दिलजलों का खूनी प्रतिशोध – भाग 2

एक दिन नूरी मोना के घर पहुंचा तो उस ने ऐसे कपड़ों में दरवाजा खोला कि नूरी उसे देखता ही रह गया. उस ने उसे अंदर आने को कहा, लेकिन वह मोना के उस रूप में इस तरह खो गया था कि उस की बात सुनी ही नहीं. उस का मन कर रहा था कि वह मोना को बांहों में भर ले. नूरी की नजरें उस के शरीर पर ही जमी थीं. उस की नजरों का आशय समझ कर मोना मुसकरा उठी.

उस ने नूरी की आंखों के सामने हाथ नचाते हुए कहा, ‘‘कहां खो गए डियर, अंदर भी आओगे या बाहर से इसी तरह ताकते रहोगे?’’

नूरी हड़बड़ा कर बोला, ‘‘सौरी डियर. तुम इस समय कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही हो, इसलिए तुम्हें देखता ही रह गया.’’

‘‘मजाक मत करो. लड़कों की आदत का मुझे अच्छी तरह पता है. वह इसी तरह लड़कियों की तारीफ कर के उन की कमजोरी का फायदा उठाना चाहते हैं.’’ मोना ने कहा.

‘‘मैं सच कह रहा हूं मोना. तुम सचमुच बहुत खूबसूरत लग रही हो. एकदम गजब ढा रही हो.’’ अंदर आ कर नूरी ने कहा, ‘‘मोना मेरी बात तुम्हें अजीब जरूर लगेगी, लेकिन सच्चाई यही है कि मेरी तुम्हारे प्रति चाहत बढ़ती जा रही है. मुझे तुम से लगाव सा हो गया है. यह भी कहा जा सकता है कि मुझे तुम से प्यार हो गया है. अगर ऐसा है तो क्या तुम मेरे प्यार को स्वीकार करोगी?’’

मोना ने मुसकराते हुए अपना एक हाथ उस के कंधे पर रख कर कहा, ‘‘नूरी, मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है. तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’’

मोना के इन शब्दों ने नूरी के मन पर कुछ ऐसा असर किया कि उस ने  उसे अपनी बांहों में भर लिया और अपने होठों की मुहर उस के गालों पर लगा दी. मोना भी पीछे नहीं रही. लेकिन जब नूरी ने इस मौके का फायदा उठाना चाहा तो मोना ने खुद को बेकाबू होने से रोका और नूरी को धक्का दे कर अलग किया.

मोना की यह हरकत नूरी को अच्छी तो नहीं लगी, लेकिन उस समय उस ने बुरा नहीं माना. उस ने सोचा, आज यहां तक पहुंचे हैं तो किसी दिन हद भी पार कर लेंगे. दूसरी ओर मोना सामान्य हुई तो बोली, ‘‘प्लीज नूरी, यहां तक तो ठीक है, लेकिन इस के आगे बढ़ने की कभी कोशिश मत करना.’’

‘‘ठीक है, लेकिन जब हमारे दिल मिल चुके हैं तो शरीरों के मिलने में क्या दिक्कत है?’’

‘‘नहीं, मैं इसे अच्छा नहीं समझती. शारीरिक मिलन के बाद दिल का नहीं, शरीर का प्यार रह जाता है, जो धीरेधीरे खत्म हो जाता है. प्रेमी जब भी मिलते हैं, शरीर के लिए मिलते हैं. मुझे यह पसंद नहीं है.’’

मोना ने नूरी को कुछ इस तरह समझा दिया कि वह बुरा भी न माने और उसे अपनी जरूरत पूरी करने का जरिया भी न बनाए. क्योंकि मोना उस के साथ प्यार का खेल कुछ इस तरह खेल रही थी कि उसे इस खेल का कभी अहसास नहीं हो सका.

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नूरी के साथ ही हामिद भी उसी बार में वेटर था. यही नहीं, वह भी उसी रैनबसेरा में सोता था, जहां नूरी सोता था. वह रहने वाला भी उसी के मोहल्ले का था, इसलिए दोनों में पक्की यारी थी. यही वजह थी कि दोनों एकदूसरे से कोई भी बात नहीं छिपाते थे. ऐसे में नूरी और मोना के प्रेमसंबंध वाली बात भला हामिद से कैसे छिपी रह सकती थी. जब हामिद ने नूरी से कहा कि वह उसे भी मोना से मिलवा दे तो वह मना नहीं कर सका.

इस के बाद नूरी मोना से मिलने गया तो साथ में हामिद को भी ले गया. मोना को देख कर हामिद भी नूरी की तरह सुधबुध खो बैठा. वह अपने लिए जिस तरह की लड़की की कामना करता था, मोना हुबहू वैसी थी. हामिद जब उसे एकटक देखता रहा गया तो उस की इस हालत पर नूरी ने मुसकराते हुए उस के कानों के पास फुसफुसा कर कहा, ‘‘क्यों बेटा, मेरी पसंद देख कर होश उड़ गए न?’’

‘‘हां यार, यह तो सचमुच बहुत सुंदर है. तेरी तो किस्मत खुल गई.’’

‘‘किस्मत अच्छी है. तभी तो इस नूरी को इतना खूबसूरत नूर मिला है’’

दोनों को खुसरफुसर करते देख मोना ने पूछा, ‘‘तुम दोनों आपस में इस तरह क्या खुसरफुसर कर रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं मोना, तुम्हें देख कर यह होश खो बैठा है, इसलिए इसे होश में ला रहा था.’’

यह सुन कर मोना खिलखिला कर हंस पड़ी. उस की हंसी ने दोनों के दिलों पर तीर चला दिए. उस दिन हामिद और मोना में भी दोस्ती हो गई. उस के बाद हामिद भी मोना से अकेले में मिलने लगा. उसे भी मोना से मोहब्बत हो गई तो वह भी अपनी कमाई उस पर लुटाने लगा. मोना उस से भी बड़े प्यार से पेश आती थी, जिसे हामिद अपने लिए प्यार समझने लगा था. दोनों दोस्त एक ही लड़की के साथ समय बिताने के साथसाथ जिंदगी बिताने के सपने देखने लगे थे. जबकि मोना को उन दोनों में से किसी से प्यार नहीं था.

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नूरी और मोना के बीच चल रहे चक्कर के बारे में जल्दी ही उस के तीसरे दोस्त विश्वजीत सिंह को भी पता चल गया. वैसे भी इस तरह की बातें कहां जल्दी छिपती हैं. खास कर दोस्तों के बीच तो बिलकुल नहीं.

विश्वजीत सिंह उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के थाना मरहद के गांव डंडापुर का रहने वाला था. उस के पिता ओमप्रकाश सिंह एक स्थानीय इंटर कालेज में चपरासी थे. परिवार में मां ममता के अलावा एक बड़ी बहन संध्या और एक छोटा भाई सर्वजीत था. संध्या का विवाह हो चुका था, जबकि सर्वजीत अभी पढ़ाई कर रहा है.

22 वर्षीय विश्वजीत बीकौम कर के दिल्ली आ गया था. दिल्ली में उसे अजमेरी गेट के पास एक रैनबसेरा में केयरटेकर की नौकरी मिल गई. उसे वहां से जो भी वेतन मिलता था, वह उसे अपने ऊपर खर्च करता था. उसे महंगे कपड़े पहनने और अच्छा खानेपीने का शौक था. ठीकठाक कपड़े पहन कर वह किसी रईसजादे से कम नहीं लगता था. इस की एक वजह यह भी थी वह स्मार्ट तो था ही, पढ़ालिखा भी था.

विश्वजीत को देख कर लोग यही अंदाजा लगाते थे कि यह किसी अच्छे घर का लड़का है. वह रहता भी रौब के साथ था. दबंगई उस के स्वभाव में थी, इसलिए जल्दी उस से कोई उलझने की कोशिश नहीं करता था. वैसे भी वह किसी से नहीं डरता था.

उसी रैनबसेरा में सोने आते थे, जहां का केयरटेकर विश्वजीत था. इस तरह रोजरोज मिलने जुलने में नूरी किसी लड़की से मिलताजुलता है, इस बात की जानकारी विश्वजीत को हुई तो उस ने भी नूरी से कहा कि वह उसे भी उस लड़की से एक बार मिलवा दे. नूरी उसे इनकार नहीं कर सकता था, इसलिए उसे विश्वजीत को मोना से मिलवाना ही पड़ा.

शक का नासूर : फोन ने घोला जिंदगी में जहर

साइको डैड : शक के फितूर में की बेटी की हत्या – भाग 1

दोपहर बाद बैंक की छुट्टी होने पर पौने 3 बजे के आसपास यशपाल सिंह जगदीशपुरा स्थित अपने घर पहुंचे तो जेब  से चाबी निकाल कर कमरे का ताला खोला और अंदर जा कर हाथ में लिया सामान टेबल पर रख दिया. इस के बाद उन्होंने बेटी के कमरे की ओर देखा. दरवाजा बंद था, इसलिए वह होठों ही होठों में बड़बड़ाए, ‘‘हरमीत अभी तक सो रही है?’’

हरमीत को आवाज देते हुए उन्होंने दरवाजे को धकेला तो वह खुल गया. कमरे में अंधेरा था. लाइट जलाने के बाद जैसे ही उन की नजर बेड पर पड़ी, भय से उन का शरीर कांप उठा और मुंह से चीख निकल गई. बेड पर उन की 17 वर्षीया बेटी हरमीत कौर की खून से लथपथ लाश पड़ी थी.

यशपाल सिंह भाग कर बेड के पास पहुंचे और हरमीत की नब्ज टटोली कि शायद वह जिंदा हो लेकिन हरमीत मर चुकी थी. उस की गरदन आधी से ज्यादा कटी हुई थी, बाकी में बीचोबीच एक चाकू घुसा हुआ था. गरदन की कटी नसें स्पष्ट दिखाई दे रही थीं. किसी ने बड़ी बेरहमी से उस की हत्या कर दी थी.

यशपाल सिंह लाश के पास बैठ कर रोने लगे. काफी देर तक रोने के बाद मन थोड़ा हलका हुआ तो उन्हें लगा कि इस तरह रोने से काम नहीं चलेगा. इस हत्या की सूचना पुलिस को देनी चाहिए. वह उठे और ताला लगा कर थाना कोतवाली पटियाला की ओर चल पड़े.

कोतवाली पहुंच कर यशपाल सिंह ने बेटी की हत्या की सूचना इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा को दी तो वह हैरान रह गए. क्योंकि यशपाल सिंह भीड़भाड़ वाले जिस इलाके में रहते थे, वहां दिनदहाड़े इस तरह घर में घुस कर हत्या करना आसान नहीं था.

बहरहाल, एएसआई प्रीतपाल सिंह और हेडकांस्टेबल कुलदीप सिंह को साथ ले कर इंसपेक्टर जसविंदर सिंह यशपाल सिंह के घर जा पहुंचे. वह एक शानदार कोठी थी. बरामदे में पहुंच कर इंसपेक्टर जसविंदर सिंह ने पूछा, ‘‘लाश कहां है?’’

‘‘जी, उधर कमरे में.’’ कह कर यशपाल ताला खोल कर पुलिस वालों को उस कमरे में ले गए, जहां बेड पर हरमीत कौर की लाश पड़ी थी.

मृतका के सिरहाने बेड पर कापीकिताबों का ढेर लगा था. एक किताब हाथ के पास पड़ी थी. शायद वह पढ़ते पढ़ते सो गई थी. सोते हुए में ही उस की हत्या की गई थी. उस का गला सामने की ओर से काटा गया था. चाकू अभी भी उस की गरदन में घुसा था. पुलिस ने देखा, बेड के आसपास कहीं खून नहीं था. चित्त पड़ी होने की वजह से शायद गरदन से बहा खून कपड़ों में समा गया था.

इंसपेक्टर जसविंदर सिंह टिवाणा ने इस हत्या की सूचना पुलिस अधीक्षक हरदयाल सिंह मान, डीएसपी (सिटी) केसर सिंह को देने के साथ क्राइम टीम को फोन कर के घटनास्थल पर बुला लिया था.

लाश का निरीक्षण करते समय इंसपेक्टर जसविंदर सिंह को मृतका की दाईं मुट्ठी में कुछ बाल दिखाई दिए. इस का मतलब मृतका ने हत्यारे से संघर्ष किया था. लेकिन बिस्तर पर ऐसे कोई चिह्न नहीं दिखाई दे रहे थे. उन्होंने बेड पर रखी कापीकिताबों के ढेर में से एक नोटबुक उठा कर देखी तो उस के प्रथम पृष्ठ पर लिखा था, ‘लड़ना नहीं, आपस में प्यार से मिल कर रहना.’

इस के बाद उन्होंने अन्य नोटबुक उठा कर देखीं तो यही लाइन लगभग सभी कापी किताबों में लिखी थी. मृतका ने अपनी सभी कापी किताबों में यह लाइन क्यों लिखी थी, यह इंसपेक्टर जसविंदर सिंह की समझ में नहीं आया?

क्राइम टीम ने अपना काम कर लिया तो घटनास्थल की अपनी सारी काररवाई निपटा कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर मृतका हरमीत कौर के पिता यशपाल सिंह की ओर से हत्या का यह मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. यह 22 फरवरी, 2014 की बात है.

पूछताछ में यशपाल सिंह ने घटना के बारे में जो बताया था, पुलिस को उस में तमाम पेंच नजर आ रहे थे. उन्होंने बताया था कि जुलाई, 2008 से उन का अपनी पत्नी परमिंदर कौर से झगड़ा चल रहा था. वह अलग रहती थी. उस ने तलाक ले लिया था. उन की 2 संतानें थीं, 18 वर्षीया बेटी हरमीत कौर, जिस की हत्या हो चुकी थी और 16 वर्षीय बेटा रिपुदमन सिंह. पहले दोनों बच्चे मां के साथ ही रहते थे.

अक्तूबर, 2013 में अदालत के सुझाव पर बेटी हरमीत कौर उन के पास रहने आ गई थी. लेकिन अदालत ने हरमीत को पिता के साथ रहने का कोई लिखित आदेश नहीं दिया था. बस सुझाव दिया था. इसी सुझाव पर मांबाप का झगड़ा खत्म करने की गरज से हरमीत पिता के पास रहने आ गई थी.

यशपाल सिंह मालवा ग्रामीण बैंक बुग्धाकलां में असिस्टेंट मैनेजर थे. उन की पत्नी परमिंदर कौर भी माल रोड, पटियाला में कोऔपरेटिव बैंक में मैनेजर थीं. मृतका हरमीत कौर आईआईटी की तैयारी कर रही थी, इसलिए रातरात भर जाग कर पढ़ती थी.

जगदीशपुरा कालोनी वाली जिस कोठी में यशपाल सिंह बेटी हरमीत कौर के साथ रह रहे थे, वह उन के बहनोई रणजीत सिंह चहल की थी. चूंकि वह परिवार के साथ कनाडा में रहते थे, इसलिए उन्होंने यह कोठी यशपाल सिंह को देखभाल के लिए सौंप रखी थी. पत्नी से मनमुटाव होने के बाद गुरुनानक नगर की टैंक वाली गली की अपनी कोठी छोड़ कर वह इसी कोठी में रहने आ गए थे. जबकि उन की पत्नी परमिंदर कौर उसी गली में किराए पर रह रही थीं.

पूछताछ में यशपाल ने पुलिस को बताया था कि सुबह जब वह बैंक जाने के लिए घर से निकले थे तो हरमीत सो रही थी. सामने वाले दोनों कमरों के बीच एक दरवाजा था. एक कमरे में हरमीत सोती थी और दूसरे में वह खुद सोते थे. हरमीत बाहर वाला दरवाजा अंदर से बंद कर लेती थी. बीच वाला दरवाजा खुला रहता था. सुबह जाते समय यशपाल अपने कमरे के दरवाजे पर ताला लगा देते थे. हरमीत सो कर उठती थी तो अपना दरवाजा खोल कर बरामदे में आ जाती थी और पिता के कमरे का ताला खोल देती थी.

दिन के 11 बजे के बाद साफसफाई वाली आती थी. उस समय तक हरमीत जाग गई होती थी. लेकिन सफाई वाली के अनुसार उस दिन वह काम पर आई तो हरमीत सो कर नहीं उठी थी.

एहसान के बदले मिली मौत

पवित्र प्रेम : गींदोली और कुंवर जगमाल की प्रेम कहानी – भाग 1

सावन का महीना था. बरखा की रिमझिमरिमझिम फुहारें पड़ रही थीं. महेवा की धरती हरीभरी हो उठी थी. पेड़ों पर नएनए पत्ते उस हरियाली में एक नया उजास पैदा कर रहे थे. मंदमंद चलती पवन और आकाश में तैरती बादलों की घटाओं ने सिणली के तालाब के आसपास की सुंदरता चौगुनी कर दी थी. बादलों की गर्जना के साथ मोरों की पीऊपीऊ मन को मोह रही थी.

तालाब के किनारे के पेड़ों पर पड़े झूलों पर झूला झूलते हुए महिलाएं यानी तीजनियां समूह में सावन के गीत गा रही थीं. बीचबीच में उन की हंसी की खिलखिलाहट सिणाली के तालाब पर इत्र सी तैर रही थी. अचानक ही उन के झूले रुक गए और झूला झूल रही महिलाएं ‘बचाओ…बचाओ…’ चिल्लाने लगीं.

वातावरण में गीतों की जगह चीखपुकार गूंजने लगी. क्योंकि गीत गा रही तीजनियों को पाटण का सूबेदार  हाथी खान अपने साथ ले जा रहा था. जब तक गांव वालों को इस बात की खबर लगती, तब तक हाथी खान उन महिलाओं को ले कर जा चुका था.

गांव के लोग हाथ मलते रह गए. उस समय महेवा के राजकुमार जगमाल अपनी रियासत से बाहर गए हुए थे. उन के अलावा और किसी में इतना साहस नहीं था कि वह हाथी खान का पीछा करता. हाथी खान के इस दुस्साहस से गांव वाले बहुत नाराज थे. यह 15वीं शताब्दी की बात है.

उस समय राजकुमार जगमाल के पिता रावल माला महेवा में तप कर रहे थे. यही रावल माला अपनी भक्तिमती पत्नी रूपांदे की संगति में रावल मल्लीनाथ कहलाए थे. आज उन्हीं के नाम पर यह प्रदेश मालानी कहलाता है. वह तपस्वी और संत के अलावा बड़े ही बलशाली योद्धा भी थे.

राजकुमार जगमाल भी पिता की तरह युद्ध कला में बड़े ही निपुण और बलशाली योद्धा थे. महेवा लौटने पर जब उन्हें पता चला कि पाटण का सूबेदार हाथी खान उन के राज्य की महिलाओं का अपहरण कर ले गया है तो उन का खून खौल उठा.

उन्होंने अपने प्रधान हुल भौपजी से कहा, ‘‘ठाकुर सा, हाथी खान ने हमारे राज्य की महिलाओं का अपहरण कर के हमारी इज्जत उतार दी है. हमें उन महिलाओं को मुक्त करा कर हाथी खान को सबक सिखाना जरूरी हो गया है.’’

भौपजी नम्रता से बोले, ‘‘हम उन महिलाओं को मुक्त तो कराएंगे ही, साथ ही इस का बदला लेने के लिए हाथी खान को सबक भी सिखाएंगे. मैं वादा करता हूं कि अहमदाबाद की छाती चीर कर उन महिलाओं को महेवा ले आऊंगा. वे एक बार फिर बेखौफ हो कर सिणली तालाब की पाल पर झूले झूलती दिखेंगी.

मगर राजकुमार जगमाल को चैन कहां था. जब तक वे महिलाएं सकुशल घर नहीं आ जातीं, तब तक उन्होंने पगड़ी न बांधने, हजामत न बनाने और धुले कपड़े न पहनने की प्रतिज्ञा कर ली थी. उसी समय सिर पर काला कपड़ा बांध कर वह अहमदाबाद पर चढ़ाई करने की योजना बनाने लगे.

उधर हाथी खान ने उन महिलाओं को पाटण के किले में कैद कर दिया था. दरअसल हाथी खान सिपहसालार था, जो अहमदाबाद के अपने सुल्तान महमूद बेग को सदैव खुश रखने में लगा रहता था. अपने आका को खुश करने के लिए ही उस ने यह काम किया था. यद्यपि उस के सैनिक चाहते थे कि इन सुंदर महिलाओं का बंटवारा कर लिया जाए, पर उस ने किसी की भी नहीं सुनी. उस ने साफ साफ कह दिया था कि सुल्तान महमूद बेग जैसा कहेंगे, वैसा ही किया जाएगा.

उधर पाटण के किले में बंद महेवा की उन तीजनियों ने अन्नजल लेने से मना कर दिया था. हाथी खान ने उन्हें सुल्तान महमूद बेग को खुश करने का लालच दिया. उस ने कहा कि अगर वे ऐसा करती हैं तो पूरी जिंदगी शानोशौकत के साथ कटेगी. तीजनियों ने हाथी खान की बात नहीं मानी. उन्होंने हाथी खान से साफ कह दिया था कि वे मर जाएंगी, लेकिन परपुरुष को अपना शरीर नहीं छूने देंगी.

अहमदाबाद में सुल्तान महमूद बेग की बेटी गींदोली को जब पाटण के किले में महेवा से अपहरण कर के लाई तीजनियों को कैद में रखने की सूचना मिली तो वह अपने पिता महमूद बेग से बोली, ‘‘अब्बा हुजूर, सुना है कि आप के सिपहसालार हाथी खान ने महेवा लूटा है और लूट का बहुत सा माल ला कर पाटण के किले में रखा है?’’

‘‘तुम ने ठीक सुना है शहजादी. हाथी खान एक बहादुर सिपाही है. उस ने हमारा नाम रोशन किया है.’’

‘‘पर अब्बा हुजूर, सुना है कि लूट में वह वहां से औरतें भी लाए हैं और उन्हें आप के हरम में भेजना चाहते हैं. यह तो ठीक नहीं है अब्बा हुजूर.’’

‘‘मर्दों की बातों में दखलंदाजी नहीं किया करते शहजादी.’’ महमूद बेग ने यह बात नाराजगी से कही, पर जब उस ने बेटी की आंखों में आंसू देखे तो वह तड़प उठा. वह उसे समझाते हुए बोला, ‘‘रोओ मत, रोओ मत मेरी दुलारी. अच्छा यह बताओ कि तुम चाहती क्या हो?’’

‘‘मैं उन औरतों से मिलना चाहती हूं अब्बा हुजूर. सुना है, उन्होंने अन्नजल त्याग दिया है. अगर उन्होंने खानापीना छोड़ दिया है तो वे फिर जिंदा कैसे रहेंगी अब्बा?’’ गींदोली ने भोलेपन से पूछा तो महमूद बेग ने कहा, ‘‘यही तो मुसीबत है इन हिंदू औरतों की, मरने पर तुल जाती हैं. किसी की सुनती ही नहीं हैं.’’

अब्बू के मना करने के बावजूद शहजादी गींदोली पाटण किले में कैद तीजनियों से मिलने जा पहुंची.

शहजादी सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी थी, तकलीफ कैसी होती है, वह जानती ही नहीं थी. इसलिए बंदी तीजनियों को देख कर वह सिहर उठी. उस ने एक रूपसी से कहा, ‘‘क्यों सता रही हो अपने आप को बहन. मान जाओ इन लोगों की बात. औरत को आखिर क्या चाहिए. घरबार, धनदौलत और सुखी जीवन. यहां तुम्हें यह सब कुछ मिलेगा. यहां तुम्हें महेवा से भी ज्यादा सुख मिलेगा…’’

शहजादी गींदोली अपनी बात पूरी कर पाती, उस के पहले ही रूपसी का झन्नाटेदार थप्पड़ शहजादी के गाल पर पड़ा. थप्पड़ लगते ही शहजादी का गाल लाल हो गया. उसे थप्पड़ मारने के बाद रूपसी ने थू कह कर मुंह बनाते हुए जमीन पर थूक दिया.

सैनिकों ने रूपसी की पिटाई शुरू कर दी, पर गींदोली ने उन्हें रोक दिया. शहजादी गींदोली ने समझाबुझा कर आखिरकार उन्हें खाना खाने के लिए मना ही लिया. उन्होंने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह उन्हें यहां से निकलने में मदद करेगी. अपने अब्बा से कह कर आखिरकार शहजादी ने उन्हें कैदखाने से निकलवा कर पाटण के बाग में रहने की व्यवस्था करा दी. इस के अलावा उन्हें अच्छे कपड़े भी उपलब्ध करा दिए, ताकि रूपसियों का मन बदल जाए.

सुल्तान महमूद बेग भी खुश था. हाथी खान अपनी तरक्की का इंतजार कर रहा था. उस ने पाटण के बाग की चौकसी के पुख्ता इंतजाम कर दिए थे.

                                                                                                                                     क्रमशः

दिलजलों का खूनी प्रतिशोध – भाग 1

दो पहर का खाना खा कर आराम कर रही मोना की नजर दीवार घड़ी पर पड़ी तो वह झटके से उठी और अलमारी खोल कर अपनी पसंद के कपड़े निकालने लगी. उन कपड़ों को पहन कर वह आईने के सामने खड़ी हुई तो  अपने आप पर मुग्ध हो कर रह गई. सफेद टौप और काली स्किन टाइट जींस में वह सचमुच बहुत खूबसूरत लग रही थी. अपनी उस खूबसूरती पर उस के होंठ स्वयं ही खिल उठे.

मोना तैयार हो कर घर से निकली तो खुद ब खुद उस के कदम उस ओर बढ़ गए, जहां वह रोज अपने ब्वायफ्रेंड विश्वजीत से मिलती थी. जब वह उस जगह पहुंची तो विश्वजीत उसे बैठा मिला. वह उस का इंतजार कर रहा था. वह दबे विश्वजीत के पीछे पहुंची और उस की आंखों को अपनी दोनों हथेलियों से बंद कर लिया. अचानक घटी इस घटना से विश्वजीत हड़बड़ाया जरूर, लेकिन तुरंत ही जान गया कि मोना आ गई. उस ने मोना के हाथों को आंखों से हटा कर उस की ओर देखा तो देखता ही रह गया.

मोना ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हो, पहले कभी नहीं देखा क्या?’’

‘‘क्या बात है भई, आज तो तुम बिजली गिरा रही हो?’’

‘‘लगता है, आज सुबह से तुम्हें बेवकूफ बनाने के लिए कोई और नहीं मिला.’’

‘‘मोना, मैं तुम्हें बेवकूफ नहीं बना रहा हूं. सचमुच आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो. हीरे को अपनी चमक का अहसास थोड़े ही होता है, उसे तो जौहरी ही पहचानता है.’’

‘‘अच्छा जौहरी साहब, अब आप ने हीरे की पहचान कर ली है तो अब जरा यह भी बता दीजिए कि हीरा असली है या नकली.’’

‘‘हीरा नकली होता तो मैं उसे हाथ ही न लगाता. हां,  हीरा भले ही असली था, लेकिन अभी तक तराशा नहीं था, इसलिए पत्थर जैसा था. अब मैं ने इसे तराश दिया है तो इस की खूबसूरती और चमक दोगुनी हो गई है.’’ विश्वजीत ने मोना की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

मोना को उस की बात की गहराई समझते देर नहीं लगी. इसलिए लजा कर उस ने नजरें झुका कर कहा, ‘‘यह हीरा तुम्हारे गले में सजना चाहता है.’’

विश्वजीत ने मोना का हाथ अपने हाथ में ले कर बड़े विश्वास के साथ कहा, ‘‘मोना, हम दोनों की यह चाहत जरूर पूरी होगी. हम अपने बीच किसी को नहीं आने देंगे. अगर किसी ने आने की कोशिश की तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा.’’

मोना विश्वजीत के प्यार के जुनून को देख कर जहां खुश हुई, वहीं उन दोनों को छिप कर देख रही 2 आंखों में खून उतर आया. इस के बाद उस ने जो निश्चय किया, वह विश्वजीत के लिए ठीक नहीं था. आगे क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा इस कहानी के पात्रों के बारे में जान लेते हैं.

मोना दिल्ली के कड़कड़डूमा की रहने वाली थी. उस के पिता वकालत करते थे. वह हिंदू थे, जबकि उन की पत्नी यानी मोना की मां मुस्लिम थीं. वकील साहब की यह दूसरी शादी थी. मोना उन की एकलौती संतान थी, जिसे वे बड़े लाडप्यार से पाल रहे थे. मांबाप के लाडप्यार और विचारों का मोना पर पूरा असर था. लड़कों से दोस्ती करना उन के साथ घूमना उस के लिए आम बात थी.

पहले तो मोना का मन पढ़ाई में खूब लगता था. लेकिन जैसे ही उस ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा और लड़कों ने उसे खूबसूरत होने का अहसास कराया, उस का मन पढ़ाई से उचटने लगा. वह सतरंगी सपनों की दुनिया में खोई रहने लगी. महानगर में पलबढ़ रही मोना के मन में भी अन्य लड़कियों की तरह अच्छे रहनसहन की ललक थी.

यही वजह थी कि वह अपनी सहेलियों को कईकई लड़कों के साथ घूमतेफिरते देखती तो उन की किस्मत से जल उठती. जबकि उस की वे सहेलियां उस की खूबसूरती के आगे कुछ भी नहीं थीं. इतनी खूबसूरत होने के बावजूद भी मोना का कोई ब्वायफ्रेंड नहीं था. जबकि उस की उन सहेलियों के ब्वायफे्रंड की लिस्ट काफी लंबी थी.

मोना की मां की कोई दूर की रिश्तेदारी उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के थाना सदर बाजार के शहबाजनगर निवासी बाबू खां के यहां थी. उन का बेटा नूरी उर्फ नूर मियां नई दिल्ली के जीबी रोड स्थित एक बार में वेटर का काम करता था. दिन में वह नौकरी करता था और रात में अजमेरी गेट के पास के एक रैनबसेरा में गुजारता था. रिश्तेदारी होने की वजह से नूरी का मोना के यहां आनाजाना था.

इसी आनेजाने में नूरी मोना को पसंद करने लगा. वह जब भी मोना के यहां आता, उस के आसपास ही मंडराता रहता. नूरी को पता ही था कि मांबाप के काम पर जाने के बाद मोना घर में अकेली रहती है, इसलिए वह ऐसे ही समय उस के पास आनेजाने लगा, जब वह घर में अकेली होती. ऐसे में वह उस से खूब बातें करता और घुमाने भी ले जाता, जहां उसे अच्छीअच्छी चीजें खिलाता. इस से मोना को उस का साथ अच्छा लगने लगा. मोना इतनी भोली नहीं थी कि यह न समझ पाती कि नूरी उस में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है? सब कुछ जानते हुए  वह उस की ओर आकर्षित होने लगी.

नफरत की गोली

मिसकाल बनी काल

नादानी का नतीजा

प्यार ने बना दिया नागिन