Hindi Stories: नन्ही की ‘सपना’

Hindi Stories: नन्ही थी तो लड़की, पर उस का कामधाम ही नहीं सोच और बातव्यवहार भी लड़कों जैसा था. शायद इसीलिए उस ने लड़के से नहीं लड़की से शादी की.

उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के कस्बा सोरों की रहने वाली केला देवी अपनी बेटी नन्ही की शादी के लिए बहुत ज्यादा परेशान थीं, क्योंकि बाकी उन के सभी बच्चों की शादियां हो चुकी थीं. पति राम सिंह की मौत बरसों पहले हो चुकी थी. उस की सोरों में परचून की दुकान थी. उस के 5 बेटों में 2 बेटे दिल्ली में नौकरी करते थे, बाकी के 3 सोरों में ही अपना काम करते थे. बेटी नन्ही बचपन से ही दुकान पर बैठ कर पिता की मदद करती थी. घर में पढ़ाई का माहौल नहीं था, इसलिए राम सिंह का कोई भी बच्चा पढ़ालिखा नहीं था. लेकिन नन्ही ऐसी थी, जो दस्तखत कर लेती थी.

पिता की मौत के बाद नन्ही ने दुकान की ही नहीं, घरपरिवार की भी सारी जिम्मेदारी संभाल ली थी. उसी ने दुकान की कमाई से 2 बड़ी बहनों की शादियां कीं. वह बचपन से ही लड़कों वाले काम करती थी, इसलिए लड़कों की ही तरह रहती थी. कपड़े भी वह उन के जैसे ही पहनती थी. बातचीत का लहजा भी उस का लड़कों जैसा ही था. यह सब देख कर यही लगता था, जैसे वह खुद को लड़की न समझ कर लड़का समझती है.

केला देवी जब भी उस से शादी की बात करती, वह साफ मना कर देती. लेकिन मां को तो उस की शादी की चिंता थी, क्योंकि वह जवान हो चुकी थी. अब भी वही दुकान पर बैठती थी. लोग उसे बचपन से ही दुकान पर बैठती देखते आए थे, इसलिए किसी को इस में कुछ अजीब नहीं लगता था. दुकानदारी में नन्ही काफी कुशल थी. वह त्योहारों का सामान तो लाती ही थी, गर्मियों में बर्फ भी बेचती थी. वह दुकान पर काफी मेहनत करती थी. करीब 2 साल पहले की बात है. केला देवी ने जाहरबीर बाबा को जात चढ़ाने का विचार किया. इस के लिए उस ने भानपुर नगरिया के रहने वाले अमरीश से बात की. वह अपनी विधवा मां और भाईबहनों के साथ रहता था. जाहरबीर बाबा का स्थान राजस्थान के बागड़ में पड़ता है.

बात कर के केला देवी नन्ही तथा अन्य घर वालों को साथ ले कर अमरीश के साथ बाबा जाहरबीर की जात चढ़ाने के लिए चल पड़ी. अमरीश के साथ उस की मां और 17 वर्षीया बहन सपना भी गई थी. पूरे एक सप्ताह का प्रोग्राम था, इसलिए सभी वहां एक धर्मशाला में ठहरे. नन्ही खुश थी कि कुछ दिनों के लिए दुकान से छुट्टी मिल गई है. लेकिन यहां उस की नजर अमरीश की बहन सपना पर पड़ी तो उसी पर जम कर गई.

सपना उस समय साथ आए लोगों को पानी पिला रही थी. नन्ही ने उसे इशारे से बुला कर कहा, ‘‘सब को तो पानी पिला रही हो, मुझे नहीं पिलाओगी क्या?’’

‘‘क्यों नहीं पिलाऊंगी. आखिर हम तुम्हारे साथ ही तो आए हैं. तुम्हें प्यासा कैसे रख सकती हूं.’’ कह कर सपना ने पानी का गिलास नन्ही की ओर बढ़ाया तो उस ने गिलास के बजाय उस का हाथ पकड़ लिया. सपना ने हैरानी से उसे घूरते हुए कहा, ‘‘यह क्या कर रही हो?’’

‘‘तुम्हारा हाथ देख रही हूं, कितना सुंदर और मुलायम है.’’

नन्ही की बात सपना को अटपटी लगी. वह कुछ सोच रही थी कि नन्ही ने दूसरे हाथ से गिलास थाम कर उसे अपनी ओर खींचा तो वह उस की गोद में आ गिरी. इस के बाद सपना का चेहरा अपनी ओर घुमा कर बोली, ‘‘यार, तुम सचमुच बहुत खूबसूरत हो. मेरे सपनों में आने वाली हसीना की तरह.’’

सपना खुद को संभालते हुए जल्दी से उठ कर बोली, ‘‘लगता है, फिल्में बहुत देखती हो, तभी इस तरह के डायलौग बोल रही हो.’’

‘‘फिल्में देखने की फुरसत कहां है. लेकिन तुम्हारे चेहरे पर जो लिखा है, उसे पढ़ना फिल्म देखने जैसा ही है.’’

नन्ही की बातें सपना की समझ में नहीं आईं. वह खाली गिलास ले कर चली गई, साथ ही नन्ही के दिल का करार भी ले गई. नन्ही को लगा, सपना ही वह लड़की है, जिसे वह जीवनसाथी के रूप में अपना सकती है. नन्ही सपना के करीब आने की कोशिश करने लगी. लेकिन वह जानती थी कि सपना को दिल की बात समझाना आसान नहीं है. इस के बावजूद उस की नजरें सपना पर ही टिकी रहती थीं. हमेशा वह उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करती रहती थी. उसे अपने दिल की बात समझाना चाहती थी. वह उसे बताना चाहती थी कि देखने में भले ही वह लड़की है, लेकिन मन से वह पुरुष है. सपना उसे लड़की समझ रही थी, इसलिए उस की ओर खास ध्यान नहीं दे रही थी.

वह अपने साथ आए लोगों की सेवा में लगी रहती थी. जबकि नन्ही दिल की बात उस तक पहुंचाने के लिए परेशान थी. वह सपना से प्यार करने लगी थी और यह बात उस तक पहुंचाना चाहती थी. धर्मशाला में सब के सामने यह बात कही नहीं जा सकती थी. इसलिए एक दिन वह घूमने के बहाने सपना को एकांत में ले गई. उसे बगल में बैठा कर बांहों में जकड़ लिया तो सपना घबरा कर बोली, ‘‘तुम तो लड़कों जैसी हरकतें करती हो. मुझे अब तुम से डर लगने लगा है.’’

‘‘तुम ने सही समझा. मैं सिर्फ देखने में लड़की हूं, बाकी सोच लड़कों वाली है. मैं तुम से प्यार करने लगी हूं. तुम्हें देख कर मेरी आंखों को बहुत सुकून मिलता है.’’ कह कर उस ने सपना की कलाई थाम ली. सपना को उस का यह स्पर्श किसी पुरुष का लगा, इसलिए उस का शरीर सिहर उठा. उस ने हैरानी से नन्ही की ओर देखा, इस के बाद अपना हाथ छुड़ा कर बोली, ‘‘लड़की भी कहीं लड़की से प्यार कर सकती है?’’

‘‘जब तुम भी मुझे प्यार करने लगोगी तो तुम्हें पता चल जाएगा कि एक लड़की दूसरी लड़की से कैसे प्यार कर सकती है.’’

‘‘अब हमें चलना चाहिए. सब इंतजार कर रहे होंगे.’’ कह कर सपना उठ खड़ी हुई.

‘‘वादा करो, फिर मिलोगी?’’

‘‘हां मिलूंगी.’’ कह कर सपना धर्मशाला की ओर बढ़ी तो पीछेपीछे नन्ही भी चल पड़ी.

सपना परेशान थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस के दिल में नन्ही ने जो हलचल पैदा कर दी थी, उस से वह बेचैन थी. नन्ही उसे अपनी ओर खींच रही थी, जबकि वह लड़की थी. उस का दिल बेकाबू हो रहा था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. उस का दिल जिस तरह नन्ही को ले कर धड़का था, इस के पहले किसी लड़के को ले कर भी नहीं धड़का था. सपना 17 साल की थी. पर गरीब घर की बिना बाप की बेटी को मां ने नसीहतें देदे कर इतना बड़ा किया था. इसलिए अब तक वह किसी लड़के के करीब नहीं आई थी. उसे पुरुष के स्पर्श का कोई अनुभव नहीं था. लेकिन नन्ही के स्पर्श ने उस के तनमन को झकझोर दिया था.

उस रात सभी सोने के लिए लेटे तो नन्ही ने इशारे से सपना को बुलाया और अपने बगल लिटा लिया. दोनों लड़कियां थीं, इसलिए किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. उस रात दोनों काफी करीब आ गईं. अगले दिन लौटना था, सपना अपने घर चली गई तो नन्ही अपने घर आ गई. लेकिन अब नन्ही का मन काम में बिलकुल नहीं लग रहा था. वह सपना से मिलने का बहाना खोजने लगी. नन्ही जानती थी कि 2 लड़कियों की दोस्ती पर किसी को ऐतराज नहीं होगा, लेकिन जब लोगों को उन की नजदीकियों का पता चलेगा तो जरूर तूफान आ जाएगा. नन्ही को एक डर यह भी था कि कहीं सपना का मन बदल न जाए. नन्ही को पता था कि नगरिया में सपना की एक मौसी रहती हैं. सपना से मिलने में परेशानी न हो, एक दिन वह उस की मौसी के यहां गई और मौसी की बेटी से दोस्ती कर ली. उसी के माध्यम से सपना और उस की मुलाकातें होने लगीं.

धीरेधीरे दोनों को प्यार रास आने लगा. नन्ही सपना की हर जरूरतें पूरी करने लगी. अब वह कभीकभी सपना के घर भी जाने लगी. तब ओमवती ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इन दोनों लड़कियों के बीच क्या चल रहा है. वह गांव की औरत थीं, उन्हें मालूम ही नहीं था कि ऐसा भी होता है. पहले तो सब सामान्य लग रहा था. कुछ दिनों बाद नन्ही ने सपना को एक मोबाइल फोन दिलवा दिया, जिस से उसे बात करने में तो आसानी हो ही गई, मिलने में भी आसानी हो गई. जरूरत पड़ने पर नन्ही ओमवती की आर्थिक मदद भी कर देती थी.

