Hindi Crime Story: आशिकी का अंजाम

Hindi Crime Story: तुलसीराम से शादी हो जाने के बाद भी कीर्तिबाला ने पुराने प्रेमियों से मिलना जारी रखा. 3 बच्चों की मां बनने के बावजूद भी उस ने आशिकी का ऐसा खेल खेला कि उसे जेल जाना पड़ा.

23 सितंबर, 2015 की सुबह इंदौर के थाना ऐरोड्रम के थानाप्रभारी बलजीत सिंह अपने औफिस में पहुंचे ही थे कि लक्ष्मीबाई अपनी 9 साल की भतीजी चांदनी को ले कर उन के पास पहुंची. वह इलाके के ही अखंडनगर में रहती थी. उस का भाई तुलसीराम पिछले कई दिनों से लापता था. तुलसीराम शादीविवाह के कार्यक्रमों में खाना बनाने का ठेका लेता था. लक्ष्मीबाई के अनुसार, उस की भाभी कीर्तिबाला ने उसे बताया था कि तुलसीराम किसी शादी में खाना बनाने की बात कह कर गए हैं. जबकि यह बात सही नहीं है. हकीकत में कीर्तिबाला ने कुछ युवकों के साथ मिल कर तुलसीराम को मार डाला है और लाश को औटो में रख कर कहीं फेंक दिया है. मामला बेहद गंभीर था. थानाप्रभारी ने लक्ष्मीबाई से पूछा, ‘‘तुलसीराम की हत्या होने की बात तुम इतने दावे के साथ कैसे कह रही हो?’’

‘‘मैं यह सब इस आधार पर कह रही हूं कि मुझे इस बच्ची ने बताया है. यह तुलसीराम की बेटी है. इस ने अपनी आंखों के सामने पिता का कत्ल होते देखा है. आप इस से खुद मालूम कर सकते हैं.’’ लक्ष्मीबाई ने थानाप्रभारी को बताया.

बलजीत सिंह ने 9 साल की बच्ची चांदनी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछा तो उस ने पिता की हत्या किए जाने की सच्चाई उन्हें बता दी. इस के बाद बलजीत सिंह ने पूरे मामले से एसपी (सिटी) आर.एस. घुरैया को अवगत करा दिया. उन के निर्देश पर उन्होंने एक पुलिस टीम बनाई. इस पुलिस टीम ने सब से पहले तुलसीराम की पत्नी कीर्तिबाला को हिरासत में ले कर उस से पूछताछ की. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करती रही, लेकिन सख्ती करने पर उस ने पति की हत्या का राज उगल दिया. उस से की गई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस के प्रेमी विशाल जगताप, संजय सिंघल उर्फ चिंटू, संदीप जाधव और औटोचालक विशाल चालसे को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में जब पांचों अभियुक्तों का एकदूसरे से सामना हुआ तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उन की कहानी अब खत्म हो चुकी है. पुलिस ने उन सभी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए तुलसीराम की हत्या की जो कहानी बयां की, वह इस प्रकार थी. कीर्तिबाला मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी. उस के मातापिता दोनों ही काम पर जाते थे. घर की बड़ी बेटी होने की वजह से कीर्ति ही अपने अन्य भाईबहनों की देखभाल करती थी. कीर्ति जब जवानी में पहुंची तो मोहल्ले के आवारा किस्म के कई युवक उस पर डोरे डालने लगे. उन में से एक युवक कीर्ति का दूर का रिश्तेदार भी था. उस युवक का कीर्ति के घर काफी आनाजाना था.

कीर्ति उस पर विश्वास करती थी. वह मौका मिलने पर कीर्ति के साथ छेड़छाड़ करता था. लेकिन रिश्तेदार होने की वजह से कीर्ति ने न तो उस का विरोध किया और न ही इस की शिकायत अपने मांबाप से की. इस से उस युवक की हिम्मत बढ़ती गई. कीर्ति उम्र के जिस पड़ाव से गुजर रही थी, वह बड़ा ही फिसलनभरा होता है. उस रिश्तेदार की बातों में फंस कर कीर्ति फिसल गई. इस के बाद तो वह अपने मोबाइल पर उसे अश्लील फिल्में दिखाने लगा. उसी दौरान उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. इस के बाद यह सिलसिला बन गया.

फिर तो कीर्ति ऐसी बहकी कि उस के मोहल्ले के कई लड़कों से नाजायज संबंध हो गए. लेकिन जब बेटी के बहके कदमों की जानकारी मातापिता को हुई तो उन्होंने बिना देरी किए कीर्ति की शादी तुलसीराम के साथ कर दी. यह 10 साल पहले की बात है. तुलसीराम इंदौर के अखंडनगर में रहता था. वह शादीविवाह में ठेके पर खाना आदि बनवाने का काम करता था. उस के साथ इस काम में और भी लोग जुड़े थे. इसलिए उस के पास साल भर काम रहता था. इस से उसे अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. चूंकि अपने काम की वजह से वह रातों को घर से बाहर रहता था, इसलिए कीर्ति को उस का यह काम पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि पति ऐसा कोई काम करे, जिस से शाम को वह घर लौट आया करे.

इस बारे में कीर्ति ने बात की तो तुलसीराम कोई दूसरा काम करने के लिए राजी नहीं हुआ. वह अपना वही काम करता रहा. रातरात भर जागने के बाद तुलसी सुबह थकाहारा घर लौटता और गहरी नींद सो जाता. कीर्ति इसे पति की बेरुखी समझती. उसे तो कमउम्र में ही शारीरिक संबंध की लत लग गई थी. पति की बेरुखी पर उस ने जल्द ही अपने मायके के पुराने प्रेमियों से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. देखतेदेखते कीर्ति एक बेटी और 2 बेटों की मां बन गई. तुलसीराम के साथ कृष्णबाग कालोनी में रहने वाला संजय उर्फ चिंटू भी काम करता था. काम के सिलसिले में वह अकसर तुलसी के घर आताजाता रहता था. चिंटू अविवाहित था. कीर्ति के सौंदर्य ने उसे पहली ही नजर में अपना दीवाना बना दिया था. इसलिए वह जब भी उस के घर आता, उस से अधिक से अधिक बातें करने के फेर में रहता.

कीर्ति तो इस खेल की पुरानी खिलाड़ी थी. इसलिए वह जल्द ही उस की नजरों को भांप गई. ॐस ने भी उसे आमंत्रण देते हुए उस के मन की आग को हवा देनी शुरू कर दी. चिंटू जब कभी कीर्ति के घर आता, उस से हंसीमजाक करता. उस की हंसीमजाक का वह उसी के अंदाज में जवाब देती थी. इस से वे एकदूसरे के करीब आते चले गए और फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों की इच्छाएं पूरी हो गईं. उस दिन के बाद चिंटू और कीर्ति दुनिया से नजरें बचा कर इस अनैतिक रास्ते पर चल पड़े. चिंटू का एक दोस्त था विशाल जगताप. चिंटू ने कीर्ति के साथ अपने संबंधों की कहानी विशाल को सुनाई तो उस ने भी चिंटू के साथ कीर्ति के घर आनाजाना शुरू कर दिया. क्योंकि कीर्ति के किस्से वह भी अन्य लोगों से सुन चुका था.

इसलिए उस से संबंध बनाने की उस की भी लालसा जाग उठी थी. नएनए लड़कों से संबंध बनाने की कीर्ति की लत लग चुकी थी. उस ने जल्द ही विशाल को भी अपने सांचे में उतार लिया. फिर एक समय ऐसा आया कि चिंटू और विशाल अकसर कीर्ति के पास आने लगे. कीर्ति की बेटी चांदनी 9 साल की हो चुकी थी. इतनी बड़ी बेटी से कीर्ति को न कोई शरम थी और न कोई डर. वह बेटी को बाहर के कमरे में बैठा कर अपने प्रेमियों के साथ दरवाजा बंद कर के मौजमस्ती करती थी. लेकिन कहते हैं कि पाप ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता.

आखिर कीर्ति के अवैध संबंधों की जानकारी तुलसीराम को किसी तरह हो ही गई. पत्नी की सच्चाई जान कर तुलसीराम को बड़ा दुख हुआ. उस ने कीर्ति को समझाया. लेकिन वह कहां मानने वाली थी. तुलसीराम को इस बात की चिंता थी कि मां की गलत आदतों का असर बेटी चांदनी पर न पड़े. इसलिए वह बेटी को अकसर समझाता रहता था. चांदनी भी मां की हरकतों की जानकारी तुलसी को देती रहती थी, जिस से वह परेशान रहने लगा. तब उस ने न केवल कीर्ति पर सख्ती बरतनी शुरू की, बल्कि चेतावनी दी कि यदि उस ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह आत्महत्या कर लेगा.

इन बातों का कीर्ति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था. उस का अपने प्रेमियों से पहले की ही तरह मिलनाजुलना जारी रहा. रोज नए युवकों के साथ वक्त बिताना उस की जैसे आदत बन चुकी थी. पति की रोजरोज की किचकिच से वह उकता गई. एक तरह से उसे अब पति में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी. वह उस से निजात पाना चाहती थी, ताकि उस से कोई टोकाटाकी न कर सके. कीर्ति ने पति की लाखों रुपए की संपत्ति पहले ही अपने नाम करा ली थी. इस के बाद उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अपने प्रेमी विशाल से बात की. विशाल ने उस से वादा किया कि तुलसीराम की हत्या के बाद वह उस से शादी कर लेगा.

यह काम विशाल अकेले नहीं कर सकता था, लिहाजा उस ने इस काम को अंजाम देने के लिए अपने 2 दोस्तों, चिंटू और संदीप को भी राजी कर लिया. फिर योजना बना कर कीर्ति ने एक दिन विशाल, चिंटू और संदीप को अपने यहां बुला कर एक कमरे में छिपा दिया. रात को तुलसीराम घर लौटा तो खाना खाने के बाद वह बिस्तर पर जा कर लेट गया. थोड़ी देर में उसे नींद आ गई. तभी कीर्ति भी उस के पास जा कर लेट गई. कीर्ति ने पहले तो पति को हिलाडुला कर देखा कि वह सो रहा है या जाग रहा है? जब तुलसीराम ने कोई हरकत नहीं की तो उस ने फटाफट अपना दुपट्टा उतार कर पति के गले में लपेट दिया और उस के दोनों सिरे पलंग के दोनों ओर लटका दिए.

इस के बाद उस के आवाज देने पर उस के दोनों प्रेमी विशाल और चिंटू कमरे में आ गए. आते ही उन्होंने दुपट्टे के दोनों सिरे खींचने शुरू कर दिए तो संदीप तुलसीराम के पैरों पर बैठ गया. उसी समय तुलसीराम की बेटी चांदनी की आंखें खुल गईं. वह उन तीनों को पहचानती थी. पिता को तड़पता देख कर वह चीखी तो कीर्ति ने झट से उस का मुंह बंद कर लिया और 2 थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिए.

इस के बाद वह उसे किचन में ले गई. वह उसे डराते हुए बोली, ‘‘खबरदार, किसी को बताया तो तुझे भी मार डालूंगी.’’

मां की धमकी से बच्ची डर गई. तुलसीराम की हत्या करने के बाद उन्हें लाश ठिकाने लगानी थी. इस के लिए उन्होंने लाश को बांध कर विशाल के औटो में रख दिया. लाश को ये नैनोद के पास ले गए और वहीं पर बने एक ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर लाश उस में डाल दी. इन का सोचना था कि लाश वहां से काफी दूर बह जाएगी और पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाएगी.

बेटी कहीं मुंह न खोल दे, इसलिए कीर्ति अगले दिन भी उसे डराती रही. उसी दिन दोपहर के समय तुलसीराम का भाई शिवकुमार और बहनोई घर आए तो उन्होंने कीर्ति से तुलसीराम के बारे में पूछा. तब कीर्ति ने उन्हें बताया कि वह किसी शादी में खाना बनाने गए हैं. वहां मौजूद चांदनी उन्हें सचाई बताना चाहती थी, लेकिन जब उस ने कीर्ति की तरफ देखा तो मां ने आंखें तरेरी तो वह डर गई. कीर्ति ने पति को ठिकाने लगाने वाली बात अपनी मां वंदना को भी बता दी थी. नानी वंदना ने भी चांदनी को पीटा और कहा कि अगर उस ने किसी से कुछ बोला तो उसे भी मार कर कहीं फेंक देंगे. शाम को तुलसीराम की बहन लक्ष्मीबाई घर आई तो वह चांदनी को अपने घर ले गई. तब चांदनी ने बुआ को सारी बात बता दी.

अगले दिन सुबहसुबह लक्ष्मीबाई चांदनी को ले कर थाना ऐरोड्रम पहुंची और थानाप्रभारी बलजीत सिंह को पूरी कहानी बता दी. हत्या का खुलासा होने पर डीआईजी संतोष कुमार सिंह और एसपी (पश्चिमी) डी. कल्याण चक्रवर्ती भी थाने पहुंच गए. उन्होंने भी अभियुक्तों से पूछताछ की. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर तुलसीराम की लाश बरामद कर ली. पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा संकलन तक तुलसीराम के तीनों बच्चे अपनी बुआ के पास थे. पति की हत्या करने का कीर्ति को तनिक भी अफसोस नहीं था.

जेल जाते समय उस ने कहा कि उसे अब बच्चों से कोई मतलब नहीं है. जेल से छूटने के बाद वह विशाल के साथ शादी कर अपनी गृहस्थी नए सिरे से बसाएगी.

Pathankot Attack: भारत की अस्मिता पर – आतंकी हमला

Pathankot Attack: पाक आतंकियों द्वारा भारत में घुसपैठ कर के आतंकी हमले करना कोई नई बात नहीं है. पठानकोट एयरबेस का हमला भी पाक आतंकियों की सोचीसमझी रणनीति थी. इस हमले में भारत के 7 जवान शहीद हुए, लेकिन राहत की बात यह है कि पहली बार पाकिस्तान अपने यहां बैठे आतंकियों के आकाओं के विरुद्ध काररवाई करने की बात कर रहा है. पर क्या ऐसा होगा?

किसी निहायत सनसनीखेज कांड को अंजाम देने की भूमिका तभी सामने आ गई थी, जब दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 29 दिसंबर, 2015 को एयरफोर्स के बर्खास्त नान कमीशंड औफिसर रंजीत के.के. को पंजाब के बठिंडा से गिरफ्तार किया था. उस पर पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई को गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध कराने का आरोप था.

दरअसल, बठिंडा में तैनात रंजीत को एक अज्ञात महिला ने सोशल साइट फेसबुक पर जाल में फांस कर एयरफोर्स की गोपनीय जानकारी हासिल कर ली थी. दिल्ली पुलिस की इस काररवाई से पंजाब पुलिस पूरी तरह अनजान थी. जांच से जुड़े दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी के बताए अनुसार, जासूसी रैकेट में अब तक सेना और बीएसएफ के एकएक जवान और एक पूर्वसैनिक सहित 5 लोग गिरफ्तार किए जा चुके थे. दिल्ली पुलिस इस मामले में पूरी गंभीरता से जांच कर रही थी, ताकि षडयंत्रकारियों की जड़ तक पहुंच सके.

24 वर्षीय रंजीत केरल के मलप्पुरम जिले का रहने वाला था. उस ने सन 2010 में इंडियन एयरफोर्स जौइन की थी. सन 2013 में उसे अपने फेसबुक एकाउंट पर दामिनी मैकनोट के नाम से एक महिला की फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट मिली थी, जिसे उस ने खुशी से स्वीकार कर लिया था. दामिनी ने अपने प्रोफाइल में बताया था कि वह देशदुनिया की खबरों पर आधारित यूके की एक पत्रिका में फीचर राइटर है. रंजीत के मैसेज बौक्स में उस ने अपना निजी मोबाइल नंबर छोड़ कर उस से बात करने की गुजारिश की थी. रंजीत ने उस नंबर पर बात की तो दोनों की अच्छीभली दोस्ती हो गई.

कुछ दिन प्यार भरी मीठीमीठी बातें करते रहने के बाद एक दिन उस ने रंजीत से यह कहते हुए भारतीय वायु सेना से संबंधित कुछ जानकारियां मांगी कि वह इस विषय पर अपनी पत्रिका के लिए एक फीचर तैयार करना चाहती है. रंजीत पहले ही उस के हनीट्रैप में फंस चुका था. उस ने जो भी जानकारी चाही, रंजीत ने बेझिझक दे दी. रंजीत को किसी मामले में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. इस के बाद ही वह दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने 4 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर उस से गहन पूछताछ की. उम्मीद थी कि उस से कई बड़े खुलासे होंगे.

दिल्ली में अभी यह सब चल ही रहा था कि पंजाब में इस बीच एक बड़ी अनहोनी हो गई. पहली जनवरी, 2016 की भोर में पठानकोट के थाना नरोट जैमलसिंह के अधीन पड़ने वाली रावी नदी पर बनी कंबलौर पुलिया के पास एक लावारिस लाश मिली. उस से थोड़े फासले पर एक गाड़ी खड़ी थी. अनुमान लगाया गया कि मरने वाला उसी गाड़ी का ड्राइवर रहा होगा. अभी यह गुत्थी सुलझ भी नहीं पाई थी कि एक अन्य सनसनीखेज समाचार चर्चा का विषय बन गया. पता चला कि विगत रात पठानकोट के एसपी (हैडक्वार्टर) रहे सलविंदर सिंह को आतंकियों ने अपहृत कर के उन से बुरी तरह मारपीट की और उन्हें एक सुनसान जगह पर छोड़ दिया और अपने साथ उन की नीली बत्ती लगी गाड़ी ले गए.

जिस ड्राइवर की लाश बरामद की गई थी, पुलिस छानबीन में उस के बारे में यह जानकारी सामने आई कि वह थाना नरोट जैमलसिंह के तहत आने वाले गांव भगवाल का रहने वाला 35 वर्षीय इकागर सिंह था. वह अपनी इनोवा गाड़ी टैक्सी के रूप में चलाया करता था. पिछली रात करीब 9 बजे कुछ लोगों ने फोन कर के उस की गाड़ी किराए पर ली थी और उसे कहीं अज्ञात जगह पर बुलाया था. तब से वह अपनी गाड़ी समेत घर से गायब था. भोर में अड्डा कोहलियां के नजदीक से जब उस की गाड़ी बरामद की गई तो गाड़ी के चारों पहियों की हवा निकली हुई थी. गाड़ी को और भी काफी नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया था.

उस जगह से थोड़ी दूरी पर स्थित कंबलौर पुलिया के पास से ड्राइवर इकागर सिंह की लाश मिली थी. लाश पर चाकुओं के अनगिनत जख्म थे. यह सीधे कत्ल का मामला था. एसपी सलविंदर सिंह का 2 दिन पहले पठानकोट से तबादला हुआ था, मगर अभी तक उन्होंने अपना चार्ज नहीं छोड़ा था. पहली जनवरी की भोर में गुलपुर सिंबली गांव पहुंच कर उन्होंने किसी के फोन से पुलिस हैडक्वार्टर को सूचित किया था कि वह अपने एक रसोइए व करीबी दोस्त राजेश वर्मा के साथ इलाके के एक धार्मिक स्थल पर मत्था टेकने गए थे. जब वह अपनी महिंद्रा एक्सयूवी गाड़ी नंबर पीबी02ए बी0313 से वापस घर लौट रहे थे तो रास्ते में फौजी वर्दी पहने 2 व्यक्तियों ने सड़क पर सामने आ कर उन्हें रुकने का इशारा किया.

गाड़ी रुकने पर 3 अन्य व्यक्ति भी वहां आ गए. इस के बाद उन लोगों ने खतरनाक हथियारों के बल पर उन का अपहरण कर लिया. गाड़ी में सलविंदर सिंह को उन के रसोइया से मारपीट कर के गुलपुर सिंबली के पास उन्हें गाड़ी से उतार दिया गया, जबकि उन के साथी राजेश वर्मा को आतंकवादी अपने साथ ले गए. उन के सेलफोन भी आतंकियों ने पहले ही हथिया लिए थे. यह गंभीर मामला पुलिस की जानकारी में आया तो पठानकोट व गुरदासपुर में रेडअलर्ट जारी कर के चारों तरफ सख्त नाकाबंदी कर दी गई.

कुछ देर बाद राजेश वर्मा भी पुलिस से संपर्क साधने में सफल हो गया. उस की बुरी तरह पिटाई करने के साथ ऐसा लग रहा था, जैसे उस की गर्दन काटने का भी प्रयास किया गया था. उस की गर्दन पर तेजधार हथियार का गहरा घाव था. जिस पर उस ने अपनी कमीज बांध रखी थी. कमीज खून से पूरी तरह लाल हो गई थी. राजेश को तुरंत सिविल अस्पताल में दाखिल करा दिया गया. चेकिंग के दौरान पुलिस को पठानकोट के गांव अकालगढ़ के नजदीक एक वीरान जगह से एसपी सलविंदर सिंह की गाड़ी खड़ी मिल गई.

इनोवा चालक इकागर सिंह के कत्ल के संबंध में थाना नरोट जैमलसिंह में केस दर्ज करने और एसपी व उन के साथियों के अपहरण के मामले में गुरदासपुर के सदर थाना में आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के बाद पठानकोट के एसएसपी रवींद्र कुमार बख्शी व गुरदासपुर के एसएसपी गुरप्रीत सिंह तूर अपनी विशेष पुलिस टीमों के साथ मामले की तह में जाने और वांछित आतंकियों की धरपकड़ के लिए जुट गए. मगर देर रात तक न तो पुलिस के हाथ कोई आतंकी लगा और न ही उन के बारे में कहीं से अन्य कोई सुराग मिल पाया.

इस बीच स्थिति का जायजा लेने के लिए पहली जनवरी की सुबह ही एडीजीपी (ला एंड और्डर) हरदीप सिंह ढिल्लो, बौर्डर रेंज के आईजी लोकनाथ आंगरा व डीआईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह, चंडीगढ़ और अमृतसर से पठानकोट आ पहुंचे. उन के आते ही पुलिस और सेना का जौइंट सर्च औपरेशन शुरू करवा दिया गया.

पुलिस के ये तीनों उच्चाधिकारी दिन भर एसपी सलविंदर सिंह से पूछताछ करते रहे. उन्हें अपना यह कनिष्ठ औफिसर संदेह के दायरे में आता दिख रहा था. यों भी इस एसपी का पिछला आचरण सही नहीं माना जा रहा था. एक साथ 5 महिला सिपाहियों ने उस के खिलाफ गलत आचरण की शिकायत की थी, जिस आधार पर उस का पठानकोट से ट्रांसफर किया गया था. मगर वह तुरंत रिलीव हो कर नई जगह पर जौइन करने के बजाय पठानकोट में ही जमा हुआ था.

अभी 5 महीने पहले ही गुरदासपुर के कस्बा दीनानगर में बड़ी आतंकवादी वारदात हुई थी. आतंकियों ने यहां के पुलिस स्टेशन को अपने कब्जे में ले लिया था. मौजूदा स्थिति को देखते हुए सेना ने आशंका जताई कि इस बार भी आतंकवादियों की ओर से वैसा ही कोई हमला हो सकता है. इसलिए इन बातों को नजरअंदाज न कर के पूरी सुरक्षा व्यवस्था कर ली गई थी. मगर सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की मुस्तैदी के दावों के बावजूद 2 जनवरी, 2016 की अलसुबह ठीक सवा 3 बजे आतंकवादी पठानकोट के एयरफोर्स स्टेशन में हथियारों समेत दाखिल होने में कामयाब हो गए. उन लोगों ने एयरफोर्स स्टेशन में दाखिल होते ही अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.

इस में डिफेंस सिक्योरिटी कोर के औफिसर औनरेरी कैप्टन फतेह सिंह व हवलदार कुलवंत सिंह शहीद हो गए, साथ ही अन्य कई जवान भी जख्मी हुए. हालांकि मरने से पूर्व बुरी तरह जख्मी हो जाने पर भी फतेह सिंह व कुलवंत सिंह ने 20 मिनट तक आतंकवादियों को आगे बढ़ने से रोके रखा था. इस बीच हमले की जानकारी मिलते ही एयरफोर्स के अनेक अधिकारी तो घटनास्थल के पास पहुंचे ही, पठानकोट की विशेष पुलिस फोर्स ने भी वहां पहुंच कर एयरफोर्स स्टेशन की समूची हद को चारों तरफ से पूरी तरह से सील कर दिया. भीतर छिपे आतंकियों से निपटने के लिए समूची कमान एयरफोर्स के साथ एनएसजी कमांडोज व भारतीय सेना के जवानों ने भी मोर्चा संभाल लिया. यह औपरेशन लगातार 17 घंटे से भी अधिक समय तक चला.

इस दौरान कई बार अतिरिक्त फौज भी बुलाई गई. बख्तरबंद गाडि़यों की भी मांग की जाती रही. आतंकवादियों की ओर से इन गाडि़यों के बुलेटप्रूफ कांच पर अंधाधुंध फायरिंग कर के इन के भीतर बैठे जवानों को नुकसान पहुंचाने के प्रयास लगातार किए जाते रहे, मगर इन गाडि़यों पर एके 47 असाल्ट राइफल की फायरिंग का भी कोई असर नहीं हुआ. देर शाम एयरफोर्स स्टेशन में एक टैंक भेजा गया. स्थिति का जायजा लेने के लिए इस्तेमाल में लाए गए एमआई 35 हेलीकौप्टरों से रुकरुक कर फायरिंग की गई. इन हेलीकौप्टरों में जीपीएस सिस्टम के साथ ऐसे कैमरे भी फिट हैं, जो दूरदराज के कोनों तक के भी साफ फोटो ले सकते हैं, जिन्हें देख कर अचूक निशाना साधा जा सकता है.

इस तरह की आधुनिक तकनीक व मारक हथियारों की मदद से सुरक्षाबलों ने एकएक कर के एयरफोर्स स्टेशन में घुसे 5 आतंकवादियों को मार गिराया. भीतर घुस आए आतंकवादियों ने औनरेरी कैप्टन फतेह सिंह व हवलदार कुलवंत सिंह का 20 मिनट तक मुकाबला कर के उन्हें शहीद करने के बाद कैंटीन का रुख कर लिया था. यहां धुआंधार फायरिंग कर के उन्होंने जिन जवानों को जख्मी किया, वे थे—सूबेदार मेजर दलबीर सिंह, नायक वेदव्यास, लांस नायक किशोरीलाल, सिपाही बिशनदास, सिपाही करतार सिंह, नायक गौरव, नायक बी.एस. जोर, हवलदार जसपाल, रोहित शर्मा व भूप सिंह, एनएसजी कमांडोज व डिफेंस सिक्योरिटी कोर के भी कई जवान घायलों में शामिल थे.

एयरफोर्स स्टेशन में हवाई फौज के मिग-21 लड़ाकू जहाज व एमआई-24 हेलीकौप्टरों समेत अन्य सैन्य साजोसामान मौजूद था, जिन्हें आतंकवादी नुकसान पहुंचा सकते थे. मगर यहां पर तैनात फोर्स की मुस्तैदी की वजह से आतंकवादी इन तक पहुंचने में सफल नहीं हो सके. जिस बर्खास्त एयरफोर्स अधिकारी रंजीत को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने काबू किया था, उस से जब इस मुद्दे पर पूछताछ की गई तो उस ने माना कि इस हमले की उसे पहले से ही जानकारी थी, साथ ही उस ने बताया कि पठानकोट के अलावा बठिंडा व जैसलमेर भी आतंकवादियों के निशाने पर हैं.

