अंकिता भंडारी मर्डर : बाप की सियासत के बूते बेटे का अपराध – भाग 2

पुष्पदीप की चिंता और बढ़ गई. अंकिता का भी कोई फोन नहीं आया था और न ही उस ने कोई मैसेज ही किया था. इस का क्या कारण हो सकता था, पुष्पदीप समझ नहीं पा रहा था. वह पूरी रात सो नहीं पाया और अंकिता के बारे में तरहतरह की बातें उस के दिमाग में आतीजाती रहीं.

अगले रोज उसे सोशल मीडिया के माध्यम से अंकिता भंडारी के रिजौर्ट से लापता होने की जानकारी मिली. ये सारी बातें अंकिता के फेसबुक फ्रैंड पुष्पदीप ने पुलिस को बताईं.

दरअसल, इस बारे में 19 सितंबर को उस के पिता वीरेंद्र भंडारी ने पौड़ी जिले के एसपी यशवंत सिंह को जा कर बताया था कि उस की बेटी अंकिता पिछले 2 दिनों से लापता हो गई है. इस की सूचना उन्होंने रिजौर्ट के मालिक पुलकित आर्य ने फोन पर दी थी.

उस ने यह भी बताया था कि अंकिता की गुमशुदगी की तहरीर राजस्व चौकी को भी दे दी गई है. इस पर जब वीरेंद्र भंडारी पुलकित से मिले, तब उस ने अंकिता के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं दिया था.

वीरेंद्र भंडारी की बात सुन कर सिंह ने पहले डीएम (पौड़ी) डा. विजय कुमार जोगदंडे से बात की. पर्वतीय क्षेत्र में राजस्व चौकी उन्हीं के क्षेत्र में आती है. इस पर सिंह को यह जानकारी मिली कि अंकिता की गुमशुदगी के बारे में राजस्व चौकी ने कोई भी काररवाई नहीं की थी.

यह सुन कर सिंह का माथा ठनका और उन्होंने वीरेंद्र भंडारी को थाना लक्ष्मण झूला भेज कर वहां के एसएचओ संतोष कुंवर को अंकिता की तलाश करने और उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकालने के आदेश दिए.

एसएचओ संतोष कुंवर ने 21 सितंबर, 2022 को अपनी टीम के साथ वंतरा रिजौर्ट पहुंच कर अंकिता के लापता होने के बारे में रिजौर्ट के मालिक पुलकित आर्य, मैनेजर सौरभ भास्कर तथा सहायक मैनेजर अंकित गुप्ता से पूछताछ शुरू की. वहां पूछताछ के दौरान तीनों ने अंकिता के लापता होने के बारे में किसी भी तरह की कोई ठोस जानकारी नहीं दी.

यहां तक कि उस के अचानक गायब हो जाने के बारे में कुछ नहीं बता सके. जब उन्होंने पुलिस के सवालों का सही तरह से जवाब नहीं दिया, तब पुलिस उन्हें लक्ष्मण झूला थाने ले आई. वहां भी उन से अंकिता के बारे में पूछताछ हुई.

पुलिस के सामने आ गईं सारी बातें

उन्होंने पुलिस के काफी दबाव के बावजूद वैसी कोई बात नहीं बताई, जिस से अंकिता के बारे में जानकारी मिल सके. अगले दिन लक्ष्मण झूला पुलिस को अंकिता के मोबाइल की काल डिटेल्स मिल गई. जिस से अंकिता के लापता होने के मामले में परदा उठने की उम्मीद दिख गई.

उस के मोबाइल का वह मैसेज मिल गया, जिस में 17 सितंबर को अपने फेसबुक फ्रैंड पुष्पदीप को कहा था कि यह बहुत गंदा रिजौर्ट है, यहां पर गलत काम होते हैं. जल्दी ही मैं ये नौकरी छोड़ दूंगी. मैं यहां आगे काम नहीं करूंगी.

इस के आलावा पुष्पदीप को किए गए एक वाट्सऐप चैट में अंकिता की वह बातें भी सामने आ गईं, जिस में उस ने बताया था कि उसे रिजौर्ट में वीआईपी गेस्ट को स्पैशल सर्विस देने के लिए कहा गया था.

कैसे उसे इस अतिरिक्त सेवा के लिए होटल मैनेजर ने वेतन के अलावा 10 हजार रुपए महीना देने की भी पेशकश की थी… किस तरह रिजौर्ट में ठहरे एक आदमी ने नशे की हालत में उसे गले लगा लिया था. इस का विरोध करने पर अंकित गुप्ता ने उसे कैसे शांत रहने का इशारा किया था.

अंकिता के मोबाइल की इस डिटेल से पुलिस के सामने रिजौर्ट की अंदरूनी सच्चाई का आभास हो गया. उस के बाद उस संबंध में काल डिटेल्स का हवाला देते हुए तीनों से दोबारा सख्ती से पूछताछ की गई. आखिरकार जब उन्होंने अंकिता के बारे में जो सच बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था.

उस के अनुसार उन्होंने अंकिता भंडारी को चीला पावर हाउस की शक्ति नहर में धक्का दे दिया था. ऐसा उन्होंने इसलिए किया था, क्योंकि अंकिता ने रिजौर्ट में होने वाले कुकर्मों और अय्याशी की पोल खोलने की धमकी दी थी. उस के बाद ही उन्होंने अंकिता को रास्ते से हटाने की योजना बनाई थी.

आक्रोशित भीड़ ने किया थाने का घेराव

योजनाबद्ध तरीके से 18 सितंबर को अंकिता को घुमाने के बहाने बाइक से चीला की शक्ति नहर पर ले गए थे. वहां पहले तीनों ने शराब पी थी. फिर अंकिता को शक्ति नहर के तेज बहाव में धक्का दे दिया था. देखते ही देखते वह अथाह पानी में बह गई थी.

इस के बाद तीनों वापस रिजौर्ट लौट आए थे. उन्हें तब तक इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि रिजौर्ट की गतिविधियों और अपनी मजबूरी के बारे में अंकिता अपने दोस्त को बता चुकी थी. उन्होंने पुलिस से बचने के लिए योजना बनाई थी.

पुलकित ने कुक से 4 लोगों का खाना बनाने को कहा था. पुलकित खुद ही अंकिता का खाना ले कर उस के कमरे में गया था, ताकि किसी को उस के लापता होने की जानकारी नहीं होने पाए. 19 सितंबर की सुबह तीनों ने अंकिता भंडारी के लापता होने की जानकारी सार्वजनिक कर दी थी. साथ ही इस बारे में क्षेत्र की राजस्व पुलिस को भी सूचित कर दिया था.

तीनों के द्वारा अंकिता को मौत के घाट उतारने के कबूलनामे के बयान सुन कर एसएचओ संतोष कुंवर हैरान रह गए. उन्होंने इस वारदात की सूचना एएसपी (पौड़ी) शेखर चंद सुयाल और एसपी (पौड़ी) यशवंत सिंह को दे दी. यह जानकारी पा कर अंकिता के पिता वीरेंद्र की हालत पागलों जैसी हो गई. वह दहाड़ मार कर थाने में ही रोने लगे.

पुलिसकर्मियों ने उन्हें ढांढस बंधाया और अपने साथ घटनास्थल पर ले जाने के लिए तैयार किया. थोड़ा सहज होने पर वीरेंद्र भंडारी ने इस की सूचना पौड़ी और देहरादून में रह रहे अपने कुछ रिश्तेदारों को भी दी.

देखते ही देखते 22 सितंबर, 2022 को 2 घंटे के भीतर वीरेंद्र के दरजनों रिश्तेदार थाना लक्ष्मण झूला पहुंच गए. उन्होंने अंकिता के साथ रिजौर्ट के संचालकों द्वारा किए गए उत्पीड़न को ले कर हंगामा खड़ा कर दिया.

एएसपी शेखर चंद सुयाल ने पहले अंकिता के रिश्तेदारों को शांत कराया. फिर अंकिता की तलाशी के लिए एसडीआरएफ की टीम बनाई गई. सभी ने पुलकित, सौरभ और अंकित द्वारा बताए घटनास्थल पर नहर में नाव से अंकिता की तलाश शुरू कर दी गई.

तब तक यह बात जंगल में आग की तरह पूरे शहर में फैल चुकी थी. रिजौर्ट का नाम आते ही खबर सनसनीखेज बन चुकी थी. पूरे शहर और प्रदेश में हंगामा खड़ा हो गया था.

एक तरफ चीला की शक्ति नहर में नावों द्वारा अंकिता की तलाशी के लिए सर्च औपरेशन चलाया जा रहा था और काल डिटेल्स को साक्ष्य मानते हुए तीनों आरोपियों के खिलाफ काररवाई  शुरू कर दी थी, दूसरी तरफ थाने के बाहर अंकिता के परिजन व रिश्तेदार चिल्लाचिल्ला कर आरोपियों को उन के हवाले करने की मांग कर रहे थे.

अंकिता के परिवार और रिश्तेदारों के मुताबिक वह एक मेधावी छात्रा और अनुशासित लड़की थी. वह एक होनहार छात्रा थी. उस ने 12वीं क्लास में 88 फीसदी अंक हासिल किए थे. वह बहुत ही अनुशासित और प्यारी थी.

