेहतर बनाने के लिए खर्च करता था. लोकप्रिय कथावाचक श्रवण दास की गिरफ्तारी से पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई. उस से लिए गए बयानों में कई असमानताएं पाई गईं. नाबालिग से यौन उत्पीडऩ के आरोप में उसे न्यायिक हिरासत में ले कर दरभंगा जेल में बंद कर दिया गया. उस ने पीडि़ता के साथ अपने संबंधों को तो स्वीकार कर लिया, लेकिन जमानत याचिका भी दाखिल की.

इस पर विशेष न्यायाधीश प्रतिमा परिहार ने बचाव पक्ष और पीडि़ता के अधिवक्ता से कुछ कानूनी सवालों के जवाब मांगे. अब इस मामले में अगली सुनवाई 4 फरवरी को तय की गई है. जबकि कथा लिखे जाने तक सहआरोपी मौनी बाबा फरार था, उस की तलाश जारी थी. श्रवण दास द्वारा आस्था की आड़ में नाबालिग के शोषण का एक चौंकाने वाला मामला बन गया है. उस के खिलाफ काररवाई लंबी निगरानी और पुख्ता सबूतों के आधार पर की गई है. आरोपी के खिलाफ दिसंबर, 2025 में महिला थाने में दर्ज की गई रिपोर्ट के बाद से वह पुलिस की पकड़ से दूर था. उसे पकडऩे के लिए एसआईटी की मदद ली गई.

पीडि़ता की शिकायत के अनुसार, आरोपी ने न केवल उस का शारीरिक शोषण किया, बल्कि गर्भवती होने पर उसे गर्भपात की दवाएं लेने के लिए भी मजबूर किया, जिस से उस की स्थिति नाजुक हो गई. इस मामले में पोक्सो ऐक्ट के तहत शिकंजा कसा जा चुका है. Bihar News

कथा में रोशनी परिवर्तित नाम है

 

 

Crime News: मासूम बच्चों का सीरियल किलर – पुलिस की गिरफ्त में

Crime News: सीरियल किलर रविंद्र एकएक कर के करीब 40 मासूमों के साथ कुकर्म कर उन की हत्याएं कर चुका था. निशा की हत्या करने के बाद यदि वह अपनी मां के प्रेमी सन्नी को फंसाने की कोशिश न करता तो शायद अब भी गिरफ्तार नहीं हो पाता.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव के नजदीक जैननगर में काफी बड़ी झुग्गी बस्ती है. यह इलाका बेगमपुर थाने के अंतर्गत आता है. इसी बस्ती के रहने वाले संतोष कुमार की 6 वर्षीया बेटी निशा रोजाना की तरह 14 जुलाई को भी नित्य क्रिया के लिए सूखी नहर की तरफ गई थी. सुबह 6 बजे घर से निकली निशा जब आधापौने घंटे बाद भी घर नहीं लौटी तो मां पुष्पा देवी चिंतित हुई. चिंता की बात इसलिए थी क्योंकि निशा को तैयार हो कर 7 बजे स्कूल के लिए निकलना था. वह नजदीक के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. कुछ देर और इंतजार करने के बाद भी वह नहीं आई तो पुष्पा बेटी को देखने के लिए सूखी नहर की तरफ चली गई.

पुष्पा ने सूखी नहर की तरफ जा कर बेटी को ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली. उधर आनेजाने वाली महिलाओं और बच्चों से भी उस ने बेटी के बारे में पता किया, पर कोई भी उस की बच्ची के बारे में नहीं बता सका. तब परेशान हो कर वह घर लौट आई. उस ने यह बात पति संतोष को बताई तो वह भी परेशान हो गया. अब तक बेटी के स्कूल जाने का समय हो गया था. मियांबीवी एक बार फिर बेटी को ढूंढने निकल गए. उन के साथ पड़ोसी भी उन की मदद के लिए गए थे. एक, डेढ़ घंटे तक वह बेटी को इधरउधर ढूंढते रहे, लेकिन उस का पता नहीं चल सका.

बस्ती के लोग इस बात से हैरान थे कि आखिर घर और सूखी नहर के बीच से बच्ची कहां गायब हो गई? संतोष की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह बच्ची को कहां ढूंढे? आखिर वह पड़ोसियों को ले कर थाना बेगमपुर पहुंचा. थानाप्रभारी रमेश सिंह उस दिन छुट्टी पर थे. थाने का चार्ज अतिरिक्त थानाप्रभारी जगमंदर दहिया संभाले हुए थे. संतोष कुमार ने उन्हें बेटी के गुम होने की बात बताई.

बच्ची की उम्र 6 साल थी, इसलिए पुलिस यह भी नहीं कह सकती थी कि वह अपने किसी प्रेमी के साथ चली गई होगी. दूसरे बच्ची के पिता की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. संतोष ने बताया था कि उस की किसी से कोई दुश्मनी वगैरह नहीं थी. इन सब बातों को देखते हुए पुलिस को यही लग रहा था कि या तो बच्ची खेलतेखेलते कहीं चली गई है या फिर उसे बच्चा चुराने वाला कोई गैंग उठा ले गया है.

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में तमाम बच्चे रहस्यमय तरीके से गायब हो रहे थे. इसी बात को ध्यान में रख कर उन्होंने उसी समय निशा के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी और इस की जांच हेडकांस्टेबल शमशेर सिंह को सौंप दी. बच्ची के अपहरण का मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद दिल्ली के समस्त थानों में उस का हुलिया बता कर वायरलैस से सूचना दे दी गई. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया कुछ पुलिसकर्मियों के साथ उस जगह पर पहुंच गए, जहां से बच्ची लापता हुई थी. उन्होंने संतोष के घर से ले कर सूखी नहर तक का निरीक्षण किया. उसी दौरान उन्होंने कुछ लोगों से बात भी की, लेकिन उन्हें ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस के सहारे लापता बच्ची का पता लगाया जा सकता.

वह उधर की झाडि़यों में भी यह सोच कर खोजबीन करने लगे कि कहीं किसी बहशी दरिंदे ने उसे अपना शिकार न बना लिया हो. क्योंकि आए दिन बच्चों के साथ कुकर्म करने जैसे मामले सामने आते रहते थे. झाडि़यों में भी उन्हें कुछ नहीं मिला. संतोष के घर से करीब 50 मीटर की दूरी पर एक निर्माणाधीन इमारत दिखाई दे रही थी. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया ने अपने आसपास खड़े बस्ती वालों से उस इमारत के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह बिल्डिंग किसी जैन की है, लेकिन पिछले काफी दिनों से इस के निर्माण का काम रुका हुआ है.

जिज्ञासावश वह उस बिल्डिंग की तरफ चल दिए. जैननगर की गली नंबर 6 में निर्माणाधीन उस 3 मंजिला बिल्डिंग में जब वह घुसे तो एक कमरे में उन्हें एक बच्ची निर्वस्त्र हालत में पड़ी मिली. वह मृत अवस्था में थी. उन के साथ मौजूद संतोष उस बच्ची को देख कर चीख पड़ा. वह उसी की बेटी निशा थी. बच्ची का निचला हिस्सा खून से सना हुआ था. उस के कपड़े पास पड़े हुए थे. निशा की हालत देख कर इंसपेक्टर दहिया समझ गए कि यह किसी दरिंदे की शिकार बनी है. निशा की हत्या की खबर सुन कर बस्ती के सैकड़ों लोग थोड़ी देर में वहां जमा हो गए. इंसपेक्टर दहिया ने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों के अलावा क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम व फोरैंसिक टीम को भी दे दी.

कुछ देर बाद बाहरी दिल्ली के डीसीपी विक्रमजीत, डीसीपी-2 श्वेता चौहान, एसीपी ऋषिदेव कराला भी जैननगर पहुंच गए. डीसीपी ने मौके पर क्राइम ब्रांच को भी बुलवा लिया. क्राइम इन्वैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीम भी मौके से सबूत जुटाने लगी. इन टीमों का काम निपटने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उसी बिल्डिंग में दूसरी मंजिल पर एक ड्राइविंग लाइसेंस और ट्रांसपोर्ट से संबंधित कुछ कागज मिले. पुलिस ने वह सब अपने कब्जे में ले लिया.

लाश का मुआयना करने पर यही लग रहा था कि किसी ने उस बच्ची के साथ गलत काम कर के उस का गला घोंट दिया है. निशा की हत्या पर बस्ती के लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. इस से पहले कि वे कोई आक्रामक कदम उठाते, पुलिस ने उन्हें समझाबुझा कर शांत कर दिया. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुल्तानपुरी के संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल भेज दिया.

इस मामले को सुलझाने के लिए डीसीपी विक्रमजीत ने एसीपी ऋषिदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर जगमंदर दहिया, एएसआई सुरेंद्रपाल, हेडकांस्टेबल नरेंद्र कुमार, कांस्टेबल टी.आर. मीणा आदि को शामिल किया गया. जिस बिल्डिंग में निशा की लाश मिली थी, उसी बिल्डिंग में पुलिस को जो ड्राइविंग लाइसेंस और कागजात मिले थे, उन की जांच शुरू की गई. ड्राइविंग लाइसेंस पर सन्नी पुत्र सुरेंद्र कुमार नाम लिखा था. उस पर जो पता लिखा था, वह कराला के जैननगर का ही था. यानी यह पता वही था, जहां मरने वाली बच्ची रहती थी.

खैर, पुलिस सन्नी के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पता चला कि वह डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती है. जब पुलिस अस्पताल पहुंची तो जानकारी मिली कि सन्नी को कुछ देर पहले ही डिस्चार्ज कर दिया गया था. लिहाजा उलटे पांव पुलिस जैननगर लौट आई. सन्नी घर पर ही मिल गया. उस के हाथपैर और शरीर के अन्य भागों पर चोट लगी हुई थी. पुलिस ने 14 जुलाई को ही सन्नी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कल रात पड़ोस के ही रविंद्र, उस के भाई सुनील और उस के दोस्त हिमांशु ने उस की खूब पिटाई की थी. पिटाई करने के बाद रविंद्र उस की जेब से मोबाइल, ड्राइविंग लाइसेंस, पैसे आदि निकाल कर ले गया था. मुझे उम्मीद है कि उसी ने यह सब किया होगा.