इस से पहले 30 अगस्त, 2015 को पठानकोट पुलिस ने एयरमैन सुनील कुमार को गिरफ्तार किया था. वह फेसबुक के जरिए हनीट्रैप में फंस कर एक लड़की के माध्यम से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को एयरफोर्स की गुप्त सूचनाएं लीक कर रहा था. मगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के लंबी पूछताछ के बाद छोड़ दिया था. जाहिर है, अब ये गलतियां नहीं दोहराई जा सकती थीं. दिल्ली पुलिस ने बठिंडा से पकडे़ गए रंजीत के कस्टडी रिमांड की अवधि बढ़ा कर उस से महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर पूछताछ शुरू कर दी. इस बीच बठिंडा कैंट की जबरदस्त सुरक्षा बढ़ा कर पंजाब सहित पूरे देश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया.

चर्चा यह थी कि पठानकोट एयरबेस में घुसे आतंकी अगर अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते तो वहां भारी नुकसान पहुंचा सकते थे. इस के बावजूद यह कहना गलत न होगा कि माल का नुकसान भले ही ज्यादा न सही, बेशकीमती जानों का नुकसान तो उन लोगों ने कर ही दिया था. गांव झंडा गुज्जरां के शहीद कैप्टन फतेह सिंह राजपूत सेना की 16 डोगरा रेजीमेंट से बतौर कैप्टन रिटायर हो कर अपने परिवार के साथ मध्य प्रदेश में रह रहे थे. कुछ वर्ष पहले वह फिर सेना में बतौर अफसर डीएससी कोर में शामिल हो गए थे. फतेह सिह सेना में अंतरराष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज थे. वह एशिया और अन्य कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों में निशानेबाजी में अनेक पदक जीत चुके थे. उन का एक बेटा गुरदीप सिंह दीपू भी सेना में तैनात है.

दूसरे शहीद हवलदार कुलवंत सिंह सन 1985 में आर्टिलरी सेना के केंद्र हैदराबाद में बतौर सिपाही भरती हुए थे. सन 2004 में रिटायरमेंट के बाद वह घर आ गए. सन 2006 में वह फिर सेना की डीएससी (डीसैंस सिक्योरिटी कौप) सेवा में भरती हो गए. 2 माह पहले ही वह ओडिशा से ट्रांसफर हो कर पठानकोट की एयरबेस में ड्यूटी पर आए थे. शहीद होने से एक दिन पहले ही वह अपने घर वालों से मिल कर वापस ड्यूटी पर पहुंचे थे.

पठानकोट पर यह आतंकी हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा के एक सप्ताह बाद हुआ था. ऐसे में सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि दोनों देशों के सुधरते रिश्तों पर इस का क्या असर होगा? वैसे पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस हमले की कड़े शब्दों में आलोचना कर के सकारात्मक संदेश देने के प्रयास किए हैं. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की मुहिम में भारत के साथ है. इस परिप्रेक्ष्य में भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना बयान इस तरह से जारी किया, ‘हम न केवल पाकिस्तान, बल्कि अपने सभी पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं. लेकिन भारत पर अगर कोई आतंकी हमला होता है तो हम उस का करारा जवाब देंगे.’

वैसे अब तक की छानबीन में यह बात सामने आई है कि पठानकोट हमले में जैशएमोहम्मद का हाथ है. इस हमले में सन 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान अपहरण व दिसंबर, 2001 में संसद पर हुए हमले से जुड़े आतंकवादियों का ही हाथ है. संदर्भवश बता दें कि आतंकवादी अफजल गुरु के बाद आतंकियों ने अपने संगठन को दूसरे तरीके से तैयार किया है और फिदायीन हमलावरों की टोली बनाई है. इन्हें ट्रेनिंग देने का काम युद्धस्तर पर शुरू किया गया. कश्मीर में आतंकवादियों के एनकाउंटर से जुड़े सुरक्षा अधिकारियों ने सीधेसीधे आशंका जताई है कि पठानकोट हमले में सन 2001 में संसद पर हुए हमले के दोषी अफजल गुरु से जुड़े लोगों का हाथ है.

इन लोगों ने सन 2014 में स्क्वैड औफ जैश नामक संगठन बनाया था. गुरु उत्तरी कश्मीर के सोपोर क्षेत्र का रहने वाला था, जिसे फरवरी, 2013 में तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई थी. इस से पहले जैश नामक आतंकी संगठन को मौलाना मसूद अजहर ने बनाया था. अजहर वही आतंकी है, जिसे सन 1999 में हाइजैक हुए इंडियन एयरलाइंस के विमान को अफगानिस्तान के कंधार ले जा कर रिहा करवा लिया गया था.  यह घटनाक्रम कुछ इस तरह से था कि 24 दिसंबर, 1999 को 5 हथियारबंद आतंकवादियों ने 178 यात्रियों के साथ इंडियन एयरलाइंस के आईसी-814 विमान को काठमांडू से हाइजैक कर लिया था. वे उसे अफगानिस्तान के कंधार एयरपोर्ट पर ले गए. वहां 25 साल के भारतीय नागरिक रूपेन कत्याल की हत्या कर के उस के शव को प्लेन से बाहर फेंक दिया गया था.

आतंकियों ने भारत के सामने 178 यात्रियों की हिफाजत के बदले 3 आतंकियों की रिहाई का सौदा किया. उस वक्त की वाजपेयी सरकार ने पैसेंजरों की जान बचाने के लिए तीनों आतंकियों को छोड़ने का फैसला किया. तब भारत की जेलों में बंद आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर व अहमद उमर सईद शेख को कंधार ले जा कर रिहा किया गया था.

बहरहाल, ताजा पठानकोट आतंकी हमले की छानबीन में यह बात सामने आई है कि हमला करने वाले आतंकवादी अपने पाकिस्तानी आकाओं से निरंतर संपर्क में थे. उन आकाओं ने इन आतंकवादियों के लिए पाकिस्तानी फोन नंबर का इस्तेमाल कर एक टोयोटा इनोवा टैक्सी की व्यवस्था की थी. रास्ते में टैक्सी का रिम खराब होने के कारण आतंकवादी उस से उतर गए थे. उस के बाद उन्होंने एसपी सलविंदर सिंह से उन की गाड़ी छीन ली. उन का मोबाइल फोन भी छीन लिया गया, जिस से एक आतंकवादी ने पाकिस्तान बात की थी.

खैर, पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले से एक बार तो लगा कि अंदर घुसे सभी आतंकवादियों का सफाया कर दिया गया है, मगर 3 जनवरी को गोलियां चलने का क्रम फिर से शुरू हो गया. अचानक बनी इस स्थिति से यह अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा था कि एयरबेस में अभी कितने और आतंकी छिपे हैं और उन के पास किस तरह के हथियार हैं, कैसी विस्फोटक सामग्री है? अभी तक तो यही समझा जा रहा था कि कुल 5 आतंकवादी थे और वे मारे जा चुके हैं.

उस दिन एक अति दुखद घटना यह घटी कि एक आतंकी की लाश को हटाते वक्त भयानक विस्फोट हुआ, जिस में एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन ई. कुमार शहीद हो गए. साथ ही 6 कमांडो भी गंभीर रूप से घायल हो गए. रविवार सुबह करीब साढ़े 8 बजे लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन एनएसजी के कमांडो के साथ एक आतंकी का शव उठवाने गए थे. तभी आतंकी के शव पर लगे आईईडी में विस्फोट हो गया था. अब तक 5  आतंकियों के मारे जाने का अनुमान था, जिन में से 4 के शव बरामद कर लिए गए थे. जबकि वायु सेना के शहीद हुए जवानों की संख्या 7 तक पहुंच गई थी.

लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन पर एनएसजी (नैशनल सिक्योरिटी गार्ड) को ही नहीं, पूरी आर्म्ड फोर्स को नाज था. उन का जन्म बंगलुरू में बीईएमएल के अधिकारी ई.के. शिवरंजन के यहां हुआ था. उनके 2 भाई व 1 बहन हैं. मां का निधन बचपन में ही हो गया था. निरंजन अपने पीछे विधवा डा. के.जी. राधिका व 2 साल की बेटी विस्मय को छोड़ गए हैं. निरंजन एनएसजी के बम निरोधक दस्ते के सदस्य थे. पठानकोट एयरबेस में वह एनएसजी की टीम को लीड कर रहे थे. एयरबेस में सुरक्षाबलों व आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ अभी भी जारी थी. इस बीच शहीद हुए शूरवीरों की शौर्यगाथाएं भी बाहर आने लगी थीं.

गरनाला, अंबाला सिटी के रहने वाले 28 वर्षीय गुरसेवक सिंह अपने फौजी पिता व बड़े भाई की तरह करीब 6 साल पहले भारतीय वायु सेना में भरती हुए थे. बचपन से ही दिलेर रहे गुरसेवक को एयरफोर्स की गरुड़ कमांडो विंग का हिस्सा बनते देर नहीं लगी. अपनी इस नौकरी से वह बहुत खुश थे. उन की शादी 18 नवंबर, 2015 को कुराली की रहने वाली जसप्रीत कौर से हुई थी. लंबी छुट्टी काटने के बाद उन्होंने 20 दिसंबर को फिर से अपनी ड्यूटी जौइन की थी. पहली जनवरी, शुक्रवार की आधी रात में ही उन्हें पठानकोट एयरबेस पहुंचने का आदेश मिला और वह अपनी टीम के साथ तत्काल वहां के लिए कूच कर गए.

अगले दिन बहादुरी दिखाते हुए उन्होंने अपनी जान देश पर न्यौछावर कर दी. त्रासदी यह कि उन की विधवा जसप्रीत कौर के हाथों की मेहंदी भी अभी नहीं छूट पाई थी. ऐसे ही डीएससी कोर के सिपाही संजीव कुमार राणा, जगदीशचंद व करतार सिंह भी अपनी जांबाजी के सबूत दे कर वतन के लिए जान दे कर अपनी शौर्यगाथाएं छोड़ गए. 4 आतंकियों की पहली टुकड़ी ने जब एयरबेस की मैस में घुस कर फायरिंग शुरू की थी, तब जगदीशचंद खाना बना रहे थे.

उन की आंखों के सामने आतंकियों ने 3 जवानों को मौत के घाट उतार दिया तो जगदीश निहत्थे ही आतंकियों के पीछे दौड़ पड़े. एक आतंकी की राइफल छीन कर उस पर गोलियों की बौछार करते हुए उसे मौत के घाट उतारने के बाद वह दूसरे आतंकी की ओर बढ़े. मगर तब तक बाकी बचे तीनों आतंकियों ने उन्हें घेर लिया था. तीनों ने एक साथ उन पर इतनी गोलियां चलाईं कि उन का पूरा जिस्म गोलियों से छलनी हो गया. इस आतंकवादी घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है.

पाकिस्तानी मीडिया का कहना है कि भारतीय वायु सेना के प्रमुख अड्डे पर हुआ यह आतंकी हमला दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ता की राह में रोड़ा साबित होगा. भारतीय मीडिया की भी यही राय है. यह हमला चूंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की औचक लाहौर यात्रा के एक हफ्ता बाद हुआ था, इसलिए इसे पुरानी घटनाओं से जोड़ते हुए पाकिस्तान की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं. बहरहाल, पठानकोट एयरबेस में तीसरे दिन भी मुठभेड़ जारी रही. सुरक्षाबलों ने उस इमारत को टैंक से उड़ा दिया, जिस में आतंकवादियों के छिपे होने की आशंका थी. इस प्रयास में एक आतंकवादी का शव मिला, जबकि वहां और भी आतंकवादियों के छिपे होने का अनुमान था.

आतंकवादी हमले के पीछे की पूरी साजिश की जांच के लिए एनआईए ने 4 जनवरी को 3 मामले दर्ज कर के पुलिस अधीक्षक रैंक की अगुवाई में एक विशेष टीम का गठन किया. 5 जनवरी को देश के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने पठानकोट पहुंच कर संवाददाता सम्मेलन का आयोजन किया और इस बात की घोषणा की कि एयरबेस में घुसे सभी 6 आतंकियों को मार गिराया गया है. अब कौंबिंग औपरेशन को अंजाम दिया जा रहा है.

6 जनवरी को चंडीमंदिर स्थित वैस्टर्न कमांड के मुख्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल के.जी. सिंह ने बताया कि इस औपरेशन को इसलिए सफलतम कहा जा सकता है, क्योंकि इसे अंजाम देते वक्त करीब 11 हजार आम नागरिकों व 23 विदेशी नागरिकों की जिंदगी बचाने में भी सफलता मिली है. उल्लेखनीय है कि इस एयरबेस में लगभग 3 हजार परिवार रहते हैं और 4 मित्र देशों के 23 सैनिक प्रशिक्षण के लिए यहां आए हुए थे.

जांच एजेंसियां इस हमले की गहराई में जाने को पूरी तरह प्रयासरत हैं. जांच एजेंसियों का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने गुरदासपुर के पुलिस अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं पर विचार करने के लिए 1 जनवरी, 2016 को शाम साढ़े 7 बजे बैठक बुलाई थी, जबकि आतंकी तब तक वायु सेना परिसर के निकट पहुंच चुके थे.

जांचकर्ताओं के अनुसार, यह तो तय है कि आतंकी पाकिस्तान से ही आए थे. वायु सेना हवाईअड्डे पर थर्मल इमेजिज उपकरण में लगे कैमरे में जो तसवीरें कैद हुई हैं, उन्होंने भी जांच एजेंसियों की काफी मदद की है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के कुछ अधिकारियों का मानना है कि पहली जनवरी को आतंकियों के पास तीनों मोबाइल फोन एक्टिव रहे. इन में एक फोन ज्वैलर राजेश वर्मा का था, जिस से पाकिस्तान में काल की गई थी. दूसरा फोन एसपी सलविंदर सिंह व तीसरा उन के रसोइए मदनगोपाल का था. एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या 10 घंटे तक पठानकोट हवाईअड्डे के निकट आतंकियों को स्थानीय मदद मिली थी. एनआईए का मानना है कि मृत आतंकियों की वस्तुओं को देखने से पता चलता है कि वे बहावलपुर से संबंध रखते हैं, जोकि जैशएमोहम्मद का मुख्यालय है.

जांचकर्ताओं के लिए यह जांच का मुख्य मुद्दा है कि 1 जनवरी की सुबह पठानकोट पहुंचे आतंकी मध्यरात्रि तक वायु सेना परिसर में दाखिल होने का इंतजार करते रहे. इन 10 घंटों केदौरान वे कहां रुके, इस का पता लगाया जाना निहायत जरूरी है. इसी से यह बात सामने आ सकती है कि क्या इन आतंकियों को वहां रुकने में किसी ने मदद की थी.

आईबी (इंटेलीजेंस ब्यूरो) ने बीएसएफ व पंजाब पुलिस को 3 महीनों में 3 अलगअलग अलर्ट भेजे थे, जिन में आतंकियों की संभावित घुसपैठ का उल्लेख किया गया था. इन संदेशों में यह भी बताया गया था कि कितने आतंकी घुसपैठ करने को तैयार बैठे हैं. सब से ताजा अलर्ट में कहा गया था कि औटोमैटिक हथियारों व हैंडग्रेनेड के साथ 6 आतंकी पाकिस्तानी पंजाब के मसरूर बड़ा भाई गांव में बैठे हुए हैं तथा भारत में दाखिल हो कर तबाही मचाने की सोच रहे हैं. हालांकि इस अलर्ट में यह नहीं बताया गया था कि ये आतंकी किस दिन, किस वक्त व भारत के किस क्षेत्र में दाखिल होंगे. इतना जरूर कहा गया था कि ये आतंकी घुसपैठ के लिए उचित समय का इंतजार कर रहे हैं तथा उत्तरी पंजाब के हिस्से बमियाल से घुसपैठ कर सकते हैं.

इस से पहले अक्तूबर व नवंबर महीने में भी अलर्ट भेजे गए थे. इंटेलीजेंस अधिकारियों का कहना है कि आतंकियों की घुसपैठ के सही दिन के बारे में बताना कठिन होता है. वे उचित समय की प्रतीक्षा में रहते हैं और अंतिम समय में ही एकदम से घुसपैठ करते हैं. मसरूर बड़ा भाई गांव बमियाल से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां आतंकवादी यदाकदा जमा होते रहते हैं. एजेंसियों का यह भी मानना है कि गुरदासपुर के दीनानगर पर हमला करने वाले पाक आतंकी भी भारत में दाखिल होने से पहले मसरूर बड़ा भाई गांव में रुके थे. वे बमियाल क्षेत्र के साथ लगते नाले की आड़ में भारत में घुसे थे.

इस संबंध में सीमा सुरक्षा बल का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में उन के जवान 24 घंटे अलर्ट रहते हैं. दूसरी ओर इंटेलीजेंस की तरफ से अलर्ट अकसर मिलते रहते हैं. यों मारे गए 6 आतंकियों के बाद अब एनआईए टीम ने विधिवत जांच शुरू कर दी है. जांच एवं सुरक्षा एजेंसियों के लिए सब से बड़ा प्रश्न उस रूट का पता लगाना था, जिसे आतंकियों ने पठानकोट पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया था. फिलहाल इन एजेंसियों की निगाह बमियाल में पड़ने वाली उज्ज नदी पर जमी है. इस नदी के साथ ही खूनी नाला पड़ता है, जो सीधा पाकिस्तान की सीमा से मिलता है.

इस खूनी नाले के किनारे पर जसपाल सिंह की जमीन है, जिस ने जांच एजेंसियों को अपने खेतों में जूतों के अजीब तरह के निशान दिखाए थे. इन निशानों पर अंगरेजी के कुछ शब्द अंकित थे. जांच एजेंसी ने इन निशानों को आतंकवादियों से जोड़ कर देखा. यह रूट आतंकियों द्वारा अपनाया गया हो सकता था, क्योंकि ये निशान खूनी नाले के बीच में तथा भारतपाक सीमा से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर पाए गए थे. यहां पर यह बताना तर्कसंगत रहेगा कि मृतक ड्राइवर इकागर सिंह के मामा के घर की ओर भी यही रास्ता जाता था. इकागर के घर वालों ने भी बताया था कि वह घटना की रात साढ़े 9 बजे अपने मामा के घर की ओर गया था.

बहरहाल, जांच पूरी होने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है. इस आतंकवादी घटना से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाहौर यात्रा आलोचना के घेरे में आ गई है. इसी के मद्देनजर 7 जनवरी, 2016 को भारत की ओर से पाकिस्तान पर दबाव बनाते हुए स्पष्ट कर दिया गया कि पठानकोट हमले के उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों पर त्वरित और निर्णायक काररवाई के बाद ही द्विपक्षीय बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ सकता है. इस के साथ ही हमले में शामिल आतंकियों के आकाओं के रूप में इन नामों की सूची पाकिस्तान को सौंप दी गई थी—जैशएमोहम्मद प्रमुख मौलाना मसूद अजहर, उस का भाई अब्दुल रऊफ असगर, अशफाक एवं कासिम. यह भी बताया गया है कि हमले की साजिश लाहौर के पास रची गई थी.

इस सिलसिले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने उसी दिन इस सिलसिले में एक उच्चस्तरीय मीटिंग बुला कर पठानकोट आतंकी हमले पर वार्ता की. उन्होंने अपने अधिकारियों की ओर से इस बात की पुष्टि चाही कि वे भारत द्वारा सौंपे गए सबूतों पर त्वरित काररवाई करते हुए जरूरी एक्शन लेंगे. इस आतंकी हमले में आतंकवादियों की ड्रग तस्करों से गठजोड़ की भी जांच हो रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 जनवरी को पठानकोट पहुंच कर स्थिति का जायजा लेने के साथ यहां के जवानों की पीठ भी ठोंकी. आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सुरक्षा बल की हौसलाअफजाई की. उसी दिन अमेरिका ने पाकिस्तान को चेताया कि वह पठानकोट एयरबेस पर हमला करने वाले आतंकियों के खिलाफ त्वरित काररवाई करे.

छहों मृत आतंकियों के शवों को पोस्टमार्टम करने के बाद उन के डीएनए टेस्ट के लिए भेज कर शवों को कड़ी सुरक्षा के बीच शवगृह में रखवा दिया गया. पुलिस प्रशासन द्वारा पठानकोट में आर्मी की वर्दी की खुले में बिक्री पर सख्त रोक लगा दी गई. भारत ने इस हमले के जो सबूत पाकिस्तान को सौंपे थे, वे यूके, यूएसए, जापान, फ्रांस व दक्षिण कोरिया को भी भेजे गए हैं. इन देशों ने भी भारत को भरोसा दिलाया है कि वे पाकिस्तान पर जांच में तेजी लाने के लिए दबाव बनाएंगे. भारत की कोशिशों का असर दिखा भी.

अमेरिकी विदेश मंत्री जौन कैरी ने पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से फोन पर बात की. इस बातचीत में शरीफ ने भरोसा दिलाया कि पाकिस्तान जल्द ही पठानकोट हमले का सच सामने लाएगा. लेकिन 11 जनवरी को पाकिस्तान ने भारत की ओर से हासिल सबूतों को नकार दिया. उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने पाकिस्तान को 2 फोन नंबर सौंपे थे +92-1017775253 और +92-3000597212. भारत का दावा था कि ये नंबर पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों के थे, जिन पर पठानकोट हमले से जुड़े आतंकियों ने बात की थी. मगर पाकिस्तान की ओर से साफ कह दिया गया कि ये नंबर पाकिस्तान में रजिस्टर्ड नहीं हैं.

अंतत: पाकिस्तान पर अमेरिका और भारत का दबाव काम आया. पाक पीएम नवाज शरीफ ने पठानकोट के एयरबेस पर हुए हमले की जांच के लिए संयुक्त टीम बनाने के आदेश दे दिए. इस टीम में पाकिस्तान आईबी, आईएसआई, मिलिट्री इंटेलीजेंस और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. नवाज शरीफ ने दावा किया कि वह पठानकोट हमले को ले कर काफी गंभीर हैं. उन्होंने सख्त रवैया अख्तियार कर लिया है. वह इस हमले की तह तक जा कर यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता कौन है, इस संबंध में उन्होंने अपने आर्मी चीफ जनरल राहील शरीफ से भी बात की.

पाकिस्तानी खबरिया चैनल एआरवाई न्यूज ने इस बारे में अपनी एक खबर के माध्यम से कहा कि इस सिलसिले में कुछ गिरफ्तारियां हुई हैँ, लेकिन पुलिस ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि  ये गिरफ्तारियां पठानकोट हमले के सिलसिले में हुई हैं. चैनल ने समाचार प्रसारित करते हुए यह भी कहा कि इन संदिग्धों को गिरफ्तार कर के पूछताछ के लिए अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है.

11 जनवरी को दिल्ली में संपन्न 68वें आर्मी डे पर आयोजित समारोह में भारत के रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने पठानकोट एयरबेस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बोलते हुए कहा कि अगर कोई इस देश को नुकसान पहुंचा रहा है तो उस शख्स और संगठन को भी वैसा ही दर्द झेलना होगा. पठानकोट हमले को अमेरिका ने बेहद गंभीरता से लिया है. 12 जनवरी को उस ने पाकिस्तान को झटका देते हुए 8 एफ-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री रोक दी. इसी दिन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने अपना बयान जारी करते हुए कहा कि पाक पर अविश्वास नहीं, मगर इन हालात के बीच विदेश सचिव स्तरीय बातचीत फिलहाल टाल देना ही ठीक है. 14 जनवरी, 2016 को पाकिस्तान से धमाकेदार खबर आई कि पठानकोट हमले के मास्टरमाइंड और जैश के सरगना मसूद अजहर को बहावलपुर से 10 अन्य कथित आतंकियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया है.

खबर में यह भी बताया गया कि पठानकोट हमले के संबंध में वांछित आरोपियों को पकड़ने के लिए न केवल ताबड़तोड़ छापेमारी की जा रही है, बल्कि पाकिस्तान का विशेष जांच दल भी पठानकोट जाएगा. इस के अगले ही दिन पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस से इनकार करते हुए कहा कि उसे मसूद की गिरफ्तारी की कोई जानकारी नहीं है. भारतपाक विदेश सचिवों की वार्ता भी फिलहाल टल गई है. 15 जनवरी को पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के कानून मंत्री राणा सनाउल्लाह ने साफ किया कि मसूद को गिरफ्तार नहीं किया गया है, बल्कि उसे ऐहतियातन हिरासत (प्रोटेक्टिव कस्टडी) में रखा गया है.

इस पर 16 जनवरी को जयपुर में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक सवाल के जवाब में कहा, ‘‘बहुत हुआ, सहने की जो क्षमता इस देश की थी, वह खत्म हो गई है. रक्षामंत्री के तौर पर मेरी भी यह क्षमता खत्म हो गई है. अब तो अगले एक साल में दुनिया इस के नतीजे देखेगी.’  फिलहाल, जांच एजेंसियों की छानबीन तो इस ओर इशारा कर रही है कि आतंकियों की मदद करने वाले पंजाब में ही बैठे वे घर के भेदी हैं, जो पैसों के लालच में अपना ईमान तक बेचने से नहीं हिचकते. आतंकियों के मारे जाने के बाद एयरबेस से जो असलहा एवं गोलाबारूद बरामद हुआ है, उस का वजन एक क्विंटल से ज्यादा है.

एयरबेस तक आतंकियों को पहुंचाने वाले एक गाइड का सुराग भी जांच एजेंसियों को मिला है. हनीट्रैप में फंस कर अपने ही देश से गद्दारी पर उतारू सुनील व रंजीत वगैरह पहले ही संदेह के घेरे में आ चुके हैं. इन्हें फिर से कस्टडी में ले कर व्यापक पूछताछ की तैयारी चल रही है. एसपी सलविंदर सिंह व उन के साथी भी संदेह के घेरे में हैं. नैशनल इन्वैस्टीगेशन एजेंसी इन से कई बार पूछताछ कर चुकी है. इन का लाई डिटेक्टर टेस्ट भी करवाया गया है. एनआईए को इस काररवाई से महत्त्वपूर्ण सूचनाएं मिली एनआईए का दावा है कि बिना भीतर की मदद के बाहर से आए आतंकवादी इतने खतरनाक हमले की योजनाएं नहीं बना सकते.

मारे गए आतंकियों के शवों के पोस्टमार्टम कर इन के पार्ट्स डीएनए के लिए भेजे गए हैं. शवों को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है. इन आतंकियों की उम्र 20 से 30 वर्ष के बीच थी. इन के फिंगरप्रिंट भी संरक्षित कर लिए गए हैं. इन लाशों का क्या किया जाना है, यह गृह मंत्रालय तय करेगा. फिलहाल पठानकोट के सिविल अस्पताल के मोर्चरी विभाग में शवों को सुरक्षित रख कर ताला लगा दिया गया है और वहां कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था कर दी गई है.

एसपी सलविंदर सिंह के बारे में बताया गया है कि एनआईए की पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया है कि वह ड्रग माफिया की खेप पार करवाने के लिए उन से हीरे लिया करता था, जिन की जांच उस का ज्वैलर दोस्त राजेश वर्मा किया करता था. उस रात भी एसपी निकला तो इसी काम के लिए था, मगर उन का सामना हो गया आतंकवादियों से. गृह मंत्रालय के प्रवक्ता के बताए अनुसार, 40 से अधिक संवेदनशीन जगहों पर लेजर दीवारें खड़ी कर के किसी भी तरह की घुसपैठ से निजात हासिल कर ली जाएगी. Pathankot Attack

 

Chhattisgarh News: अरबपति अभिषेक मिश्रा हत्याकांड – तन मांगे मोर

Chhattisgarh News: एजूकेशन कारोबारी अभिषेक मिश्रा के अपने ही इंस्टीट्यूट की युवा प्रोफेसर किम्सी जैन से प्रेमिल रिश्ते हो गए थे. विवाह के बाद वह अभिषेक से किनारा करने लगी तो अभिषेक को यह नागवार गुजरा. तब अभिषेक से छुटकारा पाने के लिए किम्सी ने अपने रोबोट इंजीनियर पति और चचिया ससुर के साथ  मिल कर जो किया, उसे  उचित कतई नहीं कहा जा सकता.

