बारिश वाला प्यार : कौन थी वो? – भाग 2

अगली सुबह राहुल कोर्ट की इजाजत ले कर पहुंच गया थाने और पुलिस हिरासत में लाई गई उस महिला से बात करने लगा, जिसे सब सेठ की बीवी समझ रहे थे. इधर सेठ की हत्या की खबर उस के घर तक पहुंची तो सब के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. घर में रोनाधोना शुरू हो गया. सभी इस बात पर ताज्जुब कर रहे थे कि हत्यारा कोई और नहीं सेठ की बीवी है. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था यह सब क्या मामला है.

उधर राहुल ने थाने में उस महिला से बात शुरू की, “मैडमजी, सब से पहले मैं ये जानना चाहूंगा कि आप कौन हैं?’‘

“क्यों, आप ने सुना नहीं, जो सब कह रहे हैं?’‘ वह महिला बोली.

“मैं ने सब सुना, लेकिन मैं जानता हूं आप वो नहीं है. और यही जानने आया हूं कि आप कौन हैं और किस बात का बदला लिया आप ने अवस्थीजी से?’‘

“क्यों देवता नहीं कहेंगे आप भी, सब लोग तो इसी नाम से पुकारते हैं. और आप केवल अवस्थीजी?’‘

“सही कहा आप ने, पहली बात आप उन की पत्नी नहीं, दूसरी आप ने अगर उन का खून किया तो किसी बात का बदला ही लिया होगा और बदला कभी देवता से नहीं लिया जाता, आप बताएं असलियत क्या है?’‘

उस महिला ने अपना नाम शीतल बताया. इस के बाद उस ने राहुल को बताया कि मुझे नहीं मालूम मुझे कब कौन मुंबई के शेल्टर होम (जहां बेघर, बेसहारा लोग आसरा पाते हैं) में छोड़ गया. जब से होश संभाला, अपने आप को वहीं पाया. वहां और भी बहुत सी लड़कियां थीं.

जब मैं छोटी थी तो अकसर औफिस से लड़कियों के रोने, चीखनेचिल्लाने की आवाजें आतीं और साथ में ये भी कोई कहता कि चुप कर हराम की औलाद, वरना यहीं खत्म कर दूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा. तेरा कोई आगेपीछे भी नहीं, जो तुझे बैठ कर रोएगा.

मैं तब इन बातों को नहीं समझ पाती थी, जब मैं 13 साल की हो गई तो कुछकुछ बात मुझे भी समझ आने लगी. एक दिन मैं उस शेल्टर में बने मंदिर से पूजा कर के रूम की तरफ जा रही थी तो सेठ अवस्थी (इस समय शीतल ने मुंह ऐसे बना लिया, जैसे किसी ने मुंह में जहर डाल दिया हो) जो कई अनाथ आश्रम, कई वृद्धाश्रम इत्यादि चलाते थे, जो नारी उत्थान की बड़ीबड़ी बातें करते थे, जिन्होंने न जाने कितनी गरीब लड़कियों का विवाह कराया, वही सेठ, उस शेल्टर होम में रोज आया करते थे.

उन की नजर मुझ पर पड़ गई और वार्डन से कहने लगे, “रियाजी, ये कोहिनूर कहां छिपा रखा था. हमारी तो नजर ही नहीं पड़ी अभी तक इस पर. हमें दिखाना तो चाहिए था, जरा बुलाओ एक झलक देखें तो.’

“शीतल बिटिया जरा इधर आओ, सर को भी प्रसाद दो.’‘ वार्डन ने आवाज दी.

मैं ने दोनों को प्रसाद दिया तो सेठ ने मेरा गाल थपथपा दिया.

दरअसल, मैं 13 साल की जरूर थी, मगर कद और शरीर से 16-17 साल की लगती थी. उस पर रंगरूप से भी गदगद थी.

अगले दिन वार्डन मेरे पास आई और बोली, “शीतल, तुम्हें सर बुला रहे हैं. शायद कोई काम हो, जाओ जरा मिल लो. और हां, जरा अच्छे से रैडी हो कर जाओ.’‘

मैं वार्डन की बात समझ चुकी थी, अब तक इतनी समझ आ गई थी मुझ में. मैं ने कहा, “मां, मैं? आप तो मेरी मां हो.’‘

वार्डन ने मुझे गले से लगाया और उस की आंखें भर आईं. बोली, “मुझे सब बच्चियां बेटी जैसी ही लगती हैं, लेकिन क्या करूं, इस पेट का सवाल खड़ा हो जाता है. मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची, तुझे जाना होगा. मैं मजबूर हूं, वरना सेठ हमें छोड़ेगा नहीं.’‘

और मुझे जाना पड़ा उस सेठ अवस्थी के पास जो अपनी हवस मिटाने के लिए आतुर बैठा था. मुझे देखते ही टूट पड़ा मुझ पर. मैं ने लाख मिन्नतें कीं, हाथ जोड़े, लेकिन उस ने मेरी एक न सुनी. मैं दर्द से तड़पती रही, रोती, चीखतीचिल्लाती रही. नहीं छोड़ा दरिंदे ने मुझे. और इस तरह अब रोज ही वह मुझे बुलाने लगा. वह बैल बन कर मुझे बंजर धरती समझ मुझ पर हल चलाता रहा.

लगभग 2 साल तक यह सिलसिला यूं ही चलता रहा और एक दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं पेट से हूं. जब सेठ अवस्थी को पता चला तो अबार्शन करवाने के लिए कहा, लेकिन अब तक समय निकल चुका था. डाक्टर ने कहा कि समय अधिक हो गया है, अगर इस समय अबार्शन कराया तो लड़की की जान को भी खतरा हो सकता है. इस पर सेठ फिर भी जिद पर था कि अबार्शन कराया जाए, अगर लड़की मरती है तो मर जाए.

मैं न ही मरना चाहती थी न ही अबार्शन कराना. मैं उस शेल्टर होम से भाग निकली, इस में वार्डन ने मेरा साथ दिया, ताकि मैं आगे अपनी जिंदगी अपने लिए जी सकूं. मैं मुंबई से भाग कर दिल्ली चली गई. वहां रेलवे स्टेशन पर एक भला योगेश आदमी मिल गया, जिस ने मुझे सहारा दिया और बहन की तरह मेरी देखभाल की. मैं उस की मदद करने के लिए छोटेमोटे काम करने लगी. मुझे परी जैसी बेटी पैदा हुई, उस का नाम मेरे नाम से ‘श’ और मेरे मुंह बोले भाई के नाम योगेश से ‘य’ ले कर हम ने शायनी नाम रखा.

योगेश का भी परिवार था तो मैं ने सोचा कि आगे चल कर कोई बच्चों की वजह से परेशानी न आए, इसलिए मैं अलग घर में रहने लगी और भाई ने मुझे काम पर भी लगवा दिया था. मैं ने अपनी बेटी शायनी को पढ़ाया लिखाया, अपने पैरों पर खड़ा किया. अब तक मैं पिछले सब दुख भूल चुकी थी.

शायनी पढ़ाई में होशियार, बहुत ही लायक बेटी थी. एमबीए करते ही अच्छी कंपनी में जौब मिल गई. अभी 15 दिन पहले ही मुंबई ट्रांसफर हुआ. जब से मुंबई ट्रांसफर हुआ, तब से ही एक अजीब सा डर मेरे दिल में था. मैं शायनी को मुंबई नहीं भेजना चाहती थी, लेकिन उस के भविष्य की सोच कर चुप रह गई और तब योगेश भी कहने लगा,

“जीजी, शायनी बड़ी हो गई है. भलाबुरा सब जानती है, उसे जाने दो, जी लेने दो अपनी जिंदगी उसे.’‘

लेकिन मुझे क्या पता था कि यहां फिर से वही कहानी दोहराई जाएगी.

इतना कह कर शीतल चुप हो गई और एक ही सांस में सामने रखा गिलास का पूरा पानी पी गई.

“उस के बाद फिर ऐसा क्या हुआ मैडम कि आप यहां और सेठ का खून? आप तो दिल्ली में रहती है न?’‘

“हां, मैं अभी तक दिल्ली में ही थी. सोचा एक बार शायनी की सैटिंग हो जाए तो फिर मैं भी बेटी के पास जा कर रहूंगी. रोज रात को फ्री हो कर हम मांबेटी खूब सारी बातें किया करते थे. जब कभी शायनी मीटिंग से लेट हो जाती तो मुझे मैसेज कर के बता देती कि आज लेट बात करेंगे और हम तब बात करते जब वो फ्री हो जाती, मैं तब तक जागती रहती.’

कहीं शायनी उस दरिंदे सेठ के चंगुल में तो नहीं फंस जाएगी? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग.

प्यार का ‘दी एंड’

11जुलाई, 2014 को रात करीब 8 बजे होटल क्रिस्टल पैलेस के रिसैप्शन कांउटर पर एक युवक पहुंचा. उस युवक के पास 2 बैग थे. वह काउंटर पर बैठी लड़की से बोला, ‘‘हमें डबलबैड वाला एसी रूम चाहिए.’’

यह सुन कर रिसैप्शन पर बैठी लड़की उस युवक को गौर से देखने लगी. वह समझ नहीं पा रही थी कि जब वह अकेला है तो डबल बेड वाले कमरे की बात क्यों कर रहा है. उस ने पूछा, ‘‘आप अकेले हैं?’’

‘‘जी नहीं, मिसेज भी साथ हैं. वह बाहर आटो का किराया दे रही हैं.’’ युवक ने इतना ही कहा था कि एक युवती दरवाजा खोलते हुए अंदर दाखिल हुई और उस युवक के बराबर में आ कर खड़ी हो गई. रिसैप्शनिस्ट समझ गई कि यह इस की बीवी होगी. रिसैप्शनिस्ट ने एसी रूम का किराया एक हजार रुपए प्रतिदिन बताया तो युवक ने रूम लेने की सहमति जता दी.

रिसैप्शनिस्ट ने कमरा बुक करने की औपचारिकताएं पूरी कराने के लिए उस युवक और युवती से नाम पूछा तो उन्होंने अपने नाम दिलीप वर्मा और पिंकी बताए. आईडी के रूप में दिलीप वर्मा ने अपना पैन कार्ड और पिंकी ने वोटर आईडी कार्ड दिखा कर उन की फोटोकौपी जमा करा दी. औपचारिकताएं पूरी करने के बाद रिसैप्शनिस्ट ने कमरा नंबर 207 उन के नाम बुक कर दिया. होटल में काम करने वाले एक लड़के से उन का सामान कमरा नंबर 207 में पहुंचा दिया.

2 दिनों तक दिलीप और पिंकी होटल में सामान्य तरीके से रहे. लेकिन तीसरे दिन के क्रियाकलापों से रिसैप्शनिस्ट को दिलीप पर शक होने लगा. दरअसल हुआ यह कि 16 जुलाई की दोपहर 12 बजे के करीब दिलीप होटल से यह कह कर बाहर गया कि वह बाहर से खाना लाने और एटीएम से पैसे निकालने जा रहा है.

जब दिलीप 2 घंटे तक नहीं लौटा, तो रिसैप्शनिस्ट ने जानकारी लेने के लिए इंटरकौम से कमरा नंबर 207 में इंटरकौम की घंटी भी बजाई. लेकिन कई बार घंटी बजने के बाद भी पिंकी ने फोन नहीं उठाया तो रिसैप्शनिस्ट ने यह जानकारी होटल के मैनेजर गणेश सिंह को दी.

दिलीप खाना लेने और एटीएम मशीन से पैसे निकालने गया था. यह काम कर के उसे काफी देर पहले लौट आना चाहिए था. उस के न आने और पिंकी द्वारा कमरे का फोन न उठाने पर मैनेजर गणेश सिंह को भी शक होने लगा. मैनेजर ने उसी समय होटल मालिक प्रशांत गुप्ता को फोन कर के होटल बुला लिया.

