जवानी बनी जान की दुश्मन – भाग 2

शीला के अपहरण और हत्या के मामले में 4 लोगों को जेल तो भेज दिया गया, लेकिन उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. उस की लाश भी बरामद नहीं हुई. शीला के गायब होने से अब वे लोग भी परेशान थे, जिन्हें जेल भेजा गया था. अब उन के घर वाले भी शीला की तलाश में लग गए, क्योंकि वे तभी जेल से बाहर आ सकते थे, जब शीला का कुछ पता चलता.

वे शीला की तलाश तो कर ही रहे थे, इस के अलावा उन्होंने गांव वालों तथा रिश्तेदारों की एक पंचायत भी बुलाई. इस पंचायत में श्रीनिवास तथा उस के गांव के भी 10-12 लोगों को बुलाया गया था. पंचायत में जेल भेजे गए लोगों के घर वालों ने शीला के चरित्र पर सवाल उठाते हुए किसी के साथ भाग जाने का आरोप लगाया तो श्रीनिवास भड़क उठा. उस ने शीला के जेठ और देवरों और देवरानी को शीला के अपहरण और हत्या को दोषी मानते हुए अपनी काररवाई को उचित ठहराया.

श्रीनिवास अपनी जिद पर अड़ा रहा तो 3-4 घंटों तक बातचीत चलने के बाद पंचायत बिना किसी फैसले के खत्म हो गई. जिस काम के लिए यह पंचायत बुलाई गई थी, वह वैसा का वैसा ही रह गया. जेल भेजे गए लोगों की रिहाई भी नहीं हो सकी. शीला के गायब होने से उस के घर तथा मायके वाले तो परेशान थे ही, उन के घर वाले भी परेशान थे, जो जेल भेजे गए थे.

सभी इस कोशिश में लगे थे कि कहीं से भी शीला का कोई सुराग मिल जाता. उन लोगों की कोशिश कोई रंग लाती, उस से पहले ही शीला के बारे में अपने आप पता चल गया. किसी ने फिरोजाबाद में रहने वाली शीला की बुआ महादेवी को फोन कर के बताया कि उन की भतीजी शीला का शव निबोहरा रोड से थोड़ा आगे सड़क से अंदर जा कर एक कंजी के पेड़ के नीचे पड़ा है.

इस खबर से महादेवी चौंकी. उस ने फोन अपने बेटे शीलू को पकड़ा दिया. शीलू ने उस से जानना चाहा कि वह कौन है और कहां से बोल रहा है तो उस ने फोन काट दिया. शीलू ने तुरंत यह बात श्रीनिवास को बताई और वह फोन नंबर भी लिखा दिया, जिस नंबर से फोन कर के यह बताया गया था.

श्रीनिवास वह नंबर देख कर चौंका, क्योंकि वह नंबर उस की बहन शीला का ही था. देर किए बगैर श्रीनिवास कुछ दोस्तों को साथ ले कर बहन की लाश की तलाश में बताए गए स्थान की ओर चल पड़ा. निबोहरा रोड 10 किलोमीटर के आसपास थी. इतनी बड़ी सड़क पर सड़क से थोड़ा अंदर जा कर कंजी का पेड़ तलाशना आसान नहीं था. श्रीनिवास दोस्तों के साथ शीला के शव की तलाश में घंटों लगा रहा.

काफी कोशिश के बाद भी उन्हें लाश नहीं मिली. अंत में निराश हो कर सब लौट पड़े. वे शमसाबाद चौराहे पर पहुंचे थे कि श्रीनिवास के मोबाइल पर फोन आया. उस ने नंबर देखा तो वह शीला का था. उस ने फोन रिसीव करने के साथ ही रिकौर्डिंग चालू कर दी, जिस से वह फोन करने वाले की बात रिकौर्ड कर सके.

फोन रिसीव होते ही दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘भाई साहब, आप लोग शीला की लाश जहां ढूंढ़ रहे थे, वह जगह तो काफी आगे है. शीला की लाश शमसाबाद चौराहे से निबोहरा रोड पर 2 किलोमीटर के अंदर ही पड़ी है.’’

‘‘भाई, तुम बोल कौन रहे हो? यह शीला का मोबाइल तुम्हें कहां से मिला? तुम्हें कैसे पता कि शीला की हत्या हो चुकी है और उस की लाश निबोहरा रोड पर थोड़ा अंदर जा कर कंजी के पेड़ के नीचे पड़ी है?’’ श्रीनिवास ने एक साथ कई सवाल पूछ लिए.

श्रीनिवास के सवालों का जवाब देने के बजाय दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. निराश और थकेमांदे श्रीनिवास के अंदर इस दूसरे फोन ने जान डाल दी. एक बार फिर वह फोन पर बताई गई जगह पर जा कर लाश की तलाश करने लगा. आखिर उस की मेहनत रंग लाई और वह बदनसीब घड़ी आ गई, जिस का कोई भी भाई इंतजार नहीं करना चाहता.

लाश इस तरह सड़ चुकी थी कि पहचान में नहीं आ रही थी. श्रीनिवास ने अपनी मां और थाना शमसाबाद पुलिस को शीला की लाश मिलने की सूचना दे दी. तब थाना शमसाबाद पुलिस ने थाना फतेहाबाद पुलिस को सूचना देने को कहा, क्योंकि जहां शीला की लाश पड़ी थी, वह जगह थाना फतेहाबाद के अंतर्गत आती थी. तब श्रीनिवास ने 100 नंबर पर फोन कर के सारी बात बताई. इस के बाद जिला नियंत्रण कक्ष ने थाना फतेहाबाद के थानाप्रभारी मुनीष कुमार को सूचना दे कर तत्काल काररवाई का निर्देश दिया.

बेटी की लाश मिलने की सूचना पा कर रामदेवी भी घटनास्थल पर जा पहुंची. शक्लसूरत से वह भी लाश को नहीं पहचान सकी. तब उस ने बेटी की लाश कान के कुंडल, गले के मंगलसूत्र और साड़ी से पहचानी. अब तक थाना फतेहाबाद के प्रभारी मुनीष कुमार भी सहयोगियों के साथ वहां पहुंच गए थे.

लाश देख कर ही वह जान गए कि 3-4 दिनों पहले हत्या कर के इसे यहां ला कर फेंका गया है. क्योंकि वहां संघर्ष का कोई निशान नहीं था. जिस से साफ लगता था कि हत्या यहां नहीं की गई है. इस के अलावा लाश के पास तक मोटरसाइकिल के टायरों के आने और जाने के निशान भी थे.

लाश से इतनी तेज दुर्गंध आ रही थी कि वहां खड़ा होना मुश्किल हो रहा था. इसलिए पुलिस ने आननफानन में जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए आगरा के एस.एन. मैडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद थाना शमसाबाद पुलिस ने अपने यहां दर्ज शीला के अपहरण और हत्या का मुकदमा थाना फतेहाबाद पुलिस को स्थानांतरित कर दिया, जहां यह अपराध संख्या 183/2013 पर भादंवि की धाराओं 302, 201 के अंतर्गत दर्ज हुआ. मुकदमा दर्ज होते ही थानाप्रभारी मुनीष कुमार ने जांच शुरू कर दी. यह 3 अगस्त, 2013 की बात है.

मुनीष कुमार ने सब से पहले श्रीनिवास से पूछताछ की. उस ने शुरू से ले कर लाश बरामद होने तक की पूरी कहानी उन्हें सुना दी. उस की इस कहानी में मृतका शीला के मोबाइल फोन से उस की हत्या और लाश पड़ी होने की बताने वाली बात चौंकाने वाली थी, क्योंकि अकसर हत्या करने वाले मृतक का मोबाइल सिम निकाल कर फेंक देते हैं. जिस से वे पकड़े न जाएं. लेकिन यहां मामला अलग था. साफ था कि मृतका का मोबाइल जिस किसी के भी पास था, वह उस के हत्यारे को जानता होगा या खुद ही हत्यारा होगा.

यही सोच कर मुनीष कुमार ने उस नंबर को सर्विलांस टीम को सौंप दिया, क्योंकि इस नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन हत्यारे तक पहुंचा सकती थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शीला की हत्या 31 जुलाई, 2013 की शाम को गला दबा कर की गई थी. लेकिन गला दबाने से पहले उसे कोई जहरीली चीज भी खिलाई गई थी. इस का मतलब शीला की हत्या उसी दिन हो गई थी, जिस दिन वह गायब हुई थी.

फरेबी के प्यार में फंसी बदनसीब कांता – भाग 2

काफी कोशिश के बाद आखिर पुलिस ने 14 साल के एक ऐसे लड़के को खोज निकाला, जिस ने उस आदमी को देखा था, जो धड़ वाला पार्सल चरई तालाब में फेंक गया था. पूछताछ में उस लड़के ने पुलिस को बताया था कि उस रात साढ़े नौ बजे के आसपास वह तालाब के किनारे बैठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था, तभी एक सुंदर स्वस्य युवक उस के पास आया. उस के हाथों में प्लास्टिक का एक थैला था, जिस में लाल रंग के कपड़ों में लिपटा एक बड़ा सा पैकेट पार्सल जैसा था.

उस युवक ने उस से पानी में फेंकने के लिए कहा. इस के लिए वह उसे कुछ पैसे भी दे रहा था. पैकेट काफी भारी और गरम था. पूछने पर उस युवक ने उसे बताया था कि इस में पूजापाठ की सामग्री के अलावा कुछ ईंटे भी हैं, सामान अभी ताजा है, इसलिए गरम है. पैकेट भारी था, इसलिए लड़के ने उसे पानी में फेंकने के लिए कुछ अधिक पैसे मांगे. पैसे कम कराने के लिए वह युवक कुछ देर तक उस लड़के से झिकझिक करता रहा.

जब वह लड़का कम पैसे लेने को तैयार नहीं हुआ तो उसने खुद ही जा कर उस पैकेट को पानी में डाला और जिस आटोरिक्शे से आया था, उसी में बैठ कर चला गया. उस लड़के ने आटो वाले का भी हुलिया पुलिस को बताया था. इस में खास बात यह थी कि आटो वाला दाढ़ी रखे था.

