Suspense Story: धनदौलत, सुखसुविधाओं के अलावा औरत की और भी जरूरतें होती हैं. मर्चेंट नेवी में इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी विवाहिता सुष्मिता की उन्हीं जरूरतों को पूरी नहीं कर पा रहा था. इस का अंजाम इतना भयानक निकला कि…
9 दिसंबर, 2015 की सुबह के 6 बजे महाराष्ट्र के जिला रायगढ़ की तहसील पनवेल, नवी मुंबई के थाना मानसरोवर कामोठे के सीनियर इंसपेक्टर श्रीराम मल्लेमवार को किसी ने फोन द्वारा सूचना दी कि सेक्टर-19 की वेदांत दृष्टि सोसायटी की दूसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर 201 में एक हादसा हो गया है, जिस में 3 लोग मारे गए हैं. तीनों लाशें फ्लैट में पड़ी हैं. सूचना गंभीर थी. श्रीराम मल्लेमवार तत्काल अपने साथ सहायक पुलिस इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर, सबइंसपेक्टर जनार्दन पार्टे, हैडकांस्टेबल मोहन मुलीक, सुनील होलार, दिलीप मिनमिणे और रवि गर्जे को ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे.
सुबहसुबह सोसायटी में पुलिस देख कर सुरक्षागार्डों से ले कर वहां रहने वाले तक इस आशंका से घिर गए कि यहां ऐसा क्या हो गया कि पुलिस को आना पड़ा. देखते ही देखते पूरी सोसायटी के लोग इकट्ठा हो गए. पुलिस ने फ्लैट नंबर 201 के अंदर जाने से पहले उस में रहने वालों के बारे में पूछा तो पता चला कि उस में मर्चेंट नेवी में काम करने वाले इंजीनियर धु्रवकांत ठाकुर अपनी पत्नी सुष्मिता ठाकुर के साथ रहते थे. इसे उन्होंने एक साल पहले ही 10 हजार रुपए महीने के किराए पर लिया था.
धु्रवकांत नौकरी की वजह से अधिकतर बाहर ही रहते थे, इसलिए उन की पत्नी सुष्मिता ठाकुर यहां अकेली ही रहती थीं. साल भर में धु्रवकांत को एकदो बार ही देखा गया है. जबकि उन के एक दोस्त अजय सिंह को अकसर उन के यहां देखा गया है. करीब एक सप्ताह से वह सुष्मिता के साथ ही रह रहा था. कल रात ही धु्रवकांत अपने फ्लैट पर आए थे. सोसायटी के सुरक्षागार्डों से पूछताछ कर के श्रीराम मल्लेमवार ने यह जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और सहयोगियों के साथ फ्लैट नंबर 201 के सामने जा पहुंचे. फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था. दरवाजा तोड़ कर वह अंदर दाखिल हुए तो उन्हें जो सूचना दी गई थी, वह सच साबित हुई.
सामने के हाल में फर्श पर एक युवक की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस के शरीर से निकला खून फर्श पर फैला हुआ था. उस के शरीर और गले पर किसी तेजधार वाले चाकू के कई गहरे घाव थे. हाल के सामने वाले बैडरूम में एक युवा और खूबसूरत महिला की लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर किसी तरह का कोई घाव नहीं था. उस के नाकमुंह पर एक तकिया पड़ा था, इस का मतलब उस की हत्या उसी तकिए से मुंहनाक दबा कर की गई थी. उसी कमरे में एक कोने में एक युवक बेहोश पड़ा था, जिस के गले में एक टूटी हुई टाई बंधी थी, पास ही एक छोटा सा टेबल गिरा पड़ा था, टाई का आधा हिस्सा छत में लगे पंखे से बंधा था. इस से श्रीराम मल्लेमवार ने अंदाजा लगाया कि इस ने आत्महत्या की कोशिश की होगी. लेकिन टाई के टूट जाने की वजह से वह उस में सफल नहीं हुआ.
श्रीराम मल्लेमवार ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया. गार्डों और पड़ोसियों ने उस की शिनाख्त धु्रवकांत ठाकुर के रूप में की. मृतका सुष्मिता ठाकुर थी और मृतक उस का दोस्त अजय सिंह था. श्रीराम मल्लेमवार घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण कर रहे थे कि नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर प्रभात रंजन, एडीशनल पुलिस कमिश्नर विश्वास पाढरे, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर शेषराव सूर्यवंशी भी आ गए थे. अधिकारियों के साथ ही प्रैस फोटोग्राफर, डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो की टीम भी आई थी. इन लोगों का काम खत्म हो गया तो वरिष्ठ अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद वे इस मामले की जांच की जिम्मेदारी श्रीराम मल्लेमवार को सौंप कर चले गए.
श्रीराम मल्लेमवार ने सहायकों की मदद से घटनास्थल की औपचारिकताएं निभा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ग्रामीण अस्पताल भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति, 2 लोगों की हत्या और एक के आत्महत्या करने की कोशिश से ही पुलिस समझ गई थी कि यह अवैध संबंधों का मामला है. लेकिन पूरी सच्चाई तो तभी सामने आ सकती थी, जब बेहोश पड़े धु्रवकांत को होश आ जाता. लेकिन जब पुलिस ने उन के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला, जिसे धु्रवकांत ने अपनी बहन रंजना झा के नाम लिखा था.
उस सुसाइड नोट को पढ़ने के बाद हत्याओं और आत्महत्या का कुछ रहस्य तो उजागर हो गया, जो रहस्य बाकी बचा था, वह धु्रवकांत के होश में आने के बाद दिए गए उन के बयान से उजागर हो गया. यह सचमुच अवैध संबंधों में की गई हत्याओं का मामला था. यह पूरी कहानी कुछ इस तरह थी. 29 वर्षीय धु्रवकांत ठाकुर बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के थाना कस्बा मडि़यारपुर के रहने वाले विमलकांत ठाकुर के दूसरे नंबर के बेटे थे. विमलकांत के पास खेती की ठीकठाक जमीन थी, इसलिए उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे तथा एक बेटी रंजना थी.
बड़ा बेटा पढ़लिख कर बाप के साथ खेती करने लगा तो उन्होंने उस की शादी कर दी. उस के बाद रंजना की भी शादी कर दी. वह नवी मुंबई के एटौली में पति के साथ रहती थी. धु्रवकांत सब से छोटा था. उस ने विज्ञान विषय से पढ़ाई की थी, इसलिए एयरफोर्स या नेवी की नौकरी करना चाहता था. गांव में रह कर वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकता था, इसलिए बहन के पास मुंबई आ गया और सपनों की तलाश में जुट गया.
आखिर धु्रवकांत का सपना साकार हुआ. उस ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और मर्चेंट नेवी में भरती हो गया. उसे चैंबूर गोवड़ी की जीएसएम साईं कमर्शियल कंपनी में नौकरी मिल गई थी. उसे अच्छी तनख्वाह तो मिलती ही थी, विदेश घूमने का भी मौका मिल रहा था. अब उस का ज्यादा समय विदशों में ही बीतता था. नौकरी लगने के बाद वह स्थाई रूप से मुंबई में ही बसने के बारे में सोचने लगा था. नौकरी लगते ही घर वालों को उस की शादी की चिंता सताने लगी थी. विमलकांत बेटे के विवाह के लिए जैसे ही तैयार हुए, उन के यहां रिश्तों की लाइन लग गई. उन रिश्तों में उन्होंने अपने ही जिले की तहसील महुआ के रहने वाले चंद्रमोहन ठाकुर की सुंदरसुशिक्षित बेटी सुष्मिता को पसंद कर लिया.
धु्रवकांत ने भी सुष्मिता को देखा. उन्हें भी सुष्मिता पसंद आ गई तो मई, 2010 में धु्रवकांत और सुष्मिता की शादी धूमधाम के साथ हो गई. शादी के बाद धु्रवकांत सुष्मिता को मांबाप के पास छोड़ना चाहता था, लेकिन सुष्मिता इस के लिए तैयार नहीं हुई. मजबूरन उसे पत्नी को मुंबई लाना पड़ा.
मुंबई आने के बाद धु्रवकांत मात्र एक सप्ताह पत्नी के साथ रहा. उस के बाद पत्नी को बहन के पास छोड़ कर अपनी नौकरी पर चला गया. नईनवेली दुलहन सुष्मिता का दिन तो किसी तरह बीत जाता था, लेकिन रातें उस के लिए पहाड़ सी बन जाती थीं. लगभग 6 महीने बाद धु्रवकांत विदेश से वापस आया तो सुष्मिता शिकायतों का पिटारा ले कर उस के सामने बैठ गई. सुष्मिता की शिकायतें वाजिब थीं, क्योंकि एक औरत को शादी के बाद जो चाहिए, वह उन्हें पूरी नहीं कर सका था. लेकिन उस की भी मजबूरी थी. लिहाजा पत्नी को समझाबुझा कर और आश्वासन दे कर चुप करा दिया.
कुछ दिनों पत्नी के साथ रह कर धु्रवकांत फिर नौकरी पर चला गया. लेकिन इस बार वह लौटा तो घर का माहौल काफी बदला हुआ था. इस बार सुष्मिता ने उस की बहन रंजना के साथ रहने से साफ मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि उन दोनों के बीच काफी मनमुटाव हो गया था. पत्नी की बात मानना धु्रवकांत की मजबूरी थी, इसलिए सुष्मिता के कहने पर उस ने बहन से अलग रहने का फैसला कर लिया और सुष्मिता के रहने की व्यवस्था जुईनगर के एक वूमंस हौस्टल में कर दी. सुष्मिता को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो और उस का मन बहलता रहे, इस के लिए उस ने घर में कंप्यूटरइंटरनेट की भी व्यवस्था कर दी.
यही नहीं, सुष्मिता का समय व्यतीत करने के लिए उस ने उस का दाखिला एमजीएम अस्पताल में औपरेशन थिएटर में तकनीकी सहायक के कोर्स में करा दिया. लेकिन सुष्मिता जिस उम्र में थी, वह उम्र नदी में आई बाढ़ की तरह होती है. अगर बांध मजबूत न हुआ तो वह उसे तोड़ कर बह निकलने में देर नहीं लगाती. सुष्मिता ने भी कुछ ऐसा ही किया. भले ही मन बहलाने की सारी सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन पति से अलग रह कर वह खुश नहीं थी.
धीरेधीरे उस की शादी को 3 साल हो गए थे. अब तक न तो उस के तन की प्यास बुझी थी और न ही उसे मातृत्व सुख मिला था, जिस की चाहत हर औरत को होती है.
यह सब सोच कर जब कभी वह बेचैन होती तो सोशल मीडिया का सहारा लेती. धु्रवकांत से वह घंटों चैटिंग करती. फेसबुक पर भी उस के दोस्तों की लंबी सूची थी. उन्हीं दोस्तों में एक था अजय सिंह, जिस के सामने उस की नजरों में धु्रवकांत की तसवीर फीकी पड़ गई थी. सुष्मिता ने अजय की प्रोफाइल खोल कर देखी तो मजबूत कदकाठी का स्मार्ट दिखने वाला अजय उसी के जिले का रहने वाला निकला. वह दुबई की एक बैंक में नौकरी करता था. उस का फोटो और प्रोफाइल देख कर सुष्मिता उस की ओर आकर्षित हो गई. उस ने उस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उस ने दोस्ती स्वीकार कर ली.
दिसंबर, 2014 में अजय भारत आया तो मुंबई के मैकडोनाल्ड में दोनों की मुलाकात हुई. इस मुलाकात में अजय के बातव्यवहार से वह उस पर मर मिटी. अजय अविवाहित था. उसे भी सुष्मिता इतनी भायी कि उस ने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि वह विवाहित है. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हुआ तो मर्यादा की दीवार टूटते देर नहीं लगी. इस पर सुष्मिता को कोई पछतावा भी नहीं हुआ. इस की वजह शायद यह थी कि अजय की बांहों में उसे जो सुख और सुकून मिला था, धु्रवकांत की बांहों में उसे कभी नहीं मिला था.
इस के बाद धु्रवकांत छुट्टी पर मुंबई आया तो किसी वजह से हौस्टल बंद हो गया. इस के बाद उस ने कामोठे की वेदांत दृष्टि सोसायटी में किराए का फ्लैट ले कर सुष्मिता को उस में शिफ्ट कर दिया. यहीं पर सुष्मिता ने अजय सिंह को अपने पति धु्रवकांत से मिलवाया. धु्रवकांत भी अजय की बातों और स्वभाव से काफी प्रभावित हुआ, इसलिए उस ने भी उस से दोस्ती कर ली.
लेकिन इस बार धु्रवकांत ने सुष्मिता के व्यवहार में काफी बदलाव महसूस किया. यह बदलाव उस ने जाने के बाद भी महसूस किया. पहले सुष्मिता उस से इंटरनेट पर घंटों चैटिंग करती रहती थी, फोन पर प्यार से बातें करती थी, अब वह उसे फोन ही नहीं करती थी. वह जब भी उसे फोन करता, उस का फोन बिजी रहता. फोन उठाती भी तो सीधे मुंह बात नहीं करती थी. नेट पर चैटिंग तो एकदम से बंद कर दी थी. इस से उसे काफी तकलीफ होती थी.
जब कभी धु्रवकांत शिकायत करता तो वह टाल देती. आखिर उसे चिंता ही किस बात की थी. उस की जिंदगी में तो कोई और धु्रव आ गया था. धु्रवकांत 6-7 महीने में आता था, जबकि सुष्मिता अजय सिंह को जब भी याद करती थी, वह 2 घंटे में उस के पास पहुंच जाता था. हौस्टल में सुष्मिता किसी पुरुष को साथ नहीं रख सकती थी, जबकि फ्लैट में तो कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. अजय सिंह का जब मन होता, वह उस के यहां रुक भी जाता था.
सुष्मिता क्यों बदल गई है, जब इस बात की जानकारी धु्रवकांत को हुई तो वह सन्न रह गया. वह सुष्मिता को बहुत प्यार करता था. वह तुरंत मुंबई आया और सुष्मिता को समझाने की कोशिश की. लेकिन अब सुष्मिता कहां समझने वाली थी. उस ने प्रेमी के लिए पति से झगड़ा ही नहीं कर लिया, बल्कि उसे छोड़ने को भी तैयार हो गई. धु्रवकांत ने सारी बातें सासससुर को बता कर सुष्मिता को समझाने को कहा तो उन लोगों ने उस की बात पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद सुष्मिता ने अपने मातापिता को सारी बात बता कर पहले ही अपने पक्ष में कर लिया था. इसी वजह से वे भी बेटी की बेवफाई पर चुप थे.
धु्रवकांत सुष्मिता को समझाबुझा कर अपनी ड्यूटी पर चला गया. लेकिन सुष्मिता मर्यादा में आने के बजाय और बाहर चली गई. उस ने अजय से शादी करने का फैसला कर लिया. इस से मुंबई से ले कर गांव तक धु्रवकांत की बदनामी हो रही थी. बदनामी उस से सहन नहीं हो पा रही थी. लेकिन वह कुछ कर पाने की स्थिति में भी नहीं था. वह एक मर्द था, अपनी पत्नी को दूसरे मर्द की बांहों में कैसे देख सकता था. उस के यारदोस्त भी उस की हंसी उड़ाते थे कि वह अपनी पत्नी को संभाल नहीं पाया. इस से वह और परेशान रहता था कि सुष्मिता को वह अजय के चंगुल से कैसे मुक्त कराए. वह इसी सोच में डूबा था कि सुष्मिता ने उस से जो कहा, उस से वह बेचैन हो उठा.
उस समय धु्रवकांत का जहाज फ्रांस के बंदरगाह पर था. सुष्मिता ने उसे फोन कर के कहा कि वह 2 दिनों में मुंबई पहुंचे और उसे तलाक दे. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. वह अजय से शादी कर के उस के साथ गृहस्थी बसाना चाहती है. धु्रवकांत ने उसे समझाना चाहा तो वह गुस्से में बोली, ‘‘तुम्हीं बताओ, मैं ऐसा क्यों न करूं? आज तक तुम ने मुझे दिया ही क्या है? हर औरत मां बनना चाहती है. तुम आज तक मुझे मां नहीं बना सके. आखिर मैं तुम से क्या उम्मीद करूं? औरत को धनदौलत की उतनी चाह नहीं होती, जितनी पति और बच्चों की होती है. जब उसे ये चीजें पति से नहीं मिलतीं, तभी वह भटक जाती है. शादी के बाद तुम ने मेरे साथ कितने दिन और रातें गुजारी हैं, इसे अंगुलियों पर गिन कर बताया जा सकता है.’’
‘‘सुष्मिता, मैं तुम्हारे दर्द को अच्छी तरह समझता हूं. लेकिन क्या करूं, मेरी भी मजबूरी है. मेरी नौकरी ही ऐसी है कि मैं चाह कर भी तुम्हारे साथ ज्यादा दिन नहीं रह सकता. जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा.’’ धु्रवकांत ने सुष्मिता को समझाते हुए कहा. इस के बाद वह फ्लाइट पकड़ कर सीधे मुंबई आ गया. 8 दिसंबर, 2015 की रात 12 बजे जब वह अपने फ्लैट पर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा था. सुष्मिता घर पर नहीं थी. गार्डों से पूछने पर पता चला कि वह 8 दिन पहले फ्लैट पर आए अजय सिंह के साथ कहीं बाहर गई है.
इस जानकारी के बाद धु्रवकांत अपना गुस्सा पी कर फ्लैट पर पहुंचा और अपनी चाबी से फ्लैट का दरवाजा खोल कर अंदर आया और हाल में बैठ कर सुष्मिता का इंतजार करने लगा. रात एक बजे जिस हालत में सुष्मिता अजय सिंह के साथ आई, वह सब देख कर धु्रवकांत का खून खौल उठा. सुष्मिता काफी कम कपड़ों में अजय की कमर में बांहें डाले अंदर आई थी. पत्नी को किसी गैर की बांहों में इस तरह देखना बरदाश्त के बाहर की बात थी. फ्लैट के अंदर रोशनी में बैठे धु्रवकांत को देख कर एक पल के लिए तो उन के चेहरे का रंग उड़ गया था, लेकिन अगले ही पल दोनों संभल गए. सुष्मिता ने बेरुखी से पूछा, ‘‘अरे, तुम कब आए?’’
पत्नी की बेरुखी से धुंवकांत का चेहरा लाल हो उठा. उस ने भी उसी की भाषा में कहा, ‘‘मैं कब आया, यह छोड़ो. पहले तुम यह बताओ कि इतनी रात गए तुम पराए मर्द के साथ कहां से आ रही हो?’’ इस के बाद अजय की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘इसे तुरंत यहां से बाहर करो.’’
‘‘यह तो कहीं नहीं जाएंगे, अगर जाना ही है तो तुम चले जाओ.’’ सुष्मिता ने अजय का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘हम दोनों कल मंदिर में शादी करने वाले हैं. इस के लिए मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है.’’ इतना कह कर सुष्मिता अजय सिंह का हाथ पकड़ कर बैडरूम में चली गई.
सुष्मिता की इन बातों और हरकत से धु्रवकांत का कलेजा छलनी हो गया. उस की आंखों में खून के आंसू आ गए. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था, एक दिन वह उस के साथ इस तरह का व्यवहार करेगी. सुष्मिता और अजय सिंह तो सो गए, जबकि धु्रवकांत को नींद नहीं आ रही थी. सुबह 5 बजे तक वह हाल के सोफे पर ही बैठा रहा. उस की आंखों के सामने सुष्मिता के साथ शादी से ले कर अब तक के बिताए पल चलचित्र की तरह घूम रहे थे. सुष्मिता ने जो किया था, कोई भी होता उसे नफरत हो जाती. अजय ने भी उस के साथ विश्वासघात किया था.
विश्वास, नफरत और हिकारत की आंधी ने धु्रवकांत की बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया. उस ने तुरंत एक भयानक फैसला कर लिया और किचन में जा कर सब्जी काटने वाला चाकू उठा लाया. चाकू ले कर वह बैडरूम पहुंचा और बातें करने के बहाने सुष्मिता के साथ गहरी नींद में सोए अजय सिंह को जगा कर हाल में ले आया. हाल में आते ही नींद में डूबे अजय का मुंह पकड़ कर उस ने उस पर हमला कर दिया. उस ने उसे तभी छोड़ा, जब तक वह मर नहीं गया. इस के बाद वह सुष्मिता के पास पहुंचा और उस से संबंध बनाने की इच्छा जताई. लेकिन उसे खून में नहाया देख कर सुष्मिता के होश उड़ गए. वह बैड से उठ कर भागी, लेकिन धु्रवकांत उसे दबोच कर उस के सीने पर सवार हो गया.
सुष्मिता ने विरोध तो बहुत किया, लेकिन धु्रवकांत ने तकिया उस के चेहरे पर रख कर दबा दिया. वह तकिए को तब तक दबाए रहा, जब तक वह मर नहीं गई. दोनों की हत्या कर धु्रवकांत ने अपना लैटरपैड उठाया और अपनी बहन रंजना के नाम एक पत्र लिखा, जिस में उस ने अपनी पत्नी सुष्मिता की बेवफाई और अजय सिंह के विश्वासघात का जिक्र करते हुए अपनी आत्महत्या के बारे में बताया कि वह सुष्मिता से बहुत प्यार करता था. वह उस का खून नहीं देख सकता था, इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार नहीं किया. उस ने उस की हत्या तकिए से की. सुष्मिता और उस का प्रेमी अजय सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब वह भी जीना नहीं चाहता, इसलिए वह भी आत्महत्या कर रहा है.
सुसाइड नोट लिखने के बाद धु्रवकांत ने थाना पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दी. उस का सोचना था कि जब तक पुलिस उस के फ्लैट पर पहुंचेगी, तब तक वह भी मर चुका होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. संयोग से वह बच गया. उस ने जिस टाई से आत्महत्या करने की कोशिश की थी, वह काफी कमजोर थी. इसलिए उस के लटकते ही वह टूट गई. लेकिन टाई गले में कस गई थी, जिस से वह फर्श पर गिर कर बेहोश हो गया.
श्रीराम मल्लेमवार के दिशानिर्देश में असिस्टैंट इंसपेक्टर चंद्रशेखर भोइर ने जांच पूरी कर के इस मामले को अपराध संख्या 234/2015 पर भादंवि की धारा 302, 164 के तहत दर्ज कर 1 जनवरी, 2016 को धु्रवकांत ठाकुर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. Suspense Story
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






