अनुराधा रेड्डी हत्याकांड : सीसीटीवी फुटेज से खुली मर्डर मिस्ट्री – भाग 1

वह जल्दीजल्दी काले कपड़े की तह को परतदरपरत हटाता गया. जब उस की नजर उस चीज पर पड़ी तो उस के मुंह से एक जबरदस्त चीख निकली और कपड़ा हाथ से छूट कर दूर जा गिरा और वह उल्टे पांव दूर जा खड़ा हुआ.  उस पौलीथिन के भीतर काले कपड़े में लपेट कर किसी महिला का कटा सिर रखा था. जिसे देख सुधाकर बुरी तरह डर गया था. डर के मारे ही उस के मुंह से चीख निकल पड़ी थी और कपड़ा हाथ से छूट कर दूर जा गिरा था.

फिर उस ने लाश…लाश चिल्ला कर लोगों को मौके पर जमा कर लिया था. चूंकि वह वक्त सुबह का था और लोग सुबह की सैर पर निकले ही थे इसलिए वहां काफी लोग जमा हो गए. मौके पर पुलिस भी आ गई. सीसीटीवी फुटेज के सहारे पुलिस चंद्रमोहन के घर पहुंच गई.

चंद्रमोहन समझ चुका था कि उस के गुनाहों का घड़ा फूट चुका है और वह बेनकाब हो चुका है. अब सच बता देने में ही भलाई है और वहां से उठा. फिर पुलिस को साथ ले कर किचन में पहुंचा, जहां फ्रिज रखा था. उस ने फ्रिज खोल कर पुलिस को दिखा दिया. फ्रिज के अंदर का नजारा देख कर दोनों पुलिस अधिकारी भौचक रह गए थे. फ्रिज के अंदर कटे हुए दोनों हाथ और पैर रखे हुए थे. यह दृश्य देख कर दोनों की जैसे रूह कांप उठी.

17 मई, 2023 की सुबह सफाई कर्मचारी सुधाकर अपनी ड्यूटी पर था. दूरदूर तक सडक़ की दोनों पटरियों पर बिखरे तिनकों को झाड़ू से बुहार रहा था और अपनी किस्मत को कोस रहा था कि पता नहीं कब तक उसे यह काम करना पड़ेगा. झाड़ू की लाठी पकड़े उस के दोनों बाजू थक चुके थे. झाड़ू लगातेलगाते सुधाकर अफजल नगर कम्युनिटी हाल के सामने मुसी नदी के पास थीगालगुडा रोड के बगल में स्थित कचरा डंप करने की जगह पहुंच गया था.

अचानक उस की नजर कचरा बौक्स के पास पड़ी काली पौलीथिन पर जा टिकी, जो काफी टाइट तरीके से बंधी हुई थी. पौलीथिन देख कर उस का दिल जोरजोर से धडक़ने लगा और मन ही मन खुश होने लगा था कि शायद उस के मन की मुराद पूरी हो रही है. सोच रहा था कि इस पौलीथिन में रुपए या कोई ज्वैलरी होगी. अपनी झाड़ू कचरा बौक्स के सहारे टिका कर सुधाकर घुटने मोड़ कर पौलीथिन के पास जा बैठा और उसे जल्दीजल्दी खोलने लगा.

पौलीथिन इतनी टाइट तरीके से बांधी गई थी कि उसे खोलने में करीब 5 मिनट का समय लग गया था. पौलीथिन की गांठें खुलीं तो देखा उस के भीतर भी काले कपड़े में सामान बंधा है. यह देख कर उस की उत्सुकता और बढ़ गई कि आखिर इस में है क्या जो इतने तरीके से बंधा है.

वह जल्दीजल्दी काले कपड़े की तह को परतदरपरत हटाता गया. जब उस की नजर उस चीज पर पड़ी तो उस के मुंह से एक जबरदस्त चीख निकली और कपड़ा हाथ से छूट कर दूर जा गिरा और वह उल्टे पांव दूर जा खड़ा हुआ. उस पौलीथिन के भीतर काले कपड़े में लपेट कर किसी महिला का कटा सिर रखा था. जिसे देख सुधाकर बुरी तरह डर गया था. डर के मारे ही उस के मुंह से चीख निकल पड़ी थी और कपड़ा हाथ से छूट कर दूर जा गिरा था.

फिर उस ने लाश…लाश चिल्ला कर लोगों को मौके पर जमा कर लिया था. चूंकि वह वक्त सुबह का था और लोग सुबह की सैर पर निकले ही थे इसलिए वहां काफी लोग जमा हो गए. मौके पर जमा तमाशबीन महिला का कटा सिर देख कर उसे पहचानने की कोशिश में जुटे थे, लेकिन उसे कोई पहचान नहीं सका. उस के बाद खुद सुधाकर ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के घटना की जानकारी दे दी.

चूंकि वह एरिया हैदराबाद के मलकापेट थाना क्षेत्र में पड़ता था. इसलिए वायरलैस से कंट्रोल रूम द्वारा मलकापेट थाने के इंसपेक्टर के. श्रीनिवास को सूचना दी गई तो वह कुछ पुलिसकर्मियों को साथ ले कर मौके पर पहुंच गए. मौके पर जुटी भीड़ पुलिस को देख कर इधरउधर हो गई. पुलिस टीम जांच कार्य में जुट गई थी.

पुलिस ने बरामद किया महिला का सिर

मौके पर जमा भीड़ से इंसपेक्टर के. श्रीनिवास ने कटे सिर की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन उसे कोई पहचान नहीं सका. पुलिस ने सिर को अपने कब्जे में ले लिया और बाकी बचे शरीर की तलाश में जुट गई. चारों ओर करीब एक किलोमीटर के दायरे में पुलिस ने शरीर के बाकी हिस्से की तलाश की, मगर वह कहीं नहीं मिला.

फिर इंसपेक्टर श्रीनिवास सिर को ले कर थाने पहुंचे. इस से पहले उन्होंने इस की जानकारी डीसीपी सी.एच. रूपेश (दक्षिण- पूर्वी जोन) और एसीपी (मलकापेट) जी. श्याम सुंदर को दे दी थी. सूचना पा कर दोनों अधिकारी मौके का जायजा लेने के बाद थाने पहुंचे.

डीसीपी और एसीपी ने भी कटे सिर का मुआयना किया तो वह चौंक गए. हत्यारे ने जिस तरीके से सिर धड़ से काट कर अलग किया, उस से लग रहा था कि उस ने उसे काटने में किसी तेजधार वाले हथियार का प्रयोग किया होगा.

अधिकारियों के निर्देश पर इंसपेक्टर श्रीनिवास ने हैदराबाद के सभी थानों को वायरलैस पर मैसेज भेज कर गुमशुदा महिला की रिपोर्ट दर्ज होने के बारे में जानकारी ली. उन्हें किसी भी थाने में न तो किसी महिला की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने की सूचना मिली और न ही किसी महिला की सिरविहीन लाश बरामद होने की जानकारी मिली.

पुलिस के सामने महिला की शिनाख्त कराने की चुनौती थी, क्योंकि पुलिस के पास केवल कटा हुआ सिर था. इस के अलावा मरने वाली की कोई पहचान नहीं थी. उस का नाम क्या है? उस की उम्र क्या है? कहां की रहने वाली थी? कहां से आई थी? ऐसे तमाम सवाल पुलिस के सामने थे, लेकिन उन का कोई जवाब नहीं था.

अगले दिन फिर से पुलिस मृतका का नाम और पता खोजने में जुट गई, लेकिन ये काम इतना आसान नहीं था. ये प्रक्रिया लंबी और जटिल थी. फिर क्या था पुलिस ने उस सिर के फोटो के पैंफ्लेट रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, शहर के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों, उन इलाकों में जहां भी संभावना थी, चिपकवा दिए और थाने का फोन नंबर दे दिया.

यही नहीं, पुलिस ने घरघर जा कर तसवीर दिखा कर लोगों से पूछा कि क्या इस युवती को जानते हैं? इस के अलावा पुलिस ने तसवीर राज्य के 750 पुलिस स्टेशनों में भेजी. साथ ही वाट्सऐप ग्रुप के जरिए भेज कर उस महिला के बारे में पूछा.

डीसीपी सी.एच. रूपेश ने घटना के खुलासे को ले कर 8 टीमें गठित कर दीं. सभी टीमों ने घटना के खुलासे को ले कर दिनरात एक कर दिया, मगर कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी. पुलिस जहां से चली थी, फिर वहीं लौट कर आ गई थी. करीब 5 दिन बीच चुके थे.

कुछ तो ऐसा था जो पुलिस की निगाहों से छूट रहा था. 22 मई, 2023 को पुलिस की एक टीम फिर से मुसी नदी के किनारे पहुंची, जहां से कटा सिर बरामद किया गया था. वहां से गुजरने वाली सडक़ों के किनारे लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खंगालने का फैसला किया गया, जो एक सडक़ को दूसरी सडक़ से जोड़ते थे.

फिर क्या था पुलिस ने एक सप्ताह (10 से 16 मई, 2023 तक) की फुटेज निकाली और उस की गहनतापूर्वक जांचपड़ताल शुरू की. उस में करीब 200 घंटे की फुटेज मौजूद थी. ऐसा इसलिए किया जा रहा था, क्योंकि 17 मई को सिर बरामद हुआ था, पुलिस को अनुमान था कि इस दरम्यान कोई न कोई क्लू जरूर मिल सकता है.