पुलिस हैडक्वार्टर के उस मीटिंग हौल में छत्तीसगढ़ पुलिस के तमाम अधिकारी मौजूद थे. उन में फोरैंसिक, साइबर और क्राइम एक्सपर्ट ही नहीं, वे लोग भी थे, जिन्हें बड़े से बड़े अनसुलझे मामले सुलझाने में महारथ हासिल थी. यह बात अलग थी कि जिस मामले को ले कर यह मीटिंग बुलाई गई थी, उसे ले कर सभी के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं.

मीटिंग में मामले से जुड़े छोटेबड़े सभी बिंदुओं को ले कर चर्चा हो रही थी. लेकिन अफसोस की बात यह थी कि कुछ भी नतीजा सामने नहीं आ रहा था. प्रोजैक्टर के दोनों ओर बिछी कुरसियों पर बैठे अधिकारियों के बीच बैठे डीजीपी ए.एस. उपाध्याय ने सभी को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘यह कितने अफसोस की बात है कि इस मामले में हम अपराधियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.’’

‘‘सर, हम कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन…’’ सामने बैठे एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘‘ऐसा कोई सुराग ही नहीं मिल रहा है कि…’’

‘‘जरूरी नहीं कि हर कोशिश का नतीजा निकल ही आए. इस के अलावा जब तक कुछ नतीजा सामने न आ जाए, तब तक यह भी तो पता नहीं चलता कि कोशिश की जा रही है.’’

‘‘सर, इस मामले में अपराध करने वाले बहुत चालाक हैं. उन्होंने किसी जासूसी फिल्म की तरह हमारे सामने चुनौती पेश की है. उन्होंने ऐसा कोई सुराग ही नहीं छोड़ा. और जो सुराग मिले भी हैं, वे उलझाने वाले हैं. ऐसे में हमारे लिए यह तय करना मुश्किल हो गया है कि यह मामला किडनैपिंग का है या कुछ और.’’

‘‘हमारा काम सुरागों को ढूंढना और उसी के सहारे मामले की तह तक पहुंचना है. यह तो जानते ही हो कि कोई भी अपराधी पुलिस से ज्यादा चालाक नहीं होता. उस सुराग को खोजिए, जिस तक अभी तक आप पहुंच नहीं पाए हैं. उस के मिलते ही केस खुल जाएगा और अपराध करने वाले आप की हिरासत में होंगे.’’

‘‘सर, इस मामले में हम ने पुलिस की 35 टीमें लगा रखी हैं. जल्द ही कोई न कोई परिणाम सामने आएगा.’’

‘‘ठीक है, जांच में छोटी से छोटी बात का खयाल रखा जाए. आप लोग निर्देश के लिए मुझ से सीधे या अपने आईजी तथा एसपी से कौंटैक्ट कर सकते हैं. कुछ भी कीजिए, इस मामले में अब हम और फजीहत नहीं चाहते.’’ डीजीपी ए.एन. उपाध्याय ने कहा.

इसी के साथ मीटिंग खत्म हो गई. कोई भी अपराध होने के बाद जांच में उस मामले से पुलिस का रिश्ता उतना ही गहरा होता है, जितना दिल से धड़कनों का. लेकिन कुछ ऐसे भी सनसनीखेज मामले सामने आ जाते हैं, जिन में पुलिस के अच्छे से अच्छे एक्सपर्ट भी गच्चा खा जाते हैं. पुलिस जांच के अपने एक मायने होते हैं, लेकिन जब कोई सबूत हाथ न लगे और जो मिलें भी, वे दगा दे जाएं तो पुलिस अधिकारियों के पसीने छूट जाते हैं. अरबपति अभिषेक मिश्रा के हत्या के मामले में भी कुछ ऐसा ही हो रहा था. इस मामले में पूरे राज्य की पुलिस के जांबाज पुलिस वाले भी चकरा कर रहे गए थे. इस की वजह भी हैरान करने वाली थी.

पुलिस की 35 टीमें एक महीने में लगभग डेढ़ हजार लोगों से पूछताछ कर चुकी थीं. वे 7 राज्यों, 20 से ज्यादा शहरों की खाक छान चुकी थीं, करीब एक करोड़ फोन काल चेक करने के अलावा सैकड़ों हिस्ट्रीशीटर और तमाम रजिस्टर्ड अपराधियों से गहरी पूछताछ कर चुकी थीं, इन में तमाम हाई प्रोफाइल खूबसूरत लड़कियां भी शामिल थीं. पूछताछ, धरपकड़ और काल ट्रैसिंग का भी सिलसिला जारी था. इस के बावजूद इस अपराध की पृष्ठभूमि और जांच में सुराग तो मिलते थे, लेकिन वे तह तक पहुंचाने में सफल नहीं होते थे. एक तरह से देखा जाए तो यह राज्य का सब से बड़ा मामला बन गया था. शायद इसीलिए मामले का किसी भी तरह खुलासा हो जाए, डीजीपी ए.एन. उपाध्याय ने तमाम पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक की थी.

समझ में नहीं आ रहा था कि अभिषेक अचानक कहां गायब हो गए थे. गायब होने के बाद फिरौती के लिए फोन भी आया था. फोन करने वाले ने नक्सली आंदोलन का प्रतीक ‘लाल सलाम’ कह कर संदेह की सुई नक्सलियों की ओर घुमा दी थी. इस तरह साजिश रचने वाले आजाद थे. मामला बेहद हैरतअंगेज और सनसनीखेज बन गया था. राज्य के लोगों की निगाह इस मामले पर टिकी थीं. मीडिया में हर रोज खबरें आ रही थीं. मामला इसलिए बड़ा हो गया था, क्योंकि अभिषेक मिश्रा कोई मामूली आदमी नहीं थे.

भारत का 26वां राज्य छत्तीसगढ़ ऊंचीनीची पर्वत श्रेणियों से घिरा है. राजधानी रायपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर राज्य का तीसरा बड़ा शहर है दुर्गभिलाई. मुंबई- नागपुर-कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित यह शहर इस्पात संयत्र के लिए प्रसिद्ध है. इसी शहर के पौश इलाके नेहरूनगर (पश्चिम) की कोठी संख्या- 45ए/13 में रहते हैं आई.पी. मिश्रा. मृदुभाषी और व्यवहारकुशल आई.पी. मिश्रा कोई छोटेमोटे आदमी नहीं हैं. उन के हाथों में शंकराचार्य गु्रप के कई बड़े शैक्षणिक संस्थानों, यूनिवर्सिटी और स्टील कंपनी की कमान है. उन के संस्थानों का शुमार राज्य के बड़े से बड़े संस्थानों में होता है. पूरी प्रौपर्टी और कारोबार अरबों में है. अब ऐसे आदमी की राजनैतिक और सामाजिक पहुंच तो होगी ही. नाम, शोहरत और दौलत भी उन के कदम चूम रही है.

करीब 2 सौ करोड़ के एंपायर के मालिक आई.पी. मिश्रा के बेटे थे अभिषेक मिश्रा. हंसमुख स्वभाव के अभिषेक खुद भी शंकराचार्य ग्रुप औफ इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे. उन के परिवार में पत्नी जया मिश्रा के अलावा 2 बच्चे थे. पिता के साथ अभिषेक भी शिक्षा जगत में बड़ा नाम थे. उन की ख्याति में तब और भी इजाफा हो गया था, जब उन्होंने सन 2013 में माओवाद विषय पर आधारित एक क्षेत्रीय फिल्म ‘अलाप’ का निर्माण किया था. यही नहीं, करोड़ों रुपए में रायपुर रेंजर्स के नाम से वह टैनिस लीग की टीम की स्पौंसरशिप भी कर चुके थे.

कौन, कब, किस मुसीबत में फंस जाए, कोई नहीं जानता. मिश्रा परिवार के साथ भी ऐसा ही हुआ था. 9 नवंबर, 2015 की शाम अभिषेक अपनी लाल रंग की स्कोडा कार नंबर सीजी 07 एमए 0007 से किसी को बिना कुछ बताए निकले तो रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे. काफी रात होने पर भी जब वह वापस नहीं आए तो आई.पी. मिश्रा और अभिषेक की पत्नी जया ने उन के मोबाइल कर फोन किया. मोबाइल पर लगातार घंटी जाती रही, लेकिन फोन नहीं उठा. उन्होंने बात तो नहीं की, लेकिन एमएमएस के जरिए बता दिया कि वह थोड़ी देर में आ जाएंगे.

थोड़ी और रात बीती तो उन का मोबाइल भी बंद हो गया. इस से घर वालों को चिंता हुई. आई.पी. मिश्रा ने जानपहचान वालों से अभिषेक के बारे में पता किया, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. फिर तो वह रात चिंता में बीती. किसी अनहोनी की आशंका से परेशान घर वालों ने सवेरा होते ही इस बात की सूचना पुलिस को दे दी. मामला प्रतिष्ठित परिवार का था, इसलिए एसपी मयंक श्रीवास्तव ने स्थानीय थाना पुलगांव के थानाप्रभारी पी.के. साहू को इस मामले की जांच के आदेश दे दिए. पुलिस ने सक्रिय हो कर अभिषेक की खोजबीन शुरू कर दी. अभिषेक को ले कर हर कोई परेशान था. वह कहां गए हैं, यह उन्होंने घर वालों को भी नहीं बताया था.

अगले दिन उन के लापता होने का मामला शहर भर में चर्चा का विषय बन गया. पुलिस को अभिषेक के अपहरण की आशंका अधिक थी. यह तब सच भी साबित हुआ, जब उन के पिता आई.पी. मिश्रा के मोबाइल पर अभिषेक के मोबाइल से फिरौती का फोन आया. उन के मोबाइल से किसी अज्ञात ने फोन कर के कहा, ‘‘लाल सलाम.’’

‘‘कौन बोल रहे हैं?’’ आई.पी. मिश्रा ने पूछा.

‘‘लाल सलाम, सुना नहीं… मिश्राजी, आप बेटे को ले कर परेशान न हों. वह हमारे कब्जे में है. हम उसे छोड़ देंगे, लेकिन बदले में मोटी फिरौती चाहिए. रकम कहां पहुंचानी है, यह हम तुम्हें बाद में बता देंगे.’’ फोन करने वाले ने पल भर रुक कर कहा, ‘‘और हां, ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करना, वरना तुम्हें बेटे की लाश ही मिलेगी.’’

आई.पी. मिश्रा कुछ कहते, उस के पहले ही फोन काट दिया गया. इस के तुरंत बाद मोबाइल फोन बंद कर दिया गया. उन्होंने यह बात पुलिस को बताई तो पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया. मामला एक अरबपति और रसूख वाले के अपहरण का था, इसलिए शक सीधे नक्सलियों पर गया, क्योंकि जिस तरह उन्होंने ‘लाल सलाम’ कहा था, वह नक्सलियों का प्रचलित शब्द था. प्रदेश के डीजीपी ए.एन. उपाध्याय सहित आला अधिकारियों ने तुरंत काररवाई के आदेश दिए. थाना पुलगांव में अपराध संख्या 643/2015 पर अभिषेक मिश्रा के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

आननफानन पुलिस की एक दर्जन टीमें गठित कर दी गईं. एसपी मयंक श्रीवास्तव, डीएसपी (क्राइम) कविलाश टंडन, एएसपी राजेश अग्रवाल के दिशानिर्देशन में ये टीमें जांच में जुट गईं. आईजी प्रदीप गुप्ता मामले की मौनीटरिंग कर रहे थे. इस कोशिश में पुलिस को रायपुरधमतरी के वीआईपी रोड से अभिषेक मिश्रा की कार लावारिस हालत में खड़ी मिल गई. पुलिस ने कार की तलाशी ली, लेकिन उस से कोई ऐसा सुराग नहीं मिला, जिस से पुलिस को जांच के लिए कोई दिशा मिल पाती.

भिलाई से रायपुर के बीच एक टौल नाका पुलिस चैकिंग पौइंट पड़ता है, वहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पुलिस ने उन की वीडियो फुटेज को खंगाली. 9 नवंबर की रात अभिषेक की स्कोडा कार कैमरे में कैद तो हुई थी, लेकिन तसवीर धुंधली थी, इसलिए यह पता लगाना मुश्किल था कि उस में कौन सवार था. फिरौती की काल धमतरी इलाके से की गई थी. धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया, लेकिन पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. क्राइम ब्रांच के प्रभारी विशाल सून भी इस मामले की जांच में लगे थे. पुलिस ने अभिषेक के मोबाइल नंबर की लोकेशन और काल डिटेल्स निकलवाई.

मोबाइल की लोकेशन के अनुसार, अभिषेक शाम 5 बजे से रात 9 बज कर 40 मिनट तक भिलाई के विभिन्न इलाके में घूमते हुए रायपुर गए थे. वहां जा कर उन का मोबाइल बंद हो गया था. रास्ते से ही उन्होंने घर वालों को एसएमएस किए थे. अगले दिन उन का मोबाइल धमतरी इलाके में ही बंद हुआ था. वहीं से फोन कर के फिरौती मांगी गई थी. इस के बाद फोन फिर बंद हो गया था. इस के बाद अपहर्ताओं ने अभिषेक के घर वालों से कोई संपर्क नहीं किया था.

इस से अपहरण में नक्सलियों का हाथ होने की आशंका कम हो गई थी. इस की वजह भी थी. अमूमन नक्सली किसी को अपहृत कर के अपनी मांगों को पूरा करने के लिए उसे खूब प्रचारित करते हैं. लेकिन इस मामले में ऐसा कतई नहीं हुआ था. पुलिस ने मुखबिरों की भी मदद ली. उन से मिली जानकारी से साफ हो गया कि इस मामले में नक्सलियों का हाथ नहीं है. पुलिस जांच को भटकाने के लिए लाल सलाम कह कर मामले को नक्सलियों से जोड़ने की कोशिश की गई थी. अपहरण के बारे में जांच के लिए पुलिस ने अलगअलग राज्यों के अपहरण करने वाले कई गिरोहों से पूछताछ की. ऐसे अपराधियों से भी पूछताछ की गई, जो जेल में बंद थे. क्योंकि जेल में बंद कोई बड़ा अपराधी भी ऐसा करा सकता था.

पुलिस की कई टीमें दिनरात काम कर रही थीं. शहर में तरहतरह की चर्चाएं हो रहीं थीं. यह भी चर्चा चली थी कि अभिषेक के घर वालों ने अपहर्ताओं को 10 करोड़ की फिरौती की रकम दे दी है. लेकिन जब अभिषेक लौट कर नहीं आए, तो इस चर्चा पर खुद ही विराम लग गया. एक चर्चा यह भी चली थी कि अभिषेक को फिल्म निर्माण व टैनिस टीम के प्रायोजक बनने पर बड़ा घाटा हुआ था, इसलिए वह खुद ही भूमिगत हो गए हैं. पुलिस ने इन पर भी जांच की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. संदेह के आधार पर पुलिस ने शंकराचार्य ग्रुप से जुड़े लोगों और उन के घर वालों से भी पूछताछ की, लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. उन लोगों से भी पूछताछ की गई, जिन से 9 नवंबर को अभिषेक से बातें हुई थीं.

इन में एक किम्सी जैन भी थी. 9 नवंबर की शाम उस की भी अभिषेक से बात हुई थी. किम्सी भिलाई में ही चौहान टाउन के ब्लाक-जी स्थित अपौर्टमैंट के फ्लैट नंबर-18 में अपने पति विशाल जैन के साथ रहती थी. विशाल पेशे से इंजीनियर था और रोबोट्स के पार्ट्स बनाता था. किम्सी का विवाह एक साल पहले ही विशाल से हुआ था. उन का 2 महीने का एक बेटा था. यह रूटीन पूछताछ थी. इन में कोई भी संदिग्ध नहीं था.

किम्सी ने बताया था कि हौकी टीम की स्पौंसरशिप के सिलसिले में उस ने अभिषेक से बात की थी. वह और उस के पति दोनों ही अभिषेक को जानते थे. वह अभिषेक के इंस्टीट्यूट में बतौर प्रोफेसर नौकरी कर चुकी थी, जबकि विशाल भी शंकराचार्य गु्रप के इंजीनियरिंग कालेज में कंप्यूटर लगाने का काम कर चुका था. 18 नवंबर को बालौदा बाजार में एक युवक का शव मिला. इस से पुलिस की चिंता बढ़ गई. अपहर्ता चूंकि कोई संपर्क नहीं कर रहे थे और अभिषेक का कोई सुराग भी नहीं मिल रहा था, इसलिए आशंका हत्या की भी थी. पुलिस मौके पर पहुंची. उस ने अभिषेक के घर वालों को भी बुलाया, लेकिन राहत की बात यह रही कि यह लाश अभिषेक की नहीं थी.

अभिषेक के घर वालों को भी अनहोनी की आशंका थी, लेकिन उन की उम्मीदों में अभिषेक जिंदा थे. इस दौरान भिलाई समेत आसपास के जिलों में जो भी लाशें मिलीं, उन सभी की जांच की गई. अब तक 25 दिन हो गए थे, परंतु अभिषेक का कुछ पता नहीं चल सका था. पुलिस ने प्रेमप्रसंग के एंगल पर काम करते हुए कई लड़कियों और महिलाओं से पूछताछ की थी. इन में स्टाफ के लोग भी शामिल थे. यहां भी नतीजा शून्य ही रहा. मामले की गूंज सत्ता के गलियारों में भी थी. प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने पुलिस के बड़े अधिकारियों को अभिषेक की जल्द बरामदगी के निर्देश दिए थे. इस के बाद पुलिस की 35 टीमों का गठन कर के जांच में लगा दिया गया था.

लेकिन इस मामले की गुत्थी सुलझाने में पुलिस के पसीने छूट रहे थे. पुलिस की टीमें बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और आंध्र प्रदेश तक घूम आई थीं. वहां कईकई दिनों तक डेरा डाले रहीं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला था. पुलिस जहां जीजान से लगी थी, वहीं मीडिया हर रोज पुलिस की नाकामी के किस्से छाप रही थी. जब पुलिस हर तरह से फेल होने लगी तो डीजीपी ने मीटिंग कर के इन्वैस्टीगेशन की समीक्षा की और नए सिरे से जांच के आदेश दिए.

अब तक अभिषेक को गायब हुए एक महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका था. इस के बाद पुलिस ने बड़ा साइबर औपरेशन चलाया. इस काम में प्रदेश के साइबर एक्सपर्ट के साथ बंगलुरु के विशेषज्ञों को भी लगाया गया. इस औपरेशन में पुलिस ने अभिषेक के मोबाइल की लोकेशन के साथ करीब एक करोड़ नंबर निकाले. इन सभी नंबरों की ट्रैकिंग की गई. यह बहुत ही मुश्किल काम था, लेकिन पुलिस ने उस में से करीब 15 सौ नंबरों को सर्विलांस पर लगाया.

पुलिस ने अभिषेक का पुराना काल डिटेल्स खंगाला तो उस में किम्सी का नंबर मिला. पता चला कि दोनों में अकसर बातें होती रहती थीं. इस से पुलिस को उस पर शक हुआ. पुलिस को याद आया कि उस से तो पहले भी पूछताछ हो चुकी है, क्योंकि 9 नवंबर को उस ने अभिषेक के फोन पर बात की थी. पुलिस ने एक बार फिर उस से पूछताछ की. इस बार भी उस ने वही सब बताया जो पहले बता चुकी थी. उस का कहना था कि वह उस के यहां नौकरी करती थी, इसलिए काम के सिलसिले में उस से बातें होती रहती थीं.

पुलिस ने उस के इंजीनियर पति विकास से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में कोई ऐसी वजह सामने नहीं आई कि उन्हें हिरासत में लिया जाता. लेकिन पुलिस को उन के चेहरे पर आने वाले भावों से लग रहा था कि वे झूठ बोल रहे हैं. बिना सबूत के सच उगलवाने का पुलिस के पास कोई उपाय नहीं था. मामला इतना सुर्खियों में था कि छोटी सी भी गलती पर पुलिस खुद कठघरे में खड़ी हो सकती थी. वैसे भी पुलिस किसी से तब ही सच उगलवा पाती है, जब संदिग्ध के खिलाफ उस के पास कुछ पुख्ता सबूत हों. अब पुलिस की नजरें किम्सी और विकास पर जम गई थीं. शायद इसी वजह से पहले क्राइम ब्रांच में तैनात रहे तेजतर्रार एएसआई एस.एन. सिंह को विशेष तौर पर जांच में लगाया गया.

चोरीछिपे विकास की निगरानी शुरू की गई तो पाया गया कि ये लोग किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखते. अभिषेक के मामले में क्या हो रहा है, इस पर लोगों से चर्चा जरूर करते रहते थे. पुलिस को किम्सी और विकास का मोबाइल नंबर मिल गया था. सर्विलांस से पता चला कि दोनों मोबाइल के जरिए एक खास नंबर के संपर्क में रहते थे. उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर विकास के चाचा अजीत का था. जांच से पता चला कि अजीत स्मृतिनगर स्थित एक पुराने बंगलेनुमा घर में बतौर किराएदार रहता है. विकास और किम्सी अकसर उस के यहां आतेजाते रहते थे. पुलिस को विकास के यहां अखबार डालने वाले हौकर से पता चला था कि इधर एक महीने से विकास कई अखबार ले रहा था.

इस से पुलिस को शक हुआ कि शायद वे अभिषेक के मामले में ज्यादा से ज्यादा जानकारी लेने के लिए ऐसा कर रहे हैं. पुलिस का संदेह और मजबूत हुआ. निगरानी बढ़ गई. जबकि विकास और किम्सी को पता ही नहीं था कि उन की निगरानी हो रही है. इसी बीच एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम (एसआईटी) गठित कर दी गई, जिस में एसपी मयंक श्रीवास्तव, एएसपी (क्राइम) अजात बहादुर, जांजगीर चांपा के एएसपी विजय अग्रवाल, सीएसपी राजीव वर्मा, टीआई संजय सिंह, कलीम खान, थानाप्रभारी पी.के. साहू आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने विकास के मोबाइल की पूरी डिटेल्स हासिल कर ली. सर्विलांस टीम ने जब गहराई से उस का विश्लेषण किया तो हैरान रह गई, क्योंकि 9 नवंबर की शाम 5 बजे से रात साढ़े 9 बजे तक अभिषेक के मोबाइल की लोकेशन और उस के मोबाइल की लोकेशन एक साथ मूव कर रही थी.  इस तरह शक यकीन में बदल गया तो 22 दिसंबर की रात पुलिस ने विकास और उस के चाचा अजीत को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस ने दोनों से पूछताछ शुरू की तो विकास ने कहा कि वह 9 नवंबर को अपने काम से कई स्थानों पर घूमने गया था.

‘‘ऐसा भी क्या काम था, जो तुम रायपुर तक घूमने गए थे?’’ एक पुलिस अधिकारी ने पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मुझे वहां काम था.’’

पुलिस को लगा कि यह चालाक और शातिर है. तब पुलिस ने उसे फंसाने के लिए सवालों का जाल बुन कर उस पर सख्ती की तो वह गुमसुम हो गया. तब पुलिस ने कहा, ‘‘कुछ बताओगे या हमें कुछ और भी करना होगा?’’

‘‘अभिषेक को हम ने मार दिया है.’’ विकास ने एकदम से सच उगल दिया.

‘‘क्या?’’

‘‘जी सर, हमारे पास उस से पीछा छुड़ाने का और दूसरा कोई रास्ता नहीं था. वह मेरी पत्नी को परेशान कर रहा था.’’

सच जान कर पुलिस हैरान रह गई. पुलिस अब अभिषेक का शव बरामद करना चाहती थी. शुरुआती पूछताछ में उन्होंने बताया था कि अभिषेक की लाश स्मृतिनगर स्थित अजीत के घर के बगीचे में दबा कर ऊपर से सब्जियां लगा दी गई हैं. अगली सुबह अभिषेक की हत्या की खबर जंगल में लगी आग की तरह फैल गई. मिश्रा परिवार में तो कोहराम मच गया. विकास और अजीत को भारी पुलिस की मौजूदगी में स्मृतिनगर ले जाया गया, जहां उन के बताए स्थान पर खुदाई कराई गई. फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुलवा लिया गया था.

पुलिस की गाडि़यां देख कर अजीत के घर के सामने सैकड़ों लोगों की भीड़ लग गई थी. करीब 6 फुट गहरा गड्ढा खोदने पर जहां बहुत सारा नमक बिखरा मिला, वहीं एक बोरे और प्लास्टिक की पौलीथिन में अभिषेक का शव बरामद हुआ. शव बुरी तरह से सड़ चुका था. घटना की जानकारी होने पर पूरे शहर में सनसनी फैल गई. घर वालों ने शव की शिनाख्त कर दी. इस के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पुलिस पूछताछ में विकास ने बताया था कि हत्या में किम्सी भी शामिल थी. उस समय वह नौकरी की तलाश में दिल्ली गई हुई थी, इसलिए उस की गिरफ्तारी के लिए हवाई मार्ग से तुरंत एक टीम दिल्ली के लिए रवाना कर दी गई. दिल्ली पुलिस की मदद से छत्तीसगढ़ पुलिस किम्सी को गिरफ्तार कर के भिलाई ले आई.

इस के बाद पुलिस के आला अधिकारियों ने तीनों से पूछताछ की तो अभिषेक हत्याकांड मामले में सनसनीखेज खुलासे और फूलप्रूफ योजना से हर कोई हैरत में पड़ गया. किसी ने नहीं सोचा था कि एक बड़े रसूख वाले आदमी के कत्ल का खुलासा ऐसा होगा कि हर कोई हैरान रह जाएगा. पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह वाकई चौंकाने वाली थी. मासूम सी दिखने वाली किम्सी अभिषेक के कत्ल की वजह बनी थी. आईजी प्रदीप गुप्ता ने प्रेस कौन्फ्रैंस कर के हत्याकांड का खुलासा किया.

दरअसल, विवाह के बाद से ही विकास महसूस करने लगा था कि किम्सी गुमसुम और परेशान रहती है. बेटे के जन्म के बाद उस की इस आदत में और भी इजाफा हुआ. विकास इंजीनियर और तेजतर्रार आदमी था. आखिर एक दिन उस ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘किम्सी, मैं देख रहा हूं कि जब से तुम्हारी शादी हुई है, तभी से तुम कुछ परेशान सी रहती हो, आखिर बात क्या है?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ है, तभी तो मैं पूछ रहा हूं. बताओ न क्या बात है?’’ विकास ने किम्सी का चेहरा दोनों हथेलियों के बीच ले कर प्यार से पूछा तो उस की आंखें भर आईं.

विवेक ने किम्सी को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘बताओ क्या बात है?’’

कुछ पल की खामोशी के बाद किम्सी ने कहा, ‘‘मुझे ब्लैकमेल किया जा रहा है विकास.’’

‘‘क…क…क्या…?’’

‘‘हां विवेक, मैं अपनी जिंदगी से परेशान हो चुकी हूं.’’

‘‘कौन ब्लैकमेल कर रहा है तुम्हें?’’

‘‘बताती हूं, लेकिन पहले तुम्हें एक वादा करना होगा.’’

‘‘क्या?’’

‘‘तुम मुझ से नाराज नहीं होओगे. मुझ से जो हुआ, वह मेरी मजबूरी थी विकास. मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं और तुम्हें खोना नहीं चाहती.’’

विकास ने विश्वास दिलाया तो किम्सी ने उसे जो कुछ बताया, उसे सुन कर विकास के रौंगटे खड़े हो गए. किम्सी ने जो बताया था, उस के अनुसार वह इंस्टीट्यूट में नौकरी के दौरान अभिषेक के संपर्क में आई. अभिषेक चूंकि डायरेक्टर थे, इसलिए वह उसे काम के बहाने अपने पास बुला लिया करते थे. उस के प्रति उन का व्यवहार मधुर होता गया. बातचीत के दौरान हंसीमजाक भी कर लिया करते. शुरू में तो किम्सी को लगा कि उन की आदत ही ऐसी होगी, लेकिन धीरेधीरे उस की समझ में आ गया कि अभिषेक उस की तरफ आकर्षित हैं.