इस तरह पुलिस को अपनी जांच आगे बढ़ाने का एक रास्ता मिल गया. अब पुलिस उस दाढ़ी वाले आटो ड्राइवर को ढूंढ़ने लगी. आखिर पुलिस ने उस दाढ़ी वाले आटो ड्राइवर को ढूंढ़ निकाला. पुलिस टीम ने उसे थाने ला कर पूंछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘सर, वह आदमी मेरे आटो में चेंबूर के सुभाषनगर वस्ता से बैठा था. वापस ला कर भी मैं ने उसे वहीं छोड़ा था.’’

आटो ड्राइवर ने यह भी बताया था कि वह हिंदी और दक्षिणी भाषा मिला कर बोल रहा था. आटो ड्राइवर ने उस युवक का जो हुलिया बताया था, वह उस लड़के द्वारा बताए गए हुलिए से पूरी तरह मेल खा रहा था. इस से साफ हो गया कि हत्यारा कोई और नहीं, वही युवक था, जो दक्षिण भारतीय था.

इस के बाद पुलिस की जांच दक्षिण भारतीय बस्तियों और दक्षिण भारतीय युवकों पर जा कर टिक गई. पुलिस ने आटो ड्राइवर और लड़के द्वारा बताए हुलिए के आधार पर हत्यारे का स्केच बनवा कर हर दक्षिण भारतीय बस्ती एवं सुभाषनगर में लगवा दिए. यह सब करने में 2 दिन और बीत गए. दुर्भाग्य से इस मामले की जांच कर रही पुलिस टीम को इस सब का कोई लाभ नहीं मिला. लेकिन पुलिस टीम इस सब से निराश नहीं हुई. वह पहले की ही तरह सरगरमी से मामले की जांच में लगी रही.

पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंचने के लिए कडि़यां जोड़ ही रही थी कि तभी उसे थाना साकीनाका से एक ऐसी सूचना मिली, जिस से लगा कि अब उसे हत्यारे तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी. 4 नवंबर, 2013 को दीपावली का दिन था. उसी दिन साकीनाका पुलिस ने फोन द्वारा सूचना दी कि चरई तालाब में मिले धड़ वाली मृतका का जो हुलिया बताया गया था, उस हुलिए की महिला की गुमशुदगी उन के थाने में दर्ज कराई गई है.

थाना साकीनाका में जो गुमशुदगी दर्ज कराई गई थी, वह गुमशुदा महिला की बहन सुहासिनी प्रसाद हेगड़े ने दर्ज कराई थी. सूचना मिलते ही पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर ने सुहासिनी से संपर्क किया. उन्हें थाने बुला कर टुकड़ोंटुकड़ों में मिली लाश के फोटोग्राफ्सदिखाए गए तो फोटो देखते ही वह रो पड़ीं. सुहासिनी ने टुकड़ोंटुकड़ों में मिली उस लाश की शिनाख्त अपनी बहन कांता करुणाकर शेट्टी के रूप में कर दी, जो 29 अक्तूबर, 2013 से गायब थी.

कर्नाटक की रहने वाली 36 वर्षीया स्वस्थ और सुंदर कांता करुणाकर शेट्टी अपने 14 वर्षीय बेटे के साथ चांदीवली, साकीनाका की म्हाणा कालोनी के सनसाइन कौआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की इमारत के ‘ए’ विंग के ग्राउंड फ्लोर पर रहती थी. वह फैशन डिजाइनर थी. उस के पति करणाकर शेट्टी का मिक्सर ग्राइंडर का अपना व्यवसाय था.

लेकिन 2 साल पहले करुणाकर के व्यवसाय में ऐसा घाटा हुआ कि वह स्वयं को संभाल नहीं सके और आत्महत्या कर ली. इस के बाद कांता अकेली पड़ गई. अब उस का सहारा एकमात्र 12 साल का बेटा रह गया था. पति के इस कदम के बाद कांता पर मानो पहाड़ टूट पड़ा था.

लेकिन उच्च शिक्षित कांता ने अपने मासूम बेटे के भविष्य को देखते हुए खुद को संभाला और अपने काम में लग गई. अंत में सुहासिनी ने पुलिस को बताया था कि पिछले कुछ समय से कांता चेंबूर के रहने वाले किसी लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था.

29 अक्तूबर, 2013 की शाम को कांता घर से निकली थी तो लौट कर नहीं आई. पूरी रात उस का बेटा इंतजार करता रहा. घर में अकेले पड़े हैरानपरेशान 14 साल के उस के बेटे ने सुबह सुहासिनी को फोन कर के मां के वापस न आने की बात बताई. सुहासिनी ने परेशान और घबराए बच्चे को ढ़ांढ़स बधाया और थोड़ी देर में उस के पास जा पहुंची.

इस के बाद सुहासिनी बच्चे को ले कर कांता शेट्टी की तलाश में निकल पड़ी. जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी, सुहासिनी ने उस की तलाश की. जब कहीं से भी उन्हें कांता के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो वह थाना साकीनाका पहुंची और कांता की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

सुहासिनी की बातों से पुलिस टीम को उसी युवक पर संदेह हुआ, जिस से कांता का प्रेमसंबंध था. पुलिस कांता के बारे में जरूरी जानकारी लेने के साथसाथ उस के घर की तलाशी भी ली कि शायद उस युवक तक पहुंचने का कोई सूत्र मिल जाए. लेकिन काफी मेहनत के बाद भी कुछ नहीं मिला तो पुलिस कांता का मोबाइल फोन ले कर थाने आ गई. यह संयोग ही था कि उस दिन वह अपना मोबाइल फोन साथ नहीं ले गई थी.

Prabhakar-Shetty

पुलिस टीम ने कांता के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस नंबर से सब से अधिक जिस नंबर पर बात हुई थी, वह नंबर प्रभाकर कुट्टी शेट्टी का था. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो पता चला कि वह सुभाषनगर में बिल्डिंग नंबर 6 एम 224 आचार्यमार्ग जोलड़ी चेंबूर में रहता है और चेंबूर जिमखाना के रेस्टोरेंट के.वी. कैटरर्स में मैनेजर है.

पुलिस टीम ने पहले प्रभाकर के नंबर पर संपर्क करना चाहा. लेकिन नंबर बंद होने की वजह से उस से संपर्क नहीं हो सका. इस के बाद पुलिस टीम ने उस के घर और रेस्टोरेंट पर छापा मारा. प्रभाकर पुलिस को दोनों जगहों पर नहीं मिला. इस से पुलिस का शक और बढ़ गया. पुलिस टीम ने उस की सरगरमी से तलाश शुरू कर दी. साथ ही मुखबिरों को भी लगा दिया. आखिर 8 नवंबर, 2013 को पुलिस ने मुखबिर की ही सूचना पर घाटकोपर की एक इमारत से प्रभाकर को गिरफ्तार कर लिया.

जेठानी की आशिकी ने बनाया कातिल

उस रात की सच्चाई : प्यार करने की मिली सजा – भाग 1

रात के यही कोई 11 बजे आगरा के थाना एतमादपुर के गांव चौगान से जिला नियंत्रण कक्ष को फोन द्वारा सूचना दी गई कि गांव के  अशोक सिंह के घर हथियारों से लैस कुछ बदमाश लूटपाट के इरादे से घुस आए थे. घर वालों ने बदमाशों से मोर्चा लिया तो बदमाश भाग निकले. लेकिन लूटपाट का विरोध करने की वजह से जातेजाते बदमाशों ने अशोक सिंह की बड़ी बेटी को गोली मार दी है, जिस की तुरंत मौत हो गई है. बाकी बदमाश तो भाग गए लेकिन एक बदमाश को उन लोगों ने बंधक बना लिया है.

खबर सनसनीखेज थी, लिहाजा पुलिस कंट्रोलरूम ने तुरंत इस खबर को पूरे जिले में प्रसारित कर दी.चौगान गांव थाना एतमादपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए गश्त पर निकले एतमादपुर के थानाप्रभारी अमित कुमार ने जीप में लगे वायरलेस सेट से जैसे ही लूटपाट के इरादे से की गई हत्या की खबर सुनी, तत्काल चौगान गांव के लिए रवाना हो गए. उस समय उन के साथ 6 सिपाही थे. जीप से ही उन्होंने फोन द्वारा इस घटना की सूचना पुलिस चौकी छलेसर के प्रभारी टोडी सिंह को दे कर चौगान पहुंचने के लिए कह दिया था.

पुलिस को अशोक सिंह का घर ढूंढ़ने में ज्यादा देर नहीं लगी. गोलियों की आवाज और चीखचिल्लाहट से पूरा गांव जाग चुका था. इसलिए गांव में घुसते ही गांव वालों ने पुलिस को अशोक सिंह के घर पहुंचा दिया था. गांव वालों के साथ घर के बाहर खड़े अशोक सिंह अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर के साथ पुलिस का इंतजार कर रहे थे. घर के अंदर से रोने की आवाजें आ रही थीं. अशोक सिंह के अन्य भाईभतीजे भी वहां मौजूद थे.

अशोक सिंह के जिस मकान में डकैती पड़ी थी, वह 6-7 कमरों का एकमंजिला मकान था. उन का यह मकान चारों ओर से बंद था, लेकिन छत से हो कर मकान के अंदर आसानी से जाया जा सकता था. क्योंकि छत पर जाने की सीढि़यां बाहर से बनी थीं.

पुलिस मकान के अंदर पहुंची तो देखा कि छत पर आंगन की ओर लगी रेलिंग से बंधी एक साड़ी लटक रही थी. पुलिस को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि किसी बदमाश के इसी साड़ी के सहारे नीचे आ कर बाकी बदमाशों के आने के लिए दरवाजे की कुंडी खोली होगी.

पूछताछ में अशोक सिंह ने बताया, ‘‘साहब, मैं अपनी पत्नी कमला देवी के साथ अपने कमरे में सो रहा था तो मेरे दोनों बेटे सचिन और विपिन अपनेअपने कमरों में सो रहे थे. एक कमरे में मेरी 2 बेटियां सो रहीं थीं. चूंकि बड़ी बेटी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी, इसलिए वह देर रात तक जाग कर पढ़ाई करती थी. इसी वजह से वह अकेली अलग कमरे मे सोती थी.’’

‘‘रात पौने 11 बजे के आसपास मैं ने बड़ी बेटी रुचि के चीखने की आवाज सुनी तो तुरंत कमरे से बाहर आ गया. वही आवाज सुन कर मेरे बेटे भी अपनेअपने कमरे से बाहर आ गए थे. रुचि के चीखते ही तड़ातड़ गोलियां चली थीं. उस के साथ एक बार फिर रुचि चीखी थी.