मिसकाल का प्यार – भाग 3

21 फरवरी की सुबह अपना कालेज बैग ले कर रूबी कालेज जाने के लिए घर से निकली और इलकल से बस पकड़ कर वह रात साढ़े 9 बजे बंगलुरु एयरपोर्ट पर पहुंच गई. वहां सुजाय उस का पहले से इंतजार कर रहा था.

रूबी और सुजाय ने जब पहली बार एकदूसरे को हकीकत में देखा तो रूबी उस के सीने से लिपट गई. दोनों के दिल करीब आए तो धड़कनें स्वाभाविक ही बढ़ गईं. चूंकि वह सार्वजनिक जगह थी, इसलिए उन्होंने न चाहते हुए भी खुद को कंट्रोल किया. सुजाय ने बंगलुरु से दिल्ली तक की जेट एयरवेज की 2 टिकटें पहले से बुक कर रखी थीं. वहां से दोनों फ्लाइट से रात करीब डेढ़ बजे दिल्ली आ गए.

चूंकि दोनों पहली बार मिले थे, इसलिए सुजाय उस से जी भर कर बातें करना चाहता था. इसलिए रूबी को ले कर दिल्ली एयरपोर्ट के नजदीक महिपालपुर इलाके में गया और वहां स्थित एक गेस्टहाउस में एक कमरा बुक करा लिया. रूबी ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर दिया था, ताकि घर वाले उसे ढूंढ़ न सकें.

कोई भी जवान लड़कालड़की, जो आपस में सगेसंबंधी न हों, अगर उन्हें लंबे समय तक एकांत में रहना पड़ जाए तो उन के बहकने की आशंकाएं अधिक होती हैं. रूबी और सुजाय तो प्रेमीप्रेमिका थे, इसलिए गेस्टहाउस के कमरे में वे इतने नजदीक आ गए कि उन के बीच की सारी दूरियां मिट गईं.

उधर रूबी शाम तक घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. उन्होंने उस का फोन मिलाया, वह स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद उन का परेशान होना लाजिमी था. वैसे भी कोई जवान बेटी घर वालों से बिना कुछ बताए गायब हो जाए तो मांबाप की क्या स्थिति होगी, इस बात को रूबी की अम्मी और अब्बू ही महसूस कर रहे थे.

उन्होंने रूबी के बारे में संभावित जगहों पर फोन कर के पता किया, लेकिन जब उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो वह थाना इलकल पहुंच गए और 22 वर्षीया रूबी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. रूबी के पिता ने बेटी के गायब होने की सूचना दर्ज करा जरूर दी थी, लेकिन उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि पुलिस बेटी के बारे में कुछ पता लगा पाएगी. बेटी की चिंता में उन्हें नींद नहीं आई.

अगले दिन 22 फरवरी को भी वह अपने तरीके से बेटी को खोजने लगे. तभी सुबह 10 बजे उन के मोबाइल की घंटी बजी. उन्होंने धड़कते दिल से काल रिसीव कर के जैसे ही हैलो कहा, दूसरी ओर से रौबदार आवाज में कोई आदमी बोला, ‘‘तुम रूबी के लिए परेशान हो रहे हो न..?’’

उस की बात पूरी होने से पहले ही रूबी के पिता बोले, ‘‘हां…हां, कहां है मेरी बेटी?’’

‘‘वह जिस के पास है, हमें पता है. वे लोग इतने खतरनाक हैं कि अगर उन की मांग नहीं मानी गई तो वे लड़की को खत्म कर देंगे या फिर उसे किसी कोठे पर बेच देंगे.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘मेरी बेटी को कुछ नहीं होना चाहिए. मैं उन की सारी मांगें मानूंगा. मगर यह तो बता दो कि जिन के पास मेरी बेटी है, वे लोग मुझ से चाहते क्या हैं?’’

‘‘10 पेटी. यानी 10 लाख रुपए दे दो और बेटी को ले जाओ. एक बात का ध्यान रखना, यह बात पुलिस को पता नहीं लगनी चाहिए, वरना बेटी को कफन ओढ़ाने की नौबत आ जाएगी. पैसे ले कर कब और कहां आना है, बाद में बता दिया जाएगा. और पैसे ले कर अकेले ही आना.’’ कहने के बाद फोन काट दिया गया.

फोन पर बात करने के बाद रूबी के पिता को यह तो पता चल गया कि बेटी का किसी ने अपहरण कर लिया है. लेकिन उन के दिमाग में एक दुविधा यह भी थी कि वह इस मामले की खबर पुलिस को दें या नहीं? क्योंकि पुलिस में सूचना देने पर अपहर्त्ता ने उन्हें अंजाम भुगतने की चेतावनी दी थी. उन की पत्नी ने पुलिस को खबर न करने को कहा, जबकि सगेसंबंधियों और दोस्तों ने पुलिस के पास जाने की सलाह दी.

फिर वह काफी सोचनेसमझने के बाद पुलिस के पास पहुंच गए. उन्होंने इलकल के थानाप्रभारी को वह मोबाइल नंबर भी दे दिया, जिस से उन के मोबाइल पर फिरौती का फोन आया था.

थानाप्रभारी ने उन की तहरीर पर एफआईआर नंबर 33/2014 भादंवि की धारा 364ए के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. जिस नंबर से फिरौती की काल आई थी, थानाप्रभारी ने उस नंबर को इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन दिल्ली की मिली. थानाप्रभारी ने यह बात अपने उच्चाधिकारियों को बताई.

बगालकोट जिले में एक आईपीएस अधिकारी हैं मिस्टर मार्टिन. मार्टिन दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के डीसीपी कुमार ज्ञानेश से अच्छी तरह परिचित थे. उन्होंने आईपीएस अधिकारी कुमार ज्ञानेश से फोन पर बात कर के रूबी को सकुशल बरामद कराने में सहयोग मांगा.

चूंकि मामला अंतरराज्यीय था, इसलिए कुमार ज्ञानेश ने क्राइम ब्रांच के अतिरिक्त आयुक्त रविंद्र यादव की जानकारी में यह बात लाई. दिल्ली पुलिस इस से पहले भी दूसरे प्रदेशों में बड़े अपराध कर के भागे अनेक अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के संबंधित राज्यों की पुलिस के हवाले कर चुकी थी.

इसलिए अतिरिक्त आयुक्त रविंद्र यादव ने कर्नाटक पुलिस का सहयोग करने के लिए क्राइम ब्रांच की एंटी स्नैचिंग सेल के इंसपेक्टर सुशील कुमार की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई सुरेंद्र दलाल, एएसआई मुकेश त्यागी, हेडकांस्टेबल राजबीर सिंह, ऋषि कुमार आदि को शामिल किया. टीम का निर्देशन डीसीपी कुमार ज्ञानेश को सौंपा गया.

उधर कर्नाटक पुलिस के इंसपेक्टर रविंद्र शिरूर, एसआई प्रदीप तलकेरी, बस्वराज लमानी की टीम 23 फरवरी, 2014 को दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच औफिस पहुंच गई. टीम के साथ रूबी का बहनोई भी था. जिस मोबाइल नंबर से अपहर्त्ता ने रूबी के पिता को फिरौती की काल की थी, उस नंबर को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने भी इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस पर लगा दिया था. उस की लोकेशन लगातार महिपालपुर इलाके की आ रही थी.

महिपालपुर के जिस इलाके की फोन की लोकेशन आ रही थी, उस इलाके में अनेक गेस्टहाउस और होटल थे. पुलिस ने अनुमान लगाया कि शायद अपहर्त्ताओं ने लड़की को किसी गेस्टहाउस या होटल में बंद कर रखा है, इसलिए कर्नाटक पुलिस के साथ दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की टीम ने उस इलाके के एकएक होटल और गेस्टहाउस की तलाशी लेनी शुरू कर दी.

होली पर मंगेतर को मौत का अबीर – भाग 1

17 मार्च को जिस समय देश भर में लोग होली के हुड़दंग में मस्त थे उस समय हरिसिंह के घर में  मायूसी छाई हुई थी. इस की वजह यह थी कि हरिसिंह की छोटी बेटी प्रियंका जो दिल्ली टै्रफिक पुलिस में कांस्टेबल थी, बीते दिन यानी 16 मार्च की शाम से गायब थी. वह शाम को करीब 7 बजे यह कह कर घर से निकली थी कि किसी से मिलने जा रही है और थोड़ी देर में घर लौट आएगी.

प्रियंका कोई दूध पीती बच्ची तो थी नहीं जो घर वालों को उस की तरफ से कोई चिंता होती. वह 22 साल की थी, ऊपर से दिल्ली पुलिस में नौकरी कर रही थी इसलिए उन्हें उस की समझदारी पर कोई शक नहीं था. घर वाले निश्चिंत थे कि वह कहीं किसी काम से गई है तो देरसवेर घर आ जाएगी.

प्रियंका को घर से गए हुए कई घंटे बीत गए. वह घर नहीं लौटी तो उस की बड़ी बहन सुमन ने उसे यह जानने के लिए फोन किया कि वह कहां है और कितनी देर में घर आ रही है. लेकिन प्रियंका का फोन कंप्यूटर द्वारा स्विच्ड औफ या पहुंच से दूर बताया जा रहा था. सुमन ने उस का फोन कई बार मिलाया, हर बाद उन्हें कंप्यूटर का वही जवाब सुनने को मिला.

प्रियंका कभी भी अपना फोन स्विच औफ कर के नहीं रखती थी. और जब कभी उसे घर लौटने में देरी हो जाती तो वह घर पर फोन जरूर कर दिया करती थी. लेकिन आज उस ने कोई फोन नहीं किया था.

सुमन की एक बहन शिक्षा दिल्ली पुलिस में सब इंसपेक्टर है. वह भी उस समय घर पर ही थी. उस ने भी प्रियंका का फोन नंबर मिलाया, जो उस समय भी स्विच्ड औफ था. घर के लोग परेशान थे कि न जाने वह कहां चली गई जो फोन भी बंद कर रखा है.

प्रियंका का एकलौता भाई प्रवीण भी दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल है. उसे भी प्रियंका के घर न लौटने की बात बताई गई तो वह भी घर आ गया. परिवार के सभी लोग इधरउधर फोन कर के प्रियंका का पता लगाने में जुट गए.

उन्होंने प्रियंका की जानपहचान वालों को भी फोन किए लेकिन उस का कहीं पता न लगा. घर के सभी लोग परेशान थे. वे रात भर जागते रहे. उस के लौटने के इंतजार में पूरी रात उन की निगाहें दरवाजे की तरफ ही लगी रहीं.

सुबह होने पर उस की फिर तलाश शुरू कर दी गई. लेकिन उस के बारे में कोई खबर नहीं मिल रही थी. तब उन के दिमाग में प्रियंका को ले कर गलत खयाल आने लगे. अंतत: सुमन ने 10 बजे के करीब बहन के रहस्यमय तरीके से गायब होने की खबर 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस नियंत्रण कक्ष को दे दी.

एक महिला कांस्टेबल के गायब होने की सूचना पाते ही पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) की वैन प्रियंका के घर पहुंच गई. चूंकि मामला सागरपुर थाना क्षेत्र का था इसलिए पीसीआर द्वारा थाना सागरपुर में वायरलेस द्वारा सूचना दे दी गई. तब थानाप्रभारी रिछपाल सिंह एसआई मदन के साथ वेस्ट सागरपुर के आई ब्लाक में स्थित कुसुम के घर पहुंच गए. सुमन और शिक्षा ने थानाप्रभारी को प्रियंका के गुम होने की पूरी बात बता दी.

पुलिस दोनों बहनों को थाने ले आई और शिक्षा की तरफ से प्रियंका की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. थानाप्रभारी ने प्रियंका के हुलिए के साथ उस के गायब होने की सूचना दिल्ली के समस्त थानों में प्रसारित करा दी. साथ ही उन्होंने जब शिक्षा से पूछा कि उन्हें किसी पर कोई शक वगैरह तो नहीं है तो शिक्षा ने बताया कि हमें प्रियंका के मंगेतर मोहित पर शक है.

‘‘मोहित कहां रहता है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘वह हरियाणा के भिवानी जिले के गांव छापर का रहने वाला है और नेवी में नौकरी करता है. अभी 3 महीने पहले ही प्रियंका का रिश्ता उस से तय हुआ था.’’ शिक्षा ने बताया.

थानाप्रभारी शिक्षा से बात कर ही रहे थे कि उसी दौरान उन्हें थाना क्षेत्र के ही मोहन नगर स्थित नीलगगन गेस्ट हाउस में एक महिला की लाश मिलने की सूचना मिली. थानाप्रभारी रिछपाल सिंह एसआई मदन, हेडकांस्टेबल सुरेश, कांस्टेबल लाला राम, नवीन आदि के साथ नीलगगन गेस्ट हाउस की तरफ चल दिए. चूंकि प्रियंका भी गायब थी इसलिए उन्होंने सुमन और शिक्षा को भी साथ ले लिया.

थानाप्रभारी जब नील गगन गेस्ट हाउस पहुंचे तो गेस्ट हाउस के मैनेजर सुनील कुमार ने बताया कि रूम नंबर 105 में एक युवती बेड पर पड़ी हुई है ऐसा लगता है शायद वह मर चुकी है. पुलिस तुरंत रूम नंबर 105 की तरफ गई, वो ग्राउंड फ्लोर पर दाहिनी साइड में था. उस कमरे में बाहर से ताला लगा था. मैनेजर ने पुलिस को बताया कि उस ने कमरे के अंदर का नजारा रोशनदान से झांक कर देखा था.

थानाप्रभारी ने भी उस कमरे के रोशनदान से कमरे में देखा तो एक युवती बेड पर लेटी हुई दिखाई दी. उस के मुंह में सफेद रंग का तौलिया ठूंसा हुआ था और बेडशीट पर खून के धब्बे भी दिख रहे थे. उस युवती के सीने तक का शरीर ब्राउन कलर के कंबल से ढका हुआ था.

उस युवती की हालत और बेडशीट पर खून के धब्बे देख कर थानाप्रभारी को भी लगा कि शायद उस की हत्या हो चुकी है. उन्होंने शिक्षा से भी कमरे के अंदर पड़ी युवती को देखने को कहा. शिक्षा ने जब रोशनदान से कमरे में झांका तो उस की आंखों में आंसू भर आए. बेड पर लेटी वह युवती उसे प्रियंका जैसी ही लग रही थी.

शिक्षा का उतरा चेहरा और आंखों में छलकते आंसू देख कर थानाप्रभारी रिछपाल सिंह ने पूछा, ‘‘क्या हुआ शिक्षा? क्या तुम उस युवती को पहचानती हो?’’

‘‘सर, वो मुझे प्रिया लग रही है.’’ प्रियंका को घर पर सब प्रिया कहते थे. वह थोड़ा गंभीर हो कर बोली, ‘‘मगर वो यहां क्यों आएगी?’’

शिक्षा की बात सुन कर सुमन भी घबरा गई उस ने भी रोशनदान से झांक कर देखा तो वह भी रुआंसी हो गई. उस ने रोशनदान से ही प्रियाप्रिया कह कर जोर से कई बार पुकारा लेकिन बेड पर लेटी युवती में कोई हरकत नहीं हुई. तब पुलिस ने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी गेस्ट हाउस में बुला लिया.

क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के सामने पुलिस ने धक्के मार कर उस कमरे के दरवाजे को तोड़ दिया. तभी शिक्षा और सुमन ने बेड पर लेटी युवती को देखा तो वे जोरजोर से रोने लगीं क्योंकि वह लाश उन की बहन प्रिया की ही निकली.

प्यार ने बना दिया नागिन – भाग 2

जब रचना को पता चला कि घर वालों ने उस की शादी तय कर दी है तो उस ने तुरंत रामेश्वर को फोन किया. प्रेमिका की शादी तय हो जाने की बात सुन कर वह बेचैन हो उठा. वह रचना से शादी तो करना चाहता था, लेकिन उस की मजबूरी यह थी कि अभी वह बेरोजगार था. उस के पास इतना पैसा भी नहीं था कि वह रचना को भगा ले जाता.

इसलिए उस ने मजबूरी जाहिर करते हुए पूछा, ‘‘रचना, तुम्हारी शादी कहां तय हुई है?’’

‘‘जब तुम कुछ कर नहीं सकते तो यह जान कर क्या करोगे?’’ रचना तुनक कर बोली.

‘‘भले ही अभी कुछ नहीं कर पा रहा हूं, लेकिन हमारे हालात हमेशा ऐसे ही थोड़े रहेंगे. जब सब ठीकठाक हो जाएगा, तब तो कुछ कर सकेंगे. इसीलिए पूछ रहा था.’’ रामेश्वर ने रचना को सांत्वना देते हुए कहा.

‘‘राम सिंह चाचा की कोई रिश्तेदारी मडौरा में है, वहीं किसी के यहां तय कराई है.’’ रचना ने जवाब दिया.

‘‘मडौरा में किस के यहां हो रही है? वहां तो मेरा ननिहाल है. कहीं तुम्हारी शादी बिहारी से तो नहीं हो रही है?’’ रामेश्वर ने चहक कर कहा, ‘‘मुझे पता चला है कि बिहारी मामा की शादी तय हो गई है. लेकिन मुझे यह नहीं मालूम कि उन की शादी कहां तय हुई है.’’

‘‘शायद उन्हीं के साथ हो रही है. वह तुम्हारे सगे मामा हैं?’’ रचना ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, बिहारी मेरे सगे मामा हैं. अगर उन के साथ तुम्हारा विवाह हो रहा है तो हम पहले की ही तरह मिलते रहेंगे. उस के बाद जब हमारे हालात सुधर जाएंगे तो हम भाग कर शादी कर लेंगे.’’ रामेश्वर ने कहा.

‘‘शादी के बाद क्या होगा, यह बाद की बात है, दूसरे के घर जा कर स्थिति कैसी बनेगी, यह तो वहां जाने पर ही पता चलेगा न? मैं तुम पर कैसे भरोसा कर सकती हूं? जब तुम अभी कुछ नहीं कर सकते तो दूसरी की हो जाने के बाद तुम मेरे लिए क्या कर पाओगे? अब मुझे तुम पर विश्वास नहीं रहा.’’ कह कर रचना ने फोन काट दिया.

अपने इस कायर प्रेमी पर रचना को बहुत गुस्सा आया था. वह समझ गई कि यह सिर्फ बड़ी बड़ी बातें कर के केवल सपने दिखा सकता है, कर कुछ नहीं सकता. एक से एक प्रेमी हैं, जो प्रेमिका के लिए जान देने को तैयार रहते हैं. एक यह है, जो बहाने बना कर पीछा छुड़ा कर भाग रहा है. यही सब सोच कर उस ने तय कर लिया कि अब वह उस से बात नहीं करेगी. अगर ससुराल में मिलेगा तो दुत्कार कर भगा देगी.