लेकिन सच्चाई को लाख छिपाया जाए, उजागर हो ही जाती है. एक दिन ओमवती ने सपना और नन्ही को कुछ इस स्थिति में देख लिया कि सन्न रह गई. इस के बाद उस की समझ में आ गया कि नन्ही उस की बेटी पर इतना मेहरबान क्यों है. उस ने नन्ही से साफसाफ कह दिया, ‘‘तुम्हारा हमारे घर आना किसी को अच्छा नहीं लगता, इसलिए तुम हमारे यहां मत आया करो.’’

‘‘लेकिन चाची मैं ने किया क्या है? सपना मेरी दोस्त है, उस से मिलने आ जाती हूं. इस में गलत क्या है?’’

‘‘यह सब मैं नहीं जानती. बस तुम समझ लो कि मेरे घर कोई मर्द नहीं है. मुझे पड़ोसियों का ही सहारा है. मुझे उन्हीं की मदद से बेटी की शादी करनी है.’’

‘‘चाची, आप पड़ोसियों की इतनी चिंता क्यों करती हैं. मुझे सपना और आप से हमदर्दी है, इसलिए चली आती हूं. अगर आप को मेरा आना अच्छा नहीं लगता तो नहीं आऊंगी.’

‘‘यही हम दोनों के लिए अच्छा रहेगा.’’ ओमवती ने कहा.

मां के इस व्यवहार से सपना तड़प उठी. उस ने कहा, ‘‘मां, तुम नन्ही से यह क्या कह रही हो? वह हमारी कितनी मदद करती है.’’

ओमवती ने बेटी को डांटा. तभी गांव का रहने वाला महिपाल आ गया. उस ने कहा, ‘‘ओमवती इस चिडि़या के पर उग आए हैं. लगता है, उन्हें काटना पड़ेगा.’’

महिपाल की बात सुन कर नन्ही बोली, ‘‘खबरदार, सपना को कुछ कहा तो अच्छा नहीं होगा. मैं तुम्हारी हरकतों को अच्छी तरह जानती हूं. मैं यह भी जानती हूं कि तुम्हारी नजर सपना पर है. लेकिन याद रखना, अगर सपना को कोई नुकसान पहुंचा तो मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं.’’

नन्ही के तेवर देख कर महिपाल घबरा गया. उस के दिल में चोर तो था ही, वह ओमवती और सपना के चक्कर में वहां आता था.

इस घटना के बाद नन्ही गंभीर हो गई. उसे लगा कि सपना की मां और महिपाल उस की राह में रोड़ा बन सकते हैं. कई दिनों तक सपना और नन्ही की न तो मुलाकात हुई और न ही फोन पर बातें हो सकीं. एक दिन सपना ने फोन कर के बताया कि मां ने फोन छीन लिया है, इसलिए वह फोन नहीं कर पाई. उस ने रोरो कर कहा कि उसे घर में कैद कर दिया गया है. महिपाल मम्मी से कह रहा था कि वह जल्दी से उस की शादी करा दे. अब वही कुछ करे, यहां उस का दम घुटता है.

‘‘तुम चिंता मत करो सपना, मैं जल्दी ही कुछ करती हूं. मैं तुम्हें उस नरक से जल्दी ही निकालती हूं.’’ नन्ही ने कहा.

ओमवती ने सपना के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी थी. उसे सपना के लिए लड़का मिल भी गया था. सपना को जब पता चला कि मां ने उस के लिए लड़का पसंद कर लिया है तो उस ने नन्ही को फोन कर के सारी बात बता कर कहा, ‘‘तुम जल्दी से मुझे यहां से निकालो वरना ये लोग मेरी शादी कर देंगे.’’

18 अप्रैल, 2015 को लड़के वालों को ओमवती के घर आना था. उसी दिन गोद भराई भी होनी थी. नन्ही सोच में पड़ गई कि अब क्या किया जाए. उस ने तुरंत निर्णय लिया और अपने शुभचिंतकों से बात कर के सपना को फोन किया कि वह 14 अप्रैल को घर से बाहर मिले, उस के बाद वह सब संभाल लेगी. इसी बीच नन्ही ने वकील से भी बात कर ली थी. ओमवती गोद भराई की तैयारी में जुटी थी. इस चक्कर में उस का ध्यान सपना के ऊपर से हट गया था. वह खुश थी कि सपना की शादी के बाद नन्ही से छुटकारा मिल जाएगा. 14 अप्रैल को योजना के अनुसार, सुबह 8 बजे के करीब सपना घर से निकल गई. उस समय अमरीश पड़ोसी गांव में गया हुआ था तो ओमवती घर के काम में लगी थी.

अचानक ओमवती को सपना की याद आई तो वह उसे कहीं दिखाई नहीं दी. उसे लगा कि पड़ोस में गई होगी. लेकिन जब वह पड़ोसियों के यहां भी नहीं मिली तो ओमवती को चिंता हुई. उस ने अमरीश और महिपाल को उस की तलाश में लगा दिया. जब सपना गांव में नहीं मिली तो सभी को यही लगा कि सपना नन्ही के यहां होगी. ओमवती ने केला देवी को फोन किया तो पता चला कि सपना वहां भी नहीं थी. नन्ही भी 2 दिनों से घर से गायब थी.

ओमवती परेशान हो गई. लड़के वाले आएंगे तो वह उन से क्या कहेगी. अगले दिन थाने गई और पूरी बात थानाप्रभारी सुरेशचंद्र को बताई. उन्होंने सपना के बारे में पता करने का आश्वासन दे कर उसे घर भेज दिया. वह सपना के बारे में पता करते 18 अप्रैल को नन्ही सपना के साथ थाना सोरो पहुंची और थानाप्रभारी को एक एफीडेविट दिया, जिस के अनुसार दोनों ने विवाह कर लिया था. उसे पढ़ कर सुरेशचंद्र हैरान रह गए. सोरों जैसे छोटे से कस्बे में समलैंगिक शादी हो सकती है, वह सोच भी नहीं सकते थे.

थानाप्रभारी ने नन्ही को घूर कर देखा तो वह बोली, ‘‘साहब, हम दोनों ने शादी की है, कोई जुर्म नहीं किया है. अब हम साथ रहना चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन यह शादी कैसे..?’’ सुरेशचंद्र कुछ और कहते, सपना ने कहा, ‘‘हम दोनों बालिग हैं. हमें भी अपनी मरजी से जीने का हक है. अब कोई हमारी जिंदगी में कैसे दखल दे सकता है.’’

सुरेशचंद्र ने फोन द्वारा ओमवती को सूचना दी. थोड़ी ही देर में दोनों लड़कियों के घर वाले थाने आ गए. बात थाने से बाहर भी पहुंच गई. कस्बे के लिए यह एक अजूबा था, लोग थाने में जुटने लगे.

दोनों पक्षों में बहस होने लगी. ओमवती सपना को अपने साथ ले जाना चाहती थी. उस ने थानाप्रभारी के आगे हाथ जोड़ कर कहा कि आज लड़के वाले उस की बेटी को देखने आने वाले हैं. अगर बेटी घर नहीं गई तो उस की बड़ी बदनामी होगी.

लेकिन सपना ने कहा कि उस की शादी तो नन्ही के साथ हो चुकी है, अब वह दूसरी शादी क्यों करेगी.

‘‘यह कैसी बेहयाई है. भला 2 लड़कियां भी शादी कर सकती हैं?’’ ओमवती ने रोते हुए कहा, ‘‘इस शादी का क्या भविष्य होगा?’’

भीड़ में चखचख होने लगी थी. पुलिस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस मामले में क्या करे. दोनों लड़कियां बालिग थीं. उन पर दबाव भी नहीं डाला जा सकता था. भारत में समलिंगी विवाह को कानूनी मान्यता नहीं है, लेकिन उन्हें साथ रहने से रोका नहीं जा सकता था. सुरेशचंद्र ने ओमवती से कहा, ‘‘भई लड़कियां बालिग हैं, इसलिए हम उन पर दबाव नहीं डाल सकते. ये जहां चाहे, वहां जा सकती हैं. तुम भी जबरदस्ती नहीं कर सकती. अगर तुम अपनी बेटी को घर ले जाना चाहती हो तो तुम्हें अदालत जाना होगा.’’

ओमवती ने अपना सिर पीट लिया. पति की मौत के बाद वह वैसे ही परेशानियों से जूझ रही थी. उस के 5 बेटे और 3 बेटियां थीं. सपना उस की सब से प्रिय बेटी थी. पर उसी ने उसे गहरा आघात पहुंचाया था. 2 लड़कियों के बीच भी शारीरिक संबंध हो सकते हैं, उस ने पहली बार जानासुना था. पुलिस ने सपना को नन्ही के साथ जाने की इजाजत दे दी. दोनों खुशीखुशी घर आ गईं. सपना अब नन्ही की पत्नी थी. सपना ने नन्ही के नाम का मंगलसूत्र पहन कर मांग में सिंदूर भर लिया. नन्ही को किसी की भी परवाह नहीं थी. उस का कहना था कि वह सपना को जान से ज्यादा प्यार करती है, इसलिए उस से शादी कर ली. रही बात समाज की तो वह किसी को कुछ नहीं देता, सिर्फ परेशान करता है.

किसी को उस की मरजी से न रहने देता है, न जीने देता है. वह सपना के साथ जीना चाहती है. रही बात बच्चे की तो वह कोई बच्चा गोद ले लेगी. नन्ही ने सपना से शादी कर के मां का सपना पूरा कर दिया. उस की मां को इस में कुछ गलत नहीं दिखाई देता. क्योंकि नन्ही उस के लिए लड़की नहीं, लड़के की तरह है. उस ने सपना को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया है. अब देखना है कि इस शादी का भविष्य क्या होगा? फिलहाल कथा लिखे जाने तक सपना ससुराल में थी और उस का मायके जाने का कोई इरादा नहीं था. नन्ही ही अब उस का सब कुछ है, वही उस का भविष्य संवारेगी, ऐसा उसे विश्वास है. Hindi Stories

 

