लक्ष्मण रेखा लांघने का परिणाम – भाग 3

बस, मैं खुदगर्ज हो गई. नहा कर मैं ने बढि़या कपड़े और गहने पहने, शृंगार किया. आइने के सामने खड़ी हुई तो यह बदलाव मुझे अच्छा लगा. मैं बच्चों के बारे में सोच रही थी कि मेरी सहेली नीरू आ गई. वह और उस के पति अशोक हमारे अच्छे दोस्तों में थे. नीरू ने कहा, ‘‘भई हम तुम्हें लेने आए हैं. अशोक बाहर गाड़ी में तुम्हारा और बच्चों का इंतजार कर रहे हैं. आज न्यू ईयर्स पर बच्चे घर में ही सेलीब्रेट कर रहे हैं. चलो जल्दी करो.’’

मुझे बढि़या मौका मिल गया. मैं ने बड़ी ही मोहब्बत से कहा, ‘‘नीरू, अभी तुम मेरे बच्चों को ले कर चलो. मुझे कुछ जरूरी काम है, मैं एक घंटे बाद आ जाऊंगी.’’

मेरे अंदर छिपे पाप को नीरू समझ नहीं सकी और जल्दी आने के लिए कह कर मेरे बच्चों को ले कर चली गई.

अब मेरा रास्ता साफ था. बादल घेरे हुए थे. हल्कीहल्की बूंदे पड़ रही थीं. ठंडी हवाएं मेरी जुल्फों को बिखेर रही थीं. अंदर की सारी जलन खत्म हो गई थी. मैं ने टैक्सी की और होटल ताज पैलेस पहुंच गई. असलम बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था. उस ने हौले से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे होटल के बैंक्वेट हौल में ले गया. वहां हर ओर मस्ती का आलम था.

असलम ने एक शानदार सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘बैठो.’’

मैं बैठ गई. थोड़ी खामोशी के बाद बातचीत शुरू हुई. धीरेधीरे हम बेतकल्लुफ होते गए. उसे पता चला कि मैं बेहद दुखी हूं. उस ने मेरी दुखती रग पकड़ ली. मेरी कहानी सुनने के बाद उस ने कहा, ‘‘गिरने वालों को संभाल भी कौन सकता है.’’

मैं ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘समय आने पर वह भी बता दूंगा,’’ असलम ने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रख कर कहा, ‘‘आप ने अपनी पूरी कहानी सुना दी, लेकिन नाम नहीं बताया.’’

‘‘शबनम.’’ मैं ने हंस कर कहा.

‘‘वाकई तुम शबनम की तरह पाक और खूबसूरत हो. तुम कितनी हसीन हो, शायद यह तुम्हें पता नहीं. यह हम जैसे कद्रदानों को ही पता होगा. जब से मैं ने तुम्हें देखा है, तभी से बेचैन हूं. मैं तुम्हारा दीवाना हूं.’’

उस दिन के बाद हमें जब भी मौका मिलता, हम मिल लेते. हर मुलाकात में वह कुछ ऐसा कह देता कि मेरा सोया जमीर जाग उठता. वह अकसर कहता कि अगर भीख में उजाला मिलता है तो कभी मत लेना. किसी की ज्यादती सहना भी गुनाह है. हालात कितने भी बुरे क्यों ना हों, हर मोड़ पर मंजिल की तलाश करनी चाहिए.

धीरेधीरे मैं उस के रंग में रंगती चली गई. उस ने मुझ से वादा किया कि हम अमेरिका पहुंच कर निकाह करेंगे. मैं उस के साथ ऐशोआराम के सपने देखने लगी. मुझे लगता, अगर इतना प्यार करने वाला पति हो तो पति और बच्चे क्या, मैं पूरी दुनिया को ठोकर मार दूं.

और फिर मेरी जिंदगी में वह काली रात आ गई. शायद उस रात मेरा दिल पत्थर का हो गया था. मैं ने अपने सारे गहने तथा नकदी एक अटैची में रखी और जब सभी लोग सो गए तो रात 12 बजे घर से बाहर आ गई. सुबह 3 बजे हमारी फ्लाइट थी. असलम टैक्सी लिए खड़ा था. मेरे बैठते ही टैक्सी चल दी.

पूरे रास्ते मुझे अपराधबोध सताता रहा और बेसाख्ता आंसू बहते रहे. मुझे अपने बच्चों की याद आ रही थी. क्योंकि अभी उन्हें मेरी जरूरत थी. लेकिन बच्चों की दादी उन्हें जान से भी ज्यादा चाहती थी, इसलिए यह बात जल्दी ही खयालों से निकल गई. वह उन्हें पालपोस लेगी.

सागर भी बच्चों को बहुत चाहता था. बेटी को तो वह पलकों पर रखता था. डांटता और नजरअंदाज करता था तो सिर्फ मुझे. एक कुटिल सी मुसकान मेरे होंठों पर तैर गई. मुझे लगा, मैं ने उसे अच्छा सबक सिखाया है. वहां किसी को मेरी जरूरत नहीं थी.

हम अपने मुकाम पर पहुंच गए. रास्ते भर असलम ने मेरा बहुत खयाल रखा. असलम की कोठी देख कर मैं बहुत खुश हुई. चारों तरफ बगीचे, फूलों से लदे पेड़, पिछवाड़े बहता झरना, जगहजगह लालनीलीपीली बत्तियां, फैंसी परदे, झाड़फानूस. लगा धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो बस यहीं है. काजी और कुछ लोगों की हाजिरी में हमारा निकाह हो गया. ऐसा उस ने इसलिए किया था कि मैं बहुत घबराई हुई थी. इस के अलावा निकाह के बिना मैं उस की किसी बात पर रजामंद नहीं थी.

बाद में पता चला कि वह कोठी किराए की थी. एक रात असलम काफी देर से 8-10 दोस्तों के साथ आया. वे शक्ल से मालदार, लेकिन गुंडे नजर आ रहे थे. वे एक कमरे में बैठ कर बातें करने लगे. जब मैं ने उन की बातें सुनीं तो लगा मुझे गश आ जाएगा.

वे सब के सब स्मगलर थे. उन के सारे गैरकानूनी धंधों का मुखिया असलम था. जब उसे पता चला कि मुझे उस की असलियत मालूम हो गई है तो वह मेरे सामने पूरी तरह खुल गया. अपने हर काले धंधे में मुझे शामिल करने लगा. इस तरह धीरेधीरे मैं भी गुनाहों के दलदल में धंसती चली गई. खूबसूरत लड़कियों को फंसा कर गुनाहों में शामिल करना असलम का मुख्य धंधा था.

मैं ने निकाह का हवाला दिया तो उस ने कहा, ‘‘निकाह तो एक रस्म अदायगी थी. निकाह तो मैं ने ना जाने कितने किए हैं.’’

अब मैं ऐसे अंधियारे गलियारे से गुजर रही थी, जहां रोशनी की किरणें भी रोशनी की मोहताज थीं. उस दिन मैं उस के काले धंधे में नहीं गई तो उस ने मेरी जम कर पिटाई की. उस ने कहा, ‘‘तू किसी की नहीं हो सकती. मेरे झूठे फोन पर तू सागर को छोड़ कर यहां आ गई. अब किसी और के फोन आएंगे तो तू उस के साथ भाग जाएगी. औरत का नाम ही बेवफा है.’’

‘‘क्या कहा तुम ने, वह फोन तुम करते थे? इस का मतलब मेरा सागर बेवफा नहीं था? मेरी खूबसूरती देख कर तुम ने मुझे बरगलाया? कमीने कहीं के.’’ कह कर मैं असलम पर झपटी तो उस ने मुझे धक्का दे दिया. मैं गिरी तो मेरे सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. सागर और बच्चों को याद कर के मैं रोने लगी.

मजबूर जिंदगी किसी भी बदलाव का स्वागत नहीं कर सकती. तेज आंधियां मुझे बुझाने का जतन कर रही थीं. अब तो वैसे भी अंधेरे से दोस्ती हो गई थी. इस अंधेरे के खिलाफ जेहाद करना मेरे बस में नहीं रह गया था. विश्वास की माला टूट चुकी थी और मनके बिखर चुके थे.

इतनी चोट खाने के बाद भी मैं किसी तरह उठी. असलम के जाने के पदचाप मुझे राहत दे रहे थे. आज इतने सालों बाद मैं ने अपने घर फोन किया. उधर से सागर ने फोन उठाया. घबराहट और शर्मिंदगी भरे लहजे में मैं ने कहा, ‘‘मैं शबनम…’’

‘‘कौन शबनम…? उसे मरे तो एक अरसा गुजर गया है. आज मेरी बेटी की शादी है, थोड़ा जल्दी में हूं.’’

कह कर सागर ने फोन काट दिया.

मेरी जैसी चरित्रहीन औरतों का शायद यही हश्र होता है. जबजब औरतों ने लक्ष्मण रेखा लांघी है, वह तबाही ही लाई है.

सनक में कर बैठी प्रेमी के दोस्त की हत्या

प्यार की जीत : सुनीता और सुमेर की प्रेम कहानी – भाग 1

राजस्थान की स्वर्णनगरी जैसलमेर शहर के कल्लू की हट्टो के पास स्थित मोहल्ला कंसारापाड़ा के रहने वाले भगवानदास सोनी की पत्नी  सुबह सो कर उठीं तो उन्हें बेटी की चारपाई खाली दिखी. उन्हें लगा, सुनीता वौशरूम गई होगी. लेकिन जब वह वौशरूम की तरफ गईं तो उस का दरवाजा खुला था. सुनीता वैसे भी उतनी सुबह उठने वालों में नहीं थी. वौशरूम खाली देख कर उन्हें हैरानी होने के साथसाथ बेटी को ले कर उन्होंने जो अफवाहें सुन रखी थीं, संदेह भी हुआ.

वह भाग कर कमरे में पहुंची तो अलमारी खुली पड़ी थी और उस में से सुनीता के कपड़े गायब थे. अलमारी में रखा एक बैग भी गायब था. अब उन्हें समझते देर नहीं लगी कि सुनीता कहां है? वह सिर थाम कर वहीं बैठ गईं और जोरजोर से रोने लगीं.

उन के रोने की आवाज पति भगवानदास और बेटे ने सुनी तो वे भाग कर उन के पास आ गए और पूछने लगे कि सुबहसुबह ऐसा क्या हो गया कि वह इस तरह रो रही हैं. वह इतने गहरे सदमे में थीं कि उन के मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी. भगवानदास ने जब झकझोर कर पूछा, ‘‘अरे बताओगी भी कि क्या हुआ?’’