रचना का विवाह बिहारी से हो गया. वह विदा हो कर ससुराल आ गई. इस तरह वह अपने प्रेमी रामेश्वर की मामी बन गई. शादी में रामेश्वर मामा की बारात में तो गया ही था, बारात लौटी तो रचना से मिलने के चक्कर में रुक भी गया. उसे उम्मीद थी कि मौका मिलेगा तो रचना उस से बात करेगी. लेकिन रचना ने उस की ओर देखा तक नहीं. अगर कभी सामने पड़ा भी तो उस ने मुंह फेर लिया.

रामेश्वर की समझ में नहीं आ रहा था कि वह रचना को कैसे समझाए कि वह उसे बहुत प्यार करता है. लेकिन उसे भगा कर अपनी अलग दुनिया बसाने का उस के पास कोई साधन नहीं था, इसलिए वह पीछे हट गया था. रचना के लिए उस के मन में जो चाहत है, वह आज भी कम नहीं हुई है. रामेश्वर काफी परेशान था, क्योंकि वह प्रेमिका को दिखाए सपनों को पूरा नहीं कर सका था.

रामेश्वर जब भी मामा के यहां आता, रचना से बात करने की कोशिश करता. लेकिन रचना उसे मौका ही नहीं देती थी. संयोग से एक दिन वह ऐसे मौके पर मामा के घर पहुंचा, जब रचना घर में अकेली थी. उसे देख कर रचना को गुस्सा आ गया. उस ने उस से तुरंत वापस जाने को कहा.

रचना के गुस्से की परवाह किए बगैर रामेश्वर ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘रचना, मैं आज भी तुम से उतना ही प्यार करता हूं, जितना पहले करता था. यही नहीं, मैं तुम्हें इतना ही प्यार पूरी जिंदगी करता रहूंगा और किसी दूसरी लड़की से शादी भी नहीं करूंगा. मैं मजबूर था, भावनाओं में बह कर मैं तुम्हें भगा तो ले जाता, लेकिन बाद में जो परेशानी होती, उस का दोष तुम मुझे ही देती.’’

रचना ने जब रामेश्वर की बात पर गंभीरता से विचार किया तो उस की बात उसे सच लगी. लेकिन उस के सपनों की दुनिया तो उजड़ चुकी थी. रामेश्वर उसे बारबार विश्वास दिला रहा था कि वह आज भी उसे उतना ही प्यार करता है. इसलिए रचना ने कहा, ‘‘केवल प्यार करने से थोड़े ही कुछ होगा, कुछ करोगे भी या इसी तरह सिर्फ प्यार ही करते रहोगे? तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारे मामा बिहारी को आज भी मैं मन से स्वीकार नहीं कर पाई हूं.’’

‘‘अब तुम मेरी मामी बन चुकी हो, ऐसे में मैं क्या कर सकता हूं?’’ रामेश्वर ने कहा.

‘‘अगर तुम कुछ नहीं कर सकते तो मेरी नजरों के सामने आते ही क्यों हो?’’ रचना ने उसे झिड़का.

‘‘ऐसा मत कहो रचना. मैं तुम्हें देखे बगैर नहीं रह सकता. अगर तुम भी मुझे पहले की ही तरह प्यार करती हो तो मैं वादा करता हूं कि तुम जैसा कहोगी, मैं वैसा ही करूंगा.’’

‘‘तो फिर जैसे भी हो सके, तुम मुझे यहां से निकालो.’’ रचना ने कहा.

इस के बाद रामेश्वर और रचना के प्यार का सिलसिला एक बार फिर पहले ही तरह चल पड़ा. वे नए सिरे से अपनी अलग दुनिया बसाने की योजना बनाने लगे. काफी सोचविचार कर रचना और रामेश्वर ने जो योजना बनाई, उसी के अनुसार रचना काम करने लगी. एक दिन उस ने अपनी सास से कहा, ‘‘अम्माजी, आजकल मेरे सपनों में नाग बहुत आते हैं. वे कहते हैं कि मैं पूर्वजन्म में नागिन थी, इसलिए मुझे वे अपने साथ ले जाएंगे.’’

सास ने समझाया, सपना तो सपना होता है, वह सिर्फ दिखाई देता है, कभी सच नहीं होता. वह उस के बारे में सोचे ही न. लेकिन रचना लगातार सास से सपने का जिक्र करती रही. वह लगभग रोज बताती कि सपने में उसे नाग दिखाई देते हैं और कहते हैं कि वे उसे छोड़ेंगे नहीं.

रचना की बातों से ससुराल वाले परेशान रहने लगे थे. धीरेधीरे उस की शिकायतें कुछ ज्यादा ही बढ़ती गईं तो ससुराल वालों ने उसे कुछ दिनों के लिए मायके भेज दिया. सपने वाली बात जान कर हाकिम सिंह और रामवती को भी चिंता हुई. उन्हें असलियत का पता तो था नहीं, इसलिए उन्होंने झाड़फूंक भी कराई. उन्हें लगता था कि रचना अपने प्रेमी को भूल चुकी होगी. इसलिए वे निश्चिंत थे.

पत्नी के लिए पिता के खून से रंगे हाथ – भाग 3

दूसरी ओर शीलेश भी कम परेशान नहीं था. गांव के कुछ लोगों ने भी उस से कहा था कि जवान बीवी को इस तरह घर में छोड़ना ठीक नहीं है. उन लोगों के कहने का मतलब कुछ और था, जबकि शीलेश ने इस का मतलब वही लगाया, जो ममता ने उस के दिमाग में भरा था.

रुकुमपाल उस से बहुत कुछ कहना चाहता था, जबकि वह उस की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं था. तनाव हद से ज्यादा हो गया तो शीलेश ने ठेके पर जा कर जम कर शराब पी. गिरतेपड़ते किसी तरह घर पहुंचा तो रुकुमपाल ने उसे संभालने की कोशिश की. तब वह बाप को धक्का दे कर गालियां देने लगा.

ममता ने सुना तो बहुत खुश हुई. वह यही तो चाहती थी. वह बापबेटे के बीच दीवार खड़ी करने में कामयाब हो गई थी. शीलेश चारपाई पर लुढ़का तो सुबह ही उठा. उठते ही उस ने कहा, ‘‘ममता, तुम अपना सारा सामान समेटो. हम दिल्ली चलेंगे.’’

ममता घबरा गई. उस का फेंका पासा उलटा पड़ रहा था. क्योंकि इस हालत में अगर वह दिल्ली चली गई तो फिर लौट नहीं सकती थी. हरीश दिल्ली जा नहीं सकता. तब वह उस से कैसे मिल सकती थी. अब वह इस सोच में डूब गई कि ऐसा क्या करे कि उसे दिल्ली भी न जाना पड़े और बुड्ढे से भी पिंड छूट जाए.

काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह दिल्ली जाने के बजाय इस कांटे को ही जड़ से निकलवा फेंकेगी. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें पता नहीं, मैं पेट से हूं. इस हालत में मैं दिल्ली नहीं जा सकती. अब तुम्हें सोचना है कि इस हालात में तुम मुझे अपने बाप से कैसे बचा सकते हो? कोई दूसरा होता तो वह ऐसे आदमी को खत्म कर देता, जो उस की पत्नी पर बुरी नजर रखता हो.’’

ममता ने यह चाल बहुत सोचसमझ कर चली थी. उस का सोचना था कि शीलेश अगर अपने बाप को मार देता है तो बाप की हत्या के आरोप में पति जेल चला जाएगा. उस के बाद वह पूरी तरह से आजाद हो जाएगी. फिर वह आराम से हरीश से मिल सकेगी.

इस के बाद अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए ममता ने त्रियाचरित्र फैला कर शीलेश के मन में बाप के प्रति ऐसा जहर भरा कि वह बाप का ऐसा दुश्मन बना कि उस की जान लेने को तैयार हो गया. उसे लगा कि ऐसे बाप को जीने का बिलकुल हक नहीं है, जो अपने बेटे की ही पत्नी पर गंदी नीयत रखता हो.

रुकुमपाल यह तो जान गया था कि पत्नी के कहने में आ कर बेटा उस के खिलाफ हो गया है. लेकिन उसे यह विश्वास नहीं था कि बेटा उस की जान भी ले सकता है. उस का सोचना था कि जब शीलेश को सच्चाई का पता चल जाएगा तो अपने आप सब ठीक हो जाएगा.

19 मार्च की शाम को शीलेश ने रुकुमपाल से खेतों से भूसा लाने को कहा. रुकुमपाल भूसा लाने के लिए खेतों की ओर चला तो शीलेश भी फावड़ा ले कर उस के पीछेपीछे वहां जा पहुंचा. उस के साथ ममता भी थी.

रुकुमपाल झुक कर भूसा निकालने लगा तो शीलेश ने पीछे से उस पर फावड़े से वार कर दिया. रुकुमपाल चीख कर गिर पड़ा. उस की चीख सुन कर आसपास के खेतों में काम कर रहे लोग उस की ओर दौड़े. वे रुकुमपाल के पास तक पहुंच पाते इस से पहले शीलेश ने बाप पर फावड़े से कई वार किए और भाग निकला. लेकिन गांव वालों ने उसे ही नहीं, ममता को भी उस के साथ भागते हुए देख लिया था.

गांव वालों ने घटना की सूचना कोतवाली देहात पुलिस को दी. सूचना पा कर कोतवाली प्रभारी पदम सिंह पुलिस बल के साथ गांव नगला समल पहुंच में रुकुमपाल के खेत पर गए. पहुंचते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले लिया. गांव वालों ने पूछताछ में बताया कि जब वे रुकुमपाल की चीख सुन कर उस की ओर दौड़े थे तो उन्हें मृतक का बेटा शीलेश और बहू ममता भागते ही दिखाई दिए थे.