गोलियां चलाने वाले मुख्य दरवाजे की ओर भाग रहे थे, क्योंकि वे जान गए थे कि अब उन का मकसद पूरा नहीं होगा. तभी मेरी नजर रुचि पर पड़ी, जो गोलियों से घायल हो कर आंगन में गिरी पड़ी थी. बाकी बदमाश तो भाग गए, लेकिन एक बदमाश नहीं भाग सका. उसे हम ने हथियारों के बल पर कमरे में बंद कर दिया है.’’

मामला काफी गंभीर था. आंगन में एक जवान लड़की की लाश पड़ी थी. उस के शरीर से अभी भी खून बह रहा था. आंगन की ओर दीवारों पर गोलियों के कुछ निशान नजर आ रहे थे. माना गया कि बदमाशों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं होंगी, जिस से कुछ गोलियां दीवारों पर जा लगी थीं.

घटना की सूचना थानाप्रभारी अमित कुमार ने पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. इसी सूचना के आधार पर डीआईजी विजय सिंह मीणा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर, पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण-पश्चिम) बबीता साहू, क्षेत्राधिकारी अवनीश कुमार गांव चौगान पहुंच गए थे. इन अधिकारियों ने भी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने के साथ अशोक सिंह तथा घर के अन्य लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की.

बंधक बना बदमाश अभी तक कमरे में बंद था. उस ने अंदर से कुंडी लगा रखी थी. बदमाश के पास कोई भी हथियार हो सकता था. इस स्थिति में पुलिस ने उसे रात में निकालना उचित नहीं समझा, क्योंकि पुलिस का मानना था कि वह अपनी जान बचाने के लिए पुलिस पर भी हमला कर सकता है.

पुलिस ने सुबह तक का इंतजार करना उचित समझा. सवेरा होने पर खिड़की और झरोखों से देख कर यह निश्चित कर लिया गया कि बंधक बनाए गए बदमाश के पास कोई हथियार नहीं है तो पुलिस ने उस से दरवाजा खोलने को कहा. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में जान की भीख मांगते हुए बदमाश ने दरवाजा खोल दिया.

कमरे से निकला बदमाश 24-25 साल का हट्टाकट्टा नौजवान था. बदमाश के बाहर आते ही पुलिस उस के साथियों के नाम पते पूछने लगी तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मुझे थाने ले चलो, क्योंकि यहां मेरी जान को खतरा है. थाने में मैं सब कुछ बता दूंगा.

क्षेत्राधिकारी अवनीश कुमार ने बदमाश का मुंह ढंक कर जीप में बैठाया और थानाप्रभारी अमित कुमार की देखरेख में उसे थाना एतमादपुर ले जाने के लिए कहा. इस के बाद अधिकारियों की देखरेख में चौकीप्रभारी टोडी सिंह ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर बदमाशों की गोली का शिकार अशोक सिंह की बेटी रुचि की लाश को पोस्टमार्टम के लिए आगरा के एस.एन. मेडिकल कालेज भिजवा दिया. पुलिस ने घटनास्थल से कारतूसों के खोखे भी कब्जे में ले लिए थे.

इस के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर सहयोगियों के साथ चलने लगे तो उन्होंने अशोक सिंह से थाने चल कर रिपोर्ट लिखवाने को कहा. तब उस ने बड़ी ही लापरवाही से कहा, ‘‘सर, आप चलिए. मैं घर वालों को समझाबुझा कर थोड़ी देर में आता हूं.’’

अशोक सिंह का यह जवाब वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर की समझ में नहीं आया. जिस की बेटी को बदमाशों ने मार दिया था और एक बदमाश पकड़ा भी गया था. इस के बावजूद भी वह आदमी मुकदमा दर्ज कराने में हीलाहवाली कर रहा था. वह उसे साथ ले जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘देखो, रिपोर्ट जितनी जल्दी लिख जाएगी, पुलिस उतनी ही जल्दी काररवाई शुरू कर देगी. तुम्हारी बेटी के हत्यारों को पकड़ना भी है. बिना रिपोर्ट लिखे पुलिस कोई भी काररवाई करने से रही. इसलिए जितनी जल्दी हो सके तुम्हें थाने चल कर रिपोर्ट लिखा देनी चाहिए.’’

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की इस बात का अशोक सिंह पर कुछ असर पड़ा. उस ने अपने भाइयों, पत्नी और बेटों से कुछ सलाहमशविरा किया और फिर पुलिस के साथ थाने आ गया. उसी के साथ गांव के तमाम अन्य लोग भी उस बदमाश को देखने थाने आ गए थे.

पुलिस ने पहले तो गांव वालों को थाना परिसर से बाहर निकाला. क्योंकि वे बदमाश को सामने लाने की बात कर रहे थे. साथ ही वे यह भी कह रहे थे कि जल्दी रिपोर्ट लिख कर अशोक सिंह को जाने दो. गांव वालों को बाहर निकाल कर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर की उपस्थिति में पकड़े गए बदमाश से उस के साथियों के बारे में पूछा गया तो उस ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस दंग रह गई.

पता चला, पकड़ा गया युवक बदमाश नहीं, उसी गांव का रहने वाला शेर सिंह था. उस ने पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार सारा मामला ही पलट गया था. उस के बताए अनुसार रुचि की हत्या का मुकदमा बदमाशों के बजाय उस के पिता अशोक सिंह सिकरवार तथा उन के बेटों के खिलाफ दर्ज कर के अशोक सिंह को उसी समय गिरफ्तार कर लिया गया था.

जब इस बात की जानकारी थाने आए गांव वालों को हुई तो वे भी हैरान रह गए क्योंकि अभी तक उन्हें ही पता नहीं था कि पकड़ा गया बदमाश कौन था और अशोक सिंह के घर में उस रात क्या हुआ था. दरअसल पुलिस ने कमरे में बंद शेर सिंह को जब बाहर निकाला था, तो उस के मुंह को ढक दिया था, इसलिए गांव वाले उस समय उसे देख नहीं पाए थे.

जवानी बनी जान की दुश्मन – भाग 1

दोपहर 2 बजे की गई शीला रात होने तक घर नहीं लौटी तो उस के बच्चे परेशान होने लगे. वह  डा. बंगाली से खुजली की दवा लेने शमसाबाद गई थी. उसे घंटे, 2 घंटे में लौट आना चाहिए था. लेकिन घंटे, 2 घंटे की कौन कहे, उसे गए कई घंटे हो गए थे और वह लौट कर नहीं आई थी. अब तक तो डा. बंगाली का क्लिनिक भी बंद हो गया होगा.

शीला का बड़ा बेटा 10 साल का सतीश रात होने की वजह से डर रहा था. वह ताऊ चाचाओं से भी मदद नहीं ले सकता था, क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले ही उस की मां की ताऊ और चाचाओं से खूब लड़ाई हुई थी. उस लड़ाई में ताऊ और चाचाओं ने उस की मां की खूब बेइज्जती की थी.

सतीश के मन में मां को ले कर तरहतरह के सवाल उठ रहे थे. मां के न आने से वह परेशान था ही, उस से भी ज्यादा परेशानी उसे छोटे भाइयों के रोने से हो रही थी. 8 साल के मनोज और 3 साल के हरीश का रोरो कर बुरा हाल था. अब तक उन्हें भूख भी लग गई थी. उस ने उन्हें दुकान से बिस्किट ला कर खिलाया था, लेकिन बच्चे कहीं बिस्किट से मानते हैं. अब तक खाना खाने का समय हो गया था.

सतीश अब तक मां को सैकड़ों बार फोन कर चुका था, लेकिन मां का फोन बंद होने की वजह से उस की बात नहीं हो पाई थी. जब वह हद से ज्यादा परेशान हो गया और उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने अपने मामा श्रीनिवास को फोन कर के मां के बंगाली डाक्टर के यहां जाने और वापस न लौटने की बात बता दी.

दोपहर की गई शीला उतनी देर तक नहीं लौटी, यह जान कर श्रीनिवास परेशान हो गया. वह समझ गया कि मामला कुछ गड़बड़ है. बहन के इस तरह अचानक रहस्यमय ढंग से गायब होने की जानकारी पा कर वह बेचैन हो उठा. उस के भांजे मां को ले कर किस तरह परेशान होंगे, उसे इस बात का पूरा अंदाजा था. उस ने भी शीला को फोन किया, लेकिन जब फोन बंद था तो शीला की भी उस से कैसे बात होती.

बहन से बात नहीं हो सकी तो दोस्त की मोटरसाइकिल ले कर वह तुरंत घर से निकल पड़ा. 8 किलोमीटर का रास्ता तय कर के वह 15-20 मिनट में भांजों के पास आ पहुंचा.

बहन को ले कर उस के मन में तरहतरह के विचार आ रहे थे. जवान बहन के साथ बदनीयती से किसी ने बुरा तो नहीं कर दिया, यह सोचने के पीछे वजह यह थी कि एक तो शीला घर नहीं लौटी थी, दूसरे उस का फोन बंद था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा अचानक क्या हो गया कि बहन का फोन बंद हो गया?

श्रीनिवास ने सब से पहले तो अपने तीनों भांजों के लिए खाने की व्यवस्था की. इस बीच बातचीत में सतीश ने मामा को बताया कि उन्हें स्कूल से ला कर खाना खिलाया. वे अपना होमवर्क करने लगे तो मां तैयार हो कर दवा लेने चली गई. उस ने घंटे, डेढ़ घंटे में लौटने को कहा था. लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि वह लौट कर ही नहीं आई.

सतीश ने बताया था कि शीला शमसाबाद वाले डा. बंगाली से दवा लेने गई थी. सतीश की इस बात से श्रीनिवास को हैरानी हुई, क्योंकि अभी तक तो शीला गांव से थोड़ी दूरी पर अपना क्लिनिक चलाने वाले डा. बंगाली से दवा लेती थी. इस बार वह शमसाबाद क्यों चली गई? शीला का पति यानी श्रीनिवास का बहनोई जयपाल दिल्ली में रहता था. श्रीनिवास ने जयपाल को फोन कर के सारी बात बताई तो उस ने मजबूरी जताते हुए उस समय गांव पहुंचने में असमर्थता व्यक्त करते हुए शीला की खोजबीन करने का अनुरोध किया.

