Cyber Crime Story : बैंक अधिकारी बनकर लूटे लाखों

मार्च, 2017 के तीसरे या चौथे सप्ताह की बात है. छुट्टी का दिन होने की वजह से भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जे.सी. मोहंती दोपहर को अपने सरकारी बंगले में बने औफिस में बैठे फाइलें देख रहे थे. उन की टेबल पर फाइलों का ढेर लगा था. वह राजस्थान में जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी के भूजल विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं. वह पानी के महकमे से जुड़े हैं और इस समय गर्मी का मौसम चल रहा है, इसलिए फाइलों की संख्या काफी हो गई थी.

वह फाइल पर मातहत अधिकारियों द्वारा लिखी गई टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ रहे थे कि अचानक उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उन्होंने मोबाइल के स्क्रीन पर आने वाले नंबर को सरसरी तौर पर देखा और फिर स्विच औन कर के कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘सर, मैं स्टेट बैंक औफ इंडिया से बोल रहा हूं.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘हां, बताइए.’’ श्री मोहंती ने फाइल पर नजरें गड़ाए हुए ही कहा.

‘‘सर, आप को पता ही होगा कि एक अप्रैल से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर  सहित देश के 5 बैंकों का एसबीआई में विलय हो रहा है. आप का खाता एसबीबीजे में है. आप के एसबीबीजे के एटीएम कार्ड का वेरिफिकेशन करना है, ताकि उसे एसबीआई से जोड़ा जा सके.’’ दूसरी ओर से फोन करने वाले ने नपेतुले शब्दों में कहा.

बात करने वाले का लहजा सभ्य और अधिकारी जैसा था. इसलिए जे.सी. मोहंती ने पूछा, ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन इस में मुझे क्या करना है?’’

‘‘सर, आप अपने एटीएम कार्ड के नंबर बता दीजिए.’’ फोन करने वाले ने कहा.

एसबीबीजे के एसबीआई में विलय की बात श्री मोहंती को पता थी, क्योंकि रोज ही मीडिया में इस की खबरें आ रही थीं. इसलिए उन्होंने टेबल पर ही रखे अपने पर्स से स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर का एटीएम कार्ड निकाल कर उस पर सामने की ओर लिखे बारह अंकों का नंबर फोन करने वाले को बता दिया. दूसरी ओर से फोन करने वाले ने एटीएम कार्ड नंबर नोट करते हुए दोबरा बोल कर कन्फर्म करते हुए कहा, ‘‘थैंक्यू सर, आप का एक मिनट और लूंगा, आप को एटीएम कार्ड के पीछे लिखा सीवीवी नंबर भी बताना होगा.’’

जे.सी. मोहंती ने सीवीवी नंबर भी बता दिया. इस के बाद फोन कट गया तो वह फिर से अपने काम में व्यस्त हो गए. कुछ देर बाद उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने मैसेज देखा तो उस में ओटीपी नंबर था. उसे उन्होंने अपनी डायरी में नोट कर लिया.

मैसेज आने के करीब 10 मिनट बाद उन के मोबाइल पर एक बार फिर उस व्यक्ति का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘सर, आप को एक बार और कष्ट दे रहा हूं. आप के मोबाइल पर ओटीपी नंबर का मैसेज आया होगा. इसी ओटीपी नंबर से आप के एटीएम कार्ड और बैंक खाते का वेरिफिकेशन किया जाएगा. कृपया आप वह ओटीपी नंबर बता दीजिए, ताकि आप के खाते और एटीएम कार्ड को वेरिफाई कर के स्टेट बैंक औफ इंडिया से जोड़ कर अपडेट किया जा सके.’’

कुछ देर पहले ही अपनी पर्सनल डायरी में लिखा ओटीपी नंबर जे.सी. मोहंती ने सहज भाव से फोन करने वाले को बता दिया और अपने काम में व्यस्त हो गए. शासन सचिवालय में आसीन आईएएस अधिकारियों का जीवन बहुत व्यस्त होता है. दिनभर मीटिंगों और फाइलों में सिर खपाना पड़ता है. कभी संबंधित मंत्री बुला लेते हैं तो कभी मुख्य सचिव. मुख्यमंत्री औफिस से भी दिन में 2-4 बार किसी न किसी फाइल के बारे में पूछताछ की जाती है. वैसे भी उन दिनों राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था, इसलिए भूजल विभाग के सवालों के जवाब के लिए उन का विधानसभा में उपस्थित रहना जरूरी था.

इन्हीं व्यस्तताओं के बीच जे.सी. मोहंती के मोबाइल पर पचासों मैसेज ऐसे आए, जिन्हें वह खोल कर देख या पढ नहीं सके. 3 अप्रैल, को वह सचिवालय के अपने औफिस में बैठे थे. जिस समय वह थोड़ा फुरसत में थे, तभी उन के मोबाइल पर एक मैसेज आया. उन्होंने वह मैसेज पढ़ा तो हैरान रह गए. मैसेज के अनुसार उन के बैंक खाते से 30 हजार रुपए निकाले गए थे.

जबकि बैंक से या एटीएम से उन्होंने कोई पैसे नहीं निकाले थे, इसलिए वह परेशान हो उठे. वह तुरंत शासन सचिवालय में ही स्थित स्टेट बैंक औफ बीकानेर एंड जयपुर की शाखा पर पहुंचे और बैंक मैनेजर को पूरी बात बताई. बैंक मैनेजर ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत जे.सी. मोहंती के बैंक खाते की डिटेल निकलवाई, जिसे देख कर श्री मोहंती को झटका सा लगा. उन के बैंक खाते से 22 मार्च से 3 अप्रैल के बीच अलगअलग समय में 2 लाख 73 हजार रुपए निकाले गए थे.

उन के मोबाइल पर बैंक की ओर से इस निकासी के मैसेज भी भेजे गए थे, पर व्यस्तता की वजह से वह उन मैसेजों को देख नहीं सके थे. खाते से करीब पौने 3 लाख रुपए निकलने की डिटेल देख कर जे.सी. मोहंती को करीब 15 दिनों पहले मोबाइल पर आए उस फोन की याद आ गई, जिस में खुद को बैंक अधिकारी बता कर किसी आदमी ने उन से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर मांगा था. जे.सी. मोहंती को समझते देर नहीं लगी कि वह साइबर ठगों द्वारा ठगी का शिकार हो गए हैं. उन के साथ औनलाइन ठगी की गई है. उन्हें दुख इस बात का था कि सितंबर, 2016 में एक बार और उन के साथ साइबर ठगी हो चुकी थी. उस समय उन के क्रेडिट कार्ड से विदेश में 86 हजार रुपए की शौपिंग की गई थी. जयपुर के थाना अशोकनगर में इस की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. लेकिन ठगों का पता नहीं चल सका था.

इस औनलाइन ठगी से जे.सी. मोहंती परेशान हो उठे थे. उन्होंने बैंक मैनेजर से पैसों की निकासी रोकने को कहा ही नहीं, बल्कि बैंक की जरूरी कागजी खानापूर्ति भी की, ताकि औनलाइन ठगी करने वाले भविष्य में उन के खाते से पैसे न निकाल सकें. इस के बाद अपने औफिस पहुंच कर उन्होंने पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल को फोन कर के अपने साथ हुई साइबर ठगी की जानकारी दी. जे.सी. मोहंती के साथ हुई ठगी की बात सुन कर संजय अग्रवाल हैरान रह गए. हैरानी की बात यह थी कि राजस्थान पुलिस और विभिन्न बैंकों की ओर से अकसर समाचार पत्रों, इलैक्ट्रौनिक और डिजिटल मीडिया द्वारा रोजाना लोगों को औनलाइन ठगी के बारे में जागरूक करने के लिए बताया जा रहा है कि किसी भी व्यक्ति को फोन पर अपने एटीएम कार्ड या बैंक खाते की डिटेल कतई न दें.

पुलिस और बैंकों की इतनी कवायद के बावजूद भी आम आदमी रोजाना इन ठगों का शिकार हो रहे हैं, लेकिन अगर कोई सीनियर आईएएस अफसर इस तरह की ठगी का शिकार हो जाए तो ताज्जुब होगा ही. संजय अग्रवाल ने जे.सी. मोहंती को रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह देते हुए साइबर ठगों को जल्दी ही पकड़ने का आश्वासन दिया. मूलरूप से ओडि़सा के रहने वाले राजस्थान कैडर के सन 1985 बैच के आईएएस अधिकारी जे.सी. मोहंती ने उसी दिन जयपुर में शासन सचिवालय के पास स्थित थाना अशोकनगर में अपने साथ हुई इस ठगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. औनलाइन ठगी का यह मात्र एक उदाहरण है. ऐसी ठगी राजस्थान सहित देश के लगभग हर राज्य में रोजाना सौ-पचास लोगों के साथ हो रही है. राजस्थान में सन 2016 में साइबर क्राइम के 907 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिन में 530 मुकदमे सिर्फ जयपुर शहर में दर्ज हुए थे.

मुकदमों के दर्ज होने के बाद जांच में सामने आया कि साइबर ठग खुद को बैंक मैनेजर बता कर लोगों के मोबाइल पर फोन कर के कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड बंद हो रहा है या आप के एटीएम कार्ड की क्रय करने की सीमा बढ़ाई जा रही है अथवा आप के एटीएम कार्ड को आधार कार्ड से लिंक किया जा रहा है.’ किसी भी व्यक्ति से ये ठग मोबाइल फोन पर कहते हैं कि ‘आप का एटीएम कार्ड पुराना हो गया है. उस के बदले नया कार्ड जारी किया जा रहा है, इसलिए आप को एटीएम कार्ड का नया पासवर्ड दिया जा रहा है. आप ने पिछली बार एटीएम से कब रकम निकाली थी? क्या आप ने नए केवाईसी या आधार कार्ड को लिंक नहीं किया है?’

बैंक वालों की तरह तकनीकी बातें कह कर ये ठग मोबाइल फोन पर ही लोगों से एटीएम कार्ड का नंबर, सीवीसी नंबर और ओटीपी नंबर पूछ लेते हैं. इस के बाद ये साइबर ठग स्मार्ट फोन या कंप्यूटर के माध्यम से मनी ट्रांसफर सौफ्टवेयर द्वारा उस व्यक्ति के खाते की रकम निकाल लेते हैं. राजस्थान में इस तरह की लगातार हो रही ठगी की वारदातों का पता करने के लिए जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन तथा पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की तकनीकी शाखा एवं संगठित अपराध शाखा के अधिकारियों की एक टीम बनाई.

इस टीम ने जांच शुरू की तो पता चला कि इस तरह की वारदातें करने वाले महाराष्ट्र के पुणे जिले के तलेगांव इलाके में रह रहे हैं. टीम ने उन अपराधियों को चिन्हित कर उन की निगरानी शुरू की तो पता चला कि ये ठग कौल सैंटर की तर्ज पर बैंक अधिकारी बन कर रोजाना सैकड़ों लोगों को फोन करते हैं और उन से एटीएम कार्ड का नंबर आदि पूछ कर औनलाइन ठगी करते हैं. कई दिनों की निगरानी के बाद क्राइम ब्रांच ने महाराष्ट्र के पुणे के एसपी (ग्रामीण) सुवेज हक तथा क्राइम ब्रांच के अधिकारियों की मदद से 27 मार्च को 5 लोगों को महाराष्ट्र के तलेगांव दाभाड़े से गिरफ्तार किया. इन में झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड निवासी 3 सगे भाई यूसुफ, मुख्तार एवं अख्तर शामिल थे. यूनुस के इन तीनों बेटों में यूसुफ सब से बड़ा और अख्तर सब से छोटा था.

इन के अलावा महाराष्ट्र के पुणे के तलेगांव दाभाड़े निवासी संजय सिंधे और शैलेश को भी गिरफ्तार किया गया था. इन के पास से पुलिस ने 10 छोटे और 4 बड़े मोबाइल फोन, 15 सिम, 7 एटीएम कार्ड और 9 लाख 86 हजार  500 रुपए बरामद किए थे. इन लोगों ने पिछले साल जयपुर के रहने वाले गोपाल बैरवा को फोन कर के उन से 29 हजार 600 रुपए ठगे थे. इस का मुकदमा जयपुर पूर्व के थाना बस्सी में दर्ज था. गिरफ्तार अभियुक्तों को पुलिस जयपुर ले आई. इन से की गई पूछताछ में पता चला कि झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाइयों ने अपने गांव के ही दूसरे लोगों से बैंक अधिकारी बन कर औनलाइन ठगी करना सीखा और फर्जी आईडी से दर्जनों सिम हासिल कर के आसान तरीके से मोटा पैसा कमाने लगे.

ये लोग ठगी के लिए फर्जी आईडी से लिए गए सिम और दर्जनों मोबाइल का उपयोग करते थे, ताकि पुलिस इन तक पहुंच न सके. इन लोगों ने फर्जी मोबाइल सिमों पर ई-वौलेट भी रजिस्टर्ड करा रखे थे, जिन में शिकार हुए आदमी के बैंक खाते से औनलाइन पैसे ट्रांसफर करते थे. इस के बाद ये औनलाइन शौपिंग करते या ई-वौलेट के माध्यम से उस पैसे को अपने बैंक खाते में भेज देते. ये ठगी गई रकम से ई-वौलेट के जरिए मोबाइल भी रिचार्ज करते थे. इस के लिए ये मोबाइल की दुकान चलाने वालों से मिलीभगत कर उन्हें 30 से 40 प्रतिशत तक कमीशन का लालच देते थे. इस तरह मोबाइल रिचार्ज कर दुकानदारों से मिलने वाली रकम को ये लोग अपने घर वालों के बैंक खाते में जमा कराते थे.

देश भर में हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए झारखंड सहित विभिन्न राज्यों की पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा इलाके में रहने वाले साइबर ठगों पर शिकंजा कसा तो करमाटांड के रहने वाले तीनों ठग भाई अपने साथियों संजय सिंधे और शैलेश की मदद से इसी साल फरवरी से पुणे के तलेगांव इलाके में किराए के एक मकान में रहने लगे. उसी मकान से ये पांचों ठगी की वारदात करते थे.

पूछताछ में पता चला कि इन पांचों अभियुक्तों ने पिछले एक साल में राजस्थान सहित देश के 23 राज्यों में 85 हजार से अधिक फोन किए थे. लेकिन ये मुख्य रूप से राजस्थान के लोगों को अपना निशाना बनाते थे. इस का पता इस से चलता है कि 85 हजार फोन में से लगभग 50 हजार फोन राजस्थान के सभी 33 जिलों में किए गए थे. राजस्थान का ऐसा कोई जिला नहीं बचा था, जहां इन लोगों ने ठगी न की हो. अकेले जयपुर शहर में ही इन लोगों ने करीब 5 हजार फोन किए थे. पुलिस ने इन से जो करीब 10 लाख रुपए बरामद किए थे, ये रुपए एक महीने का कलेक्शन बताया गया था.

तीनों ठग भाइयों ने धोखाधड़ी से करोड़ों रुपए कमाए हैं. ठगी की रकम को इन्होंने करीब 25 बैंक खातों और 50 से अधिक ई-वौलेट में जमा कराई थी. इन के 10 बैंक खातों की डिटेल खंगाली जा रही है. इन में 4 खाते प्राइवेट बैंकों और 6 सरकारी बैंकों में हैं. इन में 4 बैंक खाते केरल में हैं. इन सभी खातों में 58 लाख 18 हजार रुपए जमा हुए थे, लेकिन इन में एक जनवरी, 2017 से 23 मार्च तक 8 लाख 49 हजार रुपए ही बचे थे. जयपुर पुलिस ने इस से पहले औनलाइन ठगी के एक अन्य मामले में 23 मार्च को एक अभियुक्त दिनेश मंडल को मुंबई से वहां की पुलिस की मदद से गिरफ्तार किया था. मूलरूप से झारखंड के जामताड़ा का रहने वाला दिनेश मंडल मुंबई में वर्ली स्थित जनता कालोनी के कोलीकम में रह कर औनलाइन ठगी कर रहा था.

उस ने पिछले साल जयपुर के विनोद कुमार पाल को फोन कर के खुद को बैंक अधिकारी बता कर एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 7 हजार रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस का मुकदमा जयपुर पश्चिम के थाना सदर में दर्ज हुआ था. पुलिस ने दिनेश मंडल से 4 मोबाइल फोन और 7 सिम बरामद किए थे. उस से की गई पूछताछ में पता चला कि उस ने ठगी के लिए मोबाइल फोन से लगभग 29 सौ लोगों को फोन किए थे. जयपुर के पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने लगातार हो रही औनलाइन ठगी की वारदातों को देखते हुए काफी समय पहले अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रथम) प्रफुल्ल कुमार के निर्देशन एवं पुलिस उपायुक्त (क्राइम) डा. विकास पाठक के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की विशेष टीम गठित कर इस टीम को ऐसे अपराधियों का पता लगाने का जिम्मा सौंपा था.

इस टीम ने ठगी के एकएक मामले का अध्ययन कर अपराधियों की कार्यप्रणाली समझी. उस के बाद तकनीकी माध्यम से उन मोबाइल नंबरों का पता लगाया, जिन से लोगों को ठगी का शिकार बनाया गया था. व्यापक जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने झारखंड से 3 ठगों को गिरफ्तार किया था. इस से पहले इसी साल 24 फरवरी को सब से पहले सत्यम राय को पकड़ा गया. वह झारखंड के देवघर के खाजुरिया बसस्टैंड के पास स्थित विकासनगर का रहने वाला था. फिलहाल वह पश्चिम बंगाल के कोलकाता के टालीगंज में के.एम. लक्षकार रोड पर रह रहा था. उस ने पिछले साल जयपुर के राजेंद्र गहलोत को अपना शिकार बनाया था.