रविंद्र का घर सन्नी के घर के पास ही था. पुलिस उस के घर गई तो वह और उस के भाई में से कोई नहीं मिला. घर पर मौजूद उस के पिता ने पुलिस को बताया कि दोनों भाई अपने किसी दोस्त के यहां गए हुए हैं. पुलिस उस के पिता को हिदायत दे कर चली आई. पुलिस ने रविंद्र के बारे में छानबीन की तो जानकारी मिली कि पिछले साल उस ने बेगमपुर थानाक्षेत्र में ही एक बच्चे के साथ कुकर्म कर के उस की गला काट कर हत्या कर दी थी. इस की रिपोर्ट थाना बेगमपुर में ही भादंवि की धारा 363/307/377 के तहत लिखी गई थी. इस मामले में वह गिरफ्तार हुआ था. गिरफ्तारी के 6 महीने बाद सन्नी के पिता सुरेंद्र सिंह ने उस की जमानत कराई थी. तब वह जेल से बाहर आया था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को रविंद्र पर शक हुआ. उस का जो मोबाइल नंबर पुलिस को मिला था, वह स्विच्ड औफ था. पुलिस टीम रविंद्र को सरगर्मी से तलाशने लगी. 2 दिन बाद एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने 16 जुलाई, 2015 को उसे थाना क्षेत्र के ही सुखवीरनगर बस स्टौप से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब रविंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने निशा की हत्या का जुर्म तो स्वीकार कर ही लिया, इस के अलावा उस ने ऐसा खुलासा किया कि पुलिस हैरान रह गई.

उस ने बताया कि वह निशा की तरह तकरीबन 40 बच्चों की हत्या कर चुका है. पुलिस तो केवल मर्डर के एक केस को खोलने के लिए रविंद्र को तलाश रही थी, लेकिन वह इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, पता नहीं था. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उन्होंने उसी समय डीसीपी विक्रमजीत को यह जानकारी दी तो आधे घंटे के अंदर वह भी बेगमपुर थाने पहुंच गए.

एक लाश और ड्राइविंग लाइसेंस ने ऐसे गुनाह से परदा उठा दिया था, जिसे सुन कर इंसानियत भी शर्मशार हो जाए. उस ने डीसीपी के सामने रोंगटे खड़ी कर देने वाली बच्चों की हत्या की जो कहानी बताई, वह नोएडा के निठारी कांड से कम नहीं थी. रविंद्र ने बताया कि वह बच्चों की हत्या करने के बाद ही उन से कुकर्म करता था. उस के खुलासे पर डीसीपी भी चौंके. 24 साल के रविंद्र ने एक के बाद एक कर के करीब 40 बच्चों की हत्या करने और सैक्स एडिक्ट बनने की जो कहानी बताई, वह दिल को झकझोरने वाली थी.

रविंद्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के कस्बा गंज डुंडवारा के रहने वाले ब्रह्मानंद का बेटा था. रविंद्र के अलावा उस के 3 और बेटे थे. ब्रह्मानंद प्लंबर का काम करता था, इसलिए उस की हैसियत ऐसी नहीं थी कि वह बच्चों को पढ़ा सकता. लिहाजा जब उस के 2 बेटे बड़े हुए तो वह उन से भी मजदूरी कराने लगा. बेटे कमाने लगे तो उस के घर की माली हालत सुधरने लगी. उसी दौरान सन 1990 में गंज डुंडवारा में दंगा भड़क गया तो ब्रह्मानंद अपनी पत्नी मंजू और बच्चों को ले कर दिल्ली आ गया.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव में उस की जानपहचान के तमाम लोग रहते थे. लिहाजा वह भी उन के साथ कराला में रहने लगा. उस समय मंजू गर्भवती थी. कुछ दिनों बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रविंद्र रखा. घर में सब से छोटा होने की वजह से वह सब का प्यारा था. ब्रह्मानंद्र अपने बाकी बच्चों को तो पढ़ा नहीं सका था, लेकिन वह रविंद्र को पढ़ाना चाहता था. जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो उस ने उस का दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया. लेकिन मोहल्ले के बच्चों की संगत में पड़ कर वह पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. वह नशा करने वाले बच्चों की संगत में पड़ गया, जिस से वह भी चरस, गांजा आदि पीने लगा. घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने उसे डांटा भी, लेकिन वह नहीं माना.

रविंद्र नहीं पढ़ा तो ब्रह्मानंद उसे अपने साथ काम पर ले जाने लगा. लेकिन उस की आदत तो दोस्तों के साथ घूमने की थी. पिता के साथ मेहनत का काम भला वह क्यों करता. इसलिए वह पिता के साथ भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका. उसे जब खर्च के लिए पैसों की जरूरत होती, वह अपनी जानपहचान वाले ड्राइवर सन्नी के साथ हेल्परी करने चला जाता. सन्नी उसी के पड़ोस में रहता था और वह ट्रेलर चलाता था. उस का ट्रेलर मुंडका मैट्रो स्टेशन के निर्माण के कार्य में लगा हुआ था. रविंद्र वहां से जो भी कमाता, अपने नशा के शौक पर उड़ा देता था.

सन 2008 की बात है. उस समय रविंद्र करीब 17 साल का था. एक बार वह आधी रात को दोस्तों से फारिग हो कर अपने घर लौट रहा था. उस ने कराला में एक झुग्गी के बाहर मांबाप के साथ सो रही बच्ची को देखा. उस बच्ची की उम्र कोई 6 साल थी. उस बच्ची को देख कर रविंद्र की कामवासना जाग उठी. वह चुपके से गहरी नींद में सो रही उस बच्ची को उठा ले गया. बच्ची के मांबाप को पता ही नहीं चला कि उन की बेटी उन के पास से गायब हो चुकी है. रविंद्र उस बच्ची को सूखी नहर की तरफ ले गया. जैसे ही उस ने उस बच्ची को जमीन पर लिटाया वह जाग गई.

खुद को सुनसान और अंधेरे में देख कर वह डर गई. वहां उस के मांबाप की जगह एक अनजान आदमी था. वह रोने लगी तो रविंद्र ने डराधमका कर उसे चुप करा दिया. उस के बाद उस ने उस के साथ कुकर्म किया. बच्ची दर्द से चिल्लाने लगी तो उस ने उस का मुंह दबा दिया. कुछ ही देर में वह बेहोश हो गई. भेद खुलने के डर से उस ने बच्ची की  गला दबा कर हत्या कर दी और अपने घर चला गया. अगली सुबह झुग्गी के बाहर सो रहे दंपति को जब अपनी बेटी गायब मिली तो वह उसे खोजने लगे. उसी दौरान उन्हें सूखी नहर में बेटी की लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे वहां पहुंचे. इस मामले की थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई, लेकिन पुलिस केस को नहीं खोल सकी.

केस न खुलने से रविंद्र की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सन 2009 में बाहरी दिल्ली के ही विजय विहार, रोहिणी इलाके से 6-7 साल के एक लड़के को बहलाफुसला कर वह सुनसान जगह पर ले गया और कुकर्म करने के बाद उस की हत्या कर दी. इस मामले को भी पुलिस नहीं खोल सकी. रविंद्र को अपनी कामवासना शांत करने का यह तरीका अच्छा लगा. क्योंकि वह 2 हत्याएं कर चुका था और दोनों ही मामलों में वह सुरक्षित रहा, इस से उस के मन का डर निकल गया. इस के बाद वह कंझावला इलाके में एक बच्ची को बहलाफुसला कर सुनसान जगह पर ले गया और उस के साथ कुकर्म कर के उस की हत्या कर दी.

वह कोई एक काम जम कर नहीं करता था. कभी गाड़ी पर हेल्परी का काम करता तो कभी बेलदारी करने लगता. नोएडा के सेक्टर-72 में वह एक बिल्डिंग में काम कर रहा था. वहां भी उस ने अपने साथ काम करने वाली महिला बेलदारों की 2 बच्चियों को अलगअलग समय पर अपनी हवस का शिकार बनाया. वह उन बच्चियों को चौकलेट दिलाने के लालच में गेहूं के खेत में गया. वहीं पर उस ने उन की गला दबा कर हत्या कर दी थी.

उस के पिता ब्रह्मानंद का दिल्ली आने के बाद अपने गांव जाना नहीं हो पाता था, लेकिन रविंद्र कभीकभी अपने गांव जाता रहता था. खानदान के और लोग भी दिल्ली और नोएडा चले आए थे. रविंद्र जब भी गांव जाता, गंज डुंडवारा के पास गांव नूरपुर में अपनी मौसी मुन्नी देवी के यहां ठहरता था. वहीं पास के ही बिरारपुर गांव में उस की बुआ कृपा देवी का घर था. कभीकभी वह उन के यहां भी चला जाता था. उस की हैवानियत वहां भी जाग उठी तो उस ने वहां भी अलगअलग समय पर 2 बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया.

अब तक रविंद्र सैक्स एडिक्ट हो चुका था. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह अपने शिकार को तलाशता रहता. बच्चे उस का शिकार आसानी से बन जाते थे, इसलिए वे उस का सौफ्ट टारगेट बन जाते थे. ज्यादातर वह झुग्गीझोपडि़यों या गरीब परिवारों के बच्चों को ही निशाना बनाता था, ताकि वे लोग ज्यादा कानूनी काररवाई न कर सकें. इस तरह उस ने दिल्ली के निहाल विहार, मुंडका, कंझावला, बादली, शालीमार बाग, नरेला, विजय विहार, अलीपुर हरियाणा के बहादुरगढ़, फरीदाबाद, उत्तर प्रदेश के सिकंदराऊ, अलीगढ़ आदि जगहों पर 6 से 9 साल के करीब 40 लड़केलड़कियों को अपना निशाना बनाया. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह कुकर्म के बाद हर बच्चे की हत्या कर देता था. ज्यादातर के साथ उस ने मारने के बाद कुकर्म किया था.

उस ने कई बच्चों की लाशें ऐसी जगहों पर डाली थी कि पुलिस भी उन्हें बरामद नहीं कर सकी. 4 जून, 2014 को उस ने अपने दोस्त राहुल के साथ अपनी ही बस्ती जैननगर के कृष्ण कुमार के 6 साल के बेटे शिबू को सोते हुए उठा लिया. दोनों उसे आधा किलोमीटर दूर सुनसान जगह पर ले गए और उस के साथ कुकर्म किया. राहुल नाई था. वह अपने साथ उस्तरा भी ले गया था. बाद में उस ने उसी उस्तरे से उस का गला काट कर लाश सूखी गटर में डाल दिया था. बच्चे को गटर में डालते हुए उन्हें किसी ने देख लिया था. उन दोनों ने तो यही समझा था कि शिबू मर चुका है, लेकिन वह जीवित था. अगले दिन जब खोजबीन हुई तो वह सूखी गटर में पड़ा मिला.