एक दिन उन्होंने एक फाइल ले कर किम्सी को अपने औफिस में बुलाया. जरूरी बातें समझाने के बाद उन्होंने चाय का औफर किया तो वह मना नहीं कर सकी. चाय पीते हुए अभिषेक ने किम्सी के चेहरे को पढ़ते हुए कहा, ‘‘मुझे तुम से एक जरूरी बात कहनी थी किम्सी.’’

‘‘क्या सर?’’

‘‘किम्सी मैं तुम्हें बहुत लाइक करता हूं.’’

‘‘व्हाट सर, लेकिन…’’ वह सकपका गई.

‘‘किम्सी, दुनिया की इस भीड़ में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं, जिन्हें हम दिल से पसंद करते हैं. डौंटमाइंड किम्सी, मैं विश्वास का रिश्ता चाहता हूं.’’

किम्सी को झटका तो लगा, लेकिन एक तरफ उसे यह खुशी भी हुई कि कोई इतनी बड़ी हस्ती उसे पसंद करता है. नौकरी, कमजोरी और उम्र के नाजुक बहाव में अभिषेक को नाखुश करना उसे अपने बूते से बाहर लगा, इसलिए जवाब में उस ने मुसकरा दिया. उस दिन के बाद उन के बीच का रिश्ता बदल गया. यह सन 2014 की बात थी. एक दौर ऐसा भी आया, जब रिश्ता मर्यादाओं को लांघ गया. समय अपनी गति से चलता रहा. उन के रिश्ते कई महीने इसी तरह अनवरत चलते रहे. उसी बीच किम्सी का रिश्ता विकास के साथ तय हो गया. बाद में विकास के साथ विवाह हो गया तो किम्सी ने इंस्टीट्यूट की नौकरी को अलविदा कह दिया.  विवाह के बाद किम्सी ने अभिषेक के साथ के अपने रिश्ते को वक्ती गलती मान कर खुद को

बदल लिया. उस ने अभिषेक को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. उस का यह रुख अभिषेक को नागवार गुजरा. एक दिन दोनों की मुलाकात हुई तो किम्सी ने कहा, ‘‘हमारे बीच जो हुआ, वह वक्ती था सर. अब मैं शादीशुदा हूं, इसलिए मैं अपने हसबैंड को धोखा नहीं देना चाहती.’’

‘‘तो ठीक है, मेरे पास तुम्हारे बहुत से राज हैं, मैं उन्हें दफन कर दूंगा, लेकिन बाद में, अभी नहीं. मेरी भी मजबूरी है. किम्सी, मैं तुम्हें इतनी जल्दी आजाद नहीं कर सकता.’’

यह सुन कर किम्सी के होश उड़ गए. अभिषेक के रसूख के सामने वह कुछ भी नहीं थी. किम्सी दबाव में आ गई. इस के बाद वह अभिषेक की मरजी का शिकार होती रही. किम्सी एक बच्चे की मां भी बन गई, लेकिन अभिषेक पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था. किम्सी ने कई बार मना किया, लेकिन अभिषेक पर कोई असर नहीं हो रहा था. किम्सी कोई अच्छी नौकरी कर के कैरियर बनाना चाहती थी. परिवार और कैरियर के बीच अभिषेक से रिश्तों का तालमेल बनाए रखना उस के लिए मुश्किल हो रहा था.

वह घुटघुट कर जीने लगी. उस की परेशानियां उस के चेहरे पर साफ दिखाई देती थीं, जिस की वजह से विकास ने पकड़ लिया. किम्सी के मुंह से अभिषेक की करतूत सुन कर एकबारगी विकास को अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ. वह गुस्से में बोला, ‘‘तुम ने यह बात मुझ से पहले क्यों नहीं बताई?’’

‘‘मुझे डर लगता था विकास.’’

उस रात विकास को नींद नहीं आई. लेकिन उस ने तय कर लिया कि किसी भी तरह वह किम्सी को इस मुसीबत से छुटकारा दिला कर रहेगा. अगले दिन विकास किम्सी को ले कर अपने चाचा अजीत के पास गया. विकास और किम्सी ने उन्हें सारी बातें बताईं तो उन्हें भी गुस्सा आ गया. उन्होंने किम्सी से पूछा, ‘‘तुम ने उसे समझाया नहीं?’’

‘‘मैं उस से बहुत मिन्नतें कर चुकी हूं चाचा, लेकिन वह मेरा पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है. कहता है कि अगर मैं ने उस की बात नहीं मानी तो वह मुझे बरबाद कर देगा,’’ किम्सी ने रोते हुए कहा, ‘‘मन तो करता है कि मैं मर जाऊं, जिस से हमेशा के लिए उस से पीछा छूट जाए.’’

किम्सी की बातों से विकास और अजीत तिलमिला कर रह गए. विकास गुस्से में बोला, ‘‘तुम्हें मरने की क्या जरूरत है, मरने का काम तो उस ने किया है.’’

उन्होंने इस मामले पर काफी विचार किया. वे जानते थे कि अभिषेक रसूख वाला आदमी है. उस से सीधे टकराना कतई ठीक नहीं है. ऐसा करने पर वह किसी रूप में उन्हीं को नुकसान पहुंचा सकता है. लेकिन वे उस से छुटकारा भी पाना चाहते थे, इसलिए सब कुछ योजना बना कर ढंग से करना चाहते थे. विकास, अजीत और किम्सी ने तय किया कि अभिषेक की हत्या कर के वे इस राज को हमेशा के लिए दफन कर देंगे. इस के लिए बड़ी योजना की जरूरत थी. उस दिन के बाद तीनों ने इस मुद्दे पर विचार करना शुरू कर दिया. बदले की आग में झुलस रहे विकास को अजय देवगन की फिल्म ‘दृश्यम’ याद आई. इस फिल्म की कहानी उसे खुद से जुड़ी लग रही थी.

तेजतर्रार विकास ने भी कुछ वैसा ही करने की सोची. इस के लिए तीनों ने कई बार दृश्यम फिल्म देख कर उस की बारीकियों को समझा और तय कर लिया कि वे इसी कहानी को दोहरा कर पुलिस को गुमराह कर देंगे. उन्होंने योजना बना डाली कि कैसे और क्या करना है. फूलप्रूफ योजना तैयार कर के सब से पहले विकास ने मजदूरों को ला कर चाचा अजीत के यहां बगीचे में करीब छह फुट गहरा गड्ढा खुदवा डाला. मजदूरों ने गड्ढा खुदवाने की वजह पूछी तो विकास ने कहा कि वह भूकंप को ले कर कोई प्रयोग करना चाहता है. इस के बाद नमक के दर्जनों पैकेट ला कर अजीत के घर में रख दिए गए.

योजना के अनुसार, 9 नवंबर की शाम किम्सी ने अभिषेक को फोन कर के कहा कि उस के पास हौकी टीम की स्पौंसरशिप के लिए एक बड़ी पार्टी है, उस पर वह उस से चर्चा करना चाहती है. उसी के साथ उस ने यह भी कह दिया कि वह अपने फ्लैट में अकेली है तो अभिषेक बिना कुछ सोचेसमझे खुशीखुशी उस के यहां आने को तैयार हो गए.

विकास और अजीत भी वहीं मौजूद थे. तीनों उन के आने का इंतजार करने लगे. कुछ ही देर में वह किम्सी के बताए फ्लैट में पहुंच गए. किम्सी ने मुसकराते हुए उन का स्वागत किया. अभिषेक खुश थे कि किम्सी अभी भी उन के करीब रहना चाहती है. किम्सी ने उन्हें बातों में लगा लिया तो विकास ने पीछे से उन के सिर पर रौड से वार कर दिया. चोट लगते ही अभिषेक गिर गए. इस के बाद भी कई वार किए गए.

जब उन्हें भरोसा हो गया कि अभिषेक की मौत हो चुकी है तो विकास ने तुरंत अभिषेक के मोबाइल का स्विच औफ कर दिया. पहले से जो तय था, उसी के अनुसार तीनों ने मिल कर अभिषेक के हाथपैर बांध कर लाश को एक बड़ी पौलीथिन में रख कर उसे टेप से बंद कर एक बोरी में भर दिया. किम्सी फ्लैट पर ही रही, जबकि विकास ने अभिषेक का मोबाइल औन किया और उन की कार भिलाई के कई क्षेत्रों में घुमा कर रायपुर के वीआईपी रोड पर ले जा कर छोड़ दिया. अपनी गंध मिटाने के लिए उस ने कार में शराब छिड़क दी. रास्ते में टौल नाका था, वहां सीसीटीवी कैमरा लगा था. यह बात उसे पता थी. उस ने अन्य कारों के साथ कार को इस एंगल से निकाला था कि उस की तसवीर ठीक से कैमरे में कैद नहीं हो सकी थी.

इस बीच विकास ने अभिषेक के मोबाइल को चालू रखा और उस से आई.पी. मिश्रा और जया को मैसेज करता रहा, ताकि उन्हें संदेह न हो और पुलिस भी उलझ कर रह जाए. कार को वीआईपी रोड पर छोड़ कर विकास अजीत के साथ मोटरसाइकिल से लगभग रात 10 बजे वापस आ गया. अजीत मोटरसाइकिल से उस के साथ गया था. रात में विकास ने अपनी क्वांटों कार निकाली और लाश की बोरी को उसी में रख कर करीब डेढ़ किलोमीटर दूर स्मृतिनगर पहुंच गया. बोरी गड्ढे में डाल कर लाश को गलाने के लिए उस पर नमक डाल दिया. इस के बाद गड्ढे को बंद कर दिया. जिस रौड से हत्या की थी, उसे छिपा दिया. इस के बाद राहत की सांस लेते हुए विकास ने कहा, ‘‘जो हुआ है, उसे सब लोग भूल जाओ.’’

‘‘लेकिन भूलना इतना आसान नहीं है.’’ किम्सी ने चिंतित हो कर कहा तो विकास ने उसे समझाया, ‘‘पागल मत बनो. मेरा वादा है कि पुलिस कभी हम तक नहीं पहुंच पाएगी और अगर आती भी है तो हमें ऐसे रिएक्ट करना है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है.’’

‘‘ठीक है.’’

किम्सी और विकास अपने फ्लैट पर आ गए. इस के बाद वे ऐसे रहने लगे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. योजना के अनुसार विकास ने धमतरी जा कर फिरौती के लिए फोन कर के जांच नक्सलियों की ओर भटका दी. इस के बाद वापसी में उस ने अभिषेक के मोबाइल को एक नदी में फेंक दिया. अभिषेक की हत्या के मामले की जांच पुलिस किस दिशा में कर रही है, इस पर उन्होंने पूरी नजर बनाए रखी.

पुलिस ने पहली बार किम्सी से पूछताछ की तो उस ने बेहद मासूमियत से साफसाफ जवाब दे कर पुलिस को उलझा दिया. पुलिस जांच की ज्यादा से ज्यादा जानकारी के लिए उन्होंने कई अखबार लगा लिए. अभिषेक के अपहरण को ले कर पुलिस भटक रही थी. यह खबर पढ़ कर तीनों खुश थे. इस बीच उन्होंने जिस गड्ढे में अभिषेक को दफनाया था, उस के ऊपर फूलगोभी के पौधे लगा दिए. बाद में संदेह के आधार पर किम्सी और विकास से पूछताछ की गई तो इस बार भी वे पुलिस को चकमा देने में कामयाब रहे. इस बीच नौकरी की तलाश में किम्सी दिल्ली चली गई. अलबत्ता वह विकास से हालात की जानकारी लेती रहती थी. लेकिन आगे की जांच में जो स्थितियां बनीं, उस से तीनों पुलिस के शिकंजे में आ गए.

पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त रौड, अभिषेक की घड़ी और कपड़े आदि बरामद कर लिए. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं. पुलिस आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट तैयार कर रही थी. दूसरी ओर शव पुराना होने की वजह से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की सही वजह स्पष्ट नहीं हो सकी.मौत की सही वजह का पता लगाने के लिए पु च के लिए प्रयोगशाला भेज दिया है.Chhattisgarh News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Suspense Story: बेवफाई का दर्द

Suspense Story: धनदौलत, सुखसुविधाओं के अलावा औरत की और भी जरूरतें होती हैं. मर्चेंट नेवी में इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी  विवाहिता सुष्मिता की उन्हीं जरूरतों को पूरी नहीं  कर पा रहा था. इस का अंजाम इतना भयानक निकला कि…

9 दिसंबर, 2015 की सुबह के 6 बजे महाराष्ट्र के जिला रायगढ़ की तहसील पनवेल, नवी मुंबई के थाना मानसरोवर कामोठे के सीनियर इंसपेक्टर श्रीराम मल्लेमवार को किसी ने फोन द्वारा सूचना दी कि सेक्टर-19 की वेदांत दृष्टि सोसायटी की दूसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 201 में एक हादसा हो गया है, जिस में 3 लोग मारे गए हैं. तीनों लाशें फ्लैट में पड़ी हैं. सूचना गंभीर थी. श्रीराम मल्लेमवार तत्काल अपने साथ सहायक पुलिस इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर, सबइंसपेक्टर जनार्दन पार्टे, हैडकांस्टेबल मोहन मुलीक, सुनील होलार, दिलीप मिनमिणे और रवि गर्जे को ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे.

सुबहसुबह सोसायटी में पुलिस देख कर सुरक्षागार्डों से ले कर वहां रहने वाले तक इस आशंका से घिर गए कि यहां ऐसा क्या हो गया कि पुलिस को आना पड़ा. देखते ही देखते पूरी सोसायटी के लोग इकट्ठा हो गए. पुलिस ने फ्लैट नंबर 201 के अंदर जाने से पहले उस में रहने वालों के बारे में पूछा तो पता चला कि उस में मर्चेंट नेवी में काम करने वाले इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी पत्नी सुष्मिता ठाकुर के साथ रहते थे. इसे उन्होंने एक साल पहले ही 10 हजार रुपए महीने के किराए पर लिया था.

धु्रवकांत नौकरी की वजह से अधिकतर बाहर ही रहते थे, इसलिए उन की पत्नी सुष्मिता ठाकुर यहां अकेली ही रहती थीं. साल भर में धु्रवकांत को एकदो बार ही देखा गया है. जबकि उन के एक दोस्त अजय सिंह को अकसर उन के यहां देखा गया है. करीब एक सप्ताह से वह सुष्मिता के साथ ही रह रहा था. कल रात ही धु्रवकांत अपने फ्लैट पर आए थे. सोसायटी के सुरक्षागार्डों से पूछताछ कर के श्रीराम मल्लेमवार ने यह जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और सहयोगियों के साथ फ्लैट नंबर 201 के सामने जा पहुंचे. फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था. दरवाजा तोड़ कर वह अंदर दाखिल हुए तो उन्हें जो सूचना दी गई थी, वह सच साबित हुई.

सामने के हाल में फर्श पर एक युवक की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस के शरीर से निकला खून फर्श पर फैला हुआ था. उस के शरीर और गले पर किसी तेजधार वाले चाकू के कई गहरे घाव थे. हाल के सामने वाले बैडरूम में एक युवा और खूबसूरत महिला की लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर किसी तरह का कोई घाव नहीं था. उस के नाकमुंह पर एक तकिया पड़ा था, इस का मतलब उस की हत्या उसी तकिए से मुंहनाक दबा कर की गई थी. उसी कमरे में एक कोने में एक युवक बेहोश पड़ा था, जिस के गले में एक टूटी हुई टाई बंधी थी, पास ही एक छोटा सा टेबल गिरा पड़ा था, टाई का आधा हिस्सा छत में लगे पंखे से बंधा था. इस से श्रीराम मल्लेमवार ने अंदाजा लगाया कि इस ने आत्महत्या की कोशिश की होगी. लेकिन टाई के टूट जाने की वजह से वह उस में सफल नहीं हुआ.

श्रीराम मल्लेमवार ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया. गार्डों और पड़ोसियों ने उस की शिनाख्त धु्रवकांत ठाकुर के रूप में की. मृतका सुष्मिता ठाकुर थी और मृतक उस का दोस्त अजय सिंह था. श्रीराम मल्लेमवार घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण कर रहे थे कि नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर प्रभात रंजन, एडीशनल पुलिस कमिश्नर विश्वास पाढरे, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर शेषराव सूर्यवंशी भी आ गए थे. अधिकारियों के साथ ही प्रैस फोटोग्राफर, डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी आई थी. इन लोगों का काम खत्म हो गया तो वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद वे इस मामले की जांच की जिम्मेदारी श्रीराम मल्लेमवार को सौंप कर चले गए.

श्रीराम मल्लेमवार ने सहायकों की मदद से घटनास्थल की औपचारिकताएं निभा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ग्रामीण अस्पताल भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति, 2 लोगों की हत्या और एक के आत्महत्या करने की कोशिश से ही पुलिस समझ गई थी कि यह अवैध संबंधों का मामला है. लेकिन पूरी सच्चाई तो तभी सामने आ सकती थी, जब बेहोश पड़े धु्रवकांत को होश आ जाता. लेकिन जब पुलिस ने उन के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला, जिसे धु्रवकांत ने अपनी बहन रंजना झा के नाम लिखा था.

उस सुसाइड नोट को पढ़ने के बाद हत्याओं और आत्महत्या का कुछ रहस्य तो उजागर हो गया, जो रहस्य बाकी बचा था, वह धु्रवकांत के होश में आने के बाद दिए गए उन के बयान से उजागर हो गया. यह सचमुच अवैध संबंधों में की गई हत्याओं का मामला था. यह पूरी कहानी कुछ इस तरह थी. 29 वर्षीय धु्रवकांत ठाकुर बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के थाना कस्बा मडि़यारपुर के रहने वाले विमलकांत ठाकुर के दूसरे नंबर के बेटे थे. विमलकांत के पास खेती की ठीकठाक जमीन थी, इसलिए उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे तथा एक बेटी रंजना थी.

बड़ा बेटा पढ़लिख कर बाप के साथ खेती करने लगा तो उन्होंने उस की शादी कर दी. उस के बाद रंजना की भी शादी कर दी. वह नवी मुंबई के एटौली में पति के साथ रहती थी. धु्रवकांत सब से छोटा था. उस ने विज्ञान विषय से पढ़ाई की थी, इसलिए एयरफोर्स या नेवी की नौकरी करना चाहता था. गांव में रह कर वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकता था, इसलिए बहन के पास मुंबई आ गया और सपनों की तलाश में जुट गया.

आखिर धु्रवकांत का सपना साकार हुआ. उस ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और मर्चेंट नेवी में भरती हो गया. उसे चैंबूर गोवड़ी की जीएसएम साईं कमर्शियल कंपनी में नौकरी मिल गई थी. उसे अच्छी तनख्वाह तो मिलती ही थी, विदेश घूमने का भी मौका मिल रहा था. अब उस का ज्यादा समय विदशों में ही बीतता था. नौकरी लगने के बाद वह स्थाई रूप से मुंबई में ही बसने के बारे में सोचने लगा था. नौकरी लगते ही घर वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. विमलकांत बेटे के विवाह के लिए जैसे ही तैयार हुए, उन के यहां रिश्तों की लाइन लग गई. उन रिश्तों में उन्होंने अपने ही जिले की तहसील महुआ के रहने वाले चंद्रमोहन ठाकुर की सुंदरसुशिक्षित बेटी सुष्मिता को पसंद कर लिया.

धु्रवकांत ने भी सुष्मिता को देखा. उन्हें भी सुष्मिता पसंद आ गई तो मई, 2010 में धु्रवकांत और सुष्मिता की शादी धूमधाम के साथ हो गई. शादी के बाद धु्रवकांत सुष्मिता को मांबाप के पास छोड़ना चाहता था, लेकिन सुष्मिता इस के लिए तैयार नहीं हुई. मजबूरन उसे पत्नी को मुंबई लाना पड़ा.

मुंबई आने के बाद धु्रवकांत मात्र एक सप्ताह पत्नी के साथ रहा. उस के बाद पत्नी को बहन के पास छोड़ कर अपनी नौकरी पर चला गया. नईनवेली दुलहन सुष्मिता का दिन तो किसी तरह बीत जाता था, लेकिन रातें उस के लिए पहाड़ सी बन जाती थीं. लगभग 6 महीने बाद धु्रवकांत विदेश से वापस आया तो सुष्मिता शिकायतों का पिटारा ले कर उस के सामने बैठ गई. सुष्मिता की शिकायतें वाजिब थीं, क्योंकि एक औरत को शादी के बाद जो चाहिए, वह उन्हें पूरी नहीं कर सका था. लेकिन उस की भी मजबूरी थी. लिहाजा पत्नी को समझाबुझा कर और आश्वासन दे कर चुप करा दिया.

कुछ दिनों पत्नी के साथ रह कर धु्रवकांत फिर नौकरी पर चला गया. लेकिन इस बार वह लौटा तो घर का माहौल काफी बदला हुआ था. इस बार सुष्मिता ने उस की बहन रंजना के साथ रहने से साफ मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि उन दोनों के बीच काफी मनमुटाव हो गया था. पत्नी की बात मानना धु्रवकांत की मजबूरी थी, इसलिए सुष्मिता के कहने पर उस ने बहन से अलग रहने का फैसला कर लिया और सुष्मिता के रहने की व्यवस्था जुईनगर के एक वूमंस हौस्टल में कर दी. सुष्मिता को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो और उस का मन बहलता रहे, इस के लिए उस ने घर में कंप्यूटरइंटरनेट की भी व्यवस्था कर दी.

यही नहीं, सुष्मिता का समय व्यतीत करने के लिए उस ने उस का दाखिला एमजीएम अस्पताल में औपरेशन थिएटर में तकनीकी सहायक के कोर्स में करा दिया. लेकिन सुष्मिता जिस उम्र में थी, वह उम्र नदी में आई बाढ़ की तरह होती है. अगर बांध मजबूत न हुआ तो वह उसे तोड़ कर बह निकलने में देर नहीं लगाती. सुष्मिता ने भी कुछ ऐसा ही किया. भले ही मन बहलाने की सारी सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन पति से अलग रह कर वह खुश नहीं थी.

धीरेधीरे उस की शादी को 3 साल हो गए थे. अब तक न तो उस के तन की प्यास बुझी थी और न ही उसे मातृत्व सुख मिला था, जिस की चाहत हर औरत को होती है.

यह सब सोच कर जब कभी वह बेचैन होती तो सोशल मीडिया का सहारा लेती. धु्रवकांत से वह घंटों चैटिंग करती. फेसबुक पर भी उस के दोस्तों की लंबी सूची थी. उन्हीं दोस्तों में एक था अजय सिंह, जिस के सामने उस की नजरों में धु्रवकांत की तसवीर फीकी पड़ गई थी. सुष्मिता ने अजय की प्रोफाइल खोल कर देखी तो मजबूत कदकाठी का स्मार्ट दिखने वाला अजय उसी के जिले का रहने वाला निकला. वह दुबई की एक बैंक में नौकरी करता था. उस का फोटो और प्रोफाइल देख कर सुष्मिता उस की ओर आकर्षित हो गई. उस ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उस ने दोस्ती स्वीकार कर ली.

दिसंबर, 2014 में अजय भारत आया तो मुंबई के मैकडोनाल्ड में दोनों की मुलाकात हुई. इस मुलाकात में अजय के बातव्यवहार से वह उस पर मर मिटी. अजय अविवाहित था. उसे भी सुष्मिता इतनी भायी कि उस ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि वह विवाहित है. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हुआ तो मर्यादा की दीवार टूटते देर नहीं लगी. इस पर सुष्मिता को कोई पछतावा भी नहीं हुआ. इस की वजह शायद यह थी कि अजय की बांहों में उसे जो सुख और सुकून मिला था, धु्रवकांत की बांहों में उसे कभी नहीं मिला था.

इस के बाद धु्रवकांत छुट्टी पर मुंबई आया तो किसी वजह से हौस्टल बंद हो गया. इस के बाद उस ने कामोठे की वेदांत दृष्टि सोसायटी में किराए का फ्लैट ले कर सुष्मिता को उस में शिफ्ट कर दिया. यहीं पर सुष्मिता ने अजय सिंह को अपने पति धु्रवकांत से मिलवाया. धु्रवकांत भी अजय की बातों और स्वभाव से काफी प्रभावित हुआ, इसलिए उस ने भी उस से दोस्ती कर ली.

लेकिन इस बार धु्रवकांत ने सुष्मिता के व्यवहार में काफी बदलाव महसूस किया. यह बदलाव उस ने जाने के बाद भी महसूस किया. पहले सुष्मिता उस से इंटरनेट पर घंटों चैटिंग करती रहती थी, फोन पर प्यार से बातें करती थी, अब वह उसे फोन ही नहीं करती थी. वह जब भी उसे फोन करता, उस का फोन बिजी रहता. फोन उठाती भी तो सीधे मुंह बात नहीं करती थी. नेट पर चैटिंग तो एकदम से बंद कर दी थी. इस से उसे काफी तकलीफ होती थी.

जब कभी धु्रवकांत शिकायत करता तो वह टाल देती. आखिर उसे चिंता ही किस बात की थी. उस की जिंदगी में तो कोई और धु्रव आ गया था. धु्रवकांत 6-7 महीने में आता था, जबकि सुष्मिता अजय सिंह को जब भी याद करती थी, वह 2 घंटे में उस के पास पहुंच जाता था. हौस्टल में सुष्मिता किसी पुरुष को साथ नहीं रख सकती थी, जबकि फ्लैट में तो कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अजय सिंह का जब मन होता, वह उस के यहां रुक भी जाता था.

सुष्मिता क्यों बदल गई है, जब इस बात की जानकारी धु्रवकांत को हुई तो वह सन्न रह गया. वह सुष्मिता को बहुत प्यार करता था. वह तुरंत मुंबई आया और सुष्मिता को समझाने की कोशिश की. लेकिन अब सुष्मिता कहां समझने वाली थी. उस ने प्रेमी के लिए पति से झगड़ा ही नहीं कर लिया, बल्कि उसे छोड़ने को भी तैयार हो गई. धु्रवकांत ने सारी बातें सासससुर को बता कर सुष्मिता को समझाने को कहा तो उन लोगों ने उस की बात पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद सुष्मिता ने अपने मातापिता को सारी बात बता कर पहले ही अपने पक्ष में कर लिया था. इसी वजह से वे भी बेटी की बेवफाई पर चुप थे.

धु्रवकांत सुष्मिता को समझाबुझा कर अपनी ड्यूटी पर चला गया. लेकिन सुष्मिता मर्यादा में आने के बजाय और बाहर चली गई. उस ने अजय से शादी करने का फैसला कर लिया. इस से मुंबई से ले कर गांव तक धु्रवकांत की बदनामी हो रही थी. बदनामी उस से सहन नहीं हो पा रही थी. लेकिन वह कुछ कर पाने की स्थिति में भी नहीं था. वह एक मर्द था, अपनी पत्नी को दूसरे मर्द की बांहों में कैसे देख सकता था. उस के यारदोस्त भी उस की हंसी उड़ाते थे कि वह अपनी पत्नी को संभाल नहीं पाया. इस से वह और परेशान रहता था कि सुष्मिता को वह अजय के चंगुल से कैसे मुक्त कराए. वह इसी सोच में डूबा था कि सुष्मिता ने उस से जो कहा, उस से वह बेचैन हो उठा.

उस समय धु्रवकांत का जहाज फ्रांस के बंदरगाह पर था. सुष्मिता ने उसे फोन कर के कहा कि वह 2 दिनों में मुंबई पहुंचे और उसे तलाक दे. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. वह अजय से शादी कर के उस के साथ गृहस्थी बसाना चाहती है. धु्रवकांत ने उसे समझाना चाहा तो वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम्हीं बताओ, मैं ऐसा क्यों न करूं? आज तक तुम ने मुझे दिया ही क्या है? हर औरत मां बनना चाहती है. तुम आज तक मुझे मां नहीं बना सके. आखिर मैं तुम से क्या उम्मीद करूं? औरत को धनदौलत की उतनी चाह नहीं होती, जितनी पति और बच्चों की होती है. जब उसे ये चीजें पति से नहीं मिलतीं, तभी वह भटक जाती है. शादी के बाद तुम ने मेरे साथ कितने दिन और रातें गुजारी हैं, इसे अंगुलियों पर गिन कर बताया जा सकता है.’’