श्रीनिवास ने बहन के इस तरह अचानक गायब होने पर उस के जेठ सहीराम और देवरों गिरिराज, राकेश तथा दिनेश से बात की तो इन लोगों में से किसी ने भी उसे ठीक से जवाब नहीं दिया. उन्होंने शीला और उस के बच्चों से किसी तरह की हमदर्दी या सहानुभूति दिखाने के बजाय साफसाफ कह दिया कि वह खुद ही ढूंढ ले. उस से उन्हें कोई लेनादेना नहीं है.

अपनी बहन के जेठ और देवरों की बातों से श्रीनिवास समझ गया कि पिछले दिनों संपत्ति को ले कर इन लोगों का उस की बहनबहनोई से झगड़ा हुआ था, उसी वजह से ये लोग नाराज हैं. इसलिए इन लोगों से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद करना बेकार है. वह तीनों भांजों को ले कर अपने गांव चला गया. बच्चों को अपनी मां के पास छोड़ कर वह बहन की तलाश करने लगा. बेटी के इस तरह अचानक गायब होने से उस की मां भी चिंतित थी.

शीला के जेठ और देवरों ने श्रीनिवास के साथ जैसा व्यवहार किया था, उस से उसे लगा कि उस के गायब होने के पीछे इन लोगों का हाथ तो नहीं है? उस की मां को भी कुछ ऐसा ही लग रहा था. इसलिए मांबेटे ने इस बात पर गहराई से विचार किया. रात काफी हो गई थी, इस के बावजूद श्रीनिवास शमसाबाद चौराहे पर डा. बंगाली की क्लिनिक तक शीला को ढूंढ़ आया था.

उस का सोचना था कि साधन न मिल पाने की वजह से बहन घर न जा पाई हो. लेकिन पूरे रास्ते में उसे एक भी आदमी आताजाता नहीं मिला. रास्ते में ही नहीं, बाजार में भी सन्नाटा पसरा था. विकलांग श्रीनिवास. पूरी रात बहन की तलाश में भटकता रहा.

अगले दिन डा. बंगाली की क्लिनिक खुलने के पहले ही वह शमसाबाद पहुंच गया. डा. सपनदास विश्वास 9 बजे के आसपास क्लिनिक पर पहुंचे तो श्रीनिवास ने उन से बहन के बारे में पूछा. डा. विश्वास ने मरीजों का रजिस्टर देख कर बताया कि कल तो शीला नाम की कोई मरीज उन के यहां नहीं आई थी.

इस से श्रीनिवास को किसी अनहोनी की आशंका हुई. वह सीधे थाना शमसाबाद जा पहुंचा. उस ने शीला के अपहरण और हत्या की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो थानाप्रभारी ने अगले दिन शीला की फोटो ले कर आने को कहा. थानाप्रभारी ने अगले दिन आने को कहा तो श्रीनिवास को लगा पुलिस टाल रही है. इसलिए वह वहां से सीधे जिलाधिकारी के यहां चला गया.

एक विकलांग को अपनी जवान विवाहिता बहन की तलाश में भटकते देख जिलाधिकारी गुहेर बिन सगीर ने उस की व्यथा  ध्यान से सुनी और थाना शमसाबाद पुलिस को आदेश दिया कि तत्काल पीडि़त की रिपोर्ट दर्ज कर के काररवाई की जाए. जिलाधिकारी के आदेश के बाद श्रीनिवास थाना शमसाबाद पहुंचा और शीला का अपहरण कर हत्या करने की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए उस ने शीला के जेठ सहीराम, देवर, गिरिराज, दिनेश, राकेश और देवरानी रामलाली को नामजद करते हुए तहरीर दे दी.

रिपोर्ट दर्ज कर के पुलिस शीला की देवरानी को छोड़ कर चारों नामजद लोगों को हिरासत में ले कर थाने ले आई. थाने में की गई पूछताछ और जांच में पुलिस ने सभी को निर्दोष पाया, लेकिन अपना पीछा छुड़ाने के लिए पुलिस ने कागजी काररवाई कर के उन्हें जेल भेज दिया.

खुद के बिछाए जाल में

फरेबी के प्यार में फंसी बदनसीब कांता – भाग 1

महानगर मुंबई के उपनगर चेंबूर की हेमू कालोनी रोड पर स्थित चरई तालाब घूमने टहलने के लिए ठीक उसी तरह मशहूर है, जिस तरह दक्षिण मुंबई का मरीन ड्राइव यानी समुद्र किनारे की चौपाटी और उत्तर  मुंबई का सांताकुंज-विलेपार्ले का जुहू. ये ऐसे स्थान हैं, जहां आ कर लोग अपना मन बहलाते हैं. इन में प्रेमी युगल भी होते हैं और घर परिवार के लोग भी, जो अपनेअपने बच्चों के साथ इन जगहों पर आते हैं.

26 अक्तूबर, 2013 को रात के यही कोई 10 बज रहे थे. इतनी रात हो जाने के बावजूद चेंबूर के चरई तालाब पर घूमनेफिरने वालों की कमी नहीं थी. थाना चेंबूर के सहायक पुलिस उपनिरीक्षक हनुमंत पाटिल सिपाहियों के साथ क्षेत्र की गश्त करते हुए चरई तालाब के किनारे पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक स्थान पर कुछ लोग इकट्ठा हैं. एक जगह पर उतने लोगों को एकत्र देख कर उन्हें लगा कोई गड़बड़ है. पता लगाने के लिए वह उन लोगों के पास पहुंच गए.

पुलिस वालों को देख कर भीड़ एक किनारे हो गई तो उन्होंने जो देखा, वह स्तब्ध करने वाला था. उस भीड़ के बीच प्लास्टिक की एक थैली में लाल कपड़ों में लिपटा हाथपैर और सिर विहीन एक इंसानी धड़ पड़ा था. देखने में वह किसी महिला का धड़ लग रहा था. हत्या का मामला था, इसलिए सहायक पुलिस उपनिरीक्षक हनुमंत पाटिल ने तालाब से धड़ बरामद होने की सूचना थानाप्रभारी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर को दे दी.

धड़ मिलने की सूचना मिलते ही वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर ने मामले की प्राथमिकी दर्ज कराने के साथ ही इस घटना की जानकारी उच्च अधिकारियों और कंट्रोल रूम को दे दी. इस के बाद वह स्वयं पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर, विजय दरेकर, शशिकांत कांबले, सहायक पुलिस निरीक्षक प्रदीप वाली, संजय भावकर, विजय शिंदे, पुलिस उप निरीक्षक वलीराम धंस और रवि मोहिते के साथ मौका ए वारदात पर पहुंच गए.

Suhas khanvilkar-kanta-murder-case

अभी सिर्फ धड़ ही मिला था. उस के हाथपैर और सिर का कुछ पता नहीं था. धड़ के इन अंगों की काफी तलाश की गई, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. इस से पुलिस को लगा कि हत्यारा कोई ऐरागैरा नहीं, काफी चालाक है. उस ने स्वयं को बचाने के लिए सुबूतों को मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उस ने मृतक की पहचान छिपाने के लिए उस के शव के टुकड़े कर के इधरउधर फेंक दिए थे.

वहां एकत्र लोगों से की गई पूछताछ में पता चला कि हाथपैर और सिर विहीन उस धड़ को तालाब से वहां घूमने आए एक युवक ने निकाला था. पुलिस ने जब उस युवक से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मन बहलाने के लिए अकसर मैं यहां आता रहता था. हमेशा की तरह आज मैं यहां आया तो थकान उतारने के लिए तालाब के पानी में जा कर खड़ा हो गया. तभी मुझे लगा कि मेरे पैरों के पास कोई भारी पार्सल जैसी चीज पड़ी है.

‘‘मैं ने ध्यान से देखा तो सचमुच वह प्लास्टिक की थैली में लिपटा एक बड़ा पार्सल था. उत्सुकतावश मैं ने उस पार्सल को पानी से बाहर निकाल कर देखा तो उस में से यह धड़ निकला. डर के मारे मैं चीख पड़ा. मेरी चीख सुन कर वहां टहल रहे लोग मेरे पास आ गए. थोड़ी ही देर में यहां भीड़ लग गई. उस के बाद यहां कुछ पुलिस वाले आ गए.’’

पूछताछ के बाद वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर ने धड़ का पंचनामा तैयार कर उसे डीएनए टेस्ट और पोस्टमार्टम के लिए घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह थाने आ कर साथियों के साथ विचारविमर्श करने लगे कि इस मामले को कैसे सुलझाया जाए. क्योंकि सिर्फ धड़ से लाश की शिनाख्त नहीं हो सकती थी और शिनाख्त के बिना जांच को आगे बढ़ाना संभव नहीं था.

थाना चेंबूर पुलिस इस मामले को ले कर विचारविमर्श कर ही रही थी कि अपर पुलिस आयुक्त कैसर खालिद, पुलिस उपायुक्त लखमी गौतम, सहायक पुलिस आयुक्त मिलिंद भिसे थाने आ पहुंचे. सारी स्थिति जानने के बाद ये अधिकारी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर चले गए.

उच्च अधिकारियों के दिशानिर्देश के आधार पर वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रहलाद पानसकर ने इस मामले की जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में पुलिस निरीक्षक विजय दरेकर, शशिकांत कांबले, सहायक पुलिस निरीक्षक प्रदीप वाली, विजय शिंदे, संजय भावकर, पुलिस उपनिरीक्षक वलीराम धंस, रवि मोहिते, सहायक पुलिस उपनिरीक्षक राजाराम ढिंगले, सिपाही अनिल घोरपड़े, नितिन सावंत, धर्मेंद्र ठाकुर और सुनील पाटिल को शामिल किया गया. इस टीम का नेतृत्व पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर को सौंपा गया.

पुलिस निरीक्षक सुभाष खानविलकर जांच को आगे बढ़ाने की रूपरेखा तैयार कर ही रहे थे कि मृतक महिला के हाथपैर और सिर भी बरामद हो गया. उस के हाथ और सिर चेंबूर ट्रांबे के जीटी तालाब में मिले थे तो पैर चेंबूर की सेल कालोनी से. पुलिस ने इन्हें भी कब्जे में ले कर अस्पताल भिजवा दिया था. बाद में डाक्टरों ने इस बात की पुष्टि कर दी थी कि ये अंग उसी मृतक महिला के धड़ के थे, जो चरई तालाब से बरामद हुआ था. इस तरह पुलिस का आधा सिर दर्द कम हो गया था.