पुलिस को लगा कि उन्हीं लोगों ने यह काम किया है, तभी भाग रहे थे अन्यथा बाप की चीख सुन कर वह बचाने दौड़ेगा, भागेगा नहीं. कोतवाली प्रभारी ने 2 सिपाहियों को घटनास्थल पर छोड़ा और खुद बाकी सिपाहियों को ले कर रुकुमपाल के घर जा पहुंचे.

शीलेश भागने की तैयारी कर रहा था. ममता भी उस के साथ थी. पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया. पुलिस ने मृतक की बेटी आशा को घटना की सूचना दी तो वह दादी रामरखी को साथ ले कर आ गई. रुकुमपाल की लाश देख कर रामरखी बेहोश हो गई तो आशा भी फूटफूट कर रोने लगी.

रामरखी को होश में लाया गया तो वह रोते हुए कहने लगी, ‘‘ममता ने ही अपने यार से मिलने के लिए मेरे बेटे को मरवाया है, क्योंकि मेरा बेटा उसे उस से मिलने से रोकता था.’’

जब आशा को पता चला कि शीलेश ने ही उस के पिता की हत्या की है तो उस का दुख और बढ़ गया. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद शीलेश और ममता को ले कर थाने आ गई.

थाने में शीलेश और ममता ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद ममता ने ससुर की हत्या करवाने के पीछे की अपने अवैध संबंधों की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर शीलेश ने अपना सिर पीट लिया.

लेकिन अब क्या हो सकता था. पत्नी के कहने में आ कर उस ने अपने बच्चों को तो अनाथ किया ही, उस बाप के खून से हाथ रंग लिए, जिस ने उसे बाप का ही नहीं, मां का भी प्यार दिया था. उस ने दादी के बुढ़ापे का सहारा छीनने के साथ भरापूरा परिवार बरबाद कर दिया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शीलेश और ममता को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. रुकुमपाल का भी कैसा दुर्भाग्य था कि जिस बेटे से उस ने उम्मीद लगा रखी थी कि मरने पर उस का अंतिम संस्कार करेगा. उसी ने उसे मौत के घाट उतार दिया.

दूसरा पहलू : अपनों ने बिछाया जाल – भाग 4

एक सप्ताह बीत गया. सुकृति और मां की हालत खराब होने लगी. कोई निर्णय नहीं कर पा रहा था कि पुलिस को सूचना दी जाए या नहीं. धीरेधीरे 10 दिन बीत गए. कहीं से कोई सूचना नहीं मिली. सुकृति से पता चला कि मनु अपना क्रेडिट कार्ड साथ ले कर नहीं गया. भैया ने बैंक से पता किया तो पता चला कि जाने से एक दिन पहले मनु ने अपने एकाउंट से 20 लाख रुपए निकाले थे. इस बात ने सभी को और परेशान कर दिया.

15 दिन बीत गए. मनु का कुछ पता नहीं चल रहा था. अंत में भैया सुकृति को ले कर पुलिस स्टेशन गए. पुलिस ने गुमशुदगी लिखने से मना कर दिया. पुलिस वालों का तर्क था कि बालिग और स्वस्थ लड़का अगर अपनी इच्छा से घर से चला जाता है तो कोई अपराध नहीं होता.

मनु को गए पूरे 17 दिन हो गए थे. 17वें दिन अचानक सुबह बड़े भैया सुरेंद्र के मोबाइल पर अंजान नंबर से फोन आया. फोन करने वाले ने उसे एक नंबर दे कर कहा कि वह फौरन उस नंबर पर बात करे. भैया का माथा ठनका. किसी अनिष्ट की आशंका से शरीर सिहर उठा. उस ने वह नंबर मिलाया तो दूसरी ओर से किसी महिला का स्वर उभरा, ‘‘हैलो मि. सुरेंद्र, आप घर वालों से थोड़ा अलग हट कर बात करें.’’

घबराया सुरेंद्र कोठी के बाहर लौन में आ गया. महिला ने सिसकते हुए पूछा, ‘‘आप का छोटा भाई मनु कहां है?’’

सुरेंद्र को काटो तो खून नहीं. उस ने कहा, ‘‘बिजनैस के सिलसिले में बाहर गया है.’’

महिला ने फौरन कहा, ‘‘आप को कुछ पता भी है, मेरी बेटी घर से गायब है. आप का भाई मेरी बेटी को ले कर भाग गया है.’’

सुरेंद्र को गहरा आघात लगा. उस ने पूछा, ‘‘आप को मेरा नंबर कैसे मिला?’’

तब फोन पर बात करने वाली महिला ने कहा, ‘‘मैं सुकृति की आंटी रश्मि अहमदाबाद से बोल रही हूं.’’

सुरेंद्र को अब सारा माजरा समझ में आ गया. बात इतनी आसान नहीं थी, जितनी दिख रही थी. सुकृति की आंटी की बातों से उस ने इतना तो भांप ही लिया था कि यह सब पूर्व नियोजित था. शतरंज की गहरी चाल, जिस में न चाहते हुए भी वे सब फंस चुके थे. सुरेंद्र ने तुरंत यह बात मां को बताई. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इस घटना की जानकारी सुकृति को कैसे दी जाए.

अचानक इस अनहोनी से पूरा घर परेशान था. सुकृति की तो दुनिया ही बदल गई थी. उस के ऊपर विपत्ति के बादल फट पड़े थे. सब को लगा, समझदारी इसी में है कि सुकृति से कुछ न छिपाया जाए. उसे फौरन सब बता देना ही ठीक है. सच्चाई जान कर सुकृति सन्न रह गई. उस के अपनों ने ही उस की बसीबसाई गृहस्थी उजाड़ दी थी. पता नहीं कौन से जन्म का बदला लिया था उस के खून के दिरश्तेदारों ने.

सुकृति को याद आया कि शायद इस घटना के पीछे उस का पारिवारिक विवाद है. गांव में उस के चाचाताऊ में खेती की जमीन को ले कर काफी पुराना विवाद चल रहा था. उस के चाचा और आंटी पैतृक जमीन में से 4 बीघा जमीन पर अधिकार जता रहे थे. जबकि उन का उस  पर कोई हक नहीं था.

सुकृति ने तुरंत अपने पिता को फोन किया. उस के पिता ने अहमदाबाद में रह रहे अपने चचेरे भाई को फोन कर के असलियत जाननी चाही. लेकिन उन के अनुसार वहां ऐसा कुछ नहीं हुआ था. हद तो तब हो गई, जब सुरेंद्र से अपनी बेटी की गुमशुदगी की बात बताने वाली रश्मि ने उसी समय जेठ यानी सुकृति के पापा से मिंटू की बात करा कर कहा था कि वैसा कुछ नहीं है, जैसा वे कह रहे हैं. अब झूठा कौन था?

सुरेंद्र और उस की मां की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सुरेंद्र ने रश्मि को फोन किया तो वह फिर अपनी बेटी को भगा ले जाने का राग अलापने लगी. सुरेंद्र समझ गया कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. बातोंबातों में रश्मि ने इशारा कर दिया था कि अभी वह इस बात को सब से छिपाए हुए है. अपने रिश्तेदारों से भी उस ने कुछ नहीं बताया है. अगर अभी भी मनु और मिंटू लौट आते हैं तो वह इस बात को यहीं खत्म कर देगी. दोनों घरों की इज्जत घर में ही रह जाएगी.

मनु के मोबाइल का स्विच औफ था. सुरेंद्र को लगा, मिंटू अपना मोबाइल ले कर गई होगी, जो चालू होगा. उसे लग रहा था कि मिंटू अपने मांबाप के संपर्क में है. क्योंकि उन की बातों से उसे कभी ऐसा नहीं लगा था कि उन्हें अपनी बेटी के भाग जाने का जरा भी अफसोस है. वे एकदम सामान्य लगते थे. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं दर्ज कराई थी.

सुरेंद्र ने तय किया कि वह उस औरत के निर्देशों पर नहीं चलेगा. उस ने वकीलों से बात की तो वकीलों ने बताया कि यह भी संभव है कि बरामदगी के बाद अगर लड़की ने अपने बयान में मनु के साथ उस का भी नाम ले लिया तो वह भी फंस सकता है. सुरेंद्र घबरा गया. बैठेबिठाए अपने नासमझ भाई की मूर्खता की वजह से सब बेकार के बखेड़े में फंस कर पिस रहा था. उस ने तय कर लिया कि अब वह किसी भी कीमत पर उस महिला से संपर्क नहीं करेगा.

लेकिन रश्मि इतनी आसानी से कहां छोड़ने वाली थी. उस ने कई बार उस से मिलने को कहा. उसे अहमदाबाद बुलाया. लेकिन उस की छठी इंद्री उसे अहसास करा रही थी कि यह ठीक नहीं है. हो सकता है कि उस की कोई चाल हो. उसे भी जाल में फंसाने की प्लानिंग हो, सो वह कन्नी काटता रहा. जबकि रश्मि बारबार उसे अपने यहां आ कर खास बातचीत करने की बात कर रही थी.

सुरेंद्र उस के झांसों में नहीं आ रहा था. उस ने मनु के मोबाइल पर मैसेज किए, ताकि अगर कभी वह अपना मोबाइल औन करे तो उसे उस का संदेश मिल जाए और वह सारी हकीकत बता दे कि आखिर यह कैसी साजिश है.

