UP News: मांगा सिंदूर मिली मौत

UP News: रचना की मांग में सिंदूर भले ही पति शिवराज के नाम का होता था, लेकिन वह प्रेमी संजय पटेल को ही पति मानती थी. वह प्रेमी के लिए तनमन से पूरी तरह समर्पित थी. पति शिवराज की मौत के बाद रचना ने संजय पर शादी का दबाव डाला तो ऐसी घटना घटी, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी…

संजय के लिए रचना से विवाह रचाना नामुमकिन था. वह गांव का पूर्वप्रधान था. गांव में उस की प्रतिष्ठा थी. रचना से विवाह कर वह अपनी मानमर्यादा को मिट्टी में नहीं मिलाना चाहता था, अत: उस ने रचना से पीछा छुड़ाने की सोची. मन में यह विचार आते ही संजय को रिश्ते के भतीजे संदीप पटेल व उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार की सुध आई. दोनों अपराधी प्रवृत्ति के थे. एक शाम संजय ने भतीजे संदीप और उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार से मुलाकात कर रचना से छुटकारा दिलाने में मदद की गुहार की.

रुपयों के लालच में वे दोनों राजी हो गए. इस के बाद संजय ने संदीप व प्रदीप की मदद से रचना की हत्या करने व उस की लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. संजय ने रचना की मौत का सौदा एक लाख रुपए में किया और प्रदीप को 15 हजार रुपए पेशगी दे दी. शेष रकम काम होने के बाद देने का वादा किया. 13 अगस्त, 2025 की दोपहर झांसी जनपद के थाना टोड़ी फतेहपुर के किशोरपुरा गांव निवासी विनोद पटेल पशुओं का चारा काटने अपने महेबा रोड स्थित खेत पर पहुंचा. वहां खेत किनारे बने कुएं से तेज बदबू आ रही थी. उस ने कुएं में झांक कर देखा तो कुएं के पानी में 2 बोरियां तैर रही थीं.

विनोद ने अपने खेत के कुएं में पड़ी 2 बोरियों से तेज बदबू आने की सूचना थाना टोड़ी फतेहपुर पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही एसएचओ अतुल कुमार राजपूत पुलिस बल के साथ किशोरपुरा गांव के बाहर स्थित विनोद के कुएं पर जा पहुंचे. उस समय वहां ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. एसएचओ अतुल कुमार राजपूत ने पुलिसकर्मियों व ग्रामीणों की मदद से दोनों बोरियों को कुएं से बाहर निकलवाया. बोरियां खोली गईं तो सभी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. प्लास्टिक की एक बोरी में महिला की लाश का गरदन से ले कर कमर तक का हिस्सा था, जबकि दूसरी बोरी में कमर से ले कर जांघ तक का हिस्सा था.

इस के बाद कुएं को खाली कराया गया तो उस में एक बोरी और मिली, जिस में कटा हुआ एक हाथ था. कलाई में लाल रंग का धागा बंधा हुआ था. महिला का सिर और पैर अब भी नहीं मिले थे. बिना सिर के लाश की शिनाख्त होनी मुश्किल थी. बोरियों में शव के टुकड़ों के साथ ईंटपत्थर भी भरे गए थे, ताकि बोरियां पानी में उतरा न सकें. इंसपेक्टर अतुल कुमार ने टुकड़ों में विभाजित महिला की लाश मिलने की सूचना पुलिस के आला अधिकारियों को दी तो कुछ देर बाद ही एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति, एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार तथा सीओ (सिटी) अनिल कुमार राय घटनास्थल आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने मृतका के अन्य अंगों की खोज में पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन सफलता नहीं मिली तो बरामद अंगों को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल झांसी भेज दिया. 72 घंटे बाद भी शव की शिनाख्त न होने पर उन का पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने अज्ञात में दाह संस्कार कर दिया गया. एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने महिला के इस ब्लाइंड मर्डर को बड़ी गंभीरता से लिया और उस की शिनाख्त व हत्याकांड के खुलासे के लिए एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार व सीओ अनिल कुमार की देखरेख में 18 टीमें गठित कीं.

टीम में टोड़ी फतेहपुर थाने के एसएचओ अतुल राजपूत, स्वाट प्रभारी जितेंद्र तक्खर, सर्विलांस टीम से दुर्गेश कुमार, रजनीश तथा तेजतर्रार दरोगा रजत सिंह, शैलेंद्र, हर्षित आदि को शामिल किया गया. टीम में शामिल पुलिसकर्मियों ने आंगनबाड़ी गु्रप, ग्राम पंचायत गु्रप, आशा वर्कर तथा राशन कोटेदारों का भी सहयोग लिया. 500 से अधिक सीसीटीवी फुटेज खंगाले. इतनी मशक्कत के बाद भी शव की पहचान नहीं हो पाई. अब तक यह मामला डीआईजी (झांसी रेंज) केशव चौधरी के संज्ञान में भी आ गया था. अत: उन्होंने इस ब्लाइंड मर्डर केस को जल्द से जल्द खोलने व हत्यारों को पकडऩे का आदेश एसपी व एसएसपी को दिया. इस आदेश के बाद पुलिस और भी सक्रिय हो गई.

इधर एसपी (ग्रामीण) की टीम भी जांच में जुटी थी. शव के टुकड़े जिन बोरियों में पाए गए थे, वे खाद की बोरियां थीं. उन पर कृभको लिखा था, लेकिन कोड नंबर साफ नजर नहीं आ रहा था. टीम यह जानना चाहती थी कि बोरी किस सहकारी समिति से खरीदी गईं और यह किस गांव के किसान ने खरीदी थीं. जांच के लिए टीम ने खाद की कई सहकारी समितियों से संपर्क किया, लेकिन कोड नंबर स्पष्ट न होने से कोई खास जानकारी हासिल न हो सकी. टीम ने बोरी से बरामद ईंट की मिट्टी का भी परीक्षण कराया तो जांच में टोड़ी फतेहपुर की मिट्टी पाई गई. जांच से यह बात स्पष्ट हो गई कि महिला टोड़ी फतेहपुर क्षेत्र के ही किसी गांव की हो सकती है.

इसी बीच मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के थाना चंदेरा के मैलवारा गांव निवासी दीपक यादव को किसी महिला के कटे अंग मिलने की खबर लगी. उस की बहन रचना भी 8 दिनों से गायब थी. 19 अगस्त, 2025 की सुबह 10 बजे दीपक यादव गांव के सरपंच मोनू यादव के साथ थाना टोड़ी फतेहपुर पहुंचा. उस ने इंसपेक्टर अतुल राजपूत को बताया कि उस की बहन रचना यादव इसी थाना क्षेत्र के महेबा गांव निवासी शिवराज यादव को ब्याही थी. शिवराज की मौत हो चुकी है.

इन दिनों रचना महेबा गांव के ही पूर्वप्रधान संजय पटेल के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. 8 अगस्त को उस ने रचना से बात करने की कोशिश की थी. वह किसी अस्पताल में भरती थी. बात करने के दौरान पूर्वप्रधान संजय पटेल ने रचना के हाथ से मोबाइल फोन छीन लिया और मुझे धमकाया कि फोन मत किया करो. 2 रोज बाद फोन किया तो संजय बोला कि मैं ने तेरी बहन को मार डाला है. यह सुन कर उसे लगा कि वह गुस्से व नशे में बात कर रहा है. लेकिन अब लग रहा है कि संजय पटेल ने उसे सचमुच मार डाला है. आप सच्चाई का पता लगाइए. दीपक यादव की बात सुन कर एसएचओ अतुल राजपूत ने रचना का फोन नंबर सर्विलांस पर लगाया. इस से पता चला कि रचना और पूर्वप्रधान संजय के बीच बातचीत होती रहती थी.

इस के बाद पुलिस टीम महेबा गांव पहुंची. वहां ग्रामीणों से पता चला कि रचना और पूर्व ग्राम प्रधान संजय के बीच अफेयर है. अब रचना लापता है. पुलिस टीम ने 20 अगस्त की रात नाटकीय ढंग से संजय पटेल व उस के भतीजे संदीप को टोड़ी फतेहपुर क्षेत्र के लखेरी बांध के पास से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने पर उन्होंने रचना की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया. संजय की निशानदेही पर पुलिस टीम ने हत्या में प्रयुक्त कार व मृतका रचना का मोबाइल फोन भी संजय के घर से बरामद कर लिया. संजय पटेल व संदीप को थाने लाया गया. थाने में जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस ने अपने भतीजे संदीप व उस के दोस्त प्रदीप के साथ मिल कर रचना की हत्या की थी. फिर उस ने शव के 7 टुकड़े कर 4 बोरियों में भरे थे. 3 बोरियां कुएं में फेंक दी थी तथा चौथी बोरी लखेरी नदी में डाल दी थी.

संजय व संदीप की निशानदेही पर पुलिस ने लखेरी नदी में नाव से सर्च औपरेशन चलाया और रचना का सिर, पैर व एक हाथ भी बरामद कर लिया. ये अंग भी बोरी में भरे गए थे. बरामद अंगों को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए झांसी के जिला अस्पताल भेज दिया. अभी तक पुलिस टीम ने 2 आरोपियों को तो गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन तीसरा आरोपी प्रदीप अहिरवार फरार था. 21 अगस्त, 2025 की रात 10 बजे पुलिस टीम ने एक मुठभेड़ के बाद प्रदीप अहिरवार को भी गिरफ्तार कर लिया. मुठभेड़ के दौरान उस के पैर में गोली लगी थी. कातिलों के पकड़े जाने के बाद डीआईजी केशव कुमार चौधरी, एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति तथा एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार ने झांसी पुलिस सभागार में एक संयुक्त प्रैस कौन्फ्रैंस कर रचना यादव हत्याकांड का खुलासा किया.

कातिलों को पकडऩे वाली पुलिस टीम पर आला कमान अधिकारियों ने इनामों की खूब बौछार की. डीआईजी केशव चौधरी ने टीम को 50 हजार रुपए नकद इनाम देने की घोषणा की. एसएसपी ने 20 हजार रुपए नकद पुलिस टीम को दिया. वहीं एसपी (ग्रामीण) डा. अरविंद कुमार ने भी 20 हजार रुपए नकद पुलिस टीम को पुरस्कार के रूप में दिए. चूकि कातिलों ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल भी बरामद करा दिया था, अत: एसएचओ अतुल राजपूत ने मृतका रचना के भाई दीपक यादव की तरफ से बीएनएस की धारा 103(1) तथा 201(3)(5) के तहत संजय पटेल, संदीप पटेल तथा प्रदीप अहिरवार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

रचना कौन थी? वह संजय पटेल के संपर्क में कैसे आई? संजय ने उस की हत्या क्यों और कैसे कराई? यह सब जानने के लिए रचना के अतीत की ओर झांकना होगा. मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के चंदेरा थाना अंतर्गत एक गांव है मैलवारा. इसी गांव में फूलसिंह यादव सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी लौंगश्री के अलावा एक बेटा दीपक तथा बेटी रचना थी. फूलसिंह प्राइवेट नौकरी करता था. फूलसिंह की बेटी रचना खूबसूरत थी. 16 बसंत पार करने के बाद जब उस ने जवानी की डगर पर पैर रखा तो उस की खूबसूरती में और भी निखार आ गया. जो भी उसे देखता, मंत्रमुग्ध हो जाता. रचना खूबसूरत तो थी, लेकिन पढ़ाई में उस का मन नहीं था. जैसेतैसे कर के उस ने दसवीं की परीक्षा पास की फिर घर के काम में मम्मी का हाथ बंटाने लगी.

फूल सिंह ने रचना की शादी टीकमगढ़ शहर के मोहल्ला सलियाना में रहने वाले जयकरन यादव से कर दी. वह तहसील में काम करता था. उस के 2 अन्य भाई थे, जो पन्ना शहर में नौकरी करते थे. शादी के बाद ससुराल में रचना के हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच वह 2 बेटियों की मां बन गई. बेटियों के जन्म के बाद जब खर्च बढ़ा तो घर में आर्थिक परेशानी रहने लगी. घर खर्च को ले कर रचना व जयकरन के बीच झगड़ा होने लगा. धीरेधीरे पतिपत्नी के बीच इतना मनमुटाव बढ़ गया कि रचना अपनी दोनों मासूम बेटियों को पति के हवाले कर मायके में आ कर रहने लगी.

मायके में कुछ समय तो उस का ठीक से बीता, उस के बाद घरपरिवार के लोगों के ताने मिलने लगे. भाई दीपक को भी रचना का ससुराल छोड़ कर मायके में रहना नागवार लगता था. गांव में उस की बदनामी होने लगी थी. घरपरिवार के तानों से परेशान रचना ने जैसेतैसे 2 साल मायके में बिताए. उस के बाद एक रिश्तेदार के माध्यम से रचना ने शिवराज यादव से विवाह कर लिया. शिवराज यादव झांसी जनपद के थाना टोड़ी फतेहपुर के गांव महेबा का रहने वाला था. वह किसान था. उस के पास 10 बीघा उपजाऊ भूमि थी. वह अपने बड़े भाई रघुराज के साथ रहता था.

शादी रचाने के बाद रचना अपने दूसरे पति शिवराज के साथ महेबा गांव में रहने लगी. रचना स्वच्छंद स्वभाव की थी. उसे घूंघट में रहना पसंद न था, अत: वह न जेठ से परदा करती थी और न ही बड़ीबुजुर्ग महिलाओं से. उस की अपनी जेठानी से भी नहीं पटती थी. घरेलू कामकाज को ले कर दोनों में अकसर तूतूमैंमैं होती रहती थी. रचना को संयुक्त परिवार में रहना पसंद न था, अत: वह पति पर अलग रहने का दबाव बनाने लगी. घर और जमीन के बंटवारे को ले कर रचना और शिवराज के बीच मनमुटाव शुरू हो गया. दोनों के बीच झगड़ा व मारपीट होने लगी. बंटवारे को ले कर रचना की कहासुनी जेठजेठानी से भी होने लगी.

अत: उस ने जेठ रघुराज पर इलजाम लगाना शुरू कर दिया कि वह उस पर बुरी नजर रखता है. 25 मई, 2023 की शाम रेप हत्या के इलजाम को ले कर रचना का जेठजेठानी व पति से झगड़ा हुआ. तीनों ने मिल कर रचना की जम कर पिटाई की. इस पिटाई ने आग में घी डालने जैसा काम किया. सुबह होते ही रचना थाना टोड़ी फतेहपुर में जेठ व पति के खिलाफ रेप व हत्या की कोशिश करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने रचना के जेठ रघुराज व पति शिवराज को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इस घटना के बाद रचना का ससुराल में रहना संभव न था, अत: वह एक बार फिर मायके आ गई. उस ने अपने भाई दीपक के सामने आंसू बहाए तो उस ने बहन को घर में शरण दे दी.

रचना के रेप व हत्या के प्रयास का मामला झांसी के गरौठा कोर्ट में शुरू हो चुका था. केस की पैरवी हेतु रचना को कोर्ट आना पड़ता था. गरौठा कोर्ट आतेजाते ही एक रोज रचना की मुलाकात संजय पटेल से हुई. दोनों एकदूसरे को पहले से ही जानते थे. जिस महेबा गांव में रचना की ससुराल थी, संजय पटेल भी उसी गांव का रहने वाला था. वह गांव का प्रधान भी रह चुका था. रचना और संजय की दोस्ती हो गई. दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. संजय अब रचना के केस की पैरवी करने लगा और उस की आर्थिक मदद भी करने लगा.

संजय नहीं चाहता था कि उस की प्रेमिका रचना उस से दूर मायके में रहे, अत: उस ने झांसी के गुरदासपुर में एक मकान किराए पर लिया और रचना को इस मकान में शिफ्ट कर दिया. संजय ने मकान में सारी सुविधाएं भी मुहैया करा दीं. इस के बाद रचना और संजय इस किराए के मकान में लिवइन रिलेशन में रहने लगे. रचना जो भी डिमांड करती, संजय उस डिमांड को पूरी करता. उस ने गहनोंकपड़ों से रचना को लाद दिया था. लाखों रुपए नकद भी दे चुका था. संजय पटेल शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. बड़ा बेटा 20 वर्ष की उम्र पार कर चुका था, लेकिन रचना से नाजायज रिश्ता जोडऩे के बाद उसे अपनी पत्नी ममता फीकी लगने लगी थी.

ममता को जब पता चला कि पति संजय व गांव के शिवराज की पत्नी रचना के बीच नाजायज रिश्ता है तो उसे अपना व बच्चों का भविष्य अंधकारमय लगने लगा. उस ने दोनों के नाजायज संबंधों का जम कर विरोध किया. घर में कलह मचाई, लेकिन वह सफल नहीं हो पाई. संजय और रचना के संबंध आम हो गए थे. शिवराज यादव को जब पत्नी रचना के नाजायज संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने माथा पीट लिया. वह पहले भी उस के परिवार को बदनाम कर चुकी थी, लेकिन अब तो उस ने हद ही कर दी थी. पत्नी के कृत्य से वह इतना टूट गया कि बीमार पड़ गया. जून, 2025 की 10 तारीख को उस की बीमारी के चलते मौत हो गई.

पति की मौत के बाद रचना विधवा हो गई, लेकिन रचना को विधवा कहलाना तथा विधवा का जीवन बिताना मंजूर नहीं था. एक शाम संजय पटेल अपनी प्रेमिका रचना से मिलने आया तो वह उदास बैठी थी. संजय ने उदासी का कारण पूछा तो वह बोली, ”संजय, तुम्हें तो पता ही है कि मैं विधवा हो गई हूं. लोग मुझे विधवा की नजर से देखें, यह मुझे पसंद नहीं है.’’

”तो तुम चाहती क्या हो?’’ संजय ने रचना से पूछा.

रचना बोली, ”संजय, तुम मेरी मांग में सिंदूर भर कर मुझे अपनी पत्नी बना लो. शेष जीवन मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूं.’’

रचना की बात सुन कर संजय को लगा कि जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. वह असमंजस की स्थिति में बोला, ”रचना, मैं कपड़ा, गहना, रुपयापैसा जैसी तुम्हारी हर डिमांड को पूरा कर रहा हूं. फिर यह सिंदूर जैसी अटपटी डिमांड क्यों?’’

रचना तुनक कर बोली, ”तुम्हें मेरी डिमांड अटपटी लग रही है. औरत का सब से कीमती गहना उस का सिंदूर होता है. वही मैं तुम से मांग रही हूं. सिंदूर के आगे बाकी सारी सुविधाएं फीकी हैं.’’

”रचना, मैं शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप हूं. तुम्हारी मांग में सिंदूर भर कर मैं अपनी पत्नी से विश्वासघात नहीं कर सकता.’’ संजय ने समझाया.

”जब मेरे साथ रात बिताते हो, मेरे शरीर को रौंदते हो, तब तुम पत्नी के साथ विश्वासघात नहीं करते. सिंदूर की मांग की तो मुझे विश्वासघात का पाठ पढ़ा रहे हो. मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनूंगी. तुम्हें मेरी मांग में सिंदूर भर कर पत्नी का दरजा देना ही होगा.’’

इस के बाद तो आए दिन सिंदूर की बात को ले कर रचना और संजय में तकरार होने लगी. संजय जब भी रचना से मिलने जाता, वह मांग में सिंदूर भरने और पत्नी का दरजा देने का दबाव बनाती. रचना अब उसे ब्लैकमेल करने पर उतर आई थी. रचना ने शादी की जिद पकड़ी तो संजय घबरा उठा. उस ने रचना को बहुत समझाया, लेकिन जब वह नहीं मानी तो उस ने रचना को खत्म करने का निश्चय किया. इस के लिए उस ने भतीजे संदीप व उस के दोस्त प्रदीप अहिरवार को चुना. दोनों अपराधी प्रवृत्ति के थे.

संदीप झांसी के बिजौली कस्बे में रहता था और एक फैक्ट्री में काम करता था. साल 2022 में उस ने एक महिला की हत्या की थी. हत्या के मामले में वह जेल गया था, जेल में ही संदीप की दोस्ती प्रदीप से हुई थी. प्रदीप अहिरवार मूलरूप से झांसी के थाना गरौंठा के गांव पसौरा का रहने वाला था, लेकिन मऊरानीपुर में किराए पर रहता था. वह आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहता था. संजय पटेल ने संदीप व प्रदीप अहिरवार से संपर्क कर रचना की मौत का सौदा किया. फिर हत्या करने व लाश को ठिकाने लगाने तथा किसी भी सूरत में पकड़े न जाने का प्लान बनाया.

संजय व उस के साथी रचना की हत्या करते, उस के पहले ही रचना 6 अगस्त, 2025 को बीमार पड़ गई. संजय ने उसे झांसी के प्राइवेट अस्पताल रामराजा में भरती कराया. रचना को ब्लीडिंग हो रही थी. 2 दिन में रचना ठीक हो गई. 8 अगस्त को संजय उसे डिस्चार्ज करा कर घर लाने पहुंचा तो वह बोली, ”यहीं से कोर्ट चलो. शादी करने के बाद ही घर में जाएंगे.’’ संजय ने उसे समझाया, लेकिन वह मान नहीं रही थी. संजय ने तब रचना को ठिकाने लगाने की ठान ली. उस ने संदीप से बात की और उसे अस्पताल बुला लिया. संदीप ने तब दोस्त प्रदीप से बात की और उसे तैयार रहने को कहा. उस ने तेजधार वाली कुल्हाड़ी का इंतजाम करने की भी बात प्रदीप से कही.

सब कुछ तय होने के बाद संजय ने रचना को 9 अगस्त, 2025 की शाम 5 बजे अस्पताल से डिस्चार्ज कराया. हालांकि वह डिस्चार्ज होने से मना कर रही थी, लेकिन जब संजय ने दूसरे रोज 10 अगस्त को शादी करने का वचन दिया तो वह मान गई. संजय की कार अस्पताल के बाहर ही खड़ी थी. वह कार की पीछे की सीट पर बैठ गई. उस के बगल में संजय भी बैठ गया. संदीप कार ले कर हाइवे पर आया तो संजय बोला, ”रचना, तुम इतने दिन अस्पताल में रही, तुम्हारा मन खराब हो गया होगा. थोड़ा घूम कर आते हैं.’’

लगभग एक घंटा सफर के बाद संजय मऊरानीपुर हाइवे पहुंचा. यहां प्रदीप अहिरवार उस का पहले से इंतजार कर रहा था. उस ने प्लास्टिक बोरी में लिपटी कुल्हाड़ी कार की डिक्की में रखी. फिर आगे की सीट पर संदीप के बगल में आ कर बैठ गया. इस के बाद यह लोग घूमते रहे. एक जगह रुक कर संजय ने शराब खरीदी और तीनों ने मिल कर कार के अंदर ही शराब पी. घूमते हुए सभी लहचूरा बांध पर कार ले कर पहुंचे. अब तक अंधेरा हो गया था. वहां सन्नाटा छाया था. प्रदीप कार में बैठी रचना से बोला, ”भाभी, तुम कितनी भी जिद कर लो, लेकिन संजय भैया तुम से शादी नहीं करेंगे.’’

इतना सुनते ही रचना भड़क गई और प्रदीप से बोली, ”तुम कौन होते हो यह सब कहने वाले?’’

रचना ने संजय से पूछा तो उस ने भी कह दिया कि प्रदीप ठीक बोल रहा है. वह उस से शादी नहीं कर सकता. तब रचना गुस्से से बोली, ”मैं क्या सिर्फ मजे लेने के लिए हूं. शहर वापस चलो. तुम सब को देख लूंगी. सब के दिमाग ठिकाने लग जाएंगे.’’

रचना की धमकी सुनते ही संदीप व प्रदीप ने उसे दबोच लिया और संजय ने कार में ही गला घोंट कर रचना को मार डाला. शव में पत्थर बांध कर लहचूरा डैम में फेंकने गए तो वहां पुलिस की गाड़ी खड़ी थी. कार में लाश थी, इसलिए तीनों वहां से भाग निकले. फिर वह लाश फेंकने खजूरी नदी पहुंचे, लेकिन वहां गार्ड था, इसलिए शव को नहीं फेंक सके. आधी रात को संजय साथियों के साथ किशोरपुरा गांव पहुंचा. गांव के बाहर सड़क किनारे उस ने कार रोकी. यहां खेत के पास कुआं था. तीनों ने मिल कर रचना के शव को कार से निकाला और कुएं में फेंकने को ले आए. लेकिन यहां से संजय का गांव महेबा मात्र 5 किलोमीटर दूर था, जिस से शव की पहचान हो सकती थी. अत: उन्होंने समूचा शव कुएं में नहीं फेंका.

शातिर अपराधी प्रदीप कार से कुल्हाड़ी ले आया, फिर रचना के शव के 7 टुकड़े किए. शव के अंगों को 4 बोरियों में भरा गया. बोरियां पानी में न उतराएं, इस के लिए बोरियों में ईंटपत्थर भी भर दिए. फिर बोरियों का मुंह बांध कर 3 बोरियां कुएं में फेंक दीं और चौथी बोरी जिस में सिर व पैर थे, कार में रख कर वहां से 7 किलोमीटर दूर रेवन गांव के पास लखेरी नदी के पुल पर आए. इस के बाद पुल के नीचे नदी में बोरी फेंक दी. शव को ठिकाने लगाने के बाद संजय ने कार से प्रदीप को मऊरानीपुर तथा संदीप को विजौली पहुंचाया, फिर खुद कार ले कर अपने गांव महेबा आ गया.

संजय को विश्वास था कि उस का अपराध उजागर नहीं होगा, लेकिन यह उस की भूल थी. भीषण बरसात के कारण कुएं का जलस्तर बढ़ा तो बोरियां उतराने लगीं. 13 अगस्त, 2025 की दोपहर किशोरपुरा गांव का विनोद पटेल चारा काटने खेत पर गया तो कुएं में बोरियां उतराती दिखीं और उन से दुर्गंध भी आ रही थी. उस ने सूचना पुलिस को दी. पूछताछ करने के बाद 23 अगस्त, 2025 को पुलिस ने आरोपी संजय पटेल, संदीप पटेल तथा प्रदीप अहिरवार को झांसी कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. UP New

 

UP Crime News : चाहत बनी आफत

UP Crime News : उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर के थाना संदना का एक गांव है हरिहरपुर. रामप्रसाद का परिवार इसी गांव में रहता था. खेती किसानी करने वाले रामप्रसाद के परिवार में पत्नी सोमवती के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे. उन में संगीता सब से बड़ी थी. सांवले रंग की संगीता का कद थोड़ा लंबा था. संगीता जवान हुई तो रामप्रसाद ने उस की शादी अपने ही इलाके के गांव रसूलपुर निवासी मुन्नीलाल के बेटे परमेश्वर के साथ कर दी. यह 6 साल पहले की बात थी.

परमेश्वर के पास 7 बीघा जमीन थी, जिस पर वह खेतीबाड़ी करता था. समय के साथ संगीता 3 बच्चों रजनी, मंजू और रजनीश की मां बनी. शादी के कुछ दिनों बाद ही परमेश्वर अपने घर वालों से अलग रहने लगा, इसलिए पत्नी और बच्चों के भरणपोषण और खेतीबाड़ी की पूरी जिम्मेदारी उसी पर आ गई थी. परमेश्वर खेतों पर जी तोड़ मेहनत करता तो संगीता बच्चों और घर की जिम्मेदारी संभालती. घरगृहस्थी के चक्रव्यूह में फंस कर परमेश्वर यह भी भूल गया कि उस की पत्नी अभी जवान है और उस की कुछ भी हैं.

यह मानव स्वभाव में है कि जब उस की शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो उस में चिड़चिड़ापन आ जाता है. ऐसा ही कुछ संगीता के साथ भी था. वह परमेश्वर से अपने मन की चाह के बारे में भले ही खुल कर बता नहीं पाती थी, लेकिन चिड़चिड़ेपन की वजह से लड़ जरूर लेती थी. इस तरह दोनों के बीच कहासुनी होना आम बात हो गई थी.

गांव में ही बाबूराम का भी परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटियां और 4 बेटे थे. इन में छोटू को छोड़ कर बाकी सभी भाईबहनों की शादियां हो चुकी थीं.19 वर्षीय छोटू वैवाहिक समारोहों में स्टेज बनाने का काम करता था. जब काम न होता तो वह गांव में खाली घूमता रहता था. छोटू परमेश्वर को बड़े भाई की तरह मानता था, इसलिए उस का काफी सम्मान करता था.

एक दिन परमेश्वर खेत पर काम कर रहा था तो छोटू वहां पहुंच गया. उसे वहां आया देख परमेश्वर ने उसे अपने घर से खाना लाने भेज दिया. छोटू परमेश्वर के घर पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात संगीता से हुई. संगीता उसे नहीं जानती थी. उस ने अपने बारे में बता कर संगीता से खाने का टिफिन लगा कर देने को कहा तो संगीता टिफिन में खाना लगाने लगी.