अब उस मृतक महिला की शिनाख्त कराना था, क्योंकि बिना शिनाख्त के जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी. इसलिए शिनाख्त कराने के लिए पूरी टीम बड़ी सरगरमी से जुट गई. महानगर के उपनगरों के सभी पुलिस थानों से पुलिस टीम ने पता किया कि किसी थाने में किसी महिला के गायब होने की शिकायत तो नहीं दर्ज है. इस के अलावा मुंबई महानगर से निकलने वाले सभी दैनिक अखबारों में मृतक महिला का हुलिया और फोटो छपवा कर शिनाख्त की अपील की गई.

2 दिन बीत गए. इस बीच हत्यारों को पकड़ने की कौन कहे, थाना पुलिस लाश की शिनाख्त तक नहीं करा सकी थी. मुंबई की क्राइम ब्रांच भी इस मामले की जांच कर रही थी. लेकिन क्राइम ब्रांच के हाथ भी अभी तक कुछ नहीं लगा था. मृतका कौन थी, कहां रहती थी, उस का हत्यारा कौन था? यह सब अभी रहस्य के गर्भ में था.

मामले की जांच कर रही पुलिस टीम हत्यारों तक पहुंचने की हर संभव कोशिश कर रही थी. वह महानगर के अस्पतालों, डाक्टरों, कसाइयों और पेशेवर अपराधियों की भी कुंडली खंगाल रही थी. क्योंकि मृतका की हत्या कर के जिस सफाई से उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े किए गए थे, यह हर किसी के वश की बात नहीं थी. पुलिस को लग रहा था कि यह काम किसी पेशेवर का ही हो सकता है.

सिर्फ एक मोहब्बत : छंट गए गलतफहमी के बादल – भाग 3

फखरू चाचा की बातें सुन कर अमीर का दिल तड़प उठा. वह थके कदमों से अपने बेडरूम मे चला गया. वैसे तो शहरीना को घर छोड़े हुए एक महीने से ज्यादा हो गया था, मगर अमीर को लगता था कि उस का वजूद यहीं है. उस की चूडि़यों की खनक उसे अकसर सोते से जगा देती थी. मगर शहरीना वहां कहां होती थी. वह तड़प कर फिर सोने की कोशिश करने लगता था.

फखरू चाचा की बातों ने जब से उस की सोचों में दरार डाल दी थी, तब से वह शहरीना की याद में खोया रहने लगा था. अब वह औफिस आते जाते खोजती नजरों से भीड़ में उसे तलाशता हुआ उस की एक झलक देखने को बेकरार रहता था.

‘उफ, कहां चली गई हो शेरी, तुम क्यों मुझे तनहा छोड़ गई?’ अमीर ने कार की स्टीयरिंग पर हाथ मारते हुए बेबसी से सोचा. तभी अचानक उस की नजर सड़क किनारे खड़ी शहरीना पर पड़ी. वह गुलाबी कमीज, दुपट्टा और बाटल ग्रीन सलवार में किसी सवारी का इंतजार कर रही थी. कंधे पर लटका बैग और हाथ में पकड़ी फाइल उस के नौकरीपेशा होने की गवाह थी. अमीर तेजी से कार से उतर कर उस के पास जा पहुंचा, ‘‘शेरी…शेरी.’’

‘‘आप…आप यहां?’’ शहरीना उसे अपने सामने देख कर हैरत से सिर्फ इतना ही कह सकी.

‘‘हां मैं. चलो शेरी, मैं तुम्हें लेने आया हूं.’’ अमीर ने हाथ बढ़ाते हुए कहा.

‘‘लेकिन मुझे आप के साथ नहीं जाना. मुझे आप…’’ शहरीना उस का हाथ झटक कर आगे बढ़ गई.

‘‘मोहतरमा, मैं तुम्हारा शौहर हूं और जबरदस्ती तुम्हें अपने साथ ले जा सकता हूं.’’ कह कर अमीर ने उस की कलाई पकड़ कर कार का दरवाजा खोला और उसे अंदर धकेल दिया. इस के बाद खुद दूसरी तरफ से कार में बैठ कर गाड़ी स्टार्ट कर दी.

थोड़ी ही देर में अमीर अपने घर पहुंच गया और शहरीना का हाथ पकड़ कर घसीटते हुए बेडरूम में ले आया.

शहरीना ने तड़प कर कहा, ‘‘छोड़ो मेरा हाथ, मुझे आप की कोई बात नहीं सुननी.’’

‘‘मगर मुझे अपनी बात तुम्हें सुनानी है. देखो, आई एम वेरी सौरी.’’ अमीर ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं अपने उस दिन के रवैये से बहुत दुखी हूं.’’

‘‘क्या आप के इस तरह सौरी कह देने से सब कुछ ठीक हो जाएगा. आप ने तो मुझे अपनी ही नजरों में गिरा दिया है. आप ने मेरी मोहब्बत की तौहीन की है.’’ शहरीना बुरी तरह सिसक उठी.

‘‘मैं मानता हूं कि मुझ से गलती हुई है. लेकिन मेरे इस रवैये के पीछे जो वजह थी, तुम्हें उस का पता नहीं. मैं कभी औरत जात की बहुत इज्जत करता था. मैं ने एक सफेदपोश घराने में आंख खोली थी, जहां खुशहाली नहीं थी. हमारी छोटी सी उम्र में ही पहले अम्मी का, फिर अब्बू का इंतकाल हो गया. तब मेरे बाबा जान ने हम लोगों की परवरिश की. हमें किसी चीज की कमी नहीं होने दी.

‘‘जब उन की मौत हुई तो मैं 19 का और समीर भाई 21 साल के थे. हम लोगों का न तो कोई ददियाल था और न ही ननिहाल. अत: पेट भरने के लिए समीर भाई ने एक प्राइवेट फर्म में नौकरी कर ली. तब तक वे गे्रजुएशन कर चुके थे. वे नौकरी के साथसाथ पढ़ाई भी कर रहे थे, ताकि अच्छी नौकरी मिल सके.

‘‘जल्दी ही उन्होंने एमबीए कर लिया और उसी कंपनी में जूनियर एग्जीक्यूटिव के पद पर जा पहुंचे. अब तक हम लोग सैटल हो चुके थे. तब पड़ोस की आंटी रहमान के कहने पर समीर भाई शादी के लिए तैयार हो गए. मैं ने सोचा था कि समीर भाई की शादी के बाद घर में जो एक औरत की कमी है, वह दूर हो जाएगी. लेकिन अशमल भाभी शादी के बाद कुछ ही दिनों तक सामान्य रहीं. फिर तो आए दिन समीर भाई और अशमल भाभी में चखचख होने लगी.

‘‘भाभी दौलत को ज्यादा अहमियत देती थीं. भाई को उन की गरीबी के ताने देती थीं. जब वह अपनी सहेलियों की दौलत के किस्से व्यंग्य के साथ सुनाती थीं तो समीर भाई की गैरत पर सीधे तीर की तरह लगता था. वह भाई को रिश्वत लेने के लिए भी उकसाती थीं, मगर उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया. जल्दी ही वह गर्भवती हो गई. फिर भाभी ने सनी की पैदाइश के बाद भाई से तलाक देने को कहा, क्योंकि उन्होंने एक दौलतमंद आसामी को पसंद कर लिया था.

भाभी के इस रवैये से हम दोनों भाई बहुत हर्ट हुए. लेकिन उन की धमकियों और बदनामी के डर से भाई ने उन्हें तलाक दे दिया. वह मासूम सनी को हमारी गोद में डाल कर चली गईं. समीर भाई पत्थर की तरह हो गए. सनी की देखभाल पहले भी फखरू चाचा की बाजी करती थीं, बाद में भी वही करने लगीं. फिर समीर भाई का मन यहां नहीं लगा. वह सनी को हम लोगों के पास छोड़ कर कनाडा चले गए. ये तमाम हालात मेरे अंदर के मर्द को औरत से नफरत करने को मजबूर करते चले गए.’’

अमीर लगातार बोलता जा रहा था. उस की बातें सुन कर शहरीना भी बिखर गई थी. अमीर ने आगे कहा, ‘‘बस शेरी. फिर मैं ने तय कर लिया कि मुझे खूब दौलत कमानी है. मैं ने अपनी पढ़ाई पूरी कर के एक कंपनी में नौकरी कर ली और उस कंपनी के कुछ शेयर भी खरीद लिए. मैं ने अपना मकान बेच कर एक फ्लैट खरीदा और बाकी पैसे से शेयर खरीदे.

फिर एक दिन ऐसा आया कि मैं उस कंपनी के शेयर होल्डरों में सब से ऊपर पहुंच गया और कंपनी मेरे हाथ में आ गई. वक्त गुजरता रहा. फखरू चाचा की बीवी की मौत के बाद सनी को परवरिश का मसला सामने आया तो मैं ने तुम से शादी कर ली. लेकिन अशमल भाभी जैसी औरत को मैं देख चुका था, इसलिए…’’

‘‘इसलिए आप मेरा भी खुदगर्ज और लालची औरतों में शुमार करते रहे.’’ शहरीना की रुआंसी आवाज ने अमीर को तड़पा दिया.

‘‘आई एम सौरी. मैं कह रहा हूं ना कि मैं गलती पर था. लेकिन अगर तुम मेरी जगह होतीं तो तुम भी यही करतीं.’’ अमीर ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘शेरी, फखरू चाचा कह रहे थे कि तुम मुझ से बहुत मोहब्बत करती हो. प्लीज, उस मोहब्बत की खातिर ही मुझे माफ कर दो. मेरा वादा है कि तुम जो भी मांगोगी, वह दूंगा.’’

शहरीना ने तड़प कर कहा, ‘‘मुझे आप से पहले भी कुछ नहीं चाहिए था. सिर्फ एक मुहब्बत की खातिर ही तो…’’ शहरीना की आवाज भर्रा गई.

‘‘सिर्फ एक मोहब्बत?’’ अमीर ने उस की तरफ देखा और पूछा. मगर फिर शहरीना की हैरान, मासूम, हिरनी जैसी आंखों और खामोश लबों को देखते हुए शरारती अंदाज में बोला, ‘‘मैं तुम्हें इतनी मोहब्बत दूंगा कि तुम्हारा दामन तंग पड़ जाएगा.’’ फिर वह उस के करीब जा कर उस पर झुकते हुए बोला, ‘‘लेकिन बदले में तुम्हें एक काम करना होगा.’’

‘‘क्या?’’ इस मोहब्बत पर शहरीना ने धड़कते लहजे में पूछा.

