Kanpur Family Crime. वंदना रोहित से प्यार तो करती थी, लेकिन शादी से इसलिए मना कर रही थी, क्योंकि वह जानती थी कि उस का यौनशोषण करने वाला सौतेला बाप उसे जल्दी छोड़ने वाला नहीं है. इस बात की जानकारी रोहित को हुई तो अपना प्यार पाने के लिए वह ऐसा गुनाह करने को तैयार हो गया, जिस के लिए उसे आजीवन जेल में रहना पड़ सकता है.

वंदना ने राहुल के हाथ से मोबाइल लिया और जल्दी से एक नंबर मिलाया. फोन रिसीव होते ही उस ने कहा, ‘‘हैलो, थाना नौबस्ता पुलिस…?’’   ‘‘जी, मैं थाना नौबस्ता से इंसपेक्टर राजीव कुमार द्विवेदी बोल रहा हूं. बताइए, आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘सर, मैं नौबस्ता के राजीव विहार की रहने वाली वंदना बोल रही हूं. मेरे साथ मेरा प्रेमी रोहित भी है. अपने प्रेमी राहुल के साथ मिल कर मैं ने अपने सौतेले पिता जगदीश गौतम की हत्या कर दी है. इस समय हम दोनों नौबस्ता की बंबा धोबिन पुलिया पर खड़े हैं. आप आ कर हमें गिरफ्तार कर लीजिए.’’

वंदना की बात सुन कर राजीव कुमार द्विवेदी हैरान रह गए. उन्होंने यह बात अधिकारियों को बता कर खुद यशोदानगर चौकीप्रभारी दिनेश कुमार, हैडकांस्टेबल रामऔतार एवं 3 अन्य सिपाहियों को साथ ले कर सरकारी जीप से धोबिन पुलिया पर पहुंच गए. वहां उन्हें एक लड़की और लड़का खड़ा दिखाई दिया. पुलिस जीप के रुकते ही लड़की आगे बढ़ी और राजीव कुमार द्विवेदी के पास आ कर बोली, ‘‘सर, मेरा नाम वंदना है. मैं ने ही आप को फोन किया था.’’

लड़की के इतना कहते ही पुलिस ने उसे और उस के साथी रोहित को हिरासत में ले कर जीप में बैठाया और घटनास्थल की ओर चल पड़े. वंदना के बताए अनुसार, पुलिस जीप राजीव विहार स्थित एक मकान के सामने जा कर रुक गई. वंदना ने जीप से उतर कर दरवाजे पर लगा ताला खोला तो राजीव कुमार सहयोगियों के साथ मकान में दाखिल हुए.

जगदीश गौतम की लाश आंगन में खून से लथपथ पड़ी थी. उस की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. लाश के पास ही खून से सना गैस सिलेंडर और सिल पड़ी थी. देखने से ही लग रहा था कि उसी सिल और सिलेंडर से उस की हत्या की गई थी. मृतक की उम्र 50-52 साल रही होगी. वह शरीर से हृष्टपुष्ट लग रहा था.

राजीव कुमार घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सीओ (गोविंदनगर) ज्ञानेंद्र सिंह फोरैंसिक टीम के साथ आ पहुंचे. उन्होंने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया, साथ ही फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. ज्ञानेंद्र सिंह ने मृतक के घर वालों से बात करनी चाही तो पता चला कि उस के घर वाले रमेडी तरौस गांव (हमीरपुर) में रहते हैं. इस के बाद उन्होंने घर वालों को लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

निरीक्षण के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की काररवाई की जाने लगी, साथ ही साक्ष्य के रूप में खूनआलूदा मिट्टी, हत्या में प्रयुक्त सिल और सिलेंडर को जब्त किया गया. काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया गया.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर राजीव कुमार द्विवेदी वंदना और रोहित को ले कर थाना नौबस्ता आ गए. थाने पर सीओ ज्ञानेंद्र सिंह की उपस्थिति में वंदना और रोहित से पूछताछ शुरू हुई. पूछताछ में पता चला कि वंदना का सौतेला बाप जगदीश उस का यौनशोषण करता था. आजिज आ कर उस ने उस की हत्या की थी.

राजीव कुमार ने मृतक के पिता रामपाल की ओर से जगदीश की हत्या का मुकदमा वंदना और रोहित के खिलाफ दर्ज कर लिया. वंदना के बयान के अनुसार, जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी—

हमीरपुर जनपद का एक गांव है रमेडी तरौस, जो हमीरपुर कोतवाली के अंतर्गत आता है. इसी गांव में जगदीश गौतम अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामवती के अलावा 4 बेटे थे. वह पिता के साथ खेतीकिसानी करता था, उसी की आमदनी से परिवार का भरणपोषण होता था.

समय बीतने के साथ बच्चे बड़े हुए और परिवार का खर्च बढ़ा तो जगदीश ने मजदूरों का एक संगठन बनाया और ठेके पर मजदूरों की सप्लाई करने लगा. इस से उसे ठीकठाक आमदनी होने लगी. आमदनी बढ़ी तो वह शराब पीने लगा. शराब पीने से पत्नी और बच्चे मना करते तो वह उन से मारपीट करता. आजिज आ कर 2 बेटे दिल्ली चले गए, बाकी दादा रामपाल के साथ रहने लगे.

परिवार बिखरने के बाद भी जगदीश में कोई सुधार नहीं आया. रामवती शराब पीने से मना करती तो वह उस पर कहर बन कर टूट पड़ता. घर में कलह बढ़ी तो रामवती चिंतित रहने लगी. इसी चिंता में वह बीमार रहने लगी. जगदीश ने न पत्नी की बीमारी की चिंता की और न ही उस का उचित इलाज कराया. परिणामस्वरूप एक साल तक बीमारी से जूझने के बाद रामवती की मौत हो गई.

पत्नी की मौत के बाद जगदीश तनहा हो गया. उस का साथ न तो मातापिता दे रहे थे और न बेटे. वह दिन भर मजदूरों के साथ काम पर रहता और रात को घर लौटता तो खुद ही खाना बनाता. ऐसे में उसे पत्नी की कमी बहुत खलती. औरत सुख से वंचित जगदीश की नजर किसी दिन किशना उर्फ किशनिया पर पड़ी. उस के पति सुमेर की मौत हो चुकी थी.

जगदीश की तरह किशनिया भी तनहा जिंदगी जी रही थी. उस का घर जगदीश के घर से कुछ ही दूरी पर था. उसे एक बेटा और 2 बेटियां थीं. मेहनतमजदूरी कर के वह तीनों बच्चों को पाल रही थी. जगदीश ने उस के घर आनाजाना शुरू किया तो दोनों ओर से आकर्षण ही नहीं बढ़ने लगा, बल्कि वे एकदूसरे को मन ही मन चाहने भी लगे.

लेकिन दिल की बात जुबान पर लाने की हिम्मत दोनों में से कोई नहीं कर सका. आखिर जब जगदीश से नहीं रहा गया तो एक दिन उस ने दिल की बात कह ही दी, ‘‘किशनिया, हम दोनों का दर्द एक जैसा है. तुम्हारा आदमी नहीं है और मेरी पत्नी. अगर हम दोनों एक हो जाएं तो हमारा दर्द दूर हो जाएगा. बोलो, मेरे साथ रहोगी?’’

कुछ देर सोचने के बाद किशनिया बोली, ‘‘जगदीश, शायद तुम ठीक ही कह रहे हो. आदमी के बिना औरत अधूरी होती है. तुम ने मेरा दर्द समझा और साथ रहने की इच्छा जाहिर की है तो मैं तुम्हारा साथ देने को तैयार हूं. लेकिन मेरी एक शर्त है.’’

‘‘कैसी शर्त?’’ जगदीश ने पूछा.   ‘‘तुम्हें भरी पंचायत में मुझे और मेरे बच्चों को अपनाना होगा.’’   ‘‘मुझे तुम्हारी यह शर्त मंजूर है.’’

इस के बाद जगदीश ने गांव की पंचायत बुलाई और ग्रामप्रधान तथा पंचों की उपस्थिति में किशनिया व उस के तीनों बच्चों को अपना लिया. लेकिन जगदीश के मांबाप और बेटों ने उस इस रिश्ते को स्वीकार नहीं किया.

किशनिया की बड़ी बेटी का नाम वंदना था. उस समय वह 10 साल की थी. जगदीश किशनिया तथा उस के बच्चों का अच्छी तरह से पालनपोषण कर रहा था.

जगदीश उस के सभी बच्चों को प्यार करता था, लेकिन वंदना पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहता था. वह जिस चीज की जिद करती, जगदीश उसे पूरी करता. लगभग 3 सालों तक जगदीश किशनिया के शारीरिक आकर्षण में बंधा रहा. लेकिन उस के बाद उस का मन उस से उचटने लगा.

दरअसल, उस की बेटी वंदना अब तक जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी. उस के शरीर में अब तक काफी बदलाव आ गया था, जिस से जगदीश की बुरी नजर उस के शरीर पर जमने लगी थी. अब वह मां की जगह बेटी को बिस्तर का साथी बनाने का सपना संजोने लगा था.

जगदीश अपने मकसद को पूरा करने के लिए रातदिन तानाबाना बुनने लगा. लाड़प्यार के बहाने वह वंदना से शारीरिक छेड़छाड़ करने लगा. वंदना तुनक जाती तो वह उसे बहलाफुसला कर मना लेता. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, जगदीश के मन में वंदना को पाने की इच्छा बढ़ती जा रही थी.

एक दिन उस ने चाल चलते हुए कहा, ‘‘किशनिया, तुम्हारी बेटी वंदना पढ़ने में बहुत तेज है. वह कक्षा 6 पास कर चुकी है. अब मैं इसे शहर ले जा कर पढ़ाना चाहता हूं, ताकि यह अपना भविष्य संवार सके.’’

किशनिया जगदीश की चाल को समझ नहीं सकी और उस ने वंदना को शहर ले जाने की इजाजत दे दी. किशनिया को हमीरपुर में कांशीराम योजना के तहत एक कालोनी एलाट हुई थी, जो अभी तक खाली पड़ी थी. जगदीश ने किशनिया तथा उस के बच्चों को उसी में शिफ्ट कर दिया और वंदना को ले कर कानपुर आ गया. यह जनवरी, 2015 की बात है.

कानपुर शहर में जगदीश ने थाना किदवईनगर के नटवन टोला में एक 2 कमरे का मकान किराए पर ले लिया और उसी में वंदन के साथ रहने लगा. वंदना को शहरी हवा लगी तो वह ठाटबाट से रहने लगी. उसे लगा कि उस का सौतेला बाप सचमुच उस का जीवन सुधारने शहर लाया है. उसे क्या पता था कि बाप के मन में क्या चल रहा है?

एक दिन आधी रात को हमेशा की तरह वंदना अपने कमरे में सो रही थी. रात के अंधेरे में उसे लगा कि उस की चारपाई पर बगल में कोई लेटा है. उस की नींद टूट गई. अंधेरे की वजह से वह अपने पास लेटे आदमी को तुरंत पहचान नहीं पाई, लेकिन इतना जरूर समझ गई कि उस का इरादा नेक नहीं है.

जब बगल में लेटा आदमी उस से छेड़छाड़ करने लगा तो वह घबरा कर उठने को हुई. उस आदमी ने उसे दबोच कर कहा, ‘‘चुपचाप लेटी रह, वरना गला दबा दूंगा.’’

आवाज से वंदन ने साथ लेटे आदमी को पहचान लिया. वह कोई और नहीं, उस का सौतेला बाप जगदीश था. खामोश रहने का मतलब था इज्जत लुटवाना. चुपचाप पड़ी रहने के बजाय वह छटपटाते हुए बोली, ‘‘पापा, नशे और नींद में तुम गलत बिस्तर पर आ गए हो. यह तुम्हारा नहीं, मेरा कमरा है.’’

जगदीश वंदना को अपने शैतानी चंगुल से मुक्त कर चारपाई से उतरा और अपनी सफाई में कुछ कहे बगैर कमरे से बाहर निकल गया. वंदना पर मंडराता खतरा दूर हो गया. इस के बाद वह चौकन्नी हो गई कि क्या पता नशेड़ी बाप फिर उस की चारपाई पर कब आ जाए. अगले 3-4 दिनों तक कोई अनहोनी नहीं हुई तो वह निश्चिंत हो गई.

लेकिन 5-6 दिनों बाद एक रात शारीरिक छेड़छाड़ से वंदना की नींद टूट गई. कमरे में रोज की तरह घुप्प अंधेरा था, फिर भी उस ने छेड़छाड़ करने वाले को पहचान लिया था. वंदना को समझते देर नहीं लगी कि बाप की नीयत ठीक नहीं है, वह उठने लगी तो उस ने दबोच लिया. वंदना गिड़गिड़ाने लगी तो वह गुर्रा कर बोला, ‘‘मेरा मजा किरकिरा मत कर, चुपचाप लेटी रह. मेरे काम में अड़ंगा डाला या शोर मचाया तो गला दबा दूंगा.’’

जान किसे प्यारी नहीं होती. सौतेले बाप की धमकी से वंदना डर गई. वह रोतेगिड़गिड़ाते हुए रिश्ते की दुहाई दे कर दया की भीख मांगती रही, लेकिन जगदीश के सिर पर वासना का शैतान ऐसा सवार था कि उस ने वंदना को बरबाद कर के ही छोड़ा.

सौतेले बाप के चंगुल से छूटने के बाद वंदना देर रात तक रोती रही. जगदीश वहीं बैठा उसे धमकाता रहा कि अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो वह उसे ही नहीं, उस की मां, बहन और भाई को भी मार देगा. सौतेले बाप की धमकी से वंदना बुरी तरह डर गई. इस के बाद तो जगदीश इंसान से हैवान बन गया. उस का जब मन करता, वह वंदना को अपनी हवस का शिकार बना लेता.

उसी बीच वंदना की मुलाकात रोहित से हुई. पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए. रोहित नवटन टोला में ही रहता था और चंद्रकुमार का एकलौता बेटा था. वह दादानगर स्थित प्लास्टिक की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. वह जो कमाता था, खुद पर खर्च करता था, सो खूब ठाटबाट से रहता था.

धीरेधीरे रोहित और वंदना की मुलाकतें बढ़ती गईं और उन के बीच की दूरियां कम होती गईं. रोहित ने प्यार का इजहार किया तो वंदना रोते हुए बोली, ‘‘रोहित, प्यार तो मैं भी तुम से करती हूं, लेकिन तुम्हारी जीवनसाथी नहीं बन सकती. बेहतर होगा कि तुम मुझे भूल जाओ.’’

‘‘क्यों नहीं बन सकती जीवनसाथी?’’ रोहित ने पूछा. ‘‘मेरे सौतेले बाप ने मेरी इज्जत लूट ली है. वह बाप नहीं, अस्मत का लुटेरा है. उस का जब जी चाहता है, तब मेरी अस्मत लूट लेता है. भला लुटी हुई लड़की से कौन शादी करेगा?’’

तुम्हारी व्यथा सुन कर मेरा प्यार और अधिक उमड़ पड़ा है. मैं तुम्हें वचन देता हूं कि आज के बाद हम साथ जिएंगे और साथ मरेंगे. प्यार में बाधक बनने वाले का डट कर मुकाबला करेंगे.

जगदीश गौतम को जब रोहित और वंदना के बीच पनप रहे प्यार की जानकारी हुई तो उस ने रोहित की पिटाई कर दी और वंदना पर कड़ा पहरा लगा दिया. यही नहीं, उस ने खतरा भांप कर वह मकान छोड़ कर चंदीपुरवा (नौबस्ता) में दूसरा मकान ले लिया. लेकिन रोहित वहां भी वंदना से मिलने आने लगा.

जनवरी, 2016 में जगदीश ने राजीव विहार (नौबस्ता) में दिनेश शुक्ला का मकान किराए पर लिया और वंदना के साथ उसी में रहने लगा. यहां 2-3 महीने शांति रही. इस के बाद रोहित यहां भी वंदना से मिलने आने लगा. इस बात की जानकारी जगदीश को हुई तो उस ने वंदना को फटकार लगाई और रोहित से झगड़ा कर के मारपीट की. रोजरोज की मारपीट से आजिज आ कर रोहित और वंदना ने कठोर निर्णय ले लिया.

25 जुलाई, 2016 की सुबह 10 बजे वंदना ने फोन कर के रोहित को घर बुलाया और जगदीश के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. जगदीश ने शादी का प्रस्ताव स्वीकार तो कर लिया, लेकिन साथ रहने की शर्त रख दी. दोनों जगदीश की हरकतों से वाकिफ थे, इसलिए उन्होंने उस की शर्त मानने से इनकार कर दिया.

उन के इनकार करते ही जगदीश हमलावर हो गया. वह रोहित को पीटने लगा. प्रेमी की पिटाई से क्षुब्ध वंदना ने पास रखी सिल उठाई और जगदीश के सिर पर पूरी ताकत से पटक दी. जगदीश जमीन पर गिर पड़ा तो वंदना ने उसी सिल से उस की छाती, पैरों व सिर पर कई वार कर दिए. मार खा कर रोहित को भी गुस्सा आ गया था. वह रसोई में रखा गैस सिलेंडर उठा लाया और जगदीश के सिर पर 2 बार पटक दिया. जगदीश का सिर फट गया और खून बहने लगा. चंद मिनट तड़प कर उस ने दम तोड़ दिया.

जगदीश की हत्या करने के बाद रोहित और वंदना घर के बाहर निकले. वंदना ने दरवाजा बंद कर के ताला लगाया और इत्मीनान से चले गए. आसपड़ोस वालों ने वंदना और रोहित को साथ जाते देखा जरूर, लेकिन किसी ने उन पर शक नहीं किया. दोनों 5 घंटे तक नौबस्ता में ही घूमते हुए सोचते रहे कि अब क्या किया जाए? जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो वंदना ने रोहित के मोबाइल से थाना नौबस्ता पुलिस को फोन कर के हत्या की सूचना दे दी. इस के बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया.

24 जुलाई, 2016 को थाना नौबस्ता पुलिस ने रोहित व वंदना को कानपुर की अदालत में मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से रोहित को जिला कारागार भेज दिया गया. चूंकि वंदना नाबालिग थी, इसलिए उसे बाल सुधार गृह भेज दिया गया.

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