Crime News: हुस्न का जाल

Crime News: राजनीति में आने के लिए विनय त्यागी को पैसों की जरूरत महसूस हुई तो उस ने किसी मोटे आसामी का अपहरण करने की योजना बनाई. शिकार को आसानी से फांसा जा सके, इस के लिए उस ने चारा के रूप में ममता को इस्तेमाल किया. उस ने मनोज गुप्ता का अपहरण तो कर लिया, लेकिन फिरौती वसूल पाता, उस के पहले ही खेल बिगड़ गया और…

दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित एक रेस्तरां की टेबल पर एकदूसरे के सामने बैठे मनोज गुप्ता और ममता मसीह के चेहरों पर खुशी की एक अनोखी चमक थी. वहां के खुशनुमा माहौल में वेटर को और्डर कर के उन्होंने खानेपीने की चीजें मंगा ली थीं. खानेपीने के साथ उन की बातें भी हो रही थीं.  दोनों की यह पहली मुलाकात थी, लेकिन ऐसा लग रहा था, जैसे वे एकदूसरे को बरसों से जानते हों. दिलोदिमाग संतुष्ट हुए तो मनोज ने ममता की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘ममता, तुम से मिल कर बहुत अच्छा लगा.’’

‘‘मुझे भी बहुत अच्छा लगा. बस आप से एक उम्मीद करती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘मुलाकातों और बातों का यह सिलसिला खत्म नहीं होना चाहिए. वैसे भी वे लोग खुशनसीब होते हैं, जिन्हें विश्वास करने वाले लोग मिलते हैं.’’

ममता की आंखों में चाहत का सागर नजर आ रहा था. उस की बातें सुन कर खुश हुए मनोज ने कहा, ‘‘तुम जैसी खूबसूरत लड़की से मिलने के बाद कौन कमबख्त इस सिलसिले को तोड़ना चाहेगा. यह कितना अच्छा है कि मुझे एक ऐसी लड़की मिली, जिस पर मैं भरोसा कर सकता हूं, वरना आज के जमाने में किसी पर भरोसा करना ठीक नहीं.’’

ममता ने मुसकरा कर जवाब दिया, ‘‘फिक्र न कीजिए, मैं कभी तुम्हारे इस विश्वास को टूटने नहीं दूंगी. मेरे लिए तुम्हारी खास अहमियत है. मैं तुम्हारे साथ हंसीखुशी से जीना चाहती हूं, क्योंकि मेरी जिंदगी में तो अब तक खुशियां रूठी हुई थीं.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘जाने भी दीजिए.’’ ममता ने टालना चाहा तो मनोज ने लगभग जिद वाले अंदाज में पूछा, ‘‘तुम ने बात शुरू की है तो अब बताना ही होगा.’’

इस के बाद ममता ने जो बताया, वह यकीनन दुखभरी दास्तान थी. उस के पिता एक बड़े कारोबारी थे. 4 साल पहले कारोबार में घाटा होने से परिवार पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि सदमे से पिता की मौत हो गई. घर में वही बड़ी थी. लिहाजा मां और छोटे भाई की जिम्मेदारी उस पर आ गई. वह एयर होस्टेस बनना चाहती थी, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब हो जाने से उसे पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करनी पड़ी.

यह सब बतातेबताते ममता की आंखों में आंसू झिलमिला आए. नैपकीन से आंसुओं का वजूद मिटा कर उस ने आगे कहा, ‘‘मेरी तरफ कई लोगों ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, लेकिन मुझे कभी कोई अच्छा नहीं लगा. तुम से बात हुई तो दिल ने कहा कि तुम बहुत अच्छे इंसान हो, इसलिए तुम से दोस्ती कर ली.’’

ममता की इन बातों ने मनोज के दिल में उस के लिए खास जगह बना ली. उसे लगा कि ममता पर भरोसा कर के उस ने कोई गलती नहीं की है. यह अच्छी लड़की है. इस मुलाकात में दोनों ने अपनेअपने जज्बातों को जाहिर किया. दोनों ही इस मुलाकात से कुछ इस तरह खुश थे, जैसे वे अपनेअपने मकसद में कामयाबी की सीढि़यां चढ़ रहे हों. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि चंद दिनों की बातचीत में उन के दिल इस तरह मिल जाएंगे.

जिंदगी मकसदों के लिए भटकती रहती है, लेकिन भरोसा किस पर किया जाए, इस की परख बहुत जरूरी होती है. भरोसा किसी इंसान की बातों, उस के चेहरे के हावभाव पढ़ कर किया जाता है. मनोज की नजरों की कसौटी पर ममता बिलकुल खरी उतर रही थी. मनोज गुप्ता उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर की कोतवाली के मोहल्ला स्वामीपाड़ा का रहने वाला था. उस का मेरठ और देहरादून में प्रौपर्टी का कारोबार था. कड़ी मेहनत से उस ने यह मुकाम हासिल किया था. शादीशुदा मनोज गुप्ता का हंसताखेलता परिवार था.

जनवरी, 2016 के दूसरे सप्ताह में उस के मोबाइल पर एक अंजान नंबर से मिस्डकाल आई तो जिज्ञासावश उस ने कालबैक की. दूसरी ओर से किसी लड़की ने मासूमियत से कहा, ‘‘सौरी सर, आप का नंबर गलती से लग गया था.’’

‘‘इट्स ओके.’’ कह कर मनोज ने बात खत्म कर दी. कुछ देर बाद उसी नंबर से मनोज के वाट्सऐप पर सौरी का मैसेज आया. नंबर देख कर मनोज समझ गया कि यह मैसेज उसी लड़की का है. उस ने प्रोफाइल देखी तो उस पर खूबसूरत लड़की का आकर्षक फोटो लगा था. उस ने जवाब दिया तो दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई. वह लड़की कोई और नहीं, यही ममता थी.

27 वर्षीया ममता मूलरूप से मध्य प्रदेश के उज्जैन की रहने वाली थी. वर्तमान में वह दिल्ली के रंगपुरी महिपालपुर के मकान नंबर-418 में रहती थी और गुड़गांव के एक स्पा सैंटर में नौकरी करती थी. चैटिंग के बाद मनोज और ममता के बीच मोबाइल पर बातें भी होने लगी थीं. परिणामस्वरूप दोनों बहुत जल्दी अच्छे दोस्त बन गए. मनोज खुश था कि एक युवा लड़की उस की ओर आकर्षित है. इस रिश्ते को उस ने गहरा करने का मन बना लिया. उस ने मिलने की इच्छा जाहिर की तो ममता ने हामी भर दी. इस के बाद एक दिन मनोज उस से मिलने दिल्ली पहुंच गया.

इसी पहली मुलाकात में दोनों के रिश्ते गहरा गए. उन का यह खुफिया रिश्ता था. दुनिया में ऐसे बहुत रिश्ते होते हैं, जिन के अपने मकसद होते हैं और वह मकसद वक्त पर अपना असली रूप दिखा देता है. मनोज और ममता के रिश्ते में भी कुछ ऐसा ही मोड़ आने वाला था. मनोज को पूरा विश्वास था कि ममता उस के भरोसे का आईना कभी चटकने नहीं देगी. रिश्ते की गहराई ने मिलने की तमन्नाओं में इजाफा किया तो उन्होंने उत्तराखंड घूमने जाने का प्रोग्राम बनाया. मनोज अकसर देहरादून जाता रहता था. वहां से करीब 20 किलोमीटर दूर थाना प्रेमनगर के गांव डूंगा के छोर पर पार्टनरशिप में उस का दोमंजिला फार्महाउस था. वह जब भी देहरादून जाता था, अकसर वहीं रुकता था.

18 फरवरी की दोपहर तयशुदा प्रोग्राम के तहत ममता उसे मेरठ में दिल्लीदेहरादून बाईपास पर मिली. मनोज उसे अपनी इनोवा कार नंबर एचआर6ए डी-3251 से ले कर पहले मसूरी घुमाने ले गया, उस के बाद करीब साढ़े 8 बजे फार्महाउस पर पहुंचा. मनोज के साथ उस का ड्राइवर सन्नी भी था. फार्महाउस जाने से पहले उस ने ड्राइवर को देहरादून में ही छोड़ दिया था, जहां से वह अपनी रिश्तेदारी में चला गया था. मनोज और ममता फार्महाउस पर पहुंचे तो वहां केयरटेकर उमेश मौजूद था. इस बीच मनोज की अपने पार्टनर मुकेश से भी फोन पर बात हुई थी. मनोज के कहने पर उमेश दोनों के लिए बाहर से रात का खाना पैक करा कर लाया था और रख कर रात करीब 10 बजे चला गया था. उमेश वहीं गांव में ही रहता था.

उस के जाने के बाद फार्महाउस में ममता और मनोज ही रह गए थे. प्राकृतिक वातावरण के आनंद और रात को मादक बनाने के लिए दोनों ने शराब पी. इस के बाद खूबसूरत पल साथ बिताए. मनोज के पास लाइसेंसी पिस्तौल थी. उसे सिरहाने रख कर आधी रात तक वह सो गया, जबकि ममता की आंखों से नींद नदारद थी. वह मोबाइल पर चैटिंग में मशगूल थी. उस ने बैडरूम का दरवाजा भी खोल दिया था. इसी बीच वह बाहर गई और थोड़ी देर में लौट कर लेट गई.

फार्महाउस में सन्नाटा पसरा था. लगभग ढाई बजे एक आईटेन कार फार्महाउस में घुसी और उस में से 4 लड़के उतरे. चारों तेजी से बैडरूम  में पहुंचे और मनोज को उठा कर उस के साथ मारपीट शुरू कर दी. उन्होंने उस के ऊपर हथियार भी तान रखे थे, इसलिए वह विरोध करने की स्थिति में नहीं था.

हड़बड़ाहट में हुए इस हमले के बारे में मनोज समझ नहीं सका. ममता एक कोने में खड़ी थी. तंदुरुस्त होने के बावजूद कुछ ही देर में मनोज उन के सामने पस्त हो गया. इस मारपीट में उस का होंठ भी फट गया. उस से निकला खून बिस्तर और तकिए में लग गया. वे मनोज को पीटते हुए बाहर ले आए और उसी की कार में डाल दिया. ममता खुद ही कार में बैठ गई थी. उस का पिस्तौल भी उन्होंने कब्जे में ले लिया था. इस के बाद दोनों कारें फर्राटा भरती चली गईं. वहां क्या हुआ, किसी को पता नहीं चला.

अगले दिन सुबह 8 बजे केयरटेकर उमेश फार्महाउस पर पहुंचा तो मुख्य दरवाजा खुला पाया. मनोज की कार भी नहीं थी. ऊपरी मंजिल पर पहुंचा तो बैडरूम का भी दरवाजा खुला था. मनोज और उन की मित्र, दोनों ही नदारद थे. मनोज बिना बताए कहां चला गया, यह बात उसे परेशान कर रही थी. क्योंकि रात में उस ने उस से 2 दिन रुकने को कहा था. जब बिस्तर पर पड़े खून के छींटों पर उस की नजर पड़ी तो उसे किसी अनहोनी की आशंका हुई. उस ने मनोज के मोबाइल पर फोन किया तो वह बंद मिला. उमेश ने देहरादून में ही रहने वाले मनोज के पार्टनर मुकेश मित्तल को फोन किया तो थोड़ी ही देर में वह वहां पहुंच गए.

उस ने मनोज के घर वालों से बात की. उन्हें सिर्फ इतना पता था कि वह देहरादून जाने की बात कह कर घर से गया था. हालात आशंकाओं और रहस्य को जन्म दे रहे थे. मुकेश ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी. तब तक मनोज का ड्राइवर सन्नी भी आ गया था. सूचना पा कर थाना प्रेमनगर के थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट कुछ ही देर में फार्महाउस पर पहुंच गए. मामला चौंकाने वाला था. आशंका अपहरण की हो रही थी. मनोज के साथ आई लड़की कौन थी, यह कोई नहीं जानता था.

यशपाल सिंह ने इस की जानकारी एसएसपी डा. सदानंद दाते को दी तो उन के निर्देश पर एसपी (सिटी) अजय सिंह, सीओ (सिटी) मनोज कत्याल, थाना सहसपुर के थानाप्रभारी मुकेश त्यागी, थाना बसंत विहार के थानाप्रभारी अबुल कलाम आदि भी वहां पहुंच गए थे. पुलिस ने फार्महाउस की बारीकी से जांच की. फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया था, जिस ने फिंगरप्रिंट के साथ खून सने कपड़ों को कब्जे में ले लिया. पुलिस के हाथ कोई खास सुराग नहीं लगा. फार्महाउस में सीसीटीवी कैमरा लगा था, लेकिन वह खराब था.

पहली नजर में मामला अपहरण का लग रहा था, लेकिन सवाल यह था कि अपहर्त्ता कौन हो सकते हैं और अपहरण किस मकसद से किया गया था? जिस लड़की के साथ मनोज चोरीछिपे आए थे, उस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. मनोज के खिलाफ उस लड़की की भी कोई साजिश हो सकती थी. ड्राइवर सन्नी ने पुलिस को बताया था कि उस ने लड़की को मनोज के साथ पहली बार देखा था. बिस्तर पर लगा खून किसी अनहोनी की ओर इशारा कर रहा था.

मामला गंभीर था, लिहाजा पुलिस टीमों का गठन कर दिया गया. इन टीमों में एसपी सिटी अजय सिंह के नेतृत्व में एएसपी मंजूनाथ, सीओ स्वपन कुमार सिंह, मनोज कत्याल, कई थानों के थानाप्रभारियों के अलावा एसआई दिलबर सिंह, यादवेंद्र बाजवा, गिरीश नेगी, किशन देवरानी, रवि सैनी, कमल हसन, किशन देवरानी और जितेंद्र कुमार आदि को शामिल किया गया था. स्पैशल औपरेशन ग्रुप को भी इस में लगा दिया गया था. आईजी संजय गुंज्याल ने भी मामले का जल्द से जल्द खुलासा किए जाने के निर्देश दिए थे.

पुलिस जल्द से जल्द इस रहस्य से परदा उठाना चाहती थी. एक पुलिस टीम मनोज के घर वालों से मिलने मेरठ गई. पुलिस ने मनोज की रंजिशों और लड़की के बारे में घर वालों से जानना चाहा, लेकिन उन से कोई खास जानकारी नहीं मिली. पुलिस ने महसूस किया कि घर वाले पुलिस से बचने की कोशिश कर रहे हैं. इस से पुलिस को लगा कि मनोज का अपहरण किया गया है और अपहर्त्ता संभवत: घर वालों के संपर्क में हैं. पुलिस ने घर वालों के नंबर ले लिए. इस के बाद मनोज के दोस्त कृष्णकुमार की तहरीर पर अपराध संख्या 42/2016 पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस ने मनोज के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स हासिल कर ली. उस में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर उस की कई दिनों से दिन में कईकई बार बातें हुई थीं. वह नंबर किस के नाम तथा किस पते पर लिया गया था, पुलिस ने इस बारे में पता किया तो पता चला कि वह गलत पते पर लिया गया था. हैरानी की बात यह थी कि उस नंबर से ज्यादा फोन मनोज को ही किए गए थे. इस के बाद पुलिस ने यह पता किया कि वह सिम लिया कहां से गया था? वह सिम मुजफ्फरनगर जिले से लिया गया था. देर शाम मोबाइल के जरिए पुलिस को पता चल गया कि अपहर्त्ता मनोज के घर वालों के संपर्क में हैं.

पुलिस के सर्विलांस से उन की लोकेशन दिल्ली-लखनऊ हाईवे पर गाजियाबाद और मुरादाबाद जिलों के बीच की मिल रही थी. पुलिस टीमों ने उन का पीछा करना शुरू किया, साथ ही गाजियाबाद और मुरादाबाद पुलिस को अवगत भी करा दिया. 19 फरवरी की देर रात घेराबंदी होते देख बदमाशों ने मनोज को गढ़मुक्तेश्वर में हाईवे पर छोड़ दिया. मनोज पुलिस के हाथ लगा तो बेहद डरासहमा था. उस के चेहरे पर चोटों के निशान थे. अपहर्त्ता पुलिस को चकमा दे गए थे. पुलिस मनोज को देहरादून ले आई. उस का इलाज कराया गया. उस समय उस की मनोदशा बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए पुलिस ने उस से ज्यादा पूछताछ नहीं की.

पुलिस सर्विलांस और मोबाइल नंबरों की जांच करते हुए अगले दिन यानी 21 फरवरी को मुजफ्फरनगर पहुंच गई और सिम मुहैया कराने वाले 2 लड़कों, अंबुज त्यागी और विकास को हिरासत में ले लिया. प्राथमिक पूछताछ में पता चला कि उन्होंने फरजी आईडी पर 3 सिमकार्ड विनय त्यागी को मुहैया कराए थे. विनय त्यागी उर्फ टिंकू पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नामी शातिर अपराधी था. मुजफ्फरनगर के गांव खाइखेड़ी का रहने वाला विनय जुर्म की दुनिया का पुराना खिलाड़ी था. उस के खिलाफ विभिन्न थानों में अपहरण, लूट, हत्या, रंगदारी जैसे 30 से ज्यादा केस दर्ज थे.

वह 1 लाख रुपए का इनामी अपराधी रहा था और कई बार जेल जा चुका था. उस की पत्नी पुरकाजी ब्लौक की ब्लौकप्रमुख थी. चौंकाने वाली बात पुलिस को यह पता चली कि मनोज के साथ जो लड़की थी, वह भी अपहरण में शामिल थी. उसे मोहरा बना कर मनोज के सामने हुस्न का चारा डाला गया था. अपहरण का यह बिलकुल नया अंदाज था.

पुलिस ने विनय, अंबुज, विकास और ममता को नामजद कर लिया. पूरे मामले का खुलासा विनय और ममता के पकड़े जाने के बाद ही हो सकता था. पुलिस टीमों ने छापे मारने शुरू किए. आखिर 22 फरवरी को ममता पुलिस के हाथ लग गई. पुलिस ने मनोज और ममता से विस्तार से पूछताछ की तो एक लड़की को मोहरा बना कर अपहरण की साजिश की जो चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इस मामले में साजिश का मुख्य सूत्रधार विनय त्यागी था. अपने साथियों के साथ मिल कर उस ने कोई बड़ा अपहरण कर के फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इस के लिए वह किसी लड़की को शामिल कर के आसानी से शिकार फांसना चाहता था. विनय का जुर्म से पुराना रिश्ता था. राजनीति का लबादा ओढ़ने के लिए उस ने सन 2007 में विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था. लेकिन हार गया था. इस के बाद उस ने पत्नी को राजनीति में उतार दिया था.

वह सक्रिय राजनीति में आना चाहता था, इस के लिए उसे मोटी रकम की जरूरत थी. उस ने कुछ अपहरण कर के मोटी रकम जुटाने का फैसला किया. उस ने दिमाग चलाया तो कम रिस्क में अपहरण करने के लिए लड़की का चारा डाल कर शिकार फंसाना उसे आसान लगा. बीए पास ममता स्पा सैंटर में नौकरी करती थी और कई रंगीनमिजाज लोगों के संपर्क में थी. विनय को यह बात उस के रिश्तेदार विकास ने बताई थी. विनय को ममता काम की लड़की लगी तो वह उस से मिला. विनय ने उस से कहा कि उसे एक आदमी को फंसाना है, इस के लिए वह उसे 20 लाख रुपए देगा. ममता महत्त्वाकांक्षी थी, इसलिए बिना नानुकुर के राजी हो गई.

इस के बाद विनय ने गलत नामपतों पर अंबुज और विकास से 3 सिमकार्ड मंगवा लिए. एक सिमकार्ड ममता को दे कर मनोज और एक सर्राफ का नंबर दे कर उन्हें फंसाने को कहा. ममता ने पहले सर्राफ को मिस्डकाल मारी. सर्राफ ने कोई जवाब नहीं दिया. इस तरह वह फंसने से बच गया. इस के बाद मनोज को मिस्डकाल मारी तो वह आसानी से उस के जाल में फंस गया. सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से हुआ था. रुपयों के लालच में ममता ने मनोज को फांस लिया था. 18 फरवरी को जब मनोज के साथ उस का देहरादून घूमने का प्रोग्राम बना तो 17 फरवरी को ही वह मेरठ पहुंच गई. विनय त्यागी और उस के साथी उसे लेने आए थे. जागृति विहार में बैठ कर सभी ने आगे की योजना बनाई.