जिस शख्स ने रविंद्र और राहुल को देखा था, उसी ने अगले दिन पुलिस को सब बता दिया. नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने रविंद्र और राहुल को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. रविंद्र जिस सन्नी के साथ ट्रेलर पर हैल्परी करता था, उसी सन्नी के रविंद्र की मां मंजू से अवैधसंबंध थे. बेटे के जेल जाने के बाद मंजू परेशान हो गई. वह बेटे की जमानत की कोशिश में लग गई. कहसुन कर उस ने सन्नी के पिता सुरेंद्र से बेटे की जमानत करवा ली. लिहाजा 20 मई, 2015 को रविंद्र जेल से बाहर आ गया.

बात 13 जुलाई, 2015 की है. मंजू अपने घर में अकेली थी. उस ने फोन कर के अपने प्रेमी सन्नी को घर पर बुला लिया. दोनों अपनी हसरतें पूरी करते, अचानक रविंद्र घर आ गया था. सन्नी उस समय मंजू से बातें कर रहा. इसलिए रविंद्र को उस पर कोई शक वगैरह नहीं हुआ. रविंद्र के आने के बाद मंजू और सन्नी की योजना खटाई में पड़ती नजर आ रही थी. बेटे को बाहर भेजने के लिए मंजू ने घर में पड़ा टेप रिकौर्डर रविंद्र को देते हुए कहा कि वह उसे ठीक करा लाए. मां के कहने पर रविंद्र टेप रिकौर्डर ठीक कराने चला गया.

बेटे के जाते ही मंजू और सन्नी अपनी हसरतें पूरी करने लगे, लेकिन मैकेनिक की दुकान बंद होने की वजह से रविंद्र जल्द ही वापस लौट आया. घर का दरवाजा बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा नहीं खुला, फिर वह गली में जा कर खड़ा हो गया. उधर दरवाजा खटखटाने पर मंजू और सन्नी की कामलीला में व्यवधान पड़ गया. फटाफट दोनों ने कपड़े पहने और सन्नी दरवाजा खोल कर चला गया. सन्नी रविंद्र को नहीं देख सका. अपने घर से सन्नी को निकलता देख रविंद्र का माथा घूम गया. वह समझ गया कि उस की मां के साथ सन्नी का जरूर कोई चक्कर चल रहा है.

उस ने उसी समय तय कर लिया कि वह सन्नी को सबक सिखा कर रहेगा. उस ने यह बात अपने भाई सुनील को बताई तो सुनील का भी सन्नी के प्रति खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने सन्नी के खिलाफ योजना बना ली. इस योजना में रविंद्र ने अपने दोस्त हिमांशु को भी शामिल कर लिया. उसी दिन शाम को रविंद्र ने सन्नी से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि वह इस समय मुंडका में है. योजना को अंजाम देने के लिए रविंद्र, हिमांशु और सुनील को ले कर मुंडका पहुंच गया. सन्नी उन्हें वहीं मिल गया. सन्नी के साथ उन्होंने एक जगह बैठ कर शराब पी. सन्नी पर जब थोड़ा नशा चढ़ गया तो उसी दौरान तीनों ने सन्नी की जम कर पिटाई की और रविंद्र ने उस की जेब से उस का मोबाइल फोन और ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य कागजात निकाल लिए.

रविंद्र ने सन्नी को जिंदा जलाने के लिए उसी की मोटरसाइकिल से पेट्रौल निकाल कर उसी के ऊपर छिड़क दिया. लेकिन सुनील ने उसे आग लगाने से रोक दिया. सुनील यह कहते हुए भाई को समझा दिया कि अभी इस के लिए इतनी ही सजा काफी है. अगर यह अब भी नहीं मानेगा तो इसे दुनिया से ही मिटा देंगे. उसी वक्त मौका मिलते ही सन्नी वहां से खेतों की तरफ भाग गया. सन्नी की बाइक ले कर रविंद्र, सुनील और हिमांशु अपने घर चले गए.

सन्नी रात भर खेतों में ही रहा. डर की वजह से वह घर तक नहीं गया. सुबह होने पर वह अपने घर गया और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी. तब पुलिस ने सन्नी को रोहिणी के डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती कराया और रविंद्र, सुनील व हिमांशु के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. 14 जु़लाई को सुबह 6 बजे के करीब रविंद्र नित्य क्रिया के लिए घर से निकला, तभी उस ने रास्ते में संतोष की 6 साल की बेटी निशा को अकेली जाते हुए देखा. वह भी नित्य क्रिया के लिए जा रही थी. उसे अकेली देख कर उस का शैतानी दिमाग जाग उठा. उस ने उस बच्ची को 10 रुपए दिए और किसी बहाने से उसे वहां से 50 मीटर की दूरी पर स्थित निर्माणाधीन इमारत में ले गया.

वह इमारत खाली पड़ी थी. नादान बच्ची उस के इरादों को नहीं समझ पाई. उस ने अन्य बच्चों की तरह निशा के साथ भी कुकर्म कर के उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. शातिर दिमाग रविंद्र ने इस बच्ची के मामले में सन्नी को फंसाने के लिए सन्नी का ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य कागजात उसी इमारत की दूसरी मंजिल पर डाल दिए, ताकि पुलिस सन्नी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दे. रविंद्र ने सन्नी को फंसाने का जाल तो अच्छी तरह बिछाया था, पर अपने जाल में वह खुद फंस जाएगा, ऐसा उस ने नहीं सोचा था. आखिर वह पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया.

रविंद्र से पूछताछ के बाद डीसीपी भी हैरान रह गए कि यह एक के बाद एक 40 वारदातें करता गया और पुलिस को पता तक नहीं चला. अगर यह क्रूर हत्यारा अब भी नहीं पकड़ा जाता तो न मालूम कितने और बच्चों को अपना निशाना बनाता. बहरहाल, पुलिस ने 17 जुलाई को रविंद्र को रोहिणी जिला न्यायालय के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव के समक्ष पेश किया. रविंद्र ने पुलिस को बताया था कि वह लगभग 40 बच्चों को अपना शिकार बना कर उन की हत्या कर चुका है. ये सारी वारदातें उस ने दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों में भी की थीं.

घटनास्थल का सत्यापन और केस से संबंधित सबूत जुटाने के लिए उस से और ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी थी. इसलिए पुलिस ने कोर्ट से उस का 7 दिनों का रिमांड मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. रिमांड मिलने के बाद पुलिस रविंद्र को उन जगहों पर ले गई, जहांजहां उस ने वारदातों को अंजाम दिया था. रविंद्र ने पुलिस को अलगअलग जगहों पर ले जा कर 27 केसों की पुष्टि करा दी. बाकी केसों के बारे में उसे खुद को ध्यान नहीं रहा कि उस ने कहां वारदात की थी. जिन जगहों पर वारदात कराने की उस ने पुष्टि कराई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के थाने में संपर्क किया तो पता चला कि उन में से केवल 15 केसों की ही अलगअलग थानों में रिपोर्ट दर्ज हुई थी.

पुलिस किसी और बच्चे की लाश बरामद नहीं कर पाई. इस की वजह यह थी कि उसे वारदात को अंजाम दिए काफी दिन बीत चुके थे, जिस से अनुमान यही लगाया गया कि बच्चों की लाशें जंगली जानवरों द्वारा या अन्य वजह से नष्ट हो गईं. जैसेजैसे सीरियल किलर रविंद्र की क्रूरता के खुलासे लोगों को पता लगते गए, उन का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. दिल्ली और आसपास के क्षेत्र के जिन गायब हुए बच्चों का कोई सुराग नहीं लग रहा था, उन के मांबाप भी यही सोचने लगे कि कहीं उन का बच्चा भी रविंद्र का शिकार तो नहीं हो गया. वे भी थाना बेगमपुर पहुंचने लगे.

रिमांड अवधि खत्म होने से पहले पुलिस ने 23 जुलाई, 2015 को जब रविंद्र को फिर से न्यायालय में पेश किया गया तो उसे देखने के लिए कोर्ट में और कोर्ट से बाहर तमाम लोग जमा हो गए. वे सभी गुस्से से भरे थे. वे उसे जनता के सुपुर्द करने की मांग करने लगे, ताकि उस क्रूर हत्यारे को अपने हाथों से सजा दे सकें. भारी पुलिस सुरक्षा के बीच उसे कोर्ट में पेश किया गया.  अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने रविंद्र को जेल भेजने के आदेश दिए. पुलिस जब उसे कोर्ट से बाहर ले जा रही थी, तभी वकीलों ने रविंद्र पर हमला कर उस की पिटाई शुरू कर दी. बड़ी मशक्कत से पुलिस ने उसे बचाया. इस के बाद बार एसोसिएशन के सचिन ने ऐलान कर दिया कि कोई भी वकील वहशी दरिंदे का मुकदमा नहीं लड़ेगा.

कथा संकलन तक रविंद्र जेल में बंद था. रविंद्र के घर वालों ने भी कह दिया कि वह उस की जमानत की पैरवी नहीं करेंगे. बहरहाल रविंद्र को जानने वाले सभी लोग उस के कारनामे से आश्चर्यचकित हैं. सीधासादा दिखने वाला रविंद्र इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, ऐसी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. जांच अधिकारी इंसपेक्टर जगमंदर दहिया उस के केसों से संबंधित ज्यादा से ज्यादा सबूत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इस सीरियल किलर को उस के गुनाहों की उसे सजा मिल सके. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime: प्रेमिका का सिर कलम

Love Crime: पति जौनी को छोडऩे के बाद 30 वर्षीय उमा को 25 वर्षीय बिलाल से मोहब्बत हो गई थी. उस के बाद वह लिवइन रिलेशन में रहने लगी. फिर एक दिन जंगल में उमा की सिरविहीन और निर्वस्त्र लाश मिली. उमा की जब किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो आखिर किस ने और क्यों किया उस का मर्डर? पढ़ें, लव क्राइम की यह हैरतंगेज कहानी.

उमा को खत्म करने की बिलाल की योजना किसी कागज पर नहीं थी, वह उस के दिमाग में बनी एक अंधेरी भूलभुलैया थी. उस ने सोचा कि पहले उमा को भरोसे में लिया जाए, फिर उसे सुनसान जगह ले जा कर उसे खत्म किया जाए. फिर उस की लाश के टुकड़े कर अलगअलग फेंक दिया जाए. इस से उस की शिनाख्त भी नहीं हो पाएगी और यह राज भी राज ही बन कर रह जाएगा. प्रेमिका को ठिकाने लगाने का बिलाल ने यही प्लान बना लिया.