उस ने स्कूली शिक्षा के बाद होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया था और उसे ऋषिकेश के पास स्थित इस रिजौर्ट में वैकेंसी के बारे में पता चलने पर वहां जौब के लिए आवेदन किया था.

उधार की बीवी बनी चेयरमैन : रहमत ने नसीम को ठगा – भाग 2

13 अगस्त, 2018 को इस मामले में अदालत ने पीडि़त नसीम अंसारी के अधिवक्ता मनुज चौधरी की दलील सुनने के बाद थाना कुंडा की पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए. नसीम अंसारी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि रहमत जहां ने उसे बिना तलाक दिए ही उस के साथ निकाह किया है, जो शरीयत के हिसाब से गलत है.

बदल गई रहमत जहां

दूसरी ओर रहमत जहां का कहना था कि उस ने नसीम की रजामंदी से ही शफी के साथ निकाह किया था. आर्थिक तंगी के चलते नसीम ने शफी अहमद से इस के बदले हर माह घर खर्च के लिए 12 हजार रुपए देने का समझौता किया था, जो शफी अहमद उसे हर माह दे रहे हैं. इस में उस का कोई कसूर नहीं. इस वक्त वह कानूनन शफी की पत्नी है और रहेगी. उस के दोनों बच्चे भी उसी के साथ रह रहे हैं, जिन्हें शफी के साथ रहने में कोई ऐतराज नहीं.

बहरहाल, नसीम अहमद की ओर से यह मामला थाना कुंडा में दर्ज हो गया. कुंडा थाने के थानाप्रभारी सुधीर ने सच्चाई सामने लाने के लिए जांच शुरू कर दी. इस मामले पर शुरू से प्रकाश डालें तो कहानी कुछ और ही कहती है.

उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर का गांव सरबरखेड़ा थाना कुंडा क्षेत्र में आता है. सरबरखेड़ा मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला गांव है. अब से कुछ साल पहले यह गांव बहुत पिछड़ा हुआ था. गांव में गिनेचुने लोगों को छोड़ कर अधिकांश लोग मजदूरी करते थे. लेकिन गांव के पास में नवीन अनाज मंडी बनते ही गांव के लोगों के दिन बहुरने लगे.

अनाज मंडी बनने के बाद मजदूर किस्म के लोगों को घर बैठे ही मजदूरी मिलने लगी तो यहां के लोगों के रहनसहन में काफी बदलाव आ गया. बाद में गांव के पास हाईवे बनते ही जमीनों की कीमतें कई गुना बढ़ गईं. यहां के कम जमीन वाले काश्तकारों ने अपनी जमीन बेच कर अपनेअपने कारोबार बढ़ा लिए.

इसी गांव में दादू का परिवार रहता था. दादू के पास जुतासे की नाममात्र की जमीन थी जबकि परिवार बड़ा था, जिस में 5 लड़के थे और 2 लड़कियां. जमीन से दादू को इतनी आमदनी नहीं होती थी कि अपने परिवार की रोजीरोटी चला सके. इस समस्या से निपटने के लिए दादू ने अनाज मंडी में अनाज खरीदने बेचने का काम शुरू कर दिया.

दादू गांवगांव जा कर धान, गेहूं खरीदता और उसे एकत्र कर के अनाज मंडी में ला कर बेच देता था. इस से उस के परिवार का पालनपोषण ठीक से होने लगा. दादू का काम मेहनत वाला था. इस काम से आमदनी बढ़ी तो उस के खर्च भी बढ़ते गए. पैसा आया तो दादू को शराब पीने की लत गई.

धीरेधीरे वह शराब का आदी हो गया, जिस की वजह से वह फिर आर्थिक तंगी में आ गया. जब घर के खर्च के लिए लाले पड़ने लगे तो वह जुआ खेलने लगा. दरअसल, उस की सोच थी कि वह जुए में इतनी रकम जीत लेगा कि घर के हलात सुधर जाएंगे. लेकिन हुआ उलटा. वह मेहनत से जो कमाता जुए की भेंट चढ़ जाता.

उसी दौरान उस की मुलाकात नसीम से हुई. नसीम में जुआ खेलने की लत तो नहीं थी, लेकिन शराब पीने का वह भी आदी था. नसीम सरबरखेड़ा गांव से करीब 3 किलोमीटर दूर गांव बाबरखेड़ा का रहने वाला था. नसीम अपने 3 भाइयों में दूसरे नंबर का था. तीनों भाइयों पर जुतासे की थोड़ीथोड़ी जमीनें थीं. तीनों ही अलगअलग रहते थे.

कई साल पहले नसीम का निकाह थाना ठाकुरद्वारा, जिला मुरादाबाद में आने वाले गांव राजपुरा नंगला टाह निवासी सुगरा के साथ हुआ था.

समय के साथ सुगरा 6 बच्चों की मां बनी, जिन में 2 लड़के और 4 लड़कियां थीं. थोड़ी सी जुतासे की जमीन से नसीम के बड़े परिवार का खर्च मुश्किल से चलता था. इस के बावजूद नसीम को शराब पीने की गंदी आदत पड़ गई थी. वह शराब पीने के चक्कर में इधरउधर चक्कर लगाता रहता था.

उसी दौरान उस की मुलाकात दादू से हो गई. शराब पीनेपिलाने के चलते दोनों एकदूसरे के संपर्क में आए. जल्दी ही दोनों की दोस्ती हो गई. दोस्ती के चलते दोनों एकदूसरे के घर भी आनेजाने लगे. उस वक्त तकदादू की बेटी रहमत जहां जवानी के दौर से गुजर रही थी. रहमत जहां देखनेभालने में बहुत सुंदर थी.

नसीम ने चलाया चक्कर

हालांकि नसीम का दादू के साथ दोस्ती का रिश्ता था, लेकिन जब नसीम ने रहमत जहां को देखा तो उस की नीयत में खोट आ गया. वह उसे गंदी नजरों से देखने लगा. रहमत जहां भी नसीम की निगाहों को परखने लगी थी. रहमत जहां को यह मालूम नहीं था कि नसीम शादीशुदा है.

लेकिन जब वह उस की नजरों में प्रेमी बन कर उभरा तो उस ने अपने दिल में उस के लिए गहरी जगह बना ली. प्रेम का चक्कर शुरू हुआ तो दोनों घर से बाहर भी मिलने लगे.

दादू की बेटी क्या खिचड़ी पका रही है, उस के घर वालों को इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी. उन्हीं दिनों दादू का बड़ा लड़का बीमार पड़ गया. बीमारी की वजह से उसे कई दिन तक अस्पताल में भरती रहना पड़ा. उस के इलाज के लिए काफी रुपयों की जरूरत थी जबकि उस वक्त दादू आर्थिक तंगी से गुजर रहा था.

कुछ दिन पहले ही नसीम ने अपनी जुतासे की थोड़ी सी जमीन बेची थी. उस के पास जमीन का कुछ पैसा बचा हुआ था. यह बात दादू को भी पता थी. दादू ने अपनी मजबूरी नसीम के सामने रखते हुए मदद करने को कहा तो नसीम ने उस के लड़के के इलाज के लिए कुछ रुपए उधार दे दिए. उन्हीं रुपयों से दादू ने अपने बेटे का इलाज कराया. उस का बेटा ठीक हो गया.

इस के कुछ दिन बाद नसीम ने दादू से अपने पैसे मांगे तो उस ने मजबूरी बताते हुए फिलवक्त पैसे न देने की बात कही. नसीम दादू की मजबूरी सुन कर शांत हो गया. नसीम के सामने दादू से बड़ी मजबूरी आ गई थी. लेकिन दादू की बेटी रहमत जहां को चाहने की वजह से वह दादू से कुछ कह भी नहीं सकता था.

यह बात दादू भी समझता था कि नसीम उस की बेटी के पीछे हाथ धो कर पड़ा है लेकिन वह नसीम के अहसानों तले दबा हुआ था, इसलिए उस के सामने मुंह खोल कर कुछ भी नहीं कह सकता था. अपनी मजबूरी के आगे दादू ने नसीम और अपनी बेटी रहमत जहां को अनदेखा कर दिया.

आखिर क्या था बेलगाम ख्वाहिश का अंजाम – भाग 1

हमसफर मनपसंद हो तो गृहस्थी में खुशियों का दायरा बढ़ जाता है. जमाने की नजरों में दीपिका और राजेश भी खुशमिजाज दंपति थे. करीब 8 साल पहले  कालेज के दिनों में दोनों की मुलाकात हुई थी. पहले उन के बीच दोस्ती हुई फिर कब वे एकदूसरे के करीब आ गए, इस का उन्हें पता ही नहीं चला. वे सचमुच खुशनसीब होते हैं जिन्हें प्यार की मंजिल मिल जाती है. प्यार हुआ तो खूबसूरत दीपिका ने राजेश के साथ उम्र भर साथ निभाने की कसमें खाईं. दोनों के लिए जुदाई बरदाश्त से बाहर हुई तो परिवार की रजामंदी से दोनों वैवाहिक बंधन में बंध गए. एक साल बाद दीपिका एक बेटे की मां भी बन गई.