20 साल के सत्यम राय ने फोन पर खुद को बैंक अधिकारी बता कर राजेंद्र गहलोत से एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर पूछ कर उन के खाते से 43 हजार 391 रुपए औनलाइन निकाल लिए थे. इस ठगी का मुकदमा जयपुर दक्षिण के थाना ज्योतिनगर में दर्ज है. पूछताछ में सत्यम राय ने बताया था कि राजेंद्र गहलोत से ठगी कर के उस ने 21 हजार 891 रुपए का सैमसंग गैलेक्सी ए 5 एड्रौयड मोबाइल फोन औनलाइन खरीदा था. बाकी रकम उस ने अलगअलग गेटवे के माध्यम से बैंक खाते तथा वौलेटों में डाली थी. मोबाइल फोन आ गया तो उसे ओएलएक्स पर आईफोन एस-5 से एक्सचैंज कर लिया था.

कोलकाता से बीबीए की पढ़ाई करने के बाद सत्यम राय ने हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी और बंगला सहित अन्य भाषाएं सीखीं, ताकि पूरे देश में विभिन्न बोलीभाषाओं में बात कर लोगों को झांसे में ले सके. पूछताछ में उस ने बताया था कि वह ठगी के जरिए मिली रकम के एक हिस्से से औनलाइन शौपिंग करता था, जिसे वह बेच कर पैसे खड़े कर लेता था. पुलिस ने सत्यम राय से सैमसंग गैलेक्सी ए-7, आईफोन एस-5 और सैमसंग गैलेक्सी ए-5 फोन बरामद किए थे. उस से पूछताछ और उस के मोबाइल फोन की जांच से पता चला कि उस ने देश के अनेक राज्यों में ठगी के लिए कुल 2860 लोगों को फोन किए थे.

जयपुर के सूरज प्रजापति से 55 हजार रुपए की इसी तरह की गई ठगी में पुलिस ने सागरदास और उस के साले विक्कीदास को 26 फरवरी, 2017 को गिरफ्तार किया था. ये दोनों ठग झारखंड में जामताड़ा जिले के अंबेडकर चौक पंडेडीह के रहने वाले थे. पुलिस ने इन से 5 मोबाइल फोन बरामद किए थे. इन मोबाइल फोनों में फर्जी आईडी पर जारी किए गए सिम मिले थे. जीजासाले ने अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 779 लोगों को फोन किए थे. जयपुर निवासी राजेश कुमार वर्मा से बैंक अधिकारी बन कर 21 हजार 566 रुपए की  औनलाइन ठगी करने के मामले में जयपुर पुलिस ने झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड थाना के धरवाड़ी गांव के रहने वाले जयकांत मंडल को मार्च, 2017 के पहले सप्ताह में गिरफ्तार किया था.

पुलिस ने उस से 3 मोबाइल फोन, 4 सिम और 4 एटीएम कार्ड बरामद किए थे. वह झारखंड के धनबाद के देवली गोविंदपुर में रह कर आईटीआई कर रहा था. उस ने कई भाषाएं सीख रखी थीं. जांच में पता चला कि जयकांत ने ठगी के लिए विभिन्न मोबाइल नंबरों से अलगअलग राज्यों में ठगी के लिए करीब 9068 लोगों को फोन किए थे. जांच में पता चला है कि झारखंड के जिला जामताड़ा के करमाटांड सहित कुछ इलाके साइबर अपराधियों के गढ़ हैं. कहा जाता है कि करमाटांड के झिलुआ गांव के रहने वाले सीताराम मंडल ने सन 2008-09 में बैंक अधिकारी बन कर लोगों से औनलाइन ठगी के साइबर अपराध को जन्म दिया था. इस का जाल अब पूरे जामताड़ा जिले में फैल चुका है. आजकल वहां 150 से अधिक गिरोह काम कर रहे हैं, जिन में 20 से 30 साल के युवा शामिल हैं.

इन में कुछ गिरोह ऐसे भी हैं, जिन्होंने वेतन और कमीशन के आधार पर दूसरे युवकों को नौकरी दे रखी है. कुछ पुराने ठग नई पीढ़ी के युवाओं को औनलाइन ठगी की ट्रेनिंग देते हैं और इस के बदले में मोटा मेहनताना वसूलते हैं. इन गिरोहों ने बैंक अधिकारी बन कर पूरे देश में अब तक कई अरब रुपए की ठगी की है. मजे की बात यह है कि इन में ज्यादातर ठग ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं हैं. लेकिन देश के अलगअलग राज्यों की भाषाएं सीख कर ये लोगों को ठग रहे हैं. देश में ऐसा कोई वर्ग नहीं है, जो इन की ठगी का शिकार न हुआ हो.

केंद्रीय मंत्री से ले कर, विभिन्न राज्यों के मंत्रियों, आईएएस एवं आईपीएस अधिकारियों, जज, डाक्टर, प्रोफेसर, आयकर अधिकारी, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटैंट, बिजनेसमैन सभी इन की ठगी का शिकार हो चुके हैं, जबकि इन लोगों को कहा जाता है कि ये अपनी बुद्धि और वाकचातुर्य के बल पर देश को चला रहे हैं. आम आदमी को तो ये ठग कुछ ही मिनट में बातों में उलझा कर उस का एटीएम कार्ड और ओटीपी नंबर आदि हासिल कर लेते हैं. इन ठगों ने केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री, बांका के जिला जज, एयरपोर्ट अथौरिटी के एजीएम सहित तमाम बडे़बडे़ अधिकारियों को ठगा है.

साइबर ठगी में लगे तमाम लड़के उच्च शिक्षा भी हासिल कर सूचना प्रौद्योगिकी में दक्ष हो रहे हैं, ताकि लोगों को उन के हिसाब से हैंडल किया जा सके. जामताड़ा में साइबर क्राइम की शुरुआत एसएमएस से मोबाइल फोन का बैलेंस उड़ा कर दूसरों को सस्ती दरों पर मोबाइल फोन का बैलेंस बेचने से हुई थी. इस के बाद 8-9 सालों में यह जिला पूरे देश में चर्चित हो चुका है. जामताड़ा इलाके से जब मोबाइल फोन से बहुत ज्यादा फोन किए जाने लगे तो मोबाइल कंपनियों को मोटी कमाई होने लगी. नेटवर्क की समस्या दूर करने के लिए मोबाइल कंपनियों ने वहां नए टौवर लगवा दिए, जिस से वहां नेटवर्क अच्छा हो गया. इस से ठगों का काम और ज्यादा आसान हो गया.

ठगी की रकम से ठग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं. उन के पास आलीशान मकान और लग्जरी गाडि़यां हैं. सड़कें खराब होने से गाडि़यां चलाने में परेशानी हुई तो इन ठगों ने सड़कें भी खुद ही बनवा लीं. अब ये अपराधी खुद को भारतीय रिजर्व बैंक का अधिकारी बता कर ठगी करने लगे हैं. एटीएम रिन्यू करने, उस की वैलिडिटी बढ़ाने एवं आधार कार्ड से जोड़ने के बहाने तो कई सालों से चल रहे हैं. जामताड़ा इलाके में रोजाना किसी न किसी राज्य की पुलिस साइबर ठगों की तलाश में पहुंचती रहती है. इसलिए अब यहां के ठग थोड़ेथोड़े समय के लिए दूसरे राज्यों में जा कर अपना  ठगी का धंधा करते हैं.

जामताड़ा से पिछले 2 सालों में 268 साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए हैं. इन से 16 सौ से ज्यादा मोबाइल फोन, 176 लग्जरी कारें और करोड़ों रुपए बरामद किए गए हैं.  जयपुर पुलिस की ओर से देवघर से गिरफ्तार मिथलेश ने पुलिस को बताया कि वह अपना एसबीआई का बैंक एकाउंट साइबर ठगों को किराए पर देता था. इस के बदले वह खाते में जमा होने वाली रकम से 20 प्रतिशत हिस्सा लेता था.

भले ही अपराधी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन साइबर ठगी बंद होने का नाम नहीं ले रही है. पढ़लिख कर आदमी बुद्धिमान हो जाता है, लेकिन जामताड़ा के अनपढ़ या मामूली शिक्षित अपराधी उन लोगों की आंखों से भी काजल चुरा लेते हैं, जो खुद को सब से ज्यादा समझदार समझते हैं.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रंगहीन हिना : जेल में पैदा हुई लड़की की कहानी

‘मैं न तो पाकिस्तानी हूं और न ही हिंदुस्तानी, मैं एक इंसान हूं और कहीं भी रहूं जीने का हक रखती हूं.’ जेल की चारदीवारी से पहली बार बाहर की दुनिया देखने निकली वह मासूम अपनी बात कहते हुए भावुक हो गई. यह लड़की थी हिना.

हिना के जीवन में 2 नवंबर का दिन उस के लिए किसी दूसरे जन्म से कम नहीं था. 11 साल पहले 8 नवंबर, 2006 को हिना का जन्म पंजाब के अमृतसर की सेंट्रल जेल में हुआ था. जेल में जन्म लेने की वजह से जेल के सभी कैदी उसे कान्हा और राधा नामों से बुलाते थे.

हिना की अम्मी फातिमा का कहना था कि हिना तो जेल की बेटी है. मुझे तो यह गम है कि मेरे अनचाहे गुनाह की सजा मेरी बेटी को भुगतनी पड़ रही है. लेकिन दूसरी ओर खुशी इस बात की है कि हिना को सभी कैदी बहुत प्यार करते हैं.

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हिना का जन्मदिन मुझे भी याद नहीं, लेकिन हिना का जन्म जेल में हुआ है, इसलिए सभी कैदियों सहित पूरा जेल स्टाफ जन्माष्टमी के दिन उस का जन्मदिन मनाते हैं. भले ही मैं मुसलमान हूं, पाकिस्तान से हूं लेकिन जिस तरह से हिना को कोई कान्हा तो कोई राधा कह कर प्यार करता है, दुलारता है, यह देख मेरी आंखें बरस पड़ती हैं.

पाकिस्तान के गुजरांवाला निवासी सैफुद्दीन की पत्नी फातिमा, उस की बहन मुमताज और नानी रशीदा बेगम 8 मई, 2006 को समझौता एक्सप्रेस से दोपहर 2 बज कर 20 मिनट पर भारत-पाक बौर्डर के अटारी रेलवे स्टेशन पर पहुंची थीं. साढ़े 5 बजे फातिमा, मुमताज व रशीदा बेगम के पासपोर्ट की चैकिंग की गई.

सारे दस्तावेज दुरुस्त पाए गए थे. शाम 6 बजे काउंटर नंबर 14 पर कस्टम विभाग के अधिकारियों ने उन के सामान की चैकिंग की तो करीब 6 हजार रुपए की जाली करेंसी बरामद हुई. अटारी रेलवे स्टेशन पर कस्टम विभाग ने फातिमा की पुन: अच्छी तरह से तलाशी ली. इस बार उस के पर्स और सामान से एक किलो हेरोइन बरामद हुई, जिस के बारे में फातिमा ने अधिकारियों को बताया कि यह हेरोइन उस की नहीं है.

दोनों महिलाओं का कहना था कि उन्हें किसी ने यह सामान भारत पहुंचाने के लिए दिया था. उन्हें पता नहीं था कि सामान में हेरोइन छिपा कर रखी हुई है.

कस्टम विभाग ने फातिमा उस की बहन मुमताज और मां रशीदा बेगम को तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. फातिमा, उस की बहन और मां को गिरफ्तार कर के उन के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. इस के बाद सीमा शुल्क विभाग ने तीनों महिलाओं को शाम साढे़ 7 बजे जीआरपी को सौंप दिया.

जीआरपी ने जाली करेंसी के मामले में तीनों महिलाओं को नामजद करते हुए गिरफ्तार कर लिया. बाद में उन्हें अदालत में पेश कर के अमृतसर सेंट्रल जेल भेज दिया गया. कुछ महीने बाद कस्टम विभाग और जीआरपी ने इस मामले में अपनी काररवाई पूरी कर के अदालत में चालान पेश कर दिया था. तत्कालीन न्यायाधीश ए.पी. बत्रा ने तीनों को 8 दिसंबर, 2009 को 10-10 साल की कैद और 2-2 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी.

जिस समय फातिमा को गिरफ्तार किया गया था, उस समय वह गर्भवती थी. इतने सालों तक जेल में रही रशीदा बेगम की मौत हो गई और फातिमा ने बच्ची हिना को जन्म दिया था. फरवरी, 2017 में सजा की अवधि पूरी हो गई थी और अदालत ने जुरमाने की रकम जमा करवाने के बाद रिहाई के आदेश जारी किए थे. मई, 2017 में एडवोकेट नवजोत कौर चब्बा व नवतेज सिंह ने 4 लाख रुपए जुरमाने के जमा करवा दिए.

एनडीपी एक्ट में सजा होने के बाद आर्थिक रूप से कमजोर फातिमा और मुमताज का अपने परिवार से कोई ताल्लुक नहीं रहा.

परिवार उन की पैरवी के लिए न तो भारत आया और न जुरमाने की राशि चुकाई गई थी. भारत आते समय पकड़े जाने के बाद फातिमा के पाकिस्तान में रहने वाले उस के परिजनों और रिश्तेदारों ने गरीबी के चलते एक तरह से उस से नाता तोड़ लिया था. ऐसी स्थिति में वकील नवजोत कौर चब्बा ने उन की रिहाई का बीड़ा उठाया था.

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   हिना के साथ वकील नवजोत कौर चब्बा

बटाला के सब दा भला ह्यूमिनिटी क्लब के संचालक नवजोत सिंह के जरिए उन्होंने जुरमाने की राशि बैंक में जमा करवाई. जुरमाने की राशि 2017 के अप्रैल महीने में जमा करवा दी गई थी. लेकिन काफी भागदौड़ के बाद एडवोकेट चब्बा ने गृह मंत्रालय से उन की रिहाई के आदेश जारी करवाए थे. इस बीच पाक एंबेसी की काउंसलर फौजिया मंजूर ने खतो किताबत कर हिना, उस की मां फातिमा और मौसी मुमताज के पाकिस्तान पहुंचाने का रास्ता साफ कर दिया था.

हिंदुस्तान में जन्मी हिना को पाकिस्तानी नागरिकता मिल जाएगी. बिना कोई अपराध किए हिना को कई सालों तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा था.

इन लोगों की रिहाई में बड़ी भूमिका निभाने वाले वकील चब्बा को खुशी है कि निरपराध हिना अब खुली हवा में सांस ले सकेगी. एडवोकेट नवजोत कौर ने इस विषय में विदेश मंत्री को चिट्ठी लिखी थी.

जुलाई, 2017 में हिना के बारे में पाक स्थित भारतीय दूतावास अधिकारी ने पाक सरकार से संपर्क साधा और अगस्त 2017 में पाकिस्तान ने हिना को पाकिस्तान आने की इजाजत देने की बात स्वीकार की.

वकील नवजोत चब्बा ने बताया कि कानून के मुताबिक 17 साल के बच्चे को बाल सुधार गृह में रखा जाता है. इसी बीच एक दिन वह जेल में लेक्चर के लिए गई थीं. वहां उन की मुलाकात उक्त परिवार से हुई. जब उन्हें पता चला कि हिना अपनी मां के बिना नहीं रह सकती और उसे कानून के मुताबिक बाल सुधार गृह में भेजा जा रहा है तो उन्होंने इस बारे में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक अरजी दायर कर दी.

हाईकोर्ट के आदेश पर हिना को उस की मां और मौसी के पास ही रहने की इजाजत मिल गई थी. जिस वक्त फातिमा भारत आई थी, गर्भवती थी. उस ने सजा के दौरान जेल में ही अपनी बेटी को जन्म दिया था, जिस का नाम हिना रखा गया. 3 साल की उम्र में सरकार और जेल प्रशासन की तरफ से उसे जेल के बाहर स्कूल में पढ़ाई के लिए दाखिल करवाया गया.

हिना सिर्फ स्कूल जाने के लिए ही जेल से बाहर आती थी. बाकी समय वह जेल में ही अपनी मां के पास रहती थी. जेल की सलाखों में फातिमा की कोख से जन्मी हिना को कई कैदी कान्हा तो कई राधा कह कर बुलाते थे. हिना भी कान्हा के नाम से खुश थी, लेकिन उसे इस शब्द के मायने पता नहीं थे.

जेल की कोठरी में जन्म लेने के बाद कृष्ण को वासुदेव ने उफनती यमुना पार करवाई थी, लेकिन इस कान्हा का वासुदेव तो पाकिस्तान में था और वहां जाने की राह में यमुना नहीं बल्कि बड़ी बाधा बौर्डर था, क्योंकि भारत में जन्म लेने के कारण कानूनन हिना भारतीय नागरिक थी.

कानूनन बिना पासपोर्ट वीजा के भारतीय नागरिक को पाक सरकार स्वीकार नहीं कर रही थी. इसीलिए इन कानूनी अड़चनों को देखते हुए हिना का अटारी बौर्डर को पार करना भी मुमकिन होता नहीं दिख रहा था. ऐसे में एक फरिश्ता या यूं कहें तारणहार बन कर आईं एडवोकेट नवजोत कौर चब्बा ने एक जीतीजागती मिसाल पेश की थी.

एडवोकेट नवजोत कौर चब्बा और समाजसेवी संस्था के माध्यम से हिना की रिहाई को ले कर पिछले 6 महीने से भारतपाक के बीच वार्तालाप चल रहा था. मामला तब अटक गया, जब हिना के परिजनों ने पाक से पैगाम भिजवाया कि हिना व अन्य की रिहाई के लिए उन के पास 4 लाख की रकम नहीं है.

यह पैगाम मिलने के बाद हिना को पाक पहुंचाने का बीड़ा उठाने वालों ने जुरमाने की रकम भर कर हिना की रिहाई का रास्ता साफ किया.

हिना के अब्बू असगर अली छोटामोटा काम करते हैं. गरीबी के कारण वह हिना व बाकी घर वालों को जेल से रिहा करवाने के लिए 4 लाख की रकम नहीं जमा करवा सके तो अमृतसर की गैरसरकारी संस्था सब दा भला ने 4 लाख रुपए जमा कराने के साथ ही रिहाई की प्रक्रिया भी पूरी करवाई.

