UP Crime: उजड़ गया आशियाना – बाप बना कातिल

UP Crime: गांवों में आज भी ज्यादातर घरों में दिन ढलते ही रात का खाना बन जाता है. शाम के यही कोई साढ़े 6 बजे खाना खा कर सुरेंद्र सोने के लिए जानवरों के बाड़े में चला गया था. उस के जाने के बाद सुरेंद्र की पत्नी ममता, बेटा कुलदीप, दीपक, रतन और बहू प्रभा खाना खाने की तैयारी करने लगी थी. सभी खाने के लिए बैठने जा रहे थे कि तभी प्रभा के पिता फूल सिंह पाल, चाचा रामप्रसाद, भाई लाल सिंह उस के मौसेरे भाई टुंडा के साथ उन के यहां आ पहुंचे.

किसी के हाथ में कुल्हाड़ी थी तो कोई चापड़ लिए था तो कोई डंडा. उन्हें इस तरह आया देख कर घर के सभी लोग समझ गए कि इन के इरादे नेक नहीं हैं. वे कुछ कर पाते, उस से पहले ही उन्होंने प्रभा को पकड़ा और कुल्हाड़ी से उस की हत्या कर दी. प्रभा की सास ममता बहू को बचाने के लिए दौड़ी तो हमलावरों ने उसे भी कुल्हाड़ी से काट डाला.

ममता प्रभा की 9 महीने की बेटी को लिए थी, हत्यारों ने उसे छीन कर एक ओर फेंक दिया था. 2 लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद हमलावरों ने कुलदीप को पकड़ कर जमीन पर गिरा दिया. कुलदीप जान की भीख मांगने लगा तो फूल सिंह ने कहा, ‘‘कुलदीप, तुझे हम जान से नहीं मारेंगे, तुझे तो अपाहिज बना कर छोड़ देंगे, ताकि तू उम्र भर चलने को तरसे और अपनी बरबादी पर रोता रहे.’’

इतना कह कर फूल सिंह ने कुलदीप के दोनों पैर कुल्हाड़ी से काट दिए. सुरेंद्र की बुआ श्यामा और छोटेछोटे बच्चे चीखतेचिल्लाते रहे और गांव वालों से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन गांव का कोई भी उन की मदद को नहीं आया. लोग अपनीअपनी छतों पर खड़े हो कर इस वीभत्स नजारे को देखते रहे.

कुछ ही देर में इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दे कर जिस तरह हमलावर आए थे, उसी तरह फरार हो गए. सुरेंद्र का घर खून से डूब गया था. 2 महिलाओं की खून से लथपथ लाशें पड़ी थीं, जबकि कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. हमलावरों के जाने के बाद गांव वाले जुटने शुरू हुए. खबर सुन कर सुरेंद्र और उस के मातापिता, भाई, चाचा आदि आ गए. लोमहर्षक नजारा देख कर वे सन्न रह गए.

सुरेंद्र ने पुलिस चौकी साढ़ को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव घटना की सूचना कोतवाली घाटमपुर को दे कर हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, भीम प्रकाश, प्रवेश मिश्रा, संजय कुमार के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

घटना की सूचना पा कर कोतवाली घाटमपुर के प्रभारी गोपाल यादव और सीओ जे.पी. सिंह गांव ढुकुआपुर के लिए चल पड़े थे. ढुकुआपुर से पुलिस चौकी 8 किलोमीटर दूर थी इसलिए पुलिस टीम को वहां पहुंचने में पौन घंटा लग गया. 3 लोगों को खून में लथपथ देख कर पुलिस हैरान रह गई. देख कर ही लग रहा था कि कि यह सब दुश्मनी की वजह से हुआ है.

2 महिलाओं की मौत हो चुकी थी. कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. पुलिस ने कुलदीप को स्वरूपनगर के एसएनआर अस्पताल भिजवाया. सूचना मिलने पर एसपी (देहात) अनिल मिश्रा भी वहां आ गए थे. पुलिस अधिकारियों ने आसपास के लोगों से घटना के बारे में जानना चाहा, लेकिन पुलिस के सामने किसी ने मुंह नहीं खोला. लोग अलगअलग बहाने बना कर वहां से खिसकने लगे. पुलिस समझ गई कि डर या किसी अन्य वजह से लोग कुछ भी बताने से कतरा रहे हैं.

हमलावरों ने सुरेंद्र की पत्नी ममता और बहू प्रभा की हत्या कर दी थी, जबकि बेटे कुलदीप के दोनों पैर काट दिए थे. पुलिस ने जब सुरेंद्र से पूछताछ की तो उस ने बताया कि यह सब कुलदीप की ससुराल वालों ने किया है. पुलिस ने सुरेंद्र पाल की ओर से फूल सिंह, उस के बेटे, भाई रामप्रसाद पाल, लाल सिंह, टुंडा उर्फ मामा और रामप्रसाद उर्फ छोटे के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 307, 452, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए कानपुर भिजवा दिया था.

इस लोमहर्षक कांड के बाद गांव में दहशत फैल गई थी. गांव वाले दबी जुबान से तरहतरह की बातें कर रहे थे. एसएसपी यशस्वी यादव ने सीओ जे.पी. सिंह को निर्देश दिए कि वह जल्द से जल्द हमलावरों को गिरफ्तार करें. सीओ ने तुरंत ही प्रभारी निरीक्षक गोपाल यादव और चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव के नेतृत्व में 2 टीमें गठित कीं.

पहली टीम में एसआई अखिलेश मिश्रा, कांस्टेबल धर्मेंद्र सिंह, प्रवेश बाबू और इरशाद अहमद को शामिल किया गया, जबकि दूसरी टीम में हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, अजय कुमार यादव और भीम प्रकाश को भी शामिल किया गया. चूंकि आरोपी अपने घरों से फरार थे, इसलिए पुलिस टीमें उन की तलाश में संभावित जगहों पर छापे मारने लगीं. आखिर सुबह होतेहोते पुलिस को सफलता मिल ही गई. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह और रामप्रसाद उर्फ छोटे को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो इस खूनी तांडव की जो कहानी सामने आई, वह प्यार की प्रस्तावना पर लिखी हुई थी.

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर की एक तहसील है घाटमपुर. यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर बसा है एक गांव ढुकुआपुर. इस गांव में वैसे तो सभी जाति के लोग रहते हैं, लेकिन गड़रियों की संख्या कुछ ज्यादा है. इसी गांव में सुरेंद्र सिंह पाल भी अपने परिवार के साथ रहता था. वैसे सुरेंद्र पाल का पुश्तैनी मकान गांव के बीचोंबीच था, लेकिन भाइयों में जब बंटवारा हुआ तो वह गांव के बाहर खाली पड़ी जमीन पर मकान बना कर रहने लगा.

सुरेंद्र के परिवार में पत्नी ममता के अलावा 3 बेटे, कुलदीप, दीपक और करण थे. कुलदीप पढ़ाई के साथ पिता के काम में भी हाथ बंटाता था.  सुरेंद्र के पड़ोस में ही फूल सिंह पाल का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 1 बेटी प्रभा थी. प्रभा और कुलदीप एक ही स्कूल में पढ़ते थे. दोनों आसपास ही रहते थे, इसलिए स्कूल भी साथसाथ आतेजाते थे. दोनों साथसाथ खेलते और पढ़ते हुए जवान हुए तो उन की दोस्ती प्यार में कब बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला.

कुलदीप और प्रभा का प्यार कुछ दिनों तक तो चोरीछिपे चलता रहा, लेकिन वह इसे ज्यादा दिनों तक लोगों की नजरों से छिपा न सके. वैसे भी प्यार कहां छिप पाता है. दोनों के प्रेमसंबंधों की बात गांव के लोगों तक पहुंची तो लोग उन के बारे में चटखारे ले ले कर बातें करने लगे.

गांव वालों से होते हुए यह बात किसी तरह प्रभा और कुलदीप के घर वालों के कानों तक पहुंची तो फूल सिंह ने पत्नी रानी से बात कर के प्रभा पर पाबंदी लगा दी कि वह घर के बाहर अकेली नहीं जाएगी. कहते हैं, बंदिशें लगाने से मोहब्बत और बढ़ती है. प्रभा की कुलदीप से मुलाकात भले ही नहीं हो पा रही थी, लेकिन फोन के जरिए बात होती रहती थी.

चूंकि उन्होंने पहले से ही तय कर लिया था कि वे प्यार में आने वाली हर रुकावट का विरोध करेंगे, इसलिए वे बगावत पर उतर आए. जमाने की परवाह किए बगैर अपने प्यार को मंजिल तक पहुंचाने के लिए वे जनवरी, 2012 में अपनेअपने घरों को छोड़ कर हरियाणा के गुड़गांव शहर चले गए. गुड़गांव में कुलदीप का एक दोस्त रहता था. कुलदीप ने उसी की मदद से आर्यसमाज रीति से प्रभा के साथ विवाह भी कर लिया. दोस्त की मदद से उसे दिल्ली की एक फैक्ट्री में नौकरी भी मिल गई. इस के बाद कुलदीप दिल्ली में किराए पर कमरा ले कर प्रभा के साथ रहने लगा.

प्रभा के इस तरह भाग जाने से फूल सिंह की बहुत बदनामी हुई. उस ने 16 जनवरी, 2012 को थाना घाटमपुर में कुलदीप के खिलाफ प्रभा को बरगला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. रिपोर्ट में उस ने प्रभा को नाबालिग बताया था. मामला नाबालिग लड़की का था, इसलिए पुलिस ने सुरेंद्र पाल और उस के परिवार वालों पर शिकंजा कसा. मजबूरन कुलदीप को वापस जाना पड़ा.

चूंकि कुलदीप के खिलाफ पहले से रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए पुलिस ने कुलदीप को गिरफ्तार कर के पूछताछ की. प्रभा का मैडिकल परीक्षण कराया. मैडिकल में प्रभा की उम्र 18 साल से ऊपर निकली. वह संभोग की अभ्यस्त पाई गई.  प्रभा ने कुलदीप की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहा था कि उस ने कुलदीप के साथ अपनी मरजी से जा कर शादी की थी. प्रभा ने सुबूत के तौर पर अपने और कुलदीप के शादी के फोटो भी दिखाए. लेकिन पुलिस ने उस की एक न सुनी और कुलदीप को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

मजिस्ट्रेट के सामने प्रभा के बयान कराए गए तो प्रभा ने वही सब कहा जो उस ने पुलिस के सामने चीखचीख कर कहा था. प्रभा के बयान और उस के बालिग होने की रिपोर्ट के मद्देनजर मजिस्ट्रेट ने प्रभा को उस की मरजी के अनुसार जहां और जिस के साथ जाने व रहने की इजाजत दे दी.

अदालत के फैसले के बाद प्रभा ने अपने घर के बजाय सासससुर के साथ जाने की इच्छा जताई तो पुलिस ने उसे कुलदीप के घर पहुंचा दिया. बेटी के इस फैसले से फूल सिंह और उस के धर वालों ने बड़ी बेइज्जती महसूस की. कुछ दिनों बाद कुलदीप भी छूट कर घर आ गया. माहौल खराब न हो, इसलिए कुलदीप प्रभा को ले कर फिर से दिल्ली चला गया. जनवरी, 2013 में प्रभा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने शिवानी रखा.

समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा. शिवानी भी 9 महीने की हो गई. अपने मातापिता से भी कुलदीप के संबंध ठीक हो गए थे. वह अकसर घर वालों से फोन पर बातचीत करता रहता था. लेकिन फूल सिंह ने बेटी से हमेशा के लिए संबंध खत्म कर लिए थे. कुलदीप बेटी का मुंडन संस्कार कराना चाहता था, इसलिए घर वालों से बात कर के वह पत्नी और बेटी को ले कर 9 अक्तूबर, 2013 को अपने गांव ढुकुआपुर आ गया.

सुरेंद्र पाल ने मुंडन संस्कार की सारी तैयारियां पहले से ही कर रखी थीं. 10 अक्तूबर को बड़ी धूमधाम से शिवानी का मुंडन संस्कार हुआ. प्रभा के मातापिता ने कुलदीप को अपना दामाद स्वीकार नहीं किया था. वह कुलदीप से खुंदक खाए बैठा था. इसलिए सुरेंद्र ने मुंडन कार्यक्रम में फूल सिंह और उस के परिवार वालों को नहीं बुलाया था.

गांव वाले मुंडन की दावत खा कर जब लौट रहे थे तो तरहतरह की बातें कर रहे थे. वे बातें फूल सिंह ने सुनीं तो उस का खून खौल उठा. उस ने उसी समय कुलदीप और उस के घर वालों को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया. इस बारे में उस ने मोहद्दीपुर थाना बकेवर में रहने वाले अपने भाई रामप्रसाद से सलाह- मशविरा कर के उसे भी शामिल कर लिया. अब इंतजार था, सुरेंद्र के मेहमानों के चले जाने का. 13 अक्तूबर को उस के यहां से सभी मेहमान चले गए. केवल सुरेंद्र की बुआ श्यामा रह गई थीं.

14 अक्तूबर, 2013 की शाम सुरेंद्र खाना खा कर घर से करीब 50 मीटर दूर जानवरों के बाड़े में सोने चला गया. उस की पत्नी ममता बच्चों को खाना खिलाने की तैयारी कर रही थी तभी फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद आदि कुल्हाड़ी, चापड़ और डंडे ले कर सुरेंद्र के घर में दाखिल हुए.

घर वाले कुछ समझ पाते उस से पहले उन्होंने प्रभा की हत्या की, क्योंकि उसी की वजह से समाज में उन की नाक कटी थी. ममता बहू को बचाने आई तो उन्होंने उसे भी काट डाला. उस के बाद कुलदीप के दोनों पैर काट दिए. इतना सब कर के वे फरार हो गए. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद उर्फ छोटे पाल से पूछताछ कर के सभी को जेल भेज दिया.

पुलिस ने टुंडा उर्फ मामा से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया. पुलिस का कहना था कि उस का एक हाथ कटा था. एक हाथ से वह किसी पर हमला नहीं कर सकता. दूसरे पुलिस जब उस के घर फरीदपुर पहुंची तो वह घर पर ही सोता मिला था. अगर वह हत्या जैसे जघन्य अपराध में शामिल होता तो अन्य हमलावरों की तरह वह भी घर से फरार होता. वह आराम से अपने घर में नहीं सो रहा होता.

उधर सुरेंद्र का कहना है कि टुंडा घटना में शामिल था. पुलिस ने जानबूझ कर उसे छोड़ दिया. सच्चाई जो भी हो, इस लोमहर्षक कांड ने यह तो साबित कर दिया है कि लोग खुद को कितना भी आधुनिक कहें, लेकिन अभी उन की सोच नहीं बदली है. अगर फूल सिंह बेटी की पसंद को स्वीकार कर लेता तो उसे इस जघन्य अपराध के आरोप में जेल न जाना पड़ता. कथा लिखे जाने तक कुलदीप अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्र और जनचर्चा पर आधारित

UP Crime: बेटी के प्यार में विलेन बने पापा

UP Crime: उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले का एक थाना है नौहझील. इस थाना क्षेत्र के गांव अड्डा मीना फिरोजपुर निवासी बदन सिंह उर्फ बलवीर सिंह ने 25 जनवरी, 2023 को अपनी 17 वर्षीय बेटी अनन्या को गांव के ही युवक रामगोपाल उर्फ गोपाल द्वारा भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. रिपोर्ट में बदन सिंह ने आरोप लगाया था कि 22 जनवरी को उन की बेटी अनन्या पशुओं के लिए चारा लेने खेत पर गई थी. उन के गांव का ही रहने वाला रामगोपाल उर्फ गोपाल उन की बेटी को वहां से बहलाफुसला कर अपने साथ भगा ले गया.

पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के बाद आरोपी गोपाल को 27 जनवरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. लेकिन अनन्या का कोई पता नहीं चल सका. इस के बाद भी पुलिस उस की तलाश में जुटी रही. अनन्या की तलाश में पुलिस ने हर उस जगह दबिश दी, जहां उस के होने की संभावना थी.

मुखबिर ने दी पुलिस को जानकारी

अनन्या की तलाश में जुटी नौहझील पुलिस को मुखबिर ने सूचना दी कि उस की हत्या की जा चुकी है. अब पुलिस के सामने प्रश्न यह था कि अनन्या 22 जनवरी को अपने प्रेमी के साथ गई थी. 25 जनवरी को रिपोर्ट दर्ज होने के बाद 27 जनवरी को रामगोपाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया तो उस के जेल जाने के बाद अनन्या की हत्या किस ने, कब और कहां की? पुलिस को यह भी शक हो रहा था कि प्रेमी गोपाल के जेल चले जाने से दुखी अनन्या ने कहीं आत्महत्या तो नहीं कर ली?

लेकिन बाद में मुखबिर ने पुलिस को यह भी सूचना दी कि अनन्या की हत्या उस के पापा बदन सिंह और चाचा ने षडयंत्र के तहत मिल कर की है. वे लोग अब अपने घर पर बेफिक्र हो कर बैठे हुए हैं. मुखबिर से मिली सूचना के बाद पुलिस ने अनन्या के पापा बदन सिंह उर्फ बलवीर व चाचा तेजपाल को थाने बुलाया. उन से पूछताछ की गई.

दोनों ने बताया कि वे पलवल में अनन्या के होने की सूचना पर उस की तलाश में गए थे. लेकिन वहां काफी तलाश करने के बाद भी वह नहीं मिली. इस के बाद वह वापस गांव आ गए. अनन्या के बारे में सही जानकारी रामगोपाल ही दे सकता है. पलवल से वापस आने के बाद गांव वालों को भी दोनों भाइयों ने यही बात बताई कि अनन्या का कोई सुराग नहीं मिला.

पलवल जाने के बाद बंद कर दी तलाश

पुलिस को जांच में पता चला कि अनन्या की तलाश में घर वाले पलवल गए जरूर थे, लेकिन इस के बाद उन्होंने उस की तलाश बंद कर दी है. इस जानकारी के मिलने के बाद एसएचओ धर्मेंद्र भाटी ने बलवीर व तेजपाल दोनों की कल डिटेल्स निकलवाई, जिस से हत्या का राज खुल गया. सबूत मिलने के बाद दोनों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. जब पुलिस ने दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो वे अपने गुनाह को ज्यादा देर तक छिपा नहीं सके. दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

दोनों ने बताया कि उन्होंने अनन्या की हत्या कर लाश अलीगढ़ की शिवाला नहर में फेंक दिया था. इस संबंध में पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि अलीगढ़ जिले के थाना गोंडा पुलिस ने 31 जनवरी, 2023 को एक लडक़ी का शव बरामद किया था. पुलिस दोनों को थाना गोंडा ले गई. वहां लाश के फोटो और कपड़ों के आधार पर अनन्या के रूप में कर ली. इस के बाद उन्होंने अनन्या की हत्या किए जाने की बेहद चौंकाने वाली कहानी बताई—

अनन्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसी दौरान उस की मुलाकात रामगोपाल से हुई. उसी के गांव का रहने वाला 22 वर्षीय रामगोपाल उर्फ गोपाल एक निजी टेलीकाम कंपनी में काम करता है. गांव में आतेजाते समय अनन्या और रामगोपाल की नजरें अकसर मिल जातीं. अनन्या मुसकरा कर नजरें झुका लेती. गोपाल को अनन्या की यह अदा भा गई. उस दिन के बाद से दोनों जब तक एकदूसरे को देख नहीं लेते, उन के दिलों को चैन नहीं मिलता था.

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दोनों के बीच हुई दोस्ती

दोनों के बीच मौन प्यार चल रहा था. रामगोपाल को अनन्या ने अपने मौन प्यार के बंधन में पूरी तरह बांध लिया था. आखिर एक दिन जब रास्ते में जाते हुए अनन्या मिली तो मौका देख कर रामगोपाल ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘अनन्या, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करती?’’

“तुम ही कौन सा मुझ से बात करते हो.’’ अनन्या ने जवाब दिया. यह सुन कर गोपाल निरुत्तर हो गया. कुछ पल बाद वह बोला, ‘‘अनन्या, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. क्या मुझ से दोस्ती करोगी?’’

“करूंगी, जरूर करूंगी,’’ कहते हुए वह तेजी से कदम बढ़ाते हुए अपने घर की ओर चली गई. उस दिन के बाद से दोनों चोरीचोरी मिल लेते थे. धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढऩे लगा. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए. अब दोनों घंटों तक एकदूसरे से बतियाते, अपने भविष्य के सुखद सपने संजोते हैं. रामगोपाल और अनन्या जमाने की सोच की परवाह किए बिना अपने प्यार की पींगें बढ़ाने में लगे हुए थे.

कहते हैं प्यार को चाहे लाख छिपाने की कोशिश की जाए, लेकिन वह उजागर हो ही जाता है. गांव के लोगों ने दोनों को एक साथ देख लिया. इस के बाद तो दोनों के घर वालोयं को उन के प्रेमप्रसंग के बारे में पता चल गया. अनन्या के घर वालों ने इस का विरोध किया. लेकिन अनन्या ने अपने घर वालों से साफ कह दिया कि रामगोपाल और वह एकदूसरे को प्यार करतेे हैं. वह उस के साथ शादी करेगी. बेटी की इस बेबाकी पर घर वाले सन्न रह गए. उन्होंने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी.

तब घर वालों ने उस के रामगोपाल से मिलने पर सख्त पाबंदी लगा दी. पर अनन्या इस के बाद भी प्रेमी से फोन पर बातें करती रहती थी. अनन्या दिन और रात में अपने प्रेमी रामगोपाल उर्फ गोपाल से बात करती थी. इस की भनक अनन्या की दादी को लग गई. इस पर घटना से 2 महीने पहले दादी ने अनन्या से उस का फोन छीन लिया था. अनन्या तभी से फोन के लिए घर में झगड़ा करती रहती थी. उस के तेवर बगावती हो गए थे. उस ने अपने मम्मीपापा से साफ कह दिया था कि वह रामगोपाल के साथ ही शादी करेगी अन्यथा अपनी जान दे देगी.

प्रेमी के साथ भाग गई

22 जनवरी, 2023 को जब घर वाले गहरी नींद में सोए हुए थे, अनन्या सुबह के समय घर से अपने प्रेमी रामगोपाल के साथ भाग गई. दोनों ने एक दिन पहले ही भागने की योजना बना ली थी. इस बात का दोनों के घरवालों को पता नहीं चल सका था. अनन्या के घरवालों को बेटी के इस तरह घर से भाग जाना बेहद नागवार गुजरा. अनन्या के चले जाने पर घर वाले परेशान हो गए. अनन्या के प्रेमी के साथ भाग जाने की खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई. समाज में उन का सिर शर्म से झुक गया. उन्होंने अनन्या को काफी तलाशा, इस बीच उन्हें जानकारी मिली कि अनन्या अपने प्रेमी रामगोपाल के साथ पलवल चली गई है.

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एसएचओ धर्मेंद्र भाटी व एसआई मनोज चौधरी ने बताया कि अनन्या गोपाल के साथ ही शादी करने की जिद पर अड़ी थी. जबकि इस के लिए उस के घरवाले राजी नहीं थे. अनन्या के घर से भाग जाने की घटना ने आग में घी का काम किया. उस के पापा बदन सिंह उर्फ बलवीर सिंह का खून खौल उठा, क्योंकि उन का गांव में निकलना मुश्किल हो गया.

अनन्या के गायब होने के बाद जहां पुलिस उसे तलाश रही थी, वहीं घर वाले भी उस की तलाश में जुटे थे. पिता बदन सिंह को जानकारी मिली कि अनन्या हरियाणा के पलवल में मौजूद है. इस जानकारी पर बदन सिंह अपने छोटे भाई तेजपाल सिंह के साथ पलवल जा पहुंचा. दोनों ने अनन्या को ढूंढ लिया. लेकिन वह उन के साथ आने को तैयार नहीं हुई. आखिर गोपाल से शादी कराने की बात पर वह उन के साथ घर आने को तैयार हो गई.

झूठी आन की खातिर पिता बना हत्यारा

अनन्या को उस के पापा व चाचा बाइक पर बैठा कर टप्पल-जट्ïटारी मार्ग से होते हुए अलीगढ़ जिले के थाना खैर क्षेत्र में स्थित शिवाला नहर के पास पहुंचे. यहां दोनों भाइयों ने बाइक रोक ली. सुस्ताने के बहाने वे सब नहर किनारे बैठ गए. वहां पर पिता व चाचा ने अनन्या को एक बार फिर समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह रामगोपाल से शादी की बात पर अड़ी रही.

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फिर लोकलाज और समाज में अपनी इज्जत के डर से बदन सिंह ने अपने भाई तेजपाल की मदद से अनन्या का गला घोंट कर हत्या कर दी और शव नहर में फेंक दिया. नहर के गहरे पानी में वह डूब गई. यानी एक पिता ने ही बेटी की हत्या कर दी. दोनों भाई अनन्या को नहर में फेंक कर अपने गांव लौट आए. गांव में पूछने पर दोनों ने बताया कि उन्हें अनन्या का कोई सुराग नहीं मिला. इसलिए वे वापस आ गए. जबकि हकीकत यह थी कि दोनों ने उस की हत्या कर दी थी.

एसएचओ धर्मेंद्र भाटी के अनुसार, घर वालों ने अनन्या को 22 जनवरी को ही पलवल (हरियाणा) से बरामद कर लिया था. उसी दिन उन्होंने उस की हत्या कर लाश नहर में फेंक दी थी. इस घटना के 3 दिन बाद बदन सिंह ने प्रेमी रामगोपाल के खिलाफ बेटी को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा उसे जेल भिजवा दिया था.

शव 15 किलोमीटर बह कर पहुंचा गोंडा क्षेत्र में

उधर अनन्या की लाश नहर में बहते हुए 15 किलोमीटर दूर अलीगढ़ जिले के थाना गोंडा क्षेत्र में पहुंच गई. नहर में एक युवती का शव मिलने की सूचना पर वहां की पुलिस ने गोताखोरों की मदद से शव को नहर से बाहर निकाला.

चूँकि शव नहर में कहीं से बह कर आया था, इस के चलते उस की पहचान नहीं हो सकी. पुलिस यह पता लगाने में जुट गई कि युवती ने आत्महत्या की है या यह औनर किलिंग का मामला तो नहीं है? थाना गोंडा पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था.

पुलिस ने 72 घंटे इंतजार किया. लेकिन युवती की शिनाख्त नहीं हो सकी. इस पर उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने युवती के फोटो कराने के साथ ही उस के कपड़ों को सुरक्षित रख लिया था. इस के साथ ही आसपास के थानों से संपर्क किया. तब अनन्या की लाश मिलने की बात पुलिस के संज्ञान में आई.

बेटी के प्रेमप्रसंग में विलेन बना बाप

मोहब्बत के दुश्मन बने बलवीर सिंह ने अपनी बेटी अनन्या को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट अनन्या के प्रेमी रामगोपाल के खिलाफ दर्ज कराई थी, वह अब भी इस आरोप में जेल में बंद है. अभी उस की जमानत नहीं हुई है.बेटी के प्रेम प्रसंग में हत्या कर के विलेन बने उस के पापा व चाचा यही सोच रहे थे कि उन की इस साजिश का किसी को पता ही नहीं चलेगा, लेकिन यह उस की भूल थी.

पुलिस ने अनन्या की हत्या की गुत्थी को सुलझा कर पिता बलवीर सिंह व चाचा तेजपाल सिंह को अनन्या की हत्या करने व सबूतों को छिपाने के आरोप में 21 फरवरी, 2023 को गिरफ्तार कर हत्या में प्रयोग की गई बाइक को भी बरामद कर ली. दोनों को न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया गया.

अपराध करने वाला अपने आप को अपराध करते समय चाहे कितना भी होशियार समझे, लेकिन अंत में वह पकड़ा जरूर जाता है. झूठी आन की खातिर एक पिता ही अपनी बेटी का कातिल बन गया और एक प्रेमकहानी का दर्दनांक अंत हो गया. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अनन्या नाम परिवर्तित है.

Love Story: बहन का प्यार – यार बना गद्दार

Love Story: निश्चित जगह पर पहुंच कर अखिलेश उर्फ चंचल को प्रियंका दिखाई नहीं दी तो वह बेचैन हो उठा. उस बेचैनी में वह इधरउधर  टहलने लगा. काफी देर हो गई और प्रियंका नहीं आई तो वह निराश होने लगा. वह घर जाने के बारे में सोच रहा था कि प्रियंका उसे आती दिखाई दे गई. उसे देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. प्रियंका के पास आते ही वह नाराजगी से बोला, ‘‘इतनी देर क्यों कर दी प्रियंका. मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. अच्छा हुआ तुम आ गईं, वरना मैं तो निराश हो कर घर जाने वाला था.

‘‘जब प्यार किया है तो इंतजार करना ही पड़ेगा. मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं कि जब मन हुआ, आ गई. लड़कियों को घर से बाहर निकलने के लिए 50 बहाने बनाने पड़ते हैं.’’ प्रियंका ने तुनक कर कहा.

‘‘कोई बात नहीं, तुम्हारे लिए तो मैं कईकई दिनों तक इंतजार करते हुए बैठा रह सकता हूं. क्योंकि मैं दिल के हाथों मजबूर हूं,’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘प्रियंका, मैं चाहता हूं कि तुम आज कालेज की छुट्टी करो. चलो, हम सिनेमा देखने चलते हैं.’’

प्रियंका तैयार हो गई तो अखिलेश पहले उसे एक रेस्टोरेंट में ले गया. नाश्ता करने के बाद दोनों सिनेमा देखने चले गए.

सिनेमा देखते हुए अखिलेश छेड़छाड़ करने लगा तो प्रियंका ने कहा, ‘‘दिनोंदिन तुम्हारी शरारतें बढ़ती ही जा रही हैं. शादी हो जाने दो, तब देखती हूं तुम कितनी शरारत करते हो.’’

‘‘शादी नहीं हुई, तब तो इस तरह धमका रही हो. शादी के बाद न जाने क्या करोगी. अब तो मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ अखिलेश ने कान पकड़ते हुए कहा.

‘‘अब मुझ से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है. शादी तो मैं तुम्हीं से करूंगी.’’ प्रियंका ने कहा.

‘‘फिर तो मुझे यही गाना पड़ेगा कि ‘शादी कर के फंस गया यार.’’’ अखिलेश ने कहा तो प्रियंका हंसने लगी.