राजेश का परिवार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रायपुर थानाक्षेत्र स्थित तपोवन एनक्लेव कालोनी में रहता था. दरअसल राजेश के पिता प्रेम सिंह राणा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव सबदलपुर के रहने वाले थे, लेकिन बरसों पहले वह उत्तराखंड आ कर बस गए थे. दरअसल वह देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी और राजेश के अलावा 5 बेटियां थीं, जिन में से 2 का विवाह वह कर चुके थे.

सन 2000 में पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने किसी तरह खुद को संभाला और 3 बेटियों के हाथ पीले किए. राजेश और दीपिका एकदूसरे को चाहते थे इसलिए प्रेम सिंह ने सन 2007 में उन के प्यार को रिश्ते में बदल दिया. आजीविका चलाने के लिए राजेश ने घर के बाहर ही किराने की दुकान कर ली थी. दीपिका का मायका भी देहरादून में ही था. प्रेम सिंह व्यवहारिक व्यक्ति थे. इस तरह बेटाबहू के साथ वह खुश थे.

4 मार्च की दोपहर के समय दीपिका काफी परेशान थी. शाम होतेहोते उस की परेशानी और भी बढ़ गई. जब कोई रास्ता नजर नहीं आया तो वह थाना रायपुर पहुंची. उस ने थानाप्रभारी प्रदीप राणा से मुलाकात कर के बताया कि सुबह से उस के पति और ससुर लापता हैं.’’

थानाप्रभारी के पूछने पर दीपिका ने बताया कि आज सुबह वे दोनों अपनी सैंट्रो कार नंबर यूए07एल 6891 से बुलंदशहर जाने की बात कह कर घर से गए थे, लेकिन न तो अभी तक वापस आए और न ही उन का मोबाइल लग रहा है. दीपिका के अनुसार, 65 वर्षीय प्रेम सिंह शहर में रह जरूर रहे थे लेकिन कभीकभी वह बुलंदशहर स्थित गांव जाते रहते थे.

दीपिका से औपचारिक पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ने उस के पति और ससुर की गुमशुदगी दर्ज कर ली. थानाप्रभारी ने भी राजेश और उस के पिता के फोन नंबरों पर बात करने की कोशिश की पर दोनों के फोन स्विच्ड औफ ही आ रहे थे.

उसी रात करीब 2 बजे जब देहरादून के दूसरे थाने डोईवाला की पुलिस इलाके में गश्त पर थी तभी पुलिस को देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर कुआंवाला के पास सड़क किनारे एक कार खड़ी दिखी. पुलिस वाले कार के नजदीक पहुंचे तो पता चला कि कार के दरवाजे अनलौक्ड थे.

कार की पिछली सीट पर नजर दौड़ाई तो उस में 2 लोगों की लाशें पड़ी थीं जो कंबल और चादर में लिपटी हुई थीं. कंबल और चादर पर खून लगा हुआ था. गश्ती दल ने फोन द्वारा यह सूचना थानाप्रभारी राजेश शाह को दे दी. 2 लाशों के मिलने की खबर सुन कर थानाप्रभारी उसी समय वहां आ गए.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की. दोनों की हत्या बेहद नृशंस तरीके से की गई थी. उन के शवों पर चाकुओं के दरजनों निशान थे. दोनों की गरदन और शरीर के अन्य हिस्सों पर अनेक वार किए गए थे. दोनों के गले में रस्सी कसी हुई थी.

थानाप्रभारी ने दोहरे हत्याकांड की सूचना आला अधिकारियों को दी तो एसएसपी स्वीटी अग्रवाल, एसपी (सिटी) अजय सिंह व एसपी (देहात) श्वेता चौबे मौके पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने जब कार का निरीक्षण किया तो कार पर आग से जले के भी निशान मिले. इस से पता चला कि शवों को कार समेत जलाने की कोशिश की गई थी.

निरीक्षण से यह बात भी साफ हो गई थी कि दोनों की हत्या कार में नहीं की गई थी. हत्या किसी अन्य स्थान पर कर के शव वहां लाए गए थे. सुबह होने पर आसपास के लोगों को कार में लाशें मिलने की जानकारी मिली तो तमाम लोग वहां जमा हो गए. पर कोई भी लाशों की शिनाख्त नहीं कर सका. आखिर पुलिस ने शवों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम हेतु भेज दिया. पुलिस ने कार के बारे में जानकारी की तो वह दीपिका राणा के नाम पर पंजीकृत निकली जो तपोवन कालोनी में रहती थी.

तपोवन कालोनी शहर के ही रायपुर थाने के अंतर्गत आती थी. इसलिए थानाप्रभारी राजेश शाह ने रायपुर थाने से संपर्क किया. वहां से पता चला कि दीपिका ने अपने पति और ससुर के लापता होने की गुमशुदगी दर्ज कराई थी. यह भी बताया था कि वे दोनों कार से ही बुलंदशहर के लिए निकले थे.

कार में 2 लाशें मिलने की सूचना पर थानाप्रभारी प्रदीप राणा को शक हो गया कि कहीं वे लाशें उन्हीं बापबेटों की तो नहीं हैं. उन्होंने खबर भेज कर दीपिका को थाने बुला लिया. थानाप्रभारी प्रदीप राणा दीपिका को पोस्टमार्टम हाउस पर ले गए, जहां लाशें पोस्टमार्टम के लिए भेजी थीं. दीपिका लाशें देखते ही दहाड़ें मार कर रोने लगी. कुछ देर बाद दीपिका के नातेरिश्तेदार भी एकत्र हो गए.

दोनों शवों की शिनाख्त हो गई. दीपिका इस स्थिति में नहीं थी कि उस से उस समय पूछताछ की जाती, लेकिन हलकी पूछताछ में उस ने किसी से भी अपने परिवार की रंजिश होने से इनकार कर दिया. बड़ा सवाल यह था कि जब उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो उन की हत्या क्यों और किस ने कर दी.

एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इस मामले की जांच में एसपी (क्राइम) तृप्ति भट्ट व एसओजी प्रभारी अशोक राठौड़ को भी लगा दिया. पुलिस की संयुक्त टीम हत्याकांड की वजह तलाशने में जुट गई. जहां कार मिली, वहां आसपास के लोगों से पूछताछ करने पर पता चला कि कार वहां पूरे दिन खड़ी रही थी लेकिन किसी ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया था. इस से साफ था कि हत्याएं पहले ही की गई थीं और कार सुबह किसी समय वहां छोड़ दी गई थी.

पत्नी की खूनी साजिश : प्यार में पागल लड़की ने प्रेमी से करवाई पति की हत्या – भाग 1

22 अप्रैल, 2017 की रात करीब 2 बजे की बात है. उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना कैंट के मोहल्ला हादेव झारखंडी टुकड़ा नंबर 1 के रहने वाले देवेंद्र प्रताप सिंह अपने घर में सो रहे थे. अचानक घर की डोलबेल बजी तो वह बड़बड़ाते हुए दरवाजे पर पहुंचे कि इतनी रात को किसे क्या जरूरत पड़ गई? चश्मा ठीक करते हुए उन्होंने दरवाजा खोला तो बाहर पुलिस वालों को देख कर उन्होंने हैरानी से पूछा, ‘‘जी बताइए, क्या बात है?’’

‘‘माफ कीजिए भाईसाहब, बात ही कुछ ऐसी थी कि मुझे आप को तकलीफ देनी पड़ी.’’ सामने खड़े थाना कैंट के इंसपेक्टर ओमहरि वाजपेयी ने कहा.

‘‘जी बताएं, क्या बात है?’’ देवेंद्र प्रताप ने पूछा.

‘‘आप की बहू और बेटा कहां है?’’

‘‘ऊपर अपने कमरे में पोते के साथ सो रहे हैं.’’ देवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा.

अब तक परिवार के बाकी लोग भी नीचे आ गए थे. लेकिन न तो देवेंद्र प्रताप सिंह का बेटा विवेक प्रताप सिंह आया था और न ही बहू सुषमा. इंसपेक्टर ओमहरि वाजपेयी ने थोड़ा तल्खी से कहा, ‘‘आप को पता भी है, आप के बेटे विवेक प्रताप सिंह की हत्या कर दी गई है?’’

‘‘क्याऽऽ, आप यह क्या कह रहे हैं इंसपेक्टर साहब?’’ देवेंद्र प्रताप सिंह ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘वह हम सब के साथ रात का खाना खा कर पत्नी और बेटे के साथ ऊपर वाले कमरे में सोने गया था. अब आप कह रहे हैं कि उस की हत्या हो गई है? ऐसा कैसे हो सकता है, इंसपेक्टर साहब?’’

‘‘आप जो कह रहे हैं, वह भी सही है और मैं जो कह रहा हूं वह भी. आप जरा अपनी बहू को बुलाएंगे?’’ इंसपेक्टर ओमहरि वाजपेयी ने कहा.

