True Crime Story: भारतीय मूल की संदीप कौर अपनी अलग सोच और चाहत के चलते शराब पीने के साथसाथ मोटी रकम के लिए कैसीनो में जुआ भी खेलने लगी थी. इसी लत ने उसे लुटेरी बना दिया और वह अकेली ही नायाब तरीके से बैंकों में डकैती डालने लगी. लेकिन एक दिन वह पकड़ी गई और उसे…
6 जून, 2014 की बात है. 24-25 साल की संदीप कौर ने अपने आई पैड पर एक बैंक की लोकेशन देख कर उसे लूटने की योजना बनाई. कैलिफोर्निया की सांटा क्लैरिटा वैली में बैठी संदीप कौर लूट की योजना बना कर उस के अच्छेबुरे हर पहलू पर विचार कर रही थी. यह जगह लौस एंजिलस से उत्तरपश्चिम की तरफ 38 किलोमीटर की दूरी पर है. वैसे डकैती के पेशे में आने से पहले उस ने इस बारे में काफी अध्ययन किया था. उसी से उसे पता चला था कि उस इलाके के बैंकों में पहले से डकैतियां हुई थीं. उन के अपराधी पकड़े नहीं गए थे. लेकिन वह यह सच्चाई भी अच्छी तरह जान गई थी कि कुछ बैंक लुटेरे भागते समय पुलिस की गोली से मारे भी गए थे.
पहली बात ने संदीप को उत्साहित जरूर किया था, लेकिन दूसरी बात उसे बुरी तरह भयभीत कर गई थी. कुछ देर के लिए उसे घबराहट हुई. डकैती के अलावा उस के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं था. इसलिए उस ने किसी तरह अपनी घबराहट से पीछा छुड़ा लिया. खुद को संभालते हुए उस ने केवल डकैती के तरीकों पर विचार किया. वह एक नर्स थी, लेकिन वह उस रूप में बैंक लूटना चाहती थी, जिस से कोई भी उसे पहचान न सके.
उस ने वहीं एकांत में बैठ कर अपने सिर पर एक आकर्षक विग फिट कर के अपना हुलिया बदला. आंखों पर उस ने निहायत खूबसूरत चश्मा लगा लिया. अपनी वेशभूषा भी उस ने बदल ली. अब उस का हुलिया पूरी तरह बदल गया था. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह नर्स है. बैंक से पैसा लूटने जा रही 5 फुट 3 इंच की इस लड़की के पास कोई हथियार नहीं था. जैसे ही वह बैंक के नजदीक पहुंची, उस ने अपनी जैकेट की जिप पौकेट से कागज का टुकड़ा निकाल कर उस पर जल्दी से कुछ लिखा. फिर उसे तह कर के अपनी जेब में रख लिया.
इस के बाद वह बैंक के मुख्य गेट से सीधी चीफ कैशियर के पास पहुंची. उस वक्त वहां कोई ग्राहक वगैरह नहीं था. उस ने अपनी जेब से कागज का वही टुकड़ा निकाल कर कैशियर की ओर फेंकते हुए सधे शब्दों में पूरी नाटकीयता से कहा, ‘‘मैडम, मैं एक बड़े क्रिमिनल गैंग की मैंबर हूं. हम लोग पूरा बैंक लूटते हैं. लेकिन फिलहाल मुझे केवल एक हजार डौलर की जरूरत है. चुपचाप मुझे यह रकम दे दो वरना मैं इस बैंक को बम से उड़ा दूंगी. मेरी इस ड्रैस पर बम का कोई असर नहीं होगा, जबकि तुम मारी जाओगी.’’
कैशियर एक प्रौढ़ महिला थी. उस ने कागज की तह खोल कर उसे पढ़ा. उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘टिकटौक, आई हैव ए बौंब.’
महिला कैशियर डर गई. उस ने उस कागज को इधरउधर छिपाने की कोशिश करते हुए देखा. आसपास के बैंककर्मी अपने कामों में व्यस्त थे. किसी ग्राहक का ध्यान भी उस तरफ नहीं था. तभी कैशियर ने एक लिफाफा उठाया, सावधानी से उस में डौलर भरे और लिफाफा संदीप कौर के हवाले करते हुए धीमे से कहा, ‘‘किसी का कोई नुकसान करने की जरूरत नहीं है, रहमदिली सीखो. मैं ने अपनी नौकरी खतरे में डाल कर भी तुम्हारी जरूरत पूरी कर दी है. अब तुम कैशकैबिन की बगल से होती हुई पिछले दरवाजे से बाहर निकल जाओ.’’
संदीप कौर बड़े इत्मीनान से बैंक से बाहर निकली और अपनी गाड़ी में बैठते ही गटगट कर के बोतल का पूरा पानी पी गई. इस के बाद उस ने चैन की सांस ली और वहां से चली गई. संदीप कौर कोई विदेशी नहीं, बल्कि मूलरूप से भारत की ही रहने वाली थी. उस का जन्म 11 नवंबर, 1989 को चंडीगढ़ में हुआ था. परिवार में मातापिता के अलावा एक छोटा भाई था जितेंद्र. जितेंद्र के जन्म के कुछ अरसा बाद ही यह परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया था. फिर यह परिवार भारत को अलविदा कह कर अमेरिका चला गया था. इन लोगों की योजना वहीं बसने की थी. सैन जौस इलाके में भारतीयों की भरमार है. इन लोगों ने भी वहीं अपने रहने का ठिकाना बना लिया.
वहां के तमाम लोग एकदम अपनों जैसे लगते थे, लेकिन संदीप कौर चाह कर भी इस वातावरण में एडजस्ट नहीं कर पा रही थी. उसे सब पराया सा लगता था. अकसर वह खुद को अजनबी महसूसकरती थी. 9/11 के अटैक्स के बाद जैसे अनेक लोग उन्हें शक की निगाह से देखने लगे थे. जिस स्कूल में संदीप कौर और उस के भाई का दाखिला करवाया गया था, वहां के अंग्रेज विद्यार्थी अकसर उन्हें आतंकवादियों के बच्चे कह कर चिढ़ाते थे. इस सब से तंग आ कर संदीप कौर और जितेंद्र अकसर बीच में ही स्कूल छोड़ कर घर आ जाया करते. स्कूल प्रबंधन ने इसे गंभीरता से लेते हुए सजा के तौर पर इन्हें इस स्कूल से सस्पैंड कर के ईस्टर्न हिमालयाज के बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया.
इतना ही नहीं, जब भी छुट्टियों में वे घर आते उन के लिए मोबाइल फोन व टेलीविजन के इस्तेमाल पर मनाही लगा दी जाती. उन्हें अपने किसी दोस्त वगैरह से भी नहीं मिलने दिया जाता. जरा सी गलती कर दिए जाने पर उन्हें कुरसी उठा कर घंटों तक खड़े रहने की सजा दे दी जाती. एक दफा संदीप की मां काफी बीमार हो गईं. उन दिनों संदीप 14 साल की थी. इलाज के लिए वह अपनी मां को अस्पताल ले जाती थी. वहीं पर उस की एक नर्सिंग मैनेजर से अच्छी दोस्ती हो गई. उन्होंने संदीप को नर्स का कोर्स करने की सलाह दी. तैयारी के लिए उन्होंने संदीप को अपने पास से कई पुस्तकें भी दीं.
विपरीत हालातों में भी संदीप ने मेहनत से पढ़ाई की. पढ़ाई में वह बहुत होशियार थी. इसलिए 15 साल की उम्र में कालेज में दाखिला लेने वाली वह इस क्षेत्र की पहली लड़की थी. 19 साल की उम्र में वह नर्स बन गई. इस के बाद उस की एक निजी मैडिकल संस्थान में 6 हजार यूएस डौलर प्रति महीने की नौकरी लग गई. संदीप की देखभाल से मां पूरी तरह स्वस्थ हो गईं. इस बीच संदीप से उन की अपेक्षाएं भी बहुत बढ़ गईं. वह उस से अकसर यही कहतीं, ‘‘बेटी, तुम इतनी होशियार और मेहनती हो कि खूब पैसा कमा कर अमीर बन सकती हो. अपना खुद का घर खरीद कर अपने परिवार वालों को बेहतर जिंदगी दे सकती हो. तुम जैसी समझदार, होनहार लड़की के लिए यह जरा भी मुश्किल नहीं है.’’
यह सारे सपने मात्र 6 हजार डौलर महीने की नौकरी में पूरे हो नहीं सकते थे. इस के अलावा संदीप कौर अपनी कमाई का कुछ हिस्सा बीमा कंपनियों में निवेश करने लगी. आमदनी बढ़ाने के लिए वह ओवर टाइम करने लगी. जीतोड़ मेहनत कर के उस ने अपनी महीने की कमाई 20 हजार डौलर प्रतिमाह कर ली. इसी दौरान संदीप की कई हमउम्र अमेरिकन लड़कियों से दोस्ती हो गई. इन के संग वह पार्टियों व क्लबों में जाने लगी. जबकि उस की मां हमेशा ही इन बातों के खिलाफ थीं. मां की आंखों में धूल झोंकने को संदीप कौर अपनी नर्सिंग ड्रैस के नीचे क्लब कौस्ट्यूम पहन लिया करती. इस तरह वह एक तरह से दोहरी जिंदगी जीने लगी. अब उस पर मां की लगाई पहले जैसी पाबंदियां लागू नहीं हो पा रही थीं. इसलिए घर में काफी कलह होने लगी थी.
परेशान हो कर संदीप कौर 20 साल की उम्र में अपना घर छोड़ कर साक्रामैंटो चली गई, जहां उस ने अन्य कामों के साथ ‘बैचलर औफ साइंस इन नर्सिंग’ की पढ़ाई भी शुरू कर दी. काम का जुनून ऐसा था कि स्थानीय काऊंटी जेल में वह बीमार कैदियों की देखभाल करने, उन का रक्तचाप चैक करने और दवाएं बांटने भी जाती थी. एक जवान लड़की का ऐसा सेवाभाव देख कर कैदी और जेल के कर्मचारी उस से बहुत प्रभावित थे.
नवंबर, 2010 में 21 साल की उम्र में संदीप की जिंदगी में जैसे आमूलचूल परिवर्तन आया. अमेरिका में शराब पीने की यह लाइसैंसशुदा उम्र होती है. भारत की तरह पीनेपिलाने वाले सिलसिले को वहां बुरा भी नहीं माना जाता. लिहाजा अपने दोस्तों की संगत में क्लब जा कर संदीप कौर भी शराब पीने लगी. इतना ही नहीं, चमकदमक वाली यह दुनिया उसे काफी पसंद आने लगी. अब तक परिवार वाले उसे जिन बातों के लिए मना करते थे, वह वही खुल कर करने लगी. क्योंकि अब उस पर किसी का कोई अंकुश नहीं था, वह पूरी तरह आजाद हो चुकी थी.
एक दफा संदीप ने एक कैसिनो में जुआ खेला. पहले ही गेम में वह 4 हजार डौलर जीत गई. एक झटके में मोटी रकम जीत कर वह खुश हुई. इस के बाद वह लगातार जीतती गई. अब उसे अपनी नौकरी की कमाई कम लगने लगी. उसे लगने लगा कि वह तो पैदा ही इसी काम के लिए हुई है. वह रोजाना जुआ खेलने लगी. हारना जैसे उस के फितरत में नहीं था. वह लगातार जीतती गई. देखतेदेखते उस के पास इतना पैसा आ गया, जिस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.
लेकिन एक बार हवा का रुख उस के खिलाफ हो गया. इस का नतीजा यह हुआ कि वह लगातार जुए में हारने लगी. जिस गति से उस के पास पैसा आया था, उस से कहीं ज्यादा रफ्तार से वह पैसा उस का साथ छोड़ गया. जुआ और तनाव की वजह से संदीप कौर ने न केवल अपनी नर्स की नौकरी छोड़ी, बल्कि नर्सिंग से जुड़ी आगे की पढ़ाई भी त्याग दी. इस के बावजूद उसे इस बात का आत्मविश्वास था कि अगर वह एक बाजी खेले तो उस का हारा हुआ सारा पैसा वापस आ सकता है. वह जीतने के लिए और जुआ खेलना चाहती थी. मगर इस के लिए भी पैसा चाहिए था, जो अब उस के पास नहीं था.
उस ने कोई बहाना कर के अपनी एक कजिन से कुछ पैसे उधार लिए. इन पैसों से उस ने कैसिनों में बाजी खेली. लेकिन किस्मत इस दफा भी दगा दे गई. उधार ली हुई यह रकम भी वह एक ही झटके में हार गई. अवसाद की स्थिति से निजात पाने के लिए उस ने आत्महत्या करने का मन बना लिया. एक दिन वह परेशान सी हालत में बैठी थी, तभी एक अजनबी ने उस के पास आ कर उस के सिर पर हाथ रखते हुए आत्मीयता से कहा, ‘‘घबराओ नहीं बेबी, तुम हारने के लिए नहीं जीतने के लिए पैदा हुई हो. और हां, निराश कभी मत होना.’’
संदीप कौर ने उस आदमी को आश्चर्य से देखते हुए पूछा, ‘‘आप कौन हैं और मुझे कैसे जानते हैं?’’
‘‘बस, यही समझ लो कि मैं तुम्हारा बहुत बड़ा शुभचिंतक हूं. मैं तुम्हें तब से देखता आ रहा हूं, जब तुम पहली बार यहां आई थीं और पहली दफा के दावों से यहां सभी को हैरत में डाल दिया था. लेकिन अब तुम अपने अति आत्मविश्वास का शिकार हो कर खुद को बरबाद कर बैठी हो. वरना तुम हारने वालों में से नहीं हो. मैं तो अब भी यही कह रहा हूं कि हार शब्द को तुम अपनी डिक्शनरी से निकाल फेंको. मत भूलो कि तुम जीत की पर्याय हो.’’
संदीप कौर को इन बातों से बल मिला. उस के दिमाग में वही चित्र घूमने लगे जब वह लगातार बाजियां जीती थी. अब वह अवसाद से बाहर आ कर बाजी लगाने को तैयार हो गई. लेकिन उस के पास उस समय पैसे नहीं थे. पर जिस व्यक्ति ने उस की हिम्मत बंधाई थी, वही उसे पैसे देने के लिए तैयार हो गया. उस व्यक्ति ने पहले ही कह दिया था कि उसे न तो इन पैसों पर कोई ब्याज चाहिए और न ही दूसरा कोई लाभ. उस ने बस इतनी सी शर्त रखी कि बाजी लगाने को वह उसे जो भी पैसा देगा, उसे उसी रोज वापस चाहिए.
‘‘वह तो सर, मैं 15 मिनट में वापस कर दूंगी.’’ संदीप ने फिर से अति आत्मविश्वास का सहारा लिया. वह बोली, ‘‘आप मेरी जिंदगी में एक फरिश्ते की तरह आए हैं तो आप की मूल रकम के अलावा अलग से भी अच्छी खासी रकम आप को दूंगी. बस मुझे जी भर खेलने दीजिएगा.’’
‘‘ओके.’’ कहते हुए उस व्यक्ति ने उस के आगे नोटों के बंडल रख दिए.
‘‘फिलहाल मुझे इतने ही चाहिए,’’ कह कर संदीप कौर ने 20 हजार डौलर उठा लिए.
उस ने बाजी लगाई, पर वह हार गई. जिस व्यक्ति ने उसे पैसे दिए थे, वह उस के पास ही खड़ा था. संदीप ने उस की ओर देखते हुए इशारा किया तो उस ने उसे 45 हजार डौलर और दे दिए. इस के बाद संदीप लगातार 16 घंटों तक एक ही जगह बैठ कर जुआ खेलती रही. कई दफा वह हारी, कई दफा जीती भी. जुए में वह इतनी तल्लीन थी कि उस ने कुछ खाया तक नहीं, बस 2-4 बार पानी जरूर पी लिया था. रकम उसे उसी व्यक्ति से लगातार मिलती रही, जो बढ़तेबढ़ते काफी बड़ी रकम बन गई और जुए की अंतिम बाजी में संदीप पूरा पैसा हार गई.
जिस शख्स से उस ने मोटी रकम उधार ली थी, उस रकम को हासिल करने के लिए वह उस के साथ कैसा व्यवहार करेगा, उस की बुरी परिकल्पनाएं उस के मनमस्तिष्क पर हावी होने लगी थीं. उस ने देखा कि इस दौरान उस शख्स ने अपने कई साथियों को भी फोन कर के वहां बुला लिया था. कुछ देर पहले तक जिस शख्स को वह फरिश्ता समझ रही थी, वही व्यक्ति संदीप को राक्षस लगने लगा था. संदीप को फिलहाल बचने की यही तरकीब सूझी कि वह वाशरूम जाने का बहाना कर के वहां से भाग ले. इस में उसे सफलता मिली और वह सुरक्षित अपनी मां के पास जा पहुंची, जो यूनियन सिटी जाने की तैयारी में थीं. संदीप भी उन के साथ इस नए पते पर जा कर रहने लगी. यह मई, 2012 की बात है.
उसे मालूम था कि अगर उस के जुआ खेलने की जानकारी उस की मां को लग गई तो वह बदनामी के डर से आत्महत्या कर सकती हैं. इसलिए संदीप ने कसम खा ली कि आइंदा वह कभी जुआ नहीं खेलेगी. उस ने फिर से नर्स की नौकरी कर ली. अब वह पहले से ज्यादा यानी सप्ताह में 96 घंटे काम कर के अतिरिक्त पैसा कमाने लगी. संदीप कौर ने तो सोचा था कि इस नए पते की किसी को जानकारी नहीं है, पर न जाने कैसे 11 दिसंबर, 2012 को इस नए पते पर भी उस के नाम गिरफ्तारी वारंट आ गया. वारंट के अनुसार, वह कैसिनो की पेमेंट किए बिना वहां से भाग गई थी.
लाख छिपाने की कोशिश करने के बाद भी उस की गलत हरकतों की जानकारी उस की मां को पता लग ही गई. मां ने उसे खूब लताड़ा. उन्होंने उसे सलाह दी कि चाहे जैसे भी हो, वह अपना सब कर्ज उतारने की कोशिश करे. मेहनत तो संदीप पहले ही कर रही थी. उस ने और ज्यादा मेहनत की. कैसिनो वालों से थोड़ी मोहलत ले कर किसी तरह उन का कर्जा निपटा कर एक मुसीबत से छुटकारा पा लिया. दूसरा कर्जा उस शख्स का उस के ऊपर रह गया था, जिस ने उसे जुआ खेलने के लिए भरपूर पैसे दिए थे. कर्जे की वह तलवार अभी भी उस की गरदन पर थी. पर गनीमत यह थी कि अभी तक उन लोगों से उस का फिर से आमनासामना नहीं हुआ था.
संदीप के साथ एक अन्य बात भी हुई, जिस ने उसे बेचैन कर दिया. जब भी वह मां से पिता के बारे में पूछती, वह अकसर उसे यही बतातीं कि बिजनैस के सिलसिले में वह अकसर टूअर पर रहते हैं. कई दफा मां ने यह भी बताया कि वह देर रात को घर लौटे थे, मगर जरूरी फोन आ जाने पर सुबह ही फिर चले गए. लेकिन संदीप कौर को किसी तरह पता चल गया कि उस के मम्मीपापा के बीच तो अरसा पहले तलाक हो गया था.
आखिर संदीप भी एक दफा फिर घर से परे हो गई. लासवेगास में रहते हुए एक साल तक उस ने इतनी मेहनत कि कि अपनी कजिन का पैसा भी चुका दिया. यह खुशखबरी देने के लिए वह अपनी मां के पास गई तो मां ने बताया कि अब वह उस की शादी करना चाहती हैं. उसे कुछेक लड़के दिखाए गए, जिन में से कोई भी उसे पसंद नहीं आया. आखिर सितंबर, 2013 में वह अपनी पसंद के एक लड़के के साथ घर से गायब हो गई. मगर अप्रैल, 2014 में यह रिश्ता खत्म हो गया. वह फिर से अकेली हो गई थी. जुए वाला मोटा कर्ज अभी भी उस के सिर पर ज्यों का त्यों था.
25 मई, 2014 सोमवार की बात है. अपने एक दोस्त से मिलने संदीप फ्रीमौंट एरिया गई थी. जब वह वहां से वापस लौट रही थी, तभी उस ने गौर किया कि काले रंग की एक वैन उस की कार का पीछा कर रही थी. डर की वजह से संदीप कौर ने अपनी कार की गति बढ़ा दी, पर काले रंग की वैन ने ओवरटेक कर के संदीप की कार रोक ली. संदीप ने अपनी कार का शीशा नीचे कर के इस बदतमीजी का सबब जानना चाहा तो उस वैन में बैठे एक शख्स ने गरदन बाहर निकालते हुए कहा, ‘‘हमें तुम से बात करनी है, तुम संदीप हो.’’
‘‘क्या बात करनी है?’’ संदीप ने पूछा.
‘‘देखो, जुआ खेलने के लिए तुम ने जिस आदमी से मोटा कर्ज लिया था, वह एक भला आदमी है. मगर उसूल का पक्का भी है. कर्ज देता है तो वह वापस ले कर रहता है. उस का दायरा बहुत बड़ा है, जिस में हर किस्म के लोग हैं. अपना पैसा वापस लेने के लिए वह कुछ भी कर सकता है.’’
‘‘मतलब, छंटा हुआ बदमाश है वह और तुम कह रहे हो कि भला आदमी है.’’ संदीप बोली.
‘‘शटअप. वह शरीफ है, तभी तो तुम्हें इतना वक्त दे दिया और उस की शराफत का फायदा उठाने में तुम ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. तुम वहां से ऐसे भागी, जैसे कभी पकड़ी नहीं जाओगी.’’ उस शख्स ने चिल्लाते हुए कहा.
‘‘मैं मानती हूं, मुझे उस का पैसा देना है और देर कर भी रहूंगी. वह भी ब्याज सहित. मैं इसी सब के इंतजाम में तो लगी हूं.’’ वह बोली.
‘‘तो इंतजाम हुआ?’’
‘‘नहीं, अभी नहीं हुआ.’’
‘‘आगे होगा भी नहीं.’’
‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो?’’
‘‘इसलिए कि इतने दिनों में नहीं हो पाया तो अब कहां से होगा.’’
‘‘मैं अभी अपने कुछ दोस्तों को फोन कर के पैसे मंगवाती हूं.’’ कहते हुए संदीप ने कई जगह फोन मिला कर पैसों की दरकार की. पर कहीं से कुछ नहीं मिला.
‘‘अब बोलो.’’ वह आदमी व्यंगात्मक लहजे में बोला.
फिर वह अपनी वैन से उतर कर संदीप की कार में घुसते हुए उस के बगल वाली सीट पर बैठ गया. उस ने वैन के ड्राइवर को पीछे आने को कहा और संदीप को अपनी कार आगे बढ़ाने को कहा. मरती क्या न करती. संदीप ने कार आगे बढ़ा दी. थोड़ा आगे चलने पर उक्त शख्स ने एक अलग अंदाज में कहना शुरू किया, ‘‘देखो, मेरी बात ध्यान से सुनो, तुम ऐसी स्थिति में हो जहां से मोटी रकम लौटाना तुम्हारे बस की बात नहीं है. और यह सोच लो कि उसे पैसे नहीं मिले तो वह अपने असली रूप में आ कर तुम्हारे साथसाथ तुम्हारी फैमिली को भी खत्म करा सकता है. अब वह तुम्हारे नाम से भी चिढ़ता है.’’
इन बातों ने संदीप के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं. भय से उस का पूरा जिस्म कांपने लगा. उक्त शख्स ने उस से गाड़ी रुकवा कर अपनी सीट पर आने को कहा और खुद कार चलाने लगा. करीब 10 मिनट खामोश रह कर वह गाड़ी को एक आथोराइज्ड पार्किंग स्थल पर ले गया. वहां गाड़ी रोकते हुए बोला, ‘‘देखो संदीप, तुम्हारी परेशानी मैं समझ रहा हूं. ऐसे में तुम्हारे बचाव का एक धुंधला सा रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है. तुम पैसा नहीं दे सकती तो हमारे लिए काम करो. मगर तुम्हें काम वही करना पड़ेगा, जो हम तुम से कहेंगे. इनकार करने की कोई गुंजाइश नहीं होगी.’’
संदीप ने सोचना शुरू किया. उसे लगा कि ये लोग या तो उसे ड्रग सप्लाई का काम करने को कहेंगे या फिर उस से वेश्यावृत्ति करवाएंगे. मगर उस शख्स ने जब काम बताया तो वह इन दोनों से अलग काम निकला. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें बैंक रौबरी करनी होगी. हर लूट में जितना पैसा तुम्हारे हाथ लगेगा, उस में से एक तिहाई तुम अपने लिए रख लेना और बाकी हमें दे दिया करना. हम तुम से तब तक ही पैसा लेंगे, जब तक हमारातुम्हारा हिसाब साफ नहीं हो जाता. इस के बाद हम तुम से एक पैसा भी नहीं लेंगे.’’
काम बड़ा रिस्की था. इसलिए संदीप ने इस बारे में सोचने के लिए वक्त मांगा, जो उसे दे दिया गया. सोचने के साथसाथ उस ने इस विषय से जुड़ी तमाम सामग्री जुटाते हुए उस का व्यापक अध्ययन भी किया. इस से काम की एक बात उस के हाथ लगी कि यहां के कुछ इलाके ऐसे थे, जहां के बैंकों में डकैती डालने वाले अधिकांश अपराधी पकड़े नहीं गए थे. इस जानकारी ने उस की हिम्मत और बढ़ा दी. उस ने डकैती के प्रचलित ढंग न अपना कर अपने अलग तरीके अख्तियार करने की भी सोची.
अपने इसी अलग तरीके से उस ने 6 जून, 2014 को सांटा क्लैरिटा वैली के पास स्थित एक बैंक से एक हजार यूएस डौलर लूट लिया. यह काम इतनी आसानी और इत्मीनान के साथ हुआ था, जिस की उसे भी उम्मीद नहीं थी. उस ने मोटी रकम लूटने के बजाय कम रकम को ही लूटने का सिलसिला जारी रखा. इस का उसे एक फायदा यह मिल रहा था कि छोटी रकम की वजह से कोई हंगामा खड़ा नहीं होता था. इस के बाद अपने इसी तरीके से संदीप ने वैलेंसिया नामक जगह पर स्थित एक बैंक से पहली वारदात से दोगुने रुपए लूटे. बल्कि बैंक से निकलते वक्त उस ने एक जगह काउंटर पर पड़ी करेंसी के कुछ बंडल भी उठा लिए. उस की यह हरकत वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में भी कैद हो गई तो भी वह पकड़ी नहीं गई.
फिर तो उस ने बेधड़क हो कर कितने बैंक लूटे, इस की उसे भी खबर नहीं. कई बैंक वाले तो छोटी रकम की वजह से चुप्पी साध गए थे. पुलिस वाले बैंक डकैतों से काफी परेशान थे. उन की कार्यप्रणाली के अनुसार, उन्हें अलगअलग नाम दिए गए थे. इन में एक का नाम रखा गया था गीजार बैंडिट. यह इस क्षेत्र का नंबर वन सीरियल बैंक रौबर माना जाता था. दूसरे नंबर पर महिला आती थी, जिसे ‘बौंबशैल बैंडिट’ नाम दिया गया था. यह संदीप कौर थी. अब तक वह भी इस काम से ऊब चुकी थी. 31 जुलाई, 2014 को उस ने पक्का मन बनाया कि आज वह अंतिम दफा बैंक में लूट करेगी, इस के बाद हमेशा के लिए यह काम छोड़ देगी.
सेंट जौर्ज के यूएस बैंक की एक शाखा ने ड्राइव थ्रू टैलर की सुविधा दे रखी थी. इसलिए इस के ग्राहकों को बैंक के भीतर जाने की बहुत कम जरूरत पड़ती थी. उस रोज शाम के 4 बज कर 50 मिनट पर संदीप ने अलग तरह से सिर ढांपा, चेहरे पर सर्जिकल मास्क चढ़ाया और सनग्लासेज पहन कर बैंक में प्रवेश किया. अपने चिरपरिचित तरीके से उस ने कैशियर के पास पहुंच कर उस की तरफ कागज की परची फेंकी, जिस पर लिखा था, ‘मुझे 50 हजार की नकदी सौंपने को तुम्हारे पास 2 मिनट का वक्त है. ऐसा न किया तो यहां बम फटेगा.’
कैशियर डर गया. उस ने तुरंत पैसा निकाल कर उस के हवाले कर दिया. जिसे ले कर संदीप अपनी सिल्वर निशान गाड़ी पर सवार हो कर वहां से भाग ली. बैंक मैनेजर ने यह सब देख लिया था. उन्होंने तुरंत पुलिस के 911 नंबर पर फोन कर के बौंबशैल के ताजा कारनामे की बात बताते हुए यह भी जानकारी दी कि वह किस नंबर की कार से भागी है.
सेंट जौर्ज पुलिस डिपार्टमेंट के तेजतर्रार औफिसर मार्क बीहल को कंट्रोल रूम के जरिए इस घटना की सूचना मिली. उस समय वह पास ही के फायर स्टेशन पर थे. उन्हें यह भी बताया गया था कि बैंक लुटेरे के पास घातक हथियार भी हो सकते थे, इसलिए वे सावधानी रखें. मार्क बीहल ने आगेपीछे की न सोचते हुए तत्काल अपनी जौज चार्जर पैट्रोल गाड़ी ‘फ्री वे’ की ओर दौड़ा दी. एक्जिट-टू पर पहुंच कर उन्होंने यह सोचते हुए अपनी गाड़ी रोक दी कि संदिग्ध कार भी वहीं से हो कर जाएगी. कुछ ही देर में वाकई सूचना में बताए गए कलर और नंबर की गाड़ी वहां से निकली. मार्क बीहल ने अपनी गाड़ी उस के पीछे लगा दी.
अब तक मामला पूरी तरह फ्लैश हो गया था. पुलिस की कितनी टीमें बौंबशैल को काबू करने के लिए सक्रिय हो गईं. आखिर कुछ देर बाद संदीप को चारों तरफ से घेर कर काबू कर लिया गया. उस से उस समय किसी तरह की कोई पूछताछ के बजाय उसे क्लार्क डिटैंशन सैंटर के छोटे प्रीजन सैल में बिठादिया गया. वहां उस ने अपनी कलाई की नसें काटने की कोशिश की तो उसे साइकी सैल में नग्न कर के बंद कर दिया गया. इस के बाद उसे इसी अवस्था में यहीं पर रखते हुए उस का थोड़ा बहुत मानसिक उपचार किया गया.
14 अगस्त को एफबीआई के स्पैशल एजेंट सेथ फुटलिक ने संदीप से पूछताछ की. अब तक वह काफी चिड़चिड़ी हो चुकी थी. मगर उसे अपने किए पर कोई पश्चाताप नहीं था. वह पुलिस को कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुई. एक समाचार पत्र ने संदीप के ऊपर सचित्र विस्तृत आलेख छाप दिया. संदीप के बारे में पढ़ कर अनेक लोगों को उस से हमदर्दी होने लगी. ऐसे लोग उसे कड़ी सजा न देने की अपील अखबार में छपवाने लगे.
आखिर उस के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई. सेंट जौर्ज की फिफ्थ डिस्ट्रिक्ट फोर्ट के जिला जज टेड स्टीवार्ट के यहां उस पर मुकदमा चला. जे विनवार्ड को उस का डिफैंस अटौर्नी नियुक्त किया गया था. जिन्होंने मुकदमे की अंतिम सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश से कहा, ‘‘मी लौर्ड, अपराधी बुरे होते हैं तो अच्छे भी होते हैं. संदीप कौर इतनी पढ़ीलिखी है कि वह समाज के पूरी तरह काम आने के काबिल है. वह अपनी कथित सभ्यता के जाल में फंस गई थी.’’
इस पर प्रौसीक्यूटिंग अटौर्नी पाल कोहलेर ने एक तरह से दहाड़ते हुए कहा, ‘‘किस जाल की बात की जा रही है. इस बाबत उन लोगों से पूछ कर देखें, जो इस अपराधिनी के ट्रैप में फंस कर लुटते गए. 130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ी भगाती यह संदीप कौर सड़क पर अन्य लोगों के लिए खतरा बन जाती थी. इस ने लगातार अपराध करते हुए भोलेभाले कर्मियों को लूटते वक्त कभी उन पर तरस नहीं खाया.’’
7 अप्रैल, 2015 को केस का फैसला सुनाते हुए जज महोदय ने बैंक रौबरी के 4 केसों में संदीप कौर को एक साथ 66 महीनों तक जेल में रहने की सजा सुना दी. इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए संदीप ने कहा, ‘‘यह सजा मेरे लिए एक रिलीफ है. मैं इस सजा को पूरी ईमानदारी से निभाऊंगी.’’
फिलहाल एक अलग खबर यह है कि हंसल मेहता के निर्देशन में संदीप कौर की जीवनगाथा से प्रेरित फिल्म बननी शुरू हो गई है, जिस में संदीप का किरदार कंगना रनौत निभा रही हैं. बकौल कंगना यह फिल्म बायोपिक न हो कर एक ऐसी भारतीय लड़की की कहानी है, जो अमेरिका जा कर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाती है. कंगना का मानना है कि यह रोल उन के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है. True Crime Story