तो उन्होंने कहा, ‘‘क्या बताऊं, गजब हो गया. जिस बात का डर था, आखिर वही हुआ. सुनीता कहीं दिखाई नहीं दे रही है. अलमारी से उस के कपड़े और बैग भी गायब है.’’

भगवानदास सोनी को भी समझते देर नहीं लगी कि सुनीता प्रेमी के साथ भाग गई है. वह भी सिर थाम कर बैठ गए. पलभर में यह खबर पूरे घर में फैल गई. पूरा परिवार इकट्ठा हो गया. इस के बाद सुनीता के प्रेमी सुमेरनाथ गोस्वामी के बारे में पता किया गया. वह भी घर से गायब था.

संदेह यकीन में बदल गया. धीरेधीरे बात पूरे मोहल्ले में फैलने लगी. लोग भगवानदास सोनी के घर इकट्ठा होने लगे. बात इज्जत की थी, समाज बिरादरी में हंसी फजीहत की थी, इसलिए सलाहमशविरा होने लगा कि अब आगे क्या किया जाए.

दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है, इसी के साथ तमाम बदलाव भी आए हैं. इस के बावजूद आज भी देश में ऐसे तमाम इलाके हैं, जहां आधुनिक होते हुए भी लोग अपनी परंपराओं में जरा भी बदलाव नहीं ला पाए हैं. वैसे ही इलाकों में एक है पश्चिमी राजस्थान का जैसलमेर. यहां हर जाति की अपनी अलगअलग परंपराएं हैं.

दुनिया भले ही 21वीं सदी में पहुंच गई है, कंप्यूटर ने पूरी दुनिया को एक जगह समेट दिया है, पर जैसलमेर के लोग अपनी परंपराओं को बिलकुल नहीं बदल पाए हैं. जबकि यह भारत का एक ऐसा पर्यटनस्थल है, जहां पूरी दुनिया से लोग आते रहते हैं. कह सकते हैं कि एक तरह से यह नगर पूरी दुनिया की सभ्यता का केंद्र है.

विदेशों से आने वाले पर्यटक लड़कियों का हाथ पकड़ कर घूमते हैं. यह सब देख कर भी यहां के लोग प्रेम या प्रेम विवाह के नाम से घबराते हैं. यहां के लोग अपने ही समाज और जाति बिरादरी में शादी करते हैं. अगर किसी की लड़की या लड़के ने गैरजाति में शादी कर ली तो उसे जाति से बाहर कर दिया जाता है. कोई भी न उस के घर जाता है और न उसे अपने घर आने देता है. ऐसे में घर के अन्य बच्चों की शादियों में रुकावट आ जाती है. इसीलिए यहां के लोग प्रेम विवाह करने से बचते हैं.

नई पीढ़ी इस परंपरा से परेशान तो है, लेकिन इसे तोड़ने की हिम्मत नहीं कर पा रही है. इस परंपरा में सब से बड़ी परेशानी यह है कि घर वाले शादी अपनी मरजी से करते हैं. कुछ जातियों में तो आज भी शादी के पहले लड़का न लड़की को देख सकता है और न लड़की लड़के को. ऐसे में घर वाले कभी पढ़ेलिखे लड़के की शादी अनपढ़ लड़की से कर देते हैं तो कभी पढ़ीलिखी लड़की अनपढ़ लड़के से ब्याह दी जाती है.

इस का दुष्परिणाम भी सामने आ रहा है. तमाम पतिपत्नी में विलगाव हो रहा है. लेकिन ज्यादातर लड़केलड़कियां ऐसे हैं, जो न चाहते हुए भी जिंदगी निर्वाह करते हैं. बालविवाह पर रोक तो लग गई है, लेकिन रिवाज के अनुसार यहां आज भी सगाई किशोरावस्था तक पहुंचतेपहुंचते कर दी जाती है. बाद में शादी उसी से होती है, जिस के साथ सगाई हुई होती है. सगाई भी इस तरह होती है कि जान कर हैरानी होती है.

एक कोठरी में बड़ेबुजुर्ग बैठ कर लड़का लड़की के नाम खोलते हैं. जिस लड़की का जिस लड़के के साथ नाम खुल जाता है, अफीम और गुड़ बांट कर उस के साथ उस की सगाई पक्की कर दी जाती है. इस के बाद अगर कोई सगाई तोड़ता है तो उसे भारी जुर्माना देना पड़ता है. इसलिए सगाई हो गई तो शादी पक्की मानी जाती. ये परंपराएं तब बनी थीं, जब लोग अनपढ़ थे. आज लोग पढ़लिख गए हैं, लेकिन परंपराओं और प्रथाओं में कोई बदलाव नहीं आया है.

परंपराओं और प्रथाओं में बंधे होने की वजह से बेटी के इस तरह भाग जाने से  भगवानदास सोनी और उन के घर वालों को भी जाति से बाहर किए जाने और अन्य बच्चों की शादियों की चिंता सताने लगी थी. उन के लिए परेशानी और चिंता की बात यह थी कि वे बात को आगे बढ़ाते थे तो उन्हीं की बदनामी होती थी. इस के बावजूद वे शांत हो कर बैठ भी नहीं सकते थे.

बात बिरादरी की इज्जत की थी, इसलिए सभी ने सलाहमशविरा कर के तय किया कि जो हुआ, वह ठीक नहीं हुआ. आगे फिर कभी ऐसा न हो, इसलिए सुनीता को भगा कर ले जाने वाले सुमेरनाथ को सबक सिखाने के लिए उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराना जरूरी है. इस के बाद भगवानदास सोनी अपने कुछ शुभचिंतकों के साथ महिला थाने पहुंचे और सुमेरनाथ गोस्वामी के खिलाफ सुनीता को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए जो तहरीर दी,

उस में लिखा, ‘मेरी बेटी को दिनांक 2 जुलाई, 2014 को 3 बजे सुबह के आसपास मेरे घर से सुमेरनाथ गोस्वामी पुत्र ईश्वरनाथ गोस्वामी बहलाफुसला कर शादी करने की नीयत से भगा ले गया है.’

महिला थाने में सुमेरनाथ गोस्वामी के खिलाफ सुनीता सोनी को भगा ले जाने की रिपोर्ट भगवानदास सोनी द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर दर्ज कर ली गई. इस के बाद इस घटना की जानकारी पुलिस अधीक्षक विजय शर्मा और उपपुलिस अधीक्षक अशोक कुमार को दे दी गई. पुलिस अधिकारियों ने महिला थाना की थानाप्रभारी को जल्दी से जल्दी अभियुक्त सुमेरनाथ को गिरफ्तार कर लड़की बरामद करने के निर्देश दिए.

अधिकारियों के निर्देश पर महिला थाने की थानाप्रभारी ने सबइंसपेक्टर भवानी सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित कर अभियुक्त सुमेरनाथ की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी सौंप दी. भवानी सिंह का मुखबिर तंत्र बहुत मजबूत था. उन्होंने अपने मुखबिरों को सुमेरनाथ के बारे में पता लगाने के लिए लगा दिया.

इसी के साथ सुमेरनाथ और सुनीता की खोज रेलवे स्टेशनों और बसअड्डों पर की जाने लगी. लेकिन इन जगहों से उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इसी क्रम में पुलिस टीम पोकरण, फलोदी, बालोतरा, पाली, अजमेर, अलवर और बीकानेर तक ढूंढ़ने गई, लेकिन इन जगहों पर भी उन के बारे में कुछ पता नहीं चला.

लक्ष्मण रेखा लांघने का परिणाम- भाग 2

अब मुझे अपना घर, मांबाप और छोटा भाई याद आने लगा. उन से रिश्ते तोड़ कर इस घर को अपनाने का अब मुझे पश्चाताप होने लगा. मां मुझे कितना प्यार करती थी, वह मेरी हर जरूरत को समझती थी, इस के बावजूद मैं ने उस के प्यार को ठोकर मार दी थी.

पापा ने गुस्से में कहा था, ‘‘तू ने जो किया है, उस से हम तो सारी जिंदगी रोएंगे ही, तू भी खुश नहीं रहेगी. तू एक बदनाम और अय्यास लड़के को अपना जीवनसाथी बना रही है न, वह तुझे कभी चैन से नहीं रहने देगा. मेरी तरह तू भी सारी उम्र रोएगी.’’

इन शब्दों को सुनने के बाद मैं उन के पास कैसे जा सकती थी. एक बार, सिर्फ एक बार मैं मां की गोद में मुंह छिपा कर रोना चाहती थी. अब मुझे पता चला कि मांबाप के आशीर्वाद की क्यों जरूरत होती है. आशीर्वाद अपने आप में एक महान अर्थ लिए होता है, जिस के बिना मैं अधूरी रह गई थी.

वह रात मैं जिंदगी में कभी नहीं भूल सकती. उस तनाव में भी मैं ने सागर से वह रात अपने लिए उधार मांगी थी. 2 अक्तूबर हमारी शादी की सालगिरह थी. कई सालों बाद मैं ने उस रात मन से शृंगार किया. गुलाबी रंग का सूट पहन कर मैं सागर के साथ होटल में डिनर के लिए तैयार हो गई. सागर ने कहा था कि वह होटल जा कर वापस आ जाएगा. लेकिन गया तो लौटा नहीं.

शायद वह सोच कर गया था कि उसे वापस नहीं आना है. उस के इंतजार में मैं बाहर बगीचे में टहलती रही. चांद नाशाद था. तारे भी खामोश थे, मेरी बेबसी पर फिजाएं भी सहमीसहमी सी थीं. टहलतेटहलते मुझे लगा कि 2 आंखें मेरा पीछा कर रही हैं. सामने वाले फ्लैट की खिड़की पर खड़ा एक खूबसूरत सा युवक सिगरेट पीते हुए मेरी ओर ताक रहा था. वह काफी बुझाबुझा और परेशान लग रहा था.

सफेद कमीज और नीले कोट में वह युवक काफी दिलकश लग रहा था. बरबस मैं उस की ओर खिंचती चली गई. मैं ने कई बार उस लड़के की ओर देखा तो नीचे आ कर उस ने अपना परिचय दिया. उस ने बताया कि वह उसी दिन वहां शिफ्ट हुआ था. वह फ्लैट उस ने किराए पर लिया था. उस का नाम असलम था. बेसाख्ता मैं ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘अगर किसी भी चीज की जरूरत हो तो बिना झिझक बताइएगा.’’