इंसपेक्टर ओमहरि वाजपेयी की बातों पर देवेंद्र प्रताप सिंह को बिलकुल यकीन नहीं हुआ था. उन्होंने वहीं से बहू सुषमा को आवाज दी. 3-4 बार बुलाने के बाद ऊपर से सुषमा की आवाज आई. उन्होंने सुषमा को फौरन नीचे आने को कहा. कपड़े संभालती सुषमा नीचे आई तो वहां सब को इस तरह देख कर परेशान हो उठी. उस की यह परेशानी तब और बढ़ गई, जब उस की नजर पुलिस और उन के साथ खड़े एक युवक पर पड़ी. उस युवक को आगे कर के इसंपेक्टर ओमहरि ने कहा, ‘‘सुषमा, तुम इसे पहचानती हो?’’

उस युवक को सुषमा ने ही नहीं, सभी ने पहचान लिया. उस का नाम कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू था. वह सुषमा के मायके का रहने वाला था और अकसर सुषमा से मिलने आता रहता था. सभी उसे हैरानी से देख रहे थे.

सुषमा कुछ नहीं बोली तो इंसपेक्टर ओमहरि वाजपेयी ने कहा, ‘‘तुम नहीं पहचान पा रही हो तो चलो मैं ही इस के बारे में बताए देता हूं. यह तुम्हारा प्रेमी डब्लू है. अभी थोड़ी देर पहले यह तुम्हारे पति की हत्या कर के लाश को मोटरसाइकिल से ठिकाने लगाने के लिए ले जा रहा था, तभी रास्ते में इसे हमारे 2 सिपाही मिल गए. उन्होंने इसे और इस के एक साथी को पकड़ लिया. अब ये कह रहे हैं कि पति को मरवाने में तुम भी शामिल थी?’’crime story

ओमहरि वाजपेयी की बातों पर देवेंद्र प्रताप सिंह को अभी भी विश्वास नहीं हुआ था. वह तेजतेज कदमों से सीढि़यां चढ़ कर बेटे के कमरे में पहुंचे. बैड के एक कोने में 5 साल का आयुष डरासहमा बैठा था. दादा को देख कर वह झट से उठा और उन के सीने से जा चिपका. वह जिस बेटे को खोजने आए थे, वह कमरे में नहीं था. देवेंद्र पोते को ले कर नीचे आ गए. अब साफ हो गया था कि विवेक के साथ अनहोनी घट चुकी थी.

हैरानी की बात यह थी कि विवेक के कमरे के बगल वाले कमरे में उस के चाचा कृष्णप्रताप सिंह और चाची दुर्गा सिंह सोई थीं. हत्या कब और कैसे हुई, उन्हें पता ही नहीं चला था. सभी यह सोच कर हैरान थे कि घर में सब के रहते हुए सुषमा ने इतनी बड़ी घटना को कैसे अंजाम दे दिया? मजे की बात यह थी कि इतना सब होने के बावजूद सुषमा के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी.

सुषमा की खामोशी से साफ हो गया था कि यह सब उस की मरजी से हुआ था. उस के पास अब अपना अपराध स्वीकार कर लेने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. उस ने घर वालों के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सच्चाई जान कर घर में कोहराम मच गया. देवेंद्र प्रताप सिंह के घर से अचानक रोने की आवाजें सुन कर पड़ोसी उन के यहां पहुंचे तो विवेक की हत्या के बारे में सुन कर हैरान रह गए. उन की हैरानी तब और बढ़ गई, जब उन्हें पता चला कि यह काम विवेक की पत्नी सुषमा ने ही कराया था.

पुलिस सुषमा को साथ ले कर थाना कैंट आ गई. कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू और उस के एक साथी राधेश्याम पकड़े जा चुके थे. पता चला कि उस के 2 साथी अनिल मौर्य और सुनील भागने में कामयाब हो गए थे.

ओमहरि वाजपेयी ने रात होने की वजह से सुषमा सिंह को महिला थाने भिजवा दिया. रात में कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू और उस के साथी राधेश्याम मौर्य से पुलिस ने पूछताछ शुरू की. दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

अगले दिन यानी 23 अप्रैल, 2017 की सुबह मृतक विवेक प्रताप सिंह के पिता देवेंद्र प्रताप सिंह ने थाना कैंट में बेटे की हत्या का नामजद मुकदमा 6 लोगों कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू, राधेश्याम मौर्य, अनिल मौर्य, सुनील तेली, सुषमा सिंह और मुकेश गौड़ के खिलाफ दर्ज कराया.

पुलिस ने यह मुकदमा भादंवि की धारा 302, 201, 147, 149 के तहत दर्ज किया था. इस मामले में 3 लोग पकड़े जा चुके थे, बाकी की तलाश में पुलिस निकल पड़ी. पूछताछ में गिरफ्तार किए गए कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू ने विवेक की हत्या की जो कहानी सुनाई थी, वह इस प्रकार थी—

32 साल की सुषमा सिंह मूलरूप से जिला देवरिया के थाना गौरीबाजार के गांव पथरहट के रहने वाले सुरेंद्र बहादुर सिंह की बेटी थी. उन की संतानों में वही सब से बड़ी थी. बात उन दिनों की है, जब सुषमा ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा था. सुषमा काफी खूबसूरत थी, इसलिए उसे जो भी देखता, देखता ही रह जाता. उस के चाहने वालों की संख्या तो बहुत थी, लेकिन वह किसी के दिल की रानी नहीं बन पाई थी. इस मामले में अगर किसी का भाग्य जागा तो वह था कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू.

32 साल का कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू उसी गांव के रहने वाले दीपनारायण सिंह का बेटा था. उन की गांव में तूती बोलती थी. गांव का कोई भी आदमी दीपनारायण से कोई संबंध नहीं रखता था. उस के किसी कामकाज में भी कोई नहीं आताजाता था. डब्लू 18-19 साल का था, तभी वह भी पिता के नक्शेकदम पर चल निकला था. वह भी अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता था.crime story

पुलिस सूत्रों के अनुसार, कामेश्वर सिंह उर्फ डब्लू इंटर तक ही पढ़ पाया था. इस के बाद वह अपराध में डूब गया. जल्दी ही आसपास के ही नहीं, पूरे जिले के लोग उस से खौफ खाने लगे. डब्लू का बड़ा भाई बबलू पुलिस विभाग में सिपाही था. वह शराब पीने का आदी था. उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था.

मोहब्बत रास न आई – भाग 1

पहली सितंबर, 2022 की सुबह जगदीश चंद्र अपने काम पर निकला था. वह ठेकेदार कविता मनराल के ठेके में ‘हर घर नल, हर घर जल’ अभियान के तहत काम करता था. लेकिन देर रात तक वह घर नहीं पहुंचा तो उस की पत्नी गीता परेशान हो उठी. उस के बाद गीता ने किसी के माध्यम से ठेकेदार कविता मनराल से बात की.

ठेकेदार कविता मनराल ने जगदीश चंद्र का पता किया तो जानकारी मिली कि कुछ लोग उसे अपनी गाड़ी में बैठा कर ले गए हैं. जिस के कारण कविता मनराल को उस के अपहरण होने की शंका हुई. उसी शंका के आधार पर कविता मनराल ने तुरंत ही इस की सूचना स्थानीय प्रशासन को दी.

जगदीश चंद्र के अपहरण की सूचना मिलते ही एसडीएम शिप्रा जोशी ने इस की सूचना राजस्व विभाग पुलिस और नियमित पुलिस को दी. उस के बाद संयुक्त टीमों ने जगदीश चंद्र की खोजबीन शुरू की. रात के कोई 10 बजे सिनार मोटर मार्ग पर पुलिस को सामने से एक मारुति वैन आती दिखाई दी.

पुलिस ने उसे रोक कर उस की चैकिंग की तो उस में बेल्टी गांव निवासी जोगा सिंह, उस की पत्नी भावना देवी व बेटा गोविंद सिंह सवार थे. पुलिस ने मारुति कार की तलाशी ली तो उसी गाड़ी में जगदीश चंद्र बेहोशी की हालत पड़ा मिला.

पुलिस को देख कर जोगा सिंह, उस की पत्नी और बेटा घबरा गए. वे जगदीश चंद्र के बेहोश होने के बारे में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. तब पुलिस ने उन तीनों को हिरासत में ले लिया. पुलिस जगदीश चंद्र को तुरंत ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भिकियासैंण ले जाया गया, जहां पर डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया.

जगदीश चंद्र का अपहरण करने के बाद हत्या करने की सूचना से पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई. जगदीश चंद्र क्षेत्र में एक सम्मानित व्यक्ति था. उस ने इसी वर्ष सल्ट सीट से उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था.

जगदीश चंद्र की हत्या की खबर की सूचना मिलते ही उस के गांव पनुवाधोखन में मातम छा गया था. उस की बूढ़ी मां का रोरो कर बुरा हाल था. वहां पर मौजूद सभी लोग उस की हत्या से स्तब्ध थे. जगदीश ने अभी 12 दिन पहले ही गीता के साथ शादी की थी. उस की हत्या की सूचना सुनते ही गीता बेहोश हो गई थी.