कुछ देर बाद प्रशांत गुप्ता होटल पहुंचे तो मैनेजर गणेश सिंह ने सारी बात उन्हें बता दी. होटल क्रिस्टल पैलेस गाजियाबाद के सेक्टर-16 वसुंधरा में था. इस संदिग्ध मामले की जानकारी पुलिस को देनी जरूरी थी. इसलिए प्रशांत गुप्ता के कहने पर मैनेजर ने थाना इंदिरापुरम की पुलिस चौकी प्रहलाद गढ़ी के चौकीप्रभारी शिव कुमार राठी को फोन कर के यह सूचना दे दी.

सूचना पाते ही वह 2 सिपाहियों के साथ होटल क्रिस्टल पैलेस पहुंच गए. होटल के स्टाफ से बात करने के बाद उन्होंने ‘मास्टर की’ से कमरे का ताला खुलवाया तो डबल बैड पर एक युवती की लाश पड़ी दिखाई दी. होटल कर्मचारियों ने बताया कि यह लाश उसी युवती की है जो दिलीप के साथ आई थी. दिलीप ने इसे अपनी पत्नी बताया था. मामला हत्या का था इसलिए चौकीप्रभारी शिव कुमार राठी ने यह खबर इंदिरापुरम के थानाप्रभारी राशिद अली को भी दे दी. कुछ ही देर में वह क्रिस्टल होटल पहुंच गए.

थानाप्रभारी राशिद अली ने कमरे का निरीक्षण किया तो युवती के गले पर लाल घेरे का निशान दिखाई दिया. पलंग के पास ही मोबाइल चार्जर पड़ा हुआ मिला. इस से ऐसा लगा कि दिलीप ने शायद उसी तार से उस का गला घोंटा होगा. मृतका नीले रंग की जींस और टीशर्ट पहने थी. बिस्तर पर मिले संघर्ष के निशानों से अनुमान लगाया गया कि मृतका ने अपनी जान बचाने की कोशिश की होगी.

कमरे में 2 बैग भी रखे हुए थे. तलाशी लेने पर उन में से पेन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, दोनों के कपड़े व कुछ अन्य सामान बरामद हुआ. बैग से शिरडी से दिल्ली तक के 2 टिकिट भी मिले, जो 11 जुलाई के थे. कमरे में बीयर की 3 खाली बोतलें भी मिलीं.

बरामद सामान से मृतका की पहचान पिंकी उर्फ प्रिया पुत्री राजेश्वर निवासी 115/4 बी ब्लौक, गली नं. 7, खिचड़ीपुर दिल्ली के रूप में हुई. यह भी पता चल गया कि जो युवक उस के साथ आया था, वह दिलीप वर्मा पुत्र श्रीप्रकाश वर्मा निवासी सी 912, बुधविहार मंडोली शाहदरा, दिल्ली का था. मृतका की तलाशी लेने पर उस की जेब से उस का मोबाइल बरामद हुआ. स्थितियों को देख कर अनुमान लगाया जा सकता था कि किसी बात को ले कर दोनों में तकरार इतनी बढ़ी होगी कि गुस्से में दिलीप ने उस का गला घोंट दिया होगा और फरार हो गया.

थानाप्रभारी ने मौके पर क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया. टीम ने विभिन्न कोणों से मृतका के फोटो खींचे और अन्य वैज्ञानिक सुबूत इकट्ठे किए. इस के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए हिंडन स्थित मोर्चरी भेज दिया गया और होटल मालिक प्रशांत गुप्ता की तहरीर पर दिलीप वर्मा के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

अगली काररवाई तक पुलिस ने होटल का वह कमरा सील कर के बुकिंग रजिस्टर अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने मृतका पिंकी के फोन की काल लिस्ट देखने के बाद उस नंबर को मिलाया, जिस पर उस की आखिरी बार बात हुई थी. वह नंबर अक्षय नाम के एक युवक का था, जो पिंकी का परिचित था. पुलिस ने अजय को पिंकी की हत्या की सूचना दी तो वह उस के परिजनों के साथ थाना इंदिरापुरम पहुंच गया.

पुलिस उन्हें मोर्चरी ले गई तो उन्होंने लाश देख कर पुष्टि कर दी कि वह पिंकी ही थी. पिंकी के घरवालों ने बताया कि वह लक्ष्मीनगर के एक माल में नौकरी करती थी. जुलाई के पहले हफ्ते में वह एक दिन अपनी ड्यूटी पर तो गई लेकिन वापस नहीं लौटी. उन लोगों ने उस का फोन मिलाया तो वह स्विच औफ मिला था. जिस जगह वह नौकरी करती थी वहां भी मालूम किया गया और इधरउधर भी देखा गया. लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला था. इस पर उन लोगों पुलिस को सूचना दे दी.

लाश का पोस्टमार्टम हो जाने के बाद पुलिस ने पिंकी की लाश उस के घरवालों को सौंप दी. उस के घरवालों ने पुलिस को यह भी बताया कि वह दिलीप वर्मा नाम के किसी युवक को नहीं जानते.

घरवालों को पिंकी की लाश सौंपने के बाद इस मामले की जांच एसएसआई विशाल श्रीवास्तव को सौंप दी गई. विशाल श्रीवास्तव ने 17 जुलाई को होटल क्रिस्टल पैलेस के मैनेजर गणेश सिंह से पूछताछ की तो उस ने बताया कि 14 जुलाई, 2014 की देर शाम 8 बजे दिलीप वर्मा और पिंकी होटल पहुंचे थे. दिलीप ने पिंकी को अपनी पत्नी बता कर कमरा लिया था. अगले दिन दोनों एक साथ कहीं गए थे लेकिन वापसी में वे अलगअलग होटल लौटे थे.

16 जुलाई को दोपहर 12 बजे के आसपास दिलीप यह कह कर होटल से गया था कि वह खाना लाने व एटीएम से पैसे निकालने जा रहा है. वह काफी देर बाद नहीं लौटा तो उस का मोबाइल मिलाया गया. लेकिन वह स्विच्ड औफ था.

इस पर पिंकी के कमरे का फोन मिलाया. लेकिन जब कोई जवाब नहीं मिला तो यह सूचना होटल मालिक प्रशांत गुप्ता को दी गई. उन के होटल पहुंचने के बाद प्रह्लाद गढ़ी के चौकीप्रभारी को खबर की गई. एसएसआई ने गणेश सिंह के अलावा प्रशांत गुप्ता से भी पूछताछ की.

हत्यारोपी दिलीप वर्मा का पुलिस को पता मिल चुका था. उस की तलाश में एक पुलिस टीम उस के मंडोली, शाहदरा स्थित पते पर भेजी गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पुलिस ने उस के बारे में उस के पिता श्रीप्रकाश वर्मा से मालूमात की.

उन्होंने बताया कि दिलीप जुलाई के पहले हफ्ते में शिरडी घूमने गया था और अभी तक नहीं लौटा है. पुलिस उन्हें यह हिदायत दे कर लौट आई कि जैसे ही वह घर आए, उसे इंदिरापुरम थाने ले आएं.

थाना इंदिरापुरम पुलिस ने दिलीप के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा दिया ताकि उस की लोकेशन का पता लग सके. इस से पहले कि पुलिस को उस की लोकेशन पता चलती, लोनी क्षेत्र में उस के द्वारा आत्महत्या कर लेने की सूचना मिल गई.

20 जुलाई, 2014 को दोपहर 2 बजे लोनी थाने को सूचना मिली कि अमित विहार के पास स्थित एक ढलाई फैक्ट्री की पहली मंजिल पर एक 25 वर्षीय युवक ने आत्महत्या कर ली है. पुलिस मौके पर पहुंची तो पता चला कि मरने वाला युवक दिलीप वर्मा है. पुलिस ने मौके पर जरूरी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए हिंडन स्थित मोर्चरी भेज दी.

लोनी पुलिस ने दिलीप के पिता से मालूमात की तो उन्होंने बताया कि दिलीप ने 18 जुलाई को हरिद्वार से फोन कर के उन्हें बताया था कि उस ने वसुंधरा स्थित क्रिस्टल होटल में 16 जुलाई को अपनी प्रेमिका पिंकी की हत्या कर दी है और पुलिस के डर से वह इधरउधर छिप रहा है.

उस ने कहा था, ‘पापा, मुझ से बड़ी भूल हो गई है. आप मुझे बचा लो. नहीं तो मैं सुसाइड कर लूंगा.’

तब मैं ने उसे घर आने को कहा था. इस पर 18-19 जुलाई की रात 2 बजे वह घर पहुंचा. उस वक्त वह रो रहा था. तब मैं ने उसे अपने छोटे भाई भीष्म वर्मा के साथ लोनी स्थित फैक्ट्री भेज दिया था. जहां उस ने सुसाइड कर लिया.

लोनी पुलिस को जब पता चला कि मरने वाला युवक एक लड़की की हत्या के आरोप में वांछित था तो उस ने यह सूचना थाना इंदिरापुरम को दे दी. खबर मिलते ही एसएसआई विशाल श्रीवास्तव थाना लोनी पहुंच गए. लोनी पुलिस ने दिलीप के सुसाइड के मामले की फाइल विशाल श्रीवास्तव को सौंप दी.

विशाल श्रीवास्तव ने थाने बुला कर दिलीप के पिता श्रीप्रकाश वर्मा से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 19 जुलाई, 2014 की सुबह दिलीप जब घर पहुंचा तो उस ने पिंकी और खुद के प्यार की पूरी कहानी बताई थी.

दिलीप पिंकी से प्यार वाली बात यदि पहले ही बता देता तो शायद आज उन्हें यह दिन देखने को नहीं मिलता. पुलिस को पिंकी और दिलीप के प्यार की जो कहानी पता चली, वह इस प्रकार थी.

19 वर्षीय पिंकी दिल्ली के खिचड़ीपुर निवासी राजेश की बेटी थी. 45 वर्षीय राजेश दिल्ली के हसनपुर डिपो के पास एक निजी कंपनी में चपरासी था. उस के 6 बेटियां और एक बेटा था. पिंकी उस की दूसरे नंबर की बेटी थी. राजेश को जो सैलरी मिलती थी उस से जैसेतैसे उस के घर का खर्च चल पाता था. तब उस की पत्नी आशा एक निजी अस्पताल में सफाई कर्मचारी के रूप में काम करने लगी. आर्थिक तंगी की वजह से वह बच्चों को ज्यादा पढ़ालिखा नहीं सका.

युवावस्था की ओर बढ़ती हर लड़की की तरह पिंकी के भी कुछ सपने थे. लेकिन परिवार के हालात ऐसे नहीं थे कि वह उन सपनों को साकार कर सके. अपने सपने पूरे करने के लिए उस ने खुद ही कुछ करने का फैसला किया. उस ने अपने लिए नौकरी ढूंढ़नी शुरू कर दी. वह खूबसूरत तो थी ही. इसलिए एक जानकार के जरिए उसे लक्ष्मी नगर स्थित एक माल में सेल्सगर्ल के रूप में नौकरी मिल गई.

नौकरी लगने के बाद पिंकी ने बनठन कर रहना शुरू कर दिया. यहीं पर जनवरी, 2014 के पहले सप्ताह में उस की मुलाकात दिलीप वर्मा से हुई. दिलीप अकसर उस माल में आता रहता था. पहली ही मुलाकात में दोनों आंखों के जरिए एकदूसरे के दिल में उतर गए थे.

बाद में दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर भी दे दिए. दोनों की फोन पर बातें होने लगीं. उन की दोस्ती प्यार के मुहाने की ओर बढ़ती चली गई. एकांत में मेलमुलाकातों के चलते उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए.