इस के बाद वह रोजाना बच्चों के साथ खेलता दिखाई देने लगा. कभी उन के लिए चौकलेट लाता तो कभी गुब्बारे. अकसर उन्हें घुमाने भी ले जाता. मेरे ससुर के पास बैठ कर घंटों राजनीति पर बातें करता. जल्दी ही वह उन का अच्छा दोस्त बन गया. मांजी को अम्मी कहता तो वह निहाल हो जातीं. मांजी उसे तरहतरह की डिशेज बना कर खिलातीं.

धीरेधीरे वह सभी के दिलों में उतर गया. वह जब भी हमारे घर आता, उस की निगाहें कुछ खोजती सी रहतीं, हंसतेहंसते वह मायूस सा हो जाता. उसे क्या पता था कि 2 प्यार की प्यासी आंखें हर वक्त उस पर नजर रखती हैं. इधर कुछ दिनों से उस की बेतकल्लुफी बढ़ती जा रही थी. सागर के रात भर गायब रहने और दिन भर सोते रहने से उसे हमारे घर आने की पूरी आजादी थी.

आज भी वह मनहूस रात याद आती है तो मैं शरम से लाल हो जाती हूं. वह 31 दिसंबर की रात थी. न्यू ईयर की वजह से उस पूरी रात सागर को होटल में रहना था. मेरे सासससुर मनाली घूमने गए थे. मेरे बच्चे खापी कर सो गए थे. अचानक दरवाजे पर धीरेधीरे दस्तक हुई. मुझे लगा, मुझे वहम हो रहा है.

मगर दस्तक लगातार होती रही तो मैं ने जा कर दरवाजा खोला. बाहर असलम खड़ा था. वह पूरी तरह से भीगा हुआ था. उस ने बताया कि उस के घर की चाबी औफिस की ड्राअर में रह गई है और बारिश इतनी तेज है कि चाबी लेने जाना मुमकिन नहीं है.

मुझे उस पर रहम और प्यार दोनों आया. उसे अंदर आने के लिए कह कर मैं बगल हो गई. सागर के कपड़े दे कर मैं ने उसे कौफी बना कर दी. बिजली तड़पने के साथ तेज हवाएं बारिश को बहका रही थीं. हम दोनों कौफी पीते हुए छिपछिप कर एकदूसरे को देखते रहे.

खाना खा कर वह एक किताब ले कर पढ़ने लगा. मैं खिड़की के पास खड़ी हो कर बारिश का लुत्फ ले रही थी. उस दिन उस ने बताया कि वह अनाथ है. किसी रिश्तेदार ने भी उसे सहारा नहीं दिया. किसी तरह उस ने पढ़ाई पूरी की और अब वह एक मालदार आदमी के साथ बिजनैस करता था, जिस में उसे लाखों का फायदा होता था.

उस ने बताया था कि अमेरिका में उस की 4 बड़ीबड़ी कोठियां हैं, जिन में वह राजाओंमहाराजाओं की तरह रहता है. उस के यहां कई नौकर हैं. ऐशोआराम के सभी साधन हैं. बस उसे कमी है तो एक जीवनसाथी की.

धीरेधीरे मैं भी उस के आगे बेपर्दा होने लगी. मैं ने उसे बताया कि मांबाप के लिए अब मैं एक गुजरा वक्त हो चुकी हूं, जो कभी लौट कर नहीं आ सकता. सागर की बेवफाइयां बतातेबताते मेरी हिचकियां बंध गईं. बरसों बाद मुझे एक साथी मिला था, जिस के आगे मैं ने सारे जख्म खोल कर रख दिए. सागर की बेवफाइयां बतातेबताते मैं कितनी निरीह लग रही थी. मेरी बातें सुनतेसुनते अचानक असलम उठा और मेरे सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जिन की पहचान न हो, वही हमसफर होते हैं. तूफानों के थपेड़ों से कटकट कर ही तो इतने प्यारे साहिल बनते हैं.’’

उस के इस तरह तसल्ली देने पर रोतेरोते मैं उस के सीने से कब जा लगी, मुझे पता ही नहीं चला. वह मेरे बाल सहलाता रहा और मैं रोती रही. अचानक उस ने कहा, ‘‘अब मुझे चलना चाहिए. अगर कोई आ गया तो बिना मतलब बदनाम हो जाओगी. हां, तुम्हारी परेशानी का कोई न कोई तो हल होगा ही? परसों तुम मुझे ताज पैलेस में मिलना, वहीं विचार किया जाएगा.’’

मैं कुछ कहती, उस के पहले ही उस ने कहा, ‘‘नहीं, आज ही न्यूइयर्स है, मिल कर मनाएंगे और खूब बातें करेंगे. ठीक है ना?’’

अपनी बातों से असलम मुझे एक निहायत ही शरीफ और सुलझा हुआ आदमी लगा. उस पर भरोसा ना करने की कोई वजह नहीं थी. नाकामियों ने मुझे तोड़ कर रख दिया था. यह तल्ख हकीकत है कि हौसला छोड़ देने से नई मंजिल नहीं मिलती. जबकि अब मुझे नई मंजिल की तलाश थी.

नया साल था और पति से अलग यहां मैं अकेली थी. बड़ी इज्जत के साथ मैं बेइज्जत हो रही थी. अलसाई सी मैं उठी और एक कप चाय बना कर बगीचे में आ कर बैठ गई. सामने नजर गई तो असलम खिड़की पर खड़ा सिगरेट पी रहा था. इशारेइशारे में हमारा सलाम एकदूसरे तक पहुंचा गया.

नए साल पर सागर की डबल ड्यूटी होती थी. विदेशी युवतियों से भरा होटल सेंट्स और फूलों की महक से गमक रहा होता था. सागर मस्ती में डूबा होगा, यह खयाल मन में आते ही मैं जलन के मारे सुलग उठी. सागर से बदला लेने के लिए मन मचल उठा. आखिर कितने दिनों तक मैं अंधेरे में रहूंगी. क्या मेरी छवि को ग्रहण लग गया है. जिस तरह नदी रेगिस्तान में मिल कर रेत हो जाती है, कुछ वैसा ही हाल मेरा भी था.

पूरी न हुई ख्वाहिश

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के रहने वाले रीतेश का अपना छोटा सा टेंट का कारोबार था. जिस के  लिए उस ने अपने 3 मंजिला मकान के नीचे वाले हिस्से में गोदाम बना रखा था. पहली मंजिल पर पत्नी स्मिता और 6 साल के बेटे यथार्थ के साथ वह खुद रहता था तो दूसरी मंजिल उस ने किराए पर उठा रखी थी, जिस में मझोले अपनी पत्नी शारदा के साथ रहता था. वह भी छोटामोटा काम कर के गुजरबसर कर रहा था.

रीतेश की पत्नी स्मिता कानपुर के मूलगंज स्थित नौगढ़ खोयामंडी की रहने वाली थी. उस ने कानपुर विश्वविद्यालय से बीए किया था. उस के अलावा उस की 2 बहने और 2 भाई थे. सभी की शादियां हो चुकी थीं. स्मिता सब से छोटी थी, इसलिए वह बहुत लाड़प्यार से पली थी. सयानी होने पर घर वालों ने उस की शादी लखनऊ के रहने वाले टेंट कारोबारी रीतेश से कर दी थी.

रीतेश का पूरा परिवार कारोबारी था, इसलिए पढ़लिख कर उस ने भी अपना अलग कारोबार कर लिया था. लखनऊ में उस का अपना 3 मंजिला मकान था. यही सब देख कर स्मिता के घर वालों को लगा था कि रीतेश से शादी होने पर उस का जीवन हंसीखुशी से गुजर जाएगा. स्मिता पढ़ीलिखी भी थी और सुंदर भी, इसलिए पहली ही नजर में रीतेश और उस के घर वालों ने उसे पसंद कर लिया था.

रीतेश से शादी कर के स्मिता लखनऊ आ गई. शादी के बाद कुछ दिन तो दोनों के बढि़या गुजरे. लेकिन उस के बाद दोनों के संबंध बिगड़ने लगे. जहां पहले बातबात में प्यार बरसता था, अब बातबात में झगड़ा होने लगा. इस की सब से बड़ी वजह थी रीतेश की नशे की लत. वह किसी एक चीज का आदी नहीं था. वह नशे के लिए गांजा और शराब तो पीता ही था, कुछ न मिलने पर भांग भी खा लेता था.

पति की नशे की लत से जहां स्मिता असहज रहने लगी थी, वहीं रीतेश चिड़चिड़ा हो गया था. बिना नशा के वह रह नहीं सकता था, जबकि स्मिता उसे इन सब चीजों से दूर रहने को कहती थी. यही वजह थी कि रीतेश शाम को नशे में झूमता घर लौटता तो स्मिता टोंक देती. उस के बाद दोनों में झगड़ा होने लगता. स्मिता ने पति को सुधारने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा.

शादी के 3 सालों बाद रीतेश के यहां एक बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम उस ने यथार्थ रखा. बेटा पैदा होने के बाद उस का ध्यान पत्नी की ओर से बिलकुल हट गया. अब वह सिर्फ बेटे को ही प्यार करता था.

रीतेश और स्मिता के स्वभाव में काफी अंतर था. जहां स्मिता खुशदिल और जीवन में आगे बढ़ने के सपने देखने वाली थी, वहीं रीतेश की सोच सिर्फ नशे तक सीमित थी. उसे जितनी चिंता नशे की होती थी, उतनी काम की भी नहीं होती थी. यही वजह थी कि शाम होते ही दोस्तों के साथ उस की महफिल जम जाती थी.

अब वह स्मिता से ठीक से बात भी नहीं करता था. शायद इसीलिए स्मिता कुछ कहती तो वह अनसुना कर देता था. अगर सुन भी लेता तो उसे पूरा नहीं करता था. पति की यह लापरवाही स्मिता को बहुत बुरी लगती थी. इस पर स्मिता को भी गुस्सा आ जाता था और पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा होने लगता था.

इधर वह दोस्तों के साथ कुछ ज्यादा ही महफिल जमाने लगा था. इन महफिलों का असर उस के कारोबार पर ही नहीं, घरगृहस्थी पर भी पड़ रहा था. क्योंकि नशे के चक्कर में उस का ध्यान दोनों चीजों से हट गया था. स्मिता की बातों पर तो ध्यान देना उस ने पहले ही बंद कर दिया था. अब लड़ाईझगड़े की भी चिंता नहीं रहती थी, इसलिए वह मन का मालिक हो गया था.