14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की शादी होने जा रही थी. बारात उतराखंड के रुड़की जानी थी. लेकिन इस निकाह में बिलाल की हिंदू प्रेमिका बाधा बन सकती थी और ऐसे में उस ने प्रेमिका उमा को रास्ते से हटाने का प्लान तैयार कर लिया था.

बिलाल ने अपनी शादी से ठीक 8 दिन पहले यानी 6 दिसंबर को उस ने उमा से कहा, ”चलो, कहीं घुमा कर लाता हूं.’’

उस के खौफनाक इरादों से अनजान उमा राजी हो गई. शाम का वक्त था, अंधेरा हो चला था. उमा रोमांच महसूस कर रही थी, जबकि उस के मन में कुछ और ही चल रहा था. 6 दिसंबर, 2025 को शाम करीब 6 बजे स्विफ्ट कार ले कर वह उमा के कमरे पर गया था. बोला, ”सरप्राइज है, चलो तुम्हें बाहर घुमा कर लाता हूं.’’

हथिनीकुंड बैराज में यूपी और हरियाणा को जोडऩे वाला पुल है. वह उसी रास्ते से कार लाया. पहले हिमाचल की तरफ कार घुमाई, फिर उस ने पहले हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब की तरफ कार मोड़ ली. उमा लगातार उस से बातें किए जा रही थी. वह उसे प्यारभरे अंदाज में उस की बातों का जवाब दे रहा था. दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था.

रात के करीब 8 बज गए थे. रात का स्याह अंधेरा छा गया था. कलेसर नैशनल पार्क से गुजर रहे थे. नैशनल हाइवे से गाडिय़ां आजा रही थीं. उस दिन शनिवार था. वीकेंड पर अकसर पर्यटक इस इलाके में ज्यादा घूमने जाते हैं. उस ने कहा कि कोई होटल देखते हैं, वहां शाम बिताएंगे. पांवटा में रूम तलाशने की कोशिश की, लेकिन पर्यटक काफी थे. कहीं कोई कमरा किराए पर नहीं मिला. उसे डर लगा कि कहीं पकड़ा न जाए. अचानक प्लान बदल दिया.

इस के बाद उस ने हरियाणा की सीमा की तरफ कार मोड़ ली. बोला कि चलो, जंगल की तरफ चलते हैं, उधर भी अच्छे होटल हैं. उमा तो उस पर आंखें मूंद कर भरोसा करती थी, इसलिए राजी हो गई. कलेसर जंगल के एरिया से निकलते ही आबादी शुरू हो जाती है. यहां प्रतापनगर के गांव बहादुरपुर की सीमा से पहले ही उस ने कार रोक ली. उमा ने पूछा कि कार क्यों रोक दी?

उस ने कहा कि आबादी आने वाली है. सीट बेल्ट लगाना जरूरी है. यह बहाना बना कर वह पिछली सीट पर चला गया. उस वक्त उमा अगली सीट पर बैठी अपनी धुन में मस्त थी. तभी अचानक (25 वर्षीय) बिलाल ने 30 वर्षीय प्रेमिका उमा के गले में सीट बेल्ट डाल दी और गला घोंटने लगा. उमा के पास बचने या चिल्लाने का ज्यादा मौका नहीं था. उमा का शरीर बेजान हो गया. उसे मरा मान बिलाल तुरंत अगली सीट पर आया. उस ने कार आगे बढ़ा दी. करीब आधा किलोमीटर दूर गया तो सामने गांव बहादुरपुर की लाइटें नजर आने लगीं.

बिलाल को अब शव ठिकाने लगाने की जल्दी थी. उस के मन में पकड़े जाने का भी डर था, इसलिए उस ने गरदन से सिर काटने की सोची. साथ में वह मीट काटने वाला छुरा ले कर आया था. लाश को सड़क किनारे खेतों में बनी पौपुलर की नर्सरी में ले गया. वहां सिर धड़ से अलग किया और लाश के कपड़े उतार लिए, ताकि उस की पहचान न हो. कटे सिर और उतारे गए कपड़ों को पौलीथिन के थैले में डाल कर अगली सीट पर रख लिया. सिर कटी लाश उस ने वहीं छोड़ दी थी.

उस वक्त रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे होंगे. अब उसे ऐसी जगह की तलाश थी, जहां सिर व कपड़े फेंक सके ताकि शिनाख्त की संभावना न बचे. बिलाल ने सिर फेंकने के लिए इसी जगह को चुना. यहां सिर फेंकने के बाद बिलाल ने कार घुमाई और हथिनीकुंड बैराज के पुल से होते हुए अपने घर चला गया.

बिलाल ने मर्डर के बाद घर पहुंच कर सब से पहले अपना मोबाइल फारमेट कर दिया, जिस से कि उस के मोबाइल में उमा की फोटो और कौन्टैक्ट नंबर सब डिलीट हो गए. आधी रात के बाद बिलाल सो गया और सुबह फेमिली वालों से कहा कि अब निकाह की तैयारियों में रहूंगा. अब कहीं नहीं जाऊंगा.’’ योजना पर अमल कर के उस ने उमा की जिंदगी हमेशा के लिए खत्म कर दी. यह मामला हरियाणा के यमुनानगर और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से जुड़ा एक सनसनीखेज हत्याकांड है, जिस में प्रेम प्रसंग, लिवइन रिलेशनशिप और शादी के दबाव के चलते बेरहमी से हत्या की गई है.

सहारनपुर के हलालपुर गांव में एक परिवार रहता है. उस परिवार की उमा 18 साल की हो चुकी थी. उस की जवानी अब फूल की तरह पूरी तरह खिल चुकी थी. उमा के घर से सिर्फ 2-4 घर छोड़ कर  एक 19 साल का युवक जौनी रहता था. पेशे से मजदूर था और रंगाईपुताई का काम किया करता था. जौनी मामूली सा विकलांग था. उस की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि कोई उस की कमजोरी पर ध्यान ही नहीं देता. जौनी मेहनती और हंसमुख था.

उमा के घर में रंगाईपुताई का काम चल रहा था. उमा के पापा ने जौनी को बुलाया था, क्योंकि वह पड़ोस में ही रहता था. पहली बार जब जौनी उमा के घर आया तो वह सीढ़ी पर चढ़ कर दीवारों को रंग रहा था. विकलांग होने के बावजूद वह बड़े सलीके से काम कर रहा था, जैसे कोई कलाकार अपनी पेंटिंग बना रहा हो. उमा उस वक्त घर में थी. बचपन से ही वो जौनी को ‘जानी वाकर’ कह कर चिढ़ाती थी और जौनी मुसकरा कर उस की कलाई पकड़ लेता. दोनों साथ खेलते हुए बड़े हुए.

परंपरा, मानवता और पड़ोसी होने के नाते वह चाय ले कर किचन से बाहर आई और जौनी को देखा. उस के माथे पर पसीने की बूंदें, हाथों में ब्रश और चेहरे पर एक हलकी मुसकान.

”ओए जौनी, ले चाय पी ले,’’ उमा ने शरमाते हुए कहा.

जौनी ने मुड़ कर देखा और उस की आंखें उमा की मासूमियत पर ठहर गईं.

”धन्यवाद, उमा. लेकिन मैं तो मजदूर हूं.’’ उस ने हंसते हुए कहा.

”मजदूर को भी हमारी परंपरा के अनुसार दिन में 2 बार चाय पिलाते हैं.’’

उमा की पर्सनैलिटी ऐसी थी कि वह छोटीछोटी बातों से प्रभावित हो जाती थी. जौनी की सादगी और मेहनत ने उसे छू लिया. उस दिन से दोनों की बातचीत शुरू हुई. बचपन की पुरानी यादें, यही सब बातों के विषय होते. धीरेधीरे ये मुलाकातें रोमांटिक रंग लेने लगीं. इस के बाद उन की मुलाकातें भी होने लगीं. जौनी उमा को अपनी जिंदगी की कहानियां सुनाता, कैसे वह विकलांग होने के बावजूद कभी हारा नहीं, कैसे वह सपने देखता है एक बेहतर जिंदगी के. उमा उस की ताकत से प्रभावित होती और उसे चूमती, पहले गाल पर, फिर होंठों पर.

उन के चुंबन में एक जुनून था, जैसे दोनों की आत्माएं मिल रही हों. जौनी की मजबूत बांहें उमा को घेर लेतीं और उमा की नरम अंगुलियां उस के बालों में घूमतीं. वे घंटों बातें करते, हंसते और कभीकभी चुपके से एकदूसरे को छूते, एक स्पर्श जो बिजली सी दौड़ाता.

जौनी ने उमा का हाथ पकड़ा और बोला, ”उमा, तुम मेरी जिंदगी हो. मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’

उमा ने उस के सीने पर सिर रखा और कहा, ”जौनी, तुम्हारी कमजोरी मेरी ताकत है. हम साथ हैं, हमेशा.’’

उन का रोमांस अब गहरा हो गया था. उमा और जौनी के बीच का प्यार एक खामोश नदी की तरह बहता था. गहरा, शांत और हर किसी की नजरों से छिपा हुआ.

शादी के दिन हुई फरार

रातें उन की थीं. जब मोहल्ला सो जाता, उमा अपनी छत पर आती. जौनी दीवार फांद कर उस के पास पहुंच जाता. ऐसे ही 5 साल गुजर गए. 5 साल की अनगिनत रातें, अनकही बातें, चुराए गए चुंबन और वो सांसें जो सिर्फ एकदूसरे के लिए रुकी थीं. उमा के फेमिली वाले उमा की शादी के लिए बहुत चिंतित थे. आखिरकार एक लड़का उमा के लिए फेमिली वालों ने पसंद कर के शादी तय कर दी. यह बात सन 2010 की है. सभी धार्मिक औपचारिकताओं के बाद बारात आने की तारीख तय हो गई. अभी तक उमा की तरफ से किसी तरह का कोई विरोध फेमिली वालों के सामने नहीं आया.

सूरज की पहली किरणों ने अभीअभी गांव की सड़कों को छुआ था, जब उमा के घर में हलचल मच गई. आज वह दिन था, जिस का इंतजार पूरे परिवार को था. उमा की शादी. लेकिन कमरे में सन्नाटा था. जब मां ने दरवाजा खटखटाया और भीतर झांका तो पल भर में सब कुछ समझ में आ गया. अलमारी खुली थी, कुछ कपड़े गायब थे, उमा भी गायब थी. दुलहन का लहंगा बिस्तर पर बिखरा पड़ा था. मेज पर रखा वह छोटा सा कागज, ‘मम्मी, हम मजबूर थे. माफ करना.’