इसी तरह 5 दिन और बीत गए. इस बीच रश्मि ने उसे कई फोन किए, लेकिन सुरेंद्र ने उस से बात नहीं की. उस ने सुकृति से स्पष्ट कह दिया था कि वही इस घर की बहू है, इसलिए किसी भी कीमत पर इस घर में उस के अलावा कोई और लड़की नहीं आ सकती. मां भी भला इस तरह का अन्याय कैसे सहती.

दुनिया में रिश्ते भी कितने अजीबअजीब हैं. अक्सर जिन्हें हम अपना समझते हैं, वही कभीकभी ऐसा परायों जैसा व्यवहार कर बैठते हैं कि लोग मुसीबत में पड़ जाते हैं. सुरेंद्र ने रश्मि से मिंटू का नंबर पूछा तो उस ने बताने से साफ मना कर दिया. पुलिस रश्मि का काल डिटेल्स निकलवाने को तैयार नहीं थी.

मिसकाल का प्यार – भाग 2

जब किसी लड़की या लड़के को प्यार होता है तो उसे अपने साथी के अलावा सब कुछ बेकार लगता है. हर समय वह उसी के बारे में सोचता रहता है. रूबी और सुजाय का भी यही हाल था. वे जब तक एकदूसरे से बात नहीं कर लेते, उन्हें चैन नहीं पड़ता था.

वह नेट पर चैटिंग भी करने लगे थे. फेसबुक पर उन्होंने अपने फोटो अपलोड कर दिए थे. रूबी का फोटो देख कर सुजाय फूला नहीं समा रहा था. उस ने बातचीत के बाद उस की जैसी तसवीर अपने दिल में बसा ली थी, वास्तव में वह उस से भी ज्यादा सुंदर निकली.

सुजाय भी हैंडसम था. रूबी को उस की छवि भी अपने सपनों के राजकुमार की तरह ही लगी. यानी दोनों अपनी पसंद पर इतरा रहे थे. सुजाय और रूबी बालिग थे. भले ही वे एकदूसरे से सैकड़ों मील दूर रह रहे थे, लेकिन फोन की बातचीत और चैटिंग के जरिए वे एकदूसरे के दिल में थे.

मोहब्बत ने उन की सैकड़ों किलोमीटर दूरी को समेट कर रख दिया था. उन्होंने एकदूसरे को जता दिया था कि भले ही उन के बीच में जातिधर्म की या अन्य कोई दीवार आए, वह उस दीवार को चकनाचूर कर के शादी करेंगे. दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें जुदा नहीं कर सकेगी. फोन और सोशल मीडिया के जरिए उन का प्यार और मजबूत होता गया.

रूबी 22 साल की हो चुकी थी. बीए सेकेंड ईयर की पढ़ाई के साथ वह टेलरिंग का काम भी सीख रही थी. उस के घर वालों को इस बात की भनक तक नहीं लग पाई थी कि उस का पश्चिम बंगाल के रहने वाले किसी अन्य मजहब के लड़के साथ चक्कर चल रहा है.

हर मांबाप की यही ख्वाहिश होती है कि इज्जत के साथ वह बेटी को विदा करे. इसलिए रूबी के पिता भी उस के लिए लड़का देखने लगे. उन की मंशा थी कि जब तक कोई लड़का मिलेगा, तब तक वह बीए की पढ़ाई पूरी कर लेगी. उन्होंने अपने नातेरिश्तेदारों से भी रूबी के लिए सही लड़का तलाशने को कह दिया था.

इधरउधर भागदौड़ करने के बाद जनवरी, 2014 में रूबी का रिश्ता एक लड़के से तय हो गया और इसी साल अप्रैल महीने में निकाह की तारीख रखी गई. रूबी को जब अपने रिश्ते के बारे में जानकारी मिली तो उसे बहुत दुख हुआ. उस ने सैकड़ों किलोमीटर दूर रहने वाले प्रेमी सुजाय से जीवन भर साथ रहने का वादा किया था. इसलिए रिश्ते की बात पता लगते ही उस ने सुजाय से फोन पर बात की.

प्रेमिका की बातें सुन कर सुजाय भी हैरत में पड़ गया कि अचानक यह कैसे हो गया. रूबी ने कहा कि वह उस के अलावा किसी और से शादी के बारे में सोच भी नहीं सकती. कुछ भी हो जाए वह घर वालों द्वारा तय की गई शादी का विरोध करेगी. इस के लिए यदि उसे अपना घर भी छोड़ना पड़ जाए तो वह उसे भी छोड़ देगी.

‘‘नहीं रूबी, तुम जल्दबाजी में अभी ऐसा कदम मत उठाना. तुम्हारे घर वालों ने अप्रैल में शादी की तारीख रखी है. तुम चिंता मत करो, मैं जल्द ही कोई ऐसा उपाय निकालता हूं कि हमें कोई जुदा न कर पाए.’’ सुजाय ने उसे भरोसा दिलाया.

‘‘सुजाय, जो भी करना है जल्दी करो. कहीं ऐसा न हो कि हम लोग सोचते ही रह जाएं और…’’

‘‘नहीं रूबी, ऐसा हरगिज नहीं होगा. मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं और वादा करता हूं कि मैं तुम्हीं से शादी करूंगा.’’

‘‘ठीक है सुजाय, तुम जैसा कहोगे मैं करने को तैयार हूं. तुम बस मुझे एक दिन पहले फोन कर देना. तुम जहां कहोगे, मैं आ जाऊंगी.’’ रूबी खुश होते हुए बोली.

उधर शादी तय करने के बाद रूबी के घर वाले शादी का सामान जुटाने लगे. लेकिन उन्हें बेटी के मन की बात पता नहीं थी. उन्हें पता नहीं था कि जिस की शादी की तैयारी करने में वे फूले नहीं समा रहे हैं, वही बेटी परिवार की इज्जत उछालने के तानेबाने बुनने में लगी है.

इसी बीच 11 फरवरी, 2014 को सुजाय ने रूबी को फोन किया और बताया कि उस के घर वालों ने भी उस की शादी कहीं और तय कर दी है… सुजाय की बात पूरी होने के पहले ही रूबी गुस्से में बोली, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’

‘‘रूबी, तुम ने मेरी पूरी बात तो सुनी नहीं.’’

‘‘बताओ.’’

‘‘देखो रूबी, घर वालों ने मेरी शादी तय जरूर कर दी है, लेकिन मैं उस लड़की से नहीं, बल्कि तुम से शादी करूंगा. मैं जब प्यार तुम से करता हूं तो भला शादी किसी और से कैसे करूंगा?’’

प्रेमी की बात सुन कर रूबी की जान में जान आई. इस के बाद दोनों काफी देर तक सामान्य रूप से बातें करते रहे. उन्होंने तय कर लिया था कि अब जल्द ही कोई ठोस कदम उठाएंगे.

इस के बाद एक दिन सुजाय ने रूबी को फोन किया, ‘‘रूबी, मैं ने पूरा प्लान तैयार कर लिया है कि हमें क्या करना है. ऐसा करना, तुम 21 फरवरी को अपने घर से बंगलुरु एयरपोर्ट पहुंच जाना. इधर से मैं भी वहां पहुंच जाऊंगा. तुम्हारी और अपनी एयर टिकट मैं पहले ही खरीद लूंगा. बंगलुरु से हम लोग दिल्ली आ जाएंगे. यहां शादी करने के बाद मैं तुम्हें अपने घर ले चलूंगा.’’

‘‘घर जाने के बाद अगर तुम्हारे घर वालों ने मुझे नहीं स्वीकारा तो..?’’

‘‘तो क्या हुआ? वे हमारे रिश्ते को स्वीकारें या न स्वीकारें, मुझे चिंता नहीं है. मैं घर छोड़ दूंगा और कहीं दूसरी जगह जा कर रह लेंगे. रूबी, मुझे केवल तुम्हारा साथ चाहिए, जमाना चाहे कुछ भी कहे, मुझे फिक्र नहीं है.’’

‘‘सुजाय, मैं तो मन से तुम्हारी कब की हो चुकी हूं और शादी के बाद हमारी बेताबी भी दूर हो जाएगी. मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ सकती.’’

‘‘बस, मुझे तुम्हारी इसी हिम्मत की जरूरत है. अच्छा, तुम एक काम करना, घर से निकलते समय ज्वैलरी और कुछ पैसे लेती आना, जो हम लोगों की जरूरत पर काम आ सकेंगे.’’

‘‘तुम फिक्र न करो. अगर तुम न भी कहते तो मैं ये सब साथ लाती. बस तुम मुझे बंगलुरु हवाईअड्डे पर मिलना.’’

‘‘हां, मैं तुम्हें वहीं मिलूंगा. गांव से बंगलुरु आते समय तुम अपना ध्यान रखना.’’

‘‘ओके, तुम भी अपना खयाल रखना.’’ कहने के बाद उन्होंने अपनी बात खत्म कर दी.

रूबी एक ठोस निर्णय ले चुकी थी. वह घर से फरार होने की तैयार करने लगी. 20 फरवरी की शाम तक उस ने घर में रखी 10 तोला सोने की ज्वैलरी और साढ़े 3 लाख रुपए अपने कालेज ले जाने वाले बैग में रख लिए. अगले दिन उसे बंगलुरु एयरपोर्ट पहुंचना था, इसलिए रात भर वह सो नहीं पाई.

पति ने किया अर्चना की जिंदगी का सूर्यास्त – भाग 3

उसी दौरान उन्होंने सरिता को देर रात प्रमोद से मोबाइल फोन पर बातें करते पकड़ लिया तो उसे लगा कि अब वह बेटी को प्रमोद से अलग नहीं कर पाएगा, क्योंकि वह सरिता के साथ मारपीट, डांटफटकार कर के हार चुका था. सरिता प्रमोद को छोड़ने को तैयार नहीं थी. हद तो तब हो गई, जब सरिता ने मां से साफ कह दिया, ‘‘मां, आखिर प्रमोद में बुराई ही क्या है, हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं. आप लोगों को मेरी शादी कहीं न कहीं तो करनी ही है, उसी से कर दीजिए.’’

बेटी की बात सुन कर मां हैरान रह गई थी. बेटी के इसी इरादे से जीवनराम चिंतित था. उस ने देखा कि अब वह खुद कुछ नहीं कर सकता तो उस ने पंचायत बुलाई. पंचायत ने सलाह दी कि इस झंझट से बचने का एक ही तरीका है कि दोनों ही अपनेअपने बच्चों की शादी जल्द से जल्द कर दें. पंचायत ने प्रमोद से साफसाफ कह दिया था कि अगर उस ने कोई उल्टीसीधी हरकत की तो उसे गांव से निकाल दिया जाएगए.

प्रमोद की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. सरिता का स्कूल जाना बंद करा दिया गया था. उसे घर से बिलकुल नहीं निकलने दिया जा रहा था. उन्हीं दिनों डालचंद अपनी बेटी अर्चना की शादी के लिए प्रमोद के घर पहुंचे तो प्रमोद के बाप छदामीलाल ने तुरंत यह रिश्ता स्वीकार कर लिया. इस के बाद 14 जून, 2013 को अर्चना और प्रमोद की शादी हो गई.

अर्चना ससुराल आई तो सभी ने उसे हाथोंहाथ लिया. इस से अर्चना बहुत खुश हुई. लेकिन पहली रात को प्रमोद ने उस के साथ जो व्यवहार किया, वह उसे कुछ अजीब सा लगा था. एक पति पहली रात जिस तरह पत्नी से प्यार करता है, वैसा प्रमोद के प्यार में नजर नहीं आया था.

अर्चना सप्ताह भर ससुराल में रही. इस बीच प्रमोद के बातव्यवहार से अर्चना ने अंदाजा लगा लिया कि पति उसे पसंद नहीं करता. लेकिन मायके आने पर यह बात उस ने किसी से नहीं कही क्योंकि अगर वह यह बात मायके में किसी से बताती तो वे काफी परेशान होते.

कुछ दिनों बाद अर्चना फिर ससुराल आ गई. पति का व्यवहार संतोषजनक नहीं था, इसलिए अर्चना परेशान रहने लगी थी. उस ने यह भी देखा कि प्रमोद दिनभर मटरगश्ती करता रहता है. घर का एक काम नहीं करता. पति की बेजा हरकतों से उस से रहा नहीं गया तो एक दिन उस ने कहा, ‘‘तुम दिनभर इधरउधर घूमा करते हो, पापा के साथ खेतों पर काम क्यों नहीं करते?’’

‘‘मुझ से खेती के काम नहीं होते.’’ प्रमोद ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर कोई दूसरा काम करो. इस तरह आवारा की तरह घूमना ठीक नहीं है.’’ अर्चना ने कहा.

पत्नी की इस सलाह पर प्रमोद को गुस्सा आ गया. उस ने उसे डांट कर कहा, ‘‘तू अपने काम से काम रख. मैं क्या करूं, यह मुझे तू बताएगी?’’

‘‘तुम्हारी स्थिति से तो यही लगता है कि तुम कोई कामधंधा करने वाले नहीं. पापा से तो तुम्हारे घर वालों ने बताया था कि तुम दिल्ली में नौकरी करते हो. शादी के बाद तुम मुझे दिल्ली ले जाओगे. लेकिन मैं देख रही हूं कि आवारागर्दी करने के अलावा तुम्हारे पास कोई काम नहीं है.’’ अर्चना ने गुस्से में बोली.

प्रमोद ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम ने अपनी शक्ल देखी है. तुम जैसी गंवार लड़की दिल्ली में रहेगी तो यहां गांव में चूल्हाचौका कौन करेगा?’’

‘‘अगर मैं गंवार थी तो मुझ से शादी ही क्यों की.’’ अर्चना ने कहा.

‘‘बहुत हो गया, अब चुप रह. मैं फालतू की बकवास सुनना नहीं चाहता.’’

अर्चना को लगा कि कुछ ऐसा है जिस की जानकारी उसे नहीं है. लेकिन जल्दी ही उसे उस की भी जानकारी हो गई. उस ने प्रमोद के पर्स में सरिता के साथ उस की फोटो देख ली. उस ने तुरंत वह फोटो प्रमोद के सामने रख कर पूछा, ‘‘तुम्हारे साथ यह किस की फोटो है?’’

जवाब देने के बजाय प्रमोद उस के गाल पर जोरदार तमाचा मार कर बोला, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा पर्स छूने की?’’

अर्चना तड़प कर बोली, ‘‘आज तो मार दिया, लेकिन फिर कभी ऐसी गलती मत करना, वरना जिंदगीभर पछताओगे. सब के सामने मैं विवाह कर के आई हूं. इसलिए तुम पर मेरा पूरा हक है. मेरे रहते यह सब नहीं चलेगा.’’

प्रमोद चुपचाप घर से निकल गया. अर्चना जान गई कि उस के पति के जीवन में उस के अलावा भी कोई है. यह उस के लिए चिंता की बात थी. अभी उस के हाथ की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि उसे पता चल गया कि उसे बचाखुचा प्यार मिल रहा है.

अगर यह संबंध इसी तरह चलते रहे तो अर्चना का जीवन नरक हो जाता, इसलिए रात में प्रमोद आया तो उस ने साफसाफ कह दिया, ‘‘शादी से पहले तुम्हारी जिंदगी में जो भी रही हो, मुझ से कोई मतलब नहीं है. लेकिन शादी के बाद यह सब नहीं चलेगा. मैं तुम्हारे प्रति समर्पित हूं तो तुम्हें भी मेरे प्रति समर्पित होना पड़ेगा.’’

‘‘अगर मैं समर्पित न हो सका तो…?’’

…तो इस का भी इलाज है, मुझे कानून का सहारा लेना होगा.’’ अर्चना ने कहा.

प्रमोद सन्न रह गया. जिसे वह सीधीसादी गंवार समझता था, वह तो उस से भी तेज निकली. अर्चना ने उसी समय अपने बाप को फोन कर के कह दिया कि वह मायके आना चाहती है.

प्रमोद को लगा कि अर्चना से उस की शादी गले की हड्डी बन रही है. उस ने घर वालों के दबाव में यह शादी की थी. उस ने सोचा था कि पत्नी को जैसे चाहेगा, रखेगा, लेकिन यह तो उस के लिए मुसीबत बन रही है. अब वह इस मुसीबत से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो वह अपने दोस्त मुकेश से मिला और उस से पूरी बात बता कर कहा, ‘‘यार! मैं किसी भी तरह इस अर्चना नाम की मुसीबत से छुटकारा चाहता हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मुकेश ने पूछा.

‘‘मतलब यह कि जीतेजी तो उस से छुटकारा मिल नहीं सकता. ठिकाने लगाने के बाद ही शुकून मिल सकता है. और इस काम में तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’ प्रमोद ने कहा.

इस के बाद दोनों कई दिनों तक योजनाएं बनाते रहे. आखिर में जब योजना फाइनल हो गई तो दोनों मौके की तलाश करने लगे.

अर्चना को घर में तो मारा नहीं जा सकता था, क्योंकि घर में प्रमोद उसे मारता तो सीधे आरोप उसी पर लगता. यानी उस का फंसना तय था. इसलिए वह उसे घर के बाहर ही मारना चहाता था. उस ने ससुर को फोन किया कि पत्नी को विदा कराने आ रहा है.

अर्चना इस बार पिता के साथ मायके पहुंची थी तो उस ने मां से प्रमोद के गांव की किसी लड़की से संबंध होने की बात बता दी थी. बेटी की बात सुन कर शारदा स्तब्ध रह गई थी. कुछ महीने पहले ही तो उस ने बेटी की शादी की थी. अभी तो बेटी की पूरी जिंदगी पड़ी थी. उस ने बेटी को समझाया कि वह पति को संभाले. अब वह इस बात का जिक्र किसी और से न करे, क्योंकि अगर उस के पिता को इस बारे में पता चल गया तो मामला काफी संगीन हो जाएगा.

प्रमोद ससुराल पहुंचा तो अर्चना को उस के साथ जाना ही था. उसी दिन प्रमोद ने दोपहर के बाद विदाई के लिए कहा तो डालचंद ने कहा, ‘‘यह समय विदाई करने का नहीं है. लालपुर पहुंचतेपहुंचते रात हो जाएगी. इसलिए तुम कल चले जाना.’’

‘‘नहीं पापा, जाना बहुत जरूरी है. साधन से ही तो जाना है. आराम से पहुंच जाएंगे.’’

डालचंद को क्या पता था कि उस के मन में क्या है. उन्होंने अर्चना को विदा कर दिया. प्रमोद खुश था कि सब कुछ उस के मन मुताबिक हो रहा है. अर्चना भी पति के मन की बात से बेखबर थी. वह प्रमोद के साथ गजरौला कलां पहुंची तो वहां मुकेश मिल गया. दोनों अर्चना को ले कर लालपुर की ओर चल पड़े.

अंधेरा हो जाने की वजह से लालपुर जाने वाली सड़क सुनसान हो गई थी. रास्ते में खेतों के बीच प्रमोद ने अर्चना को दबोच लिया तो वह चीखी, ‘‘यह क्या कर रहे हो? छोड़ो मुझे.’’