सारी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने पर भी रिहाई नहीं हो पाने पर वकील चब्बा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मामले के हालात को ले कर पत्र लिखा. पीएमओ ने 17 अक्तूबर, 2017 को जारी एक पत्र में वकील चब्बा को जवाब दिया कि तीनों लोगों हिना, फातिमा और मुमताज की रिहाई 2 नवंबर को की जाएगी.

हिना और उस के घर वालों ने जेल में जो काम किया था, उस के मेहनताने के तौर पर उन्हें एक लाख रुपए दिए गए. दोनों देशों में अमनशांति का संदेश देने के लिए संस्था ने हिना को 1 लाख रुपए की लागत से तैयार किए भारत के राष्ट्रीय झंडे तथा पाकिस्तान के झंडे वाला सोने का लौकेट दे कर वापस उस के वतन भेजा.

अपनी रिहाई के समय पत्रकारों से बातचीत करते हुए फातिमा और मुमताज ने कहा कि उन्हें उस जुर्म की सजा काटनी पड़ी थी, जो उन्होंने किया ही नहीं था. उन का कहना था कि वे पूरी तरह से अनभिज्ञ थीं कि किन लोगों ने उन के सामान में कब और कैसे यह हेरोइन छिपा कर रख दी थी. उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सरकारों को उन कैदियों को रिहा कर देना चाहिए, जो अपनी सजाएं पूरी कर चुके हैं.

पाकिस्तान रवाना होते समय हिना के हाथों में भारत व पाकिस्तान के फ्लैग थे, जो दर्शा रहे थे कि उस के दिल में भारत व पाक दोनों के लिए एक जैसा सम्मान है. इसीलिए हिना कहती है कि जेल के सभी अंकल मुझे प्यार करते हैं. हिना को पढ़ाने वाली टीचर राजबीर कौर एवं सुखजिंदर सिंह हेर कहती हैं कि हिना बहुत मीठी और प्यारी बातें करती है. जेल में जन्म होने के चलते जेल प्रबंधन भी उसे बहुत प्यार करता था.

अमृतसर जेल से रिहाई के बाद हिना और उस की मां फातिमा अटारी बौर्डर की तरफ बढ़ रही थीं कि बच्ची ने पूछा, ‘‘अम्मी, क्या हमें अब्बू लेने के लिए आएंगे?’’

सवाल सुन कर एक बार फातिमा चुप हो गई फिर बोली, ‘‘बेटा, कौन आएगा हमें लेने के लिए.’’

हिना भी अपनी मां का यह उत्तर सुन कर चुप हो गई और उस के कदम बौर्डर की ओर बढ़ गए. यह सवाल जवाब सुन कर एडवोकेट नवजोत कौर चब्बा और उन के आसपास चल रहे लोगों की भावुकतावश आंखें छलक आईं.

वहीं दूसरी ओर जिस हिना को भारत के लोगों ने पलकों पर बिठाया, उसी हिना ने जब वाघा बौर्डर (अटारी बौर्डर के उस पार पाक एरिया) पर पाक के जिओ टीवी पर भारत को अच्छा कहा तो पाकिस्तान को इतना बुरा लगा कि चैनल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी.

जिओ न्यूज टीवी चैनल ने हिना का स्पैशल इंटरव्यू वाघा बौर्डर पर लिया तो पाक हुकूमत ने भारत को अच्छा बताने पर यह काररवाई की.

खास बात यह थी कि अमृतसर सेंट्रल जेल में सन 2006 में पैदा हुई हिना जब पाकिस्तान लौटी तो पाक की खुफिया एजेंसी पूरे परिवार को मीडिया से दूर रख कर रात 10 बजे तक पूछताछ करती रही.

हिना पाक मीडिया से कहती रही, भारत के लोग बहुत अच्छे हैं. रात करीब 12 बजे हिना अपने घर पहुंची तो वहां सैकड़ों की गिनती में देशविदेश के मीडियाकर्मी मौजूद थे.

अधिकांश मीडियाकर्मी हिना से सवाल पूछ रहे थे कि भारत ने उसे क्यों कैद में रखा, उस का क्या कसूर था? लेकिन हिना पाक मीडिया से यही कहती रही कि भारत के लोग बहुत अच्छे हैं.

उसे जेल में सभी लोग बहुत प्यार करते थे. जेल स्टाफ उसे बिटिया हिना कहा करता था. जेल से रिहा होने के बाद हिना काफी खुश नजर आई. वहीं उस की मां फातिमा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद किया और कहा कि मोदी साहब ने मामले को खासतौर पर लिया, इस के लिए उन की शुक्रगुजार हूं.

मिलावटी मसालों वाला गिरोह

गाजियाबाद के कस्बा लोनी में स्थित विकास नगर में कुछ उत्साही युवकों ने भंडारे का आयोजन किया था. गली नंबर 8 के पास हलवाई के लिए टेंट लगाया जा चुका था. सब्जी, आटा, घी, तेल वगैरह एकत्र हो चुका था. हलवाई के साथ आए कारीगरों ने भट्ठी तैयार कर ली थी.

सब्जी आलू की बनाई जानी थी, आलू काट लिए गए थे. सब सामान तैयार था, कमी मिर्चमसालों की थी. यह सब लाने का जिम्मा अतुल ने उठाया था. वह अभी तक मसाले देने नहीं आया था, जबकि अतुल के दोस्तों का कहना था, ‘मसाले तो अतुल ने एक हफ्ता पहले ही खरीद लिए थे. मसालों को उसे सुबह ही पहुंचा देना चाहिए था.’ वह नहीं आया, इस के पीछे क्या वजह है कोई नहीं जानता था.

”रामू, तुम अतुल के घर जा कर देखो. कहीं अतुल आज के भंडारे की डेट भूल तो नहीं गया है.’’ गणेश नाम के एक व्यक्ति ने वहां मौजूद एक युवक को संबोधित कर के कहा.

”देखता हूं दादा.’’ रामू सिर हिला कर बोला और गली नंबर 8 में ही स्थित अतुल जैन के घर की तरफ चल पड़ा.

अभी रामू दोचार कदम ही चला था कि सामने से अतुल अपनी स्कूटी से आता हुआ नजर आ गया. रामू के पांव रुक गए. अतुल पास आया, तब रामू को उस की स्कूटी पर मसालों का कट्टा नजर आ गया.

”सब तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं अतुल. मैं तुम्हें बुलाने जा रहा था कि तुम आ गए.’’

”मैं देर से सोया था, थोड़ी देर पहले ही जागा हूं. अभी नहाया भी नहीं, पहले मसाले पहुंचाने आ गया.’’ अतुल ने कहा और स्कूटी आगे बढ़ा कर टेंट के नजदीक रोक दी.

रामू भी लौट आया. मसाले का कट्टा उतार कर उसी ने हलवाई के पास पहुंचाया, ”लो उस्ताद, मसाले भी आ गए.’’

हलवाई ने कट्टे की रस्सी खोली और टेबल पर कट्टे से मसाले के पैकेट निकाल कर रखने लगा.

अतुल वहां से हट कर गणेश के पास आ गया और बात करने लगा. अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि हलवाई उन के पास आ कर खिन्न होते हुए बोला, ”मसाले कहां से उठा कर लाए हो भाई. सारे मसाले नकली हैं. इन से सब्जी में कोई टेस्ट नहीं आएगा.’’

”यह क्या कह रहे हो उस्ताद? मसाले नकली कैसे हो गए, मैं ने तो बाजार भाव में ही खरीदे हैं, किसी रेहड़ी या पटरी से नहीं खरीदे हैं.’’ अतुल हैरान परेशान स्वर में बोला.

”बेशक बाजार भाव से खरीदे हैं लेकिन मैं रातदिन पार्टी भंडारे का काम करता हूं, मुझे मसालों की अच्छे से पहचान है. तुम जो मसाले लाए हो, सब मिलावटी और नकली हैं.’’

”अतुल, उस्तादजी अगर कह रहे हैं कि मसाले नकली हैं तो नकली ही होंगे. तुम जहां से इन्हें लाए हो वापस दे कर अच्छी दुकान से मसाले खरीद लाओ.’’ गणेश ने गंभीर होते हुए कहा.

”मैं ने करावल नगर से ये मसाले खरीदे थे. मैं इन्हें बाद में वापस कर दूंगा. आप ये 2 हजार रुपए रखो और मसाले खरीद लाओ.’’ अतुल ने जेब से 2 हजार रुपए निकाल कर हलवाई को दे दिए.

”मुझे अपनी स्कूटी दे दो, मैं जवाहर नगर से मसाले खरीद कर लाता हूं.’’

”ले जाइए.’’ अतुल ने स्कूटी की चाबी हलवाई की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ”रामू, तुम उस्तादजी के साथ चले जाओ.’’

रामू ने सिर हिलाया. हलवाई उसे ले कर मसाले खरीदने चला गया.

नकली मसालों की इस तरह पुलिस को लगी भनक

जब ये बातें हो रही थीं, वहीं पास से गुजर रहा पतला सा व्यक्ति रुक कर उन की बातें सुनने लगा था. हलवाई गया तो वह व्यक्ति लपक कर उन के पास आ गया.

”हलवाई मसालों को नकली बता रहा है, कहीं तुम ये मसाले करावल नगर की उस मसाला फैक्ट्री से तो नहीं लाए हो, जो न्यू नाइस चिकन कार्नर के पास में है?’’ उस व्यक्ति ने गंभीर हो कर पूछा.

”हां, मसाले मैं ने वहीं से खरीदे हैं.’’ अतुल जल्दी से बोला, ”किंतु आप कौन हैं और उस फैक्ट्री के बारे में आप को कैसे जानकारी है?’’

युवक मुसकराया फिर आगे मुंह कर फुसफुसाया, ”मुझे उस के बारे में सब पता है. उस नकली मसाला बनाने वाली फैक्ट्री के ऊपर मेरी कई दिनों से नजर जमी हुई है. मैं तय नहीं कर पा रहा था कि उस फैक्ट्री में असली मसाले तैयार होते हैं या नकली. आज पारखी (हलवाई) ने मेरी परेशानी दूर कर दी. उस फैक्ट्री में नकली मसाले बनाए जाते हैं. अब उस फैक्ट्री पर पुलिस रेड होगी. हां, तुम अभी यह बात कहीं लीक मत करना और कल सुबह अपना माल बदल लेना.’’

”ठीक है.’’ अतुल ने कहा.

वह युवक आराम से टहलता हुआ पैदल ही एक ओर बढ़ गया. अतुल और गणेश उसे हैरानी से देखते रह गए. दरअसल, वह युवक दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का मुखबिर था.

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       एएसआई कंवर पाल

पहली मई, 2024 को करीब साढ़े 10 बजे मुखबिर साइबर सेल क्राइम ब्रांच के औफिस में पहुंचा. उस वक्त अपने कक्ष में एएसआई कंवर पाल एक जरूरी फाइल देख रहे थे. मुखबिर ने उन्हें सैल्यूट किया तो कंवरपाल मुसकरा पड़े, ”पुलिस की संगत में रह कर तुम भी खुद को पुलिस वाला ही समझने लग गए हो.’’

मुखबिर ने खींसे निपोरी, ”ऐसी बात नहीं है साहब, कहां आप पढ़ेलिखे अफसर और कहां मैं तीसरी पास सड़कछाप आदमी. बस तहजीब कहती है, अपने से बड़े को सम्मान करो, सो कर लेता हूं. आप को तो खुश होना चाहिए साहब.’’

”तुम्हें देख कर खुशी ही होती है, क्योंकि तुम कभी बिना वजह नहीं आते हो.’’ कंवरपाल मुसकरा कर बोले, ”बोलो, क्या खबर है?’’

”साहब, मुझे आप ने करावल नगर में नकली मसाले तैयार होने का पता ठिकाना मालूम करने के काम पर लगाया था.’’

”याद है. हमारी एक टीम नकली मसालों के धंधे का पता लगाने में जुटी हुई है. इस में एसआई प्रवेश, मैं और हैडकांस्टेबल विपिन और अनुज शामिल हैं. तुम ने क्या मालूम किया है?’’

”बहुत कुछ मालूम कर लिया है साहब.’’ मुखबिर एएसआई कंवरपाल के सामने आ कर कुरसी पर बैठते हुए बोला, ”करावल नगर में नकली मसालों को बना कर सप्लाई किया जा रहा है. एक ऐसा गवाह भी मुझे मिल गया है, जिस ने उसी फैक्ट्री से भंडारा करने के लिए मसाले खरीदे थे. भंडारा लोनी के विकास नगर में होना था, मैं कल सुबह वहीं से गुजर रहा था. मुझे पता लगा, जो मसाले करावल नगर से भंडारा करने के लिए खरीदे गए थे, हलवाई ने उन्हें देख कर बता दिया कि वे नकली हैं.’’

”यह पक्की जानकारी है या…’’

”एकदम पक्की है साहब. एक हफ्ते से मैं उस मसाला फैक्ट्री की टोह ले रहा था. वह फैक्ट्री न्यू नाइस चिकन कार्नर के पास स्थित है. मैं ने कल फैक्ट्री में घुस कर पूरी जानकारी जुटाई है. फैक्ट्री में मसाला पीसने की चक्की भी है. वहां बड़े पैमाने पर मसालों में हानिकारक पदार्थ मिलाए जाते हैं.

”लाल मिर्च, हल्दी, धनिया पाउडर, गरम मसाले आदि में सड़ा हुआ सामान डाला जा रहा है जो आम लोगों के लिए बहुत खतरनाक है. इस के प्रयोग से उन की सेहत खराब हो सकती है. साहब, कुछ नामी ब्रांड के नाम से इन मिलावटी मसालों को पैकेटों में भरा जाता है. इन्हें पकड़ा नहीं गया तो ये अपने मुनाफे के लिए दिल्ली ही नहीं, एनसीआर तक में लोगों की तबियत खराब कर डालेंगे. आप इन पर तुरंत ऐक्शन लीजिए.’’

”अगर तुम्हारी सूचना सही हुई तो तुम्हें मोटा ईनाम दिया जाएगा. तुम कुछ देर बाहर रुको, मैं अफसरों को इस की जानकारी दे कर रेड डालने की इजाजत लेता हूं.’’

मुखबिर उठ कर कंवरपाल के कक्ष से बाहर निकल गया. एएसआई कंवरपाल ने इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह को फोन से मुखबिर द्वारा दी गई नकली मसाला फैक्ट्री के बारे में जानकारी दे दी. उन्होंने मुखबिर के साथ तुरंत एएसआई कंवरपाल को अपने कक्ष में आने को कहा.

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                  इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह

एएसआई कंवरपाल अपने कक्ष से निकल कर बाहर आए. मुखबिर बाहर खड़ा था. एएसआई कंवरपाल को देखते ही मुखबिर सावधान हो कर खड़ा हो गया.

”आओ मेरे साथ.’’ एएसआई कंवरपाल ने मुखबिर को इशारा किया और उसे ले कर इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह के औफिस में आ गए.

इंसपेक्टर को सैल्यूट कर के उन्होंने मुखबिर की तरफ देख कर कहा, ”साहब, मैं ने नकली मसाला बनाने वाली फैक्ट्री की टोह में एक सप्ताह पहले इसे लगाया था. यह पक्की जानकारी ले कर आया है.’’

”क्या उस फैक्ट्री में नकली मसाले तैयार किए जाते हैं?’’ इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने मुखबिर से पूछा.

”जी हां, साहब. मसालों में हानिकारक चीजें मिला कर वे लोग नामी कंपनियों के पैकेट तैयार करते हैं.’’ मुखबिर ने गंभीर स्वर में कहा, ”वहां तुरंत रेड डालने की जरूरत है.’’

नकली मसाला फैक्ट्री पर रेड के लिए बन गई पुलिस टीम

इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने उच्चाधिकारियों से बात कर के उन के निर्देश पर तुरंत एक रेड पार्टी का गठन कर दिया. इस रेड पार्टी में एसआई हरविंदर, प्रवेश राठी, एएसआई विनोद, हैडकांस्टेबल विपिन, अनुज को शामिल किया गया. इन के साथ मुखबिर को जाना था, क्योंकि वह उस फैक्ट्री के बारे में जानता था, जहां नकली मसाले तैयार किए जा रहे थे.

HC Anuj kumar                            HC vipin

                       हैडकांस्टेबल अनुज                                                 हैडकांस्टेबल विपिन

सादे कपड़ों में रेड पार्टी मुखबिर के साथ करावल नगर में स्थित मसाला फैक्ट्री के पास पहुंच गई. दरवाजे खुलवा कर पुलिस टीम फैक्ट्री में घुसी तो वहां काम करने वाले घबरा गए.

HC vinod                                     HC-anand

            एएसआई विनोद                                                             हैडकांस्टेबल आनंद 

एक साथ इतने लोगों को अंदर आया देख कर टेबल के पास बैठा एक व्यक्ति चौंक कर खड़ा हो गया. वह उन्हें देख कर हैरान होते हुए बोला, ”कौन हैं आप लोग? क्या आप यहां पर मसाले खरीदने आए हैं?’’

”हम क्राइम ब्रांच से हैं. काफी समय से हमारी एक टीम तुम लोगों की टोह में थी. आज तुम तक पहुंचने में हमें सफलता मिली है.’’

वह व्यक्ति बुरी तरह घबरा गया. वह हड़बड़ा कर बोला, ”सर, ऐसा कुछ नहीं है. यहां कोई नकली मसाला नहीं बनाया जाता.’’

एसआई हरविंदर ने एक करारा झापड़ उस की कनपटी पर रसीद कर दिया, ”मैं ने यह कहां कहा कि यहां नकली मसाला बनता है! तुम क्यों सफाई देने लगे?’’

”जी, मैं सच कह रहा हूं.’’ वह थप्पड़ खा कर अपना गाल सहलाते हुए बोला.

”हम देख लेंगे, सच क्या है.’’ एसआई हरविंदर ने टीम को इशारा किया, ”आप अंदर देखिए.’’

टीम के सभी सदस्य अंदर लपके.

SI Harvinder singh                    SI parvesh

            एसआई हरविंदर                                                           एसआई प्रवेश राठी

अंदर एक अधेड़ व्यक्ति मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के अंदर हल्दी पीसता मिला. उसे अपने काबू में कर के टीम यूनिट का मुआयना करने लगी. अंदर काफी कट्टे रखे थे. इन में देखा गया तो पूरी टीम के होश उड़ गए.

अंदर कट्टों में खराब चावल की किनकी, सड़े हुए गोले (नारियल), पशुओं को खिलाने वाला चोकर, सड़े हुए बेर, जामुन की गुठलियां, हल्दी की गांठ, अमचूर पाउडर, मसाले की पत्तियां, साबुत धनिया, लाल मिर्च साबुत, लाल मिर्च के डंठल, आर्टिफिशियल कलर, तेल आदि मिले. कुछ बोरों में यूकेलिप्टस के पत्ते, लकड़ी का बारीक बुरादा भी भरा मिला.

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चक्की के पास पिसी हुई हल्दी पड़ी थी. क्राइम ब्रांच की टीम हैरान थी कि रुपया कमाने के लिए ये लोग सब की जिंदगी और सेहत के साथ खतरनाक खिलवाड़ कर रहे थे. सड़े हुए चावल, सड़े हुए गोले, यूकेलिप्टस के पत्ते, लकड़ी का बुरादा मसाला तैयार करने में इस्तेमाल किया जा रहा था.

पुलिस ने बुलाया फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट के अफसरों को

इस में जहरीला कलर, सड़ा हुआ सरसों तेल, पशुओं का चोकर, सड़े बेर, जामुन की गुठलियां, सड़ा नारियल तक पीसा जा रहा था. साइट्रिक एसिड भी मिलाया जाता था.

यहां 2 व्यक्ति थे. इन के नाम पूछे गए. एक ने अपना नाम खुर्शीद मलिक (42 वर्ष). पता गिरी मार्केट, लोनी, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश, बताया. दूसरे का नाम दिलीप सिंह उर्फ बंटी (46 वर्ष) निवासी दयालपुर, मेन रोड करावल नगर, दिल्ली.

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       आरोपी खुर्शीद मलिक

यह फैक्ट्री दिलीप सिंह की थी. यह पिछले 6-7 महीने से बी-24ए दयालपुर, करावल नगर, दिल्ली, नजदीक न्यू नाइस चिकन कार्नर में किराए पर यह मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चला रहा था.

दिलीप सिंह ने पूछताछ में बताया कि वह मिलावटी मसाला तैयार कर नामी ब्रांड के मसालों के नकली रैपर्स में भर कर दिल्ली की खारी बावली, मिठाई पुल, मुस्तफाबाद, लोनी, गाजियाबाद, सदर बाजार में थोक व फुटकर में बेच कर मोटी कमाई कर रहा था.

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      आरोपी दिलीप उर्फ बंटी

सभी नकली मसालों के सैंपल लेना जरूरी था. एसआई प्रवेश ने फूड सेफ्टी औफिसर (जीएनसीटी) को सूचित कर के सारी बात बताई और टीम को करावल नगर आने के लिए कहा.

यह काररवाई चल ही रही थी कि अपनी स्कूटी पर अतुल जैन वह मसालों का कट्टा ले कर वहां आ गया, जो उस ने 23 अप्रैल को ही भंडारे के लिए वहां से खरीदे थे.

आते ही वह दिलीप उर्फ बंटी से झगड़ा करने लगा, ”तुम से मैं ने जो मसाले खरीदे थे, वे नकली हैं. तुम यहां नकली मसाले बनाने का धंधा करते हो?’’ अतुल जैन गुस्से में बोला, ”मैं तुम्हारी पुलिस में शिकायत करूंगा.’’

”हम क्राइम ब्रांच से हैं.’’ एसआई हरविंदर ने अतुल के पास आ कर कहा, ”यह मिलावटी मसाले बनाने और बेचने के जुर्म में हमारी गिरफ्त में है. क्या तुम इस के खिलाफ गवाही दोगे मिस्टर अतुल?’’

”अवश्य दूंगा सर, ऐसे लोगों को कानून की तरफ से सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए.’’ वह बोला.

”गुड बौय.’’ एसआई हरविंदर ने अतुल की पीठ थपथपाई, ”तुम अपनी कंप्लेंट हमें लिखवा दो. मिस्टर विनोद, आप अतुल की लिखित शिकायत ले लो.’’

”ओके सर.’’ एएसआई विनोद अपने साथ अतुल को ले कर एक तरफ चले गए.

थोड़ी ही देर में मंसूर अली, एफएसओ तथा फूड ऐंड सेफ्टी डिपार्टमेंट, दिल्ली सरकार अपनी टीम के साथ वहां आ गए. उन्होंने आते ही हल्दी पाउडर, मिर्च, मिर्च पाउडर, अमचूर, धनिया पाउडर, गरम मसाले की शुद्धता जांचने के लिए इन के सैंपल लिए. इसी प्रकार उपरोक्त सभी मसालों के सैंपल पौलीथिन में ले कर उन के नंबर लिखे गए. इस के बाद दिलीप सिंह उर्फ बंटी की निशानदेही पर निम्नलिखित सामान पुलिस कब्जे में लिया गया.

खुली पड़ी हल्दी को अलगअलग 3 प्लास्टिक कट्टों में भर कर उन कट्टों को वहां रखी इलैक्ट्रोनिक मशीन पर तौला गया. पहला कट्टा एस-1 का वजन 46 किलोग्राम, दूसरे कट्टे एस- 2 का वजन 41 किलोग्राम, तीसरे कट्टे एस-3 का वजन 42 किलोग्राम निकला था.

ऐसे ही सीरियल नंबर डाल कर सभी सड़े हुए गोले, सड़ी हुई चावल किनकी, लकड़ी का बुरादा, यूकेलिप्टस के पत्ते, एसिड, तेल, सड़े हुए बेर, जामुन की गुठलियां आदि का वजन कर के उन के सैंपल ले लिए गए.

छापे के दौरान एक और नकली मसाला बनाने वाली फैक्ट्री का पता चला

अभी यह सब काम निपटने ही वाला था कि एएसआई विनोद अपने साथ अतुल जैन को ले कर वापस आ गए. उन्होंने अतुल जैन द्वारा इस फैक्ट्री से खरीदे गए नकली मसालों का हवाला दे कर एक लिखित कंप्लेट लिख ली थी.

अतुल जैन ने आते ही एक धमाका किया. वह एसआई हरविंदर से बोला, ”सर, यहीं पास में ही काली घटा रोड पर एक दूसरी मैनुफैक्चरिंग यूनिट है, वहां भी इसी प्रकार नकली मसाला बनाया जाता है. यही सब जहरीली और नुकसान पहुंचाने वाली सड़ीगली चीजें मिला कर वहां भी नामी कंपनियों के पैकेट तैयार किए जाते हैं.’’

एसआई हरविंदर चौंके, ”ऐसा है तो वहां भी छापा डालते हैं, तुम हमें वहां ले चलो.’’

”आइए सर,’’ अतुल जैन ने कहा.

एसआई हरविंदर ने हैडकांस्टेबल विपिन कुमार और अनुज को वहां छोड़ा और अपनी टीम तथा फूड ऐंड सेफ्टी तथा एफएसओ मंसूर अली को साथ ले कर अतुल जैन के इशारे पर काली घटा रोड पर उस मैनुफैक्चरिंग यूनिट में पहुंच गए, जहां नकली मसालों को तैयार किया जा रहा था.

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           आरोपी सरफराज

यहां पर उन्हें सरफराज (32 वर्ष) निवासी 1385/15, मुस्तफाबाद, दिल्ली मिला. वहां फर्श पर हल्दी की तरह दिखने वाला पीला चाट मसाला पाउडर का मिक्सर पड़ा था. सरफराज से इस पाउडर के बारे में पूछा गया तो वह कोई जवाब नहीं दे पाया, न लाइसैंस संबंधित कागजात दिखा पाया. उसे क्राइम ब्रांच टीम ने गिरफ्त में ले लिया.

इस मसाला फैक्ट्री में भी सड़ा हुआ सामान जैसा करावल नगर की फैक्ट्री से बरामद किया गया, यहां भी भारी मात्रा में भरा हुआ था. उन के सैंपल लिए गए. जरूरी सैंपल निकाल कर दोनों फैक्ट्रियों को लौक लगा कर उन्हें सील लगा दी गई.

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क्राइम ब्रांच की टीम दिलीप सिंह उर्फ बंटी, सरफराज तथा खुर्शीद को साथ ले कर वापस औफिस में आ गई. लेडी एसआई निशा रानी (क्राइम ब्रांच) द्वारा मसाला फैक्ट्रियों में नकली और जहरीले मसाला बनाए जाने का मामला भादंवि की धारा 272/273/420/34 के तहत करवाया गया.

दिलीप उर्फ बंटी और सरफराज फैक्ट्री के मालिक थे, जबकि खुर्शीद इन से माल खरीद कर अपने टैंपो द्वारा दिल्ली तथा एनसीआर के बाजारों में सप्लाई करता था और मोटा मुनाफा कमाता था.  इन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया. मामले की जांच एएसआई कंवरपाल को सौंप दी गई.

कानून को तमाशा बनाने के चक्कर में

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सुभाष रोड स्थित प्रदेश पुलिस मुख्यालय में उस दिन भी रोज की ही तरह पुलिस महानिदेशक बी.एस.  सिद्धू समेत अन्य अधिकारी अपनेअपने औफिसों में बैठे कार्य में लगे थे. पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा भी अपने औफिस में जरूरी फाइलें निपटा रही थीं, तभी ड्यूटी पर तैनात उन के पीए ने इंटरकौम से सूचना दी, ‘‘मैडम, एक लड़की आप से मिलना चाहती है.’’

‘‘ठीक है, उसे अंदर भेज दो.’’ ममता वोहरा ने कहा.

उन के कहने के पल भर बाद एक लड़की दरवाजे पर टंगा परदा हटा कर अंदर आ गई. लड़की को देखते ही वह पहचान गईं. उस का नाम गुडि़या था और वह एक बहुचर्चित दुराचार मामले की वादी थी. उन्हें लगा, लड़की अपने केस की प्रगति के बारे में जानने आई है, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘कहिए सब ठीक तो है? हमारी पुलिस उसे गिरफ्तार करने की कोशिश में लगी है. वह जल्दी ही पकड़ा जाएगा.’’

‘‘वह तो ठीक है मैडम, लेकिन…’’ लड़की ने इतना ही कहा था कि ममता वोहरा ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या…’’

‘‘मैडम, मैं अपना बयान दोबारा देना चाहती हूं.’’ गुडि़या ने कहा.

सवालिया नजरों से उसे घूरते हुए पूछा, ‘‘मतलब?’’

‘‘मैडम, रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद मैं ने जो बयान दिया था, अब उस में मैं कुछ बदलाव करना चाहती हूं.’’

‘‘क्यों?’’ एसपी वोहरा ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैडम, उस समय मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. उलझन में पता नहीं मैं ने क्या कुछ कह दिया था. गफलत में जो कह गई, अब उस में सुधार करना चाहती हूं.’’

इतना कह कर गुडि़या ने एक कागज उन की ओर बढ़ा दिया. ममता वोहरा ने उसे ले कर गौर से पढ़ा. उस में उस ने अपना बयान बदलने के बारे में लिखा था. उसे पढ़ कर उन्हें हैरानी हुई कि आखिर यह ऐसा क्यों करना चाहती है. उस का मामला काफी गंभीर ही नहीं था, बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय भी बना हुआ था.

इसलिए विचारों से निकल कर उन्होंने गुडि़या से कहा, ‘‘देखो, मुझे इस मामले में अपने अधिकारियों से बात करनी पड़ेगी. तुम अपना यह प्रार्थना पत्र मेरे पास छोड़ जाओ.’’

गुडि़या ने अपना वह प्रार्थना पत्र उन्हीं के पास छोड़ दिया और बाहर आ गई. यह 5 मई, 2014 की बात थी.

पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा के लिए यह हैरानी की बात थी कि लगातार न्याय की मांग करती आ रही लड़की अचानक अपनी बात से पलटना क्यों चाहती है. पीडि़त होने के नाते उस के साथ उन की शुरू से ही सहानुभूति रही थी.

पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा ने गुडि़या द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र से अधिकारियों को अवगत करा दिया. इस मुद्दे पर डीजीपी बी.एस. सिद्धू ने अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) आर.एस. मीना और एसएसपी अजय रौतेला के साथ रायमशविरा किया.

अधिकारी गुडि़या के इस कदम से न केवल हैरान थे, बल्कि असमंजस की स्थिति में भी थे. मामला हाईप्रोफाइल था. इसलिए अधिकारियों को जब पता चला कि गुडि़या ने 2 दिन पहले अदालत में भी अपना बयान दोबारा कराने के लिए शपथ पत्र दिया है तो उन्हें चिंता हुई. यह बात अलग थी कि उस के उस शपथ पत्र पर अभी सुनवाई नहीं हुई थी.

गुडि़या के इस कदम से पुलिस को अनेक आशंकाएं हुईं. इस की वजह यह थी कि अभी अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. जबकि पुलिस की कई टीमें उस का गैरजमानती वारंट लिए अंतरराज्यीय स्तर पर उस की तलाश कर रही थीं.

अभियुक्त रसूख, राजनीतिक पहुंच और दौलत वाला था. लड़की को बयान बदलने के लिए डराया धमकाया भी जा सकता था. कहीं इसी वजह से तो गुडि़या बयान बदलने के लिए मजबूर नहीं है? अगर सचमुच में ऐसा था तो यह कानून के लिए एक बड़ी चुनौती थी. अभियुक्त के गिरफ्तार न होने से पुलिस वैसे ही सवालों के घेरे में थी.

दरअसल 18 अप्रैल, 2014 को गुडि़या ने देहरादून के थाना राजपुर में एक मुकदमा दर्ज कराया था. जिस से पूरे उत्तराखंड राज्य में सनसनी फैल गई थी. यह मुकदमा प्रदीप सांगवान के खिलाफ दर्ज कराया गया था.

सनसनी की वजह यह थी कि मूलरूप से सोनीपत का रहने वाला प्रदीप सांगवान कोई मामूली आदमी नहीं था. उस के पिता किशनचंद सांगवान भारतीय जनता पार्टी से सांसद रह चुके थे. वह खुद भी एक राष्ट्रीय पार्टी से जुड़ा हुआ था.

उस ने देहरादून और पहाड़ों की रानी मसूरी में अपना घर बना रखा था. इस के अलावा देहरादून के सहस्रधारा स्थित पिकनिक स्थल के रूप में विकसित किए गए जौयलैंड वाटर पार्क का मालिक भी था. देहरादून में उस के रहने की यही वजहें थीं.

गुडि़या ने आरोप लगाया था कि प्रदीप सांगवान ने उस के साथ न सिर्फ दुष्कर्म किया था, बल्कि उस दौरान उस की एक वीडियो क्लिप भी बना ली थी. जिस के बल पर वह उस का यौन शोषण कर रहा था. उस वीडियो क्लिप को सार्वजनिक करने और सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर डालने की धमकियां दे कर वह उस का मनचाहा इस्तेमाल कर रहा था. उसे जो धमकियां दी जा रही थीं, उस के सुबूत में उस ने अपने मोबाइल फोन में पुलिस को कुछ मैसेज भी दिखाए थे.

मामला बेहद गंभीर था. ऐसे मामलों में कानून हर तरह से पीडि़ता के साथ होता है. उस की बात को गंभीरता से सुना ही नहीं जाता, बल्कि तुरंत काररवाई भी की जाती है. राजपुर के थानाप्रभारी  प्रदीप राणा ने तुरंत इस बात की उच्चाधिकारियों को जानकारी दी थी, जहां से उन्हें उचित काररवाई के निर्देश मिले थे.

गुडि़या की शिकायत व बयानों के आधार पर थानाप्रभारी ने मुकदमा अपराध संख्या 33/14 पर नामजद मुकदमा दर्ज करा दिया था और मामले की जांच इंसपेक्टर अंशू चौधरी को सौंपी गई थी. चूंकि मामला रसूखदार आदमी से जुड़ा था, इसलिए यह मीडिया वालों के लिए सुर्खियां बन गया था.

मुकदमा दर्ज होते ही एसएसपी अजय रौतेला ने पुलिस अधीक्षक (नगर) नवनीत भुल्लर, होमीसाइड सेल के प्रभारी प्रदीप टमटा और स्पेशल टास्क फोर्स की टीम को भी प्रदीप सांगवान की गिरफ्तारी के लिए लगा दिया था. पुलिस उस की तलाश में निकली तो वह गायब मिला.

प्रदीप सांगवान से मिलने से ले कर दुराचार तक की जो कहानी गुडि़या ने पुलिस को बताई थी, वह कम चौंकाने वाली नहीं थी. वह पूरी कहानी कुछ इस प्रकार थी, जिस में वह एक खूबसूरत जाल में उलझ कर रह गई थी.

गुडि़या उत्तरप्रदेश के जिला बिजनौर की रहने वाली थी. नौकरी व सुनहरे भविष्य की तलाश में वह साल 2012 में देहरादून आ गई थी. देहरादून में वह अपनी एक सहेली के पास रुकी थी. यहां कोई नौकरी कर के वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. उस ने नौकरी की तलाश भी शुरू कर दी. कुछ जगह उसे अवसर मिले भी, परंतु काम पसंद नहीं आया.

तब उस की उस सहेली ने कहा, ‘‘तू किसी प्लेसमेंट एजेंसी का सहारा क्यों नहीं लेती?’’

‘‘मैं खुद ही कोई बढि़या नौकरी तलाश लूंगी. अखबार रोज देख ही रही हूं, कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘अरे हां, कल मैं ने देखा था, जौयलैंड वाटर पार्क में कैशियर की जगह खाली है. वहां ज्यादा काम भी नहीं है. कोशिश करो, शायद तुम्हें वहां नौकरी मिल ही जाए.’’

अगले ही दिन गुडि़या अपना बायोडाटा ले कर जौयलैंड पार्क जा पहुंची. थोड़े इंतजार के बाद वाटर पार्क के मालिक प्रदीप सांगवान से उस की मुलाकात भी हो गई. पहली नजर में प्रदीप सांगवान गुडि़या को अच्छा आदमी लगा. गुडि़या को इस से भी ज्यादा खुशी तब हुई, जब औपचारिक बातचीत के बाद उस ने उसे नौकरी पर रख लिया.

अगले दिन यानी 24 जून, 2012 से गुडि़या अपनी नौकरी पर जाने लगी. उसे कैशियर के पद पर रखा गया था, इसलिए वाटर पार्क में आनेजाने वाले पैसों का हिसाब उसे ही रखना था. बैंक के लेनदेन का हिसाब भी उसे ही देखना था, इस के अलावा पार्क से होने वाली प्रतिदिन कमाई की एंट्री भी उसे ही करनी थी.

गुडि़या मेहनत कर के जमाने की रफ्तार के साथ आगे बढ़ना चाहती थी. सोच की इसी इमारत पर नौकरी के रूप में उस ने पहली सीढ़ी पर कदम रखा. वह सुंदर भी थी और मेहनती भी. उत्तराखंड की आबोहवा उसे शुरू से ही पसंद थी. कुछ ही दिनों में अपने काम से उस ने सभी का दिल जीत लिया.

जल्दी ही वह वाटर पार्क में काम करने वाले अन्य लोगों से भी घुलमिल गई थी. उस का सोचना था कि वहां नौकरी करते हुए उस के सपने पूरे होंगे. अपवाद को छोड़ दिया जाए तो जिंदगी के सफर के रास्ते हर इंसान अपनी ओर से अच्छा ही चुनता है.

रास्ते सीधे भी होते हैं तो कई मोड़ से भी हो कर गुजरते हैं. मोड़ वाले रास्ते में कब, कौन, किस तरह की कड़वी हकीकत से रूबरू हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. कभीकभी अचानक ऐसे भी मोड़ आ जाते हैं, जब इंसान को अपना अक्स भी धुंधला नजर आने लगता है. गुडि़या के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

नौकरी के उस के 2 सप्ताह बड़ी अच्छी तरह बीते. वह बहुत खुश थी. वक्त पंख लगा कर उड़ रहा था. तीसरा सप्ताह चल रहा था. एक दिन प्रदीप ने कहा, ‘‘गुडि़या आज तुम्हें मेरे साथ मसूरी चलना है.’’

‘‘क्यों सर?’’

‘‘वहां एक प्रिंसिपल हैं. मैं तुम्हें उन से मिलवाना चाहता हूं, क्योंकि उन्हें मार्केटिंग का बहुत अच्छा नौलेज है. मैं चाहता हूं कि तुम उन से कुछ सीख लो, जिस का तुम्हें भी लाभ होगा और हमें भी.’’

‘‘ओके सर.’’ गुडि़या ने हामी भर दी. वह प्रदीप के यहां नौकरी करती थी. मन में कोई आशंका थी नहीं, जिस की वजह से वह उस के साथ जाने से मना कर देती. वह जाने के लिए तैयार हो गई. उसे क्या पता था कि उसे बहाने से एक ऐसे खूबसूरत जाल में उलझाया जा रहा है, जिस में फंस कर वह छटपटा कर रह जाएगी.

शाम तक वह प्रदीप के साथ पहाड़ों की रानी मसूरी पहुंच गई. देहरादून से वहां पहुंचने में एक घंटे से भी कम समय लगा. वहां पहुंच कर प्रदीप ने कहा, ‘‘हम तो आ गए, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या सर?’’ गुडि़या ने पूछा.

‘‘प्रिंसिपिल यहां हैं ही नहीं.’’

‘‘कब आएंगी?’’

‘‘कह नहीं सकता. क्योंकि उन का मोबाइल बंद है.’’

मसूरी में भी प्रदीप का घर था. उस ने कह उस रात गुडि़या को वहीं रुकने के लिए तैयार कर लिया. फिर वह रात गुडि़या के लिए कयामत की रात साबित हुई. गुडि़या के अनुसार प्रदीप ने शराफत का नकाब उतार कर उस रात कई बार उस के साथ जबरदस्ती की. उस ने उस दौरान की वीडियो क्लिप भी बना ली.

सुबह उस ने गुडि़या से साफसाफ कह दिया कि अगर उस ने इस बारे में किसी से कुछ कहा या आगे उस की बात नहीं मानी तो उस की इस क्लिप को फेसबुक पर अपलोड कर दिया जाएगा, जिसे सारी दुनिया देखेगी.

सब कुछ गंवा कर गुडि़या अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहा कर रह गई. इस के बाद से उस के यौन शोषण का सिलसिला चल निकला. यह सब होते धीरेधीरे एक साल से ज्यादा हो गया. वह आंसू बहा कर रह जाती थी.  वहां जब भी विरोध करती, उसे धमका दिया जाता. गुडि़या को अपनी जिंदगी दोजख सी लगने लगी. जब वह कुछ ज्यादा ही परेशान हो गई तो इंसाफ के लिए पुलिस की दहलीज पर जा पहुंची और प्रदीप के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

मामला प्रकाश में आते ही चर्चा का विषय बन गया. इस की राजनीति के गलियारों में भी चर्चा हो रही थी. पुलिस ने गुडि़या का मैडिकल कराया. 22 अप्रैल को सिविल जज (तृतीय) के यहां धारा 164 के तहत उस का बयान दर्ज कराया. अगले दिन पुलिस ने गुडि़या का कलमबंद बयान दर्ज किया, जिस में उस ने अपने साथ हुई पूरी घटना को दोहरा दिया.

जांच अधिकारी इंसपेक्टर अंशू चौधरी ने सुबूत जुटाने के लिए घटनास्थल मसूरी के रिहाइशी इलाके और वाटर पार्क का निरीक्षण कर के नक्शा तैयार किया. पुलिस सुबूत जुटाने में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए वाटर पार्क के कर्मचारियों समेत करीब 16 लोगों के बयान दर्ज किए.

मामला पहुंच वाले आदमी से जुड़ा था, पुलिस तथ्यों के आधार पर ही आगे की काररवाई करना चाहती थी. प्रदीप की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीमें गठित कर दी गई थीं, जो लगातार उसे तलाश रही थीं. कई दिन बीत गए, वह हाथ नहीं आया.

3 मई को पुलिस ने उस के देहरादून स्थित आवास पर छापा मारा. वह तो फरार था, इसलिए कहां से मिलता. पुलिस ने वहां की जांचपड़ताल के दौरान मोबाइल, लैपटौप और अन्य समान बरामद किया. इस के बाद पुलिस ने अदालत से उस का गैरजमानती वारंट हासिल कर लिया. अदालत ने प्रदीप को भगोड़ा भी घोषित कर दिया.

प्रदीप के जहांजहां मिलने की संभावना थी, वहांवहां पुलिस टीमें छापा मार रही थीं. चंडीगढ़, दिल्ली, मेरठ में संभावित ठिकानों पर उस की तलाश की गई. मामले ने काफी तूल पकड़ा तो इस की जांच पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा को सौंप दी गई. वह बिना किसी दबाव के पीडि़ता को इंसाफ दिलाना चाहती थीं. इस के लिए तमाम सामाजिक संगठन आवाज भी उठा रहे थे.

पुलिस प्रदीप सांगवान को पकड़ने के लिए जीजान से जुटी थी, तभी गुडि़या ने अचानक बयान बदलने का शपथ पत्र दिया तो पुलिस अधिकारी अजीब उलझन में पड़ गए. इस से पुलिस को आशंका हुई कि कहीं उस की जान खतरे में तो नहीं है. किसी दबाव में तो वह ऐसा नहीं कर रही है.

पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू ने अधीनस्थों को निर्देश दिए कि पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि पीडि़ता की जान खतरे में तो नहीं है. इस के बाद यह पता लगाया जाए कि वह ऐसा कर क्यों रही है?

उसे प्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा देने से उस की पहचान उजागर हो सकती थी, इसलिए उसे प्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा न दे कर उस पर खुफिया नजर रखने के लिए एक टीम लगा दी गई. इसी के साथ उस का नंबर सर्विलांस पर लगा दिया गया कि अगर कोई उसे डराधमका रहा होगा तो यह बात भी सामने आ जाएगी.

इतना सब कर के प्रदीप की गिरफ्तारी के प्रयासों की समीक्षा कर के कोशिश और तेज कर दी गई. अधिकारियों के निर्देशानुसार पुलिस टीमें तेजी से काम में जुट गईं. इस में स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव टीम के सदस्यों को भी शामिल किया गया था. पुलिस ने अदालत से प्रदीप का कुर्की वारंट भी हासिल कर लिया था.

12 मई को गुडि़या द्वारा अदालत में बयान बदलने संबंधी शपथ पत्र पर सुनवाई हुई. अदालत ने उस की अपील को नामंजूर करते हुए कहा, ‘‘न ऐसा कोई कानूनी प्रावधान है और न ही यह विधि सम्मत है.’’

गुडि़या की बात अदालत ने नहीं मानी थी. यह उस के लिए एक बड़ा झटका था.

अगले दिन यानी 13 मई को इस मामले में अचानक चौंकाने वाला मोड़ आ गया. पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू ने आननफानन इस मामले को ले कर प्रेसवार्ता बुलाई तो सभी ने सोचा कि अभियुक्त गिरफ्तार हो गया होगा. लेकिन जो हुआ, उस की किसी ने कल्पना नहीं की थी.

दरअसल पुलिस ने गुडि़या को ही गिरफ्तार कर लिया था. उस पर पुलिस को गुमराह करने और अभियुक्त को ब्लैकमेल कर के समझौता करने का आरोप था. यह आरोप फोरैंसिक सुबूतों के साथ था, जिस में यह आरोप किसी और ने नहीं, पुलिस ने ही लगाया था.

गोपनीय रूप से गुडि़या की निगरानी कर रही पुलिस को जांच में पता चला था कि उस ने दुराचार के मामले में समझौते के लिए एक बड़ा सौदा कर लिया था.

उसी सौदे के बाद अभियुक्त प्रदीप को बचाने के लिए वह अपना बयान बदलना चाहती थी. इज्जत का यह सौदा मामूली रकम में नहीं, आधा करोड़ रुपयों से भी ज्यादा में हुआ था. रकम से गुडि़या ने मकान और सुखसुविधा के आधुनिक साधन जुटा भी लिए थे. पुलिस ने उस के पास से लाख रुपए नकद बरामद भी किए थे.

पुलिस ने गुडि़या के साथ उस के एक दोस्त सईद को भी गिरफ्तार किया था. इस सौदेबाजी में दिल्ली निवासी अजय मान ने अपने जीजा प्रदीप सांगवान को बचाने में सईद की मार्फत गुडि़या से बात की थी.

समझौता चूंकि दोनों पक्षों की रजामंदी से हुआ था, इसलिए कोई भी एकदूसरे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सकता था. इसलिए गुडि़या, उस के साथी और अजय के खिलाफ थाना कोतवाली में सबइंस्पेक्टर नीलम रावत की ओर से ब्लैकमेलिंग का मुकदमा दर्ज किया गया था.

प्रदीप सांगवान पर दर्ज मुकदमों की धाराओं में सुबूतों को प्रभावित करने की धारा 201 बढ़ा दी गई थी. गुडि़या की गिरफ्तारी के पीछे चौंकाने वाली जो कहानी थी, वह इस प्रकार थी.

पुलिस ने गुडि़या पर नजर रखनी शुरू की तो उस की काल डिटेल्स में 2 संदिग्ध नंबर नजर आए. दोनों नंबरों की जांच की गई तो पता चला कि उन में से एक नंबर दिल्ली के रहने वाले अजय का था तो दूसरा सईद चौधरी का.

पुलिस को लगा कि वही दोनों गुडि़या को धमका रहे हैं. इसी शक के आधार पर गुडि़या के मोबाइल की रिकौर्डिंग शुरू की गई तो मामला कुछ दूसरा ही सामने आया. अजय प्रदीप सांगवान का साला था तो सईद गुडि़या का दोस्त. सईद उत्तराखंड के ही जिला ऊधमसिंहनगर के काशीपुर के रहने वाले इफ्तिखार हुसैन का बेटा था.

गुडि़या की उस से रोज ही बातें होती थीं. मोबाइल की काल रिकौर्डिंग से पता चला कि वे उसे धमकी नहीं देते थे, बल्कि समझौते की बात करते थे. गुडि़या की समझौते की बात हो चुकी थी.

एक दिन सईद ने फोन कर के पूछा, ‘‘क्या हाल है गुडि़या?’’

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘उस ने पैसे दिए कि नहीं?’’

‘‘अभी उस ने पैसे कहां दिए हैं?’’ गुडि़या ने कहा तो सईद बोला, ‘‘फिर भी तुम ने कोर्ट में अर्जी लगा दी.’’

‘‘हां, अर्जी तो लगा दी है, लेकिन मैं ने यह नहीं कहा है कि मैं बयान वापस ले रही हूं. मैं ने अर्जी में लिखा है कि पहले दिए गए बयान में कुछ तथ्य छूट गए हैं, जिस की वजह से मैं दोबारा बयान देना चाहती हूं. उस हिसाब से मैं कुछ भी कह सकती हूं.’’

‘‘ऐसा तो नहीं कि बयान बदल देने के बाद वह बाकी पैसे देने में दिक्कत करे?’’

‘‘कुछ कहा नहीं जा सकता. कर भी सकते हैं. इसीलिए मैं ने ऐसा लिखा है.’’

‘‘खैर, तुम दोनों तरफ से सेफ हो. मैं ने तुम्हारी हर तरह से मदद की है. पैसे के लिए क्या कह रहा था?’’

‘‘कह रहा था 5 लाख अभी ले लो, बाकी इलेक्शन के बाद दे दूंगा. मेरे नाम मकान की रजिस्ट्री तो करा दी है, कुछ पैसे भी दिए हैं, जिस से मैं ने घर का सामान खरीद लिया है.’’

‘‘वह डबल गेम तो नहीं खेल रहा?’’

‘‘मैं अजय से बात कर लूंगी. अगर वह पैसे दे देगा, तभी मैं अपना केस वापस लूंगी.’’

‘‘अभी तुम अजय से कोई बात मत करो. जब मैं कहूंगा, तभी करना. देख लेना और जैसा भी हो बता देना.’’

‘‘टेंशन मत लो, अभी गेंद मेरे ही पाले में है. ओके बाय.’’ अपनी बात पूरे आत्मविश्वास के साथ कह कर गुडि़या ने फोन काट दिया.

ये बातें सुन कर पुलिस सन्न रह गई थी. समझते देर नहीं लगी कि दुराचार के इस मामले में पुलिस और कानून को तमाशा बनाया जा रहा है.

पुलिस ने गुडि़या के खिलाफ सुबूत जुटाने शुरू कर दिए. उस ने अपने नाम मकान की रजिस्ट्री की बात की थी. इस के लिए दस्तावेजों की जांच जरूरी थी. पुलिस ने रजिस्ट्री औफिस से एक महीने के अंदर मकानों की खरीदफरोख्त करने वाले लोगों की सूची हासिल कर ली.

लेकिन इस सूची की जांच की गई तो उस में गुडि़या का नाम नहीं था. यह हैरान करने वाली बात थी. जबकि फोन टेपिंग में उस ने स्पष्ट कहा था कि उस के नाम एक मकान की रजिस्ट्री हुई थी.

पुलिस ने रजिस्ट्री औफिस जा कर जब हो चुकी रजिस्ट्री की एंट्री करने वाला रजिस्टर चेक किया तो सच्चाई का पता चल गया. क्योंकि उस रजिस्टर पर खरीदारों के फोटो चस्पा होते हैं. यह एक चौंकाने वाली जानकारी हाथ लगी. खरीदारों की सूची में फोटो तो गुडि़या का लगा था, लेकिन उस में नाम दूसरा था. शायद ऐसा उस ने चालाकी से किया था. उस ने नाम तो बदल दिया था, परंतु चेहरा कैसे बदलती.

वह मकान मोहल्ला बंजारावाला में मीनाक्षी बिष्ट से 2 मई, 2014 को 17 लाख रुपए में खरीदा गया था. पुलिस के अनुसार उस मकान की वास्तविक कीमत 35 लाख रुपए थी. शायद स्टांप ड्यूटी बचाने के लिए उस का बैनामा 17 लाख रुपए में कराया गया था.

अब तक प्राप्त सुबूतों में अभियुक्त को ब्लैकमेल करने की पुष्टि हो गई थी. सुबूत पक्के थे, इसलिए पुलिस ने गुडि़या की गिरफ्तारी की योजना बना कर अदालत से वारंट हासिल किया और छापा मार कर उसे गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में पता चला कि ब्लैकमेलिंग से मिली रकम से उस ने अपने लिए आधुनिक सुखसुविधाओं के तमाम साधन जुटा रखे थे.

ब्लैकमेलिंग में गुडि़या के दोस्त सईद ने मदद की थी, इसलिए उसे भी शिकंजे में लेना जरूरी था. गुडि़या और उस की बातचीत से पुलिस को पता चल चुका था कि अजय मान ने उसे नौकरी का औफर दिया था और साक्षात्कार के लिए देहरादून आने को कहा था. पुलिस ने इस का फायदा उठाते हुए एक कंपनी का नाम ले कर उसे नौकरी का औफर दिया और साक्षात्कार के लिए देहरादून बुलाया. नौकरी की खुशी में वह देहरादून आ गया. पुलिस पहले से उस की फिराक में ही थी. देहरादून आने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस ने गुडि़या और सईद को आमनेसामने बैठा कर विस्तारपूर्वक पूछताछ की. विश्वास करना मुश्किल था कि एक लड़की ने दुराचार को हथियार बना कर किस तरह अपनी किस्मत को बदलने की कोशिश की तो दुराचार के अभियुक्त ने खुद को बचाने की. उस ने पैसे ऐंठने की योजना मुकदमा दर्ज होने के बाद तब बनाई थी, जब उस के पास समझौते के लिए प्रस्ताव आए. लाखों की रकम और मकान का प्रस्ताव उसे पसंद आ गया था.

इस के बाद गुडि़या ने अपने दोस्त सईद से बात की तो उस ने उसे समझौता कर लेने की सलाह दी. उस समय वह यह भूल गई कि दुराचार का सख्त कानून महिलाओं और लड़कियों के हक में उन्हें न्याय दिलाने के लिए बनाया गया है ना कि नाजायज इस्तेमाल कर के कमाई करने के लिए.

गुडि़या को एक ही झटके में लाखों रुपए मिलते नजर आ रहे थे. समझौते की शर्तों में उस के लिए बहुत जल्दी मोहल्ला बंजारावाला में मीनाक्षी बिष्ट का मकान तलाश लिया गया.

किसी को शक न हो, इस के लिए गुडि़या ने बैनामे के समय अपना वह नाम लिखवाया, जो शैक्षिक प्रमाण पत्रों में था. जबकि रिपोर्ट उस ने घरेलू नाम से लिखवाई थी. इसीलिए रजिस्ट्री औफिस की सूची में उस का नाम न देख कर पुलिस उलझ गई थी.

मकान मिल गया और कुछ नकद भी तो गुडि़या केस वापस लेने को तैयार हो गई. इसी प्रक्रिया के तहत उस ने जांच अधिकारी पुलिस अधीक्षक ममता वोहरा और अदालत में फिर से बयान कराने का प्रार्थना पत्र भी दे दिया. पुलिस ने उस के पत्र पर जांच शुरू कर दी और अदालत ने भी उस की बात नहीं मानी. इस तरह कानून को तमाशा बनाने के चक्कर में वह अपने ही बुने जाल में फंस गई.

पुलिस ने गुडि़या और सईद से काफी लंबी पूछताछ की थी. इस पूछताछ में पुलिस ने पुख्ता सुबूत जुटा लिए. अगले दिन दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. जेल भेजे जाने से पूर्व प्रयोगशाला के विशेषज्ञों ने जांच के लिए दोनों की आवाजों के सैंपल ले लिए थे, ताकि पुष्टि हो सके कि मोबाइल पर हुई बातचीत उन्हीं दोनों की थी.

इस के बाद पुलिस ने प्रदीप सांगवान के साथ उस के साले अजय की तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने प्रदीप का पासपोर्ट जब्त कर के लुक औफ सर्कुलर जारी करा दिया है, ताकि वह विदेश न भाग सके. अजय का गैरजमानती वारंट हासिल कर लिया गया है. प्रदीप सांगवान पर पुलिस ने ढाई हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया.

कथा लिखे जाने तक जेल गई गुडि़या और उस के साथी सईद की जमानत नहीं हो सकी थी. प्रदीप और अजय को गिरफ्तार नहीं किया जा सका था. गुडि़या ने प्रदीप पर जो आरोप लगाए थे, अब वे कितना सच साबित होंगे यह तो वक्त ही बताएगा.

लेकिन उस ने खुद की गलती से दुराचार को हथियार बना कर जिस तरह खुद को कानून के फंदे में उलझा लिया है, अब उस से निकलना मुश्किल है. ऐसे में लोग कभी खुद पर तो कभी हालात पर खीझते हैं. यह भी सच है कि कानून सुरक्षा और न्याय के लिए बने हैं, न कि मनचाहे इस्तेमाल के लिए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. गुडि़या परिवर्तित नाम है.

अंजाम-ए-साजिश : एक निर्दोष लड़की की हत्या

 रेलवे लाइनों के किनारे पड़ी बोरी को लोग आश्चर्य से देख रहे थे. बोरी को देख कर सभी अंदाजा लगा रहे थे कि बोरी में शायद किसी की लाश होगी. मामला संदिग्ध था, इसलिए वहां मौजूद किसी शख्स ने फोन से यह सूचना दिल्ली पुलिस के कंट्रोलरूम को दे दी.

कुछ ही देर में पुलिस कंट्रोलरूम की गाड़ी मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने जब बोरी खोली तो उस में एक युवती की लाश निकली. लड़की की लाश देख कर लोग तरहतरह की चर्चाएं करने लगे.

जिस जगह लाश वाली बोरी पड़ी मिली, वह इलाका दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना सरिता विहार क्षेत्र में आता है. लिहाजा पुलिस कंट्रोलरूम से यह जानकारी सरिता विहार थाने को दे दी गई. सूचना मिलते ही एसएचओ अजब सिंह, इंसपेक्टर सुमन कुमार के साथ मौके पर पहुंच गए.

एसएचओ अजब सिंह ने लाश बोरी से बाहर निकलवाने से पहले क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को मौके पर बुला लिया और आला अधिकारियों को भी इस की जानकारी दे दी. कुछ ही देर में डीसीपी चिन्मय बिस्वाल और एसीपी ढाल सिंह भी वहां पहुंच गए. फोरैंसिक टीम का काम निपट जाने के बाद डीसीपी और एसीपी ने भी लाश का मुआयना किया.

मृतका की उम्र करीब 24-25 साल थी. वहां मौजूद लोगों में से कोई भी उस की शिनाख्त नहीं कर सका तो यही लगा कि लड़की इस क्षेत्र की नहीं है. पुलिस ने जब उस के कपड़ों की तलाशी ली तो उस के ट्राउजर की जेब से एक नोट मिला.

उस नोट पर लिखा था, ‘मेरे साथ अश्लील हरकत हुई और न्यूड वीडियो भी बनाया गया. यह काम आरुष और उस के 2 दोस्तों ने किया है.’

नोट पर एक मोबाइल नंबर भी लिखा था. पुलिस ने नोट जाब्जे में ले कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पुलिस के सामने पहली समस्या लाश की शिनाख्त की थी. उधर बरामद किए गए नोट पर जो फोन नंबर लिखा था, पुलिस ने उस नंबर पर काल की तो वह उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले आरुष का निकला. नोट पर भी आरुष का नाम लिखा हुआ था.

सरिता विहार एसएचओ अजब सिंह ने आरुष को थाने बुलवा लिया. उन्होंने मृतका का फोटो दिखाते हुए उस से संबंधों के बारे में पूछा तो आरुष ने युवती को पहचानने से इनकार कर दिया. उस ने कहा कि वह उसे जानता तक नहीं है. किसी ने उसे फंसाने के लिए यह साजिश रची है.

आरुष के हावभाव से भी पुलिस को लग रहा था कि वह बेकसूर है. फिर भी अगली जांच तक उन्होंने उसे थाने में बिठाए रखा. उधर डीसीपी ने जिले के समस्त बीट औफिसरों को युवती की लाश के फोटो देते हुए शिनाख्त कराने की कोशिश करने के निर्देश दे दिए. डीसीपी चिन्मय बिस्वाल की यह कोशिश रंग लाई.

पता चला कि मरने वाली युवती दक्षिणपूर्वी जिले के अंबेडकर नगर थानाक्षेत्र के दक्षिणपुरी की रहने वाली सुरभि (परिवर्तित नाम) थी. उस के पिता सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करते हैं. पुलिस ने सुरभि के घर वालों से बात की. उन्होंने बताया कि नौकरी के लिए किसी का फोन आया था. उस के बाद वह इंटरव्यू के सिलसिले में घर से गई थी.

पुलिस ने सुरभि के घर वालों से उस की हैंडराइटिंग के सैंपल लिए और उस हैंडराइटिंग का मिलान नोट पर लिखी राइटिंग से किया तो दोनों समान पाई गईं. यानी दोनों राइटिंग सुरभि की ही पाई गईं.

पुलिस ने आरुष को थाने में बैठा रखा था. सुरभि के घर वालों से आरुष का सामना कराते हुए उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने आरुष को पहचानने से इनकार कर दिया.

नौकरी के लिए फोन किस ने किया था, यह जानने के लिए एसएचओ अजब सिंह ने मृतका के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस से सुरभि के फोन पर कई बार काल की गई थीं और उस से बात भी हुई थी. जांच में वह फोन नंबर संगम विहार के रहने वाले दिनेश नाम के शख्स का निकला. पुलिस काल डिटेल्स के सहारे दिनेश तक पहुंच गई.

थाने में दिनेश से सुरभि की हत्या के संबंध में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कबूल कर लिया कि अपने दोस्तों के साथ मिल कर उस ने पहले सुरभि के साथ सामूहिक बलात्कार किया. इस के बाद उन लोगों ने उस की हत्या कर लाश ठिकाने लगा दी.

उस ने बताया कि वह सुरभि को नहीं जानता था. फिर भी उस ने उस की हत्या एक ऐसी साजिश के तहत की थी, जिस का खामियाजा जेल में बंद एक बदमाश को उठाना पड़े. उस ने सुरभि की हत्या की जो कहानी बताई, वह किसी फिल्मी कहानी की तरह थी—

दिल्ली के भलस्वा क्षेत्र में हुए एक मर्डर के आरोप में धनंजय को जेल जाना पड़ा. जेल में बंटी नाम के एक कैदी से धनंजय का झगड़ा हो गया था. बंटी उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र का रहने वाला था.

बंटी भी एक नामी बदमाश था. दूसरे कैदियों ने दोनों का बीचबचाव करा दिया. दोनों ही बदमाश जिद्दी स्वभाव के थे, लिहाजा किसी न किसी बात को ले कर वे आपस में झगड़ते रहते थे. इस तरह उन के बीच पक्की दुश्मनी हो गई.

उसी दौरान दिनेश झपटमारी के मामले में जेल गया. वहां उस की दोस्ती धीरेंद्र नाम के एक बदमाश से हुई. जेल में ही धीरेंद्र की दुश्मनी बुराड़ी के रहने वाले बंटी से हो गई. धीरेंद्र ने जेल में ही तय कर लिया कि वह बंटी को सबक सिखा कर रहेगा.

करीब 2 महीने पहले दिनेश और धीरेंद्र जमानत पर जेल से बाहर आ गए. जेल से छूटने के बाद दिनेश और धीरेंद्र एक कमरे में साथसाथ संगम विहार इलाके में रहने लगे.

उन्होंने बंटी के परिवार आदि के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी. उन्हें पता चला कि बंटी के पास 200 वर्गगज का एक प्लौट है. उस प्लौट की देखभाल बंटी का भाई आरुष करता है. कोशिश कर के उन्होंने आरुष का फोन नंबर भी हासिल कर लिया.

इस के बाद दिनेश और धीरेंद्र एक गहरी साजिश का तानाबाना बुनने लगे. उन्होंने सोचा कि बंटी के भाई आरुष को किसी गंभीर केस में फंसा कर जेल भिजवा दिया जाए. उस के जेल जाने के बाद उस के 200 वर्गगज के प्लौट पर कब्जा कर लेंगे. यह फूलप्रूफ प्लान बनाने के बाद वह उसे अंजाम देने की रूपरेखा बनाने लगे.

दिनेश और धीरेंद्र ने इस योजना में अपने दोस्त सौरभ भारद्वाज को भी शामिल कर लिया. पहले से तय योजना के अनुसार दिनेश ने अपनी गर्लफ्रैंड के माध्यम से उस की सहेली सुरभि को नौकरी के बहाने बुलवाया. सुरभि अंबेडकर नगर में रहती थी.

गर्लफ्रैंड ने सुरभि को नौकरी के लिए दिनेश के ही मोबाइल से फोन किया. सुरभि को नौकरी की जरूरत थी, इसलिए सहेली के कहने पर वह 25 फरवरी, 2019 को संगम विहार स्थित एक मकान पर पहुंच गई.

उसी मकान में दिनेश और धीरेंद्र रहते थे. नौकरी मिलने की उम्मीद में सुरभि खुश थी, लेकिन उसे क्या पता था कि उस की सहेली ने विश्वासघात करते हुए उसे बलि का बकरा बनाने के लिए बुलाया है.

सुरभि उस फ्लैट पर पहुंची तो वहां दिनेश, धीरेंद्र और सौरभ भारद्वाज मिले. उन्होंने सुरभि को बंधक बना लिया. इस के बाद उन तीनों युवकों ने सुरभि के साथ गैंपरेप किया. नौकरी की लालसा में आई सुरभि उन के आगे गिड़गिड़ाती रही, लेकिन उन दरिंदों को उस पर जरा भी दया नहीं आई.

चूंकि इन बदमाशों का मकसद जेल में बंद बंटी को सबक सिखाना और उस के भाई आरुष को फंसाना था, इसलिए उन्होंने सुरभि के मोबाइल से आरुष के मोबाइल नंबर पर कई बार फोन किया. लेकिन किन्हीं कारणों से आरुष ने उस की काल रिसीव नहीं की थी.

इस के बाद तीनों बदमाशों ने हथियार के बल पर सुरभि से एक नोट पर ऐसा मैसेज लिखवाया जिस से आरुष झूठे केस में फंस जाए. उस नोट पर इन लोगों ने आरुष का फोन नंबर भी लिखवा दिया था.

फिर वह नोट सुरभि के ट्राउजर की जेब में रख दिया. सुरभि उन के अगले इरादों से अनभिज्ञ थी. वह बारबार खुद को छोड़ देने की बात कहते हुए गिड़गिड़ा रही थी. लेकिन उन लोगों ने कुछ और ही इरादा कर रखा था.

तीनों बदमाशों ने सुरभि की गला घोंट कर हत्या कर दी. बेकसूर सुरभि सहेली की बातों पर विश्वास कर के मारी जा चुकी थी. इस के बाद वे उस की लाश ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगे. उन्होंने उस की लाश एक बोरी में भर दी.

इस के बाद इन लोगों ने अपने परिचित रहीमुद्दीन उर्फ रहीम और चंद्रकेश उर्फ बंटी को बुलाया. दोनों को 4 हजार रुपए का लालच दे कर इन लोगों ने वह बोरी कहीं रेलवे लाइनों के किनारे फेंकने को कहा.

पैसों के लालच में दोनों उस लाश को ठिकाने लगाने के लिए तैयार हो गए तो दिनेश ने 7800 रुपए में एक टैक्सी हायर की. रात के अंधेरे में उन्होंने वह लाश उस टैक्सी में रखी और रहीमुद्दीन और चंद्रकेश उसे सरिता विहार थाना क्षेत्र में रेलवे लाइनों के किनारे डाल कर अपने घर लौट गए.

लाश ठिकाने लगाने के बाद साजिशकर्ता इस बात पर खुश थे कि फूलप्रूफ प्लानिंग की वजह से पुलिस उन तक नहीं पहुंच सकेगी, लेकिन दिनेश द्वारा सुरभि को की गई काल ने सभी को पुलिस के चंगुल में पहुंचा दिया. मामले का खुलासा हो जाने के बाद एसएचओ अजब सिंह ने हिरासत में लिए गए आरुष को छोड़ दिया.

दिनेश से की गई पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के अन्य साथियों सौरभ भारद्वाज, चंद्रकेश उर्फ बंटी और रहीमुद्दीन उर्फ रहीम को भी गिरफ्तार कर लिया. पांचवां बदमाश धीरेंद्र पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका, वह फरार हो गया था. गिरफ्तार किए गए बदमाशों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

पुलिस को इस मामले में दिनेश की प्रेमिका को भी हिरासत में ले कर पूछताछ करनी चाहिए थी, क्योंकि सुरभि की हत्या की असली जिम्मेदार तो वही थी. उसी ने ही सुरभि को नौकरी के बहाने दिनेश के किराए के कमरे पर बुलाया था.

बहरहाल, दूसरे को फांसने के लिए जाल बिछाने वाला दिनेश खुद अपने बिछाए जाल में फंस गया. पहले वह झपटमारी के आरोप में जेल गया था, जबकि इस बार वह सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में जेल गया. पुलिस मामले की जांच कर रही है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

डेढ़ करोड़ का विश्वास

घटना 14 जुलाई, 2020 की है. उस रोज राम गोयल सो कर उठे तो घर का अस्तव्यस्त हाल देख कर उन के होश उड़ गए. कमरे में तिजोरी खुली पड़ी थी, जिस में रखी कई किलोग्राम सोनाचांदी व नकदी सब गायब थी. यह देख कर घर में हड़कंप मच गया.

राम गोयल को पता चला कि घर से 3 किलो सोने और चांदी के आभूषण, नकदी और अन्य कीमती सामान गायब है. इस के अलावा परिवार के साथ रह रही बेटी की नौकरानी अनुष्का, जो दिल्ली से आई थी, वह भी गायब थी. अनुष्का राम गोयल की बेटीदामाद की नौकरानी थी. वह उन के बच्चों की देखभाल करती थी.

जून, 2020 महीने में राम गोयल की बेटी एक समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली से राजगढ़ अपने पिता के यहां आई थी. बेटी के बच्चों की देखभाल के लिए अनुष्का भी उस के साथ आ गई थी. इसलिए पिछले एक महीने से वह राम गोयल के घर पर ही रह रही थी.

वह एक नेपाली लड़की थी. नेपाली अपनी बहादुरी और ईमानदारी के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं. राम गोयल की भी अनुष्का के प्रति यही सोच थी. लेकिन कुछ ही समय में अनुष्का अपना असली रंग दिखा कर करोड़ों का माल साफ कर के भाग चुकी थी.

घटना की रात अनुष्का ने अपने हाथ से कढ़ी और खिचड़ी बना कर पूरे परिवार को खिलाई थी. खाने के बाद पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. जाहिर था, खाने में कोई नशीली चीज मिलाई गई थी, जिस के असर से घर में हलचल होने के बावजूद किसी सदस्य की आंख नहीं खुली.

इस बात की खबर मिलते ही थाना पचोर के टीआई डी.पी. लोहिया तुरंत पुलिस टीम के साथ राम गोयल के यहां पहुंचे तथा उन्होंने मौकामुआयना कर सारी घटना की जानकारी एसपी प्रदीप शर्मा को दी. कुछ ही देर में एसपी शर्मा भी मौके पर पहुंच गए.

घटनास्थल की जांच करने के बाद एसपी प्रदीप शर्मा ने आरोपियों को पकड़ने के लिए एडिशनल एसपी नवलसिंह सिसोदिया के निर्देशन में एक टीम गठित कर दी.

टीम में एसडीपीओ पदमसिंह बघेल, टीआई डी.पी. लोहिया, एसआई धर्मेंद्र शर्मा, शैलेंद्र सिंह, साइबर सैल टीम प्रभारी रामकुमार रघुवंशी, एसआई जितेंद्र अजनारे, आरक्षक मोइन खान, दिनेश किरार, शशांक यादव, रवि कुशवाह एवं आरक्षक राजकिशोर गुर्जर, राजवीर बघेल, दुबे अर्जुन राजपूत, अजय राजपूत, सुदामा, कैलाश और पल्लवी सोलंकी को शामिल किया गया.

इधर लौकडाउन के चलते पुलिस का एक काम आसान हो गया था. टीआई लोहिया जानते थे कि लौकडाउन के दिनों में ट्रेन, बस बंद हैं इसलिए लुटेरी नौकरानी अनुष्का ने पचोर से भागने के लिए किसी प्राइवेट वाहन का उपयोग किया होगा.

क्योंकि इतनी बड़ी चोरी एक अकेली लड़की नहीं कर सकती, इसलिए उस के कुछ साथी भी जरूर रहे होंगे. अनुष्का कुछ समय पहले ही दिल्ली से आई थी. टीआई लोहिया ने अनुष्का का मोबाइल नंबर हासिल कर उसे सर्विलांस पर लगा दिया. इस के अलावा उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवाई.

काल डिटेल्स से पता चला कि अनुष्का एक फोन नंबर पर लगातार बातें करती थी और ताज्जुब की बात यह थी कि वारदात वाले दिन उस फोन नंबर की लोकेशन पचोर टावर क्षेत्र में थी. जाहिर था कि वह मोबाइल वाला व्यक्ति अनुष्का का कोई साथी रहा होगा, जो उस के बुलाने पर ही घटना को अंजाम देने राजगढ़ आया होगा.

एसपी प्रदीप शर्मा के निर्देश पर टीआई लोहिया की टीम पचोर क्षेत्र में हर चौराहे, हर पौइंट, हर क्रौसिंग पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने में जुट गई. इसी कवायद में एक संदिग्ध कार पुलिस की नजर में आई, जिस का रजिस्ट्रेशन नंबर यूपी-14एफ-टी2355 था.

टीआई लोहिया समझ गए कि चोर शायद इसी गाड़ी में सवार हो कर पचोर आए और घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. इसलिए पुलिस की एक टीम ने पचोर से व्यावह हो कर गुना और ग्वालियर तक के रास्ते में पड़ने वाले टोल नाकों के कैमरे चैक कर उस गाड़ी के आनेजाने का रूट पता कर लिया.

जांच में पता चला कि उक्त नंबर की कार दिल्ली के उत्तम नगर के रहने वाले मनोज कालरा के नाम से रजिस्टर्ड थी, इसलिए तुरंत एक टीम दिल्ली भेजी गई. टीम ने मनोज कालरा को तलाश कर उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह किराए पर गाडि़यां देने का काम करता है. उक्त नंबर की कार उस ने एक नौकर पवन उर्फ पद्म नेपाली के माध्यम से 12 जुलाई को इंदौर के लिए बुक की थी.

जबकि इस कार के ड्राइवर से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि 13 जुलाई, 2020 को 3 युवक उसे शादी में जाने की बात बोल कर पचोर ले गए थे. दिल्ली पहुंची पुलिस टीम सारी जानकारी एसपी प्रदीप शर्मा से शेयर कर रही थी. इस से एसपी प्रदीप शर्मा समझ गए कि उन की टीम सही दिशा में आगे बढ़ रही है.

लेकिन वे जल्द से जल्द चोरों को पकड़ना चाहते थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि देर होने पर आरोपी माल सहित नेपाल भाग सकते हैं. ड्राइवर ने यह भी बताया कि वापसी में सभी लोगों को उस ने दिल्ली में बदरपुर बौर्डर पर बस स्टैंड के पास छोड़ा था.

अब पुलिस को जरूरत थी उन तीनों नेपाली लड़कों की पहचान कराने की, जो दिल्ली से गाड़ी ले कर पचोर आए थे.

इस के लिए पुलिस ने दिल्ली में रहने वाले सैकड़ों नेपाली परिवारों से संपर्क किया. शक के आधार पर 16 लोगों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. जिस में एक नया नाम सामने आया बिलाल अहमद का, जो लोगों को घरेलू नौकर उपलब्ध कराने के लिए एशियन मेड सर्विस की एजेंसी चलाता था.

बिलाल ने पुलिस को बताया कि अनुष्का उस के पास आई थी, उस की सिफारिश सरिता पति नवराज शर्मा ने की थी. जिसे उस ने दिल्ली में एक बच्ची की देखभाल के लिए नौकरी पर लगवा दिया था.

जांच के दौरान पुलिस टीम को पवन थापा के बारे में जानकारी मिली. पता चला कि पवन ही वह आदमी है जो उन तीनों लोगों को दिल्ली से पचोर ले कर आया था. पवन भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उस ने पूछताछ में बताया कि उत्तम नगर के सम्राट उर्फ वीरामान ने टैक्सी बुक की थी, जिस के लिए उसे15 हजार रुपए एडवांस भी दिए थे.

इस से पुलिस को पूरा शक हो गया कि इस मामले में सम्राट की खास भूमिका हो सकती है. दूसरी बात यह पुलिस समझ चुकी थी कि इस बड़ी चोरी के सभी आरोपी उत्तम नगर के आसपास के हो सकते हैं. इसलिए न केवल पुलिस सतर्क हो गई, बल्कि अन्य आरोपियों की रैकी भी करने लगी.

आरोपी लगातार अपना ठिकाना बदल रहे थे, इसलिए तकनीकी टीम के प्रभारी एसआई रामकुमार रघुवंशी और आरक्षक मोइन खान ने चाय व समोसे वाला बन कर उन की रैकी करनी शुरू कर दी, जिस से जल्द ही जानकारी हासिल कर सम्राट उर्फ वीरामान धामी को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में वीरामान पहले तो कुछ भी बताने की राजी नहीं था. लेकिन जब उस ने मुंह खोला तो चौंकाने वाला सच सामने आया.

वास्तव में वीरामान खुद वारदात करने के लिए पचोर जाने वाली टीम में शामिल था. अन्य 2 पुरुषों और महिला के बारे में पूछताछ की तो सम्राट ने बताया कि अनुष्का अपने प्रेमी तेज के साथ नई दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहती है.

पुलिस ने बदरपुर इलाके में छापेमारी कर के दोनों को वहां से गिरफ्तार कर उन के पास से चोरी का माल बरामद कर लिया. यहां तेज रोक्यो और अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल के साथ उन का तीसरा साथी भरतलाल थापा भी पुलिस गिरफ्त में आ गए.

मौके पर की गई पूछताछ के बाद दिल्ली गई पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस की मदद से मामले के मुख्य आरोपी वीरामान उर्फ सम्राट मूल निवासी धनगढ़ी, नेपाल, अनुष्का उर्फ आशु उर्फ कुशलता भूखेल निवासी जनकपुर, तेज रोक्यो मूल निवासी जिला अछम, नेपाल, भरतलाल थापा को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की थी.

इस के अलावा आरोपियों को पचोर तक कार बुक करने वाला पवन थापा निवासी उत्तम नगर नई दिल्ली, बेहोशी की दवा उपलब्ध कराने वाला कमल सिंह ठाकुर निवासी जिला बजरा नेपाल, चोरी के जेवरात खरीदने वाला मोहम्मद हुसैन निवासी जैन कालोनी उत्तम नगर, जेवरात को गलाने में सहायता करने वाला विक्रांत निवासी उत्तम नगर भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए.

अनुष्का को कंपनी में काम पर लगवाने वाली सरिता शर्मा निवासी किशनपुरा, नोएडा तथा अनुष्का को नौकरानी के काम पर लगाने वाला बिलाल अहमद उर्फ सोनू निवासी जामिया नगर, नई दिल्ली को गिरफ्तार कर के बरामद माल सहित पचोर लौट आई. जहां एसपी श्री शर्मा ने पत्रकार वार्ता में महज 7 दिनों के अंदर जिले में हुई चोरी की सब से बड़ी घटना का राज उजागर कर दिया.

अनुष्का ने बताया कि राम गोयल का पूरा परिवार उस पर विश्वास करता था. इसलिए परिवार के अन्य लोगों की तरह अनुष्का भी घर में हर जगह आतीजाती थी. एक दिन उस के सामने घर की तिजोरी खोली गई तो उस में रखी ज्वैलरी और नकदी देख कर उस की आंखें चौंधिया गईं और उस के मन में लालच आ गया. यह बात जब उस ने दिल्ली में बैठे अपने प्रेमी तेज रोक्यो को बताई तो उसी ने उसे तिजोरी पर हाथ साफ करने की सलाह दी.

योजना को अंजाम देने के लिए उस का प्रेमी तेज रोक्यो ही दिल्ली से बेहोशी की दवा ले कर पचोर आया था. वह दवा उस ने रात में खिचड़ी में मिला कर पूरे परिवार को खिला दी. जिस से खिचड़ी खाते ही पूरा परिवार गहरी नींद में सो गया. तब अनुष्का अलमारी में भरा सारा माल ले कर पे्रमी के संग चंपत हो गई. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर एक करोड़ 53 लाख रुपए का चोरी का सामान और नकदी बरामद कर ली.

पुलिस ने सभी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच टीआई डी.पी. लोहिया कर रहे थे.

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड – भाग 3

अभिजीत और मोमिता दोनों कला प्रेमी थे. चालाकियों से उन का वास्ता नहीं था इसलिए भरोसा कर लिया. राजू के तीनों दोस्त भी टैक्सी में सवार हो गए. थोड़ा आगे जाने पर बबलू व अन्य ने राजू से स्थानीय भाषा में मोमिता से छेड़छाड़ करने की बात कही तो उस ने थोड़ा अंधेरा होने का इंतजार करने को कहा.

मोमिता व अभिजीत नहीं जानते थे कि विश्वास कर के वह चंडालों की चौकड़ी में फंस चुके हैं. हलका अंधेरा हुआ तो राजू के साथियों ने मोमिता से छेड़छाड़ शुरू कर दी. उन का यह रवैया दोनों को ही खराब लगा. उन्हें ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी.

अभिजीत ने उन का विरोध किया, ‘‘यह क्या बदतमीजी है.’’

‘‘क्यों, क्या हम कुछ नहीं कर सकते?’’ तीनों ने बेशरमी से हंसते हुए उसे धमकाया, ‘‘चुपचाप बैठा रह, वरना…’’

‘‘…वरना क्या?’’

‘‘उठा कर खाई में फेंक देंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’

उस वक्त सड़क पर सन्नाटा था. बावजूद इस के अभिजीत नहीं डरा. अभिजीत को लगा कि वह ऐसे नहीं मानेंगे तो उस ने उन लोगों से हाथापाई शुरू कर दी. इस से बौखलाए युवकों ने टैक्सी में पड़ी रस्सी निकाल कर अभिजीत का गला दबा दिया. फलस्वरूप उस ने छटपटा कर दम तोड़ दिया.

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मोमिता ने विरोध किया तो उन्होंने उस के साथ भी मारपीट की. वह डर से कांप रही थी. तीनों ने अभिजीत के शव को टैक्सी में पीछे डाल दिया. युवकों के सिर पर हैवानियत सवार थी. चलती टैक्सी में बबलू ने मोमिता के साथ दुराचार किया. बाकी साथियों ने उस की मदद की.

मोमिता चीखी चिल्लाई तो उस के साथ मारपीट की गई. इस के बाद उन्होंने दुपट्टे से गला दबा कर उस की भी हत्या कर दी. मरने से पहले मोमिता बहुत गिड़गिड़ाई, लेकिन किसी को भी उस पर दया नहीं आई. दोनों का सामान लूट कर थोड़ा आगे जा कर राजू ने टैक्सी रोक दी. चारों ने मिल कर लाखामंडल के पास एक पुल से मोमिता के शव को यमुना नदी में फेंक दिया.

ये लोग अभिजीत का शव भी फेंकने वाले थे कि तभी एक गाड़ी आती दिख जाने से रुक गए और वहां से आगे बढ़ गए. आगे जा कर उन्होंने अभिजीत के शव को चकराता के लाखामंडल मार्ग पर क्वांसी के पास नौगांव इलाके में खाई में फेंक दिया.

लूटा गया सामान आपस में बांट कर सभी अपनेअपने घर चले गए. दोनों के मोबाइल उन्होंने स्विच औफ कर के उन के सिम कार्ड निकाल कर फेंक दिए. उधर संपर्क टूटने से मोमिता व अभिजीत के घर वाले परेशान हो गए थे और उन्होंने दोनों की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

लूटे गए मोबाइलों का किसी ने इस्तेमाल नहीं किया. इस बीच कई दिन बीत गए. इसी बीच 30 अक्तूबर को उत्तरकाशी जनपद के पुरोला थाना क्षेत्र की नौगांव पुलिस चौकी क्षेत्र में एक युवक का शव मिला. सूचना पा कर थानाप्रभारी ठाकुर सिंह रावत मौके पर पहुंचे. उन्होंने उत्तरकाशी के एसपी जगतराम जोशी को घटना से अवगत कराया.

मृतक युवक के पास कोई सामान या शिनाख्त के लिए पहचानपत्र नहीं मिला था. पुलिस को यह मामला लूटपाट के लिए की गई हत्या का लगा था. इसलिए अज्ञात हत्यारे के खिलाफ धारा 302 व 201 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने शव की शिनाख्त का प्रयास किया, लेकिन एक तो शव पुराना था दूसरे उस की शिनाख्त भी नहीं हो पा रही थी. उसे ज्यादा दिन रखना संभव नहीं था इसलिए उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक की मौत का कारण गला दबाना पता चला. यह शव अभिजीत का ही था.

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बाद में दिल्ली पुलिस जांचपड़ताल करते हुए राजू तक पहुंची तो उस ने सीधेपन का नाटक करते हुए पुलिस को बहका दिया. पुलिस ने भी उस पर विश्वास कर लिया क्योंकि ऐसा नहीं लग रहा था कि वह इतना भयानक कृत्य कर सकता है.

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इस के बाद चारों दोस्तों ने एक बार फिर जश्न मनाया कि पुलिस को उन पर शक नहीं है और उस ने झूठ बोल कर मामला सुलटा दिया है. राजू व उस के दोस्तों को यह विश्वास हो गया था कि उन का राज अब कभी नहीं खुलेगा और दिल्ली पुलिस इतनी दूर बारबार पूछताछ करने नहीं आएगी.

यही सोच कर राजू ने मोमिता के मोबाइल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था. उस की इस बेवकूफी ने पुलिस की मंजिल को आसान कर दिया और वह दोस्तों के साथ शिकंजे में फंस गया. अभिजीत का मोबाइल आरोपी कुंदन ने अपनी बहन को बतौर गिफ्ट दे दिया था. पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से मोमिता व अभिजीत का मोबाइल, पर्स, शौल व अन्य सामान भी बरामद कर लिया.

फोटो के आधार पर अभिजीत के शव की शिनाख्त हो चुकी थी, लेकिन मोमिता का शव अभी तक नहीं मिला था. अगले दिन पुलिस टीम हत्यारोपियों को ले कर चकराता व उत्तरकाशी पहुंच गई. एसपी जगतराम जोशी व थानाप्रभारी पुरोला ठाकुर सिंह रावत भी आ गए.

आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने गोताखोरों की मदद से नदी के 12 किलोमीटर एरिया में मोमिता के शव की तलाश की लेकिन उस का शव नहीं मिल सका. उस के शव का मिलना भी एक बड़ी चुनौती थी.

अगले दिन पुलिस ने फिर तलाशी अभियान चलाया. इस बीच आरोपियों को पुरोला पुलिस के हवाले कर दिया गया. पुलिस ने अपराध संख्या 50/2014 पर आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी ठाकुर सिंह रावत ने सुरक्षा के बीच सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

13 नवंबर को आखिर पुलिस को मोमिता का शव नदी में मिल गया. पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. मोमिता के परिजन भी आ चुके थे. शव की हालत ऐसी नहीं थी कि उसे वे लोग ले जा सकते. इसलिए उन्होंने पोस्टमार्टम के बाद उस के शव का केदारघाट पर अंतिम संस्कार कर दिया.

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चकराता जैसे शांत इलाके में अपनी तरह की यह पहली घिनौनी घटना थी. इस घटना को ले कर चकराता व आसपास के लोगों में बहुत गुस्सा था. वे हत्यारों को फांसी देने की मांग कर रहे थे. इलाकाई लोगों ने अभिजीत व मोमिता की आत्मा की शांति के लिए कई कैंडल मार्च निकाले और मौनव्रत रखा.

इस घटना को ले कर 16 नवंबर को चकराता में कई गांवों के करीब 300 लोगों की पंचायत हुई. पंचायत में सर्वसम्मति से आरोपियों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया. निर्णय लिया गया कि उन के घर वाले न तो उन से जेल में मिलने जाएंगे और न ही उन की पैरवी करेंगे.

घर वालों ने उन से नाता तोड़ दिया. लोगों को आशंका है कि इलाके की छवि धूमिल होने से पर्यटकों की संख्या पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. आरोपियों के घर वालों की मांग है कि उन के बेटों को फांसी की सजा दी जाए. मोमिता व अभिजीत ने राजू पर विश्वास किया था, लेकिन उस ने उन के विश्वास को बुरी तरह छल कर उन की जिंदगी का चिराग हमेशा के लिए बुझा दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड – भाग 2

पुलिस ने मोमिता अभिजीत के मोबाइल को सर्चिंग में लगा दिया. दरअसल पुलिस को उम्मीद थी कि अगर उन के साथ कुछ गलत हुआ होगा तो हो सकता है कोई अन्य व्यक्ति उन के मोबाइलों का इस्तेमाल कर रहा हो. नवंबर के पहले सप्ताह में मोमिता के मोबाइल का इस्तेमाल किया गया. पुलिस ने उस नंबर की जांच कराई, जो उस के मोबाइल में इस्तेमाल हुआ था. वह नंबर चकराता के टैक्सी चालक राजू का ही निकला. इस से वह शक के दायरे में आ गया.

हालांकि पहली पूछताछ में पुलिस ने राजू के बयानों को सही मान लिया था. लेकिन मोमिता का मोबाइल उस के पास कैसे आया, यह एक बड़ा सवाल था. अब पुलिस को आशंका होने लगी कि मोमिता और अभिजीत के साथ जरूर कोई अनहोनी हुई है.

इस के बाद पुलिस टीम एक बार फिर उत्तराखंड के लिए रवाना हो गई. इस टीम में एसआई दुर्गादास सिंह, हेडकांस्टेबल सुधीर कुमार और गोपाल शामिल थे. डीआईजी संजय गुंज्याल ने दिल्ली पुलिस को पूरे सहयोग का आश्वासन दिया. उन्होंने इस बाबत विकासनगर सीओ एसके सिंह को काररवाई के निर्देश भी दे दिए.

दिल्ली पुलिस की टीम के साथ थानाप्रभारी विकासनगर चंदन सिंह बिष्ट, चकराता थानाप्रभारी मुकेश थलेड़ी, विकासनगर थाने के सबइंसपेक्टर दिनेश ठाकुर, चौकीप्रभारी नरेंद्र, कांस्टेबल अमित भप्त, धर्मेंद्र धामी और सोवन सिंह भी थे. दिल्ली व उत्तराखंड पुलिस की टीम ने 10 नवंबर को टैक्सी चालक राजू को हिरासत में ले लिया.

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विकासनगर के सीओ एसके सिंह ने राजू से पूछताछ की तो उस ने पुलिस को घुमाने का प्रयास किया. लेकिन पुलिस इस बार उस के साथ सख्ती से पेश आई तो उस ने जो राज खोला उसे सुन कर सभी शर्मसार हो गए. राजू ने अपने ही गांव के 3 दोस्तों के साथ मिल कर मोमिता और अभिजीत की हत्या कर दी थी. पुलिस ने उस के दोस्तों बबलू, गुड्डू और कुंदन को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस की विस्तृत पूछताछ में इन लोगों की सारी करतूत सामने आ गई.

राजू का परिवार बेहद साधारण था. उस ने बचपन से ही गरीबी देखी थी, लेकिन युवा होतेहोते उस ने परिवार को गरीबी से निजात दिलाने की ठान ली थी. वह टैक्सी चलाने लगा. उस के टैक्सी रूट में विकासनगर, चकराता और देहरादून शामिल थे. राजू बुरी लतों का शिकार था. इस के लिए वह अकेला नहीं, बल्कि उस की संगत भी जिम्मेदार थी. गांव के ही बबलू, गुड्डू और कुंदन से उस की गहरी दोस्ती थी. वह भी उसी की तरह थे.

वह आए दिन बैठते थे और बड़ीबड़ी बातें करते थे. चारों की सोच एक जैसी थी. वे लोग हमेशा एक ही बात सोचा करते थे कि शार्टकट अपना कर जीवन में कैसे आगे बढ़ा जाए. शराब पीने के बाद उन के सपने और भी जाग जाते थे. राजू जो कमाता था, उस में उस का पूरा नहीं पड़ता था. कोई और होता, तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती. उस की बुरी लतों की वजह से उस की कमाई की आधी रकम पीने पिलाने में उड़ जाती थी.

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उत्तराखंड की आबादी का एक हिस्सा पर्यटन पर निर्भर है. यहां लाखों पर्यटक आते हैं जिन से स्थानीय लोगों की आजीविका चलती है. पुराने विचारों वाले लोग आज भी पर्यटकों को सम्मान की नजर से देखते हैं. वे लोग यह भी जानते हैं कि अगर पर्यटक नहीं आएंगे और वे उन के साथ अपना व्यवहार अच्छा नहीं रखेंगे, तो उन का काम नहीं चलेगा.

लेकिन राजू नई पीढ़ी का युवक था, उसे इन बातों से कोई मतलब नहीं था. वह पर्यटकों से उल्टेसीधे पैसे ऐंठने को अपनी कला समझता था. जो लोग समय हालात के हिसाब से खुद को स्थापित नहीं करते, जिंदगी अकसर उन्हें अपने हिसाब से परेशान करती रहती है. राजू के साथ भी ऐसा ही था, वह आर्थिक तंगियों से जूझता रहता था.

22 अक्तूबर को मोमिता और अभिजीत दोनों ट्रेन से देहरादून पहुंचे थे. उन्होंने रेलवे स्टेशन के नजदीक ही एक होटल में कमरा ले लिया. पहले दिन वह विकासनगर घूमने गए. लौट कर शाम को होटल से नंबर ले कर उन्होंने टैक्सी चालक राजू से बात की और उसे अगले दिन चकराता चलने के लिए बुक कर लिया. चकराता का नाम अभिजीत व मोमिता ने पहले ही सुन रखा था कि वह खूबसूरत जगह है.

समुद्र तल से 6730 फुट की ऊंचाई पर बसा चकराता उत्तराखंड का प्रमुख पर्यटन स्थल है. इस के साथसाथ यहां भारतीय सेना का क्षेत्रीय कार्यालय है. यहां सेना के कमांडोज को प्रशिक्षण दिया जाता है. चकराता में जहां खूबसूरत घने जंगल हैं वहीं टाइगर फाल, यमुना नदी जैसे स्थल पर्यटकों को लुभाते हैं. गर्मियों में पर्यटकों की संख्या यहां और भी ज्यादा बढ़ जाती है.

जैसी कि 22 अक्तूबर की शाम को ही बात हो चुकी थी, अगले दिन यानी 23 अक्तूबर की दोपहर को राजू अभिजीत और मोमिता को अपनी टैक्सी में बैठा कर चकराता ले गया. वहां का प्राकृतिक सौंदर्य देख कर दोनों बहुत खुश हुए. राजू के व्यवहार से भी दोनों खुश थे. राजू पूरे रास्ते उन की बातें सुनता रहा और वहां के बारे में बताता रहा.

बातचीत व पहनावा देख कर राजू को लग गया था कि दोनों ही अच्छे घरों से ताल्लुक रखते हैं. बस यहीं से उस का दिमाग घूम गया और उस ने उन्हें लूटने की ठान ली. अभिजीत व मोमिता चकराता घूमते रहे. इस बीच राजू ने कुछ देर में वापस आने की बात कही और अपने तीनों आवारा दोस्तों से मिला.

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राजू ने उन्हें बताया, ‘‘बाहर की एक पार्टी है. मुझे लगता है उन के पास अच्छा माल है. उन्हें लूटा जाए तो कुछ दिन आराम से बीत जाएंगे.’’

‘‘हम पकड़े भी तो जा सकते हैं?’’

‘‘खाक पकड़े जाएंगे. दोनों बंगाल के रहने वाले हैं, यहीं कहीं ठिकाने लगा देंगे.’’ राजू ने कहा तो चारों ने मिल कर लूटपाट की योजना बना ली. इस के बाद उन्होंने शराब पी. शराब पी कर राजू जाने लगा तो उस ने तीनों दोस्तों से टाइगर फौल के बाहर मिलने को कहा.

इस के बाद राजू अभिजीत व मोमिता के पास गया और उन्हें टाइगर फौल घुमाने ले गया. दोनों को प्राकृतिक नजारों ने बहुत लुभाया. वहां से वापसी के वक्त शाम होनी शुरू हो गई थी. जैसे ही वह सड़क पर आए, तो योजना के अनुसार वहां बबलू, गुड्डू व कुंदन मिल गए. राजू ने उन्हें अपनी टैक्सी में बैठा लिया. यह देख कर मोमिता ने विरोध किया, ‘‘भैया, जब टैक्सी बुक है तो किसी को क्यों बैठा रहे हो?’’

‘‘मेमसाहब, ये मेरे गांव के साथी हैं. इन्हें बस थोड़ा आगे रास्ते में छोड़ना है. आप को कोई परेशानी नहीं होगी. आप आराम से बैठिए.’’ राजू ने समझाया तो मोमिता व अभिजीत ने विश्वास कर लिया.

विश्वास का खून : मोमिता अभिजीत हत्याकांड – भाग 1

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रहने वाले मृणाल कृष्णा दास उन खुशहाल लोगों में से थे जो अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर किसी काबिल बना देते हैं. वह एक सरकारी बैंक में नौकरी करते थे. कुछ साल पहले मिली सेवानिवृत्ति के बाद उन का अधिकांश समय घर पर ही बीतता था. उन के परिवार में पत्नी काजोल दास के अलावा 2 बच्चे थे, मोमिता दास और बेटा मृगांक दास.

मोमिता को चित्रकारी का शौक था. स्कूलकालेजों में होने वाली आर्ट प्रतियोगिताओं में वह हमेशा अव्वल आती थी. इसी के मद्देनजर उस ने एमए तक की पढ़ाई आर्ट से ही की.

प्राकृतिक फोटोग्राफी भी उस के शौक में शामिल थी. मोमिता की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. इसलिए 2 साल पहले घर वालों की सलाह पर वह कैरियर बनाने के लिए नदिया से दिल्ली आ गई. वह चूंकि समझदार थी इसलिए उस के अकेले दिल्ली आने पर मातापिता को ज्यादा चिंता नहीं थी. मोमिता का छोटा भाई मृगांक भी पढ़ाई के लिए बेंगलुरु चला गया.

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दिल्ली आ कर मोमिता ने अपने एक परिचित के माध्यम से दक्षिणी दिल्ली के लाडोसराय इलाके में किराए पर एक कमरा ले लिया और अपने लिए नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी. थोड़ी कोशिश के बाद उसे गुडगांव, हरियाणा के एक निजी स्कूल में आर्ट टीचर की नौकरी मिल गई. 28 वर्षीय मोमिता स्वभाव से मिलनसार व खुशमिजाज थी.

कुछ दिनों बाद मोमिता की दोस्ती ग्राफिक डिजाइनर अभिजीत पौल से हो गई. अभिजीत भी पश्चिमी बंगाल के कोलकाता शहर का रहने वाला था और दिल्ली में रह कर अपना कैरियर बनाने की कोशिश कर रहा था. दोनों की आदतें, विचार और शौक एक जैसे थे. लिहाजा उन की दोस्ती बदलते वक्त के साथ प्यार में बदल गई थी.

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उन की इस दोस्ती की खबर उन के परिजनों तक भी पहुंच गई थी. मोमिता के मातापिता ने इस बात पर कोई ऐतराज नहीं किया. वे जानते थे कि बेटी ने जो कदम उठाया है वह कुछ सोच कर ही उठाया होगा.

मोमिता को प्राकृतिक सौंदर्य से बहुत प्यार था. वह जब भी कहीं घूमने के लिए जाती थी, तो अकसर वहां की फोटोग्राफी किया करती थी. कुछ पत्र पत्रिकाओं में उस के द्वारा खींचे गए फोटो छपने भी लगे थे. बेटी की उपलब्धियों से मृणाल बहुत खुश थे. वह लगातार उस के संपर्क में रहते थे.

22 अक्तूबर, 2004 की सुबह का वक्त था. मृणाल कृष्णदास के पास मोमिता का फोन आया. उस ने बताया, ‘‘पापा, मैं आज उत्तराखंड जा रही हूं.’’

‘‘क्यों?’’ मृणाल ने पूछा.

‘‘बस घूमने और अच्छे फोटोग्राफ के लिए.’’

‘‘अकेली जाओगी?’’

‘‘नहीं पापा मेरे साथ अभिजीत है. हम दोनों जा रहे हैं.’’ बेटियां भले ही कितनी भी समझदार क्यों न हो जाएं, मातापिता को हमेशा उन की फिक्र लगी ही रहती है. मृणाल को भी उस की फिक्र रहती थी. इसलिए उन्होंने उसे सफर की सावधानियों के बारे में समझा दिया.

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मृणाल ने शाम को मोमिता को फोन किया तो उस ने बताया कि वे लोग देहरादून पहुंच गए हैं और कल से घूमने का प्रोग्राम बनाएंगे. अगले दिन उन की बात हुई, तो मोमिता ने बताया, ‘‘पापा, आज हम लोग चकराता जाएंगे. यहां की बहुत खूबसूरत जगह है.’’ मोमिता की बातों से ही झलक रहा था कि उत्तराखंड पहुंच कर वह बहुत खुश थी.

24 अक्तूबर को मृणाल बहुत परेशान थे. उन की परेशानी की वजह मोमिता थी. 23 अक्तूबर की शाम से उन का मोमिता से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था. बारबार मिलाने पर भी मोबाइल स्विच औफ आ रहा था. कृष्णा समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मोमिता का मोबाइल अचानक क्यों बंद हो गया. वह सैकड़ों मील दूर थे. उन की परेशानी पत्नी काजोल से भी नहीं छिपी रह सकी.

‘‘क्यों परेशान हैं आप?’’ काजोल ने पूछा.

‘‘मोमिता का नंबर नहीं लग रहा है.’’ मृणाल ने कहा.

‘‘नेटवर्क में नहीं होगी या मोबाइल की बैटरी वीक हो गई होगी.’’

‘‘वह तो मैं भी समझता हूं. लेकिन बहुत वक्त हो गया.’’ इस बात से वह भी परेशान हो गईं. इस के बाद इंतजार का सिलसिला शुरू हो गया. लेकिन न तो मोमिता का नंबर मिला और न उस का फोन आया. इस से पतिपत्नी को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. देखतेदेखते 4 दिन बीत गए. अगर मोमिता का मोबाइल खो गया था तो भी उसे संपर्क करना चाहिए था. ऐसा कभी नहीं होता था कि वह उन लोगों से बात न करें. नाते रिश्तेदारों की सलाह पर मृणाल कृष्णा दिल्ली आ गए.

अपने बेटे को भी उन्होंने बेंगलुरु से बुलवा लिया. मृणाल कृष्णा ने दिल्ली के थाना साकेत जा कर पुलिस को बेटी से संबंधित अपनी चिंता बताई. चिंता की बात यह थी कि मोमिता का अपने घर वालों से सपंर्क नहीं हो पा रहा था. पुलिस ने गुमशुदगी संख्या 33 ए पर मोमिता की गुमशुदगी दर्ज कर ली. दूसरी तरफ कोलकाता में अभिजीत के घर वाले भी परेशान थे, उस का भी कुछ पता नहीं चल रहा था. उस के घर वालों ने कोलकाता में ही उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

गुमशुदगी दर्ज कर के मोमिता के मामले की जांच सबइंसपेक्टर दुर्गादास सिंह के हवाले कर दी गई. मामला एक युवक युवती के लापता होने का था. इस मामले में अपनी मरजी से गायब हो जाने की आशंकाएं भी नहीं थीं क्योंकि मोमिता व अभिजीत के रिश्ते उन के परिजनों से छिपे नहीं थे.

पुलिस ने कुछ दिन इंतजार किया. जब कोई पता नहीं चला तो दिल्ली पुलिस की एक टीम उत्तराखंड के लिए रवाना हो गई. इस बीच पुलिस ने मोमिता के मोबाइल की काल डिटेल्स हासिल कर ली थी. उस के मोबाइल की अंतिम लोकेशन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 98 किलोमीटर दूर पर्यटनस्थल चकराता में पाई गई थी. इस से पहले उस के मोबाइल की लोकेशन देहरादून और विकासनगर में थी. यह भी पता चला कि मोमिता ने 23 अक्तूबर को अंतिम बार एक स्थानीय नंबर पर बात की थी.

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दिल्ली पुलिस ने देहरादून के डीआईजी संजय गुंज्याल और एसएसपी अजय रौतेला से संपर्क किया. पुलिस ने उस नंबर की जांचपड़ताल कराई जिस पर मोमिता की बात हुई थी. वह नंबर एक टैक्सी चालक राजू दास पुत्र मोहन दास का निकला. राजू चकराता के गांव टुंगरौली का रहने वाला था. वह विकासनगर और चकराता के बीच टैक्सी चलाता था. दिल्ली पुलिस राजू तक पहुंच गई.

पुलिस ने मोमिता का फोटो दिखा कर उस से पूछताछ की, तो उस ने बताया, ‘‘हां सर, यह लड़की एक लड़के के साथ विकासनगर से मेरी टैक्सी में चकराता तक गई थी.’’

‘‘उस के बाद?’’

‘‘उस के बाद मुझे नहीं पता सर. मुझे लड़की ने फोन कर के बुलाया था कि उन्हें चकराता जाना है. उस दिन हम लोग दोपहर में विकासनगर से चले थे. चकराता पहुंच कर उन्होंने मुझे मेरा भाड़ा दे दिया और मैं वापस आ गया.’’

‘‘तुम्हें उन्होंने कुछ बताया. मतलब आगे का कोई प्रोग्राम?’’

‘‘नहीं सर, लेकिन हां दोनों काफी खुश थे और पूरा उत्तराखंड घूमने की बात कर रहे थे.’’ टैक्सी चालक राजू देखने में सीधासादा युवक लगता था. उस की बातों में सच्चाई झलक रही थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे छोड़ दिया. उस से पूछताछ के बाद दिल्ली पुलिस वापस आ गई. मोमिता व अभिजीत के इस तरह गायब होने की वजह पुलिस भी नहीं समझ पा रही थी. पुलिस को जांच के लिए कोई ऐसा सिरा नहीं मिल पा रहा था जिस से दोनों के लापता होने का राज खुल सके.