दरअसल, विनय त्यागी का एक ठिकाना जागृति विहार में भी था. दोपहर बाद वे ममता को कार से बाईपास पर छोड़ गए, जहां से मनोज ने उसे अपनी इनोवा गाड़ी में बैठा लिया. मनोज को अंदाजा भी नहीं था कि वह आफत में फंसने जा रहा है. इस के बाद ममता लगातार सारी जानकारी वाट्सऐप के जरिए विनय और उस के साथियों को देती रही.

रात में मनोज के सोने के बाद उस ने हरी झंडी दे दी तो देर रात विनय अपने साथियों के साथ फार्महाउस पर पहुंच गया. ममता ने सारे दरवाजे पहले ही खोल दिए थे. वे अंदर आए तो मनोज सो रहा था. उन्होंने मारपीट कर के उसे कब्जे में ले लिया और निकल गए. उन्होंने उसे नशे का इंजेक्शन लगा कर उस का मोबाइल बंद कर दिया था. अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए मनोज की उस के घर वालों से बात करा कर उसे मारने की धमकी दी तो वे इतने डर गए कि उन्होंने पुलिस का सहयोग नहीं किया. विनय ने मनोज को मुजफ्फरनगर और मेरठ में रखा. वहां से वे रात में हाईवे की ओर ले कर चल दिए. उन्हें लगा कि पुलिस उन के पीछे लग गई है तो पुलिस से बचने के लिए उन्होंने मनोज को छोड़ दिया और ममता को दिल्ली भेज दिया.

ममता सोच रही थी कि उसे देरसवेर रकम मिल जाएगी और वह मजे की जिंदगी बिताएगी. लेकिन उस के पहले ही वह पुलिस के शिकंजे में फंस गई. पुलिस ने ममता समेत अन्य गिरफ्तार आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. पुलिस टीमें अब मास्टरमाइंड विनय त्यागी की तलाश में जुटी हैं, लेकिन वह भूमिगत हो गया है. पुलिस ने अदालत से उस का गैरजमानती वारंट हासिल कर लिया है. विनय और उस के साथियों की तलाश में कई जगहों पर छापा मारा गया है. लेकिन वे हाथ नहीं लगे हैं.

कथा लिखे जाने तक पुलिस उन की सरगर्मी से तलाश कर रही थी. पुलिस जांच में सामने आया है कि अपहरण के राज को हमेशा के लिए दफन करने के लिए विनय और उस के साथी ममता की हत्या कर देना चाहते थे. आईजी संजय गुंज्याल ने मामले का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को पुरस्कृत करने की घोषणा की है. मनोज ने सकुशल रिहाई का श्रेय देहरादून पुलिस को तो दिया ही, साथ ही अपनी गलतियों को भी स्वीकार किया, क्योंकि अगर वह खूबसूरत लड़की के हुस्न के जाल में न फंसा होता तो यह नौबत कभी न आती. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Hindi: जिस्म के चारे का बड़ा खिलाड़ी

Crime Story Hindi: प्रौपर्टी डीलर महेंद्र सिंह को बुलाया तो था मकान देखने के लिए, लेकिन उन के फ्लैट पर पहुंचते ही उन्हें कैद कर लिया गया और बदले में उन से 40 लाख रुपए तो वसूले ही गए, मुंह बंद रखने के लिए उन की एक महिला के साथ ब्लू फिल्म भी बना ली गई.

प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने वाले महेंद्र सिंह यादव पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई इलाके के कमरुद्दीन नगर में रहते थे. वहीं पर उन का औफिस भी था. कमीशन और ज्यादा कमाई के चक्कर में वह दूसरे शहरों की भी प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त करा देते थे. 8 दिसंबर, 2015 को वह अपने औफिस में बैठे थे, तभी उन के मोबाइल पर किसी महिला का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘यादवजी, मैं विकासनगर, उत्तम नगर में रहती हूं. मैं अपना मकान बेचना चाहती हूं.’’

पार्टी की ओर से फोन आने पर महेंद्र सिंह खुश हुए. उन्होंने महिला से मकान के बारे में पूरी जानकारी ले ली. महिला ने उसी समय उन से मकान देखने को कहा, लेकिन उस समय उन्हें कहीं और जाना था, इसलिए उन्होंने महिला से कहा कि आज नहीं, फिर कभी आ कर वह मकान देख लेंगे.

अगले दिन यानी 9 दिसंबर को उन के मोबाइल पर महिला का फोन फिर आया. महिला ने कहा, ‘‘यादवजी, दरअसल मुझे पैसों की सख्त जरूरत है, जिस की वजह से मुझे मकान बेचना पड़ रहा है. इसीलिए मैं कह रही हूं कि आप मेरा मकान देख कर जल्द से जल्द बिकवा दें.’’

‘‘मैडम, आप चाह रही हैं कि मकान जल्दी बिक जाए, ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि आजकल प्रौपर्टी के रेट काफी गिर गए हैं. खरीदार जल्दी मिलते नहीं हैं. जैसे ही मुझे टाइम मिलेगा, मैं आप के यहां पहुंच जाऊंगा.’’ महेंद्र सिंह ने कहा.

उसी दिन उस महिला का एक बार फिर फोन आया, लेकिन काम की व्यस्तता की वजह से वह उस का मकान देखने नहीं जा सके. 10 दिसंबर को शाम 5 बजे महिला ने फोन कर के कहा, ‘‘यादवजी, मैं इस समय रणहोला बसस्टाप पर खड़ी हूं. अगर आप अभी आ जाते तो मैं आप के साथ चल कर मकान दिखा देती, मकान देख कर आप चले जाना.’’

महिला के बारबार फोन करने से महेंद्र सिंह को लगा कि शायद उसे पैसों की सख्त जरूरत है, तभी वह मकान बेचने में इतनी जल्दी कर रही है. फिर मकान देखने में हर्ज ही क्या है. जब कोई ग्राहक मिलेगा, उसे मकान का सौदा करा देंगे. यही सोच कर वह अपनी मोटरसाइकिल से रणहौला बसस्टाप की तरफ चल दिए. बसस्टाप पर जो लोग खड़े थे, उन में कई महिलाएं थीं. महेंद्र सिंह महिला को पहचानते नहीं थे, इसलिए उस की पहचान के लिए उन्होंने अपने मोबाइल से उस का नंबर मिलाया तो सामने खड़ी 24-25 साल की एक महिला ने फोन रिसीव कर लिया. वह समझ गए कि यही वह महिला है, जिस ने फोन कर के उन्हें बुलाया है. वह कुछ कहते, महिला खुद ही उन की मोटरसाइकिल के पास आ गई. वह जींस की पैंट और कोट पहने थी.

औपचारिक बातचीत के बाद महिला उन की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ कर विकासनगर की ओर चलने को कहा. उसे ले कर महेंद्र सिंह दोढाई किलोमीटर गए होंगे कि एक मोटरसाइकिल आ कर उन के बराबर में चलने लगी. उस मोटरसाइकिल पर सवार आदमी की ओर इशारा कर के महिला ने कहा, ‘‘यादवजी, यह मेरे पति आ गए. आप मुझे उतार दीजिए, अब मैं इन के साथ चलूंगी. आप हमारी मोटरसाइकिल के पीछेपीछे आ जाइए.’’

महेंद्र सिंह ने मोटरसाइकिल रोकी तो बराबर में चल रहे युवक ने भी मोटरसाइकिल रोक दी. महिला जा कर युवक की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. इस के बाद महेंद्र सिंह उस युवक की मोटरसाइकिल के पीछेपीछे अपनी मोटरसाइकिल से चलने लगे. कई गलियों से निकल कर वह युवक विकासनगर में एक आयुर्वेदिक दवा स्टोर के पास जा कर रुक गया. महेंद्र सिंह भी उसे देख कर वहीं रुक गए. वहीं सड़क किनारे महिला ने उन की मोटरसाइकिल खड़ी करा दी. इस के बाद वह महेंद्र सिंह को एक बिल्डिंग की चौथी मंजिल पर ले गई.

दरवाजे का ताला खोल कर महिला महेंद्र को फ्लैट में ले गई. उस महिला के साथ जो युवक था, वह भी फ्लैट में आ गया था. सोफा पर बैठने के बाद महिला ने महेंद्र सिंह को पानी दिया. वह पानी पी रहे थे कि तभी 3 युवक फ्लैट में आ पहुंचे. आते ही उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया. वे मंकी कैप पहने थे और काले चश्मे लगाए थे. उन युवकों ने महेंद्र सिंह से कपड़े उतारने को कहा. इस पर महेंद्र सिंह चौंके कि वे यह क्या कह रहे हैं? उन्हें तो मकान दिखाने के लिए बुलाया गया था. वह महिला की तरफ देखने लगे. लेकिन वह कुछ नहीं बोली.

महेंद्र सिंह ने डरते हुए उन युवकों से पूछा कि वह उन से कपड़े उतारने को क्यों कह रहे हैं? एक युवक ने कहा, ‘‘हमें तेरे मर्डर की 25 लाख की सुपारी मिली है.’’

‘‘सुपारी..किस ने दी है सुपारी?’’ महेंद्र सिंह ने चौंक कर पूछा.

‘‘तुझे इन बातों से क्या मतलब. तुझ से जितना कहा जा रहा है, उतना कर.’’ कह कर युवकों ने उन की पिटाई शुरू कर दी.

डर की वजह से महेंद्र सिंह ने अपने कपड़े उतार दिए. उन्हें लगा कि किसी साजिश के तहत उन्हें यहां बुलाया गया है. कपड़े उतारने के बाद युवकों ने महेंद्र सिंह के हाथ पीछे कर के बांध दिए. इस के बाद वे उन की लातघूंसों से पिटाई करने लगे. महेंद्र सिंह उन से अपनी जान बख्शने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे.

‘‘हम तेरी जान बख्श देंगे, लेकिन उस के बदले हमें 50 लाख रुपए चाहिए.’’ एक युवक ने कहा.

‘‘यह तो बहुत ज्यादा हैं, इतने पैसे मेरे पास नहीं है.’’ महेंद्र सिंह ने कहा.

युवकों ने तमंचे निकाल कर उन के सामने उन में गोलियां भरीं. इस के बाद दाईं और बाईं ओर पेट पर सटा दिया, एक अन्य युवक ने चाकू निकाल कर पेट के बीचोबीच लगा दिया. इस से महेंद्र और घबरा गए. उन के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था. उन लोगों ने महेंद्र सिंह का मोबाइल, जो उन्होंने अपने कब्जे में ले रखा था, उन्हें देते हुए कहा, ‘‘अब तुम अपने घर वालों को फोन कर के कहो कि तुम एक प्लौट देखने हरिद्वार जा रहे हो, वहां से 2 दिन बाद लौटोगे.’’

डर की वजह से महेंद्र सिंह ने पत्नी को फोन कर के वैसा ही कह दिया, जैसा वे लोग कहलवाना चाहते थे. इस के बाद उन्होंने उन के पैर बांध कर फर्श पर नंगा छोड़ दिया. कड़ाके की सर्दी में महेंद्र सिंह फर्श पर पड़े थे. जब वह ठंड से कांपने लगे तो महिला ने उन के ऊपर कंबल डाल दिया. अगले दिन उन लोगों ने कहा, ‘‘अब तू यह बता कि तुझे पैसे कौन दे सकता है? जो लोग तुझे 50 लाख रुपए दे सकते हों, उन्हें अभी फोन करो.’’

महेंद्र सिंह परेशान थे कि वह पैसों के लिए किस से बात करें. घर पर भी इतने पैसे नहीं थे. पत्नी इतनी बड़ी रकम का इंतजाम नहीं कर सकती थी. लिहाजा उन्होंने अपने दोस्त तिलक को फोन किया. लेकिन तिलक ने उन का फोन रिसीव ही नहीं किया. उन की घबराहट बढ़ गई. इस के बाद उन्होंने अपने साले रमेश को फोन किया. उन्होंने रमेश से कहा, ‘‘मैं ने हरिद्वार में 50 लाख रुपए में 600 वर्गगज के प्लौट का सौदा किया है. तुम इतने पैसों का इंतजाम कर लो. मैं इस समय घर नहीं आ सकता. जैसे ही पैसों का इंतजाम हो जाए, बता देना. मैं किसी से मंगा लूंगा.’’

रमेश ने सोचा कि कोई अच्छा प्लौट होगा, तभी तो उन्होंने जल्दी से उस का सौदा कर लिया है. उन के पास भी इतने पैसे नहीं थे. इसलिए इधरउधर से इंतजाम कर के उन्होंने 40 लाख रुपए जुटा लिए. दोपहर एकडेढ़ बजे के करीब उन्होंने महेंद्र सिंह को फोन कर के कहा, ‘‘जीजाजी, 40 लाख रुपए का इंतजाम हो गया है. बताओ हरिद्वार में पैसे ले कर कहां आना है.’’

‘‘नहीं, पैसे ले कर तुम मत आओ. ऐसा करो, ये पैसे मेरे दोस्त राजेश के पास पहुंचा दो. वह मेरे पास पहुंचा देगा.’’ महेंद्र ने कहा.

रमेश निलोठी मोड़, नांगलोई के रहने वाले राजेश को जानते थे, इसलिए एक सफेद रंग के बैग में पैसे रख कर राजेश के पास पहुंचा दिए. उधर महेंद्र ने राजेश को फोन कर के पहले ही कह दिया था कि उस का साला उसे कुछ पैसे देने आएगा. उन पैसों को वह अपने पास रख लेंगे. किसी को भेज कर वह उस से पैसे मंगा लेगा. रमेश ने राजेश को जैसे ही पैसे दिए, राजेश ने महेंद्र को फोन कर दिया. उन लोगों के कहने पर महेंद्र ने राजेश को फोन किया, ‘‘राजेश, मैं एक लड़के को पैसे लेने के लिए भेज रहा हूं. तुम उसे कुंवर सिंह नगर में पुलिस बूथ के पास मिलना. वह युवक मेरी मोटरसाइकिल ले कर आएगा. उसे पैसे दे देना.’’

यह बातचीत हो जाने के बाद उन लोगों में से एक महेंद्र सिंह की मोटरसाइकिल ले कर कुंवर सिंह नगर में पुलिस बूथ के पास पहुंच गया. महेंद्र की मोटरसाइकिल पहचान कर राजेश उस युवक के पास पहुंच गए. बातचीत में उस युवक ने बता दिया कि उसे महेंद्र सिंह ने पैसे लेने के लिए भेजा है. इतनी मोटी रकम एक अनजान युवक को देने की राजेश की हिम्मत नहीं हो रही थी.  पुष्टि के लिए राजेश ने उसी समय महेंद्र को फोन किया. महेंद्र के हां कहने के बाद राजेश ने 40 लाख रुपए से भरा बैग उस युवक को दे दिया. पैसे ले कर वह युवक विकास नगर के उसी फ्लैट में लौट आया.

दूसरे कमरे में जा कर सब से पहले उन युवकों ने पैसे गिने. वे पूरे 40 लाख ही निकले. महेंद्र सिंह को उम्मीद थी कि पैसे लेने के बाद वे लोग उन्हें छोड़ देंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. मकान दिखाने के बहाने जो महिला उन्हें बुला कर लाई थी, उस ने उन के सामने अपने सारे कपड़े उतार दिए. महेंद्र सिंह ने अपनी नजरें झुका लीं. वह समझ नहीं पा रहे थे कि महिला ऐसा क्यों कर रही है. महेंद्र सिंह भी नग्नावस्था में थे.

इस के बाद एक युवक ने महेंद्र से कहा, ‘‘अब तुम इस के साथ वैसा ही करो, जैसा पत्नी के साथ करते हो.’’

45 साल के महेंद्र यह सुन कर हैरान रह गए. उन्होंने कहा, ‘‘आप लोगों को पैसे तो मिल ही गए हैं, फिर यह सब क्यों करा रहे हो?’’

इतना कहते ही एक युवक उन की पिटाई करने लगा. डर की वजह से महेंद्र को वह सब करना पड़ा, जो उन लोगों ने चाहा. उन युवकों ने अपनेअपने मोबाइल फोन से इस सब की उन की फिल्म बना ली थी. फिल्म बनाने के बाद उन्होंने महेंद्र सिंह को धमकी दी कि अगर उन्होंने यह बात पुलिस को बताई तो वे यह ब्लू फिल्म उन के सारे रिश्तेदारों को भेज देंगे, तब वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. उन्होंने कहा कि पुलिस तो दूर, अपने घर में भी वह किसी को कुछ नहीं बताएगा.

रात करीब 8-9 बजे 2 युवक महेंद्र सिंह को उन की मोटरसाइकिल पर बिठा कर गलियों में होते हुए विकासपुरी के गंदे नाले के पास ले गए. उन्होंने महेंद्र सिंह को वहीं उतार दिया और कहा कि थोड़ी दूर आगे उन की मोटरसाइकिल सड़क किनारे खड़ी मिल जाएगी, वहां से उसे ले कर वह घर चले जाएंगे. पिटाई की वजह से महेंद्र सिंह के शरीर में दर्द हो रहा था, इस के बावजूद वह पैदल चल दिए. करीब 500 मीटर दूर चलने पर उन्हें सड़क किनारे मोटरसाइकिल खड़ी मिल गई तो वह उसे ले कर अपने घर पहुंचे.

हरिद्वार में प्लौट खरीद कर पति को खुश होना चाहिए था, लेकिन वह उस समय ऐसे दुखी थे, जैसे उन्हें कोई भारी नुकसान हुआ हो. पत्नी ने महेंद्र से दुखी होने की वजह जाननी चाही, पर उन्होंने पत्नी को कुछ नहीं बताया. उन बदमाशों ने उन्हें इतना डरा दिया था कि वह पत्नी को भी अपने साथ हुए हादसे के बारे में बताने से डर रहे थे. 12 दिसंबर की रात दर्द की वजह से उन का सारा शरीर दुख रहा था. जब उन से नहीं रहा गया तो उन्होंने पत्नी को सारी बात बता दी. पति के साथ इतनी बड़ी घटना घट गई और 40 लाख रुपए भी चले गए, भला पत्नी इस बात को कैसे छिपा सकती थी. उस ने तुरंत अपने भाई रमेश को यह खबर दे दी.

चूंकि 40 लाख रुपए रमेश के हाथ से गए थे, इसलिए उन्हें भी विश्वास हो गया कि उस के बहनोई को साजिश के तहत फांस कर यह खेल खेला गया है. रमेश ने महेंद्र को समझाया कि वह इस की शिकायत पुलिस से करें, वरना वे बदमाश उस ब्लू फिल्म के जरिए उन्हें आगे भी ब्लैकमेल करते रहेंगे. इस के बाद महेंद्र सिंह 16 दिसंबर, 2015 को शाम के समय थाना उत्तमनगर पहुंचे और थानाप्रभारी को अपने साथ हुए हादसे से अवगत करा दिया. महेंद्र सिंह यादव की शिकायत पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 342/384/506/323/34 के तहत मामला दर्ज कर जांच सबइंसपेक्टर प्रताप सिंह को सौंप दी.

प्रताप सिंह ने इस मामले की जांच शुरू कर दी. वह विकासनगर में उस फ्लैट पर गए, जहां महेंद्र सिंह को रखा गया था. मकान मालिक ने बताया कि यह फ्लैट उस ने एक दंपति को किराए पर दिया था. वे इसे खाली कर के कहां चले गए, इस का उसे पता नहीं. इतनी बड़ी दिल्ली में बिना नाम व फोटो के उन्हें तलाश करना आसान नहीं था. फिर भी जांच अधिकारी ने उन बदमाशों की अपने स्तर से पता लगाने की कोशिश की, पर उन का पता नहीं चला. अंत में वह चुप मार कर बैठ गए. 2 महीने बीत जाने के बाद भी महेंद्र सिंह को अपने केस में काररवाई होती नहीं नजर आई तो उन्होंने जांच अधिकारी प्रताप सिंह से मुलाकात की. इस के बाद भी नतीजा कुछ नहीं निकला. जांच में कोई उन्नति नहीं हुई.