प्रियंका उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के थाना सदर बाजार के मोहल्ला बाड़ूजई प्रथम के रहने वाले चंद्रप्रकाश सक्सेना की बेटी थी. वह ओसीएफ में दरजी थे. उन के परिवार में प्रियंका के अलावा पत्नी सुखदेवी, 2 बेटे संतोष, विपिन तथा एक अन्य बेटी कीर्ति थी. बड़े बेटे संतेष की शादी हो चुकी थी. वह अपनी पत्नी प्रीति के साथ दिल्ली में रहता था.

कीर्ति की भी शादी शाहजहांपुर के ही मोहल्ला तारोवाला बाग के रहने वाले राजीव से हुई थी. वह अपनी ससुराल में आराम से रह रही थी. गै्रजएुशन कर के विपिन ने मोबाइल एसेसरीज की दुकान खोल ली थी. जबकि प्रियंका अभी पढ़ रही थी. प्रियंका घर में सब से छोटी थी, इसलिए पूरे घर की लाडली थी. विपिन तो उसे जान से चाहता था.

प्रियंका बहुत सुंदर तो नहीं थी, लेकिन इतना खराब भी नहीं थी कि कोई उसे देख कर मुंह मोड़ ले. फिर जवानी में तो वैसे भी हर लड़की सुंदर लगने लगती है. इसलिए जवान होने पर साधारण रूपरंग वाली प्रियंका को भी आतेजाते उस के हमउम्र लड़के चाहत भरी नजरों से ताकने लगे थे. उन्हीं में एक था उसी के भाई के साथ मोबाइल एसेसरीज का धंधा करने वाला अखिलेश यादव उर्फ चंचल.

अखिलेश उर्फ चंचल शाहजहांपुर के ही मोहल्ला लालातेली बजरिया के रहने वाले भगवानदीन यादव का बेटा था. भगवानदीन के परिवार में पत्नी सुशीला देवी के अतिरिक्त 3 बेटे मुनीश्वर उर्फ रवि, अखिलेश उर्फ चंचल, नीलू और 2 बेटियां नीलम और कल्पना थीं. अखिलेश उस का दूसरे नंबर का बेटा था. भगवानदीन यादव कभी जिले का काफी चर्चित बदमाश था. उस की और उस के साथी रामकुमार की शहर में तूती बोलती थी.

रामकुमार की हत्या कर दी गई तो अकेला पड़ जाने की वजह से भगवानदीन ने बदमाशी से तौबा कर लिया और अपने परिवार के साथ शांति से रहने लगा. लेकिन सन 2002 में उस के सब से छोटे बेटे नीलू की बीमारी से मौत हुई तो वह इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर सका और कुछ दिनों बाद उस की भी हार्टअटैक से मौत हो गई.

बड़ी बेटी नीलम का विवाह हो चुका था. पिता की मौत के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी बड़े बेटे रवि ने संभाल ली थी. वह ठेकेदारी करने लगा था. हाईस्कूल पास कर के अखिलेश ने भी पढ़ाई छोड़ दी और मोबाइल एसेसरीज का धंधा कर लिया. एक ही व्यवसाय से जुड़े होने की वजह से कभी विपिन और अखिलेश की बाजार में मुलाकात हुई तो दोनों में दोस्ती हो गई थी.

दोस्ती होने के बाद कभी अखिलेश विपिन के घर आया तो उस की बहन प्रियंका को देख कर उस पर उस का दिल आ गया. फिर तो वह प्रियंका को देखने के चक्कर में अकसर उस के घर आने लगा. कहने को वह आता तो था विपिन से मिलने, लेकिन वह तभी उस के घर आता था, जब वह घर में नहीं होता था. ऐसे में भाई का दोस्त होने की वजह से उस की सेवासत्कार प्रियंका को करनी पड़ती थी. उसी बीच वह प्रियंका के नजदीक आने की कोशिश करता.

उस के लगातार आने की वजह से विपिन से उस की दोस्ती गहरी हो ही गई, प्रियंका से भी उस की नजदीकी बढ़ गई. इस के बाद विपिन और अखिलेश ने मिल कर मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली एक नामी कंपनी की एजेंसी ले ली तो उन का कारोबार भी बढ़ गया और याराना भी. इस से उन का एकदूसरे के घर आनाजान ही नहीं हो गया, बल्कि अब साथसाथ खानापीना भी होने लगा था.

अब अखिलेश को प्रियंका के साथ समय बिताने का समय ज्यादा से ज्यादा मिलने लगा था. उस ने इस का फायदा उठाया. उसे अपने आकर्षण में ही नहीं बांध लिया, बल्कि उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. वह विपिन की अनुपस्थिति का पूरा फायदा उठाने लगा. विपिन के चले जाने के बाद केवल मां ही घर पर रहती थी. वह घर के कामों में व्यस्त रहती थी. फिर उसे बेटी पर ही नहीं, बेटे के दोस्त पर भी विश्वास था, इसलिए उस ने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वे दोनों क्या कर रहे हैं.

प्रियंका अपने भाई और परिवार को धोखा दे रही थी तो अखिलेश अपने दोस्त के साथ विश्वासघात कर रहा था. वह भी ऐसा दोस्त, जो उस पर आंख मूंद कर विश्वास करता था. उसे भाई से बढ़ कर मानता था. प्रियंका और अखिलेश क्या कर रहे हैं, किसी को कानोकान खबर नहीं थी. जबकि जो कुछ भी हो रहा था, वह सब घर में ही सब की नाक के नीचे हो रहा था.

संतोष की पत्नी प्रीति को बच्चा होने वाला था, इसलिए संतोष ने प्रीति को शाहजहांपुर भेज दिया. डिलीवरी की तारीख नजदीक आ गई तो उसे जिला अस्पताल में भरती करा दिया गया. प्रीति के अस्पताल में भरती होने की वजह से विपिन और उस की मां का ज्यादा समय अस्पताल में बीतता था.

छुट्टी न मिल पाने की वजह से संतोष नहीं आ सका था. उस स्थिति में प्रियंका को घर में अकेली रहना पड़ रहा था. विपिन को अखिलेश पर पूरा विश्वास था, इसलिए प्रियंका और घर की जिम्मेदारी उस ने उस पर सौंप दी थी. अखिलेश और प्रियंका को इस से मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. जब तक प्रीति अस्पताल में रही, दोनों दिनरात एकदूसरे की बांहों में डूबे रहे.

26 फरवरी, 2014 को प्रीति को जिला अस्पताल में बेटा पैदा हुआ था. खुशी के इस मौके पर अखिलेश ने 315 बोर के 2 तमंचे और 10 कारतूस ला कर विपिन को दिए थे. भतीजा पैदा होने पर दोनों ने उन तमंचों से एकएक फायर भी किए थे. बाकी 8 कारतूस और दोनों तमंचे अखिलेश ने विपिन से यह कह कर उस के घर रखवा दिए थे कि भतीजे के नामकरण संस्कार पर काम आएंगे. विपिन ने दोनों तमंचे और कारतूस अपने कमरे में बैड पर गद्दे के नीचे छिपा कर रख दिए थे.

विपिन पुलिस में भरती होना चाहता था, इसलिए रोजाना सुबह 5 बजे उठ कर जिम जाता था. वहां से वह 9 बजे के आसपास लौटता था. कभीकभी उसे देर भी हो जाती थी. 23 मार्च को विपिन 9 बजे के आसपास घर लौटा तो मां नीचे बरामदे में बैठी आराम कर रही थीं. भाभी प्रीति बच्चे के साथ सामने वाले कमरे में लेटी थी. उस ने कपड़े बदले और ऊपरी मंजिल पर बने अपने कमरे में सोने के लिए चला गया.

विपिन ने दरवाजे को धक्का दिया तो पता चला वह अंदर से बंद है. इस का मतलब अंदर कोई था. उस ने आवाज दी, लेकिन अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उस ने पूरी ताकत से दरवाजे पर लात मारी तो अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर अखिलेश और प्रियंका खड़े थे. दोनों की हालत देख कर विपिन को समझते देर नहीं लगी कि अंदर क्या कर रहे थे. उन के कपड़े अस्तव्यस्त थे और वे काफी घबराए हुए थे.

विपिन के कमरे में घुसते ही प्रियंका निकल कर नीचे की ओर भागी. विपिन का खून खौल उठा था. उस ने गुस्से में अखिलेश को एक जोरदार थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘तुझे मैं दोस्त नहीं, भाई मानता था. मैं तुझ पर कितना विश्वास करता था और तूने क्या किया? जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया.’’

‘‘भाई, मैं प्रियंका से सच्चा प्यार करता हूं और उसी से शादी करूंगा.’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘वह मुझ से शादी को तैयार है.’’

‘‘तुम दोनों को पता था कि हमारी जाति एक नहीं है तो यह कैसे सोच लिया कि तुम्हारी शादी हो जाएगी?’’ विपिन गुस्से से बोला, ‘‘तुम ने जो किया, ठीक नहीं किया. मेरी इज्जत पर तुम ने जो हाथ डाला है, उस की सजा तो तुम्हें भोगनी ही होगी.’’

अखिलेश को लगा कि उसे जान का खतरा है तो उस ने जेब से 315 बोर का तमंचा निकाल लिया. वह गोली चलाता, उस के पहले ही विपिन ने उस के हाथ पर इतने जोर से झटका मारा कि तमंचा छूट कर जमीन पर गिर गया. अखिलेश ने तमंचा उठाना चाहा, लेकिन विपिन ने फर्श पर पड़े तमंचे को अपने पैर से दबा लिया.

अखिलेश कुछ कर पाता, विपिन ने बैड पर गद्दे के नीचे रखे दोनों तमंचे और आठों कारतूस निकाल कर उस में से एक तमंचा जेब में डाल लिया और दूसरे में गोली भर कर अखिलेश पर चला दिया. गोली अखिलेश के सीने में लगी. वह जमीन पर गिर गया तो विपिन ने एक गोली उस के बाएं हाथ और एक पेट में मारी. 3 गोलियां लगने से अखिलेश की तुरंत मौत हो गई.

अखिलेश का खेल खत्म कर विपिन नीचे आ गया. प्रियंका बरामदे में दुबकी खड़ी थी. उस के पास जा कर उस ने पूछा, ‘‘मैं ने सही किया या गलत?’’

प्रियंका ने जैसे ही कहा, ‘‘गलत किया.’’ विपिन ने उस की कनपटी पर तमंचे की नाल रख कर ट्रिगर दबा दिया. प्रियंका कटे पेड़ की तरह फर्श पर गिर पड़ी. इस के बाद उस ने एक गोली और चलाई, जो प्रियंका के सीने में बाईं ओर लगी. प्रियंका की भी मौत हो गई. प्रियंका को खून से लथपथ देख कर उस की मां और भाभी बेहोश हो गईं.

अखिलेश और प्रियंका की हत्या कर विपिन घर से बाहर निकला तो सामने पड़ोसी सचिन पड़ गया. सचिन से उस की पुरानी खुन्नस थी. उस ने उस की ओर तमंचा तान दिया. विपिन का इरादा भांप कर सचिन अपने घर के अंदर भागा. विपिन भी पीछेपीछे उस के घर में घुस गया. सचिन कहीं छिपता, विपिन ने उस पर भी गोली चला दी. गोली उस की कमर में लगी, जिस से वह भी फर्श पर गिर पड़ा.

सचिन के घर से निकल कर विपिन अपने एक अन्य दुश्मन सतीश के घर में घुस कर 2 गोलियां चलाईं. लेकिन ये गोलियां किसी को लगी नहीं. अब तक शोर और गोलियों के चलने की आवाज सुन कर आसपड़ोस वाले इकट्ठा हो गए थे. लेकिन विपिन के हाथ में तमंचा देख कर कोई उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सका. इसलिए विपिन एआरटीओ वाली गली में घुस कर आराम से फरार हो गया.

किसी ने कोतवाली सदर बाजार पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी थी. चंद मिनटों में ही कोतवाली इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. इस के बाद उन की सूचना पर पुलिस अधीक्षक राकेशचंद्र साहू, अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) ए.पी. सिंह, फोरेंसिक टीम और डाग स्क्वायड की टीम भी वहां आ गई थी.

पुलिस तो आ गई, लेकिन अपनी नौकरी पर गए चंद्रप्रकाश को किसी ने इस बात की सूचना नहीं दी. काफी देर बाद सूचना पा कर वह घर आए तो बेटी की लाश देख कर बेहोश हो गए. एक ओर बेटी की लाश पड़ी थी तो दूसरी ओर उस की और उस के प्रेमी की हत्या के आरोप में बेटा फरार था.

सचिन की हालत गंभीर थी. इसलिए पुलिस ने उसे तुरंत सरकारी अस्पताल भिजवाया. उस की हालत को देखते हुए सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने उसे कनौजिया ट्रामा सेंटर ले जाने को कहा. लेकिन वहां भी उस की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. तब उसे वसीम अस्पताल ले जाया गया. डा. वसीम ने उस का औपरेशन कर के फेफड़े के पार झिल्ली में फंसी गोली निकाली. इस के बाद उस की हालत में कुछ सुधार हुआ.

फोरेंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य उठा लिए. डाग स्क्वायड टीम ने खोजी कुतिया लूसी को छोड़ा. वह विपिन के घर से निकल कर सतीश के घर तक गई, जहां विपिन ने 2 गोलियां चलाई थीं. घटनास्थल के निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों को समझते देर नहीं लगी कि मामला अवैध संबंधों में हत्या का यानी औनर किलिंग का है.

पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज ने अखिलेश के बड़े भाई मुनीश्वर यादव की ओर से विपिन सक्सेना के खिलाफ अखिलेश और प्रियंका की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद विपिन की तलाश शुरू हुई.

26 मार्च की सुबह पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर विपिन को पुवायां रोड पर चिनौर से पहले हाइड्रिल पुलिया के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस समय वह अपने चचेरे भइयों सुशील और लल्ला के पास चिनौर जा रहा था. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पूछताछ में विपिन ने पुलिस को बताया कि जिस यार को मैं भाई की तरह मानता था, उस ने मेरी इज्जत पर हाथ डाला तो मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं ने उस का खून कर दिया. घटना को अंजाम देने के बाद वह एआरटीओ वाली गली के पास से निकल रहे नाले में अखिलेश से छीना तमंचा और अपनी खून से सनी टीशर्ट निकाल कर फेंक दी थी.

खाली बनियान और जींस पहने हुए वह एआरटीओ गली से रोडवेड बसस्टैंड पहुंचा. यहां से उस ने निगोही जाने के लिए सौ रुपए में एक आटो किया. निगोही जाते समय रास्ते में उस ने दूसरा तमंचा फेंक दिया. निगोही से वह प्राइवेट बस से बरेली पहुंचा. बरेली में उस ने नई टीशर्ट खरीद कर पहनी. पूरे दिन वह इधरउधर घूमता रहा. रात को उस ने बरेली रेलवे स्टेशन से दिल्ली जाने के लिए टे्रन पकड़ ली.

दिल्ली में विपिन बड़े भाई संतोष के यहां गया. उसे उस ने पूरी बात बताई. संतोष को पता चल गया कि प्रियंका मर चुकी है, फिर भी वह उस के अंतिम संस्कार में शाहजहांपुर नहीं गया. संतोष को जब पता चला कि पुलिस विपिन की गिरफ्तारी के लिए घर वालों तथा रिश्तेदारों को परेशान कर रही है तो उस ने उसे घर भेज दिया.

