True Crime Story: शहाना स्कूल के समय से ही सरफराज से मोहब्बत करने लगी थी. जब उस की शादी सरफराज से नहीं हो सकी तो वह सलीम से निकाह कर के उस की हो गई, लेकिन बाद में उस ने सलीम से भी किनारा कर लिया. इस के बाद उस का निकाह नवाब से हुआ लेकिन अपने प्यार के चक्कर में उस ने नवाब को ठिकाने लगवा दिया.
8दिसंबर, 2015 की देर रात उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा में किसी राहगीर ने फोन द्वारा सूचना दी कि शेर अली बाबा की मजार के पास एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. शेरअली बाबा की मजार काशीपुरजसपुर राष्ट्रीय राजमार्ग- 74 के किनारे है. लाश पड़ी होने की सूचना मिलते ही थाना कुंडा के थानाप्रभारी रमेश तनवार तुरंत पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश खून से लथपथ जसपुर की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पड़ी थी. वहीं पर कुछ लोग भी खड़े थे.
थानाप्रभारी ने वहां खड़े लोगों से मरने वाले शख्स की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. पुलिस ने मृतक की जेब की तलाशी ली तो जेब में एक परची मिली. उस पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. वह फोन नंबर किस का है, यह जानने के लिए थानाप्रभारी ने अपने फोन से वह नंबर मिलाया तो दूसरी तरफ से शहाना नाम की औरत ने फोन रिसीव किया. उन्होंने उस महिला से जानकारी ली तो पता चला कि वह जसपुर के मोहल्ला छिपियान के नवाब की पत्नी शहाना परवीन है.
थानाप्रभारी ने शहाना से उन के पति के बारे में पूछा तो उस ने उलटे थाना प्रभारी से ही सवाल किया, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन बोल रहे हैं और आप मेरे पति को क्यों पूछ रहे हैं?’’
‘‘देखिए, मैं थाना कुंडा का थानाप्रभारी बोल रहा हूं. दरअसल हमें शेर अली बाबा की मजार के पास एक आदमी की लाश मिली है. उसी लाश की जेब से यह आप का मोबाइल नंबर मिला है. कहीं यह लाश आप के किसी परिचित की तो नहीं है? आप यहां आ कर लाश को देख लीजिए.’’
थानाप्रभारी ने शहाना को लाश का जो हुलिया बताया था, वह जान कर शहाना रोने लगी, क्योंकि वह हुलिया उस के पति के हुलिए से मिल रहा था. उस का पति नवाब भी घर पर नहीं था. देर रात में अचानक शहाना के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर उस के परिवार वाले और मोहल्ले के कुछ लोग जमा हो गए. नवाब के साथ अनहोनी की बात सुनते ही वे सभी रात में ही शहाना के साथ अली बाबा की मजार के पास पहुंच गए. घटनास्थल पर पड़ी लाश देखते ही शहाना दहाड़े मार कर रोने लगी, क्योंकि वह लाश उस के पति नवाब की थी. उस जगह को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे नवाब का किसी वाहन से एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन उस के घर वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि नवाब वहां तक पहुंचा कैसे?
पुलिस ने नवाब के घर वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि नवाब का हरिद्वार और लक्सर में ट्रांसपोर्ट का काम था. उस के घर आनेजाने का भी कोई नियत समय नहीं था. काम में व्यस्त होने की वजह से वह 2-4 दिनों बाद ही जसपुर आता था. 8 दिसंबर को वह घर जरूर आया था. घर से वह काशीपुर कैसे पहुंचा, इस की किसी को जानकारी नहीं थी. उस समय रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए घर वालों से कुछ जानकारी लेने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भिजवा दिया गया. अगले दिन से पुलिस इस केस की जांचपड़ताल में जुट गई. सुबहसुबह पुलिस फिर से उस जगह पहुंच गई, जहां लाश मिली थी, ताकि वहां से कोई सबूत वगैरह मिल सके.
घटनास्थल के आसपास पुलिस ने काफी खोजबीन की, लेकिन वहां से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस घटना की तह तक पहुंच पाती. मृतक का मोबाइल फोन भी गायब था. पुलिस ने सोचा कि दुर्घटना होने पर नवाब सड़क पर गिर गया होगा और उसे एक्सीडेंट करने वाले ने मजार के पास डाल दिया होगा. पुलिस ने मृतक के घर वालों से एक बार फिर बात की तो उन्होंने बताया कि नवाब एक मिलनसार व्यक्ति था. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. वह उस की दुर्घटना वाली बात को मानने को तैयार नहीं थे. इस पर पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.
नवाब के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि 8 दिसंबर को उस की कुछ नंबरों पर बातचीत हुई थी. जिनजिन नंबरों पर उस की बातचीत हुई थी, पुलिस उन नंबरों की जांच में जुट गई. उन में 2 नंबर संदिग्ध नजर आए. जांच के दौरान पता चला कि उन में से एक नंबर रामपुर जिले के गांव बैजनी निवासी खालिद का था, जबकि दूसरा नंबर जिला मुरादाबाद के थाना भगतपुर के गांव बहेड़ी के रहने वाले उस्मान का था.
पुलिस इन दोनों ही व्यक्तियों से पूछताछ करना चाहती थी, इसलिए एसएसपी केवल खुराना ने उन की तलाश कि लिए थानाप्रभारी रमेश सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई अशोक कुमार, कांस्टेबल मनोज कोहली, खेम सिंह, जगत सिंह, शहाना परवीन आदि को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम खालिद और उस्मान के घरों पर गई तो वे दोनों ही अपने घरों से गायब मिले. उन के घरों से पुलिस को उन के बारे में यह जानकारी मिल गई कि दोनों काशीपुर में नौकरी कर रहे हैं.
पता चला कि खालिद हमदम अस्पताल में और उस्मान वहीं के सनराईज अस्पताल में कंपाउंडरी कर रहा है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम काशीपुर पहुंची. लेकिन वे वहां भी नहीं मिले. अस्पताल वालों ने बताया कि वे कई दिनों से अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं. इस के बाद पुलिस को इन दोनों पर शक हो गया. लिहाजा पुलिस ने उन की तलाश के लिए मुखबिर लगा दिए. करीब 2 सप्ताह बाद 25 दिसंबर को पुलिस को सुबहसुबह मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि खालिद और उस्मान कहीं जाने की फिराक में काशीपुर बसअड्डे पर खड़े हैं. यह खबर मिलते ही पुलिस टीम तुरंत बस अड्डे पर पहुंच गई. दोनों वहां एक बैंच पर बैठे मिल गए.
पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस कुंडा थाने ले आई. वहां उन से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों जल्दी ही टूट गए. दोनों ने स्वीकार कर लिया कि नवाब की हत्या उन्होंने नवाब की पत्नी शहाना के प्रेमी सरफराज के कहने पर की थी. सरफराज एक प्रतिष्ठित परिवार से था. पुलिस बिना सबूत के उसे गिरफ्तार करना नहीं चाहती थी. इसलिए पुलिस ने सब से पहले सरफराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह दिन में करीब 40 बार बात करता था.
जांच में पता चला कि वह नंबर उसी मोहल्ले की रहने वाली शहाना का है. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि सरफराज और शहाना के बीच जरूर प्रेमसंबंध रहे होंगे, तभी तो वे फोन पर इतनी ज्यादा बातें करते हैं. यानी खालिद और उस्मान ने पुलिस को जो बात बताई थी, उस में सच्चाई नजर आने लगी. इस से पुलिस को कुछ और ही कहानी नजर आने लगी. सरफराज जसपुर के ही मोहल्ला छिपियान में रहता था. पुलिस उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस को देखते ही उस के होश उड़ गए. पुलिस पूछताछ के लिए उसे भी थाने ले आई.
पुलिस ने सरफराज से पूछताछ की तो उस ने साफ कह दिया कि उस का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. इस पर पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स उस के सामने रखी. जिस में उस की शहाना से एक साल में 12995 बार बातें हुई थीं. अब सच्चाई सरफराज के सामने थी, जिसे वह झुठला नहीं सकता था. फिर भी वह खुद को बचाने के लिए यही कहता रहा कि उस की शहाना से दोस्ती है, इसलिए वह उस के साथ इतनी बातें फोन पर करता था. लेकिन नवाब की हत्या से उस का कोई संबंध नहीं है.
इस के बाद पुलिस टीम मृतक नवाब की पत्नी शहाना को पूछताछ के लिए थाने ले आई. शहाना भी पुलिस को घुमाने की कोशिश में लगी रही. लेकिन पुलिस ने जब उसे बताया कि उस का प्रेमी सरफराज पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया है तो शहाना को सांप सूंघ गया. पुलिस उसे सरफराज के पास ले आई. दोनों को आमनेसामने बैठा कर बात की गई तो सरफराज टूट गया. उस ने बताया कि शहाना के कहने पर ही उस ने नवाब को ठिकाने लगवाया था. इस के बाद दोनों ने ही अपना गुनाह कबूल कर लिया. इन दोनों के प्यार से ले कर नवाब की हत्या तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—
उत्तराखंड के जसपुर शहर के मोहल्ला छिपियान में हाजी फिदा हुसैन का परिवार रहता था. मुसलिम बाहुल्य इस शहर के अधिकांश मुसलिमों का लकड़ी का व्यापार है. फिदा हुसैन का भी लकड़ी का व्यापार था. उन के परिवार में 7 सदस्य थे. शहाना इन की दूसरे नंबर की बेटी थी. वह शुरू से ही पढ़ाईलिखाई में तेज थी. इसीलिए मदरसे की पढ़ाई के बाद फिदा हुसैन ने उस का दाखिला फैजएआम इंटर कालेज में करा दिया था. सरफराज ने भी उसी कालेज में दाखिला लिया था. इस से पहले भी वह मदरसे में शहाना के साथ ही पढ़ता था.
सरफराज फिदा हुसैन के घर के पास अगले नुक्कड़ पर रहने वाले शब्बीर मास्टर का बेटा था. पड़ोसी होने के नाते दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. शब्बीर मास्टर का छोटा परिवार था. शब्बीर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. उन के परिवार में 3 बेटे थे, जिन में सरफराज सब से छोटा था. शब्बीर मास्टर तेजतर्रार व्यक्ति थे. इसलिए मोहल्ले क्या, शहर की पूरी बिरादरी में उन की अच्छी जानपहचान थी.
शब्बीर मास्टर अपने दोनों बेटों की शादी कर चुके थे. सरफराज अभी पढ़ रहा था, इसलिए उन्हें उस की ज्यादा चिंता नहीं थी. सरफराज के इंटरमीडिएट करने के बाद शब्बीर मास्टर ने उस के सामने शादी की बात रखी तो उस ने साफ कह दिया कि जब तक वह कोई कामधंधा नहीं कर लेता, शादी नहीं करेगा. उधर शुरू से साथसाथ पढ़ने के कारण शहाना और सरफराज के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. उन की दोस्ती प्यार में बदल गई थी. और तो और दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं.
उसी दौरान किसी के माध्यम से शब्बीर मास्टर को पता चला कि सरफराज और शहाना के बीच चक्कर चल रहा है. वह समझ गए कि सरफराज शादी के लिए मना क्यों कर रहा है. उन्होंने इस बारे में सरफराज से बात की तो उस ने कह दिया कि वह शहाना से प्यार करता है और उसी से निकाह करना चाहता है. शब्बीर मास्टर ने बेटे की खुशी के लिए शहाना के अब्बू फिदा हुसैन से बात भी की, पर वह तैयार नहीं हुए.
फिदा हुसैन की समाज में अच्छीखासी इज्जत थी. बेटी वाली बात कहीं समाज में न फैल जाए, इसलिए वह उस के लिए अच्छा लड़का तलाशने लगे, ताकि जल्द से जल्द उस की शादी कर सकें. थोड़ी भागादौड़ी कर के उन्हें उस के योग्य वर मिल भी गया. जसपुर के तत्कालीन चेयरमैन मोहम्मद उमर के बेटे सलीम से उन्होंने शहाना की शादी तय कर दी. अच्छी हैसियत वाले परिवार में शादी तय होने के बाद घर वाले गदगद थे. फिदा हुसैन इस बात से खुश थे कि उन की बेटी इतने संपन्न परिवार में खुश रहेगी.
शादी तो तय हो गई, लेकिन फिदा हुसैन को दुविधा इस बात की थी कि कहीं शहाना शादी करने से मना न कर दे. यदि उस ने ऐसा कर दिया तो बिरादरी में उन की किरकरी हो जाएगी. इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिदा हुसैन ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों को बुला कर शहाना को समझाने के लिए कहा. रिश्तेदारों के समझाने पर शहाना सलीम से शादी करने के लिए तैयार तो हो गई, लेकिन उस का दिल सरफराज पर ही लगा रहा. इस के बाद फिदा हुसैन ने शादी की तैयारी शुरु कर दी. उधर जब सरफराज को पता चला कि शहाना की शादी किसी और के साथ होने वाली है तो वह परेशान हो गया. उस ने शहाना से बात की तो शहाना ने कह दिया कि घर वालों और रिश्तेदारों की हठ के आगे उसे मजबूर होना पड़ा. शहाना का फैसला सुन कर सरफराज को दुख हुआ.
उधर बड़ी धूमधाम के साथ शहाना और सलीम का निकाह हो गया. यह सन 1997 की बात है. उस के निकाह के बाद सरफराज परेशान रहने लगा. वह शहाना से फोन पर बातें करता रहता था. शहाना भले ही सलीम की पत्नी बन गई थी लेकिन सरफराज के साथ गुजारे पलों की यादें उस के दिल से अभी भी धूमिल नहीं हो पाई थीं.
वह जब कभी मायके आती, उस की निगाहें हर वक्त सरफराज की राहों पर जमी रहतीं. इत्तफाक से कभी दोनों आमनेसामने पड़ जाते तो एकदूसरे के लिए तड़प उठते. मौका मिलने पर दोनों मुलाकात भी कर लेते. यही वजह थी कि शहाना मायके आने के बाद ससुराल नहीं जाना चाहती थी. वह सरफराज के प्यार में पागल सी हो गई थी. यह बात सलीम को पता चली तो वह परेशान हो उठा. सलीम ने शहाना को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. जब शहाना नहीं मानी तो उस ने उस के साथ रिश्ता तोड़ दिया.
सलीम से रिश्ता टूटने के बाद सरफराज बहुत खुश हुआ. उसे उम्मीद थी कि अब तो उसे उस का खोया प्यार मिल जाएगा. फिदा हुसैन पहले से ही बेटी के कारनामों से तंग आ चुके थे. दोनों के मिलनेजुलने से मोहल्ले वालों ने उन का मोहल्ले में रहना दूभर कर दिया. शहाना अपने अब्बू पर सरफराज से निकाह कराने का दबाव डाल रही थी, लेकिन फिदा हुसैन को सरफराज से इतनी नफरत हो गई थी कि वह किसी भी कीमत पर उस से शहाना का निकाह करने को तैयार नहीं थे.
शहाना फिर से सरफराज की मोहब्बत में पागल हो गई थी. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो अंत में फिदा हुसैन ने शब्बीर मास्टर से इस बारे में बात कर के सरफराज की शादी कहीं और करने की बात कही. शब्बीर मास्टर समझदार व्यक्ति थे. वह जानते थे कि समाज में इंसान की इज्जत की क्या कीमत होती है. यही सोच कर उन्होंने जल्दी ही सरफराज के लिए बिजनौर के स्योहारा कस्बे में एक लड़की देखी और उस का निकाह करा दिया.
सरफराज ने पिता के दबाव में शादी तो कर ली, लेकिन वह अपने दिल से शहाना को नहीं निकाल सका. लेकिन सरफराज के शादी करने की बात शहाना को बहुत बुरी लगी. उस ने उस से मिलनाजुलना बिलकुल बंद कर दिया. इस के बाद सरफराज भी अपनी गृहस्थी के चक्कर में फंस गया और कुछ दिनों के लिए शहाना को भूल गया. जवान बेटी के घर बैठने पर फिदा हुसैन भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने अपनी पत्नी हुसना से कहा कि वह शहाना को दूसरे निकाह के लिए तैयार करे. शहाना सरफराज की मोहब्बत से टूट चुकी थी. वह यह भी जानती थी कि सारी जिंदगी मांबाप के सीने पर मूंग तो नहीं दली जा सकती.
उस ने अपने घर वालों की परेशानी समझ कर दूसरे निकाह के लिए हामी भर दी. शहाना के शादी के लिए तैयार होते ही उस के अब्बू फिदा हुसैन ने फिर से उस के लिए सही लड़का देखना शुरू कर दिया. उसी दौरान उन के एक करीबी रिश्तेदार ने जसपुर के ही मोहल्ले जटवारा के इमरान चौक में रहने वाले मोहम्मद असलम के बेटे नवाब के बारे बताया. नवाब का ट्रांसपोर्ट का अपना काम था. नवाब के कुल मिला कर 6 भाई और 4 बहनें थीं. भले ही मोहम्मद असलम का परिवार बड़ा था, लेकिन उस के सभी बेटे अपनेअपने काम से लगे हुए थे. शादी की बात पक्की होने के बाद 17 मई, 2000 को बड़ी धूमधाम के साथ नवाब और शहाना का निकाह हो गया.
शहाना नवाब के साथ निकाह कर के खुश थी. वह अपनी पुरानी जिंदगी भूल कर नई जिंदगी जीना चाहती थी. नवाब का अपना अच्छा कारोबार था. आमदनी भी अच्छी थी, इसलिए दोनों हंसीखुशी से रह रहे थे. शहाना परवीन लिखीपढ़ी थी, इसलिए उसे आंगनबाड़ी में सहायिका की नौकरी मिल गई. वह आसपास के बच्चों को पढ़ाने लगी. कहते हैं कि वक्त को बदलते देर नहीं लगती. शहाना के आंगनबाड़ी में लगते ही उस का फिर से घर से बाहर आनाजाना शुरू हो गया. उसी दौरान एक दिन उस का आमनासामना फिर से सरफराज से हो गया. सरफराज को सामने से आते देख शहाना ने उस से बचने की कोशिश की, लेकिन सरफराज उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.
उस दिन सरफराज ने उस से केवल हालचाल पूछा और वहां से चला गया. लेकिन इस छोटी सी मुलाकात ने शहाना के दिल में पुरानी मोहब्बत को चिंगारी दिखा दी. शहाना कई दिनों तक उस की यादों में जीती रही. उस ने कई बार उस मुलाकात को भूलने की कोशिश की, लेकिन भुला नहीं सकी. हालांकि शहाना और सरफराज दोनों ही एकएक बच्चे के मांबाप बन चुके थे, लेकिन उन के दिलों में पुरानी मोेहब्बत शायद अभी भी जिंदा थी. दोनों के दिलों में छिपी मोहब्बत फिर से जागी तो वे फिर चोरीछिपे मिलने लगे. आंगनबाड़ी के बहाने शहाना कई घंटों तक घर से बाहर रहती थी. उसी दौरान मौका निकाल कर वह सरफराज के साथ इधरउधर मौजमस्ती करने लगी.
उसी बीच शहाना दूसरी बच्ची की भी मां बन गई. लेकिन अब उस का सरफराज से मिलनाजुलना और भी ज्यादा हो गया था. शहाना नवाब का भी पूरा ख्याल रखती थी. इसलिए वह उस पर पूरा भरोसा करता था. लेकिन उसे पता नहीं था कि पत्नी उस की पीठ पीछे क्या गुल खिला रही है? शहाना अपने मकान की ऊपरी मंजिल पर अकेली ही रहती थी. उस का पति नवाब अपने काम से चला जाता और उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं.
इसी का लाभ उठा कर वह हर वक्त सरफराज से मोबाइल पर बतियाती रहती थी. जब उस के मोबाइल में बैलेंस खत्म हो जाता तो सरफराज रिचार्ज करा देता. उसी दौरान सरफराज ने नवाब से भी दोस्ती बढ़ा ली, ताकि वह उस के घर बिना किसी झिझक के आजा सके. लेकिन नवाब उस के मंसूबों को समझ नहीं पाया. नवाब के भाई जसपुर में ट्रांसपोर्ट का धंधा चलाते थे. इस धंधे में अच्छी कमाई थी, इसलिए नवाब ने हरिद्वार के लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. धंधे की वजह से वह अकसर घर से बाहर रहता था. ट्रांसपोर्ट के काम के साथ नवाब ने प्रौपर्टी खरीदनेबेचने का काम भी शुरू कर दिया था. इसी का लाभ उठाते हुए सरफराज और शहाना मौजमस्ती कर रहे थे.
उसी दौरान सरफराज ने भी नवाब के सहयोग से लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. सरफराज ने कुछ दिनों में नवाब के साथ इतनी गहरी दोस्ती कर ली कि वह हर वक्त उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था. सरफराज कभीकभी नवाब के जिम्मे अपना औफिस छोड़ कर जसपुर आ जाता और शहाना के साथ मौजमस्ती करता. नवाब की हत्या से लगभग 5-6 महीने पहले सरफराज ने शहाना से कहा, ‘‘शहाना क्यों न हम आपस में शादी कर लें.’’
‘‘हम दोनों पहले से ही शादीशुदा हैं तो फिर यह आफत मोल लेने से क्या फायदा?’’ शहाना बोली, ‘‘सरफराज, तुम यह बात तो जानते ही हो कि नवाब के जीवित रहते मैं भला तुम्हारे साथ निकाह कैसे कर सकती हूं. यदि तुम यह चाहते हो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा.’’
सरफराज अब शहाना के दिल की बात जान गया था. उस ने पक्का मन बना लिया कि शहाना को पाने के लिए वह कुछ भी करेगा. उधर शहाना भी सरफराज की मोहब्बत में पागल सी हो गई थी. वह यह भी भूल गई थी कि नवाब उसे कितना चाहता है. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद उस की अच्छाबुरा सोचने की शक्ति पर पानी फिर गया था. इसी पागलपन में वह नवाब को अपने और सरफराज के बीच से हटाने के लिए भी राजी हो गई. अब से लगभग ढाई महीने पहले सरफराज का ड्राइवर मकसूद हादसे में घायल हो गया था. उसे इलाज के लिए काशीपुर के हमदम अस्पताल में भरती कराया गया था. यहीं पर सरफराज की मुलाकात खालिद व उस्मान से हुई. हालांकि खालिद और उस्मान दोनों अलगअलग अस्पतालों में काम करते थे, लेकिन दोनों में अच्छी दोस्ती थी.
खालिद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बैजनी गांव का था और उस्मान मुरादाबाद के रोशनपुर बहेड़ी गांव का था. खालिद ओटी टैक्नीशियन था तो उस्मान कंपाउंडर. उसी दौरान बातोंबातों में सरफराज ने उस्मान और खालिद के सामने जिक्र करते हुए पूछा कि कोई ऐसी भी दवा आती है, जिस के प्रयोग से इंसान खत्म हो जाए और किसी को पता भी न चले. इस पर खालिद ने बताया, ‘‘भाई काम सब हो जाते हैं, लेकिन उस के लिए कुछ खर्च करना पड़ता है. यह काम बहुत ही रिस्की होते हैं. आप को अगर किसी का काम कराना है तो पूरे एक लाख रुपए खर्च करने होंगे.’’
सरफराज के लिए एक लाख रुपए कोई मायने नहीं रखते थे. अपने प्यार को पाने के लिए वह कुछ भी खर्च करने को तैयार था. उस ने दोनों को 75 हजार रुपए दे कर नवाब की मौत का सौदा तय कर लिया. बाकी के 25 हजार रुपए उन्होंने काम हो जाने के बाद देने को कह दिया. बातचीत हो जाने के बाद सरफराज ने खालिद और उस्मान को प्रौपर्टी डीलर बताते हुए नवाब से उन की मुलाकात करा दी. उस ने नवाब से कह दिया कि यदि वह किसी प्रौपर्टी का सौदा इन से कराते हैं तो अच्छा कमीशन मिलेगा. नवाब खुश हो गया कि प्रौपर्टी बिकवाने पर उसे अतिरिक्त आमदनी होगी. नवाब शराब पीता ही था, इसलिए उस्मान और खालिद ने नवाब से दोस्ती गांठते हुए उसे शराब भी पिलानी शुरू कर दी.
8 दिसंबर, 2015 को योजना के अनुसार, सरफराज नवाब को साथ ले कर खालिद और उस्मान के पास काशीपुर पहुंचा. नवाब को उन दोनों के पास छोड़ कर वह खुद शहर में कुछ काम होने का बहाना कर के वहां से खिसक लिया. सरफराज के जाने के बाद उस्मान और खालिद ने नवाब को रामनगर रोड पर सड़क के किनारे ही शराब पिलाई. शराब पीने के बाद तीनों सनराइज अस्पताल पहुंचे. उस्मान उसी अस्पताल में कंपाउंडर था. उस ने अस्पताल के मालिक डा. सम्स से जसपुर जाने की बात कह कर उन की नैनो कार मांगी. डा. सम्स ने उसे अपनी कार दे दी. नवाब को उस कार में बिठा कर तीनों जसपुर की ओर चल दिए.
नवाब पर शराब का नशा चढ़ गया था. उसी का लाभ उठाते हुए दोनों ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इंजेक्शन के लगते ही नवाब बेहोश हो कर सीट पर लुढ़क गया. इस के बाद शेर अली बाबा की मजार के पास कार रोक कर उन्होंने उसे ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाला 10 एमएल का पूरा इंजेक्शन लगा दिया और फिर उसे चलती कार से सड़क पर फेंक दिया. बाद में उन्होंने उसी कार से उसे 2-3 बार बेरहमी से कुचल दिया, जिस के बाद नवाब की मौके पर ही मौत हो गई. सरफराज ने घटना वाले दिन ही उस्मान को शहाना का नंबर लिख कर दे दिया था, जो उन्होंने नवाब की जेब में रख दिया था. जिस से पुलिस उस के घर वालों तक आसानी से पहुंच सके. उसी के द्वारा पुलिस ने शहाना को फोन कर के दुर्घटना वाली बात बताई थी.
नवाब को मौत के घाट उतारने के बाद उस्मान और खालिद, दोनों ही काशीपुर वापस चले आए थे. इस घटना को अंजाम देने के बाद ही उस्मान ने मोबाइल से सरफराज को बता दिया था कि उस का काम हो गया है. इस घटना के बाद से खालिद और उस्मान के साथसाथ सरफराज ने भी अपना मोबाइल बंद कर लिया था. सरफराज ने नवाब को मारने की सूचना शहाना परवीन को भी दे दी थी. इस केस का खुलासा होते ही पुलिस ने भादंवि की धारा 302/120 के तहत मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.
एसएसपी केवल खुराना ने इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 2,500 रुपए का इनाम देने की घोषणा की थी. वहीं मृतक के घर वालों ने भी पुलिस को 5 हजार रुपए बतौर इनाम दिए. True Crime Story
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






