आवारगी में गंवाई जान – भाग 1

रात साढ़े 9 बजे के आसपास कुसुम्ही जंगल के वन दरोगा राकेश कुमार गश्त करते हुए बुढि़या माई दुर्गा मंदिर रोड पर मंदिर से थोड़ा आगे बढ़े थे कि वहां लगे खड़ंजे पर उन्हें एक लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने टार्च की रोशनी में देखा, लाश महिला की थी. वह हरा सूट पहने थी. उस के दोनों पैरों में चांदी की पाजेब थी. लाश के पास ही एक पीले रंग की शौल पड़ी थी. सिर पर पीछे की ओर किसी धारदार हथियार से वार किया गया था. वहां बने घाव से अभी भी खून बह रहा था. इस से उन्हें लगा कि यह हत्या अभी जल्दी ही की गई है.

राकेश कुमार ने फोन द्वारा थाना खोराबार के थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव को लाश पड़ी होने की सूचना दी. वह गायघाट मर्डर केस को ले कर वैसे ही परेशान थे, इस लाश ने उन की परेशानी और बढ़ा दी. बहरहाल उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही क्षेत्राधिकारी नम्रता श्रीवास्तव, एसपी (सिटी) परेश पांडेय और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रदीप कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

मृतका के सिर से बह रहे खून से पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि हत्या एकाध घंटे के अंदर हुई है. मृतका की उम्र 24-25 साल थी. घटनास्थल पर संघर्ष के निशान थे. खड़ंजे से कुछ दूरी पर जूते और  दुपहिया वाहन के टायरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे. इस का मतलब हत्यारे मोटरसाइकिल से आए थे. मृतका की छाती पर भी जूते के निशान मिले थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि हत्यारे मृतका से नफरत करते रहे होंगे.

लाश के निरीक्षण के दौरान मृतका की दाहिनी हथेली पर पुलिस को एक मोबाइल नंबर लिखा दिखाई दिया. पुलिस ने वह मोबाइल नंबर नोट कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव ने मृतका के पास से मिला सामान कब्जे में ले लिया था, ताकि उस की शिनाख्त कराने में मदद मिल सके. यह 21 दिसंबर की रात की बात थी. 22 दिसंबर की सुबह उन्होंने मृतका की हथेली से मिले मोबाइल नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन उठाने वाले ने ‘हैलो’ कहने के साथ ही उन के बारे में भी पूछ लिया.

‘‘मैं गोरखपुर के थाना खोराबार का थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव बोल रहा हूं.’’ उन्होंने अपना परिचय देते हुए पूछा, ‘‘यह नंबर आप का ही है. आप कहां से और कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘साहब मैं अजय गिरि बोल रहा हूं. यह नंबर आप को कहां से मिला?’’

‘‘यह नंबर एक महिला की हथेली पर लिखा था, जिस की हत्या हो चुकी है.’’

‘‘उस का हुलिया कैसा था?’’ अजय गिरि ने पूछा.

थानाप्रभारी ने हुलिया बताया तो अजय ने छूटते ही कहा, ‘‘साहब, यह हुलिया तो मेरी पत्नी रिंकी का है. क्या उस की हत्या हो चुकी है? दिसंबर, 2013 को छोटे बेटे सुंदरम को ले कर घर से निकली थी. तब से उस का कुछ पता नहीं चला. उसी की तलाश में मैं बड़े भाई की ससुराल मधुबनी आया था.’’

‘‘ऐसा करो, तुम थाना खोराबार आ जाओ. मरने वाली तुम्हारी पत्नी है या कोई और यह तो यहीं आ कर पता चलेगा.’’ थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘लेकिन मृतका के पास से हमें कोई बच्चा नहीं मिला है. भगवान तुम्हारे साथ अच्छा ही करे.’’

अजय ने पत्नी के साथ बच्चे के होने की बात की थी, जबकि महिला की लाश के पास से कोई बच्चा नहीं मिला था. इस से थानाप्रभारी थोड़ा पसोपेश में पड़ गए कि उस का बच्चा कहां गया? बच्चे की उम्र भी कोई ज्यादा नहीं थी. उन्हें लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हत्यारों ने बच्चे को कहीं दूसरी जगह ले जा कर ठिकाने लगा दिया हो. गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझ गई थी. अब यह अजय के आने पर ही सुलझ सकती थी.

उसी दिन शाम होतेहोते अजय थाना खोराबार आ पहुंचा. थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव ने मेज की दराज से कुछ फोटो और लाश से बरामद सामान निकाल कर उस के सामने रखा तो सामान और फोटो देख कर वह रो पड़ा. थानाप्रभारी समझ गए कि मृतका इस की पत्नी रिंकी थी. इस के बाद मैडिकल कालेज ले जा कर उसे शव भी दिखाया गया. अजय ने उस शव की भी शिनाख्त अपनी पत्नी रिंकी के रूप में कर दी. अब सवाल यह था कि उस के साथ जो बच्चा था, वह कहां गया?

थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव द्वारा की गई पूछताछ में अजय ने बताया, ‘‘रिंकी अपने 3 वर्षीय छोटे बेटे सुंदरम को साथ ले कर ननद पुष्पा की ससुराल कुबेरस्थान जाने की बात कह कर घर से निकली थी. वहां जाने के लिए मैं ने ही उसे जीप में बैठाया था. उस ने 2 दिन बाद लौट कर आने को कहा था.

2 दिनों बाद जब वह घर नहीं लौटी तो मैं ने उस के मोबाइल पर फोन किया. उस के मोबाइल का स्विच औफ था. बाद में पता चला कि वह कुबेरस्थान न जा कर सीधे गोरखपुर में रहने वाले मेरे बहनोई तेजप्रताप गिरि के यहां चली गई थी. इस के बाद मैं ने उन से रिंकी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह उन के यहां आई तो थी, लेकिन दूसरे ही दिन चली गई थी. उस के बाद उस का कुछ पता नहीं चला.’’

अजय के अनुसार उस का बहनोई तेजप्रताप गिरि शाहपुर की द्वारिकापुरी कालोनी में किराए पर परिवार के साथ रहता था. पुलिस ने उसी रात उस के घर से उसे पकड़ लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ शुरू हुई. तेजप्रताप गिरि कुछ भी बताने को तैयार नहीं था. वह काफी देर तक पुलिस को इधरउधर घुमाता रहा. जब पुलिस को लगा कि यह झूठ बोल रहा है, तब पुलिस ने अपने ढंग से उस से सच्चाई उगलवाई.

तेजप्रताप ने पुलिस को जो बताया था, उसी के आधार पर पुलिस ने बबलू और संदीप पाल को गिरफ्तार कर लिया. जबकि मनोज फरार होने में कामयाब हो गया. बबलू और संदीप से पूछताछ की गई तो पता चला कि रिंकी की हत्या के मामले में 2 महिलाएं रंभा उर्फ रेखा पाल और इशरावती भी शामिल थीं.

आगे क्या हुआ? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग…

हाईटैक होता देह धंधा : शहरी चकाचौंध और ग्लैमर ने बदले मायने

शहरी चकाचौंध और ग्लैमर ने आज देह धंधे के माने ही बदल दिए हैं. यह काफी हाईटैक हो गया है. देश में आज तकरीबन 1370 रैडलाइट एरिया हैं. इन में सब से ज्यादा देह धंधे वाला एरिया कोलकाता और मुंबई का है. अकेले मुंबई रैडलाइट एरिया का ही करोड़ों रुपए का साप्ताहिक आंकड़ा है. राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा ऐसे राज्य हैं, जहां देह धंधे की प्रथा का लंबा इतिहास रहा है. जयपुर ‘सवारियों’ के खेल में काफी तरक्की कर रहा है. इस वजह से गरम गोश्त के बेचने वालों की बांछें खिलती जा रही हैं.

प्रशासन या राज्य ने इस ओर इसलिए भी अपनी आंखें बंद कर रखी हैं, क्योंकि उन का इस से करीबी ताल्लुक है. आखिरकार नेताओं और अफसरों की मौजमस्ती का भी तो सवाल है.

राजस्थान का कोई भी शहर इस गरम गोश्त के कारोबार से अछूता नहीं है. इन इलाकों में ज्यादातर ‘सवारियों’ का धंधा होता है. या यों कहें कि इधर इस धंधे की खास क्वालिटी है, जिस का नाम ‘सवारी’ दिया गया है. यानी वे औरतें जिन्हें इस शहर से उस शहर में जिस्म के भिखारियों के आगे भेजा जाता है. जिस औरत का इस्तेमाल लोकल लैवल पर किया जाता है, उसे ‘गाड़ी’ कहते हैं. राजस्थान में जहां ‘सवारियों’ का ज्यादा काम होता है, वे इलाके हैं जयपुर, कोटा, अलवर, डूंगरपुर, किशनगढ़, जोधपुर, गंगानगर, नागौर, जैसलमेर और सीकर. बाकी इलाकोें में ‘गाडि़यों’ और ‘सवारियों’ का खूब कारोबार होता है.

ये बातें देश के तमाम रैडलाइट एरिया में पिछले 3 सालों से रिसर्च कर रहे एक पत्रकार, लेखक मोहम्मद जावेद अनवर सिद्दीकी के आंकड़ों से हासिल हुई हैं.

‘सवारियों’ और ‘गाडि़यों’ के इस नायाब कारोबार से अजमेर भी अछूता नहीं रहा है. यहां गरम गोश्त के कारोबारी भी अपनी ‘सवारियों’ और ‘गाडि़यों’ के लिए मन्नतें मांगने आते हैं, क्योंकि यहां हर किसी की मुरादें पूरी होती हैं.