26 मार्च को विपिन अपने चचेरे भाइयों के पास चिनौर जा रहा था, तभी पुलिस ने मुखबिरों से मिली सूचना पर गिरफ्तार कर लिया था. उस समय भी उस के पास एक तमंचा था.

पूछताछ में विपिन ने बताया था कि उस के पास कारतूस नहीं बचे थे. अगर कारतूस बचा होता तो वह खुद को भी गोली मार लेता. कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के पुलिस ने विपिन को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Superstition: अल्लाह के नाम पर बेटी की कुर्बानी

Superstition: रमजान का पवित्र महीना चल रहा था. मसजिद से सुबह की अजान हुई तो शबाना की आंखें खुल गईं. वह फटाफट सेहरी के लिए उठी तो देखा कि उस की 4 साल की बेटी रिजवाना बिस्तर पर नहीं थी. वहां केवल छोटी बेटी ही दिखी. शबाना ने सोचा कि रिजवाना को शायद टौयलेट आया होगा तो वह नीचे चली गई होगी. उस ने रिजवाना को आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. इस पर शबाना सोचने लगी कि रिजवाना कहां गई होगी. मेरे पास ही तो सो रही थी. शबाना अपनी बेटी को तलाश करने लगी. यह 8 जून, 2018 के तड़के की बात है.

राजस्थान में जोधपुर जिले के पीपाड़ शहर में सिलावटों का मोहल्ला है. इस मोहल्ले में नवाब अली अपने मामा मोहम्मद साजिद के घर में उन के साथ ही ऊपरी मंजिल पर रहता था. नवाब अली और मोहम्मद साजिद मिल कर मीट की दुकान चलाते थे. नवाब अली मूलरूप से पिचियाक गांव का रहने वाला था. वह अपनी बीवी शबाना और 4 साल की बेटी रिजवाना तथा एक छोटी बेटी के साथ मामा के मकान में रहता था.

जून महीने में राजस्थान में भीषण गरमी पड़ती है इसलिए नवाब अली अपनी बीवी और दोनों बेटियों के साथ छत पर सोया हुआ था. शबाना को जब बेटी रिजवाना नहीं मिली तो वह उसे देखने नीचे की मंजिल पर बने कमरे में गई. कमरे का दृश्य देख कर शबाना की आंखें फटी रह गईं. वहां उस की मासूम रिजवाना खून में सनी पड़ी थी. उस के गले से खून बह रहा था. बेटी को रक्तरंजित हालत में देख कर शबाना रोने लगी. उस ने नब्ज देख कर बेटी के जिंदा होने का अनुमान लगाने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला.

वह रोती हुई तेजी से सीढि़यां चढ़ कर छत पर पहुंची और वहां सो रहे पति नवाब अली को जगा कर नीचे वाले कमरे में खून से लथपथ पड़ी बेटी रिजवाना के बारे में बताया. इस पर नवाब अपनी बीवी के साथ नीचे वाले कमरे में आया और वहां खून फैला देख कर बीवी से कहा कि लगता है इस पर बिल्ली ने हमला किया है, इस से उस का गला कट गया है.

शबाना की चीखपुकार सुन कर नवाब अली के मामा मोहम्मद साजिद के परिवार वाले भी जाग गए. शबाना पति के साथ खून से लथपथ बेटी को अस्पताल ले गई. अस्पताल में डाक्टरों ने चैकअप के बाद बच्ची को मृत घोषित कर दिया. नवाब अली ने बच्ची पर बिल्ली के हमले की बात कह कर अस्पताल में डाक्टरों को संतुष्ट कर दिया और बेटी का शव घर ले आया.

तब तक सूरज का उजाला नजर आने लगा था. नवाब की मासूम बेटी की मौत होने का पता चलने पर मोहल्ले के लोग भी एकत्र हो गए. नवाब ने मोहल्ले वालों को भी बेटी पर बिल्ली के हमले की बात बताई, लेकिन यह बात लोगों के गले नहीं उतरी. इस बीच किसी आदमी ने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस मौके पर पहुंच गई.

पुलिस ने जब बच्ची की लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर कहीं भी बिल्ली के पंजों के निशान नहीं दिखे. गला भी किसी धारदार हथियार से काटा हुआ दिख रहा था, इसलिए पुलिस को शक हो गया कि यह हत्या का मामला है. पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी.

पुलिस ने बच्ची की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए जोधपुर से विधिविज्ञान प्रयोगशाला की टीम को मौके पर बुलाया, लेकिन इन से भी पुलिस को कोई ऐसे सबूत नहीं मिले, जिस से हत्यारे तक पहुंचा जा सके. पुलिस ने डाक्टरों के पैनल से बच्ची के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया.

पुलिस इस बात से भी आश्चर्यचकित थी कि जब कमरे में बच्ची के मातापिता सो रहे थे तो फिर गला रेतने के समय उन्हें रिजवाना के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनाई क्यों नहीं पड़ी. मां के पास सो रही रिजवाना नीचे वाले कमरे में कैसे पहुंची. पुलिस को इस बात के भी कोई सबूत नहीं मिले कि हत्यारा बाहर से आया था, क्योंकि घर के दरवाजे बंद थे.

मासूम बच्ची की हत्या से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. शबाना की तरफ से पुलिस ने अज्ञात आदमी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. जोधपुर एसपी (ग्रामीण) राजन दुष्यंत राजन, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) खींवसिंह भाटी और पुलिस उपाधीक्षक सेठाराम बंजारा ने भी मौके पर पहुंच कर जांचपड़ताल की.

एसपी राजन दुष्यंत ने मौकामुआयने के बाद थाने में पुलिस अधिकारियों के साथ इस मामले पर चर्चा की. उन्हें लगा कि रिजवाना की हत्या में परिवार के ही किसी सदस्य का हाथ रहा होगा. परिवार वालों ने जब रिजवाना का शव दफना दिया तो पुलिस नवाब अली और उस के मामा मोहम्मद साजिद को पूछताछ के लिए थाने ले आई. दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई. पूछताछ में नवाब अली ने अपनी बेटी रिजवाना की हत्या की जो लोमहर्षक कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस अफसर भी स्तब्ध रह गए.

नवाब अली कुरैशी ने पुलिस को बताया कि रमजान के महीने में अल्लाह को खुश करने के लिए वह अपनी सब से प्यारी चीज की कुरबानी देना चाहता था. वह बेटी रिजवाना को बहुत प्यार करता था, इसलिए उसे ही कुरबान कर दिया. नवाब जिस छुरी से बकरे काटता था, उसी से उस ने अपनी बेटी को हलाल कर दिया.

26 साल के नवाब ने पुलिस को बताया कि मैं नमाजी हूं. बेटी को कुरबान कर के अल्लाह को खुश करना चाहता था. वह कई दिनों से अपने ननिहाल में थी. मैं ने रिजवाना को ननिहाल से बुलवा लिया. 7 जून को उसे बाजार ले गया और शहर में घुमायाफिराया. उसे मिठाई, फ्रूट, चौकलेट आदि खिलाए और उस की पसंद की चीजें दिलवाईं. उस के बाद मैं घर आ गया. रात को रिजवाना अपनी मां शबाना के साथ छत पर सोई थी, मैं भी पास में ही सोया था.

आधी रात बाद मैं रिजवाना को चुपके से उठा कर नीचे के कमरे में ले गया. वहां उसे कलमा सुनाया. फिर अपनी गोद में बिठा कर बकरा काटने वाली छुरी से धीरेधीरे उस का गला रेत दिया. बेटी को हलाल करने से मेरी पैंट खून से सन गई तो मैं ने कपड़े बदले. फिर छुरी और खून से सने कपड़े छिपा कर रख दिए और वापस छत पर आ कर सो गया. मुझे नींद नहीं आ रही थी, पर मैं सोने का नाटक कर रहा था. बाद में जब शबाना मुझे बेटी की लाश के पास ले गई तो मैं ने बेटी पर बिल्ली के हमले की बात कह कर मामले को दूसरा रूप देने की कोशिश की लेकिन बाद में पुलिस आ गई और मेरी मंशा पूरी नहीं हो सकी.

पुलिस ने बेटी की हत्या के आरोप में नवाब अली कुरैशी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया और वहां से उसे जेल भेज दिया गया. दूसरी ओर इसलाम से जुड़े लोगों ने आरोपी के बयान और कृत्य को धर्मविरोधी बताया. इन का कहना था कि इसलाम में इंसान का कत्ल हराम है. यह कृत्य सरासर धर्म के खिलाफ है. Superstition

Heart Touching Story: मां को बनाया आया

Heart Touching Story: बच्चे का जन्म उस बच्चे के मांबाप के लिए एक सुंदर सपना सच होने जैसा होता है. बच्चे के जन्म लेते ही मां की ढेरों आशाएं उस से जुड़ जाती हैं. बच्चे में मां को अपना भविष्य सुरक्षित नजर आने लगता है. मां की उम्मीद बंध जाती है कि बच्चा जब बड़ा होगा तो उस के जीने का सहारा बनेगा. उसे अच्छी जिंदगी देगा. अपने इस सपने को साकार करने के लिए मांबाप जब अपने छोटे से फूल जैसे बच्चे को पढ़ालिखा कर बड़ा करते हैं और समाज में सम्मान से जीने की राह दिखाते हैं. खासतौर पर अगर जन्म लड़के का हो तो मांबाप कुछ ज्यादा ही आशान्वित हो जाते हैं.

बच्चा बड़ा हो कर जब कमाने लगता है और उस का मांबाप को संभालने का वक्त आता है, उस वक्त वह अपने स्वार्थ और बढ़ती इच्छाओं के चलते शादी कर के अपनी दुनिया अलग बसा लेता है. उसे अपनी मां फांस की तरह चुभने लगती है. लेकिन जब उस का खुद का परिवार बनना शुरू होता है और उस के अपने बच्चे को संभालने की बारी आती है तो वही अपनी मां उस को याद आने लगती है. उस के हिसाब से मां से अच्छा बच्चे को भला कौन संभाल सकता है और आया को भारी रकम देने का खर्चा भी बच जाएगा. इस तरह बच्चे अपने स्वार्थ के लिए अपनी ही मां को घर की आया बनाने से नहीं चूकते.

बच्चे संभालने के लिए साथ रखा

खासतौर पर उन मांओं को यह तकलीफ ज्यादा सहन करनी पड़ती है जो तलाकशुदा या विधवा का जीवन जी रही हों. वह मां जिस को बुढ़ापे में आराम की जरूरत होती है उस को बच्चे की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है क्योंकि पतिपत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं.

ऐसे ही हालात की मारी 60 वर्षीय प्रेमा कुलकर्णी एक विधवा हैं. प्रेमा के पति की ऐक्सिडैंट में मौत हो गई और चूंकि वे पढ़ीलिखी नहीं थीं इसलिए उन्होंने घरघर काम कर के अपने बच्चे को पढ़ायालिखाया इस उम्मीद से कि उन का बेटा उन को बड़ा हो कर संभालेगा और उन को बुढ़ापे में काम नहीं करना पड़ेगा लेकिन इस के ठीक विपरीत प्रेमा बताती हैं,

‘‘मेरे बेटे ने कमाई शुरू करते ही शराब पीनी शुरू कर दी. और चूंकि हम लोग गरीब हैं, झोंपड़पट्टी में रहते हैं इसलिए वहां पर कुछ गलत लड़कों की संगत में उस ने जुआ खेलना भी शुरू कर दिया. ‘‘उस के बाद उस की एक लड़की से दोस्ती हुई जोकि उस के औफिस में ही काम करती थी, उस से उस ने शादी कर ली. जब मेरे बेटे की शादी हुई तो मुझे लगा घर में बहू आएगी तो शायद मेरा बेटा सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

‘‘मेरा बेटा और बहू दोनों काम पर चले जाते थे और मुझे घर का पूरा काम करने को बोलते थे जबकि मैं इतनी उम्र में 5 घरों का काम पहले से कर रही थी. जब मैं ने इस बात पर एतराज किया तो वे दोनों मेरा घर छोड़ कर अलग हो गए. 1 साल तक मैं अकेली रही. जब उस को बच्चा हुआ तो वे दोनों मेरे पास आए और अपने साथ ही रहने को कहा.

‘‘मैं भी अकेली घर में रहरह कर तंग हो गई थी इसलिए बेटे के पास चली गई लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि उन्होंने मुझे अपना बच्चा संभालने के लिए घर में रखा है. बुढ़ापे में मुझे छोटे से बच्चे को संभालने में तकलीफ होती थी. साथ ही मुझे भरपेट खाना भी नहीं मिलता था. मेरी बहू फ्रिज में ताला लगा कर जाती थी ताकि मैं फ्रिज में से कुछ ले कर खा न सकूं. जब इस बात को ले कर मैं ने बहू से झगड़ा किया तो वह और बेटा दोनों मुझ से झगड़ा करने लगे. आखिर तंग आ कर मैं वापस अपनी झोंपड़ी में चली आई और घरघर काम कर के ही अपना पेट पाल रही हूं.’’

मजबूरी भी कारण

प्रेमा की तरह ही एक और भारतीय नारी हैं जो अपने पति की सेवा और बच्चों का पालनपोषण ही अपना धर्म समझती हैं. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी कार्य में लगा दी. उन का नाम है वीणा मिश्रा.

65 वर्षीय वीणा के 3 बच्चे हैं, 1 लड़का और 2 लड़कियां वीणा अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि बेटियों की तो उन्होंने पढ़ालिखा कर शादी कर दी और बेटे को इंजीनियरिंग करवाई. चूंकि बेटा पढ़ाई में होशियार था इसलिए उस ने पढ़लिख कर अच्छी नौकरी पा ली और उसी नौकरी के तहत उस को अमेरिका में ट्रांसफर मिल गया. हम अपने बेटे की तरक्की से बहुत खुश थे और हमारा बेटा हमारा अच्छे से खयाल भी रख रहा था. वीणा आगे बताती हैं कि वह जब पूरी तरह सैटल हो गया तो हम ने हिंदुस्तान की ही एक लड़की से उस की शादी करवा दी.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. उस का इरादा कुछ सालों में इंडिया में ही बसने का था. लेकिन शादी के बाद वह एकदम से बदल गया. वहां पर ही वह रचबस गया. उस के 2 बच्चे भी हो गए. वह हमें लगातार नियमित तौर पर पैसे भी भेजता था. लेकिन क्योंकि उस की पत्नी भी नौकरी करती है इसलिए घर में बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं था. वहां पर (अमेरिका में) पहले तो नौकरानी मिलती नहीं है और अगर मिलती भी है तो उस की तनख्वाह ही 60 हजार रुपए से ऊपर होती है.

वीणा कहती हैं कि बेटे ने कहा कि वे वहीं उन के साथ अमेरिका में रहें ताकि उस के बच्चों को कोई संभालने वाला मिल जाए. मेरे पति और मुझे दोनों को इंडिया से बहुत प्यार है, हमारा पूरा जीवन यहीं गुजरा है इसलिए हम ने अमेरिका आने से मना कर दिया. नतीजा यह हुआ कि उस ने हमें खर्चे के पैसे भेजने बंद कर दिए. आखिर में थकहार कर हमें अमेरिका जाना ही पड़ा.

वीणा और प्रेमा की तरह कितनी ही बेबस बूढ़ी और लाचार मांएं हैं जो अपने बच्चों के घर में ही नौकरानी जैसी बन गई हैं. अगर वे इस के खिलाफ जाती हैं तो उन को अपने बुढ़ापे का सहारा खोना पड़ता है. इसलिए वे नौकरानी बनना कुबूल कर लेती हैं या फिर उन्हीं के साथ रहने का फैसला करती हैं. Heart Touching Story

Agra News: मिटा दिया साया – पिता बने भविष्य पर बोझ

Agra News: रात लगभग 2 बजे सुनील कुमार के घर में कोहराम मच गया. बरामदे में सुनील कुमार की लहूलुहान लाश पड़ी थी. लाश के पास में ही उस की पत्नी आशा देवी बैठी रो रही थी. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए. बेटे अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया कि रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था. अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचा. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया.

पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

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44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज और 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया.

पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था.

हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस थाने ले लाई. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वह वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी सुनील पर कोई असर नहीं हुआ.

इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी. संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली.

अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वह उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं. यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा.

सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए. उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया.

पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime: जेल से बड़ा जुर्म – परिवार ही बना शिकार

UP Crime: 52 साल के सत्यपाल शर्मा को गांव में हर कोई जानता था. वे उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के गांव सिंघावली अहीर के रहने वाले थे और नजदीक के ही एक गांव खिंदौड़ा में बने आदर्श प्राइमरी स्कूल में हैडमास्टर थे. गांव में उन की खेतीबारी भी थी. उन के परिवार में पत्नी उर्मिला के अलावा एक बेटा सोनू व एक बेटी सीमा थी.

23 अप्रैल, 2016 की सुबह सत्यपाल शर्मा रोजाना की तरह मोटरसाइकिल से स्कूल गए थे. सुबह के तकरीबन पौने 10 बजे थे. लंच ब्रेक का समय था. सत्यपाल शर्मा स्कूल के बरामदे में कुरसी डाल कर बैठे हुए थे, तभी एक मोटरसाइकिल पर सवार 3 नौजवान स्कूल परिसर में आ कर रुके. उन में से एक नौजवान मोटरसाइकिल के पास ही खड़ा रहा, जबकि 2 नौजवान पैदल चल कर सत्यपाल शर्मा के नजदीक पहुंच गए.

उन्होंने नमस्कार किया, तो सत्यपाल शर्मा ने पूछा, ‘‘कहिए?’’

उन में से एक नौजवान ने पूछा, ‘‘क्या आप ही मास्टर सत्यपाल हैं?’’

‘‘जी हां, मैं ही हूं. आप लोग कहां से आए हैं?’’

‘‘हम तो नजदीक के गांव से ही आए हैं मास्टरजी.’’

सत्यपाल शर्मा ने उन्हें बैठने का इशारा किया, तो वे पास रखी कुरसियों पर बैठ गए. इस बीच तीसरा नौजवान भी टहलता हुआ वहां आ गया.

सत्यपाल शर्मा उन नौजवानों को पहचानते नहीं थे. वे कुछ जानसमझ पाते कि उस से पहले ही कुरसी पर बैठे दोनों नौजवान बिजली की सी फुरती से खड़े हुए और उन्होंने अपने हाथों में तमंचे निकाल लिए. सत्यपाल शर्मा सकते में आ गए. पलक झपकते ही एक नौजवान ने उन्हें निशाना बना कर गोली दाग दी. गोली उन के पेट में लगी और खून का फव्वारा छूट गया.

सत्यपाल शर्मा समझ गए थे कि वे नौजवान उन के खून के प्यासे हैं. वे जान बचाने के लिए चिल्लाते हुए परिसर में तेजी से भागे, लेकिन तकरीबन 50 मीटर ही भाग पाए थे कि बदमाशों ने उन पर 2 और फायर झोंक दिए. इस से वे लहूलुहान हो कर जमीन पर गिर पड़े. गोलियां चलने से स्कूल के टीचरों व बच्चों में चीखपुकार और भगदड़ मच गई. स्कूल चूंकि गांव के बीच में था, इसलिए आसपास के गांव वाले भी इकट्ठा होना शुरू हो गए.

यह देख कर गोली मारने वाले बदमाशों के पैर उखड़ गए. घिरने का खतरा देख कर मोटरसाइकिल वाला बदमाश अकेला ही भाग गया, जबकि एक बदमाश दीवार कूद कर खेतों की तरफ और तीसरा बदमाश गांव के रास्ते की तरफ भाग निकला. जो बदमाश गांव की तरफ भागा था, गांव वालों ने उस का पीछा कर कुछ ही दूर जा कर उसे पकड़ लिया था. गांव वालों ने पीटपीट कर उसे लहूलुहान कर दिया. उधर बदमाशों की गोली से घायल सत्यपाल शर्मा की मौके पर ही मौत हो गई.

इस सनसनीखेज वारदात की सूचना पा कर थाना सिंघावली अहीर के थाना प्रभारी सुभाष यादव अपने दलबल के साथ मौके पर पहुंच गए. हत्या की इस वारदात से गांव वालों में भारी गुस्सा था. लिहाजा, एसपी रवि शंकर छवि, कलक्टर हृदय शंकर तिवारी, एएसपी अजीजुलहक, सीओ कर्मवीर सिंह व दूसरे थानों का पुलिस बल भी वहां आ पहुंचा. पुलिस को मौके से एक तमंचा व खाली कारतूस बरामद हुए.

उधर सत्यपाल शर्मा की मौत की खबर से उन के परिवार में कुहराम मच गया था. उन की पत्नी उर्मिला व बेटा सोनू भी वहां आ पहुंचे थे. थाना पुलिस को गांव वालों के आरोपों के साथ विरोध का सामना करना पड़ रहा था. इस विरोध की भी वजह थी. लोगों का आरोप था कि कुछ दिनों पहले कुछ बदमाशों ने सत्यपाल शर्मा पर उन के घर पर हमला किया था. उन्होंने इस की शिकायत थाने में की थी और जान का खतरा बता कर सिक्योरिटी की मांग की थी, लेकिन थाना प्रभारी सुभाष यादव ने इस मामले में घोर लापरवाही दिखाते हुए नजरअंदाज कर दिया था.

पूछताछ में पुलिस को पता चला कि सत्यपाल शर्मा की जमीन को ले कर अपने ही परिवार के लोगों से रंजिश चली आ रही थी. इस रंजिश का शिकार हुए अपने बेटे सतीश के लिए सत्यपाल शर्मा इंसाफ की जंग लड़ रहे थे, इसीलिए उन की भी हत्या कर दी गई थी. गांव वालों का गुस्सा पकड़े गए बदमाश पर उतर रहा था. वह अधमरी हालत में पहुंच गया था. पुलिस ने उस से पूछताछ की, तो उस ने अपना नाम सोनू बताया, जबकि अपने साथियों के नाम गौरव व रोहित बताए.

सोनू गांव निरपुड़ा का रहने वाला था, जबकि गौरव उस का चचेरा भाई था और रोहित शेरपुर लुहारा गांव का रहने वाला था. पुलिस सोनू को अस्पताल में दाखिल कराती, उस से पहले ही उस की मौत हो गई. पुलिस ने सत्यपाल शर्मा व बदमाश सोनू की लाशों का पंचनामा कर के पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इस मामले में पुलिस ने सत्यपाल शर्मा के बेटे सोनू की तरफ से मारे गए व भागे बदमाशों के साथ ही विरोधी पक्ष के राजकरण, उस के भाई रामकिशन व आनंद, राजकरण के 2 बेटों पंकज पाराशर, दीपक, आनंद के बेटों मोहित, रोहित, बेटी पूजा, आनंद की पत्नी बबली, राजकरण की पत्नी कौशल्या, राजकरण के बेटे ईशान व रामकिशन के बेटे महेश के खिलाफ धारा 302 व 120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया.

मामला बेहद गंभीर था. एसपी रवि शंकर छवि ने थाना प्रभारी सुभाष यादव को तत्काल प्रभाव से सस्पैंड कर दिया और थाने का प्रभार चंद्रकांत पांडेय को सौंप दिया. उन्होंने आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश देने के साथ ही हत्या की साजिश का खुलासा करने के निर्देश भी दिए. पुलिस ने सत्यपाल शर्मा की पत्नी उर्मिला व बेटे सोनू के साथसाथ गांव वालों से भी पूछताछ की. मामला सीधेतौर पर रंजिश का था.

दरअसल, सत्यपाल शर्मा की राजकरण व आनंद से जमीन की डोलबंदी को ले कर तकरीबन 10 साल से रंजिश चली आ रही थी. इसी रंजिश में 4 जुलाई, 2014 को सत्यपाल शर्मा के  जवान बेटे सतीश की सुबह तकरीबन 8 बजे उस वक्त गोली मार कर हत्या कर दी गई थी, जब वह खेत में काम करने के लिए गया था. सत्यपाल शर्मा ने इस मामले में 11 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

पुलिस ने इस मामले में आनंद व उस के बेटे मोहित को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. आनंद के कब्जे से हत्या में इस्तेमाल किया गया तमंचा व कारतूस भी बरामद हुए थे, जबकि बाकी आरोपियों को पुलिस ने जांच के दौरान क्लीनचिट दे दी थी. इस मामले में पुलिस मिलीभगत के आरोपों का सामना कर रही थी. बेटे सतीश की मौत से दुखी हो कर सत्यपाल शर्मा ने सोच लिया था कि वे उस के कातिलों को सजा दिला कर रहेंगे, इसलिए वे आएदिन कचहरी जा कर मुकदमे को मजबूत करने के लिए पैरवी करते थे. उन की पैरवी का ही नतीजा था कि जेल में बंद आरोपियों को जमानत नहीं मिल पा रही थी.

सत्यपाल शर्मा की इसी पैरवी से चिढ़ कर 26 मार्च की रात उन पर उस समय हमला किया गया था, जब वे घर पर थे. बदमाश गोली चला कर भाग गए थे. सत्यपाल शर्मा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. जब उन्होंने जान का खतरा बता कर पुलिस से सिक्योरिटी मांगी थी, तब थाना पुलिस ने न जाने किन वजहों से अपने फर्ज से मुंह मोड़ लिया था.

पुलिस दोनों पक्षों की रंजिश से वाकिफ थी. बाद में इस मामले में सत्यपाल शर्मा की तहरीर पर राजकरण व रोहित के खिलाफ धारा 452 व 523 के तहत मुकदमा तो लिख लिया गया था, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई थी. इस के बाद सत्यपाल शर्मा की हत्या हो गई थी.

पुलिस सत्यपाल शर्मा के हत्यारों की तलाश में जुट गई. अगले दिन पुलिस ने इस मामले में नामजद रोहित व उस की बहन पूजा को गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ की गई, तो एक चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि इस हत्या की योजना लाखों रुपए की सुपारी के बदले मेरठ जेल में बनाई गई थी. पुलिस ने जरूरी सुराग हासिल कर के उन दोनों को जेल भेज दिया और दूसरे आरोपियों की तलाश में लग गई.

26 अप्रैल, 2016 को पुलिस ने एक शूटर गौरव व एक औरत किरन को गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ हुई, तो पुलिस भी चौंक गई, क्योंकि आरोपी परिवार की औरतों से ले कर गिरफ्तार की गई औरत ने भी हत्या की इस साजिश में अहम भूमिका निभाई थी. पूछताछ में सत्यपाल शर्मा की हत्या का हैरान करने वाले सच सामने आया.

दरअसल, सत्यपाल शर्मा अपने बेटे सतीश की हत्या की जिस तरह से पैरवी कर रहे थे, उस से आनंद व उस के बेटे मोहित को चाह कर भी जमानत नहीं मिल पा रही थी. उन्होंने अपनी जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील कर दी थी. 31 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन की जमानत पर सुनवाई होनी थी. सत्यपाल शर्मा इस का कानूनी तरीके से विरोध कर रहे थे. आरोपियों को लगने लगा था कि सत्यपाल शर्मा के रहते उन्हें कभी जमानत नहीं मिल पाएगी और उन्हें सजा हो कर रहेगी.

सत्यपाल शर्मा के पैरवी बंद कर देने से उन की राह आसान हो सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था. आनंद की पत्नी बबली अपने पति व बेटे से अकसर जेल में मुलाकात के लिए जाती थी. उस ने आनंद व मोहित को उकसाया कि वे किसी भी तरह सत्यपाल का कोई इलाज करें. जितने रुपए कोर्टकचहरी में खर्च हो रहे हैं, उतने में तो उसे मरवाया जा सकता था. आनंद और मोहित को बबली की बात ठीक लगी. जेल की बदहाल जिंदगी से वे पहले ही परेशान थे. बबली अपनी जेठानी कौशल्या से इस संबंध में अकसर बात करती थी.

आनंद ने जेल में रहते बदमाश अमरपाल उर्फ कालू व अनिल से बात की. अमरपाल बागपत के ही छपरौली थाना क्षेत्र के शेरपुर लुहारा गांव का रहने वाला था, जबकि अनिल सूप गांव का बाशिंदा था. वे दोनों भी हत्या के मामले में मेरठ जेल में बंद थे. दोनों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे. आनंद व उस का परिवार सत्यपाल शर्मा को रास्ते से हटाना चाहता था. दोनों बदमाशों ने इस काम के लिए हामी भर ली. साढ़े 6 लाख रुपए में उन का सौदा तय हो गया.

अमरपाल ने इस मामले में अपने ही गांव के रोहित को जेल में बुलवा कर उस से बात की. उस से रुपयों के बदले में सत्यपाल शर्मा की हत्या करना तय हो गया. रोहित ने इस काम के लिए अपने दोस्तों सोनू राणा उर्फ शिशुपाल उर्फ अमरीकन व उस के चचेरे भाई गौरव को भी तैयार कर लिया. अमरपाल जेल में जरूर था, लेकिन उस के गैरकानूनी कामों को उस की पत्नी किरन उर्फ बाबू पूरा करती थी.

इस मामले में भी अमरपाल ने सुपारी के लेनदेन से ले कर हथियार मुहैया कराने  तक की जिम्मेदारी किरन को ही सौंप दी और उस की मुलाकात आनंद की पत्नी बबली से करा दी. सुपारी की रकम हत्या के बाद दी जानी थी. 11 अप्रैल को किरन, रोहित, गौरव व सोनू जेल में जा कर अमरपाल व अनिल से मिले. आनंद व उस की पत्नी बबली की भी उन से मुलाकात हुई और हत्या का प्लान तैयार कर लिया गया. इस के बाद रोहित अपने साथियों के साथ किरन के संपर्क में रहने लगा.

हत्या के लिए किरन ही उन्हें हथियार देने वाली थी. हत्या किस तरह करनी है, इस की पूरी कमान अब बबली व किरन ने संभाल ली थी. किरन अपने मायके मुजफ्फरनगर जिले के टयावा गांव में रह रही थी. अमरपाल के कई साथी, जो जेल से बाहर थे, किरन उन के संपर्क में थी. उन से बात कर के उस ने 3 तमंचों और कारतूसों का इंतजाम कर लिया था.

