ATM Guard Inspiring Story. देहरादून शहर के पटेलनगर के भीड़भाड़ वाले इलाके में स्थित एक बैंक के एटीएम सेंटर में पूरे दिन चहलपहल रहती थी. बाहर कुरसी पर बैठा सुरक्षा गार्ड बृजेंद्र आनेजाने वालों पर पैनी नजर रखता था. वह एटीएम में प्रवेश करने वाले लोगों को ध्यान से देखता था. कोई मोबाइल पर बात करते हुए अंदर जाता तो कोई जल्दबाजी में कार पार्क कर के पैसे निकाल कर तुरंत आगे बढ़ जाता.

बाहर बैठा सुरक्षा गार्ड बृजेंद्र सिंह यह सब ध्यान से देखता था और शाम 6 बजे एटीएम बंद होने के बाद उस का असली काम शुरू होता था. ठीक 6 बजे बैंक बंद होता और धीरेधीरे देहरादून की सड़कों पर अंधेरा फैलने लगता. तब बृजेंद्र सिंह फुटपाथ पर बैठ जाते. थोड़ी ही देर में आसपास की झुग्गीबस्तियों से छोटेछोटे बच्चे दौड़ते हुए उन के पास आ जाते.

किसी बच्चे के हाथ में पुरानी नोटबुक होती तो किसी के कंधे पर फटा हुआ थैला. कुछ बच्चों ने चप्पल तक नहीं पहनी होती. कई बच्चे कचरा बीन कर आते और कुछ होटल में बरतन धो कर आते. इतनी कठिन मेहनत के बावजूद उन के चेहरों पर थकान या उदासी नहीं, बल्कि अलग ही उत्साह दिखाई देता.

दरअसल, बृजेंद्र सिंह पहले भारतीय सेना में सूबेदार के पद पर सेवा दे चुके थे. सेना में रहने के कारण अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और देशप्रेम उन की रगरग में बसा था. लेकिन मजबूत शरीर वाला यह सैनिक एक संवेदनशील हृदय भी रखता था.

साल 2001 में जब वह सेना के जवान के रूप में अमृतसर में तैनात थे, तब स्वर्ण मंदिर के बाहर से गुजरते हुए उन्होंने देखा कि कुछ गरीब बच्चे कचरे में से प्लास्टिक और लोहे के टुकड़े बीन रहे थे. एक बच्चा बहुत गंदा था, दूसरे के पैरों में चप्पल नहीं थी, तीसरे की कमीज फटी हुई थी और एक छोटी बच्ची बदबू मारते कचरे के ढेर के पास बैठ कर रो रही थी.

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