‘‘तुम्हें हमारी फेमिली को पूरा करना होगा. बोलो, मंजूर है.’’ अमीर उस के कान के करीब फुसफुसाते हुए बोला.

यह सुन कर शर्म से सुर्ख चेहरा लिए शहरीना ने अमीर के सीने में अपना मुंह छिपा लिया. गलतफहमी के बादल छंट गए थे और रास्ते रोशन हो गए थे. अब सब कुछ साफसाफ नजर आ रहा था बहुत दूर तक.

प्रेमिका पर विश्वास का उल्टा नतीजा

पहली ही मुलाकात में रश्मि और मनोज एकदूसरे के प्रति आकर्षित हुए तो चंद दिनों में ही उन के  दिलों में चाहत पैदा हो गई थी. यही वजह थी कि दोस्ती के बीच प्यार के खुशनुमा रंग कब भर गए, उन्हें पता नहीं चला था. मनोज और रश्मि एक ही फैक्ट्री में एकसाथ काम करते थे. दिनभर साथ रहने से भी उन का मन नहीं भरता था, इसलिए फैक्ट्री के बाहर भी दोनों मिलने लगे थे. वैसे तो दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे. लेकिन उन के घरों के बीच काफी दूरी थी, इसलिए रश्मि से मिलने के लिए मनोज को बहाने से उस के घर आना पड़ता था.

मनोज जब भी रश्मि के घर आता, घंटों बैठा बातचीत करता रहता. इसी आनेजाने में मनोज की दोस्ती रश्मि के पति सोनू सोनकर से भी हो गई थी. रश्मि की नजदीकी पाने के लिए मनोज अपनी कमाई का ज्यादा हिस्सा सोनू पर लुटाने लगा था. इसी से सोनू मनोज को अपना अच्छा दोस्त समझने लगा था.

सोनू से दोस्ती होने के बाद मनोज रोज ही रश्मि के घर जाने लगा. देर रात तक दोनों साथ बैठ कर खातेपीते. उस के बाद सोनू मनोज को अपने घर पर ही रुक जाने के लिए कह देता. सोनू मनोज को अपना अच्छा दोस्त मानता था, इसलिए उसे काफी महत्त्व देता था.

मनोज सोनू के साथ उठताबैठता है और खातापीता है, जब इस बात की जानकारी उस के बड़े भाई विनोद को हुई तो उस ने मनोज को रोका. लेकिन मनोज नहीं माना. तब उस ने मनोज को घर से भगा दिया. जब इस बात की जानकारी सोनू और रश्मि को हुई तो सहानुभूति दिखाते हुए सोनू ने उसे अपना छोटा भाई मान कर अपने साथ रख लिया. इस की एक वजह यह भी थी कि मनोज सोनू के लिए दुधारू गाय की तरह था.

मनोज के साथ रहने से रश्मि बहुत खुश हुई थी. फिर तो कुछ ही दिनों में मनोज और रश्मि के बीच शारीरिक संबंध बन गए. रश्मि से शारीरिक सुख पा कर मनोज उस का दीवाना हो गया. हर पल वह रश्मि के आसपास छाया की भांति मंडराता रहता. यही सब देख कर पड़ोसियों को उन पर शक हुआ तो लोग आपस में चर्चा करने लगे.

लोगों की चिंता किए बगैर मनोज और रश्मि एकदूसरे में इस तरह डूबे रहे कि उन्हें जैसे किसी बात की परवाह ही नहीं थी. इस प्रेम कहानी का अंत क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा इस कहानी के पात्रों के बारे में जान लेते हैं.

रश्मि कानपुर के जूही के रतूपुरवा की रहने वाली थी. 18 साल की होते ही वह हवा में उड़ने लगी. इस उम्र की लड़कियों की तरह रश्मि भी भावी जीवन के युवराज के बारे में तरहतरह की कल्पनाएं संजोने लगी. उस का मन करता कि एक सुंदर और जोशीला युवराज उसे पलकों पर बिठा कर अपने घर ले जाए और खूब प्यार करे. इन्हीं कल्पनाओं के बीच कानपुर के ही बादशाही नाका के रहने वाले बेदी सोनकर पर उस की नजर पड़ी.

गठीले बदन का खूबसूरत बेदी उस के पड़ोसी के यहां आताजाता था. इसी आनेजाने में रश्मि की आंख लड़ी तो पहली ही नजर में वह उसे अपना दिल दे बैठी. वही क्यों, बेदी भी उस पर कुछ इस तरह फिदा हुआ कि वह भी उस की एक झलक पाने के लिए उस के घर के चक्कर लगाने लगा. चाहत दोनों ओर थी, इसलिए दोनों एकदूसरे की ओर तेजी से बढ़ने लगे.

उस समय रश्मि अल्हड़ उम्र के दौर से गुजर रही थी. इसलिए दिमाग के बजाए दिल की भावनाओं के प्रबल प्रवाह में तेजी से बहती गई. यह भी सच है कि प्यार छिपता नहीं. मोहल्ले में रश्मि और बेदी के प्यार के भी चर्चे होने लगे. जैसे ही इस बात की खबर रश्मि के घर वालों को लगी, उन्होंने उस का घर से निकलना बंद कर दिया. लेकिन वह बेदी के प्यार में पागल हो चुकी थी, इसलिए वह बगावत पर उतर आई और घर वालों के मना करने के बावजूद वह बेदी से मिलतीजुलती रही.

मातापिता ने बहुत समझाया कि बेदी शहर का कुख्यात बदमाश है, इसलिए उस से मिलनाजुलना ठीक नहीं है. उस की वजह से उस की जिंदगी बरबाद हो सकती है, लेकिन बेदी के प्यार में अंधी रश्मि बेदी से लगातार मिलतीजुलती रही.

बेदी दूसरों के लिए भले ही कितना भी बड़ा बदमाश रहा हो, रश्मि के लिए वह बहुत ही सीधा, सरल और भावुक युवक था. वह देखने में काफी हैंडसम था, इसलिए रश्मि उस पर जान छिड़कती थी. रश्मि को बेकाबू होते देख उस के मातापिता उस के विवाह के लिए लड़का ढूंढ़ने लगे.

जब इस बात की जानकारी रश्मि और बेदी को हुई तो साथ रहने के लिए उन्होंने एक योजना बना डाली. फिर उसी योजना के तहत एक दिन रश्मि चुपके से मातापिता का घर छोड़ कर बेदी के घर रहने आ गई और बिना विवाह के ही उस के साथ पत्नी की तरह रहने लगी.

बेदी से रश्मि को 2 बच्चे पैदा हुए. दोनों की जिंदगी आराम से कट रही थी. लेकिन सब्जी मंडी में जबरन वसूली के विवाद में 2003 में बेदी की हत्या हो गई. बेदी की मौत के बाद रश्मि की जिंदगी में अंधेरा छा गया. पति की मौत के बाद भी रश्मि अपने दोनों बच्चों के साथ बेदी के मातापिता के साथ रहती रही.

बेदी की मौत के करीब 2 सालों के बाद बेदी का चाचा श्यामप्रकाश उर्फ सोनू उस के घर आया तो वह रश्मि को देख कर उस पर लट्टू हो गया. इस के बाद किसी न किसी बहाने वह उस से मिलने उस के घर आने लगा. सोनू रश्मि के उम्र का ही था और देखने में भी स्वस्थ और सुंदर था, इसलिए रश्मि को भी वह भा गया.

यही वजह थी कि जब सोनू ने उस से अपने प्यार का इजहार किया तो उस के प्यार को स्वीकार कर के रश्मि बेदी के दोनों बचों को छोड़ कर सोनू के साथ आर्य समाज मंदिर में सन् 2008 में शादी कर ली. शादी के बाद कानपुर में ही वह सोनू के साथ रहने लगी. साल भर बाद ही वह सोनू के बेटे की मां बन गई. सोनू के साथ रहते हुए ही रश्मि की मुलाकात साथ काम करने वाले मनोज से हुई तो वह उसे दिल दे बैठी.

मनोज को जब पता चला कि रश्मि उसी की जाति की है तो वह उसे और अधिक प्यार करने लगा. यही नहीं, वह उसे पत्नी का दर्जा देने को भी तैयार हो गया. इस के बाद उस ने यह भी कहा कि जब उस के मातापिता और भाई को पता चलेगा कि उस ने अपने ही जाति के लड़के से शादी कर ली है तो वे भी उसे अपना लेंगे.

मनोज के इस प्रस्ताव पर रश्मि गंभीर हो गई, क्योंकि वह सोनू के साथ खुश नहीं थी. आखिर काफी सोचविचार कर रश्मि एक बार फिर मनोज के साथ भाग कर जिंदगी बसर करने का सपना देखने लगी. इस के बाद वह मनोज का कुछ ज्यादा ही खयाल रखने लगी. जब इस ओर सोनू का ध्यान गया तो उसे रश्मि और मनोज पर शक होने लगा.

सोनू भी अपराधी किस्म का आदमी था. सच्चाई का पता लगाने के लिए उस ने एक योजना बनाई. फिर उसी योजना के तहत एक दिन उस ने रश्मि से कहा कि वह अपने घर सीतापुर जा रहा है. यह कह कर वह 2 बजे दोपहर को घर से निकला, लेकिन वह सीतापुर गया नहीं. शहर में ही इधरउधर घूमता रहा. रात 11 बजे वह वापस आया और अपने कमरे के दरवाजे की झिर्री पर कान लगा कर अंदर की आहट लेने लगा. अंदर से आने वाली आवाजों से उस ने समझ लिया कि उस की योजना सफल हो गई है.

फिर तो वह जोर से चीखा, ‘‘जल्दी दरवाजा खोलो, अंदर क्या हो रहा है, मैं जान गया हूं.’’

सोनू की आवाज सुन कर कमरे के अंदर तेज हलचल हुई. उस के बाद एकदम से सन्नाटा पसर गया. लेकिन दरवाजा नहीं खुला.

सोनू एक बार फिर दरवाजा खुलवाने के लिए चिल्लाया, ‘‘दरवाजा खोल रही है या तोड़ डालूं?’’

रश्मि के दरवाजा खोलते ही सोनू अंदर आ गया. बल्ब जलाने पर दोनों के झुके सिर देख कर वह सारा माजरा समझ गया. उस ने गालियां देते हुए मनोज की लातघूसों से पिटाई शुरू कर दी.

इस के बाद उसे कमरे से भगा कर रश्मि की जम कर पिटाई की. मारपीट कर उस ने रश्मि से मनोज और उस के अवैध संबंधों की सारी सच्चाई उगलवा ली. जब रश्मि ने उसे बताया कि मनोज उसे भगा कर ले जाने वाला था तो सोनू को उस पर इतना गुस्सा आया कि उस ने मनोज की हत्या करने का निश्चय कर लिया.

सोनू ने रश्मि से कहा कि कल रात वह मनोज को यह कह कर बुलाए कि वह शराब के नशे में गुमराह हो गया था. सुबह समझाने पर उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है, इसलिए वह माफी मांग कर पहले की तरह अपने साथ रखना चाहता है. क्योंकि मनोज ने दोस्ती के नाम पर उसे जो धोखा दिया था, उस की हत्या कर के वह उसे उस की सजा देना चाहता था. रश्मि को उस ने धमकाते हुए कहा कि अगर उस ने ऐसा नहीं किया तो वह उस के प्रेमी मनोज के साथ उस की भी हत्या कर के हमेशा के लिए कानपुर छोड़ कर चला जाएगा.

रश्मि असमंजस में फंस गई थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

चूंकि रश्मि मनोज को दिल से चाहती थी, इसलिए अगले दिन फैक्ट्री में मनोज उसे मिला तो उस ने उसे सोनू की साजिश के बारे में बता कर कहीं बाहर चले जाने के लिए कह दिया. उस ने मनोज से यह भी कहा था कि सोनू सीतापुर में एक पीएसी कंपनी कमांडर की हत्या कर के यहां छिप कर रह रहा है, इसलिए ऐसे आदमी पर भरोसा नहीं किया जा सकता. वह उसे ढूंढ़ कर निश्चित उस की हत्या कर देगा.

रश्मि की बात सुन कर मनोज डर गया और उसी समय वह कानपुर छोड़ कर जिला फतेहपुर स्थित अपने गांव चला गया. शाम को रश्मि अकेली घर आई तो सोनू ने पूछा, ‘‘मनोज कहां है?’’

‘‘वह उसी रात अपने गांव भाग गया था.’’ रश्मि ने कहा.

रश्मि की बात पर सोनू को विश्वास नहीं हुआ. उस ने रश्मि को गालियां देते हुए कहा, ‘‘वह खुद नहीं भागा, तूने उसे भगाया है. तुझ से रहा नहीं गया होगा. तू ने मेरी योजना के बारे में बता कर उसे भगा दिया होगा.’’

सोनू को रश्मि की इस धोखेबाजी से उस से भी नफरत हो गई. अब वह रोज शराब पी कर उस की पिटाई करने लगा. रश्मि को पिटाई करते हुए वह कहता भी था, ‘‘जब तक तू मनोज को नहीं बुलाती और मैं उस की हत्या नहीं कर देता, तब तक तुझे इसी तरह नियमित मारता पीटता रहूंगा.’’

रोजरोज की मारपीट से तंग आ कर आखिर एक दिन रश्मि ने अपने सहकर्मी के फोन से मनोज को फोन कर के कहा कि सोनू उस पर बहुत अत्याचार कर रहा है. इसलिए अब वह उस के साथ रहना नहीं चाहती और भाग कर उस के पास आ रही है. अब वह उसी के साथ उस की बन कर रहना चाहती है.

मनोज ने रश्मि को समझाते हुए कहा, ‘‘मैं यहां गांव में रह रहा हूं. यहां किसी तरह 2 जून की रोटी मिल जाती है, बाकी यहां कमाई का कोई जरिया नहीं है. इसलिए तुम थोड़ा इंतजार करो. मैं कोई व्यवस्था कर के तुम्हें जल्दी ही यहां बुला लूंगा. उस के बाद तुम्हें अपनी पत्नी बना कर साथ रखूंगा.’’

मनोज की इन बातों से रश्मि का कलेजा बैठ गया. वह जिंदगी के ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जहां उस के लिए चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा था. काफी सोचविचार कर उस ने सोनू के साथ ही जिंदगी गुजारने का इरादा बना लिया. फिर उस ने सोनू से माफी मांगी और भविष्य में किसी तरह की कोई गलती न करने की कसम खाई. लेकिन सोनू मनोज की हत्या से कम पर उसे माफ करने को तैयार नहीं था.

जिंदगी और भविष्य के लिए रश्मि को सोनू की जिद के आगे झुकना पड़ा. वह मनोज की हत्या की साजिश में पति का साथ देने को तैयार हो गई. इस के बाद योजना के अनुसार सोनू ने नटवनटोला, किदवईनगर का अपना वह किराए का कमरा खाली कर के जूही गढ़ा में सुरजा के मकान में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. रश्मि मनोज को फोन कर के बुलाने लगी. लेकिन मनोज कानपुर आने को तैयार नहीं था.

रश्मि के बारबार आग्रह पर मनोज को जब रश्मि से मिलने वाले सुख की याद आई तो 29 जनवरी को रश्मि से मिलने के लिए वह कानपुर आ गया. सोनू और रश्मि ने पहले की ही तरह मनोज को हाथोंहाथ लिया. दोनों उस से इस तरह हंसहंस कर बातें कर रहे कि उसे लगा सोनू ने सचमुच उसे माफ कर दिया है.

मनोज रश्मि और सोनू के जाल में पूरी तरह फंस गया. रात 8 बजे के आसपास सोनू उसे शराब के ठेके पर ले गया, जहां दोनों ने थोड़ीथोड़ी शराब पी. इस के बाद 2 बोतल ले कर वह घर आ गया. उस ने रश्मि से कहा, ‘‘आज बढि़या खाना बनाओ, बहुत दिनों बाद मेरा दोस्त आया है. आज देर रात तक हम दोनों की महफिल जमेगी.’’

रश्मि को खाना बनातेबनाते रात के 11 बज गए. इस के बाद उस ने सोनू और मनोज के लिए खाना परोसा. सोनू ने होशियारी से मनोज को बड़ेबड़े पैग बना कर ज्यादा शराब पिला दी थी. ज्यादा नशा होने की वजह से मनोज खाना खा कर अपने लिए लगे बिस्तर पर लेटते ही बेसुध हो कर सो गया.

सोनू को उस के सोने का इंतजार था. रात साढ़े 12 बजे उस ने रश्मि को अपने पास बुला कर मनोज के सिर के ऊपर से रजाई हटाने को कहा. रश्मि ने जैसे ही मनोज के सिर से रजाई हटाई, सोनू गड़ासे से उस के सिर और गरदन पर लगातार वार करने लगा.

मनोज ने अपने ऊपर हुए इस प्राणघातक हमले से बचने की कोशिश तो की, लेकिन रश्मि उस के सिर के बाल पकड़ कर नीचे दबाए थी, इसलिए वह उठ नहीं सका. लगातार वार होने से मनोज की गरदन कट गई तो वह मर गया. उस के मरते ही सोनू ने उस के हाथपैर समेट कर रस्सी से बांध दिए, ताकि वह अकड़ न जाए, क्योंकि अकड़े हुए शव को घर से बाहर ले जाने में काफी परेशानी होती.

मनोज की हत्या कर उस की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में पूरी रात सोनू और रश्मि सोचते विचारते रहे. सोनू ने सोचा कि अगर लाश को रजाई में लपेट कर दिन में रिक्शे से बाहर ले जाया जाए तो कोई शक नहीं करेगा.

यही सोच कर उस ने मनोज की लाश को रजाई में लपेटा और रस्सी से बांध कर रजाई भराने की बात कह कर एक रिक्शा बुलाया.  रजाई में बंधी मनोज की लाश उस ने रिक्शे के पायदान पर रखा और रश्मि तथा 5 साल के बेटे के साथ रिक्शे पर बैठ कर वह स्वदेशी कौटन मिल की ओर चल पड़ा.

स्वदेशी कौटन मिल के पास सड़क के किनारे की एक चाय की दुकान पर कुछ लोगों ने रिक्शे पर रखी उस रजाई को देखा तो उन्हें शक हुआ. उन्होंने रिक्शा रोक कर सोनू से उस के बारे में पूछा तो वह सकपका गया.

एकदम से वह जवाब नहीं दे सका. काफी देर बाद उस ने कहा कि इसे वह भरवाने ले जा रहा है. उन लोगों में से किसी ने कहा, ‘‘इस तरह रस्सी से बांध कर रुई तो नहीं ले जाई जाती, इस में जरूर कुछ और है.’’

यह कह कर उस आदमी ने रजाई के अंदर हाथ डाला तो एकदम से चिल्लाया, ‘‘अरे यह रुई नहीं, किसी की लाश है.’’

सभी सोनू को पकड़ कर लातघूसों से पिटाई करने लगे. उसी बीच मौका पा कर रश्मि अपने बेटे को ले कर भाग गई. किसी ने इस बात की सूचना थाना जूही पुलिस को दी तो पुलिस ने मौके पर आ कर लाश और सोनू को कब्जे में ले लिया. थाना जूही पुलिस ने मौके की काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए हैलेट अस्पताल भिजवा दी. उस के बाद थाने ला कर सोनू से पूछताछ की गई. सोनू ने मनोज की हत्या का अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी कहानी पुलिस को सुना दी, जिसे आप पहले ही पढ़ चुके हैं.

पूछताछ के बाद सबइंस्पेक्टर आमोद कुमार ने सोनू की निशानदेही पर उस के कमरे से शराब की 2 खाली बोतलें, खून से सनी साड़ी, वह गड़ासा, जिस से मनोज की हत्या की गई थी और मनोज का मोबाइल फोन बरामद कर लिया. इस के बाद उन्होंने उस के खिलाफ मनोज की हत्या का मुकदमा दर्ज कर 30 जनवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

अगले दिन पुलिस ने रश्मि को भी उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह कमरे पर अपने और बच्चे के कपड़े लेने आई थी. पूछताछ कर के पुलिस ने उसे भी अदालत में पेश किया, जहां से उसे भी जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सिर्फ एक मोहब्बत : छंट गए गलतफहमी के बादल – भाग 2

जिस वक्त अमीर कमरे में दाखिल हुआ, शहरीना सोफे से पीठ टिकाए खुद में मुसकरा रही थी. वह अपने खयालों में इतनी खोई थी कि अमीर के आने का पता भी नहीं चला. जब अमीर उस के सामने आ कर खड़ा हो गया तो वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘अमीर… आप… आप कब आए?’’

शहरीना के चेहरे पर शर्म की एक लहर आ कर गुजर गई.

‘‘उस वक्त जब तुम किसी खूबसूरत ख्याल में खोई हुई थीं.’’ अमीर ने कोट उतार कर तीखे अंदाज में कहा, ‘‘क्या मैं पूछ सकता हूं कि तुम किस ख्याल में डूबी हुई थीं कि तुम्हें न तो अपनी खबर थी और न मेरे आने की.’’

‘‘वह अमीर, मैं सोच रही थी कि हमारी शादी हुए एक साल हो गया है और मैं चाहती हूं कि…’’ शहरीना झिझक कर रुक गई, फिर कड़ी हिम्मत कर के बोली, ‘‘मेरा मतलब है कि मैं आप से मोहब्बत करती हूं और …और चाहती हूं कि… कि… हमें अपनी फेमिली पूरी कर लेनी चाहिए.’’ शर्मिंदगी ओढ़ कर आखिर शहरीना ने अपनी बात कह ही दी.

पहले तो अमीर की कुछ समझ में ही नहीं आया, लेकिन दूसरे ही पल वह उस की बात का मतलब समझ गया. उस के माथे पर लकीरें उभर आईं. वह तीखे लहजे में बोला, ‘‘हमारी फेमिली आफ्टर आल पूरी है.’’

‘‘नहीं अमीर, मेरा मतलब है कि हमारा अपना बच्चा…’’

‘‘आई एम सौरी शेरी. मैं इस बारे में सोच भी नहीं सकता.’’ अमीर उस के चेहरे पर नजरें जमा कर बोला.

‘‘लेकिन अमीर, क्यों… मैं…’’ शहरीना के स्वर में हल्का सा दर्द था.

‘‘वह इसलिए कि मुझ से सनी का दुख बरदाश्त नहीं होगा.’’ अपने सीने पर रखे शहरीना के हाथों को झटक कर अमीर उठ खड़ा हुआ.

‘‘जी… मैं…’’ शहरीना उस की बात को ले कर सोच में पड़ गई.

‘‘शटअप… और आगे इस मसले पर मुझ से बात मत करना.’’ कहते हुए अमीर गुस्से से उबलता बाहर निकल गया.

शहरीना अंदर ही अंदर कुढ़ती बेड पर गिर पड़ी. पिछले कुछ महीने से वह अपनी इस इच्छा को दबाती चली आ रही थी. आज दिल के हाथों मजबूर हो कर कहा भी तो क्या मिला, सिवाय तड़प के.

अमीर के इस व्यवहार ने उसे बुरी तरह तोड़ दिया. और फिर इसी वजह से छोटेमोटे झगड़े रोज की बात बन गए. दोनों के बीच दूरी बढ़ने लगी. उस दिन तो हद ही हो गई. बात बहुत मामूली थी, मगर अमीर ने उसे इतना तूल दिया कि वह लड़ाईझगड़े तक जा पहुंची. शहरीना ने धीरे से कहा, ‘‘अमीर, प्लीज बात को इतना मत बढ़ाएं कि…’’

‘‘कि… क्या कर लोगी तुम? यह घर छोड़ कर चली जाओगी तो चली जाओ. मगर नहीं, तुम जैसी ऐशोआराम पर मरने वाली औरतें इतनी आसानी से ऐसी जिंदगी छोड़ कर कहां जा सकती हैं? तुम भी मुझे छोड़ कर भला कहां जा सकती हो? तुम ने तो इस ऐशोइशरत और दौलत के लिए ही मुझ से शादी की थी.’’ अमीर ने व्यंग्य से कहा.

शहरीना मुंह पर हाथ रखे फटी आंखों से अमीर को ताकते हुए उस की बातें सुनती रही. गुस्से से सुर्ख चेहरा लिए कुछ दूरी पर खड़ा अमीर उसे बदला हुआ लग रहा था. जिसे वह जानती थी, आज वह अमीर नहीं था. एक साल का मोहब्बत भरा साथ देने वाला अमीर उसे ही खुदगर्ज और दौलत का भूखा होने का ताना दे रहा था. जिस के लिए उस का पोरपोर मोहब्बत में डूबा था, वही उस की मोहब्बत की तौहीन कर के चला गया था.

शाम को अमीर जब घर में दाखिल हुआ तो पोर्च से लाउंज और लाउंज से बेडरूम तक पूरा घर खामोशी में डूबा था. अमीर को जहां आश्चर्य हुआ, वहीं उसे सुबह की घटना याद आ गई. कशमकश में डूबा वह अपने बेडरूम में दाखिल हुआ. शहरीना वहां भी नहीं थी. पर हां, उस का लिखा एक खत मेज पर जरूर रखा था. उस ने खत उठा लिया और जल्दी जल्दी पढ़ने लगा, उस में लिखा था—

‘‘अमीर औसाफ,

मैं आप का घर छोड़ कर जा रही हूं. कहां, यह फिलहाल मैं भी नहीं जानती. अपने भाइयों के दरवाजे पर जाना मुझे मंजूर नहीं, क्योंकि उन की नजरों में आप का एक मुकाम है. आप का मुकाम तो मेरे में दिल में भी था, लेकिन आप की बातों ने आप का वह मुकाम मेरी नजरों में गिरा दिया. आप ने यहां तक कह दिया कि तुम भला मुझे छोड़ कर कैसे जा सकती हो और यह कि मैं ने तुम से दौलत की वजह से शादी की थी. मैं पिछले एक साल से आप का तीखा रवैया इसलिए बरदाश्त करती आ रही थी कि मैं आप से मोहब्बत करती हूं. लेकिन अब बरदाश्त नहीं हुआ तो आप का घर छोड़ने पर मजबूर हो गई.

‘‘कहते हैं कि जब मोहब्बत दोतरफा होती है, तभी अच्छी होती है. एकतरफा मोहब्बत दुख ही देती है. आप अब तक मेरे मोहब्बत भरे रवैये और जज्बे को दौलत की तराजू में तौलते रहे हैं. इस से ज्यादा मेरी मोहब्बत की तौहीन और क्या होगी. मुझे आप की दौलत और ऐशोइशरत से कोई सरोकार नहीं है. इसलिए आप के द्वारा दिए गए सभी तोहफे और जेवर ‘लौकर’ में छोड़ कर जा रही हूं.              फकत-शहरीना’’

खत पढ़ कर अमीर के चेहरे पर मुसकराहट फैल गई. वह व्यंग्य भरे लहजे में कहने लगा, ‘वक्ती जज्बात में बह कर तुम ऐशोइशरत और आराम छोड़ कर चली तो गईं, मगर देखना, तुम्हें बहुत जल्द वापस लौटना पड़ेगा.’

कुछ देर बाद वह डाइनिंग टेबल पर बैठा सनी से पूछ रहा था, ‘‘सनी बेटा. तुम ने खाना खा लिया?’’

‘‘नहीं अंकल.’’

‘‘क्यों बेटा, अब तो काफी समय हो गया है? तुम ने अब तक खाना क्यों नहीं खाया?’’ अमीर ने मोहब्बत से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा.

‘‘आंटी आज घर पर नहीं हैं ना. मुझे तो खाना वही खिलाती थीं.’’

‘‘अच्छा ठीक है. चलो, आज आप के अंकल आप को खाना खिलाएंगे.’’

‘‘मगर अंकल, वह आंटी…’’ 8 वर्षीय सनी ने कुछ कहना चाहा.

‘‘आंटी को छोड़ो और तुम खाना खाओ.’’

शहरीना के चले जाने से जहां सनी की देखरेख नहीं हो पा रही थी, वहीं पूरा घर अस्तव्यस्त हो गया था. ठीक से साफसफाई भी नहीं हो रही थी. नौकर नौकरानी टाइम पास करते रहते थे. बेडरूम, बाथरूम, लाउंज आदि अस्तव्यस्त और धूलगर्द से अटे रहते थे. यह सब देख कर अमीर चिल्लाने लगता. सनी की ड्रेस भी मैली रहती थी. कभीकभी वह उसी स्थिति में स्कूल चला जाता था तो उसे डांट खानी पड़ती थी.

यह सब बातें जब अमीर को मालूम पड़तीं तो वह नौकरों को डांटने लगता. लेकिन उन पर कोई भी असर नहीं होता था. एक दिन सनी ने अमीर से कहा, ‘‘अंकल ,मेरी शर्ट नहीं मिल रही है. पता नहीं कहां चली गई. आंटी सारी चीजें संभाल कर रखती थीं. मैं होमवर्क भी नहीं कर पाता हूं और रोज स्कूल भी देर से पहुंचता हूं. अब आप जल्दी से खुद जा कर आंटी को ले आएं, तब मैडम मुझे फिर से अच्छा बच्चा कहने लगेंगी.’’

‘‘हां, अमीर बेटा. सनी ठीक कह रहा है. आप शेरी बेटी को वापस ले आओ. वह बहुत अच्छी बच्ची है.’’ फखरू ने कहा. वह उस वक्त से उस के साथ रह रहे थे, जब अमीर के पिता औसाफ अहमद जिंदा थे. फखरू चाचा नौकर कम, बल्कि घर के सदस्य की तरह थे. औसाफ अहमद की मृत्यु के बाद उन्होंने और उन की बाजी ने अमीर और समीर का हर तरह से खयाल रखा था. यही नहीं, सनी की पैदाइश के बाद जब समीर की बीवी सनी को समीर की गोद में डाल कर खुद चलती बनी थी तो भी फखरू चाचा और उन की बीवी ने उस नन्हे बच्चे की देखभाल की थी.

‘‘लेकिन चाचा…’’ अमीर ने तड़प कर कुछ कहना चाहा.

‘‘नहीं बेटा. गलती तुम्हारी है. हर औरत तुम्हारी भाभी अशमल की तरह नहीं होती. शेरी जैसी नेक लड़की का अशमल से मिलान करना उस की तौहीन है. शेरी आप से बहुत मोहब्बत करती थी. सनी का बहुत खयाल रखती थी. घर में नौकर चाकर होने के बावजूद वह आप का एकएक काम खुद करती थी. बेटा, शेरी बेटी की फितरत मैं अच्छी तरह जानता हूं. उसे दौलत का कोई लालच नहीं है. वह तो बस आप की मोहब्बत के सहारे जीती थी. मगर आप ने उस पर शक कर के अच्छा नहीं किया.’’ फखरू चाचा ने जो कुछ अनुभव किया और देखा था, सचसच कह दिया.