छोटू जवान हो चुका था. इस मुकाम पर महिलाओं के प्रति आकर्षण स्वाभाविक होता है. वह चोर निगाहों से संगीता के यौवन का जायजा लेने लगा. छोटू कुंवारा था, इसलिए नारी तन उस के लिए कौतूहल का विषय था. संगीता के यौवन को देख कर छोटू के तन में कामवासना की आग जलने लगी. वह मन ही मन सोचने लगा कि अगर संगीता का खूबसूरत बदन उस की बांहों में आ जाए तो मजा आ जाए.

संगीता का भी यही हाल था. उसे परमेश्वर से वह सब कुछ हासिल नहीं हो रहा था, जिस की उसे चाह थी. छोटू के बारे में ही सोचतेसोचते उस ने टिफिन में खाना लगा कर उसे थमा दिया. जब छोटू खाना ले कर जाने लगा तो संगीता भी ठीक वैसा ही सोचने लगी, जैसा थोड़ी देर पहले छोटू सोच रहा था. छोटू शारीरिक रूप से हट्टाकट्टा नौजवान ही नहीं था, बल्कि कुंवारा भी था. पहली ही नजर में वह संगीता को भा गया था.

दूसरी ओर छोटू का भी वही हाल था. वह दूसरे दिन का इंतजार करने लगा. परमेश्वर ने जब दूसरे दिन भी उस से खाना लाने को कहा तो वह तुरंत परमेश्वर के घर के लिए रवाना हो गया. वह उस के घर पहुंचा तो संगीता घर के बाहर ही बैठी थी. छोटू को देखते ही संगीता खुश हो गई. वह उसे प्यार से अंदर ले गई. जवान छोटू उसे एकटक निहार रहा था.

छोटू को अपनी ओर एकटक देखते पा कर संगीता ने उस का ध्यान भंग करते हुए कहा, ‘‘ऐसे एकटक क्या देख रहे हो, कभी जवान औरत को नहीं देखा क्या?’’

छोटू तपाक से बोला, ‘‘देखा तो है, पर तुम्हारी जैसी नहीं देखी.’’

संगीता शरमाने का नाटक करती हुई अंदर चली गई और वहीं से उस ने छोटू को आवाज लगाई, ‘‘अंदर आ जाओ, आज खाना लगाने में थोड़ी देर लगेगी.’’

उस के आदेश का पालन करते हुए छोटू अंदर आ गया. दोनों बैठ कर बातें करते हुए एकदूसरे के प्रति आकर्षित होते रहे. अब यही रोज का क्रम बन गया. स्त्रीपुरुष एकदूसरे की तरफ आकर्षित होते हैं तो मतलब की बातों का सिलसिला खुदबखुद जुड़ जाता है. मौका देख एक दिन छोटू ने संगीता की दुखती रग को छेड़ दिया, ‘‘भाभी, तुम खुश नहीं लग रही हो. लगता है, भैया तुम्हारा ठीक से खयाल नहीं रखते?’’

‘‘खुश होने की वजह भी तो होनी चाहिए. तुम्हारे भैया तो सिर्फ खेतों के हो कर रह गए हैं, घर में जवान बीवी है, इस की उन्हें कोई परवाह ही नहीं है.’’

‘‘भैया से इस बारे में बात करतीं तो तुम्हारी समस्या जरूर दूर हो जाती.’’

‘‘मैं ने कई बार उन्हें इस बात का अहसास दिलाया, लेकिन वह अपनी इस जिम्मेदारी को समझने को तैयार ही नहीं हैं. उन्हें पूरे घर की जिम्मेदारी तो दिखती है, लेकिन मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती.’’ संगीता ने बड़े ही निराश भाव से कहा. मौका देख कर छोटू ने अपने मन की बात उस के सामने रख दी, ‘‘भाभी, निराश मत हों. अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें वह खुशियां दे सकता हूं, जो परमेश्वर भैया नहीं दे पा रहे हैं.’’

अपनी बात कह कर छोटू ने संगीता को चाहत भरी नजरों से देखा तो संगीता ने भी उस की आंखों में आंखें डाल दीं. उस की आंखों में जो जुनून था, वह उस की सुलगती कामनाओं को ठंडा करने के लिए काफी था. संगीता ने उस के हाथों में अपना हाथ दे दिया. छोटू उस की सहमति पा कर खुशी से झूम उठा. इस के बाद संगीता ने अपने तन की आग में सारी मर्यादाओं को जला कर राख कर दिया.

एक बार दोनों ने अपने नाजायज रिश्ते की इबारत लिखी तो वह बारबार दोहराई जाने लगी. इसी के साथ उन के रिश्ते में गहराई भी आती गई. रसूलपुर में ही प्रमोद नाम का एक युवक रहता था. उस के पिता हरनाम भी खेतीकिसानी करते थे. 23 वर्षीय प्रमोद अविवाहित था. वह भी परमेश्वर की पत्नी संगीता पर फिदा था और उसे अपने जाल में फांसने का प्रयास करता रहता था.

एक दिन मौका देख कर उस ने संगीता से अपने दिल की बात कह दी. लेकिन संगीता ने उस से संबंध बनाने से साफ इनकार कर दिया. प्रमोद इस से निराश नहीं हुआ. उस ने अपनी तरफ से कोशिश जारी रखी. इसी बीच उसे संगीता के छोटू से बने नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया. प्रमोद को यह बात बिलकुल पसंद नहीं आई कि संगीता उस के अलावा किसी और से संबंध रखे. उस ने परमेश्वर के सामने उन दोनों के नाजायज रिश्ते की पोल खोल दी. परमेश्वर को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मन में शक जरूर पैदा हो गया.

अगले ही दिन परमेश्वर रोज की तरह छोटू से खाना लाने को कहा. छोटू खाना लाने चला गया तो परमेश्वर भी छिपतेछिपाते उस के पीछे घर की तरफ चल दिया. छोटू घर में जा कर संगीता के साथ रंगरलियां मनाने लगा. चूंकि दोपहर का समय था और किसी के आने का अंदेशा नहीं था, इसलिए दोनों बिना दरवाजा बंद किए ही एकदूसरे से गुंथ गए.

अभी कुछ पल ही बीते थे कि किसी ने भड़ाक से दरवाजा खोल दिया. अचानक दोनों ने घबरा कर दरवाजे की तरफ देखा तो सामने परमेश्वर खड़ा था. उस की आंखों से चिंगारियां फूट रही थीं. उस ने पास पड़ा डंडा उठाया तो छोटू वहां से भागा. लेकिन भागते समय परमेश्वर का डंडा उस की कमर पर पड़ गया. दर्द की एक तेज लहर उस के बदन में दौड़ गई, लेकिन वह रुका नहीं.

उस के जाने के बाद परमेश्वर ने संगीता की जम कर पिटाई की. संगीता ने परमेश्वर से किए की माफी मांग ली और आगे से कभी दोबारा ऐसा कदम न उठाने की कसम खाई. लेकिन एक बार विश्वास की दीवार में दरार आ जाए तो उसे किसी भी तरह भरा नहीं जा सकता.

ऐसे में परमेश्वर भला संगीता पर कैसे विश्वास करता? छोटू ने उस के परिवार की इज्जत से खेलने की जो हिमाकत की थी, उसे वह बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. इस आग में घी डालने का काम किया प्रमोद ने. वह परमेश्वर को छोटू से बदला लेने के लिए उकसाने लगा.

दरअसल प्रमोद यह सब सोचीसमझी साजिश के तहत कर रहा था. उस ने सोचा था कि परमेश्वर छोटू की हत्या कर देगा तो वह छोटू के परिजनों से मिल कर परमेश्वर को जेल भिजवा देगा. इस से छोटू और परमेश्वर नाम के दोनों कांटे उस के रास्ते से हट जाएंगे. फिर संगीता को पाने से उसे कोई नहीं रोक पाएगा.

आखिर प्रमोद ने परमेश्वर को छोटू को मार कर बदला लेने के लिए मना ही लिया. परमेश्वर के कहने पर इस साजिश में वह भी शामिल हो गया. परमेश्वर के कहने पर संगीता को भी इस साजिश में शामिल होना पड़ा. क्योंकि इस के अलावा उस के सामने कोई चारा नहीं था.

24 मार्च की रात परमेश्वर ने संगीता से कह कर छोटू को अपने घर बुलाया. परमेश्वर और प्रमोद घर में ही छिप कर बैठे थे. छोटू घर आया तो संगीता उस के पास बैठ कर मीठीमीठी बातें करने लगी. देर रात होने पर परमेश्वर और प्रमोद चुपचाप बाहर निकले और पीछे से छोटू के गले में अंगौछे का फंदा बना कर डाल कर पूरी ताकत से कसने लगे.

छोटू छूटने के लिए छटपटाने लगा. इस से वह जमीन पर गिर पड़ा. छोटू के जमीन पर गिरते ही संगीता ने उस के पैर कस कर पकड़ लिए तो परमेश्वर व प्रमोद ने पूरी ताकत से अंगौछे से छोटू का गला कस दिया. कुछ ही देर में उस का शरीर शांत हो गया. उस की मौत हो गई.

प्रमोद ने छोटू की जेब से उस का मोबाइल निकाल लिया. इस के बाद परमेश्वर और प्रमोद लाश को एक बोरी में भर कर पास के गांव मेदपुर में मुन्ना सिंह के खेत में ले जा कर डाल आए. बोरी को उन्होंने सरकंडे और घासफूस से ढक दिया था. दूसरे दिन छोटू दिखाई नहीं दिया तो घर वालों ने उस की तलाश शुरू की. लेकिन जब काफी कोशिशों के बाद भी उस का कुछ पता नहीं चला तो 26 मार्च, 2014 को उस के पिता बाबूराम ने थाना संदना में उस की गुमशुदगी लिखा दी.

28 मार्च को मेदपुर में गांव के कुछ लोगों ने मुन्ना सिंह के खेत में एक लाश पड़ी देखी तो यह खबर आसपास के गांवों तक फैल गई. बाबूराम को पता चला तो वह भी अपने घर वालों के साथ वहां पहुंच गया. वहां पड़ी लाश देख कर बिलखबिलख कर रोने लगे. लोगों द्वारा सांत्वना देने के बाद सभी किसी तरह शांत हुए तो लाश की सूचना थाना संदना पुलिस को दी गई.

सूचना पा कर थानाप्रभारी राजकुमार सरोज पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. मृतक छोटू के गले में अगौंछा पड़ा हुआ था. गले में उस के कसे जाने के निशान भी मौजूद थे. इस से यही लगा कि उसी अंगौछे से उस की गला घोंट कर हत्या की गई थी. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय सीतापुर भिजवा दिया.

थाने लौट कर थानाप्रभारी राजकुमार सरोज ने बाबूराम की लिखित तहरीर पर परमेश्वर और संगीता के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. दूसरी ओर इस की भनक लगते ही पकड़े जाने के डर से परमेश्वर संगीता के साथ फरार हो गया.

30 मार्च की सुबह 8 बजे थानाप्रभारी राजकुमार सरोज ने एक मुखबिर की सूचना पर संदना-मिसरिख रोड पर भरौना पुलिया के पास से परमेश्वर और संगीता को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब पूछताछ की गई तो दोनों ने छोटू की हत्या की पूरी कहानी बयां कर दी.

31 मार्च को सुबह साढ़े 7 बजे पुलिस ने प्रमोद को भी गोपालपुर चौराहे से गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया.

दरअसल, प्रमोद छोटू की हत्या करवाने के बाद छोटू के घर वालों से जा कर मिल गया था. उसी ने ही उन्हें बताया था कि छोटू और संगीता के नाजायज संबंध थे, जिस के बारे में परमेश्वर को पता चल गया था. इसी वजह से परमेश्वर ने संगीता के साथ मिल कर छोटू की हत्या की थी. प्रमोद ही लाश मिलने की जगह भी बाबूराम को ले गया था. बाबूराम ने उसी की बातों के आधार पर परमेश्वर और संगीता के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई थी. इतनी चालाकी के बावजूद भी प्रमोद खुद को कानून के शिकंजे से नहीं बचा सका और पकड़ा गया. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Etawah News : देवर के इश्क में सुहाग की बलि

Etawah News : 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद मधु के अवैध संबंध फुफेरे देवर रोहित के साथ हो गए. अवैध संबंधों की राह पर वह ऐसी फिसली कि संभल नहीं पाई. साथ ही उस ने प्रेमी के साथ मिल कर ऐसे क्राइम को अंजाम दिया, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.

उस रोज मधु ने मस्टर्ड कलर की साड़ी और ब्लैक कलर का ब्लाउज पहन रखा था. इन कपड़ों में उस का गोरा रंग खूब खिल रहा था. रोहित कुछ देर उसे एकटक देखता रहा, फिर मुसकराते हुए बोला, ”भाभी, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

मधु के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. वह सवालिया नजरों से रोहित को देखने लगी. रोहित ने उस की झील सी आंखों में झांकते हुए कह दिया, ”तुम बहुत हसीन हो भाभी, हजारों में न सही, लेकिन सैकड़ों में एक जरूर हो.’’

अपनी तारीफ सुन कर मधु के गाल गुलाबी हो गए. बरबस उस के होंठों पर मुसकान तैर गई. वह मन की खुशी को छिपाते हुए बोली, ”चलो हटो, आजकल तुम बातें बनाना सीख गए हो.’’

”मैं सच कहता हूं भाभी, ”रोहित उत्साह में आ कर उस के सामने आ खड़ा हुुआ, ”कहो तो मैं सबूत भी दे सकता हूं कि आज तुम कितनी हसीन लग रही हो.’’

मधु ने गौर से रोहित को देखा फिर थोड़ी अदा से कहा, ”दो सबूत?’’

”मेरी आंखों में देखो, आईना तो झूठ बोल सकता है, पर मेरी आंखें झूठ नहीं बोलेंगी. आंखों में तुम्हारा अक्स जो कैद है, वह दुनिया की सब से हसीन औरत का है.’’ रोहित ने बड़े प्यार से मधु को देखा.

मधु के होंठों पर शरारत तैर गई. उस ने रोहित की आंखों में देखा, फिर निचला होंठ दबाते हुए बोली, ”चल झूठे, तेरी आंखों में तो मुझे कुछ और ही दिखाई दे रहा है.’’

”तुम्हारी तसवीर के सिवाय कुछ और हो ही नहीं सकता. बताओ, तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?’’

”एक तमन्ना… एक प्यास,’’ मधु ने मादक स्वर में कहा.

”भाभी, जब तुम ने मेरी तमन्ना देख ही ली है तो उसे पूरी कर दो न.’’ रोहित ने हिम्मत जुटा कर मधु का हाथ पकड़ लिया.

”कर दूंगी, वक्त आने दो.’’ मधु ने रोहित के गाल पर प्यार की चपत लगाई.

”कब भाभी, आखिर कितना इंतजार कराओगी?’’

”ज्यादा नहीं, सिर्फ एक दिन का.’’ मधु नशीली नजरों से देवर को देख कर बोली, ”अब हाथ तो छोड़ दो.’’

”पहले वादा करो भाभी, तभी हाथ छोड़ूंगा.’’

”पक्का वादा.’’ मधु ने कहा तो रोहित ने उस का हाथ छोड़ दिया.

उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद का एक चर्चित कस्बा है लखुना. यह कस्बा सोनेचांदी के व्यवसाय के लिए दूरदूर तक मशहूर है. ग्रामीण क्षेत्र के ज्यादातर लोग शादीविवाह में इसी कस्बे से आभूषण बनवाते हैं.

इसी लखुना कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामबेटी के अलावा 2 बेटे अजय, अमर तथा 2 बेटियां राधा व मधु थीं. रामबाबू पढ़ालिखा तो न था, लेकिन आभूषण बनाने का उम्दा कारीगर था. वह ज्वैलरी की दुकान में काम करता था. उस के परिवार का भरणपोषण उस की सैलरी से होता था.

मधु भाईबहनों में सब से छोटी थी. वह अपने अन्य भाईबहनों से ज्यादा सुंदर थी. पढ़ाईलिखाई में भी तेज थी. हाईस्कूल पास कर के वह आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, लेकिन मम्मीपापा उसे आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे. वह पढ़ाई छोड़ कर मम्मी के साथ घरेलू काम में हाथ बंटाने लगी. हालांकि वह मम्मीपापा के इस निर्णय से खुश नहीं थी.

मधु ने सोलहवां वसंत पार किया तो रामबाबू को उस के ब्याह की चिंता सताने लगी. एक कहावत है, ‘जब बेटी हुई सयानी, फिर पेटे नहीं समानी.’ इसी कहावत के चरितार्थ रामबाबू भी अपनी बेटी की शादी के लिए योग्य लड़का ढूंढने लगा. काफी दौड़धूप के बाद उस की नजर मनोज कुमार पर जा कर ठहर गई.

मनोज कुमार के पापा तहसीलदार, इटावा जिले के इकदिल कस्बा में रहते थे. परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी रागिनी तथा बेटा मनोज कुमार था. रागिनी की शादी वह आगरा के बाह कस्बा निवासी श्याम सिंह के साथ कर चुके थे. श्याम सिंह डाक्टर था.

मनोज अभी कुंवारा था. मनोज रंगरूप से तो सांवला था, लेकिन शरीर से मजबूत था. पढ़ालिखा भी था. सरकारी नौकरी की तलाश में उस ने जूते घिसे. लेकिन जब नौकरी नहीं मिली तो वह कस्बे में ही प्राइवेट नौकरी करने लगा. कुछ खेती की जमीन भी थी, उस की भी देखभाल मनोज ही करता था. रामबाबू ने मनोज को अपनी बेटी मधु के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद फरवरी, 2010 में मधु का विवाह मनोज कुमार के साथ धूमधाम से हो गया.

सुहाग के जोड़े में सजीधजी मधु पहली बार ससुराल आई तो मुंह दिखाई रस्म में सभी ने उस के रूपरंग की तारीफ की. मनोज भी मधु जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था. वह अपने भाग्य पर इतरा उठा था. सब खुश थे, लेकिन मधु खुश नहीं थी. उस ने जिस तरह के पति की कल्पना की थी, मनोज वैसा नहीं था.

मधु ने सपना संजो रखा था कि उस का पति हैंडसम, तेजतर्रार और आधुनिक विचारों वाला होगा. जबकि मनोज उस की अपेक्षाओं से बिलकुल विपरीत था. सांवले रंग का मनोज देहाती भाषा बोलता था और रहनसहन भी साधारण था.

लेकिन अब जैसा भी था, मनोज उस का पति था. मन मसोस कर मधु ने जीवन की शुरुआत की. धीरेधीरे कई साल बीत गए. इस बीच मधु 2 बेटों अमित व सुमित की मां बनी. 2 बच्चों के जन्म से घर में खुशियां तो बढ़ गईं, लेकिन आर्थिक बोझ भी बढ़ गया. मनोज अधिक कमाई की सोचने लगा. लेकिन उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कौन सा काम करे, जिस से उस की आमदनी में इजाफा हो.

काफी सोचविचार के बाद उस ने घरों में ब्रेड, चाय, बिसकुट सप्लाई का काम शुरू कर दिया. इस धंधे से उस की अतिरिक्त कमाई तो होने लगी, लेकिन इस काम से वह बहुत थम जाता था.

मधु की सास की मौत हो चुकी थी. अत: घर की चाबी उसी के हाथ में थी. मनोज नौकरी व व्यवसाय में जो भी कमाई करता था, वह सब मधु के हाथ पर ही रखता था. खेती से होने वाली आमदनी का हिसाब भी मधु ही रखती थी. मधु के ससुर तहसीलदार नाममात्र के घर के मालिक थे. वह तो केवल घर खेत की रखवाली करते थे. खेतों पर उन्होंने झोपड़ी बना रखी थी. उन का ज्यादा समय खेतों पर ही बीतता था. वह केवल खाना खाने घर आते थे.

मनोज कड़ी मेहनत करता था. वह सुबह उठ कर फेरी लगाता, फिर 10 बजे नौकरी पर चला जाता तो फिर रात गए ही लौटता था. थकान के बहाने वह शराब भी पीने लगा था. धीरेधीरे वह शराब का लती हो गया. मधु शराब पीने को मना करती तो वह उस पर नाराज हो जाता था.

मधु 2 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन उस के रूपरंग में अभी भी कोई कमी नहीं आई थी. वह बनसंवर कर रहती थी. दूसरी तरफ मनोज का मन सैक्स से हट गया था. 2 बच्चे पैदा करने के बाद उस ने पत्नी की भावनाओं को समझना बंद कर दिया था. मधु हर रात पति का साथ चाहती थी, लेकिन शराब का लती मनोज उस का साथ नहीं दे पाता था. नतीजा यह निकला कि मधु पति से किनारा कर के अपने लिए जिस्म का साथी तलाशने लगी.

इन्हीं दिनों मधु की निगाह रोहित पर पड़ी. रोहित थाना एकदिल के गांव बुसा का रहने वाला था. रिश्ते में मनोज रोहित का ममेरा भाई यानी मामा का बेटा था. इस नाते मनोज की पत्नी मधु और रोहित के बीच देवरभाभी का रिश्ता था.

25 वर्षीय रोहित गबरू जवान था. वह एलआईसी व पोस्ट औफिस का एजेंट था. बचत योजनाओं में लोगों का पैसा जमा कराता था और अच्छी कमाई करता था, जिस से वह ठाटबाट से रहता था. मधु भी पोस्ट औफिस में पैसा जमा करने जाती थी, अत: उस का मधु के घर आनाजाना लगा रहता था. रोहित रसभरी लच्छेदार बातें करता था, इसलिए मधु से उस की खूब पटती थी.

उम्र में रोहित मधु से 5 साल छोटा था. दोनों का देवरभाभी का रिश्ता था, सो उन के बीच खूब हंसीमजाक होती थी. मधु भी उस की बातों में खूब रस लेती थी. उस के मन के किसी कोने में जैसे साथी की तसवीर थी, वह रोहित जैसी ही थी.

यही वजह थी कि मधु रोहित को चाहने लगी थी. रोहित तो वैसे ही उस का दीवाना था. वह मधु भाभी से प्रीत जोड़ कर अपनी तन्हाइयों से निजात पाने के सपने देखा करता था.

उस रोज जब रोहित घर आया तो वह मधु के रूपरंग की तारीफ करने लगा और अपनी रसभरी बातों से मधु को रिझाने लगा. इस से मधु का दिल उमंगों से भर गया. उधर रोहित भी भाभी के लिए बेताब था. उस ने वह रात सपने संजोतेसंजोते गुजारी. अगले दिन उस की चाहत पूरी होने वाली थी.

रोहित सुबह देर से जागा. दोपहर हुई तो तैयार हो कर बाइक से मधु के घर की ओर रवाना हो लिया. लगभग 10 किलोमीटर की दूरी तय कर वह मधु के घर पहुंच गया. मधु उसी का इंतजार कर रही थी. उस दिन उस ने अपने आप को कुछ खास तरह से संवारा था. रोहित ने कमरे में पहुंचते ही मधु को अपनी बांहों में समेट लिया, ”भाभी, आज तो हूर की परी लग रही हो. जी चाहता है कि…’’

”थोड़ा सब्र से काम लो देवरजी,’’ मधु ने प्यार से उसे एक चपत लगाई, ”मैं दरवाजा तो बंद कर लूं.’’

 

रोहित ने मधु को बाहुपाश से मुक्त कर दिया. मधु दरवाजे तक गई, बाहर का जायजा लिया. बाहर दोपहर का सन्नाटा था. मधु ने दरवाजा बंद किया और मुसकान बिखेरती हुई रोहित के सामने आ खड़ी हुई. ख्वाबों की तसवीर अब उस के सामने थी. रोहित बावला सा हो गया. उस ने मधु को बाहुपाश में भरा और बिस्तर पर ले गया. इस के बाद तो कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं. दोनों के जिस्म तभी जुदा हुए, जब उन्हें तृप्ति मिल गई.

उस दोपहर अनीति की आग में मर्यादा स्वाहा हुई तो फिर यह खेल अकसर खेला जाने लगा. मधु को रोहित पसंद था. उसे उस की बांहों में असीम सुख मिलता था. देवर से अवैध रिश्ता बना तो मधु पति को तनमन से भूल सी गई. उस ने उस की परवाह करनी भी बंद कर दी. यही नहीं, मधु रोहित के साथ बाइक पर बैठ कर बाजार में घूमने भी जाने लगी.

छिप न सके दोनों के अवैध संबंध

जब देवरभाभी की हर दोपहर रंगीन होने लगी तो बातें बाहर भी फैलने लगीं. इसी बीच एक रोज गांव का एक युवक खेतों पर पहुंचा और झोपड़ी में बैठे मनोज के पिता तहसीलदार से बोला, ”दद्ïदा, आप तो यहां खेतों पर पड़े रहते हो. घर में क्या अनर्थ हो रहा है, तुम्हें कुछ पता भी है?’’

”मेरे घर में और अनर्थ? यह तुम कैसी बातें कर रहे हो?’’ तहसीलदार ने प्रश्न किया.

”दद्ïदा, नहीं पता है तो सुनो. बुसा गांव का रिश्तेदार रोहित अकसर तुम्हारे घर दोपहर में आता है. उस के आते ही तुम्हारी बहू मधु दरवाजा बंद कर लेती है. आप तो बुजुर्ग हैं. बंद दरवाजे के भीतर बहू क्या गुल खिलाती होगी, आप को भी समझना चाहिए.’’

युवक तो अपनी बात कह कर बीड़ी फूंकता हुआ चला गया, लेकिन तहसीलदार के मन में शंकाओं के बादल उमडऩेघुमडऩे लगे. वह सोचने लगा, ‘रोहित खास रिश्तेदार है. क्या वह वास्तव में उस की पीठ में इज्जत का छुरा घोंप रहा है. जल्द ही असलियत का पता लगाना होगा. मनोज को भी अलर्ट करना होगा.’

असलियत जानने के लिए तहसीलदार ने घर की निगरानी शुरू कर दी. चंद दिनों में ही उसे पता चल गया कि बहू मधु बदचलन है. उस का रोहित से टांका भिड़ा है. दोनों बंद कमरे में मर्यादा को तारतार करते हैं. उन्होंने इस बाबत मनोज को अलर्ट किया कि वह अपनी पत्नी मधु व घर पर आने वाले रोहित पर नजर रखे. उन के बारे में पूरे मोहल्ले में खुसरफुसर हो रही है.

मनोज ने इस बाबत मधु से बात की तो वह उसे ही आंखें दिखाते हुए बोली, ”लोगों के बहकावे में आ कर मेरे कैरेक्टर पर शक करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई. रोहित रिश्ते में मेरा देवर है. पोस्ट औफिस की किस्त लेने घर आता है. देवरभाभी के रिश्ते से हम दोनों हंसीमजाक कर लेते हैं. कमाल है, पासपड़ोस के लोग देवरभौजाई के रिश्ते को भी शक की नजर से देखते हैं.’’

आधी रात को चूडिय़ों की आवाज ने खोली पोल

मनोज के पास पत्नी की चरित्रहीनता का कोई सबूत तो था नहीं, सो वह चुप रह गया. उस ने सोचा कि जब तक सच अपनी आंखों से नहीं देखेगा, किसी की बात पर विश्वास नहीं करेगा. मनोज चुप हो गया तो मधु ने इसे अपनी जीत मान लिया. एक महीने तक वह रोहित से दूर रही. उस के बाद फिर अनीति की आग में बदन सिंकने लगे.

उस रोज भी मनोज रोजाना की तरह सुबह 10 बजे ड्यूटी गया था. उस के जाने के बाद ही रोहित उस के घर आ गया. उसी समय मनोज वापस आ गया. मधु और रोहित वासना के नशे में चूर थे. जल्दबाजी में दोनों अंदर से दरवाजा बंद करना भी भूल गए. उढ़का हुआ दरवाजा आहिस्ता से खोल कर मनोज सीधा कमरे में पहुंच गया. वहां का नजारा देख कर उस की आंखें गुस्से से लाल हो गईं.

मधु और रोहित रंगेहाथों पकड़े गए तो दोनों अपराधबोध से कांपने लगे. मनोज ने दोनों की खबर ली. मौके की नजाकत समझ कर मधु ने पति से अपनी गलती की माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने कसम खाई कि भविष्य में वह रोहित से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखेगी. रोहित ने भी मनोज के पैर पकड़ते हुए कहा, ”बड़े भैया, मुझ से बड़ी भूल हो गई, इस बार माफ कर दो. आइंदा ऐसी भूल नहीं होगी.’’

मनोज ने देवरभाभी को इसलिए माफ कर दिया था ताकि मोहल्ले में घर की इज्जत नीलाम न हो. लेकिन इस के बाद वे दोनों पर कड़ी नजर रखने लगा. जिस दिन मनोज रोहित को घर में देख लेता तो उसे फटकार लगाता. मधु जवाबसवाल करती तो वह उस की पिटाई कर देता, परंतु पति की मार का मधु पर कोई असर नहीं पड़ता था. वह रोहित के प्यार में इस कदर पागल थी कि एक दिन भी उस से अलग नहीं रहना चाहती थी. रोहित को भी मधु के बिना चैन नहीं था.