जौनी और उमा, 2 प्रेमी दिल, रात की आड़ में घर से निकल चुके थे. उन के पैरों की धूल अब दूर किसी अनजान रास्ते पर उड़ रही थी, जहां प्यार की उड़ान ने परिवार की इज्जत को पीछे छोड़ दिया था. पापा की आंखें फैल गईं, भाई दौड़ कर बाहर निकले. ”कहां गई वो? जौनी भी गायब है!’’ चाचा की आवाज कांप रही थी.

पूरे गांव में तलाश शुरू हो गई. कुएं के पास, मंदिर में, बस स्टैंड पर. सभी रिश्तेदार मिल कर तलाश कर रहे थे. पड़ोसी जुट गए, फोन घूमने लगे. उन के मुंह से एक ही बात निकली, ‘भाग गए दोनों…’

ये शब्द हवा में जहर की तरह फैल गए, उमा के पापा का चेहरा पीला पड़ गया, मम्मी रोरो कर बेहाल हो रही थी.

‘उमा और जौनी की प्यार की आग में सब जल गया. अब इज्जत का क्या होगा?’ सोच कर पापा ने सिर थाम लिया.

तभी मामामामी आगे आए. उन की आवाज कांपी, पर नीयत मजबूत थी. दोनों ने उमा की मम्मी और पापा को समझाया. कहा, ”हम हैं आप के साथ. चिंता की कोई बात नहीं है. मेरी बेटी है. अगर आप कहें तो आज हम उमा की जगह अपनी बेटी को विदा कर देंगे. पूरे समाज में आप की इज्जत का सवाल है. यह त्याग हम कर सकते हैं.’’

दोनों में से किसी ने आंखें उठा कर नहीं देखा. अब हर तरफ फुसफुसाहटें थीं. उमा की मम्मी आंसू पोंछते हुए बोली, ”भाभी, क्या करूं? मेरी बेटी ने तो हमें डुबो दिया. बारात लौट गई तो गांव में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’

आंसू बिना आवाज के गिरते रहे. मां ने एक पल को भाई की ओर देखा और फिर धीरे से सिर हिला दिया. समय बीतता गया, सूरज चढ़ता गया. बारात की धुन दूर से सुनाई देने लगी. ढोल की थाप, शहनाई की मधुर स्वरलहरियां. दूल्हा, घोड़ी पर सजाधजा, मुसकराता हुआ आ रहा था अनजान इस तूफान से. घर के दरवाजे पर बारात रुकी. बारात आई. ढोलनगाड़ों की आवाज ने उस खालीपन को ढक लिया, जो आंगन में पसरा था. स्वागत हुआ, आवभगत निभाई गई. सभी के चेहरे पर नकली मुसकानें थीं, पर आंखों में प्रश्न.

परंपराएं चलीं, फेरों का समय आया. मामा की बेटी लाल जोड़े में आई. कांपती नहीं, बल्कि विश्वास से भरी थी. फेमिली वालों के चेहरे पर मुसकान चिपकी हुई थी, लेकिन आंखें बता रही थीं कि दिल टूटा हुआ है.

पापा ने आगे बढ़ कर दूल्हे का स्वागत किया, ”आओ जी, स्वागत है!’’

बाहर बारात नाच रही थी, अंदर फैसला हो चुका था. मामामामी की बेटी को बुलाया गया. वह हैरान थी, लेकिन परिवार की इज्जत के लिए तैयार हो गई.

”अगर इस से सब की लाज बचती है तो मैं कर लूंगी,’’ उस ने धीरे से कहा.

मेकअप किया गया. उमा का ही लहंगा पहनाया गया. अब  मंडप सजा, पंडितजी मंत्र पढऩे लगे. दूल्हे को बताया गया कि ‘परिवार की रस्म है, दुलहन का नाम बदल गया.’ वह मुसकराया. शायद अनजान, शायद समझदार. फेरों के समय उमा की मम्मी की आंखों से आंसू बह रहे थे, खुशी के नहीं, दर्द के. पापा ने दुलहन का हाथ दूल्हे को सौंपा, मन में उमा की याद थी, ‘बेटी, तू जहां भी है, खुश रह,’ उन्होंने मन ही मन कहा.

इस तरह अपनी इज्जत की आरती को बचा कर इस घर से उमा की जगह उस की ममेरी बहन को विदा कर दिया गया. शादी संपन्न हुई. बारात विदा हुई. लेकिन घर में सन्नाटा था. रात को जब सब सो गए तब उमा की मम्मी ने पति से कहा, ”क्या हम ने सही किया?’’

उन्होंने सिर हिलाया, ”हां, इज्जत बचाई. लेकिन दिल टूटा है. जौनी और उमा, काश वे समझते.’’

इस अप्रत्याशित मोड़ ने एक नई कहानी शुरू की, दर्द की, बलिदान की और उम्मीद की.

निर्वस्त्र मिली लाश

हरियाणा के यमुनानगर के प्रताप नगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत एक गांव पड़ता है बहादुरपुर. 7 दिसंबर, 2025 की सुबह के करीब  9 बजे के आसपास इसी बहादुरपुर गांव के एक व्यक्ति ने प्रताप नगर थाने में फोन कर कहा, ”साहब, मेरे गांव के बाहर पौपुलर की एक नर्सरी है. एक महिला की डैडबौडी पड़ी है, जिस का न तो वहां पर सिर मौजूद है और न ही उस के शरीर पर कोई कपड़ा मौजूद है.’’

एसएचओ नरसिंह गुर्जर को जैसे ही सूचना मिली, वह फौरन अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पर पहले से ही काफी तादाद में लोग मौजूद थे. पुलिस भीड़ को हटा कर डैडबौडी के पास पहुंची. डैडबौडी को देखने के बाद खुद पुलिस भी एकदम से चौंक गई. पुलिस ने घटनास्थल का बड़ी बारीकी से मुआयना किया, लेकिन महिला का सिर बरामद नहीं हुआ.

पर सवाल यह था कि आखिरकार वह मरने वाली महिला कौन थी? घटनास्थल पर काफी सारे लोग मौजूद थे. उन सभी से पूछताछ की, पर कोई भी व्यक्ति उस डैडबौडी की शिनाख्त नहीं कर सका. घटनास्थल पर कोई ऐसा डौक्यूमेंट्स और न ही कोई ऐसा पहचानपत्र मिला, जिस से उस मरने वाली महिला के बारे में कुछ पता चल सके. उस के शरीर पर भी कहीं कोई टैटू, नाम या अन्य कोई चिह्नï या गुदा नहीं था.

पुलिस ने डैडबौडी को अपने कब्जे में लेने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. एसएचओ नरसिंह गुर्जर ने तुरंत अपने उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी. यमुनानगर के एसपी कुलदीप गोयल घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुला लिया गया. पुलिस ने अज्ञात अपराधियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद केस की जांचपड़ताल शुरू कर दी. 72 घंटे का समय बीत जाने के बावजूद मृतका की शिनाख्त नहीं हुई तो इस सिरविहीन धड़ का अंतिम संस्कार सेवा समिति के माध्यम से करा दिया गया.

एसपी कुलदीप गोयल ने केस का खुलासा करने के लिए एसआईटी का गठन कर दिया. साथ ही सर्विलांस टीम, फोरैंसिक टीम, डौग स्क्वायड सभी अपनीअपनी तरह से प्रयास करने में जुट गए, ताकि इस हत्याकांड का खुलासा हो सके. यह एक तरह से ब्लाइंड मर्डर था और इस का पता चल पाना मुश्किल हो रहा था. एसपी कुलदीप गोयल ने एसआईटी के हैड डीएसपी रजत गुलिया को नियुक्त किया था. रजत गुलिया के नेतृत्व में पुलिस ने प्रयास करने शुरू कर दिए. 500 से ज्यादा  सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए. पुलिस द्वारा उन्हें बारबार देखा जा रहा था.

इस केस की जांचपड़ताल करते हुए 3 दिन का समय गुजर गया, लेकिन पुलिस के हाथ कोई सबूत नहीं मिला. 3 दिनों के बाद पुलिस फिर से उस घटनास्थल पर गई. जब आसपास के लोगों से पूछताछ की तो बहादुरपुर गांव के ही रहने वाले एक व्यक्ति ने पुलिस से कहा कि साहब मैं दावे के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन ठीक एक दिन पहले 6 दिसंबर, 2025 को रात के करीब 11-साढ़े 11 बजे इस रोड पर मैं ने एक कार को देखा था. मुझे उस कार का नंबर तो याद नहीं है, लेकिन उस कार के नंबर प्लेट पर यूपी का नंबर लिखा हुआ था.

निकाह से पहले अरेस्ट

पुलिस ने इसी को आधार बना कर जब इस केस की जांचपड़ताल करते हुए आगे जा कर जब रोड पर लगे हुए सीसीटीवी की फुटेज को चैक किया तो आखिरकार एक सीसीटीवी में वह कार जाते हुए दिखाई दी. उस का नंबर भी साफसाफ दिखाई दे गया. पुलिस गाड़ी के उस नंबर के माध्यम से उस के मालिक तक पहुंच गई. कार के मालिक से पता चला कि उस गाड़ी के ड्राइवर का नाम बिलाल है, जो मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के नकुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत टिडोली गांव का रहने वाला है.

13 दिसंबर, 2025 को शाम के करीब 7 बजे के आसपास हरियाणा की पुलिस अपनी टीम के साथ बिलाल के घर पहुंच गई. उस दिन बिलाल की छोटी बहन की बारात आई हुई थी. कुछ बाराती चले गए थे. कुछ बाराती वहां मौजूद थे. उस वक्त बिलाल की बहन की विदाई का कार्यक्रम चल रहा था. बड़ी संख्या में पुलिस बल देख कर घर में अफरातफरी मच गई. पुलिस ने बिलाल के अब्बा फुरकान से संपर्क किया. उन से पूछा कि आज तुम्हारे यहां क्या फंक्शन है? उन्होंने बता दिया कि आज उन की बेटी की विदाई हो रही है.

पुलिस के कहने पर फुरकान ने अपने बेटे बिलाल को पुलिस के सामने पेश कर दिया.  पुलिस वालों ने जब उस से सवाल करने शुरू किए तो बिलाल सवालों के जवाब नहीं दे पा रहा था. सर्दी में भी उसे पसीना आने लगा. फुरकान समझ गया कि कुछ न कुछ उस के बेटे ने गड़बड़ की है. तभी बिलाल ने वहां से भागने की कोशिश की. उसे पता नहीं था कि चारों तरफ से वह पुलिस से घिरा हुआ है.