‘‘सुष्मिता, मैं तुम्हारे दर्द को अच्छी तरह समझता हूं. लेकिन क्या करूं, मेरी भी मजबूरी है. मेरी नौकरी ही ऐसी है कि मैं चाह कर भी तुम्हारे साथ ज्यादा दिन नहीं रह सकता. जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा.’’ धु्रवकांत ने सुष्मिता को समझाते हुए कहा. इस के बाद वह फ्लाइट पकड़ कर सीधे मुंबई आ गया. 8 दिसंबर, 2015 की रात 12 बजे जब वह अपने फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा था. सुष्मिता घर पर नहीं थी. गार्डों से पूछने पर पता चला कि वह 8 दिन पहले फ्लैट पर आए अजय सिंह के साथ कहीं बाहर गई है.

इस जानकारी के बाद धु्रवकांत अपना गुस्सा पी कर फ्लैट पर पहुंचा और अपनी चाबी से फ्लैट का दरवाजा खोल कर अंदर आया और हाल में बैठ कर सुष्मिता का इंतजार करने लगा. रात एक बजे जिस हालत में सुष्मिता अजय सिंह के साथ आई, वह सब देख कर धु्रवकांत का खून खौल उठा. सुष्मिता काफी कम कपड़ों में अजय की कमर में बांहें डाले अंदर आई थी. पत्नी को किसी गैर की बांहों में इस तरह देखना बरदाश्त के बाहर की बात थी. फ्लैट के अंदर रोशनी में बैठे धु्रवकांत को देख कर एक पल के लिए तो उन के चेहरे का रंग उड़ गया था, लेकिन अगले ही पल दोनों संभल गए. सुष्मिता ने बेरुखी से पूछा, ‘‘अरे, तुम कब आए?’’

पत्नी की बेरुखी से धुंवकांत का चेहरा लाल हो उठा. उस ने भी उसी की भाषा में कहा, ‘‘मैं कब आया, यह छोड़ो. पहले तुम यह बताओ कि इतनी रात गए तुम पराए मर्द के साथ कहां से आ रही हो?’’ इस के बाद अजय की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘इसे तुरंत यहां से बाहर करो.’’

‘‘यह तो कहीं नहीं जाएंगे, अगर जाना ही है तो तुम चले जाओ.’’ सुष्मिता ने अजय का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘हम दोनों कल मंदिर में शादी करने वाले हैं. इस के लिए मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है.’’ इतना कह कर सुष्मिता अजय सिंह का हाथ पकड़ कर बैडरूम में चली गई.

सुष्मिता की इन बातों और हरकत से धु्रवकांत का कलेजा छलनी हो गया. उस की आंखों में खून के आंसू आ गए. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था, एक दिन वह उस के साथ इस तरह का व्यवहार करेगी. सुष्मिता और अजय सिंह तो सो गए, जबकि धु्रवकांत को नींद नहीं आ रही थी. सुबह 5 बजे तक वह हाल के सोफे पर ही बैठा रहा. उस की आंखों के सामने सुष्मिता के साथ शादी से ले कर अब तक के बिताए पल चलचित्र की तरह घूम रहे थे. सुष्मिता ने जो किया था, कोई भी होता उसे नफरत हो जाती. अजय ने भी उस के साथ विश्वासघात किया था.

विश्वास, नफरत और हिकारत की आंधी ने धु्रवकांत की बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया. उस ने तुरंत एक भयानक फैसला कर लिया और किचन में जा कर सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. चाकू ले कर वह बैडरूम पहुंचा और बातें करने के बहाने सुष्मिता के साथ गहरी नींद में सोए अजय सिंह को जगा कर हाल में ले आया. हाल में आते ही नींद में डूबे अजय का मुंह पकड़ कर उस ने उस पर हमला कर दिया. उस ने उसे तभी छोड़ा, जब तक वह मर नहीं गया. इस के बाद वह सुष्मिता के पास पहुंचा और उस से संबंध बनाने की इच्छा जताई. लेकिन उसे खून में नहाया देख कर सुष्मिता के होश उड़ गए. वह बैड से उठ कर भागी, लेकिन धु्रवकांत उसे दबोच कर उस के सीने पर सवार हो गया.

सुष्मिता ने विरोध तो बहुत किया, लेकिन धु्रवकांत ने तकिया उस के चेहरे पर रख कर दबा दिया. वह तकिए को तब तक दबाए रहा, जब तक वह मर नहीं गई. दोनों की हत्या कर धु्रवकांत ने अपना लैटरपैड उठाया और अपनी बहन रंजना के नाम एक पत्र लिखा, जिस में उस ने अपनी पत्नी सुष्मिता की बेवफाई और अजय सिंह के विश्वासघात का जिक्र करते हुए अपनी आत्महत्या के बारे में बताया कि वह सुष्मिता से बहुत प्यार करता था. वह उस का खून नहीं देख सकता था, इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार नहीं किया. उस ने उस की हत्या तकिए से की. सुष्मिता और उस का प्रेमी अजय सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब वह भी जीना नहीं चाहता, इसलिए वह भी आत्महत्या कर रहा है.

सुसाइड नोट लिखने के बाद धु्रवकांत ने थाना पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दी. उस का सोचना था कि जब तक पुलिस उस के फ्लैट पर पहुंचेगी, तब तक वह भी मर चुका होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. संयोग से वह बच गया. उस ने जिस टाई से आत्महत्या करने की कोशिश की थी, वह काफी कमजोर थी. इसलिए उस के लटकते ही वह टूट गई. लेकिन टाई गले में कस गई थी, जिस से वह फर्श पर गिर कर बेहोश हो गया.

श्रीराम मल्लेमवार के दिशानिर्देश में असिस्टैंट इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर ने जांच पूरी कर के इस मामले को अपराध संख्या 234/2015 पर भादंवि की धारा 302, 164 के तहत दर्ज कर 1 जनवरी, 2016 को धु्रवकांत ठाकुर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

ExtraMarital Affair: अवैध संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

ExtraMarital Affair: विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

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अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

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वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी. ExtraMarital Affair

Ghaziabad Crime News: अमीर बनने की चाहत

Ghaziabad Crime News: दीपक और संदीप दोनों रातोंरात अमीर बनने का ख्वाब देखते थे. अपने इस ख्वाब को पूरा करने के लिए उन्होंने क्राइम सीरियल देख कर एक शेयर कारोबारी के बेटे का अपहरण कर लिया. लेकिन उन का यह अपराध उन्हें जेल ले गया.

उत्तर प्रदेश के जनपद गाजियाबाद के पौश इलाके राजनगर एक्सटेंशन की वीवीआईपी सोसाइटी में 30 नवंबर, 2015 की सुबह हड़कंप मचा हुआ था. इस की वजह वह थी कि इस सोसाइटी में रहने वाले कारोबारी विवेक महाजन का बेटा रहस्यमय ढंग से गायब हो गया था. दरअसल उन का 13 वर्षीय बेटा जयकरन 29 नवंबर की दोपहर सोसाइटी में ही बने मैदान में खेलने के लिए गया था. इसी बीच वह लापता हो गया था. जब वह शाम तक घर नहीं पहुंचा तो घर वालों को चिंता हुई. चिंताओं के बादल तब और गहरे हो गए, जब यह पता चला कि जयकरन का मोबाइल भी स्विच्ड औफ है.

परिचितों और जयकरन के दोस्तों के यहां भी उस की खोजबीन की जा चुकी थी. लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं लग पा रहा था. थकहार कर विवेक महाजन ने स्थानीय थाना सिंहानी गेट में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. पुलिस ने उन्हें नातेरिश्तेदारों के यहां खोजबीन करने की सलाह दे कर जयकरन का फोटो और हुलिया नोट कर लिया था.

विवेक महाजन के परिवार में पत्नी अमिता के अलावा 2 ही बच्चे थे, बेटी संस्कृति और बेटा जयकरन. अमिता पेशे से डाक्टर थीं, उन का अपना नैचुरोपैथी क्लिनिक था. जयकरन शहर के ही एक पब्लिक स्कूल में कक्षा 8 में पढ़ रहा था. उस के लापता होने से अनहोनी की आशंकाएं जन्म ले रही थीं. पूरी रात जयकरन का इंतजार होता रहा. लेकिन न तो वह आया और न ही उस के मोबाइल पर संपर्क हो सका. चिंताओं के बीच किसी तरह रात बीत गई. 30 नवंबर की सुबह सूरज की रेशमी किरणों से नई उम्मीदों का उजाला तो हुआ, लेकिन महाजन परिवार की उदासी और परेशानी ज्यों की त्यों बनी रही.

करीब सवा 10 बजे अमिता के मोबाइल की घंटी बजी. उन्होंने बुझे मन से मोबाइल की स्क्रीन को देखा तो उस पर जयकरन का नंबर डिस्प्ले हो रहा था. उन्होंने झट से फोन का बटन दबा कर के कान से लगाया, ‘‘ह…ह…हैलो जयकरन बेटा, कहां है तू?’’

‘‘घबराओ नहीं डाक्टर साहिबा, जयकरन हमारे पास सलामत है.’’ किसी अनजबी की आवाज सुन कर अमिता के दिल की धड़कनें बढ़ गईं और आवाज गले में अटक सी गई, ‘‘अ…अ…आप कौन, मेरा बेटा कहां है? उस से मेरी बात कराइए.’’ अमिता ने कहा.

लेकिन फोन करने वाला ठंडे लहजे में बोला, ‘‘इतनी भी क्या जल्दी है, बेटे से बात करने की. अभी एक ही रात के लिए तो दूर हुआ है. बाई द वे वह बिल्कुल ठीक है. हम पूरा खयाल रख रहे हैं उस का.’’

कुछ पल रुक कर उस ने आगे कहा, ‘‘रही हमारी बात तो इतना बताना ही काफी है कि आप लोग फटाफट 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो. जैसे ही 2 करोड़ दे दोगे, बेटा तुम्हें मिल जाएगा.’’

यह सुन कर अमिता के होश उड़ गए. वह समझ गईं कि उन के बेटे का अपहरण हुआ है. वह गिड़गिड़ाईं, ‘‘देखो प्लीज, तुम मेरे बेटे को छोड़ दो.’’

उन की बेबसी पर फोनकर्ता ने पहले ठहाका लगाया, फिर वह कठोर लहजे में बोला, ‘‘कहा तो है छोड़ देंगे. तुम रकम का इंतजाम करो. हम तुम्हें दोबारा फोन करेंगे.’’ थोड़ा रुक कर वह आगे बोला, ‘‘और हां, पुलिस को फोन करने की गलती कतई मत करना, वरना तुम्हारा बेटा टुकड़ों में मिलेगा.’’

‘‘तुम लोग गलत कर रहे हो. हम पर रहम करो, प्लीज मेरे बेटे को छोड़ दो.’’

अमिता ने कहा तो दूसरी ओर से फोन कट गया. उन्होंने काल बैक की, लेकिन तब तक मोबाइल फोन स्विच्ड औफ हो चुका था. जयकरन के अपहरण की बात से महाजन परिवार में कोहराम मच गया. सोसाइटी के लोग भी एकत्र हो गए. विवेक महाजन ने इस की सूचना पुलिस को दी तो पुलिस विभाग तुरंत हरकत में आ गया. मामला एक हाईप्रोफाइल कारोबारी के बच्चे के अपहरण का था, लिहाजा कुछ ही देर में थानाप्रभारी रणवीर सिंह विवेक महाजन के घर पहुंच गए. बाद में एसएसपी धर्मेंद्र यादव, एसपी (सिटी) अजयपाल शर्मा व सीओ विजय प्रताप यादव भी वहां आ गए.

यह बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि जयकरन का अपहरण फिरौती के लिए किया गया था. अपहर्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. ऐसे में पुलिस के सामने जयकरन को बचाना बड़ी चुनौती थी. मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व डीआईजी आशुतोष कुमार ने सतर्कता के साथ अविलंब काररवाई निर्देश दिए. एसएसपी धर्मेंद्र यादव ने जयकरन की सकुशल रिहाई के लिए एसपी अजयपाल शर्मा के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी. इस टीम में थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच के प्रभारी अवनीश गौतम व उन की टीम को भी शामिल किया गया. इस बीच पुलिस ने जयकरन की गुमशुदगी को अपहरण में तरमीम कर के अज्ञात अपहर्ताओं के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया था.

पुलिस ने जयकरन का मोबाइल नंबर ले कर सर्विलांस पर लगा दिया. पुलिस को उम्मीद थी कि सीसीटीवी की मदद से संभवत: कोई ऐसा सुराग मिल जाएगा, जिस से यह पता चल जाएगा कि जयकरन को कालोनी के बाहर कब और कैसे ले जाया गया. लेकिन पुलिस की यह उम्मीद तब टूट गई, जब पता चला कि वीवीआईपी सोसाइटी में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे हैं. इस बीच पुलिस इतना अंदाजा जरूर लगा चुकी थी कि जयकरन के अपहरण में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ है, जिसे वह पहले से जानता रहा होगा. क्योंकि अगर उसे जबरन ले जाया गया होता तो शोरशराबा होता या घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी मिल जाता.

पुलिस ने जयकरन के घर वालों और अन्य लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई ऐसा सुराग नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस आगे बढ़ पाती. पुलिस ने जयकरन के दोस्तों और सोसाइटी के संदिग्ध लोगों के बारे में पूछताछ की तो एक चौंकाने वाली जानकारी मिली. एक व्यक्ति ने बताया, ‘‘सर, 2 लड़के हैं जो अब नहीं दिख रहे. वे दोनों जयकरन के दोस्त भी हैं.’’

‘‘कौन हैं वे?’’ पुलिस अधिकारी ने पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया, ‘‘दीपक और संदीप. दोनों सोसाइटी में ही किराए पर अकेले रहते हैं. रात और सुबह 9 बजे तक तो दोनों यहीं पर थे, लेकिन अब नहीं दिख रहे हैं.’’

यह पता चलने पर पुलिस उन दोनों के फ्लैट पर पहुंची, लेकिन वहां ताला लटका हुआ था. इस से पुलिस को उन पर थोड़ा शक हुआ. उन के बारे में ज्यादा कोई कुछ नहीं जानता था. बस इतना ही पता चला कि वे दोनों 2 महीने पहले ही सोसाइटी में रहने के लिए आए थे. दोनों बहुत मिलनसार थे और बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते थे. जयकरन को चूंकि क्रिकेट का बहुत शौक था, इसलिए उस की उन से अच्छी जानपहचान थी.

‘‘वे दोनों काम क्या करते थे?’’

‘‘नहीं पता सर.’’

पुलिस के शक की सूई उन दोनों के इर्दगिर्द घूमने लगी. तभी एक युवक ने अपना मोबाइल आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘यह देखिए सर, दीपक का फोटो.’’ फोटो पर नजर पड़ते ही एसपी अजयपाल शर्मा चौंके. उस में दीपक अपने हाथ में अवैध पिस्टल लिए हुए था. दरअसल दीपक ने वह फोटो व्हाट्सएप ग्रुप में खुद ही पोस्ट की थी. पुलिस ने पहली नजर में ही ताड़ लिया कि पिस्टल अवैध थी. इस से पुलिस का शक उन दोनों पर और भी बढ़ गया. पुलिस ने पूछताछ कर के दीपक का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया.

इस सनसनीखेज मामले की जांच में तत्परता दिखाना बहुत जरूरी था. क्योंकि अपहर्ता जयकरन को नुकसान पहुंचा सकते थे. दोपहर होतेहोते पुलिस को जयकरन के मोबाइल की काल डिटेल्स भी मिल गई. उस से पता चला कि उस की अंतिम लोकेशन दिल्ली-मेरठ रोड स्थित औद्योगिक क्षेत्र में थी. इस के बाद मोबाइल बंद हो गया था. जबकि जयकरन के मोबाइल से फिरौती के लिए जो काल की गई थी, वह वहां से करीब 15 किलोमीटर दूर गालंद क्षेत्र से की गई थी. मोबाइल से सिर्फ एक वही काल हुई थी. इस के बाद मोबाइल बंद कर दिया गया था.

इस का मतलब अपहर्ता बेहद चालाक थे. उन्होंने फिरौती के लिए न सिर्फ जयकरन के फोन का इस्तेमाल किया था, बल्कि स्थान भी बदल दिया था. संदिग्ध गतिविधियों के चलते पुलिस ने दीपक को रडार पर ले लिया. उस के मोबाइल की जांच से पता चला कि वह मोदीनगर क्षेत्र का रहने वाला था. जांच के दौरान यह बात भी पता चली कि वह अपनी मां के साथ राजनगर स्थित छोटे बच्चों के रौयल किड्स प्ले स्कूल में रहता था. उस की मां चूंकि स्कूल में ही कर्मचारी थी, इसलिए इस परिवार को स्कूल में रहने के लिए जगह मिली हुई थी.

पुलिस को दीपक के 2 और नजदीकियों के ठिकाने पता चले. इन में एक था संदीप. उस के मोबाइल की लोकेशन जयकरन के मोबाइल की लोकेशन से मैच हो रही थी. संदीप के बारे में पुलिस तत्काल कोई खास जानकारी नहीं जुटा सकी. शक में मजबूती आते ही पुलिस सतर्क हो गई. अगर दीपक ही अपहर्ता था तो यह भी संभव था कि उस ने जयकरन को स्कूल स्थित घर पर ही छिपा कर रखा हो.

पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श कर के अविलंब स्कूल में दबिश डालने का निर्णय लिया. एसपी अजयपाल शर्मा के नेतृत्व वाली टीम रौयल किड्स स्कूल पहुंची. उस वक्त दोपहर के 3 बजे थे. स्कूल के बच्चों की छुट्टी हो चुकी थी. अचानक पुलिस को वहां आया देख स्कूल की संचालिका रिचा सूद सकते में आ गईं. पुलिस को दीपक की मां अनीता भी वहीं मिल गईं. दीपक के बारे में पूछताछ करने पर वह बुरी तरह घबरा गईं.

‘‘दीपक कहां है?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘घर पर.’’ बताते हुए उस ने स्कूल कैंपस में पीछे की तरफ इशारा कर के बताया. वहां क्वार्टर बना हुआ था. पुलिस दनदनाती हुई वहां पहुंची तो वहां पहुंचते ही वह हुआ, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. घर के अंदर से अचानक गोलियां चलनी शुरू हो गईं.

संभवत: क्वार्टर में मौजूद लोगों को अपनी घेराबंदी का अंदाजा हो गया था. इस पर पुलिसकर्मियों ने भी हथियार थाम कर पोजीशन ले ली. कुछ मिनटों तक दोनों तरफ से रुकरुक कर कई राउंड गोलियां चलीं. इस से आसपास के क्षेत्र में दहशत फैल गई और लोग एकत्र हो गए. पुलिसकर्मियों की निगाहें क्वार्टर पर जमी थीं. तभी ट्रैक सूट पहने एक युवक ने तेजी से क्वार्टर का दरवाजा खोला और बिजली जैसी फुरती से फायरिंग करता हुआ भागा. पुलिस ने उसे चेतावनी दी, ‘‘रुक जाओ, वरना गोली मार देंगे.’’

युवक ने एक  पल के लिए पीछे पलट कर देखा और फिर भागने लगा. इस पर पुलिस ने एक गोली उस के बाएं पैर पर दाग दी. गोली लगते ही वह नीचे गिर गया. उस के गिरते ही पुलिसकर्मियों ने उसे घेर लिया. पुलिस को उम्मीद थी कि वह दीपक होगा, लेकिन उस ने अपना नाम संदीप बताया.

‘‘जयकरन कहां है?’’ जवाब में उस ने घर की तरफ इशारा कर दिया. पुलिस हथियार तान कर घर के अंदर दाखिल हुई, तो भौचक्की रह गई. पिस्टल से लैश 2 और युवक वहां मौजूद थे. लेकिन वह घबराए हुए थे. जयकरन एक कोने में बैठा थरथर कांप रहा था. उस के हाथपैर बंधे हुए थे.n पुलिस ने दोनों युवकों को गिरफ्त में ले कर जयकरन को बंधनमुक्त कराया. अपहर्ताओं को गिरफ्तार कर के जयकरन को सकुशल बरामद करना पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी थी. मौके से गिरफ्तार किए गए दोनों युवकों में एक दीपक व दूसरा उस का छोटा भाई बिट्टू था.

उन के कब्जे से पुलिस ने तीन पिस्टल, उन के मोबाइल व जयकरन का मोबाइल भी बरामद कर लिया. बेटे की बरामदगी की सूचना पर विवेक महाजन और उन की पत्नी भी मुठभेड़स्थल पर आ गए. जयकरन बहुत डरासहमा था. इस बीच पुलिस घायल युवक संदीप को अस्पताल ले गई. पुलिस दीपक व बिट्टू को थाने ले आई. पुलिस ने डरीसहमी स्कूल संचालिका रिचा सूद, दीपक की मां अनीता और उस के सब से छोटे भाई आयुष को भी पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस द्वारा गिरफ्तार युवकों व घायल संदीप से विस्तृत पूछताछ की गई तो राह से भटके युवाओं द्वारा रचित अपराध की चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

दीपक का प्लेसमेंट एजेंसी का कमीशन पर आधारित काम था. उस के परिवार में मां अनीता के अलावा उस के छोटे भाई बिट्टू व आयुष थे. दीपक के पिता की वर्षों पहले मृत्यु हो गई थी. अनीता मेहनती और हिम्मती महिला थीं. उन्होंने परिवार को चलाने के लिए छोटीमोटी नौकरियां कर के बेटों को इस उम्मीद में पढ़ायालिखाया कि वे जिम्मेदारियां उठा कर घर को संभाल लेंगे. लेकिन इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ और है.

अनीता ने आर्थिक तंगियां भी देखी थीं और जमाने की कठोरता भी. वह मोदीनगर की भूपेंद्र कालोनी में रहती थीं. बाद में उन्होंने रौयल किड्स स्कूल में नौकरी कर ली थी. स्कूल परिसर में ही बने क्वार्टर में उन के रहने का भी इंतजाम हो गया तो वह तीनों बेटों के साथ वहां चली आईं. वहां आ कर दीपक ने एक कंपनी में कमीशन के आधार पर काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन यह काम उसे छोटा लगता था. इंसान की ख्वाहिशें आसमान को छूती हों तो उसे अपनी प्रगति बहुत छोटी नजर आती है. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह अपने काम से संतुष्ट नहीं था.

उस के पास अपनी एक सैकेंड हैंड कार थी. इसी दौरान उस की दोस्ती संदीप से हो गई. संदीप मूलरूप से मेरठ जनपद के कस्बा लावड़ का रहने वाला था और गाजियाबाद में किराए पर रहता था. वह एक इंस्टीट्यूट में बच्चों को कोचिंग देता था. वह भी अमीर बनने के सपने देखता था.  2 इंसानों की सोच यदि समान हों तो उन के ताल्लुकात गहरे होते देर नहीं लगती. दीपक व संदीप की दोस्ती भी वक्त के साथ गहरा गई. दोनों जब भी साथ बैठते, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की बात करते. दीपक अपनी प्लेसमेंट एजेंसी खोलना चाहता था. जबकि संदीप की ख्वाहिश थी कि उस का अपना कोचिंग सैंटर हो. इन कामों के लिए मोटी रकम चाहिए थी, लेकिन दोनों में से किसी के पास पैसा नहीं था.

कमउम्र में ही वे बड़ी महत्वाकांक्षाओं के शिकार थे. एक दिन दोनों साथ बैठे तो दीपक बोला, ‘‘कभी हमारे भी सुनहरे दिन आएंगे क्या?’’

‘‘इतना सीरियस क्यों है भाई, यह तो इंसान के अपने हाथ में है.’’ संदीप ने शांत लहजे में कहा तो दीपक मन मसोसते हुए बोला, ‘‘अपने हाथ में होता तो कब का बड़ा आदमी बन जाता. कभीकभी मन करता है कि कोई बड़ा हाथ मार कर एक ही झटके में जिंदगी संवार दूं.’’

‘‘अब की है तूने काम की बात. सोचता तो मैं भी यही हूं. तू कहे तो कुछ ऐसा करें, जिस से सारे संकट जड़ से मिट जाएं.’’ संदीप ने कहा तो दीपक बोला, ‘‘दोनों मिल कर कुछ बड़ा प्लान करते हैं. इस शहर में बड़ेबड़े रईस हैं, वे किस काम आएंगे.’’

‘‘वे क्या हमें आ कर पैसा देंगे?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘बिलकुल देंगे, लेने का हुनर आना चाहिए.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘इतना भोला भी मत बन,  अरे जब हम किसी के जिगर के टुकड़े को कब्जे में लेंगे, तो वह खुद ही तो आ कर पैसा देगा.’’ दीपक का आशय समझते ही संदीप की आंखों में चमक आ गई.

‘‘ठीक है, कुछ ऐसा प्लान करते हैं कि किसी का अपहरण कर के मोटी रकम वसूल कर ली जाए.’’

‘‘इस के लिए हमें बहुत सोचना होगा.’’ संदीप ने कहा.

उस दिन के बाद दोनों का फितरती दिमाग सरपट दौड़ने लगा. अगले कुछ दिनों में ही दोनों ने किसी रईस आदमी के बच्चे का अपहरण करने की योजना बना ली. दोनों इस काम को बेहद चतुराई से करना चाहते थे. वे क्राइम के सीरियलों और ऐसी फिल्मों के शौकीन थे, जिन की पटकथा पुलिस को चौंका देने वाली होती थी. शहर के बारे में उन्हें अच्छी जानकारी थी.

उन दोनों ने अपने शिकार की तलाश के लिए वीवीआईपी सोसाइटी का चुनाव कर लिया. योजना के तहत उन्होंने अगस्त महीने में वहां फ्लैट किराए पर ले लिया. इस दौरान दोनों अपना कामधंधा छोड़ कर भविष्य के सपने बुनने लगे. उन के पास अब आमदनी का कोई जरिया नहीं था. दोनों कमउम्र में ही अंजाम की परवाह किए बिना गलत राह पर चल निकले थे. संदीप अपने घर से आजाद था, जबकि दीपक अपनी मां के नियंत्रण से बाहर था.

सोसायटी में रहते हुए उन्होंने अपने सौफ्ट टारगेट की तलाश शुरू कर दी. वे घूमतेफिरते और मैदान में जा कर बच्चों का क्रिकेट देखते और उन के साथ खुद भी क्रिकेट खेलते. जयकरन को क्रिकेट का जुनून था. पढ़ाई के बाद उस का ज्यादातर वक्त क्रिकेट में ही बीतता था. जयकरन किशोर था, लेकिन वह अपने से बड़ी उम्र के लड़कों से भी दोस्ती करने का इच्छुक रहता था. क्रिकेट के मैदान में ही उस की मुलाकात दीपक व संदीप से हुई. इस के बाद उन की अकसर बातेंमुलाकातें होने लगीं. कुछ ही दिनों में बातोंबातों में दोनों ने जयकरन का फैमिलीग्राउंड जान लिया. उम्र का बड़ा फांसला होने के बावजूद तीनों दोस्त बन गए.

दीपक व संदीप को जयकरन सब से अच्छा शिकार लगा. उन्हें लगा कि उस के पिता शेयर कारोबारी हैं और मां डाक्टर, इसलिए वे मुंहमांगी मोटी रकम दे देंगे. इस बात को दिमाग में रख कर उन्होंने जयकरन से मेलजोल बढ़ाया और बाद में उस के सहारे उस के घर में भी एंट्री कर ली. अपनी मीठीमीठी बातों और भोलेपन के नाटक से उन्होंने विवेक व अमिता से भी मुलाकात कर ली. कालोनी के अन्य लोगों से भी वे घुलमिल कर रहते थे. वे नहीं चाहते थे कि उन पर किसी को जरा भी शक हो. दरअसल वे अपना काम पूरी प्लानिंग के साथ करना चाहते थे. कुछ इस तरह की पुलिस उन की परछाईं भी न छू सके.

दीपक व संदीप की नजरों में सोसाइटी के यूं तो कई बच्चे थे. लेकिन उन्होंने मन ही मन सोच लिया कि जयकरन को विश्वास में ले कर आसानी से उस का अपहरण किया जा सकता है. दोनों ने विचारविमर्श कर के तय कर लिया कि एक दिन वे जयकरन का अपहरण कर के उस के पिता से फिरौती की मोटी रकम वसूल करेंगे. वे इस बारे में दिनरात सोचते रहते थे. बड़ा भाई किसी आदर्श की तरह होता है. दीपक को भी मेहनत, लगन और ईमानदारी की जिंदगी से अपने छोटे भाइयों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था, लेकिन हुआ इस का उलटा. उस ने बिट्टू को भी अपनी प्लानिंग बता कर उसे अपने साथ मिला लिया.

इस दौरान उन्होंने एक बदमाश के माध्यम से 3 अवैध पिस्तौलों का इंतजाम भी कर लिया. दीपक ने अपने मोबाइल पर वाट्सएप का एक ग्रुप बना रखा था, जिस में जयकरन व कालोनी के कुछ अन्य किशोर भी शामिल थे. दीपक ने यह सब भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने के लिए किया था.

29 नवंबर को रविवार था. जयकरन को मैच खेलने जरूर आना था. इसी दिन उन्होंने जयकरन का अपहरण करने का फैसला कर लिया. उन्होंने सोच लिया कि जयकरन को वे अपने किड्स स्कूल के क्वार्टर में ही ले जाएंगे. उस दिन किड्स स्कूल भी बंद था, इसलिए जयकरन को उन्होंने वहां रखने की सोची. रोजाना की भांति वे जयकरन से मिले. जयकरन दोपहर में क्रिकेट खेल कर घर जाने लगा तो दीपक ने उसे अपने पास बुलाया, ‘‘जयकरन, आओ हमारे साथ. अभी 20 मिनट में वापस आते हैं.’’

‘‘कहां जा रहे हो भैया?’’

‘‘अभी थोड़ा घूम कर आते हैं. हमें किसी से पैसे लेने हैं. साथ ही घूमना भी हो जाएगा. आज तो वैसे भी संडे है. तुम भी फ्री हो.’’ संदीप ने बात घुमाते हुए कहा.

जयकरन उन पर भरोसा करता था. वैसे भी वह बच्चा था. आने वाले खतरे से अनजान जयकरन उन के साथ कार में बैठ गया. इत्तफाक से उन्हें किसी ने नहीं देखा. दीपक उसे ले कर सीधे स्कूल के अंदर क्वार्टर पर पहुंचा. कमरे में पहुंचते ही दीपक व संदीप अपनी असलियत पर आ गए.

जयकरन को दहशतजदा करने के लिए उन्होंने उसे पीटना शुरू कर दिया और उसे बता दिया कि पैसे के लिए उन्होंने उस का अपहरण किया है. जयकरन ‘भैया…भैया’ करता रहा, लेकिन उन्होंने डरेसहमे जयकरन के हाथपैर बांध दिए. उस का मोबाइल छीन कर उन्होंने स्विच्ड औफ कर दिया. अनीता घर पहुंची तो यह देख कर उन्होंने विरोध किया. तब दीपक मां से दुर्व्यवहार पर उतर आया, ‘‘इस मामले में बहस मत करो मां, वरना इस के साथ तुम्हें भी गोली मार दूंगा. मैं यह सब करने के लिए मजबूर हूं. बस तुम लोग एक 2 दिन चुपचाप रहो.’’

बेटे के इस रवैए से अनीता भी घबरा गई. दीपक ने सब से छोटे भाई आयुष को डरधमका दिया. जयकरन को घर में छोड़ कर दोनों सोसाइटी चले गए. वहां जयकरन की ढूंढ़ मची तो वे भी चिंतित हो कर उसे खोजने का ढोंग करने लगे. उधर रात में बिट्टू ने जयकरन को खाना खिलाया. जयकरन का मन तो नहीं था, लेकिन डर की वजह से उस ने खाना खा लिया.

अगली सुबह संदीप व दीपक स्कूल स्थित घर आ गए. दीपक ने जयकरन को धमकाते हुए समझाया, ‘‘एकदो दिन में हम तुम्हारी बात तुम्हारे पापा से कराएंगे.’’

‘‘ज…ज…जी भैया.’’ दहशत में आए जयकरन ने डर से हां में हां मिलाई.

‘‘पता है क्या कहोगे?’’ दीपक ने पूछा तो जयकरन ने इनकार में गरदन हिलाई. इस पर दीपक ने उसे समझाया, ‘‘तुम कहना कि पापा अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो इन लोगों को 2 करोड़ रुपए दे दो, वरना ये लोग मुझे मार डालेंगे.’’

‘‘भैया, जैसा आप कहोगे, मैं वैसा ही कह दूंगा.’’ जयकरन ने डर कर जवाब दिया.

उस दिन सोमवार था. स्कूल भी खुलना था. जयकरन शोर न मचाए, इस के लिए दीपक ने नाश्ता करा कर उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. यह इंजेक्शन दीपक ने अपने एक दोस्त के माध्यम से 500 रुपए में खरीदा था. पुलिस मोबाइल के जरिए उन्हें पकड़ न सके, इसलिए उन्होंने अपने मोबाइल का इस्तेमाल नहीं किया.

बिट्टू को फिरौती के लिए फोन करने के लिए जयकरन का मोबाइल ले कर 15 किलोमीटर दूर भेजा गया. वहां से 2 करोड़ की फिरौती का फोन कर के वह वापस आ गया. बिट्टू से फोन कराना इसलिए जरूरी था, क्योंकि जयकरन के घर वाले दीपक व संदीप की आवाज पहचानते थे. तीनों ने तय कर लिया था कि उन्होंने फिरौती की रकम की शुरुआत 2 करोड़ से की है तो सौदेबाजी होने पर करोड़ तो मिल ही जाएंगे.

इस से भी ज्यादा खतरनाक योजना उन्होंने यह बनाई कि रकम मिलते ही वे जयकरन की हत्या के बाद लाश को हरिद्वार ले जा कर ठिकाने लगा देंगे. जयकरन चूंकि उन्हें पहचानता था, इसलिए उसे जिंदा छोड़ना उन के लिए खतरनाक था. हरिद्वार में दीपक का एक चाचा रहता था. दीपक ने उसे भी फोन कर के इशारों से अपनी बात समझा दी थी. रकम मिलने तक वह जयकरन को इसलिए जिंदा रखना चाहते थे, ताकि विश्वास दिलाने के लिए उस के घर वालों से उस की बात कराई जा सके. उन्होंने यह भी सोच लिया था कि यदि रकम नहीं मिली तो भी जयकरन को मार देंगे. दोनों ही सूरतों में जयकरन का मरना तय था.

उधर फिरौती का फोन पहुंचते ही सोसायटी में पुलिस की गतिविधियां बढ़ गईं. शाम तक उन्होंने मौके की नजाकत परखने का निर्णय लिया. उन्हें दोबारा शाम को फोन करना था, इसलिए इंतजार करने लगे. इन लोगों ने अपनेअपने मोबाइल औफ कर लिए थे. उन्हें उम्मीद थी कि पुलिस जयकरन का मोबाइल दूसरी जगह इस्तेमाल करने की वजह से धोखा खा कर दिशा भटक जाएगी, लेकिन उन तक नहीं पहुंच पाएगी, यह उन की अपनी सोच थी. शक की बिनाह पर वह शिकंजे में आ गए.

उधर पूछताछ के बाद स्कूल संचालिका व आरोपियों की मां को छोड़ दिया गया. स्कूल में क्या कुछ चल रहा था, रिचा सूद वाकई इस से पूरी तरह अंजान थीं. पुलिस ने अपहरण में प्रयुक्त कार भी बरामद कर ली. अगले दिन यानी 1 दिसंबर को प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने संदीप को डिस्चार्ज करा लिया.

पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अपने से बड़ी उम्र के युवकों से दोस्ती करने की आदत ही जयकरन को भारी पड़ गई थी. वहीं दीपक, संदीप व बिट्टू ने राह से भटकने के बजाय मेहनत की राह अपना कर जिंदगी को संवारने की कोशिश की होती तो उन का भविष्य चौपट होने से बच जाता. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी जेल में थे और उन की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस दीपक के चाचा की तलाश कर रही थी. Ghaziabad Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: शिल्पा शेट्टी के – परिवार को ठगने वाला बाबा

Crime Story Hindi: योगगुरु बाबा रामदेव के तथाकथित शिष्य देवेंद्र ने मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के परिवार के अलावा भी कई लोगों को ठगा था. लेकिन जब उस के कारनामों की पोल खुली तो हर कोई दंग रह गया. चेहरे पर दाढ़ी और सिर पर लंबे बाल रखने वाला वह लंबातगड़ा शख्स खुद को पहुंचा हुआ बाबा बताता था. मैडिकल साइंस को चुनौती देने वाले रोगों को भी वह ठीक करने का दावा करता था. सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि वह खुद को करोड़ों का कारोबार करने वाले ट्रस्ट पतंजलि के योगगुरु बाबा रामदेव का शिष्य भी बताता था, साथ ही वह बौलीवुड की मशहूर अदाकारा शिल्पा शेट्टी के साथसाथ कई और विख्यात हीरोइनों से अपने खास ताल्लुकात बताया करता था.

उस के कई नाम थे और उस का सब से बड़ा हथियार था धर्म. यही वजह थी कि तमाम लोग उस के मुरीद थे, लेकिन जब उस की करतूतों का खुलासा हुआ तो उस की हकीकत जान कर हर कोई दंग रह गया. वास्तव में वह महाठग था. उस ने न सिर्फ शिल्पा शेट्टी के परिवार से एक करोड़ रुपए से ज्यादा ठग लिए थे, बल्कि अन्य कई लोगों को भी चूना लगाया था. इस शख्स का नाम था देवेंद्र कुमार योगी उर्फ देवेंद्र कुमार आचार्य उर्फ योगी महाराज उर्फ स्वामी कृष्णदेव योगी. इस तथाकथित योगी का उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद स्थित हस्तिनापुर इलाके में आश्रम था. गेरुआ व सफेद वस्त्र धारण करने वाला यह बाबा धर्म के नाम पर लोगों को अपना मुरीद बनाता था.

लोगों को धर्म के नाम पर किस तरह बहलाफुसला कर काबू में लाया जाता है, यह हुनर वह बखूबी जानता था. इस के लिए वह सोशल नेटवर्किंग साइट का भी सहारा लेता था. वैसे भी समाज में ऐसे अंधविश्वासियों की कोई कमी नहीं है, जो अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं. देवेंद्र के कई चेलेचपाटे गांवगांव जा कर उस का प्रचार किया करते थे. वह लोगों को योग सिखाने के साथसाथ खुद को कैंसर स्पैशलिस्ट भी बताता था. वैसे तो उस के पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन वह दावा करता था कि जिस मर्ज का इलाज डाक्टर नहीं कर सकते, उस का इलाज वह कर देगा.

वह जिन मर्जों को दूर करने की बात करता था, उन में गुप्तरोग, दमा, अस्थमा, हृदय रोग, थायराइड, एनीमिया, साइनस, किडनी स्टोन, शुगर, प्रोस्टेट, पाइल्स, कोरोनरी आर्टरीज, मोटापा, कब्ज, आर्थराइटिस, ब्लड प्रेशर व जोड़ों का दर्द आदि रोग शामिल थे.

धनी भक्तों के घर जा कर वह योगा क्लास चलाता था. वह अपनी फीस भक्तों की हैसियत के हिसाब से निर्धारित करता था. आश्रम में आने वाले भक्तों को वह अपनी कामयाबियों के मनगढ़ंत किस्से सुना कर प्रभावित करता था. उस ने खुद को कारोबारी बाबा के रूप में पहचान बना चुके बाबा रामदेव का खास शिष्य घोषित किया हुआ था. उस के अनुसार, वह पिछले 10 सालों से बाबा से जुड़ा हुआ था. अपने इस दावे को सच साबित करने के लिए उस ने बाबा रामदेव के साथ वाली अपनी कई तसवीरें आश्रम की दीवारों पर टांग रखी थीं.

रौबरुतबे के लिए इतना ही काफी नहीं था. वह फिल्म हीरोइन शिल्पा शेट्टी समेत उन के पूरे परिवार को अपना भक्त बताता था. शिल्पा शेट्टी और उन के परिवार के साथ भी उस ने कई तसवीरों को दीवार पर सजा रखा था. वह अपने भक्तों को बताता था कि जब वह मुंबई जाता है तो प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, करिश्मा कपूर, बिपाशा बसु, सोनाक्षी सिन्हा, अनिल कपूर, रितिक रोशन जैसे कई हीरोहीरोइन उस से मिलने आते हैं. वे लोग अपने कई काम उस के कहे अनुसार करते हैं और टेलीफोन पर बराबर संपर्क में रहते हैं.

साधारण लोग सोचते थे कि जब इतने बड़ेबड़े स्टार बाबा के भक्त हैं तो फिर वे क्यों पीछे रहें. भक्तों की बढ़ती कतार के साथ उस के चेहरे की रौनक बढ़ जाती थी. उस के भक्त बाबा को खुशीखुशी रुपयापैसा भी देते थे. देवेंद्र की दुकान ठीक जमी हुई थी कि 20 नवंबर, 2015 को मुंबई के वरसोवा थाने के सबइंसपेक्टर भारत शिवाजी के नेतृत्व में पुलिस टीम की छापेमारी से खलबली मच गई. दरअसल मुंबई में बाबा के खिलाफ धोखाधड़ी व गबन का मामला दर्ज था. पुलिस ने बाबा देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया.

इस के साथ ही उस की कलई खुली तो उस के भक्त भी सिर थाम कर बैठ गए, क्योंकि हकीकत हैरान करने वाली थी. बाबा कोई छुटभैया नहीं, बल्कि महाठग निकला. उस ने हीरोइन शिल्पा शेट्टी के मातापिता से 1 करोड़ 20 लाख रुपए की रकम ठगी थी. कानून का फंदा कसते ही देवेंद्र हक्काबक्का रह गया. वजह यह कि शायद उसे इस की कतई उम्मीद नहीं थी.

दरअसल, देवेंद्र ने जनवरी, 2014 में एक कारोबारी के माध्यम से शिल्पा के पिता सुरेंद्र शेट्टी व मां सुनंदा शेट्टी से जानपहचान बढ़ाई. बाबा के लिबास और धर्म की बड़ीबड़ी बातों से वह उस के झांसे में आ गए. इस के बाद वह अकसर उन के घर आनेजाने लगा. उस ने उन से खुद को रामदेव का खास शिष्य व आयुर्वेदिक औषधियों का बड़ा जानकार बताया था. उस ने उन्हें सपना दिखाया कि औषधियों का बड़ा कारोबार किया जा सकता है. उस के झांसे में आए सुरेंद्र शेट्टी ने उसे मोटी रकम दे दी. दिखावे के लिए देवेंद्र ने मुंबई में औफिस भी खोल लिया था.

देवेंद्र जब शिल्पा के घर जाता था तो प्रभाव जमाने के लिए श्वेत वस्त्रों के साथ ही लकड़ी की खड़ाऊ पहन कर जाता था. जबकि हकीकत में वह फैशनपरस्त था. वह जींस टीशर्ट पहन कर डांस बारों से ले कर सिनेमाघरों तक में मौजमस्ती करता था. शिल्पा का परिवार उस की इस हकीकत से अनजान था. दवा सप्लाई के नाम पर जब उस ने धीरेधीरे एक करोड़ से ज्यादा की रकम झटक ली तो एक दिन वह चुपके से बोरियाबिस्तर समेट कर अपने मूल ठिकाने पर आ गया. शिल्पा शेट्टी के परिवार की एक लग्जरी कार भी वह अपने साथ ले आया था. ठगी का अहसास होने पर शिल्पा के पिता ने वरसोवा थाने में बाबा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था.

आश्रम आ कर देवेंद्र ने अपना काम ठीक से जमा लिया था. उस ने योग के नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया, जिस पर विदेशी मौडल्स की कई उत्तेजक तसवीरें लगाईं. फेसबुक पेज पर उस ने खुद को योग अध्यापक घोषित कर रखा था. देवेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही उस की ठगी के कारनामे खुलने लगे. उस ने कई लोगों को चूना लगाया था. अजय ठाकुर नामक एक युवक से उस ने पीसीएस परीक्षा में चयन करवाने के नाम पर 10 लाख रुपए मांगे थे. उन्होंने उसे पेशगी के तौर पर 4 लाख रुपए दे भी दिए थे. लेकिन चयन के नाम पर बाबा टरकाने का काम करता रहा. इस के अलावा कई बड़े व्यापारियों को भी उस ने यह कह कर चूना लगाया था कि वह उन के किसी प्रोग्राम में शिल्पा शेट्टी को बुलवा देगा.

चूंकि शिल्पा और उन के परिवार के साथ उस के फोटोग्राफ थे, इसलिए लोग भरोसा कर लेते थे. पुलिस का कहना है कि देवेंद्र ने कई और लोगों को ठगने की प्लानिंग कर रखी थी. पुलिस इस बाबा को जेल भेज चुकी है. पुलिस कस्टडी में उस ने दावा किया कि वह रामदेव के ट्रस्ट पतंजलि से जुड़ा है. देवेंद्र कोई अकेला ठग नहीं है. समाज में ऐसे लोगों की भरमार है, जो धर्म के नाम पर लोगों को बहका कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. जरूरत है ऐसे ठगों को पहचान कर उन से सावधान रहने की. Crime Story Hindi

 

Hindi Crime Story: जिद्दी बीवी – पत्नी का कातिल पति

चेतन घोरपड़े और अर्चना घोरपड़े कोई नवदंपति नहीं थे. कई साल हो गए थे दोनों की शादी को. पतिपत्नी पिछले 3 सलों से कोल्हापुर जिले के तालुका शिरोल बाईपास स्थित जयसिंह सोसायटी में रह रहे थे. दोनों ही एमआईडीसी परिसर की एक गारमेंट कंपनी में काम करते थे.

कंपनी 2 शिफ्टों में चलती थी इसलिए उन दोनों का काम अलगअलग शिफ्टों में था. अर्चना सुबह 8 बजे काम पर जाती और शाम 5 बजे तक घर आ जाती थी. लेकिन चेतन का काम ऐसा नहीं था. उस को कभीकभी दोनों शिफ्टों में काम करना पड़ता था. दोनों खुश थे. उन की लवमैरिज की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. मगर इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था. दरअसल, 20 फरवरी, 2021 को अचानक 2 बजे के करीब एक ऐसी लोमहर्षक घटना घटी कि जिस ने भी देखा, उस का कलेजा मुंह को आ गया. कामकाज का दिन होने की वजह से सोसायटी के सभी पुरुष और महिलाएं अपनेअपने कामों के कारण घरों से बाहर थे.

सोसायटी में सिर्फ बच्चे, कुछ बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष ही थे. दोपहर का खाना खा कर सभी अपनेअपने घरों में आराम कर रहे थे कि तभी चीखनेचिल्लाने और बचाओ… बचाओ की आवाजें आने लगीं. आवाजें पड़ोस के रहने वाले चेतन घोरपड़े के घर से आ रही थीं. लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि पतिपत्नी दोनों अकसर अपने काम पर रहते थे. अर्चना घोरपड़े के चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर लोग अपनेअपने घरों से बाहर आए तो उन्होंने देखा कि दरवाजा अंदर से बंद था. लोगों ने दरवाजा थपथपाया, आवाजें दीं. लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

इस से लोगों ने समझा कि हो सकता है पतिपत्नी का कोई मामला हो, जिसे ले कर दोनों के बीच झगड़ा हो गया हो. वैसे भी पतिपत्नी के झगड़े आम बात होते हैं. बहरहाल, उन्होंने पतिपत्नी का आपसी मामला समझ कर खामोश ही रहना उचित समझा. तभी बाहर शांति देख कर चेतन घोरपड़े ने धीरे से दरवाजा खोला. उस के कपड़ों पर खून लगा था. इस के पहले कि पड़ोसी कुछ समझ पाते, चेतन दरवाजे की कुंडी लगा कर तेजी से सोसायटी के बाहर निकल  गया और वहां से सीधे शिरोल पुलिस थाने पहुंचा.

थाने की ड्यूटी पर तैनात एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने थाने में चेतन घोरपड़े को देखा तो वह स्तब्ध रह गए. उस का हुलिया और उस के कपड़ों पर पड़े खून के छींटे किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे. एपीआई शिवानंद कुमार उस से कुछ पूछते, उस के पहले ही उस ने उन्हें जो कुछ बताया, उसे सुन कर उन के होश उड़ गए.

मामला काफी गंभीर था. एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. साथ ही साथ उन्होंने इस की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों के साथ पुलिस कंट्रोल रूम जयसिंहपुर को भी दे दिया.

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शिवानंद पुलिस टीम ले कर घटनास्थल की ओर निकल ही रहे थे कि अचानक चेतन घोरपड़े की तबीयत बिगड़ने लगी. उस की बिगड़ती तबीयत को देख कर एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ उसे तुरंत स्थानीय अस्पताल भेज दिया और खुद हैडकांस्टेबल डी.डी. पाटिल और सागर पाटिल को ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

जिस घर में घटना घटी थी, वहां पर काफी भीड़ एकत्र थी, जिसे हटाने में पुलिस टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी. भीड़ को हटा कर इंसपेक्टर शिवानंद कुमार जब घर के अंदर गए तो वहां का दृश्य काफी मार्मिक और डरावना था. फर्श पर एक लहूलुहान युवती का शव पड़ा था. उस के पास ही 2 महिलाएं बैठी छाती पीटपीट कर रो रही थीं. पूछताछ में मालूम हुआ कि वे दोनों महिलाएं मृतका की मां और सास थीं, जिन का नाम वसंती पुजारी और आशा घोरपड़े था. पुलिस टीम ने दोनों महिलाओं को सांत्वना दे कर घर से बाहर निकला और अपनी काररवाई शुरू कर दी.

अभी पुलिस घटना के विषय में पूछताछ कर ही रही थी कि वारदात की जानकारी पा कर कोल्हापुर के एसपी शैलेश वलकवड़े मौकाएवारदात पर आ गए. उन के साथ 2 फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के लोग भी थे. घर के अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था. पूरे फर्श पर खून ही खून फैला हुआ था. बैडरूम में युवती का शव पड़ा था, जिस की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस की कलाई और गालों पर किसी तेज धारदार वाले हथियार से वार किए गए थे.

गले में मोबाइल चार्जर का वायर लिपटा था, जिसे देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस का गला घोंटने में इसी वायर का इस्तेमाल किया गया था. फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो का काम खत्म होने के बाद एसपी शैलेश वलकवड़े ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल की बारीकी से जांच की. इस के बाद उन्होंने जांचपड़ताल की सारी जिम्मेदारी एपीआई शिवानंद कुमार को सौंपते हुए उन्हें जरूरी निर्देश दिए.

एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल पर पड़े ब्लेड और मोबाइल चार्जर के वायर को अपने कब्जे में ले लिया और मृतका अर्चना घोरपड़े के शव को पोस्टमार्टम के लिए जयसिंहपुर के जिला अस्पताल भेज दिया. वहां की सारी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के शिवानंद पुलिस थाने आ गए. साथ ही घटनास्थल पर आई मृतका की मां बसंती पुजारी को भी पुलिस थाने ले आए और उन की शिकायत पर अर्चना घोरपड़े के पति चेतन घोरपड़े के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया.

आगे की जांच के लिए उन्हें चेतन घोरपड़े के बयान का इंतजार था जो अभी अस्पताल में डाक्टरों की निगरानी में था. पत्नी की हत्या के बाद अपराधबोध के कारण उस ने आत्महत्या के लिए घर में रखा कीटनाशक फिनायल पी लिया था और फिर पुलिस थाने आ गया था. डाक्टरों के अथक प्रयासों के बाद चेतन घोरपड़े को जब होश आया तो उस से पूछताछ की गई. उस ने जो कुछ बताया, उस से घटना का विवरण सामने आया.

25 वर्षीय अर्चना पुजारी जितनी सुंदर और स्वस्थ थी, उतनी ही खुले मन और आधुनिक विचारों वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें करती और उस के साथ घुलमिल जाती थी, लेकिन अपनी हद में रह कर. उस की मीठी और सीधीसरल बातें हर किसी के मन को मोह लेती थीं. यही वजह थी जो उस की मौत का कारण बनी. उस के पिता रामा पुजारी की मृत्यु हो गई थी. घर की सारी जिम्मेदारी मां बसंती पुजारी के कंधों पर थी. घर की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी, इसलिए उस की शिक्षादीक्षा ठीक से नहीं हो पाई थी.

30 वर्षीय चेतन मनोहर घोरपड़े ने सजीसंवरी अर्चना पुजारी को अपने एक दोस्त की पार्टी में देखा था और उस का दीवाना हो गया था. जब तक वह उस पार्टी में रही, तब तक चेतन की आंखें उसी पर टिकी रहीं.

देर रात पार्टी खत्म होने के बाद चेतन घोरपड़े ने जब घर के लिए आटो लिया तब अपने दोस्त के कहने पर अर्चना पुजारी को उस के घर तक छोड़ते हुए गया. उस रात आटो के सफर में दोनों ने एकदूसरे को जानासमझा. दोनों ने बेझिझक एकदूसरे से बातें कीं. घर पहुंचने के बाद अर्चना पुजारी ने चेतन का शुक्रिया अदा किया और अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया और उस का भी ले लिया.

घर पहुंचने के बाद दोनों की एक जैसी ही स्थिति थी. रात भर दोनों सोच के दायरे में एकदूसरे के व्यक्तित्व को अपनेअपने हिसाब से टटोलते, तौलते रहे. दोनों की ही आंखों से नींद कोसों दूर थी. सारी रात उन की आंखों के सामने एकदूसरे का चेहरा नाचता रहा, जिस का नतीजा यह हुआ कि वे दोनों जल्दी ही एकदूसरे के करीब आ गए. फोन पर लंबीलंबी बातों के बाद मुलाकातों से शुरू हुई दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई और कुछ महीनों बाद दोनों ने शादी का निर्णय ले लिया.

उन के इस निर्णय से अर्चना पुजारी की मां को तो कोई ऐतराज नहीं था लेकिन चेतन की मां को इस शादी से आपत्ति थी. वह गैरजाति की लड़की को अपनी बहू बनाने के पक्ष में नहीं थी, लेकिन चेतन घोरपड़े की पसंद के कारण मां की एक नहीं चली. 2013 के शुरुआती महीने में अर्चना बहू बन कर चेतन के घर आ गई. चेतन ने अपने कुछ रिश्तेदारों की उपस्थिति में अर्चना से लवमैरिज कर ली.

लवमैरिज के बाद दोनों का सांसारिक जीवन हंसीखुशी से शुरू तो जरूर हुआ लेकिन कुछ ही दिनों के लिए. शादी के बाद से ही अर्चना और चेतन की मां की किचकिच शुरू हो गई थी. चेतन अकसर दोनों को समझाबुझा कर शांत कर देता था. लेकिन कब तक, आखिरकार उन के झगड़ों से परेशान हो कर चेतन घोरपड़े अपनी मां का घर छोड़ कर अर्चना के साथ जयसिंहपुर में किराए के घर में आ कर रहने लगा.

किराए के घर में आने के बाद अर्चना भी उसी कंपनी में सर्विस करने लगी, जिस में चेतन काम करता था. इस घर में आने के कुछ दिन बाद ही अर्चना का रहनसहन बदल गया था. हाथों में महंगा मोबाइल फोन, महंगे कपड़े उस के शौक बन गए. घूमनाफिरना, शौपिंग करना, ज्यादा समय फोन पर बातें करना उस की हौबी बन गई थी. चेतन जब भी उसे समझाने की कोशिश करता तो वह उस से उलझ जाती और उस की बातों पर ध्यान नहीं देती थी.

अर्चना की आए दिन की इन हरकतों से परेशान हो कर चेतन को लगने लगा था जैसे वह अर्चना से शादी कर के फंस गया है. अर्चना जैसी दिखती थी, वैसी थी नहीं. यह सोचसोच कर उस का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा था, जिसे शांत करने के लिए वह दोस्तों के साथ शराब पीने लगा था. इस से उस के घर का माहौल और खराब होने लगा था. अर्चना का खुले विचारों का होना और कंपनी के लोगों से हिलमिल जाना आग में घी का काम कर रहा था, जो अर्चना के चरित्र को कठघरे में खड़ा करता था.

इसी सब को ले कर चेतन घोरपड़े शराब के नशे में अर्चना के साथ अकसर झगड़ा और मारपीट करने लगा था. इस से परेशान हो कर अर्चना अपने मायके शिरोल चली जाती थी और वहीं से काम पर कंपनी आती थी. यह दूरियां तब और बढ़ गईं जब अर्चना अपनी शादी की सालगिरह के एक हफ्ते पहले चेतन से लड़ कर अपनी मां के पास चली गई और फिर वापस नहीं आई. इस बार चेतन घोरपड़े ने अर्चना से माफी मांग कर उसे घर लौट आने के लिए कहा लेकिन अर्चना ने उसे इग्नोर कर दिया.

वह अपने मायके शिरोल से लंबी दूरी तय कर के कंपनी आती थी लेकिन चेतन घोरपड़े की लाख मिन्नतों के बाद भी उस के पास नहीं आई और न ही शादी की सालगिरह की बधाई का फोन ही उठाया. लाचार हो कर चेतन घोरपड़े ने अर्चना को शादी की सालगिरह का मैसेज भेज कर शुभकामनाएं दीं. लेकिन उस का भी कोई जवाब नहीं आया तो मजबूरन शादी की सालगिरह के 2 दिन बाद वह अर्चना के मायके गया. जहां उस का स्वागत अर्चना की मां बसंती पुजारी ने किया और चेतन को काफी खरीखोटी सुनाई. साथ ही उसे पुलिस थाने तक ले जाने की धमकी भी दी.

फिर भी चेतन घोरपड़े ने अर्चना से अपनी गलतियों की माफी मांगते हुए उसे अपने घर चलने के लिए कहा. मगर अर्चना पर उस की माफी का कोई असर नहीं पड़ा. नाराज हो कर चेतन अपने घर लौट आया. जब इस बात की जानकारी उस के दोस्तों को हुई तो उन्होंने उस के जले पर नमक छिड़क दिया, जिस ने आग में घी का काम किया था. उन्होंने बताया कि अर्चना का किसी कार वाले से अफेयर चल रहा है जो उसे अपनी कार से कंपनी लाता और ले कर जाता है. इस से चेतन के मन में अर्चना के प्रति उपजे संदेह को और हवा मिल गई.

वह जितना अर्चना के बारे में गहराई से सोचता, उतना ही परेशान हो जाता. इस का नतीजा यह हुआ कि उस के मन में अर्चना के प्रति घोर नफरत भर गई. उसके प्यार का दर्द छलक गया और उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया. अपने निर्णय के अनुसार, घटना वाले दिन चेतन कंपनी में गया और अर्चना को कंपनी के बाहर बुला कर कुछ जरूरी काम के लिए घर चलने के लिए कहा. कंपनी में तमाशा न बने, इसलिए अर्चना बिना कुछ बोले उस के साथ घर आ गई.

घर आने के बाद दोनों के बीच जोरदार झगड़ा हुआ तो पहले से ही तैयार चेतन ने अपनी जेब से ब्लेड निकाल कर अर्चना के हाथों की कलाई काट दी. जब अर्चना चिल्लाई तो उस के गालों पर भी ब्लेड मार कर पास पड़े मोबाइल चार्जर से उस का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. अर्चना घोरपड़े की जीवनलीला खत्म करने के बाद अब उस के जीने का कोई मकसद नहीं बचा था. उस ने अपने जीवन को भी खत्म करने का फैसला कर अपनी चाची को फोन कर सारी कहानी बताई. फिर साफसफाई के लिए घर में रखी फिनायल पी कर पुलिस थाने पहुंच गया.

जांच अधिकारी एपीआई शिवानंद कुमार और उन की टीम ने चेतन मनोहर घोरपड़े से विस्तृत पूछताछ करने के बाद मामले को भादंवि की धारा 302, 34 के तहत दर्ज कर के चेतन को न्यायिक हिरासत में जयसिंहपुर जेल भेज दिया. Hindi Crime Story

Crime News: अपहरण के चक्कर में फंस गया मुंबई का किंग

Crime News:15 मई, 2017 की सुबह की बात है. समय 11-साढ़े 11 बजे सीकर जिले के शहर फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार अपनी ज्वैलरी की दुकान पर थे. उन की पत्नी पार्वती और बेटा ध्रुव ही घर पर थे. बेटी वर्षा किसी काम से बाजार गई थी. उसी समय अच्छी कदकाठी का एक सुदर्शन युवक उन के घर पहुंचा. उस के हाथ में शादी के कुछ कार्ड थे. युवक ने ललित के घर के बाहर लगी डोरबेल बजाई तो पार्वती ने बाहर आ कर दरवाजा खोला. युवक ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘नमस्ते आंटीजी, पोद्दार अंकल घर पर हैं?’’

पार्वती ने शालीनता से जवाब देते हुए कहा, ‘‘नमस्ते भैया, पोद्दारजी तो इस समय दुकान पर हैं. बताइए क्या काम है?’’

‘‘आंटीजी, हमारे घर में शादी है. मैं कार्ड देने आया था.’’ युवक ने उसी शालीनता से कहा.

युवक के हाथ में शादी के कार्ड देख कर पार्वती ने उसे अंदर बुला लिया. युवक ने सोफे पर बैठ कर एक कार्ड पार्वती की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आंटीजी, यह कार्ड पोद्दार अंकल को दे दीजिएगा. आप लोगों को शादी में जरूर आना है. बच्चों को भी साथ लाइएगा.’’

पार्वती ने शादी का कार्ड देख कर कहा, ‘‘भैया आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आंटीजी, आप नहीं पहचानतीं, लेकिन पोद्दार अंकल मुझे अच्छी तरह से पहचानते हैं.’’ युवक ने कहा.

पार्वती ने घर आए, उस मेहमान से चायपानी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘चायपानी के तकल्लुफ की कोई जरूरत नहीं है, आंटीजी. अभी एक कार्ड आप के भांजे अश्विनी को भी देना है. मैं उन का घर नहीं जानता. आप अपने बेटे को मेरे साथ भेज देतीं तो वह उन का घर बता देता. कार्ड दे कर मैं आप के बेटे को छोड़ जाऊंगा.’’

बाहर तेज धूप थी. इसलिए पार्वती बेटे को बाहर नहीं भेजना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आप कार्ड हमें दे दीजिए. शाम को अश्विनी हमारे घर आएगा तो हम कार्ड दे देंगे.’’

पार्वती की बात सुन कर युवक ने मायूस होते हुए कहा, ‘‘कार्ड तो मैं आप को दे दूं, लेकिन पापा मुझे डांटेंगे. उन्होंने कहा है कि खुद ही जा कर अश्विनी को कार्ड देना.’’

युवक की बातें सुन कर पार्वती ने ड्राइंगरूम में ही वीडियो गेम खेल रहे अपने 13 साल के बेटे ध्रुव से कहा, ‘‘बेटा, अंकल के साथ जा कर इन्हें अश्विनी का घर बता दे.’’

ध्रुव मां का कहना टालना नहीं चाहता था, इसलिए वह अनमने मन से जाने को तैयार हो गया. वह युवक ध्रुव के साथ घर से निकलते हुए बोला, ‘‘थैंक्यू आंटीजी.’’

ध्रुव और उस युवक के जाने के बाद पार्वती घर के कामों में लग गईं. काम से जैसे ही फुरसत मिली उन्होंने घड़ी देखी. दोपहर के साढ़े 12 बज रहे थे. ध्रुव को कब का घर आ जाना चाहिए था. लेकिन वह अभी तक नहीं आया था. पार्वती ने सोचा कि ध्रुव वहां जा कर खेलने या चायपानी पीने में लग गया होगा. हो सकता है, अश्विनी ने उसे किसी काम से भेज दिया हो. यह सोच कर वह फिर काम में लग गईं.

थोड़ी देर बाद उन्हें जब फिर ध्रुव का ध्यान आया, तब दोपहर का सवा बज रहा था. ध्रुव को घर से गए हुए डेढ़ घंटे से ज्यादा हो गया था. पार्वती को चिंता होने लगी. 10-5 मिनट वह सेचती रहीं कि क्या करें. कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने पति ललित पोद्दार को फोन कर के सारी बात बता दी. पत्नी की बात सुन कर ललित को भी चिंता हुई. उन्होंने पत्नी को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘ध्रुव कोई छोटा बच्चा नहीं है कि कहीं खो जाए या इधरउधर भटक जाए. फिर भी मैं अश्विनी को फोन कर के पता करता हूं.’’

ललित ने अश्विनी को फोन कर के ध्रुव के बारे में पूछा तो अश्विनी ने जवाब दिया, ‘‘मामाजी, मेरे यहां न तो ध्रुव आया था और ना ही कोई आदमी शादी का कार्ड देने आया था.’’

अश्विनी का जवाब सुन कर ललित भी चिंता में पड़ गए. वह तुरंत घर पहुंचे और पार्वती से सारी बातें पूछीं. उन्होंने वह शादी का कार्ड भी देखा, जो वह युवक दे गया था. कार्ड पर लियाकत सिवासर का नाम लिखा था. ललित को वह शादी का कार्ड अपने किसी परिचित का नहीं लगा. उन्होंने कार्ड पर लिखे मोबाइल नंबरों पर फोन किया तो वे नंबर फरजी निकले.

ललित को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. उन के मन में बुरे ख्याल आने लगे. उन्हें आशंका इस बात की थी कि कहीं किसी ने पैसों के लालच में ध्रुव का अपहरण न कर लिया हो. इस की वजह यह थी कि वह फतेहपुर के नामीगिरामी ज्वैलर थे. राजस्थान के शेखावटी इलाके में उन का अच्छाखासा रसूख था. बेटे के घर न आने से पार्वती का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था.

ललित ने अपने कुछ परिचितों से बात की तो सभी ने यही सलाह दी कि इस मामले की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए. इस के बाद दोपहर करीब ढाई बजे ललित ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. पार्वती से पूछताछ की गई. शुरुआती जांच से यही नतीजा निकला कि ध्रुव का अपहरण किया गया है.

अपहर्त्ता प्रोफेशनल अपराधी हो सकते थे. क्योंकि रात तक फिरौती के लिए किसी अपहर्त्ता का फोन नहीं आया था. पुलिस को अनुमान हो गया था कि अपहर्त्ता ने ध्रुव के अपहरण का जो तरीका अपनाया था, उस से साफ लगता था कि उन्होंने रेकी कर के ललित पोद्दार के बारे में जानकारियां जुटाई थीं.

पुलिस ने फिरौती मांगे जाने की आशंका के मद्देनजर पोद्दार परिवार के सारे मोबाइल सर्विलांस पर लगवा दिए. लेकिन उस दिन रात तक ना तो किसी अपहर्त्ता का फोन आया और ना ही ध्रुव को साथ ले जाने वाले उस युवक के बारे में कोई जानकारी मिली. पुलिस ने ललित के घर के आसपास और लक्ष्मीनारायण मंदिर के करीब स्थित उस की दुकान के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, लेकिन उन से पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ.

पुलिस को अब तक केवल यही पता चला था कि ललित पोद्दार के घर जो युवक शादी का कार्ड देने आया था, उस की उम्र करीब 30 साल के आसपास थी. वह सफेद शर्ट पहने हुए था. अगले दिन सीकर के एसपी राठौड़ विनीत कुमार त्रिकमलाल ने ध्रुव का पता लगाने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों को दिशानिर्देश दिए. इस के बाद पुलिस ने उस शादी के कार्ड को आधार बना कर जांच आगे बढ़ाई.

परेशानी यह थी कि शादी के कार्ड पर किसी प्रिंटिंग प्रैस का नाम नहीं लिखा था, जबकि हर शादी के कार्ड पर प्रिंटिंग प्रैस का नाम जरूरी होता है. इस की वजह यह है कि राजस्थान सरकार ने बालविवाह की रोकथाम के लिए यह कानूनी रूप से जरूरी कर दिया है. पुलिस ने शादी के कार्ड छापने वाले प्रिंटिंग प्रैस मालिकों से बात की तो पता चला कि उस कार्ड में औफसेट पेंट का इस्तेमाल किया गया था.

उस पेंट का उपयोग फतेहपुर में नहीं होता था. सीकर में प्रिंटिंग प्रैस वाले उस का उपयोग करते थे. इस के बाद पुलिस ने सीकर, चुरू और झुंझुनूं के करीब डेढ़ सौ प्रैस वालों से पूछताछ की. इस जांच के दौरान एक नया तथ्य यह सामने आया कि ध्रुव के अपहरण से 4 दिन पहले से उसी के स्कूल में पढ़ने वाला छात्र अंकित भी लापता था. अंकित चुरू जिले के रतनगढ़ शहर का रहने वाला था. वह फतेहपुर के विवेकानंद पब्लिक स्कूल में पढ़ता था और हौस्टल में रहता था. गर्मी की छुट्टी में वह रतनगढ़ अपने घर गया था. वह 12 मई को दोपहर करीब सवा बारह बजे बाल कटवाने के लिए घर से निकला था, तब से लौट कर घर नहीं आया था.

तीसरे दिन आईजी हेमंत प्रियदर्शी एवं एसपी राठौड़ विनीत कुमार ने ध्रुव के घर वालों से मुलाकात की और उन्हें आश्वासन दिया कि ध्रुव का जल्द से जल्द पता लगा लिया जाएगा. उसी दिन यानी 17 मई को अपहर्त्ता ने ललित पोद्दार को फोन कर के बताया कि उन के बेटे ध्रुव का अपहरण कर लिया गया है. उन्होंने ध्रुव की उन से बात करा कर 70 लाख रुपए की फिरौती मांगी.

उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि अगर पुलिस को बताया तो बच्चे को मार दिया जाएगा. ललित ने समझदारी से बातें करते हुए अपहर्त्ता से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि नोटबंदी को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. भाइयों, परिवार वालों और रिश्तेदारों से पैसे जुटाने के लिए समय चाहिए. चाहे जितनी कोशिश कर लूं, 70 लाख रुपए इकट्ठे नहीं हो पाएंगे. बैंक से एक साथ ज्यादा पैसा निकाला तो पुलिस को शक हो जाएगा.

ललित ने अपहर्ता को अपनी मजबूरियां बता कर यह जता दिया कि वह 70 लाख रुपए नहीं दे सकते. बाद में अपहर्ता 45 लाख रुपए ले कर ध्रुव को सकुशल छोड़ने को राजी हो गए. अपहर्ताओं ने फिरौती की यह रकम कोलकाता में हावड़ा ब्रिज पर पहुंचाने को कहा. लेकिन बाद में वे फिरौती की रकम मुंबई में लेने को तैयार हो गए.

ललित का मोबाइल पहले से ही पुलिस सर्विलांस पर लगा रखा था. पुलिस को अपहर्ता और ललित के बीच हुई बातचीत का पता चल गया. इसी के साथ पुलिस को वह मोबाइल नंबर भी मिल गया, जिस से ललित को फोन किया गया था.

इसी बीच पुलिस ने शादी के उस कार्ड की जांच एक्सपर्ट से कराई तो पता चला कि वह एविडेक प्रिंटर से छपा था. शेखावटी के सीकर, चुरू व झुंझुनूं जिले में करीब 60 एविडेक प्रिंटर थे. इन प्रिंटर मालिकों से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह कार्ड नवलगढ़ के एक प्रिंटर से छपवाया गया था. उस प्रिंटर के मालिक से पूछताछ में पता चला कि वह कार्ड फतेहपुर के किसी आदमी ने उस के प्रिंटर पर छपवाया था. उस आदमी से पूछताछ में पुलिस को अपहर्त्ता युवक के बारे में कुछ सुराग मिले.

इस के अलावा पुलिस ने 15 मई को ललित पोद्दार के मकान के आसपास घटना के समय हुई सभी मोबाइल कौल को ट्रेस किया. इस में मुंबई का एक नंबर मिला. यह नंबर साजिद बेग का था. काल डिटेल्स के आधार पर यह भी पता चल गया कि साजिद के तार फतेहपुर के रहने वाले अयाज से जुड़े थे.

जांच में यह बात भी सामने आ गई कि अपहर्ता मुंबई से जुड़ा है. इस पर पुलिस ने फतेहपुर से ले कर विभिन्न राज्यों के टोल नाकों पर जांच की और उन नाकों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस में सब से पहले शोभासर के टोल पर सफेद रंग की एसेंट कार पर जयपुर का नंबर मिला. अगले टोल नाके मौलासर पर इसी कार पर महाराष्ट्र की नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. आगे के टोल नाकों पर उसी कार पर अलगअलग नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. जांच में ये सारे नंबर फरजी पाए गए.

सीकर के एसपी ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर से बात कर के ध्रुव के अपहरण की पूरी जानकारी दे कर अपराधियों को पकड़ने में सहायता करने का आग्रह किया. इसी के साथ एसपी के दिशानिर्देश पर एडिशनल एसपी तेजपाल सिंह ने 3 टीमें गठित कर के 3 राज्यों में भेजी. सब से पहले रामगढ़ शेखावाटी के थानाप्रभारी रमेशचंद्र को टीम के साथ मुंबई भेजा गया. यह टीम मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के साथ मिल कर आरोपियों की तलाश में जुट गई.

फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह ने लगातार जांच कर के ध्रुव के अपहरण में साजिद बेग और फतेहपुर के रहने वाले अयाज के साथ उस के संबंधों के बारे में पता लगाया.

एसपी ध्रुव के घर वालों को सांत्वना देने के साथ यह भी बताते रहे कि उन्हें अपहर्ता को किस तरह बातों में उलझा कर रखना है, ताकि पुलिस बच्चे तक पहुंच सके. पुलिस की एक टीम उत्तर प्रदेश और एक टीम पश्चिम बंगाल भी भेजी गई. पुलिस को संकेत मिले थे कि अपहर्ता धु्रुव को ले कर मुंबई, कोलकाता या कानपुर जा सकते हैं.

लगातार भागदौड़ के बाद सीकर पुलिस ने मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की मदद से 21 मई की आधी रात के बाद मुंबई के बांद्रा  इलाके से ध्रुव को सकुशल बरामद कर लिया. पुलिस ने उस के अपहरण के आरोप में साजिद बेग को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया था. इस के अलावा उस की 2 गर्लफ्रैंड्स को भी गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने वह एसेंट कार भी बरामद कर ली, जिस से ध्रुव का अपहरण किया गया था. सीकर पुलिस 22 मई की रात ध्रुव और आरोपियों को ले कर मुंबई से रवाना हुई और 23 मई को फतेहपुर आ गई.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में मुंबई से साजिद बेग और उस की गर्लफ्रैंड्स यास्मीन जान और हालिमा मंडल को गिरफ्तार किया था. पूछताछ के बाद फतेहपुर के रहने वाले अयाज उल हसन उर्फ हयाज को गिरफ्तार किया गया. इस के बाद सभी आरोपियों से की गई पूछताछ में ध्रुव के अपहरण की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

साजिद बेग पेशे से सिविल इंजीनियर था. वह बांद्रा, मुंबई में मछली बाजार में रहता था. उसे हिंदी, अंग्रेजी व मारवाड़ी का अच्छा ज्ञान था. वह मूलरूप से फतेहपुर का ही रहने वाला था. उस के दादा और घर के अन्य लोग मुंबई जा कर बस गए थे. फतेहपुर में साजिद का 2 मंजिला आलीशान मकान था. वह फतेहपुर आताजाता रहता था. उस की पत्नी भी पढ़ीलिखी है. उस का एक बच्चा भी है.

मुंबई स्थित उस के घर पर नौकरचाकर काम करते हैं. उस के पिता के भाई और अन्य रिश्तेदार भी मुंबई में ही रहते हैं. इन के लोखंडवाला, बोरीवली सहित कई पौश इलाकों में आलीशान बंगले हैं. वह मुंबई में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम करता था. मौजमस्ती के गलत शौक और व्यापार में घाटा होने की वजह से साजिद कई महीनों से आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उस पर करीब 30 लाख रुपए का कर्ज हो गया था. इसलिए वह जल्द से जल्द किसी भी तरीके से पैसे कमा कर अपना कर्ज उतारना चाहता था.

करीब 2 महीने पहले साजिद ने फतेहपुर के रहने वाले अपने बचपन के दोस्त अयाज उल हसन उर्फ हयाज को मुंबई बुलाया. वह 5 दिनों  तक मुंबई में रहा. इस बीच साजिद ने उस से पैसे कमाने के तौर तरीकों के बारे में बात की. इस पर अयाज ने कहा कि फतेहपुर में किसी का अपहरण कर के उस के बदले में अच्छीखासी फिरौती वसूली जा सकती है. हालांकि उस समय यह तय नहीं हुआ था कि अपहरण किस का किया जाएगा.

साजिद ने अयाज को यह कह कर फतेहपुर वापस भेज दिया कि वह किसी ऐसी पार्टी का चयन करे, जिस से मोटी रकम वसूली जा सके. अयाज फतेहपुर आ कर योजना बनाने लगा. अयाज ने पिछले साल फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार के मकान पर पेंट का काम किया था. इसलिए उसे ललित के घरपरिवार की सारी जानकारी थी. उस ने साजिद को ललित के बारे में बताया.

इस के बाद दोनों ने ललित के बेटे ध्रुव के अपहण की योजना बना ली. उसी योजना के तहत शादी का फरजी कार्ड नवलगढ़ से छपवाया गया. इस के बाद कार्ड से कैमिकल द्वारा प्रिंटिंग प्रैस का नाम हटा दिया गया. योजनानुसार साजिद 10 मई को मुंबई से कार ले कर फतेहपुर आ गया और दरगाह एरिया में रहने वाले अपने दोस्त अयाज से मिला. इस के बाद ध्रुव के अपहरण की योजना को अंतिम रूप दिया गया.

15 मई को शादी का कार्ड देने के बहाने साजिद ललित के घर से उस के बेटे धु्रव को अश्विनी के घर ले जाने की बात कह कर साथ ले गया और उसे घर के बाहर खड़ी एसेंट कार में बैठा लिया. उस ने धु्रव से कहा कि गाड़ी में पैट्रोल नहीं है, इसलिए पहले पैट्रोल भरवा लें, फिर अश्विनी के घर चलेंगे.

फतेहपुर में पैट्रोल पंप से पहले ही साजिद ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी तो ध्रुव को शक हुआ. वह शीशा खोल कर ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाने लगा. इस पर साजिद ने उसे कोई नशीली चीज सुंघा दी, जिस से वह बेहोश हो गया.

ध्रुव को बेहोशी की हालत में पीछे की सीट पर सुला कर साजिद अपनी कार से मुंबई ले गया. बीचबीच में टोलनाकों से पहले उस ने 5 बार कार की नंबर प्लेट बदलीं.

साजिद ने अपहृत ध्रुव को मुंबई में अपनी 2 गर्लफ्रैंड्स के पास रखा. इन में एक गर्लफ्रैंड यास्मीन जान मुंबई के चैंबूर में लोखंड मार्ग पर रहती थी. तलाकशुदा यास्मीन को साजिद ने बता रखा था कि वह कुंवारा है. उस ने उसे शादी करने का झांसा भी दे रखा था. साजिद ने यास्मीन को धु्रव के अपहरण के बारे में बता दिया था. यास्मीन फिरौती में मिलने वाली मोटी रकम से साजिद के साथ ऐशोआराम की जिंदगी गुजारने का सपना देख रही थी. इसलिए उस ने साजिद की मदद की और धु्रव को अपने पास रखा.

साजिद की दूसरी गर्लफ्रैंड हालिमा मंडल मूलरूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली थी. वह पिछले कई सालों से बांद्रा इलाके में बाजा रोड पर रहती थी. उस के 2 बच्चे हैं. साजिद मुंबई पहुंच कर ध्रुव को सीधे हलिमा के घर ले गया था. उस ने उसे ध्रुव के अपहरण के बारे में बता दिया था. हालिमा ने भी फिरौती में मोटी रकम मिलने के लालच में साजिद का साथ दिया और ध्रुव को अपने पास रखा. वह ध्रुव को नींद की गोलियां देती रही, ताकि वह शोर न मचा सके.

फेसबुक पर एक पोस्ट में खुद को मुंबई का किंग बताने वाला साजिद इतना शातिर था कि ललित पोद्दार से या अयाज से बात करने के बाद मोबाइल स्विच औफ कर लेता था, ताकि पुलिस उसे ट्रेस न कर सके. ध्रुव को जहां रखा गया था, वहां से वह करीब सौ किलोमीटर दूर जा कर नए सिम से फोन करता था, ताकि अगर किसी तरह पुलिस मोबाइल नंबर ट्रेस भी कर ले तो उसी लोकेशन पर बच्चे को खोजती रहे.

साजिद के बताए अनुसार, टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिकों को देख कर उस ने ध्रुव के अपहरण की साजिश रची थी. सीरियलों को देख कर ही उस ने हर कदम पर सावधानी बरती, लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई. जबकि उस ने पुलिस से बचने के तमाम उपाय किए थे.

23 मई को पुलिस ध्रुव को ले कर फतेहपुर पहुंची तो पूरा शहर खुशी से नाच उठा. पुष्पवर्षा और आतिशबाजी की गई. 9 दिनों बाद बेटे को सकुशल देख कर पार्वती की आंखों से आंसू बह निकले. पिता ललित पोद्दार ने बेटे को गले से लगा कर माथा चूम लिया. सालासर मंदिर में लोगों ने फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह का सम्मान किया.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में साजिद के अलावा यास्मीन जान, हालिमा मंडल और फतेहपुर निवासी अयाज को गिरफ्तार किया था. फतेहपुर के एक अन्य युवक की भी इस मामले में भूमिका संदिग्ध पाई गई. इस के अलावा उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर नसरत उर्फ नागा उर्फ चाचा का नाम भी ध्रुव के अपहरण में सहयोगी के रूप में सामने आया है.

नसरत उर्फ नागा उत्तर प्रदेश के सिमौनी का रहने वाला था. वह फिलहाल मुंबई के गौरी खानपुर में रहता है. साजिद काफी समय से उस के संपर्क में था. उस के साथ नागा भी आया था. उस ने नागा को सीकर में ही छोड़ दिया था.

ध्रुव के अपहरण के बाद नागा साजिद के साथ हो गया था. दोनों ध्रुव को ले कर मुंबई गए थे. नागा पर उत्तर प्रदेश और मुंबई में हत्या के 3 मामले और लूट, चाकूबाजी, हथियार तस्करी, गुंडा एक्ट आदि के दर्जनों मामले दर्ज हैं. वह हिस्ट्रीशीटर है. कथा लिखे जाने तक सीकर पुलिस इस मामले में नागा की तलाश कर रही थी. Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: मधुर व सईद जाफरी – सफल प्रेम असफल संबंध

Love Story: सईद जाफरी ने फिल्मों में भले ही कोई भी भूमिका निभाई हो, हकीकत में वह शाही मिजाज के अभिनेता थे. इतने शाही कि शराब पीने के लिए वह अपना चांदी का गिलास जेब में रखते थे. बड़ीबड़ी पार्टियों में वह उसी में शराब पीते थे. लेकिन यह सफल चरित्र अभिनेता अपने दांपत्य जीवन में असफल था.