पिछले 4 साल से अख्तरी बेगम (बदला हुआ नाम) ‘सवारियों’ को लाने और उन्हें सफर पर भेजने तक का सारा कारोबार करती है. उस के पास दलाल माल ला कर बेचते हैं और ज्यादातर वह ट्रेनिंग पाई ‘सवारियों’ का ही कारोबार करती है.

अख्तरी बेगम का कहना है कि इस कारोबार में काहिल और बीमार हों, तब भी औरतें ‘सवारी’ पर जाती हैं और ‘गाडि़यों’ का काम शौकिया और पार्टटाइम कमाने वाली औरतों के लिए है. लेकिन धंधा चाहे ‘सवारी’ का हो या ‘गाड़ी’ का, एक बार जो औरत इस राह पर आ जाती है, उस का अंत उम्र ढल जाने के बाद या तो फुटपाथ पर पागलों की शक्ल में या कहीं दलालों के साथ कमीशनखोर के लैवल पर जा कर खत्म होता है. वे न तो मां रह पाती हैं, न बीवी, न बेटी और न बहन.

अजमेर और जयपुर में ज्यादातर ‘सवारियों’ को विदेश भेजा जाता है. विदेशों से आने वाले, जिन्हें यहां का गरम गोश्त भा जाता है, अपने देश में हमारे यहां से अपनी रातें रंगीन करने का सामान मंगाना ज्यादा पसंद करते हैं.

जाहिर है, इस कारोबार का रुतबा भी कम लुभावना नहीं होगा. इस में मोटी कमाई तो होती ही है, ज्यादा खतरा भी नहीं रहता. बस, अच्छी ‘सवारियों’ को इकट्ठा करना और उन्हें विदेशी भूखों के हवाले कर देना, बाकी वे जानें और उन का काम. उसे तो बस हवाईजहाज तक ले जाने की जिम्मेदारी निभानी होती है.

एक ‘सवारी’ से जो कारोबार का ग्राफ बनता है, जरा उस पर भी गौर करें. अमूमन देश के अलगअलग इलाकों से 12 साल से 21 साल की उम्र की लड़कियों को ‘सवारी’ के लिए चुन कर लाया जाता है.

आमतौर पर गरम गोश्त के विदेशी ग्राहक हमारे यहां के सौदागरों को अपनी पसंद और बजट भेजते हैं और उन्हें उन की पसंद की ‘सवारियां’ मुहैया करा दी जाती हैं. उन ‘सवारियों’ को विदेशों में काम के बहाने भेजा जाता है. कुछ ‘सवारियां’, जो पहली बार इस धंधे में आती हैं, उन्हें विदेश जा कर मोटी कमाई का लालच दे कर इस दलदल में उतार दिया जाता है.

‘सवारी’ एक बार विदेश क्या गई, उस का सबकुछ या तो लुट जाता है या फिर मिजाज ही ऐसा बन जाता है कि चाहत ही नहीं होती इस धंधे से बाहर आने की. जब तक हुस्न का जलवा रहता है, ‘सवारियां’ उड़नछू होती रहती हैं, फिर उम्र ढलने तक इतनी सोच उन में आ जाती है कि उन्हें इस कारोबार की सारी जानकारी हो जाती है और या तो वे इस कारोबार की रानी बन जाती हैं या अपनी जिंदगी अलगथलग काटने पर मजबूर हो जाती हैं.

राजस्थान से जो ‘सवारियां’ जाती हैं, वे काफी सैक्सी और कम उम्र की गठीली बालाएं होती हैं. जब वे सजतीसंवरती हैं, तो सचमुच बेहोश कर देती हैं. उन का भाव भी सब से ज्यादा होता है. खाड़ी देशों के गरम गोश्त के भूखे उन्हें देखते ही कुछ भी लुटाने को तैयार हो जाते हैं.

‘सवारियों’ में कुंआरियों का होना ही जरूरी नहीं है. इन में शादीशुदा भी होती हैं, जिन के मर्द इस बात से अनजान नहीं होते हैं कि उन की पटरानी किसी पराए मर्द की रातें रंगीन करने विदेश जा रही हैं. रही बात वीजा की, तो इस में भी कोई मुश्किल नहीं होती है.

औरतों को इन अंधी गलियों में धकेलने वाले कई देशों में फैले गिरोहों के लोगों द्वारा इन की सभी जरूरतें पूरी कर दी जाती हैं.

चांदी (बदला हुआ नाम) बताती है कि उसे एक ट्रक ड्राइवर से प्यार हो गया था. उस ने बड़ेबड़े सपने दिखाए थे और वह उस के साथ भाग आई अपने बंगाल से अजमेर. मांबाप, भाईबहन सब थे, मगर दुनिया की रंगीनियत देख कर वह बहक गई. पति था तो, लेकिन मनमौजी. वह भी कहीं कामधाम नहीं करता था और ऊपर से उसे मारतापीटता भी था.

सब से बड़ी बात तो यह थी कि उस मर्द से देह सुख भी चांदी को नहीं मिलता था. उस की सखीसहेलियां अपने पति की बातें उसे बताती रहती थीं, तो बेचारी चांदी सिसक कर रह जाती थी. शायद इसी कमजोरी को भांप गया था वह ट्रक ड्राइवर.

ट्रक ड्राइवर ने चांदी को खूब भोगा. उसी दौरान चांदी को मिल गई रजिया. रजिया ‘सवारियों’ को खाड़ी देशों में भेजने की ठेकेदार थी. उस ने उसे सारी बातें खूब समझा कर बताईं, जिसे सुन कर चांदी की समझमें बस इतनी बात आई कि अगर एक बार वह ‘सवारी’ बन गई, तो जिंदगीभर मौज से कटेगी. फिर तो अपने बापभाई को भी वह तार देगी. मायके की गरीबी छूमंतर हो जाएगी. उस ने ‘सवारी’ बन जाना कबूल कर लिया और दुबई चली गई.

बंगाल से दिल्ली, दिल्ली से जयपुर और जयपुर से अजमेर, इन तमाम जगहों पर लोगों ने चांदी को खूब भोगा और फिर वह दुबई चली गई. उस के साथ पहली बार दुबई जाने वाली एक और औरत थी. उस औरत के बारे में बताया गया कि वह अब तक अपने ही देश में जो विदेशी लोग आते हैं, उन को खुश करने होटलों में जाती रही है. सो, उसे उन लोगों के साथ रात बिताने की पूरी जानकारी है.

उस औरत के साथ चांदी को दुबई में एक होटल में ठहराया गया था. रोज सुबह उसी होटल में एक गाड़ी आ जाती थी, जो उसे ले कर शेखों के हरम तक पहुंचा आती थी.

शेख रातभर चांदी को खूब नोचखसोट कर सुबह तक तकरीबन बेहोशी की हालत में छोड़ दिया करते थे. फिर वही गाड़ी आती थी, जो उसे होटल में छोड़ आती थी.

होटल में आ कर जब चांदी को कुछ होश आता, तो अपनी ही अंटी में से पैसे जो उसे रात को शेख से मिलते थे, होटल और गाड़ी वाले को देने होते थे. वह खापी कर कुछ देर आराम करती और तब तक फिर से दूसरी रात के लिए बुकिंग आ जाती थी.

इस तरह एक साल बीत गया और उस ने 19 हजार रियाल जमा कर लिए.

कुछ और पैसों के लालच में चांदी ने अपने एजेंटों से बात की, तो उस ने उसे वीजा के लिए किसी के बारे में बताया, लेकिन फिर क्या हुआ उसे पता ही नहीं, क्योंकि उसे जब उस रात शेख ने नोचने की शुरुआत की तो वह इतना वहशियाना था कि बेचारी बेहोश हो गई और जब होश में आई तो हवाईजहाज में थी. फिर दिल्ली में आ पहुंची.

अब वह ऐसा काम नहीं करेगी, इतना सोचते हुए बाहर आई. एयरपोर्ट पर एक गाड़ी खड़ी थी, जिस में चांदी को उस के एजेंट के आदमी बिठा ले गए. वह कुछ सोच पाती, उस से पहले उस के सपनों ने दम तोड़ दिया.

‘हिंदुस्तान के प्रमुख देह व्यापार और उस के बदलते परिदृश्य’ विषय पर रिसर्च करने वाले मोहम्मद जावेद अनवर सिद्दीकी ने जयपुर, अलवर, कोटा, नागौर, गंगानगर, जोधपुर, बीकानेर, अजमेर, सीकर, बाड़मेर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, टोंक, हनुमानगढ़, भरतपुर, बूंदी और बांसवाड़ा में जा कर सभी रैडलाइट इलाकों की छानबीन की.

इस से जो खास बातें सामने आई हैं, उन के मुताबिक पूरे देश में राजस्थान तीसरा ऐसा प्रमुख राज्य है, जहां से देश के बाहर ‘सवारियां’ भेजने का कारोबार होता है.

यह चौंकाने वाली बात है कि अगर सरकार देह व्यापार की मंडियों से टैक्स वसूल करने लगे, तो अकेला यह व्यापार देश की तमाम पंचवर्षीय योजनाओं को पूरा करने के लिए काफी है.

कोटा, राजस्थान की 2 पढ़ीलिखी सहेलियां रूबी और सविता (बदला हुआ नाम) पिछले 5 साल से जिस्मफरोशी का धंधा कर रही हैं. अब वे पछतावा नहीं कर रही हैं, बल्कि कहती हैं कि इतनी रईसी क्या बाहर मिलेगी?