उस के बाद पुलिस तीनों आरोपियों को भिकियासैंण पटवारी चौकी ले कर गई. वहां पुलिस ने उन से जगदीश के बारे में पूछताछ की. पूछताछ के दौरान तीनों ने उस का अपहरण कर उसे पीटपीट कर मार डालने की बात स्वीकार की.

इस घटना से संबधित सभी तथ्य जुटाने के बाद पुलिस ने जगदीश के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिकियासैंण के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया था. डा. संदीप कुमार दीक्षित और डा. दीप प्रकाश पार्की के पैनल ने शव का पोस्टमार्टम किया.

पोस्टमार्टम के बाद रिपोर्ट में बताया कि मृतक के सिर व पूरे शरीर पर 27 से अधिक चोटें पाई गईं. उस की बाईं कलाई की दोनों हडिड्यां, पैर की बाईं एड़ी व नाक की हड्डी टूटने के साथ ही 4 पसलियां व एक जबड़ा भी टूटा हुआ पाया गया. वही सब उस की मौत का कारण भी बनी. जगदीश चंद्र के शव का पोस्टमार्टम हो जाने के बाद पुलिस ने उस का शव उस के परिवार को सौंप दिया.

आरोपियों से पूछताछ के बाद जगदीश चंद्र की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तराखंड राज्य में एक जिला है अल्मोड़ा. अल्मोड़ा में ही भिकियासैंण तहसील का एक गांव है बेल्टी. इसी गांव में रहता था नंदन सिंह का परिवार. नंदन सिंह का मेहनतमजदूरी करना मुख्या पेशा था. नंदन सिंह का छोटा परिवार था. उस की पत्नी भावना, बेटी गीता उर्फ गुड्डी, 2 बेटे ललित और कैलाश.

नंदन सिंह की शराब पीने की आदत थी. वह दिनभर में जो कुछ कमाता था, उस का आधा हिस्सा शराब पीने में खर्च कर डालता था. बच्चे बड़े हुए, खर्च बढ़ा तो उस का परिवार आर्थिक तंगी से गुजरने लगा. उस के बाद घर में पतिपत्नी में विवाद रहने लगा. धीरेधीरे विवाद ने इतना बढ़ गया कि एक दिन नंदन सिंह ने बच्चों सहित पत्नी को ही घर से बाहर निकाल दिया.

नंदन सिंह के घर से निकालते ही भावना देवी के सामने संकट आ खड़ा हुआ था. उस के बाद उस ने कई रिश्तेदारों व जानपहचान वालों से नंदन को समझाने के लिए दबाव डाला, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उस ने भावना और बच्चों को अपने घर में रखने से साफ मना कर दिया था.

फिर भी भावना ने हिम्मत नहीं हारी और बच्चों को साथ ले कर मेहनतमजदूरी के उद्देश्य से भिकियासैंण जा पहुंची. वहां पर उस की मुलाकात जोगा सिंह से हुई.

जोगा सिंह के पास खेतीबाड़ी थी. उस के साथ ही उस ने कुछ जानवर भी पाल रखे थे. जोगा सिंह की पत्नी किसी बीमारी के चलते मर चुकी थी. उस के पास एक ही बेटा था गोविंद सिंह. घर पर काम अधिक होने के कारण उसे एक व्यक्ति की सख्त जरूरत थी.

भावना देवी ने अपनी परेशानी जोगा सिंह के सामने रखी तो वह उसे अपने घर पर रखने को तैयार हो गया. उस के बाद भावना देवी अपने बच्चों को साथ ले कर जोगा सिंह के साथ ही रहने लगी थी.

जोगा सिंह के घर पर रहते हुए भावना देवी ने उसके घर की सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी. जिस से जोगा सिंह भी बहुत ही खुश हुआ था. धीरेधीरे जोगा सिंह ने भावना देवी को अपनी पत्नी का दरजा देते हुए एक पत्नी के सारे अधिकार भी सौंप दिए थे. भावना देवी अपने बच्चों और जोगा सिंह के साथ हंसीखुशी से दिन बिताने लगी थी.

उस समय गीता कक्षा 8 में पढ़ती थी. लेकिन जोगा सिंह के घर आने के बाद उस की पढ़ाई बंद करा दी गई. हालांकि गीता पढ़लिख कर भविष्य में कुछ बनना चाहती थी. लेकिन जोगा सिंह ने उस की पढ़ाई पर पाबंदी लगा दी थी.

जोगा सिंह का कहना था कि हमारे घर पर ही इतना कामधंधा है. उसे करने के लिए भी घर पर कोई चाहिए. फिर पढ़लिखकर वह कौन सी नौकरी करने वाली है.

उस वक्त गीता का बचपना था. फिर भी उसे उचित और अनुचित की समझ तो थी. लेकिन इस वक्त उस का परिवार दूसरे के यहां शरण लिए हुए था. यही उस की सब से बड़ी विवशता थी. फिर उस ने अपने भाग्य का लेखा समझते हुए पढ़ाई की तरफ से मुंह फेर लिया. गीता की पढ़ाई छुड़ाते ही जोगा सिंह ने उसे खेती के काम में लगा दिया था.

गीता उस समय बालिका थी. वह अपनी क्षमता के अनुसार बहुत काम कर लेती थी. लेकिन उस के बावजूद भी उस के सौतेले बाप जोगा सिंह ने उसे बैलों से खेत जुताई करना तक सिखा दिया था.

वह बैलों से खेती भी करने लगी. उस के बावजूद भी उस की थोड़ी सी गलती पर जोगा सिंह और उस का बेटा गोविंद सिंह उसे बुरी तरह से मारनेपीटने लगे थे.

बंधुआ मजदूर की तरह करती थी काम

शुरूशुरू में तो उस की मां भावना यह सब सहन करती रही. लेकिन जब वे लोग हदें पार करने लगे तो भावना को भी बुरा लगने लगा था. उस ने बेटी के पक्ष में बोलना शुरू किया तो जोगा सिंह और उस का बेटा गोविंद उसे भी भलाबुरा कहने लगे. लेकिन भावना उन के अहसानों के तले दबी थी. यही कारण था कि उन की हर बात सहन करना उस की मजबूरी थी.

मर्यादा की हद से आगे – भाग 1

सुबह टहलने वाले कुछ लोगों ने पनकी इंडस्ट्रियल एरिया स्थित नगर निगम के पार्क में एक युवक की लाश पड़ी देखी. पार्क में लाश पड़ी होने की खबर फैली तो वहां भीड़ जुट गई. इस भीड़ में चेयरमैन (फैक्ट्री) विजय कपूर भी मौजूद थे. उन्होंने लाश की सूचना थाना पनकी पुलिस को दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अजय प्रताप सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी.

थानाप्रभारी अजय प्रताप सिंह ने घटनास्थल का निरीक्षण शुरू किया. युवक की लाश हरेभरे पार्क के पश्चिमी छोर की आखिरी बेंच के पास पड़ी थी. उस की हत्या किसी नुकीली चीज से सिर कूंच कर की गई थी. लकड़ी की बेंच के नीचे शराब की खाली बोतल, प्लास्टिक के 2 खाली गिलास और कोल्डड्रिंक की एक खाली बोतल पड़ी थी.

अजय प्रताप सिंह ने अनुमान लगाया कि पहले खूनी और मृतक दोनों ने शराब पी होगी. फिर किसी बात को ले कर उन में झगड़ा हुआ होगा और एक ने दूसरे की हत्या कर दी.

मृतक की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी. उस का शरीर स्वस्थ और रंग सांवला था. वह हरे रंग की धारीदार कमीज व ग्रे कलर की पैंट पहने था. पैरों में हवाई चप्पलें थीं, जो शव के पास ही पड़ी थीं. इस के अलावा मृतक के बाएं हाथ की कलाई पर मां काली गुदा हुआ था, साथ ही दुर्गा का चित्र भी बना था. इस से स्पष्ट था कि मरने वाला युवक हिंदू था. जामातलाशी में उस की जेबों से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस से उस की पहचान हो पाती.

अजय प्रताप सिंह घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी (पश्चिम) संजीव सुमन तथा सीओ (कल्याणपुर) अजीत कुमार सिंह घटनास्थल पर आ गए. अधिकारियों ने भी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

उन्होंने थानाप्रभारी अजय प्रताप से घटना के संबंध में जानकारी ली. घटनास्थल पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जुटी थी. लोगों में शव देखने, शिनाख्त करने की जिज्ञासा थी. लेकिन अब तक कोई भी शव की शिनाख्त नहीं कर पाया था.

कई घंटे बीतने के बाद भी युवक के शव की पहचान नहीं हो सकी. आखिर पुलिस अधिकारियों के आदेश पर थानाप्रभारी अजय प्रताप सिंह ने फोटोग्राफर बुलवा कर शव के विभिन्न कोणों से फोटो खिंचवाए.

फिर शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया. थाना पनकी लौट कर अजय प्रताप ने वायरलैस से अज्ञात शव पाए जाने की सूचना प्रसारित करा दी. यह 29 जून, 2019 की बात है.

