Magic Mirror Scam.राजस्थान के जैसलमेर में ठग गिरोहों ने जादुई शीशे की बदौलत न जाने कितने लोगों से लाखों रुपए ठगे. लेकिन जब पुलिस ने ठगों को पकड़ कर वह जादुई शीशा बरामद किया तो पता चला कि वह एक साधारण शीशा था.

जैसलमेर के एसपी डा. राजीव पचार को मुबारक ने जो बताया था, वह काफी हैरान करने वाला था. उस ने उन्हें बताया था कि जैसलमेर में एक गिरोह करामाती जादुई शीशा बेचने के नाम पर लोगों को ठग रहा है. कई लोगों से उस ने लाखों रुपए ऐंठ भी लिए हैं.

डा. राजीव पचार को लगा कि और लोग ठगे जाएं, उस के पहले ही करामाती जादुई शीशा बेचने वालों को पकड़ना जरूरी है. उन्होंने तुरंत अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों की मीटिंग बुलाई और मुबारक द्वारा दी गई जानकारी के बारे में बताया तो अधिकारी भी हैरान रह गए.

करामाती जादुई शीशा का यह ठग गिरोह कई लोगों को लाखों की चपत लगा चुका था और अन्य तमाम लोगों को ठगने की फिराक में था. अधिकारियों ने इस तरह के ठगों के बारे में पहले से सुन रखा था. 5 साल पहले जयपुर पुलिस ने एक ऐसा ही गिरोह पकड़ा था, जिस ने लाखों की ठगी की थी.

लेकिन पुलिस उस समय गिरोह से वह शीशा बरामद नहीं कर पाई थी, जिस के नाम पर ठगी की गई थी. ठगों ने लोगों से पैसे ले कर उसे तोड़ दिया था, ताकि उन की पोल न खुले.

डा. राजीव पचार ने मीटिंग में जैसलमेर के इस ठग गिरोह को पकड़ने की रणनीति बना कर दिशानिर्देश दिए तो पुलिस अधिकारी इस ठग गिरोह को पकड़ने की तैयारी में लग गए. इस के लिए जिस पुलिस टीम का गठन किया गया था, उस में एसआई भवानी सिंह, एएसआई अर्जुन सिंह, कांस्टेबल प्रहलाद सिंह, भीम सिंह, कमाल खान, राजाराम, मुकेश बीरा और जुगल किशोर पालीवाल को शामिल किया गया था.

मुबारक ने बताया था कि करामाती जादुई शीशा के नाम पर ठगी करने वाले यूनियन चौराहे पर शाम को मिल सकते हैं. पुलिस टीम शाम को बिना वरदी के यूनियन चौराहे पर मुबारक के साथ पहुंच गई. थोड़ी देर बाद आरजे 15 यूए 1083 नंबर की गाड़ी आई तो मुबारक ने इशारा कर दिया. इस के बाद पुलिस टीम ने गाड़ी को घेर कर उस में बैठे लोगों को पकड़ लिया.

पकड़े गए लोगों के नाम थे, शेख जादर अली, ओरुबाग, कंवराज, हरीसिंह. इन में जादर अली और ओरुबाग पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे, जबकि कंवराज सिंह और हरिसिंह जैसलमेर के ही रहने वाले थे. इन के एक साथी नैनाराम को सांकड़ा गांव से गिरफ्तार किया गया. लेकिन इस गिरोह का सरगना प्रयाग सिंह फरार होने में कामयाब हो गया था.

पांचों आरोपियों को पुलिस टीम थाने ले आई. थाने में की गई पूछताछ में इन ठगों ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार, उन की ठगी करने की कहानी कुछ इस तरह थी.

राजस्थान के जिला जोधपुर का रहने वाला मुबारक वर्षों से उड़ीसा में रह रहा था. वहां उस की वर्कशौप थी, जहां जैसलमेर की तहसील पोकरण का रहने वाला प्रयाग सिंह का खूब आनाजाना था. वह वहां ट्रैक्टर चलाता था. दोनों ही राजस्थान के रहने वाले थे, इसलिए परदेश में रह कर दोनों में दोस्ती हो गई थी. वक्त जरूरत दोनों एकदूसरे के काम भी आते रहते थे.