14 अप्रैल को रोहित, गौरव व सोनू बबली से उस के घर जा कर मिले. बबली ने उन्हें खर्च के लिए 10 हजार रुपए दिए. तीनों ने बबली व कौशल्या से सत्यपाल शर्मा के बारे में जानकारियां जुटा लीं. इस के बाद किरन ने उन्हें 3 तमंचे व 17 कारतूस सत्यपाल शर्मा की हत्या के लिए दे कर ताकीद कर दिया कि वह किसी भी सूरत में बचना नहीं चाहिए. इस के बाद कई दिनों तक उन्होंने रेकी कर के सत्यपाल शर्मा की पहचान के साथसाथ स्कूल आनेजाने का समय भी पता कर लिया.

23 अप्रैल को उन्होंने योजना को आखिरी रूप देने का फैसला किया. 22 अप्रैल की शाम को वे मोटरसाइकिल से बबली के घर पहुंच गए. किसी को शक न हो, इसलिए उन के सोने का इंतजाम एक ट्यूबवैल पर कर दिया गया. बबली और उस के बेटेबेटी ने उन के खानेपीने व सोने का भी इंतजाम किया था. 23 अप्रैल की अलसुबह वे वहां से निकल गए. उन्होंने सत्यपाल शर्मा को रास्ते में ही स्कूल जाते वक्त मारने की योजना बनाई. वे खिंदौड़ा वाले रास्ते की एक पुलिया पर खड़े हो गए. सत्यपाल शर्मा अपनी मोटरसाइकिल पर तेजी से आए और निकल गए, इसलिए उन का प्लान चौपट हो गया.

इस के बाद वे तीनों बदमाश इधरउधर टहलते रहे. बाद में उन्होंने स्कूल जा कर ही सत्यपाल शर्मा की हत्या करने का मन बनाया. सत्यपाल शर्मा को मारने में गलती न हो, इसलिए सोनू व रोहित ने पहले उन से नाम पूछा और इस के बाद उन तीनों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी. शोरशराबा होने पर वे घबरा गए और मजबूरन उन्हें अलगअलग रास्ते से भागना पड़ा. सोनू भीड़ के गुस्से का शिकार हो गया.

पुलिस ने गौरव की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल हुआ तमंचा व मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. इस के साथ ही पुलिस ने मुकदमे में किरन, उस के हिस्ट्रीशीटर पति अमरपाल व दूसरे बदमाश अनिल का नाम भी बढ़ा दिया. एसपी रवि शंकर छवि ने किरन व गौरव को मीडिया के सामने पेश कर के हत्याकांड का खुलासा किया. उन दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. UP Crime

True Crime Story: दौलत के लालच में अपनों का कत्ल

True Crime Story: वर्षा से शादी के बाद से ही खफा चल रहे उस के देवर कृष्णकांत को जब यह पता चला की वर्षा  किसी और के साथ लिवइन में रह रही है तो यह उस से सहा नहीं गया. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद उस का सारा पैसा भी उस की भाभी वर्षा ही ले गई थी. भाई के बदले वह सेना में नौकरी चाह रहा था. यह मामला भी कोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुका था.

भाभी के लिवइन में रहने की खबर के बाद कृष्णकांत को लगा कि भाभी उस के भाई की ही संपत्ति और पैसे पर ऐश कर रही है. तब कृष्णकांत ने अपनी भाभी को सदा के लिए मौत की नींद सुला देने का भयानक निर्णय ले लिया. मध्य प्रदेश के जिला बैतूल से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर बसा है आमला कस्बा. आदिवासी बाहुल्य यह कस्बा ज्यादा बड़ा तो नहीं है पर आसपास के गांव वाले यहां खरीदारी करने आया करते हैं.

लिहाजा शाम तक यहां के बाजार भीड़ से भरे होते हैं. ऐसे में पुलिस को भी कानूनव्यवस्था के लिए चुस्त रहना पड़ता है. 6 फरवरी, 2021 को रात करीब 9 बजे का वक्त रहा होगा. आमला के टीआई सुनील लाटा शहर में भ्रमण पर थे. इसी बीच उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि कनौजिया गांव में गोली चली है, इस में एक महिला गंभीर रूप से घायल है.

सूचना मिलते ही टीआई कनौजिया गांव पहुंचे, इस इलाके में गोली चलने की वारदात अमूमन कम ही होती है. बरहाल, टीआई ने इस घटना की जानकारी एसपी सिमाला प्रसाद को दी. साथ ही एसडीपीओ मुलताई नम्रता सोंधिया समेत फोरैंसिक टीम के सदस्यों को दी और वह तत्काल कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

आमला से कनौजिया की दूरी करीब 5 किलोमीटर है, लिहाजा पुलिस को यहां पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची, तब तक भीड़ काफी जमा हो चुकी थी. कनौजिया गांव के जिस मकान में गोली चलने की घटना हुई थी, वहां करीब 4-5 कमरे थे. पहले कमरे में बैड पर खून से लथपथ एक 27-28 वर्षीय युवती का शव पड़ा था. पास में ही उस का मोबाइल पड़ा था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि घटना के समय युवती मोबाइल पर बात कर रही होगी.

टीआई सुनील लाटा अभी मौकामुआयना कर ही रहे थे कि इतने में एसडीपीओ (मुलताई) नम्रता सोंधिया भी मौके पर आ गईं. इस के बाद एसपी सिमाला प्रसाद भी वहां पहुंच गईं. पूछताछ में पता चला कि मृतका का नाम वर्षा नागपुरे है और वह बोखड़ी कस्बे की रहने वाली थी. सुबह ही वह अपनी मां के पास कनोजिया आई थी.

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पुलिस ने यहां लोगों से प्रारंभिक पूछताछ भी की, पर वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं थे. उन का कहना था कि कौन आया, किस ने वर्षा को गोली मारी, पता ही नहीं चला. वे तो गोली चलने की आवाज के बाद अपने घरों से बाहर आए थे. वर्षा की हत्या की वजह पुलिस को भी समझ नहीं आ रही थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि मायके में आने के बाद उस की हत्या किस ने की? एफएसएल टीम द्वारा जांच करने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

पुलिस ने इस के बाद वर्षा के मायके वालों से पूछताछ की तो वर्षा के भाई कृष्णा पवार ने बहन वर्षा की हत्या का संदेह उस के देवर कृष्णकांत नागपुरे और महेश नागपुरे निवासी बोडखी पर व्यक्त किया था. इधर पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि वर्षा किसी के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी.

बहरहाल, सारी जानकारी जुटाने के बाद टीआई सुनील लाटा आमला लौट आए. उन के सामने जिन लोगों के नाम संदेह के तौर पर सामने आए थे, उन पर नजर रखने के लिए उन्होंने कुछ पुलिसकर्मियों को लगा दिया. पुलिस को अपनी जांच में यह भी पता चला कि अपनी ससुराल वालों से वर्षा के रिश्ते ठीक नहीं थे, लिहाजा उन्होंने जांच का रुख ससुराल वालों की तरफ मोड़ लिया.

इस बीच टीआई सुनील लाटा को खबर मिली कि वर्षा का देवर कृष्णकांत घटना से कुछ दिनों से गांव बोडखी में ही देखा गया था. पर घटना के बाद से वह गायब है. पुलिस ने अब अपना ध्यान कृष्णकांत की ओर लगा दिया.

पुलिस की जांच आगे बढ़ी तो यह भी पता चला कि कृष्णकांत का अपनी भाभी वर्षा से काफी समय से विवाद चल रहा था. जब से उस ने कृष्णकांत के बड़े भाई चंद्रशेखर नागपुरे से लवमैरिज की थी, तभी से ससुराल वाले उस से नाराज चल रहे थे. जिस से वह शादी के बाद से ही ससुराल वालों से अलग पति के साथ रह रही थी. वह भी उस से खुश नहीं थे.

पुलिस ने वर्षा की सास और जेठ से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वर्षा उन से अलग रहती थी. लिहाजा उन्होंने भी उस से रिश्ता लगभग खत्म कर रखा था. इस मामले में पता चला कि कीर्ति नाम की युवती से मृतका के देवर की मित्रता थी. पुलिस ने कीर्ति के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि उस का कृष्णकांत से मिलनाजुलना था. पुलिस ने कीर्ति से पूछताछ की और उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि घटना के दिन कई बार उस की कृष्णकांत से बात भी हुई थी.

कीर्ति से जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कृष्णकांत अकसर उस से वर्षा के बारे में पूछता रहता था. तब वह उसे वर्षा की लोकेशन बता देती थी. कीर्ति ने पुलिस को बताया कि अब कृष्णकांत कहां है, इस बारे में उसे कुछ भी पता नहीं है. कृष्णकांत का मोबाइल फोन भी बंद था. पुलिस ने अपने मुखबिरों को लगातार इस मामले में नजर रखने को कहा था. इस का परिणाम यह हुआ की पुलिस को जानकरी मिली कि कृष्णकांत भोपाल में है.

पुलिस को यह भी पता चला कि वह कोर्ट के काम से आमला आने वाला है. लिहाजा पुलिस मुस्तैद हो कर उस के आने का इंतजार करने लगी. अगले दिन जैसे ही वह आमला आया, पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने थाने ले जा कर जब कृष्णकांत से पूछताछ की तो वह खुद को बेगुनाह बताने लगा. उस ने बताया कि घटना वाली तारीख को वह भोपाल में था.

पुलिस ने जब उसे बताया कि घटना की रात उस का मोबाइल देर रात तक आमला के आसपास ही लोकेशन दिखा रहा था. उसे उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स दिखाई तो वह टूट गया. उस ने कबूल कर लिया कि उस ने अपनी दोस्त कीर्ति की मदद से अपनी भाभी वर्षा की हत्या की है. वर्षा ने हालात ही ऐसे बना दिए थे, जिस से उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

कृष्णकांत ने पुलिस को जो बताया उस के अनुसार कहानी कुछ इस प्रकार सामने आई—

बैतूल जिले के आमला गांव के समीप बोडखी में रहने वाले आर.के. नागपुरे के 3 बेटों में सब से बड़ा चंद्रशेखर नागपुरे था. इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद चंद्रशेखर सेना में भरती हो गया.

नौकरी से छुट्टी मिलने पर जब वह घर आता तो कनोजिया में रहने वाले अपने मामा के यहां भी जाता था. उस के मामा की बेटी वर्षा उस समय जवानी की दहलीज पर कदम रख ही रही थी और महज 16 साल की थी. इधर चंद्रशेखर 27 की उम्र छू रहा था. पर सेना में होने के कारण उस का बदन गठीला था और सेना में होने का रौब तो उस पर था ही. उसी दौरान वर्षा से उसे प्यार हो गया. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

रिश्ते मे वर्षा चंद्रशेखर की ममेरी बहन थी, पर इस के बाद भी दोनों रिश्तों की मर्यादा भूल गए और प्यार की पींगे बढ़ाने लगे. जब इस बात की भनक चंद्रशेखर के घर वालों को लगी तो वे उस पर नाराज हुए. उन को कतई गवारा नहीं था कि उन का बेटा ऐसी युवती से प्रेम करे, जो उस के सगे रिश्ते में आती हो. वे चंद्रशेखर का रिश्ता कहीं दूसरी जगह करने की योजना बना रहे थे. उन्होंने चंद्रशेखर को काफी समझाया पर वह नहीं माना.

चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध की परवाह नहीं की ओर वर्षा से मिलना जारी रखा. वर्षा भी उस के प्यार में दीवानी थी. लिहाजा उस ने नजदीकी रिश्ते से ज्यादा अपने प्यार को अहमियत दी. नतीजा यह हुआ कि घर वालों के विरोध के बावजूद चंद्रशेखर और वर्षा ने शादी का फैसला कर लिया और घर वालों के विरोध के बावजूद उन्होंने शादी कर ली.

शादी चूंकि चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध के बावजूद की थी, लिहाजा शादी के बाद वह घर से अलग हो गया और बोखड़ी में ही अलग मकान ले कर रहने लगा. समय अपनी गति से बीतता रहा. कुछ समय बाद वर्षा एक बेटे की मां भी बन गई. बात 2013 के आसपास की है. चंद्रशेखर की जहर खाने से संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. उस ने जहर कैसे खाया, इस बात का खुलासा तो नहीं हो पाया, पर कहा यह जाता है कि चंद्रशेखर अपने घर वालों के व्यवहार से दुखी था और घर वालों द्वारा उसे स्वीकार नहीं किया तो उस ने यह कदम उठा लिया.

हालांकि उस ने जहर खाया था या उसे दिया गया था, यह भी एक रहस्य था. चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद उस की सारी संपत्ति की वारिस उस की पत्नी वर्षा बन गई. चंद्रशेखर के घर वाले वर्षा को पहले ही नापसंद करते थे. उन्होंने इस शादी को भी मान्यता नहीं दी थी, लिहाजा वे इस के खिलाफ हो गए कि वर्षा को उस की संपत्ति में से कुछ मिले. पर उन के चाहने से कुछ नहीं हुआ.

सेना ने वर्षा को उस की पत्नी मानते हुए उस की मौत के बाद उस के सारे देय दे दिए. बताया जाता है कि वर्षा को चंद्रशेखर की मौत के बाद करीब 30 लाख रुपए मिले थे. चंद्रशेखर का भाई कृष्णकांत इसे अपनी संपत्ति मान रहा था और उस का मानना था कि इस से उस के घर वालों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है. उस ने सेना मुख्यालय में भी पत्र लिख कर इस धनराशि में अपना अधिकार बताया. कृष्णकांत ने कहा कि चंद्रशेखर का वर्षा के साथ कभी विवाह हुआ ही नहीं था. दोनों भाईबहन थे, लिहाजा उस की संपत्ति पर घर वालों का अधिकार है.

उस ने चंद्रशेखर की मौत के बाद खुद को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने की मांग भी सेना से की थी. जब यह बात नहीं बनी तो वह कोर्ट चला गया. कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अभी जारी थी. अब बात करते हैं हत्या के कारणों की. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद कृष्णकांत भोपाल आ गया और यहां एक कंपनी में मोटरसाइकिल राइडर बन गया. वह कंपनी के निर्देश पर लोगों को लाने ओर छोड़ने का काम करने लगा.

इस दौरान वह जब भी गांव जाता तो वर्षा के शानोशौकत भरे खर्चे देख कर उसे बेहद पीड़ा होती थी. उसे लगता था कि उस का परिवार आर्थिक दिक्कत झेल रहा है और वर्षा उस के भाई की मौत के बाद मिले पैसों से ऐश कर रही है. कुछ दिनों बाद कृष्णकांत को पता चला की वर्षा किसी और व्यक्ति के साथ लिवइन में रहने लगी है तो उसे और बुरा लगा. उसे लगा कि अब तो वर्षा की संपत्ति उसे कभी नहीं मिलेगी. लाखों के लालच में उस ने वर्षा को मारने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने कीर्ति को अपने विश्वास में लिया और उस से दोस्ती कर ली. कीर्ति को उस ने यह जिम्मेदारी दी कि वर्षा की हर गतिविधि पर नजर रखे और उस की हर गतिविधि की उसे फोन द्वारा जानकारी देती रहे.

6 फरवरी, 2021 को वर्षा अपनी मां के यहां आई थी. कीर्ति ने इस की जानकारी फोन पर कृष्णकांत को दी. कृष्णकांत को लगा कि अच्छा मौका है. शाम के समय वैसे भी गांव में अंधेरा छा जाता है और अधिकांश लोग अपने घरों में कैद हो जाते हैं. ऐसे मे वर्षा की हत्या करना कृष्णकांत को आसान लगा. उस ने अपने एक मित्र से एक तमंचे का जुगाड़ किया और शाम को मोटरसाइकिल से सीधा कनौजिया गांव पहुंचा और वर्षा के घर के सामने जा कर खड़ा हो गया. वहां उस समय कुछ लोग उसे दिखे और घर का दरवाजा भी बाहर से बंद था.

लिहाजा वह घर के पीछे गया. वहां वर्षा की दादी बरतन साफ कर रही थीं. बूढ़ी होने के कारण उन्हें कम दिखाई और कम सुनाई देता था. उन्हें चकमा दे कर वह पीछे के दरवाजे से अंदर घुस गया. वर्षा कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. कृष्णकांत ने बिना समय गंवाए उस पर गोली चला दी. गोली लगते ही वर्षा ढेर हो गई. उधर अपना काम करने के बाद कृष्णकांत पीछे के दरवाजे से फरार हो गया. उसी रात वह मोटरसाइकिल से भोपाल आ गया. कोर्ट के काम से उसे फिर आमला जाना पड़ा. हालांकि वह 2 दिन में निश्चिंत हो चुका था कि उसे किसी ने नहीं देखा होगा. इस कारण वह पकड़ा नहीं जाएगा.

लेकिन कहते हैं न कि जुर्म कहीं न कहीं अपने निशान छोड़ ही जाता है. कृष्णकांत के साथ भी यही हुआ. पुलिस ने कड़ी से कड़ी जोड़ी तो उस का जुर्म सामने आ गया. पुलिस ने कृष्णकांत और कीर्ति से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. True Crime Story

Gorakhpur Crime: रिश्तों की मर्यादा टूटी, चाची की यारी में चाचा का खौफनाक कत्ल

Gorakhpur Crime: 17 अक्तूबर, 2016 की सुबह जिला गोरखपुर के चिलुआताल के महेसरा पुल के नजदीक जंगल में एक पेड़ के सहारे एक साइकिल खड़ी देखी गई, जिस के कैरियर पर एक बोरा बंधा था. बोरा खून से लथपथ था, इसलिए देखने वालों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बोरे में लाश हो सकती है. लाश  होने की संभावना पर ही इस बात की सूचना थाना चिलुआताल पुलिस को दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामबेलास यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. बोरे से उस समय भी खून टपक रहा था.

इस का मतलब था कि बोरा कुछ देर पहले ही साइकिल से वहां लाया गया था. उन्होंने बोरा खुलवाया तो उस में से एक आदमी की लाश निकली. मृतक की उम्र 35-36 साल रही होगी. उस के सिर पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था. वह रंगीन सैंडो बनियान और लुंगी पहने था. शायद रात को सोते समय उस की हत्या की गई थी. पुलिस को लाश की शिनाख्त कराने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. वहां जमा भीड़ ने मृतक की शिनाख्त प्रौपर्टी डीलर सुरेश सिंह के रूप में कर दी थी. वह चिलुआताल गांव का ही रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद रामबेलास यादव ने मृतक के घर वालों को सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को भेजा. दोनों सिपाही मृतक के घर पहुंचे तो घर पर कोई नहीं मिला. पड़ोसियों से पता चला कि सुरेश सिंह के बिस्तर पर भारी मात्रा में खून मिलने और उस के बिस्तर से गायब होने से घर के सभी लोग उसी की खोज में निकले हुए थे. घर पर पुलिस के आने की सूचना मिलने पर मृतक सुरेश सिंह के बड़े भाई दिनेश सिंह घर आए तो जंगल में एक लाश मिलने की बात बता कर दोनों सिपाही उन्हें अपने साथ ले आए. लाश देखते ही दिनेश सिंह फफक कर रो पड़े. इस से साफ हो गया कि मृतक उन का भाई सुरेश सिंह ही था.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया और उस साइकिल को जब्त कर लिया, जिस पर लाश बोरे में भर कर वहां लाई गई थी. थाने लौट कर रामबेलास यादव ने मृतक के बडे़ भाई दिनेश सिंह की तहरीर पर सुरेश सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया. मृतक सुरेश सिंह प्रौपटी डीलिंग का काम करता था. विवादित जमीनों को खरीदनाबेचना उस का मुख्य धंधा था. पुलिस ने इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई, लेकिन उस का ऐसा कोई दुश्मन नजर नहीं आया, जिस से लगे कि हत्या उस ने कराई है.

यह हत्याकांड अखबारों की सुर्खियां बना तो एसएसपी रामलाल वर्मा ने एसपी (सिटी) हेमराज मीणा को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा कराएं. उन्होंने सीओ देवेंद्रनाथ शुक्ला और थानाप्रभारी रामबेलास यादव को सुरेश सिंह तथा उस के घरपरिवार के आसपास जांच का घेरा बढ़ाने को कहा. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह हत्या दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि अवैधसंबंधों की वजह से हुई है. क्योंकि मृतक को जिस तरह बेरहमी से मारा गया था, इस तरह लोग अवैध संबंधों में ही नफरत में मारे जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई गई तो जल्दी ही नतीजा निकलता नजर आया.

किसी मुखबिर ने बताया कि पिछले कई सालों से सुरेश सिंह की अपनी पत्नी से पटती नहीं थी. दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था और इस की वजह सुरेश सिंह का सगा भतीजा राहुल चौधरी था. क्योंकि उस के अपनी चाची राधिका से अवैध संबंध थे. घटना से सप्ताह भर पहले भी इसी बात को ले कर सुरेश और राधिका के बीच काफी झगड़ा हुआ था. तब सुरेश ने पत्नी की पिटाई कर दी थी, जिस से नाराज हो कर वह बच्चे को ले कर मायके चली गई थी. रामबेलास यादव को हत्या की वजह का पता चल गया था. राहुल से पूछताछ करने के लिए वह उस के घर पहुंचा तो उस के पिता दिनेश सिंह ने बताया कि वह तो लखनऊ में है.

लखनऊ में राहुल गोमतीनगर में किराए का कमरा ले कर रहता है और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है. पिता का कहना था कि हत्या वाले दिन के एक दिन पहले वह लखनऊ चला गया था. जबकि मुखबिर ने उन्हें बताया था कि घटना वाले दिन सुबह वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. पिता का कहना था कि घटना से एक दिन पहले यानी 16 अक्तूबर, 2016 को राहुल लखनऊ चला गया था, जबकि मुखबिर का कहना था कि घटना वाले दिन वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. मुखबिर की बात पर विश्वास कर के रामबेलास यादव ने राहुल को लखनऊ से लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

लखनऊ पुलिस की मदद से गोरखपुर पुलिस 22 अक्तूबर, 2016 को लखनऊ के गोमतीनगर से राहुल चौधरी को गिरफ्तार कर गोरखपुर ले आई. थाने ला कर उस से सुरेश सिंह की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के चाची से अवैध संबंधों की वजह से चाचा सुरेश सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. राहुल ने चाची के प्रेम में पड़ कर चाचा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना चिलुआताल में सुरेश सिंह पत्नी राधिका सिंह और 6 साल के बेटे के साथ रहता था. उस का बड़ा भाई था दिनेश सिंह. राहुल उसी का बेटा था. दोनों भाइयों के परिवार भले ही अलगअलग रहते थे, लेकिन रहते एक ही मकान में थे. सुखदुख में भी एकदूसरे की मदद भी करते थे. गांव वाले भाइयों के इस प्रेम को देख मन ही मन जलते थे. सुरेश सिंह चेन्नई में किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन पत्नी राधिका बेटे के साथ गांव में रहती थी. वह साल में एक या 2 बार ही घर आता था. उस के न रहने पर जरूरत पड़ने पर घर के छोटेमोटे काम उस के बड़े भाई का बेटा राहुल कर दिया करता था.

राहुल और राधिका थे तो चाचीभतीजा, लेकिन हमउम्र होने की वजह से दोनों दोस्तों की तरह रहते थे, बातचीत भी वे दोस्तों की ही तरह करते थे. इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे उन के बीच मधुर संबंध बन गए. उन के मन में एकदूसरे के लिए चाहत के फूल खिले तो एकदूसरे के स्पर्श मात्र से उन का रोमरोम खिल उठने लगा. राहुल चाची राधिका से जुनून के हद तक प्यार करने लगा तो राधिका ने भी उस के प्यार पर अपने समर्पण की मोहर लगा दी. एक बार मर्यादा टूटी तो उन्हें जब भी मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटाने लगे. दोनों ने अपने इस अनैतिक रिश्ते पर परदा डालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन पाप के इस रिश्ते को वे छिपा नहीं सके.

लोग राधिका और राहुल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं भी करने लगे, पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. जब सुरेश सिंह के किसी शुभचिंतक ने उसे फोन कर के चाचीभतीजे के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी दी तो वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. यह सन 2014 की बात है. सुरेश ने खूब पैसे कमाए थे. उन्हीं पैसों से उस ने गांव में रह कर प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया, जो थोड़ी मेहनत के बाद अच्छा चल निकला. कामधंधे की वजह से अकसर उसे दिन भर घर से बाहर रहना पड़ता था, इसलिए राहुल और राधिका को मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन एक दिन अचानक वह दोपहर में घर आ गया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया.

फिर क्या था, सुरेश ने न पत्नी को छोड़ा और न भतीजे को. उस ने इस बात को ले कर भाई से बात की तो बेटे की हरकत से वह काफी शर्मिंदा हुए. समाज और रिश्तों की दुहाई दे कर उन्होंने बेटे को घर से निकाल दिया तो वह लखनऊ आ गया और गोमतीनगर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. यहां वह सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. सुरेश की वजह से गांव में राहुल और उस की चाची की काफी बदनामी हुई थी. यही नहीं, उसे घर से भी निकाल दिया गया था. राधिका की खूब थूथू हुई थी. गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों तक ने उस की खूब फजीहत की थी.

धीरेधीरे बात थमती गई. मांबाप से मांफी मांग कर राहुल फिर घर लौट आया. मांबाप ने उसे माफ जरूर कर दिया था, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. राधिका से उसे मिलने की सख्त मनाही थी. जबकि वह चाची से मिलने के लिए तड़प रहा था. लेकिन सख्त पहरेदारी की वजह से दोनों का मिलन संभव नहीं हो पा रहा था. चाचा सुरेश की वजह से राहुल प्रेमिका चाची से मिल नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि जब तक चाचा रहेगा, वह चाची से कभी मिल नहीं पाएगा. चाचा प्यार की राह का कांटा लगा तो वह उसे हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने उसे हटाने का निश्चय कर लिया.

अब वह ऐसी राह खोजने लगा, जिस पर चल कर उस का काम भी हो जाए और वह फंसे भी न. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह अपना मोबाइल फोन औन कर के बाइब्रेशन पर लखनऊ वाले कमरे पर ही छोड़ देगा और रात में गोरखपुर पहुंच कर चाचा की हत्या कर के लखनऊ अपने कमरे पर आ जाएगा. पुलिस उस पर शक करेगी तो मोबाइल लोकेशन के सहारे वह बच जाएगा. तब वह शायद यह भूल गया था कि कातिल कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से उस का बचना आसान नहीं है.

राहुल जब से घर आ कर रहने लगा था, सुरेश और उस की पत्नी राधिका के बीच उसे ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था. जबकि इस बीच राहुल एक बार भी चाची से नहीं मिला था. रोजरोज के झगड़े से परेशान हो कर राधिका नाराज हो कर बेटे को ले कर मायके चली गई थी. राधिका के चली जाने से राहुल काफी दुखी था. उस का मन घर में नहीं लगा तो 16 अक्तूबर को मांबाप से कह कर वह लखनऊ चला गया. चाची से न मिल पाने की वजह से राहुल तड़प रहा था. तड़प की वेदना से आहत हो कर उस ने योजना को अमलीजामा पहना दिया. योजना के अनुसार 17 अक्तूबर की शाम 4 बजे इंटरसिटी ट्रेन से वह गोरखपुर के लिए चल पड़ा. रात 11 बजे के करीब वह गोरखुपर पहुंचा. स्टेशन से टैंपो ले कर वह चिलुआताल के बरगदवां चौराहे पर पहुंचा और वहां से पैदल ही घर पहुंच गया.

उसे घर तो जाना नहीं था, इसलिए सब से पहले उस ने पिता के कमरे के दरवाजे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी, ताकि शोर होने पर वह बाहर न निकल सकें. इस के बाद पीछे की दीवार के सहारे वह सुरेश सिंह के कमरे में पहुंचा, जहां वह गहरी नींद सो रहा था. उसे देखते ही नफरत से राहुल का खून खौल उठा. उसे पता था कि चाचा के घर में लोहे की रौड कहां रखी है. उस ने लोहे की रौड उठाई और पूरी ताकत से सुरेश के सिर पर 3 वार कर के उसे मौत के घाट उतर दिया.

राहुल को विश्वास हो गया कि सुरेश की मौत हो चुकी है तो उस ने घर में रखा बोरा उठाया और उसी में उस की लाश भर कर रात के 4 बजे के करीब बाहर झांक कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा. जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा है तो उस ने सुरेश की ही साइकिल घर उस की लाश वाले बोरे को कैरियर पर रख कर जंगल की ओर चल पड़ा. लेकिन जब वह झील की ओर जा रहा था, तभी एक ट्रैक्टर आता दिखाई दिया. उसे देख कर वह घबरा गया और साइकिल को एक पेड़ से टिका कर भागा. ट्रैक्टर पर बैठे एक मजदूर ने उसे भागते देख लिया तो उस ने उस का नाम ले कर पुकारा भी, लेकिन रुकने के बजाए राहुल बरगदवां चौराहे की ओर भाग गया.

वहां से उस ने टैंपो पकड़ी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ स्थित अपने कमरे पर चला गया. उस ने चालाकी तो बहुत दिखाई, लेकिन वह काम न आई और पकड़ा गया. राहुल चौधरी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली थी. पूछताछ के बाद राहुल को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. राधिका के पति की हत्या की खबर पा कर ससुराल आ गई थी. राहुल ने जो किया था, उस से उसे काफी दुख पहुंचा. क्योंकि उस ने राहुल से कभी नहीं कहा था कि वह उस के पति की हत्या कर उसे विधवा बना दे.

राहुल के मांबाप भी काफी दुखी हैं. उन्होंने राहुल से अपना नाता तोड़ कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया है. Gorakhpur Crime

कथा में राधिका सिंह बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों एवं राहुल के बयानों पर आधारित

Crime News: फिरौती में मांगा कटा सिर – चाचा को बनाया मोहरा

Crime News: सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस गाने के बोल और शब्द दोनों ही 14 वर्षीय मासूम मंगलू राजकुमार पांडेय उर्फ राज के हैं, जो 10 जून, 2021 को अपने दोस्तों के साथ इंदिरानगर मैदान में क्रिकेट खेलने के लिए गया तो फिर वापस नहीं लौटा. सुबह 11 बजे क्रिकेट खेलने गया राज जब शाम 5 बजे तक घर नहीं आया तो मां गीता देवी को उस की चिंता हुई. अकसर वह घर पर 3 बजे तक आ जाता था. अगर किसी दिन उसे देर हो जाती तो वह इस की जानकारी अपने घर वालों को फोन कर के दे देता था. लेकिन उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

कई बार फोन करने के बाद भी जब उन्हें राज के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो वह घबरा उठी. राज कहां है, क्या कर रहा है, उस का फोन स्विच्ड औफ क्यों है, इस बात की जानकारी उन्होंने अपने पति राजकुमार पांडेय को दी.nमगर राजकुमार पांडेय ने पत्नी की बातों को गंभीरता से न लेते हुए कहा, ‘‘इस में इतना परेशान होने की क्या बात है, अपने किसी दोस्त के यहां चला गया होगा. हो सकता है वहां फोन का नेटवर्क न हो.’’