अज्ञात शव की शिनाख्त के लिए पुलिस ने क्षेत्र के शराब ठेकों, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों तथा नहर किनारे बसी बस्तियों में लोगों को मृतक की फोटो दिखा कर पहचान कराने की कोशिश की, लेकिन कोई भी उस की पहचान नहीं कर सका. पुलिस हर रोज शव की शिनाख्त के लिए लोगों से पूछताछ कर रही थी, कोई नतीजा निकलता न देख अजय प्रताप सिंह की चिंता बढ़ती जा रही थी.

5 जुलाई, 2019 की सुबह 10 बजे थानाप्रभारी अजय प्रताप सिंह अपने कक्ष में आ कर बैठे ही थे कि एक अधेड़ व्यक्ति ने उन के औफिस में प्रवेश किया. वह कुछ परेशान दिख रहा था. अजय प्रताप सिंह ने उस अधेड़ व्यक्ति को सामने पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा कर के पूछा, ‘‘आप कुछ परेशान दिख रहे हैं, जो भी परेशानी हो साफसाफ बताओ.’’

‘‘सर, मेरा नाम जगत पाल है. मैं कानपुर देहात जिले के गांव दौलतपुर का रहने वाला हूं. मेरा छोटा भाई पवन पाल पनकी गल्ला मंडी में पल्लेदारी करता है. वह पनकी गंगागंज कालोनी में रहता है. पवन हफ्ते में एक बार घर जरूर आता था.

‘‘लेकिन इस बार 2 सप्ताह बीत गए, वह घर नहीं आया. उस का मोबाइल भी बंद है. आज मैं उस के क्वार्टर पर गया तो वहां ताला बंद मिला. पूछने पर पता चला कि वह सप्ताह भर से क्वार्टर में आया ही नहीं है. मुझे डर है कि कहीं… पवन को खोजने में आप मेरी मदद करने की कृपा करें.’’

जगत पाल की बात सुन कर थानाप्रभारी अजय प्रताप सिंह ने पूछा, ‘‘तुम्हारे भाई की उम्र कितनी है, वह शादीशुदा है या नहीं?’’

‘‘साहब, उस की उम्र 35-36 साल है. अभी उस की शादी नहीं हुई.’’ जगत ने बताया.

29 जून को पनकी इंडस्ट्रियल एरिया स्थित नगर निगम के पार्क में लाश मिली थी. उस युवक की उम्र तुम्हारे भाई से मिलतीजुलती है. पहचान न हो पाने के कारण हम ने पोस्टमार्टम करा दिया था. लाश के कुछ फोटोग्राफ हमारे पास हैं. तुम उन्हें देख लो.’’ अजय प्रताप ने फाइल से फोटो निकाल कर जगत पाल के सामने रख दिए.

जगत पाल ने एकएक फोटो को गौर से देखा, फिर रोते हुए बोला, ‘‘साहब, ये सभी फोटो मेरे छोटे भाई पवन पाल के ही हैं.’’

थानाप्रभारी अजय प्रताप सिंह ने जगत पाल को धैर्य बंधाया, फिर पूछा, ‘‘जगत पाल, तुम्हारे भाई की किसी से रंजिश या फिर लेनदेन का कोई झगड़ा तो नहीं था?’’

‘‘सर, मेरा भाई सीधासादा और कमाऊ था. उस की न तो किसी से रंजिश थी और न ही किसी से लेनदेन का विवाद था.’’

‘‘कहीं पवन की हत्या दोस्तीयारी में तो नहीं की गई. उस का कोई दोस्त था या नहीं?’’

जगत पाल कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, ‘‘सर, पवन का एक दोस्त रमाशंकर निषाद है. वह भी पवन के साथ ही पल्लेदारी करता था. पवन उसे अपने साथ गांव भी लाया था. वह उसे कल्लू कह कर बुलाता था. बातचीत में पवन ने बताया था कि कल्लू नहर किनारे की कच्ची बस्ती में रहता है. पवन की तरह वह भी खानेपीने का शौकीन है.’’

अंकिता भंडारी मर्डर : बाप की सियासत के बूते बेटे का अपराध – भाग 1

अंकिता भंडारी महज 19 साल की थी. जितनी सुंदर, गोरीचिट्टी, उतनी ही आकर्षक. यौवन की दहलीज पर ग्लैमर और हंसमुख स्वभाव से लबालब. बातचीत में मधुर और आचरण से शालीन. वह जीवन में कुछ कर गुजरने का सपना लिए अपने घर से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर ऋषिकेश 28 अगस्त, 2022 को आई थी. वह पौड़ी गढ़वाल में श्रीकोटा पट्टी नादलस्यू की रहने वाली थी. घर में मांबाप और परिवार के अन्य सदस्य थे.

दरअसल, उसे गंगा भोगपुर स्थित वंतरा रिजौर्ट में 10 हजार रुपए पर रिसैप्शनिस्ट की नौकरी मिली थी. आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे परिवार वालों ने उसे खुशीखुशी घर से भेजा था. वे इस बात से थोड़े आश्वस्त और निश्चिंत थे क्योंकि उस के रहनेठहरने का इंतजाम रिजौर्ट में ही कर्मचारियों के बने कमरे में किया गया था.

अंकिता जल्द ही रिसैप्शनिस्ट का काम सीख गई थी. वहां आने वाले लोगों से बातें करते हुए रिजौर्ट की सुविधाओं के बारे में उन के पूछे गए सवालों के जवाब सलीके से देती थी. साथ ही वहां के सीनियर कर्मचारियों के साथ अनुशासित तरीके से पेश आती थी. सभी का आदर करती थी और वहां के कायदेकानून के बारे में भी जान गई थी.

इसी सिलसिले में उसे मालूम हो गया था कि यह रिजौर्ट किसी बड़े राजनेता का है. इस के मालिक कहने को तो भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश के बड़े नेता और पूर्व मंत्री विनोद आर्य थे, लेकिन वह उन के बेटे पुलकित आर्य की देखरेख में चल रहा था.

उस का रिजौर्ट में अकसर आना होता था. उस के भाई को भी मौजूदा सरकार में राज्यमंत्री का दरजा मिला हुआ था और वह भाजपा में ओबीसी मोर्चे का पदाधिकारी भी था. अंकिता को वहां काम करते हुए एक सप्ताह बीत चुका था. उस के कामकाज पर 2 मैनेजर अंकित गुप्ता और सौरभ भास्कर नजर रखते थे. उन्हें अपने कामकाज की रोजाना रिपोर्ट देनी होती थी और उन के आदेशों का पालन करना होता था.

अंकित गुप्ता उस की हर गतिविधियों पर ध्यान देता था. काम में जरा सी चूक होने पर डांट देता था. सही तरह से काम करने के बारे में समझाते हुए आगे से गलती नहीं होने की हिदायत भी देता था.

वहां आने वाले ग्राहकों से बहुत ही प्यार से बात करने को कहता था. यहां तक कि उस के तीखे बोल या रूखे व्यवहार पर भी उसे कोई वैसी जवाबी प्रतिक्रिया नहीं जतानी थी, जिस से ग्राहक नाराज हो जाए.

अंकिता अपना कामकाज बखूबी निभा रही थी. उसे जब भी समय मिलता था तो वह जम्मू में काम करने वाले अपने फेसबुक फ्रैंड  पुष्पदीप से वाट्सऐप चैटिंग कर लेती थी. उस से फोन पर अकसर बात भी कर लिया करती थी. उसे अपने नए काम के बारे में बताती रहती थी. हर छोटीमोटी जानकारी उसे देती थी.

दोस्त को सारी बातें बता देती थी अंकिता

एक दिन अंकिता पुष्पदीप से चैट कर रही थी तो उस ने दिन में उस के साथ हुई एक घटना और मैनेजर की डांट के बारे में भी लिख दिया. साथ ही यह भी लिखा कि उसे वहां कुछ अच्छा नहीं लग रहा है. जब वाट्सऐप पर ही उस के दोस्त ने पूछा बात क्या है, तब उस ने लिखा, ‘लगता है कि वह यहां आ कर फंस गई है.’

यह बात 17 सितंबर, 2022 की है. चैट में उस के साथ की घटना के बारे में पुष्पदीप के पूछने पर अंकिता ने रिजौर्ट के मैनेजर से ले कर मालिक तक के बारे में लिख दिया. उस में सब से बड़ी बात लिख दी कि रिजौर्ट में गलत काम होता है… उसे भी उस में शामिल करने का दबाव बनाया रहा है.

घटना के बारे में अंकिता ने बताया था कि रिजौर्ट में आए एक गेस्ट ने नशे की हालत में उसे गले से लगा लिया था. इसे ले कर उस ने हंगामा खड़ा कर दिया था. उस से अधिक हंगामा उस के मैनेजर ने गेस्ट से माफी मांगने को ले कर खड़ा कर दिया था.

बाद में रिजौर्ट के मालिक ने गेस्ट से माफी मांगी थी, जबकि मैनेजर अंकित ने इस मामले में अंकिता को चुप रहने की हिदायत दी थी.  अंकिता ने अपने वाट्सऐप चैट में दोस्त को लिखा, ‘अगर मैनेजर अंकित ने इस तरह की दोबारा बात की तब मैं रिजौर्ट में काम नहीं करूंगी. ये लोग चाहते हैं कि मैं प्रोस्टिट्यूट बन जाऊं.’

एक चैट में अंकिता ने लिखा था, ‘आज अंकित मेरे पास आया और मुझ से कहा कि वह उस से कुछ खास बात करना चाहता है. मैं मान गई और अपने रिसैप्शन डेस्क के पास एक कोने में चली गई. वहां उस ने मुझ से पूछा कि क्या तुम एक ऐसे मेहमान को अतिरिक्त सेवाएं देने के लिए तैयार हो, जो 10 हजार रुपए देने को तैयार है. इस पर मैं ने उसे दोटूक कह दिया था कि मैं गरीब हो सकती हूं, लेकिन मैं आप के रिजौर्ट में 10 हजार रुपए के लिए खुद को नहीं बेचूंगी.’

अगले रोज 18 सितंबर की शाम 6 बजे अंकिता की पुष्पदीप से बात हुई थी. उस समय वह फोन पर ही फूटफूट कर रोने लगी थी. रोने के कारण वह अपनी पूरी बात बता नहीं पाई. उस ने सिर्फ इतना कहा कि रात को पूरी बात बताऊंगी.

अंकिता ने दोस्त को यह जरूर बताया कि पुलकित आर्य ने पुलिस को फोन कर उस के खिलाफ शिकायत की है. पुलकित उस के बारे में कह रहा था कि ‘यहां एक अश्लील लड़की है. इस को यहां से ले जाओ.’ शायद, वह उसे डराने के लिए गिरफ्तारी की धमकी दे रहा था. उस पर सैक्स के लिए दबाव बनाया जा रहा था.

उसी 18 सितंबर की रात करीब साढ़े 8 बजे अंकिता का फोन पुष्पदीप के पास आया. उस समय कई गाडि़यों की आवाजें आ रही थीं. आवाज सुन कर दोस्त ने पूछा, ‘कहां हो?’ अंकिता ने कहा, ‘मैं बाहर हूं. सर (पुलकित) ने मुझे कुछ जरूरी बात करने के लिए

बाहर चलने को कहा है.’ उस के बाद फोन कट गया.

पुष्पदीप ने समझा उस के लिए यह कोई नई बात नहीं है. वे लोग शाम के समय में काम के सिलसिले में बराबर बाहर जाते रहते थे. फिर भी अंकिता ने सैक्स के लिए दबाव बनाने की जो बात कही थी, उसे ले कर पुष्पदीप चिंतित हो गया था.

पुष्पदीप हो गया परेशान

अगले दिन जब पुष्पदीप ने अंकिता को फोन किया, तब उस का फोन बंद मिला. फिर उस ने पुलकित को भी फोन किया. उस का भी फोन बंद था. तब उस ने रिजौर्ट के मैनेजर अंकित को फोन किया. उस ने बताया कि वह जिम में है. कुछ समय बाद पुष्पदीप ने रिजौर्ट के रसोइया से बातचीत की, उस ने कहा कि कल (18 सितंबर) से अंकिता को नहीं देखा है.

शराबी की विनाश लीला – भाग 1

शराब पीना अलग बात है और शराबी होना अलग. शराबी जब मनमाफिक शराब पी लेता है तो उसे न तो अच्छेबुरे का ज्ञान रहता है और न रिश्तेनातों का. शराब ने हजारों घर उजाड़े हैं. यही हाल रामभरोसे  का था. दुख की बात यह है कि सजा उस की पत्नी और 4 बेटियों को भोगनी पड़ी.

अगर… श्यामा निरंकारी बालिका इंटर कालेज में रसोइया के पद पर कार्यरत थी. वह छात्राओं के लिए मिड डे मील तैयार करती थी. वह 2 दिन से काम पर नहीं आ रही थी, जिस से छात्राओं को मिड डे मील नहीं मिल पा रहा था. श्यामा शांतिनगर में रहती थी. वह काम पर क्यों नहीं आ रही, इस की जानकारी लेने के लिए कालेज की प्रधानाचार्य ने एक छात्रा प्रीति को उस के घर भेजा. प्रीति श्यामा के पड़ोस में रहती थी और उसे अच्छी तरह जानती थी.

प्रीति सुबह 9 बजे श्यामा देवी के घर पहुंची. घर का दरवाजा अंदर से बंद था. प्रीति ने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिला, न ही अंदर कोई हलचल हुई. श्यामा की बेटी प्रियंका प्रीति की सहेली थी, दोनों एक ही क्लास में पढ़ती थीं. प्रीति ने आवाज दी, ‘‘प्रियंका, ओ प्रियंका दरवाजा खोलो. मुझे मैडम ने भेजा है.’’

प्रीति की काफी कोशिश के बाद भी दरवाजा नहीं खुला, न ही कोई हलचल हुई.

पड़ोस में श्यामा का ससुर रामसागर रहता था. प्रीति ने दरवाजा न खोलने की जानकारी उसे दी तो वह श्यामा के घर आ गया. उस ने दरवाजा पीटा और ‘बहू…बहू’ कह कर आवाज दी. लेकिन दरवाजा नहीं खुला.

रामसागर ने दरवाजे की झिर्री से झांकने की कोशिश की तो अंदर से तेज बदबू आई. इस से उसे लगा कि जरूर कोई गंभीर बात है. उस ने घबरा कर पड़ोसियों को बुला लिया. पड़ोसियों ने उसे पुलिस में सूचना देने की सलाह दी. यह 1 फरवरी, 2020 की बात है.

सुबह 10 बजे रामसागर बदहवास सा फतेहपुर सदर कोतवाली पहुंचा. कोतवाल रवींद्र कुमार श्रीवास्तव कोतवाली में ही थे. उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति को बदहवास हालत में देखा तो पूछा, ‘‘क्या बात है, इतने घबराए हुए क्यों हो?’’

‘‘साहब, मेरा नाम रामसागर है. मैं शांतिनगर में रहता हूं. पड़ोस में मेरा बेटा रामभरोसे अपनी पत्नी श्यामा और 4 बेटियों के साथ रहता है. उस के घर का दरवाजा अंदर से बंद है और भीतर से तेज दुर्गंध आ रही है. मुझे किसी अनिष्ट की आशंका हो रही है. आप मेरे साथ चलें.’’

रामसागर ने जो कुछ बताया, गंभीर था. थानाप्रभारी रवींद्र कुमार श्रीवास्तव ने पुलिस टीम साथ ली और रामसागर के साथ रामभरोसे के घर पहुंच गए. उस समय वहां पड़ोसियों का जमघट लगा था. लोग दबी जुबान से कयास लगा रहे थे.

थानाप्रभारी रवींद्र कुमार श्रीवास्तव लोगों को परे हटा कर दरवाजे पर पहुंचे. दरवाजा अंदर से बंद था, उन्होंने आवाज दे कर दरवाजा खुलवाने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे. घर के अंदर मां और उस की 4 बेटियां थीं. अंदर से दुर्गंध आ रही थी. निस्संदेह कोई गंभीर बात थी. थानाप्रभारी रवींद्र कुमार श्रीवास्तव ने इस मामले की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी.

जानकारी मिलने पर एसपी प्रशांत वर्मा, एएसपी राजेश कुमार और सीओ (सिटी) कपिलदेव मिश्रा मौके पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने पहले जानकारी जुटाई, फिर थानाप्रभारी रवींद्र कुमार श्रीवास्तव को कमरे का दरवाजा तोड़ने का आदेश दिया. रवींद्र कुमार ने अपनी पुलिस टीम की मदद से दरवाजा तोड़ दिया. दरवाजा टूटते ही तेज दुर्गंध का भभका निकला.

पुलिस अधिकारियों ने घर के अंदर जा कर देखा तो उन का दिल कांप उठा. वहां का दृश्य बड़ा वीभत्स था. फर्श पर आड़ीतिरछी 5 लाशें एकदूसरे के ऊपर पड़ी थीं. मृतकों की पहचान रामसागर ने की. उस ने बताया कि मृतकों में एक उस की बहू श्यामा है, 4 उस की नातिन पिंकी (20 वर्ष), प्रियंका (14 वर्ष), वर्षा (13 वर्ष) और रूबी उर्फ ननकी (10 वर्ष) हैं.

सभी लाशें फर्श पर पड़ी थीं. देखने से ऐसा लग रहा था कि जैसे सभी ने जहरीला पदार्थ पी कर आत्महत्या की थी. क्योंकि लाशों के पास ही एक भगौना रखा था, जिस में कोई जहरीला पदार्थ आटे में घोला गया था. संभवत: उसी पदार्थ को पी कर मां तथा बेटियों ने आत्महत्या की थी.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल की जांच हेतु फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने जांच की तो पता चला कि उन लोगों ने जहरीला पदार्थ (क्विक फास) पी कर जान दी थी. घर से क्विक फास के 7 पैकेट मिले, 4 खाली 3 भरे हुए.

फोरैंसिक टीम ने जहरीले पदार्थ के सातों पैकेट जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिए. भगौना तथा उस में घोला गया जहरीला पदार्थ भी जांच के लिए रख लिया गया.

श्यामा और उस की 4 बेटियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर जिस ने भी सुनी, वही स्तब्ध रह गया. इस दुखद घटना की खबर जब निरंकारी बालिका इंटर कालेज पहुंची तो वहां शोक की लहर दौड़ गई. प्रधानाचार्य ने कालेज की छुट्टी कर दी. छुट्टी के बाद 20-25 छात्राएं शांतिनगर स्थित मृतकों के घर पहुंची. दरअसल, मृतका प्रियंका, रूबी और वर्षा निरंकारी बालिका इंटर कालेज में ही पढ़ती थीं.

जांचपड़ताल के बाद पुलिस अधिकारी इस नतीजे पर पहुंचे कि श्यामा ने आर्थिक तंगी और शराबी पति की क्रूरता से तंग आ कर बेटियों सहित आत्महत्या की है. हत्या जैसी कोई बात नहीं थी. पुलिस अधिकारियों ने पांचों शवों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

घर में 5 लाशें पड़ी हुई थीं, इतना कुछ हो गया था, लेकिन घर के मुखिया रामभरोसे का कुछ अतापता नहीं था. पुलिस अधिकारियों ने उस के संबंध में पिता रामसागर से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रामभरोसे शराबी है. वह दिन भर मजदूरी करता है और शाम को शराब के ठेके पर जा कर शराब पीता है. उस की तलाश ढाबों व शराब ठेकों पर की जाए तो वह मिल सकता है.

उधार की बीवी बनी चेयरमैन : रहमत ने नसीम को ठगा – भाग 1

5 अगस्त, 2018 को एक डेली न्यूजपेपर में एक खबर प्रमुखता से छपी, जिस की हैडलाइन ऐसी थी जिस पर जिस की भी नजर गई, उस ने जरूर पढ़ी. न्यूज कुछ इस तरह से थी— ‘भरोसे पर दोस्त ने दोस्त को पत्नी उधार दी थी, चेयरमैन बन गई तो वापस नहीं किया.’

इस न्यूज में उधार में दी गई बीवी वाली बात पढ़ने वाला हर आदमी हैरत में था. इस हैडलाइन की न्यूज में यह भी शामिल था कि महिला के पति की ओर से बीवी को वापस दिलाने के लिए अदालत में अर्जी लगाई गई है.

इस न्यूज के हिसाब से एक शादीशुदा व्यक्ति को अपनी बीवी को नेता बनाने का ऐसा खुमार चढ़ा कि उस ने पत्नी को सियासी गलियारों में उतारने के लिए यह सोच कर बीवी अपने दोस्त को उधार दे दी कि वह उसे चुनाव लड़ाएगा.

यह संयोग ही था कि उस की बीवी चुनाव जीतने के बाद चेयरमैन बन गई. लेकिन चेयरमैन बनने के बाद पत्नी ने पति को भुला दिया. शर्त के मुताबिक चुनाव जीतने के बाद महिला के पति ने दोस्त से बीवी लौटाने को कहा तो दोनों की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई. यहां तक कि दोस्त ने महिला के पति को पहचानने तक से इनकार कर दिया. इस पर मामला गरमा गया. नतीजा यह हुआ कि जो बात अभी तक 3 लोगों के बीच थी, वह सार्वजनिक हो गई.

उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर के थाना कुंडा, जसपुर के थाना क्षेत्र में एक गांव है बावरखेड़ा. नसीम अंसारी का परिवार इसी गांव में रहता है. नसीम के अनुसार, मुरादाबाद जिले के भोजपुर निवासी पूर्व नगर अध्यक्ष शफी अहमद के साथ उस की काफी समय से अच्छी दोस्ती थी. उसी दोस्ती के नाते शफी अहमद का उस के घर आनाजाना था. कुछ महीने पहले शफी ने उसे विश्वास में ले कर उस की पत्नी रहमत जहां को भोजपुर से चेयरमैन का चनुव लड़ाने की बात कही.

शफी अहमद ने नसीम को बताया कि इस बार चेयरमैन की सीट ओबीसी के लिए आरक्षित है. जबकि वह सामान्य जाति के अंतर्गत आने के कारण अपनी बीवी को चुनाव नहीं लड़ा सकता. नसीम अपने दोस्त के झांसे में आ गया और उस ने दोस्त की मजबूरी समझते हुए चुनाव लड़ाने के लिए अपनी बीवी उस के हवाले कर दी.

लेकिन दूसरे की बीवी को चुनाव लड़ाना इतना आसान काम नहीं था. यह बात नसीम ही नहीं, नसीम की बीवी रहमत जहां भी जानती थी. इस के लिए सब से पहले रहमत जहां का कानूनन शफी अहमद की बीवी बनना जरूरी था. शफी की बीवी का दरजा मिलने के बाद ही वह चुनाव लड़ने की हकदार होती.

चुनाव के लिए इशरत बनी शमी की पत्नी

चुनाव लड़ने में आ रही अड़चन को दूर करने के लिए दोनों दोस्तों और रहमत जहां ने साथ बैठ कर गुप्त रूप से समझौता किया. उसी समझौते के तहत शफी अहमद ने रहमत जहां से कोर्टमैरिज कर ली. कोर्टमैरिज के बाद शफी अहमद ने अपने पद और रसूख के बल पर जल्दी ही सरकारी कागजातों में रहमत जहां को अपनी बीवी दर्शा कर उस का आईडी कार्ड और आधार कार्ड बनवा दिया. रहमत जहां का आधार कार्ड बनते ही उस ने चुनाव की अगली प्रक्रिया शुरू कर दी.

इस से पहले सन 2012 से 2017 तक भोजपुर के चेयरमैन की कुरसी पर शफी अहमद का ही कब्जा रहा था. शफी को पूरा विश्वास था कि इस बार भी जनता उन्हीं का साथ देगी. लेकिन इस बार आरक्षण के कारण शफी को सपा से टिकट नहीं मिल पाया. वजह यह थी कि इस बार भोजपुर चेयरमैन की सीट पिछड़े वर्ग की महिला के लिए आरक्षित कर दी गई थी.

शफी अहमद सामान्य वर्ग में आते थे. इस समस्या से निपटने के लिए शफी अहमद ने रहमत जहां से कोर्टमैरिज कर के उसे कानूनन अपनी बीवी बना कर निर्दलीय चुनाव लड़वाया. शफी के पुराने रिकौर्ड और रसूख की वजह से रहमत जहां चुनाव जीत गई. उस ने अपनी प्रतिद्वंदी परवेज जहां को 117 वोटों से हरा कर जीत हासिल की थी.

रहमत जहां को चेयरमैन बने हुए अभी 8 महीने ही हुए थे कि नसीम अंसारी ने अपनी बीवी रहमत जहां को वापस ले जाने के लिए शफी अहमद से बात की तो बात बढ़ गई. शफी ने इस मामले से अपना पल्ला झाड़ते हुए नसीम से कहा कि वह स्वयं ही रहमत जहां से बात करे.

नसीम ने जब इस बारे में रहमत जहां से बात की तो उस ने साफ कह दिया कि तुम से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. मैं ने शफी अहमद से कोर्टमैरिज की है. वही मेरे कानूनन पति हैं. मैं तुम्हें नहीं जानती.

रहमत जहां की बात सुन कर नसीम स्तब्ध रह गया. उस ने बच्चों का वास्ता दे कर रहमत से ऐसा न करने को कहा, लेकिन उस ने उस के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया.

नसीम ने वापस मांगी बीवी

इस पर नसीम ने फिर से शफी अहमद से बात की और अपनी बीवी वापस मांगी, लेकिन उस ने रहमत जहां को देने से साफ मना कर दिया. शफी अहमद का कहना था कि उस ने रहमत के साथ निकाह किया है और वह कानूनन उस की बीवी है. उसे जो करना है करे, वह रहमत को वापस नहीं देगा.

उस के बाद नसीम के पास एक ही रास्ता था कि वह अदालत की शरण में जाए. उस ने जसपुर के अधिवक्ता मनुज चौधरी के माध्यम से जसपुर के न्यायिक मजिस्ट्रैट की अदालत में धारा 156(3) के तहत प्रार्थनापत्र दिया, जिस में कहा गया कि शफी अहमद ने उस की बीवी से जबरन निकाह कर लिया.

नसीम अंसारी ने अदालत में जो प्रार्थनापत्र दिया, उस में कहा कि वर्ष 2006 में उस का निकाह सरबरखेड़ा निवासी दादू की बेटी रहमत जहां के साथ हुआ था, जिस से उस का एक बेटा और एक बेटी हैं.

17 नवंबर, 2017 की रात 10 बजे शफी अहमद, नईम चौधरी, मतलूब, जिले हसन निवासी भोजपुर, उस के घर आए. उन लोग ने मेरी कनपटी पर तमंचा रखा और मेरी पत्नी को कार में डाल कर ले गए. बाद में शफी अहमद ने उस की बीवी के साथ जबरन निकाह कर लिया. उस के कुछ समय बाद कुछ लोग कार से फिर उस के घर आए और उस के दोनों बच्चों को उठा ले गए.