इन बातों को ले कर उस की किराएदार शारदा भी हंसती थी. स्मिता देख रही थी कि उस के किराएदार कितने प्यार और समझदारी से रहते थे, जबकि वे हमेशा लड़तेझगड़ते रहते थे.

एक दिन स्मिता ने रीतेश से बासमती चावल लाने को कहा तो शाम को रीतेश नशे में लड़खड़ाता खाली हाथ घर आ गया. उस की इस हरकत से उसे गुस्सा आ गया. उस ने गुस्से में पैर पटकते हुए कहा, ‘‘कितना कहा था कि यथार्थ बिना चावल के खाना नहीं खा रहा है, फिर भी तुम हाथ झुलाते चले आए. 2 दिनों से बेटा चावल नहीं खा रहा है. लेकिन तुम्हें क्या, तुम ने तो अपना नशा कर ही लिया.’’

‘‘भई, काम के चक्कर में चावल के बारे में भूल गया. कल ला दूंगा. अब रात में तो चावल बनाना नहीं है.’’ रीतेश ने कहा.

‘‘काम के चक्कर में नहीं, यह क्यों नहीं कहते कि नशे के चक्कर में भूल गया. काम भूल जाते हो, जबकि नशा करना नहीं भूलते.’’

‘‘आखिर मेरे नशे से तुम्हें इतनी परेशानी क्यों है?’’ रीतेश ने झुंझला कर पूछा.

‘‘क्योंकि तुम नशे के चक्कर में काम भूल जाते हो. यही हाल रहा तो एक दिन तुम यह भी भूल जाओगे कि तुम्हारी बीवी और बच्चे भी हैं. नशे के चक्कर में तुम ने कारोबार तो बरबाद कर ही दिया है, धीरेधीरे घरगृहस्थी भी बरबाद कर दोगे. अपने साथ के लोगों को देखो, सभी ने कितनी तरक्की कर ली है. एक तुम हो, आगे जाने के बजाय पीछे चले गए हो.’’

‘‘मैं जैसा भी हूं, अब वैसा ही रहूंगा. अगर तुम्हें मुझ से परेशानी है तो तुम अपना रास्ता बदल सकती हो.’’ कह कर रीतेश दूसरे कमरे में चला गया.

‘‘आज तो तुम चावल लाए नहीं, अगर कल भी नहीं लाए तो खाना नहीं बनेगा.’’ कह कर स्मिता बिना कुछ खाए सोने वाले कमरे में चली गई. रीतेश से भी उस ने खाने के लिए नहीं कहा. उस ने कपड़े बदले और सोने के लिए लेट गई. यह 22 अप्रैल की बात है.

यथार्थ पहले ही सो चुका था. स्मिता भी सोने के लिए लेट गई थी. रीतेश आगे वाले कमरे में लेटा था. पत्नी की किचकिच से परेशान रीतेश को नींद नहीं आ रही थी. जब काफी प्रयास के बाद भी उसे नींद नहीं आई तो उस ने उठ कर एक बार फिर शराब पी कि शायद नशे की वजह से नींद आ जाए. लेकिन शराब पीने के बाद भी उसे नींद नहीं आई.

करवट बदलतेबदलते रीतेश परेशान हो गया तो उस का पत्नी के करीब जाने का मन होने लगा. वह नशे में तो था ही, इसलिए शायद वह यह भूल गया कि अभी थोड़ी देर पहले ही तो पत्नी से लड़ाईझगड़ा हुआ है. वह उसे अपने करीब कैसे जाने देगी. वह उठा और लड़खड़ाते हुए स्मिता के कमरे में पहुंच गया.

खाली पेट स्मिता को भी नींद नहीं आ रही थी. इसलिए जैसे ही रीतेश ने उसे जगाने की गरज से उस के ऊपर हाथ रखा, वह गुस्से में चीखी, ‘‘खाने तो दिया नहीं, अब सोने भी नहीं दोगे.’’

पत्नी के इस तरह चीखने से रीतेश समझ गया कि यहां रुकने से कोई फायदा नहीं है. यहां समझौता के बजाय लड़ाईझगड़ा ही होगा. उसे भी क्रोध आ गया, लेकिन वह बिना कुछ कहे ही बाहर आ गया. बाहर खड़े हो कर वह सोचने लगा कि उस की औकात इतनी भी नहीं रही कि वह पत्नी के पास सो सके. पत्नी उसे पति नहीं, उठल्लू का चूल्हा समझने लगी है. यह अपने आप को समझती क्या है. इसे लाइन पर लाना ही होगा.

रीतेश स्मिता को सबक सिखाने के बारे में सोच रहा था कि तभी उस की नजर सामने रखे हथौड़े पर चली गई. हथौड़े पर नजर पड़ते ही उस का इरादा खतरनाक हो उठा. उस ने हथौड़ा उठाया और कमरे में वापस आ गया. स्मिता आंख बंद किए लेटी थी. उसे क्या पता कि यहां क्या होने जा रहा है, इसलिए वह उसी तरह चुपचाप लेटी रही. रीतेश ने उस की इस लापरवाही का फायदा उठाया और उस पर हथौड़े से वार कर के इस तरह उसे खत्म कर दिया कि वह चीख भी नहीं पाई.

कमरे में खून ही खून फैल गया था. बिस्तर भी खून से तर हो गया था. उस के भी कपड़े खराब हो गए थे. उस ने पहले तो अपने ही नहीं, स्मिता के भी कपड़े बदले. बिस्तर बदला. उस के बाद कमरा साफ किया. स्मिता की लाश उस ने चादर से ढक दी. उस ने सोचा कि सुबह जल्दी उठ कर वह लाश को ठिकाने लगा देगा. लेकिन पत्नी की हत्या करने के बाद उसे यह चिंता होने लगी कि अब वह बचे कैसे? यही सोचते-सोचते वह सो गया तो सुबह देर से आंखें खुलीं.

23 अप्रैल की सुबह रीतेश जागा तो रात का पूरा दृश्य उस की आंखों के आगे घूमने लगा. वह उठ कर बैठ गया और सोचने लगा कि अब स्मिता की लाश का क्या करे. तभी किराएदार मझोले की पत्नी शारदा किसी काम से ऊपर आई. रीतेश को बाहर वाले कमरे में परेशान बैठा देख कर पूछा, ‘‘क्या बात है भाईसाहब, आप कुछ परेशान लग रहे हैं? यथार्थ की मम्मी अभी नहीं उठीं क्या?’’

‘‘उन की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह अभी सो रही हैं.’’ कह कर रीतेश ने शारदा को टाल दिया.

शारदा और उस के पति मझोले ने रात में रीतेश और स्मिता के बीच जो झगड़ा हुआ था, सुना था. उन का यह रोज का मसला था, इसलिए वे बीच में नहीं बोलते थे. लेकिन जब उन्होंने रीतेश को परेशान देखा और स्मिता उन्हें दिखाई नहीं दी तो उन्हें संदेह हुआ. लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं.

कुछ देर बाद रीतेश का 6 साल का बेटा यथार्थ उठा तो उस ने भी मां के बारे में पूछा. तब रीतेश ने कहा, ‘‘बेटा, उन की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह सो रही हैं. अभी तुम उन्हें जगाना मत.’’

उस ने यथार्थ को खाने के लिए बिस्कुट और साथ में चाय दी. बेटे को चायबिस्कुट दे कर वह नीचे गोदाम में चला गया. उस का वहां भी मन नहीं लगा. वह स्मिता की लाश को ले कर काफी परेशान था. वह सोच रहा था कि किसी तरह से रात हो जाए तो वह उसे ठिकाने लगा दे. लेकिन रात होने से पहले ही उस की पोल खुल गई.

यथार्थ अकेला ही इधरउधर खेल कर टाइम पास कर रहा था. कुछ देर के बाद शारदा फिर ऊपर आई. उस ने यथार्थ को अकेला खेलते देख कर पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारी मम्मी कहां है?’’

‘‘मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह सो रही हैं. पापा ने कहा है कि उन्हें जगाना मत.’’ यथार्थ ने कहा.

शारदा को संदेह तो पहले ही था कि कुछ गड़बड़ है. यथार्थ की बात सुन कर उस का संदेह गहराया तो वह अंदर आ गई, जहां स्मिता सो रही थी. उस ने स्मिता को तो नहीं देखा, लेकिन इधरउधर देखा तो वहां उसे खून के छींटे दिखाई दिए. वह भाग कर नीचे आई और उस ने सारी बात पति को बता दी.

इस के बाद मझोले ने इस बात की सूचना सआदतगंज कोतवाली को दे दी. सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी समर बहादुर यादव ने 2 सिपाहियों को मामले का पता लगाने के लिए भेज दिया. दोनों सिपाही रीतेश के घर पहुंचे तो उन्हें देख कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. लेकिन उस ने खुद को जल्दी से संभाल कर पूछा, ‘‘आप लोग यहां, कोई खास काम है क्या?’’

‘‘क्या तुम हमें बताओगे कि तुम्हारी पत्नी कहां है?’’ एक सिपाही ने पूछा.

‘‘मेरी पत्नी की तबीयत खराब है, वह सो रही है. आप लोगों को उस से क्या काम पड़ गया, जो आप लोग उस के बारे में पूछ रहे हैं?’’ रीतेश ने कहा.

पुलिस वाले उस की बात का जवाब देने के बजाय किराएदारों के इशारा करने पर स्मिता के कमरे की ओर चल पड़े. इस पर रीतेश सिपाहियों के आगे खड़ा हो गया और उन्हें ऊपर जाने से रोकने लगा.  लेकिन सिपाही उसे धकिया कर ऊपर चले गए. स्मिता चारपाई पर लेटी थी. उसे चादर ओढ़ाई हुई थी. उस के शरीर से किसी तरह की हरकत नहीं हो रही थी. ऐसे में सिपाहियों को भी शक हुआ तो उन्होंने ऊपर पड़ी चादर हटा दी.

स्मिता की खून से सनी लगभग अर्धनग्न लाश सामने आ गई. सिपाहियों ने रीतेश को दबोच लिया. इस के बाद सिपाहियों ने हत्या की सूचना थानाप्रभारी को दे दी. थानाप्रभारी समर बहादुर यादव ने इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी. थोड़ी ही देर में रीतेश के घर थानाप्रभारी समर बहादुर यादव के साथ क्षेत्राधिकारी राजकुमार अग्रवाल पहुंच गए.