पति की इन बातों से गीता देवी को थोड़ी राहत तो मिली लेकिन मन अशांत ही रहा. राजकुमार पांडेय ने पत्नी गीता देवी को तो धीरज दे दिया लेकिन अपने काम में उन का भी मन नहीं लग रहा था. उन्होंने अपने चचेरे भाई मनोज कुमार पांडेय को फोन पर सारी बातें बताई और वह घर जल्दी आ गए थे. फिर वह मनोज के साथ मिल कर राज की तलाश में लग गए थे. अपने आसपास और जानपहचान वालों से पूछताछ करने के बाद जब उन्होंने राज के उन दोस्तों से संपर्क किया, जिन के साथ वह अकसर क्रिकेट खेलने जाया करता था तो उन की बेचैनी और बढ़ गई.

उस के साथ क्रिकेट खेलने वाले दोस्तों ने उन्हें बताया, ‘‘अंकल, राज हमारे साथ क्रिकेट खेलने आया तो जरूर था लेकिन वह 2 बजे मैदान से यह कह कर निकल गया था कि 15-20 मिनट में वापस आएगा. मैदान में एक मोटरसाइकिल आई थी. उस पर बैठे लड़के ने जब राज को पुकारा तो वह उस की ओर देख कर मुसकराया था और वह उस की मोटरसाइकिल पर बैठ कर निकल गया तो फिर वापस नहीं आया.’’

राज के दोस्तों की बातें सुन कर राजकुमार और काका मनोज पांडेय के चेहरे पर मायूसी छा गई थी. उन्होंने पूछा, ‘‘बेटा, आप लोग उस मोटरसाइकिल वाले को पहचानते हो?’’

‘‘नहीं अंकल, वह हेलमेट लगाए हुए था, जिस से हम उस का चेहरा नहीं देख पाए.’’ एक बच्चे ने कहा.

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अपने बेटे राज के किसी अपरिचित के साथ जाने की बात सुन कर राजकुमार और उन का परिवार बुरी तरह डर गया था. वह व्यक्ति जिस प्रकार से उन के बेटे को ले गया था, उस से उन की नीयत ठीक नहीं लग रही थी. उन्हें दाल में कुछ काला नजर आ रहा था. इस बात की जानकारी जब मोहल्ले वालों को हुई तो सारा मोहल्ला उन के साथ आ गया था. सभी राजकुमार पांडेय और उन के परिवार के साथ राज की तलाश में जुट गए और उन्हें पुलिस के पास जाने की सलाह दी.

इस के पहले कि राज के पिता और चाचा मनोज कुमार पांडेय पुलिस में जा कर राज की गुमशुदगी दर्ज कराते, उन्होंने जो सोचा था वही हुआ. राज के गायब होने का रहस्य सामने आ गया था. राज का अपहरण हो गया था. इस बात की पुष्टि तब हुई, जब फिरौती का फोन आया. अपहर्त्ता ने राज की फिरौती के लिए जो शर्त रखी थी, वह सुन कर राज का सारा परिवार स्तब्ध रह गया. शाम 7 बजे के करीब राज की मां गीता देवी के मोबाइल स्क्रीन पर जो नंबर उभरा था, उसे देख कर परिवार वालों की आंखों में चमक आ गई थी. वह नंबर उन के बेटे राज का था.

फोन रिसीव करने पर दूसरी तरफ से जो आवाज आई थी, उस से उन की आंखों की चमक वापस चली गई थी. आवाज सख्त और कर्कश थी,  ‘‘तुम्हारा लाडला मेरे पास है. उस की आवाज सुनना चाहोगी.’’

यह कहते हुए अपहर्त्ता ने जब उन्हें उन के बेटे की आवाज सुनाई तो उन का दिल दहल उठा.

राज बुरी तरह रो रहा था. वह कह रहा था, ‘‘मां मुझे बचा लो. भैया मुझे मार डालेंगे.’’

इस के बाद अपहर्त्ता ने उस से फोन ले लिया और कहा, ‘‘देखो, मेरी तुम लोगों से कोई दुश्मनी नहीं है. मेरा दुश्मन राज का चाचा मनोज पांडेय है. मुझे उस का कटा हुआ सिर चाहिए. उस का सिर काट कर मुझे दिखाओ और मेरे वाट्सऐप पर डालो तो मैं तुम्हारे बेटे को छोड़ दूंगा. इस के लिए मैं तुम्हें 12 घंटे का समय दे रहा हूं. इस के बाद मैं तुम्हारे बच्चे का क्या करूंगा, यह तुम सोच भी नहीं सकते.’’

यह कहते हुए अपहर्त्ता ने फोन कट कर दिया. फोन पर राज के घर वालों को जिस प्रकार की धमकी मिली थी, उस से राज की मां गीता देवी की तबीयत बिगड़ गई थी. वह रहरह कर बेहोश हो जा रही थी. राज के पिता राजकुमार पांडेय बारबार अपहर्त्ता को फोन कर मिन्नतें कर रहे थे, ‘‘देखो, राज उन का बेटा नहीं है. उस बच्चे ने आप का क्या बिगाड़ा है. आप की जो भी दुश्मनी है, उस के चाचा मनोज से है, फिर उस की सजा उसे क्यों दे रहे हो. वह मासूम है, उसे छोड़ दो.’’

लेकिन राजकुमार पांडेय और परिवार वालों की बातों का उस पर कोई असर नहीं हुआ. अपनी बात पर कायम रहते हुए उस ने फोन काट दिया था. अब तक रात के 9 बज चुके थे. कई बार अपहर्त्ता से फोन पर संपर्क करने के बाद राजकुमार पांडेय और उन का परिवार आवाज पहचान कर इतना तो जान चुका था कि उन के मासूम बच्चे का अपहर्त्ता कोई और नहीं बल्कि सूरज साहू है और वह राज के चाचा मनोज पांडेय का सिर क्यों मांग रहा है, यह भी जानते थे. मामला नाजुक था, जो बिना पुलिस के नहीं सुलझ सकता था. अत: वे बिना कोई देरी किए अपने भाई मनोज पांडेय और इलाके के कुछ लोगों के साथ थाना एमआईडीसी चले गए.

वहां के थानाप्रभारी युवराज हांडे से मिल कर उन्हें सारी बातें बताई और बेटे के अपहरण के मामले में सूरज साहू के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज करवा दी. उन्होंने थानाप्रभारी को सूरज साहू के बारे में सारी जानकारी दे दी. अपहर्त्ता सूरज साहू की विचित्र मांग पर थानाप्रभारी युवराज हांडे भी सकते में आ गए थे. 55 वर्षीय राजकुमार पांडेय महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर के आजाद नगर इलाके में परिवार के साथ रहते थे. परिवार में उन की पत्नी गीता देवी के अलावा उन का एक चचेरा भाई मनोज पांडेय भी रहता था. उन के 2 बच्चों में एक बेटी कंचन थी, जो करीब 16 साल की थी और एक बेटा मंगलू पांडेय उर्फ राज जो लगभग 14 साल के आसपास का था.

दोनों बच्चे होनहार और समझदार थे. राज पांडेय कौन्वेंट स्कूल में तो बेटी एक कालेज में पढ़ती थी. राजकुमार की पत्नी गीता देवी एक कुशल गृहिणी थीं, जो अपने बच्चों का हर तरह से खयाल रखती थी. राजकुमार पांडेय एमआईडीसी परिसर की एक प्राइवेट फर्म में औपरेटर थे. राज उन का एकलौता बेटा था. उसे अपनी पढ़ाई के साथसाथ गाने और क्रिकेट खेलने का बड़ा शौक था. वह अपने स्कूल में तो गाने गाता ही था, पार्टियों में अपनी बहन के साथ भी गाता था. उस की बहन के साथ उस के कई ऐसे मार्मिक गाने थे, जो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुए थे, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया और सराहा था.

हालांकि पिता राजकुमार पांडेय की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी फिर भी अपने लाडले को वह चोटी का गायक बनाना चाहते थे. वह अपनी दमदार अवाज के साथ जिस लयबद्ध तरीके से गाता था, उस से उस के जानने वाले भी कायल थे. लेकिन उन का यह सपना बस सपना ही रह गया था. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उस के गाने के शब्द उस के न रहने पर उन्हें और उन के परिवार को सारी उम्र रुलाएंगे. राजकुमार पांडेय की शिकायत दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी युवराज हांडे ने उन्हें सांत्वना देने के बाद यह कह कर घर भेज दिया कि वह अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे और मामले की खबर अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी.

मामले का संज्ञान लेते हुए नागपुर पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार, अपर पुलिस कमिश्नर दिलीप झलके तत्काल एमआईडीसी पुलिस थाने आ गए थे. उन्होंने थानाप्रभारी युवराज हांडे के साथ मामले पर गंभीरता से विचार किया और जांच की रूपरेखा तैयार कर अपने अधिकारियों की 4 टीमें बना कर उन्हें जिम्मेदारियां सौंप दी. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में पुलिस जांच टीम अपनीअपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही थी. चूंकि मामले में सूरज साहू आरोपी था, अत: पूरी टीम का ध्यान उस पर  था. पहले पुलिस ने उस के घर पर छापा मारा लेकिन वह उन्हें वहां नहीं मिला.

इस के साथ उन्होंने सूरज साहू और राज के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था, जिस में उन्हें कामयाबी मिली और उसे आधी रात को वर्धा रोड बोरखेड़ के परिसर से दबोच कर एमआईडीसी पुलिस थाने ले आए. थाने में सरसरी तौर से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर वहां से 22 किलोमीटर दूर हुड़केश्वर बंजारी कालेज परिसर के एक सुनसान जगह से मासूम राज पांडेय का शव बरामद कर लिया. जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने उसे नागपुर मैडिकल कालेज भेज दिया था. रात भर चली पुलिस की इस काररवाई से जहां इलाके के लोग खुश थे, वहीं अपहर्त्ता सूरज साहू के प्रति लोगों में रोष था. सुबह होते ही पुलिस थाने में इलाके के लोग इकट्ठा हो कर सूरज साहू को उन के हवाले करने की मांग करने लगे, ताकि वे अपनी तरह से उसे सजा दें. इस भीड़ में राज का परिवार सब से आगे था.

मामला बिगड़ता देख डीसीपी नूरुल हसन को सामने आना पड़ा. उन के समझाने पर लोगों की भीड़ इस बात पर शांत हो गई कि राज का मामला फास्टट्रैक कोर्ट में चले और जल्द से जल्द अपराधी को फांसी की सजा मिले. पूछताछ में सूरज साहू ने पुलिस टीम को पहले बताया कि 7 साल पहले पांडेय परिवार के मनोज पांडेय ने उस की मां पर अत्याचार किया था, जिस का उस ने बदला लिया है. लेकिन उस के इस बयान पर पुलिस टीम संतुष्ट नहीं हुई. पुलिस ने जब मामले की जांच की तो कहानी कुछ और ही थी, जो इस प्रकार थी—

25 साल का सूरज रामभुज साहू एक आशिकमिजाज युवक था और अपनी मां के साथ सीआरआरपी स्थित रायसैनी कालेज के पास रहता था. परिवार में उस के अलावा 3 भाई और थे. परिवार शिक्षित था. तीनों भाई पोस्ट ग्रैजुएट और इंजीनियर थे. उन की शादी हो चुकी थी. वे अपने परिवार के साथ अलगअलग रह रहे थे. सूरज साहू सब से छोटा और मां का लाडला था. इस नाते मां ने उसे अपने पास ही रखा था. तीनों भाई उसे भी अपने जैसा बनाना चाहते थे लेकिन वह बन नहीं सका. 12वीं कक्षा पास करने के बाद उस ने पालीटेक्निक में प्रवेश लिया पर साल भर बाद ही पढ़ाई छोड़ कर फैब्रिकेशन का काम करने लगा था.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि इसी बीच उस के दिल में एक लड़की को लेकर हलचल मच गई थी. वह उस का दीवाना हो गया था. दरअसल, हुआ यह था कि सूरज साहू अपने काम से फ्री होने के बाद अकसर दोस्तों से मिलने आजाद नगर इलाके में आताजाता था. यहीं उस की नजर पांडेय परिवार के रिश्ते में आने वाली सुंदर खूबसूरत कुसुम पर पड़ गई थी और वह उस से एकतरफा प्यार करने लगा. अपने प्यार का अहसास कराने के लिए सूरज साहू कई बार उस के रास्ते आया था. इस के पहले कि वह अपने मकसद में कामयाब होता, इस बात की खबर पांडेय परिवार को लग गई.

इस बात से नाराज राज पांडेय के चाचा मनोज पांडेय ने सूरज साहू को कुसुम से दूर रहने के लिए कहा. लेकिन सूरज पर मनोज की बातों का कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने उस की जम कर पिटाई कर दी गई और जल्द ही कुसुम की शादी करवा दी. मामला लड़की का था इसलिए सूरज साहू के परिवार वालों ने उसे ही आड़े हाथों लिया. जिस से नाराज सूरज साहू ने पांडेय परिवार को सबक सिखाने का फैसला कर लिया था. एक साल बीत जाने के बाद लगभग 5 महीने पहले से उस ने पांडेय परिवार के खिलाफ प्लानिंग शुरू कर दी और लगातार अपराध से जुड़ी घटनाओं की वीडियो, क्राइम वेब सीरीज देखनी शुरू कर दीं.

घटना के एक हफ्ते पहले उस ने एक मैडिकल स्टोर से एक सर्जिकल ब्लेड खरीद कर अपने पास रख लिया था और पांडेय परिवार को गहरा दर्द देने के लिए उन की सारी कमजोरियों का अध्ययन किया. इस के लिए उस ने उन के एकलौते बेटे राज को चुना था. इस घटना को अंजाम देने के लिए क्रिकेट प्रेमी राज को फोन कर 2 दिन पहले किसी बहाने से उसे 10 जून, 2021 को इंदिरा नगर क्रिकेट मैदान से अपनी बाइक पर बैठा कर ले गया. वह बाइक को सुनसान इलाके में ले गया. सुनसान इलाका देख कर राज जब घबरा कर रोने लगा तो उस ने राज को मारापीटा. इस के बाद उस ने उस का फोन द्वारा संपर्क उस की मां से करवा कर उसे पत्थर से मार कर बेहोश किया.

फिर सर्जिकल ब्लेड से उस के हाथ की नसें काट कर उस की निर्मम हत्या कर दी. इस के बाद उस ने राज के घर वालों से राज के चाचा मनोज पांडेय का सिर काटने को कहा. फोन कर के वह वहां से निकल गया था. लेकिन 4 घंटे पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया था. सूरज साहू से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे कोर्ट में पेश कर के नागपुर की सेंट्रल जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक मामले की आगे की जांच थानाप्रभारी युवराज हांडे कर रहे थे.

—कथा में कंचन और कुसुम परिवर्तित नाम है