पुलिस ने बिलाल को गिरफ्तार कर लिया. तभी काफी संख्या में मौजूद रिश्तेदार पुलिस का विरोध करने लगे. सभी रिश्तेदार जानना चाहते थे कि बिलाल को पुलिस क्यों गिरफ्तार करने आई है. तब पुलिस ने उन्हें बता दिया कि इस ने एक महिला की हत्या की है. पुलिस उसे गिरफ्तार कर लौट आई. थाने में जब उस महिला की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने उमा नाम की महिला की हत्या कर उस की सिरविहीन लाश हरियाणा के यमुना नगर क्षेत्र में डाल दी थी और उस का सिर हरियाणा हिमाचल प्रदेश के बौर्डर पर कलेसर जंगल में एक खाई में डाल दिया था.

पुलिस ने रविवार 14 दिसंबर, 2025 को बिलाल की निशानदेही पर हरियाणा हिमाचल के बौर्डर पर कलेसर जंगल में स्थित लालढांग की खाई से उमा का सिर बरामद किया गया. हालांकि वहां छुरा बरामद नहीं हुआ. पुलिस ने अदालत में पेश कर के बिलाल को 4 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. रिमांड अवधि पर उस ने पुलिस को उमा की हत्या करने की जो कहानी बताई, वह हैरान करने वाली निकली—

हमदर्दी ने प्यार जगाया

बिलाल 4 भाईबहन हैं. वह पहले ट्रक और डंपर चलाता था. इन दिनों कार की ड्राइविंग कर रहा था. पेशेवर तरीके से कार की बुकिंग कर के यात्रियों को उन की बताई हुई मंजिल तक पहुंचाता था. रोज की तरह उस दिन भी वह एक फैक्ट्री में किसी सवारी को छोडऩे आया था. फैक्ट्री के गेट के बाहर एक महिला बेंच पर बैठी हुई थी. करीब 30 साल की, उस का चेहरा पीला था. आंखों में थकान और बेचैनी साफ झलक रही थी.

बिलाल का ध्यान उस पर चला गया. वह आदतन संवेदनशील था. उस ने पास जा कर उस से धीरे से पूछा, ”आप ठीक तो हैं? कुछ परेशान लग रही हैं.’’

महिला ने कमजोर सी मुसकान के साथ कहा, ”बुखार आ रहा है, सिर घूम रहा है. इसी फैक्ट्री में काम करती हूं. छुट्टी ले कर घर जा रही थी. चला नहीं गया, इसलिए अकेली बैठी हूं. अगर हो सके तो मुझे गंगोत्री कालोनी में घर तक छोड़ दीजिए.’’

घर पहुंचने पर बिलाल ने मैडिकल स्टोर से ला कर बुखार की दवा भी खिला दी. 2 घंटे में बुखार उतर गया तो बिलाल अपने घर चला गया. अगले कुछ दिनों में बिलाल हालचाल पूछने आने लगा. कभी दवा लाता, कभी फल. बातचीत का सिलसिला बढ़ा तो अहसासों की गरमाहट भी. दोनों ने अपनेअपने संघर्ष, अकेलापन और सपने साझा किए. उमा को बिलाल की सादगी और ईमानदारी भा गई और बिलाल को उमा की समझदारी और आत्मसम्मान.

एक दिन उमा ने बिलाल को अपनी जिंदगी की दुखभरी कहानी सुनाई. 13 साल पहले की बात है. मैं ने अपने पड़ोस के एक युवक जौनी के साथ भाग कर शादी की थी. मेरे एक बेटा भी है, जो अपने पापा के साथ रहता है. घर से बाहर 10 साल हम ने इधरउधर बिताए. उस के बाद हम लौट कर सहारनपुर आ गए. मेरे फेमिली वालों ने मुझ से संबंध खत्म कर दिए थे.

सहारनपुर आने पर मैं अपने पति के साथ  रमजानपुर में रहती थी. मैं काफी गुरबत में समय बिता रही थी. मोहल्ले के ही एक युवक से मेरा संपर्क हुआ. उस ने मुझे सहारनपुर में एक फैक्ट्री में नौकरी दिला दी. एक मोहल्ले के ही होने के कारण कभीकभी मैं उस के साथ चली जाती और कभीकभी वापसी में भी हम साथसाथ ही आ जाते. इस से पति मेरे ऊपर शक करने लगा. मैं ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन पति जौनी के दिमाग से शक दूर नहीं हुआ.

इस बात को ले कर हम दोनों के बीच झगड़ा होने लगा. दिलों में खटास पैदा हो गई. मैं ने गंगोत्री में किराए पर मकान लिया और पति से अलग इस किराए के मकान में अकेली रहने लगी. बात तलाक तक पहुंच गई. इस तरह हम दोनों के बीच संबंध विच्छेद हो गया. कुछ दिनों बाद युवक ने फैक्ट्री से काम छोड़ दिया. मेरा संपर्क उस से टूट गया. पति ने मेरी कभी कोई खबर नहीं ली. इस तरह मैं अकेली पड़ गई.

मैं एक दिन अपने पति के कमरे पर अपने बेटे से मिलने के इरादे से गई. पता चला कि वह मकान खाली कर के अपने गांव वापस चला गया है. उमा की आंखों में आंसू आ गए. दोनों एकदूसरे के करीब आए. उन के दिलों में एक नई गरमाहट जाग रही थी. धीरेधीरे मामला प्यार में बदल गया.

सहारनपुर की गलियों में एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी 2 अकेले दिलों के मिलन की. बिलाल और उमा अब साथ थे. वे लिवइन में रहने लगे. बिलाल अपने घर कोई न कोई बहाना बना कर उमा के साथ रातें बिताया करता था. घर का सारा खर्च बिलाल ही उठाता था.

परिजनों ने तोड़ा संबंध

बिलाल को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने सब से पहले उस से सवाल किया कि यह महिला कौन है और इस की हत्या क्यों की? बिलाल ने पुलिस को अपनी मोहब्बत की शुरुआत की सारी कहानी बता दी. सिर को भी पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया. शेष धड़ का तो पहले ही पोस्टमार्टम हो चुका था. सिरविहीन धड़ लावारिस घोषित हो जाने के कारण सेवा समिति ने बगैर सिर के अज्ञात मान कर पश्चिम यमुना नहर के पास श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया था.

क्योंकि अब उमा की शिनाख्त हो गई थी. उस के परिवार का पता लग गया था, इसलिए पुलिस पोस्टमार्टम के बाद सिर को ले कर उमा के गांव हलालपुर पहुंची तो उस का भाई टिंकू मिला. टिंकू ने बताया कि साहब करीब 15 साल पहले उमा की शादी हो रही थी. हम लोगों को पता ही नहीं चला, जिस दिन उस की बारात आने वाली थी, उसी दिन मौका पाते ही वो जौनी के साथ घर से भाग गई थी. उसी रात हम ने फैसला ले लिया था कि हम अब उमा को कभी याद नहीं करेंगे. उमा से हमारा कोई वास्ता नहीं है. उमा से हमारा कोई रिश्तानाता नहीं है.

पुलिस वाले जब उस का सिर ले कर पहुंचे तो इंसानियत के नाते टिंकू ने पुलिस वालों और रिश्तेदारों के कहने पर सिर का अंतिम संस्कार कर दिया. गांव के लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि आखिरकार यह सब कैसे हो गया. फिर पुलिस उस के पति जौनी के पास गई. जौनी बोला कि मुझे पता चला है कि वह किसी बिलाल नाम के युवक के साथ रह रही थी. उस ने ही उस का कत्ल कर दिया है. जौनी ने कहा कि मुझे उस के मर्डर का दुख तो है, लेकिन मेरा उस से कोई वास्ता या सरोकार नहीं रहा. कानूनन मेरा उमा से तलाक हो चुका था.

बिलाल इस समय जेल में है. पुलिस का दावा है कि उस ने सारे सबूत एकत्र कर लिए हैं. आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी. Love Crime

 

 

Dehradun Crime: नादान उम्र की भूल

Dehradun Crime: नादान शालू की रवि राजपूत से दोस्ती हो गई, जिसे रवि प्यार समझ बैठा. परेशानी तब हुई, जब इस प्यार ने रवि को जुनूनी बना दिया. वह शालू को भगा कर अपनी दुनिया बसाना चाहता था. एक रात वह शालू को भगा ले जाने के इरादे से आया तो शालू ने इंकार कर दिया. दोनों की इस जिद में शालू की जान गई तो रवि अपराधी बन गया.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पौश कालोनी पाम सिटी में लोगों की एक से बढ़ कर एक कोठियां और फ्लैट्स हैं. इन्हीं कोठियों में से कोठी नंबर 91 के.के. अरोड़ा की है. खुशमिजाज शख्स के तौर पर पहचाने जाने वाले के. के. अरोड़ा पेशे से प्रौपर्टी डीलर थे. वह होटल कारोबार से भी जुड़े रहे हैं. हर शख्स चाहता है कि उस का परिवार खुश रहे, आर्थिक रूप से संपन्न अरोड़ा भी इस चाहत को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करते थे.

उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी के अलावा 2 बेटियां थीं, शालू व शालिनी और एक छोटा बेटा विशाल. शालू शहर के ही एक कालेज में इंटर की छात्रा थी. उस के दोनों भाईबहन भी पढ़ाई कर रहे थे. अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह परिवार बेहद खुशहाल था. किस की जिंदगी में खुशियों का सूरज कब रेशमी किरणें फैलाने लगे और कब शाम का रंग लाल हो कर दिल दहला जाए, कोई नहीं जानता. 21 जून, 2015 को विश्व योग दिवस मनाया जाना था. इसे ले कर शहर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाने थे. के. के. अरोड़ा को भी एक ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जाना था, जहां सामूहिक रूप से योगा किया जाना था. उस दिन वह भोर में करीब साढ़े 5 बजे जाग गए थे.

उन की कोठी चूंकि 2 मंजिला थी, लिहाजा सभी के सोने के लिए अलगअलग कमरे बने हुए थे. सुबहसुबह अरोड़ाजी कोठी की छत पर जा कर टहलने लगे. तब तक उन की पत्नी लक्ष्मी भी उठ कर बैडरूम से बाहर आ गई थीं. वह बड़ी बेटी शालू के कमरे की तरफ गईं. लेकिन वह अपने कमरे में नहीं थी. आमतौर पर हर रोज उस वक्त शालू सोती हुई मिला करती थी. बेटी को बिस्तर पर न पा कर लक्ष्मी थोड़ा चौंकीं. उन्हें नहीं पता था कि वह कहां चली गई थी. उन्होंने पति के पास पहुंच कर बताया कि शालू अपने कमरे में नहीं है.