समाज भले ही ऐसे संबंधों को मान्यता न दे लेकिन आधुनिकता की इस दौड़ में आज का युवा ऐसे रिश्तों से परहेज नहीं करता. दिलीप से प्यार हो जाने के बाद पिंकी के संबंध और भी कई युवकों से हो गए. बाद में वह उन युवकों से पैसे भी ऐंठने लगी. वह अपने कपड़ों की तरह दोस्तों को बदलने लगी. ऐसे में उस की दिलीप से दूरी बढ़ गई.

पिंकी के बदले व्यवहार को दिलीप समझ नहीं सका. लेकिन जब उस ने एक दिन उसे किसी दूसरे युवक के साथ घूमते देखा तो उस का खून खौल गया. प्रेमिका की इस बेवफाई पर उस ने उस से कुछ नहीं कहा. ऐसा कर के वह उसे बदनाम नहीं करना चाहता था. लेकिन अगली मुलाकात में दिलीप ने जब उस युवक के बारे में उस से जानना चाहा तो वह साफ मुकर गई.

उस ने पिंकी को समझाने की बहुत कोशिश की. वह उस पर लगातार सुधरने के लिए दबाव डालता रहा. इसी दबाव के चलते एक दिन उस ने पिंकी के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया. जिसे सुन कर पहले तो पिंकी आश्चर्यचकित रह गई, लेकिन दिलीप के बारबार कहने पर उस ने कह दिया कि इस बारे में फिर किसी दिन बात करेंगे.

रूठी प्रेमिका को मनाने की दिलीप की कोशिश काफी दिनों तक चलती रही. इसी कोशिश के तहत जुलाई के पहले हफ्ते में दिलीप ने शिरडी जाने के 2 टिकिट बुक कराए. पिंकी शिरडी जाने को तैयार भी हो गई.

दोनों नियत समय पर शिरडी पहुंच गए. 11 जुलाई को शिरडी से लौटने का टिकिट भी बुक था. वहां से लौट कर दोनों 14 जुलाई को देर शाम 8 बजे गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित क्रिस्टल होटल पहुंचे. वहां दिलीप ने उसे अपनी पत्नी बता कर कमरा बुक कराया. एक दिन का किराया उस ने जमा कर दिया.

16 जुलाई को दिलीप ने पिंकी से शादी के मसले पर फिर बात की. वह उस की बात को फिर से टालने लगी. तभी दिलीप ने उस से उस युवक के बारे में पूछा जिस के साथ वह घूम रही थी. इस बात पर पिंकी भड़क गई. बातोंबातों में दोनों में तकरार बढ़ गई. जब बात ज्यादा बढ़ी तो दिलीप ने गुस्से में मोबाइल फोन चार्जर के तार से पिंकी का गला घोंट दिया.

पिंकी की हत्या के आरोप में वह फंस सकता था इसलिए दोपहर 12 बजे के करीब वह रिसैप्शन पर बैठी लड़की से यह कह कर निकल गया कि वह ढाबे से खाना लेने जा रहा है. और आते समय वह एटीएम से पैसे निकाल कर लाएगा ताकि कमरे का किराया दे सके.

होटल से निकलते ही दिलीप ने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया था. वह वहां से सीधा हरिद्वार निकल गया. ताकि पुलिस उसे न ढूंढ़ सके. दिलीप के घरवालों को यही पता था कि वह शिरडी से नहीं लौटा है. उन्होंने 1-2 बार उस का फोन भी मिलाया था, लेकिन वह स्विच्ड औफ था.

18 जुलाई, 2014 को दिलीप ने अपने पिता को फोन कर के बताया कि वह हरिद्वार में है. उस समय उस की आवाज में घबराहट थी. हरिद्वार में होने की बात पर श्रीप्रकाश वर्मा ने चौंकते हुए पूछा, ‘‘तू गया तो शिरडी था, हरिद्वार कैसे पहुंचा?’’

‘‘पापा मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है. मैं ने गाजियाबाद में एक लड़की का मर्डर कर दिया है. अब मैं बहुत परेशान हूं. मन करता है सुसाइड कर लूं.’’ दिलीप ने बताया.

मर्डर की बात सुनते ही वह अपने यहां पुलिस के आने की बात को समझ गए. बेटे ने अपराध तो किया ही था, लेकिन इस का मतलब यह नहीं था कि वह उसे सुसाइड करने देते. उन्होंने उसे काफी समझाया और सुसाइड जैसा कदम न उठाने की बजाय घर आने को कहा. पिता के समझाने पर दिलीप रात 2 बजे घर आ गया. उस समय वह काफी तनाव में था. उस समय श्रीप्रकाश वर्मा ने उस से कुछ नहीं कहा. अगले दिन सुबह उन्होंने उस से पूछा तो उस ने पिंकी से प्यार होने से ले कर हत्या तक की पूरी बात बता दी.

गाजियाबाद पुलिस दिलीप की तलाश में जब घर आई थी तो श्रीप्रकाश गुप्ता से कह गई थी कि जैसे ही दिलीप घर आए तो उसे इंदिरापुरम थाने ले आएं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि उन्होंने उसे छोटे भाई भीष्म वर्मा के साथ लोनी में स्थित फैक्ट्री भेज दिया. जहां वह दोपहर 12 बजे के करीब पहली मंजिल पर गले में अंगोछे का फंदा बना कर पंखे के हुक से लटक गया और उस की मौत हो गई.

प्रेमिका पिंकी के हत्यारे प्रेमी दिलीप ने भी अपनी जीवनलीला खत्म कर ली थी इसलिए इस मामले में जांच के लिए अब कुछ खास बचा ही नहीं था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कविता ने लिखी खूनी कविता – भाग 2

शादी के पहले के प्रेमी से जोड़े संबंध

शादी के बाद दीपचंद जैसा पति और हाकम जैसा नेकदिल ससुर पा कर कविता भी काफी खुश थी, उस ने ससुराल को ही अपना घर मान लिया था. कविता के मम्मीपापा राजस्थान के जोधपुर में एक सीमेंट फैक्टी में काम करते थे.

दीपचंद का मन खेतीबाड़ी में नहीं लगता था. इस वजह से वह उन दिनों काम की तलाश कर रहा था. जब कविता के पिता ने उसे जोधपुर में काम दिलाने की बात की तो वह शादी के कुछ महीनों बाद ही राजस्थान पहुंच गया. दीपचंद तब राजस्थान की एक सीमेंट फैक्ट्री में नौकरी पर चला गया.

घर में अकेली कविता को तन्हाई ने डस लिया. उस के मन के एक कोने में अब भी अपने बचपन के प्यार बृजेश बर्मन उर्फ कल्लू की यादें थीं. जब अकेलापन भारी पड़ने लगा तो उस ने बृजेश से फिर तार जोड़ लिए. कविता का मायका सुनवानी पन्ना में था, वह पहले शराब कंपनी में काम करता था. तब कविता के पापा के घर में ही किराए पर रहता था.

कविता ने बीएससी तक की पढ़ाई की थी और वह शुरू से ही सपनों की दुनिया में सैर करने वाली लड़की थी. बृजेश तब शराब कंपनी में काम कर के अच्छे पैसे कमा रहा था. उसे कविता पहली ही नजर में पसंद आ गई थी. वह आतेजाते कविता से बात करने के बहाने ढूंढता. उस समय कविता की उम्र महज 19 साल थी.

एक दिन बृजेश शाम को जल्दी अपने रूम पर आ गया. उस समय कविता की मां मंदिर गई थीं और पिता किसी काम से बाहर गए हुए थे. बृजेश ने मौका देखते ही अपने प्यार का इजहार करते हुए कहा, “कविता, तुम बहुत खूबसूरत हो. आई लव यू कविता.’’

कविता भी मन ही मन बृजेश को चाहने लगी थी, मगर डर के मारे यह बात दिल में दबाए बैठी थी. जब बृजेश ने प्यार का इजहार किया तो उस ने भी कह दिया, “आई लव यू टू बृजेश.’’

कविता की स्वीकृति मिलते ही बृजेश ने उस का हाथ पकड़ा और गालों पर चुंबन लेते हुए कहा, “कविता, मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता.’’

कविता का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया, उस ने जल्दी से अपना हाथ छुड़ाया और अपने कमरे की तरफ भाग गई. धीरेधीरे दोनों में गहरी दोस्ती और फिर प्यार परवान चढ़ने लगा. बृजेश अकसर कविता के लिए महंगे गिफ्ट भी ला कर देने लगा.

कविता पटेल और बृजेश बर्मन अलगअलग जाति के थे. दोनों शादी के लिए राजी थे, मगर सामाजिक रीतिरिवाजों में इस की इजाजत नहीं थी. बृजेश उसे घर से भगा कर शादी करना चाहता था, लेकिन कविता घर से भाग कर शादी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. आखिर में मई, 2021 में कविता की शादी उस के घर वालों ने दमोह जिले के खैरा गांव निवासी दीपचंद से कर दी.

किराएदार से हुआ था प्यार

23 साल की कविता की शादी दीपचंद पटेल से हुई थी. उस समय कविता हायर सेकेंडरी तक पढ़ी थी. जब उस ने अपने ससुर से आगे पढ़ने की इच्छा जताई तो उन्होंने उस का एडमिशन पन्ना के अमानगंज कालेज में करवा दिया. शादी से पहले कविता का उस के मकान में रहने वाले किराएदार बृजेश बर्मन उर्फ कल्लू से अफेयर जरूर था, मगर दोनों की जाति अलग होने की वजह से उन की शादी नहीं हो पाई.

शादी के बाद सब ठीकठाक चल रहा था. कविता के ससुर उसे बेटी की तरह प्रेम करते थे. शादी के बाद कविता अपने प्रेमी बृजेश को भी भुला चुकी थी. कविता के पति की नौकरी राजस्थान की सीमेंट फैक्ट्री में थी. शादी के कुछ दिन बाद दीपचंद वापस नौकरी पर लौट गया तो कविता को खाली घर काटने लगा.

एक दिन वह मोबाइल के कौंटैक्ट नंबर देख रही थी, तभी उसे बृजेश का नंबर दिखा. उसे पुराने दिन याद आने लगे. वह बृजेश से बात करने की कोशिश तो करती, लेकिन कुछ सोच कर रुक जाती थी. आखिरकार एक दिन उस ने बृजेश से बात करने की गरज से फोन किया तो बृजेश ने काल रिसीव करते हुए कहा, “हैलो कौन?’’

“बृजेश, पहचाना नहीं मुझे. तुम तो बहुत बदल गए, अब तो मेरी आवाज भी भूल गए.’’ कविता ने शिकायत की.

“जानेमन तुम्हें कैसे भूल सकता हूं. इस अननोन नंबर से काल आई तो पहचान नहीं सका.’’ बृजेश सफाई देते हुए बोला.

“तुम ने तो मेरी शादी के बाद कभी काल भी नहीं की,’’ कविता बोली.

“कविता, मैं तुम्हें दिल से चाहता था, इसलिए मैं तुम्हारा बसा हुआ घर नहीं उजाड़ना चाहता था. मैं ने अपने दिल पर पत्थर रख कर तुम्हारी खुशियों की खातिर समझौता कर लिया था,’’ बृजेश बोला.

“सच में इतना प्यार करते हो तो मुझ से मिलने दमोह आ जाओ, तुम्हारी जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही.’’ कविता ने फिर से उस के प्रति चाहत दिखाते हुए कहा.

कई महीने बाद बृजेश और कविता ने अपने दिल की बातें कीं तो उन का पुराना प्यार जाग गया. उस के बाद दोनों की मेल मुलाकात का सिलसिला चल निकला. बृजेश से जब कविता का दोबारा संपर्क हुआ तो उस समय वह टेंट हाउस में काम करने लगा था. कविता से उस की मुलाकात अकसर कालेज जाते समय होती थी. जब बृजेश कविता की ससुराल भी आने लगा तो कविता ने अपने ससुर और पति से उस का परिचय मुंहबोले भाई के तौर पर कराया.