महेंद्र सिंह के एक दोस्त की दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल के डीसीपी संजीव कुमार यादव से जानपहचान थी. उन्होंने महेंद्र सिंह की मुलाकात डीसीपी से करा कर उन के साथ घटी घटना के बारे में बताया. घटना के बारे में सुन कर डीसीपी को लगा कि यह काम किसी गैंग का है. उन्होंने एसीपी निशांत गुप्ता के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर अतर सिंह, एसआई रमेश डबास, राकेश कुमार, संदीप कुमार, एएसआई संजय, हैडकांस्टेबल संजीव, कांस्टेबल परवेज आलम, विकास, संदीप आदि को शामिल किया.

टीम ने सब से पहले डोजियर सेल और अन्य माध्यमों से यह पता लगाना शुरू किया कि पहले इस तरह की दिल्ली में जो घटनाएं घटी हैं, उन में कौन लोग शामिल रहे थे और इस समय वे जेल में हैं या जेल से बाहर हैं. इस जांच में यह जानकारी मिली कि संदीप, अजय, रमेश तिवारी और 2 लड़कियों ने झज्जर (हरियाणा) निवासी प्रौपर्टी डीलर महा सिंह को इसी तरह प्रौपर्टी दिखाने के बहाने दिल्ली बुलाया और उन्हें अपने जाल में फांस कर उन से 9 लाख रुपए ऐंठ लिए थे. इस मामले की रिपोर्ट कंझावला थाने में दर्ज हुई थी.

इसी तरह दिल्ली के मुंडका निवासी बिजनेसमैन प्रकाश को कुछ लोगों ने 25 लाख की फिरौती के लिए अपहरण कर लिया था. बाद में 3 लाख फिरौती वसूल कर के उन्हें छोड़ दिया गया था. इस में भी उन्हीं लोगों के नाम सामने आए थे. इसी घटना की तरह झज्जर के ही दूसरे प्रौपर्टी डीलर रविंद्र सिंह को भी गिरोह ने अपने जाल में फांस कर उन से 7 लाख रुपए ऐंठे थे. इस घटना में भी संदीप दलाल, रमेश तिवारी के अलावा एक लड़की का नाम सामने आया था. इस केस में भी बदमाशों ने लड़की के साथ रविंद्र सिंह के अश्लील फोटो खींचे थे. इस की रिपोर्ट दिल्ली के रोहिणी (दक्षिण) थाने में 20 जनवरी, 2014 को दर्ज हुई थी.

महेंद्र सिंह के साथ जो घटना घटी थी, वह इन घटनाओं से पूरी तरह से मेल खा रही थी. जांच टीम ने जब इन घटनाओं में शामिल रहे लोगों के बारे में पता लगाया तो जानकारी मिली कि ये लोग जेल से जमानत पर छूटे हुए हैं. ये सभी नांगलोई इलाके के ही रहने वाले थे. पुलिस ने इन के घरों पर छापे मारे तो ये सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले. पुलिस ने फरार बदमाशों के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की तो एक नंबर ऐसा मिला, जो रमेश तिवारी, अजय और संदीप के संपर्क में था. वह नंबर अरविन का था और वह नांगलोई के कुंवर सिंह नगर में रहता था.

पुलिस ने 6 मार्च, 2016 को अरविन के यहां छापा मार कर उसे हिरासत में ले लिया. औफिस में ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि महेंद्र सिंह के साथ जो वारदात हुई थी, उस में वह शामिल था. उस ने बताया कि इस वारदात का मास्टरमाइंड संदीप दलाल था. इस के अलावा नकाबपोश लोग कौन थे, इस की उसे जानकारी नहीं थी, क्योंकि उन की व्यवस्था खुद संदीप दलाल ने की थी. अरविन ने बताया था कि नांगलोई में उस की स्पेयर पार्ट्स बनाने की फैक्ट्री थी, जो किसी वजह से घाटा होने पर बंद करनी पड़ी थी. वह पैसेपैसे के लिए मोहताज था. कुछ दिनों पहले उस की मुलाकात नांगलोई के ही रहने वाले संदीप दलाल से हुई तो पैसों के लालच में वह उस के साथ ब्लैकमेलिंग के धंधे में शामिल हो गया.

इस धंधे में हुई कमाई से उस ने एक मारुति स्विफ्ट डिजायर कार खरीदी थी. पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस की मरुति स्विफ्ट डिजायर कार बरामद कर ली थी. पुलिस को जानकारी मिली है कि महेंद्र के साथ हुई वारदात में संदीप दलाल, आकाश उर्फ सन्नी, रमेश तिवारी आदि भी शामिल थे. अरविन को गिरफ्तार करने की सूचना स्पैशल सेल औफिस से थाना उत्तमनगर पुलिस को मिल गई थी. 7 मार्च को स्पैशल सेल के एसआई संदीप कुमार ने अरविन को न्यायालय में पेश किया तो वहां मौजूद उत्तमनगर पुलिस ने अरविन को पूछताछ के लिए 2 दिनों की पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में पूछताछ करने के बाद उसे फिर से न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया था.

कथा लिखे जाने तक अन्य अभियुक्त पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके थे. इन के गिरफ्तार होने के बाद ही पता चल सकेगा कि इन लोगों ने कितने लोगों को हनीट्रैप में फांसा और उन से कितने रुपए ऐंठे. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime Story: परिस्थितियों की फैशन डिजाइनिंग

UP Crime Story: फैशन डिजाइनर शिप्रा मलिक मनमुटाव व पारिवारिक तनाव से परेशान थी. इसी तनाव के चलते उस ने क्राइम सीरियल से आइडिया ले कर अपने अपहरण का सफल ड्रामा रचा. उस का मामला इतना चर्चित हुआ कि पुलिस ने सारे काम छोड़ दिए और उस की बरामदगी के लिए जमीनआसमान एक कर दिया.

पुलिस हिरासत में बैठी वह फैशन डिजाइनर खूबसूरत युवती पुलिस अधिकारियों के लिए किसी अजूबे की तरह थी. पुलिस उस से घुमाफिरा कर पूछताछ कर रही थी. वह दुखी भी थी और परेशान भी. इस की वजह यह थी कि वह अपने अपहरण की ऐसी घटना से रूबरू हुई थी, जिस ने उस के दिलोदिमाग पर डरावनी छाप छोड़ी थी. गनीमत बस यही थी कि अपहर्त्ताओं ने उसे कोई जिस्मानी चोट नहीं पहुंचाई थी. अपनी मौत को चूंकि उस ने बेहद करीब से देखा था, लिहाजा मानसिक तौर पर वह काफी परेशान थी.

पुलिस के लिए वह अजूबा इसलिए थी, क्योंकि उस के अपहरण की घटना ने पूरे पुलिस तंत्र को हिला कर रख दिया था. इस हाईप्रोफाइल केस ने इतना तूल पकड़ा था कि पुलिस ने उच्चाधिकारियों के निर्देश पर उस की खोज में जमीनआसमान एक कर दिया था. स्पैशल टास्क फोर्स (एसटीएफ), क्राइम ब्रांच, साइबर एक्सपर्ट और पुलिस सभी काम छोड़ कर दिनरात सिर्फ उसे खोज रही थी. उस की तलाश में पुलिस की 1-2 टीमें नहीं, बल्कि 200 से ज्यादा पुलिसकर्मी लगे हुए थे. उस का परिवार गंभीर आशंकाओं से ग्रस्त था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाकामी और लापरवाही के आरोप लगाए जा रहे थे.

पुलिस के लिए उस की बरामदगी चुनौती बनी हुई थी, परंतु अपहरण के पांचवे दिन 4 मार्च, 2016 की सुबह वह नाटकीय अंदाज में मिल गई थी. यूं तो पुलिस के लिए यह एक बड़ी राहत की बात थी, पर पुलिस अपहरण की उस कहानी पर अटक कर रह गई थी, जो युवती सुना रही थी. उस युवती का नाम शिप्रा मलिक था. 29 वर्षीया शिप्रा उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे नोएडा के सैक्टर-37 के मकान नंबर-42 निवासी प्रौपर्टी कारोबार से जुड़े चेतन मलिक की पत्नी थी. शिप्रा मूलत: दिल्ली की रहने वाली थी. सन 2010 में उस का विवाह चेतन के साथ हुआ था. उस का करीब डेढ़ साल का बेटा अर्नव था.

शिप्रा घर पर ही डिजाइनर कपड़ों का बुटीक चलाती थी. 29 फरवरी को शिप्रा अपनी कार से दिल्ली जाने के लिए निकली थी कि तभी रहस्यमय स्थितियों में उस का अपहरण हो गया था. उस के अपहरण ने नोएडा से ले कर दिल्ली और दिल्ली से लखनऊ तक हड़कंप मचा दिया था. मामला संज्ञान में आने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद को अविलंब शिप्रा को बरामद करने के निर्देश दिए थे. मामला मीडिया की सुर्खियां बन गया था. पुलिस अपनी पूरी ताकत लगा कर भी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी.

मेरठ जोन के आईजी सुजीत पांडेय, रेंज की डीआईजी लक्ष्मी सिंह को नोएडा कैंप करना पड़ा था. डीआईजी जांच में जुटी पुलिस टीमों की खुद मौनिटरिंग कर रही थीं. इसी बीच शिप्रा ने हरियाणा से अपने पति को फोन कर के अपने सकुशल होने की जानकारी दी थी, जिस के बाद पुलिस व उस के पति जा कर 4 मार्च की तड़के करीब 5 बजे उसे घर ले आए थे. शिप्रा ने अपने साथ हुई सनसनीखेज वारदात का खुलासा किया था, लेकिन उस की बात पर पुलिस को विश्वास नहीं था. यही वजह थी कि एसएसपी किरन एस. व एसपी (सिटी) दिनेश यादव उस से खुद पूछताछ कर रहे थे.

दरअसल, शिप्रा का अपहरण ही इतना सनसनीखेज और चर्चित था कि उस की तह तक जा कर हकीकत को सामने लाना जरूरी था. शिप्रा अपने पति चेतन, उस के मातापिता व देवर शरद मलिक के साथ रहती थी. उस ने विवाह के बाद एक प्लाजा में अपना बुटीक खोल लिया था. उस का काम ठीक चलने लगा था, लेकिन उसी बीच सन 2014 में दुकान को ले कर उस का दुकान मालिकों राहुल और गुलशन से विवाद हो गया था. इस मामले में शिप्रा ने दोनों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करा दिया था. फिर भी शिप्रा को दुकान छोड़नी पड़ी थी. इस वजह से उसे लाखों का नुकसान हुआ था. इस के बाद शिप्रा ने अपना बुटीक घर में ही खोल लिया था.

29 फरवरी, 2016 की दोपहर में तकरीबन एक बजे शिप्रा अपनी स्विफ्ट डिजायर कार नंबर-डीएल1सी 1905 से दिल्ली जाने के लिए निकली. अपने बुटीक के काम से वह अक्सर दिल्ली के चांदनी चौक जाती रहती थी. वह सेक्टर-29 के ब्रह्मपुत्रा मार्केट की तरफ से निकली तो उस की मुलाकात अपने पति चेतन से हो गई. चेतन को चूंकि किसी काम से कनाटप्लेस जाना था, इसलिए कुछ देर बातचीत कर के दोनों अपनीअपनी राह चले गए. करीब साढ़े 3 बजे चेतन अपने काम से फ्री हो गया. उस ने यह सोच कर शिप्रा का मोबाइल नंबर डायल किया कि दोनों नोएडा एकसाथ वापस चले जाएंगे, लेकिन उस का मोबाइल स्विच औफ था.

शाम के करीब 5 बजे चेतन नोएडा वापस आ गए. वह जीआईपी मौल की तरफ से घर जा रहे थे, तभी उन की नजर सड़क किनारे खड़ी शिप्रा की कार पर पड़ी. चेतन को आश्चर्य हुआ, क्योंकि शिप्रा दिल्ली जाने की बात कह कर गई थी. फिर उस की कार वहां कैसे आ गई? वह कार के नजदीक पहुंचे तो कार में कोई नहीं था. कार का लौक चैक करने के लिए उन्होंने ड्राइविंग सीट की तरफ दरवाजे का हैंडल चैक किया तो वह खुल गया. कार अनलौक थी. इतना ही नहीं, कार की चाबी भी स्टीयरिंग के ठीक नीचे पायदान पर पड़ी थी.

यह देख कर चेतन को आश्चर्य भी हुआ और आशंका भी. उन्होंने एक बार फिर शिप्रा का नंबर मिलाया, लेकिन उस का मोबाइल अभी भी औफ था. चेतन ने अपने घर व शिप्रा के मायके वालों को इस की सूचना दी तो सभी परेशान हो उठे. शिप्रा का मोबाइल चूंकि बंद था, इस से अनहोनी की आशंका सताने लगी. विचारविमर्श के बाद घर वाले लावारिस मिली कार को ले कर थाना सैक्टर-20 पहुंचे.

पुलिस ने मामला दिल्ली का होना बताया. घर वाले दिल्ली के थाना लाजपतनगर पहुंचे तो वहां से उन्हें घटना की शुरुआत नोएडा से होने की बात कह कर चलता कर दिया गया. इस मामले में उन्होंने अपनी राजनैतिक पहुंच का इस्तेमाल किया तो मामला एकाएक दिल्ली से ले कर लखनऊ तक पहुंच गया. बात सरकार तक पहुंची तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पुलिस महानिदेशक को जल्द काररवाई के निर्देश दे दिए. इस के बाद पुलिस तंत्र बिजली की गति से सक्रिय हो गया. थाना सेक्टर-20 पुलिस ने पहले गुमशुदगी दर्ज की, फिर उस के परिजनों की तहरीर पर अपहरण का मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी अमरनाथ यादव जांच में जुट गए. आननफानन में मेरठ जोन के आईजी सुजीत पांडेय व डीआईजी लक्ष्मी सिंह नोएडा पहुंच गए. दोनों अधिकारियों ने अधीनस्थों को शिप्रा की तलाश करने को कहा. डीआईजी लक्ष्मी सिंह के निर्देशन में एसएसपी किरन एस. ने पुलिस की कई टीमों क ा गठन करने के साथ ही क्राइम ब्रांच व साइबर सेल को भी सक्रिय कर दिया.

साइबर यूनिट ने शिप्रा के मोबाइल की काल डिटेल्स के साथ ही उस की लोकेशन भी हासिल कर ली. शिप्रा के मोबाइल से अंतिम काल 29 फरवरी की दोपहर 2 बज कर 50 मिनट पर दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को की गई थी. यह काल 9 सैकेंड की थी. इस से इस बात को बल मिला कि शिप्रा जरूर किसी बड़ी मुसीबत में थी. दिल्ली पुलिस के रिकौर्ड की जांच की गई तो पता चला कि उन 10 सैकेंड में कोई बात नहीं हो सकी थी. जबकि उस के मोबाइल की अंतिम लोकेशन दिल्ली के लाजपतनगर क्षेत्र की पाई गई थी. इन सब तथ्यों के प्रकाश में आने से उस के अपहरण की आशंका को बल मिला.

इस के बाद पुलिस ने शिप्रा की तलाश के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दिया. पुलिस ने शिप्रा के पति चेतन व अन्य से कई दौर की पूछताछ की. पुलिस ने शिप्रा के पिता सतीश कटारिया व भाई शिवांग से भी पूछताछ की. पुलिस के सामने यक्ष प्रश्न यह था कि शिप्रा का अपहरण क्यों और किस ने किया? दूसरे शिप्रा को यदि चांदनी चौक जाना था तो उस की कार सैक्टर-29 कैसे पहुंची? इस दौरान फिरौती के लिए कोई फोन या पत्र भी उस के घर वालों को नहीं मिला था.

देखतेदेखते 2 दिन बीत गए. पुलिस अपने स्तर से छानबीन कर रही थी. इस जांच में एसटीएफ को भी लगा दिया गया था. शिप्रा के पति चेतन ने उन दुकानदारों पर भी शक जाहिर किया, जिन से कुछ समय पहले शिप्रा का झगड़ा हुआ था. पुलिस ने उन से भी गहराई से पूछताछ की, लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. इस के अलावा शिप्रा के घर वाले किसी भी रंजिश की बात से इंकार कर रहे थे.

शिप्रा अपनी मर्जी से कहीं न चली गई हो, इस आशंका में पुलिस ने दिल्ली एयरपोर्ट से 29 फरवरी को 3 बजे के बाद विदेश गए यात्रियों की लिस्ट हासिल कर ली, लेकिन उस में शिप्रा का नाम नहीं था. एक बात यह भी लग रही थी कि शिप्रा का अपहरण करने वाला कोई उस का जानकार रहा होगा. उस की काल डिटेल्स की छानबीन की जा रही थी.

उस के मोबाइल पर काल के साथ इंटरनेट का भी इस्तेमाल हुआ था. जांच के दौरान पुलिस को उस में कोई संदिग्ध नंबर नहीं मिला. साइबर यूनिट उस का मैसेंजर व्हाट्सएप डाटा जुटाने का प्रयास कर रही थी. पुलिस के लिए अपहरण का यह केस एक तरह से चुनौती बन गया था. अंदेशा था कि शिप्रा को रास्ते से अपहृत कर के दिल्ली ले जाया गया होगा. लाजपतनगर में मिली उस के मोबाइल की अंतिम लोकेशन भी इस आशंका को पुख्ता कर रही थी.

पुलिस ने कई सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग की जांच की, लेकिन उन से भी कोई सुराग नहीं मिला. पुलिस चांदनी चौक की उस दुकान पर भी पहुंची, जहां से वह कपड़े लाया करती थी. वहां पता चला कि शिप्रा दुकान पर पहुंची ही नहीं थी. पुलिस ने शहर भर में शिप्रा के पोस्टर चस्पा कर दिए, ताकि कोई सुराग मिल सके.

इस के साथ ही विभिन्न सैक्टरों में नौकरी करने वाले 40 से ज्यादा सुरक्षागार्डों से भी पुलिस ने पूछताछ की. पुलिस की अलगअलग टीमें एसपी (सिटी) दिनेश यादव, एसपी (क्राइम) विश्वजीत श्रीवास्तव, एएसपी डा. गौरव ग्रोवर व सीओ अनूप कुमार के नेतृत्व में काम कर रही थीं. इस के बावजूद पुलिस की काबिलियत पर सवाल उठने लगे थे. 3 मार्च को पुलिस को शिप्रा का एक सुराग मिला. सीसीटीवी रिकौर्डिंग में शिप्रा सैक्टर-18 में कार चलाती दिखी. इस रूट पर वह एक बैंक में गई थी. सवा से 2 बजे के बीच बैंक के एंट्री गेट पर वह अंदर जाती दिखाई दी. उस ने कान पर मोबाइल लगाया हुआ था और वह एकदम सामान्य लग रही थी.

पूछताछ में पता चला कि बैंक में शिप्रा का जौइंट लौकर था. सवाल यह था कि शिप्रा बैंक किस लिए गई थी? शिप्रा के पति चेतन ने इस बात से इनकार कर दिया कि उसे इस संबंध में कोई जानकारी है. पुलिस अपहरण की गुत्थी सुलझाने में दिनरात उलझी हुई थी कि इसी बीच एक ऐसा मोड़ आया, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. 4 फरवरी की देर रात करीब सवा बजे एक अंजान नंबर से चेतन के मोबाइल पर शिप्रा का फोन आया. उस ने बताया कि वह गुड़गांव, हरियाणा के गांव सुल्तानपुर में सरपंच राकेश चौहान के घर है. वह उसे लेने के लिए आ जाए. यह सुन कर चेतन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस ने यह बात पुलिस को बताई तो एसएसपी किरन एस. के नेतृत्व में गया पुलिस दल उसे अपने साथ नोएडा ले आया.