अरोड़ा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘‘हो सकता है घूमने चली गई हो.’’

कालेज की छुट्टियां चल रही थीं. कभीकभी ऐसा भी होता था कि शालू मौर्निंग वाक पर निकल जाती थी. लक्ष्मी दूसरी बेटी शालिनी के पास गईं. तब तक वह जाग चुकी थी. उन्होंने उस से भी पूछा, ‘‘शालू कहीं नहीं दिख रही, तूने देखा है क्या उसे?’’ लेकिन शालिनी ने भी शालू को देखने की बात से इनकार किया.

वैसे तो यह मामूली सी बात थी. लेकिन बच्चे मातापिता की नजरों के सामने न हों या उन्हें बिना बताए कहीं चले जाएं तो चिंता हो ही जाती है. बेटियों के मामले में तो चिंता और बढ़ जाती है. लक्ष्मी को चिंता हुई तो वह ‘शालू शालू’ पुकारते हुए कोठी में दूसरी तरफ गईं. उसी वक्त अनायास उन की निगाह लौबी की ओर चली गई. वहां शालू खून के सैलाब में डूबी फर्श पर पड़ी थी. यह नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. उन्होंने आगे बढ़ कर ‘बेटीबेटी’ पुकारते हुए शालू को हिलायाडुलाया, उसे झिंझोड़कर देखा. लेकिन उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई.

बदहवास सी लक्ष्मी चिल्लाते हुए पति की तरफ दौड़ीं. वह भी दौड़ कर आए. बेटी को इस दशा में देख कर वह भी जड़वत रह गए. शालू का शव खून से लथपथ पड़ा हुआ था. इस खौफनाक मंजर ने लक्ष्मी की रुलाई को हृदयविदारक चीखों में तब्दील कर दिया. आसपड़ोस के लोगों ने चीखने और रोने की आवाज सुनी तो वे घरों से बाहर निकल आए. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो पहले से ही मौर्निंग वाक के लिए सड़क पर टहल रहे थे. वे भी अंदर आ गए. रक्तरंजित नजारा देख कर उन के कलेजे कांप गए. निस्संदेह किसी ने शालू की हत्या कर दी थी.

आननफानन में 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया गया. करीब 20 मिनट में एक गश्ती पीसीआर मौके पर पहुंच गई. यह इलाका थाना पटेलनगर में आता था. थानाप्रभारी पंकज गैरोला, वरिष्ठ उप निरीक्षक नत्थीलाल उनियाल तथा अन्य पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. घटना सनसनीखेज थी, सूचना मिलते ही एसएसपी पुष्पक ज्योति और एसपी सिटी अजय कुमार वगैरह भी वहां आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. 17 वर्षीया शालू 3 फुट की लौबी में पड़ी थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. उस का सिर फटा हुआ था और आसपास खून फैल कर जम गया था.

मौके पर काले व सफेद रंग का एक मर्दाना गमछा पड़ा था. संभवत वह कातिल का था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. एसएसपी के निर्देश पर क्राइम ब्रांच की फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुलाया गया. जांच में मदद के उद्देश्य से ट्रेनर पुलिसकर्मी ने प्रशिक्षित कुत्ते को घटनास्थल और लाश को सुंघा कर छोड़ दिया. वह छत व सीढि़यां उतर कर नीचे गया और टहल कर वापस आ गया. जाहिर है इस से कोई स्पष्ट अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.

क्राइम ब्रांच की टीम ने भी अपने हिसाब से घटनास्थल की जांच की. पुलिस ने परिजनों से भी औपचारिक पूछताछ की. मृतका के बहन और भाई गमगीन होने की वजह से बात करने की स्थिति में नहीं थे. सब से चौंकाने वाली बात यह थी कि शालू की हत्या का सैटरडे नाइट में परिवार के किसी सदस्य को पता तक नहीं लग सका था. किसी ने उस के चीखने की आवाज भी नहीं सुनी थी. यह बात थोड़ी अजीब लगने वाली थी. वैसे भी घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था.

शुरुआती जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं. एक तो यह कि सिर पर किसी चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला सीधेसीधे हत्या का था, न कि लूटपाट में हुई हत्या का. क्योंकि घर से कोई चीज गायब नहीं थी. तीसरा यह कि वारदात में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ था, जो घर की भौगोलिक स्थिति से भी परिचित था. यह भी संभव: हो सकता था कि बदमाश लूटपाट के इरादे से कोठी में घुसे हों और इसी बीच शालू लौबी में गई हो और उन्होंने उस की हत्या कर दी हो. इस के बाद वे बिना लूटपाट किए ही भाग गए हों. यह केवल अनुमान भर था.

प्राथमिक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने के. के. अरोड़ा की तहरीर पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ पटेलनगर थाने में भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. साथ ही शालू के शव को पोस्टमार्टम के लिए दून अस्पताल भिजवा दिया. इस केस की विवेचना एसएसआई नत्थीलाल उनियाल के सुपुर्द की गई. घटना का पता चलने पर डीआईजी संजय गुंज्याल के निर्देश पर एसएसपी पुष्पक ज्योति ने केस की जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में थाना पुलिस के अलावा सहसपुर थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट, प्रेमनगर थानाप्रभारी रवि कुमार सैनी, एसआई मनोज नैनवाल, नरोत्तम सिंह, विक्रम सिंह, कांस्टेबल अनिल, संदीप, सहदेव त्यागी, हितेश कुमार व आशीष राठी के अलावा क्राइम ब्रांच को शामिल किया गया.

पोस्टमार्टम के बाद शालू का शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया गया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने रिपोर्ट में बताया कि शालू की मृत्यु सिर पर हुए प्रहार के कारण अत्यधिक रक्तप्रवाह की वजह से हुई थी. उस के सिर की हड्डी भी टूटी पाई गई थी. पुलिस ने पड़ताल शुरू की. सुरक्षा के लिहाज से कालोनी के एंट्री गेट पर रात में एक सिक्योरिटी गार्ड रहता था. उस के मुताबिक घटना वाली रात 12 बजे के बाद कालोनी में किसी का आवागमन नहीं हुआ था. हालांकि कालोनी के कुछ घरों में सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे, परंतु उन के फोकस का दायरा सीमित था. कातिल बाहर से नहीं आया था तो शालू की हत्या किस ने की, यह अहम सवाल था.

पुलिस ने शालू के घर वालों से पुन: पूछताछ की तो उन्होंने रवि राजपूत नामक युवक पर अपना संदेह जताया. मृतका की बहन ने पुलिस को बताया कि नजदीक के एक फ्लैट में रहने वाला लड़का रवि राजपूत शालू को परेशान किया करता था. उस ने यह भी बताया कि मौकाएवारदात पर जो मर्दाना गमछा पाया गया है, उसे उस ने रवि के गले में कई बार देखा था. पुलिस ने रवि को शक के दायरे में रख कर जांच आगे बढ़ाई. पुलिस वहां पहुंची, जिस फ्लैट में रवि रहता था. पता चला कि रवि मूलरूप से हरियाणा के जिला करनाल के रहने वाले रूप सिंह का बेटा था. वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर चुका था.

उस फ्लैट में वह अपने ममेरे भाई ऋषिपाल के पास कभीकभी आ कर ठहरता था. ऋषिपाल मूलरूप से सहारनपुर के बड़गांव का रहने वाला था और प्रौपर्टी का काम करता था. उस वक्त वह भी लापता था. पुलिस ने शालू का मोबाइल हासिल किया तो उस में लौक लगा था. एक्सपर्ट से उस का लौक खुलवाया गया. उस में लेट नाइट की एक आखिरी काल थी. जांच में वह नंबर रवि का निकला. पुलिस ने शालू व रवि के नंबरों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. उन से साबित हुआ कि घटना वाली रात उस की न सिर्फ शालू से बातें हुई थीं, बल्कि आधी रात के बाद रवि की लोकेशन भी पाम सिटी में ही थी.

रवि पूरी तरह शक के दायरे में आ गया था. पुलिस टीम ने उस की सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने लोकेशन के आधार पर उसे उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह देहरादून से भागने की कोशिश कर रहा था. उस के साथ सुनील राणा व उस का दोस्त प्रताप सिंह भी थे. पुलिस तीनों को थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया तो एक चौंकाने वाली कहानी पता चली. रवि बचपन से ही जिद्दी और दबंग स्वभाव का युवक था. बुरे लड़कों की संगत में रह कर वह कालेज के लड़ाईझगड़ों में पड़ने लगा था. परिजनों ने उसे डांटाफटकारा, समझाया, लेकिन वह नहीं समझा. उस ने जैसेतैसे इंटरमीडिएट तो पास कर लिया, लेकिन इस से आगे वह न पढ़ा.

बेटा सुधर जाए इस उम्मीद में पिता ने 2015 में उसे देहरादून की पाम सिटी में रह रहे ऋषिपाल के पास भेज दिया था. उन्हें लगता था कि वह उस के साथ रह कर कोई काम करेगा तो सुधर जाएगा. रवि देहरादून आया तो उसे और भी आजादी मिल गई. वह शराब भी पीने लगा. उस के हावभाव से ले कर बातों में दबंगई होती थी. अपनी दबंगई के लिए वह अपने पास एक तमंचा भी रखता था. देहरादून में भी उस ने अपने कई दोस्त बना लिए थे. यहीं पर एक दिन राह से गुजरते हुए रवि की नजरें शालू से चार हो गईं. पहली ही नजर में शालू उस के दिल में उतर गई.

रवि उन युवाओं में से था, जो उम्र से पहले ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. वह चालाक किस्म का युवक था. एक दिन उस ने बहाने से शालू से बातचीत की और उस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. बड़े शहरों में लड़केलड़कियों के बीच यह कोई बड़ी बात नहीं होती. शालू ने भी बिना सोचेसमझे उस की दोस्ती स्वीकार कर ली. शालू ने अपनी छोटी बहन शालिनी को भी यह बात बता दी थी. कई बार की बातों और सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए दोनों एकदूसरे के संपर्क में बने रहे. शालू उस के मैसेज का जवाब दे देती थी. इस से उस के हौसले बढ़ गए. शालू खूबसूरत लड़की थी. रवि उसे अपना बनाने का सपना देखने लगा. उस ने एक दिन अपने प्यार का इजहार भी कर दिया, लेकिन शालू ने इनकार कर दिया.