रोहित अब अकसर संडे के दिन आता था. उस दिन मनोज की भी छुट्टी रहती थी, इसलिए वह घर पर ही मिलता था. ऐसा वह इसलिए करता था ताकि आने पर मनोज को शक न हो. उस रोज मधु स्वादिष्ट खाना बनाती थी. शाम को दोनों बैठ कर शराब पीते थे, फिर खाना खाते थे. मधु बड़ी चालाकी से मनोज की सब्जी में नींद की गोलियां पीस कर मिला देती थी. नतीजन खाने के बाद मनोज चारपाई पर लेटता तो कुछ देर बाद उसे नींद आ जाती थी. मनोज जब खर्राटे भरने लगता तो रोहित मधु के कमरे में पहुंच जाता. फिर दोनों रंगरलियां मनाते.

लेकिन मधु की यह चाल ज्यादा समय तक न चली और उस का यह भांडा भी फूट गया. दरअसल, उस रोज मनोज की तबियत कुछ नरम थी. इसलिए उस ने लती होने के बावजूद रोहित के साथ बैठ कर शराब नहीं पी. वह कमरे में जा कर लेट गया. उस ने खाना भी कमरे में ही मंगवा लिया. मधु ने खाने में नशीली गोलियां तो मिलाई थीं, लेकिन उस ने खाना आधाअधूरा ही खाया और थाली चारपाई के नीचे रख दी. कुछ देर बाद मधु उस के कमरे में पहुंची तो मनोज करवट लिए लेटा था. मधु ने समझा कि वह गहरी नींद में है. कुछ देर बाद वह रोहित के बिस्तर पर पहुंच गई.

आधी रात के बाद मनोज पेशाब करने के लिए उठा तो उस के बगल में सो रही मधु गायब थी. वह दबे पांव कमरे से निकल कर आंगन में आ गया. आंगन में आते ही मनोज के पांव ठिठक गए. आंगन से सटे कमरे में फुसफुसाहट और चूडिय़ों के खनकने की आवाजें आ रही थीं. मनोज सधे कदमों से कमरे के पास पहुंचा. दरवाजा उढ़का हुआ था, उस ने दरवाजा ढकेला तो खुल गया. कमरे के अंदर रोहित और मधु निर्वस्त्र हो कर एकदूसरे से गुंथे थे.

रिश्ते के भाई रोहित के साथ मधु को रंगरलियां मनाते देख कर मनोज की मर्दानगी जाग उठी. उस ने पहले दोनों को जलील किया और फिर जम कर मधु की पिटाई की. सुबह उस ने रोहित को भी फटकारा और घर आने को साफ मना कर दिया. अपराधबोध के चलते रोहित चला गया. उस ने मनोज के घर आना बंद कर दिया. रोहित का घर आना बंद हुआ तो मनोज ने राहत की सांस ली, लेकिन यह उस की भूल थी. मधु और रोहित कुछ महीनों तक एकदूसरे से दूर रहे और मोबाइल फोन के जरिए अपनी दिल की लगी बुझाते रहे. उस के बाद उन का फिर से मिलन होने लगा.

मधु रोहित की इस कदर दीवानी थी कि उसे उस के बिना कुछ भी नहीं सुहाता था. अब वह सागभाजी या घर का सामान लाने का बहाना बना कर घर से निकलती और पहुंच जाती रोहित के बताए स्थान पर. जिस्मानी मिलन के बाद मधु घर आ जाती थी. एक रोज मनोज दोपहर में घर आ गया. उस समय घर में ताला लगा था. उस ने पड़ोसियों से मधु के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अकसर घर में ताला लगा कर कहीं चली जाती है. पड़ोसियों की बात सुन यह सोच कर मनोज का माथा ठनका कि कहीं वह रोहित से मिलने तो नहीं जाती. वह सोच ही रहा था कि हाथ में थैला लिए मधु आती दिखाई दी. पास आते ही वह बोली, ”आज इतनी जल्दी आ गए आप?’’

”हां, मैं तो आ गया. पहले तुम बताओ कहां गई थी?’’ मनोज ने मधु को शक की नजर से देखते हुए पूछा.

”और कहां जाऊंगी, सब्जी लेने गई थी.’’ मधु ने रूखी आवाज में जवाब दिया.

”सब्जी लेने क्या रोज जाती होï?’’ मनोज ने सवाल किया तो मधु बोली, ”नहीं, आज ही गई थी.’’

”पड़ोसी तो कहते हैं कि तुम आए दिन घर से निकल जाती हो?’’

”पड़ोसी जलते हैं. उन्हें हमारे घर में कलह कराने में मजा आता है, इसलिए तुम्हारे कान भरते हैं. तुम्हारा बूढ़ा बाप भी मुझे शक की नजर से देखता है और ताकझांक में लगा रहता है और तुम ऐसे शक्की इंसान हो कि भरोसा कर लेते हो.’’ मधु ने पति को बरगलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन मनोज नहीं माना. उस ने लांछन लगाते हुए मधु को पीट दिया.

मधु भी ढीठ थी. उस ने तय कर रखा था कि पति कितना भी पूछे, लांछन लगाए पर वह रोहित का साथ नहीं छोड़ेगी. एक रोज मधु रोहित से मिलने पहुंची. वह उसे होटल में ले गया. वहां कमरे में रोहित के सामने उस के मन का दुख आंखों से छलक पड़ा. मधु रोआंसी आवाज में बोली, ”रोहित, मनोज ने मेरा जीना हराम कर दिया है. जब मन होता है, तुम्हारा नाम ले कर मुझे पीटने लगता है. अब मैं उस के साथ नहीं रह सकती. मुझे उस से निजात दिलाओ, नहीं तो मैं खुदकुशी कर लूंगी.’’

”ऐसा मत कहो भाभी,’’ रोहित ने उसे बांहों में भर लिया, ”तुम नहीं मरोगी, बल्कि वह मरेगा जो हमारी खुशियों का दुश्मन है.’’

”यह ठीक रहेगा. उस के जीते जी हम सुख से नहीं जी पाएंगे. तुम किसी सुपारी किलर के जरिए उसे ठिकाने लगवा दो. इस काम के लिए जो रुपया लगेगा, मैं खर्च कर दूंगी. कुछ रुपया पेशगी भी दे दूंगी.’’

पत्नी ने क्यों दी हत्या की सुपारी

भाभी के प्यार में आकंठ डूबे रोहित ने उसे पूरी तरह हासिल करने के लिए ममेरे भाई मनोज की हत्या का फैसला कर लिया. इस के बाद वह सुपारी किलर की तलाश में जुट गया. लेकिन वह सुपारी किलर हायर करने में सफल नहीं हुआ. रोहित शातिरदिमाग था. उस ने सोचा कि यदि वह स्वयं ही मनोज को ठिकाने लगा दे तो सुपारी किलर को दी जाने वाली रकम उसे ही मिल जाएगी. किसी को कानोकान खबर भी नहीं लगेगी. मन में लालच समाया तो उस ने सावधानी के साथ मधु से मुलाकात की. रोहित ने मधु से कहा कि सुपारी किलर का इंतजाम हो गया है. मोलभाव के बाद साढ़े 3 लाख रुपए में सौदा तय हुआ है. 20 हजार रुपए पेशगी देने होंगे.

रोहित की बात सुन कर मधु बोली, ”रोहित, तुम्हारे प्यार में मैं पागल हूं. तुम्हें पाने के लिए और पति से छुटकारा के लिए मुझे सौदा मंजूर है, लेकिन अभी मेरे पास 15 हजार रुपया है. कल एकदिल रेलवे स्टेशन पर मिलना, वहीं रुपए दे दूंगी. बाकी रकम काम होने के बाद ज्वैलरी बेच कर व एफडी तुड़वा कर दे दूंगी.’’ दूसरे रोज 15 हजार रुपए मिलने के बाद रोहित ने ममेरे भाई मनोज की हत्या का प्लान तैयार किया. इस प्लान में उस ने अपने छोटे भाई राहुल को भी शामिल कर लिया. राहुल बेरोजगार था और पैसेपैसे के लिए परेशान था, इसलिए पैसा मिलने के लालच में भाई का साथ देने को राजी हो गया.

दोनों भाइयों के बीच तय हुआ कि मनोज को इटावा की नुमाइश दिखाने के बहाने इटावा लाया जाए, फिर लौटते समय रास्ते में शराब पिला कर उसे ठिकाने लगा दिया जाए. लेकिन मनोज को नुमाइश दिखाने कैसे लाया जाए. क्योंकि उस के मन में तो रोहित के प्रति गुस्सा भरा था. रोहित ने इस के लिए कोशिश करनी शुरू कर दी. वह उस के घर तो नहीं जाता, लेकिन जब कभी एकदिल कस्बे में मुलाकात हो जाती तो रोहित झुक कर मनोज के पैर छूता, गलती के लिए माफी मांगता, फिर ठेके पर ले जा कर उसे शराब पिलाता. बारबार माफी मांगने और शराब पार्टी करने से कुछ दिनों बाद मनोज के मन में रोहित के प्रति भरा गुस्सा ठंडा पड़ गया.

प्रेमिका के पति की हत्या तो कर दी लेकिन…

3 जनवरी, 2025 की दोपहर रोहित अपनी बाइक से मनोज के एकदिल कस्बा के खेड़ापति मोहल्ला स्थित घर पहुंचा. उस समय मनोज घर पर ही था. रोहित ने उस के पैर छू कर कहा, ”मनोज भैया, इटावा नुमाइश देखने जा रहा हूं. आप भी साथ चलते तो मजा और ही होता. नुमाइश देख कर व खानेपीने के बाद वापस घर आ जाएंगे.’’ चूंकि मनोज शराब का लती था, इसलिए खानेपीने के लालच में रोहित के साथ चलने को राजी हो गया. वह यह भी जानता था कि सारा खर्चा रोहित ही करेगा, इसलिए वह फटाफट तैयार हुआ और रोहित के साथ नुमाइश देखने को बाइक से घर से निकल लिया. अपनी योजना के तहत रोहित ने अपने छोटे भाई राहुल को भी साथ ले लिया.

शाम 5 बजे तीनों इटावा नुमाइश पहुंचे. यहां रात 9 बजे तक वह सब नुमाइश देखते रहे. फिर रोहित मनोज के साथ शराब ठेके पर पहुंचा और दोनों ने शराब पी. राहुल ने शराब नहीं पी. अद्धा बोतल शराब रोहित ने खरीद कर सुरक्षित भी रख ली. इस के बाद तीनों ने एक होटल में खाना खाया. फिर खापी कर तीनों घर वापस जाने को निकल पड़े. योजना के तहत रोहित जब यमुना पुल के करीब सुनवारा बाईपास पर पहुंचा तो उस ने बाइक रोक दी. यहां रोहित ने मनोज को फिर शराब पिलाई. मनोज जब नशे में धुत हो गया, तब रोहित व राहुल ने उसे दबोच लिया और ईंट से सिर कूंच कर मनोज की हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद दोनों मनोज के शव को यमुना नदी में फेंकने के इरादे से बाइक पर रखा और चल पड़े. लेकिन यमुना नदी तक पहुंचने के पहले ही उन की बाइक फिसल गई और शव सड़क किनारे गिर पड़ा. पकड़े जाने के डर से रोहित व राहुल शव को वहीं छोड़ कर भाग गए. इस बीच मोबाइल फोन के जरिए मधु रोहित के संपर्क में थी. उसे सारी जानकारी मिल रही थी. अब तक रात के 12 बज चुके थे. रोहित ने घर आ कर कार सवार बदमाशों द्वारा मनोज को मारनेपीटने व उस के किडनैप की झूठी खबर फेमिली वालों को दी. यह बात सुनते ही घर में कोहराम मच गया. बेटे के किडनैप की बात सुन कर तहसीलदार घबरा उठा. उस ने फोन के जरिए दामाद श्याम सिंह को खबर दी. मधु त्रियाचरित्र का नाटक कर रोनेपीटने लगी. उस की रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी इकट्ठा होने लगे.

सुबह तहसीलदार अपने दामाद श्याम सिंह व अन्य फेमिली वालों के साथ सुनवारा बाईपास के पास पहुंचा और मनोज की खोज शुरू की. यमुना पुल से एक किलोमीटर पहले जब दोनों मानिकपुर जाने वाली रोड पर पहुंचे तो लोगों की भीड़ देखी. पता चला कि किसी युवक की लाश पड़ी है. उस लाश को तहसीलदार ने देखा तो फफक पड़ा, क्योंकि लाश मनोज की थी. लाश जिस जगह सड़क किनारे पड़ी थी, वह क्षेत्र इटावा के बड़पुरा थाने के तहत था, इसलिए पुलिस को सूचना दी गई. सूचना पाते ही बड़पुरा थाने के एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी पुलिस बल के साथ वहां आ गए.

उन की सूचना पर एसएसपी संजय कुमार वर्मा तथा सीओ (भरथना) नागेंद्र चौबे भी आ गए. पुलिस अधिकारियों को तहसीलदार ने बताया कि लाश उन के बेटे मनोज की है. कल दोपहर बाद वह रिश्ते के भाई रोहित के साथ नुमाइश देखने गया था. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक मनोज की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी. उस का सिर जख्मी था. देखने से ऐसा लग रहा था कि उस की मौत किसी वाहन से टकराने से हुई थी. शव को पोस्टमार्टम के लिए इटावा के जिला अस्पताल भिजवा दिया गया.

ससुर ने बहू पर क्यों जताया शक

घटनास्थल पर पिता तहसीलदार मौजूद था. पुलिस अधिकारियों ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने बेटे मनोज की हत्या का शक जाहिर किया. उस ने बताया कि बुसा गांव निवासी रोहित का उस के घर आनाजाना था. रिश्ते में वह मनोज का भाई है. रोहित और उस की बहू मधु के बीच नाजायज रिश्ता बन गया था, जिस का वह और मनोज विरोध करते थे. रोहित ही उसे कल घर से ले गया था. अब मनोज की हत्या की गई या दुर्घटना से मौत हुई, इस का राज तो रोहित और उस की बहू के पेट में ही छिपा है. सुबह बहू भी रोहित के साथ ही चली गई है.

शक के आधार पर एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने मनोज की मौत के खुलासे के लिए सीओ नागेंद्र चौबे की देखरेख में एक पुलिस टीम गठित कर दी. इस टीम ने रोहित व मधु की टोह में इकदिल, भरथना, लखुना आदि स्थानों पर छापा मारा, लेकिन उन का पता नहीं चला. पुलिस टीम ने रोहित के बुसा गांव स्थित घर पर भी छापा मारा तो पता चला कि रोहित के साथ उस का भाई राहुल भी घर से गायब है. 5 जनवरी, 2025 की दोपहर एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी जमुना पुल के करीब वाहन चेकिंग कर रहे थे. तभी एक बाइक पर 3 सवारी दिखीं. उन्होंने बाइक रोकने का प्रयास किया तो वे भागने लगे. तब पीछा कर पुलिस ने उन्हें दबोच लिया. इन तीनों में एक महिला थी. तीनों को थाना बड़पुरा लाया गया.

थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो पता चला कि महिला का नाम मधु है और वह मृतक मनोज कुमार की पत्नी है. उस के साथ जो अन्य 2 युवक थे, उन में से एक रोहित और दूसरा रोहित का भाई राहुल था.

उन तीनों से जब मनोज की मौत के बारे मे पूछा गया तो उन्होंने मनोज की हत्या ईंट से सिर कूंचकर करने का जुर्म कुबूला. रोहित ने बताया कि मनोज उस का ममेरा भाई था. घर आनेजाने के दौरान मनोज की पत्नी मधु से उस के संबंध बन गए थे. इस रिश्ते का मनोज विरोध करता था. इसलिए उस ने मधु के साथ मिल कर हत्या की योजना बनाई.

फिर उसे नुमाइश दिखाने के बहाने भाई राहुल के साथ इटावा ले गए. वापसी में राहुल के साथ मिल कर ईंट से सिर कूंच कर मनोज की हत्या कर दी और शव छोड़ कर भाग गए. रोहित ने जुर्म कुबूलने के बाद हत्या में प्रयुक्त ईंट भी बरामद करा दी, जो उस ने झाडिय़ों में फेंक दी थी. एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी ने मनोज की हत्या का खुलासा करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसएसपी संजय वर्मा ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की और मीडिया के सामने मनोज की हत्या का खुलासा किया. उन्होंने 24 घंटे के अंदर खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 10 हजार रुपए पुरस्कार देने की भी घोषणा की.

चूंकि हत्यारोपियों ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल खून से सनी ईंटभी बरामद करा दी थी, इसलिए बड़पुरा थाने के एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी ने मृतक के पिता तहसीलदार को वादी बना कर बीएनएस की धारा 103(1), 238/61(2) तथा 3(5) के तहत मधु, रोहित व राहुल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

6 जनवरी, 2025 को पुलिस ने मधु, रोहित राहुल को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन तीनों को जिला जेल भेज दिया गया.

 

 

Crime Update : चार बच्चों की मां ट्यूशन टीचर के साथ हुई फरार

रुखसाना ने कम उम्र में मर्दों की लत लगा कर जो गलती की, वह शादी ही नहीं, 4 बच्चों की मां बनने के बाद भी नहीं छूटी. उसी का नतीजा है कि आज वह पति की हत्या के आरोप में जेल में है. खटखट की आवाज से असलम की आंख खुली तो आंखों की कड़वाहट से ही वह समझ गया कि अभी सवेरा नहीं हुआ  है. लाइट जला कर उस ने समय देखा तो रात के 2 बज रहे थे. उतनी रात को कौन गया? असलम सोच ही रहा था कि दोबारा खटखट की आवाज आई. वह झट से उठा. रात का मामला था, इसलिए बिना पूछे दरवाजा खोलना ठीक नहीं था. उस ने पूछा, ‘‘कौन?’’

बाहर से सहमी सी आवाज आई, ‘‘भाईजान, मैं रुखसाना.’’

रुखसाना का नाम सुन कर उस ने झट से दरवाजा खोल दिया. क्योंकि वह उस की पड़ोसन थी. सामने खड़ी रुखसाना से उस ने पूछा, ‘‘भाभीजी आप, सब खैरियत तो है?’’

‘‘माफ कीजिएगा भाईजान, आप को इतनी रात को तकलीफ दी.’’ रुखसाना ने कहा तो असलम बोला,‘‘जाबिरभाई और बच्चे तो ठीक हैं ?’’

‘‘असलमभाई, मुझे लगता है, मेरे घर कोई अनहोनी हो गई है. काफी देर पहले जाबिर टौयलेट के लिए ऊपर गए थे. लेकिन अभी तक वह नीचे नहीं आए हैं. मेरा जी घबरा रहा है.’’

‘‘नीचे नहीं आए, क्या मतलब? मैं समझा नहीं?’’ असलम ने हैरानी से कहा.

‘‘आज उन की तबीयत ठीक नहीं थी. शाम को भी देर से आए थे. खाना खाने के बाद दवा ली और सो गए. थोड़ी देर बाद वह टौयलेट जाने के लिए उठे. नीचे वाला टौयलेट खराब था, इसलिए मैं ने उन्हें ऊपर जाने को कहा. वह ऊपर वाले फ्लोर पर चले गए. जबकि मैं लेटी ही रही. काफी देर हो गई और वह ऊपर से नीचे नहीं आए तो मेरा जी घबराने लगा. इसलिए मैं आप के पास गई.’’

‘‘आप ने ऊपर जा कर नहीं देखा?’’ असलम ने पूछा.

‘‘जा रही थी, लेकिन सीढि़यों के दरवाजे की दूसरी ओर से कुंडी बंद थी, इसलिए जा नहीं सकी. मैं ने कई आवाजें दीं. दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. मुझे लगता है, कोई गड़बड़ हो गई है?’’ रुखसाना ने भर्राई आवाज में कहा.

‘‘आप परेशान मत होइए भाभीजान. चलिए मैं देखता हूं.’’ कह कर असलम अपनी पत्नी के साथ रुखसाना के घर की ओर चल पड़ा. रुखसाना, उस का बेटा साजिद, असलम और उस की पत्नी ऊपर जाने के लिए सीढि़यों पर चढ़ने लगे. ऊपर जाने वाले दरवाजे की कुंडी दूसरी ओर से बंद थी, इसलिए सभी को वहीं रुकना पड़ा. असलम ने वहीं से कई आवाजें लगाईं, लेकिन दूसरी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. सभी नीचे उतरने लगे तो एकाएक असलम की नजर बालकनी पर चली गई. उसे लगा, वहां चादर में लिपटा कुछ पड़ा है. उस ने उस ओर इशारा कर के कहा, ‘‘भाभीजान, उधर देखिए, वह क्या पड़ा है?’’

रुखसाना ने उधर देखा. उस का बेटा साजिद वहां भाग कर पहुंचा. उस में से खून बह रहा था. उस ने झुक कर चादर हटाई. इस के बाद एकदम से चीखा, ‘‘अम्मी. यह तो अब्बू हैं.’’

रुखसाना चीखी, ‘‘या खुदा यह क्या हो गया? जाबिर तुम्हारा यह हाल किस ने किया?’’ 

साजिद भी जोरजोर से रोने लगा था. असलम ने अपने मोबाइल फोन से पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी. फिर तो थोड़ी ही देर में पीसीआर की गाड़ी वहां पहुंच गई. पीसीआर पुलिस ने चादर हटाई तो उस में खून से सनी जाबिर की लाश लिपटी थी. पीसीआर पुलिस ने संबंधित थाना जीटीबी एन्क्लेव को घटना के बारे में सूचित किया. कुछ देर बाद थाना जीटीबी एन्क्लेव के थानाप्रभारी नरेंद्र सिंह चौहान और इंसपेक्टर एटीओ राकेश कुमार दोहाना पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचे.

घटनास्थल का मुआयना करने के दौरान ही पुलिस को खून सना एक चाकू मिला. पुलिस ने उसे कब्जे में ले लिया, क्योंकि हत्या उसी से की गई थी. पुलिस ने पूछताछ की तो रुखसाना ने वही बातें बताईं, जो वह असलम को पहले ही बता चुकी थी. स्थिति को देखते हुए पुलिस उस से ज्यादा पूछताछ नहीं कर सकी. लेकिन घटनास्थल के हालात से साफ था कि यह हत्या लूटपाट की वजह से नहीं हुई थी. क्योंकि घर का सारा सामान जस का तस था. चूंकि मकान में आनेजाने का एक ही दरवाजा था, इसलिए पुलिस ने अंदाजा लगाया कि हत्या किसी जानकार ने की है या फिर इस में घर के किसी सदस्य का हाथ है. पुलिस परिवार वालों और रिश्तेदारों के नामपते तथा फोन नंबर ले रही थी, तभी क्राइम टीम और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने कर अपनी काररवाई निपटा ली. इस के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

थाना जीटीबी एन्क्लेव में उसी दिन यानी 16 जून, 2013 को जाबिर की हत्या का यह मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. इस के बाद मामले के खुलासे के लिए डीसीपी वी.वी. चौधरी एवं स्पेशल सेल के डीसीपी संजीव कुमार यादव ने स्पेशल सेल के इंसपेक्टर अत्तर सिंह यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में सबइंसपेक्टर प्रवीण कुमार, संदीप कुमार, हेडकांस्टेबल संजीव, दिलावर, सुरेश और राजवीर को शामिल किया गया.

पुलिस को पता था कि जाबिर के मकान में आनेजाने के लिए एक ही दरवाजा था, इसलिए हत्यारा उसी दरवाजे से आया होगा और जाबिर की हत्या कर के उस की लाश को चादर में लपेट कर उसी दरवाजे से बाहर गया होगा. जाबिर का हत्यारा या तो जानपहचान का था या फिर घर का ही कोई सदस्य था. पुलिस ने सभी नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया था. इसी के साथ मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला था कि जाबिर के शरीर पर चाकू के 32 वार किए गए थे. पुलिस जांच में क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा जाबिर और रुखसाना के बारे में जान लें.

जाबिर और रुखसाना उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं के गांव रमजानपुर के रहने वाले थे. जाबिर 30-32 साल का रहा होगा, तभी उसे 15 साल की रुखसाना से प्यार हो गया था. इस की वजह यह थी कि जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वह फूल की तरह महक उठी थी, जिस पर भंवरे मंडराने लगे थे. रुखसाना के घर से निकलते ही चाहने वाले उस के पीछे लग जाते थे. कोई उसे परी कहता तो कोई जन्नत की हूर तो कोई अप्सरा तो कोई दिल की रानी. वह फूल कर कुप्पा हो जाती. फिर तो जल्दी ही वह जाने कितनों के दिलों की रानी बन गई. उस के ये प्रेमी उसे घुमानेफिराने और मौज कराने लगे. ये लड़के उसे ऐसे ही नहीं मौज करा रहे थे, वे उस के शरीर से अपनी एकएक पाई वसूल रहे थे.

रुखसाना को भी इस में मजा रहा था. धीरेधीरे वह इस की आदी हो गई. हालत यह हो गई कि जब तक वह किसी लड़के से शारीरिक संबंध बना लेती, उस का मन बेचैन रहता. उस के ऐसे ही यारों में एक जाबिर भी था. जाबिर उस से उम्र में बड़ा जरूर था, लेकिन शारीरिक संबंधों की आदी बन चुकी रुखसाना के लिए अब उम्र के कोई मायने नहीं रह गए थे. जाबिर भी उसी मोहल्ले में रहता था, जिस मोहल्ले में रुखसाना रहती थी. वह नौशे मियां का बेटा था. जाबिर अन्य लड़कों से थोड़ा अलग था. दरअसल वह उस के दिल का राजा बनना चाहता था. रुखसाना को वह अपनी बीवी बनाना चाहता था. लेकिन लाख कोशिशों के बाद रुखसाना इस के लिए तैयार नहीं थी. इस की वजह यह थी कि वह उम्र में उस से काफी बड़ा था. रुखसाना का कहना था कि मौजमस्ती की बात दूसरी है और बीवी बन कर रहने की बात दूसरी.

रुखसाना की हरकतों से सारा गांव वाकिफ था. गांव वालों से इस बात की जानकारी उस के मातापिता को हुई तो उन्होंने उसे मारापीटा और समझाया भी. आखिर मांबाप की बात रुखसाना की समझ में गई. इसलिए वह जाबिर से निकाह के लिए राजी हो गई. जाबिर तो उस के लिए पागल था ही, इसलिए रुखसाना के हामी भरते ही उस ने अपने अब्बू नौशे मियां से कहा, ‘‘अब्बू, मैं रुखसाना से निकाह करना चाहता हूं.’’

जाबिर की बात सुन कर नौशे मियां हैरान रह गए. क्योंकि रुखसाना अब तक गांव में इस कदर बदनाम हो चुकी थी कि निकाह की छोड़ो, कोई भला आदमी उस से बातचीत करना भी पसंद नहीं करता था. ऐसी लड़की से जाबिर निकाह की बात कर रहा था. नौशे मियां की गांव में अच्छी इज्जत थी. उन्होंने इस निकाह के लिए साफ मना कर दिया. लेकिन जाबिर ने तो इरादा पक्का कर लिया था, इसलिए उस ने कहा, ‘‘अगर मेरा निकाह रुखसाना से नहीं  किया गया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा.’’

मजबूरन नौशे मियां को राजी होना पड़ा. रुखसाना के घर वालों की ओर से इनकार का सवाल ही नहीं था. क्योंकि उन की बदनाम बेटी से और कौन शादी करता. इस तरह जाबिर और रुखसाना का निकाह हो गया. निकाह के बाद रुखसाना पूरी तरह बदल गई थी. वह पति की ही नहीं, सासससुर और देवर की सेवा पूरे लगन से करने लगी थी. घर के सारे कामों की जिम्मेदारी ले ली थी. नौशे मियां के पास काफी जमीन थी. उसी पर खेती कर के वह अपने परिवार का भरणपोषण कर रहे थे. जाबिर गांव में रह कर पिता की मदद करता था. समय के साथ जाबिर 4 बच्चों का बाप बन गया. परिवार बढ़ा तो जिम्मेदारी और खर्च बढ़ा. जाबिर को लगा कि अब गांव में गुजारा नहीं होगा तो गांव छोड़ कर वह दिल्ली चला गया.

दिल्ली के दिलशाद गार्डेन में उस ने कबाड़ी का काम शुरू किया. कबाड़ी का काम नाम से भले ही छोटा है, लेकिन अगर मेहनत से किया जाए तो इस काम में मोटी कमाई है. जाबिर ने मन लगा कर मेहनत की. जिस का उसे फायदा भी मिला. उस की ठीकठाक कमाई होने लगी. वह जरूरत भर का पैसा रख कर बाकी गांव भेज देता था. जाबिर की कमाई बढ़ी तो उस ने रहने के लिए एक जनता फ्लैट खरीद लिया. अपना मकान हो गया तो गांव से वह अपना परिवार ले आया. बच्चों का उस ने यहीं एडमिशन करा दिया. अब समय आराम से गुजरने लगा.

