Camel Festival: खेतीबाड़ी और ऐसे ही और कामों के लिए आई आधुनिक मशीनों ने भले ही ऊंटों के महत्त्व को कम कर दिया हो, पर राजस्थान में ऊंट आज भी महत्त्वपूर्ण है. उस की महत्ता को बनाए रखने के लिए ही यहां हर साल कई ऊंट प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं.

गुलाबी नगरी जयपुर और मरुभूमि बीकानेर का अपना अलगअलग महत्त्व है. ऐतिहासिक नजरिए से दोनों नगर गरिमामय हैं, जयपुर की अपनी अलग खूबसूरती है और रेत के धोरों से घिरे बीकानेर की अलग. बीकानेर मेरे लिए कोई नया नहीं था, पहले भी गया था मैं वहां. लेकिन इस बार ऊंट महोत्सव देखने का रोमांच कुछ अलग ही था. इस रोमांच के लिए ठंडी के मौसम में 335 किलोमीटर का थका देने वाला उबाऊ सफर भी मुझे रोकने में असमर्थ रहा. आखिर मैं ठंड या थकान की चिंता किए बिना बीकानेर पहुंच ही गया. बीकानेर का अपना गौरवशाली इतिहास है.

किसी जमाने में यहां राजेरजवाड़ों की तूती बोलती थी. लेकिन अब उन की यादें और उन के द्वारा स्थापित महलोंचौबारों के अवशेष ही नजर आते हैं, जिन्हें यह नगर किसी धरोहर की तरह अपने आंचल में समेटे है. इस से हट कर बात करें तो आज बीकानेरी भुजिया और रसगुल्ले दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं. खैर, मेरा मकसद केवल 2 दिनों का ऊंट महोत्सव देखना था, जिसे देखने के लिए दुनिया भर के सैलानी आते हैं. ऊंट को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है. देश में ऊंटों की संख्या भले ही घट रही हो, पर राजस्थान खासकर राजस्थान का वह भूभाग जहां रेत ही रेत है, ऊंट के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल लगता है. इसीलिए राजस्थान सरकार ने ऊंट को स्टेट एनिमल घोषित किया है.

आमतौर पर देखें तो ऊंट सवारी करने, खेती में काम आने वाला प्राणी अथवा सामान ढोने वाला जानवर है, लेकिन बीकानेर के पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन ने अन्य सालों की तरह इस बार 9 और 10 जनवरी को ऊंट महोत्सव का आयोजन इसलिए किया, ताकि लोग यह देख सकें कि ऊंट के कितने रंग हैं, उस में कितनी कलाएं हैं. यही सब देखने के लिए मैं बीकानेर गया था. ऊंट महोत्सव के पहले दिन यानी 9 जनवरी को जूनागढ़ किले से सादुल क्लब तक सजेधजे ऊंटों की शोभायात्रा निकाली गई. यह कोई सामान्य यात्रा नहीं थी. सजेधजे ऊंटों पर रोबीली मूंछों और रंगबिरंगी पगड़ी वाले लोेग राजस्थानी योद्धाओं की तरह नंगी तलवार लिए बैठे थे तो उन के आगे नाचतेगाते चल रहे कलाकारों और उन से भी आगे सिर पर कलश ले कर चल रही बालिकाओं ने अलग ही रंग जमा रखा था.

यह शोभायात्रा जूनागढ़ से शुरू हो कर कचहरी रोड, अभिलेखागार, वीर दुर्गादास सर्किल होते हुए सादुल क्लब पहुंची. सादुल क्लब के मैदान में आयोजित महोत्सव में ढोल की थाप पर ऊंटों ने नृत्य करने जैसे हैरतंगेज करतब दिखाए, जिन्हें देख कर देशीविदेशी पर्यटक ही नहीं, स्थानीय लोग भी अचरज में पड़ गए. ग्रामीण और राजस्थानी संस्कृति से ओतप्रोत इस आयोजन ने सैलानियों का मन मोह लिया.

राजस्थान की अलगअलग जगहों से अपनेअपने ऊंटों के साथ आए लोगों ने अपने ऊंटों के करतब दिखाए. झुंझनू जिले के सावंतसरी गांव के रहने वाले धरमा उर्फ धर्मेंद्र अपने जिगरी दोस्त हंसराज के साथ मैदान में उतरे. हंसराज उन के 16 वर्षीय ऊंट का नाम है, जो पिछले 8 सालों से उन के साथ है. इन दोनों के प्यार को देखते हुए लोगों ने इन्हें धरमेला (धर्मभाई) नाम दे दिया है, हंसराज कभी दोनों पैरों को उठा कर लोगों से सैल्यूट करता तो कभी ठुमके लगा कर नाचता. हंसराज ने चारपाई पर चढ़ कर करतब दिखाए तो दर्शक हैरान रह गए.

हंसराज कभी अपने मालिक धरमा की छाती पर पैर टिकाता और हलके से छू कर पैर उठा लेता तो कभी आगे के पैर उन के सिर पर रख कर आशीर्वाद देता. ऊंट महोत्सव देखने आए लोगों की सांसें तब थम गईं, जब हंसराज ने अचानक धरमा की गरदन अपने जबड़ों में फंसा ली. एक तरफ धरमा की पूरी गरदन ऊंट के जबड़ों में और दूसरी ओर साफा बांधे धरमा का सिर और कनपटी से गाल तक नसें खिंचा हुआ तमतमाया चेहरा. ऊंट के दांतों का हल्का सा दबाव भी बढ़ जाता तो धरमा की जिंदगी का काम तमाम होना तय था.

एकबारगी सब कुछ ठहर सा गया. लोग खड़े हो गए. लगा, अनहोनी न हो जाए. अचानक ढोल बजा और हंसराज अपने मालिक की गरदन छोड़ कर ठुमकने लगा. धरमा ने ठहाका लगाया तो हंसराज ने भी थुथला कर अपने मुंह से झाग छोड़े मानो वह भी मालिक से ऐसी अठखेली कर खिलखिला रहा हो. इंसान व जानवर के अद्भुत रिश्ते की कई कहानियां ऊंट महोत्सव में जीवंत होती नजर आईं. ये कहानियां ऊंटों को सजानेसंवारने और बाल कतरने में दिखाई कलात्मकता से भी झलक रही थीं. अपने मनमोहक नृत्य के साथ झुक कर अभिवादन करते हुए ऊंट मानो अपने व्यवहार से इंसान को रिश्तों की अहमियत और अपनत्व का पाठ पढ़ा रहे थे.

इस से पहले सादुल क्लब मैदान में ढोल की थाप और शंख ध्वनि के बीच जिला कलेक्टर पूनम, जनरल औफिसर कमांडिंग मेजर के.के. शर्मा, स्टेट बैंक औफ बीकानेर ऐंड जयपुर के मुख्य महाप्रबंधक वेंकटरमन एस. आदि ने सफेद कबूतर और रंगबिरंगे गुब्बारे छोड़ कर ऊंट महोत्सव का शुभारंभ किया. जिला कलेक्टर पूनम ने ऐतिहासिक किले जूनागढ़ से शोभायात्रा को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया. इस शोभायात्रा में राजस्थान के पारंपरिक वाद्ययंत्रों, कालबेलिया, गैर और गरबा जैसे लोकनृत्यों ने बहुरंगी संस्कृति को साकार कर देशीविदेशी पर्यटकों का मन मोह लिया.

ऊंट महोत्सव में पहली बार निकली मोटरसाइकिल रैली बीकानेर अरबन लूप-2016 भी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र रही. राजस्थान रौयल्स मोटर साइकिलिंग क्लब व पर्यटन विभाग के साझा तत्वावधान में शोभायात्रा से पहले जूनागढ़ से निकले ये बाइकर्स बीकानेर शहर के विभिन्न इलाकों से होते हुए सादुल क्लब मैदान पहुंचे. रैली में हार्ले डेविडसन के विभिन्न मौडल के साथ 37 बाइकर्स ने भागीदारी की. इन में जयपुर से बेनली बाइक पर आए इंजीनियर मुदित अस्थाना, हार्ले 48 पर आए प्रतीक और उन की पत्नी डा. कृति भी शामिल थीं.

पहले दिन ऊंट नृत्य, साजसज्जा सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया. राजस्थान में ऊंटों को सजाने की पुरानी परंपरा है. माना जाता है कि जिस की ऊंटनी जितनी सजीधजी हसीना जैसी होगी, उस का मालिक उतना ही धनवान होगा. बीकानेर के ऊंट महोत्सव, पुष्कर मेला, बाड़मेर व जैसलमेर में होने वाले ऊंटों के उत्सव में ऊंट ऊंटनियों को सजानेसंवारने और उन के डांस की काफी डिमांड रहती है. राजस्थान में कई जगह ऊंटों को सजानेसंवारने वाले हैं, वे अपनी दुकान को ऊंटनी का ब्यूटीपार्लर कहते हैं.

इन पार्लरों में ऊंट और ऊंटनियों का शृंगार किया जाता है. सब से पहले ऊंट के गले का शृंगार होता है, इस में गोरबंद का इस्तेमाल किया जाता है. गले में ही चांदी और जरी की कसीदाकारी पट्टियां भी लगाई जाती हैं. पैरों में नेवरी बांधी जाती है. घुंघरू पहनाए जाते हैं. ऊंट की पीठ पर भी शृंगार किया जाता है. पहले काठी पहनाई जाती है. इस में 2 लोगों के बैठने की जगह होती है. इस के नीचे गद्दियां और ऊपर छेवटी रखी जाती है. काठी के सब से ऊपर गादी रखी जाती है, जो बैठने वालों के लिए आरामदेह होती है. ऊंट को गले के दोनों ओर पांवों तक लुंबाझुंबा पहनाया जाता है. यह रंगबिरंगा होता है. इस के बाद मुंह, कान व नाक को ढकते हुए चांदी का कसीदा किया हुआ मोहरा पहनाया जाता है.

इस मौके पर हुई प्रतियोगिता में मिस्टर बीकाणा का खिताब भंवरलाल ओझा के नाम रहा, जबकि रविंद्र जोशी दूसरे और नवीन बिस्सा तीसरे स्थान पर रहे. मिस मरवण का खिताब हेमा कंवर राठौड़ और निशा सांखला के नाम रहा. सुमन चौधरी दूसरे और शिखा राजपुरोहित तीसरे स्थान पर रहीं. मिस मरवण के लिए पहुंची युवतियों ने कैटवाक भी किया. फर कटिंग में ऊंटपालकों ने ऊंटों के शरीर पर विभिन्न आकृतियां उकेरीं. कैमल फर कटिंग प्रतियोगिता में रामलाल (अक्कासर) प्रथम, जापान की मैगोमी टाकेड़ची द्वितीय और स्वरूपदेवर के गोविंदराम तीसरे स्थान पर रहे. ऊंट साजसज्जा प्रतियोगिता में ऊंटों का दुलहन की तरह साजशृंगार किया गया.

ऊंट शृंगार प्रतियोगिता में स्वरूपदेसर के लक्ष्मणराम सियाग प्रथम, इमरान खां द्वितीय और अख्तर अली तीसरे स्थान पर रहे. महोत्सव के तहत विदेशियों और स्थानीय महिलाओं और पुरुषों की खोखो प्रतियोगिता, मटका दौड़ और रस्साकसी प्रतियोगिताएं भी हुईं. ग्रामीणों ने कुश्ती में भी अपने दांवपेच दिखाए. विदेशी पर्यटकों के लिए साफा बांधने की प्रतियोगिता भी हुई. कबड्डी का मैच भी खेला गया. रौबीले मूंछों का प्रदर्शन भी किया गया. शाम को सजी नाचगाने की महफिल में लोक कलाकारों ने समां बांध दिया. ऊंट महोत्सव का दूसरा दिन भी यादगार रहा. सादुल क्लब मैदान में दिन भर कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताएं होती रहीं. देशीविदेशी सैलानियों की जोरआजमाइश देख कर पूरा मैदान जोर लगा कर हइशा… के उद्घोष से गूंज उठा. पुरुषों व महिलाओं की खोखो प्रतियोगिता से दूसरे दिन की शुरुआत हुई.

कुश्ती में पहलवानों ने दांव दिखाए. रस्साकसी, कबड्डी, साफा बांधने की प्रतियोगिता, ऊंट नृत्य, महिलाओं की मटका दौड़, म्यूजिकल चेयर आदि की प्रतियोगिताएं भी हुईं. साफा बांधने की प्रतियोगिता में स्पेन की लुइस रुबियो ने प्रथम स्थान हासिल किया, जबकि आस्ट्रेलिया की सैंडी बोले दूसरे व स्पेन की सुमाना तीसरे स्थान पर रहीं. महिला रस्साकसी प्रतियोगिता में विदेशी महिलाओं ने बाजी मारी.

विदेशी महिला टीम में कनाडा की मोनिका, फ्रांस की जोइले, रशिया की ओल्गा, आस्ट्रेलिया की डा बोलेश और अमेरिका की डी हर्ले शामिल थीं. पुरुष रस्साकसी में स्थानीय लोगों ने जीत दर्ज की. टीम में सहीराम, प्रदीप कुमार, मेहरचंद, रामप्रताप सिंह, प्रेमनाथ, जुगल किशोर व रामप्रताप शामिल थे. ऊंट नृत्य में झुंझनूं जिले के सांवतसरी गांव के धरमा प्रथम रहे. जबकि झुंझनूं के ही नेकीराम व रामअवतार दूसरे तथा तीसरे स्थान पर रहे. समापन पर धधकते अंगारों पर जसनाथी संप्रदाय की ओर से प्रस्तुत अग्नि नृत्य ने लोगों को रोमांचित कर दिया. सतगुरु सिंवरो मोवणा, जिन गुरु संवार उपाया…पारंपरिक जसनाथजी की स्तुति के साथ जसनाथ संप्रदाय के लोगों ने धधकते अंगारों पर नृत्य किया तो पूरा मैदान तालियों से गूंज उठा.

जसनाथजी महाराज की स्तुति व वंदना के अग्नि नृत्य को मालासर के महंत रूपनाथ सिद्ध एंड पार्टी ने पेश किया. इस में 4 क्विंटल खेजड़ी की लकड़ी के अंगारों पर जगदीशनाथ, पुरखनाथ, मेघनाथ, तपसीनाथ, किशननाथ, ऊदनाथ व गौरीशंकर ने नृत्य किया. इन्होंने अंगारों को मुंह में रखा और नंगे पैरों से फूलों की तरह उठाया. नगाड़े की थाप के साथ इन नर्तकों की गति भी बढ़ती गई. नगाड़ा वादन मानाराम कर रहे थे. सैलानियों की दिन भर की थकावट शाम को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों से दूर हुई. इस में देश के विभिन्न इलाकों से आए लोक कलाकारों ने एक से बढ़ कर एक शानदार प्रस्तुतियां दीं.

सांस्कृतिक कार्यक्रम में बीकानेर की तरुणा शेखावत एंड पार्टी ने राजस्थानी लोकनृत्य, हरियाणा के कलाकारों ने हरियाणवी होली व बम लहरी लोकनृत्य, गुजरात के कलाकारों ने गरबा रास, चुरू की मनीषा शांडिल्य ने लोकगीत व उत्तराखंड के कलाकारों ने गढ़वाली लोकनृत्य प्रस्तुत किए. 2 दिनों के इस अंतरराष्ट्रीय महोत्सव से ऊंटों को बचाने का संदेश भी दिया गया. रेगिस्तानी जहाज ऊंट राजस्थान की शान रहा है. अब भले ही ऊंटों की तादाद दिन पर दिन घट रही है, लेकिन ऊंट आज भी गांवों में रोजीरोटी का जरिया है. राजस्थान में सन 1997 की पशुगणना में 6 लाख 68 हजार ऊंट थे, जो सन 2003 में घट कर 4 लाख 98 हजार रह गए. सन 2008 में इन की तादाद और भी घट कर 4 लाख 30 हजार 426 रह गई. सन 2012 में राज्य में केवल 3 लाख 25 हजार 713 ऊंट थे. Camel Festival

 

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