प्रयाग सिंह रहता जरूर उड़ीसा में था, लेकिन उस का राजस्थान स्थित घर भी आनाजाना होता रहता था. इस बीच वह गांव आया तो उसे पता चला कि गांव के एक आदमी ने करामाती जादुई शीशा की बदौलत करोड़ों रुपए कमाए हैं. उसे और उस के साथियों को जयपुर पुलिस ने भले ही पकड़ लिया है, लेकिन उस कमाई के पैसे से घर वाले मौज कर रहे हैं.

पुलिस सूत्रों के अनुसार, उन्होंने उस करामाती जादुई शीशे का करोड़ों में सौदा कर के उसे तोड़ दिया था, लेकिन उन्होंने करोड़ों रुपए कमा लिए थे.

यह सुन कर प्रयाग सिंह के भी मन में आया कि वह भी उसी तरह ठगी कर के करोड़ों रुपए कमाएगा. वह उड़ीसा से पश्चिम बंगाल गया और वहां संजय से मिला. संजय इस तरह का काम पहले भी कर चुका था. उस ने उसे सलाह दी कि पहले वह करामाती जादुई शीशे की अफवाह फैला कर शिकार फंसाए, उस के बाद आगे क्या करना है, वह बताएगा.

प्रयाग सिंह शिकार फंसाने की योजना बनाने लगा. वहां से लौट कर वह मुबारक के वर्कशौप पहुंचा तो उस से बोला, ‘‘मुबारकभाई, मुझे एक ऐसा जादुई शीशा मिला है, जिस से जमीन में गड़ा धन देखा जा सकता है. यही नहीं, अगर उस के सामने कोई आदमी 14 फुट की दूरी पर खड़ा हो जाए तो वह निर्वस्त्र दिखाई देता है और अगर 9 फुट की दूरी पर खड़ा होता है तो कंकाल जैसा नजर आता है. 9 फुट से कम दूरी पर उस में कुछ नहीं दिखाईर् देता. उस की कीमत करीब 5 लाख रुपए है. यह ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1818 में बनाया गया था. अगर कोई उसे लेना चाहे तो बताना, मैं आप को भी खुश कर दूंगा.’’

इस तरह के करामाती जादुई शीशे के बारे में सुन कर मुबारक हैरान रह गया. उस ने कहा, ‘‘प्रयागभाई, जरूर बताऊंगा. लेकिन उस शीशे को आप ने देखा है?’’

‘‘हां, मैं ने वह शीशा देखा है. वह पश्चिम बंगाल में संजय के पास है. चाहो तो मैं चल कर आप को भी दिखा सकता हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, मैं कुछ ऐसे लोगों से बात करता हूं, जो उसे ले सकते हैं.’’ मुबारक ने कहा.

बस, उसी दिन से मुबारक पर करामाती जादुई शीशे का ऐसा नशा चढ़ा कि वह हर किसी से उस शीशे के बारे में बात करने लगा. उस ने जब अपने दोस्त हीरजी चौधरी को उस करामाती जादुई शीशे के बारे में बता कर कहा कि करोड़ों रुपए की कीमत का वह शीशा अगर कोई अपना आदमी खरीदता है तो वह उसे 50 लाख रुपए में दिला देगा.

इस पर हीरजी ने कहा, ‘‘मुबारकभाई, अगर वह करामाती जादुई शीशा आदमी को नंगा, उस का कंकाल और जमीन में गड़ा धन दिखा सकता है तो उसे तुम खुद क्यों नहीं खरीद लेते. कहा जाता है कि राजस्थान की हवेलियों, खेतों में बहुत धन गड़ा है. अगर वह शीशा तुम खरीद लोगे तो बहुत धन पा सकते हो.’’

मुबारक को हीरजी की बात में दम नजर आया. उस ने गांव में सुना था कि चोरडाकुओं से बचाने के लिए पूर्वजों ने कितना ही सोनाचांदी जमीन में गाड़ रखा है. जिस का अब पता नहीं चल रहा है. उसे लगा कि अगर वह करामाती जादुई शीशा वह खुद ही खरीद लेता है तो उस की बदौलत ढेरों धन पा सकता है.

यह सोचते समय वह यह भूल गया कि अगर सचमुच में इस तरह का कोई शीशा होता तो बेचने वाला खुद ही क्यों न उस की बदौलत सारा गड़ा धन निकाल लेता. उस ने तय कर लिया कि अब वह शीशा खुद ही खरीद लेगा. उस की बदौलत गड़ा धन निकाल कर करोड़पति बन जाएगा.

मन में लालच आया तो वह प्रयाग सिंह से मिला. उस से उस ने वह शीशा खुद ही खरीदने की बात की तो प्रयाग सिंह की आंखों में चमक आ गई. उस ने कहा, ‘‘शीशे के लिए बंगाल चलना होगा. चलते समय 10-15 लाख रुपए ले लेना, जिस से एडवांस दे कर शीशे का सौदा किया जा सके.’’

मुबारक झांसे में आ गया और 15 लाख रुपए ले कर प्रयाग सिंह के साथ बंगाल चला गया. दोनों वहां हावड़ा में उतर कर डीसीपुर पहुंचे, जहां एक होटल में रुके. वहां प्रयाग सिंह ने मुबारक की मुलाकात संजय से कराई तो बातचीत के बाद शीशे का सौदा 40 लाख रुपए में हो गया. मुबारक ने 10 लाख रुपए एडवांस भी दे दिए.

रुपए मिलने के बाद संजय ने कहा, ‘‘आप लोग जोधपुर पहुंचिए, शीशा वहीं मिल जाएगा. मैं अपने लोगों से शीशा वहीं भिजवा दूंगा. बाकी रकम वहीं दे कर आप शीशा ले लेना.’’

प्रयाग सिंह ने मुबारक की संजय से  मुलाकात जुलाई, 2015 में कराई थी. जब काफी दिन बीत गए और मुबारक को शीशा नहीं मिला तो उस ने प्रयाग सिंह से बात की. वह आजकल करता रहा. इसी तरह 3-4 महीने और बीत गए. जब शीशा नहीं मिला तो मुबारक ने कहा, ‘‘भाई प्रयाग सिंह, अगर आप शीशा नहीं दिला सकते तो मेरे पैसे ही वापस करवा दो.’’

प्रयाग सिंह ने थोड़ी मोहलत मांगी और संजय से बात की. इस के बाद संजय ने उसे जो समझाया, उसी हिसाब से काम करने के लिए उस ने नैनाराम, कंवराज सिंह और हरिसिंह को अपने साथ मिला कर अपना गिरोह बना लिया. संजय ने अपने 2 सहयोगियों जादर अली और ओरुबाग के साथ नवंबर, 2015 में एक शीशा भिजवा कर प्रयाग सिंह को अच्छी तरह समझा दिया कि इस करामाती जादुई शीशे से किस तरह लोगों को उल्लू बनाना है.

प्रयाग सिंह की टीम में कुल 6 लोग थे. उन्होंने शीशे को एक ऐसे कमरे में रखा, जिस की लंबाईचौड़ाई 10 फुट थी. जिस व्यक्ति को शीशा दिखाना होता था, उसे वे कमरे के अंदर खड़ा कर देते थे. कमरे के अंदर रखे शीशे के ऊपर पड़े कपड़े को हटा कर कमरे के बाहर गेट के पास एक आदमी को निर्वस्त्र खड़ा कर देते थे, जो अंदर खड़े आदमी को निर्वस्त्र दिखाई देता था. शीशे का खरीदार समझता था कि शीशे में जो निर्वस्त्र आदमी दिख रहा है, वह वही है, जबकि वह आदमी ठगों की गैंग का होता था. शीशा के एक कोने में ईस्ट इंडिया कंपनी का स्टिकर इस तरह लगा था, जैसे मोहर लगी हो.

खरीदार शीशा में खुद को निर्वस्त्र देख कर शर्म के मारे सामने से हट जाता था. उसे यही लगता कि शीशा में उसी की निर्वस्त्र आकृति दिखाई दे रही थी. ठगों के लिए यही फायदे की चीज होती थी.

9 फुट से कंकाल दिखाई देने का जो दावा ये लोग करते थे, इस के लिए इन का एक साथी कमरे की दुछत्ती पर कंकाल को तार से बांध कर बैठा रहता था. आदमी के 9 फुट की दूरी पर आते ही वह आदमी कंकाल को नीचे लटका देता था. आदमी जैसे ही कंकाल देखता था, शीशे को घुमा दिया जाता और ऊपर बैठा आदमी कंकाल खींच लेता था.

इसी तरह इन लोगों ने शीशा दिखा कर न जाने कितने लोगों को ठगा. इन के लिए फायदे की बात यह थी कि उन में से कोई पुलिस में शिकायत करने नहीं गया. अच्छी बात यह थी कि इन लोगों ने मुबारक को शीशा नहीं दिखाया था. उस से कहा गया था कि संजय ने जिन लोगों के साथ शीशा भेजा था, पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया है. अब दूसरा शीशा आने में समय लगेगा.

मुबारक जब काफी परेशान हो गया तो उस ने कहा, ‘‘मुझे अब शीशा नहीं चाहिए. मेरे 10 लाख रुपए वापस कर दो.’’

‘‘आप ने जो 10 लाख रुपए दिए थे,उसे तो संजय ने रख लिए हैं. मेरे पास तुम्हारे रुपए नहीं है, इसलिए तुम मुझ से रुपए नहीं मांग सकते. संजय से मेरी सिर्फ फोन पर बात होती है, बाकी उस के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है. जैसे ही संजय से बात होगी, मैं उस से तुम्हारे पैसों के लिए कह दूंगा.’’ प्रयाग सिंह ने कहा.

प्रयाग सिंह की इन बातों से मुबारक को लगा कि वह ठगा जा चुका है. उस ने इस बारे में अपने दोस्तों से बात की तो उन्होंने कहा कि वह ठगा गया है. ऐसा कोई करामाती शीशा उन्होंने आज तक न देखा है और न इस बारे में सुना है. उसे पुलिस के पास जा कर शिकायत करनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आए.

मुबारक को कहीं से पता चला था कि प्रयाग सिंह के पास शीशा तो है, लेकिन वह उसे देना नहीं चाहता. वह अन्य लोगों को वह शीशा दिखा कर लाखों रुपए की ठगी कर रहा है. आखिर मुबारक जैसलमेर के एसपी डा. राजीव पचार के पास जा पहुंचा और अपने साथ हुई ठगी के बारे में सब कुछ बता दिया.

29 जनवरी, 2016 को मुबारक की तहरीर पर थाना कोतवाली जैसलमेर में अपराध संख्या 43/2016 पर भादंसं की धारा 420, 406 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज कर के पकड़े गए सभी लोगों को कानूनी रूप से गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इन का सरगना प्रयाग सिंह फरार हो गया था, जो कथा लिखे जाने तक पकड़ा नहीं जा सका था.

पुलिस उस की तलाश में लगी थी. गिरफ्तार हुए पांचों ठगों को पुलिस ने अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया. पुलिस ने ठगों से वह शीशा बरामद कर लिया था, जिस पर सन 1818 का ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रतीक चिह्न बना था. पुलिस ने यह शीशा पहली बार बरामद किया था, जबकि इस के पहले कभी शीशा बरामद नहीं किया जा सका था. कथा लिखे जाने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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