जाबिर ने देखा कि कबाड़ी के काम में पैसा तो खूब है, लेकिन इज्जत नहीं है. अगर वह इसी तरह कबाड़ी का काम करता रहा तो उस के बच्चों की शादी ठीकठाक घरों में नहीं हो सकेगी. उस ने कबाड़ी का काम बंद कर दिया और स्टील वर्क्स का काम शुरू कर दिया. इस काम में भी उस ने मन लगा कर मेहनत की. उस की मेहनत रंग लाई और उस के पास सब कुछ हो गया. वह दिन में मेहनत करता और रात को चैन की नींद सोता. जाबिर अपने अब्बू को दिल्ली लाना चाहता था. लेकिन नौशे मियां ने दिल्ली आने से साफ मना कर दिया. तब जाबिर ने उन की मदद के लिए एक नौकर रख दिया. इस नौकर का नाम भी जाबिर था.

वह नौशे मियां के साथ उन के खेतों पर काम करता था. समय निकाल कर जाबिर कभीकभार पिता से मिलने रमजानपुर जाता और एकाध दिन रह कर चला जाता था. काम बढ़ा तो जाबिर की व्यस्तता भी बढ़ गई. जिस की वजह से वह पत्नी और बच्चों को समय कम दे पाता था. अब तक रुखसाना 30 साल की हो गई थी तो जाबिर 45 साल का. दिन भर काम कर के जाबिर बुरी तरह थक जाता तो देर रात घर आने पर उसे बिस्तर ही दिखाई देता था. वह जल्दी से खाना खा कर सो जाता. जबकि भरपूर जवान रुखसाना को उस की नजदीकी की जरूरत होती थी. पति के सो जाने से उस के अरमान दिल में ही रह जाते थे

रुखसाना चाहती थी कि पति घर आए तो उस से बातें करे, प्यार करे. उस के बच्चों को समय दे. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था, जिस की वजह से वह खीझने लगी थी. उसे लगता था कि जाबिर को जैसे पत्नी और बच्चों को जरूरत ही नहीं है. बस उसे पैसे चाहिए. उस के अरमानों और भावनाओं की उसे कोई परवाह नहीं है. ऐसे में अगर औरत जवान हो तो वह क्या करे? इस स्थिति में उसे उम्र के लंबे अंतराल का खयाल आया और उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. वह देखती थी कि लोग अभी भी उसे चाहतभरी नजरों से ताकते हैं, जबकि पति उस की ओर ध्यान ही नहीं देता. पति की इस बेरुखी से उस का मन बहकने लगा तो उस की नजरें किसी मर्द को तलाशने लगीं.

रुखसाना के बच्चों को एक सरदार ट्यूशन पढ़ाने आता था. वह हट्टाकट्टा गठीले बदन का कुंवारा नौजवान था. रुखसाना का दिल उसी पर गया. क्योंकि वही उस के सब से करीब था. रुखसाना ने उसे लटकेझटके दिखाए तो सरदार को समझते देर नहीं लगी कि उस के मन में क्या है. फिर एक दिन रुखसाना ने उसे मौका दिया तो उस सरदार ने खुशीखुशी उस की इच्छा पूरी कर दी. सरदार ने उसे इस तरह खुश किया कि वह उस की दीवानी हो गई. रुखसाना उस की इस कदर दीवानी हुई कि उसे लगने लगा कि वह सरदार के बिना जी नहीं पाएगी. कुछ ऐसा ही सरदार को भी लगने लगा तो एक दिन वह रुखसाना को भगा ले गया. यह सन 2008 की बात है. रुखसाना को पति की चिंता थी, बच्चों की. इसलिए सरदार के साथ जाने के बाद उस ने उन की कोई खबर नहीं ली

पत्नी की बेवफाई से जाबिर को गहरा आघात लगा. लेकिन इस आघात को बच्चों की परवरिश में लग कर उस ने भुला दिया. फिर भी वह रुखसाना की तलाश करता रहा. 5 महीने बाद उसे किसी से पता चला कि रुखसाना अपने प्रेमी के साथ पंजाब में रह रही है. पत्नी को वापस लाने के लिए वह पंजाब गया. सचमुच वहां रुखसाना उस सरदार के साथ रवीना कौर नाम से रह रही थी. रुखसाना आने को तैयार नहीं थी. लेकिन उस की असलियत जब सरदार के घर वालों को पता चली तो उन्होंने जबरदस्ती उसे जाबिर के साथ भेज दिया.

जाबिर को अब रुखसाना पर यकीन नहीं रह गया था. इसलिए उस ने उसे पिता के पास गांव पहुंचा दिया. 4 बच्चों की मां बनने के बाद भी रुखसाना के रुखसार में कोई कमी नहीं आई थी. साथ ही उस के अरमान भी पहले जैसे ही चिंगारी की तरह थे, जिसे सिर्फ हवा देने की जरूरत थी. आखिर गांव में जाबिर ने पिता की मदद के लिए जाबिर नाम के जिस नौकर को रखा था, उस ने हवा देने का काम किया. उसे देखते ही रुखसाना की आग भड़क उठी. उन के पास मौका ही मौका था. जाबिर घर का नौकर था, इसलिए उस का अंदर तक आनाजाना थारुखसाना ने इसी का फायदा उठाया और नौकर जाबिर को बिस्तर का साथी बना लिया.

रुखसाना का जब मन होता, नौकर जाबिर के साथ हमबिस्तर हो जाती. पहले तो यह काम बहुत चोरीछिपे होता रहा, लेकिन धीरेधीरे वे लापरवाह होते गए. गांव वालों को संदेह हुआ तो लोग उन पर नजर रखने लगे. जब उन्हें यकीन हो गया कि सचमुच कुछ गड़बड़ है तो उन्होंने इस बारे में नौशे मियां से बात की. उन्होंने फोन कर के सारी बात बेटे को बता दी. अगले ही दिन जाबिर गांव पहुंचा और पहले तो उस ने रुखसाना की जम कर पिटाई की, उस के बाद तुरंत नौकर को भगा दिया. 4-5 दिन गांव में रह कर जाबिर दिल्ली चला गया. दिल्ली आते समय उस ने रुखसाना पर नजर रखने की जिम्मेदारी भाई दिलशाद को सौंपी थी. भाई के कहने पर दिलशाद उस पर रातदिन नजर रखने लगा.

रुखसाना की आदत बिगड़ चुकी थी. अब वह सुधरने वाली नहीं थी. वह बिना मर्द के बिलकुल नहीं रह सकती थी. लेकिन देवर की वजह से वह किसी मर्द तक पहुंच नहीं पा रही थी. पिछले साल मई महीने में अचानक दिलशाद की करंट लगने से मौत हो गई. गांव वालों का कहना था कि यह सब रुखसाना ने अपने पुराने प्रेमी असरुद्दीन से करवाया था. इस की वजह यह थी कि असरुद्दीन उन दिनों गांव में ही था. जबकि वह सूरत में रहता था. वह रुखसाना का बचपन का प्रेमी था. बहरहाल सच्चाई कुछ भी रही हो, सुबूत होने की वजह से पुलिस केस नहीं बना. पुलिस केस भले ही नहीं बना, लेकिन गांव वाले इस बात को ले कर काफी गुस्से में थे. इसलिए घर वालों ने असरुद्दीन को सूरत भेज दिया. वह सूरत तो चला गया, लेकिन वह वहां भी नहीं बच सका. दिलशाद के भतीजे ताहिर ने चाचा की मौत का बदला लेने के लिए सूरत में ही उस की हत्या कर दी.

गांव वाले रुखसाना के कारनामों से परेशान हो गए तो उन्होंने जाबिर को फोन कर के उसे अपने साथ दिल्ली ले जाने को कहा. उन का कहना था कि वे इस गंदगी को गांव में नहीं रहने देंगे. क्योंकि इस की वजह से खूनखराबा भी होने लगा है. गांव वालों के कहने पर जाबिर रुखसाना को दिल्ली ले आया. रुखसाना ने पति से वादा किया था कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से उस के मानसम्मान को ठेस पहुंचे. लेकिन रुखसाना मानी नहीं. उस ने  ठान लिया था कि अब वह जाबिर के साथ नहीं रहेगी. फिर उस ने पति से छुटकारा पाने के लिए जो योजना बनाई, वह बहुत ही खतरनाक थी

पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चल गया था कि हत्या में रुखसाना का हाथ है. फिर भी पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया था. दरअसल उसी के माध्यम से पुलिस असली हत्यारों तक पहुंचना चाहती थी. अगर पुलिस उसे पकड़ लेती तो असली हत्यारे छिप जाते. इंसपेक्टर अत्तर सिंह यादव ने मुखबिरों की मदद से नंदनगरी के गगन सिनेमा के पास से जानेआलम उर्फ टिंकू, आमिर हुसैन और हनीफ उर्फ काला को पकड़ा. थाने ला कर तीनों से पूछताछ की गई तो पता चला कि रुखसाना ने ही 4 लाख रुपए की सुपारी दे कर जाबिर की हत्या कराई थी. हत्यारों के पकड़े जाने के बाद पुलिस रुखसाना के घर पहुंची तो पता चला कि वह घर से गायब हो चुकी है. शायद उसे हत्यारों के पकड़े जाने की भनक लग चुकी थी.

पुलिस रुखसाना की तलाश कर रही थी कि तभी अलाउद्दीन उर्फ आले पुलिस के हाथ लग गया. इस के बाद 4 नवंबर, 2013 को पुलिस ने रुखसाना को भी उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपने घर जरूरी सामान लेने आई थी. इस के बाद पुलिस को नौकर जाबिर अली, कमर और शानू की तलाश थी. गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में रुखसाना ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. इस के बाद उस ने जाबिर की हत्या की जो कहानी पुलिस को सुनाई, वह इस प्रकार थी.

गांव में रहने के दौरान जब उस के संबंध नौकर जाबिर अली से बने थे तो इस का खुलासा होने पर उस का शौहर जाबिर उस के साथ बुरी तरह मारपीट करने लगा था. तब रुखसाना ने तय कर लिया था कि अब वह उसे ठिकाने लगवा कर ही रहेगी. नौकर जाबिर से उस की फोन पर बात होती रहती थी. उस ने उस से बात की तो उस ने रुखसाना की मुलाकात अलाउद्दीन उर्फ आले से कराई. उस ने आले को 4 लाख रुपए देने की बात की तो वह जाबिर की हत्या करने के लिए तैयार हो गया.

अलाउद्दीन नौकर जाबिर का दोस्त था और रमजानपुर का ही रहने वाला था. आले अपराधी प्रवृत्ति का था. उस ने गांव के ही अब्बन की हत्या तलवार से काट कर की थी. चूंकि आले को गांव वालों से जान का खतरा था, इसलिए वह जेल से छूटने के बाद पत्नी मुनीजा के साथ गांव बीकमपुर में रहने लगा था. आले कामकाज के नाम पर दिल्ली की फैक्ट्रियों से कौपर डस्ट की चोरी कर के कबाडि़यों को बेचता था. दिल्ली में रहते हुए ही उस की जानपहचान 26 वर्षीय हनीफ उर्फ काला से हुई. वह भी रमजानपुर का ही रहने वाला था. काफी समय से वह गाजियाबाद के भोपुरा में रहता था. वह चोरी का माल तो खरीदता ही था, खुद भी चोरी करता था. आले ने जाबिर की हत्या करने पर 4 लाख रुपए मिलने की बात बता कर उसे भी योजना में शामिल कर लिया था. हनीफ को लगा कि वह आले के साथ मिल कर इस योजना को अंजाम नहीं दे पाएगा, इसलिए उस ने अपने दोस्तों कमर, आमिर हुसैन, शानू और जानेआलम उर्फ टिंकू को भी अपने साथ मिला लिया.

पूरी योजना तैयार कर के सभी 15 जून, 2013 को रुखसाना के घर पहुंचे. रुखसाना ने सभी को घर में ही अलगअलग जगहों पर छिपा दिया. रात में क्या होना है, रुखसाना को पता ही था, इसलिए उस ने जाबिर के रात के खाने में बेहोशी की दवा मिला दी, जिसे खा कर जाबिर सो गया. लेकिन थोड़ी देर बाद उसे टौयलेट आई तो रुखसाना ने उसे ऊपर वाले टौयलेट में जाने को कहा. क्योंकि नीचे वाले टौयलेट में कमर छिप कर बैठा था. जबकि टिंकू कमरे में ही चाकू लिए छिपा था. जाबिर सीढि़यां चढ़ने लगा, तभी कमर ने उसे पीछे से पकड़ लिया तो टिंकू ने उस पर चाकू से लगातार कई वार कर दिए. जाबिर का मुंह दबा था, इसलिए वह चीख भी नहीं सका और छटपटा कर मर गया.

खून बहुत ज्यादा बह रहा था, इसलिए उसे रोकने के लिए लाश को चादर में लपेट कर बालकनी में डाल दिया. इस के बाद वे सभी चले गए. उन के जाने के बाद रुखसाना ने इधरउधर फैले खून को साफ किया और असलम के घर जा कर जाबिर के ऊपर जा कर वापस आने की बात बताई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने रुखसाना को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 4 लोगों को पुलिस पहले ही जेल भेज चुकी थी. पुलिस को अभी नौकर जाबिर, कमर और शानू की तलाश है. कथा लिखे जाने तक इन में से एक भी अभियुक्त पुलिस के हाथ नहीं लगा था.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

  

Murder Story : भतीजे के इश्क में मारी गई पति के हाथों फरहीन

निकाह के 3 साल बाद जब 28 वर्षीय फरहीन बानो को बच्चा नहीं हुआ तो वह पति गुलफाम की मर्दानगी पर ही सवाल उठाने लगी. इसी दौरान पति से बगावत कर अपनी उम्र से छोटे भतीजे आमिर से संबंध बना लिए. उस से उसे बच्चा तो नहीं मिला, लेकिन उस के जीवन में ऐसा कुछ हो गया कि…

गुलफाम ने बीवी को बेवफाई का सबक सिखाने के लिए पूरी योजना बनाई. उस ने अपनी खतरनाक योजना में घर के किसी सदस्य को शामिल नहीं किया. योजना के तहत वह इटावा के कटरा बाजार गया और 200 रुपए में एक तेज धार वाला बांका खरीद लाया और झोले में रख दिया. 3 सितंबर, 2024 की सुबह 10 बजे गुलफाम झोले में छिपा कर रखा गया बांका ले कर घर से निकला, फिर उझैदी स्थित शराब ठेके पर पहुंचा. वहां उस ने शराब पी, फिर कुछ देर तक बकझक करता रहा. 

लगभग 12 बजे गुलफाम नशे की हालत में अपनी ससुराल नई बस्ती कटरा शमशेर खां, इटावा पहुंचा. उस समय उस की पत्नी फरहीन बानो अपनी बहन रूबी की मासूम बेटी जोया से बातचीत कर रही थी. उस के मां व भाई काम पर गए थे और बहन रूबी पड़ोस में किसी काम से गई थी. शौहर गुलफाम को नशे की हालत में देख कर फरहीन सिहर उठी. वह वहां से उठ कर कमरे में चली गई तो पीछे से गुलफाम भी कमरे में पहुंच गया और उस ने कमरा अंदर से बंद कर लिया. फिर वह बोला, ”फरहीन, मैं तुम्हें आखिरी बार मनाने आया हूं. बोलो, मेरे साथ घर चलोगी या नहीं.’’
मैं एक बार नहीं सौ बार कह चुकी हूं कि मैं तुम्हारे साथ नही जाऊंगी. पता नही क्यों बेशर्म बन कर यहां कुत्ते की तरह पूंछ हिलाते हुए चले आते हो?’’ फरहीन गुस्से से बोली. 

यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ गुलफाम ने पूछा.

हां, यह मेरा आखिरी फैसला है.’’ फरहीन ने जवाब दिया. 

तो अब मेरा फैसला भी सुन ले. यदि तू मेरी बीवी बन कर नहीं रह सकती तो मैं तुझे किसी और की बीवी भी नही बनने दूंगा. तुझ जैसी बेवफा औरत को आज मैं सबक सिखा कर ही दम लूंगा.’’ कह कर गुलफाम ने झोले से बांका निकाल लिया. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर था. 

शौहर के रूप में साक्षात मौत देख कर फरहीन बचाओ…बचाओचीखने लगी. उस की चीख सुन कर उस की बहन रूबी आ गई. अब तक गुलफाम हमलावर हो चुका था. उस ने बांके से कई वार फरहीन के सिर, गरदन व शरीर के अन्य हिस्सों पर किए. बचाव में फरहीन के दोनों हाथों की अंगुलियां भी कट गई थीं और वह खून से लथपथ हो कर जमीन पर गिर गई थी. बहन रूबी ने यह सब नजारा खिड़की से देखा था. उस ने सोचा गुलफाम भाग न जाए, इसलिए उस ने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और फिर मां, भाइयों व पुलिस को सूचना दी. 

सूचना पाते ही सदर कोतवाल विक्रम सिंह कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर मौके पर पहुंच गए. हमलावर गुलफाम कमरे में बंद था. पुलिस ने उसे बाहर निकाला. कोतवाल विक्रम सिंह ने उसे आला कत्ल बांका सहित हिरासत में ले लिया. फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया और सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. कुछ देर में एसएसपी (इटावा) संजय कुमार वर्मा, एएसपी अमरनाथ त्रिपाठी और डीएसपी अमित कुमार सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. कमरे के अंदर एक युवती मरणासन्न स्थिति में पड़ी थी. वहां मौजूद तहमीदा ने बताया कि वह उस की बेटी फरहीन बानो है और हमलावर गुलफाम उस का दामाद है. फरहीन के शरीर पर आधा दरजन घाव थे. पुलिस अधिकारियों ने फरहीन बानो को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान उस की मौत हो गई. एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने घटना की प्रत्यक्षदर्शी गवाह मृतका की बहन रूबी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह पड़ोस में गई थी. बहन के चीखने की आवाज सुन कर वह घर आई तो कमरे में गुलफाम उस की बहन पर हमलावर था. वह बांके से प्रहार कर रहा था. गुलफाम बहन की हत्या कर भाग न जाए, इसलिए उस ने बाहर से कमरे को बंद कर दिया.

पुलिस आरोपी गुलफाम को थाने ले आई. उस से वारदात के बारे में पूछताछ की तो उस ने पत्नी फरहीन बानो की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की चाशनी में सराबोर निकली

तहमीदा पर टूट पड़ा दुखों का पहाड़

उत्तर प्रदेश के जिला औरैया का एक कस्बा है- दिबियापुर. रेलवे में यह फफूंद स्टेशन के नाम से जाना जाता है. इसी कस्बे के नहर पुल के समीप लाल मोहम्मद वारिसी सपरिवार रहते थे. उस के परिवार में बीवी तहमीदा बानो के अलावा 4 बेटे नासिर, वाजिद, वारिस, साबिर तथा 4 बेटियां वहीदा, फरहीन, रूबी व शमीम थीं. लाल मोहम्मद कबाड़ का धंधा करते थे. इसी से ही वह अपने भारीभरकम परिवार का पालनपोषण करता था.

लाल मोहम्मद के बच्चे जब बड़े हुए तो वे भी उस के धंधे में हाथ बंटाने लगे. इस से उन की आमदनी बढ़ी और परिवार खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगा. वारिसी परिवार के ही कुछ लोग उन से जलते थे, जिस से वे लोग अकसर बातबेबात झगड़ते रहते थे. बेटियों को भी तंग करते थे. आखिर परेशान हो कर लाल मोहम्मद के परिवार ने वहां से हट जाने का निश्चय कर लिया. वर्ष 2017 में उन्होंने दिबियापुर कस्बा छोड़ दिया और इटावा शहर आ गए. यहां उन्होंने सदर कोतवाली क्षेत्र के नई बस्ती कटरा शमशेर खां मोहल्ले में एक मकान किराए पर ले लिया और सपरिवार रहने लगे. 

अब तक उन के बच्चे जवान हो चुके थे. इसलिए वह अपना कारोबार करने लगे थे. 2 बेटे नासिर व वाजिद अलग हो गए थे. वे अपना घर बसा कर अलग रहने लगे. लाल मोहम्मद बड़ी बेटी वहीदा का भी निकाह कर चुके थे. वहीदा से छोटी फरहीन बानो थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खूबसूरत तथा निपुण थी. वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, लेकिन उस की बातों से लोग यही समझते थे कि वह अच्छीखासी पढ़ीलिखी है. हालांकि 5 जमात पास करने के बाद फरहीन बानो आगे पढऩा चाहती थी, लेकिन अम्मी तहमीदा ने साफ मना कर दिया था. उस के बाद उस ने भी चुप्पी साध ली और अम्मी के घरेलू काम में हाथ बंटाने लगी थी. 

फरहीन बानो शरीर से स्वस्थ व चेहरेमोहरे से खूबसूरत दिखती थी. वह जब भी घर से हाटबाजार के लिए निकलती, हमउम्र लड़के उसे देख कर फिकरे कसते, लेकिन फरहीन बानो उन आवारा लड़कों को लिफ्ट नहीं देती थी. लाल मोहम्मद व उस की बीवी तहमीदा वारिसी को भी अहसास हो गया था कि उन की बेटी जवान हो गई है, अत: वह उस के योग्य लड़के की तलाश में जुट गए. लेकिन इसी बीच लाल मोहम्मद गंभीर बीमार पड़ गए. उसी दौरान उन की मृत्यु हो गई.

शौहर की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी तहमीदा वारिसी पर आ गई. वह अपने बेटे वारिस व साबिर की मदद से परिवार को संभालने लगी. तहमीदा वारिसी को जवान बेटी फरहीन बानो के निकाह की चिंता सता रही थी. वह इज्जत के साथ उस के हाथ पीले कर उसे ससुराल भेज देना चाहती थी. इस के लिए वह जीजान से जुटी थी. एक रोज एक करीबी रिश्तेदार ने तहमीदा वारिसी को गुलफाम के बारे में बताया. गुलफाम को तहमीदा ने देखा तो उसे अपनी बेटी फरहीन बानो के लिए पसंद कर लिया. गुलफाम उत्तर प्रदेश के ही शहर इटावा की सदर कोतवाली के मोहल्ला उझैदी में रहता था. गल्ला मंडी में वह सब्जी का ठेला लगाता था. फेरी लगा कर भी सब्जी बेचता था. उस के मांबाप का इंतकाल हो चुका था. बस भाई अनवर था, जो परिवार के साथ अलग मकान में रहता था. 

न सासससुर के तानों का झंझट था और न ही जेठजेठानी के झगड़ों का. गुलफाम भी स्वस्थ और कमाऊ था. तहमीदा वारिसी ने सोचा कि ससुराल जाते ही उस की बेटी घर की मालकिन बन जाएगी. अत: अगस्त 2018 की 13 तारीख को तहमीदा वारिसी ने फरहीन बानो का निकाह गुलफाम के साथ कर दिया.
फरहीन बानो निकाह के बाद गुलफाम की जीनत बन कर अपनी ससुराल आ गई. ससुराल आते ही फरहीन ने घर संभाल लिया. गुलफाम हर तरह से बीवी का खयाल रखता था. वह जिस चीज की डिमांड करती, गुलफाम उसे पूरा करता था. वह उसे कभीकभी सैरसपाटे के लिए भी ले जाता. 

गुलफाम मेहनती इंसान था. वह सुबह उठ कर सब्जीमंडी जाता और 8 बजे के आसपास सब्जी खरीद कर वापस आता. फिर मियांबीवी मिल कर ठेले पर सब्जी सजाते. उस के बाद नाश्ता कर गुलफाम सब्जी का ठेला ले कर फेरी पर निकल जाता. शौहर के जाने के बाद फरहीन बानो घर का काम निपटाती, फिर खाना पका कर शौहर के लौटने का इंतजार करने लगती. गुलफाम लगभग 2 बजे वापस लौटता फिर दोनों साथ बैठ कर खाना खाते और खूब बातें करते. 

फरहीन बानो पति से क्यों करने लगी नफरत

इस तरह हंसीखुशी व मौजमस्ती से 3 साल बीत गए. लेकिन इन सालों में फरहीन बानो को कोई औलाद नहीं हुई. औलाद का सुख पाना हर औरत के लिए सौभाग्य की बात होती है. लेकिन फरहीन बानो वंचित थी. उस के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर वह इस सुख से क्यों वंचित है. वह यह भी सोचने लगी कि जरूर उस के शौहर में ही कोई कमी है. फरहीन बानो अब उदास रहने लगी. उस का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया. वह शौहर से लडऩेझगडऩे भी लगी.

पत्नी को उदास व स्वभाव में परिवर्तन देख कर गुलफाम सोच में पड़ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि फरहीन उदास क्यों रहती है और क्यों बातबात पर झगड़ती है. आखिर जब उस से नहीं रहा गया तो उस ने पूछा, ”फरहीन, मैं तुम्हारा हर तरह से खयाल रखता हूं, फिर तुम मुझ से बेरुखी से पेश क्यों आती हो?’’

फरहीन बानो शौहर को घूरते हुए बोली, ”सुखसाधन से कोई औरत संतुष्ट नहीं होती, उसे तो संतुष्टि तब मिलती है जब उस की गोद भरती है. हमारी शादी को 3 साल से ज्यादा का समय हो गया है, लेकिन हमारी अभी भी कोई औलाद नहीं है. घरपरिवार की औरतें ताने कसती हैं. वे मुझे बांझ समझने लगी हैं.’’

बीवी की बात सुन कर गुलफाम भी भड़क उठा, ”इस में मेरा क्या दोष है. खुदा जब चाहेगा, तभी औलाद होगी. मुझे विश्वास है कि वह जरूर हम पर रहम करेगा. तुम परेशान न हो. रही बात औरतों के तानों की तो तुम उस पर ध्यान मत दिया करो.’’

फरहीन गुस्से से बोली, ”खुदा को बीच में मत लाओ. सारा दोष तुम्हारा ही है. तुम मर्द होते तो एक नहीं, 2 औलाद हमारी गोद में अब तक होतीं. तुम अपना इलाज कराओ. दुआ ताबीज लो. वरना हमारी तुम्हारे साथ नहीं बनेगी.’’

फरहीन ने मर्दानगी पर चोट की तो गुलफाम भी भड़क उठा, ”मुझ में कोई कमी नही है. जो भी कमी है, वह सब तुझ में है. इसलिए न मैं इलाज कराऊंगा और न ही किसी फकीर के पास दुुआताबीज के लिए जाऊंगा. तुझे ही अपना इलाज कराना होगा.’’

इस के बाद तो आए दिन फरहीन और गुलफाम के बीच औलाद न होने को ले कर तकरार होने लगी. कभीकभी तकरार इतनी अधिक बढ़ जाती कि दोनों के बीच हाथापाई हो जाती. गुस्से में गुलफाम शराब के ठेके पर जाता और जम कर शराब पी कर लौटता. धीरेधीरे गुलफाम की शराब पीने की लत पड़ गई. वह पक्का शराबी बन गया. अभी तक फरहीन और गुलफाम के बीच औलाद को ले कर ही झगड़ा होता था, लेकिन अब शराब पीने को ले कर भी झगड़ा होने लगा. कभीकभी झगड़ा इतना बढ़ जाता कि गुलफाम फरहीन को जानवरों की तरह पीट देता. फरहीन समझ गई कि वह शराबी व नाकाबिल शौहर से कभी औलाद का सुख नहीं पाएगी. अत: वह शौहर से नफरत करने लगी. 

इन्हीं दिनों फरहीन बानो के घर आमिर का आनाजाना शुरू हुआ. रिश्ते में आमिर फरहीन का भतीजा था. वह भी नई बस्ती कटरा शमशेर खां मोहल्ले में रहता था. आमिर शरीर से हृष्टपुष्ट तथा सजीला युवक था. वह जो कमाता था, अपनी ही फैशनपरस्ती में खर्च करता था. फरहीन को वह बुआ कहता था. उम्र में वह फरहीन से छोटा था.

फरहीन को किस तरह हुआ भतीजे से प्यार

28 साल की बुआ फरहीन बानो से आमिर की खूब पटती थी. बुआभतीजे के बीच हंसीठिठोली भी होती थी. आमिर को बुआ की सुंदरता और अल्हड़पन बहुत भाता था. कभीकभी वह उसे एकटक प्यार भरी नजरों से देखा करता था. अपनी ओर टकटकी लगाए देखते समय जब कभी फरहीन की नजरें उस से टकरा जातीं तो दोनों मुसकरा देते थे. आमिर फरहीन के शौहर गुलफाम से ज्यादा स्मार्ट और अच्छी कदकाठी का था. इस से फरहीन का झुकाव आमिर के प्रति बढ़ता गया. 

फरहीन बानो स्वभाव से मिलनसार थी. आमिर बुआ के प्रति सम्मोहित था. जब दोनों साथ चाय पीने बैठते, तब फरहीन उस से खुल कर हंसीमजाक करती. फरहीन का यह व्यवहार धीरेधीरे आमिर को ऐसा बांधने लगा कि उस के मन में फरहीन का सौंदर्यरस पीने की कामना जागने लगी. एक दिन आमिर दोपहर को आया तो फरहीन उस के लिए थाली ले कर आई और जानबूझ कर गिराए गए आंचल को ठीक करते हुए बोली, ”लो आमिर, खाना खा लो. आज मैं ने तुम्हारी पसंद का खाना बनाया है.’’

आमिर को बुआ की यह अदा बहुत अच्छी लगी. वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ”बुआ, तुम भी अपनी थाली परोस लो. साथ खाने में मजा आएगा.’’

खाना खाते वक्त दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो आमिर बोला, ”बुआ, तुम खूबसूरत और खिदमतगार हो. लेकिन फूफाजान तुम्हारी कद्र नहीं करते. मुझे पता है कि अभी तक तुम्हारी गोद सूनी क्यों है? वह अपनी कमजोरी की खीझ तुम पर उतारते हैं. लेकिन मैं तुम से बेइंतहा मोहब्बत करता हूं.’’

यह कह कर आमिर ने फरहीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. सच में फरहीन शौहर से संतुष्ट नहीं थी. उसे न तो औलाद का सुख मिला था और न ही शारीरिक सुख, जिस से उस का मन विद्रोह कर उठा. उस का मन बेइमान हो चुका था. आखिरकार उस ने फैसला कर लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. औलाद के लिए उसे रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े. उस ने यह भी तय कर लिया कि भले ही उस की कितनी भी बदनामी क्यों न हो. लेकिन वह आमिर का साथ नहीं छोड़ेगी. 

औरत जब जानबूझ कर बरबादी के रास्ते पर कदम रखती है तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही फरहीन बानो के साथ हुआ. फरहीन जवान भी थी और शौहर से असंतुष्ट भी. वह औलाद सुख भी चाहती थी. अत: उस ने भतीजे आमिर के साथ नाजायज रिश्ता बनाने का निश्चय कर लिया. आमिर वैसे भी फरहीन का दीवाना था. एक रोज सुबह 9 बजे जैसे ही गुलफाम सब्जी का ठेला ले कर फेरी के लिए निकला, तभी आमिर आ गया. फरहीन उस समय कमरे में चारपाई पर लेटी थी. कमरे में पहुंचते ही वह उस की खूबसूरती को निहारने लगा. फरहीन को आमिर की आंखों की भाषा पढऩे में देर नहीं लगी. फरहीन ने उसे करीब बैठा लिया और उस का हाथ सहलाने लगी. आमिर के शरीर में हलचल मचने लगी.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद होश दुरुस्त हुए तो फरहीन ने आमिर की ओर देख कर कहा, ”आमिर तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन हमारे बीच रिश्ते की दीवार है. अब मैं इस दीवार को तोडऩा चाहती हूं.’’

आमिर ललचाई नजरों से देखता हुआ बोला, ”मैं तुम्हें कभी धोखा नही दूंगा. तुम अपना बनाओगी तो तुम्हारा ही बन कर रहूंगा.’’ कह कर आमिर ने फरहीन को बाहों में भर लिया. ऐसे ही कसमेवादों के बीच संकोच की सारी दीवारें कब टूट गईं, दोनों को पता ही नहीं चला. उस दिन के बाद आमिर और फरहीन बिस्तर पर सामाजिक रिश्तों और मानमर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने लगे. वासना की आग ने इन के इन रिश्तों को जला कर खाक कर दिया. 

आमिर अपनी बुआ की मोहब्बत में इतना अंधा हो गया कि उसे जब भी मौका मिलता, वह फरहीन से मिलन कर लेता. फरहीन भी भतीजे के पौरुष की दीवानी थी. उन के मिलन की किसी को कानोंकान खबर नहीं थी. 

इस तरह खुली बुआभतीजे के संबंधों की पोल

कहते हैं कि वासना का खेल कितनी भी सावधानी से खेला जाए, एक न एक दिन भांडा फूट ही जाता है. ऐसा ही फरहीन और आमिर के साथ भी हुआ. एक दोपहर पड़ोस में रहने वाली जेठानी खातून ने रंगरलियां मना रहे आमिर और फरहीन को चोरीछिपे देख लिया. इस के बाद तो इन की पापलीला की चर्चा पड़ोस में होने लगी. गुलफाम को जब फरहीन और उस के भतीजे आमिर के नाजायज रिश्तों की जानकारी हुई तो उस का माथा घूम गया. उस ने इस बाबत फरहीन से बात की तो उस ने नाजायज रिश्तों की बात सिरे से खारिज कर दी. उस ने कहा, ”आमिर उस का भतीजा है. कभीकभार घर आ जाता है तो उस से हंसबोल लेती हूं. चायनाश्ता करने के बाद वह चला जाता है. पड़ोसी इस का गलत मतलब निकालते हैं. उन्होंने ही तुम्हारे कान भरे हैं.’’

गुलफाम ने उस समय तो फरहीन की बात मान ली, लेकिन मन में शक पैदा हो गया. इसलिए वह चुपकेचुपके बीवी पर नजर रखने लगा. परिणामस्वरूप एक दोपहर गुलफाम ने बुआभतीजे को रंगेहाथ पकड़ लिया. आमिर तो भाग गया, लेकिन फरहीन की गुलफाम ने जम कर पिटाई की. साथ ही संबंध तोडऩे की चेतावनी दी. लेकिन इस चेतावनी का असर न तो फरहीन पर पड़ा और न ही आमिर पर. हां, इतना जरूर हुआ कि अब वे सावधानी बरतने लगे. जिस दिन गुलफाम को पता चलता कि आमिर उस के घर के चक्कर लगा रहा था. उस दिन शराब पी कर वह फरहीन को जानवरों की तरह पीटता और भद्दीभद्दी गालियां बकता. 

फरहीन शौहर की पिटाई से तंग आ चुकी थी, अत: मार्च 2024 के पहले सप्ताह में गुलफाम को बिना बताए अपने मायके नई बस्ती कटरा शमशेर खां आ गई. उस ने मां व भाइयों को आंसू बहा कर बताया कि गुलफाम शराब पी कर उसे बेतहासा पीटता था. उसे भूखाप्यासा रखता था. चरित्र पर लांछन लगाता था, जिस से उसका ससुराल में जीना दूभर हो गया था. इसलिए वह मायके आ गई. आंसू देख कर मां व भाइयों ने सहज ही उस की बातों पर भरोसा कर लिया. मां ने उसे धैर्य बंधाया और कहा कि गुलफाम जब आएगा, तब उसे सबक सिखाएगी. उसे जलील करेगी और माफी मांगने पर भी उसे ससुराल नहीं भेजेगी. 

इधर गुलफाम घर आया तो फरहीन घर पर नहीं थी. उस ने उसे फोन किया, लेकिन फरहीन ने काल रिसीव नहीं की. दूसरे ही दिन गुलफाम अपनी ससुराल जा पहुंचा. ससुराल पहुंचते ही गुलफाम की सास तहमीदा वारिसी उस पर बरस पड़ी, ”गुलफाम, तू इंसान नहीं जानवर है. तू शराब पी कर मेरी बेटी को पीटता था और उसे भूखाप्यासा रखता था. चला जा यहां से, वरना अंजाम बुरा होगा.’’

गुलफाम नरमी से बोला, ”सासू मां, फरहीन ने आप को जो कुछ बताया, वह सब सही नहीं है. फरहीन मेरी इज्जत पर धब्बा लगा रही है. भतीजे आमिर से उस के नाजायज ताल्लुकात हैं. में ने मना किया तो मुझ से ही उलझ गई. रंगेहाथ पकड़ा तो शराब के नशे में उसे पीट दिया. नाराज हो कर वह यहां आ गई.’’

गुलफाम ने लाख सफाई दी, लेकिन उस की बात पर किसी ने यकीन नहीं किया. फरहीन के भाई वारिस व साबिर ने भी गुलफाम को खूब खरीखोटी सुनाई, गालियां भी बकी. धमकी भी दी कि यहां से चला जाए वरना कुछ अनर्थ हो जाएगा. ससुराल में अपमान का घूंट पी कर गुलफाम अपने घर वापस आ गया. गम को भुलाने के लिए उस रात उस ने जम कर शराब पी. गुलफाम को अपमानित कर भगाया गया तो फरहीन मन ही मन खुश हुई. अब वह मायके में स्वच्छंद रूप से रहने लगी. भतीजा आमिर भी बेरोकटोक उस से मिलने आने लगा. आमिर अब उसे खर्च के लिए रुपए भी देने लगा. 

जिस दिन मां और भाई घर पर नहीं होते, उस दिन फरहीन फोन कर आमिर को बुला लेती और मिलन कर लेती. घर में मौका न मिलता तो आमिर के साथ होटल चली जाती.

और प्रेमी आमिर के साथ फुर्र हो गई फरहीन

एक रोज फरहीन ने बिस्तर पर मस्ती के दौरान कहा, ”आमिर, हम कब तक इस तरह छिपतेछिपाते मिलते रहेंगे. यदि तुम मुझे अपना बनाना चाहते हो तो मुझे अपने साथ कहीं और ले चलो, जहां हम खुल कर जी सकें.’’

मई 2024 में फरहीन भतीजे आशिक आमिर के साथ मायके से भाग गई. लेकिन मायके वालों ने फरहीन के भाग जाने की जानकारी उस के शौहर गुलफाम को नहीं दी. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां हैं? एक सप्ताह बाद ही गुलफाम को पता चल गया कि फरहीन अपने आशिक आमिर के साथ फरार हो गई है. बेटी के भाग जाने की रिपोर्ट तहमीदा वारिसी ने पुलिस में दर्ज नहीं कराई. वह अपने बेटों के साथ उस की खोज करने लगी. गुलफाम भी अपने स्तर से बीवी की तलाश में जुट गया. लेकिन सफलता नहीं मिली. 

लगभग 3 महीने बाद फरहीन घर वापस आ गई. मां ने डांटाफटकारा तो वह बोली, ”मां, मैं आमिर के साथ धार्मिक स्थानों पर माथा टेकने गई थी. अजमेर शरीफ एक महीने तक रही. दिल्ली, आगरा शहर भी घूमा. इस के बाद वापस आ गई.’’

बेटी की बात सुन कर तहमीदा को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह अपने गुस्से को पी गई और फरहीन को शराफत से रहने की नसीहत दी. उस ने आमिर को भी खूब खरीखोटी सुनाई और फरहीन से मिलने पर रोक लगा दी. इधर गुलफाम बीवी के बिना बेचैन रहता था. अधिक शराब पीने से उस का सब्जी का धंधा चौपट हो गया था. उस पर कर्ज भी चढ़ गया था. एक रोज उसे पता चला कि फरहीन वापस घर आ गई है तो वह उसे मनाने ससुराल पहुंच गया. लेकिन फरहीन ने उस के साथ जाने से साफ मना कर दिया. तहमीदा अब तक जान गई थी कि बेटी के कदम बहक गए हैं, सो वह भी चाहती थी कि वह ससुराल चली जाए. उस ने उसे समझाया भी. लेकिन फरहीन ने शौहर के साथ जाने से इंकार कर दिया. 

इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. गुलफाम हर हफ्ते बीवी को मनाने ससुराल जाता. लेकिन वह उसे दुत्कार कर भगा देती. अगस्त के दूसरे सप्ताह में वह अपने बड़े भाई अनवर को भी साथ ले गया. अनवर ने फरहीन की मां व भाइयों से बात की तथा फरहीन को भी समझाया. लेकिन फरहीन राजी नहीं हुई. अपमानित हो कर गुलफाम व अनवर वापस घर आ गए. गुलफाम बखूबी जानता था कि फरहीन पर इश्क का भूत सवार है. वह भतीजे आमिर के प्यार में अंधी हो चुकी है. इसलिए वह उस के साथ आने को नानुकुर कर रही है. काफी सोचविचार के बाद गुलफाम ने सोच लिया कि वह आखिरी बार और फरहीन को मनाने जाएगा. यदि इस बार उस ने इंकार किया तो वह बरदाश्त नहीं करेगा और बेवफा बीवी को सबक सिखा कर ही रहेगा. 

इस के लिए उस ने एक बांका भी खरीद लिया था. फिर वह 3 सितंबर, 2024 को अपनी ससुराल पहुंच गया. उस ने बड़े प्यार से बीवी फरहीन को मनाने की कोशिश की, लेकिन फरहीन ने उस की एक नहीं सुनी. इतना ही नहीं, उस ने पति गुलफाम की उस दिन भी बेइज्जती की. तब गुलफाम ने बांके से वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया. गुलफाम से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने मृतका के भाई वारिस की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103 के तहत गुलफाम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. 

4 सितंबर, 2024 को पुलिस ने हत्यारोपी गुलफाम को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

शारीरिक संबंध बनाने के बाद की बेटी से शादी

देश ही नहीं विदेश में भी सभी रिश्ते आज कलंकित हो गए हैं. स्टीवन ने अपनी सगी बेटी कैटी के साथ सिर्फ शारीरिक संबंध बनाए बल्कि उस से शादी तक कर ली. इस के बाद जो हुआ उस की किसी ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी…   

13 अप्रैल, 2018 की सुबह अमेरिका में पश्चिमी कनेक्टिकट के ग्रामीण इलाके से नौर्थ कैरोलिना पुलिस को एक महिला ने फोन किया. उस ने कहा कि नाइटडेल में स्टीवन वाल्टर प्लाडल नाम के एक व्यक्ति ने अपनी दूसरी पत्नी कैटी और उस के अबोध बेटे की जान ले ली है. इस के अलावा उस ने एंथोनी फ्यूस्को नाम के व्यक्ति को भी मार दिया हैफोन करने वाली महिला ने अपना नाम अलायशा प्लाडल बताते हुए कहा कि वह हत्यारे की पहली पत्नी है. उस ने यह भी बताया कि इस हत्या की जानकारी उसे फोन पर प्लाडल ने ही दी थी. उसी दिन पुलिस को ग्रेसी नाम की महिला ने भी फोन कर खबर दी थी कि उस का बेटा स्टीवन प्लाडल अपने बेटे बेन्निट की हत्या कर घर से फरार हो गया है. ग्रेसी ने यह जानकारी फोन कर के अलायशा को भी दे दी थी.

यह सुन कर पुलिस को हैरत हुई, क्योंकि नाइटडेल में प्लाडल ने अपने 7 महीने के बेटे बेन्निट की हत्या की थी और वहां से 965 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कनेक्टिकट जा कर उस ने 2 हत्याओं को अंजाम दिया था. यह सब कैसे हुआ होगा, इस सवाल का जवाब पुलिस के लिए भी जानना जरूरी था. सूचना मिलते ही पुलिस नाइटडेल स्थित स्टीवन प्लाडल के घर पहुंची, जहां बैडरूम से 7 महीने के बच्चे बेन्निट की रक्तरंजित लाश मिली. दूसरी ओर पश्चिमी कनेक्टिकट की पुलिस ने वहां के ग्रामीण इलाके न्यू मिल्फोर्ड में पिकअप ट्रक के भीतर से एक युवती और एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति की लाश बरामद की. दोनों जगहों की पुलिस ने हत्या से संबंधित आवश्यक तहकीकात शुरू की. इस सनसनीखेज तिहरे हत्याकांड की पूरी वारदात के तारों को जोड़ने के क्रम में कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं.

पुलिस लेफ्टिनेंट लारेंस ऐश के अनुसार कनेक्टिकट के न्यू मिल्फोर्ड में पिकअप ट्रक के अंदर 12 अप्रैल की सुबह करीब पौने 9 बजे खिड़की से गोली मारी गई थी, जिस से 20 वर्षीय युवती कैटी और उस के दत्तक पिता एंथोनी फ्यूस्को की घटनास्थल पर ही मौत हो गई थी. वहां से कुछ दूर ही न्यूयार्क के डोबर में पुलिस को स्टीवन प्लाडल की होंडा मिनी वैन भी मिल गई. पुलिस ने उस गाड़ी की जांच की तो उस के अंदर भी एक आदमी की लाश पड़ी थी. बाद में उस की शिनाख्त स्टीवन प्लाडल के रूप में हुई. यह वही शख्स था, जिस ने इन 3 हत्याओं को अंजाम दिया था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि स्टीवन ने खुदकुशी की होगी.

अब पुलिस के सामने उन हत्याओं के साथसाथ आत्महत्या की वारदात और उस की वजहों की भी जांच करनी थी. संबंधित घटनाओं के तार को एकदूसरे के साथ जोड़ते हुए पुलिस ने गहन तहकीकात शुरू कीजैसेजैसे जांच का सिलसिला आगे बढ़ा, वैसेवैसे पुलिस को चौंकाने वाली कई ऐसी बातें मालूम हुईं, जिस में अनैतिक रिश्ता, यौनाकर्षण की अंधता और असामाजिकता के पहलू शामिल थेप्राथमिक जांच में मालूम हुआ कि हत्या करने वाले 43 वर्षीय स्टीवन प्लाडल ने कैटी नाम की अपनी उस पत्नी की हत्या कर दी थी, जो उस की ही सगी बेटी थी. हालांकि 20 वर्षीय कैटी का लालनपालन 56 वर्षीय दत्तक फ्यूस्को दंपति द्वारा किया गया था. स्टीवन ने उस का पालनपोषण करने वाले पिता एंथोनी फ्यूस्को को भी मौत के घाट उतार दिया था.

अनैतिक रिश्तों में उलझी हुई इस कहानी की मीडिया में जोरशोर से चर्चा फरवरी, 2017 में शुरू हुई थी. तब बापबेटी (स्टीवन प्लाडल और कैटी) के बीच नाजायज संबंधों को ले कर घरपरिवार, सगेसंबंधी से ले कर समाज में चौतरफा निंदा होने से अलायशा प्लाडल को काफी गहरा सदमा लगा थाअलायशा स्टीवन प्लाडल की पहली पत्नी थी. उसे हैरत हुई कि उस की पीठ पीछे कब और किस तरह से दोनों के बीच नाजायज संबंध पनप गए. यह उस के मनमस्तिष्क को गहरे आघात मिलने जैसी बात थी, क्योंकि उस की बेटी कैटी अपने ही पिता से गर्भवती थी. और तो और, उस का पति स्टीवन अपनी जैविक बेटी के साथ शादी करने की जिद पर भी अड़ा हुआ था.

अलायशा ने कैटी का भले ही बचपन से लालनपालन नहीं किया हो और उसे अपनी आंखों के सामने बालपन से किशोर और युवावस्था में जाते नहीं देखा हो, लेकिन वह अपनी सगी बेटी की हर खुशी और सुरक्षा को ले कर चिंतित रहती थी. अलायशा को जब बापबेटी के अनैतिक रिश्ते और विवाह की बात मालूम हुई, तब उस ने इस का पुरजोर विरोध जताया. इस बात को ले कर परिवार में विवाद इस कदर बढ़ गया कि मामला घर से ले कर अदालत तक जा पहुंचा. इस के चलते अलायशा ने पति स्टीवन प्लाडल से मार्च, 2017 में तलाक ले लिया. इस के अलावा अपनी 8 और 12 साल की 2 अन्य बेटियों को ले कर पति का घर छोड़ने का फैसला ले लिया. अपने साथ उस ने कैटी को भी ले जाना चाहा, लेकिन उस ने साथ जाने से मना कर दिया. उस के लाख समझाने के बावजूद कैटी अपने पिता के साथ ही रहने की जिद पर अड़ी रही

वैसे अलायशा ने जब घर छोड़ा था, तब प्लाडल अपने बैडरूम में जमीन पर सोया हुआ था. अलायशा के जाने के बाद स्टीवन प्लाडल मानो आजाद हो गया था और उस ने वही किया जो उस के दिल में था. जल्द ही स्टीवन प्लाडल ने अपनी सगी बेटी कैटी के साथ 20 जुलाई, 2017 को एक झील के किनारे छोटे से समारोह में शादी रचा ली. उस समय कैटी गर्भवती थी. यह अनोखी शादी थी. उन की गैरकानूनी शादी के गवाह बनने वालों में कैटी को गोद लेने वाले मातापिता यानी फ्यूस्को दंपति मुख्य अतिथि थे. साथ में प्लाडल की मां ग्रेसी प्लाडल ने भी इस समारोह में हिस्सा लिया था. इस मौके पर उन्होंने एक ग्रुप फोटो भी खिंचवाया था. इस शादी को ले कर चाहे जितनी भी नकारात्मक बातें हुई हों, प्लाडल और कैटी दांपत्य जीवन गुजारने की कसम खा चुके थे. इस के साथ ही दोनों प्रैस, वेब या इलैक्ट्रौनिक मीडिया के लिए अनोखे अवैध रिश्ते की रोचक खबर भी बन गए थे. वे समाजशास्त्रियों के लिए भी एक शोध का विषय बन गए थे.

खैर, कैटी ने सितंबर, 2017 में बेन्निट को जन्म दिया. इस की जानकारी कैटी की मां अलायशा को तब हुई, जब उसे समाचारपत्र में यह खबर पढ़ने को मिली. उस ने इस की सूचना पुलिस को दी और उन के खिलाफ एक रिपोर्ट भी दर्ज करवा दी. दोनों पर गंभीर आरोप लगाया कि उन की शादी अवैध और गैरकानूनी है, जो सामाजिक संस्कार और कायदेकानून के अनुसार भी गलत है. अलायशा द्वारा दर्ज करवाई गई प्राथमिकी पर पुलिस ने काररवाई करते हुए दोनों को जनवरी 2018 में गिरफ्तार कर लिया. मामला अदालत में जा पहुंचा और प्लाडल पर नाबालिग रिश्तेदार के साथ व्यभिचार करने का आरोप लगाया गया. भले ही उन के यौन संबंध आपसी सहमति से बने थे और उन्होंने परिवार के कुछ लोगों की उपस्थिति में विवाह किया था, लेकिन अमेरिकी कानून के मुताबिक उन की शादी दूसरे देशों के कानून की तरह ही अनैतिक और गैरकानूनी करार दे दी गई

नौर्थ कैरोलिना स्थित नाइटडेल में एर्लस्टन कोर्ट द्वारा उन पर कानूनी काररवाई की गई. हालांकि बाद में स्टीवन और कैटी 20 फरवरी को 28 हजार डौलर के बांड पर इस शर्त के साथ रिहा कर दिए गए कि वे आपस में फिर कभी नहीं मिलेंगे. इसी के साथ बच्चे बेन्निट को उस की दादी ग्रेसी प्लाडल के पास रखने का अदालती आदेश भी जारी किया गया. ग्रेसी अपने बेटे स्टीवन प्लाडल के साथ ही रहती थी. इस फैसले से 72 वर्षीया ग्रेसी पर बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी गई थी. बावजूद इस के अदालत ने प्लाडल को बेन्निट से मिलने या उस के घर के पास के शहर कैरी से भी दूर रहने की हिदायत दी थी. साथ ही अलायशा और उस की 8 12 साल की दोनों बेटियों की सुरक्षा के आदेश भी अदालत ने दिए. अलायशा कैटी के बचपन की तसवीर दिखाती हुई कहती है, ‘‘मुझे अफसोस है कि मैं अपनी बेटी और उस के बच्चे को नहीं बचा सकी.’’

इतना बोलते ही उस की आंखों में आंसू बह निकले. उस की नजरों में 7 माह के अबोध बच्चे को प्लाडल की बुजुर्ग मां के हवाले करना एक गलत निर्णय था, जो नहीं किया जाना चाहिए था. यही उस की मौत का कारण बनीइस के साथ ही अलायशा अपनी दूसरी 2 बेटियों को ले कर संतोष व्यक्त करती है, ‘‘अब मैं सोचती हूं कि हमारी दोनों बेटियां कितनी भाग्यशाली हैं, जो उस जुनूनी हत्यारे से बच गईं. अगर वे अपनी दादी और पिता के पास होतीं तो वह उन्हें भी मार डालता.’’

अलायशा के अनुसार, स्टीवन अपने घर पर 4 बंदूकें रखता था. उसे शुरू से ही बंदूकें रखने का शौक था. संभवत: युवावस्था में उस ने औनलाइन बंदूक खरीदी थी. वैसे वह पेशे से एक कुशल बढ़ई था, लेकिन एक अच्छा शूटर भी था

बंदूकों का इस्तेमाल वह निशानेबाजी का करतब दिखाने के लिए करता था. ऐसा कर के वह कैटी को भी काफी इंप्रैस कर चुका था, जबकि उस का गुस्सा बहुत ही खराब था. जब भी गुस्से में आता, तब उस पर पागलपन सवार हो जाता था. वह गुस्से में घर की चीजों को नष्ट करने लगता था. यहां तक कि घर की दीवारों में छेद करना शुरू कर देता था. लेकिन उस का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं था. अलायशा और प्लाडल के मिलने की भी कहानी कुछ कम रोमांचक नहीं थी. दोनों की मुलाकात इंटरनेट के जरिए सन 1995 में हुई थी. उन दिनों इंटरनेट पर चैटिंग ही डेटिंग की पहली सीढ़ी हुआ करती थी. तब अलायशा मात्र 15 साल की थी और टेक्सास के सैन एंटोनिया में अपने मातापिता के साथ रहती थी. उस वक्त 20 वर्षीय प्लाडल न्यूयार्क में रहता था. उन की प्रेम कहानी इंटरनेट पर चैटिंग और लव लैटर के जरिए परवान चढ़ी थी.

हालांकि अलायशा के मातापिता को यह सब जरा भी पसंद नहीं था. दूसरी तरफ स्टीवन अलायशा से मिलने के लिए बेताब रहता था. एक दिन वह अलायशा से मिलने के लिए टेक्सास आया. चैटिंग के बाद उन की पहली डेटिंग काफी सुखद एहसास दे गई. उन के प्रेम को पंख मिल गए और वे रोमांस की भावना से भर गए. उस के बाद वह अलायशा से मिलने लगातार आता रहा. इस तरह से उन के बीच शुरू हुए प्रेम संबंध में एक दिन उन पर सैक्स हावी हो गया. अलायशा 16 साल की उम्र में गर्भवती हो गई थी. उस ने 17वें साल में एक बच्ची कैटी को जन्म दिया. यह सब दोनों के विवाह के पहले ही हो गया. बाद में दोनों ने शादी तो कर ली लेकिन स्टीवन कैटी को पा कर खुश नहीं हुआ. वह उसे अलग करना चाहता था. बच्ची कैटी को जरा भी पसंद नहीं करता था और हमेशा उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश में रहता था. उसे दूर करने को ले कर कई बार हिंसक भी बन गया था. अंतत: अलायशा ने 8 माह की कैटी को खुद से दूर करना ही बेहतर समझा.

कैटी को बचपन में ही प्लाडल दंपति से फ्यूस्को दंपति ने सन 1998 में गोद ले लिया था. एंथोनी फ्यूस्को उस के दत्तक पिता थे. कैटी ने जब होश संभाला, तब उसे मालूम हुआ कि वह जिस परिवार में रह रही है, वह उस का अपना नहीं है. उस के जैविक मातापिता कोई और हैं. जिन के पास रह रही है, उन्होंने उसे गोद ले रखा है. इस बात को ले कर कैटी के मन में ऊहापोह और संशय की स्थिति बनी रही. उस के मन में अकसर टीस मारती कि आखिर उस के मांबाप कौन हैं? उन की क्या मजबूरी रही कि उन्होंने उसे खुद से अलग कर किसी को गोद दे दिया?

किशोरावस्था के आतेआते उस की जानने की इच्छा प्रबल हो गई कि आखिर उस के अपने मातापिता कौन हैं, कैसे हैं? कैटी खूबसूरत और काफी समझदार लड़की थी. यौवन की दहलीज पर खड़ी थी. पढ़ाई में भी अव्वल थी. आर्ट की स्टूडेंट थीदूसरी तरफ अलायशा भी अपनी पहली संतान कैटी से मिलना चाहती थी. उसे पता था कि उस के दत्तक मातापिता काफी अच्छे हैं. उधर अलायशा को भरोसा था कि उन्होंने कैटी का काफी खयाल रखा होगा. फिर भी जब वह एकांत में होती तो कैटी से मिलने की इच्छा जाग जाती थी, लेकिन आजीविका की आपाधापी में मिलना संभव नहीं हो पाता था. अलायशा और स्टीवन इंटरनेट के जरिए मिले थे तो कैटी ने भी अपने जैविक मातापिता की तलाश के लिए इंटरनेट संचालित सोशल साइट फेसबुक का सहारा लिया. फेसबुक के जरिए उस ने अपने मांबाप को तलाशना शुरू कर दिया.

इस में उसे अगस्त 2015 में सफलता मिल गई. उन से कैटी की पहली मुलाकात जून 2016 में हो गई. मां अलायशा से मिल कर जहां उस ने भावनात्मक लगाव महसूस किया, वहीं पिता स्टीवन प्लाडल को देखा तो देखती ही रह गई. स्टीवन खूबसूरत नौजवान की तरह दिखता था. उस का व्यक्तित्व काफी आकर्षक था और शारीरिक बनावट, कदकाठी और चालढाल कुछ ऐसा था कि वह अपनी उम्र से 10 साल कम का दिखता था. कैटी ने स्टीवन को पहली ही निगाह में एक आकर्षक व्यक्ति के नजरिए से देखा. उस के पहली झलक वाले व्यक्तित्व की ओर खिंचाव का एहसास हुआ, जो ठीक उस के सपनों के किसी राजकुमार की तरह था. कैटी अपने दत्तक मातापिता की इजाजत ले कर अलायशा और स्टीवन प्लाडल के साथ हेनरिको काउंटी स्थित उन के घर में रहने लगी. तब कैटी की उम्र 18 साल थी. जल्द ही उस ने नए परिवार के सदस्यों के तालमेल बिठा लिया

उसे दशकों बाद मिले मातापिता के अलावा दादी और 2 छोटी बहनों के साथ भावनात्मक लगाव काफी अच्छा लग रहा था. उसे लंबे अरसे बाद एकाकीपन दूर होने का अहसास हुआ. इसी के साथ मन में सामान्य लड़की की तरह स्वाभाविक रोमांच भी कुलांचे मार रहा था. उस ने जिस के साथ रोमांस की पहल की वह और कोई नहीं, उस का पिता स्टीवन था. उसे रिश्तों की मर्यादा का तो जरा भी खयाल आया और ही स्टीवन ने इसे लांघने का विरोध जताया. वह भी अनैतिक यौनाकर्षण में खिंचता चला गयावह नवयौवना कैटी की सुंदरता के आकर्षण की रौ में बह गया. भूल गया कि कैटी उस की सगी बेटी है. इस यौनाकर्षण के अंजाम क्या हो सकते थे, इस की उन्होंने जरा भी परवाह नहीं की. जल्द ही बापबेटी ने रिश्ते की मर्यादा को लांघते हुए यौन संबंध भी कायम कर लिया.

गलत बुनियाद वाले नए रिश्ते का अंजाम ही था कि उन्हें इसे निभाने के लिए कई बाधाएं दूर करनी पड़ीं. कैटी अनब्याही मां बनने वाली थी. अजन्मे बच्चे के भविष्य को ले कर वह चिंतित रहने लगी. इस की जानकारी उस के दत्तक मातापिता को भी हुई. यह उन की बड़ी भूल थी, जो उन्होंने कैटी को अपने जैविक मातापिता से मिलने की इजाजत दी थी, लेकिन यह भूल अब सुधारी नहीं जा सकती थी. उन के मन में सब से बड़ा सवाल कैटी के गर्भ में पलने वाले बच्चे के भविष्य और पिता के नाम को ले कर था. अंतत: स्टीवन और कैटी ने शादी करने की ठान ली. अलायशा ने विरोध करते हुए पति स्टीवन से अलग होने का निर्णय ले लिया. वह उन्हें हर हाल में एकदूसरे से अलग करना चाहती थी. अजन्मे बच्चे को ले कर उस के मन में योजना थी. फिलहाल अलायशा की पूरी कोशिश कैटी को स्टीवन से अलग करने की थी.

इस में अलायशा को आंशिक सफलता मिली और दोनों कानून की गिरफ्त में गए. कैटी और स्टीवन को अवैध विवाह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया. उन की गिरफ्तारी वहीं से हुई, जहां से अबोध बच्चे बेन्निट की लाश बरामद की थी. स्टीवन ने अपनी मां से छीन कर 7 माह के बेन्निट की हत्या कर दी और मां को वहां से भाग जाने को कहा था. उस वक्त कैटी अदालत के आदेश के मुताबिक अपने दत्तक पिता के पास थी. स्टीवन की मां ग्रेसी ने पुलिस को बताया कि उस ने पुलिस को इस की सूचना देने के लिए कहा. वह काफी गुस्से में था. कैटी और उस के दत्तक पिता को मार डालने की धमकी दे कर फरार हो गया. ग्रेसी ने बताया कि उस के सिर पर सब कुछ खत्म कर देने का भूत सवार हो चुका था

उस का हिंसक रूप और पागलपन देख कर वह डर गई थी. अगला निशाना उस ने कैटी को ही बनाया. साथ में उस के दत्तक पिता को भी मार डाला. तब तक वह गुस्से में पागल और विक्षिप्त हो चुका था. अंतत: उस ने खुद को भी गोली मार ली.

पुलिस द्वारा पूरे मामले की तहकीकात करने के बाद फाइल बंद कर दी गई. इस की वजह यह थी कि हत्या करने वाला भी आत्महत्या कर चुका था. इस की पुष्टि नाइटडेल पुलिस के चीफ लारेंस कैप्स द्वारा प्रैस कौन्फ्रैंस में कर दी गई. उन्होंने इस तरह अनैतिक संबंधों को ले कर हैरानी भी व्यक्त की. इस तरह अनैतिक रिश्ता बनाने की यह कहानी समाज और परिवार के बिगड़े स्वरूप और आनुवांशिक यौन आकर्षण के विकसित होने वाली परिस्थितियों को दर्शाती है. यह तो सत्य है कि इस तरह के संबंध समाज के लिए अहितकर ही होंगे. लोगों को ऐसी घटनाओं से सीख लेनी चाहिए.

शादीशुदा महिला ने दो प्रेमियों के साथ मिलकर किया तीसरे का कत्ल

आशा पति से जिन संबंधों को छिपा कर उस की नजरों में पाक साफ बनी रहना चाहती थी, प्रेमी की हत्या करने के बाद उन संबंधों के बारे में पति को ही नहीं पूरी दुनिया को पता चल गया…    

उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के थाना औरास के अंतर्गत आने वाले गांव गागन बछौली का रहने वाला उमेश कनौजिया बहुत ही हंसमुख और मिलनसार स्वभाव का था. इसी वजह से उस का सामाजिक और राजनीतिक दायरा काफी बड़ा था. उन्नाव ही नहीं, इस से जुड़े लखनऊ और बाराबंकी जिलों तक उस की अच्छीखासी जानपहचान थी. वह अपने सभी परिचितों के ही सुखदुख में नहीं बल्कि पता चलने पर हर किसी के सुखदुख में पहुंचने की कोशिश करता था. उस की इसी आदत ने ही उसे इतनी कम उम्र में क्षेत्र का नेता बना दिया था. मात्र 25 साल की उम्र में वह जिला पंचायत सदस्य बना तो इस उम्र का कोई दूसरा सदस्य पूरे जिले में नहीं था.

नेता बनने की यह उस की पहली सीढ़ी थी. वह और आगे बढ़ना चाहता था, इसलिए उस ने अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया था. वैसे तो उस ने यह चुनाव भाजपा के समर्थन से जीता था, लेकिन उस के संबंध लगभग हर पार्टी के नेताओं से थे. इस की वजह यह थी कि उस की कोई ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं थी कि लोग उसे नेता मान लेते. उस के पिता सूबेदार कनौजिया दुबई में नौकरी करते थेउमेश भी पढ़लिख कर नौकरी करना चाहता था, लेकिन जब उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली तो वह छुटभैया नेता बन कर गांव वालों की सेवा करने लगा. उसी दौरान उस की जानपहचान कुछ नेताओं से हुई तो वह भी नेता बनने के सपने देखने लगा. उस का यह सपना तब पूरा होता नजर आया, जब जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ने पर भाजपा ने उस का समर्थन कर दिया.

उमेश अपनी मेहनत और जनता की सेवा कर के नेता बना था. वह राजनीति में लंबा कैरियर बनाना चाहता था, इसलिए अपने क्षेत्र की जनता से ही नहीं, क्षेत्र के लगभग सभी पार्टी के नेताओं से जुड़ा था. उस का सोचना था कि कभी भी किसी की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में उस के निजी संबंध ही काम आएंगे. इस का उसे लाभ भी मिल रहा था. बसपा के सांसद ब्रजेश पाठक उसे भाई की तरह मानते थेउन्नाव के विकास खंड औरासा के वार्ड नंबर 2 से जिला पंचायत सदस्य चुने जाने के बाद उमेश ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा था. अपनी कार्यशैली की वजह से ही वह कम समय में लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया था.

उत्तर प्रदेश का जिला उन्नाव लखनऊ और कानपुर जैसे 2 बड़े शहरों को जोड़ने का काम करता है. यह लखनऊ से 60 किलोमीटर दूर है तो कानपुर से मात्र 20 किलोमीटर दूर. एक तरफ प्रदेश की राजधानी है तो दूसरी ओर कानपुर जैसा महानगर है. इस के बावजूद इस की गिनती पिछड़े जिलों में होती है. शायद यही वजह है कि यहां नशा और अपराध अन्य शहरों की अपेक्षा ज्यादा हैं. जिला भले ही पिछड़ा है, लेकिन कानपुर और लखनऊ की सीमा से जुड़ा होने की वजह से यहां की जमीन काफी महंगी है. इसलिए यहां के लोग अपनी जमीनें बेच कर अय्याशी करने लगे हैं. इस के अलावा गांवों के विकास के लिए पंचायती राज कानून लागू होने की वजह से गांवों में सरकारी योजनाओं का पैसा भी खूब रहा है, जिस से पंचायतों से जुड़े लोग प्रभावशाली बनने लगे हैं

यही सब देख कर युवा चुनाव की ओर आकर्षित होने लगे हैं. वे चुनाव जीत कर समाज और राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं. उमेश कनौजिया भी कुछ ऐसा ही सोच नहीं रहा था, बल्कि इस राह पर उस ने कदम भी बढ़ा दिए थे. लेकिन उस का यह सपना पूरा होता, उस के साथ एक हादसा हो गया. 14 नवंबर, 2013 की सुबह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना मलिहाबाद के गांव गढ़ी महदोइया के लोगों ने गांव के बाहर शारदा सहायक नहर के किनारे एक लाश पड़ी देखी. मृतक यही कोई 25-26 साल का था. वह धारीदार सफेदनीला स्वेटर, नीली जींस और हरे रंग की शर्ट पहने था. उस के दाहिने हाथ में कलावा बंधा था, जिस का मतलब था कि वह हिंदू था. उस के गले पर रस्सी का निशान साफ नजर रहा था. जिस से साफ था कि उस की हत्या की गई थी. हालांकि उस के दाहिने गाल से खून भी बह रहा था.

लाश से थोड़ी दूरी पर एक पैशन प्रो मोटरसाइकिल भी पड़ी थी, जिस का नंबर यूपी 32 ईवाई 1778 था. उस में चाबी लगी थी. पहली नजर में देख कर यही कहा जा सकता था कि यह दुर्घटना का मामला है. लेकिन गले पर जो रस्सी का निशान था, उस से अंदाजा साफ लग रहा था कि यह एक्सीडेंट नहीं, हत्या का मामला  है. जिन लोगों ने लाश देखी थी, उन्हें लगा कि यह हत्या का मामला है तो उन्होंने इस बात की सूचना ग्रामप्रधान को दी. उस समय सुबह के यही कोई 7 बज रहे थे. ग्रामप्रधान के पति राजेश कुमार ने नहर के किनारे लाश पड़ी होने की सूचना थाना मलिहाबाद पुलिस को दी तो एसएसआई श्याम सिंह सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए

लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर उन्होंने लाश की शिनाख्त करानी चाही, तो वहां जमा लोगों में से कोई भी उस की पहचान नहीं कर सका. लाश के कपड़ों की तलाशी में भी ऐसा कोई सामान नहीं मिला, जिस से उस की पहचान हो पाती. मोटरसाइकिल के नंबर से अंदाजा लगाया गया कि मृतक लखनऊ का रहने वाला है, क्योंकि उस पर पड़ा नंबर लखनऊ का ही था. संयोग से मोटरसाइकिल की डिग्गी खोली गई तो उस में से उस के कागजात मिल गए. मोटरसाइकिल उमेश कनौजिया के नाम रजिस्टर्ड थी. उस पर पता एकतानगर, थाना ठाकुरगंज, लखनऊ का था. इस से साफ हो गया कि मारा गया युवक लखनऊ का ही रहने वाला था

थाना मलिहाबाद पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मेडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद एसएसआई श्याम सिंह ने घटना की सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को एकता नगर भेज दिया. थाना मलिहाबाद के सिपाहियों ने थाना ठाकुरगंज के एकतानगर पहुंच कर उमेश कनौजिया के बारे में पता किया तो वहां पर उस की मौसी शशिकला मिलीं. पुलिस वालों ने जब उमेश की लाश मिलने की बात उन्हें बताई तो वह बेहोश हो गईं. घर वाले पानी के छींटे मार कर उन्हें होश में ले आए तो उन्होंने बताया, ‘‘उमेश हमारी बहन का बेटा है. वह उन्नाव का रहने वाला है. जब वह मेरे यहां रह कर पढ़ाई कर रहा था, तभी उस ने यह मोटरसाइकिल खरीदी थी. इसीलिए उस के कागजातों में मेरा पता लिखा है.’’

इस के बाद पुलिस वालों ने शशिकला से उमेश के घर वालों का फोन नंबर ले कर उमेश की मौत की सूचना उस के घर वालों को दी. सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद ही उमेश के घर वाले थाना मलिहाबाद पहुंच गए. उमेश के पिता सूबेदार कनौजिया ने उमेश की हत्या किए जाने की बात कह कर 2 लड़कों के नाम भी बताएलेकिन थाना मलिहाबाद पुलिस का कहना था कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद ही हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाएगा. इस पर उमेश के घर वाले भड़क उठे. धीरेधीरे यह बात फैलने लगी कि जिला पंचायत सदस्य उमेश कनौजिया की हत्या हो गई है और थाना मलिहाबाद पुलिस मुकदमा दर्ज करने में आनाकानी कर रही है. मलिहाबाद उन्नाव की सीमा से जुड़ा है, इसलिए खबर मिलने के बाद मृतक उमेश की जानपहचान वाले थाना मलिहाबाद पहुंचने लगे.

15 नवंबर, 2013 की सुबह से ही हत्या का मुकदमा दर्ज करने के लिए धरनाप्रदर्शन शुरू हो गया. अब तक शव घर वालों को मिल चुका था. घर वालों ने बसपा सांसद ब्रजेश पाठक, भाजपा के पूर्व विधायक मस्तराम, किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह के नेतृत्व में रहीमाबाद चौराहे पर लाश रख कर रास्ता रोक दिया. सांसद ब्रजेश पाठक का कहना था कि समाजवादी पार्टी के राज में पुलिस आम जनता की नहीं सुन रही है, इसलिए ऐसा करना पड़ रहा है. जाम लगने से आनेजाने वाले ही नहीं, रहीमाबाद कस्बे के लोग भी परेशान हो रहे थे. जाम लगाने वाले लोग उमेश कनौजिया के हत्यारों को गिरफ्तार करने, थाना मलिहाबाद के इंसपेक्टर जे.पी. सिंह को निलंबित करने, पीडि़त परिवार को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने और उमेश के छोटे भाई सुधीर को सरकारी नौकरी देने की मांग कर रहे थे.

जाम का नेतृत्व कर रहे नेताओं को लग रहा था कि उन के इस आंदोलन से राजनीतिक लाभ मिल सकता है, इसलिए वे आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे. जाम लगाए लोगों को हटाने के लिए रहीमाबाद चौकी के प्रभारी अनंतराम सिपाही ज्ञानधर यादव, छेदी यादव, अशोक और होमगार्ड श्रीपाल यादव को साथ ले कर वहां पहुंचे तो गुस्साए लोगों ने अनंतराम और उन के साथ आए सिपाहियों के साथ मारपीट कर के उन्हें भगा दिया. इस बात की सूचना लखनऊ के एसपी (ग्रामीण) सौमित्र यादव, क्षेत्राधिकारी (मलिहाबाद) श्यामकांत त्रिपाठी और इंसपेक्टर (मलिहाबाद) जे.पी. सिंह को मिली तो आसपास के 3 थानों की पुलिस रहीमाबाद भेज दी गई

काफी समझानेबुझाने और भरोसा दिलाने के बाद लगभग 4 घंटे बाद जाम खुला. तब रहीमाबाद के लोगों ने राहत की सांस ली. इस के बाद उमेश के घर वाले उस का शव अंतिम संस्कार के लिए ले कर गांव चले गए. उस समय तो यह खतरा टल गया, लेकिन पुलिस को अंदेशा था कि अगले दिन भी राजनीतिक लोग इस घटना का लाभ उठाने के लिए धरनाप्रदर्शन कर सकते हैं. इसी बात पर विचार कर के लखनऊ के एसएसपी जे. रवींद्र गौड ने मामले का जल्द से जल्द खुलासा करने के लिए अपने मातहत अधिकारियों पर दबाव बनाया. इस के बाद थाना मलिहाबाद के इंसपेक्टर जे.पी. सिंह ने उमेश के घर वालों से मिल कर यह जानने की कोशिश की कि उन की किसी से रंजिश तो नहीं है. लेकिन घर वालों ने किसी भी तरह की राजनीतिक या पारिवारिक रंजिश से इनकार कर दिया

उमेश के पास इतना पैसा भी नहीं था कि लूटपाट के लिए उस की हत्या की जाती. वह पैसे का भी लेनदेन नहीं करता था. अब पुलिस के पास उमेश हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का एकमात्र सहारा उस का मोबाइल फोन था. पुलिस ने उमेश के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस के अध्ययन से पता चला कि 13 नवंबर को एक ही नंबर पर उस ने 32 बार फोन किया था. पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर जिला उन्नाव के थाना हसनगंज के गांव शाहपुर तोंदा की रहने वाली आशा का निकला. आशा का विवाह थाना मलिहाबाद के अंतर्गत आने वाले गांव सिंधरवा के रहने वाले राजू से हुआ था. राजू दुबई में लांड्री का काम करता था. आशा यहीं रहती थी. पति बाहर रहता था, इसलिए वह ससुराल में कम, मायके शाहपुर तोंदा में ज्यादा रहती थी.

उमेश का उस के यहां नियमित आनाजाना  था. जब भी आशा मायके में रहती, उमेश उस से मिलने के लिए दूसरेतीसरे दिन आता रहता था. अगर किसी वजह से वह नहीं पाता था तो उसे फोन जरूर करता था. दरअसल आशा कनौजिया की मां महेश्वरी देवी ने भी जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा था. उमेश बिरादरी का नेता माना जाता था, इसलिए महेश्वरी देवी उमेश को अपने साथ रखने लगी थी. उसे लगता था कि उमेश साथ रहेगा तो बिरादरी के वोट उसे मिल जाएंगे. चुनाव महेश्वरी देवी लड़ रही थी, लेकिन उस का पूरा कामकाज पति प्रकाश कनौजिया देखता था. यही वजह थी कि उमेश और प्रकाश में गहरी छनने लगी थी. प्रकाश कनौजिया को भी लगता था कि उमेश के साथ रहने से बिरादरी का सारा वोट उसे ही मिलेगा.

चुनाव के दौरान महेश्वरी देवी के यहां आनेजाने में उमेश की नजर उस की 24 वर्षीया विवाहित बेटी आशा पर पड़ी तो वह उसे भा गई. भरेपूरे बदन वाली आशा पर उमेश की नजरें गड़ गईं. फिर तो जल्दी ही आशा की भी उमंगें हिलोरे लेने लगीं. यही वजह थी कि जल्दी ही दोनों के बीच प्रेमसंबंध बन गए. उमेश स्मार्ट और खुशदिल इंसान था. अपने इसी स्वभाव की बदौलत वह आशा को भा गया था. चुनाव के दौरान अकसर दोनों का एकसाथ आनाजाना होता रहा. उसी बीच एकांत मिलने पर दोनों ने अपने इस प्रेमसंबंध को शारीरिक संबंध में तबदील कर दिया था.

समय के साथ उमेश और आशा के संबंध प्रगाढ़ हुए तो उमेश आशा को अपनी जागीर समझने लगा. जबकि आशा को यह बिलकुल पसंद नहीं था. क्योंकि आशा के संबंध कुछ अन्य लोगों से भी थे. यही बात उमेश को पसंद नहीं थी. वह चाहता था कि आशा उस के अलावा किसी और से संबंध रखे. इस के लिए उस ने आशा को रोका भी, लेकिन वह नहीं मानीउस का कहना था कि वह अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती है, वह उसे रोकने वाला कौन होता है. उमेश के पास आशा के पति राजू का दुबई का फोन नंबर था. कभीकभी राजू की उस से बात भी होती रहती थी. आशा ने उमेश का कहना नहीं माना तो उस ने उसे सबक सिखाने की ठान ली.

एक दिन जब उस के पास राजू का फोन आया तो उमेश ने उस से बता दिया कि यहां आशा के कई लोगों से प्रेमसंबंध हैं. इस के बाद राजू और आशा में जम कर तकरार हुई. उमेश की यह हरकत आशा को बिलकुल पसंद नहीं आई. उस का इस तरह जिंदगी में दखल देना उसे अच्छा नहीं लगा तो उस ने उमेश को फोन कर के कहा, ‘तुम ने हमारे बारे में झूठ बोल कर राजू से मेरी जो लड़ाई कराई है, यह मुझे अच्छा नहीं लगा.’ अब तुम मुझ से तो मिलने की कोशिश करना और ही मुझे फोन  करना.

‘‘आशा, तुम मेरी बात का बेकार ही बुरा मान रही हो. मैं तुम्हें प्यार करता हूं, इसलिए चाहता हूं कि तुम मेरे अलावा किसी और से मिलो.’’ उमेश ने सफाई दी.

‘‘लेकिन राजू से शिकायत कर के तुम ने मुझे उस की नजरों में गिरा दिया. वह मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा? शक तो वह पहले से ही करता था. अब उसे विश्वास हो गया कि मैं सचमुच गलत हूं.’’ आशा ने झल्ला कर कहा.

‘‘मैं गुस्से में था, इसलिए मुझ से गलती हो गई. अब ऐसा नहीं होगा. तुम मुझे समझने की कोशिश करो आशा.’’ उमेश ने आशा को समझाने की कोशिश की.

‘‘तुम्हारी यह पहली गलती नहीं है. इस के पहले तुम ने मेरे साथ मारपीट की थी, मैं ने उस का भी बुरा नहीं माना था. लेकिन यह जो किया, अच्छा नहीं किया. यह गलती माफ करने लायक नहीं है. मैं तुम जैसे आदमी से अब संबंध नहीं रखना चाहती.’’ आशा ने कहा.

‘‘आशा, 13 नवंबर को मैं तुम से मिलने रहा हूं. तब बैठ कर आराम से बातें कर लेंगे.’’ उमेश ने कहा.

‘‘मैं तुम से बिलकुल नहीं मिलना चाहती, इसलिए तुम्हें यहां आने की जरूरत नहीं है.’’ आशा ने उसे आने से रोका.

‘‘आशा इतना भी नाराज मत होओ बस एक बार मेरी बात सुन लो, उस के बाद सब साफ हो जाएगा. बात इतनी बड़ी नहीं है, जितना तुम बना रही हो.’’

‘‘तुम्हारे लिए भले ही यह बात बड़ी नहीं है, लेकिन मेरे लिए यह बड़ी बात है. मैं अभी तक तुम्हारी हरकतें नजरअंदाज करती आई थी, यह उसी का नतीजा है. लेकिन अब बरदाश्त के बाहर हो गया है.’’ कह कर आशा ने फोन काट दिया.

13 नवंबर को उमेश आशा से मिलने उस के घर जाने वाला था. 14 नवंबर को बाराबंकी में उस के दोस्त पंकज के यहां शादी थी. उमेश ने योजना बनाई थी कि वह आशा से मिलते हुए दोस्त के यहां शादी में चला जाएगा. 13 नवंबर की शाम को यही कोई 7 बजे उमेश ने अपने घर फोन कर के बताया भी था कि वह मलिहाबाद में अपने दोस्त से मिल कर बाराबंकी चला जाएगा. इस के बाद उमेश ने घर वालों से संपर्क नहीं किया. रात में उस के छोटे भाई सुधीर ने उसे फोन किया तो उस का फोन बंद मिला. 13 नवंबर को उमेश ने दिन में 32 बार फोन कर के आशा को मनाने की कोशिश की थी. लेकिन आशा को अब उमेश से नफरत हो गई थी. उमेश ने उस के साथ जो किया था, अब वह उस से उस का बदला लेना चाहती थी.

आशा के संबंध गांव के ही रहने वाले रामनरेश, शकील और हरौनी के रहने वाले छोटे उर्फ पुत्तन से थे. आशा ने इन्हीं लोगों की मदद से उमेश से हमेशाहमेशा के लिए छुटकारा पाने का निश्चय कर लिया था. शाम को जब उमेश आशा से मिलने उस के घर पहुंचा तो आशा ने उस के साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसे उस से उसे कोई शिकायत नहीं है. उस ने उसे खाना खिलाया और सोने के लिए बिस्तर भी लगा दिया. सोने से पहले उमेश ने शारीरिक संबंध की इच्छा जताई तो थोड़ी नानुकुर के बाद आशा ने उस की यह इच्छा भी पूरी कर दी. आशा की यही अदा उमेश को अच्छी लगती थी. आशा के इस व्यवहार से उमेश को लगा कि वह मान गई है. वह उसे बांहों में लिएलिए ही निश्चिंत हो कर सो गया.

उमेश के सो जाने के बाद आशा उठी और अपने कपड़े ठीक कर के घर के बाहर आई. उस ने गांव का माहौल देखा. गांव में सन्नाटा पसर गया था. उस ने रामनरेश, शकील और छोटे को पहले से ही तैयार कर रखा था. उन के पास जा कर उस ने कहा, ‘‘चलो उठो, वह सो चुका है. गांव में भी सन्नाटा पसर गया है. जल्दी से उसे खत्म कर के लाश ठिकाने लगा दो.’’

रामनरेश और आशा ने उमेश के पैर पकड़े तो छोटे ने हाथ पकड़ लिए. उस के बाद शकील ने गला दबा कर उसे खत्म कर दिया. छोटे महदोइया गांव का ही रहने वाला था, इसलिए उसे गांव की एकएक गली का पता था. सभी ने मिल कर उमेश की लाश को टैंपो नंबर 35 8902 में डाला और ले जा कर गांव से काफी दूर नहर के किनारे फेंक दिया. शकील और छोटे टैंपो के पीछेपीछे उमेश की मोटरसाइकिल ले कर गए थे. उसे भी वहीं डाल दिया थालाश ले जाने से पहले आशा ने उमेश की पैंट की जेब से मोबाइल और पर्स निकाल लिया था, जिस से उस की पहचान हो सके.

शकील और छोटे ने उमेश की लाश को नहर के किनारे इस तरह फेंका था कि देखने वालों को यही लगे कि रात में दुर्घटना की वजह से इस की मौत हुई है. अपनी इस योजना में वे सफल भी हो गए थे, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पोल खुल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस की मौत गला दबाने से हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर के मामले की जांच शुरू की तो हत्यारों तक पहुंचने में उसे देर नहीं लगी. आशा से पूछताछ के बाद पुलिस ने रामनरेश को भी गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की. उस ने भी अपना जुर्म कुबूल लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस शकील और छोटे की तलाश कर रही थी, लेकिन कथा लिखे जाने तक दोनों पुलिस के हाथ नहीं लगे थे. पुलिस हत्या के इस मामले में आशा के मांबाप की भूमिका की भी जांच कर रही है. आशा ने जो किया, उस से उमेश का ही नहीं, उस का खुद का भी परिवार छिन्नभिन्न हो गया. जिस पति से वह अपने जिन संबंधों को छिपाना चाहती थी, उमेश की हत्या के बाद पति को ही नहीं, पूरी दुनिया को पता चल गया. अब उस का क्या होगा, यह तो अदालत के फैसले के बाद ही पता चलेगा.

दोस्त से कराई प्रेमिका की हत्या

समीर ने विवाहिता सोफिया से प्यार केवल उस का शरीर पाने के लिए किया था. जबकि सोफिया उस के साथ जिंदगी बिताने के सपने देख रही थी. कभी किसी के सपने पूरे हुए हैं जो सोफिया के पूरे होते. आग भड़की तो धुआं खिड़कियों और दरवाजों की दराजों से बाहर निकलने लगा. पड़ोसियों ने तुरंत इस बात की जानकारी फायर और पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोलरूम ने तत्काल इस बात की सूचना मुंबई के उपनगर चैंबूर के थाना पुलिस को दी. सूचना के अनुसार लल्लूभाई कंपाउंड की इमारत की पांचवीं मंजिल के किसी फ्लैट में आग लगी थी. उस में से निकलने वाले धुएं से मानव शरीर के जलने की गंध रही थी. उस समय ड्यूटी पर सबइंसपेक्टर माली थे.

सूचना गंभीर थी, इसलिए घटना की सूचना अपने सीनियर पुलिस इंसपेक्टर चंद्रशेखर नलावड़े को दे कर वह तुरंत कुछ सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. सबइंसपेक्टर माली के पहुंचने तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. आग बुझाने वाली गाडि़यां भी चुकी थीं और उन्होंने आग पर काबू भी पा लिया था. सबइंसपेक्टर माली साथियों के साथ फ्लैट के अंदर पहुंचे तो वहां की स्थिति देख कर स्तब्ध रह गएकमरे में एक औरत बेहोशी की हालत में रुई के गद्दे में लिपटी थी. गद्दे के साथ उस के सारे कपड़े ही नहीं, सीना, पेट, हाथ, कमर और दोनों पैर भी बुरी तरह जल गए थे. गौर से देखने पर पता चला कि उस के सिर के ऊपरी हिस्से में गहरा घाव था, जिस से अभी भी खून रिस रहा था.

वहां तेज धार वाला एक बड़ा सा खून से सना चाकू पड़ा था. साफ था, पहले हत्यारों ने महिला पर चाकू से वार किया था. उस के बाद सुबूत मिटाने के लिए उसे गद्दे में लपेट कर आग लगा दी थी. सबइंसपेक्टर माली ने देखा कि महिला की सांस चल रही है तो उन्होंने उसे तुरंत एंबुलैंस में डाल कर उपचार के लिए घाटकोपर राजा वाड़ी असपताल भिजवा दिया. इस के बाद वह सुबूतों की तलाश में फ्लैट का कोनाकोना छानने में लग गए. पड़ोसियों से पूछताछ में पता चला कि महिला का नाम सोफिया शेख था. वह अपनी बेटी के साथ वहां रहती थी. श्री माली अपने सहायकों के साथ सोफिया के बारे में जानकारी जुटा रहे थे कि घटना की सूचना पा कर ज्वाइंट सीपी कैसर खालिद, एडिशनल सीपी लखमी गौतम, एसीपी विजय मेरु, सीनियर इंसपेक्टर शंकर सिंह राजपूत, इंसपेक्टर चंद्रशेखर नलावड़े, प्रमोद कदम घटनास्थल पर पहुंचे थे.

अधिकारी घटनास्थल का निरीक्षण कर के सीनियर इंसपेक्टर शंकर सिंह राजपूत को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर चले गए. अधिकारियों के जाने के बाद सीनियर इंसपेक्टर शंकर सिंह राजपूत ने सहायकों की मदद से चाकू, खून का नमूना, सोफिया का मोबाइल फोन कब्जे में लिया और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर थाने गए. थाने कर सीनियर इंसपेक्टर शंकर सिंह राजपूत हत्यारों तक पहुंचने का रास्ता तलाश करने लगे. घटनास्थल की स्थिति से साफ था कि यह लूटपाट का मामला नहीं था, क्योंकि फ्लैट का सारा समान यथास्थिति पाया गया था. ऐसे में सावाल यह था कि तब सोफिया की हत्या की कोशिश क्यों की गई थी

सोफिया इस स्थिति में नहीं थी कि वह इस सवाल का जवाब देती. वह उस समय जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी. वैसे भी उस के बचने की संभावना कम थी. आखिर वही हुआ, जिस का सभी को अंदाजा था. लाख कोशिश के बाद भी डाक्टर सोफिया को बचा नहीं सके. उसी दिन शाम लगभग 6 बजे सोफिया ने दम तोड़ दिया था. सोफिया की मौत के बाद हत्यारों के बारे में पता चलने की पुलिस की उम्मीद खत्म हो गई थी. अब उन्हें अपने तरीके से कातिलों तक पहुंचना था. सोफिया की हत्या किस ने और क्यों की, वे कहां के रहने वाले थे? अब पुलिस के लिए यह एक रहस्य बन गया था. सीनियर इंसपेक्टर शंकर सिंह राजपूत ने इस मामले की जांच इंसपेक्टर चंद्रशेखर नलावड़े को सौंप दी थी.

सीनियर इंसपेक्टर शंकर सिंह राजपूत के मार्गदर्शन में इंसपेक्टर चंद्रशेखर नलावड़े ने इंसपेक्टर प्रमोद कदम, असिस्टेंट इंसपेक्टर पोपट सालुके, सबइंसपेक्टर संदेश मांजरेकर, सिपाही भरत ताझे, राजेश सोनावणे की एक टीम बना कर मामले की तफ्तीश तेजी से शुरू कर दी. चंद्रशेखर की इस टीम ने सोफिया की बेटी, इमारत में रहने वालों और उस के नातेरिश्तेदारों से लंबी पूछताछ की. इमारत में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी. लेकिन काफी मेहनत के बाद भी उस के कातिलों तक पहुंचने का पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. जब इस पूछताछ से पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला तो पुलिस ने सोफिया के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. पुलिस की नजरें काल डिटेल्स के उस नंबर पर जम गईं, जो उस दिन सोफिया पर हमला होने से पहले आया था

वही अंतिम फोन भी था. वह फोन 12 बज कर 03 मिनट पर आया था. सोफिया ने उसे रिसीव भी किया था. इस का मतलब उस समय तक वह जीवित थी. इस के बाद ही उस फ्लैट में आग लगने की सूचना पुलिस और फायरब्रिगेड को दी गई थी. इस का मतलब फोन करने के बाद 15 मिनट के अंदर हत्यारे अपना काम कर के चले गए थे. इंसपेक्टर चंद्रशेखर की टीम ने एक बार फिर इमारत में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. उस समय की तस्वीरों को गौर से देखा गया. लेकिन कोई स्पष्ट तस्वीर पुलिस को दिखाई नहीं दी. इस के बाद पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया, लेकिन फोन बंद होने की वजह से बात नहीं हो पाई. तब पुलिस ने यह पता किया कि वह नंबर किस के नाम है और वह कहां रहता है?

पुलिस को इस संबंध में तुरंत जानकारी मिल गई. वह किसी जावेद के नाम था. पुलिस को उस का पता भी मिल गया था. पुलिस उस के घर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. घर पर जावेद की बहन और भाभी मिलीं तो पुलिस ने पूछा कि उस का फोन बंद क्यों है? तब दोनों ने बताया कि उस का फोन इन दिनों उस के जिगरी दोस्त पप्पू के पास है. पप्पू का पता भी दोनों ने बता दिया था. इसलिए पुलिस टीम वहां से सीधे पप्पू के घर जा पहुंची. पप्पू भी घर से गायब था. पुलिस टीम ने उस फोन को सर्विलांस पर लगवा दिया, जिस का उपयोग पप्पू कर रहा था. इस के बाद सर्विलांस की मदद से 12 दिसंबर, 2013 की दोपहर 2 बजे पुलिस टीम ने पप्पू को शिवडी के झकरिया बंदर रोड से गिरफ्तार कर लिया.

थाने ला कर जब पप्पू से सोफिया की हत्या के बारे में पूछताछ की जाने लगी तो पहले उस ने स्वयं को निर्दोष बताया. लेकिन पुलिस के पास उस के खिलाफ ढेर सारे सुबूत थे, इसलिए उसे घेर कर सच्चाई उगलवा ली. आखिर उस ने स्वीकार कर लिया कि मुन्ना उर्फ परवेज शेख के साथ उसी ने दुबई में रहने वाले समीर के कहने पर सोफिया की हत्या की थी. इस के बाद पुलिस ने पप्पू की निशानदेही पर घाटकोपर के तिलकनगर के सावलेनगर के रहने वाले मुन्ना को उस के घर छापा मार कर गिरफ्तार कर लिया. पप्पू के पकड़े जाने से पूछताछ में उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों को मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर के 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान पूछताछ में दोनों ने जो बताया, उस के अनुसार सोफिया की हत्या की यह कहानी कुछ इस तरह थी.

40 वर्षीया सोफिया शेख अपने 2 बच्चों के साथ चैंबूर मानखुर्द के लल्लूभाई कंपाउंड की बिल्डिंग नंबर 60 की बीविंग के फ्लैट नंबर 5/3 में रहती थी. उस का 13 वर्षीय बेटा रत्नागिरि के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ता था और वहीं बोर्डिंग के हौस्टल में रहता था. जबकि 10 वर्षीया बेटी सोफिया के साथ ही रहती थी. घटना के समय वह स्कूल गई हुई थी. सन 1991 में सोफिया शेख का निकाह चैंबूर के शिवाजीनगर के रहने वाले इमरान हाजीवर शेख के बड़े भाई के साथ हुआ तो मानो उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गई थीं. इस की वजह यह थी कि उस का पति उसे जान से ज्यादा प्यार करता था. उस का दांपत्यजीवन बड़ी हंसीखुशी से बीत रहा था. दोनों अपनी गृहस्थी जमाने की कोशिश कर रहे थे कि अचानक उन की इस गृहस्थी पर किसी की काली नजर पड़ गई

अभी सोफिया के हाथों की मेहंदी भी ठीक से नहीं छूटी थी कि जिस पति ने उस का हाथ थाम कर जीवन भर साथ निभाने का वादा किया था, वह हाथ ही नहीं, बल्कि हमेशाहमेशा के लिए उस का साथ छोड़ कर चला गया. हैवानियत की एक ऐसी आंधी आई, जिस में उस का सुहाग पलभर में उड़ गया. सन 1992 में मुंबई में जो सांप्रदायिक दंगे हुए थे, उस में उस का पति मारा गया था. पति की आकस्मिक मौत ने सोफिया को तोड़ कर रख दिया. उसे दुनिया से ही नहीं, अपनी जिंदगी से भी नफरत हो गई. वह जीना नहीं चाहती थी, लेकिन आत्महत्या भी नहीं कर सकती थी. वह हमेशा सोच में डूबी रहने लगी. मुसकराने की तो छोड़ो, वह बातचीत भी करना लगभग भूल सी गई थी. उस की हालत देख कर मातापिता परेशान रहने लगे थे. उस ने जिंदगी शुरू की थी कि उस के साथ इतना बड़ा हादसा हो गया था.

अभी उस की पूरी जिंदगी पड़ी थी. उस की जिंदगी को संवारने के लिए उस के मातापिता उस के दूसरे निकाह के बारे में सोचने लगे. सोफिया के मातापिता उस का दूसरा निकाह उस के पति के छोटे भाई इमरान हाजीवर शेख से करना चाहते थे. सोफिया की ससुराल वालों से बातचीत कर के जब उस के मातापिता ने इमरान से निकाह का प्रस्ताव सोफिया के सामने रखा तो उस ने मना कर दिया. लेकिन उन्होंने उसे ऊंचनीच का हवाला दे कर खूब समझायाबुझाया तो वह देवर इमरान हाजीवर शेख के साथ निकाह करने को तैयार हो गई. इस के बाद दोनों परिवारों की उपस्थिति में बड़ी सादगी से सोफिया का निकाह उस के पति के छोटे भाई इमरान हाजीवर शेख के साथ हो गया. यह 1996 की बात थी. इमरान औटो चलाता था

निकाह के बाद सोफिया अपने दूसरे पति से भी वैसा ही प्यार चाहती थी, जैसा उसे पहले पति से मिला था. यही वजह थी कि वह उसे भी उसी तरह प्यार कर रही थी. निकाह के कुछ दिनों बाद तक तो इमरान ने उसे उसी तरह प्यार किया, जिस तरह उस के पहले पति ने किया था. तब वह अपनी सारी कमाई ला कर सोफिया के हाथों में रख देता था. उस बीच उस ने उस के हर दुखसुख का खयाल भी रखा. उसी बीच सोफिया उस के 2 बच्चों की मां बनी. पहला बच्चा बेटा था तो दूसरा बेटी. बच्चों के बढ़ने के साथ जिम्मेदारियां बढ़ने लगीं. जिम्मेदारियां बढ़ीं तो खर्च बढ़ा, जिस के लिए इमरान को कमाई बढ़ाने के लिए ज्यादा समय देना पड़ता था. अब वह पहले की तरह सोफिया को प्यार कर पाता था, समय दे पाता था. इस से सोफिया का मन बेचैन रहने लगा, जिस से छोटीछोटी बातों को ले कर बड़ेबड़े झगड़े होने लगे. धीरेधीरे ये झगड़े इतने बढ़ गए कि दोनों ने अलग रहने का निर्णय ले लिया. इस तरह दोनों के संबंध खत्म हो गए.

पति से अलग होने के बाद सोफिया दोनों बच्चों को ले कर मानखुर्द में मुंबई म्हाण द्वारा मिले मकान में कर रहने लगी. बच्चों के साथ यहां कर सोफिया खुश तो थी, लेकिन एक बात यह भी है कि पति से अलग होने के बाद हर औरत बहुत दिनों तक अपने दिलोदिमाग पर काबू नहीं रख पाती. अगर वह जवान हो तो यह समस्या और बढ़ जाती है. क्योंकि इस उम्र में जो जोश होता, उसे संभालना हर किसी के वश की बात नहीं होती. उस औरत के लिए यह और मुश्किल हो जाता है, जो उस का स्वाद चख चुकी होती है. ऐसे में वह उस सुख के लिए मर्यादा तक भूल जाती है. ऐसा ही सोफिया के साथ भी हुआ. पति इमरान हाजीवर से अलग होने के बाद वह अपने तनमन पर काबू नहीं रख पाई और स्वयं को समीर शेख की बांहों में झोंक दिया.

25 वर्षीय समीर शेख अपने भाई के साथ गोवड़ी शिवाजीनगर के उसी इलाके में रहता था, जहां सोफिया अपने पति इमरान हाजीवर शेख के साथ रहती थी. समीर शेख देखने में जितना सुंदर और स्वस्थ था, उतना ही दिलफेंक भी था. इसी वजह से लड़कियां उस की कमजोरी बन चुकी थीं. समीर के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. वह दुबई की किसी कंपनी में नौकरी करता था. अच्छी कमाई थी, इसलिए खर्च करने में भी उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. वह हमेशा हीरो की तरह सजधज कर रहता था. उस की शादी भी नहीं हुई थी, इसलिए कोई जिम्मेदारी भी नहीं थी. अपने दिलफेंक स्वभाव की ही वजह से जब उस ने सोफिया को अपने एक रिश्तेदार के यहां देखा तो पहली ही नजर में उसे अपने दिल में बैठा लिया. कुंवारा समीर अपनी उम्र से बड़ी और 2 बच्चों की मां सोफिया पर मर मिटा. सोफिया जब तक अपने उस रिश्तेदार के घर रही, तब तक महिलाओं को पटाने में माहिर समीर की नजरें सोफिया के इर्दगिर्द ही घूमती रहीं.

सोफिया को भी एक ऐसे पुरुष की जरूरत थी, जो उस के भटकते तनमन को काबू में ला सके. इसलिए समीर से नजरें मिलते ही उस ने उस के दिल की बात जान ली. सोफिया ने समीर को तब देखा था, जब वह लड़का था. आज वही समीर जवान हो कर उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था. समीर का भरापूरा चेहरा, चौड़ी छाती और मजबूत बांहें देख कर सालों से शारीरिक सुख से वंचित सोफिया का मन विचलित हो उठा. वह उसे चाहत भरी नजरों से ताक ही रहा था, इसलिए सोफिया ने भी उस पर अपनी नजरें इनायत कर दीं तो बातचीत में होशियार समीर को उस पर अपना प्रभाव जमाने में देर नहीं लगी. उसी दौरान दोनों ने एकदूसरे के फोन नंबर भी ले लिए. इस के बाद मोबाइल पर शुरू हुई बातचीत जल्दी ही मेलमुलाकात में ही नहीं, प्यार और शारीरिक संबंधों में बदल गई.

2 बच्चों की मां होने के बावजूद सोफिया की सुंदरता में जरा भी कमी नहीं आई थी. उस के रूपसौंदर्य और शालीन स्वभाव में समीर डूब सा गया. औरतों का रसिया समीर शेख जब तक दुबई में रहता, फोन से बातें कर के सोफिया को अपने प्यार में इस कदर उलझाए रहता कि उसे उस की दूरी का अहसास नहीं हो पातादुबई से आने पर समीर सोफिया के लिए ढेर सारे उपहार तो लाता ही, उसे इस कदर प्यार करता कि बीच का खालीपन भर जाता. जब तक वह यहां रहता, सोफिया को इतना प्यार देता कि वह पूरी दुनिया भूली रहती. समीर के प्यार को पा कर सोफिया एक सुंदर भविष्य के सपनों में खो गई. उस के मन में उम्मीद जाग उठी कि समीर उस का पूरे जीवन साथ देगा. समीर ने वादा भी किया था, इसलिए सोफिया उस से निकाह के लिए कहने लगी. जबकि समीर टालता रहा.

जब समीर और अपने से दोगुनी उम्र की सोफिया के प्यार की जानकारी समीर के घर वालों की हुई तो वे परेशान हो उठे. उन्हें इज्जत के साथसाथ उस के भविष्य की भी चिंता सताने लगी. उन्होंने दुनियादारी बता कर उसे समझायाबुझाया तो वह शादी के लिए राजी हो गया. इस के बाद उस के लिए पारिवारिक लड़की खोजी जाने लगीसमीर शादी के लिए तैयार तो हो गया था, लेकिन वह जानता था कि सोफिया आसानी से मानने वाली औरतों में नहीं है. उस ने सिर्फ शारीरिक जरूरत के लिए ही उस से प्यार नहीं किया था. उस ने उसे दिल से प्यार किया था, इसलिए वह जानता था कि सोफिया आसानी से उसे छोड़ने वाली नहीं है.

समीर भले ही उस से शादी का वादा करता रहा था, लेकिन सच्चाई यह थी कि उस ने मात्र शारीरिक जरूरत पूरी करने के लिए सोफिया से प्यार किया था. यही वजह थी कि घर वालों ने उस के लिए लड़की की तलाश शुरू की तो वह सोफिया को ले कर परेशान रहने लगा. क्योंकि वह जानता था कि सोफिया आसानी से तो क्या, बिलकुल ही नहीं मानने वाली. पता चलने पर यह भी हो सकता था कि वह उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा देतब बदनामी भी होती और समीर कानूनी शिकंजे में भी फंस जाता. इसलिए सोफिया नाम के इस कांटे को अपनी जिंदगी से निकालने के लिए उस ने एक खतरनाक फैसला ले कर इस की जिम्मेदारी अपने एक दोस्त पप्पू उर्फ इस्माइल शेख को सौंप दी. इस के बाद वह सोफिया से एक बार फिर शादी का वादा कर के 20 नवंबर, 2013 को दुबई चला गया.

28 वर्षीय पप्पू उर्फ इस्माइल शेख शिवाजीनगर में उसी इमारत में रहता था, जिस में समीर शेख का परिवार रहता था. उस की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए उस ने लगभग साल भर पहले व्यवसाय करने के लिए समीर से 35 हजार रुपए उधार लिए थे. समीर से रुपए ले कर उस ने जो व्यवसाय किया था, संयोग से वह चला नहीं. फायदा होने की कौन कहे, उस में उस की जमापूंजी भी डूब गई. जब पैसे ही नहीं रहे तो पप्पू समीर का कर्ज कहां से अदा कर पाता. समीर ने रुपए ब्याज पर दिए थे, जो ब्याज के साथ 50 हजार रुपए हो गए थे. समीर ने अपने रुपए मांगे तो पप्पू ने रुपए लौटाने में मजबूरी जताई और कुछ दिनों की मोहलत मांगी. समीर जानता था कि पप्पू जल्दी रुपए नहीं लौटा सकता, इसलिए उस ने मौका देख कर कहा, ‘‘अगर तुम मेरा एक काम कर दो तो मैं तुम्हारा यह कर्ज माफ कर दूंगा.’’

‘‘ऐसा कौन सा काम है, जिस के लिए तुम इतना कर्ज माफ करने को तैयार हो?’’ पप्पू ने पूछा.

‘‘भाई, इतनी बड़ी रकम माफ करने को तैयार हूं तो काम भी बड़ा ही होगा.’’ समीर ने कहा.

‘‘ठीक है, काम बताओ.’’

‘‘सोफिया शेख की हत्या करनी है.’’ समीर ने कहा तो पप्पू को झटका सा लगा. क्योंकि काम काफी खतरनाक था. लेकिन समीर के 50 हजार रुपए देना भी उस के लिए काफी मुश्किल था, इसलिए मजबूरी में वह यह मुश्किल और खतरनाक काम करने को राजी हो गया. इस के बाद सोफिया की हत्या कैसे और कब करनी है, समीर ने पूरी योजना उसे समझा दी. समीर के दुबई चले जाने के बाद पप्पू उस के द्वारा बनाई योजना को साकार करने की कोशिश में लग गया. यह काम उस के अकेले के वश का नहीं था, इसलिए मदद के लिए उस ने अपने एक परिचित 15 वर्षीय मुन्ना उर्फ परवेज शेख को साथ ले लिया. इस के बाद अपने दोस्त जावेद का मोबाइल फोन ले कर 9 दिसंबर, 2013 को मुन्ना के घर जा पहुंचा. पूरी रात दोनों समीर द्वारा बताई योजना पर विचार करते रहे.

अगले दिन 10 दिसंबर, 2013 की सुबह पप्पू मुन्ना के साथ बाजार गया और वहां से एक तेज धार वाला बड़ा सा चाकू खरीदा. अब उसे यह पता करना था कि सोफिया घर में है या कहीं बाहर. इस के लिए उस ने सोफिया को फोन किया. उस ने फोन रिसीव किया तो पप्पू ने छूटते ही कहा, ‘‘समीरभाई ने मेरा पासपोर्ट और कुछ जरूरी कागजात तुम्हारे घर पर रखे हैं, मैं उन्हें लेने रहा हूं. आप उन्हें ढूंढ़ कर रखें.’’

सोफिया कुछ कहती, उस के पहले ही पप्पू ने फोन काट दिया. इस के बाद पप्पू ने आटो किया और मुन्ना के साथ सोफिया के घर जा पहुंचा. उस ने घंटी बजाई तो सोफिया ने दरवाजा खोल दिया. पप्पू ने अपने पासपोर्ट और कागजातों के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘समीर मेरे पास तो कोई पासपोर्ट रख गया है कोई कागजात. जा कर उसी से पूछो, उस ने कहां रखे हैं.’’

इसी बात को ले कर पप्पू सोफिया से बहस करने लगा तो उस ने नाराज हो कर पप्पू को घर से निकल जाने को कहा. तभी पप्पू ने चाकू निकाल कर उस के सिर पर पूरी ताकत से वार कर दिया. वार इतना तेज था कि सोफिया संभल नहीं पाई और गिर पड़ी. गिरते ही वह बेहोश हो गई. इस के बाद पप्पू और मुन्ना ने सोफिया के सारे गहने उतार कर उसे उसी हालत में गद्दे में लपेट कर आग लगा दी. अपना काम कर के वे बाहर गए और काम हो जाने की सूचना समीर को दे दी.

रिमांड अवधि खत्म होने पर एक बार फिर पप्पू और मुन्ना को महानगर मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थे. हत्या की साजिश रचने वाला समीर शेख दुबई में था. पुलिस उसे वहां से भारत बुलाने की कोशिश कर रही थी.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शराब पिलाया, कार में सुलाया फिर लगा दी आग

रानी को फांसा तो था देशराज ने, लेकिन मजबूरन उसे इस अवैध रिश्ते में रंजीत को भी हिस्सेदार बनाना पड़ा. जाहिर है इस तरह की हिस्सेदारी ज्यादा दिनों तक नहीं चलती. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.   लखनऊ के थाना मडि़यांव के थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को सुबहसुबह किसी ने फोन कर के सूचना दी कि ककौली में बड़ी खदान के पास एक कार में आग लगी है. सूचना मिलते ही रघुवीर सिंह ककौली की तरफ रवाना हो गए. थोड़ी ही देर में वह ककौली की बड़ी खदान के पास पहुंच गए. उन्होंने एक जगह भीड़ देखी तो समझ गए कि घटना वहीं घटी है. जब तक पुलिस वहां पहुंची, कार की आग बुझ चुकी थी. पुलिस ने देखा, कार के अंदर कोई भी सामान सलामत नहीं बचा था

यहां तक कि कार की नंबर प्लेट का नंबर भी नहीं दिखाई दे रहा था. इसी से अंदाजा लगाया गया कि आग कितनी भीषण रही होगी. जली हुई कार के अंदर कुछ हड्डियां और 2 भागों में बंटी इंसान की एक खोपड़ी पड़ी थी. उन्हें देख कर थानाप्रभारी चौंके. हड्डियों और खोपड़ी से साफ लग रहा था कि कार के अंदर कोई इंसान भी जल गया थाथानाप्रभारी ने अपने आला अधिकारियों को भी इस घटना की सूचना दे दी थी. इस के बाद थोड़ी ही देर में क्षेत्राधिकारी (अलीगंज) अखिलेश नारायण सिंह फोरेंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. कार के अंदर जली अवस्था में एक छोटा गैस सिलेंडर और शराब की खाली बोतल भी पड़ी थी. फोरेंसिक टीम ने अपना काम निपटा लिया तो पुलिस ने अपनी जांच शुरू की.

कार की स्थिति देख कर पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि साजिशन इसे अंजाम दिया गया है. कार एक खुले मैदान में थी. आबादी वहां से कुछ दूरी पर थी. इसलिए हत्यारों ने वारदात को आसानी से अंजाम दे दिया था. यह 4 दिसंबर, 2013 की बात हैकार में कोई ऐसी चीज नहीं मिली थी, जिस से जल कर खाक हो चुके व्यक्ति की शिनाख्त हो पाती. इसलिए पुलिस ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटा कर बरामद हड्डियों और खोपड़ी को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया, जहां से हड्डियों को फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया.

अब तक इस घटना की खबर जंगल की आग की तरह आसपास फैल चुकी थी. ककौली के ही रहने वाले सुरजीत यादव का छोटा भाई रंजीत यादव 3 दिसंबर को कार से कटरा पलटन छावनी एरिया में किसी शादी समारोह में शामिल होने के लिए घर से निकला था. उसे उसी रात को लौट आना था. लेकिन वह नहीं लौटा तो घर वालों को उस की चिंता हुई. यही वजह थी कि यह खबर सुनते ही सुरजीत बड़ी खदान की तरफ चल पड़ा. वहां पहुंच कर कार देखते ही वह समझ गया कि यह कार उसी की है. सुरजीत ने थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को अपने भाई के गायब होने की पूरी बात बता कर आशंका जताई कि कार में जल कर जो व्यक्ति मरा है, वह उस का भाई रंजीत हो सकता है. इस के बाद सुरजीत की तहरीर पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ रंजीत की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

सुरजीत से बातचीत के बाद थानाप्रभारी रघुवीर सिंह ने तहकीकात शुरू की तो पता चला कि रंजीत शादी समारोह में जाने के लिए घर से निकला तो था, लेकिन समारोह में पहुंचा नहीं था. अब सोचने वाली बात यह थी कि वह शादी समारोह में नहीं पहुंचा तो गया कहां था. यह जानने के लिए उन्होंने मुखबिर लगा दिए. एक मुखबिर ने बताया कि 3 दिसंबर की शाम रंजीत को देशराज और अजय के साथ देखा गया था. देशराज हरिओमनगर में रह कर सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. रंजीत उसी की सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था

देशराज से पूछताछ के बाद ही सच्चाई का पता चल सकता था, इसलिए पुलिस ने उस की तलाश शुरू कर दी. 5 दिसंबर, 2013 को सुबह 5 बजे के करीब उसे रोशनाबाद चौराहे के पास से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब देशराज से पूछताछ की गई तो उस ने सारा सच उगल दिया. इस के बाद उस ने रंजीत यादव को जिंदा जलाने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर का रहने वाला देशराज लखनऊ के हरिओमनगर में एक सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. वहीं पर उस ने एक मकान किराए पर ले रखा था. वह लखनऊ में अकेला रहता था, जबकि उस की पत्नी और बच्चे सीतापुर में रहते थे. समय मिलने पर वह अपने परिवार से मिलने सीतापुर जाता रहता था.

उस की एजेंसी अच्छी चल रही थी. जिस से उसे हर महीने अच्छी आमदनी होती थी. कहते हैं, जब किसी के पास उस की सोच से ज्यादा पैसा आना शुरू हो जाता है तो कुछ लोगों में नएनए शौक पनप उठते हैं. देशराज के साथ भी यही हुआ. वह शराब और शबाब का शौकीन हो गया था. वह पास के ही ककौली गांव भी आताजाता रहता था. वहीं पर एक दिन उस की नजर रानी नाम की एक औरत पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा. रानी की अजीब ही कहानी थी. उस का विवाह उस उम्र में हुआ था, जब वह विवाह का मतलब ही नहीं जानती थी. नाबालिग अवस्था में ही वह 2 बेटों अजय, संजय और एक बेटी सीमा की मां बन गई थी. उसी बीच किसी वजह से उस के पति की मौत हो गई. पति का साया हटने से उस के ऊपर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. जब कमाने वाला ही रहा तो उस के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया. मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे वह दो जून की रोटी का इंतजाम करने लगी

देशराज ने उस की भोली सूरत देखी तो उसे लगा कि वह उसे जल्द ही पटा लेगा. रानी से नजदीकी बढ़ाने के लिए वह उस से हमदर्दी दिखाने लगा. रानी देशराज के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी. बस इतना ही जानती थी कि वह पैसे वाला है. एक पड़ोसन से रानी ने देशराज के बारे में काफी कुछ जान लिया था. इस के बाद धीरेधीरे उस का झुकाव भी उस की तरफ होता गयाएक दिन देशराज रानी के घर के सामने से जा रहा था तो वह घर की चौखट पर ही बैठी थी. उस समय दूरदूर तक कोई नजर नहीं रहा था. मौका अच्छा देख कर देशराज बोल पड़ा, ‘‘रानी, मुझे तुम्हारे बारे में सब पता है. तुम्हारी कहानी सुन कर ऐसा लगता है कि तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ दुख ही दुख है.’’

‘‘आप के बारे में मैं ने जो कुछ सुन रखा था, आप उस से भी कहीं ज्यादा अच्छे हैं, जो दूसरों के दुख को बांटने की हिम्मत रखते हैं. वरना इस जालिम दुनिया में कोई किसी के बारे में कहां सोचता है?’’

‘‘रानी, दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है. खैर, तुम चिंता मत करो. आज से मैं तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. चाहो तो बदले में तुम मेरे घर का कुछ काम कर दिया करना.’’

‘‘ठीक है, आप ने मेरे बारे में इतना सोचा है तो मैं भी आप के बारे में सोचूंगी. मैं आप के घर के काम कर दिया करूंगी.’’

इतना कह कर देशराज ने रानी के कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रखा तो रानी ने अपनी गरदन टेढ़ी कर के उस के हाथ पर अपना गाल रख कर आशा भरी नजरों से उस की तरफ देखा. देशराज ने मौके का पूरा फायदा उठाया और रानी के हाथ पर 500 रुपए रखते हुए कहा, ‘‘ये रख लो, तुम्हें इस की जरूरत है. मेरी तरफ से इसे एडवांस समझ लेना.’’

रानी तो वैसे भी अभावों में जिंदगी गुजार रही थी, इसलिए उस ने देशराज द्वारा दिए गए पैसे अपने हाथ में दबा लिए. इस से देशराज की हिम्मत और बढ़ गई. वह हर रोज रानी से मिलने उस के घर पहुंचने लगा. वह जब भी उस के यहां जाता, रानी के बच्चों के लिए खानेपीने की कोई चीज जरूर ले जाता. कभीकभी वह रानी को पैसे भी देता. इस तरह वह रानी का खैरख्वाह बन गया. रानी हालात के थपेड़ों में डोलती ऐसी नाव थी, जिस का कोई मांझी नहीं था. इसलिए देशराज के एहसान वह अपने ऊपर लादती चली गई. पैसे की वजह से उस की बेटी सीमा भी स्कूल नहीं जा रही थी. देशराज ने उस का दाखिला ही नहीं कराया, बल्कि उस की पढ़ाई का सारा खर्च उठाने का वादा किया.

स्वार्थ की दीवार पर एहसान की ईंट पर ईंट चढ़ती जा रही थी. अब रानी भी देशराज का पूरा खयाल रखने लगी थी. वह उसे खाना खाए बिना जाने नहीं देती थी. लेकिन देशराज के मन में तो रानी की देह की चाहत थी, जिसे वह हर हाल में पाना चाहता था. एक दिन उस ने कहा, ‘‘रानी, अब तुम खुद को अकेली मत समझना. मैं हर तरह से तुम्हारा बना रहूंगा.’’ 

यह सुन कर रानी उस की तरफ चाहत भरी नजरों से देखने लगी. देशराज समझ गया कि वह शीशे में उतर चुकी है, इसलिए उस के करीब गया और उस के हाथ को दोनों हथेलियों के बीच दबा कर बोला, ‘‘सच कह रहा हूं रानी, तुम्हारी हर जरूरत पूरी करना अब मेरी जिम्मेदारी है.’’

हाथ थामने से रानी के शरीर में भी हलचल पैदा हो गई. देशराज के हाथों की हरकत बढ़ने लगी थी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों बेकाबू हो गए और अपनी हसरतें पूरी कर के ही माने. देशराज ने वर्षों बाद रानी की सोई भावनाओं को जगाया तो उस ने देह के सुख की खातिर सारी नैतिकताओं को अंगूठा दिखा दिया. अब वह देशराज की बन कर रहने का ख्वाब देखने लगी. देशराज और रानी के अवैध संबंध बने तो फिर बारबार दोहराए जाने लगे. रानी को देशराज के पैसों का लालच तो था ही, अब वह उस से खुल कर पैसों की मांग करने लगी

देशराज चूंकि उस के जिस्म का लुत्फ उठा रहा था, इसलिए उसे पैसे देने में कोई गुरेज नहीं करता था. इस तरह एक तरफ रानी की दैहिक जरूरतें पूरी होने लगी थीं तो दूसरी तरफ देशराज उस की आर्थिक जरूरतें पूरी करने लगा था. वर्षों बाद अब रानी की जिंदगी में फिर से रंग भरने लगे थे. ककौली गांव में ही भल्लू का परिवार रहता था. पेशे से किसान भल्लू के 2 बेटे रंजीत, सुरजीत और 2 बेटियां कमला, विमला थीं. चारों में से अभी किसी की भी शादी नहीं हुई थी. 24 वर्षीय रंजीत और 22 वर्षीय सुरजीत, दोनों ही भाई देशराज की सिक्योरिटी एजेंसी में काम करते थे. रंजीत और देशराज की उम्र में काफी लंबा फासला था. देशराज की जवानी साथ छोड़ रही थी, जबकि रंजीत की जवानी पूरे चरम पर थी. वैसे भी वह कुंवारा था. देशराज और रंजीत के बीच बहुत अच्छी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ खातेपीते थे.

एक दिन शराब के नशे में देशराज ने रंजीत को अपने और रानी के संबंधों के बारे में बता दिया. यह सुन कर रंजीत चौंका. यह उस के लिए चिराग तले अंधेरे वाली बात थी. उसी के गांव की रानी अपने शबाब का दरिया बहा रही थी और उसे खबर तक नहीं थी. वह किसी औरत के सान्निध्य के लिए तरस रहा था. रानी की हकीकत पता चलने के बाद जैसे उसे अपनी मुराद पूरी होती नजर आने लगी. रंजीत के दिमाग में तरहतरह के विचार आने लगे. वह मन ही मन सोचने लगा कि जब देशराज रानी के साथ रातें रंगीन कर सकता है, तो वह क्यों नहीं? वह देशराज की ब्याहता तो है नहीं. अगले दिन रंजीत देशराज से मिला तो बोला, ‘‘रानी की देह में मुझे भी हिस्सा चाहिए, नहीं तो मैं तुम दोनों के संबंधों की बात पूरे गांव में फैला दूंगा.’’

देशराज को रानी से कोई दिली लगाव तो था नहीं, वह तो उस की वासना की पूर्ति का साधन मात्र थी. उसे दोस्त के साथ बांटने में उसे कोई परेशानी नहीं थी. वैसे भी रंजीत का मुंह बंद करना जरूरी था. इसलिए उस ने रानी को रंजीत की शर्त बताते हुए समझाया, ‘‘देखो रानी, अगर हम ने उस की बात नहीं मानी तो वह हमारी पोल खोल देगा. पूरे गांव में हमारी बदनामी हो जाएगी. इसलिए तुम्हें उसे खुश करना ही पड़ेगा.’’

रानी के लिए जैसा देशराज था, वैसा ही रंजीत भी था. उस ने हां कर दी. इस बातचीत के बाद देशराज ने यह बात रंजीत को बता दी. फलस्वरूप वह उसी दिन शाम को रानी के घर पहुंच गया. एक ही गांव का होने की वजह से दोनों केवल एकदूसरे को जानते थे, बल्कि उन में बातें भी होती थीं. रंजीत उसे भाभी कह कर बुलाता था. सारी बातें चूंकि पहले ही तय थीं, सो दोनों के बीच अब तक बनी संकोच की दीवार गिरते देर नहीं लगी. दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने तो रानी को एक अलग ही तरह की सुखद अनूभूति हुई. रंजीत के कुंवारे बदन का जोश देशराज पर भारी पड़ने लगा. उस दिन के बाद तो वह अधिकतर रंजीत की बांहों में कैद होने लगी. रंजीत भी रानी की देह का दीवाना हो चुका था.

इसलिए वह भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करने लगा. रंजीत ने मारुति आल्टो कार ले रखी थी, जो उस के भाई सुरजीत के नाम पर थी. रंजीत रानी को अपनी कार में बैठा कर घुमाने ले जाने लगा. वह उसे रेस्टोरेंट वगैरह में ले जा कर खिलातापिलाता और गिफ्ट भी देता.

रानी की जिंदगी में रंजीत आया तो वह देशराज को भी और उस के एहसानों को भूलने लगी. रंजीत उस के दिलोदिमाग पर ऐसा छाया कि उस ने देशराज से मिलनाजुलना तक छोड़ दिया. इस से देशराज को समझते देर नहीं लगी कि रानी रंजीत की वजह से उस से दूरी बना रही है. उसे यह बात अखरने लगी. रानी को फंसाने में सारी मेहनत उस ने की थी, जबकि रंजीत बिना किसी मेहनत के फल खा रहा था. इसी बात को ले कर रंजीत और देशराज में मनमुटाव रहने लगा. देशराज ने रंजीत से उस की कुछ जमीन खरीदी थी, जिस का करीब 5 लाख रुपया बाकी था. रंजीत जबतब देशराज से अपने पैसे मांगता रहता था. इस बात को ले कर रंजीत कई बार उसे जलील तक कर चुका था.

एक तरफ रंजीत ने देशराज की मौजमस्ती का साधन छीन लिया था तो दूसरी ओर उसे 5 लाख रुपए भी देने थे. इसलिए सोचविचार कर उस ने रंजीत को अपने रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने अपने यहां सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहे अजय पांडेय को भी लालच दे कर अपनी योजना में शामिल कर लिया. अजय सीतापुर के कमलापुर थानाक्षेत्र के गांव रूदा का रहने वाला था. 3 दिसंबर की शाम को रंजीत को कटरा पलटन छावनी में एक वैवाहिक समारोह में जाना था. यह बात देशराज को पता थी. उस ने उसी दिन अपनी योजना को अंजाम देने के बारे में सोचा. उस दिन देर शाम रंजीत घर से तैयार हो कर कार से कटरा पलटन जाने के लिए निकला. रास्ते में एक जगह उसे देशराज और अजय पांडेय मिल गए. वहां से वे हाइवे पर ट्रामा सेंटर के पास गए और शराब खरीद कर बड़ी खदान के पास गए.

तीनों ने कार के अंदर बैठ कर शराब पी. देशराज और अजय ने खुद कम शराब पी, जबकि रंजीत को ज्यादा पिलाई. जब रंजीत नशे में धुत हो गया तो दोनों ने उसे पिछली सीट पर लिटा दिया. कार में एक छोटा गैस सिलेंडर भरा रखा था, जिसे रंजीत घर से गैस भराने के लिए लाया था. साथ ही कार में एक बोतल पेट्रोल भी रखा था. देशराज ने कार के सभी शीशे चढ़ा कर गैस सिलेंडर की नौब खोल दी, जिस से तेजी से गैस रिसने लगीदेशराज पेट्रोल की बोतल उठा कर कार से बाहर गया और कार के सभी दरवाजे बंद कर दिए. इस के बाद उस ने कार के ऊपर सारा पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. चूंकि कार के अंदर गैस भरी थी, इसलिए आग की लपटें तेजी से बाहर निकलीं. देशराज का चेहरा और हाथ जल गए. गैस और पेट्रोल की वजह से कार धूधू कर के जलने लगी. नशे में धुत अंदर लेटे रंजीत ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन वह नाकामयाब रहा. अपना काम कर के देशराज और अजय वहां से भाग खडे़ हुए.

देशराज मौके से तो भाग गया, लेकिन कानून से नहीं बच सका. इंसपेक्टर रघुवीर सिंह ने रानी से भी पूछताछ की. हत्या के इस मामले में उस की कोई भूमिका नहीं थी. अलबत्ता जब गांव वालों को यह पता चला कि हत्या की वजह रानी थी तो लोगों ने उस के साथ भी मारपीट की.

पुलिस ने देशराज को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. कथा संकलन तक पुलिस अजय पांडेय को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

  

भाभी ने चचेरे देवर के साथ मिलकर की पति की हत्या

जब कोई पूरी योजना बना कर किसी की हत्या करता है, उस की सोच यह होती है कि वह पकड़ा नहीं जाएगा. लेकिन कानून के शिकंजे से बचना आसान नहीं होता. सरिता और बलराम ने भी…   

त्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले में मीरजापुरइलाहाबाद मार्ग से सटा एक गांव हैमहड़ौरा. विंध्यक्षेत्र की पहाड़ी से लगा यह गांव हरियाली के साथसाथ बहुत शांतिप्रिय गांवों में गिना जाता है. इसी गांव के रहने वाले बंसीलाल सरोज ने रेलवे की नौकरी से रिटायर होने के बाद बड़ा सा पक्का मकान बनवाया, जिस में वह अपने पूरे परिवार के साथ रहते थेउन के भरेपूरे परिवार में पत्नी, 2 बेटे, एक बेटी और बहू थी. गांव में बंसीलाल सरोज के पास खेती की जमीन थी, जिस पर उन का बड़ा बेटा रणजीत कुमार सरोज उर्फ बुलबुल सब्जी की खेती करता था. खेती के साथसाथ रणजीत अपने मामा के साथ मिल कर होटल भी चलाता था

जबकि छोटा राकेश सरोज कानपुर में बिजली विभाग में नौकरी करता था. वह कानपुर में ही रहता था. महड़ौरा में 9-10 कमरों का अपना शानदार मकान होने के साथसाथ बंसीलाल के पास गांव से कुछ दूर सरोह भटेवरा में दूसरा मकान भी थारात में वह उसी मकान में सोया करते थे. बंसीलाल के परिवार की गाड़ी जिंदगी रूपी पटरी पर हंसीखुशी से चल रही थी. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. दोनों बेटे अपनेअपने पैरों पर खड़े हो चुके थे, जबकि वह खुद इतनी पेंशन पाते थे कि अकेले अपने दम पर पूरे परिवार का खर्च उठा सकते थे.

बड़ा बेटा रणजीत कुमार सुबह होने पर खेतों पर चला जाता था, फिर दोपहर में उसे वहां से होटल पर जाना होता था. जहां से वह रात में वापस लौटता था और खापी कर सो जाता था. यह उस की रोज की दिनचर्या थी. रणजीत की 3 बेटियां थीं. 10 साल की माया, 7 साल की क्षमा और 3 साल की स्वाति. वह अपनी बेटियों को दिलोजान से चाहता था और उन्हें बेटों की तरह प्यार करता थाउस की बेटियां भी अपनी मां से ज्यादा पिता को चाहती थीं. व्यवहारकुशल, मृदुभाषी रणजीत गांव में सभी को अच्छा लगता था. वह जिस से भी मिलता, हंस कर ही बोलता था. खेतीकिसानी और होटल के काम से उसे फुर्सत ही नहीं मिलती थी. उसे थोड़ाबहुत जो समय मिलता था, उसे वह अपने बीवीबच्चों के साथ गुजारता था.

सोमवार 19 मार्च, 2018 का दिन था. रात होने पर रणजीत कुमार रोज की तरह होटल से घर आया तो उस की पत्नी सरिता उसे खाने का टिफिन पकड़ाते हुए बोली, ‘‘लो जी, दूसरे मकान पर बाबूजी को खाना दे आओ. आज काफी देर हो गई है, बाबूजी इंतजार कर रहे होंगे. आप खाना दे कर आओ तब तक मैं आप के लिए खाने की थाली लगा देती हूं.’’

पत्नी के हाथ से खाने का टिफिन ले कर रणजीत दूसरे मकान पर चला गया, जहां उस के पिता बंसीलाल रात में सोने जाया करते थे. उन का रात का खाना अकसर उसी मकान पर जाता था. रणजीत उन्हें खाना दे कर जल्दी ही लौट आया और घर कर खाना खाने बैठ गया. खाना खाने के बाद वह अपने कमरे में सोने चला गया. रणजीत की मां, पत्नी सरिता, बहन सोनी और रणजीत की तीनों बेटियां बरांडे में सो गईं. रणजीत बना निशाना रणजीत सोते समय अपने कमरे का दरवाजा खुला रखता था. उस दिन भी वह अपने कमरे का दरवाजा खुला छोड़ कर सोया था. देर रात पीछे से चारदीवारी फांद कर किसी ने रणजीत के कमरे में प्रवेश किया और पेट पर धारदार हथियार से वार कर के उसे मौत की नींद सुला दिया

उस पर इतने वार किए गए थे कि उस की आंतें तक बाहर गई थीं. रणजीत की मौके पर ही मौत हो गई थी. आननफानन में घर वाले उसे अस्पताल ले कर भागे, लेकिन वहां डाक्टरों ने रणजीत को देखते ही मृत घोषित कर दियाभोर में जैसे ही इस घटना की सूचना पुलिस को मिली वैसे ही विंध्याचल कोतवाली प्रभारी अशोक कुमार सिंह पुलिस टीम के साथ गांव पहुंच गए. वहां गांव वालों का हुजूम लगा हुआ था. अशोक कुमार सिंह ने इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को भी दे दी. इस के बाद उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. घर के उस कमरे में जहां रणजीत सोया हुआ था, काफी मात्रा में खून पड़ा हुआ था. मौकाएवारदात को देखने से यह साफ हो गई कि जिस बेदर्दी के साथ रणजीत की हत्या की गई थी, संभवत: वारदात में कई लोग शामिल रहे होंगे

यह भी लग रहा था कि या तो हत्यारों की रणजीत से कोई अदावत रही होगी या किसी बात को ले कर वह उस से खार खाए होंगे. इसी वजह से उसे बड़ी बेरहमी से किसी धारदार हथियार से गोदा गया था. खून के छींटे कमरे के साथसाथ बाहर सीढि़यों तक फैले थे. इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह ने आसपास नजरें दौड़ा कर जायजा लिया तो देखा, जिस कमरे में वारदात को अंजाम  दिया गया था, वह कमरा घर के पीछे था. संभवत हत्यारे पीछे की दीवार फांद कर अंदर आए होंगे और हत्या कर के उसी तरह भाग गए होंगे. इसी के साथ उन्हें एक बात यह भी खटक रही थी कि हो हो इस वारदात में किसी करीबी का हाथ रहा हो. घटनास्थल की वस्तुस्थिति और हालात इसी ओर इशारा कर रहे थे. ताज्जुब की बात यह थी कि इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी घर के किसी मेंबर को कानोंकान खबर नहीं हुई थी.

बहरहाल, अशोक कुमार सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर मृतक रणजीत के बारे में जानकारी एकत्र की और थाने लौट आए. उन्होंने रणजीत के पिता बंसीलाल सरोज की लिखित तहरीर के आधार पर अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत केस दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. रणजीत की हत्या होने की खबर आसपास के गांवों तक पहुंची तो तमाम लोग महड़ौरा में एकत्र हो गए. हत्या को ले कर लोगों में आक्रोश था. आक्रोश के साथसाथ भीड़ भी बढ़ती गई. महिलाएं और बच्चे भी भीड़ में शामिल थेआक्रोशित भीड़ ने गांव के बाहर मेन रोड पर पहुंच कर इलाहाबाद मीरजापुर मार्ग जाम कर दिया. दोनों तरफ का आवागमन बुरी तरह ठप्प हो गया. गुस्से के मारे लोग पुलिस के विरोध में नारे लगाने के साथ मृतक के हत्यारों को गिरफ्तार करने और उस की बीवी को मुआवजा दिलाने की मांग कर रहे थे.

धरना बना जी का जंजाल इस की जानकारी मिलने पर विंध्याचल कोतवाली की पुलिस वहां पहुंच गई, जहां भीड़ जाम लगाए हुए थी. जाम के चलते इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह ने धरने पर बैठे गांव वालों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे किसी भी सूरत में पीछे हटने को तैयार नहीं थे. अपना प्रयास विफल होता देख उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को वहां की स्थिति बता कर पुलिस फोर्स भेजने को कहा, ताकि कोई अप्रिय घटना घट सके. वायरलैस पर सड़क जाम की सूचना प्रसारित होते ही पड़ोसी थानों जिगना, गैपुरा और अष्टभुजा पुलिस चौकी के अलावा जिला मुख्यालय से पहुंची पुलिस और पीएसी ने मौके पर पहुंच कर मोर्चा संभाल लिया. कुछ ही देर में पुलिस अधीक्षक आशीष तिवारी सहित अन्य पुलिस और प्रशासन के अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए

अधिकारियों ने ग्रामीणों को विश्वास दिलाया कि रणजीत के हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा. काफी समझाने के बाद ग्रामीण मान गए और उन्होंने धरना समाप्त कर दिया. इस के साथ ही धीरेधीरे जाम भी खत्म हो गया. जाम समाप्त होने के बाद विंध्याचल कोतवाली पहुंचे पुलिस अधीक्षक आशीष तिवारी ने रणजीत के हत्यारों को हर हाल में जल्दी से जल्दी गिरफ्तार कर के इस केस को खोलने का सख्त निर्देश दिया. पुलिस अधीक्षक के सख्त तेवरों को देख कोतवाली प्रभारी अशोक कुमार और उन के मातहत अफसर जीजान से जांच में जुट गएअशोक कुमार सिंह ने इस केस की नए सिरे से छानबीन करते हुए मृतक रणजीत के पिता बंसीलाल से पूछताछ करनी जरूरी समझी. इस के लिए वह महड़ौरा स्थित बंसीलाल के घर पहुंचे, जहां उन्होंने बंसीलाल से एकांत में बात की

इस बातचीत में उन्होंने रणजीत से जुड़ी छोटी से छोटी जानकारी जुटाई. बंसीलाल से हुई बातों में एक बात चौंकाने वाली थी जो रणजीत की पत्नी सरिता से संबंधित थी. पता चला उस का चालचलन ठीक नहीं था. इस संबंध में रणजीत के पिता बंसीलाल ने इशारोंइशारों में काफी कुछ कह दिया था. पिता से मिला क्लू बना जांच का आधार इस जानकारी से इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह की आंखों में चमक गई. उन्होंने पूछताछ के लिए मृतक रणजीत की पत्नी सरिता और उस के चचेरे भाई बलराम सरोज को थाने बुलाया. लेकिन इन दोनों ने कुछ खास नहीं बताया. दोनों बारबार खुद को बेगुनाह बताते रहे

बलराम रणजीत का भाई होने का तो सरिता पति होने का वास्ता देती रही. दोनों के घडि़याली आंसुओं को देख कर इंसपेक्टर अशोक कुमार ने उस दिन उन्हें छोड़ दिया, लेकिन उन पर नजर रखने लगे. इसी बीच उन के एक खास मुखबिर ने सूचना दी कि सरिता और बलराम भागने के चक्कर में हैं. मुखबिर की बात सुन कर अशोक कुमार सिंह ने बिना समय गंवाए 29 मार्च को महड़ौरा से सरिता को थाने बुलवा लिया. साथ ही उस के चचेरे देवर बलराम को भी उठवा लिया. थाने लाने के बाद दोनों से अलगअलग पूछताछ की गईपूछताछ के लिए पहला नंबर सरिता का आया. वह पुलिस को घुमाने का प्रयास करते हुए अपने सुहाग का वास्ता दे कर बोली, ‘‘साहब, आप कैसी बातें कर रहे हैं, भला कोई अपने ही हाथों से अपने सुहाग को उजाड़ेगा? साहब, जरूर किसी ने आप को बहकाया है. आखिरकार मुझे कमी क्या थी, जो मैं ऐसा करती?’’

उस की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह बोले, ‘‘देखो सरिता, तुम ज्यादा सती सावित्री बनने की कोशिश मत करो, तुम्हारी भलाई इसी में है कि सब कुछ सचसच बता दो वरना मुझे दूसरा रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा.’’ लेकिन सरिता पर उन की बातों का जरा भी असर नहीं पड़ा. वह अपनी ही रट लगाए हुई थी. अशोक कुमार सिंह सरिता के बाद उस के चचेरे देवर बलराम से मुखातिब हुए, ‘‘हां तो बलराम, तुम कुछ बोलोगे या तुम से भी बुलवाना पड़ेगा.’’

‘‘मममतलब. मैं कुछ समझा नहीं साहब.’’

‘‘नहीं समझे तो समझ आओ. मुझे यह बताओ कि तुम ने रणजीत को क्यों मारा?’’

‘‘साहब, आप यह क्या कह रहे हैं, रणजीत मेरा भाई था, भला कोई अपने भाई की हत्या क्यों करेगा? मेरी उस से खूब पटती थी. उस के मरने का सब से ज्यादा गम मुझे ही है. और आप मुझे ही दोषी ठहराने पर तुले हैं.’’

उस की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक इंसपेक्टर अशोक कुमार का झन्नाटेदार थप्पड़ उस के गाल पर पड़ा. वह अपना चेहरा छिपा कर बैठ गया. अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि इंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह बोले, ‘‘बलराम, भाई प्रेम को ले कर तुम्हारी जो सक्रियता थी, वह मैं देख रहा था. तुम्हारा प्रेम किस से और कितना था, यह सब भी मुझे पता चल चुका है. तुम ने रणजीत को क्यों और किस के लिए मारा, वह भी तुम्हारे सामने है.’’ 

 उन्होंने सरिता की ओर इशारा करते हुए कहा तो बलराम की नजरें झुक गईं. उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उस की बनाई कहानी का अंत इतनी आसानी से हो जाएगा और पुलिस उस से सच उगलवा लेगीतीर निशाने पर लगता देख इंसपेक्टर अशोक कुमार सिह ने बिना देर किए तपाक से कहा, ‘‘अब तुम्हारी भलाई इसी में है, दोनों साफसाफ बता दो कि रणजीत की हत्या क्यों और किसलिए की, वरना मुझे दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’

खुल गया रणजीत की हत्या का राज सरिता और बलराम ने खुद को चारों ओर से घिरा देख कर सच्चाई उगलने में ही भलाई समझी. पुलिस ने दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर के पूछताछ की तो रणजीत के कत्ल की कहानी परत दर परत खुलती गई. बलराम ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि जाने कैसे रणजीत को उस के और सरिता के प्रेम संबंधों की जानकारी मिल गई थीफलस्वरूप वह उन दोनों के संबंधों में बाधक बनने लगा. यहां तक कि उस ने बलराम को अपनी पत्नी से मिलने के लिए मना कर दिया था. इसी के मद्देनजर सरिता और बलराम ने योजनाबद्ध तरीके से रणजीत की हत्या की योजना बनाई. योजना के मुताबिक बलराम ने घर में घुस कर बरामदे में सोए रणजीत की चाकू घोंप कर हत्या कर दी

बलराम की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू घर से 2 सौ मीटर दूर गेहूं के खेत से बरामद कर लिया. सरिता और बलराम ने स्वीकार किया कि जिस चाकू से रणजीत की हत्या की गई थी, उसे बलराम ने हत्या से एक दिन पहले ही गांव के एक लोहार से बनवाया था. पुलिस ने उस लोहार से भी पूछताछ की. उस ने इस की पुष्टि की. पुलिस लाइन में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान पुलिस अधीक्षक आशीष तिवारी ने खुलासा करते हुए बताया कि रणजीत सरोज की पत्नी के अवैध संबंध उस के चचेरे भाई बलराम से पिछले 5 वर्षों से थे. रणजीत ने दोनों को एक बार रंगेहाथों पकड़ा था. उस वक्त घर वालों ने गांव में परिवार की बदनामी की वजह से इस मामले को घर में ही दबा दिया था. साथ ही दोनों को डांटाफटकारा भी था.

रणजीत ने बलराम को घर में आने से मना भी कर दिया था. इस से सरिता अंदर ही अंदर जलने लगी थी. उसे चचेरे देवर से मिलने की कोई राह नहीं सूझी तो उस ने बलराम के साथ मिल कर पति की हत्या की योजना तैयार की ताकि पिछले 5 सालों से चल रहे प्रेम संबंध चलते रहेंपकड़े जाने पर दोनों ने पुलिस और मीडिया के सामने अपना जुर्म कबूल करते हुए अवैध संबंधों में हत्या की बात मानी. दोनों ने पूरी घटना के बारे में विस्तार से बताया. रणजीत हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के बाद पुलिस ने पूर्व  में दर्ज मुकदमे में अज्ञात की जगह सरिता और बलराम का नाम शामिल कर के दोनों को जेल भेज दिया.