बनारस से धंधे की शुरुआत करते हुए इन दोनों ने अब तक 3 बार ‘सवारी’ का सफर पूरा किया है. अब तो वे अपने ही देश में रह कर इस धंधे को अंजाम दे रही हैं. जिस्म की खरीदफरोख्त का काम अब बदनाम बस्तियों से होते हुए राज्य के गंवई इलाकों के घरों की चौखट तक को पार कर गया है. माहौल ऐसा बन गया है कि लोग अपनी पत्नी, सौतेली या कमजोर बहन, भांजी या दूसरी औरतों को गरम गोश्त की गलियों में खुद भेजते हैं, जिस के एवज में बैठेबिठाए बेहतर आमदनी हो जाती है.

यह बात भी कम चौंकाने वाली नहीं है कि कहींकहीं नौकरी की जरूरत ने भी कमसिन लड़कियों को जिस्म की तस्करी में फंसा दिया है.

साल 2015 में दिल्ली पुलिस ने नौकरी का झांसा दे कर जिस्मफरोशी के जाल में फांस कर गांव की औरतों और जवान होती कमसिन बालिकाओं को अरब देशों में बेचने वाले एक गिरोह का परदाफाश किया था. इस में 80 फीसदी राजस्थान की थीं, जो अपने घरबार की गरीबी, भुखमरी से जूझते लाचार मांबाप और कुपोषण की शिकार भाईबहनों की खातिर नौकरी करने घर से बाहर निकल गई थीं.

दिल्ली में पकड़े गए गरम गोश्त के सौदागरों ने जाहिर किया कि वे राजस्थान के जयपुर, अजमेर, ब्यावर और अलवर इलाकों से गांव की लड़कियों और औरतों को नौकरी का झांसा दे कर अपने जाल में लपेट लेते थे. इन अबलाओं को दिल्ली में सब से पहले इस गहरी अंधेर नगरी से रूबरू कराया जाता है, फिर कुछ खास गुर बताते हुए इस पेशे में उतार दिया जाता है.

कभी एकएक दाने को मुहताज जयपुर बाजार के तंग महल्ले के टूटेफूटे मकान में रहने वाली शायरा (बदला हुआ नाम) ने 40 लाख रुपए में एक मकान खरीद कर लोगों को चौंका दिया.

इस की खबर पुलिस को भी मिली, तो उस ने फौरन शायरा को दबोच लिया और उस के बाद यह राज खुला कि शायरा ‘सवारियों’ की कारोबारियों में से एक है.

जयपुर और अजमेर से शायरा महिला डांस म्यूजिकल ग्रुप की आड़ में गांवों से लाई गई बेबस लड़की को विदेश भेजने का काम करती थी. किराए के गुंडेमवालियों के बल पर वह एक शातिर कारोबारी बन गई थी. आज डांस स्कूल और म्यूजिकल ग्रुप की आड़ में राजस्थान के कई इलाकों में जिस्मफरोशी का काम चल रहा है. हकीकत यह है कि अजमेर इन दिनों इस धंधे की खास मंडी बना हुआ है.

मास्टरमाइंड और सब से बड़े रेगिस्तानी कारोबारी के रूप में सलाम उर्फ टोपीबाज का नाम सामने आया है. सलाम खुद तो मुंबई में रहता है, लेकिन जयपुर और अजमेर में इस के 3 खास एजेंट काम संभालते हैं.

इन एजेंटों के साथ उन की खास सैक्रेटरी की हैसियत से एकएक औरत भी रहती है. इन को एरिया में घूम रहे दलाल और सड़कछाप गुंडों के जरीए माल मिलता है. बताते हैं कि सलाम का नैटवर्क पिछले 10-12 सालों से चल रहा है. इस पर हाथ क्या नजर तक उठाने के लिए पुलिस को कई बार सोचना पड़ता है.

चाहे सलाम मुंबई में रहे या अजमेरजयपुर में, उस का नैटवर्क अब इतना तगड़ा हो गया है कि किसी भी तरह की अड़चन इस के कारोबार को डिस्टर्ब नहीं कर सकती है.

अब तो सलाम ने अपना कारोबार कंप्यूटराइज्ड कर लिया है. इंटरनैट या मोबाइल फोन पर ही सारा काम निबटा लिया जाता है.

जिस्म के सौदागरों का काम करने का तरीका भी कुछ अजीब सा है. ये देहात से लाई गई लड़कियों को डांस की टे्रनिंग देते हैं. उन के घर वालों को कहा जाता है कि उन की लाड़ली को विदेश में काम करने के लिए ले जा रहे हैं, जहां ये बहुत सारा रुपया कमा सकेंगी. मांबाप इजाजत देने से गुरेज नहीं करते, फिर उन्हें 20-25 हजार रुपए थमा दिए जाते हैं, जो उन्हें गरीबी के अंधेरे में किसी चांद से कम नहीं लगते. उन से यह भी कहा जाता है कि उन की बेटी विदेश से उन्हें मोटी रकम भेजती रहेगी. जब ये मासूम लड़कियां डांस की कुछ टे्रनिंग ले कर अरब देशों की जमीन पर उतार दी जाती हैं, तब जा कर इन्हें पता चलता है कि इन की मासूमियत को यहां शेखों की बांहों में मसला जाएगा.

क्या कोई बता सकता है कि लोग चंद सिक्कों में जो मासूम देह खरीदते हैं, वे आती कहां से हैं और कैसे?

इस सवाल का जवाब मिलेगा पश्चिम बंगाल के बागानों से, उत्तरपूर्व के पहाड़ों से, कश्मीर की सुनहरी वादियों से, दक्षिण भारत के समुद्री घाटों से और नेपाल के गांवों से. मुंबई के कमाठीपुरा, फारस रोड, फाकलैंड रोड और पीला हाउस जैसे इलाकों में हर महीने सैकड़ों नई नाबालिग लड़कियां पहुंचाई जाती हैं.

गरीबी की चक्की में पिसती ये भोलीभाली 10 से 12 साल की मासूम लड़कियों ने सिर्फ इतनी ही गलती की थी कि उन्होंने अपने लिए एक बेहतर जिंदगी का सपना देख लिया था. कई तो परिवार की सताई हुई होती हैं, कई दुबई जा कर खूब ज्यादा पैसा कमाने की तमन्ना लिए होती हैं, कइयों को मुंबई आ कर फिल्मी सितारे से शादी करनी होती है या खुद हीरोइन बनने का सपना देख रही होती हैं.

नेपाल बौर्डर पर तकरीबन हर थाने और सोनौली व भैरवाट्रांजिट कैंप में ऐसे बोर्ड लगे हैं, जिन पर नेपाल से गायब हुई ऐसी तमाम लड़कियों के फोटो चस्पां होते हैं, जिन्हें देह धंधे की भेंट चढ़ा दिया जाता है.

इन तथाकथित गुमशुदा नाबालिग और बालिग लड़कियों को कभी बरामद नहीं किया जा सका है, यह रिकौर्ड उन पुलिस थानों में मिल सकता है. अलबत्ता, उन में से तकरीबन 90 फीसदी लड़कियों के घर वाले जान चुके होते हैं कि उन की लाड़ली परदेश में पैसा कमा रही है. थानों में लगे पुराने फोटो उम्मीदों की तरह धुंधले भी होते जाते हैं.

मोईती, नेपाल के एक सदस्य के पास एक गांव का बाशिंदा आता है और अपनी पत्नी को किसी लोगों के द्वारा बहलाफुसला कर भगा ले जाने की बाबत शिकायत करता है, उस के बारे में जब तहकीकात की जाती है, तो पता चलता है कि उस की बीवी मुंबई में है और अच्छीखासी कमाई कर रही है. लिहाजा, उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है.

इस खबर के साथ बेचारे के हाथ में एक हजार रुपए थमा दिए जाते हैं और बताया जाता है कि अब हर महीने उसे उस की बीवी की ओर से 2 हजार रुपए मिलेंगे, सो वह अपनी जबान बंद ही रखे.

वह आदमी कुछ दिनों तक तो यों ही खोजता फिरा, फिर बाद में जब पता लगा कि उस की बीवी पुणे के बुधवारपेठ रैडलाइट इलाके में एक कोठे पर काजल नामक बाई के पास है, तो वह थाने से पुलिस के साथ चल पड़ा अपनी बीवी की छुड़ाने को. जुगत काम आई और पुलिस दस्ते ने उस की बीवी को सुरक्षित बरामद कर लिया. पुलिस ने उस की बीवी के साथ 5 नेपाली दलालों को भी पकड़ लिया.

कुछ गिरोह नेपाल के पहाड़ों और तराई में बसे गांवों की गरीब नाबालिग लड़कियों के जत्थे को मुंबई की देह मंडी में झोंक देते हैं. इस बारे में कोई तय आंकड़ा भी मुहैया नहीं है, जिस से पता चले कि कितनी लड़कियां हर साल नेपाल की तराइयों से ला कर मुंबई में बेच दी जाती हैं.

लेकिन सरकारी सूत्रों की अगर मानें, तो जाहिर होता है कि 4 से 5 हजार लड़कियों को बहलाफुसला कर नेपाल के रास्ते भारत की सब से बड़ी देह मंडी कमाठीपुरा में बेच दिया जाता है. इन में से 40 फीसदी बहलाफुसला कर, 30 फीसदी जबरन, जिस में उन के घर और रिश्तेनातेदारों की रजामंदी होती है. 30 फीसदी पैसे कमाने की खातिर इस दलदल में आती हैं.

हवस के पुजारी : राजेंद्र शर्मा क्यों हुआ जेल में गिरफ्त

10 मार्च, 2016 की सुबह सैकड़ों लोग भोपाल के पौश इलाके टीटी नगर के कस्तूरबा स्कूल के सामने बने शीतला माता मंदिर के इर्दगिर्द इकट्ठा हो रहे थे. उस दिन वहां कोई धार्मिक जलसा नहीं हो रहा था और न ही यज्ञहवन या भंडारा था. भीड़ गुस्से में थी. कुछ लोगों के हाथ में लोहे के सरिए थे. देखते ही देखते लोगों ने मंदिर के पीछे बनी दीवार तोड़ डाली, जो इस मंदिर के 58 साला पुजारी राजेंद्र शर्मा के घर की थी.