Short Story : लड़के ने लड़की बनकर बनाई पहचान

Short Story : रेलवे के तकनीकी विभाग में कार्यरत राजेश पांडेय देखने में भले ही एक युवक था, लेकिन मानसिक रूप से वह बचपन से ही एक लड़की था. भावनाएं जाहिर न करने की वजह से घर वालों ने एक लड़की से उस की शादी भी कर दी. इस के बाद स्त्री बन कर अपनी अलग पहचान बनाने के लिए राजेश उर्फ सोनिया पांडेय ने जो संघर्ष किया वह…

काफी जद्दोजहद के बाद अब मैं असली जिंदगी जी रही हूं और जिंदगी के मजे ले रही हूं. इस के लिए मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा. संघर्ष भी किसी और से नहीं, बल्कि अपने परिवार से और समाज से, तब कहीं जा कर मैं अपनी असली पहचान बना पाई हूं. जिसे अब मेरा परिवार और समाज भी स्वीकार करने लगा है. मैं कौन हूं, क्या हूं और मेरे परिवार में कौनकौन हैं, इस के बारे में मैं बताए देती हूं. इस की शुरुआत मैं अपने घर से ही करती हूं. दरअसल, मेरे पिता ख्यालीराम पांडेय मूलरूप से उत्तराखंड के शहर अल्मोड़ा के रहने वाले थे. वह 1960 में उत्तर प्रदेश के शहर बरेली आ गए.

वह पूर्वोत्तर रेलवे में इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे. बरेली की इज्जतनगर रेलवे की वर्कशाप में वह काम करते थे. परिवार में मेरी मां निर्मला और एक बड़ा भाई था. मेरा परिवार बरेली आ गया. बरेली में ही मेरा जन्म हुआ. मातापिता ने मेरा नाम राजेश रखा. मेरे बाद मेरी 2 छोटी बहनें हुईं. मैं कहने को तो लड़का थी, लेकिन मेरी आत्मा, मेरी भावना मुझे लड़की होने का एहसास कराती थी. जब मैं 5 साल की थी, तभी से मुझे लड़कियों की तरह रहना पसंद था, लड़कों की तरह नहीं. पापा मार्केट से मेरे लिए लड़कों वाली कोई ड्रेस ले कर आते तो मैं लड़कियों की डे्रस पहनने की जिद करती थी. मैं लड़कियों के कपड़े पहनना पसंद करती थी. कभी मां या बड़ी बहनें मुझे फ्रौक पहना देती थीं तो उन को उस फ्रौक को उतारना मुश्किल हो जाता था, मैं उन से बच के घर से बाहर भाग जाती थी.

तब शायद मुझे इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि मेरी यह इच्छा आगे चल कर मजाक का सबब भी बनेगी. जैसेजैसे मेरी उम्र बढ़ती गई, मेरे अंदर की जो लड़की थी, उस की इच्छाएं भी जवान होती गईं. जब मैं 14 साल की थी तो किशोरावस्था में कदम रखते ही मेरे चेहरे पर हलकेहलके बाल आने लगे. चेहरे पर ये बाल मुझे किसी अभिशाप की तरह लगने लगे थे. आईने में चेहरा देखती तो बहुत गुस्सा आता था. मेरे पड़ोस में ही मेरे एक भाई जैसे रहते थे. मैं ने उन से इन बालों को हटाने के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हेयर रिमूवर क्रीम लगाओ. तब से मैं ने चेहरे पर हेयर रिमूवर क्रीम लगानी शुरू कर दी. मैं खुद ही हमेशा से एक लड़की की तरह दिखना चाहती थी.

उम्र का बहुत ही मुश्किल दौर था, जहां एक तरफ मेरी उम्र के लड़के लड़कियों की ओर आकर्षित होते थे, वहीं मैं लड़कियों के बजाय लड़कों की तरफ आकर्षित होती थी. समझ नहीं आता था कि ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा है, पर मैं ने अपनी भावनाओं को किसी को नहीं बताया. वह इसलिए कि मुझे पता था कि लोग मेरा मजाक बनाएंगे. मुझे बहुत अकेलापन महसूस होता था. एक अजीब सी घुटन होती थी. लड़कों से दोस्ती करने का मन होता था. मैं चाहती थी कि स्कूल में लड़कियों के साथ बैठ कर ही लड़कों को निहारूं, उन से बातें करूं, पर कुछ कह पाने की हिम्मत नहीं होती थी. कुछ कहती भी तो मेरी भावनाओं को समझने के बजाय मेरे ऊपर हंसते.

स्कूल में मिला नया साथी जब मैं सातवीं क्लास में थी, तभी मेरी दोस्ती योगेश भारती नाम के सहपाठी से हुई. प्यार से लोग उसे बिरजू भी कहते थे. जब बिरजू एडमीशन के बाद क्लास में आने लगा तो उसे देख कर लगा कि बिरजू और मेरी भावनाएं एक जैसी ही हैं. वह भी बिलकुल लड़की जैसा था. हम दोनों घंटों तक अकेले बातें करते, एक साथ स्कूल आते, एक साथ लंच करते. मानो जैसे हमें हमारी खुद की दुनिया मिल गई थी. हम दोनों बहुत खुश रहते थे. इसे ले कर हमारे सहपाठी हमारा मजाक भी बनाते थे. लेकिन जैसे हम दोनों को इस की परवाह ही नहीं थी.

मैं और बिरजू नौंवी क्लास तक साथ पढ़े. उस के बाद मेरा स्कूल बदल गया. मेरा दूसरे स्कूल में एडमीशन हो गया. जिंदगी फिर वैसी हो गई. नए स्कूल के माहौल में खुद को एडजस्ट कर पाना मुश्किल लगता था. इंटरमीडिएट तक मैं ने अपना स्कूली जीवन व्यतीत किया. फिर मैं ने बरेली कालेज में बीए में एडमीशन ले लिया. कालेज में आई तो लड़कियां मुझे प्रपोज करने लगीं, कई ने तो मुझे प्रेम पत्र भी दिए. मैं ने सब को यही कह कर टाल दिया कि हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं. और उन को क्या बोलती. यह तो कह नहीं सकती थी कि मैं अंदर से एक लड़की हूं.

वैसे भी जिस लड़के को मैं पसंद करती थी, उस से अब तक अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाई, करती भी तो वह शायद मेरे ऊपर हंसता, पूरी क्लास को  बताता, सब मेरे ऊपर हंसते. मैं कभी खुद से खुद को मिला नहीं पा रही थी. मेरे दिमाग में हर पल यही बात घूमती रहती थी कि मैं लड़का क्यों हूं. भगवान ने मुझे इतनी बड़ी सजा क्यों दी. इसी घुटन के साथ मैं कब जवान हो गई, पता ही नहीं चला. फिर मेरी मुलाकात समाज में कुछ ऐसे लड़कों से हुई जो बिलकुल मेरे जैसी भावना रखने वाले थे. इस से लगने लगा कि चलो इस समाज में मैं ही अकेली ऐसी नहीं हूं, मेरे जैसे दुनिया में और लोग भी हैं.

जब और बड़ी हुई तो परिवार की जिम्मेदारियों का एहसास हुआ. मेरा परिवार बड़ा था. कमाने वालों में केवल मेरे पिता थे. मेरा बड़ा भाई बिलकुल गैरजिम्मेदार था. इसलिए मैं ने घरघर जा कर ट््यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. बस जिंदगी यूं ही कट रही थी. कंधों पर आई जिम्मेदारी अचानक 2002 में मेरे पिता की मृत्यु हो गई. पिता की मृत्यु होने के कारण मृतक आश्रित कोटे में नौकरी की बात आई तो मेरी मां ने मुझे नौकरी करने को कहा तो मैं ने घर का जिम्मेदार बेटा होने का फर्ज निभाया. 2003 में मुझे इज्जतनगर रेलवे की वर्कशाप में ही तकनीकी विभाग में नौकरी मिल गई. उस समय मैं बीए की पढ़ाई कर रही थी और कत्थक नृत्य का प्रशिक्षण ले रही थी.

मेरा सपना था कि मैं कत्थक नृत्य में एमए करूं और उस के बाद उसी में अपना करियर बनाऊं. लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था. मुझे रेलवे के कारखाने में नौकरी मिली, जहां मुझे एक आदमी की भांति ताकत का काम करना पड़ता था. बड़ेबड़े इंजनों के नट कसना होता था. पर शरीर इन सब को सहन नहीं कर पाता था. सब मजाक बनाते कि देखो कैसा नाजुक लड़का है. मैं उन को कैसे बताती कि मैं तन से न सही लेकिन मन से लड़की हूं, इसलिए शरीर भी वैसा ही ढल गया. मैं अकेले में बैठ कर खूब रोती थी कि मेरे साथ ये अन्याय क्यों हुआ. कभी मन करता कि मैं नौकरी छोड़ कर कहीं दूर भाग जाऊं, पर घर की जिम्मेदारी पर नजर डालती तो लगता पापा जो मेरे ऊपर जिम्मेदारी छोड़ गए हैं, उसे पूरा करना मेरा फर्ज है.

जैसेतैसे नौकरी करने लगी. पुरुषों से बात करने का मेरा मन नहीं होता था और स्त्रियों से मैं उतनी बात कर नहीं सकती थी क्योंकि उन की नजरों में भी तो मैं एक पुरुष ही थी. मेरे बड़े भाई का भी विवाह हो चुका था. नौकरी मिलने के बाद मैं ने बड़े भाई को रहने के लिए घर बनवा कर दिया. दोनों छोटी बहनों का विवाह किया. मेरे अंदर की जो लड़की थी, वह अंदर ही अंदर घुटती जा रही थी. समाज में मर्द बनने का नाटक करतेकरते मुझे खुद से चिढ़ सी होने लगी थी. वर्ष 2009 में बड़े भाई की अचानक मृत्यु हो गई. वह अपने पीछे पत्नी और 8 साल की बेटी छोड़ गए थे. उन दोनों की जिम्मेदारी भी मेरे कंधों पर आ गई. मेरे अंदर की लड़की पलपल अपनी खुशियों को मन में मार रही थी.

सोचती थी कि काश मेरा एक भाई और होता, जिस के ऊपर सारी जिम्मेदारियां डाल कर मैं कहीं अपनी दुनिया में भाग जाऊं, जहां खुल कर अपनी जिंदगी जी सकूं. अब मेरे अलावा घर में कोई लड़का नहीं था तो मां का, बहनों का और समाज का मुझ पर विवाह करने का दबाव बनाया जाने लगा. घर के लोगों को उम्मीद  थी कि मैं अपने वंश को आगे बढ़ाऊं. घर वालों ने कराया विवाह मेरे अंदर तब इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं खुल कर बता पाऊं कि मैं किसी लड़की के साथ विवाह कर के खुश नहीं रह पाऊंगी. न ही मैं विवाह कर के किसी लड़की की जिंदगी खराब करना चाहती थी. इसी बीच मेरा एक बौयफ्रैंड भी बना, पर समाज के डर से उस ने भी किसी लड़की से विवाह कर लिया.

2-3 सालों तक मैं अपने विवाह का मामला किसी तरह टालती रही. मैं अपने परिवार को अपने बारे में चाह कर भी बता नहीं पा रही थी. तब मैं ने सोचा कि मैं ने अपने परिवार के लिए जहां इतनी कुर्बानियां दी हैं, तो एक कुरबानी और दे देती हूं. शायद मेरा भी वंश बढ़ जाए और साथ ही साथ मैं अपने अंदर की लड़की को भी जीवित रख सकूंगी. परिवार और समाज को खुश करने के लिए मेरा भी सन 2012 में विवाह हो गया. मैं अंदर से रो रही थी और बाहर से खुश होने का नाटक कर रही थी. रत्ती भर खुशी नहीं थी मुझे अपने विवाह की. सुहागरात के समय भी मैं ने बहुत कोशिश की, लेकिन मुझे अपनी पत्नी के लिए कोई फीलिंग ही नहीं जगी. काली रात की तरह थी वह रात मेरे लिए, कुछ भी नहीं कर सकी.

हमारे संबंध नहीं बन सके. मैं समझ गई कि मैं किसी भी लड़की से संबंध नहीं बना सकती. जब तक मनमस्तिष्क में लड़की के लिए उत्तेजना या कामेच्छा पैदा नहीं होगी, कैसे कोई शारीरिक संबंध बना सकता है. मैं शारीरिक रूप से बिलकुल स्वस्थ थी. ऐसी कोई कमी नहीं थी, जिस से मैं अपने आप को नपुंसक समझती. क्योंकि जब मैं अपने पुरुष साथी के साथ शारीरिक संबंध बनाती तो मेरे शरीर के हर अंग में उत्तेजना होती थी. मैं उस रात बहुत रोई कि मैं ने यह क्या गलती कर दी, मेरी वजह से एक अंजान बेकसूर युवती की जिंदगी खराब हो गई थी. मेरी वजह से वह समाज की दिखावटी खुशियों की बलि चढ़ गई थी. मुझे खुद पर शर्म आने लगी.

तभी मैं ने फैसला किया कि मैं उस की जिंदगी में खुशियां लाऊंगी. क्योंकि उसे भी खुश रहने का, अपनी जिंदगी खुल कर जीने का हक था. कुछ महीने बीत जाने पर मैं ने धीरेधीरे उसे अपने बारे में बताना शुरू किया. हम अच्छे दोस्त बन गए. मैं ने उसे पूरी तरह से अपनी भावनाओं को खुल कर बताया. वह बहुत समझदार थी. मैं ने जब उसे बताया कि मैं अपने बारे में सब उस के परिवार को बताने जा रही हूं तो वह डर गई कि उस के परिवार को बहुत ठेस पहुंचेगी और गुस्से में आ कर उस के परिवार वाले उस पर पुलिस केस न कर दें. उस ने मुझे विश्वास दिलाया कि हम दोनों ऐसे ही पूरी जिंदगी काट लेंगे.

उसे भी समाज का डर सता रहा था कि लोग उस के परिवार के बारे में क्याक्या बातें करेंगे. लेकिन मुझे लगने लगा था कि मैं ने अब अगर अंदर से खुद को मजबूत नहीं किया तो उस की और मेरी जिंदगी घुटघुट कर कटेगी या तो वह आत्महत्या कर लेगी या मैं. मैं ने पत्नी के घर वालों को अपनी सच्चाई बताई तो पहले तो उन्हें बहुत गुस्सा आया, बाद में उन्हें यह जान कर सही लगा कि मैं ने उन से झूठ तो नहीं बोला, ईमानदारी से उन की बेटी की खुशियां चाहती हूं. 2014 में आपसी सहमति से मेरा पत्नी से तलाक हो गया. तलाक के पहले मेरी पत्नी के घर वालों ने मुझ से 8 लाख रुपए लिए, जिस से वे अपनी बेटी का विवाह कहीं और कर सकें. मैं ने वह रकम खुशीखुशी उन्हें दे दी, क्योंकि गलती तो मैं ने ही की थी, उस गलती के लिए यह बहुत छोटी रकम थी.

अब मैं फिर से आजाद थी, लेकिन इस के बाद तो मेरी जिंदगी और भी खराब हो गई. लोगों की नजरों में मेरी इमेज खराब हो गई थी. मेरी बहनों ने मुझ से बात करनी तक बंद कर दी. एक मेरी मां थी, जिन्होंने मुझे समझा. मैं ने सोचा कि अभी तक 32 साल मैं ने परिवार और समाज को खुश करने के लिए निकाल दिए, उस के बाद भी मुझे कुछ हासिल नहीं हुआ. बस फैसला कर लिया कि अब खुद के बारे में सोचना है. नौकरी से मैं ने लंबी छुट्टी ले ली. मैं पूरी तरह से लड़की बनना चाहती थी, लेकिन लड़की बनने से पहले मैं तीर्थस्थल गया में पिताजी का श्राद्ध करने गई. क्योंकि लड़की बनने के बाद मैं श्राद्ध कर नहीं सकती थी.

उस के बाद मैं ने इंटरनेट पर सर्च करना शुरू किया कि कोई डाक्टर मुझे लड़की का रूप दे सकता है कि नहीं. सर्च करने पर पता चला कि दिल्ली में बहुत से डाक्टर हैं, जो हारमोंस और सर्जरी के जरिए एक लड़के को लड़की जैसा शरीर दे देते हैं. औपरेशन के बाद बनी स्त्री काफी डाक्टरों के बारे में जानने के बाद मुझे दिल्ली में पीतमपुरा के एक हौस्पिटल में कार्यरत डा. नरेंद्र कौशिक सही लगे. मैं डा. कौशिक से मिली और पूरी बात बताई. उन्होंने मुझ से बात कर के जाना कि मैं इस इलाज के लिए किस हद तक तैयार हूं. मुझ से बात कर के जब वह संतुष्ट हुए, तब उन्होंने मेरा इलाज शुरू किया. यह सन 2016 की बात है. मैं ने हारमोंस की गोलियां और इंजेक्शन लेने शुरू कर दिए. लगभग 2 साल तक हारमोंस लेने के बाद मेरे शरीर में काफी बदलाव आ गए. इस पर दिसंबर 2017 में मेरी सैक्स चेंज की सर्जरी हुई.

डा. कौशिक के अलावा 2 और डाक्टर औपरेशन के समय मौजूद रहे. सर्जरी करने में लगभग 8 घंटे का समय लगा. इस पूरे इलाज का कुल खर्च करीब 7 लाख रुपए आया था. इलाज के बाद मैं पूरी तरह से लड़की बन गई थी. इस के बाद तो जैसे मेरी खुशियों को पंख लग गए. दूसरा जन्म हुआ था यह मेरा सोनिया पांडेय के रूप में. राजेश पांडेय नाम के लड़के की पहचान हटा कर मैं सोनिया पांडेय नाम की पहचान से जिंदगी जीने के लिए आगे बढ़ने को तैयार थी. बहुत खुश हूं जो खुद को पा लिया मैं ने. आत्मा और शरीर एक हो चुके थे मेरे. समय के साथसाथ समाज का नजरिया बदला और मुझे समाज से प्यार और इज्जत भी मिलने लगी है. नए मित्र बन गए हैं, जो हर कदम पर मेरे साथ खड़े हैं.

लोगों से मिल कर बताती हूं कि खुद को पहचानना सीखो. यह जिंदगी मिली है तो इसे खुल के जियो और जीने दो. अब एक नई जंग मेरा इंतजार कर रही थी. मैं खुद को पाने की लड़ाई में खुद से, परिवार से और समाज से तो लड़ चुकी थी, अब लड़ाई थी अपनी कानूनी पहचान पाने की क्योंकि मेरे आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर कार्ड और सर्विस रिकौर्ड में मेरा नाम राजेश पांडेय ही था. 2018 में मैं ने रेलवे के प्रशासनिक अधिकारियों को अपने जेंडर में परिवर्तन करने के लिए एप्लीकेशन दी तो उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि रेलवे में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिस के तहत रिकौर्ड में लिंग परिवर्तन कराया जा सके.

इस के बाद मैं ने पूर्वोत्तर रेलवे के गोरखपुर हैडक्वार्टर में 80 पेज की एक फाइल बना कर भेजी, जिस में उन्हें बताया गया कि भारत में कोई भी नागरिक स्वेच्छा से अपना लिंग चुनने के लिए स्वतंत्र है. मैं औफिस के चक्कर लगाती रही, क्योंकि मुझे जवाब चाहिए था रेलवे के अधिकारियों से. अगर रेलवे बोर्ड मेरे आवेदन को निरस्त कर देता तो मैं अपनी पहचान पाने के लिए हाईकोर्ट भी जाने को तैयार थी. बाद में इज्जतनगर के मुख्य कारखाना प्रबंधक एवं मुख्य कार्मिक अधिकारी ने मेरे मामले में दिलचस्पी ली. जिस में मेरे सीडब्ल्यूएम राजेश कुमार अवस्थी की मुख्य भूमिका रही.

तब कहीं जा कर सितंबर, 2019 में रेलवे ने मेरा मैडिकल कराया. मार्च 2020 में रिकौर्ड में मेरा नाम और लिंग बदल कर नाम सोनिया पांडेय कर दिया. अब मैं बहुत खुश हूं. मेरी अपनी आगे की जिंदगी में ईमानदारी और सम्मान से जीने की जंग जारी है. Short Story