यथार्थ मां की खून से लथपथ लाश देख कर रोने लगा. वह पुलिस को कुछ बताने लायक नहीं था, इसलिए पुलिस ने उसे बाहर भिजवा दिया. इस के बाद पुलिस ने रीतेश से पूछताछ शुरू की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस ने घटना की सूचना स्मिता के भाई राजू द्विवेदी को दी तो वह कानपुर से लखनऊ आ गया. उस के पहुंचने पर पुलिस ने उस की ओर से स्मिता की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस ने रीतेश की निशानदेही पर वह हथौड़ा और ड्रम में छिपाए गए खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. यथार्थ को पुलिस ने उस के मामा के हवाले कर दिया. इस के बाद रीतेश को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. अब उसे अपने किए पर पश्चाताप हो रहा है, लेकिन अब उस के इस पश्चाताप से क्या हो सकता है.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पुनर्जन्म : कौन था मयंक का कातिल? – भाग 6

‘‘अपने शक के चलते बलराम तोमर ने बर्नेट अस्पताल के रजिस्टर का मुआयना किया और इंक रिमूवर के दाग ने इन के शक को पुख्ता कर दिया. हां, बलराम के शक के दायरे में सुभाषिनीजी के साथ धुरंधर ही थे. इसी वजह से इन्होंने तय कर लिया था कि मौका मिलते ही मयंक को मौत के घाट उतार देंगे और फिर सुभाषिनी और धुरंधर को भी नहीं छोड़ेंगे.

‘‘धुरंधर मयंक को बहुत प्यार करते थे और मयंक भी अकसर उन के साथ ही रहता था, रात को वह सोता भी उन के साथ ही था. इस से बलराम के शक की जड़ें और गहरी होती गईं, हालांकि यह 20 साल तक अपनी कोशिशों के बावजूद मयंक की जान लेने में नाकाम रहे. आखिर इन्होंने शिकार का प्रोग्राम बनाया और उस में घर की औरतों को भी शामिल किया, ताकि किसी को शक न हो. इस तरह उस रात इन्हें मौका मिल गया.

‘‘शक्तिशाली राइफल की गोली मयंक के माथे को चीरती हुई दूसरी ओर निकल कर कुछ दूर मौजूद एक पेड़ के तने में जा घुसी. मयंक के मुंह से चीख निकली और वह बेजान हो कर नीचे जा गिरा, जहां घात लगाए बैठा तेंदुआ उस पर टूट पड़ा.

‘‘फिर हवाई फायरों और सुरबाला तथा सुभाषिनी की चीखपुकारों से डर कर तेंदुआ भागा तो सही, पर मयंक की लाश को घसीट ले गया. उस ने मयंक की अधखाई लाश सुखनई की कगार पर तिरछे खड़े छतनार पेड़ों में छिपा दी, जहां वह कई साल लटकी रही और कल मैं ने उसे वहां से निकाला.’’

उसी समय वहां एक एंबुलेंस आई और स्ट्रेचर पर लेटे सुकुमार को अंदर लाया गया, वह होश में था. उसे देखते ही धुरंधर और सुखदेवी दौड़ कर उस से जा लिपटे.

‘‘यह भाई नहीं कसाई है.’’ धुरंधर ने घृणा भरी निगाह बलराम के ऊपर डाली, ‘‘इस ने तो हमारे वंश का ही नाश कर दिया था…’’

‘‘मैं बहुत शर्मिंदा हूं त्रिलोचनजी, यह मेरे पाप की सजा है. मैं ने न तो ठीक से मेजर साहब की वापसी का इंतजार किया और न इस आदमी को सच बताया…’’ सुभाषिनी ने रोते हुए एक नजर बलराम पर डाली, ‘‘शायद इसीलिए मेरा बेटा…’’

‘‘अब आप का बेटा लौट तो आया है.’’ विप्लव ने रजत की ओर इशारा किया.

‘‘हां त्रिलोचनजी.’’ धुरंधर तोमर त्रिलोचन के पास आ पहुंचे, ‘‘अब तो मुझे भी पुनर्जन्म पर विश्वास हो गया है. आखिर रजत ने ही तो पूर्वजन्म में हुई अपनी हत्या की सच्चाई से आप को अवगत कराया है.’’

‘‘यह पुनर्जन्म का मामला नहीं है तोमर साहब.’’ त्रिलोचन सपाट स्वर में बोले.

‘‘क्या…? आप का मतलब रजत पिछले जन्म में मयंक नहीं है?’’

‘‘जी हां, मेरा मतलब यही है.’’ त्रिलोचन ने कहा.

‘‘आप क्या कह रहे हैं डैड?’’ नीरव और विप्लव ने एकसाथ सवाल किया, ‘‘अगर यह सच है तो फिर रजत ने मयंक के परिजनों को कैसे पहचाना?’’

‘‘यह सब एक नाटक था. सारी जानकारी और घरवालों के फोटोग्राफ्स सुभाषिनी जी ने उपलब्ध कराए थे और उसी आधार पर मैं ने रजत को प्रशिक्षित किया था.’’

‘‘तो क्या आप को इस मामले को सुलझाने के लिए सुभाषिनी जी ने नियुक्त किया था?’’ अनिल ने पूछा.

‘‘जी हां, सुभाषिनीजी को शुरू से ही शक था कि उन के बेटे की हत्या हुई है. इसीलिए मैं ने यह जाल रचा. मैं जानता था कि मयंक का हत्यारा रजत की हत्या करने की कोशिश करेगा और हम उसे रंगे हाथ पकड़ लेंगे. आगे की घटनाएं आप सब को मालूम ही हैं.’’

‘‘कमाल हो गया.’’ धुरंधर की अचरज भरी निगाह रजत के ऊपर जा टिकी, ‘‘यह छुटकू तो बेजोड़ एक्टर है.’’

रजत के चेहरे पर मुसकान फैलते देर न लगी, उस के मातापिता उस से ज्यादा खुश थे, शेष लोगों के भी चेहरों पर आश्चर्य था, उन में से एक अनिल भी थे, जो अब हथकड़ी लिए बलराम तोमर की ओर बढ़ रहे थे.

त्रिलोचन अपना सामान समेट रहे थे कि धुरंधर तोमर ने पूछा, ‘‘मेरा चरित्र शक के घेरे में कैसे आ गया था त्रिलोचनजी?’’

‘‘जिस तरह से विप्लव को इस पत्रिका में आप दोनों का फोटो देख कर शक हुआ, ठीक वैसे ही बलराम के भी मन में शुबहा हुआ और जब उस ने बर्नेट अस्पताल के प्रसूति रजिस्टर का अवलोकन किया तो उस का शक यकीन में बदल गया.’’

‘‘आप बुरा न मानें तो कुछ मैं भी पूछूं?’’ सुखदेवी अपनी जगह से उठ कर त्रिलोचन के पास आ पहुंचीं.

‘‘जरूर पूछिए.’’

‘‘रजत तो पहली बार यहां आया था, वह सड़क से सीधे हमारे घर तक कैसे पहुंचा?’’

‘‘आसान काम था मिसेज तोमर. हम ने रात में सड़क से ले कर आप के घर तक गेहूं के दाने गिरवा दिए थे, रजत उन्हें देखते हुए आप के घर तक पहुंच गया और किसी को संदेह भी नहीं हुआ, क्योंकि गांवों में अनाज की ढुलाई के दौरान ऐसा होता रहता है.’’

‘‘क्या दिमाग पाया है आप ने.’’ सुखदेवी के मुंह से बरबस निकल गया और अपनी तारीफ सुन कर त्रिलोचन खुश हुए बिना न रह सके.

— कल्पना पर आधारित

जाना अनजाना सच : जुर्म का भागीदार

लक्ष्मण रेखा लांघने का परिणाम – भाग 1

‘‘कमबख्त, कमीनी किसे फोन कर रही थी? हिंदुस्तान कर रही थी ना? अगर तुझे उन  पिल्लों से इतनी ही मोहब्बत थी तो यहां मरने क्यों चली आई? अगर तेरी हरकतें ऐसी ही रहीं तो तू एक न एक दिन मुझे जेल भिजवा कर रहेगी.’’ कह कर असलम ने मेरे हाथ से रिसीवर ले कर पटक दिया और मुझे ऐसा धक्का दिया कि मैं सिर के बल गिर पड़ी.

इस के बाद मुझे गंदीगंदी गालियां देते हुए बाहर से ताला लगाया और सीढि़यां उतर गया. असलम जितना चालाक था, उतना ही फुर्तीला और ताकतवर भी था. वह गले तक काले धंधों में डूबा था. अमेरिका की पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. मेरी बदकिस्मती यह थी कि उस के हर जुर्म में मैं बराबर की हिस्सेदार थी. यही एक वजह थी कि चाह कर भी मैं उस के घर से निकल नहीं पा रही थी.

मेरे पास अब आंसू बहाने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं था? इस के लिए मैं किसी और को दोष भी नहीं दे सकती थी. मैं ने जो किया था, उसर की सजा मुझे मिल रही थी.

असलम जिसे मैं ने जीजान से चाहा था, जिस के लिए मैं ने अपना घर, पति और तीन प्यारेप्यारे मासूम बच्चों को भुला दिया था, आज वही असलम मुझ से इस तरह बदसलूकी करेगा, मैं ने सपने में भी नही सोचा था. जब से मैं अमेरिका आई हूं, तब से मेरा यही हाल है. ताले में बंद रहना और उस के हर नाजायज धंधे में शामिल होना.  मेरी खूबसूरती का इस से अच्छा इस्तेमाल और क्या हो सकता था. हर वह काम, जो असलम वर्षों में नहीं कर सका था, उसे मैं ने चुटकी बजा कर अपनी खूबसूरत अदाओं से कर दिया था.

मैं जब भी भागने की कोशिश करती, वह बेरहमी से मेरी पिटाई करता. उस की गिरफ्त से निकलना मेरे लिए नामुमकिन था. लेकिन मैं हिम्मत हारने वालों में नहीं हूं, मैं एक बार, सिर्फ एक बार अपने उन मासूम बच्चों को सीने से लगा कर प्यार करना चाहती हूं, जिन्हें 10 साल पहले मैं असलम के प्यार में पागल हो कर हिंदुस्तान छोड़ आई थी.