बृजेश ने दीपचंद से भी दोस्ती कर ली थी. दीपचंद खाने पीने का शौकीन था, इसलिए अकसर ही दीपचंद की बैठक बृजेश के साथ होने लगी. दीपचंद और उस के पिता हाकम को यह शक तक नहीं हुआ कि वह यहां कविता के लिए आता है.

दीपचंद को उस की गैरमौजूदगी में जब बृजेश के कुछ अधिक ही घर आने की खबर मिलने लगी तो उसे संदेह हुआ. फिर दीपचंद राजस्थान से नौकरी छोड़ कर लौट आया. वह पन्ना की सीमेंट फैक्ट्री में काम पर लग गया. वह अपने गांव खैरा के घर से ही ड्यूटी आनेजाने लगा. दीपचंद के लौटने के बाद दोनों का मिलना मुश्किल हो गया था.

धीरेधीरे दीपचंद को पत्नी कविता और बृजेश के संबंधों की भनक लग चुकी थी. हालांकि दोनों ने अपने संबंधों को दीपचंद के सामने स्वीकार नहीं किया. कविता हमेशा बृजेश को मुंहबोला भाई ही बताती रही. शादी के 2 साल बाद भी उन के संतान नहीं हुई थी.

खुला नहीं उनकी मौत का रहस्य

अंकिता अग्रवाल उत्तर प्रदेश के जिला फैजाबाद की रहने वाली थी. उस के पिता अनिल कुमार  अग्रवाल का सोनेचांदी के गहनों का कारोबार था. पिता की लाडली तो वह थी ही, मां विमला और भाई अभिषेक भी उसे बहुत प्यार करते थे. अंकिता बीए की परीक्षा दे रही थी, तभी उस के पिता ने उस की शादी की बात चला दी.

अंकिता देखने में तो सुंदर थी ही, मासूम और सुशील भी थी. पिता चाहते थे कि उस की शादी किसी ऐसे लड़के से हो, जो उसे जीवन भर खुश और सुखी रख सके. काफी तलाश के बाद उन्हें अंकिता के लिए अमित अग्रवाल मिला तो वह उन्हें अपनी भोलीभाली बेटी के लिए योग्य वर लगा.

अमित अग्रवाल मथुरा के गुदड़ी बाजार का रहने वाला था. उस के पिता माधवराम अग्रवाल की मथुरा में के.डी. ज्वैलर्स के नाम से सोनेचांदी के गहनों की दुकान थी. अमित का परिवार मथुरा का बड़ा कारोबारी घराना माना जाता था. सोनेचांदी की दुकान के साथसाथ उस के अन्य कई कारोबार थे.

अनिल कुमार अग्रवाल को अंकिता और अमित की जोड़ी हर तरह से ठीक लगी थी. यही वजह थी कि 13 जुलाई, 2005 को उन्होंने बड़े धूमधाम से अंकिता की शादी अमित से कर दी. शादी के कुछ दिनों बाद अमित ने लखनऊ के चौक बाजार में अपनी सोनेचांदी की दुकान खोलने का विचार किया. अमित और अंकिता, दोनों के ही तमाम नातेरिश्तेदार लखनऊ में सोनेचांदी की दुकानें चलाते थे. उन्हीं लोगों की मदद से अमित ने मथुरा के के.डी. ज्वैलर्स की एक अन्य दुकान यानी शाखा लखनऊ के चौक बाजार के सुरंगी टोला में खोल दी.

अमित जल्द से जल्द अमीर होना चाहता था, इसलिए वह गहनों के कारोबार से जुड़े गैरकानूनी काम करने लगा. समय के साथसाथ अमित और अंकिता 2 बच्चों के मांबाप बन गए थे. बेटी वाणी बड़ी थी तो बेटा दिव्यांश छोटा था.

बच्चे स्कूल जाने लायक हुए तो उन का दाखिला लखनऊ के रेडहिल स्कूल में करा दिया गया. कारोबार को बढ़ाने के लिए अमित ने अपनी ससुराल वालों यानी अंकिता के घर वालों से भी मदद ली थी.

अंकिता के साथ अमित को जिस तरह का प्यार और व्यवहार करना चाहिए था, वह वैसा नहीं करता था. इस से अंकिता परेशान रहती थी. अंकिता ये बातें मायके वालों को बता कर उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी. इस की वजह यह थी कि उस के पिता अनिल कुमार अग्रवाल की तबीयत ठीक नहीं रहती थी. लेकिन बच्चे अपनी परेशानी या दुख कितना भी छिपाएं, मांबाप तो चेहरे के हावभाव से ही सब जान लेते हैं.

अंकिता भले ही अपने मन की बात मांबाप से नहीं कह रही थी, लेकिन मां उस की परेशानी को अच्छी तरह से समझ रही थी. लेकिन वह जब भी कुछ पूछती, अंकिता कुछ बताने के बजाए बात को टाल जाती थी.

कभी वह इतना जरूर कह देती, ‘‘मां, आप लोगों ने हमारे लिए रिश्ता बहुत अच्छा खोजा है, फिर भी मेरे साथ जो होना होगा, वह होगा ही. फिलहाल मुझे कोई परेशानी नहीं है.’’

इसी बीच अंकिता के पिता की मौत हो गई. अंकिता की मां विमला का कहना है कि अंकिता के पिता का उस की ससुराल और पति पर काफी दबाव रहता था. इस वजह से वे लोग अंकिता के साथ कोई गलत व्यवहार नहीं कर पाते थे. अमित को लगता था कि अगर कोई बात अंकिता के पिता को पता चल गई तो वह हंगामा खड़ा कर देंगे. लेकिन उस के पिता की मौत के बाद वह दबाव खत्म हो गया, जिस से अमित अंकिता को परेशान करने लगा. अंकिता हालात बेहतर होने की उम्मीद में सब सहती रही.

विमला अग्रवाल के अनुसार, 18 अगस्त, 2013 को अमित अंकिता और दोनों बच्चों को ले कर इनोवा कार से अचानक कहीं चला गया. जाने से पहले उस ने अपने घर वालों या ससुराल  वालों को कुछ बताने के बजाए अपने मैनेजर राजेश पांडे को सिर्फ एक पत्र लिखा था, ‘मैं बहुत परेशान हूं. मरने जा रहा हूं. पैसे का लेनदेन तो चलता ही रहता है, लेकिन कैलाश चाचा, रानू और मनोज ने परेशान कर रखा है. वे मुझे बहुत अपमानित करते हैं. अब जीने की इच्छा नहीं रही. इसलिए मरने जा रहा हूं. आप लेग दूसरी जगह नौकरी कर लीजिएगा.’

अगले दिन अमित की इनोवा कार इलाहाबाद के दारागंज में लावारिस हालत में खड़ी मिली. अंकिता की मां का कहना है कि अमित के गायब होने के बाद योजना के अनुसार अमित के करीबी लोगों ने अफवाह फैला दी कि अमित पर 25 करोड़ रुपए की देनदारी हो गई थी. वह बकाया चुकाने की हालत में नहीं था, इसलिए परिवार के साथ कहीं भाग गया.

अंकिता के भाई अभिषेक ने लखनऊ की चौक कोतवाली में इंसपेक्टर आई.पी. सिंह ने मिल कर अमित, बहन अंकिता और भांजेभांजी की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. इस की जांच सबइंसपेक्टर दिनेश सिंह को सौंपी गई. बकायेदारी की बात का पता चलने पर पुलिस को लगा कि कुछ दिनों बाद अमित खुद ही वापस आ जाएगा. इसलिए लखनऊ पुलिस ने अमित की खोज के लिए सर्विलांस का भी सहारा नहीं लिया. अगर पुलिस तत्काल अमित के घर और करीबी लोगों के फोन सर्विलांस पर लगा देती तो शायद कोई न केई नतीजा जरूर निकल आता.

अमित की तलाश में केवल अंकिता का परिवार जुटा था. अभिषेक का कहना है कि अमित का परिवार किसी भी तरह का सहयोग नहीं कर रहा था. इसी तरह समय गुजरता रहा. अचानक 15 दिसंबर को अंकिता के भाई अभिषेक के मोबाइल फोन पर उड़ीसा के जिला पुरी से पुलिस का फोन आया. पुरी की पुलिस ने उसे बताया कि अंकिता और उस के दोनों बच्चे वहां के होटल जमींदार पैलेस के कमरा नंबर 307 मृत पाए गए हैं.

पुरी पुलिस की इस सूचना पर अभिषेक पत्नी श्रद्धा और मां विमला अग्रवाल के साथ पुरी पहुंचा. अभिषेक के अनुसार होटल के कमरे में अंकिता और बच्चों के शव बिस्तर पर पड़े मिले थे. बिस्तर की चादर और तकिया खून से सने थे. होटल के कमरे में जहर की शीशी भी पड़ी थी. इस से अंदाजा लगाया गया कि अंकिता और उस के बच्चों को जहर दे कर बेहोश किया गया था. उस के बाद उन्हें बेरहमी से पीटा गया था. फिर सब की गला दबा कर हत्या कर दी गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, अंकिता के शरीर में चोट के 5 निशान पाए गए थे. शरीर की हड्डी 4 जगह से टूटी थी. अभिषेक का कहना है कि ये लोग पहले पुरी के अन्य होटलों में ठहरे थे. 22 नवंबर को होटल जमींदार पैलेस आए थे. यह अच्छा होटल था. यहां अमित ने सी-फेसिंग कमरा लिया था, जिस का एक दिन का किराया 7500 रुपए था. घटना वाली रात होटल में पार्टी चल रही थी, इसलिए होटल का सारा स्टाफ उस में लगा था. कमरा समुद्र की ओर वाला था, इसलिए तेज हवाओं के शोर की वजह से अंकिता की चीखपुकार किसी को सुनाई नहीं दी थी.

अंकिता के भाई अभिषेक के अनुसार, लाशों के गले में तुलसी की माला और शरीर पर कालेसफेद तिल पड़े मिले थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि मरने के बाद उन के क्रियाकर्म की कोशिश की गई थी. बाद में पुलिस ने होटल का वह कमरा डुप्लीकेट चाबी से खोला था.

कमरे में कागज का एक टुकड़ा मिला था, जिस पर अभिषेक के फोन नंबर के साथ लिखा था कि इस नंबर पर घटना की सूचना दी जाए. पुलिस जांच में पता चला कि अमित ने होटल के रजिस्टर में अपना पता मथुरा वृदांवन लिखाया था. पते के साथ उस ने जो मोबाइल नंबर लिखाया था, वह पहले से ही बंद था.

अभिषेक ने अंकिता और उस के बच्चों का अंतिम संस्कार कर दिया था. वह अपने बहनोई अमित और उस के घर वालों के खिलाफ बहन और उस के बच्चों की हत्या का मुकदमा नामजद दर्ज कराना चाहता था. उस का कहना है कि अमित के पिता माधवराम ने भाजपा के एक स्थानीय विधायक से पैरवी करा दी, जिस से पुरी पुलिस ने दबाव में आ कर हत्या का मुकदमा नामजद दर्ज करने के बजाए अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर के जांच शुरू की.

अंकिता की मां विमला अग्रवाल का कहना है कि पहले तो उन्हें लग रहा था कि उड़ीसा की पुरी पुलिस अमित को खोज लेगी. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, उन की उम्मीद धूमिल होती गई. पुरी पुलिस ने इस मामले की जानकारी लखनऊ पुलिस को भी दी थी. दोनों ने तथ्यों का अदानप्रदान भी किया था, लेकिन मामले का कोई हल नहीं निकला.