बरामदगी के बाद शिप्रा ने पुलिस को जो कहानी बताई, उस के अनुसार वह बैंक में अपना लौकर चैक करने गई थी, लेकिन बाद में उस ने इरादा बदल दिया था. बैंक से निकल कर वह कुछ दूर पहुंची तो वैन में सवार 4 लोगों ने उसे रोक कर वैन की पिछली सीट पर डाल लिया. उन्होंने उस का मोबाइल व पर्स छीन लिया और उस के ऊपर एक कंबल डाल कर एक बदमाश ने उसे धमकी दी, ‘‘चुपचाप पड़ी रहना. अगर जरा भी चीखनेचिल्लाने की कोशिश की तो गोली मार दूंगा.’’

शिप्रा बुरी तरह घबरा गई. वह शांत पड़ी रही. उस की समझ नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. वैन कहां जा रही थी, उसे कुछ नहीं पता था. उसी बीच बदमाशों ने उस का मोबाइल पिछली सीट पर फेंका तो वह उस के हाथ आ गया. इस से उसे उन के चंगुल से बचने की उम्मीद की किरन नजर आई. सोचविचार कर उस ने पुलिस का सौ नंबर डायल कर दिया. लेकिन नजर पड़ते ही बदमाशों ने उस से मोबाइल छीन कर स्विच्ड औफ कर दिया.

बदमाशों ने उस की आंखों पर पट्टी बांध दी. वह उसे गुड़गांव ले गए. पहले उसे खेतों और बाद में एक कमरे में बंधक बना कर रखा गया. मीडिया में मामला उछला तो बदमाश घबरा गए. एक रात वह उसे सुल्तानपुर गांव के पास सड़क पर फेंक कर फरार हो गए. इस के बाद उस ने दरवाजा बजा कर गांव वालों से मदद की गुहार की और जैसेतैसे चेतन के मोबाइल पर सूचना दी.

पुलिस शिप्रा के बयानों से संतुष्ट नहीं थी. इस की कई वाजिब वजहें भी थीं. बदमाशों ने सरेआम उस का अपहरण किया था तो उस ने शोर क्यों नहीं मचाया था? बदमाशों ने उस का अपहरण क्यों किया था? इस की भी कोई ठोस वजह वह नहीं बता पा रही थी. कार से फेंके जाने पर भी उस के जिस्म पर कोई खरोंच नहीं आई थी.

उस ने रस्सी से हाथपैर बांधे जाने की बात की थी, लेकिन ऐसे कोई निशान मौजूद नहीं थे. मामला चूंकि चर्चित था, इसलिए पुलिस के लिए हकीकत से पर्दा उठाना जरूरी था. पहले ही अपनी कार्यप्रणाली को ले कर सवालों में उलझी पुलिस इस मामले में अब ऐसे सवालों का शिकार नहीं होना चाहती थी, जिन का जवाब उस के पास न हो.

शिप्रा चाहती थी कि वह जो बता रही है, पुलिस सिर्फ उसी पर भरोसा करे. जबकि पुलिस चाहती थी कि जो सवाल वह पूछ रही है, उन का उसे सटीक जवाब मिले, ताकि अपहरण से ले कर सकुशल वापसी तक की तसवीर आईने की तरह साफ हो जाए. शिप्रा का अपहरण और उस का मिलना, दोनों ही नाटकीय व रहस्यमयी थे. उन के इर्दगिर्द सवालों का जाल फैला था.

पूछताछ से विचलित हो चुकी शिप्रा अधिकारियों से बोली, ‘‘सर, प्लीज मेरे साथ जो हुआ, अब मैं उसे याद कर के परेशान नहीं होना चाहती. मैं यह भी नहीं चाहती कि अपहर्ता पकड़े जाएं. उन्होंने मेरी जान बख्श दी, यही बड़ी बात है. क्या मैं अब घर जा सकती हूं?’’

‘‘जा सकती हो, लेकिन पूरा सच बताने के बाद.’’ एक अधिकारी ने कहा तो उस ने उलटा सवाल दाग दिया, ‘‘मैं भला झूठ क्यों बोलूंगी? मैं ने सच ही तो बताया है.’’

‘‘सच बताया होता तो हम तुम्हारे साथ इतनी माथापच्ची न करते.’’

‘‘अपने अपहरण की कहानी का वह सच बता दो, जिसे हर कोई जानना चाहता है.’’

शिप्रा की बरामदगी की सूचना पर डीआईजी लक्ष्मी सिंह भी 8 बजे तक वहां पहुंच गईं. उन्होंने करीब आधा घंटे शिप्रा से घुमाफिरा कर मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की तो अपहरण के उस सच से पर्दा उठ गया, जिस में पुलिस उलझी हुई थी. विस्तृत पूछताछ में पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. हैरतअंगेज बात यह थी कि शिप्रा अपने अपहरण की खुद ही सूत्रधार थी. वह खुद अपहृत हुई थी और खुद ही बरामद. उस ने क्राइम सीरियल देख कर उसी की तर्ज पर जिस अंदाज में अपने अपहरण की पटकथा से पुलिस को नचाया था, वह न सिर्फ चौंकाने वाली थी, बल्कि हैरतअंगेज भी थी.

दरअसल, शिप्रा पारिवारिक मनमुटाव की वजह से मानसिक तनाव में चल रही थी. यूं तो उस की जिंदगी में सभी कुछ था, पर वह अपना फैशन डिजाइनिंग का बड़ा शोरूम खोलना चाहती थी. लेकिन इस के लिए उस की आर्थिक स्थिति गवाही नहीं दे रही थी. शिप्रा के पिता और पति के बीच भी पैसों के लेनदेन को ले कर तनाव था. शिप्रा ने बचपन से बेहतर स्टाइल में जिंदगी को जिया था. अब भी वह ऐसा ही चाहती थी. यह बात अलग थी कि आर्थिक स्थिति अब इस की इजाजत नहीं दे रही थी.

इंसान को विपरीत हालात का सामना कर के उन्हें अपने अनुकूल बनाना चाहिए, लेकिन शिप्रा पारिवारिक कलह, आर्थिक परेशानी व मनमुटाव में घुटन महसूस करने लगी थी. इस का नतीजा यह निकला कि वह धीरेधीरे तनावग्रस्त हो गई. आदतन उस ने क्राइम स्टोरी आधारित टीवी सीरियल देखे. उन में से एक सीरियल ने उस के दिमाग पर विशेष छाप छोड़ी. तनाव से निकलने के लिए उस ने हमेशा के लिए परिवार को छोड़ने और क्राइम सीरियल के आधार पर अपने अपहरण का ड्रामा रचने की सोची. कुछ दिन की सोच के बाद उस ने घर को अलविदा करने का मन बना लिया.

29 फरवरी को वह कार से घर से निकल कर बैंक गई, लेकिन वहां उस ने कुछ किया नहीं. योजना के तहत उस ने अपनी कार सेक्टर-29 में जानबूझ कर ऐसी जगह पार्क कर दी, ताकि उस के पति को मिल जाए. चेतन उस रास्ते से आतेजाते थे, इस बात को वह बखूबी जानती थी. कार की चाबी भी उस ने कार में ही छोड़ दी. वहां से वह पैदल चल कर बौटेनिकल गार्डन गई.

वहां से उस ने धौला कुआं जाने वाली बस पकड़ी. जब वह लाजपतनगर फ्लाईओवर पर पहुंची तो उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को यह बताने के लिए काल की कि वह अपनी मर्जी से जा रही है, इसलिए बाद में उस के घर वालों को परेशान न किया जाए. लेकिन चंद सैकेंड में ही उस का इरादा बदला तो उस ने काल डिसकनेक्ट कर दी. इस के बाद मोबाइल का भी उस ने स्विच औफ कर दिया. धौला कुआं पहुंच कर वह पहले गुड़गांव गई, फिर जयपुर जाने वाली बस में सवार हो गई और खाटू श्यामजी के आश्रम जा पहुंची. वहां वह पहले भी जाती रही थी. आश्रम में आने वाले लोगों के लिए ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था थी.

आश्रम का चुनाव उस ने इसलिए किया, क्योंकि वहां सैंकड़ों लोग आतेजाते थे. उस ने सोचा कि अगर उस की खोजबीन हुई तो आसानी से कोई उस का पता नहीं लगा सकेगा. 3 दिन वह आश्रम में ही रही. इस बीच उस ने अपना मोबाइल फोन और पर्स फेंक दिया था. शिप्रा के पास 5 हजार रुपए थे. उस ने टीवी पर अपने अपहरण की खबर देखी तो उसे अपने बच्चे की याद सताने लगी. अर्नव की याद से उस का ममत्व हिलोरें लेने लगा. उस की मनोदशा बदली और उस ने वापस जाने का फैसला कर लिया.

उस ने मन ही मन सोच लिया कि अब वह अपने अपहरण की कहानी को अमलीजामा पहनाएगी. शाम को जयपुर से चल कर देर रात वह गुड़गांव पहुंची. पैदल चल कर वह फर्रुखनगर रोड स्थित सुल्तानपुर गांव गई. उस ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक दी. यह घर नरेंद्र सैनी का था. नरेंद्र को उस ने रोते हुए अपने अपहरण की झूठी कहानी सुनाई. नरेंद्र उसे सरपंच राकेश के पास ले गए. वहां से उस ने चेतन को फोन किया. इस बीच सरपंच ने क्षेत्रीय पुलिस को भी खबर कर दी. स्थानीय पुलिस ने भी पहुंच कर उस से पूछताछ की.

शिप्रा ने नोएडा आ कर पुलिस को भी यही कहानी बताई थी, लेकिन पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो वह टूट गई. मानवीय आधार पर बिना किसी काररवाई के पुलिस ने शिप्रा को मैडिकल परीक्षण के बाद उस के घर वालों के हवाले कर दिया. विस्तृत पूछताछ के बाद डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने दोपहर में प्रैसवार्ता कर के शिप्रा के अपहरण के ढोंग का खुलासा मीडिया के सामने कर दिया. पुलिस के जितने समय, पैसे और संसाधनों की बर्बादी उसे ले कर हुई, उतने में कई केस सुलझ सकते थे. कथा लिखे जाने तक नोएडा पुलिस बिना वजह परेशान करने वाली शिप्रा के बयानों की पुष्टि के लिए और गहराई से जांचपड़ताल कर रही थी. पुलिस उस का मोबाइल व पर्स बरामद नहीं कर सकी थी.

शिप्रा चाहती तो संयम व विवेक का परिचय दे कर परिस्थितियों से कदमताल मिला सकती थी, लेकिन उस ने तनाव से निकलने का जो खुराफाती आइडिया सोचा, उसे अफसोसजनक ही कहा जाएगा. पुलिस का कहना था कि अपहरण का मुकदमा खत्म किया जाएगा. जरूरी हुआ तो सभी तथ्यों की पड़ताल के बाद शिप्रा के खिलाफ काररवाई करने की बात सोची जाएगी. UP Crime Story

—कथा पुलिस सूत

Punjab Crime: गर्भ में पल रहे बच्चे का सौदा करने वाला गिरोह

Punjab Crime: पंजाब के लुधियाना में औरतों का एक ऐसा गिरोह पकड़ा गया है, जो नवजात बच्चों की तो खरीदफरोख्त करता ही था, गर्भ में पलने वाले बच्चे का भी सौदा कर लेता था.

फोन पर दूसरी ओर से बारबार यही आवाज आ रही थी कि जिस नंबर पर आप बात करना चाहते हैं, वह या तो कवरेज एरिया से बाहर है या बंद है. लेकिन शामलाल ने हिम्मत नहीं हारी और थोड़ीथोड़ी देर पर वह उस नंबर को मिलाते रहे. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और दूसरी ओर घंटी बज उठी. उस समय शाम के साढ़े 4 बज रहे थे और तारीख थी 15 फरवरी, 2016. दूसरी ओर से फोन रिसीव किया गया तो शामलाल के कानों में किसी आदमी की भारी आवाज गूंजी, ‘‘हां जी बताइए, किस से बात करनी है, कहीं किसी गलत नंबर पर तो फोन नहीं मिला दिया? मैं तो आप को जानता नहीं.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने एकदम सही नंबर मिलाया है. काफी देर से कोशिश कर रहा हूं, तब कहीं जा कर आप का फोन लगा है.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन आप बोल कौन रहे हैं? आप को किस से बात करनी है?’’ दूसरी ओर से अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘दरअसल, हमारी पहली बार बात हो रही है, इस से पहले हमारी कभी बात नहीं हुई. आप मिस्टर तेजवीर सिंह बोल रहे हैं न?’’

‘‘देखिए, पहले आप अपने बारे में बताइए. उस के बाद किस काम के लिए फोन किया है, यह बताइए. और हां, मेरा यह नंबर आप को कहां से मिला?’’ दूसरी ओर से उसी अक्खड़ अंदाज में पूछा गया.

‘‘आप का नंबर आप के एक खास दोस्त काला ने मुझे दिया है.’’

‘‘कहां रहता है यह काला?’’

‘‘यहीं लुधियाना में, उस का पता बताऊं?’’

‘‘तब तो आप भी लुधियाना से ही बोल रहे होंगे?’’ इस बार दूसरी ओर से थोड़ा नरमी से पूछा गया.

‘‘जी हां, मैं लुधियाना से ही बोल रहा हूं. वर्धमान चौक के पास मेरी कोठी है और घंटाघर के सामने वाली बिल्डिंग में मेरा औफिस है. यहां मुझे सब ठेकेदार शामलाल के नाम से जानते हैं. काला आप की बड़ी तारीफें कर रहा था. कह रहा था कि आप मेरा काम चुटकी बजा कर करवा देंगे.’’

‘‘बताइए, आप की परेशानी क्या है?’’

‘‘ऐसा है कि मेरी शादी हुए 5 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अभी तक मैं बच्चे का मुंह देखने को तरस रहा हूं. मां न बन पाने की वजह से मेरी पत्नी भी डिप्रैशन का शिकार हो गई है. न कहीं आतीजाती है और न किसी से ज्यादा मिलतीजुलती है, गुमसुम सी अपने कमरे में पड़ी रहती है.’’

‘‘डाक्टर को नहीं दिखाया, आखिर बच्चा क्यों नहीं हो रहा?’’

‘‘बड़ेबड़े डाक्टरों को दिखा दिया है, लेकिन कहीं से कोई फायदा नहीं हुआ. अब यही सोच रहे हैं कि किसी और का बच्चा ले कर पाल लें.’’

‘‘तो किसी अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लीजिए. इस में परेशानी क्या है?’’

‘‘आप की बात सही है, लेकिन मेरी पत्नी इस के लिए राजी नहीं है. क्योंकि ऐसा करने से उस पर बांझ की मोहर लग जाएगी. हमें तुरंत का जन्मा बच्चा चाहिए, जिस के बारे में मेरी पत्नी कह सके कि उसे उस ने पैदा किया है. इस बारे में मेरी काला से बात हुई तो उस ने कहा कि पैसा ले कर आप मेरा काम आसानी से कर देंगे.’’

‘‘आसानी से कैसे कर देंगे भाई? यह बहुत ही मुश्किल काम है. कई लोगों से संपर्क करना पड़ेगा. वैसे भी यह काम मैं सीधे नहीं कर सकता. जो भी करेंगी, डाक्टर साहब करेंगी. मैं उन से एक बार बात कर लेता हूं, उस के बाद आप को बताता हूं. और हां, काला ने आप को यह भी बताया ही होगा कि इस तरह के काम में काफी पैसा लगता है.’’

‘‘बताया है न. मैं ने उस से भी कहा था और आप से भी कह रहा हूं कि आप पैसों की जरा भी चिंता न करें. बस मेरा काम होना चाहिए. आप जितना भी पैसा मांगेंगे, मैं उस से ज्यादा दूंगा. पैसों की मेरे पास कोई कमी नहीं है. बस हां, बच्चा इस तरह का होना चाहिए कि देखने में अच्छे घर का लगे. खूबसूरत भी होना चाहिए.’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन हम तो पेमेंट के हिसाब से बच्चा देते हैं. आप जैसा पेमेंट करेंगे, आप को वैसा ही बच्चा मिलेगा. मैं डाक्टर मैडम से बात करता हूं.’’ कह कर उस आदमी ने फोन काट दिया.

फरवरी, 2016 के दूसरे सप्ताह में लुधियाना के डीसीपी डा. नरेंद्र भार्गव को अपने किसी माध्यम से सूचना मिली थी कि शहर में कुछ महिलाओं का एक ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो किसी गरीब महिला के गर्भवती होने पर उस के पेट में पल रहे बच्चे (भ्रूण) को अच्छेखासे दामों में बेच कर आपराधिक धंधा कर के अच्छीखासी कमाई कर रहा है. दरअसल, महिलाओं का यह गिरोह बिना औलाद वाली महिलाओं को नवजात बच्चा बेच कर उन से अच्छीखासी रकम वसूल करता था.

यही नहीं, इस गिरोह के सदस्य उन गरीब औरतों के बारे में पता लगाती रहती थीं, जिन के कई बच्चे पहले से ही होते थे, इस के बावजूद वे गर्भवती हो जाती थीं. ऐसी महिलाओं को गर्भ ठहरने की खुशी कम, समस्या ज्यादा प्रतीत होती थी. ऐसी ही महिलाओं को पैसों का लालच दे कर वे औरतें उस का बच्चा पैदा होते ही ले कर बेऔलाद अमीर महिलाओं को अच्छेखासे दामों में बेच देती थीं. नरेंद्र भार्गव ने इस गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए एडिशनल डीसीपी (मुख्यालय) ध्रुव दहिया के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में सीआईए-2 के इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह, उन के रीडर सुखपाल सिंह, एएसआई सतनाम सिंह, हवलदार कुलवंत सिंह, राजेश कुमार, सिपाही दलजीत सिंह, होमगार्ड के जवान जितेंद्र कुमार एवं महिला सिपाही सुरेंद्र कौर को शामिल किया गया.

टीम नवजात बच्चों का सौदा करने वाले गिरोह के बारे में पता लगाने के लिए भागदौड़ करने लगी. इसी के साथ इस टीम ने अपने मुखबिरों को भी सहेज दिया था. पुलिस टीम ने बहुत जल्दी इस गिरोह के बारे में पता कर लिया. उस में एक पुरुष भी शामिल था, जिस का नाम तेजवीर सिंह था. वही फोन पर ग्राहकों से बात कर के सौदा करता था. उस का मोबाइल नंबर भी पुलिस के हाथ लग गया था. इस के बाद एक आदमी को नकली ग्राहक बना कर नवजात बच्चा खरीदने के लिए तेजवीर सिंह को फोन किया गया. नकली ग्राहक ने अपना नाम रखा था- ठेकेदार शामलाल.

15 फरवरी, 2016 की शाम 4 बजे नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल की तेजवीर से बात हुई थी. 6 बजे तक कोई जवाब नहीं मिला तो शामलाल ने उसे दोबारा फोन किया. दूसरी ओर से तेजबीर ने छूटते ही कहा, ‘‘ऐसा है ठेकेदार साहब, मैं ने डाक्टर मैडम से बात कर ली है, उन्होंने आप के काम के लिए आगे की काररवाई शुरू कर दी है. मेरे सामने ही उन्होंने कई लोगों को फोन किए हैं.’’

‘‘आप को क्या लग रहा है, मेरा काम हो जाएगा न?’’ शामलाल ने उतावलेपन से पूछा.

‘‘बिलकुल हो जाएगा जी. बस आप हमें थोड़ा समय दीजिए. मेरे पास कुछ बच्चे हैं, लेकिन उन में आप जैसा बच्चा चाहते हैं, वैसा नहीं है. आप के लिए हम एकदम गोराचिट्टा और सेहतमंद बच्चा देख रहे हैं, जो पहली ही नजर में अमीर घर का लगे. क्योंकि उसे बनाना भी तो अमीर घर की औलाद है.’’

‘‘यह बात आप ने एकदम सही कही. सुन कर मन इतना खुश हुआ कि अगर आप सामने होते तो डील की रकम से अलग लाख रुपए अभी निकाल कर इनाम के रूप में आप के हाथ में रख देता.’’

‘‘कोई बात नहीं ठेकेदार साहब, हम आप से इनाम जरूर लेंगे. लेकिन पहले आप के आदेश के अनुसार काम कर दूं. आप को ऐसा खूबसूरत बच्चा ला कर देंगे कि आप और आप की मेमसाहब देखते रह जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, अब यह बताओ कि बच्चा हमें कब मिल रहा है? मैं ने इस बारे में अपनी पत्नी को भी बता दिया है. इसलिए वह बारबार फोन कर के एक ही बात पूछ रही है कि बच्चा कब ला कर उस की गोद में डाल रहा हूं.’’

‘‘आप को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा ठेकेदार साहब. जैसे ही बच्चा हमारे पास पहुंचेगा, हम तुरंत आप को फोन कर के बता देंगे और उसी समय आप के पास तक बच्चे को पहुंचाने चल देंगे. बस आप कैश तैयार रखिएगा. डील फाइनल होते ही मैं आप को पैसे के बारे में बता दूंगा.’’

‘‘मैं ने कहा न कि आप को पैसों की चिंता करने की जरूरत नहीं है. उम्मीद से कहीं ज्यादा पैसे मिलेंगे आप लोगों को.’’

फिलहाल बात यहीं खत्म हो गई.

इस के बाद उसी दिन रात 9 बजे तेजवीर सिंह का फोन आया. उस ने जल्दीजल्दी कहा, ‘‘निहायत खूबसूरत बच्चे की व्यवस्था हो गई है. हम उसे मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 से ले कर एक घंटे बाद यानी ठीक 10 बजे वर्धमान चौक पर पहुंच रहे हैं. इस के लिए आप को 5 लाख रुपए देने हैं, जो आप को कैश में लाना है. बच्चा अभी एक हफ्ते का भी नहीं हुआ है, उसे संभालने के लिए आप अपनी पत्नी को भी साथ ले आइएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं रुपए ले कर 10 बजे से पहले ही वर्धमान चौक के बाईं ओर वाले फुटपाथ पर अपनी पत्नी के साथ खड़ा रहूंगा.’’ नकली ग्राहक बने ठेकेदार शामलाल ने कहा.  इस के बाद फोन कट गया.

तेजवीर सिंह से फोन पर यह बातचीत सीआईए के औफिस से ही हो रही थी. इस बात की जानकारी डीसीपी नरेंद्र भार्गव को दी गई तो उन्होंने कहा, ‘‘किसी की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर के वर्धमान चौक के पास पूरी फोर्स के साथ तैनात हो जाओ. नकली ग्राहक को ब्रीफकेस दे कर फुटपाथ पर खड़ा कर दो. उन लोगों के आने पर वह उन से बातचीत करे. गिरोह के बारे में पता चलते ही वह अपने फोन से तुम्हारे फोन पर मिस्डकाल करे. उस के बाद तुम अपनी टीम के साथ उन्हें घेर कर गिरफ्तार कर लो. और हां, नकली ग्राहक इस बात का भी ध्यान रखे कि उस समय बच्चा उन के पास मौजूद होना चाहिए.’’

‘‘जी हां, ऐसा ही होगा.’’ जितेंद्र सिंह ने कहा.

इस के बाद उन्होंने मुखबिरी को आधार बना कर एएसआई सतनाम सिंह से तहरीर ले कर भादंवि की धारा 370 एवं ह्यूमन ट्रैफिकिंग एक्ट की धारा 2 के तहत थाना डिवीजन नंबर 7 में अपराध क्रमांक 30 पर रिपोर्ट दर्ज करवा दी. इस के बाद अपनी पुलिस टीम के साथ नकली ग्राहक बने कथित ठेकेदार शामलाल को साथ ले कर वर्धमान चौक पहुंच गए. अब उन्हें इंतजार था तेजवीर सिंह के अगले फोन का. नकली ग्राहक ठेकेदार शामलाल को एक खाली ब्रीफकेस दे कर चौक के बाईं ओर फुटपाथ पर खड़ा कर दिया गया था. बाकी पुलिस टीम वहीं एक जगह छिप कर खड़ी हो गई थी. अपनी सरकारी गाड़ी बोलेरो पीबी 10 बीयू 8036 को भी उन्होंने छिपा दिया था.

ठीक 10 बजे तेजवीर सिंह ने शामलाल को फोन किया, ‘‘हां जी ठेकेदार साहब, हम वर्धमान चौक से थोड़ा पीछे हैं. बस 2 मिनट में पहुंच जाएंगे. आप पैसा ले कर पहुंच गए हैं न?’’

‘‘जी हां, मैं बताई गई जगह पर पैसों से भरा ब्रीफकेस लिए आप का ही इंतजार कर रहा हूं.’’ शामलाल ने कहा.

‘‘ठीक है ठेकेदार साहब, बस 2 मिनट में हम भी पहुंच रहे हैं आप तक.’’ कह कर तेजवीर ने फोन काट दिया. शामलाल ने तुरंत इस बारे में जितेंद्र सिंह को उन के मोबाइल पर बता दिया, जिस से उन्होंने अपनी पुलिस टीम को सतर्क कर दिया. मुश्किल से 5 मिनट गुजरे होंगे कि सफेद रंग की मारुति कार नंबर पीबी 10 एम 0685 फुटपाथ के पास वहीं आ कर रुकी, जहां ब्रीफकेस लिए शामलाल खड़े थे. कार के रुकते ही शामलाल तेज कदमों से उस के पास पहुंच कर कार के अंदर देखा तो उस की ड्राइविंग सीट पर एक सरदार बैठा था और बगल वाली सीट पर एक औरत बैठी थी.

शामलाल को देखते ही सरदार ने खिड़की से सिर बाहर निकाल कर कहा, ‘‘आप ठेकेदार शामलाल हो न?’’

‘‘और आप तेजवीर सिंह?’’

‘‘जी, मैं ही तेजवीर हूं, मुझ से ही आप की फोन पर बात हुई थी. मैं ने आप की आवाज पहचान ली है. अच्छा, यह ब्रीफकेस मुझे दे दो, पूरे 5 लाख हैं न?’’

‘‘उस से ज्यादा हैं, लेकिन पहले बच्चा तो दो. उस के बाद ही पैसे मिलेंगे.’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. पिछली सीट पर देखो, कितना प्यारा बच्चा है.’’ कह कर तेजवीर ने कार के अंदर की लाइट जला दी.

शामलाल ने कार की उस रोशनी में पिछली सीट पर देखा तो वहां 2 औरतें बैठी थीं, जिन में से एक ने अपनी गोद में पड़े कपड़े को हटाया तो उस की गोद में बहुत ही खूबसूरत बच्चा लेटा दिखाई दिया. शामलाल ने खुशी का इजहार करते हुए कहा, ‘‘बच्चा तो ठीक वैसा ही है, जैसा मैं चाहता था.’’

‘‘तो जल्दी से बच्चा उठाइए और पैसे मेरे हवाले कीजिए.’’ तेजवीर ने इधरउधर देखते हुए कहा.

‘‘भई ये पैसे तो मैं आप के लिए ही लाया हूं. बस मेरी मिसेज जरा आ जाएं.’’

‘‘वह कहां हैं? उन्हीं को तो संभालना है यह छोटा सा बच्चा.’’

‘‘वह अपनी बहन को लेने गई हैं. बस आती ही होंगी. आप कहें तो मैं फोन कर के पूछ लूं.’’

‘‘बिलकुल पूछ लो.’’ तेजवीर ने जल्दी से कहा.

शामलाल ने तुरंत इंसपेक्टर जितेंद्र सिंह का नंबर मिला दिया. लेकिन उन्होंने बात करने के बजाय मिस्डकाल कर के छोड़ दिया. इस के बाद तेजवीर से कहा, ‘‘फोन रिसीव करने के बजाय काट दिया. इस का मतलब वह पास में ही हैं.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं. थोड़ा इंतजार कर लेते हैं.’’ कह कर तेजवीर ने कार का इंजन बंद कर दिया.

तभी पुलिस टीम ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया. तेजवीर को समझते देर नहीं लगी कि ठेकेदार शामलाल ने ग्राहक बन कर होशियारी से उसे फंसाया है. जितेंद्र सिंह ने बच्चे को एक महिला सिपाही के हवाले कर दिया और वहीं पूछताछ शुरू कर दी. सइस पूछताछ में तेजवीर ने जो बताया, उस के अनुसार, वह पंजाब के जिला मोगा के कस्बा धर्मकोट का रहने वाला था. उस की बगल वाली सीट पर उस की पत्नी रछपाल कौर बैठी थी. वह आरएमपी डाक्टर थी. कार की पिछली सीट पर जो 2 महिलाएं बैठी थीं, उन के नाम बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर थे.

बलजिंदर कौर लुधियाना के शिमलापुरी के रहने वाले जागीर सिंह की पत्नी थी, जबकि गुरमीत कौर फरीदकोट के जैतो मंडी के रहने वाले हरभजन सिंह की पत्नी थी. उन्होंने वहीं स्वीकार कर लिया था कि वे सभी नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त के अलावा गर्भ में पलने वाले बच्चों का भी सौदा करते थे. सीआईए केंद्र ला कर रात में पूछताछ करने के बजाय इन सभी के हवालात में बंद कर दिया गया था. अगले दिन चारों को लुधियाना के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अजयपाल सिंह की अदालत में पेश कर के विस्तार से पूछताछ के लिए 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. बच्चे को अदालत के आदेश पर एक धार्मिक संस्थान के बाल संरक्षण केंद्र के हवाले कर दिया गया.

रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ में गिरफ्तार चारों अभियुक्तों ने जो बताया, उस से जो कहानी निकल कर सामने आई, वह हैरान करने वाली थी. ये लोग नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त तो करते ही थे, ये गर्भ में पल रहे बच्चों तक का सौदा कर लेते थे. तेजवीर सिंह ड्राइवर था. वह टैक्सी के रूप में दूसरों की गाडि़यां चलाता था. अपनी कार खरीद कर उसे टैक्सी के रूप में चलाना उस का सपना था, जो अरसा बीत जाने के बाद भी पूरा नहीं हो रहा था. उस की पत्नी रछपाल कौर आरएमपी (रजिस्टर्ड मैडिकल प्रैक्टीशनर) डाक्टर थी. घर के एक कमरे में उस ने अपना क्लिनिक खोल रखा था, लेकिन उस के यहां मरीज नाममात्र के ही आते थे. लिहाजा उन का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था.

करीब 2 साल पहले की बात है. बगल के गांव की एक औरत रछपाल की क्लिनिक पर आई. वह गर्भवती थी. वह इस अजन्मे बच्चे से छुटकारा चाहती थी. यानी वह अपना गर्भपात कराना चाहती थी. इस काम के लिए रछपाल कौर को अच्छाखासा पैसा मिल सकता था, लेकिन यह सब करने का उसे अनुभव नहीं था. फिर यह गैरकानूनी भी था. इसलिए वह ऐसा करने से घबरा रही थी. लेकिन उस की क्लिनिक पर मुश्किल से यह मरीज आया था, इसलिए वह उसे खाली हाथ लौटाना भी नहीं चाहती थी.

उस के दिमाग में एक तरकीब आई. उस ने उस औरत को सुझाव दिया कि वह गर्भ गिराने के बजाय अपने इस बच्चे को जन्म दे कर उसे दे दे. वह उसे सर्टिफिकेट दे देगी कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. उस ने सोचा कि इस के बाद वह बच्चा किसी बेऔलाद दंपत्ति को दे देगी. इस से वह जीव हत्या से भी बच जाएगी और किसी उदास परिवार को खुशियां मिल जाएंगी. उस औरत को रछपाल की बात जंच गई. रछपाल ने उस से जो कहा था, वह उस के लिए तैयार हो गई.

रछपाल ने औरत से बच्चे को जन्म देने के लिए कह तो दिया, लेकिन यह तय नहीं कर पाई थी कि वह उस बच्चे का करेगी क्या? इस के कुछ महीने बाद एक दिन रछपाल लुधियाना जा रही थी तो बस में उस की मुलाकात बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर से हो गई. तीनों एक ही सीट पर अगलबगल बैठी थीं. बातचीत शुरू हुई तो रछपाल ने उन्हें अपने बारे में बता कर उस महिला का किस्सा कह सुनाया. इस पर बलजिंदर और गुरमीत ने कहा, ‘‘वह बच्चा हमें दे देना, उस के लिए हम आप को एक लाख रुपए देंगे.’’

रछपाल की तो जैसे लौटरी लग गई. समय पर उस ने उस महिला की डिलिवरी करा कर उस से 2 हजार रुपए ले कर सर्टीफिकेट बना दिया कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ था. इस के बाद रछपाल ने बच्चा बलजिंदर और गुरमीत को दे कर एक लाख रुपए ले लिए. दरअसल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर का यही धंधा था. वे नवजात बच्चा खरीद कर उसे दोगुनीतिगुनी कीमत पर निस्संतान लोगों को बेच देती थीं. यही नहीं, वे गर्भवती गरीब औरतों को एडवांस दे कर उन के पेट में पल रहे बच्चों का भी सौदा कर लेती थीं.

उन के गिरोह में कई आशा वर्करों के अलावा 2 महिलाएं और शामिल थीं. उन में एक थी परमजीत कौर. वह लुधियाना के जमालपुर के रहने वाले देवेंद्र सिंह की पत्नी थी. दूसरी थी मधु वर्मा. वह लुधियाना के बसंतनगर के रहने वाले मंजीत सिंह की विधवा थी. इस के बाद बलजिंदर और गुरमीत ने रछपाल कौर को असलियत बता कर उसे भी अपने गिरोह में शामिल कर लिया. इस के बाद रछपाल ने अपने पति तेजवीर सिंह को एक पुरानी मारुति कार दिला कर उसे भी इसी धंधे से लगा दिया.

पुलिस पूछताछ में इन लोगों ने 7 नवजात बच्चों को बेचने और गर्भ में पल रहे कई बच्चों का सौदा करने की बात स्वीकार की थी. इसी पूछताछ में यह भी पता चला था कि गुरमीत कौर और बलजिंदर कौर एक बार इसी तरह के मामले में फरीदकोट पुलिस द्वारा पकड़ी गई थीं. दोनों जमानत पर छूटी थीं. फरीदकोट की अदालत में अभी भी उन पर मुकदमा चल रहा है. एक बार फिर तेजवीर सिंह, रछपाल, बलजिंदर कौर और गुरमीत कौर को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

उसी दिन समरासा चौक से परमजीत कौर और मधु वर्मा को भी हिरासत में ले लिया गया. उन्हें भी 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई. पूछताछ कर उन्हें भी अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. पुलिस के अनुसार, इस गिरोह ने पंजाब में अपना अच्छाखासा नैटवर्क बना रखा था. पुलिस इन से जुड़े तमाम लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. इन लोगों ने जो बच्चा नकली ग्राहक शामलाल को बेचना चाहा था, उसे जिला फाजिल्का के गांव आरनीया के एक परिवार से ढाई लाख रुपए में खरीदा था.

लुधियाना पुलिस के वहां पहुंचने तक वह परिवार भूमिगत हो गया था. लुधियाना पुलिस इस मामले के पीछे हाथ धो कर पड़ी है. वह इस गिरोह से जुड़े हर आदमी को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करना चाहती है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, ठेकेदार शामलाल बदला हुआ नाम है Punjab Crime

Bhopal Crime Story: आधी हकीकत आधा फसाना

Bhopal Crime Story: कुछ लोग प्राकृतिक रूप से किन्नर होते हैं, जबकि कुछ को किन्नर बनाया जाता है. अबरार उर्फ सारिका के साथ भी ऐसा ही कुछ था. फैशनेबल सारिका जब शहर की सड़कों पर निकलती थी तो मनचलों की तो छोडि़ए, कई शरीफजादों तक की नीयत डोल जाती थी. पुराने भोपाल के कैंची छोला इलाके की रहने वाली इस खूबसूरत लड़की के बारे में लोग ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. अलबत्ता कुछ लोगों को यह जरूर पता था कि सारिका हकीकत में लड़की नहीं, लड़का है, जिस का असली नाम अबरार है.

अबरार उर्फ सारिका भी उन लाखों लोगों में से एक था, जिस का जन्म तो लड़के के रूप हुआ था, लेकिन उस की शक्ल, सूरत, नजाकत और अदाएं लड़कियों जैसी थीं. आम बोलचाल की भाषा में ऐसे लोगों को किन्नर कहा जाता है. सारिका मूलरूप से कहां की रहने वाली थी, उस के मांबाप कौन थे, इस की जानकारी जिन लोगों को थी, उन में से अधिकांश अब जेल में हैं. कुछ दिनों पहले किन्नरों की एक टोली जो शहर में मंजू एंड पार्टी के नाम से जानी जाती थी, ने सारिका से ताल्लुक बढ़ाने के बाद झांसा दिया कि वह उन लोगों के साथ रहे और उन की टोली में शामिल हो जाए. काम के नाम पर उसे बधाई के समय बस उन के साथ डांस करना है. इस के एवज में उसे रोज 3 हजार रुपए मिलेंगे.

पेशकश बुरी नहीं थी. एक दिन में 3 हजार रुपए कमाना बड़ी बात थी, इसलिए सारिका मना नहीं कर पाई. मंजू एंड पार्टी भी उसे बेवजह इतना पैसा नहीं दे रही थी. दरअसल सारिका के जलवे और अदाएं देख कर पार्टी के सदस्यों को लगा था कि अगर वह भी उन के साथ आ जाए तो कमाई बढ़ जाएगी. वजह यह, हूबहू लड़कियों जैसे दिखने वाले किन्नरों की खासी पूछ रहती है. लोग इन पर पैसा लुटाने से परहेज नहीं करते. बातचीत के बाद सारिका ने टोली के साथ नाचनागाना शुरू कर दिया. साथसाथ काम करते हुए अभी कुछ ही दिन ही गुजरे थे कि सारिका पर शारीरिक रूप से किन्नर बनने का दबाव पड़ने लगा.

लेकिन सारिका के अंदर बैठे अबरार को यह मंजूर नहीं था. लिहाजा उस ने पूरी तरह किन्नर बनने से इनकार कर दिया. फलस्वरूप कुछ दिनों बाद ही मंजू एंड पार्टी ने उस पर चोरी का इलजाम लगा दिया. लेकिन तब तक अच्छाखासा पैसा कमा चुकी सारिका पर इस इलजाम का कोई खास फर्क नहीं पड़ा. वह इस की वजह भी समझ रही थी. अपने अतीत को छिपाए रखने वाली सारिका बीती 9 फरवरी, 2016 को अचानक उस समय सुर्खियों में आई जब उस ने जहांगीराबाद थाने जा कर यह रिपोर्ट लिखाई कि आधा दरजन किन्नरों ने उसे अगवा कर के किन्नर बना दिया.

उस दिन बदहवास सी सारिका जब पुलिस मुख्यालय में एसपी अंशुमान सिंह के पास पहुंची तो धारीदार फुल शर्ट और काले रंग की हाफ पैंट पहने थी. उसे देख कर एसपी ने भी यही सोचा कि इस लड़की के साथ जरूर कोई ज्यादती हुई है. बाद में पूछताछ करने पर सारिका ने पुलिस वालों को जो कुछ बताया, वह न केवल दिलचस्प था, बल्कि चौंका देने वाला भी था. सारिका के मुताबिक करीब 5 दिन पहले 6 किन्नर उस के घर आए और उसे अगवा कर के सुरैया मुजरा किन्नर के घर ले गए.

सुरैया किन्नर समुदाय का मुखिया है, इसलिए भोपाल में उसे सभी जानते थे. वह विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका है. भोपाल का मंगलवारा इलाका किन्नरों की रिहाइश के लिए जाना जाता है. यहीं सुरैया मुजरा भी रहता है. सारिका ने आगे बताया कि किन्नर उसे मंगलवारा स्थित सुरैया के अड्डे पर ले गए और बेहोश कर दिया. 5 दिन बाद जब उसे होश आया तो उस का गुप्तांग गायब था. पूछने पर किन्नरों ने उसे बताया कि हम ने तुझे भी अपने जैसा बना दिया है.

सारिका उर्फ अबरार की जिंदगी में पहले से ही गमों की कमी नहीं थी, अब उसे यह बड़ा सदमा मिला था. वैसे किन्नर और उन की दुनिया उस के लिए नए और अनजाने नहीं थे. सच तो यह है कि धीरेधीरे उन की दुनिया उस की जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही थी. ज्ञापन में उन्होंने बताया कि नकली किन्नरों के लीडर निम्मा और सुनील हैं. इन के ग्रुप में नैना, बुलबुल, तानिया, दिव्या, रूपाली, अलकिया, बिहारन, हिना, छमिया, बिल्लो, नेहा, रानी और सारिका शामिल हैं.

सारिका की बात सुन कर एसपी अंशुमान सिंह ने उसे रिपोर्ट लिखाने के लिए जहांगीराबाद थाने भेज दिया. जहां सारिका ने थाने में 6 किन्नरों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई. इन में सब से ऊपर जो नाम थे, उन में प्रमुख थे सुरैया मुजरा, खुशी और काजल. मामला पुलिस तक पहुंच गया था, इसलिए किन्नर गुटों के बीच भीतरी तौर पर तलवारें खिंचने लगी थीं.

सारिका के साथ जहां घटना घटी थी, वह इलाका मंगलवारा थानाक्षेत्र में आता था, इसलिए इस केस को मंगलवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया गया. थाना पुलिस ने मैडिकल जांच के लिए सारिका को अस्पताल भेज दिया. इस दौरान सुरैया और उस के साथी किन्नर नेताओं, पत्रकारों, अफसरों और वकीलों के चक्कर काटते रहे. क्योंकि पुलिस ने आरोपी किन्नरों सुरैया, शिल्पा, सबा, नीतू और शबाब आदि के खिलाफ धारदार हथियार से जान लेने की कोशिश करने, बंधक बनाने, मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने का मामला दर्ज कर लिया था.

उसी दिन खुद को असली बताने वाले नगर के किन्नरों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. उन का कहना था कि कुछ नकली किन्नर नाचगा कर पैसा वसूल रहे हैं, जिस से उन की छवि भी बिगड़ रही है और रोजीरोटी पर भी संकट खड़ा हो गया है. किन्नरों के एक गुट ने राजभवन जा कर राज्यपाल रामनरेश यादव के नाम एक ज्ञापन भी दिया था. सुरैया और उस के साथियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो गया तो गिरफ्तारी से बचने के लिए पांचों किन्नर फरार हो गए. लेकिन मुखबिर की सूचना पर सबा और नीतू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन का कहना था कि अबरार उर्फ सारिका अपनी मरजी से किन्नर बना है. पूछताछ के बाद गिरफ्तार हुए किन्नरों को जेल भेज दिया गया.

जो किन्नर फरार चल रहे थे, उन्होंने अपर सत्र न्यायाधीश दिनेश प्रसाद मिश्रा की अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने उन की जमानत की अर्जी खारिज कर दी. आखिरकार 24 फरवरी, 2016 को पुलिस ने किन्नर वाली गली से सुरैया और सबा को भी धर दबोचा. दोनों को अदालत में पेश कर के उन का पुलिस कस्टडी रिमांड लिया गया, ताकि उन से विस्तृत पूछताछ की जा सके.

पूछताछ के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. अब यह अदालत तय करेगी कि सारिका का गुप्तांग जबरन काटा था या इस में उस की कोई रजामंदी थी. और थी भी तो इस संबंध में कानून क्या कहता है. किन्नर जब इस तरह किसी का लिंग काट कर उसे किन्नर बनाते हैं तो कोई समारोह आयोजित नहीं करते और न ही पुलिस को सूचना देते हैं. असली किन्नर कौन और नकली किन्नर कौन, इस का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है.

बहरहाल इस घटना से मध्य प्रदेश सरकार की किन्नरों को मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिशों को झटका लगा है. पिछले साल किन्नर घरघर जा कर ताली बजाते सरकारी टैक्स वसूली करते नजर आए थे. इस साल उन्हें लोगों को हेलमेट पहनने के लिए जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. कुछ दूसरी सरकारी योजनाओं का भी प्रचारप्रसार उन से करवाया गया था. खास बात यह कि सरकार की ओर से बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में उन के लिए अलग से स्टडी सेंटर खोलने की मंजूरी दी गई है.

इस लड़ाई के बाद किन्नरों का पुराना गुट तितरबितर हो गया है, जबकि एक नया गुट वजूद में आ रहा है. बहरहाल यह किन्नर वार कब, कैसे और कहां जा कर थमेगा, यह कह पाना मुश्किल है. Bhopal Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Gujarat Fraud Case: ऐसा कोई सगा नहीं जिसे इन्होने ठगा नहीं

Gujarat Fraud Case: संजय शर्मा ने अपने भाई और अन्य लोगों के साथ मिल कर ठगी की एक कंपनी बना रखी थी. जिस के माध्यम से उन्होंने न जाने कितने लोगों को तो ठगा ही, अपने रिश्तेदार नरेश शर्मा से भी 400 करोड़ लोन दिलाने के नाम पर साढ़े 12 करोड़ रुपए ठग लिए. लेकिन इस बार ऐसे फंसे कि…

गुजरात के कच्छ जिले के रहने वाले नरेश कुमार शर्मा का कोयले का बहुत बड़ा व्यापार है. कच्छ के ही गांधीधाम में उन की बालाजी कोक इंडस्ट्री प्रा.लि., श्री कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी प्रा.लि. और तिरुपति फ्यूल्स प्रा.लि. नाम की कंपनियां हैं. इन कंपनियों को वह अपने भाई रमेश शर्मा के साथ देखते हैं. 200-250 करोड़ रुपए के टर्नओवर वाली तीनों कंपनियों में करीब 80-90 लोग काम करते हैं. नरेश शर्मा का कारोबार पहले तो अच्छा चल रहा था, लेकिन पिछले कई सालों से उन के कारोबार में अचानक गिरावट आने लगी थी, जिस की वजह से दोनों भाई परेशान रहने लगे थे.

कारोबार में उतारचढ़ाव आना स्वभाविक बात है, लेकिन ज्यादा दिनों तक गिरावट इंडस्ट्री के लिए ठीक नहीं रहती. इसलिए दोनों भाई परेशान रहने लगे थे. ऐसी हालत में उन्होंने स्थानीय बैंकों से लोन ले कर अपनी कंपनियों को पहले की स्थिति में लाने की कोशिश की. लेकिन काफी कोशिश के बावजूद भी उन की तीनों कंपनियों की दशा नहीं सुधर रही थी. उन की इंडस्ट्रीज में जो मशीनें लगी थीं, वे पुरानी हो चुकी थीं. वे उन का आधुनिकीकरण करना चाहते थे. इस के लिए भी पैसों की जरूरत थी, जो उन के पास नहीं था. वे चाह रहे थे कि अगर उन्हें कहीं से 400-500 करोड़ का लोन मिल जाए तो उन की कंपनियां फिर से लाइन पर आ जाएं. बैंकों से वह पहले ही लोन ले चुके थे, इसलिए वहां से लोन मिलने की उम्मीद उन्होंने छोड़ दी थी.

रमेश शर्मा संजय शर्मा भारद्वाज नाम के एक आदमी को जानता था. वह रमेश शर्मा के साले का बेटा था. वह पूर्वी मुंबई के कांदिवली इलाके में रहता था और कारपोरेट लोन दिलाने का काम करता था. रमेश शर्मा ने संजय शर्मा के बारे में अपने भाई नरेश शर्मा को बताया. चूंकि नरेश शर्मा को पैसों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने अपने भाई से कह दिया कि वह संजय शर्मा से इस बारे में बात कर लें. इस के बाद रमेश शर्मा ने फोन पर संजय शर्मा से बात की तो उस ने कहा, ‘‘फूफाजी, हमारी डेल्टा फिनलीज नाम की एक कंपनी है, जिस का औफिस दहिसर (पूर्वी), मुंबई में है. इस कंपनी द्वारा हम बड़ीबड़ी कंपनियों को लोन दिलाते हैं. लोन की राशि कम से कम 100 करोड़ रुपए होनी चाहिए.’’

संजय की बात सुन कर रमेश शर्मा खुश हुए, क्योंकि उन्हें 100 करोड़ से ज्यादा की जरूरत थी. इसलिए उन्होंने संजय शर्मा से कहा, ‘‘हमें 400 करोड़ के लोन की जरूरत है. यह तुम हमें दिलवा दो.’’

इस बातचीत के कुछ दिनों बाद ही संजय शर्मा की बहन के बच्चे का मुंडन था. उस की बहन दक्षिणी दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके में रहती थी. इस कार्यक्रम में संजय शर्मा के अलावा नरेश शर्मा के परिवार वालों को भी आमंत्रित किया गया था. नरेश शर्मा को चूंकि संजय शर्मा से लोन के बारे में बातचीत करनी थी, इसलिए वह भी अपने परिवार के साथ इस मुंडन में शामिल हुए.

वहीं पर नरेश शर्मा ने संजय शर्मा भारद्वाज से लोन के सिलसिले में डिटेल में बात की. उस समय संजय का भाई साकेत शर्मा भारद्वाज और उस के पिता ओमप्रकाश भारद्वाज भी मौजूद थे. संजय ने कहा, ‘‘फूफाजी, हमारी कंपनी का ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन के नाम की कंपनी के साथ टाईअप है. यह कपंनी थाईलैंड के रहने वाले डेविड वेल्हम की है. भारत में इस कंपनी की फ्रेंचाइजी हमारे पास है. मैं आप की कंपनी के पदाधिकारियों के साथ मीटिंग करा दूंगा.’’

‘‘आप जल्द से जल्द हमारी उन से मीटिंग करा दें.’’ नरेश शर्मा ने कहा.

‘‘आप चिंता न करें. मैं डेविड वेल्हम से कहता हूं कि वह समय निकाल कर जल्द ही इंडिया आ कर मीटिंग कर लें.’’ संजय शर्मा भारद्वाज ने कहा.

संजय शर्मा ने डेविड से बात करने के बाद 3 मई, 2012 को मीटिंग का कार्यक्रम निश्चित कर लिया. मीटिंग के लिए दक्षिणी दिल्ली के ओखला स्थित पांच सितारा होटल क्राउन प्लाजा को चुना गया. निर्धारित समय पर नरेश शर्मा अपने भाई और कंपनी के महत्वपूर्ण कागजातों के साथ होटल क्राउन प्लाजा पहुंच गए. संजय शर्मा भारद्वाज और उस के भाई साकेत शर्मा भारद्वाज ने नरेश शर्मा और रमेश शर्मा की मुलाकात डेविड वेल्हम से कराई. डेविड वेल्हम के साथ और भी कई लोग थे. डेविड ने उन का परिचय राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़ और एडवोकेट नीरज गुप्ता के रूप में कराया.

डेविड ने बताया कि उन की कंपनी का कारोबार पूरे संसार में फैला है, जिसे कंपनी के 70 प्रबंधकीय सदस्य देख रहे हैं. दिल्ली में कंपनी का काम राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़ और एडवोकेट नीरज गुप्ता देख रहे हैं. डेविड की बात की पुष्टि संजय शर्मा भारद्वाज ने भी की. लोन के बारे में बात हुई तो एडवोकेट नीरज गुप्ता ने कहा कि आप जो 400 करोड़ का लोन लेना चाहते हैं, उस में 300 करोड़ रुपए पर साढ़े 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और शेष 100 करोड़ रुपए पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा. यह लोन उन्हें 9 साल के अंदर अदा करना होगा. लेकिन कंपनी के नियम के अनुसार, उन्हें 400 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की संपत्ति कंपनी के पास गिरवी रखनी होगी. लोन की साढ़े 3 प्रतिशत प्रौसेसिंग फीस उन्हें अलग से देनी होगी.

डील तय हो जाने के बाद डेविड वेल्हम ने कहा, ‘‘मिस्टर नरेश शर्मा, यह काररवाई आगे बढ़ने से पहले कुछ कागजी औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी. उस के लिए हमारे सीए वगैरह आप की कंपनी का दौरा कर के कुछ कागजों को देखेंगे. इसलिए हम चाहते हैं कि आप जल्द से जल्द यह काम करा दें, ताकि आप की फाइल आगे बढ़ सके.’’

नरेश शर्मा चाहते थे कि सारी औपचारिकताएं जल्दी पूरी हो जाएं, जिस से उन्हें जल्दी लोन मिल जाए. इसलिए उन्होंने कह दिया, ‘‘बेशक, आप को जो भी डाक्यूमेंट्स देखने हैं, देख लीजिए. हमारे सभी डाक्यूमेंट्स तैयार हैं.’’

इस के बाद जून में ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन की एक टीम नरेश शर्मा की कंपनियों की जांच के लिए कच्छ पहुंच गई. टीम में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स और वकीलों के अलावा कुछ विशेषज्ञ भी शामिल थे. कंपनी ने उन की तीनों कंपनियों के स्टाक, इनकम टैक्स रिटर्न की फाइलों को देखा. टीम ने यह भी देखा कि मौजूदा समय में उन की तीनों कंपनियों की संपत्ति की वैल्यू क्या है. नरेश शर्मा लोन के एवज में जिस संपत्ति को गिरवी रख रहे थे, उस के कागजों की भी जांच की गई. इस के अलावा आसपास की बैंकों से भी यह जानने की कोशिश की गई कि उन कंपनियों पर कितना लोन बकाया है. सारी जांचें पूरी करने के बाद टीम ने अपनी रिपोर्ट कंपनी को दे दी.

टीम ने अपनी जो रिपोर्ट कंपनी को दी थी, उस में बताया गया था कि नरेश शर्मा की तीनों कंपनियों की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है. इस के अलावा उन कंपनियों पर पहले से ही बैंकों का करोड़ों रुपए बकाया है. गिरवी के जो पेपर हैं, वे भी पूरे नहीं हैं. इस स्थिति में इन कंपनियों को 400 करोड़ रुपए का लोन नहीं दिया जा सकता. संजय शर्मा भारद्वाज ने यह खबर अपने फूफा नरेश शर्मा को दी तो वह परेशान हो गए. परेशान होने की बात भी थी, क्योंकि उन्हें संजय के ऊपर भरोसा था कि वह उन का लोन मंजूर करा देगा. लोन का पैसा किसकिस मद में कितना खर्च करना है, वह इस की योजना भी बना चुके थे. इसलिए उन्होंने संजय से कहा कि लोन के कागजात पूरे करने के लिए जो भी पैसे खर्च होंगे, वह खर्च करने को तैयार हैं. किसी भी तरह वह उन्हें लोन दिला दे.

‘‘फूफाजी, टीम ने जो रिपोर्ट दी है, उस में सब से ज्यादा महत्वपूर्ण गिरवी के कागजात हैं. बस वे कागज पूरे हो जाएं तो आगे की काररवाई मैं करा दूंगा. आप जो लोन ले रहे हैं, उस की प्रौसेसिंग फीस साढ़े 3 प्रतिशत के हिसाब से 14 करोड़ रुपए होती है. ऐसा कीजिए, आप उस में से एक करोड़ रुपए जमा करा दीजिए. गिरवी के कागजों के लिए मैं किसी और से बात करता हूं.’’ संजय शर्मा भारद्वाज ने कहा.

नरेश को प्रौसेसिंग फीस देनी ही थी, इसलिए उन्होंने संजय शर्मा के कहने पर एक करोड़ का चैक परवेज के नाम से काट दिया. परवेज फरीदाबाद में रहता था और संजय का साथी था. कुछ दिनों बाद संजय शर्मा ने कहा कि उस की नोएडा के धर्मजीत नाम के एक आदमी से बात हुई है, वह अपनी प्रौपर्टी के कागज आप के लोन के लिए गिरवी रख देगा. लेकिन इस में करीब 10 करोड़ रुपए खर्च होंगे. नरेश शर्मा तैयार हो गए. उन्होंने ओखला के उसी क्राउन प्लाजा होटल में फिर से संजय शर्मा, डेविड वेल्हम, राज मल्होत्रा, पूजा कक्कड़, नीरज गुप्ता आदि के साथ मीटिंग की और 10 करोड़ रुपए गिरवी पेपरों के एवज में दे दिए.

लोन की सारी औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी थीं. नरेश शर्मा को उम्मीद थी कि अब उन्हें लोन मिल जाएगा. संजय शर्मा ने उन से 2 करोड़ रुपए और ले लिए. साथ ही यह भी कहा कि प्रौसेसिंग फीस के जो 11 करोड़ रुपए बचे हैं, वे लोन मिलने के बाद दे देना. संजय की यह बात सुन कर नरेश शर्मा खुश हुए, क्योंकि हर एक कंपनी अपनी प्रौसेसिंग फीस पहले लेती है, लेकिन ग्लोबल फाइनैंशियल कारपोरेशन कंपनी उन से प्रौसेसिंग फीस केवल संजय शर्मा की वजह से बाद में लेने की बात कह रही थी. नरेश शर्मा इस के लिए संजय शर्मा को धन्यवाद दे रहे थे.

नरेश शर्मा का कोई मामला आस्ट्रेलिया के न्यायालय में चल रहा था. चूंकि डेविड वेल्हम का अपनी कंपनी के काम की वजह से अलगअलग देशों में जाना लगा रहता था, इसलिए डेविड से अपने आस्ट्रेलिया वाले मामले पर बात की. डेविड ने भरोसा दिया कि वह इस मामले को निपटवा देगा, लेकिन दूसरे पक्ष को तैयार करने के लिए कुछ खर्चा करना होगा. नरेश शर्मा आस्ट्रेलिया वाले मामले को निपटवाना चाहते थे. उन्होंने डेविड से बात कर के उसे 50 लाख रुपए दे दिए. वह इन लोगों को कुल मिला कर साढ़े 12 करोड़ रुपए दे चुके थे. उन की संजय और अन्य लोगों से फोन पर बातचीत होती रहती थी. संजय बताता रहता था कि लोन की फाइल पर किसकिस के हस्ताक्षर होने बाकी हैं, उन का यह काम जल्द हो जाएगा.

एक दिन संजय ने उन्हें फोन कर के उन का लोन मंजूर होने की जानकारी दी, साथ ही यह भी बता दिया कि बड़ौदा की किसी कंपनी ने उन की कंपनी से लोन ले रखा था, वह उस लोन के 50 करोड़ रुपए कैश के रूप में दे रही है. जैसे ही वहां से पैसे मिलेंगे, आप के पास पहुंचा दिए जाएंगे, बाकी के पैसे आप की बालाजी कोल इंडस्ट्री के बैंक खाते में पहुंच जाएंगे. यह खबर सुन कर नरेश शर्मा और रमेश शर्मा बेहद खुश हुए. उन्होंने अपनी इंडस्ट्री के आधुनिकीकरण की जो योजना बना रखी थी, उस के साकार होने की शुरुआत होने वाली थी. अब केवल उन्हें पैसे आने का इंतजार था. पैसे मिलते ही वह यह काम कराने को आतुर थे.

लोन मंजूर होने के करीब 15 दिनों बाद भी नरेश शर्मा की कंपनी के खाते में पैसे नहीं पहुंचे, वह नकदी भी नहीं आई, जो बड़ौदा से आनी थी. तब उन्होंने संजय शर्मा से फोन पर बात की. संजय शर्मा उन्हें कोई न कोई बहाना बना कर टालता रहा. इसी तरह कई महीने बीते गए. नरेश शर्मा समझ नहीं पा रहे थे कि जब उन का लोन मंजूर हो गया है तो उसे देने में देर क्यों की जा रही है. चूंकि संजय शर्मा उन का रिश्तेदार था, इसलिए वे उस से अपनी नाराजगी भी नहीं जता पा रहे थे. किसी तरह वे उस की बातों पर विश्वास करते रहे.

शक तो उन्हें तब हुआ, जब दिसंबर, 2013 में एक दिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया. फोन के लगातार स्विच्ड औफ होने पर रमेश शर्मा भी परेशान हुए, क्योंकि संजय उन के साले ओमप्रकाश भारद्वाज का बेटा था. उन्होंने ओमप्रकाश और उन के दूसरे बेटे साकेत शर्मा को फोन मिलाया तो उन के फोन भी बंद पाए गए. नरेश शर्मा ने संजय के साथियों के फोन पर बात करनी चाही तो उन के नंबर भी स्विच्ड औफ या पहुंच से दूर बताए गए. इस से उन्हें अपने साथ धोखाधड़ी होने का अहसास हुआ.

नरेश शर्मा उन लोगों को साढ़े 12 करोड़ रुपए से अधिक दे चुके थे. यह रकम कोई मामूली रकम नहीं थी, लिहाजा उन्होंने उन लोगों की पहले तो अपने स्तर से खोजबीन की, लेकिन जब उन्हें कोई सफलता नहीं मिली तो उन्होंने सन 2014 में दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा से मुलाकात कर अपने साथ की गई धोखाधड़ी की जानकारी विस्तार से दी.

संजय शर्मा भारद्वाज, सकेत शर्मा भारद्वाज, आदि के नाम सुन कर संयुक्त आयुक्त चौंके, क्योंकि इन्हीं लोगों के खिलाफ सन 2009 में विन पौवर मार्केटिंग प्रा.लि. और सिंधी केबल एंड कंडक्टर्स प्रा.लि. नाम की कंपनियों के निदेशक अशोक कुमार अग्रवाल ने आर्थिक अपराध शाखा में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. अशोक कुमार अग्रवाल का कहना था कि उन की कंपनी को पौवर ग्रिड कारपोरेशन औफ इंडिया, आसाम स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड, डिपार्टमेंट औफ पौवर नागालैंड की विभिन्न परियोजनाओं का कौन्ट्रैक्ट मिलना था.

इस कौन्ट्रैक्ट के लिए इन कंपनियों ने 33 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी मांगी थी. यह गारंटी उन्हें 15 से 30 दिनों के अदंर देनी थी. इतनी जल्दी यह गारंटी उपलब्ध कराना उन के लिए आसान नहीं था. फिर भी वह किसी तरह से बैंक गारंटी उपलब्ध कराने की कोशिश करने लगे. उन्हीं दिनों 22 फरवरी, 2009 को उन्होंने अंगरेजी समाचार पत्र ‘द टाइम्स औफ इंडिया’ में एसएस कैपिटल एंड फाइनैंशियल सर्विस का एक विज्ञापन देखा, जिस में हर तरह के लोन, बैंक गारंटी आदि उपलब्ध कराने को कहा गया था. इस विज्ञापन में दिए गए पते पर अशोक कुमार अग्रवाल ने संपर्क किया तो उन की ओमप्रकाश भारद्वाज से बात हुई. उन्होंने ही अशोक कुमार अग्रवाल को कंपनी के औफिस में बात करने के लिए बुलाया.

इस कंपनी का औफिस दक्षिणपूर्व दिल्ली के खानपुर स्थित देवली रोड पर था. अशोक कुमार अग्रवाल औफिस पहुंचे तो वहां पर ओमप्रकाश भारद्वाज और उन के दोनों बेटे संजय शर्मा भारद्वाज और साकेत शर्मा भारद्वाज मिले. इन लोगों से उन्होंने बैंक गारंटी के संबंध में बात की तो उन लोगों ने बैंक गारंटी उपलब्ध कराने के नाम पर उन से 1,09,22,380 रुपए मांगे. रुपए मिलने के बाद उन्होंने विभिन्न 27 बैंकों की गारंटी के पेपर अशोक कुमार अग्रवाल को दे दिए.

जिन कंपनियों से अशोक कुमार अग्रवाल की कंपनी के लिए कौंट्रैक्ट की बात चल रही थी, वहां पर उन्होंने ओमप्रकाश भारद्वाज से मिले बैंक गांरटी के पेपर जमा करा दिए. बैंक गारंटी के पेपरों की जांच की गई तो वे फरजी पाए गए. उन्होंने शिकायत के लिए ओमप्रकाश भारद्वाज से संपर्क करना चाहा तो उन का और उन के बेटों का फोन बंद मिला, साथ ही खानपुर के औफिस पर भी ताला लग गया था. ठगी का अहसास होने पर अशोक कुमार अग्रवाल ने इस की शिकायत संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा से की. इस के बाद नामजद आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 406/420/467/468/471/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया और मामले की जांच सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा को सौंप दी गई थी.

धोखाधड़ी का यह मामला भी संजय शर्मा भारद्वाज और उस के साथियों द्वारा अंजाम दिया गया था, इसलिए संयुक्त आयुक्त सतीश गोलचा ने नरेश शर्मा वाले मामले को भी आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दिया. उन के आदेश पर 17 दिसंबर, 2014 को आर्थिक अपराध शाखा में संजय शर्मा भारद्वाज, साकेत शर्मा भारद्वाज, डेविड वेल्हम, नीरज गुप्ता, राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा आदि के खिलाफ भादंवि की धारा 406/420/120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस मामले की भी जांच सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा को सौंपी गई.

पुलिस आयुक्त ने इन की गिरफ्तारी पर 50 हजार का इनाम भी घोषित कर दिया था. आरोपियों ने बेहद शातिराना तरीके से करोड़ों रुपए की ठगी की थी, इसलिए जाहिर था कि वे शातिर दिमाग के थे. संयुक्त आयुक्त के निर्देश पर आर्थिक अपराध शाखा के डीसीपी मंगेश कश्यप ने इन धोखेबाजों की तलाश के लिए एसीपी एम.एस. शेखावत की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर उमेश शर्मा, अवधेश कुमार, एएसआई हरजीत सिंह, हैडकांस्टेबल रविंद्र त्यागी, बिट्टू तोमर, अजीब कुमार, कांस्टेबल संजय, धर्मेंद्र आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने नामजद आरोपियों की तलाश शुरू की. उसी बीच पता चला कि संजय शर्मा भारद्वाज के खिलाफ मुंबई, मध्य प्रदेश, जयपुर में भी धोखाधड़ी के एक दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज हैं. इन के बैंक खातों में जो पते दर्ज थे, पुलिस उन पतों पर गई तो वहां कोई नहीं मिला. इस के बाद पुलिस ने उन के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. फोन के लोकेशन के आधार पर पुलिस ने 24 जून, 2015 को फरीदाबाद के सेक्टर-31 से राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा और परवेज को गिरफ्तार कर लिया. अरुण शर्मा उर्फ राज मल्होत्रा वहां कोठी किराए पर ले कर रह रहा था.

पुलिस ने दोनों से संजय शर्मा भारद्वाज और अन्य लोगों के बारे में पता किया तो वे किसी के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए. पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. बाकी अभियुक्तों को पुलिस तलाशती रही. इसी बीच 3 महीने बाद राज मल्होत्रा उर्फ अरुण शर्मा और परवेज जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आ गए. पुलिस इन दोनों की गतिविधियों पर निगरानी रखने लगी. क्योंकि उसे उम्मीद थी कि गैंग के बाकी साथी इन लोगों से मिलने जरूर आएंगे. पुलिस सर्विलांस के जरिए संजय शर्मा भारद्वाज के फोन पर होने वाली बातों को सुन रही थी. उस का मोबाइल फोन उदयपुर के पास सुखेर कस्बे में ऐक्टिव था.

पुलिस टीम वहां पहुंची तो पता चला कि उस मोबाइल का उपयोग पवन नाम का एक ज्वैलर कर रहा था. पूछताछ में पवन ने बताया कि उस ने यह मोबाइल किसी से खरीदा था, जिस का नाम वह नहीं जानता, लेकिन वह 1-2 दिन बाद मार्केट में घूमता दिखाई दे जाता है. पुलिस के पास संजय का फोटो था ही, इसलिए टीम ने सुखेर कस्बे में डेरा डाल दिया. 10 सितंबर, 2015 को संजय अपनी एसेंट कार से बाजार आया तो कार में बैठे होने के बावजूद उसे पवन ज्वैलर ने पहचान लिया. पुलिस ने अपनी प्राइवेट गाड़ी उस की कार के पीछे लगा दी. कुछ देर बाद उस की कार सुखेर में ही कृष्णा अपार्टमेंट के आगे रुकी. जैसे ही वह कार से उतर कर अपने फ्लैट में घुसा, पुलिस ने उसे पकड़ लिया. वहां उस का कोई साथी नहीं मिला. पूछताछ में उस ने अपने किसी साथी का ठिकाना नहीं बताया.

पुलिस संजय शर्मा भारद्वाज को ले कर दिल्ली आ गई. अगले दिन उसे मुख्य महानगर दंडाधिकारी वीना रानी की अदालत में पेश कर के 4 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस उस से उस के अन्य साथियों के बारे में पता नहीं कर सकी. लिहाजा रिमांड खत्म होने पर उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस अन्य अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर सकी थी. Gujarat Fraud Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: दुष्कर्म में फंसे राजद विधायक राजवल्लभ यादव

True Crime Story: रूपम पाठक ने यौनशोषण करने वाले एक आरोपी विधायक राजकिशोर केसरी को खुद मौत के घाट उतार दिया था. जबकि दूसरे आरोपी विपिन राय को कोर्ट ने 10 साल की सजा सुना दी है.

10 मार्च, 2016 को बिहार के पूर्णिया जिले के अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन की अदालत खचाखच भरी थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन बहुचर्चित रूपम पाठक यौनशोषण कांड का फैसला सुनाया जाना था. इस केस में भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी और उन का सहायक विपिन राय आरोपी थे. इसलिए वकीलों के अलावा अन्य तमाम लोग उस दिन अदालत में पहुंच कर माननीय न्यायाधीश द्वारा सुनाए जाने वाले फैसले का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.

मामले में विधायक के फंसने के बाद दूसरी पार्टियों के नेताओं ने इसे बहुत तूल दिया था. इस केस के सहारे वे अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रहे थे. बाद में इस केस में कई उतारचढ़ाव आए. यह पूरा मामला क्या था और विधायक राजकिशोर केसरी इस केस में कैसे फंसे, जानने के लिए हमें अतीत में जाना होगा. दरअसल, रूपम अपने पति और 2 बच्चों के साथ इंफाल में रहती थी. सन 2006 में वह अपने पति अशोक पाठक और बच्चों के साथ बिहार के पूर्णिया शहर आ गई और शहर के ओली टोला में राजहंस पब्लिक स्कूल खोल लिया.

सन 2007 में स्कूल के सालाना जलसे में उस ने चीफ गेस्ट के रूप में पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी को बुलाया. वहीं से रूपम और विधायक की जानपहचान बढ़ी. विधायक के साथ उन का सहायक विपिन राय भी जलसे में पहुंचा था. जलसे में विधायक ने स्कूल के विकास के लिए विधायक फंड से रकम देने का ऐलान किया था. रूपम राजकिशोर के उसी झांसे में फंस गई थी. उसे यह लालच हो गया कि विधायक की मदद से वह अपने स्कूल की काफी तरक्की कर सकती है, जिस से उस की आमदनी में काफी इजाफा हो जाएगा. जलसा खत्म होने के कुछ दिनों बाद जब रूपम विधायक से रुपए पाने के लालच में उन के मधुबनी वाले घर पहुंची तो वहां मौजूद उस के सहायक विपिन से उस ने बात की.

विपिन ने रूपम के सामने पेशकश रखी कि यदि उसे स्कूल के लिए आर्थिक मदद चाहिए तो उसे विधायक के साथ बिस्तर पर जाना होगा. रूपम ने मना किया तो विपिन ने उसे जबरन विधायक के कमरे में धकेल कर दरवाजा बंद कर दिया. कमरे में पहले से मौजूद विधायक ने रुपए देने के बहाने उस के साथ बलात्कार किया. इतना ही नहीं, जब वह विधायक के कमरे से निकली तो विपिन ने भी डराधमका कर उस के साथ मनमानी की. उस के बाद विपिन जबतब रूपम के घर पहुंचने लगा और उसे ब्लैकमेल करने लगा.

वह रूपम से कहता था कि जैसा वह कहता है, करती रहे नहीं तो सारे शहर में उस की बदनामी करा देगा. इसी डर से रूपम कई सालों तक उन दोनों के शोषण का शिकार होती रही. फिर हिम्मत जुटा कर रूपम ने 18 अप्रैल, 2009 को विधायक राजकिशोर केसरी और उन के सहयोगी विपिन राय पर पिछले 3 सालों से दुराचार करने का आरोप लगाया. रूपम ने इस की शिकायत तत्कालीन एसपी से की थी. शिकायत के आधार पर पूर्णिया के केहाट थाने में दोनों आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. पुलिस ने सीजेएम कोर्ट में धारा-164 के तहत 18 जून, 2010 को रूपम का बयान रिकौर्ड कराया तो रूपम एफआईआर में लगाए गए आरोपों से पलट गई. इस का लाभ विधायक को मिला.

फिर एसपी ने इस मामले की जांच कराई और विधायक पर लगाए गए आरोप को बेबुनियाद करार देते हुए 7 सितंबर, 2010 को सीजेएम कोर्ट में अपनी ओर से आखिरी रिपोर्ट फाइल करते हुए जांच को बंद कर दिया. इस के 10 दिनों बाद 16 सितंबर, 2010 को रूपम ने उसी कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दायर किया, जिस में उस ने 18 जून, 2010 को धारा-164 के तहत दिए बयान को दबाव में दिया गया बयान बताया. कोर्ट ने उस की पिटीशन मंजूर कर के सुनवाई के लिए 25 मार्च, 2011 की तारीख निश्चित कर दी.

इस के बाद इस केस में नया मोड़ तब आया, जब रूपम ने दिनदहाड़े विधायक राजकिशोर केसरी की चाकू मार कर हत्या कर दी. बात 4 जनवरी, 2011 की सुबह करीब सवा 9 बजे के आसपास की है. विधायक राजकिशोर केसरी अपने समर्थकों से अपने ही घर में बातचीत कर रहे थे. उसी दौरान शाल लपेटे रूपम वहां पहुंची. वह विधायक से बोली कि उसे उन से कुछ खास बात करनी है. विधायक ने सोचा कि शायद केस के बारे में कुछ बात करने आई होगी. इसलिए वह अपने समर्थकों के बीच से उठ कर उस के साथ किनारे की ओर बढ़ने लगे.

कुछ आगे बढ़ने के बाद रूपम ने अपना शाल हटाया और दनादन चाकू से विधायक के पेट पर वार करने लगी. खून से लथपथ विधायक घायल हो कर जमीन पर गिर पड़े. आननफानन में उन के समर्थक उन्हें उठा कर सदर अस्पताल ले गए, लेकिन इलाज के दौरान सवा 10 बजे के करीब उन की मौत हो गई. विधायक के घर में घुस कर सुरक्षागार्डों और उन के समर्थकों के बीच रूपम ने उन की हत्या कर दी. रूपम जैसी पढ़ीलिखी महिला ने विधायक की हत्या कर जीवन भर जेल की सलाखों के पीछे रहने का फैसला आखिर क्यों किया? इस राज का खुलासा पुलिस और अदालत की काररवाई के दौरान हुआ.

पुलिस ने विधायक की हत्या के आरोप में रूपम पाठक को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. रूपम ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा था कि वह विधायक के खिलाफ ठीक से कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती थी. उसे इस बात की आशंका थी कि विधायक की दबंगई की वजह से उसे न्याय नहीं मिल पाएगा, इसलिए उस ने खुद ही सजा देने का फैसला किया. जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई, उस में बताया गया था कि हृदय से जुड़ी एब्डोमिनल एरोटा नस (महाधमनी) के कट जाने की वजह से विधायक की मौत हुई थी. राजकिशोर केसरी सन 2000 में पहली बार विधायक बने थे.

उस के बाद वह 4 बार पूर्णिया विधानसभा सीट से जीते थे. इस हत्याकांड से बिहार की सियासत में हलचल मच गई थी. उस समय राज्य में जदयू और भाजपा की सरकार थी. सरकार दोनों के बेहतर तालमेल के साथ चल रही थी. भाजपा विधायक पर जब रूपम ने दुराचार और 3 सालों तक यौनशोषण का आरोप लगाया था तो भाजपा की काफी फजीहत हुई थी. इस मामले की जांच के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता और उस समय के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी खुद 30 मई, 2010 को पूर्णिया गए थे. हर भाजपा नेता यही रट लगा रहा था कि रूपम ने विधायक केसरी पर मनगढं़त आरोप लगा कर उन की छवि को खराब करने की कोशिश की थी.

विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद अदालत ने रूपम के प्रोटेस्ट पिटीशन से विधायक का नाम हटा दिया. करीब एक साल तक चले गवाहों के बयान के बाद चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ने आरोपी विपिन राय के खिलाफ मामला संज्ञान में लिया. तब 19 मार्च, 2012 को विपिन राय ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया. तब से ले कर इस केस की सुनवाई अदालत में होती रही. अपर सत्र न्यायाधीश (तृतीय) मोहम्मद एजाउद्दीन ने इस केस का फैसला 10 मार्च 2016 को सुनाने का दिन मुकर्रर किया. इसलिए फैसले को जानने के लिए तमाम लोग अदालत में पहुंच गए थे.

विपिन के वकील जनार्दन प्रसाद ने कोर्ट में यह दलील दी कि आरोपी की आयु का खयाल रखते हुए उस के अपराध पर सहानुभूति बरती जाए और कम से कम सजा दी जाए. वहीं पीडि़ता रूपम पाठक के वकील ने आरोपी विपिन को कठोरतम सजा देने की मांग की थी. दोनों पक्षों को सुनने के बाद माननीय न्यायाधीश मोहम्मद एजाउद्दीन ने विपिन राय को 10 साल के सश्रम कारावास की सजा के साथ 50 हजार रुपए का जुरमाना भी भरने का आदेश दिया. अदालत ने कहा कि जुरमाने की 80 फीसदी रकम पीडि़ता को दी जाए. उधर विधायक की हत्या के मामले में निचली अदालत ने रूपम को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. वह भी जेल की रोटियां तोड़ रही है. फिलहाल रूपम भागलपुर जेल में कैद है.

विधायक ने सैक्स के चक्कर में फंस कर अपनी जान गंवाई. अब विपिन की जवानी भी अंधेरी कालकोठरी में कटेगी. वहीं रुपयों के लालच में फंस कर रूपम ने इज्जत और आगे की जिंदगी दोनों बरबाद कर ली. राजकिशोर की हत्या के बाद उन का परिवार, विपिन के जेल जाने के बाद उस का परिवार और रूपम को उम्रकैद मिलने के बाद उस का परिवार भी घर पर सजा भुगतने को मजबूर है. यानी अविवेक में उठाए गए कदम का खामियाजा तीनों के परिवार भुगत रहे हैं. True Crime Story

True Crime Story: प्रेमिका के लिए पत्नी का कत्ल

True Crime Story: सुंदर पत्नी होने के बावजूद जसवीर सिंह अपने से आधी उम्र की लड़की के इश्क में फंस कर उस से शादी का वादा कर बैठा. पत्नी के रहते शादी नहीं हो सकती थी, इसलिए उस से छुटकारा पाने के लिए उस ने जो किया, घर ही नहीं, जिंदगी भी बरबाद कर ली.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के थाना भोजीपुरा का एक गांव है कैथोला बेनीराम. जसवीर अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. गांव का वह बेहद संपन्न किसान था. 22  नवंबर को वह बरेली शहर में रह कर पढ़ रहे अपने तीनों बच्चों से मिलने जाने लगा तो पत्नी गुरप्रीत से कहा कि चाहे तो वह भी साथ चल सकती है. गुरप्रीत को भी तीनों बच्चों से मिले काफी समय हो गया था, इसलिए उस ने सोचा कि वह भी चली जाए. एक तो बच्चों से मुलाकात हो जाएगी, दूसरे वहां से वह अपनी जरूरत के सामान भी खरीद लेगी.

गुरप्रीत तैयार हो गई तो जसवीर उसे मोटरसाइकिल से बरेली ले गया. पहले गुरप्रीत ने खरीदारी की, उस के बाद दोनों बच्चों से मिलने गई. मम्मीपापा को साथ आया देख कर बच्चे काफी खुश हुए. बच्चों से मिलने में उन्हें काफी देर हो गई. गुरप्रीत की इच्छा बच्चों को छोड़ कर घर आने की नहीं हो रही थी, लेकिन जब अंधेरा होने लगा तो जसवीर ने उस से घर चलने को कहा. गुरप्रीत को भी लगा कि देर करना ठीक नहीं है, इसलिए बच्चों को प्यार कर के वह पति के साथ मोटरसाइकिल से गांव की ओर चल पड़ी. जाड़े के दिनों में दिन छोटा होने की वजह से अंधेरा जल्दी घिर आता है. जसवीर जल्दी घर पहुंचना चाहता था, इसलिए वह खेतों के बीच बनी सड़क से तेजी से घर की ओर चला जा रहा था.

रास्ता सुनसान था. जैसे ही वह गांव के पास नत्थू मुखिया के खेतों के नजदीक पहुंचा, 2 मोटरसाइकिल सवारों ने उसे ओवरटेक कर के अपनी मोटरसाइकिल उस के आगे अड़ा दी. मजबूरन जसवीर को अपनी मोटरसाइकिल रोकनी पड़ी. तभी एक और मोटरसाइकिल उस के पीछे आ कर इस तरह खड़ी हो गई कि वह उन लोगों से बच कर भाग न सके. दोनों मोटरसाइकिलों पर बैठे चारों लोग उतर कर उस के सामने आ गए. जसवीर कुछ समझ पाता, उन में से एक ने तमंचा निकाल कर उस पर गोली चला दी. गोली उसे लगने के बजाय उस के सिर को छूते हुए निकल गई. उस ने दूसरी गोली चलाई तो वह उसे लगने के बजाय मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी गुरप्रीत की कनपटी पर जा लगी. वह नीचे गिर कर तड़पने लगी.

सड़क से थोड़ी दूरी  पर जसवीर के चाचा नरेंद्र सिंह और मामा बलविंदर सिंह खेतों में पानी लगाए हुए थे. गोली चलने की आवाज सुन कर वे उस की ओर दौड़े तो उन्हें आते देख कर बदमाश भाग गए. जसवीर ने मोटरसाइकिल की हैडलाइट के उजाले में हमलावरों में से एक को पहचान लिया था. उस का नाम नबी बख्श था और वह उस से रंजिश रखता था. बाकी लोगों के चेहरों पर कपड़ा बंधा था, इसलिए वह उन्हें नहीं पहचान पाया था. बदमाशों के भाग जाने के बाद जसवीर चाचा और मामा की मदद से बुरी तरह से घायल गुरप्रीत को अस्पताल ले जा रहा था कि रास्ते में उस की मौत हो गई. लाश अस्पताल में ही छोड़ कर वह थाना भोजीपुरा पहुंचा और थानाप्रभारी अनिल कुमार सिरोही को पूरी बात बताई.

अनिल कुमार सिरोही पुलिस बल ले कर जसवीर के साथ अस्पताल पहुंचे और लाश का निरीक्षण करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर जसवीर ने नबी बख्श और उस के 3 अज्ञात साथियों के खिलाफ जो तहरीर दी, उसी के आधार पर अपराध संख्या 637/2015 भादंवि की धारा 302/307 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद अनिल कुमार सिरोही ने नामजद नबी बख्श और उस के साथियों को पकड़ने के लिए एक टीम बनाई, जिस में सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई, कांस्टेबल धीरेंद्र सिंह, संजीव कुमार आदि को शामिल किया. इस का नेतृत्व वह खुद कर रहे थे. वह टीम के साथ नबी बख्श की तलाश में उस के घर पहुंचे तो वह घर पर ही मिल गया.

वह उसे हिरासत में ले कर थाने ले आए और जब उस से जसवीर पर जानलेवा हमला और उस की पत्नी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो उस ने कहा कि जिस समय जसवीर घटना को अंजाम देने की बात कर रहा है, उस समय तो वह कुछ लोगों के साथ अपने घर पर था. अनिल कुमार सिरोही ने जब नबी बख्श के बयान की उन लोगों से तसदीक की तो बात सही निकली. तब नबी बख्श ने कहा, ‘‘साहब, कुछ दिनों पहले औटो में बैठने को ले कर मेरा जसवीर से झगड़ा हुआ था. उस झगड़े में मारपीट भी हो गई थी. उसी मारपीट का बदला लेने के लिए जसवीर उसे और उस के साथियों को झूठे मुकदमे में फंसा रहा है.’’

अनिल कुमार सिरोही को नबी बख्श निर्दोष लगा तो उन्होंने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. अब सवाल यह था कि नबी बख्श ने गुरप्रीत की हत्या नहीं की थी तो हत्या किस ने की थी? उस की जसवीर से क्या रंजिश थी? गुरप्रीत के हत्यारों को पकड़ने की पुलिस के सामने कठिन चुनौती थी. थाना भोजीपुरा पुलिस गुरप्रीत के हत्यारों की तलाश कर ही रही थी कि पंचायत चुनाव पड़ गए, जिस से इस मामले पर वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई.

चुनाव खत्म होते ही अनिल कुमार सिरोही गुरप्रीत के हत्यारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे कि 16 दिसंबर की शाम 4 बजे जसवीर घायल अवस्था में थाना भोजीपुरा पहुंचा. उस के पेट में गोली लगी थी, जहां से उस समय भी खून बह रहा था. संयोग से गोली एकदम किनारे लगी थी. एक तरह से वह मौत के मुंह में जाने से बालबाल बचा था. इस बार भी उस ने गोली मारने का आरोप नबी बख्श पर लगाया. जसवीर ने भले ही नबी बख्श पर आरोप लगा कर तहरीर दी थी, लेकिन थानाप्रभारी ने इस बार नामजद मुकदमा दर्ज कराने के बजाय अपराध संख्या 680/2015 पर भादंवि की 307 के तहत अज्ञात हमलावर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

एक तो अनिल कुमार ने नबी बख्श को छोड़ दिया था, दूसरे इस बार जब उस के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज नहीं किया तो जसवीर को यह बात बड़ी नागवार गुजरी, लेकिन वह कुछ करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए चुपचाप चला गया. अनिल कुमार सिरोही की समझ में नहीं आ रहा था कि जसवीर आखिर ऐसा कर क्यों रहा है? वह जिस तरह हमलों में बारबार बचा जा रहा था, उस से उन्हें लगा कि कहीं वह खुद तो ऐसा नहीं कर रहा? जसवीर जिस तरह नबी बख्श पर आरोप लगा रहा था, उस से उन्हें उस पर शक हुआ.

गुरप्रीत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गोली उसे कनपटी से सटा कर मारी गई थी. जबकि जसवीर का कहना था कि बदमाशों ने मोटरसाइकिल रुकवा दूर से उस पर और गुरप्रीत पर गोली चलाई थी. जसवीर और नबी बख्श के बयानों की सच्चाई पता लगाने के लिए उन्होंने दोनों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स की जांच की तो जसवीर की काल डिटेल्स में 2 मोबाइल नंबर ऐसे मिले, जिन पर बहुत ज्यादा फोन किए गए थे. उन्होंने उन नंबरों की भी काल डिटेल्स निकलवाई तो उसे देख कर उन्हें लगा कि यह सारा खेल जसवीर का ही खेला है.

उन्होंने सबइंसपेक्टर गौरव बिश्नोई के नेतृत्व में कुछ पुलिस वालों को जसवीर को गिरफ्तार करने भेज दिया. गौरव बिश्नोई जसवीर के घर पहुंचे तो वह घर में ही मिल गया. वह उसे पकड़ कर थाने ले आए. अनिल कुमार सिरोही ने जसवीर से पूछताछ शुरू की तो एक बार फिर उस ने सारा आरोप नबी बख्श के ऊपर मढ़ने की कोशिश की, लेकिन जब उसे उस के दोस्त पिंकू उर्फ महेंद्र और उस की काल डिटेल्स और मोबाइल फोन की लोकेशन दिखाई गई तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने जो बयान दिया, उस के अनुसार गुरप्रीत की हत्या की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

बरेली के थाना भोजीपुरा के गांव कैथोला बेनीराम के रहने वाले लक्खा सिंह के बेटे जसवीर सिंह की गिनती इलाके के प्रतिष्ठित और संपन्न किसानों में होती थी. उस की सौ बीघा खेतों में लहलहाती फसल स्वयं उस की संपन्नता की कहानी बयां करती थी. हर साल गन्ने की खेती से उसे लाखों की रकम मिलती थी. 18 साल पहले उस की शादी बिलासपुर की रहने वाली गुरप्रीत कौर से हुई थी. गुरप्रीत बेहद खूबसूरत थी. उस की जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर जसवीर फूला नहीं समा रहा था. दूसरी ओर गुरप्रीत भी जसवीर जैसे बांके छैलछबीले नौजवान को जिंदगी के हमसफर के रूप में पा कर अपने मातापिता की पसंद पर गर्व कर रही थी कि जिन्होंने अपनी चांद जैसी गोरी और फूल जैसी खूबसूरत बेटी के लिए हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में एक सुखीसंपन्न दामाद ढूंढ़ा था.

जसवीर से शादी के बाद गुरप्रीत को ऐसा लगा, जैसे उस की सारी मनोकामना पूरी हो गई है. जसवीर के घर किसी चीज की कमी नहीं थी. गुरप्रीत पति से जिस भी चीज की मांग करती, वह उस की हर मांग को पलक झपकते पूरा कर देता था. क्योंकि पत्नी की खुशी में ही वह अपनी खुशी समझता था. उन का दांपत्य हंसीखुशी से गुजर रहा था. देखतेदेखते कई साल गुजर गए. इस बीच गुरप्रीत 3 बच्चों की मां बन गई. उस के तीनों बेटों के नाम गुरुशांत, रौकी और शैंकी थे. बच्चे जैसेजैसे बड़े हुए, जसवीर ने उन की पढ़ाई की व्यवस्था बरेली शहर के एक नामी स्कूल में कर दी. गुरप्रीत और जसवीर चाहते थे कि उन के तीनों बेटे पढ़लिख कर उन का नाम रौशन करें.

शादी के कुछ सालों बाद जसवीर के रंगढंग में बदलाव आने लगा तो गुरप्रीत को चिंता हुई, क्योंकि जसवीर शराब पीने के साथसाथ दूसरी औरतों में रुचि लेने लगा था. उस ने पति को खानदान की इज्जत की दुहाई देते हुए समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर पत्नी की बातों का कोई असर नहीं हुआ. वह हमेशा शराब और शबाब में डूबा रहने लगा.

गुरप्रीत ने पहले जसवीर को प्यार से समझाबुझा कर रास्ते पर लाने की कोशिश की, लेकिन जब उस की आदत में कोई सुधार नहीं हुआ तो वह उस की बुराइयों का विरोध करते हुए उस से लड़नेझगड़ने लगी. जसवीर अब तक इस सब का आदी हो चुका था, इसलिए गुरप्रीत का रोकनाटोकना उसे अच्छा नहीं लगता था. उस का मानना था कि वह उस की सारी जरूरतें पूरी कर देता है, उसे किसी चीज की कमी नहीं होने देता है तो वह बेवजह उस के रास्ते में टांग अड़ाती है. मर्दों के तो 10 तरह के शौक होते हैं, फिर उस के पास कमी ही किस चीज की है. जब उस के पास इतनी दौलत है तो उसे जिंदगी में सारे शौक पूरे कर लेने चाहिए.

शादी के इतने सालों बाद और 3 बच्चे होने से गुरप्रीत में अब पहले वाली खूबसूरती नहीं रह गई थी. जबकि जसवीर कमउम्र की खूबसूरत लड़कियों के साथ मौजमस्ती करना चाहता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था. गुरप्रीत को गांव के किसी न किसी से पति की हरकतों के बारे में पता चल ही जाता था. उस समय तो वह पति की करतूतें सुन कर खून का घूंट पी कर रह जाती, लेकिन जब जसवीर घर आता तो वह उस की जम कर खबर लेती.

ऐसा रोजरोज होने से जसवीर का मन गुरप्रीत की ओर से उचट गया, अब वह घर आने से भी कतराने लगा. जबकि गुरप्रीत पति से पहले जैसा प्यार चाहती थी. लेकिन घर से बाहर मौजमस्ती कर के लौटे जसवीर के शरीर में इतनी ताकत नहीं होती थी कि वह पत्नी को संतुष्ट कर सके. वैसे भी अब उस की उम्र 55 साल के करीब थी. इस उम्र में वह जोश कहां होता है, जो जवानी के शुरुआती दिनों में होता है. नतीजतन गुरप्रीत कौर की सारी रात करवटों में बीत जाती.

अगले दिन वह पति की उलटीसीधी हरकतों का विरोध करते हुए उसे ऐसा करने से रोकने की कोशिश करती. लेकिन पत्नी के लाख विरोध के बावजूद जसवीर पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. वह वही करता था, जो उस के मन में आता था. दौलत के मद में चूर जसवीर अपनी अय्याशियों और शौक के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहता था. एक साल पहले उस की मुलाकात बरेली के थाना सीबीगंज के गांव जौहरपुर के रहने वाले ड्राइवर बालकराम से हुई. दोनों की दोस्ती परवान चढ़ी तो एक दिन वह बालकराम के साथ उस के घर चला गया. वहां उस की सयानी बेटी शानू उस के सामने आई तो जसवीर की आंख फटी की फटी रह गई.

25 वर्षीया शानू हुस्न की साक्षात मूर्ति थी. दिलफेंक स्वभाव का जसवीर उस दिन के बाद किसी न किसी बहाने उस के घर जाने लगा. शानू को समझते देर नहीं लगी कि जसवीर उस की खूबसूरती का दीवाना हो चुका है और वह उस से नजदीकियां बढ़ाने को बेताब है. बातों ही बातों में शानू जान गई कि जसवीर मोटा असामी है. उसे लगा कि अगर किसी तरह वह उस की बातों में आ गया तो वह उस के पैसों पर न केवल पूरी जिंदगी ऐश करेगी, बल्कि उस की जायदाद की मालकिन भी बन सकती है. यह सोच कर उस ने जसवीर की उम्र की परवाह न कर के उस से प्रेम में डूबी मीठीमीठी बातें करने लगी.

शानू ने निकटता बढ़ाने के लिए अपना मोबाइल नंबर जसवीर को दे दिया. फिर जसवीर शानू से फोन पर लंबीलंबी बातें करने लगा. कुछ ही दिनों में दोनों इतने नजदीक आ गए कि उन के बीच अंतरंग संबंध बन गए. जसवीर ने सूखा छावनी में हरिओम के घर में एक कमरा किराए पर ले रखा था. वहां उस का एक दोस्त पिंकू रहता था. पिंकू के साथ वह प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा करता था. शानू से मिलने के लिए यह जगह एकदम सुरक्षित थी. जसवीर जब भी बरेली आता, शानू को फोन कर के वहीं बुला लेता.

जब शानू को विश्वास हो गया कि जसवीर पूरी तरह उस के प्यार की गिरफ्त में आ चुका है और अब वह उस से हर जायजनाजायज मांगे पूरी करवा सकती है तो एक दिन प्यार के हसीन पलों के बीच उस ने जसवीर के आगे शादी का प्रस्ताव  रख दिया. जसवीर को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई. उस ने शानू को आगोश में लेते हुए शादी के लिए हां कर दी. लेकिन उस ने यह भी कहा कि शादी के पहले उसे अपनी पत्नी गुरप्रीत को रास्ते से हटाना होगा. शानू जसवीर के मुंह से पत्नी की हत्या के बाद शादी की बात सुन कर खुश हो गई. इस के बाद वह जब भी जसवीर से मिलती, उस के ऊपर शादी के लिए दबाव जरूर डालती.

सितंबर में किसी तरह गुरप्रीत को पता चल गया कि जसवीर का संबंध बरेली की किसी लड़की से है तो वह उस पर उस लड़की से संबंध तोड़ने के लिए दबाव डालने लगी. लेकिन जसवीर तो उसे ही रास्ते से हटाना चाहता था. इसलिए उस ने गुरप्रीत की हत्या की तैयारी कर ली. वह पिंकू उर्फ महेंद्र के साथ शानू से मिलने जौहरपुर गया. पिंकू जसवीर की हर बात का राजदार था. शानू को ले कर वे सीबीगंज के परसाखेड़ा इंडस्ट्रियल एरिया पहुंचे, जहां तीनों ने गुरप्रीत को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. वहां से घर लौट कर जसवीर मौके की तलाश में लग गया. गुरप्रीत को विश्वास में लेने के लिए अब वह उस से प्यार से पेश आने लगा. जसवीर का बदला व्यवहार देख कर मासूम गुरप्रीत को लगा कि शायद जसवीर की अक्ल ठिकाने आ गई है. वह उस की बातों पर विश्वास करने लगी.

21 नवंबर को जसवीर ने गुरप्रीत से बच्चों से मिलने के लिए शहर चलने को कहा तो बच्चों से मिलने के लिए लालायित गुरप्रीत उस के साथ चलने को तैयार हो गई. इस के बाद जसवीर ने पिंकू को फोन कर के बता दिया कि वह कल गुरप्रीत को ले कर शहर आएगा, इसलिए वह उस की हत्या की पूरी तैयारी कर ले. 22 नवंबर को भी जसवीर ने सुबह पिंकू को फोन किया. इस के बाद अपनी योजना के अनुसार, वह सुबह 10 बजे गुरप्रीत को ले कर घर से निकला और फतेहगंज पश्चिमी होता हुआ मिलक पहुंचा. वहां जसवीर की मामी रहती थीं. कुछ देर वहां रुक कर वह फतेहगंज और सीबीगंज होता हुआ अपने बच्चों के पास छावनी हार्डमैन पहुंचा.

गुरप्रीत को बच्चों के पास छोड़ कर वह सूखा छावनी में पिंकू से मिला और उस से कहा कि वह शाम 6 बजे गुरप्रीत को अपनी मोटरसाइकिल से ले कर सोहरा होता हुआ घर की ओर जाएगा, वह नत्थू मुखिया के खेतों के पास उस से मिले. उसी सुनसान जगह पर गुरप्रीत की हत्या करनी है. पिंकू को गुरप्रीत की हत्या की योजना समझा कर जसवीर बच्चों के पास लौट आया. शाम 6 बजे वह गुरप्रीत के साथ वापस घर जाने के लिए निकला तो रास्ते में फतेहगंज पश्चिमी चौराहे पर रुका. वहां उस ने कृष्णा से गन्ने के रुपए लिए.

उसी बीच पिंकू पहले से तय योजना के अनुसार, अगरास जाने वाले रास्ते से कैथोला बेनीराम गांव के बाहर नत्थू मुखिया के खेतों के पास पहुंच गया और जसवीर के आने का इंतजार करने लगा. जसवीर वहां पहुंचा तो पिंकू ने उसे हाथ दे कर रोक लिया. जसवीर ने गुरप्रीत को मोटरसाइकिल से उतरने के लिए कहा. अपनी हत्या से अनजान गुरप्रीत मोटरसाइकिल से उतर कर खड़ी हो गई. इस के बाद जसवीर ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की और कमर में खोंसा तमंचा निकाल कर उस की कनपटी से सटा कर गोली चला दी.

गोली लगते ही गुरप्रीत गिर कर तड़पने लगी. इस के बाद पिंकू ने तमंचा निकाला और गुरप्रीत के सीने में गोली मार दी. इस के बाद पहले से तय योजना के अनुसार, पिंकू ने अपने तमंचे में दोबारा गोली भरी और जसवीर के कान के पास लगा कर गोली चला दी, ताकि पुलिस के सामने वह खुद को निर्दोष बता कर गुरप्रीत की हत्या का आरोप अपने पुराने दुश्मन नबी बख्श पर लगा सके. इस के लिए उस ने अपनी जान की भी परवाह नहीं की.  जब पुलिस ने नबी बख्श को नहीं पकड़ा तो उस ने पेट के पास तमंचा सटा कर गोली मारी और थाने पहुंच गया. लेकिन पुलिस के सामने उस की यह चालाकी भी काम नहीं आई और वह पकड़ा गया.

अनिल कुमार सिरोही ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त उस का तमंचा नत्थू मुखिया के खेत के पास से बरामद कर लिया. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने मुकदमे में पिंकू और शानू का नाम भी जोड़ दिया है. शानू को धारा 120बी का अभियुक्त बनाया गया है. कथा लिखे जाने तक पुलिस पिंकू और शानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी. इस बीच अनिल कुमार सिरोही का तबादला हो गया था. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित