दिल्ली पुलिस के साइबर थाने में तैनात एसआई अंकुर मलिक और एसआई नेहा पूनिया की दोस्ती पुलिस ट्रेनिंग के दौरान ही हो गई थी. अंकुर इस बात को अच्छी तरह जानता था कि साइबर फ्रौड के मामलों में लोगों के बैंक खातों में करोड़ों रुपए फ्रीज रहते हैं. इन दोनों पुलिस अधिकारियों ने फ्रीज किए बैंक खातों से 2 करोड़ से अधिक रुपए फरजी दस्तावेजों के जरिए अन्य बैंक खातों में ट्रांसफर करा लिए. इस के बाद ये दोनों बंटीबबली फरार हो गए. फिर ये देश के अलगअलग पर्यटक स्थलों पर घूम कर मौजमस्ती करते रहे. दिल्ली पुलिस ने इन दोनों को इंदौर से गिरफ्तार कर पूछताछ की तो इन के द्वारा फ्रौड करने की चौंकाने वाली ऐसी कहानी सामने आई कि

उमस भरी शाम थी. मध्य प्रदेश के इंदौर में अरविंदो अस्पताल के पास एक पौश कालोनी की शांत सड़क पर कई गाडिय़ां आ कर रुकीं. सादे कपड़ों में कुछ लोग तेजी से उतरे. उन की निगाहें सामने बने किराए के मकान पर थी.

अगले ही पल दरवाजे पर दस्तक हुई.  ”दरवाजा खोलो…पानी वाला.’’

अंदर कुछ सेकेंड सन्नाटा रहा, फिर खिसकती हुई कुरसियों और चलते हुए कदमों की आवाजें आईं.

दरवाजा खुलते ही सामने जो चेहरा था, उसे देख कर टीम के अफसर ठिठक गए. वह कोई शातिर गैंगस्टर नहीं बल्कि दिल्ली पुलिस की एसआई नेहा पूनिया थी. पीछे कमरे में खड़ा युवक भी कोई आम आदमी नहीं था, वह था एसआई अंकुर मलिक.

दोनों के चेहरे उतर चुके थे. कमरे की तलाशी शुरू हुई तो नोटों की गड्डियां, सोने के सिक्के, जेवर, कई मोबाइल फोन और एक लैपटाप बरामद हुआ.

यह सिर्फ गिरफ्तारी नहीं थी, यह खाकी पर लगा ऐसा दाग था, जिस की गूंज दिल्ली से इंदौर तक सुनाई देनी थी.

लेकिन सवाल था 2 पुलिस अफसर आखिर अपराधी कैसे बन गए?

पुलिस ट्रेनिंग ग्राउंड से साल 2021 में शुरू हुई यह कहानी. दिल्ली पुलिस के नए बैच की ट्रेनिंग चल रही थी. उसी बैच में अंकुर मलिक और नेहा पूनिया भी थे.

दोनों तेजतर्रार और महत्त्वाकांक्षी थे. ट्रेनिंग के दौरान अकसर साथ दिखने लगे. उन लोगों की दोस्ती धीरेधीरे नजदीकियों में बदल गई थी.

दोनों ही जानते थे कि पुलिस की नौकरी सिर्फ वरदी नहीं, ताकत भी देती है और ताकत अगर चरित्र से बड़ी हो जाए तो इंसान का पतन तय हो जाता है.

ट्रेनिंग पूरी होने के बाद दोनों अलगअलग थानों में तैनात हो गए. अंकुर मलिक को उत्तरपूर्वी दिल्ली की साइबर सेल में पोस्टिंग मिली. नेहा पूनिया की शाहदरा इलाके के मानसरोवर पार्क थाने में तैनाती हुई.

बाहर से सब सामान्य सा था, मगर एक रिश्ता अब भी जिंदा था. अंकुर साइबर सेल में काम करता था. उस के पास रोज ही ऐसे केस आते थे, जिन में लोगों से औनलाइन ठगी हुई होती. ठगों के बैंक खातों को ट्रेस किया जाता, रकम फ्रीज कराई जाती और कानूनी प्रक्रिया के बाद पीडि़तों को वापस दिलाई जाती.

अंकुर ने बहुत जल्दी सिस्टम की कमजोरियों को समझ लिया था. उसे पता था कि बैंक पुलिस और अदालत के आदेशों को गंभीरता से लेते हैं. अगर दस्तावेज असली जैसे लगें तो करोड़ों की रकम भी इधर से उधर हो सकती है. यही सोच धीरेधीरे लालच में बदल गई थी.

एक रात उस ने नेहा से मुलाकात की.

”सोचो, लोग कितने ठगे जाते हैं, उन का पैसा खातों में पड़ा रहता है और सिस्टम को कुछ पता भी नहीं चलता.’’ अंकुर ने धीमी आवाज में कहा. नेहा ने उस की ओर देखा, ”क्या कहना चाहते हो?’’

”अगर आदेश बदल जाएं तो पैसा किसी और खाते में भी जा सकता है.’’ नेहा कुछ देर चुप रही, फिर बोली, ”जोखिम बहुत बड़ा है.’’ अंकुर मुसकराया, ”इनाम भी.’’ यहीं से दोनों ने कानून से उलटी राह चुन  ली.

फरजी कोर्ट, असली पैसा

दोनों ने अदालत के नाम से नकली आदेश तैयार किए. इन आदेशों में लिखा जाता कि फ्रीज की गई रकम पीडि़तों को लौटाई जाए, लेकिन जिन खातों का जिक्र होता, वे पीडि़तों के नहीं उन के अपने जानकारों के थे. इस खेल में 3 बाहरी लोग भी शामिल किए गए. इलियास, आरिफ और शादाब, क्योंकि इन के बैंक खाते इस्तेमाल होने थे.

दस्तावेज इतनी सफाई से तैयार किए गए कि कई जगह बैंक अधिकारियों को शक तक नहीं हुआ. धीरेधीरे लाखों रुपए उन खातों में ट्रांसफर होने लगे. पैसों के हर सफल ट्रांसफर के साथ दोनों का हौसला बढ़ता गया.

उन्होंने कुछ ही महीनों में साइबर फ्रौड के फ्रीज खातों से 2 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम फरजी दस्तावेजों के जरिए अन्य खातों में ट्रांसफर कर ली.

इस बीच दोनों की निजी जिंदगी भी अलग दिशा में चल रही थी. अंकुर पहले से शादीशुदा था. उस का एक बच्चा भी था. घर में पत्नी को लगता था कि पति ड्यूटी में व्यस्त है.

नेहा की शादी हो चुकी थी. दिसंबर 2024 में उस के विवाह की चर्चा साथियों में हुई थी, लेकिन शादी के बाद भी उस का मन कहीं और था.

दोनों अपनेअपने घरों में जीवनसाथी की भूमिका निभा रहे थे और बाहर चोरी की रकम तथा गुप्त रिश्ते की दुनिया बसाते रहे. उन के लिए कानून, परिवार, समाज सब पीछे छूट चुका था.

17 मार्च, 2024 को अंकुर मलिक ने 7 दिन की मैडिकल छुट्टी डाली. कागजों में वह बीमार था, मगर हकीकत में वह दिल्ली छोडऩे की तैयारी कर चुका था. इसी दौरान नेहा भी बिना सूचना ड्यूटी से गायब हो गई.

शुरुआत में विभाग को लगा कि निजी कारण रहे होंगे. मगर दोनों के फोन बंद मिले और औफिस में कोई सूचना नहीं पहुंची तो शक गहराने लगा.

इधर दोनों लोग दिल्ली छोड़ चुके थे. उन्होंने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा. न परिवार, न नौकरी और न वरदी.

ठगी के पैसों से ऐश

आम अपराधी चोरी के बाद छिपते हैं. मगर ये दोनों खुद को बहुत चतुर समझ बैठे थे. इन्होंने रकम से करीब एक करोड़ रुपए का सोना खरीदा. नकद पैसा अलग रखा. कई मोबाइल फोन लिए ताकि ट्रैकिंग मुश्किल हो.

फिर शुरू हुआ मौजमस्ती का दौर. कभी गोवा के बीच पर, कभी मनाली की ठंडी वादियों में, कभी कश्मीर की वादियों में वे ऐसे घूम रहे थे, मानो जिंदगी जीत ली हो.

नेहा कहती, ”अब किसी के आदेश नहीं सुनने.’’ अंकुर हंसता, ”अब हम अपनी दुनिया बनाएंगे.’’

दोनों को लगता था कि पुलिस विभाग उन्हें कभी नहीं पकड़ पाएगा.