रवि को लगा कि उस का इनकार सिर्फ दिखावा है, अंदर से शालू भी उस से प्यार करती है. दोनों की मेलमुलाकातें हुईं तो शालू के रिश्ते के एक भाई आशीष ने उन्हें देख लिया. उस ने शालू को डांटा, क्योंकि वह रवि की आवारगी जानता था. इस के बाद उन का मिलनाजुलना कम हो गया. दूसरी तरफ रवि शालू को पाने के सपने देखने लगा था. शालू जब उस से बात नहीं करती तो वह रास्ते में उसे रोकने की कोशिश कर के उसे परेशान करता. शालिनी इन बातों को जानती थी. फोन पर वह न केवल शालू के संपर्क में रहने लगा, बल्कि उसे मैसेज भी भेजा करता था. रवि के सिर पर प्यार का भूत सवार था. शालू ने उस के एकतरफा प्यार को जब ज्यादा तवज्जो नहीं दी तो उस ने अपनी एक फोटो इंटरनेट के जरिए उसे भेज दी.

उस फोटो में वह फांसी का फंदा हाथ में लिए नजर आ रहा था. उस ने लिखा था, ‘यदि तुम मुझ से प्यार नहीं करोगी तो मैं अपनी जान दे दूंगा.’ यह देख कर शालू उलझन में पड़ गई. वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से कोई मर जाए, तभी रवि का फोन आ गया. वह बोला, ‘‘अब बोलो, तुम मुझ से प्यार करती हो ना?’’

‘‘देखो, मैं कुछ नहीं कहना चाहती. तुम्हें जो समझना है समझो और हां प्लीज ऐसी कोई हरकत आगे से मत करना.’’

रवि ने उस की इन बातों को इकरार समझ लिया. उसे लगा कि शालू को उस की फिक्र है, इसलिए वह उसे मरने नहीं देना चाहती. इस के बाद वह उस के खयालों में ही खोया रहने लगा. अंजाम से बेखबर शालू उस के जुनून को समझ नहीं पाई. उस ने यह बातें अपने मातापिता को भी नहीं बताईं. यह उस की नादान उम्र का तकाजा था. अलबत्ता शालू ने रवि के फोटो भेजने वाली बात अपनी बहन शालिनी को जरूर बता दी थी. रवि को ले कर कोई बदनामी न हो, इसलिए शालू ने उस से थोड़ी दूरी बनाने की सोची. वह उस से कम बातें करने लगी. इस से रवि को लगा कि शायद वह अपने परिवार की वजह से ऐसा करती है.

उस के दिमाग में सुबहशाम, दिनरात शालू की ही छवि घूमती रहती थी. उसे देखे बिना उसे सुकून नहीं आता था. शालू से दोस्ती के किस्से उस ने अपने दोस्तों को भी सुना रखे थे. इसी बीच वह करनाल चला गया. वहां जाने के बाद उसे दूरियां बरदाश्त नहीं हुईं. शालू भले ही उसे तवज्जो नहीं देती थी, लेकिन अपनी तरफ से वह उसे बहुत प्यार करता था. शालू ने सोचा कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा और रवि उसे अपने दिमाग से निकाल कर अपने काम पर ध्यान देगा. उधर रवि के सिर पर शालू को पाने की जिद सवार हो गई थी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अब वह शालू को अपनी बना कर ही दम लेगा. इस के लिए रवि ने उसे भगाने की योजना बनाई.

उस ने सोचा कि शालू परिवार की मजबूरियों में कैद है, इसलिए वह उस से ज्यादा बात नहीं कर पाती. वह उस के सामने प्रस्ताव रखेगा तो वह उस के साथ खुशीखुशी चल देगी. उस ने यह बात अपने दोस्त सुनील व प्रताप को बताई कि वह एक लड़की से प्यार करता है और उसे भगा कर शादी करना चाहता है. रवि ने उन्हें बताया कि वह उसे हर सूरत में हासिल करना चाहता है. रवि की चाहत देख कर वे दोनों उस की मदद करने को तैयार हो गए. 19 जून की शाम रवि सुनील व प्रताप के साथ शालू को भगा ले जाने के इरादे से देहरादून आया. तीनों जीएसएम रोड स्थित एक होटल में रुके.

रवि अपने साथ एक तमंचा भी लाया था. उस ने सोचा था कि अगर शालू के घर वाले किसी वजह से रोकने की कोशिश करेंगे तो वह उन्हें डराधमका कर रोक देगा. अगली रात उस ने शालू को फोन कर के कहा, ‘‘शालू मुझे तुम से मिलना है.’’

‘‘अब रात में?’’ शालू चौंकी.

‘‘हां, मेरे पास वक्त कम है और तुम से नहीं मिला तो सच में मैं मर जाऊंगा. मुझे तुम से जरूरी बात करनी है.’’

‘‘क्या बात है? मोबाइल पर ही बता दो.’’

‘‘नहीं, मिल कर ही बताऊंगा और तुम्हें मेरी बात माननी होगी.’’

‘‘मानने वाली होगी तो ही मानूंगी ना, फिर ऐसी कौन सी बात है?’’

‘‘पहले मुझे आने दो.’’

‘‘तुम जानते हो यह गलत है और कोई गड़बड़ भी हो सकती है.’’

‘‘कुछ नहीं होगा मैं लेट नाइट आ जाऊंगा.’’ रवि ने कहा तो शालू सोच में डूब गई. वैसे भी उसे रवि की दोस्ती परेशान करने लगी थी और वह उस से पीछा छुड़ाने के बारे में सोच रही थी. वह रवि पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने इजाजत भी दे दी, ‘‘ठीक है, तुम आ जाना, मैं पिछला दरवाजा खोल दूंगी.’’

कोठी के पीछे की तरफ से भी एक छोटा खिड़कीनुमा दरवाजा था. इस भौगोलिक स्थिति को रवि जानता था. यह बात उसे शालू ही बता चुकी थी. रवि करीब एक बजे सुनील व प्रताप के साथ होटल से निकला. ये लोग पैदल चल कर कारगी चौक की ओर गए. उधर से ही पाम सिटी का रास्ता था. कालोनी में जाने के लिए उस ने मुख्य गेट नहीं चुना. वह जानता था कि शालू के भागने के बाद हंगामा मचेगा तो वह पकड़ा जा सकता है.

पाम सिटी कालोनी की चारदीवारी थी. उस के बाहर खेत व जंगल था. खेतों के रास्ते वे लोग दीवार फांद कर कालोनी में दाखिल हो गए. करीब डेढ़ बजे कोठी के पीछे पहुंच कर रवि ने शालू को फोन किया. उस ने चुपके से दरवाजा खोल दिया. तीनों अंदर आ गए. सुनील व प्रताप लौबी में ही खड़े रहे, जबकि शालू के साथ रवि ड्राइंगरूम में पहुंच गया. शालू ने उस से पूछा, ‘‘बोलो क्या बात है?’’

‘‘शालू मैं तुम्हें ले जाने के लिए आया हूं.’’

‘‘मतलब?’’ उस की बात सुन कर शालू चौंकी.

‘‘तुम्हें यहां से आजाद करा कर मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

सुन कर शालू के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे नहीं पता था कि रवि इतने बड़े ख्वाब देख चुका है.

‘‘पागल हो गए हो तुम?’’ शालू ने गुस्से में कहा.

‘‘तुम चाहे जो समझो, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा. तुम डरती किस से हो, मैं सब को देख लूंगा.’’ कहते हुए उस ने तैश में आ कर तमंचा निकाल कर शालू को दिखाया. लेकिन शालू ने उस के साथ जाने से इनकार कर दिया.

इस के बावजूद वह करीब एक घंटा उसे समझाता रहा. शालू नानुकूर करती रही. रवि जबरन प्यार हासिल करना चाहता था. उस ने मन ही मन सोच लिया कि या तो वह शालू को साथ ले जाएगा या हमेशा के लिए उस का किस्सा खत्म कर देगा. शालू समझ गई कि यह बिगड़ैल किस्म का युवक है, इसलिए उस से पीछा छुड़ाना ही बेहतर है. बात करतेकरते दोनों लौबी में आ गए. शालू ने उसे चले जाने को कहा.

रवि को अपनी योजना फेल होती नजर आई तो उस ने निर्णायक अंदाज में पूछा, ‘‘शालू आखिरी बार पूछ रहा हूं, तुम मेरे साथ चलोगी या नहीं?’’

शालू ने साफ इनकार कर दिया, ‘‘बिलकुल नहीं, तुम पागल हो गए हो.’’

‘‘मैं तुम्हें उठा कर ले जाऊंगा, फिर देखता हूं तुम्हारी मरजी कैसे चलेगी.’’ उस ने कहा तो शालू ने उसे चेतावनी भरे लहजे में जवाब दिया. ‘‘ऐसी गलती मत करना रवि, मैं शोर मचा कर तुम सब को अभी पकड़वा दूंगी समझे. अब तुम चुपचाप यहां से चले जाओ.’’

अपनी जिद पूरी न होते देख रवि गुस्से में आ गया. उस ने शालू को हाथ पकड़ कर खींचना चाहा तो शालू ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया. इस से वह आगबबूला हो गया. तब तक उस के साथी भी आ गए थे. रवि ने तमंचा निकाल कर उस की बट से शालू के सिर पर वार कर दिया. वार तेज था. खून बहा तो मामूली चीख के साथ वह सिर थाम कर नीचे बैठ गई. उस ने चिल्लाने की कोशिश की तो रवि ने उस का मुंह दबा दिया और नीचे गिरा दिया. फिर उस का सिर पकड़ कर फर्श में दे मारा. उस के साथियों ने शालू के हाथपैर पकड़ लिए. रवि तब तक उस का सिर पटकता रहा, जब तक कि उस की मौत नहीं हो गई. इस से उस का सिर बुरी तरह फट गया और आसपास खून फैल गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने रवि की निशानदेही पर तमंचा बरामद कर लिया. उस के साथियों का कहना था कि उन्हें नहीं पता था कि रवि इस तरह हत्या कर देगा. वह तो शालू को भगाने में उस का सहयोग करने के लिए उस के साथ चले आए थे. अगले दिन पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

शालू नादान उम्र में रवि जैसे सिरफिरे की दोस्ती में न पड़ी होती और उस की हरकतों के बारे में अपने पिता को बता दिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. रवि ने भी अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से प्यार के जुनून में खून से हाथ रंग कर अपना भविष्य खराब कर लिया. कथा लिखे जाने तक रवि व उस के साथियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर रही थी. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.