लेकिन प्रमोद ने उसे छोड़ने के लिए थोड़े ही पकड़ा था. उस ने उसे जमीन पर गिरा दिया तो मुकेश ने फुरती से उस के दोनों हाथ पकड़ लिए. इस के बाद प्रमोद ने उस का गला दबा कर उसे मार डाला. इस तरह अर्चना का खेल खत्म कर के प्रमोद ने रास्ते का कांटा निकाल दिया था. इस के बाद प्रमोद ने जल्दीजल्दी अर्चना के गहने उतारे और फिर लाश को उठा कर गन्ने के खेत में फेंक दिया.

फिर योजना के मुताबिक प्रमोद थाना गजरौला कलां पहुंचा, जहां उस ने अपनी पत्नी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. लेकिन उस के हावभाव से ही थानाप्रभारी भुवनेश गौतम ने ताड़ लिया कि यह झूठ बोल रहा है. इस के बाद तो उन्होंने उसे थाने ला कर सच्चाई उगलवा ही ली.

पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ने प्रमोद और मुकेश को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. बाद में डालचंद ने कहा कि उन की बेटी की हत्या की साजिश में प्रमोद का बाप छदामीलाल भी शामिल था तो पुलिस ने उसे भी इस मामले में अभियुक्त बना कर जेल भेज दिया.

जांच अधिकारी ने सीओ दिनेश शर्मा की देखभाल में इस मामले की चार्जशीट तैयार कर के अदालत में पेश कर दी गई है. अब देखना यह है कि इस मामले में दोषियों को सजा क्या होती है.  द्य

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पिंड दान : प्रेमी के प्यार में पति का कत्ल

अपहरण का कारण बना लिव इन रिलेशन – भाग 3

एक दिन बबीता की मुलाकात रविंद्र से हुई तो रविंद्र ने उसे अपने दिल में बसा लिया. इस के बाद वह उस दुकान के आसपास मंडराने लगा, जहां बबीता काम करती थी. धीरेधीरे बबीता का झुकाव भी रविंद्र की ओर हो गया. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर भी दे दिए. जल्दी ही दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए. यहां तक कि उन के बीच जिस्मानी संबंध भी कायम हो गए. उन के दिलों में पनपी मोहब्बत पूरे शबाब पर थी.

रविंद्र ने अपने दोस्त अनिल की मदद से अंजलि और बबीता को बदरपुर में ही दूसरी जगह किराए पर मकान दिलवा दिया और वह खुद भी उन दोनों के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा.

चंद्रा दिल्ली के सराय कालेखां इलाके में रहने वाले रामपथ चौधरी की बेटी थी. रामपथ चौधरी की चंद्रा के अलावा एक बेटा नरेंद्र चौधरी और 2 बेटियां थीं. वह सभी बच्चों की शादी कर चुके थे. नरेंद्र चौधरी का दूध बेचने का धंधा था. करीब 15 साल पहले उन्होंने चंद्रा का ब्याह नोएडा सेक्टर-5 स्थित हरौला गांव में रहने वाले महावीर अवाना के साथ किया था. महावीर अवाना प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था.

शादी के कुछ सालों तक महावीर और चंद्रा के बीच सब कुछ ठीक रहा, लेकिन बाद में उन के बीच मनमुटाव रहने लगा. इस की वजह यह थी कि वह शराब पीने का आदी था. चंद्रा शराब पीने को मना करती तो वह उस के साथ गालीगलौज करता और उस की पिटाई कर देता था. रोजरोज पति की पिटाई से परेशान हो कर चंद्रा अपनी मां के पास आ जाती थी.

इस दरम्यान वह 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. उस की बेटी सोनिया 11 साल की और बेटा प्रिंस 7 साल का था. सोनिया 5वीं में पढ़ रही थी और प्रिंस यूकेजी में. कुछ दिन मां के यहां रहने के बाद चंद्रा ससुराल लौट जाती थी.

20 नवंबर, 2013 को भी चंद्रा बच्चों के साथ मायके आई थी. नानी के यहां आ कर बच्चे बहुत खुश थे, क्योंकि यहां वे एमसीडी के पार्क में मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ जी भर कर खेलते थे. दूसरी ओर नरेंद्र के रिश्ते का भाई रविंद्र कोई कामधंधा नहीं करता था. उस का खर्चा बबीता ही उठाती थी.

एक दिन अंजलि ने रविंद्र से कहा, ‘‘तुम बबीता के साथ बिना शादी किए पतिपत्नी की तरह रह रहे हो. वह कमाती है और तुम खाली रहते हो. आखिर ऐसा कब तक चलेगा. तुम कोई काम क्यों नहीं करते?’’

रविंद्र भी कोई काम करना चाहता था, लेकिन काम शुरू करने के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. वह सोचता था कि कहीं से मोटी रकम हाथ लग जाए तो वह कोई कामधंधा शुरू करे. यह बात उस ने अंजलि और बबीता को बताई. काम शुरू करने के लिए रविंद्र 1-2 लाख रुपए की बात कर रहा था. इतने पैसे दोनों बहनों के पास नहीं थे. रविंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह ऐसा क्या करे, जिस से उस के हाथ मोटी रकम लग जाए. काफी सोचने के बाद उस के दिमाग में एक योजना आई तो वह उछल पड़ा.

उस ने उन दोनों से कहा, ‘‘मैं ने एक योजना सोची है, अगर तुम मेरा साथ दो तो वह पूरी हो सकती है.’’

‘‘क्या योजना है?’’ अंजलि ने पूछा.

‘‘हम किसी बच्चे का अपहरण कर लेंगे. फिरौती में जो रकम मिलेगी, उस से हम कोई अच्छा काम शुरू कर सकते हैं. काम जोखिम भरा है, लेकिन अगर सावधानी से किया जाएगा तो जरूर सफल होगा. काम हो जाने पर हम दिल्ली से कहीं दूर जा कर अपनी दुनिया बसा लेंगे.’’

‘‘अगर कहीं पुलिस के हत्थे चढ़ गए तो सारी उम्र जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी.’’ अंजलि और बबीता ने कहा.

‘‘पुलिस को पता तो तब चलेगा, जब हम उस बच्चे को जिंदा छोड़ेंगे. मैं ने पूरी योजना तैयार कर ली है.’’ रविंद्र ने अपने मन की बात बता दी.

‘‘मगर अपहरण करोगे किस का?’’

‘‘सराय कालेखां में नरेंद्र की बहन चंद्रा अपने बच्चों के साथ आई हुई है. मैं चाहता हूं कि नरेंद्र के भांजे प्रिंस को किसी तरह उठा लें. उस से हमें मोटी रकम मिल सकती है.’’

बबीता और अंजलि भी उस की बात से सहमत हो गईं. रविंद्र प्रिंस की लाश को ठिकाने लगाने के लिए बड़ा सा एक ट्रैवलिंग बैग भी ले आया.

इस के बाद रविंद्र ने अपने दोस्तों अनिल और संदीप को भी पैसों का लालच दे कर अपहरण की योजना में शामिल कर लिया. संदीप के पास पल्सर मोटरसाइकिल थी, उसी से तीनों ने अपहरण की वारदात को अंजाम देने का फैसला किया. इन लोगों ने तय किया कि फिरौती मिलने के बाद वे बच्चे को मौत के घाट उतार देंगे और उस की लाश के टुकड़ेटुकड़े कर के बैग में भर कर बदरपुर के पास वाले बूचड़खाने में डाल देंगे.

पूरी योजना बन जाने के बाद तीनों प्रिंस को अगवा करने का मौका देखने लगे. 24 नवंबर, 2013 को कुछ बच्चे इलाके में बने एमसीडी पार्क में खेल रहे थे. उस वक्त प्रिंस बच्चों से अलग पार्क के किनारे चुपचाप बैठा था. रविंद्र अनिल के साथ आहिस्ता से वहां गया और उस ने प्रिंस को गोद में उठा लिया. इस से पहले कि प्रिंस शोर मचाता, उस ने उस का मुंह दबा कर उसे शौल से ढक लिया. फिर तीनों मोटरसाइकिल से फरार हो गए. उन्होंने अपने चेहरे रूमाल से ढक रखे थे.

सोनिया ने यह सब देख लिया था, वह भागती हुई घर गई और अपनी मां से सारी बात बता दी.

सभी आरोपियों ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस ने अनिल के पास से 6 फोन भी बरामद किए, जिन से उस ने फिरौती की काल्स की थीं. पता चला कि वे फोन भी चोरी के थे. पुलिस ने पल्सर मोटरसाइकिल के अलावा वह बैग भी बरामद कर लिया, जिस में ये लोग प्रिंस को मारने के बाद लाश के टुकड़े भर कर फेंकते.

पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि फिरौती की रकम मिलती या न मिलती, वे लोग प्रिंस को मौत के घाट उतारने वाले थे, क्योंकि प्रिंस ने रविंद्र उर्फ रवि गुर्जर को पहचान लिया था. क्राइम ब्रांच ने सभी आरोपियों को 29 नवंबर, 2013 को साकेत कोर्ट में पेश कर के थाना सनलाइट कालोनी पुलिस के हवाले कर दिया.

बाद में सनलाइट कालोनी थाना पुलिस ने रविंद्र उर्फ रवि, अनिल, संदीप, अंजलि और बबीता को अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में भेज दिया. कथा लिखे जाने तक सभी आरोपी जेल में बंद थे.

—कथा पुलिस सूत्रों तथा चंद्रा और नरेंद्र चौधरी के बयानों पर आधारित है.