अब नया शहर, नए नाम. आखिरकार दोनों ने मध्य प्रदेश के इंदौर को ठिकाना चुना. शांत शहर, नई पहचान और किराए का मकान. यहां उन्होंने नाम बदल लिए. पड़ोसियों से कहा कि वे निजी कंपनी में काम करते हैं. कम बाहर निकलते, नकद खर्च करते, ज्यादा मेलजोल नहीं रखते थे.

वे सचमुच बंटी बबली की तरह नई जिंदगी शुरू करना चाहते थे. उधर दिल्ली पुलिस मुख्यालय में मामला गंभीर हो चुका था. 2 एसआई गायब थे. साइबर सेल के खातों में फरजी दस्तावेजों से गड़बड़ी के संकेत भी मिल चुके थे. 3 मामलों में करोड़ों रुपए गायब मिले तो पुलिस का शक एसआई अंकुर मलिक और नेहा पर ठहर गया.

अब यह सिर्फ अनुपस्थिति का मामला नहीं, विभाग की शर्म का प्रश्न बन चुका था.

नार्थईस्ट जिले के डीसीपी के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन किया गया. बैंक रिकौर्ड खंगाले गए. दस्तावेजों की गहनता से जांच की गई. संदिग्ध खातों का लिंक जोड़ा गया. जैसेजैसे परतें खुलीं, तसवीर साफ होती गई और हर रास्ता अंकुर और नेहा पर रुकता था.

यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी. असली पीछा अब शुरू होना था. तकनीकी चालाकी और कानून की जंग कि कैसे होटल के सीसीटीवी और डिजिटल सुरागों ने दोनों प्रेमी पुलिस वालों को इंदौर तक पहुंचा कर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

एसआई बने अपराधी

दिल्ली पुलिस मुख्यालय की तीसरी मंजिल पर उस दिन देर रात तक रोशनी जल रही थी. मीटिंग रूम में कुछ अफसर फाइलों और बैंक स्टेटमेंट और कौल डिटेल्स रिकौड्र्स के बीच बैठे थे. मामला बेहद संवेदनशील था, क्योंकि अपराधी कोई बाहरी नहीं बल्कि विभाग के अपने 2 एसआई थे.

अंकुर मलिक और नेहा पूनिया 2 नाम, जो कभी विभाग की सूची में ईमानदार अफसरों की तरह दर्ज थे, अब फरार अपराधियों की सूची में शामिल हो चुके थे.

डीसीपी आशीष मिश्रा ने मेज पर हाथ मारते हुए कहा, ”यह सिर्फ चोरी नहीं है, यह खाकी वरदी से गद्दारी है. इन्हें हर हाल में पकडऩा है.’’

हर सुरंग बंद, फिर भी एक रास्ता खुला. जांच टीम ने सब से पहले दोनों के मोबाइल नंबरों को ट्रैक करने की कोशिश की, मगर सभी नंबर बंद मिले. बैंक खातों में कोई सीधा लेनदेन नहीं दिख रहा था. नकद रकम निकाल ली गई थी.

पासपोर्ट मूवमेंट चैक हुई. देश से बाहर नहीं गए थे. परिवारों से पूछताछ हुई. अंकुर के घर में उस की पत्नी रोते हुए बोली, ”उस ने कहा था कि तबियत खराब है, फिर फोन बंद हो गया.’’

नेहा के परिवार वालों ने भी अनभिज्ञता जताई. मगर पुलिस को यकीन था कि दोनों कहीं न कहीं संपर्क में जरूर हैं.

हर घर पर रखी नजर

टीम ने दोनों के करीबियों की निगरानी शुरू कर दी. इसी दौरान एक तकनीकी अधिकारी ने बताया, ”मैडम नेहा समयसमय पर परिवार से इंटरनेट कौल कर रही हैं, मगर लोकेशन छिपी हुई है.’’

”कैसे?’’ अधिकारी ने पूछा. ”वीपीएन का इस्तेमाल कर रही हैं.’’

कमरे में कुछ पल सन्नाटा पसर गया.

नेहा पुलिस अफसर थी, इसलिए जानती थी कि लोकेशन कैसे छिपाई जाती है. वह सामान्य कौल नहीं करती थी. इंटरनेट के जरिए वीपीएन पर बात करती, जिस से लोकेशन किसी दूसरे शहर या देश की दिखती.

वह पुलिस को उसी के खेल में मात देना चाहती थी. डिजिटल निगरानी बढ़ाई गई. पुरानी लोकेशन हिस्ट्री, टोल डाटा, रेलवे रिकौर्ड, होटल चेकइन, सब खंगाले गए.

3 दिन के बाद कुछ सुराग मिला. नोएडा के एक होटल के सीसीटीवी में एक जोड़ा दिखाई दिया था नाम नकली थे, लेकिन चेहरे असली. फुटेज में अंकुर कैप लगाए था और नेहा ने चेहरा ढंका हुआ था. मगर जांच टीम उन्हें पहचान चुकी थी.

वीडियो देख कर एक अफसर ने कहा, ”ये भागे नहीं हैं, प्लान कर के निकले हैं.’’

फुटेज से पता चला कि दोनों ने एक रात वहां गुजारी थी और अगली सुबह टैक्सी से निकले थे.

टैक्सी ड्राइवर मिला. उस ने बताया, ”साहब, वे लोग बोले थे आगरा रोड जाना है. बीच में लोकेशन बदलते रहो.’’

अब पुलिस समझ गई कि दोनों लगातार रास्ता बदल रहे हैं, ताकि ट्रैकिंग मुश्किल हो. शहर बदल रहे थे.

जांच में पता चला कि दिल्ली छोडऩे के बाद दोनों ने कई शहरों में समय बिताया. पहले गोवा, फिर मनाली फिर कश्मीर वे घूमते रहे थे.

होटल बदल रहे थे और हर जगह नकली नाम इस्तेमाल कर रहे थे.

एक होटल कर्मचारी ने बताया, ”सर, वो दोनों पतिपत्नी लग रहे थे. बहुत महंगे कपड़े, खूब शौपिंग. किसी चीज की कमी नहीं.’’

अंकुर को लगता था कि नकद खर्च करने से पुलिस पकड़ नहीं पाएगी. नेहा को भरोसा था कि तकनीकी जानकारी उन्हें बचा लेगी.

मगर अपराधी चाहे कितना भी चालाक हो, कहीं न कहीं गलती करता ही है.

जांच के दौरान पता चला कि फरारी के कुछ दिनों बाद बड़ी मात्रा में सोना खरीदा गया था. खरीद नकद में हुई थी. दुकानदारों ने चेहरे तो याद नहीं रखे, मगर सीसीटीवी फुटेज में 2 धुंधले चेहरे कैद थे.

एक विशेष टीम ने फुटेज मिलाई, सब कुछ कदकाठी, चाल और हावभाव सब कुछ अंकुर और नेहा से मेल खा रहा था.

पुलिस अधिकारी ने कहा, ”इन्होंने पैसा छिपाने का तरीका चुना है. कैश पकड़ा जाता है, सोना नहीं.’’

लेकिन पुलिस को यह भी पता था कि उस के पास पैसा अभी बाकी है. इस का मतलब वे जल्दीबाजी में नहीं, स्थाई ठिकाना बना कर रह रहे हैं.

पुलिस टीम ने इंदौर, मध्य प्रदेश का पता, उन खातों को भी खंगाला जिन में रकम ट्रांसफर हुई थी. एक संदिग्ध खाते में खर्च का सुराग मिला. फिर मध्य प्रदेश में किराए के मकान के रिकौर्ड खंगाले गए.

आखिर टीम एक मकान मालिक तक पहुंची. उस ने बताया, ”एक कपल आया था. बोले निजी कंपनी में नौकरी करते हैं. एडवांस कैश दिया. ज्यादा किसी से मिले नहीं.’’

पुलिस टीम ने फोटो दिखाई. मकान मालिक चौंक गया, ”हां साहब, यही हैं.’’

अब पुलिस टीम के पास लोकेशन थी इंदौर, अरविंदो अस्पताल के पास एक पौश कालोनी.

18 जुलाई की सुबह दिल्ली से पुलिस टीम रवाना हुई. स्थानीय पुलिस को भी सूचना दी गई, मगर मामला गोपनीय रखा गया.

टीम के इंचार्ज ने कहा कि ध्यान रहे, दोनों पुलिस विभाग में रहे हैं. हथियार चलाना जानते हैं. सतर्क रहना.

शाम तक टीम मकान के आसपास तैनात हो चुकी थी. टीम का एक सदस्य दूध वाले के भेष में गली में घूम रहा था. दूसरा मोबाइल रिपेयर वाला बन कर सामने की दुकान पर बैठा था.

रात करीब साढ़े 8 बजे घर की खिड़की में रोशनी जली. अंदर दोनों मौजूद थे. संकेत मिलते ही टीम हरकत में आई.

दरवाजे पर दस्तक हुई.

”कौन?’’ ”पानी वाला.’’ जैसे ही कुंडी ढीली हुई, पुलिस ने दरवाजा धक्का दे कर खोल दिया. सामने नेहा थी. उसे समझते देर नहीं लगी.

”तुम लोग…यहां कैसे?’’ उस ने घबरा कर कहा. पीछे कमरे से अंकुर भागने की कोशिश में था, मगर 2 जवानों ने उसे दबोच लिया.

कुछ सेकेंड के संघर्ष के बाद दोनों काबू में थे. अंकुर चिल्लाया, ”तुम्हारे पास वारंट है?’’

टीम अधिकारी ने शांत स्वर में कहा, ”तुम को कानून याद है? अच्छा है…जेल में काम आएगा.’’

नेहा सिर झुका कर सोफे पर बैठ गई. उस की आंखों में पहली बार कानून का डर साफ दिखाई दे रहा था.

ऐसे खुली इन की पोल

टीम तलाशी के दौरान मौजमस्ती की पोल खुली. तलाशी के दौरान अलमारी खुली तो नोटों की गड्डियां मिलीं. एक बैग से सोने के सिक्के और बिसकुट निकले. ड्रेसिंग टेबल पर जेवर रखे थे. टेबल की ड्राअर से कई मोबाइल बरामद हुए. लैपटाप भी मिला, जिस में कई फरजी दस्तावेजों के ड्राफ्ट सेव थे.

12 लाख रुपए नकद, 820 ग्राम सोने के सिक्के और बिस्कुट, 200 ग्राम सोने के जेवर, एक लैपटाप, 11 स्मार्टफोन.

एक टीम अधिकारी ने तंज कसा, ”सरकारी नौकरी छोड़ कर कारोबार चल रहा था.’’

अंकुर चुप रहा. टूट गया उस का भ्रम.

दोनों को दिल्ली लाते समय रास्ते भर वे खामोश रहे. नेहा बाहर खिड़की से देख रही थी. शायद उसे अपना घर, परिवार और नौकरी याद आ रही थी.

अंकुर कभी सिर झुकाता, कभी आंखें बंद करता. जिस प्रेम के लिए दोनों ने सब कुछ छोड़ा था, अब वह प्रेम हथकड़ी की जंजीर में बंधा बैठा था.

दिल्ली पहुंचते ही पूछताछ शुरू हुई. धीरेधीरे तीनों बाहरी साथी इलियास, आरिफ और शादाब को भी उन के ठिकानों से गिरफ्तार कर लिया गया.

जब यह खबर मीडिया में आई तो दोनों परिवारों पर मानो बिजली गिर पड़ी हो. अंकुर की पत्नी ने सिर्फ इतना कहा, ”उस ने हमें किसी लायक नहीं छोड़ा.’’

नेहा के फेमिली वाले शर्म और सदमे में थे. जो लोग कभी अपने बच्चों पर गर्व करते थे, अब वे अपने ही मोहल्ले में नजर छिपाते फिर रहे थे.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ”अपराधी जब चोरी करता है तो कानून पकड़ता है. लेकिन जब कानून का आदमी चोरी करे तो समाज का भरोसा पुलिस पर से टूटता है.’’

अंकुर और नेहा ने सिर्फ पैसे नहीं चुराए थे, उन्होंने उस विश्वास को चोट पहुंचाई थी, जो जनता पुलिस पर करती है.

जेल की सलाखों के पीछे बैठे दोनों शायद अब समझ चुके थे कि फरारी, पैसा, सोना और छुट्टियां सब अस्थाई थीं.

स्थाई था सिर्फ अपराध का परिणाम. लालच ने उन्हें भागने पर मजबूर किया, जहां से वे गिरे थे.

जिन कंधों पर कभी स्टार चमकते थे, आज उन्हीं हाथों में हथकडिय़ां थीं. कहानी खत्म हो चुकी थी, लेकिन सबक बाकी था— खाकी पहन लेने से चरित्र नहीं बनता. और कानून से खेलने वाला एक रोज कानून के हाथों ही पकड़ा जाता है.   Delhi Police Fraud

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