सन 1985 में रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘सागर’. इस फिल्म को काफी पसंद किया गया था, खासकर इस के गानों को. इस की कई वजहें थीं. इन में पहली वजह तो थी फिल्म ‘बौबी’ के बाद डिंपल कपाडि़या की ऋषि कपूर के साथ वापसी. दूसरी वजह थी प्रेमत्रिकोण, जिस में नायक रवि (ऋषि कपूर) विदेश से लौट कर एक मछुआरन लड़की मोना को चाहने लगता है. दरअसल उसे पता नहीं होता कि राजा यानी कमल हासन मोना से बचपन से प्यार करता है. बाद में जब हकीकत पता चलती है तो दोस्ती की खातिर वह अपने प्यार को कुरबान कर देता है.

इस फिल्म के हिट होने से यह बात साफ हो गई थी कि किसी घिसेपिटे कथानक पर भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है. बशर्ते उस में अभिनय करने वाले कलाकार दमदार अभिनय करें. फिल्म में रवि की दादी कमलादेवी एक औद्योगिक घराने की मालकिन दिखाई गई थीं, जिन के चेहरे, वेशभूषा और हावभाव से संपन्नता साफ झलकती थी. यह बात उन की बरदाश्त के बाहर थी कि उन का एकलौता पोता एक गरीब मछुआरन से प्यार करे.

यही वजह थी कि रवि और मोना को अलग करने के लिए उन्होंने तरहतरह के हथकंडे अपनाए. यहां तक कि आखिर में उन के आदमी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, जिस में ऋषिकपूर को बचाने में कमल हासन की जान चली जाती है. लेकिन मरतेमरते वह डिंपल का हाथ ऋषिकपूर के हाथों में दे जाते हैं.

फिल्म में कमला देवी यानी दादी का यह किरदार मधुर जाफरी ने निभाया था, जिन्हें दर्शक नाम से भले नहीं जानते थे, लेकिन उन के अभिनय से काफी प्रभावित हुए थे. मधुर जाफरी हिंदी फिल्मों का कोई खास जानापहचाना चेहरा नहीं था, लेकिन इस फिल्म में सशक्त अभिनय के चलते वह दर्शकों के दिल में बस गई थीं. आमतौर पर इस तरह के किरदार ललिता पवार या सुषमा सेठ जैसी अभिनेत्रियां निभाती आई थीं, ऐसी स्थिति में दर्शक खुद से यह सवाल पूछने से रोक नहीं पाए कि आखिर ऋषि कपूर की दादी का किरदार निभाने वाली यह ऐक्ट्रेस कौन है?

इस फिल्म में मधुर जाफरी ऐंग्लो इंडियन सी लगीं, जिन्हें अपनी दौलत पर काफी गुरूर और गुमान था. इसी के चलते वह गरीबों और गरीबी से नफरत करती थीं. यह मधुर जाफरी कोई और नहीं, हाल ही में दिवंगत हुए मशहूर अभिनेता सईद जाफरी की पहली पत्नी थीं, जिन्होंने एक संपन्न एवं क्रूर दादी की भूमिका इसलिए सहजता से निभाई, क्योंकि वह इस किरदार के लिए एकदम फिट थीं. सन 1933 में दिल्ली के एक संपन्न कायस्थ परिवार में पैदा हुईं मधुर परंपराओं और आधुनिकता का अद्भुत मेल थीं. उन के दादा को अंगरेजों से राय बहादुर का खिताब मिला था. वह शाही परिवार से भले नहीं थीं, लेकिन उन का रहनसहन और ठाठबाट किसी शाही परिवार से कम नहीं था.

यह वह दौर था, जब अंगरेज शासकों से नजदीकियां रखने वाले परिवारों की समाज में एक अलग पहचान हुआ करती थी. वे बड़ेबड़े बंगलों में शानोशौकत से रहते थे, बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमते थे. इस तरह के लोग आमतौर पर कला या साहित्य प्रेमी होते थे. उन की लड़कियां बौबकट बाल रख सकती थीं और स्कर्ट पहन कर सड़कों पर घूम सकती थीं, विदेशी कुत्तों को सड़कों पर घुमाया करती थीं. वे फर्राटे से अंगरेजी बोलती थीं. उन के लिए स्कूल और कालेज की शिक्षा इसलिए जरूरी होती थी, क्योंकि समाज में उन्हें अपनी अलग पहचान कायम करनी होती थी. इस तरह के परिवार मध्यमवर्गीय परिवारों के आदर्श हुआ करते थे. रिश्तेदारों और समाज में चर्चा का विषय होते थे.

मधुर इस का अपवाद इसलिए नहीं रह पाईं, क्योंकि बंदिशें न होते हुए भी उन्होंने कायस्थ परिवारों के संस्कार यथासंभव ढोए. वह बेइंतहा खूबसूरत और प्रतिभावान थीं. अभिनय और नाटकों के प्रति उन का लगाव बचपन से ही था, लेकिन बाद में वह एक इंटरनेशनल शैफ के रूप में जानी गईं. पहले कानपुर और फिर दिल्ली में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मधुर स्थाई रूप से दिल्ली में बस गईं. देश आजाद हो चुका था, लेकिन सामाजिक माहौल बहुत ज्यादा नहीं बदला था, बल्कि विभाजन के वक्त हुए हिंदूमुसलिम दंगों की वजह से कड़वाहट बढ़ गई थी. मधुर को इस सब से कोई सरोकार नहीं था, उन की दुनिया तो नाटकों और पढ़ाईलिखाई तक सिमटी रहती थी. अपनी दोनों बड़ी बहनों ललिता और कमल के साथ वह दिल्ली की सड़कों पर घूमतीं तो किसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थीं.

मधुर के दादा राय बहादुर राजनारायण का अपना अलग रसूख और रुतबा था. लेकिन घर से बाहर और अंदर एक नई संस्कृति और संस्कार पनप रहे थे, जिन में शिक्षा के साथसाथ दीगर शौक पूरे करने की आजादी सभी सदस्यों को थी. दिल्ली के क्वीन मेरी हायर सैकेंडरी स्कूल की छात्रा रहते मधुर ने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू किया तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. जिस अभिजात्य वर्ग की वह थीं, वह अंगरेजी नाटकों खासतौर से विलियम शेक्सपियर को ज्यादा पसंद करता था. तब ऐसे ही नाटक ज्यादा खेले जाते थे. सन 1951 आतेआते वह एक कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने लगी थीं.

18 साल की यह नवयौवना अभी तक प्यार के अहसास से अछूती थी. दिल्ली की कई नामी कला संस्थाओं के साथसाथ मधुर अब तक आकाशवाणी से भी जुड़ गई थीं, जो उस समय एक उपलब्धि की बात मानी जाती थी. सन 1953 में दिल्ली के मिरांडा हाउस कालेज से मधुर ने बीए कर लिया तो घर में उन की शादी की बात चलने लगी.

लेकिन इस बीच 2 सालों में मधुर काफी बदल चुकी थीं, क्योंकि उन्हें सईद जाफरी नाम के एक मुसलिम युवक से प्यार हो गया था. उन का यह प्यार एकदम या पहली नजर का नहीं था, बल्कि धीरेधीरे परवान चढ़ा था. खुद मधुर को भी इस का पता काफी बाद में चला था. पंजाब के मलेरकोटला में सन 1929 में पैदा हुए सईद की पहचान मूलत: ब्रिटिश अभिनेता की रही थी. मुसलिम पंजाबी परिवार के सईद भी उस समय दिल्ली में एक कलाकार के रूप में संघर्ष कर रहे थे. वह आकाशवाणी से जुड़े थे. वहीं उन की मुलाकात मधुर से हुई थी.

केवल मधुर और उन की रुचियों में ही समानता नहीं थी, बल्कि दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी काफी मेल खाती थी. सईद के पिता डा. हामिद हुसैन जाफरी अपने जमाने के मशहूर फिजीशियन थे. वह उत्तर प्रदेश के कई शहरों के सरकारी अस्पतालों में पदस्थ रहे थे. सईद के नाना खान बहादुर फैजल ईमान मलेरकोटला रियासत के दीवान थे. इस नाते उन की भी नजदीकियां ब्रिटिश शासकों और अधिकारियों से थीं.

सईद के पास भी न आत्मविश्वास की कमी थी और न पैसों की. स्कूली जीवन से ही वह रंगमंच से जुड़े हुए थे. वह भी एक खूबसूरत युवक थे, सुर्ख गुलाबी रंगत, चौड़ा माथा, झूलते घुंघराले बाल उन की शख्सियत में चार चांद लगाते थे. उन के बोलने का अंदाज भी हर किसी को लुभाता था. उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंगरेजी भाषाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले सईद जाफरी ने स्कूल और कालेज में नाटक कर के खूब तारीफ हासिल की थी. तब के हिंदी फिल्मों के अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और मोतीलाल के वह मुरीद थे और उन की फिल्में देख उन की नकल उतारा करते थे.

सईद जाफरी बेशक महत्त्वाकांक्षी और प्रतिभावान थे, लेकिन खुद को साबित करने के लिए उन्हें संघर्ष भी खूब करना पड़ा. कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें दिल्ली ले आया, जहां उन के सामने रहने और खाने की समस्या थी. इस के लिए उन्होंने सन 1951 में आकाशवाणी में 250 रुपए महीने वेतन पर नौकरी कर ली. हालांकि यह वेतन उन के लिए पर्याप्त नहीं था, लेकिन इतना भी कम नहीं था कि वह गुजरबसर न कर पाते. शुरुआती दिनों में वह आकाशवाणी के पीछे पार्क में बनी बैंच पर सोते थे. एक दिन उन्हें इस हालत में देख कर आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर मसानी मेहरा ने उन्हें वाईएमसीए में 30 रुपए महीने पर एक कमरा किराए पर दिला दिया.

आकाशवाणी में नौकरी करते हुए ही ‘द ईगल हैज टू हैड्स’ नाटक के दौरान उन की मुलाकात मधुर से हुई थी. वह उन के साथ प्रमुख भूमिका में थीं. मधुर सईद के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थीं. सईद उन से ज्यादा पढ़ेलिखे थे. उन्होंने सन 1948 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया था. उन के अंदर अभिनय का कीड़ा कुलबुला रहा था, जिस की वजह से वह सरकारी नौकरी में नहीं गए थे.

पहले मधुर और सईद की निकटता बढ़ी, फिर धीरेधीरे उन की यह निकटता कब प्यार में तब्दील हो गई, दोनों को ही पता नहीं चला. अभिनय में पारंगत दोनों युवा कलाकार अपनेअपने अव्यक्त तरीके से रोमांस कर रहे थे. संस्कारी परिवार से होने की वजह से मधुर पहल नहीं कर पा रही थीं. दूसरी ओर अपने पिता की गोरखपुर की नियुक्ति के दौरान महंतों और मठों में हिंदू धर्म को नजदीक से देख चुके सईद भी उन्हें प्रपोज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें पूरा विश्वास था कि मधुर के घर वाले इस रिश्ते के लिए कभी राजी नहीं होंगे.

लेकिन प्यार हो चुका था. मधुर और सईद दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित गेलार्ड रेस्टोरेंट, जिस में अनगिनत प्रेमकथाओं की पटकथा लिखी गई थी, में घंटों बैठ कर थिएटर, सिनेमा और दुनियाजहान की बातें किया करते थे. लेकिन इजहार की बात आते ही दोनों हिचकिचा जाते थे. इस में धर्म ही नहीं, समाज और देश के हालात भी आड़े आ रहे थे. दोनों एकदूसरे को जाननेसमझने लगे थे, पसंद करने लगे थे और प्यार भी करने लगे थे. यह सच है कि प्यार एक मियाद से ज्यादा खामोश नहीं रह सकता.

सन 1955 में मधुर को राडा (रायल एकेडमी औफ ड्रामेटिक आर्ट) में काम करने के लिए अमेरिका जाने का प्रस्ताव मिला तो सईद खुद को रोक नहीं पाए और एक दिन हिम्मत कर के उन्होंने मधुर के घर वालों से शादी की इच्छा व्यक्त कर दी. उम्मीद के मुताबिक जवाब ना में मिला, लेकिन वजह धर्म नहीं, बल्कि कमाई बताई गई. मधुर के घर वालों, खासतौर पर पिता जो खुद पिता की मौत के बाद आर्थिक परेशानियां झेल चुके थे का खयाल था कि एक कलाकार इतना नहीं कमा सकता कि उन की बेटी को सुखी रख सके.

लेकिन उन के जवाब से सईद निराश नहीं हुए. वह भी अमेरिका चले गए और अपने दिल की बात, जिसे मधुर सालों से जानती थीं, कह दी. मधुर को पता था कि घर वाले तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्होंने भी वही जवाब दिया. लेकिन सईद समझ रहे थे कि मधुर का यह इनकार दिल से नहीं है. प्रेमिका की दुविधा वह समझ रहे थे. अनमने मन से न कहने के बावजूद मधुर ने उन के सामने राडा से जुड़ने का प्रस्ताव रखा. बहुत कुछ हासिल करने से पहले सईद मधुर को पा लेना चाहते थे, जिन में उन्हें एक नेक और प्यार करने वाली उदार पत्नी दिख रही थी. बचपन से ही पिता के साथ उत्तर प्रदेश में शहरशहर भटक चुके सईद की ख्वाहिश अपना घर बसाने की थी, कमोवेश यही इच्छा मधुर की भी थी.

आखिर एक दिन हैरतअंगेज तरीके से दोनों ने शादी कर ली और हनीमून मनाने न्यूयार्क चले गए. मधुर सचमुच सईद को बहुत चाहती थीं और शायद इसीलिए उन्होंने अपना नाम सईद की इच्छा के मुताबिक बदल कर मेहरुन्निमा रख लिया था. एक औरत किस हद तक समर्पित होती है, इस से सईद पहली बार रूबरू हुए थे. औरत के समर्पण के बारे में कला और साहित्य की बड़ीबड़ी किताबों में उन्होंने काफी कुछ पढ़ा और सुना था, लेकिन उस सब को खुद की जिंदगी में उतरते देखा तो निहाल हो उठे. प्यार में एक औरत इतनी सहजता से अपना नाम, जाति, धर्म और पहचान सब कुछ बदलने को तैयार हो जाती है, यह उन्होंने मधुर के समर्पण भाव से ही जाना.

दोनों के पास काम की कमी नहीं थी. लंदन, अमेरिका और भारत घूम कर नाटक करते हुए इन का दांपत्य जीवन शुरू हुआ, जिस में वक्त की कमी के चलते रोमांस शायद उतना नहीं रह गया था, जितना एक नवदंपति में होना चाहिए. इस के बाद भी दोनों संतुष्ट और खुश थे और भविष्य के लिए बहुत सा पैसा कमा लेना चाहते थे. उसी दौरान दोनों मशहूर फिल्मकार इस्माइल मर्चेंट के संपर्क में आए, जिन्हें ऐसे ही प्रतिभाशाली कलाकारों की जरूरत थी. दोनों शिद्दत के साथ मर्चेंट से जुड़ गए और इस्माइल आइवरी प्रोडक्शन के लिए काम करने लगे.

शादी के एक साल बाद ही बेटी जिया पैदा हुई. 2 सालों के अंतर से मीरा और सकीना हुईं. लगातार मां बनने के कारण मधुर जितना थिएटर से दूर होती गईं, सईद उतना ही काम में व्यस्त होते गए. उन्हें पहले के मुकाबले नाम और पैसा ज्यादा मिलने लगा था. इस दौरान अमेरिका और लंदन में रहते हुए उन्हें मुकम्मल शोहरत और दौलत मिली, जिस के लिए वह कोशिश कर रहे थे.

बेटियों की परवरिश कर रहीं मधुर ने पूरी तरह से काम नहीं छोड़ा था. वह शौकिया ही सही, पहले की तरह यात्रा संस्मरण लिख रही थीं, इसी के साथ वह भारतीय व्यंजनों पर लिखने का काम भी करने लगी थीं. यह उन का बचपन से पसंदीदा काम था. जिंदगी एक ढर्रे पर आ कर ठहर गई थी, जिस में बेटियों की किलकारियां, मासूम शरारतें और जिया के पहली बार स्कूल जाने का अनुभव था. लेकिन इस बीच पति का साथ कम होता गया था. सईद लगातार व्यस्त होते जा रहे थे, लेकिन अच्छी बात यह थी कि वह कामयाब हो रहे थे.

सईद पत्नी, बच्चों और खुद पर खुले हाथों खर्च करने वालों में थे. उन के शौक अब परवान चढ़ते जा रहे थे, जिस में महंगे सूट, सिगरेट और महंगी शराब खास थे. लेकिन वह खुद समझ नहीं पा रहे थे कि ये साधारण सफलताएं उन्हें उदंड क्यों बना रही हैं? वह बेवजह चिड़चिड़े होते जा रहे थे. इंगलैंड और अमेरिका से उन का मन ऊबने लगा था, लिहाजा उन्होंने भारत वापस आने का फैसला ले लिया. मेहरुन्निमा इस फैसले से असहमत नहीं थी. सन 1961 में वे दिल्ली वापस आए और भारत सरकार के टूरिस्ट औफिस में बतौर पब्लिसिटी औफिसर नौकरी कर ली.

लेकिन सईद और मधुर के बीच अब सन्नाटा सा पसरने लगा था. सईद ब्रिटिश संस्कृति से प्रभावित थे, जबकि मधुर उन की तरह पाश्चात्य सभ्यता की दीवानी  नहीं थीं. सईद पत्नी में बदलाव देखना चाहते थे और इस के लिए उन पर दबाव भी बना रहे थे. वैसे तो मधुर एक आज्ञाकारी पत्नी थीं, लेकिन उन्हें दबाव सहन करने की आदत नहीं थी. अपनी तरफ से उन्होंने पूरी कोशिश की कि कोई विवाद और कलह न हो, पर ऐसा होने लगा था.

कुछ दिनों बाद सईद और मधुर की मुलाकात एक बार फिर इस्माइल मर्चेंट और उन के सहयोगी आइवरी से हुई और फिल्मों पर काम शुरू हो गया. अब मधुर के पास ज्यादा वक्त था, लिहाजा मौके भी उन्हें ही ज्यादा मिले. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि मधुर का नाम सईद से ज्यादा चलने लगा था. हां, उन की पूछ जरूर बढ़ रही थी. इस के बावजूद सईद उन से पहले की तरह संतुष्ट नहीं थे. जबकि असंतुष्ट रहने की वजह भी उन की समझ में नहीं आ रही थी. मधुर से वह कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रखने लगे थे, पर वे उम्मीदें किस तरह की हैं और उन से हासिल क्या होगा, यह वह नहीं समझ पा रहे थे.

अलगाव के बीज अंकुरित हो उठे थे. दोनों ही अभिजात्य और कुलीन पृष्ठभूमि से थे, लिहाजा उन के बीच का तनाव भी अभिजात्य और कुलीन था, जिस से बचने की वे जितनी ज्यादा कोशिश कर रहे थे, उतना ही ज्यादा उस की गिरफ्त में आते जा रहे थे. किशोरवय की मेलमुलाकातें, कनाट प्लेस का घूमनाफिरना, गेलार्ड में घंटों एकदूसरे के साथ बैठ कर बातें करना, दीवानों की तरह एकदूसरे को चाहना और डूब कर प्यार करना, गुजरे कल की बातें हो चली थीं.

खटपट शुरू हुई और मुंह खुले तो सन 1966 में दोनों का तलाक हो गया. यह सईद का पुरुषोचित अहं था या फिर शादी से पहले मधुर और उन के अभिभावकों के सामने शादी के लिए गिड़गिड़ाने का प्रतिशोध या ग्लानि, यह तय कर पाना मुश्किल था. उधर मधुर जैसी पत्नी के लिए जिंदगी के वे दिन बेहद कठिन दिन थे. क्योंकि पति ही उन के लिए सब कुछ था. बेटियां छोटी थीं और उन्हें मां के साथसाथ पिता की भी जरूरत थी. लेकिन बात नहीं बनीं. विधिवत तलाक के बाद दोनों अलग हो गए. बेटियां मां के साथ ही रहीं. हैरानी की बात यह थी कि इस तलाक से न सईद टूटे और न ही मधुर विचलित हुईं. इस के बजाए दोनों और ज्यादा ऊर्जा से अपनेअपने कामों में लग गए.

मधुर ने पाक कला पर लिखना शुरू किया तो अमेरिका और इंगलैंड में उन की रैसिपीज को हाथोंहाथ लिया गया. परंपरागत भारतीय व्यंजनों पर उन्होंने पूरी शृंखला लिख डाली, जिस का ताजा संस्करण भारतीय शाकाहारी करी है. पत्रपत्रिकाओं से ले कर टेलीविजन तक मधुर शैफ के रूप में दिखने लगीं. आज भी वह चर्चित और लोकप्रिय शैफों की रोल मौडल हैं. दूसरी ओर मधुर से तलाक के बाद सईद जाफरी जेनिफर ईरीन सोरेल नाम की अमेरिकन महिला से प्यार करने लगे थे, जो पेशे से फ्रीलांस कास्टिंग डायरेक्टर थी.

वह वैसी ही थी जैसी छवि जाफरी उस में देखना चाहते थे. इस बार उन्होंने प्रपोज करने और शादी का फैसला लेने में देर नहीं की. उन्होंने तलाक के तुरंत बाद शादी कर ली. सईद एक कलाकार जरूर थे, लेकिन उन के दिल में आममर्दों की तरह यह ख्वाहिश भी कहीं दबी थी कि अब मधुर पछताएगी, उन्हें याद करेगी और उन के पास आ कर गिड़गिड़ाएगी.

लेकिन हुआ इस का उलटा. शादी के चंद महीनों बाद ही जेनिफर ने जता दिया कि उसे पति की उतनी परवाह नहीं है, जितनी एक पत्नी को होनी चाहिए. महत्त्वाकांक्षी जेनिफर को अपने काम की फिक्र ज्यादा रहती थी, सईद की बिलकुल नहीं. भारतीय और पाश्चात्य पत्नियों में कितना फर्क है, यह बात सईद की समझ में आ गई थी, लेकिन अब पछतावे के सिवाय उन के पास कुछ नहीं था. फिर भी सईद ने हिम्मत नहीं हारी. सईद को स्टेज कलाकार के रूप में वह सब नहीं मिला था, जो व्यावसायिक हिंदी फिल्मों में काम कर के मिला.

70 के दशक से ले कर 2015 तक उन्होंने सौ से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों में अभिनय किया और सभी में खासे सराहे गए. पैसा भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा मिला. गांधी फिल्म में वल्लभभाई पटेल की भूमिका में उन्होंने मानों पटेल के रौबीले व्यक्तित्व को साकार कर दिया था. शुरुआती फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ से ही उन्होंने जता दिया था कि वह बेहद मंझे और सधे अभिनेता हैं, जिस की संवाद अदायगी की अपनी खास शैली है, जिस के चेहरे के हावभाव किसी दूसरे पेशेवर ऐक्टर से ज्यादा बेहतर तरीके से बदलते हैं. शतरंज के खिलाड़ी में सईद जाफरी ने संजीव कुमार के सामने शतरंज खेलते हुए उन से कमतर अभिनय नहीं किया था. ‘हिना’ से ले कर ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा कर ही दम लिया.

सईद जाफरी ने फिल्म इंडस्ट्री के तमाम दिग्गजों के साथ काम किया और हर फिल्म में बेहतर से बेहतर अभिनय कर के पहले से ज्यादा वाहवाही लूटी. ‘चश्मेबद्दूर’ और ‘मासूम’ जैसी दर्जनों फिल्मों में वह एकदम अलग रोल में थे. इस के बावजूद वह हर चुनौतीपूर्ण भूमिका में खरे उतरे. सईद जाफरी बेशक बेहतरीन कलाकार थे. लेकिन उन के बारे में यह बात गिनेचुने लोग ही जानते थे कि वह एक असफल पति हैं. मधुर को तलाक दे कर वह जिंदगी भर पछताते रहे. खुद उन का मानना था कि जेनिफर की बेरुखी उन्हें अकसर मेहरुन्निमा की याद दिलाती रही, जो एक आज्ञाकारी नेक और उदार पत्नी थीं. तलाक के 7 सालों बाद उन्होंने कहीं शैफ मधुर जाफरी के बारे में पढ़ा और उन की तसवीर देखी तो चौंक पड़े और उन से मिलने अमेरिका जा पहुंचे, जहां मधुर सेनफोर्ड एलन से शादी कर के दोबारा घरगृहस्थी बसा चुकी थीं.

सईद से तलाक के करीब 3 सालों बाद उन्होंने दोबारा शादी का फैसला लिया था. इस की अहम वजह बेटियों को पिता का प्यार दिलाना था. इस मामले में सेनफोर्ड मधुर से किए अपने वादे पर एकदम खरे उतरे थे. मधुर का दूसरी शादी का फैसला सईद की तरह न गलत था, न चयन में कोई त्रुटि. सईद जब उन से मिलने पहुंचे तो मधुर ने मिलने से साफ मना कर दिया, पर तीनों बेटियों जिया, मीरा और सकीना ने एक बार उन से मिलना जरूर मुनासिब समझा. मुनासिब इसलिए नहीं कि उन्हें सईद से कोई लगाव था, बल्कि इसलिए कि वे सईद को बताना चाहती थीं कि उन के नए पिता दुनिया के बेहतरीन पिता हैं और वह जानते हैं कि सच्चा प्यार क्या होता है. मम्मी जैसी थीं, उन्हें वैसा ही उन्होंने स्वीकार कर लिया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में पूरी मदद की.

यह सईद जाफरी की जिंदगी का सब से कड़वा दिन था. जब संतान पिता को अच्छाबुरा सिखाने और समझाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि दुनिया और रिश्तेनाते हमेशा आप के मुताबिक नहीं चलते, क्योंकि आप उन के मुताबिक नहीं चले थे. मधुर के प्रति अपनी क्रूरता को स्वीकारना बताता है कि सईद जाफरी में कन्फैशन की हिम्मत थी, जो आमतौर पर लोगों में नहीं होती. उस दिन सईद की समझ आया कि शायद वह किसी को प्यार नहीं करते, इसलिए कोई उन्हें प्यार नहीं करता.

एक कामयाब रंगमंचीय और फिल्मी कलाकार की इस हालत पर तरह खाया जा सकता है, जिस का जिम्मेदार भी वह खुद ही था. लेकिन दाद उन की चाहत को भी देनी पड़ेगी कि वह अपनी पहली पत्नी मधुर को कभी भुला नहीं पाए. सईद ने बेहद स्वस्थ मन से माना कि दांपत्य में जीवनसाथी को बदलने की कोशिश से ही रिश्ता टूटता है. शायद मधुर के प्रति इसी चाहत का नतीजा था कि फिल्म ‘सागर’, जिस में वह डिंपल कपाडि़या के पिता के रोल में थे. सेट पर आमनासामना होने पर मधुर ने कभी सिर उठा कर उन्हें देखने की जहमत नहीं उठाई, न ही जरूरत महसूस की. लेकिन सईद ने मधुर को जरूर जी भर के देखा होगा. ठीक वैसे ही, जैसे कभी आकाशवाणी और कनाट प्लेस में देखा करते थे. इसलिए अपनी तमाम फिल्मों में सागर उन के लिए ज्यादा अहम थी.

बीते 14 नवंबर को जब सईद की भतीजी शाईन अग्रवाल ने उन की मौत की खबर सोशल मीडिया के जरिए दी तो बौलीवुड में उन्हें नजदीक से जानने वाले कलाकारों ने यह जरूर सोचा होगा कि जरूरी नहीं कि एक सफल अभिनेता सफल पति भी हो. Love Story