अभी भीड़ तोड़फोड़ कर ही रही थी कि दनदनाती हुई पुलिस की गाडि़यां आ खड़ी हुईं. पुलिस वाले नीचे उतरे और भीड़ को तितरबितर करने की कोशिश करने लगे, लेकिन उन के पास लोगों खासतौर से औरतों के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि जब परसों उन की बेटी की इज्जत इसी मंदिर में लुट रही थी, तब पुलिस कहां थी?

इस सवाल के जवाब से ज्यादा अहम पुलिस वालों के लिए यह था कि भीड़ पुजारी के घर को और ज्यादा नुकसान न पहुंचा पाए, लिहाजा, पुलिस वालों ने औरतों को समझाया और 4 लोगों को तोड़फोड़ और बलवे के इलजाम में गिरफ्तार कर लिया.

यों फंसाया शिकार

कस्तूरबा नगर में झुग्गीझोंपडि़यां भी काफी तादाद में हैं. यहां के बाशिंदों की अपनी अलगअलग परेशानियां हैं, जिन्हें दूर करने वे इस मंदिर में अपना माथा झुकाने आया करते थे. मंदिर का पुजारी राजेंद्र शर्मा नकद चढ़ावा और प्रसाद बटोरता था और इस के एवज में भगवान की तरफ से गारंटी भी देता था कि यों ही चढ़ावा चढ़ाते रहो, आज नहीं तो कल जब भी तुम्हारी बारी आएगी, भगवान जरूर सुनेगा और परेशानी दूर करेगा.

ऐसी ही एक हैरानपरेशान औरत ललिता बाई (बदला नाम) थी, जिस का पति जगन्नाथ प्रसाद (बदला नाम) शराब की लत का शिकार हो कर निकम्मा हो चला था. नशे में धुत्त रहने वाले जगन्नाथ को घरगृहस्थी तो दूर की बात है, जवान हो रही बेटी आशा (बदला नाम) की भी चिंता नहीं थी कि वह 12 साल की हो रही है और जैसेतैसे 5वीं जमात तक पहुंची है.

ललिता की चिंता यह थी कि अगर पति ने नशा करना नहीं छोड़ा, तो बेटी के हाथ पीले करना मुश्किल हो जाएगा. काफी समझाने के बाद भी जगन्नाथ की शराब की लत नहीं छूटी, तो ललिता उसे मंदिर ले गई और पुजारी राजेंद्र शर्मा के आगे अपना दुखड़ा रोया. पुजारी राजेंद्र शर्मा तो मानो इसी दिन का इंतजार कर रहा था. उस ने ललिता को एक टोटका बता दिया कि रोजाना मंदिर में दीया लगाओ, तो जगन्नाथ की शराब की लत छूट सकती है.

इस मशवरे के पीछे इस पुजारी की मंशा यह थी कि जगन्नाथ के घर से रोज दीया रखने तो ललिता आने से रही, क्योंकि माहवारी के दिनों में औरतें मंदिर में पैर रखना तो दूर की बात है, नजदीक से भी नहीं गुजरतीं. ऐसे में जाहिर है कि कभी न कभी ललिता अपनी बेटी आशा को भेजेगी और तभी वह अपनी हवस की आग बुझा लेगा. और ऐसा हुआ भी. 8 मार्च, 2016 की शाम को दीया रखने आशा आई, तो ललिता की तो नहीं, पर राजेंद्र शर्मा की मुराद पूरी हो गई. जैसे ही आशा ने दीया लगाया, तो राजेंद्र ने उसे मंदिर की एक परिक्रमा लगाने को भी कहा.

आशा ने मंदिर का चक्कर लगाया और मंदिर के सामने आ खड़ी हुई. इस पर राजेंद्र ने उसे एक और दीया मंदिर के भीतर आ कर लगाने को कहा. जैसे ही वह दीया लगाने मंदिर के अंदर गई, तो हवस के इस पुजारी ने उसे खींच लिया और इज्जत तारतार कर दी. अपनी हवस पूरी करने के बाद राजेंद्र शर्मा ने रोती कराहती आशा को धमकी दी कि अगर किसी को कुछ बताया, तो अंजाम अच्छा नहीं होगा.

घर आ कर आशा ने मां ललिता को अपने साथ मंदिर में हुई ज्यादती की बात बताई, तो ललिता का खून खौल गया. ललिता ने कुछ खास लोगों को बात बता कर सीधे थाने का रुख किया. मंदिर की तरह थाने में भी ललिता की सुनवाई नहीं हुई और मौजूदा पुलिस वाले उसे टरकाने की कोशिश करते हुए रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करने लगे, पर अब तक महल्ले के काफी लोग थाने के बाहर जमा हो चुके थे. लिहाजा, पुलिस को पुजारी राजेंद्र शर्मा के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखनी पड़ी और उसे गिरफ्तार भी करना पड़ा.

दूसरे दिन 9 मार्च, 2016 को जैसे ही मंदिर में नाबालिग से बलात्कार की खबर आम हुई, तो लोगों ने जीभर कर पुजारी राजेंद्र शर्मा को कोसा, लेकिन यह कम ही लोगों ने सोचा कि मंदिर में बैठी शीतला माता ने क्यों नहीं आशा की इज्जत बचाई? क्यों फिल्मों की तरह उस का त्रिशूल उड़ कर राजेंद्र शर्मा की छाती में जा घुसा? क्यों किसी सांप ने आ कर उसे नहीं डसा, जो मंदिर में हैवानियत कर रहा था?

ऐयाशी के अड्डे

देवी ने कुछ नहीं किया, तो 10 मार्च, 2016 को गुस्साए लोगों ने ही इंसाफ करने की ठान ली, पर पुलिस बीच में आ गई, तो मामला आयागया हो गया. लेकिन यह हादसा कई सच उजागर कर गया कि मंदिर बलात्कार करने के लिए महफूज जगह है, क्योंकि ये भगवान के घर हैं, इसलिए यहां कुछ गलत नहीं हो सकता. लेकिन हकीकत में मंदिर हमेशा से ही पंडेपुजारियों की ऐयाशी के अड्डे रहे हैं.

घनी बस्तियों में बने मंदिरों में तो दुकानदारी के खराब होने के डर से थोड़ाबहुत लिहाज चलता है, पर शहर से दूर सुनसान और नदी किनारे बने मंदिरों में शाम होते ही चिलम सुलग उठती है और गांजे के धुएं से पूरा माहौल ही गंधाने लगता है. दिनभर तो साधुसंत घरघर जा कर भीख मांगते हैं और शाम को अफीमगांजा और शराब के सेवन से अपनी थकान उतारते हैं.

भोपाल की बस्तियों में बने नाजायज मंदिरों पर कब्जा जमाने की नीयत से ज्यादातर पुजारी वहीं पर ही घर बना कर रहने लगे हैं, क्योंकि जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं और अहम बात यह कि अगर इलाका रिहायशी हो, तो दुकान खुद ब खुद चल पड़ती है.

लोग सुबहशाम मंदिर का घंटा बजाते हैं, पैसाप्रसाद चढ़ाते हैं और पुजारी की भी खासी इज्जत करते हैं, क्योंकि वही उन्हें बताता है कि किस उपाय से कौन सा दुख दूर होगा. पति जगन्नाथ की शराब पीने की आदत तो इस से नहीं छूटी, उलटे नाबालिग बेटी की इज्जत देवी की आंखों के सामने तारतार होते लुट गई. इस से कुछ लोगों की आंखें खुलीं, तो उन्होंने बलवा कर डाला, जो समस्या का हल नहीं कहा जा सकता.

समस्या का हल है भगवान और उस का राग अलाप कर दोनों हाथों से पैसा बटोरते पंडेपुजारियों की असलियत समझना कि देवी या देवता कुछ नहीं कर सकते, लेकिन इन की आड़ में पुजारी जो न करे सो कम है. सालभर मंदिरों में धार्मिक जलसे हुआ करते हैं. गरीबों से कहा जाता है कि भगवान सभी की गरीबी दूर करेगा.

ऐसा होता तो अब तक देश में एक भी गरीब न बचता, लेकिन चढ़ावे के चक्कर में गरीब हर तरफ से लुटपिट रहा है और उन की औरतों की इज्जत ये पुजारी कैसे करते हैं, भोपाल की 2 वारदातों ने इसे उजागर किया है. हालांकि आसाराम बापू जैसे भी नाबालिग लड़की की इज्जत अपने आश्रम में ही लूटने के इलजाम में जेल की सजा काट रहे हैं, पर उन से यह सबक कौन सीखता है कि मंदिर जाने से पाप नहीं धुलते, बल्कि पाप होने देने के मौके बढ़ जाते हैं.

यह भी बनी शिकार

दानदक्षिणा ले कर भक्तों के लोकपरलोक सुधरवाने का दावा करने वाले पुजारियों का खुद का लोक कितना बिगड़ा होता है, इस की एक और मिसाल भोपाल में ही 15 मार्च, 2016 को देखने में आई. 38 साला गोमती (बदला नाम) को उस के पति ने तलाक दे दिया था, इसलिए वह रोजगार और काम की तलाश में रायसेन से भोपाल चली आई और बाग दिलकुशा इलाके में किराए के मकान में रहने लगी.

घर के पास बने मंदिर में गोमती रोज जाने लगी, तो पुजारी दुर्गा प्रसाद दुबे ने उसे अपनी बातों के जाल में फंसा लिया और 6 साल तक उस का जिस्मानी शोषण किया. इस के एवज में शादी का वादा भी किया. पर जब दुर्गा प्रसाद दुबे का जी गोमती से भरने लगा, तो वह शादी के वादे से मुकरने लगा. घरों में झाड़ूपोंछा और बरतनकपड़े धो रही गोमती जैसेतैसे अपने जवान होते बेटे का पेट पालती थी. वह पुजारी की बीवी बनने का सपना देखने लगी थी. जब यह ख्वाब टूटा, तो वह भी सीधे थाने गई और पुजारी की ज्यादतियों और देह शोषण के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई. पुलिस ने दुर्गा प्रसाद दुबे को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

हाईप्रोफाइल हसीनाओं का रंगीन खेल – भाग 3

अंकिता का अपनी बहन अनीता के घर आनाजाना लगा रहता था. बहन के ठाठबाट से अंकिता प्रभावित थी. वह उस की अहसानमंद भी थी, क्योंकि वह उस की आर्थिक मदद कर देती थी. एक दिन अंकिता ने बातोंबातों में उस से कहा, ‘‘अनीता दीदी, मैं सदैव परेशानी में रहती हूं. आशुतोष इतना नहीं कमा पाता कि हमारा गुजारा हो सके. दीदी, हमें भी कोई धंधा बताओ ताकि हमारा भी गुजारा हो सके.’’

अनीता ने अंकिता के चेहरे पर नजरें गड़ा दीं. फिर कुछ क्षण बाद बोली, ‘‘जो धंधा मैं करती हूं, तू भी शुरू कर दे, कुछ ही दिनों में तेरे दिन भी बहुर जाएंगे.’’‘‘कौन सा धंधा दीदी?’’ अंकिता ने अचकचा कर पूछा.
‘‘वही जिस्मफरोशी का.’’ अनीता ने बताया. ‘‘दीदी, यह आप क्या कह रही हैं, यह तो बहुत गंदा काम है. क्या आप यही करती हो?’’

‘‘हां, अंकिता मैं यही धंधा करती हूं. बता, इस में गलत क्या है? देख ले, इस में कमाई बहुत है. सोच ले, मन करे तो आ जाना.’’ अंकिता एक सप्ताह तक पसोपेश में पड़ी रही. उस के बाद वह राजी हो गई. फिर अनीता ने बहन को देह धंधे में उतार दिया. आशुतोष झा ने भी प्राइवेट नौकरी छोड़ दी और पत्नी की देह की दलाली करने लगा. अंकिता सजधज कर बहन के अड्डे पर पहुंच जाती और जिस्म का धंधा करती. आशुतोष पत्नी के लिए ग्राहक तलाश कर लाता.छापे वाले दिन अंकिता पति आशुतोष झा के साथ बहन के घर पहुंची ही थी कि पुलिस का छापा पड़ गया और वह पति के साथ पकड़ी गई.

जिस्मफरोशी के अड्डे से पकड़ी गई सरिता फतेहपुर जिले के असोम कस्बे की रहने वाली थी. सरिता अनीता की सब से छोटी बहन थी. उस का विवाह असोम निवासी बलवीर के साथ हुआ था. बलवीर फेरी लगा कर कपड़े बेचता था. कपड़े के व्यवसाय में उसे कभी घाटा तो कभी मुनाफा होता था. उसी से वह जैसेतैसे अपनी गृहस्थी चलाता था.

सरिता महत्त्वाकांक्षी थी. वह पति की कमाई से संतुष्ट नहीं थी. सरिता अपनी बहनों के घर आतीजाती थी. वह उन के ठाटबाट देख कर मन ही मन कुढ़ती थी. उस ने बहनों से कमाई और ठाटबाट का रहस्य जाना तो उस ने भी बहनों का साथ पकड़ लिया और जिस्मफरोशी का धंधा करने लगी. उस ने पति बलवीर को भी राजी कर लिया. बलवीर भी पत्नी की देह का दलाल बन गया.सरिता कुछ ही समय में इस धंधे की खिलाड़ी बन गई. वह असोम तथा फतेहपुर से ग्राहक तथा लड़कियां भी फंसा कर लाने लगी. इस के एवज में अनीता उसे कमीशन भी देती थी.

छापे वाले दिन सरिता को ग्राहक के साथ उन्नाव जाना था लेकिन ग्राहक आने से पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गई. उस दिन उस का पति बलवीर उस के साथ अड्डे पर नहीं आया था, जिस से वह बच गया.पुलिस रेड में पकड़ी गई नेहा फतेहपुर की रहने वाली थी. 4 भाईबहनों में वह सब से छोटी थी. उस के पिता प्राइवेट नौकरी कर परिवार का पालनपोषण करते थे. नेहा की शादी कल्याणपुर निवासी रमेश के साथ हुई थी.

रमेश शराबी था, जो कमाता था वह सब शराब में ही उड़ा देता था. नेहा विरोध करती तो वह उसे मारतापीटता था. लगभग 3 साल उस ने जैसेतैसे पति के साथ बिताए, फिर उस का साथ छोड़ कर मायके आ गई.पिता उस की दूसरी शादी रचा कर गृहस्थी बसाना चाहते थे, लेकिन नेहा राजी नहीं हुई. नेहा पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती, अत: वह कानपुर आ गई और दादानगर स्थित एक प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करने लगी. लेकिन यह नौकरी उसे ज्यादा समय तक रास नहीं आई.

वह पढ़ीलिखी थी सो दूसरी नौकरी की तलाश में जुट गई. इसी तलाश में उस की मुलाकात कालगर्ल सरगना अनीता शुक्ला से हुई. अनीता ने उसे अच्छी नौकरी लगवाने का झांसा दिया और उस की आर्थिक मदद करने लगी. नेहा जवान और खूबसूरत थी. अनीता ने उस को देहसुख का चस्का भी लगा दिया. इस के बाद अनीता ने उसे देहव्यापार के धंधे में उतार दिया.

नेहा फैशनेबल थी. वह जींसटौप पहनती थी. ग्राहक उसे देखते ही पसंद कर लेता था. अनीता नेहा की बुकिंग दिल्ली, आगरा जैसे बड़े शहरों को करती थी और भारीभरकम रकम वसूलती थी. छापे वाले दिन नेहा का सौदा 10 हजार रुपए में तय था. ग्राहक कार से उसे लेने आ रहा था. लेकिन इसी बीच पुलिस का छापा पड़ गया और वह पकड़ी गई.

पुलिस छापे में पकड़ी गई पूनम, असोम (फतेहपुर) की रहने वाली थी. उस का पति फतेहपुर खागा रोड पर टैंपो चलाता था. वह इतना कमा लेता था कि अपनी पत्नी व 2 बच्चों का पालनपोषण हो जाता था. लेकिन एक दिन उस का टैंपो ट्रक से भिड़ गया, जिस से वह बुरी तरह जख्मी हो गया. उस का साल भर इलाज चला पर वह चल न सका. उस का एक पैर खराब हो गया. फिर हमेशा के लिए बिस्तर ही उस का साथी बन गया था.

पूनम के पास जो जमापूंजी थी, वह सब उस ने पति के इलाज में लगा दी. वह कर्जदार भी हो गई. बच्चों के भूखों मरने की नौबत जब आ गई तब उसे घर के बाहर कदम निकालना पड़ा. वह फतेहपुर में एक चूड़ी की दुकान पर काम करने लगी. इसी चूड़ी की दुकान पर पूनम की मुलाकात कालगर्ल सरिता से हुई.

सरिता ने पूनम को अच्छी नौकरी दिलवाने का झांसा दिया और अपनी बहन अनीता से मिलवाया. अनीता ने पूनम की मजबूरी समझी और फिर प्रलोभन दे कर सैक्स के धंधे में उतार दिया.पूनम को शुरू में तो धंधा करने में झिझक हुई, किंतु जब शरीर की भरपूर कीमत मिलने लगी तो वह इस धंधे में रम गई. छापे वाले दिन उस का रात भर का सौदा 5 हजार रुपए में तय हुआ था. वह अपने ग्राहक के साथ कमरे में बिस्तर पर थी, तभी पुलिस का छापा पड़ा और वह पकड़ी गई.

जिस्म का धंधा करते पकड़ी गई नीलम भी असोम (फतेहपुर) की रहने वाली थी. उस का पति मानसिक रोगी था. घर में ही पड़ा रहता था.सासससुर और 3 बच्चों का बोझ उस के कंधे पर था. उस की मजबूरी का फायदा असोम की रहने वाली सरिता ने उठाया. सरिता ने उसे अपनी बड़ी बहन अनीता से मिलवाया. अनीता ने नीलम को समाज की कड़वी सच्चाई से अवगत कराया और फिर जिस्म बेचने को राजी कर लिया.

मजबूरी में नीलम देह का सौदा करने लगी. हालांकि नीलम का पति और सासससुर यही समझते थे कि नीलम किसी कंपनी में नौकरी करती है और कंपनी के काम से उसे बाहर जाना पड़ता है. छापे वाली रात नीलम ग्राहक के इंतजार में थी, तभी पुलिस का छापा पड़ गया और वह पकड़ी गई.

देहव्यापार के अड्डे पर अय्याशी करते रंगेहाथ पकड़ा गया सत्यम द्विवेदी कानपुर नगर के छावनी थाने के लालकुर्ती मोहल्ले का रहने वाला था. वह कपड़े का व्यापार करता था और अय्याश प्रवृत्ति का था.