बच्चों की याद त्रिशूल बन कर मुझे सालती रहती थी. मैं जब भी तनहा होती थी, तीनों बच्चों के चेहरे मेरी आंखों के सामने तैरने लगते थे. जब मैं उन्हें छोड़ कर आई थी, सृष्टि 9 साल की थी, बबलू 4 साल का और दीपू 2 साल का. तीनों बच्चे मेरे सीने से चिपट कर सोते थे. कितनी मशगूल जिंदगी थी वह  मेरी. एकएक बातें किताब के पन्नों की तरह खुलने लगी थीं.

सृष्टि और बबलू सुबह 7 बजे ही स्कूल चले जाते थे. उन के लिए टिफिन बनाना, उन्हें तैयार करना, बच्चों को स्कूल भेज कर घर की साफसफाई करना और दोनों समय के खाने में दिन कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता था.  और आज मैं विदेश में अकेली बैठी हूं. चारों ओर कुहासा और बर्फ से ढकी चोटियां हैं. मैं ऐसे दलदल में फंसी हूं, जहां से चाहूं तो भी नहीं उबर सकती.

शुरू से ही आशावादी व भरपूर जीवन जीने की मैं आदी थी. एक मस्त हिरनी की तरह कुलांचे भरना मेरी फितरत थी. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद मुझ में चंचलता पहले जैसी ही थी. घर का काम निपटा कर मैं पूरे मन से अपना शृंगार करती और 5 बजते ही मैं लौन में चहलकदमी करने लगती. आतेजाते मर्द जब मुझ पर चाहतभरी निगाह डालते तो मैं उसे अपनी तारीफ और उपलब्धि समझ कर फूली न समाती. मेरे गालों पर मोगरे के फूल दहकने लगते.

इसी चंचल स्वभाव की वजह से 16 साल की उम्र में ही मैं सागर से प्यार कर बैठी थी. कैंब्रिज स्कूल में हम दोनों साथ पढ़ते थे. रोजरोज मिलने से हमारी दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. मैं उसे बेपनाह मोहब्बत करने लगी. हर पल मेरी जुबान पर उसी का नाम होता. हम जब भी मिलते, अपने आशियाने के सपने संजोते. वह भी शिद्दत से मेरा दीवाना था.

उस की दीवानगी को देखते हुए एक दिन मैं ने अपनी मां को सब कुछ बता कर कहा कि ‘मैं सागर से ही शादी करूंगी और जल्दी ही करूंगी.’ मां ने बहुत समझाया. पापा ने भी कहा कि पहले पढ़ाई पूरी कर लूं, उस के बाद मैं जो कहूंगी, वह वही करेंगे. मैं ने घर से भाग जाने की धमकी दी. मेरे उद्दंड स्वभाव के आगे किसी की न चली और लाख पहरों के बावजूद मैं ने घर से भाग कर सागर से शादी कर ली. शायद आज यही मेरे जीवन की सब से बड़ी भूल साबित हुई.

मैं ने मांबाप की मरजी के खिलाफ जो कदम उठाए, उस से फिर कभी मैं उन की दहलीज पर लौट नहीं सकी. सागर का जुनून और दिलफरेब मोहब्बत नकली हीरे से कम नहीं थी. बीवी और महबूबा में एक बुनियादी फर्क होता है. इसी बुनियादी फर्क के तहत मेरी हदें निश्चित कर दी गईं.

शादी के बाद सागर पूरी तरह से मेरा हो गया था, इसलिए तनमन से मैं उस की सेवा करने लगी. दिनरात मैं उस के प्यार में डूबी रहने लगी. अपनी किस्मत पर मुझे रश्क आने लगा था कि इतनी बड़ी कोठी का एकलौता वारिस मुझ पर सौ जान से फिदा है. ईश्वर ने मुझे रूप भी ऐसा दिया था कि जो भी देखता, ठगा सा देखता रह जाता. दूध में केसर डाल कर जो रंग आता है, उस रंग की काया पर कमर तक झूलते काले स्याह बाल, लंबा कद. लेकिन जल्दी ही हमारी मोहब्बत का सुरूर बुलबुले की तरह खत्म हो गया.

परदा उठते ही जो हालात सामने आए, वे मेरी जिद और नासमझी के अंजाम थे. अपने मांबाप के जिंदगी भर के तजुर्बे को ठुकरा कर मैं ने जो प्रेमविवाह किया था, उस में सीरत वाला पहलू पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था. शायद प्रेमविवाह में ऐसा ही होता है. सूरत इस में अहम होती है. सागर की शानदार पर्सनैल्टी की मैं दीवानी सी हो गई थी. मेरे मांबाप, भाई जब कभी उस के खिलाफ कुछ कहते, मैं नाराज हो कर घंटों रोती रहती और भूख हड़ताल कर बैठती. प्यार में अंधी हो कर मैं सच सुनना नहीं चाहती थी.

सागर एक 5 स्टार होटल के डिस्कोथैक का मैनेजर था, जहां रातें शराबशबाब में डूबी रहती थीं. उस की ड्यूटी रात की होती थी. वह सुबह घर आता तो बेहद थका और टूटा हुआ होता. आते ही बिस्तर पर ढेर हो जाता. पूरे दिन सोता. शाम को उठता और फ्रैश हो कर होटल चला जाता.

इस तरह महीनों हमारे बीच कोई बातचीत न होती. अगर कभी मैं कुछ कह देती तो उस के मुंह में ऊलजुलूल जो आता, कहने लगता. उस की इन बातों से हम दोनों के बीच एक ऐसी खाईं बनती चली गई, जिसे पाटना नामुमकिन सा हो गया. मैं समझ गई कि यह बड़े बाप की वह बिगड़ी हुई औलाद है. मैं घुटघुट कर जीने लगी.

उसी घुटन में एक दिन मैं सो रही थी कि अचानक मेरे फोन की घंटी बजी. फोन करने वाले ने कहा, ‘‘आप मुझे नहीं जानतीं, लेकिन मैं आप को अच्छी तरह जानता हूं. मैं आप का शुभचिंतक हूं, इसलिए आप को चेता रहा हूं कि आप अपने पति पर नजर रखिए. आजकल वह रेशमा नाम की खूबसूरत लड़की के साथ अकसर नाचतेगाते, खातेपीते नजर आते हैं.’’

मैं सागर से वैसे ही परेशान थी, इस गद्दारी से मैं बिफर उठी. उस दिन हम दोनों के बीच काफी कहासुनी हुई. सागर ने सारे आरोपों को गलत बताया. लेकिन शक का जहर मेरी नसनस में फैल चुका था. वह अजनबी न जाने मेरा हमदर्द था या खैरख्वाह या दुश्मन, जो मेरा अच्छा सोच रहा था. इस के बाद उस ने मुझे न जाने कितने फोन किए. हर फोन में सिर्फ सागर की बुराई होती. सागर सुबह आता तो शराब की बू से कमरा भर जाता. मेरे नाम से उसे चिढ़ सी हो गई थी.

मेरा हर मशवरा उसे नागवार गुजरता. सागर की रात की ड्यूटी से मेरा और बच्चों का जीवन घर की चारदीवारी में कैद हो कर रह गया था. पति, 3 बच्चे और सासससुर की जिम्मेदारी उठातेउठाते मैं चिड़चिड़ी और बेरहम होती गई. जिस तरह बिना पानी के धरती सूखती जाती है, प्यार के बिना कुछ वैसी ही हालत मेरी हो गई थी. मैं प्यार के 2 बोल सुनने के लिए तरसती रहती थी.

पुनर्जन्म : कौन था मयंक का कातिल? – भाग 5

कई सालों तक तो मेजर को सुभाषिनी के बारे में कोई जानकारी ही नहीं मिली. लेकिन यह भी जिद्दी स्वभाव के थे. जैसेतैसे इन्होंने सुभाषिनी की नई ससुराल का पता लगा ही लिया. तब तक वह मयंक की मां बन चुकी थी. वह काफी बड़ा हो गया था.

मेजर चौहान बदला लेने के लिए सालों तक सुभाषिनी और तोमर परिवार पर नजर रखे रहे. लंबी अवधि गुजर जाने के बाद भी इन के बदले की आग ठंडी नहीं हुई. इस की वजह यह भी थी कि सुभाषिनी की वजह से इन का बेटा किसी और का हो गया था और ये चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे. बेटे की वजह से ही इन्होंने शादी तक नहीं की. इन्हें बदले का मौका तब मिला, जब तोमर परिवार ने शिकार का प्रोग्राम बनाया.’’

‘‘अंधेरा होने पर झाडि़यों में छिपे मेजर ने अपने रिवाल्वर से गोली चला दी, लेकिन गोली सुभाषिनी को नहीं मयंक को लगी और वह नीचे गिर गए.’’ नीरव बोल उठा.

‘‘मेजर चौहान ने भी यही समझा था, क्योंकि इन के गोली चलाने के तुरंत बाद सुरबाला की चीखपुकार गूंज उठी थी. उसी वक्त मेजर ने दूसरा फायर किया, वह हवाई फायर था, जो इन्होंने मयंक को तेंदुए से बचाने के लिए किया था. दूसरे लोगों ने भी कुछ हवाई फायर किए थे.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ डैड कि मेजर चौहान ने मयंक की हत्या नहीं की थी, बल्कि वह नींद के झोंके में मचान से गिर कर तेंदुए का शिकार हो गए थे.’’ नीरव बोला.

‘‘सच्चाई का खुलासा तो रजत ही कर सकता है.’’ त्रिलोचन ने रजत पर निगाह डाली तो माता पिता के बीच में बैठा रजत मुसकराने लगा.

‘‘एक्जैक्टली डैड,’’ विप्लव ने कुर्सी के हत्थे पर हाथ मारा, ‘‘आखिर रजत, मयंक का ही तो पुनर्जन्म है, इसे तो पूरी सच्चाई मालूम होगी.’’

‘‘अपराधी इसी बात से तो डर गया था, उसे लगा कि रजत ने सुरबाला को सच्चाई बता दी है, तभी उस ने सुरबाला की जान लेने की कोशिश की थी. जब वह कामयाब नहीं हुआ तो उस ने मौका पा कर रजत की हत्या करनी चाही. हालांकि हम ने रजत की सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया था, लेकिन हमलावर तोमर परिवार के पुश्तैनी मकान के चप्पे चप्पे से वाकिफ था.

‘‘वह गुप्त रास्ते से उस कमरे में दाखिल हुआ और अपनी समझ के हिसाब से रजत को चाकू मार कर उसी रास्ते से गायब भी हो गया. इसे नियति का खेल ही कहेंगे कि रजत और सुकुमार ने सोने के पहले अपने बिस्तर बदल लिए थे. जिस की वजह से हमलावर ने सुकुमार को रजत समझा.’’

‘‘मतलब, कोई घर का ही आदमी है जो पहले मयंक का दुश्मन था और अब रजत का दुश्मन बन बैठा.’’ वहां मौजूद रजत के पिता मनोहर अग्रवाल ने पहली बार मुंह खोला.

‘‘चाचाजी, मेरी तफ्तीश कहती है कि सुरबालाजी के ऊपर हमला करने की कोशिश सुखदेवी ने की थी, आई मीन मिसेज धुरंधर तोमर.’’ इंसपेक्टर अनिल ने पासा फेंका.

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं, दरोगाजी…?’’ सुखदेवी उछल कर उठ खड़ी हो गई, ‘‘मैं बहू के ऊपर हमला क्यों करूंगी, इस से मुझे क्या मिलेगा…?’’

‘‘जिस तरह से सुरबाला ने रजत को अपनाया, उस से आप के मन में डर बैठ गया था कि अब तक जिस जायदाद का वारिस आप का बेटा था, अब उस का आधा हिस्सा कहीं रजत को न मिल जाए.’’

‘‘इंसपेक्टर साहब,’’ अभी तक चुप बैठे धुरंधर का धैर्य जाता रहा, ‘‘मेरी पत्नी के खिलाफ आप के पास क्या सबूत हैं?’’

‘‘आप की पत्नी ‘संदली एहसास’ नामक टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल करती हैं. सुरबालाजी के शयन कक्ष में जो तलवार पाई गई थी. उस पर उस पाउडर के कण मिले हैं.’’

‘‘प्लीज, अब यह मत कहिएगा कि अपने बेटे को छुरा भी हम ने ही मारा है…’’ धुरंधर आजिज आ कर बोले.

‘‘इंस्पेक्टर साहब, आप सुखदेवी जी के ऊपर नाहक आरोप लगा रहे हैं.’’ त्रिलोचन ने दखल दिया, ‘‘हमारा ध्यान भटकाने के लिए अपराधी द्वारा चली गई नायाब चाल थी यह.’’

‘‘तो फिर अपराधी कौन है डैड?’’ नीरव बोला, ‘‘आप ने रजत से तो पूछा ही नहीं कि पिछले जन्म में उस की मृत्यु कैसे हुई थी?’’

प्रत्युत्तर में त्रिलोचन ने अपने बैग से पालिथीन की एक थैली निकाली, जिस में एक नरमुंड रखा था. पारदर्शी थैली में दिख रहे नरमुंड के माथे की ओर इशारा करते हुए त्रिलोचन बोले, ‘‘यह छेद देख रहे हैं आप लोग, यह मयंक की खोपड़ी है और इस के माथे में यह गोली का निशान. मयंक की मौत गोली लगने से हुई थी.’’ कहते हुए त्रिलोचन ने अपनी जेब से कोई चीज निकाली, ‘‘और यह रही वह गोली.’’

‘‘यह तो राइफल की गोली है…’’ मेजर चौहान के मुंह से अनायास निकल गया.

‘‘हां मेजर, अब आप उस अपराधबोध से मुक्त हो गए होंगे, जिसे आप पिछले कई सालों से ढोते आ रहे थे?’’

‘‘जी’’ मेजर का गला भर्रा गया, ‘‘मैं अपने आप को मयंक का हत्यारा समझता था और मुझे इतनी ग्लानि हुई थी कि अपना रिवाल्वर उसी जंगल में फेंक आया था.’’

‘‘चाचाजी, घटनास्थल पर उस वक्त 2 राइफलें थीं.’’ अनिल बोला.

‘‘जी हां, और फोरेंसिक रिपोर्ट से साफ हो गया है कि यह गोली जिस राइफल से चली थी. वह थी मैनलिकर सूनर.’’

‘‘लेकिन… मैं ने तो तेंदुए को भगाने के लिए हवाई फायर किए थे, ताकि वह नीचे गिरे मयंक को नुकसान न पहुंचाए.’’ बलराम तोमर त्रिलोचन को लक्ष्य करते हुए बोले.

‘‘हवाई फायर हवा में किए जाते हैं तोमर साहब, नाक की सीध में नहीं.’’ त्रिलोचन का स्वर सख्त हो उठा.

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं कि मयंक का हत्यारा मैं हूं?’’ तोमर साहब क्षुब्ध हो कर कांपने लगे.

‘‘जी हां.’’ त्रिलोचन का स्वर दृढ़ था.

‘‘त्रिलोचन तुम सठिया गए हो, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है…’’ बलराम तोमर दहाड़ उठे, उन के गुस्से का ठिकाना न रहा, ‘‘मैं अपने बेटे की हत्या क्यों करूंगा?’’

‘‘क्योंकि मयंक आप का बेटा नहीं था.’’

बलराम तोमर अवाक रह गए.

‘‘मैं ने तो पहले ही कहा था डैड कि धुरंधर और सुभाषिनी…’’

‘‘शटअप विप्लव.’’ त्रिलोचन आंखें तरेरते हुए बोले, ‘‘मयंक, मेजर चौहान का बेटा था.’’

‘‘डैड, आप इस नतीजे पर कैसे पहुंचे?’’ विप्लव पूछे बिना न रह सका.

‘‘बर्नेट अस्पताल के रजिस्टर में मयंक की जन्मतिथि लिखी हुई है, जिस के हिसाब से बलराम और सुभाषिनी की शादी के सात महीने बाद ही मयंक का जन्म हो गया था. रजिस्टर में इसे नार्मल डिलीवरी के तौर पर दर्ज किया गया था, जिसे बाद में सुभाषिनी ने रिश्वत दे कर ‘प्रीमैच्योर डिलीवरी’ करवा दिया था.’’

‘‘मतलब, सुभाषिनी बलराम तोमर के साथ शादी होने के पहले से गर्भवती थीं?’’ मनोहर अग्रवाल का सवाल था.

त्रिलोचन ने आगे कहा, ‘‘इस की सूचना सुभाषिनी ने अपने पूर्व पति मेजर चौहान को पत्र द्वारा भेजी भी थी. उसी दौरान मेजर चौहान लापता हो गए थे और वह पत्र भेजने वाले के पते पर लौट आया था.’’ त्रिलोचन ने बैग में हाथ डाल कर एक अंतर्देशीय पत्र निकाला, जो पीला पड़ चुका था.

रेशमा की हंसी ने बुलाई मौत

उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद के डीआईजी निवास के नजदीक गौतम नगर की गली नंबर-9 में नन्हे अपनी पत्नी रेशमा और ढाई साल के बेटे व मां के साथ 2 कमरों के मकान में रहता था. 8 मई, 2023 की रात 11 बजे की बात है. नन्हे के पड़ोस में रहने वाली नाजमा की रसोई के शेड पर रात के करीब 11 बजे कुछ गिरने की आवाज आई, जिस से रसोई के ऊपर की सीमेंट की चादरें तक टूट गईं. नाजमा समझी कि घर में चोर आ गए, उस ने अपने परिवार के लोगों को उठाया और जोर से ‘चोर…चोर’ कहते हुए शोर मचा दिया.

शोर सुन कर आसपास के घरों से लोग निकल आए. उन्होंने तभी देखा कि नन्हे अपनी पत्नी रेशमा के बाल पकड़ कर खींचता हुआ अपने घर में ले गया था. उधर नाजमा व अन्य लोगों ने देखा कि रसोई का शेड टूटा हुआ नीचे पड़ा है, वहां पर खून भी पड़ा था. इस के अलावा जिधर से नन्हे अपनी पत्नी रेशमा को घसीट कर ले गया था, वहां पर खून की बूंदें दिखाई दे रही थीं. इकट्ठा हुए लोग यह जानने के लिए नन्हे के घर पहुंच गए थे कि आखिर हुआ क्या है.

खून देख कर लोगों को हुआ शक

नन्हे के घर का गेट अंदर से बंद था. लोगों ने नन्हे को आवाज लगाई और गेट खोलने को कहा. नन्हे बोला कुछ नहीं हुआ मेरी पत्नी रेशमा ने गुस्से में अपनी कलाई की नस काट ली है, वह अस्पताल गई है. पड़ोसी नाजमा ने आवाज दी, ‘‘नन्हे गेट तो खोल, तूने मेरी रसोई का शेड तोड़ दिया है, उसे अब कौन बनवाएगा.’’

इस के बाद नन्हे ने अपने घर का गेट खोल दिया. गेट खुलते ही वहां मौजूद लोग अंदर घर में दाखिल हो गए. उन्होंने नन्हे की पत्नी रेशमा को पूरे घर में तलाशा, वह नहीं मिली. लोगों ने इतना जरूर देखा कि मकान के सेप्टिक टैंक (गटर) के पास खून की बूंदें व खून साफ करने के निशान थे. लोगों को मामला गंभीर दिखा तो उसी समय किसी ने थाना सिविल लाइंस को फोन कर दिया.

उस समय एसएचओ गजेंद्र सिंह रात्रि गश्त की तैयारी कर रहे थे ड्राइवर गाड़ी में बैठा उन के आने का इंतजार कर रहा था. एसएचओ कमरे से बाहर आए. तभी ड्ïयूटी औफिसर ने उन्हें डीआईजी साहब के बंगले के पास गौतम नगर गली नंबर 9 में लोगों की भीड़ जमा होने की सूचना दी.

यह सुन कर एसएचओ सीधे गौतम नगर चले गए. पुलिस को देखते ही लोग अपनेअपने घरों में चले गए. कुछ लोग छतों पर खड़े हुए थे. एसएचओ गजेंद्र सिंह ने पूछा कि नन्हे का घर कौन सा है? लोगों ने इशारे से बताया, ‘‘साहब वो है.’’

नन्हे के मकान का गेट खुला था. पुलिस जब उस के घर में पहुंची तो घर में जगहजगह खून बिखरा पड़ा था. एक छोटा दोढाई साल का बच्चा सोता मिला. पूरा घर खाली था. पुलिस को देख नन्हे के घर में कुछ बुजुर्ग लोग भी आ गए थे. उन्होंने बताया, ‘‘साहब, नन्हे व उस की पत्नी रेशमा में झगड़ा हुआ था, सेप्टिक टैंक के पास ज्यादा खून पड़ा है.’’

एसएचओ गजेंद्र सिंह ने एक सिपाही से कह कर गटर का ढक्कन उठवाया तो उस में कंबल व अंदर कपड़े पड़े थे. उन्हें हटा कर देखा तो वहां मौजूद पुलिस व लोग सन्न रह गए. गटर के अंदर रेशमा की खून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी. पुलिस ने शव को गटर से बाहर निकाला. रेशमा का गला काटा गया था.

नन्हे आया पुलिस हिरासत में

इस हत्याकांड की सूचना एसएचओ गजेंद्र सिंह ने अपने उच्च अधिकारियों को दी. सूचना मिलते ही मुरादाबाद के एसएसपी हेमराज मीणा, एसपी (सिटी) अखिलेश भदौरिया, सीओ अर्पित कपूर भी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी घटनास्थल की जांच की.

पुलिस के आने से पहले हत्यारा नन्हे घर से भाग गया था. एसएसपी हेमराज मीणा ने सीओ अर्पित कपूर के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. पुलिस टीम आरोपी नन्हे की तलाश में जुट गई. पुलिस को 9 मई, 2023 को सफलता मिल गई.

मुखबिर की सूचना पर टीम ने भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी के केंद्रीय पुलिस अस्पताल के सामने से नन्हे को उस समय धर दबोचा, जब वह बाहर भागने की फिराक में था. थाना सिविल लाइंस में उच्च अधिकारियों के सामने नन्हे से पूछताछ की गई तो उस ने पत्नी की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने पत्नी रेशमा के मर्डर की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

रेशमा नन्हे की थी दूसरी बीवी

मुरादाबाद शहर के गौतम नगर निवासी नन्हे की पहली शादी काशीपुर निवासी नाजनीन से हुई थी. नन्हे ईरिक्शा चलाता था. पहली पत्नी नाजनीन से 2 बेटियां पैदा हुईं. किसी वजह से दोनों के बीच अकसर झगड़ा होने लगा तो एक दिन गुस्से में नाजनीन अपनी छोटी बेटी को ले कर अपने मायके काशीपुर चली गई. उस ने नन्हे के साथ रहने को मना कर दिया. बड़ी बेटी नन्हे की बड़ी बहिन के पास है.

पत्नी के वापस न आने की शिकायत नन्हे ने थाना सिविल लाइंस में भी की. पुलिस ने नाजनीन को काशीपुर से थाने बुलाया. थाने में ही नाजनीन ने पति के साथ न रहने की बात दोहरा दी. तब नन्हे ने उसे तलाक दे दिया. यह बात करीब ढाई साल पहले की है.

पत्नी से तलाक के बाद नन्हे अकेला हो गया. फिर करीब 2 साल पहले जिला बिजनौर के कस्बा नेहटौर के कासमपुर लेखराज बाग निवासी रेशमा से निकाह कर लिया था. रेशमा भी पहले से शादीशुदा थी. उस के भी 2 बच्चे थे.

रेशमा की पहले लव मैरिज हुई थी. बदायूं निवासी कन्हैया नाम के युवक के पिता नेहटौर, बिजनौर में लेखराज बाग में आम के बाग की रखवाली करते थे. आम के बाग में कन्हैया भी अपने पापा के साथ ही रहता था.

कन्हैया गठे शरीर का गबरू इंसान था. वह गांव में स्थित दुकान से अकसर घरेलू खानेपीने का सामान लेने जाता था. वहीं पर खूबसूरत रेशमा से उस की आखें चार हुईं. दोनों ही एकदूसरे को चाहने लगे. बाग का एकांत क्षेत्र दोनों के मिलने के लिए काफी मुफीद था. नैन मटक्का होतेहोते दोनों में शारीरिक संबंध बन गए थे.

अवैध संबंध हो जाने के बाद एक दिन कन्हैया व रेशमा दोनों गायब हो गए थे. उस के बाद दोनों ने लव मैरिज कर ली थी. रेशमा उस के साथ हंसीखुशी रह रही थी. वह 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. बाद में रेशमा अकसर अपने मायके में रहने लगी थी. यह बात कन्हैया को पसंद नहीं थी. जिस कारण कन्हैया व रेशमा में झगड़ा रहने लगा था. रेशमा का बड़ा बेटा अपने पिता कन्हैया से बहुत लगाव रखता था.

cmritak reshma or nanne

रेशमा ने भी छोड़ रखा था पहला पति

रेशमा के अब्बू मेहंदी हसन का पहले ही इंतकाल हो चुका था. रेशमा का छोटा बेटा उस समय गोद में था. उस के बाद से रेशमा अपनी ससुराल नहीं गई थी. कन्हैया व रेशमा के बीच संबंध बिलकुल खत्म हो गए थे.

उधर रेशमा की अम्मी नसीमा ने अपने एक परिचित की मदद से नन्हे की मां छोटी से संपर्क साधा कि तुम्हारा बेटा भी अपनी पहली पत्नी नाजनीन को तलाक दे चुका है, मेरी बेटी रेशमा भी अपने पहले पति से अलग हो गई. इसलिए क्यों न नन्हे और रेशमा का निकाह कर दिया जाए.

करीब 2 साल पहले नन्हे ने नेहटौर जिला बिजनौर की रेशमा से निकाह कर लिया. नन्हे रेशमा को पा कर बहुत खुश था, क्योंकि रेशमा बला की खूबसूरत थी. नन्हे रेशमा से बहुत प्यार करता था. नन्हे ईरिक्शा चला कर ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने में लगा रहता था. थकाहारा नन्हे घर आ कर खाना खा कर सो जाता था.

रेशमा कहीं अपने घर या रिश्तेदारों में हंसहंस कर फोन पर बात करती तो नन्हे को शक पैदा होता था कि उस का किसी गैरमर्द से जरूर कोई चक्कर चल रहा है. इसी बात को ले कर अकसर नन्हे और रेशमा में झगड़ा होता रहता था. शक आदमी को पागल बना देता है, ऐसा ही नन्हे के साथ हुआ था. नन्हे द्वारा पत्नी के चरित्र पर शक करने के बाद रेशमा ने भी नन्हे से दूरी बनानी शुरू कर दी. नन्हे रेशमा की बेवफाई से परेशान था. सुंदर होना भी उस के लिए एक अभिशाप बन गया था.

आदमी की फितरत ही कुछ ऐसी होती है कि सुंदर पत्नी यदि किसी से हंस कर बात कर ले या फोन पर ज्यादा परिवार वालों से बात कर ले तो वह शक करने लगता है. नन्हे के मन में शक ज्यादा गहराने लगा था. घर में आए दिन झगड़े होने लगे थे.

पति को होने लगा रेशमा पर शक

8 मई, 2023 की रात करीब 11 बजे से पहले भी रेशमा के चरित्र को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ था. नन्हे का शक इतना बढ़ गया था कि वह कुछ भी करने को तैयार था. उस दिन नन्हे की मां अपनी छोटी लडक़ी शहनाज की ससुराल काशीपुर, उत्तराखंड गई हुई थी. घर में रेशमा के पहले पति कन्हैया से पैदा ढाई साल का बेटा ही मौजूद था.

उस दिन नन्हे खाना खा कर सोने चला गया था. उस की पत्नी रेशमा भी अपने बच्चे के साथ दूसरे कमरे में सोने चली गई थी. उधर नन्हे की नींद जैसे कोसों दूर हो चुकी थी. उसे नींद नहीं आ रही थी. मन में तरहतरह के विचार आ रहे थे.

वह उठा व घर में रखा छुरा उठा कर दूसरे कमरे में सो रही रेशमा के पास पहुंच गया. उस ने उस की गरदन जैसे ही छुरा से रेतनी शुरू की रेशमा की नींद खुल गई. पूरा जोर लगा कर रेशमा ने नन्हे को पलंग से नीचे गिरा दिया और वह कमरे से बाहर आ गई थी.

घायल अवस्था में छत से कूद गई थी रेशमा

जान बचाने का रास्ता नहीं था. घायल रेशमा भाग कर मकान की सीढिय़ों पर चढ़ गई. वहां से उस ने बराबर में रहने वाली नाजमा के घर में छलांग लगा दी. वह घर में न गिर कर गली में गिर गई. ठीक उसी समय नन्हे भी पीछा करते हुए वहां पहुंचा. उस ने भी पड़ोसी के घर में छलांग लगा दी. वह नाजमा की रसोई, जिस की छत सीमेंट के चादरों की थी, पर जा कर गिरा. उस के कूदते ही रसोई का शेड धड़ाम से टूट कर नीचे गिरा. बहुत जोर की आवाज हुई.

शोर सुन कर नाजमा ने समझा कि घर में चोर आ गए हैं, उस ने शोर मचा दिया. चोरचोर सुनते ही पड़ोसी लोग अपनेअपने घरों से निकल आए. नाजमा और पड़ोसियों ने देखा नन्हे रेशमा के बाल पकड़ कर खींचते हुए अपने घर में ले गया. वहां घायल रेशमा नन्हे के पैरों पर पड़ कर अपनी जान की भीख मांगने लगी. नन्हे पर भूत सवार था. उस ने एक झटके में रेशमा का गला रेत कर मौत के घाट उतार दिया.

cReshma ko ise gadde mein

आननफानन में नन्हे ने अपने सेप्टिक टैंक (गटर) का ढक्कन उठा कर रेशमा के शव को उस में डाल कर ऊपर से कंबल व अन्य कपड़े डाल दिए. जो खून घर में पड़ा था जो उसे दिखाई दिया, उसे उस ने साफ कर दिया था.

मोहल्ले वाले जब पुलिस बुलाने की कोशिश कर रहे थे तो पुलिस के आने से पहले ही नन्हे फरार हो गया था. पुलिस ने रेशमा की हत्या की सूचना उस के मायके वालों को दी. रेशमा की अम्मी नसीमा सूचना मिलते ही अपने बड़े बेटे नाजिम व छोटी बेटी व बहनोई को ले कर मुरादाबाद आ गई. रेशमा की लाश देख कर घर के लोगों का रोरो कर बुरा हाल था.

रेशमा की अम्मी नसीमा ने थाना सिविल लाइंस में नन्हे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई. पोस्टमार्टम के बाद रेशमा का शव अपने घर नेहटौर ले कर चली गई थी. साथ में रेशमा का ढाई साल का बेटा भी अपने साथ ले गई थी. वहां जा कर उन्होंने रेशमा को दफन कर दिया था. नन्हे से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे 9 मई, 2023 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.