अंकिता के भाई अभिषेक का कहना है कि अंकिता और उस के बच्चों की हत्या में उस के पति अमित का हाथ है. उस की मदद उस के घर वाले कर रहे हैं. ऐसा भी हो सकता है कि उन की मदद से वह देश से बाहर चला गया हो. अगर अमित के घर वाले उस की मदद न कर रहे होते तो वह इतने लंबे समय तक पुरी के महंगे होटलों में नहीं रह सकता था.

अंकिता की मां विमला अग्रवाल का कहना है कि अगर अमित सही मायने में गायब होता तो उस के घर वाले उस की तलाश में जमीनआसमान एक कर देते. अमित के गायब होने से उस के घर वाले जरा भी परेशान नजर नहीं आ रहे हैं. उन्होंने उस की खोज भी नहीं की. वे चाहते तो अमित की तलाश में अखबार में उस का फोटो छपवाते, टीवी पर दिखवाते, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं कराया.

विमला अग्रवाल का कहना है कि लखनऊ पुलिस ने भी इस मामले में कम लापरवाही नहीं की. अमित और अंकिता के गायब होने के बाद पुलिस को गुमशुदगी की रिपोर्ट को अपहरण की धारा में बदल कर जांच करनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. पुरी पुलिस के साथ मिल कर भी लखनऊ पुलिस ने कोई छानबीन नहीं की.

अंकिता के घर वालों ने न्याय पाने के लिए लखनऊ में कैंडिल मार्च निकाल कर पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाने की भी कोशिश की थी. पुलिस के बड़े अफसरों के अलावा फैजाबाद के सांसद एवं उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री और अयोध्या के विधायक अखिलेश सरकार के मंत्री तेजनारायण पांडेय से भी अपनी व्यथा सुनाई थी. सभी ने न्याय दिलाने और सही जांच कराने का भरोसा दिलाया था, लेकिन हकीकत में कुछ हुआ नहीं.

अंकिता के भाई अभिषेक अग्रवाल का कहना है कि अमित के घर वालों की सत्ता में पहुंच है, इसलिए पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं कर रही है. अगर लखनऊ पुलिस ने शुरू में ही अमित के खिलाफ सख्त कदम उठाया होता तो अंकिता और उस के बच्चे आज जिंदा होते. अंकिता की मां विमला अग्रवाल का कहना है कि अब हमें सिर्फ सीबीआई जांच पर भरोसा है. हम उसी की मांग कर रहे हैं.

कितने शर्म की बात है कि अगस्त से अब तक 8 महीने बीत जाने के बाद भी 2-2 राज्यों की पुलिस अंकिता और उस के बच्चों की हत्या का राज खोलने में पूरी तरह से नाकाम रही है. ऐसे में पुलिस की वैज्ञानिक और खोजपूर्ण जांच की बातें पूरी तरह से खोखली और बेमानी नजर आती हैं. जब तक अमित का पता नहीं चलता, तब तक हत्या की वजह और हत्यारे के बारे में नहीं जाना जा सकता.

अंकिता के करीबियों का कहना है कि अमित देश में ही कहीं छिपा है. उस के घर वालों को पता भी है. लेकिन वे बता नहीं रहे हैं. जबकि अमित के घर वाले इस बात को गलत बता रहे हैं. उन का कहना है, ‘‘हम तो चाहते हैं कि अमित जल्द से जल्द वापस आ जाए. जिस से सच्चाई का खुलासा हो सके.’’

—कथा अंकिता की मां और भाई के बयान पर आधारित

महामिलन : दो जिस्म एक जान थे वो – भाग 3

समर सिंह मौली को अपने साथ क्या ले गए, राखावास के प्राकृतिक दृश्यों की शोभा चली गई, गांव वालों का अभिमान चला गया और मानू की जान. पागल सा हो गया मानू. बस झील किनारे बैठा उस राह को निहारता रहता, जिस राह राजा के साथ मौली गई थी. खानेपीने का होश ही नहीं था उसे. लगता, जैसे राजा उस की जान निकाल ले गया हो.

बात तब की है, जब हिंदुस्तान में मुगलिया सल्तनत का पराभव हो चुका था और ईस्ट इंडिया कंपनी का परचम पूरे देश में फहराने के प्रयास किए जा रहे थे. देश के कितने ही राजारजवाड़े विलायती झंडे के नीचे आ चुके थे और कितने भरपूर संघर्षों के बाद भी आने को मजबूर थे.

उन्हीं दिनों अरावली पर्वतमाला की घाटियों में बसी एक छोटी सी रियासत थी चंदनगढ़. इस रियासत के राजा समर सिंह थे तो अंगरेज विरोधी, पर शक्तिहीनता की वजह से उन्हें भी ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे तले आना पड़ा था. अंगरेजों का उन पर इतना प्रभाव था कि उन्हें अपने घोड़े गोरा का नाम बदल कर गोरू करना पड़ा था.

समर सिंह उन राजाओं में थे, जो रासरंग में डूबे रहने के कारण राजकाज और प्रजा का ठीक से ध्यान नहीं रख पाते थे. राजा समर सिंह को 2 ही शौक थे—पहला शिकार का और दूसरा नाचगाने, मौजमस्ती का. मौली को भी उन्होंने इसी उद्देश्य से चुना था. लेकिन यह उन की भूल थी. वह नहीं जानते थे कि मौली दौलत की नहीं, प्यार की दीवानी है.

राजा समर सिंह मौली के रूपलावण्य, मदमाते यौवन और उस की नृत्यकला से प्रभावित हो कर उसे साथ जरूर ले आए थे, लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी भान नहीं था कि यह सौदा उन्हें सस्ता नहीं पड़ेगा.

राजमहल में पहुंच कर मौली का रंग ही बदल गया. राजा ने उस की सेवा के लिए दासियां भेजीं, नएनए वस्त्र, आभूषण और शृंगार प्रसाधन भेजे, लेकिन मौली ने किसी भी चीज की ओर आंख उठा कर नहीं देखा. वह जिंदा लाश सी शांत बैठी रही. किसी से बोली तक नहीं, मानो गूंगी हो गई हो. दासियों ने समझाया, पड़दायतों ने मनुहार की, पर कोई फायदा नहीं.

राजा समर सिंह को पता चला तो स्वयं मौली के पास पहुंचे. उन्होंने उसे पहले प्यार से समझाने की कोशिश की, फिर भी मौली कुछ नहीं बोली तो राजा गुस्से में बोले, ‘‘तुम्हें महल ला कर हम ने जो इज्जत बख्शी है, वह किसी को नहीं मिलती, और एक तुम हो जो इस सब को ठोकर मारने पर तुली हो. यह जानते हुए भी कि अब तुम्हारी लाश भी राखावास नहीं लौट सकती. हां, तुम अगर चाहो तो हम तुम्हारे वजन के बराबर धनदौलत तुम्हारे मातापिता को भेज सकते हैं. लेकिन अब तुम्हें हर हाल में हमारी बन कर हमारे लिए जीना होगा.’’

मौली को मौत का डर नहीं था. डर था तो मानू का. वह जानती थी, मानू उस के विरह में सिर पटकपटक कर जान दे देगा. उसे यह भी मालूम था कि उस की वापसी संभव नहीं है. काफी सोचविचार के बाद उस ने राजा समर सिंह के सामने प्रस्ताव रखा, ‘‘अगर आप चाहते हैं कि मौली आप के महल की शोभा बन कर रहे तो इस के लिए पहाड़ों के बीच वाली उसी झील के किनारे महल बनवा दीजिए, जिस के उस पार मेरा गांव है.’’

अपने इस प्रस्ताव में मौली ने 2 शर्तें भी जोड़ीं. एक यह कि जब तक महल बन कर तैयार नहीं हो जाता, राजा उसे छुएंगे तक नहीं और दूसरी यह कि महल में एक ऐसा परकोटा बनवाया जाएगा, जहां वह हर रोज अपनी चुनरी लहरा कर मानू को बता सके कि वह जिंदा है. मानू उसी के सहारे जीता रहेगा.

मौली मानू को जान से ज्यादा चाहती है, यह बात समर सिंह को अच्छी नहीं लगी थी. कहां एक नंगाभूखा लड़का और कहां राजमहल के सुख. लेकिन उस की जिद के आगे वह कर भी क्या सकते थे. कुछ करते तो मौली जान दे देती. मजबूर हो कर उन्होंने उस की शर्तें स्वीकार कर लीं.

राखावास के ठीक सामने झील के उस पार वाली पहाड़ी पर राजा ने महल बनवाना शुरू किया. बुनियाद कुछ इस तरह रखी गई कि झील का पानी महल की दीवार छूता रहे. झील के तीन ओर बड़ीबड़ी पहाडि़यां थीं. चौथी ओर वाली छोटी पहाड़ी की ढलान पर राखावास था. महल से राखावास या राखावास से महल तक आधा मील लंबी झील को पार किए बिना किसी तरह जाना संभव नहीं था.

उन दिनों आज की तरह न साधनसुविधाएं थीं, न मार्ग. ऐसी स्थिति में चंदनगढ़ से 10 मील दूर पहाड़ों के बीच महल बनने में समय लगना स्वाभाविक ही था. मौली इस बात को समझती थी कि यह काम एक साल से पहले पूरा नहीं हो पाएगा और इस एक साल में मानू उस के बिना सिर पटकपटक कर जान दे देगा. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी, राजा ने उस की सारी शर्तें पहले ही मान ली थीं.

लेकिन जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. मोहब्बत कहीं न कहीं अपना रंग दिखा कर ही रहती है. मौली के जाने के बाद मानू सचमुच पागल हो गया था. उस का वही पागलपन उसे चंदनगढ़ खींच ले गया.

मौली के घुंघरू जेब में डाले वह भूखाप्यासा, फटेहाल महीनों तक चंदनगढ़ की गलियों में घूमता रहा. जब भी उसे मौली की याद आती, जेब से घुंघरू निकाल कर आंखों से लगाता और जारजार रोने लगता. लोग उसे पागल समझ कर उस का दर्द पूछते तो उस के मुंह से बस एक ही शब्द निकलता-मौली.

मानू चंदनगढ़ आ चुका है, मौली भी इस तथ्य से अनभिज्ञ थी और समर सिंह भी. उधर मानू ने राजमहल की दीवारों से लाख सिर टकराया, पर वह मौली की एक झलक नहीं देख सका. महीनों यूं ही गुजर गए.

राजा समर सिंह जिस लड़की को राजनर्तकी बनाने के लिए राखावास से चंदनगढ़ लाए हैं, उस का नाम मौली है, यह बात किसी को मालूम नहीं थी. राजा स्वयं उसे मालेश्वरी कह कर पुकारते थे, अत: दासदासियां और पड़दायतें तक उसे मालेश्वरी ही कहती थीं.

राजा ने मौली के लिए अपने महल के एक एकांत कक्ष में रहने की व्यवस्था की थी, जहां उसे रानियों जैसी सुविधाएं उपलब्ध थीं. उस की सेवा में कई दासियां रहती थीं.

एक दिन उन्हीं में से एक दासी ने बताया, ‘‘नगर में एक दीवाना मौली मौली पुकारता घूमता है. पता नहीं कौन है मौली, उस की मां, बहन या प्रेमिका. बेचारा पागल हो गया है उस के गम में. न खाने की सुध, न कपड़ों की. एक दिन महल के द्वार तक चला आया था, पहरेदारों ने धक्के दे कर भगा दिया. कहता था, इन्हीं दीवारों में कैद है मेरी मौली.’’

मौली ने सुना तो कलेजा धक से रह गया. प्राण गले में अटक गए. लगा, जैसे बेहोश हो कर गिर पड़ेगी. वह संज्ञाशून्य सी पलंग पर बैठ कर शून्य में ताकने लगी. दासी ने उस की ऐसी स्थिति देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है, आप मेरी बात सुन कर परेशान क्यों हो गईं? आप को क्या, होगा कोई दीवाना. मैं ने तो जो सुना था, आप को यूं ही बता दिया.’’

मौली ने अपने आप को लाख संभालना चाहा, लेकिन आंसू पलकों तक आ ही गए. दासी पलभर में समझ गई, जरूर कोई बात है. उस ने मौली को कुरेदना शुरू किया तो वह न चाहते हुए भी उस से दिल का हाल कह बैठी. दासी सहृदय थी. मौली और मानू की प्रेम कहानी सुनने और उन के जुदा होने की बात सुन उस का हृदय पसीज उठा.

क्या मानू मौली से मिल सकेगा या राजा के महलों में कैद होकर रह जायेगा? जानने के लिए पढ़ें हिंदी कहानी का अगला भाग…

कर्नल का इश्क बना रिस्क

बारिश वाला प्यार : कौन थी वो? – भाग 1

राहुल मुंबई न्यूज का एक न्यूज रिपोर्टर था. 23 अक्तूबर को उस का जन्म दिन था, इसलिए वह दोस्तों के साथ पार्टी करने जा रहा था. उस दिन एक तो बारिश का सुहाना मौसम, उस पर यार दोस्तों का साथ मिल जाए तो मस्ती में सोने पे सुहागे वाला रंग चढ़ जाता है. राहुल मुंबई में अकेला रहता था, उस का परिवार कर्नाटक में था, क्योंकि उस के मम्मीपापा वहां एक स्कूल चलाते थे, इसलिए वह यहां अकेला ही रह रहा था.

राहुल पार्टी के लिए अपने दोस्तों को ले कर होटल के लिए निकला. उस ने गाड़ी ओबराय होटल के बाहर रोक कर कर दोस्तों से कहा, “यार तुम लोग गाड़ी में बैठो, बारिश तेज है. मैं जरा देख कर आता हूं कि अंदर कोई सीट है या नहीं. क्योंकि यहां भीड़ तो ऐसी होती है, जैसे पूरा मुंबई इसी होटल में आता है.’‘

जैसे ही राहुल कार का दरवाजा खोल कर होटल की तरफ बढ़ा, अचानक सामने से एक लड़की घबराई हुई लगभग भागते हुए आई और वह राहुल से टकरा गई. तभी वह लड़की राहुल की तरफ देख कर बोली, “ओह! आई एम सौरी.’‘

राहुल ने भी झट से कहा, “इट्स ओके, बाई द वे, हैव यू एनी प्राब्लम? मेरा मतलब है आप इस तरह बेतहाशा क्यों भाग रही हैं, कोई परेशानी हो तो कहिए.’‘

“जी नहीं, कोई परेशानी नहीं है. दरअसल, बारिश की वजह से मैं तेज आ रही थी.’‘

“जी, फिर ठीक है.’‘

इतने में जोर से बादलों की गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी तो उस लड़की ने डर की वजह से राहुल को जकड़ लिया.

जैसे ही राहुल ने लड़की की नजदीकी महसूस की तो उस के शरीर में भी सिहरन पैदा हुई. एक तो दोनों का जवान खून, उस पर बारिश का कहर ढहाता मौसम था. सीने की धड़कन की तरह पास गोरी चिट्टी परियों जैसी हसीना, रूप की मल्लिका थी. उस का शरीर गुंथा हुआ था. उस की सांसों से सांसें टकराईं तो राहुल जैसे होशोहवास  खो बैठा. वह बुत बना वहीं खड़ा था.

न जाने वह लड़की क्या बोल रही थी, उसे कुछ सुनाई नहीं दिया. उस की तंद्रा तब भी नहीं टूटी जब सामने से वहां टैक्सी आ कर रुकी. टैक्सी में बैठ कर वह उस की आंखों से ओझल हो गई. राहुल वहीं बारिश में ही बुत बना खड़ा रहा. गाड़ी में बैठे उस के दोस्त समझ नहीं पा रहे थे कि राहुल बारिश में खड़ा क्यों भीग रहा है.

तभी गाड़ी में से अमन बाहर निकला और उसे झिंझोड़ते हुए बोला, “ओए राहुल, क्या हुआ यार, वो लड़की क्या कह रही थी? कौन थी और कहां गई ? और तू यहां इस तरह इतनी बारिश में बुत बना क्यों खड़ा है?’‘

“अमन यार, पता नहीं कौन थी, कहां गई और क्या कह रही थी? लेकिन यार बारिश में मुझे वह जलपरी नजर आई. लगता है कोई जादू कर गई वो.’‘

“राहुल, लगता है तुझे उस से प्यार हो गया है.’‘ अमन मजाकिया लहजे में बोला.

“हां यार, शायद पहली नजर वाला, मुंबई की पहली बारिश का पहला प्यार.’‘

“चल अच्छा, अब अंदर तो चल या यहीं खड़े रहने का इरादा है क्या?’‘

“हां चल, मगर कौन थी वो इस का पता तो लगा कर रहूंगा. यार, दिल निकाल कर ले गई मेरा.’‘ राहुल बेमन से गाड़ी में चला गया, लेकिन उस के दिमाग में वह लड़की बस गई. राहुल सोचने लगा कि कल ही इस का पता करेगा और फिर अपने मम्मीपापा से कह कर उस के उस के साथ रिश्ते की बात करेगा.

जैसे ही गाड़ी होटल के गेट पर रुकी और सब उतर कर होटल में जाने लगे तो वहां खड़े वैले पार्किंग के ड्राइवर ने कहा, “सर, आज होटल में एंट्री नहीं है.’‘

“क्यों?’‘

“होटल में खून हो गया है.’‘

“क्या… खून?’‘

आश्चर्य से सब के मुंह खुले रह गए, क्योंकि ओबराय नामचीन होटलों में गिना जाता है. आज तक इस होटल के बारे में कभी कोई ऐसीवैसी बात नहीं सुनी थी. इस होटल में कोई ऐरागैरा नहीं आ सकता था, केवल नामचीन लोग जैसे बड़ेबड़े सेठसाहूकार या मंत्री लोग ही आते थे. भला ऐसे बड़े लोगों में क्या झगड़ा या खूनखराबा हो सकता है.

पूछने पर पता चला कि खून शहर के जानेमाने बिजनैस टाइकून सेठ अवस्थीजी का हुआ, उस पर और चौंकाने वाली बात कि कत्ल उन्हीं की बीवी ने किया था.

“भला ऐसा कैसे हो सकता है?’‘ राहुल सोचने लगा.

एक तो सेठ इतने भले इंसान, उस पर उन्हीं की बीवी कत्ल करे, सुन कर राहुल का दिमाग घूम गया.

सभी दोस्त दूसरे होटल जाने के लिए कह रहे थे, मगर राहुल के दिमाग में कोई खिचड़ी पकने लगी, साथ में उस के मस्तिष्क में यह बात भी बारबार आ रही थी कि बारिश वाली लड़की कौन थी?

इतने में पुलिस की जीप सायरन बजाती हुई होटल में पहुंची, जिस में 2 लेडीज पुलिस भी थीं. थोड़ी देर में पुलिस एक महिला को साथ लिए बाहर निकली और जीप में बैठ कर चली गई. तभी राहुल का फोन बज उठा. उस ने देखा एडिटर साहब का फोन था, उस ने दोस्तों से माफी मांग कर उन्हें फिर कभी पार्टी देने का वादा कर के विदा किया और बौस से बात करने लगा.

“हैलो सर.’‘

“राहुल, कहां हो तुम? इतनी बड़ी खबर पूरे शहर में फैल गई और तुम्हें पता तक नहीं, पूरी डिटेल्स ले कर पहुंचो औफिस.’‘

“सर मैं वहीं हूं, अभी थोड़ी देर में आता हूं.’‘ राहुल बोला.

उस समय किसी को भी होटल के अंदर जाने की पाबंदी थी, इसलिए राहुल थोड़ी ही देर में औफिस चला गया.

“सुना है कि सेठ अवस्थी की बीवी ने ही उस का खून किया? जल्दी से बाकी डिटेल्स बताओ ताकि सब से पहले हमारे ही अखबार में धांसू खबर छपे,’‘ एडिटर बोले.

“नहीं सर, अभी हम ये खबर नहीं छापेंगे.’‘ राहुल ने कहा.

“लेकिन क्यों? इतनी बड़ी खबर, मुंबई शहर का इतना बड़ा सेठ अपनी ही बीवी के हाथों क्यों और कैसे मारा गया. कल देखना हर पेपर के फ्रंट पेज की हैडिंग यही होगी, लेकिन हमारे पेपर में पूरी डिटेल्स होगी कि क्यों मारा उस की बीवी ने, यही तो कमाल है तुम्हारे अंदर. दूसरे पेपर में आधी खबर होती है और तुम जमीन खोद कर और आसमान फाड़ कर जो खबर लाते हो वो तहलका मचा देती है.’‘

लेकिन राहुल उलझा हुआ था, उसे लड़की और मर्डर का कनेक्शन जुड़ा हुआ लग रहा था, इसलिए वह बौस से बोला, “सर, छापने दीजिए सब को, ये खबर आधी सच्ची और आधी झूठी है. मुझे पूरी तरह इस की तह तक जाना है, जो दिख रहा है वो है नहीं, जो है वो दिख नहीं रहा.’‘

बौस यह जानते थे कि राहुल जब तक संतुष्ट न हो वो खबर नहीं देता, इसलिए वह भी चुप हो गए. लेकिन राहुल को चैन नहीं था. वह खबर की तह तक पहुंचना चाहता था. और उसी समय वह पुलिस स्टेशन पहुंच गया. उसी औरत से मिलने, जिसे पुलिस पकड़ कर ले गई थी.

वह एसएचओ से बोला, “सर, मुझे उस औरत से मिलना है, जिस ने उस देवतारूपी सेठ का कत्ल किया.’‘

“वह उन की बीवी है, उन से बिना कोर्ट की इजाजत कोई नहीं मिल सकता. कोर्ट से और्डर ले कर मिल लेना.’‘ एसएचओ ने कहा.

राहुल वापस चला गया और कोर्ट खुलने का इंतजार करने लगा. राहुल का मन यह मानने को तैयार नहीं था कि वह सेठ की बीवी है. और यही बात उस ने बौस से भी कही थी.

उस बारिश वाली लड़की का क्या संबंध था इस कत्ल से? कौन थी वो महिला जिसे पुलिस सेठ की बीवी बता रही थी? इन सभी सवालों के जवाब मिलेंगे कहानी के अगले भाग में.

मामी का जानलेवा प्यार – भाग 3

पत्नी ने बनाई हत्या की योजना

रामवीर आरती को बहुत ही प्यार करता था, लेकिन उस की शादी हो जाने के बाद वह मजबूर हो गया था. आरती ने फिर से उसे अपनाने के लिए दूसरा रास्ता दिखाया तो वह रामवीर की हत्या करने के लिए तैयार हो गया था.

वहीं आरती की हरकतों से आजिज आ कर रामवीर भी दिल्ली से नौकरी छोड़ कर बरेली अपने घर चला आया था. घर आते ही उस ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी थी. ऐसे में मानवेंद्र और आरती के मिलन में रामवीर सब से बड़ी बाधा बन गया था. रामवीर हर वक्त उसी पर नजर जमाए रहता था. इस के बावजूद भी आरती किसी न किसी तरह से मानवेंद्र से मिलती रहती थी.

आरती को पता था कि आजकल रामवीर बरेली में ही नौकरी की तलाश में लगा हुआ है. वह टाइम टाइम पर इधरउधर जाता ही रहता है. 19 सितंबर, 2023 को भी रामवीर नौकरी की तलाश में गया हुआ था. उसी समय आरती मौका पाते ही मानवेंद्र से मिली. उस ने मानवेंद्र को रामवीर की हत्या करने की योजना पूरी तरह से समझा दी थी.

रामवीर की हत्या की रूपरेखा तैयार होते ही मानवेंद्र ने इस मामले को निपटाने के लिए अपने दोस्त सौरभ को भी शामिल कर लिया था. सौरभ उर्फ छोटे रामवीर के बचपन का दोस्त था. वह भी शराब पीने का आदी था.

उसी योजनानुसार 20 सितंबर, 2023 को मानवेंद्र ने किसी अंजान फोन नंबर से रामवीर को फोन किया, “हैलो, मैं मानवेंद्र बोल रहा हूं.’’

“हां बोल, क्या कह रहा है?’’

तभी मानवेंद्र बोला, “मामा, तुम मुझ पर गलत शक करते हो. जैसा तुम सोचते हो, आरती और मेरे बीच में ऐसा कुछ भी नहीं. मैं तो केवल उस से फोन पर कभीकभार बातचीत ही कर लेता हूं. उस का भी एक कारण है. तुम तो पहले ही जानते हो कि आरती के पड़ोस में मेरे मामा रहते हैं. मेरा वहां पर पहले से ही आनाजाना लगा रहता है. इस रिश्ते से आप तो मेरे मामा हो. फिर मैं आप के साथ ऐसा काम कैसे कर सकता हूं.’’

उस के बाद मानवेंद्र ने कहा, “मामा, आज की पार्टी मेरी तरफ से है. मामा, मैं ने तुम्हारे लिए एक नौकरी की तलाश भी कर ली है. जल्दी ही वहां पर तुम्हें नौकरी मिल जाएगी. सब इंतजाम हो गया है. आप तुरंत ही नकसुआ फाटक के पास आ कर मुझ से मिलो.’’

रामवीर नौकरी के लिए काफी समय से परेशान था. जब मानवेंद्र ने उस से नौकरी लगवाने वाली बात कही तो वह खुश हो गया. रामवीर भी पक्का शराबी था. जब बात नौकरी और शराब पीने की आई तो वह मानवेंद्र के साथ पुरानी दुश्मनी को पलभर में भूल गया.

जिस वक्त वह फोन पर मानवेंद्र से बात कर रहा था, रामवीर का भाई अशोक भी उस की बात सुन रहा था. लेकिन वह किस से बात कर रहा था, वह यह नहीं समझ पाया था. घर से निकलते वक्त रामवीर ने केवल यही कहा था कि वह एक नौकरी के लिए जा रहा है. उस के बाद फोन काटते ही रामवीर ने अपनी बाइक उठाई और वह मानवेंद्र के बुलाई जगह नकसुआ फाटक के पास पहुंच गया. रामवीर के घर से निकलते ही आरती खुश हो गई थी. उसे पता था कि आज रामवीर का आखिरी दिन है.

हत्या करने के बाद लाश फेंकी ट्रैक पर

रामवीर के घर से निकलते ही आरती ने मानवेंद्र को फोन कर कहा, “बकरा हलाल होने के लिए घर से निकल गया है. काम ठीक वैसे ही करना जैसा तुम्हें बताया गया है. इस मामले में तनिक भी चूक नहीं होनी चाहिए. वरना मेरे साथसाथ तुम्हें भी जेल की हवा खानी पड़ेगी और जैसे ही वह खत्म हो जाए उस का फोटो मेरे वाट्सऐप पर भेज देना. ताकि मेरे दुखी मन को कुछ शांति मिल सके.’’

उस दिन मानवेंद्र शराब का पक्का इंतजाम कर के लाया था. रामवीर के वहां पर पहुंचते तीनों ने वहीं बैठ कर शराब पी. शराब पीतेपीते जब तीनों को नशा चढ़ने लगा तो मौका पाते ही मानवेंद्र अपनी लाइन पर आ गया. उस ने उसी समय रामवीर को प्यार से समझाते हुए आरती को तलाक देने के लिए कहा.

लेकिन तलाक की बात सामने आते ही रामवीर बिगड़ गया. फिर वह मानवेंद्र और सौरभ को भलाबुरा कहने लगा था. रामवीर के बिगड़ते ही मानवेंद्र ने रामवीर से क्षमा मांगी. उस के बाद उस ने उसे फिर से और शराब पिलाई,जिस के बाद रामवीर नशे में धुत हो गया.

रामवीर के नशे में होते ही सौरभ ने उस के गले में गमछा डाल कर खींच दिया. गला घुटते ही रामवीर ने चिल्लाने की कोशिश की तो मानवेंद्र ने उस का मुंह दबा दिया. कुछ ही देर में सांस रुकते ही रामवीर की मौत हो गई. उस के बाद दोनों ट्रेन के आने का इंतजार करने लगे. तभी मानवेंद्र ने मृत पड़े रामवीर का फोटो खींचा और आरती को वाट्सऐप कर दिया.

उस के तुरंत बाद ही मानवेंद्र ने आरती को काल कर हत्या की बात बता दी. योजना के मुताबिक सौरभ की सहायता से मानवेंद्र ने रामवीर की लाश को रेलवे ट्रैक पर डाल दिया. फिर दोनों ही रेलवे लाइन के पास छिप गए. जैसे ही ट्रेन आई, रामवीर का शरीर 2 भागों में कट गया. रामवीर के रेल से कटते ही दोनों वहां से फरार हो गए थे.

इस केस के खुलते ही पुलिस ने तीनों आरोपियों आरती, उस के प्रेमी मानवेंद्र व सौरभ को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

पत्रकारों के पूछने पर आरती ने बेबाकी से जबाव देते हुए कहा कि रामवीर की हत्या का उसे जरा सा भी अफसोस नहीं है. उस का कहना था कि रामवीर के साथ शादी कर के वह खुश नहीं थी. उस ने शादी से ही उसे अपना पति नहीं माना था. वह पहले से ही मानवेंद्र को अपना पति मानती आ रही थी.

उस ने कहा कि वह रामवीर की हत्या के शोक में न तो अपने बिछिया ही उतारेगी और न ही मौत के बाद की जाने वाली कोई भी रस्म निभाएगी. पुलिस पूछताछ के दौरान आरती ने कहा कि उसे तो हर हाल में रामवीर की हत्या करानी ही थी. वह तो उस की हत्या में कुछ गड़बड़ हो गई, अन्यथा वह पकड़ी नहीं जाती.

पत्नी जब न बनी दोस्तों का बिछौना – भाग 4

सरिता एक सप्ताह तक खाट पर पड़ी रही तथा दर्द से छटपटाती रही. उस ने मारपीट की शिकायत न तो पुलिस में की और न ही मायके वालों को कुछ बताया. वह नहीं चाहती थी कि उस का परिवार बिखरे और वह दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर हो. पति आज नहीं तो कल सुधर ही जाएगा.

लेकिन सरिता की यह सोच गलत थी. सरिता की चुप्पी से रमन को बढ़ावा मिला. वह उस पर और जुल्म ढाने लगा. सरिता का पति रमन सिर से पांव तक कर्ज में डूबा था. इस कर्ज को उतारने के लिए वह सरिता को गलत रास्ते पर ढकेलने की कोशिश कर रहा था. सरिता उस की बात मानने को राजी नहीं थी. जिस से वह उसे आए दिन शराब पी कर पीटता था. कभीकभी तो घर के बाहर भी निकाल देता था.

ससुर ने रमन को सुनाई खरीखोटी

सरिता पति के जुल्म सह रही थी. उस ने मायके वालों को इसलिए कभी कुछ नहीं बताया कि उस के मातापिता उस के गम में डूब जाएंगे, लेकिन इस के बावजूद किसी तरह उस के पिता कमलेश को बेटी पर ढाए जा रहे जुल्मों की बात पता चल गई. तब कमलेश पाल ने दामाद रमन को खूब बुराभला कहा और सुधर जाने की नसीहत दी. न सुधरने पर किसी हद तक जाने की धमकी भी दी.

कमलेश पाल की इस धमकी ने आग में घी का काम किया. शिकायत को ले कर रमन ने सरिता को खूब पीटा. उस दिन तो वह इतना हैवान बन गया कि पानी भरे टब में उस ने सरिता के बाल पकड़ कर उस के चेहरे को कई बार डुबोया. मासूम बेटी जोरजोर से रोने लगी तो उस के हाथ रुके. अन्यथा वह सरिता को डुबो कर मार ही डालता.

30 अगस्त, 2023 को रक्षाबंधन का त्योहार था. सरिता भाई को राखी बांधने मायके गहलों जाने लगी तो रमन ने मना कर दिया. मायके जाने को ले कर सरिता और रमन में बहस होने लगी. इसी बहस में रमन ने सरिता की पिटाई कर दी. लेकिन पिटाई के बावजूद सरिता नहीं मानी और बेटी को साथ ले कर मायके आ गई. यहां सरिता ने मारपीट की बात घर वालों को बताई तो उन का पारा चढ़ गया.

दूसरे रोज ही रमन ससुराल पहुंच गया. तब कमलेश पाल ने रमन को जम कर फटकार लगाई और खूब बेइज्जत किया. सरिता को भी साथ भेजने से इंकार कर दिया. सरिता ने भी रमन को बेइज्जत किया. अपमान का घूंट पी कर रमन वापस लौट आया. शाम को उस ने दोस्त अखिल व रंजीत संग शराब पी. फिर उस ने बेइज्जती वाली बात दोस्तों को बताई और सरिता को ठिकाने लगा कर बदला लेने की बात कही.

नशे में धुत अखिल व रंजीत दोस्त रमन का साथ देने को तैयार हो गए. इस की वजह यह भी थी कि अखिल व रंजीत को सरिता ने कई बार बेइज्जत किया था और घर से भगाया था. इस के बाद रमन, अखिल व रंजीत ने सरिता के अपहरण व हत्या की योजना बनाई. इस योजना में रंजीत ने अपने दोस्त सौरभ गौतम को भी शामिल कर लिया.

आखिर सरिता को लगा दिया ठिकाने

5 सितंबर, 2023 की सुबह 10 बजे रमन ने सरिता से मोबाइल फोन पर बात की और मारपीट के लिए माफी मांगी. साथ ही कहा कि वह शाम को उसे लेने आएगा, इंकार मत करना. सरिता से बात करने के बाद रमन ने चौबेपुर बाजार के शराब ठेके पर रंजीत, अखिल व सौरभ को बुलाया. कुछ देर में तीनों वहां आ गए. सभी ने बैठ कर शराब पी फिर सरिता की हत्या की योजना बनाई.

योजना के तहत शाम 6 बजे रंजीत, अखिल व सौरभ, केशरी निवादा गांव के पास नहर पट्टी सड़क पर गगनी देवी मंदिर के पास पहुंच गए. पीछे से रमन भी बाइक से वहां आ गया. सभी ने मिल कर आसपास के जंगल एरिया का जायजा लिया फिर आपस में बात की. इस के बाद दोस्तों को वहीं छोड़ कर रमन अपनी ससुराल गहलों चला गया.

गहलों पहुंच कर रमन ने सरिता को फोन कर गांव के बाहर बुला लिया फिर वह सरिता व बेटी अनिका को बाइक पर बिठा कर अपने घर की ओर चल पड़ा. अब तक सूरज छिप चुका था और अंधेरा छाने लगा था. रमन धीमी गति से बाइक चलाता हुआ केशरी निवादा गांव के पास पहुंचा.

तभी वहां स्थित देवी मंदिर के पास योजना के तहत अखिल, रंजीत व सौरभ ने रमन की बाइक रोक ली. सरिता कुछ समझ पाती, उस के पहले ही उन तीनों ने सरिता को दबोच लिया और घसीटते हुए जंगल की ओर ले गए. पीछे से रमन भी पहुंच गया. सरिता ने अपनी जान जोखिम में देखी तो वह उन से भिड़ गई. सभी ने मिल कर सरिता को खूब पीटा फिर उसी की चुनरी से उस का गला घोंट दिया और शव को बबूल के पेड़ के नीचे छोड़ आए.

हत्या करने के बाद अखिल, रंजीत व सौरभ तो फरार हो गए, लेकिन रमन पाल सड़क पर आया, जहां उस ने बाइक खड़ी की थी और मासूम बेटी अनिका डरीसहमी बैठी थी. उस ने ब्लेड से अपना हाथ जख्मी किया फिर शोर मचाने लगा.

रमन का शोर सुन कर कुछ लोग इकट्ठा हो गए. उन लोगों को उस ने बताया कि उसे जख्मी कर बदमाशों ने उस की पत्नी सरिता का अपहरण कर लिया है. कुछ देर बाद रमन ने पहले अपने ससुर कमलेश पाल को सरिता के अपहरण की सूचना दी फिर थाना शिवली पुलिस को सूचना दे दी.

सूचना पा कर शिवली थाने के एसएचओ एस.एन. सिंह घटनास्थल पहुंचे और सर्च औपरेशन शुरू किया. दूसरे रोज सरिता की लाश मिली.

8 सितंबर, 2023 को थाना शिवली पुलिस ने आरोपी रमन पाल, अखिल पाल व रंजीत को कानपुर देहात की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल माती भेज दिया गया. सौरभ गौतम कथा लिखने तक फरार था. पुलिस उसे तलाश रही थी. मासूम अनिका नाना कमलेश के संरक्षण में रह रही थी.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कविता ने लिखी खूनी कविता – भाग 1

एक दिन कविता पटेल मोबाइल के कौंटैक्ट नंबर देख रही थी, तभी उसे शादी से पहले के प्रेमी बृजेश का नंबर दिखा. नंबर देखते ही उसे पुराने दिन याद आने लगे. वह बृजेश से बात करने की कोशिश तो करती, लेकिन कुछ सोच कर रुक जाती थी.

आखिरकार एक दिन उस ने बृजेश से बात करने की गरज से फोन किया तो बृजेश बर्मन ने काल रिसीव करते हुए कहा, “हैलो कौन?’’

“बृजेश, पहचाना नहीं मुझे. तुम तो बहुत जल्दी बदल गए, अब तो मेरी आवाज भी भूल गए.’’ कविता ने शिकायती लहजे में कहा.

“जानेमन तुम्हें कैसे भूल सकता हूं. इस अननोन नंबर से काल आई तो पहचान नहीं सका.’’ बृजेश सफाई देते हुए बोला.

“तुम ने तो मेरी शादी के बाद कभी काल भी नहीं की,’’ कविता बोली.

“कविता, मैं तुम्हें दिल से चाहता था, इसलिए मैं तुम्हारा बसा हुआ घर नहीं उजाड़ना चाहता था. मैं ने अपने दिल पर पत्थर रख कर तुम्हारी खुशियों की खातिर समझौता कर लिया था,’’ बृजेश बोला.

“सचमुच इतना प्यार करते हो तो मुझ से मिलने दमोह आ जाओ, मुझ से तुम्हारी जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही.’’ कविता ने फिर से उस के प्रति चाहत दिखाते हुए कहा.

इतना सुनते ही बृजेश का दिल बागबाग हो गया. फिर एक दिन वह कविता से मिलने उस की ससुराल पहुंच गया. कई महीने बाद बृजेश और कविता ने अपने दिल की बातें कीं तो उन का पुराना प्यार जाग गया. उस के बाद दोनों की मेलमुलाकात का सिलसिला चल निकला. बृजेश से जब कविता का दोबारा संपर्क हुआ तो उस समय वह टेंट हाउस में काम करने लगा था. कविता से उस की मुलाकात अकसर कालेज जाते समय होती थी.

प्रेमी को बताती थी मुंहबोला भाई

जब बृजेश कविता की ससुराल भी आने लगा तो कविता ने अपने ससुर और पति से उस का परिचय मुंहबोले भाई के तौर पर कराया. वैसे तो कविता को दीपचंद जैसा नेक पति मिल गया था, परंतु पति के शादी के बाद नौकरी के लिए चले जाने से कविता का पुराना प्यार जाग गया था.

दीपचंद को जब कविता और बृजेश के प्रेम संबंधों का पता चला तो हंसते खेलते परिवार में कलह होते देर न लगी. लाख समझाने के बाद भी जब कविता नहीं मानी तो दीपचंद ने कविता पर सख्त पहरा लगा दिया. इस का अंजाम यह हुआ कि कविता के कहने पर बृजेश ने कविता की मांग का सिंदूर मिटा दिया.

22 जुलाई, 2023 दोपहर के करीब 2 बज रहे थे. मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल के दमोह जिले के गैसाबाद थाने में टीआई विकास सिंह चौहान अपने कक्ष में बैठे कुछ जरूरी फाइल देख रहे थे. तभी अधेड़ उम्र के एक व्यक्ति ने उन के कक्ष के बाहर से आवाज लगाई, “साब, क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’

टीआई चौहान ने एक नजर सामने खड़े उस व्यक्ति पर डालते हुए कहा, “हां, आ जाइए. बैठिए.’’

जब वह व्यक्ति कुरसी पर बैठ गया तो उन्होंने पूछा, “बताइए, क्या काम है?’’

“साहब, मेरा नाम हाकम पटेल है और मैं खैरा गांव का रहने वाला हूं. मेरा बेटा पिछले 3 दिनों से लापता है.’’

टीआई विकास सिंह चौहान ने एक कर्मचारी को पानी लाने का इशारा करते हुए हाकम पटेल से कहा, “आप इत्मीनान से मुझे पूरी बात विस्तार से बताइए.’’

“जी साहब, 19 जुलाई, 2023 की शाम 7 बजे मेरा 26 साल का इकलौता बेटा दीपचंद पटेल घर से निकला था. तब से उस का कुछ पता नहीं चल रहा है. उस का मोबाइल भी बंद आ रहा है.’’ यह कहते हुए हाकम ने कर्मचारी के हाथ से पानी का गिलास ले लिया.

“शादी हो गई बेटे की?’’ टीआई चौहान ने पूछा.

“हां साहब, 2021 में उस की शादी हो गई. बेटेबहू में किसी तरह का कोई मनमुटाव भी नहीं था.’’ गटागट पानी पीने के बाद हाकम ने बताया.

“किसी पर शक है तुम्हें, किसी से कोई रंजिश तो नहीं थी?’’

“नहीं साहब, हमारी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, इसलिए किसी पर शक भी नहीं है.’’

दीपचंद की गुमशुदगी दर्ज कराते हुए टीआई चौहान ने हाकम को भरोसा दिलाया कि पुलिस जल्द ही उस के बेटे दीपचंद को खोज निकालेगी. दीपचंद के लापता होने की खबर उस के ससुराल दमोह से सटे हुए पन्ना तक पहुंची तो दीपचंद के ससुर और साले के साथ कुछ नातेरिश्तेदार भी दमोह पहुंच गए. वे हाकम के साथ मिल कर दामाद की तलाश में जुट गए.

जैसेजैसे दिन बीत रहे थे, टीआई विकास सिंह चौहान को दीपचंद के बिना वजह लापता होने की बात खटक रही थी. दमोह जिले के एसपी सुनील तिवारी के निर्देश पर एसडीओपी (हटा) नितिन पटेल ने दीपचंद की खोजबीन के लिए एक पुलिस टीम गठित कर टीआई चौहान को पतासाजी करने के निर्देश दिए.

हाकम पटेल अपनी करीब 8-10 एकड़ जमीन पर खेतीबाड़ी करते हैं. हाकम ने 2 शादियां की थीं. पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं हुआ और कुछ समय बाद बीमारी के चलते उस की मौत हो गई तो हाकम ने दूसरी शादी कर ली तो दूसरी पत्नी से दीपचंद पैदा हुआ.

दीपचंद जब छोटा ही था कि उस की मां घर छोड़ कर किसी दूसरे मर्द के साथ चली गई. पिता हाकम ने दीपचंद को लाड़प्यार से पालापोसा. दीपचंद केवल 12वीं कक्षा तक ही पढ़ाई कर पाया था. जवान होते ही दीपचंद की शादी पन्ना जिले के सुनवानी गांव की कविता से कर दी गई.

कविता के कदम दीपचंद के घर में पड़ते ही बाप बेटे काफी खुश थे, क्योंकि लंबे अरसे बाद घर में कोई महिला आई थी. दोनों चूल्हा फूंकफूंक कर थक चुके थे, ऐसे में कविता ने जब इस घर की दहलीज पर कदम रखा तो जल्द ही वह दोनों की आंखों का तारा हो गई. ससुर हाकम उसे बेटी की तरह दुलारते तो दीपचंद भी उस की हर ख्वाहिश पूरी करता.

पुलिस के लिए दीपचंद की गुमशुदगी एक पहेली बनी हुई थी. दीपचंद की न तो किसी से रंजिश थी और न ही कोई दुश्मनी. गांव में पूछताछ के दौरान भी कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा, जिस से दीपचंद का पता चल सके. पुलिस की आखिरी उम्मीद दीपचंद की काल डिटेल्स रिपोर्ट पर टिकी हुई थी.

पुलिस ने जब दीपचंद के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि दीपचंद की 19 जुलाई की शाम आखिरी बार पन्ना के लोहरा गांव में रहने वाले बृजेश बर्मन उर्फ कल्लू से बात हुई थी. इस के बाद पुलिस ने बृजेश बर्मन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि बृजेश की सब से ज्यादा बात चिकला निवासी गणेश विश्वकर्मा से हुई थी. दीपचंद समेत तीनों के फोन नंबर भी टावर लोकेशन में एक साथ खैरा गांव में मिले. इस से साफ हो गया था कि घर से दीपचंद इन दोनों के साथ ही निकला था.

दीपचंद का मोबाइल बंद होने से पहले की आखिरी टावर लोकेशन गांव वर्धा की थी. इसी टावर लोकेशन में गणेश विश्वकर्मा व बृजेश बर्मन के मोबाइल फोन भी बंद हो गए थे. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस टीम को पूरा भरोसा हो गया कि दीपचंद के लापता होने के बारे में इन दोनों को जरूर कुछ पता होगा.

पुलिस टीम के लिए एक चौंकाने वाली बात यह पता चली कि बृजेश बर्मन उर्फ कल्लू की काल डिटेल्स में दीपचंद की पत्नी कविता का नंबर भी मिला. 19 जुलाई, 2023 को भी बृजेश और कविता के बीच बातचीत हुई थी. इस के पहले भी दोनों के बीच लगातार बात होने की पुष्टि हुई.

पुलिस ने बृजेश बर्मन और फिर गणेश विश्वकर्मा को हिरासत में ले कर पूछताछ की. पहले तो बृजेश ने यह कह कर पुलिस को बरगलाने की कोशिश की कि वह कविता को बहुत पहले से जानता है वह उस के मायके में किराए पर रह चुका है. इसी जानपहचान के चलते कविता से बात करता रहता था. पुलिस को उस की बात पर भरोसा नहीं हुआ. पुलिस के संदेह की सुई बृजेश के इर्दगिर्द घूम रही थी.

पुलिस ने तुक्का मारते हुए बृजेश से कहा, “कविता ने सब कुछ बता दिया है, अब तुम्हारी बारी है. सच बताओगे तो ठीक नहीं तो दूसरा ही तरीका अपनाना पड़ेगा.’’

आखिरकार, तीर निशाने पर लगा और पुलिस की सख्ती के आगे बृजेश बर्मन टूट गया. बृजेश ने दीपचंद की हत्या की पूरी साजिश और हत्या की जो कहानी सुनाई, वह पुराने प्रेम संबंधों की कहानी निकली, जिस में अपने प्रेमी के लिए कविता ने अपनी मांग का सिंदूर ही मिटा दिया. बहू की यह करतूत जान कर दीपचंद के पिता हाकम पटेल के पैरों से तो जैसे जमीन ही खिसक गई.