एक रंगीनमिजाज दोस्त के माध्यम से वह श्यामनगर क्षेत्र में स्थित अनीता के अड्डे पर पहुंचा था. पूनम नाम की कालगर्ल को पसंद कर उस ने पूरी रात का सौदा 5 हजार रुपए में तय किया था. पूनम के साथ वह कमरे में हमबिस्तर था, तभी पुलिस का छापा पड़ा और वह पकड़ा गया. 6 जनवरी, 2020 को थाना चकेरी पुलिस ने देहव्यापार के अड्डे से पकड़े गए सभी आरोपियों को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से सभी को जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा संकलन सूत्रों पर आधारित. महिला पात्रों के नाम परिवर्तित किए गए हैं.

हाईप्रोफाइल हसीनाओं का रंगीन खेल – भाग 2

उमेश निराला कालेज में इंटरमीडिएट में पढ़ रहा था. उमेश और अनीता की मुलाकातें धीरेधीरे बढ़ती गईं और दोनों एकदूसरे को चाहने लगे. प्यार परवान चढ़ा तो उनके बीच की सारी दूरियां खत्म हो गईं.

उमेश और अनीता का अवैध रिश्ता आम हुआ तो अनीता के पिता को बड़ा दुख हुआ. उन्होंने बेटी को समझाया, घरपरिवार की इज्जत का वास्ता दिया, लेकिन अनीता की समझ में नहीं आया. वह तो आसमान में उड़ने लगी थी. उस ने उमेश के अलावा और भी कई बौयफ्रैंड बना लिए थे, जिन के साथ वह घूमतीफिरती और मौजमस्ती करती थी. अनीता की बदचलनी का असर उस की दोनों छोटी बहनों पर भी पड़ने लगा. वे भी उसी की राह पर चल पड़ी थीं.

अनीता के कदम बहके तो पिता को उस के ब्याह की चिंता सताने लगी. उन्होंने उस के हाथ पीले करने को स्वयं तो दौड़धूप शुरू की ही, नातेरिश्तेदारों से भी कह दिया कि वह अनीता के लिए कोई लड़का बताएं. एक रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें एक लड़का पसंद आ गया. लड़के का नाम था राघवेंद्र कुमार शुक्ला.

राघवेंद्र के पिता अजय कुमार शुक्ला उन्नाव जिले के अचलगंज कस्बे के रहने वाले थे. उन के 3 बच्चों में राघवेंद्र सब से बड़ा था. वह पढ़ालिखा तो था किंतु बेरोजगार था. उस का मन खेती में नहीं लगता था और उसे नौकरी भी नहीं मिल रही थी. सो वह आवारा घूमता था. अनीता के पिता ने राघवेंद्र को देखा तो यह सोच कर उसे पसंद कर लिया कि पढ़ालिखा है. शरीर से भी स्वस्थ है, नौकरी आज नहीं तो कल मिल ही जाएगी.

देवनारायण ने राघवेंद्र के पिता अजय कुमार शुक्ला से उस के ब्याह की बात चलाई तो वह राजी हो गए. इस के बाद सन 2010 में अनीता की शादी राघवेंद्र के साथ हो गई.शादी के बाद अनीता ससुराल आई तो सभी ने उस के रूप की तारीफ की. राघवेंद्र भी सुंदर पत्नी पा कर इतरा उठा. सब खुश थे पर अनीता खुश नहीं थी. उसे एक तो बेरोजगार पति मिला था, दूसरे उस की स्वच्छंदता पर प्रतिबंध लग गया था. इसलिए वह परेशान रहती थी. घर से बाहर आनेजाने को ले कर उस की तूतूमैंमैं पति से भी होती थी और सासससुर से भी.

अनीता ने जैसेतैसे 3 साल ससुराल में बिताए. इस बीच वह एक बेटे की मां भी बनी. उस के बाद अनीता को ले कर घर में कलह होने लगी. दरअसल, अनीता ने शादी के पहले के अपने प्रेमियों के साथ घूमनाफिरना शुरू कर दिया था. उन के साथ वह बहाने से उन्नाव तो कभी बदरका घूमने निकल जाती थी. राघवेंद्र तथा उस के परिवार से यह बात अधिक दिनों तक छिपी नहीं रही.

वह समझ गए कि अनीता बदचलन है. राघवेंद्र ने पत्नी पर अंकुश लगाना चाहा तो वह पति को ही आंखें दिखाने लगी, ‘‘ज्यादा टोकाटाकी की तो थाने जा कर घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज करा दूंगी. सभी जेल में दिखाई दोगे. इज्जत नीलाम होगी अलग से.’’धमकी से डर कर राघवेंद्र ने अनीता को उस की मरजी और हाल पर छोड़ दिया. अनीता ने पति को तो दबाव में ले लिया पर ससुराल वालों को नहीं दबा सकी. वह घर में ऐसी औरत को भला कैसे बरदाश्त करते जो बदचलन हो.

लिहाजा सब मिल कर उसे घर से निकालने पर तुल गए.अनीता जानती थी कि अकेली औरत कटी पतंग की तरह होती है. नाम के लिए ही सही, लेकिन पुरुष साथ हो तो वह अनेक मुसीबतों से सुरक्षित रहती है. अपनी इसी सोच के तहत अनीता घर से तो निकली पर पति को भी साथ ले गई. अनीता पति के साथ कानपुर आ गई और किदवईनगर में किराए का कमरा ले कर रहने लगी. वहां राघवेंद्र दादानगर स्थित एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. अनीता ने भी नौकरी ढूंढ ली और काम पर जाने लगी.

छोटीछोटी उन नौकरियों में वेतन भी मामूली था और मेहनत अधिक थी. अत: आमदनी बढ़ाने के लिए अनीता ने किसी दूसरे काम की तलाश शुरू कर दी. इसी तलाश में अनीता एक कालगर्ल रैकेट की सरगना से जा टकराई. सरगना ने जौब दिलाने का झांसा दे कर अनीता को अपने जाल में फंसाया और फिर देहव्यापार के धंधे में उतार दिया. अनीता खूबसूरत और जवान थी. उस की डिमांड अधिक होती थी, अत: वह खूब पैसे कमाने लगी.राघवेंद्र प्राइवेट नौकरी करता रहा और अनीता देहव्यापार के गंदे तालाब की मछली बनी रही. हालांकि राघवेंद्र को पत्नी का धंधा कतई पसंद नहीं था, मगर वह उसे रोक नहीं पाता था. जब भी अनीता से कुछ कहता तो वह उसे डराधमका कर चुप रहने को विवश कर देती थी. तब राघवेंद्र खून का घूंट पी कर रह जाता.

अनीता ने जब जिस्मफरोशी के धंधे के सभी गुर सीख लिए तो उस ने अपना अलग रैकेट बना लिया. उस के रैकेट में पेशेवर कालगर्ल्स थीं. इस के अलावा वह अपने स्तर से नई कालगर्ल भी तैयार करती थी. इस के लिए अनीता गरीब मजबूर व सुंदर लड़कियों को टारगेट करती. वह उन्हें रुपयों या फिर नौकरी दिलाने का लालच दे कर अपने जाल में फंसाती फिर देहव्यापार में उतार देती. शर्मनाक बात तो यह रही कि अनीता ने अपनी जवान व खूबसूरत सगी बहनों को भी देह के धंधे में उतार दिया. उन के पति ही उन की दलाली करने लगे.

अनीता घर में ही देहव्यापार करती थी. वह ग्राहक से फुल नाइट के 5 से 10 हजार रुपए लेती थी. जो ग्राहक कालगर्ल को बाहर ले जाना चाहते थे, उन्हें अतिरिक्त चार्ज देना पड़ता था. कालगर्ल का सारा खर्चा कस्टमर को ही देना पड़ता था.पुलिस के भय से अनीता किसी एक मकान में लंबे अरसे तक नहीं रहती थी. स्थानीय पुलिसकर्मियों से वह सांठगांठ बनाए रखती थी. 2019 के जनवरी महीने में अनीता ने चकेरी थाने के श्यामनगर क्षेत्र के रामपुरम में एक मकान 15 हजार रुपए महीने के किराए पर लिया. यह मकान अजय सिंह का था.

इसी किराए के मकान में अनीता अपना हाईप्रोफाइल सैक्स रैकेट का संचालन करने लगी थी. उस ने अपना दायरा भी बढ़ा लिया था. वह शहर के बाहर भी कालगर्ल्स भेजने लगी थी. अनीता ने शहर के बाहर कालगर्ल भेजने का 25 हजार रुपया तय कर रखा था. वह वाट्सऐप, फेसबुक के जरिए भी ग्राहकों को युवतियों की फोटो भेज कर सौदा तय करती थी और ग्राहकों की डिमांड पर दूसरे शहरों से भी कालगर्ल्स बुलाती थी.बड़े शहरों के जिस्मफरोशी के दलाल उस के संपर्क में थे. अनीता का पति राघवेंद्र भी अब पत्नी के अनैतिक धंधे में शामिल हो गया था. पैसों का लेनदेन वही करने लगा था.

रामपुरम में अनीता का धंधा खूब फलफूल रहा था कि पड़ोसियों की नजर उस के धंधे पर पड़ गई. उन्होंने इस की जानकारी आईजी मोहित अग्रवाल को दी और उस के सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ हो गया.
पुलिस छापे में पकड़ी गई अंकिता, अनीता की सगी बहन थी. वह अपने पति आशुतोष झा के साथ नौबस्ता थाना क्षेत्र के पशुपतिनगर में रहती थी. वहीं पर एक मंदिर में दोनों की मुलाकात हुई, जो बाद में प्यार में बदल गई. तब अंकिता ने आशुतोष के साथ प्रेम विवाह किया था. आशुतोष मधुबनी, बिहार का रहने वाला था.आशुतोष से शादी करने के बाद अंकिता पशुपतिनगर में रहने लगी. आशुतोष प्राइवेट नौकरी करता था. इस नौकरी से वह न तो अपनी जरूरतें पूरी कर पाता था और न ही अंकिता की ख्वाहिशें. 2-3 सालों में ही प्यार का नशा उतर गया था और वे दोनों आर्थिक परेशानी से जूझने लगे थे. अंकिता सदैव चिंताग्रस्त रहने लगी थी.

हाईप्रोफाइल हसीनाओं का रंगीन खेल – भाग 1

उस दिन जनवरी, 2020 की 5 तारीख थी. आईजी मोहित अग्रवाल अपने कार्यालय में कानपुर शहर की कानूनव्यवस्था पर पुलिस अधिकारियों के साथ मीटिंग कर रहे थे. दरअसल, नागरिकता कानून को ले कर शहर में धरनाप्रदर्शन जारी थे, जिस से शहर की कानूनव्यवस्था बिगड़ती जा रही थी. इस बिगड़ती कानूनव्यवस्था को सुधारने के लिए ही उन्होंने पुलिस अधिकारियों को बुलाया था ताकि शहर में कोई हिंसक प्रदर्शन न हो और अमनचैन कायम रहे.

दोपहर 12 बजे मीटिंग समाप्त होने के बाद आईजी मोहित अग्रवाल ने अपनी समस्या समाधान के लिए आए आगंतुकों से मिलना शुरू किया. इन्हीं आगंतुकों में अधेड़ उम्र के 2 व्यक्ति भी थे, जो आईजी साहब से मिलने आए थे. अपनी बारी आने पर वे दोनों आईजी साहब के कक्ष में पहुंचे और हाथ जोड़ कर अभिवादन किया.

आईजी साहब ने उन पर एक नजर डाली. कुरसी पर बैठने का संकेत किया. इस के बाद उन से पूछा, ‘‘आप लोगों का कैसे आगमन हुआ? बताइए, क्या समस्या है?’’ तभी उन में से एक ने कहा, ‘‘सर, हम चकेरी थाने के श्यामनगर मोहल्ले में रहते हैं. हमारे घर के पास अजय सिंह का आलीशान मकान है. उस मकान में वह खुद तो नहीं रहते लेकिन उन्होंने मकान किराए पर दे रखा है. मकान की पहली मंजिल पर 2 अफसर रहते हैं पर भूतल पर जो किराएदार है, उस की गतिविधियां बेहद संदिग्ध हैं. उस के घर पर अपरिचित युवकयुवतियों का आनाजाना लगा रहता है. हम लोगों को शक है कि वह किराएदार अपनी पत्नी के सहयोग से सैक्स रैकेट चलाता है.

‘‘सर, हम लोग इज्जतदार हैं. इन लोगों के आचारव्यवहार का असर हमारी बहूबेटियों पर पड़ सकता है. इसलिए आप से विनम्र निवेदन है कि इस मामले में उचित कानूनी काररवाई करने का कष्ट करें.’’आईजी मोहित अग्रवाल ने आगंतुकों की बात गौर से सुनी और फिर उन्हें आश्वासन दिया कि वह इस सूचना की जांच कराएंगे. अगर सूचना सही पाई गई तो दोषियों के खिलाफ काररवाई की जाएगी.  ‘‘ठीक है, लेकिन सर हमारा नाम गुप्त रहना चाहिए वरना वे लोग हमारा जीना दूभर कर देंगे.’’ जाते समय उन में से एक बोला.आईजी मोहित अग्रवाल को आगंतुकों ने जो जानकारी दी थी, वह वाकई चौंकाने वाली थी. एकबारगी तो उन्हें उन की खबर पर विश्वास नहीं हुआ, पर इसे अविश्वसनीय समझना भी उचित नहीं था. अत: उन्होंने तत्काल एसपी (क्राइम) राजेश कुमार यादव को कार्यालय बुलवा लिया.

एसपी (क्राइम) राजेश कुमार यादव आईजी कार्यालय पहुंचे तो मोहित अग्रवाल ने उन्हें आगंतुकों द्वारा दी गई सूचना के बारे में बताया और कहा कि अगर सूचना की पुष्टि होती है तो दोषियों के खिलाफ जल्द काररवाई करें.  एसपी (क्राइम) राजेश कुमार यादव ने चकेरी थानाप्रभारी रणजीत राय को इस गुप्त सूचना की सत्यता लगाने के निर्देश दिए, तो थानाप्रभारी ने मुखबिरों को लगा दिया.उसी दिन शाम 5 बजे मुखबिरों ने थानाप्रभारी रणजीत राय को इस बारे में जो जानकारी दी, उस ने सूचना की पुष्टि कर दी.

उन्होंने बताया कि श्यामनगर क्षेत्र के रामपुरम में एचएएल अफसर का एक मकान है, जिस की देखरेख उस का बेटा अजय सिंह करता है.  इस मकान की पहली मंजिल पर पैरा मिलिट्री फोर्स के 2 अफसर रहते हैं. भूतल पर राघवेंद्र शुक्ला अपनी पत्नी अनीता के साथ रहता है. अनीता ही अपने पति के साथ मिल कर वहां सैक्स रैकेट का चलाती है. इस मकान में वह पिछले एक साल से रह रही है.

मुखबिरों से पुख्ता जानकारी मिलने की सूचना थानाप्रभारी ने तत्काल एसपी (क्राइम) राजेश कुमार यादव को दे दी. इस के बाद राजेश यादव ने सैक्स रैकेट का परदाफाश करने के लिए एक पुलिस टीम गठित की. इस टीम में उन्होंने सीओ (कलेक्टरगंज) श्वेता सिंह, थानाप्रभारी रणजीत राय, एसआई (क्राइम ब्रांच) डी.के. सिंह, अर्चना, कांस्टेबल अनूप कुमार, अनुज, मनोज, कविता, रीता आदि को शामिल किया.

5 जनवरी, 2020 को रात 8 बजे थानाप्रभारी रणजीत राय ने सीओ (कलेक्टरगंज) श्वेता सिंह के निर्देश पर अनीता शुक्ला के रामपुरम स्थित मकान पर छापा मारा. मकान के अंदर एक कमरे का दृश्य देख कर थानाप्रभारी वहीं ठिठक गए.

कमरे में एक महिला अर्धनग्न अवस्था में बिस्तर पर चित पड़ी थी. उस के साथ एक युवक कामक्रीड़ा में लीन था. पुलिस पर निगाह पड़ते ही युवकयुवती ने दरवाजे से भागने का प्रयास किया, पर दरवाजे पर खड़े पुलिसकर्मियों ने उन्हें दबोच लिया.दूसरे कमरे में 2 अन्य युवतियां सजीसंवरी बैठी थीं. शायद वे ग्राहक के आने के इंतजार में थीं. महिला दरोगा अर्चना ने उन्हें अपनी हिरासत में ले लिया. इसी समय 3 युवतियों तथा 2 युवकों ने मुख्य दरवाजे की ओर भागने का प्रयास किया, किंतु सीओ श्वेता सिंह व अन्य पुलिसकर्मियों ने उन्हें दबोच लिया.

इस तरह पुलिस छापे में सरगना सहित 6 युवतियां, 2 दलाल तथा एक ग्राहक पकड़ा गया. मकान की तलाशी ली गई तो वहां से कामवर्धक दवाएं, स्प्रे, कंडोम तथा अन्य आपत्तिजनक सामग्री के अलावा 4 मोबाइल फोन तथा कुछ नगदी भी बरामद हुई. पुलिस पकड़े गए युवकयुवतियों को थाना चकेरी ले आई.

जिस मकान में सैक्स रैकेट चलता था, उस का मालिक अजय सिंह था. संदेह के आधार पर पुलिस ने उसे भी थाने बुलवा लिया. अजय सिंह एक अफसर का बेटा था, अत: उसे छोड़ने के लिए थानाप्रभारी के पास रसूखदारों के फोन आने लगे.लेकिन इंसपेक्टर रणजीत राय ने जांचपड़ताल के बाद ही रिहा करने की बात कही. अजय सिंह ने भी स्वयं को निर्दोष बताया और कहा कि उस ने तो उन लोगों को मकान किराए पर दिया था. उसे सैक्स रैकेट की जानकारी नहीं थी.

सीओ श्वेता सिंह ने जिस्मफरोशी के आरोप में पकड़े गए युवकयुवतियों से पूछताछ की तो युवतियों ने अपना नाम अनीता शुक्ला, अंकिता झा, सरिता तिवारी, पूनम, नीलम तथा नेहा बताया. इन में अनीता शुक्ला सैक्स रैकेट की संचालिका थी. अंकिता तथा सरिता अनीता की सगी छोटी बहनें थीं. तीनों बहनें जिस्मफरोशी के धंधे में लिप्त थीं.युवकों ने अपने नाम राघवेंद्र शुक्ला, आशुतोष झा तथा सत्यम द्विवेदी बताए. इन में राघवेंद्र शुक्ला और आशुतोष झा सगे साढ़ू थे और अपनीअपनी पत्नियों के लिए दलाली करते थे. जबकि लालकुर्ती कैंट (कानपुर) का रहने वाला सत्यम द्विवेदी ग्राहक था.

चूंकि सैक्स रैकेट के सभी आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, अत: सीओ श्वेता सिंह ने स्वयं वादी बन कर अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम 1956 की धारा 3, 4, 5, 6, 7 के तहत अनीता शुक्ला, अंकिता झा, सरिता तिवारी, नीलम, पूनम, नेहा, राघवेंद्र शुक्ला, आशुतोष झा तथा सत्यम द्विवेदी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.इन सब से पुलिस ने जब पूछताछ की तो देह व्यापार में लिप्त युवतियों ने इस धंधे में आने की अपनी अलगअलग मजबूरी बताई.

कालगर्ल्स सरगना अनीता उन्नाव जिले के बेहटा गांव की निवासी थी. उस की 2 छोटी बहनें और थीं, जिन के नाम अंकिता तथा सरिता थे. इन 3 बहनों का एक इकलौता भाई भी था, जो बचपन में ही रूठ कर घर से चला गया था. वह दिल्ली में रहता है और दाईवाड़ा (नई सड़क) स्थित एक किताब की दुकान में काम करता है.अनीता खूबसूरत थी. उस ने जब जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उस के पैर डगमगा गए. उस का मन पढ़ाई में कम और प्यारमोहब्बत में ज्यादा रमने लगा. वह बीघापुर स्थित पार्वती इंटर कालेज में 10वीं में पढ़ती थी. कालेज आतेजाते ही उस की मुलाकात उमेश से हुई.

इंसाफ चाहिए इस निर्भया को – भाग 3

नाबालिग निर्भया की हालत देख कर जोट्टा सिंह द्रवित हो उठे. उस की हालत काफी गंभीर थी. उसे तत्काल मैडिकल सहायता की जरूरत थी. मामला संगीन था, इसलिए पुलिस को भी सूचना देना जरूरी था. उन्होंने तुरंत एसपी भुवन भूषण यादव को मामले की जानकारी दे दी.

एसपी के निर्देश पर महिला थाने की थानाप्रभारी सहयोगियों के साथ सरदारी बुआ के घर पहुंच गईं. अब तक मंजू परिवार के साथ फरार हो चुकी थी. बाल संरक्षण कमेटी के संरक्षण में निर्भया को हनुमानगढ़ के जिला चिकित्सालय में भरती कराया गया.

शुरुआती पूछताछ में पुलिस को पता चला कि निर्भया दिल्ली के अमन विहार की रहने वाली थी. हनुमानगढ़ पुलिस ने दिल्ली के थाना अमन विहार पुलिस से संपर्क किया तो पता चला कि निर्भया के पिता कुंदन (बदला हुआ नाम) ने फरवरी महीने में उस की गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

सूचना पा कर थाना अमन विहार पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ दर्ज मुकदमे में गोलू, मंजू, निशा, सुनील बागड़ी आदि को नामजद कर लिया. इस के बाद दिल्ली पुलिस की सबइंसपेक्टर मनीषा शर्मा पुलिस टीम के साथ हनुमानगढ़ पहुंची और निर्भया का बयान ले कर लौट गई.

पुलिस टीम के साथ आए निर्भया के पिता ने बेटी की हालत देखी तो गश खा कर गिर गए. मामला मीडिया द्वारा जगजाहिर हुआ तो शहर में भूचाल सा आ गया. निर्भया को न्याय दिलाने के लिए हनुमानगढ़ में भी मुकदमा दर्ज करने की मांग करते हुए लोग सड़कों पर उतर आए. श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में कैंडल मार्च निकाला गया.

हनुमानगढ़ पुलिस दिल्ली में मुकदमा दर्ज होने की बात कह कर मुकदमा दर्ज करने से कतरा रही थी. लेकिन लोग मैदान में उतर आए. लोगों का कहना था कि यहां के आरोपियों से दिल्ली पुलिस को कोई सरोकार नहीं रहेगा. निर्भया का बुरा करने वालों को किए की सजा दिलाने के लिए यहां भी मुकदमा दर्ज होना चाहिए.

लोगों के गुस्से को देखते हुए हनुमानगढ़ पुलिस बेबस हो गई. तीसरे दिन महिला पुलिस थाने में मंजू, गोलू, निशा, मुकेश, सोनू आदि के खिलाफ भादंवि की धारा 370, 372, 373, 376 (डी), 377, 3/4 पौक्सो एक्ट व हरिजन उत्पीड़न अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस के बाद डीएसपी वीरेंद्र जाखड़ को मामले की जांच सौंप दी गई.

जानकारी मिलने पर 30 मार्च, 2017 को राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा मनन चतुर्वेदी हनुमानगढ़ आईं और स्वास्थ्य केंद्र जा कर उपचाराधीन निर्भया से मिलीं. बच्ची की हालत देख कर वह रो पड़ीं. इस मामले में एक भी गिरफ्तारी न होने से उन्होंने पुलिस को आड़े हाथों लिया और शीघ्र गिरफ्तारी के आदेश दिए. 10वीं कक्षा में पढ़ने वाली निर्भया को अपनी पढ़ाई जारी रखने और वरिष्ठ अधिकारी बनने के लिए प्रेरित करते हुए हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया. कुछ संस्थाओं ने ही नहीं, जन साधारण ने भी निर्भया की आर्थिक मदद की.

आखिर कौन थी निर्भया, वह कैसे चकलाघर संचालिका मंजू अग्रवाल के पास पहुंची? पुलिस जांच में पता चला कि सुरेशिया में ही किराएदार के रूप में मंजू के पड़ोस में सुनील बागड़ी रहता था. इस के पहले वह पश्चिमी दिल्ली के अमन विहार में रहता था. सुनील मंजू का राजदार था और एक दो बार उस के लिए बाहर से लड़की ला चुका था.

एक दिन सुनील मंजू के पास बैठा था तो उस ने कहा, ‘‘अरे सुनील बाबू, आजकल मेरा धंधा बड़ा मंदा है. कोई बढि़या सी लड़की की व्यवस्था कर देते तो धंधा चमक उठता. ऐसे माल के लिए मैं लाख, डेढ़ लाख रुपए खर्च करने को तैयार हूं.’’

‘‘मैडम, यह कौन सा मुश्किल काम है. मैं आज ही अपने साथी से कहे देता हूं.’’ सुनील ने कहा.

दिल्ली में सुनील के पड़ोस में ही गोलू और निशा रहते थे. निशा का पति ट्रक चलाता था, जबकि गोलू टैंपो चलाता था. निशा और उस के पति में किसी बात को ले कर खटपट हो गई तो निशा पति से अलग हो कर गोलू के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगी. सुनील ने मंजू की मंशा गोलू और निशा को बताई तो लाखों मिलने की उम्मीद में उन के मुंह में पानी आ गया.

निशा के पड़ोस में ही रहती थी निर्भया. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी और दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी. पिता मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार की गाड़ी खींच रहे थे. आकर्षक कदकाठी और मनमोहक नयननक्श वाली निर्भया गोलू और निशा की निगाह में चढ़ गई. दोनों ने उसे मंजू के अड्डे पर पहुंचाने का मन बना लिया.

बस फिर क्या था. निशा और गोलू निर्भया पर डोरे डालने लगे. निशा को गोलू ने अपनी भाभी बताया था. जानपहचान बढ़ी तो निशा और गोलू निर्भया को गिफ्ट के साथ नकदी भी देने लगे. निशा ने निर्भया से कहा था कि वह गोलू से उस की शादी करा कर उसे अपनी देवरानी बनाना चाहती है.

फिसलन भरी राह पर आखिर एक दिन निर्भया फिसल ही गई और निशा तथा गोलू के साथ भाग गई. उसे ले जा कर पहले गोलू ने उस से शादी की. फिर 4-5 दिनों बाद वे उसे ले कर हनुमानगढ़ पहुंचे और सुनील बगड़ी के माध्यम से मंजू को सौंप दिया गया. निर्भया के गायब होने पर कुंदन ने थाना अमन विहार में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

हनुमानगढ़ पुलिस जब मुख्य अपराधियों को 3-4 दिनों तक गिरफ्तार नहीं कर सकी तो लोग नाराजगी व्यक्त करने गले. मीडिया भी पुलिस की भद्द पीट रही थी. साइबर क्राइम एक्सपर्ट हैडकांस्टेबल गुरसेवक सिंह ने मंजू के परिवार की लोकेशन पता कर रहे थे, पर शातिर मंजू पुलिस के पहुंचने से पहले ही उड़नछू हो जाती थी.

आखिर पांचवें दिन मंजू की आंख मिचौली खत्म हो गई. वह अपने बेटे मुकेश और बहू सोनू के साथ हरियाणा के ऐलनाबाद में पुलिस के हत्थे चढ़ गई. अदालत में पेश किए जाने पर अदालत ने तीनों को विस्तृत पूछताछ के लिए 10 दिनों  की पुलिस रिमांड पर सौंप दिया था.

मंजू से पूछताछ के बाद स्थानीय पुलिस ने पहले ग्राहक अख्तर खान सहित, 15 सौ रुपए में कमरा उपलब्ध कराने वाले संगम होटल के मैनेजर कृष्णलाल घूडि़या, दलाल गुड्डी मेघवाल और निर्भया का बुरा करने वाले विजय (रावतसर), नवीन खां, मंजूर खां (मोधूनगर) पूर्णचंद सिंधी (हनुमानगढ़) बिजली मैकेनिक जगदीश काला उर्फ अमरजीत आदि 15 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

अब दिल्ली पुलिस मंजू सोनू, मुकेश आदि को प्रोटक्शन वारंट पर अपनी सुपुर्दगी में लेने की कोशिश कर रही है. दिल्ली के दोनों आरोपी गोलू और निशा तिहाड़ जेल पहुंच गए हैं. हनुमानगढ़ पुलिस के लिए वे दोनों भी वांटेड हैं.

स्वास्थ्य लाभ के बाद निर्भया दिल्ली लौट गई थी. जिंदगी बरबाद करने वाले आरोपियों को फांसी की सजा की मांग करने वाली निर्भया की पुकार अब अदालत के फैसले पर निर्भर करेगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित