True Crime Stories : कोल्ड ड्रिंक पिलाकर की पांच लोगों की हत्या

True Crime Stories : पुलिस अधिकारियों को बरामदे में ही 2 महिलाएं घायल पड़ी दिखाई दीं. पूछने पर सुभाष ने बताया कि एक महिला उस की बहू डौली है तथा दूसरी रिश्तेदार सुषमा है. पुलिस अधिकारियों ने इन दोनों को इलाज हेतु सैफई अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद पुलिस अधिकारी आंगन में पहुंचे तो वहां 3 लाशें पड़ी थीं. इन की हत्या गला काट कर बड़ी बेरहमी से की गई थी. आंगन में खून ही खून फैला था.

पूछने पर सुभाष ने बताया कि एक लाश उस के छोटे बेटे अभिषेक उर्फ भुल्लन (20 वर्ष) की है, जबकि दूसरी लाश दामाद सौरभ (26 वर्ष) की है. तीसरी लाश बेटे के दोस्त दीपक (21 वर्ष) की है.

Bhullan (Mratak)               Sonu (Mratak)

     अभिषेक उर्फ भुल्लन                                 मृतक सोनू

लाश के पास ही खून सना फरसा पड़ा था. शायद उसी फरसे से उन का कत्ल किया गया था, इसलिए फरसे को पुलिस ने सुरक्षित कर लिया.

एसपी विनोद कुमार सहयोगियों के साथ आंगन से जीने के रास्ते छत पर पहुंचे तो वहां का दृश्य देख कर वह चौंक गए. कमरे के अंदर सुभाष के बेटे सोनू व उस की नई नवेली दुलहन True Crime Stories सोनी की लाश पड़ी थी. उन दोनों के हाथ की मेहंदी व पैरों की महावर अभी छूटी भी न थी कि उन्हें मौत की नींद सुला दिया गया था. उन दोनों की हत्या भी गला काट कर ही की गई थी. सोनू की उम्र 23 साल के आसपास थी, जबकि सोनी की उम्र 20 वर्ष थी.

निरीक्षण करते हुए एसपी विनोद कुमार जब मकान के पिछवाड़े पहुंचे तो वहां एक और युवक की लाश पड़ी थी. पूछताछ से पता चला कि वह लाश सुभाष के बड़े बेटे शिववीर (Shivvir) की है.

पता चला कि शिववीर ने ही पूरे परिवार का कत्ल किया था, फिर पकड़े जाने के डर से खुदकुशी कर ली थी. शिववीर की उम्र 28 साल के आसपास थी.

शिववीर के शव के पास ही एक तमंचा पड़ा था. इसी तमंचे से गोली मार कर उस ने खुदकुशी की थी. पुलिस ने तमंचे को सुरक्षित कर लिया. पुलिस ने शिववीर की तलाशी ली तो उस की जेब से मिर्च स्प्रे तथा नींद की गोलियों के 2 खाली पत्ते मिले. पुलिस ने इसे भी सुरक्षित कर लिया.

इस के अलावा पुलिस ने कमरे से कुल्हाड़ी व फावड़ा भी कब्जे में लिया, जिस से शिववीर ने पत्नी, भाभी व पिता पर हमला किया था.  यह बात 24 जून, 2023 की है.

शिववीर ने घर के 5 जनों को क्यों काटा

यह वीभत्स घटना उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के मैनपुरी (Mainpuri) जिले के किशनी थाने के गांव गोकुलपुरा अरसारा में बीती रात घटित हुई थी. सामूहिक नरसंहार (Mainpuri Mass Murder Case) की खबर थाना किशनी पुलिस को मिली तो पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया.

पुलिस अधिकारी भी घटनास्थल की तरफ रवाना हो लिए. कुछ ही देर में एसएचओ अनिल कुमार, एसपी विनोद कुमार, एएसपी राजेश कुमार तथा सीओ चंद्रशेखर सिंह घटनास्थल पर आ गए.

सुभाष के दरवाजे पर अब तक भारी भीड़ जुट चुकी थी. ग्रामीणों की इतनी भीड़ देख कर पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए. उन्हें लगा कि असामाजिक तत्त्व भीड़ को गुमराह कर कहीं कोई बवाल खड़ा न कर दें. इसलिए उन्होंने अतिरिक्त फोर्स मंगा कर गोकुलपुरा गांव में तैनात करा दी.

सामूहिक हत्याकांड (Mainpuri Mass Murder) की खबर सुन कर अब तक सुभाष यादव के घर पर रिश्तेदारों का जमावड़ा शुरू हो गया था. जब भी कोई खास रिश्तेदार आता, महिलाओं का करुण रुदन कलेजा चीरने लगता. माहौल उस समय तो बेहद गमगीन हो उठा, जब नईनवेली दुलहन True Crime Stories मृतका सोनी के मम्मीपापा के साथ सैकड़ों लोग आ गए.

वेदराम व उन की पत्नी सुषमा बेटी दामाद का शव देख कर बिलख पड़े. उन का करुण रुदन इतना द्रवित कर देने वाला था कि वहां मौजूद शायद ही कोई ऐसा हो, जिस की आंखों में आंसू न आए हों. पुलिसकर्मी तक अपने आंसू न रोक सके.

Deepak (Mratak)                  Saurabh (Mratak)

मृतक दीपक                                              मृतक सौरभ

मृतक दीपक के मम्मीपापा भी फिरोजाबाद से आ गए थे. वह भी बेटे की लाश के पास सुबक रहे थे. प्रियंका भी पति सौरभ की लाश के पास बिलख रही थी. उस की मम्मी शारदा देवी उसे ढांढस बंधा रही थी. यह बात दीगर थी कि उन की आंखों से भी लगातार आंसू बह रहे थे. क्योंकि उन की आंखों के सामने ही बेटे, बहू और दामाद की लाश पड़ी थी.

पुलिस अधिकारियों ने संवेदना व्यक्त करते हुए किसी तरह समझाबुझा कर मृतकों के घर वालों को शवों से अलग किया, फिर पंचनामा भरवा कर मृतक सोनू, भुल्लन, दीपक, सौरभ, शिववीर तथा सोनी के शवों को पोस्टमार्टम के लिए मैनपुरी के जिला अस्पताल भिजवा दिया.

शवों को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाने के बाद एसपी विनोद कुमार ने घर के मुखिया सुभाष यादव से घटना के बारे में जानकारी जुटाई. सुभाष यादव ने बताया कि यह खूनी खेल उस के बड़े बेटे शिववीर ने ही खेला है. 22 जून को उस के मंझले बेटे सोनू की शादी थी. बारात गंगापुरा (इटावा) गई थी. 23 जून को दोपहर बाद बारात वापस आई. घर में बहू की मुंहदिखाई व अन्य रस्में पूरी हुईं. खूब गाना बजाना हुआ.

रात 12 बजे तक डीजे पर सब नाचतेझूमते रहे. शिववीर भी जश्न में शामिल रहा. लेकिन उस के मन में क्या चल रहा है, हम लोग भांप नहीं पाए. रात के अंतिम पहर में इस क्रूर हत्यारे ने हमला कर 5 जनों को काट कर मौत की नींद सुला दिया. शायद उस का इरादा सभी को खत्म करने का था, लेकिन पत्नी बेटी सहित वह बच गए.

Ghar Ke Mukhiya Se Puch-Tach Karte S.P. Vinod Kumar

घर के मुखिया सुभाषचंद यादव से बातचीत करते हुए एसपी विनोद कुमार

एसपी विनोद कुमार ने गोकुलपुरा अरसारा गांव में डेरा जमा लिया था. शवों के अंतिम संस्कार तक वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे. देर शाम एडीजी राजीव कृष्ण व आईजी दीपक कुमार गोकुलपुरा पहुंचे और उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर घर के मुखिया सुभाषचंद यादव से बातचीत की. उन्होंने एसपी विनोद कुमार से भी घटना से संबंधित जानकारी हासिल की तथा कुछ आवश्यक निर्देश दिए.

मृतकों के शवों का पोस्टमार्टम वीडियोग्राफी के साथ 3 डाक्टरों के पैनल ने किया. वहां क्षेत्रीय विधायक बृजेश कठेरिया मृतकों के परिजनों के साथ रहे और उन्हे धैर्य बंधाते रहे.

पोस्टमार्टम के बाद शव उन के परिजनों को सौंप दिए गए. पुलिस व्यवस्था के साथ दीपक का शव फिरोजाबाद तथा सौरभ का शव उस के गांव चांद हविलिया (किशनी) भेज दिया गया. 3 बेटों सोनू, भुल्लन व शिववीर का दाह संस्कार सुभाष ने किया.

इधर वेदराम यादव अपनी बेटी सोनी का शव ले कर अपने गांव गंगापुरा पहुंचे तो माहौल बेहद गमगीन हो गया. लाडली बेटी का शव देखने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा. हर आंख में आंसू थे.

दर्द इस बात का था कि जिस बेटी को पूरे गांव ने हंसी खुशी से ससुराल भेजा था, उस का कफन में लिपटा शव गांव आया था. पूर्व दर्जाप्राप्त राज्यमंत्री रामसेवक यादव भी बेहद दुखी थे. क्योंकि लाडली बेटी सोनी उन के गांव व परिवार की थी. वेदराम को ढांढस बंधाते वह स्वयं भी रो रहे थे.

Ghatna Sthal Par Pahuchi Sansad Dimple Yadav

घटनास्थल पर पहुंची डिंपल यादव

सामूहिक नरसंहार से राजनीतिक गलियारों में भी हलचल शुरू हो गई थी. चूंकि मामला यादव परिवार से जुड़ा था और डिंपल यादव भी मैनपुरी से सांसद हैं, इसलिए वह दूसरे रोज ही गोकुलपुरा गांव जा पहुंचीं.

पर्यटन राज्यमंत्री जयवीर सिंह ने भी सामूहिक नरसंहार (Mainpuri Mass Killing) पर गहरा दुख व्यक्त किया. शिववीर ने अपने सगे भाइयों की हत्या क्यों की? परिवार के प्रति उस के मन में ईष्र्या, द्वेष और नफरत की भावना क्यों पनपी? वह क्या हासिल करना चाहता था? यह सब जानने के लिए हमें उस की पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझना होगा.

 

UP Crime : 30 करोड़ के लिए पत्नी बनी पति की कातिल

UP Crime :  उर्मिला ने शैलेंद्र को रिझाने के जतन शुरू कर दिए. कभी वह उसे तिरछी नजरों से देख कर मुसकराती तो कभी शरमाने का अभिनय करती. शैलेंद्र पहले से ही उसे हसरत भरी निगाहों से देखता था. उर्मिला ने मुसकरा कर उसे देखना शुरू किया तो उस की हसरतें उफान मारने लगीं. जब उर्मिला के कामुक बाणों का शैलेंद्र पर प्रभाव हुआ तो वह एक कदम आगे बढ़ी. यही नहीं, अब वह निर्माणाधीन मकान देखने भी जाने लगी. वहां दोनों खुल कर बतियाते और हंसीमजाक भी करते. शैलेंद्र समझ गया कि उर्मिला उस की बांहों में समाने को बेताब है.

एक दिन उस ने साहस दिखाते हुए उर्मिला को बाहुपाश में जकड़ लिया, ”भाभी, बहुत ललचा चुकी हो,  आज मर्यादा टूट जाने दो.’’

”तोड़ दो,’’ उम्मीद के विपरीत उर्मिला शैलेंद्र की आंखों में देखते हुए मुसकराई, ”मैं भी यही चाहती हूं.’’

राजेश गौतम स्कूल गया था और दोनों बेटे पढऩे के लिए स्कूल जा चुके थे. सुनहरा मौका देख कर शैलेंद्र उर्मिला को बैड पर ले गया. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं.

4 नवंबर, 2023 की सुबह 7 बजे किसी परिचित ने कानपुर के अनिगवां निवासी ब्रह्मदीन गौतम को फोन पर सूचना दी कि उन का शिक्षक भाई राजेश गौतम स्वर्ण जयंती विहार स्थित पार्क के पास सड़क पर घायल पड़ा है. उस का एक्सीडेंट हुआ है. किसी तेज रफ्तार कार ने उसे कुचल (UP Crime) दिया है. यह जानकारी मिलते ही ब्रह्मदीन ने अपने बेटे कुलदीप को साथ लिया और स्वर्ण जयंती विहार पहुंच गए. वहां पार्क के पास राजेश सड़क पर औंधे मुंह पड़ा था.

उस के सिर से खून बह रहा था. थोड़ी ही देर में घर के अन्य लोगों के साथ राजेश की पत्नी उर्मिला भी वहां पहुंच गई. पति की हालत देख कर उर्मिला की चीख निकल गई. ब्रह्मदीन व महेश भी भाई की हालत देख कर हैरान रह गए थे. कुलदीप तो समझ ही नहीं पा रहा था कि चाचा हर रोज मार्निंग वाक पर इसी सड़क पर आते थे, लेकिन आज इतना खतरनाक एक्सीडेंट कैसे हो गया. राजेश को हिलाडुला कर देखा गया तो उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई. लेकिन सांस की आस में राजेश को कांशीराम अस्पताल ले जाया गया, जहां के डाक्टरों ने उसे रीजेंसी ले जाने को कहा. इसी बीच किसी ने राजेश के (UP Crimes) एक्सीडेंट की सूचना थाना सेन पश्चिम पारा पुलिस को दे दी थी.

सूचना मिलते ही एसएचओ पवन कुमार कुछ पुलिसकर्मियों के साथ कांशीराम अस्पताल पहुंच गए. डाक्टरों के अनुसार राजेश की सांसें थम चुकी थीं, लेकिन घर वालों की जिद की वजह से पुलिस उसे पहले रीजेंसी फिर जिला अस्पताल हैलट ले गई. वहां के डाक्टरों ने भी राजेश गौतम को मृत घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने शव को कब्जे में ले लिया और घटना की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. कुछ देर बाद एसएचओ पवन कुमार दुर्घटनास्थल का निरीक्षण करने पहुंचे तो वहां भीड़ जुटी थी. सुबह की सैर करने वाले कई लोग भी वहां मौजूद थे. उन में से एक कमल गौतम ने बताया कि राजेश गौतम से वह परिचित था. वह हर रोज मार्निंग वाक पर आते थे.

आज सुबह साढ़े 6 बजे के लगभग वह सड़क पर तेज कदमों से टहल रहे थे, तभी एक कार उन के नजदीक से पास हुई. फिर उसी कार ने कुछ दूरी पर जा कर यू टर्न लिया और तेज रफ्तार से आ कर राजेश को टक्कर मार दी. राजेश उछल कर दूर जा गिरे. एसएचओ पवन कुमार घटनास्थल पर जांच कर ही रहे थे, तभी एसीपी (घाटमपुर) दिनेश कुमार शुक्ला तथा एडीसीपी अंकिता शर्मा भी वहां पहुंच गईं. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा वहां मौजूद कुछ लोगों से पूछताछ की.

अंतिम संस्कार के बाद मृतक का भाई ब्रह्मदीन, महेश तथा भतीजा कुलदीप, उर्मिला के घर में ही रात को रुक गए. रात में राजेश की मौत पर चर्चा शुरू हुई तो कुलदीप बोला, ”उर्मिला चाची, हमें लगता है कि चाचा को सोचीसमझी रणनीति के तहत मौत के घाट उतारा गया है और दुर्घटना का रूप दिया गया है. लगता है कि चाचा से कोई खुन्नस खाए बैठा था.’’

”कुलदीप, ऐसा कुछ भी नहीं है. तुम सब लोग मेरे घर पर फालतू की बकवास मत करो और मेरा दिमाग खराब न करो. अच्छा होगा, तुम सब हमारे घर से चले जाओ.’’

घर वालों को उर्मिला पर क्यों हुआ शक

उर्मिला का व्यवहार देख कर कुलदीप ने उर्मिला से बहस नहीं की और अपने पिता व परिवार के अन्य लोगों के साथ वापस घर लौट आया.

इधर तमतमाई उर्मिला सुबह 10 बजे ही एडीसीपी कार्यालय जा पहुंची. उस ने एडीसीपी अंकिता शर्मा को एक तहरीर देते हुए कहा कि उसे शक है कि पति के भतीजे कुलदीप व उस के घर वालों ने पति की करोड़ों की प्रौपर्टी हड़पने के लिए दुर्घटना का रूप दे कर उन की (UP Crimes ) हत्या की है.

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एडीसीपी अंकिता शर्मा

इधर कुलदीप को जब पता चला कि उर्मिला चाची ने उस के व घर वालों के खिलाफ शिकायत की है तो कुलदीप एडीसीपी अंकिता शर्मा से मिला और बताया कि वह नेवी में कार्यरत है. उसे शक है कि उस के चाचा राजेश की मौत किसी षड्यंत्र के तहत हुई है. वह चाहता है कि इस की गंभीरता से जांच हो. इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल के आसपास के सीसीटीवी फुटेज खंगाली. इस से पता चला कि राजेश को कुचलने के बाद कार बेकाबू हो कर खंभे से टकराई तो कार चालक पीछे आ रही दूसरी वैगन आर कार में सवार हो कर भाग गया था.

इन सबूतों को देख कर एडीसीपी अंकिता शर्मा ने एसीपी दिनेश शुक्ला की देखरेख में एक जांच टीम भी गठित कर दी. टीम में 2 महिला सिपाही व एक तेजतर्रार महिला एसआई को भी शामिल किया गया.

पुलिस कैसे पहुंची आरोपियों तक

ईको स्पोर्ट कार, जिस से राजेश को टक्कर मारी गई थी, का पता लगाया तो वह कार आवास विकास 3 कल्याणपुर, कानपुर निवासी सुमित कठेरिया की निकली. वैगनआर कार के नंबर की जांच करने पर पता चला कि यह नंबर फरजी है. यह नंबर किसी लोडर का था. अब पुलिस का शक और गहरा गया.

जांच में पुलिस टीम को 12 संदिग्ध मोबाइल नंबर मिले थे, उन में एक नंबर मृतक राजेश की पत्नी उर्मिला का भी था. पुलिस ने जब उर्मिला के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस ने एक फोन नंबर पर महीने भर में 400 बार काल्स की थीं. घटना वाले दिन भी उस की इस नंबर पर कई बार बातें हुई थीं. पुलिस ने इस नंबर की जांचपड़ताल की तो पता चला कि यह नंबर शैलेंद्र सोनकर का है.

पुलिस ने शैलेंद्र सोनकर के बारे में मृतक के घर वालों से जानकारी जुटाई तो पता चला कि शैलेंद्र सोनकर आर्किटेक्ट इंजीनियर है. उसी ने राजेश के कोयला नगर वाले मकान को बनाने का ठेका लिया था. मकान बनवाने के दौरान ही शैलेंद्र का उर्मिला के घर आनाजाना शुरू हुआ और दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ी थीं.

पुलिस जांच से अब तक यह साफ हो चुका था कि उर्मिला और ठेकेदार इंजीनियर शैलेंद्र के बीच कोई चक्कर है. पुलिस ने अब हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने की योजना बनाई. पुलिस टीम ने विकास सोनकर, शैलेंद्र सोनकर व सुमित कठेरिया को गिरफ्तार करने के लिए उन के घरों पर दबिश दी, लेकिन वह अपने घरों से फरार थे.

29 नवंबर, 2023 की शाम 5 बजे एसएचओ पवन कुमार को मुखबिर के जरिए पता चला कि उर्मिला व उस के साथी इस समय कोयला नगर स्थित गणेश चौराहे पर मौजूद हैं. शायद वे शहर से फरार होने की फिराक में हैं. चूंकि सूचना खास थी, अत: एसएचओ पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए और उर्मिला को उस के 2 साथियों के साथ हिरासत में ले लिया. लेकिन सुमित कठेरिया वहां से फरार हो गया था. तीनों को थाने लाया गया. पुलिस अधिकारियों ने उन से पूछताछ की तो  तीनों ने राजेश की हत्या में शामिल होने का जुर्म कुबूल कर लिया.

चूंकि तीनों हत्यारोपियों ने शिक्षक राजेश की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था, इसलिए मृतक के बड़े भाई ब्रह्मदीन की तरफ से शैलेंद्र सोनकर, विकास, सुमित कठेरिया तथा उर्मिला गौतम के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया और सुमित के अलावा तीनों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. सुमित कठेरिया की तलाश में पुलिस जी जान से जुट गई.

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पुलिस कस्टडी में आरोपी

पुलिस द्वारा की गई जांच, आरोपियों के बयानों एवं मृतक के घर वालों द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर इस वारदात के पीछे औरत और जुर्म की एक ऐसी कहानी सामने आई, जिस ने प्यार और प्रौपर्टी के लालच में अपने ही सुहाग की सुपारी दे दी.

उर्मिला की शादी की अजीब थी कहानी

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के चकेरी थाने के अंतर्गत आता है- दहेली सुजानपुर. 2 दशक पहले दहेली सुजानपुर गांव था और यहां खेती होती थी. लेकिन जैसे जैसे शहर का विकास हुआ, यह गांव शहर की परिधि में आ गया. कानपुर विकास प्राधिकरण ने किसानों की जमीन अधिग्रहण कर कालोनियां बनाईं और लोगों को बसाया. प्रौपर्टी डीलरों ने भी प्लौट काट कर बेचे तथा फ्लैट भी बनाए. सालों पहले जो जमीन कौडिय़ों के दाम बिकती थी, वही जमीन अब लाखोंकरोड़ों की हो गई है.

इसी दहेली सुजानपुर में राजाराम गौतम रहते थे. उन के 3 बेटे ब्रह्मïादीन, राजेश व महेश थे. राजाराम के पास 20 एकड़ जमीन थी. उन्होंने अपने जीते जी मकान व जमीन का बंटवारा तीनों बेटों में कर दिया था. हर बेटे के हिस्से में करोड़ों की जमीन आई थी. उन के 2 बेटे ब्रह्मदीन व महेश, सनिगवां में मकान बना कर परिवार सहित रहने लगे थे. बड़ा बेटा ब्रह्मदीन एमईएस चकेरी में नौकरी करता था. ब्रह्मादीन के बेटे कुलदीप का इंडियन नेवी में चयन हो गया था.

राजेश गौतम 3 भाइयों में मंझला था. वह अन्य भाइयों से ज्यादा तेजतर्रार था. वह दहेली सुजानपुर में ही रहता था. उस के परिवार में पत्नी उर्मिला के अलावा 2 बेटे थे. वह सरसौल ब्लाक के सुभौली गांव स्थित प्राथमिक पाठशाला में अध्यापक था. राजेश दबंग शिक्षक था.

वर्ष 2012 में राजेश का विवाह खूबसूरत उर्मिला के साथ बड़े ही नाटकीय ढंग से हुआ था. दरअसल, राजेश अपने दोस्त विमल के लिए उर्मिला को देखने उस के साथ बनारस गया था. विमल ने तो उर्मिला को देखते ही पसंद कर लिया था, लेकिन उर्मिला ने विमल को यह कह कर नकार दिया था कि विमल गंजा है. वहीं उस ने राजेश को पसंद कर लिया था.

बनारस से लौटने के बाद उर्मिला और राजेश के बीच मोबाइल फोन पर प्यार भरी बातें होने लगीं. 2-3 महीने बाद उर्मिला ने अपने घर वालों को और राजेश ने भी अपने घर वालों से एकदूसरे से शादी कराने की बात कही तो घर वालों ने भी इजाजत दे दी. उस के बाद 17 जून, 2012 को उर्मिला का विवाह राजेश के साथ धूमधाम से हो गया.

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राजेश गौतम और उर्मिला

खूबसूरत उर्मिला को पा कर राजेश गौतम अपने भाग्य पर इतरा उठा था. उर्मिला भी उस से शादी कर के खुश थी. उर्मिला ने आते ही घर संभाल लिया था और पति को अपनी अंगुलियों पर नचाने लगी थी. शादी के एक साल बाद उर्मिला ने एक बेटे को जन्म दिया. बेटे के जन्म से घर में खुशियां दोगुनी हो गईं. इस के 2 साल बाद उर्मिला ने एक और बेटे को जन्म दिया. 2 बच्चों के जन्म के बाद राजेश ने पत्नी की इच्छाओं पर गौर करना कम कर दिया. क्योंकि उस ने नौकरी के साथसाथ प्रौपर्टी डीलिंग का काम भी शुरू कर दिया था.

पति की बेरुखी पर उर्मिला रात भर बेचैन रहती. उसे घर में सब सुख था, किसी चीज की कमी न थी, लेकिन पति के प्यार से वंचित थी. इस तरह उर्मिला नीरस जिंदगी गुजारने लगी. उस ने दोनों का एडमिशन कोयला नगर स्थित मदर टेरेसा स्कूल में करा दिया. राजेश गौतम ने प्रौपर्टी डीलिंग में करोड़ों रुपए कमाए. साथ ही कोयला नगर क्षेत्र में ही उस ने 5-6 प्लौट भी खरीद लिए, जिन की कीमत करोड़ों रुपए थी. राजेश कमाई में इतना व्यस्त हो गया कि पत्नी की भावनाओं की कद्र करना ही भूल गया.

30 करोड़ की संपत्ति थी राजेश के पास

वह सुबह उठता, पहले टहलने जाता, फिर तैयार होकर स्कूल चला जाता. दोपहर बाद स्कूल से आता, फिर प्रौपर्टी के काम में व्यस्त हो जाता. इस के बाद देर रात आता और खाना खा कर सो जाता. यही उस का रुटीन था. राजेश गौतम की तमन्ना थी कि वह कोयला नगर में एक ऐसा आलीशान मकान बनाए, जिस की चर्चा क्षेत्र में हो. अपनी तमन्ना पूरी करने के लिए उस ने 300 वर्गगज वाले अपने प्लौट पर मकान बनाने का फैसला किया. इस के लिए उस ने 6 करोड़ रुपए का इंतजाम भी कर लिया.

राजेश ने मकान का ठेका अपने दोस्त हेमंत सोनकर के रिश्तेदार इंजीनियर शैलेंद्र सोनकर को दे दिया. ठेका मिलने के बाद शैलेंद्र ने राजेश के घर आनाजाना शुरू कर दिया. इसी आनेजाने में शैलेंद्र सोनकर की नजर राजेश की खूबसूरत पत्नी उर्मिला पर पड़ी. पहली ही नजर में उर्मिला उस के दिलो दिमाग में रचबस गई. उर्मिला भी जवान और हैंडसम शैलेंद्र को देख कर प्रभावित हुई.

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इंजीनियर शैलेंद्र सोनकर

उर्मिला देह सुख से वंचित थी, इसलिए उस का मन बहकने लगा. जब औरत का मन बहकता है तो उसे पतित होने में देर नहीं लगती. इस के बाद उर्मिला की आंखों के सामने शैलेंद्र की तसवीर घूमने लगी. वैसे भी उर्मिला ने महसूस किया था कि वह जब भी घर आता है, उस की मोहक नजरें हमेशा ही उस से कुछ मांगती सी प्रतीत होती हैं. दोनों के बीच प्यार के बीज अंकुरित हो गए. फिर जल्द ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी कायम हो गए.

आखिर क्यों बहकी उर्मिला

कुछ समय बाद उर्मिला शैलेंद्र की इस कदर दीवानी हो गई कि वह अपने निर्माणाधीन मकान पर भी जाने लगी. मौका निकाल कर वह वहां भी शैलेंद्र के साथ मौजमस्ती कर लेती थी.

विवाहित और 2 बच्चों की मां उर्मिला ने पति से विश्वासघात कर शैलेंद्र के साथ अवैध संबंध तो बना लिए थे, लेकिन उस वक्त उस ने यह नहीं सोचा था कि इस का अंजाम क्या होगा. 2 नावों पर पैर रखना हमेशा नुकसानदायक ही होता है. हुआ यह कि मार्च 2023 की एक दोपहर राजेश अचानक स्कूल से घर वापस आ गया और उस ने उर्मिला व शैलेंद्र को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. फिर तो राजेश का खून खौल उठा. शैलेंद्र फुरती से भाग गया. तब उस ने उर्मिला की जम कर पिटाई की.

बाद में उस ने शैलेंद्र को खूब फटकार लगाई. उर्मिला की अनैतिकता को ले कर कभीकभी झगड़ा इतना बढ़ जाता कि वह उर्मिला को जानवरों की तरह पीटता. एक दिन तो हद ही हो गई. राजेश की पिटाई से आहत हो कर उर्मिला नग्नावस्था में ही घर के बाहर आ गई थी. अड़ोसपड़ोस तथा परिवार के लोग उर्मिला की अनैतिकता से वाकिफ थे, इसलिए किसी ने भी उस का पक्ष नहीं लिया. पति की पिटाई से उर्मिला राजेश से नफरत करने लगी थी. इसी नफरत के चलते उस ने एक रोज राजेश को खाने में जहर दे दिया. उस की तबीयत बिगड़ी तो घर वालों ने उसे प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया, जहां उस का 2 सप्ताह इलाज चला. तब जा कर वह ठीक हुआ.

उर्मिला अपने आशिक शैलेंद्र को भी पति के खिलाफ उकसाती थी. वह वीडियो काल कर उसे अपने शरीर के जख्म दिखाते हुए ताने देती थी कि यह जख्म तुम्हारे प्यार की निशानी के तौर पर दिए गए हैं. उर्मिला के शरीर पर जख्म देख कर शैलेंद्र का गुस्सा फट पड़ता था.

पति की हत्या क्यों कराना चाहती थी उर्मिला

एक दिन उर्मिला ने शैलेंद्र से कहा, ”मैं अब अपने पति से छुटकारा चाहती हूं. वह हम दोनों के मिलन में बाधा बना है. प्रताडि़त भी करता है. तुम इस कांटे को हमेशा के लिए दूर कर दो. राजेश के पास 3 करोड़ का जीवन बीमा और 20 करोड़ की अचल संपत्ति तथा यह 6 करोड़ का आलीशान मकान है. उस के मरने के बाद यह सब हमारा होगा. मैं तुम से ब्याह कर लूंगी. फिर हम दोनों आराम से रहेंगे. उस की सरकारी नौकरी भी मुझे मिल जाएगी.’’

शैलेंद्र सोनकर का ममेरा भाई विकास सोनकर शास्त्री नगर में रहता था. वह ड्राइवर था. उस ने अपनी मंशा उसे बताई तो विकास ने शैलेंद्र को अपने साथी ड्राइवर सुमित कठेरिया से मिलवाया, जो आवास विकास-3 कल्याणपुर में रहता था. सुमित ने शैलेंद्र को एक ट्रक ड्राइवर से मिलवाया. ट्रक ड्राइवर ने राजेश को ट्रक से कुचल कर मारने का वादा किया और 2 लाख में हत्या की सुपारी ली. इस के बाद उर्मिला ने रुपयों का इंतजाम किया और डेढ़ लाख रुपए ड्राइवर को दे दिए, लेकिन उस ट्रक ड्राइवर ने काम तमाम नहीं किया और डेढ़ लाख रुपया ले कर फरार हो गया.

उस के बाद सुमित कठेरिया ने विकास के साथ मिल कर राजेश की हत्या की सुपारी 4 लाख में ली. उर्मिला और शैलेंद्र हर हाल में राजेश को मौत (New Year 2025 Crimes ) के घाट उतारना चाहते थे, अत: उन्होंने रकम मंजूर कर ली. इस के बाद उर्मिला, शैलेंद्र, सुमित व विकास ने राजेश को कुचल कर मारने की पूरी योजना बनाई. 4 नवंबर, 2023 की सुबह 6 बजे राजेश गौतम मार्निंग वाक पर निकला, तभी उस की पत्नी उर्मिला ने शैलेंद्र को फोन पर सूचना दे दी. सूचना पा कर सुमित कठेरिया अपनी ईको स्पोर्ट कार से तथा शैलेंद्र विकास के साथ अपनी वैगनआर कार से स्वर्ण जयंती विहार पहुंच गए.

उन लोगों ने पहले रेकी की, फिर राजेश की पहचान कर सुमित कठेरिया ने अपनी ईको स्पोर्ट कार से राजेश को जोरदार टक्कर मारी. राजेश टकरा कर करीब 20 मीटर दूर जा गिरा और तड़पने लगा. टक्कर मारने के बाद भागते समय सुमित की कार बिजली के खंभे से टकरा गई और उस का टायर फट गया. तब सुमित अपनी कार वहीं छोड़ कर कुछ दूरी बनाए खड़ी शैलेंद्र की वैगनआर कार के पास पहुंचा और उस में बैठ कर शैलेंद्र के साथ फरार हो गया.

पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 30 नवंबर, 2023 को आरोपी उर्मिला गौतम, शैलेंद्र सोनकर तथा विकास सोनकर को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. आरोपी सुमित कठेरिया ने भी बाद में अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था.

राजेश के दोनों बेटे अपने ताऊ ब्रह्मदीन के पास रह रहे थे. ताऊ ने दोनों बच्चों के पालनपोषण की जिम्मेदारी ली है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Extramarital Affairs : आशिक मिजाज ससुर की कातिल बहू

Extramarital Affairs : गीता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के थाना बहेड़ी के गांव फरीदपुर के रहने वाले गंगाराम की दूसरे नंबर की बेटी थी. गंगाराम की गिनती गांव के  संपन्न किसानों में होती थी. उन की 3 शादियां हुई थीं. पहली पत्नी रमा की बीमारी से मौत हो गई तो उन्होंने सुधा से शादी की. पारिवारिक कलह की वजह से उस ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली तो उन्होंने तीसरी शादी रेशमा से की.

रेशमा से ही उन्हें 4 बेटियां और 2 बेटे थे. बड़ी बेटी ललिता की उन्होंने उम्र होने पर शादी कर दी थी. उस से छोटी गीता का 8वीं पास करने के बाद पढ़ाई में मन नहीं लगा तो उस ने पढ़ाई छोड़ दी. गीता जिस उम्र में थी, अगर उस उम्र ध्यान न दिया जाए तो बच्चों को बहकते देर नहीं लगती. वे सही गलत के फर्क को समझ नहीं पाते. ऐसा ही कुछ गीता के साथ भी हुआ.

गीता गंगाराम के अन्य बच्चों से थोड़ा अलग हट कर थी. वह जिद्दी थी, इसलिए उस के मन में जो आता था, वह हर हाल में वही करती थी. उसे लड़कों की तरह रहना, उन्हीं की तरह दोस्ती करना और बिंदास घूमते हुए मस्ती करना कुछ ज्यादा ही अच्छा लगता था. इसलिए वह लड़कों की तरह कपड़े तो पहनती ही थी, अपने बाल भी लड़कों की ही तरह कटवा रखे थे. वह अकसर गांव के लड़कों के साथ घूमती रहती थी. उम्र के साथ उस के बदन में ही नहीं, सुंदरता में भी निखार आ गया था.

गंगाराम के पास ट्रैक्टर भी था और मोटरसाइकिल भी. गीता दोनों ही चीजें चला लेती थी. इसलिए उस का जब मन होता, वह मोटरसाइकिल ले कर घूमने निकल जाती. उसे लड़कों से कोई परहेज नहीं था, इसलिए गांव के लड़के उस के आसपास मंडराते रहते थे. गीता नादान तो थी नहीं कि उन लड़कों की मंशा न समझती, इसलिए अपने बिंदासपन से वह उन्हें अंगुलियों पर नचाती रहती थी. लेकिन उन लड़कों को इस का फायदा भी मिलता था. वे लड़के गीता से जो चाहते थे, वह उन्हें मिला भी.

फिर तो गांव में गीता को ले कर तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस सब की जानकारी गीता के पिता गंगाराम को हुई तो उस ने गीता पर बंदिशें लगाईं. लेकिन गीता अब काबू में आने वाली कहां थी. कोई न कोई बहाना बना कर वह घर से निकल जाती. कोई ऊंचनीच न हो जाए, इस डर से गंगाराम गीता के लिए लड़के की तलाश करने लगा. जल्दी ही उस की यह तलाश खत्म हुई और उसे बरेली के ही थाना नवाबगंज के गांव लावाखेड़ा निवासी परमानंद का बेटा मनोज मिल गया.

परमानंद भी किसान थे. उस के पास भी ठीकठाक खेती थी, जिस की वजह से उस के यहां भी गांवदेहात के हिसाब से किसी चीज की कमी नहीं थी. उस के परिवार में पत्नी उर्मिला के अलावा 3 बेटियां और 2 बेटे मनोज तथा चैतन्य स्वरूप थे. बेटियों का वह विवाह कर चुका था. अब मनोज का नंबर था. यही वजह थी कि जब गंगाराम उस के यहां अपने किसी रिश्तेदार के माध्यम से रिश्ता ले कर पहुंचा तो बात बन गई. इस के बाद सारे रस्मोरिवाज पूरे कर के मनोज और गीता को शादी के गठबंधन में बांध दिया गया. यह शादी फरवरी, 2009 में हुई थी.

गीता सुंदर तो थी ही, साथ ही उस में वे सारे गुण विद्यमान थे, जो पुरुषों को दीवाना बना देते हैं. यही वजह थी कि गीता ने अपनी अदाओं से पहली ही रात में मनोज को अपना दीवाना बना दिया था. गीता पहली ही रात में समझ गई कि उसे पति उस के मनमाफिक मिला है. वह जैसा सीधासादा, अंगुलियों पर नाचने वाला पति चाहती थी, मनोज ठीक वैसा ही निकला था.

2-4 दिनों में ही मनोज गीता के हुस्न में इस कदर खो गया कि हर पल, हर जगह उसे गीता ही गीता नजर आने लगी. उस का गीता को छोड़ कर कहीं जाने का मन ही न होता. खेतों पर भी उस का मन न लगता. लेकिन जिम्मेदारी ऐसी चीज है, जो पत्नी तो क्या, मांबाप से भी दूर होने को मजबूर कर देती है. यही हाल मनोज का भी हुआ. साल भर बाद वह एक बेटे का बाप बना तो खर्च बढ़ते ही उसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास होने लगा.

इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए मनोज को कमाना धमाना जरूरी था, जिस के लिए वह ऊधमसिंहनगर चला गया. वहां उसे टाटा मैजिक के लिए पुर्जे बनाने वाली अल्ट्राटेक कंपनी में नौकरी मिल गई. रहने के लिए उस ने शांति कालोनी रोड स्थित बधईपुरा में जागरलाल के मकान में किराए पर कमरा ले लिया.

कमाईधमाई के लिए मनोज खुद तो ऊधमसिंहनगर चला गया था, लेकिन घरवालों की देखरेख के लिए गीता को गांव में ही मांबाप के पास छोड़ गया था. उस ने एक बार भी नहीं सोचा कि उस के बिना गीता का मन गांव में कैसे लगेगा. शायद उसे लग रहा था कि जिस तरह वह पत्नीबच्चे और परिवार के लिए त्याग कर रहा है, उसी तरह गीता भी कर लेगी.

लेकिन मनोज की यह सोच गलत साबित हुई. क्योंकि गीता को तो शारीरिक संबंधों का चस्का पहले से ही लगा हुआ था. ऐसे में वह बिना पति के कैसे रह सकती थी. उस का दिन तो घर के कामधाम और बच्चे में कट जाता था, लेकिन रातें काटे नहीं कटती थीं. बेचैनी से वह पूरी रात करवटें बदलती रहती थी. शारीरिक सुख के बिना वह बुझीबुझी सी रहती थी. उस की इस बेचैनी और परेशानी को घर का कोई दूसरा सदस्य भले ही नहीं समझ सका, लेकिन पितातुल्य ससुर परमानंद ने जरूर समझ लिया था.

इस की वजह यह थी कि परमानंद लंगोट का कच्चा था. उस के लिए रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण स्त्री का शरीर था. शायद यही वजह थी कि गीता को उस ने देखते ही पसंद कर लिया था. परमानंद अपनी बहू पर शुरू से ही फिदा था. लेकिन बेटे के रहते वह बहू के करीब नहीं जा पा रहा था. बहू के नजदीक जाने के लिए ही उस ने बेटे को जिम्मेदारी का अहसास दिला कर उसे घर से बाहर भेज दिया था.

मनोज के जाने के बाद गीता की बेचैनी बढ़ी तो परमानंद गीता के नजदीक जाने की कोशिश करने लगा. वह उस से बातें करने के बहाने ढूंढ़ने लगा. गीता उस से बातें करती तो वह अकसर बातें करते करते अपनी सीमाएं लांघ जाता. वह उसे कोई सामान पकड़ाती तो सामान पकड़ने के बहाने वह उसे छूने (Extramarital Affairs) की कोशिश करता. ससुर की इन हरकतों से अनुभवी गीता को समझते देर नहीं लगी कि वह उस से क्या चाहता है. गीता को शक तो पहले से ही था, लेकिन जब निगाहें बदलीं और परमानंद बातबात में हंसीमजाक करने लगा तो उस का शक यकीन में बदल गया.

परमानंद देखने में ही जवान नहीं था, बल्कि शरीर से भी हृष्टपुष्ट था. इस की वजह यह थी कि वह अपने शरीर और खानपान का विशेष ध्यान रखता था. बच्चे सयाने हो गए हैं, यह कह कर पत्नी उर्मिला उसे पास नहीं फटकने देती थी. जबकि परमानंद अभी खुद को जवान समझता था और स्त्रीसुख की लालसा रखता था.

परमानंद को इस बात की जरा भी चिंता नहीं थी कि गीता उस की बेटी की उम्र की तो है ही, उस की बहू भी है. वह वासना में इस कदर अंधा हो गया था कि मर्यादा ही नहीं, रिश्ते नाते भी भूल गया. गीता अब उसे सिर्फ एक औरत नजर आ रही थी, जो उस की शारीरिक भूख शांत कर सकती थी. यहां परमानंद ही नहीं, गीता भी अपनी मर्यादा भुला चुकी थी. यही वजह थी कि वह परमानंद की किसी अशोभनीय हरकत का विरोध नहीं कर रही थी, जिस से उस की हिम्मत और हसरतें बढ़ती जा रही थीं. फिर तो एक स्थिति यह आ गई कि परमानंद की रात की नींद गायब हो गई. अब वह मौके की तलाश में रहने लगा.

आखिर उसे एक दिन तब मौका मिल गया, जब पत्नी मायके गई हुई थी. गरमी के दिन होने की वजह से बाकी बच्चे अंदर सो रहे थे. गीता घर के काम निपटा कर बाहर दालान में आई तो ससुर को बेचैन हालत में करवट बदलते देखा. उसे लगा ससुर की तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए उस ने उस के पास आ कर पूछा, ‘‘लगता है, आप की तबीयत ठीक नहीं है?’’

परमानंद हसरत भरी निगाहों से गीता को ताकते हुए बोला, ‘‘तुम इतनी दूरदूर रहोगी तो तबीयत ठीक कैसे रहेगी.’’

गीता को परमानंद की बीमारी का पहले से ही पता था. बीमार तो वह खुद भी थी. इसीलिए तो मौका देख कर उस के पास आई थी. उस ने चाहतभरी नजरों से परमानंद को ताकते हुए कहा, ‘‘यह आप का भ्रम है. मैं आप से दूर कहां हूं बाबूजी. आप के आगेपीछे ही तो घूमती रहती हूं.’’

अब गीता इस से ज्यादा क्या कहती. परमानंद ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा तो वह खुद ही उस के ऊपर गिर पड़ी. इस तरह एक बार मर्यादा की दीवार गिरी तो उस पर रोजरोज वासना की इमारत खड़ी होने लगी. गीता का तो मर्यादा से कभी कोई नाता ही नहीं रहा था, उसी में उस ने ससुर को भी शामिल कर लिया. परमानंद की संगत में आ कर वह शराब भी पीने लगी. अब वह शराब पी कर ससुर के साथ आनंद उठाने लगी. कुछ दिनों बाद उस ने अपने चचिया ससुर से भी संबंध बना लिए.

ये ऐसा रिश्ता है, जिसे कितना भी छिपाया जाए, छिपता नहीं है. किसी दिन उर्मिला ने गीता को परमानंद के साथ रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. लेकिन उन दोनों पर इस का कोई असर नहीं पड़ा. जब घर का मुखिया ही पतन के रास्ते पर चल रहा हो तो घर के अन्य लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते. उर्मिला भी जब ससुरबहू के इस मिलन को नहीं रोक पाई तो उस ने यह बात अपने बेटे मनोज को बताई.

मनोज जानता था कि उस का बाप और पत्नी बरबादी की राह पर चल रहे हैं, इसलिए वह भाग कर गांव आया. बाप से वह कुछ कह नहीं सकता था, उस ने गीता को समझाने की कोशिश की. लेकिन गीता अब कहां मानने वाली थी. हार कर मनोज उसे अपने साथ ले गया. मनोज का विचार था कि गीता साथ रहेगी तो ठीक रहेगी. लेकिन जिस की आदत बिगड़ चुकी हो, वह कैसे सुधर सकती है. बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे, जो ऐसे मामलों में सुधरने के बारे में सोचते हैं.

मनोज के नौकरी पर जाते ही गीता आजाद हो जाती. वह कमरे में ताला डाल कर घूमने निकल जाती. उस ने वहां भी अपने रंगढ़ंग दिखाने शुरू किए तो वहां भी रंगीनमिजाज लोग उस के पीछे पड़ गए. उन्हीं में रुद्रपुर की आदर्श कालोनी का रहने वाला शेखर और जगतपुरा का रहने वाला मनोज भटनागर भी था. गीता के दोनों से ही प्रेमसंबंध बन गए. शेखर ने बातें करने के लिए गीता को एक मोबाइल फोन भी खरीद कर दे दिया था. यही नहीं, दोनों गीता की हर जरूरत पूरी करने को तैयार रहते थे. गीता उन के साथ घूमतीफिरती, सिनेमा देखती, होटलों और रेस्तरांओं में खाना खाती. बदले में वह उन्हें खुश करती और खुद भी खुश रहती.

मनोज जागरलाल के जिस मकान में किराए पर रहता था, उसी में उस के बगल वाले कमरे में रामचंद्र मौर्य रहता था. वह जिला बरेली के थाना मीरगंज के अंतर्गत आने वाले गांव गौनेरा का रहने वाला था. था तो वह शादीशुदा, लेकिन वहां वह अकेला ही रहता था. वह वहां एक फैक्ट्री में ठेकेदारी करता था. अगलबगल रहने की वजह से मनोज और रामचंद्र के बीच परिचय हुआ तो दोनों एक ही जिले के रहने वाले थे, इसलिए उन में आपस में खास लगाव हो गया था. जल्दी ही रामचंद्र गीता के बारे में सब कुछ जान गया था. मनोज के काम पर जाते ही वह उस के कमरे पर पहुंच जाता और गीता से घंटों बातें करता रहता.

पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करने में माहिर गीता समझ गई कि रामचंद्र उस के कमरे पर क्यों आता है. वह जान गई कि पत्नी से दूर औरत सुख के लिए बेचैन रामचंद्र उसी के लिए उस के आगेपीछे घूमता है. रामचंद्र गीता से दोगुनी उम्र का था. लेकिन गीता के लिए इस का कोई मतलब नहीं था. उसे मतलब था तो सिर्फ देहसुख और पैसों से, जो चाहने वाले उस पर लुटा रहे थे. तरहतरह के मर्दों के साथ मजा लेने वाली गीता को रामचंद्र का आना अच्छा ही लगा. इसलिए गीता उस का मुसकरा कर स्वागत करने लगी.

फिर तो रामचंद्र को उस के करीब आने में देर नहीं लगी. जल्दी ही दोनों के मन ही नहीं, तन भी एक हो गए. लेकिन जितनी जल्दी वे एक हुए, उतनी ही जल्दी उन की पोल भी खुल गई. एक दिन मनोज फैक्ट्री से जल्दी आ गया तो कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाया तो गीता ने दरवाजा काफी देर बाद खोला. वह मनोज को देख कर चौंकी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे, इसलिए मनोज को लगा, वह सो रही थी. गीता ने सहमे स्वर में पूछा, ‘‘आज तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘फैक्ट्री का जनरेटर खराब था, इसलिए काम नहीं हुआ.’’ कह कर मनोज कमरे में दाखिल हुआ तो सामने पलंग पर रामचंद्र को बैठे देख कर उसे माजरा समझते देर नहीं लगी. मनोज को देख कर वह तेजी बाहर निकल गया. मनोज ने गुस्से से पूछा, ‘‘यह यहां क्या कर रहा था?’’

‘‘पानी पीने आया था.’’ गीता ने हकलाते हुए कहा.

‘‘कमरा बंद कर के पानी पिला रही थी या उस के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी?’’

‘‘तुम्हें यह कहते शरम नहीं आती?’’ गीता चीखी.

‘‘शरम तो तुम्हें आनी चाहिए, जो एक के बाद एक गलत हरकतें करती आ रही हो. अपने मर्द के होते हुए पराए मर्द के साथ गुलछर्रे उड़ा रही हो. तुम्हें तो शरम से डूब मरना चाहिए.’’

‘‘तुम में है ही क्या? तुम न तो पत्नी को संतुष्ट (Extramarital Affairs)  कर सकते हो, न ही उस के खर्चे उठा सकते हो. अगर तुम को इस सब से परेशानी हो रही है तो मुझे छोड़ दो.’’ गीता ने अपना फैसला सुना दिया.

‘‘तू तो चाहती ही है कि मैं तुझे छोड़ दूं तो तू घूमघूम कर गुलछर्रे उड़ाए. तुझे तो अपनी इज्जत की पड़ी नहीं है, लेकिन मुझे तो अपनी इज्जत की फिक्र है. इसलिए सामान बांध लो और अब हम गांव चलते हैं.’’

अगले दिन मनोज ने नौकरी छोड़ दी और हिसाबकिताब ले कर गांव आ गया. कुछ दिनों गांव में रह कर मनोज अकेला ही दिल्ली चला गया, जहां किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी करने लगा. उस के जाते ही गीता फिर आजाद हो गई. अब वह वही करने लगी, जो उस के मन में आता. शेखर और मनोज उस से मिलने उस की ससुराल भी आने लगे. मनोज के पास मोटरसाइकिल थी, गीता का जब मन होता, मोटरसाइकिल ले कर अकेली ही बरेली से रुद्रपुर चली जाती और अपने प्रेमियों से मिल कर वापस आ जाती.

रामचंद्र से गीता को विशेष लगाव था. वह उसी के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताती थी. जब इस सब की जानकारी परमानंद को हुई तो उस ने गीता को रोका. लेकिन वह मानने वाली कहां थी. उस ने एक दिन गीता को रामचंद्र के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो उस ने सरेआम रामचंद्र की पिटाई कर दी. रामचंद्र को यह बुरा तो बहुत लगा, लेकिन वह उस समय कुछ करने की स्थिति में नहीं था.

गीता को भी ससुर की यह हरकत पसंद नहीं आई. क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे अपनी जागीर समझे और उस की बेलगाम जिंदगी पर अंकुश लगाए. जब उस ने अपने पति मनोज की बात नहीं मानी तो परमानंद की बात कैसे मानती. यही वजह थी कि परमानंद बारबार उस के रास्ते में रोड़ा बनने लगा तो उस ने इस रोड़े को हमेशा के लिए हटाने की तैयारी कर ली. इस के लिए उस ने रामचंद्र को भी राजी कर लिया. वह राजी भी हो गया, क्योंकि वह भी उस से अपनी बेइज्जती का बदला लेना चाहता था.

गीता ने ससुर को ठिकाने लगाने की जो योजना बनाई थी, उसी के अनुसार 27 जुलाई को वह परमानंद को मोटरसाइकिल से रुद्रपुर रामचंद्र के कमरे पर ले गई. देर रात तक गीता, रामचंद्र और परमानंद बैठ कर शराब पीते रहे. गीता और रामचंद्र ने तो खुद कम पी, जबकि परमानंद को जम कर पिलाई. यही नहीं, उस की शराब में नींद की गोलियां भी मिला दी थीं, जिस से कुछ ही देर में वह बेहोश हो कर लुढ़क गया. उस के बाद गीता और रामचंद्र ने उसी के अंगौछे से उस का गला घोंट दिया.

इस के बाद गीता ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की तो रामचंद परमानंद की लाश को बीच में बैठा कर पीछे स्वयं बैठ गया. गीता मोटरसाइकिल ले कर काला डूंगी रोड पर भाखड़ा नदी के किनारे पहुंची, जहां दोनों ने परमानंद की लाश को बोरी में कुछ ईंटों के साथ डाल कर नदी के पानी में फेंक दिया. इस के बाद गीता रुद्रपुर में ही रामचंद्र के कमरे पर कई दिनों तक रुकी रही.

11 अगस्त को गीता मोटरसाइकिल से अपनी ससुराल लावाखेड़ा पहुंची तो परमानंद के छोटे बेटे चैतन्य स्वरूप ने पिता के बारे में पूछा. तब गीता ने किसी रिश्तेदारी में जाने की बात कह कर बात खत्म कर दी. 2 दिन ससुराल में रह कर गीता फिर चली गई. गीता के जाने के बाद कई दिनों तक परमानंद नहीं लौटा तो घर वालों को चिंता हुई.

उन्हें गीता पर शक हुआ कि कहीं उस ने अपने प्रेमियों शेखर और मनोज के साथ मिल कर उस की हत्या तो नहीं करा दी. चैतन्य स्वरूप ने कोतवाली नवाबगंज जा कर अपने पिता के गायब होने की सूचना दी. उस समय इंसपेक्टर अशोक कुमार के पास कोतवाली का भी चार्ज था. उन्हें लगा कि बहू ससुर को क्यों गायब करेगी? यही सोच कर उन्होंने चैतन्य को लौटा दिया. परमानंद का परिवार उस की तलाश में लगा रहा. उसी बीच 21 अगस्त को इंसपेक्टर अशोक कुमार का तबादला हो गया तो उन की जगह आए इंसपेक्टर जे.पी. तिवारी. चैतन्य स्वरूप उन से मिला तो उन्होंने उस से तहरीर ले कर शेखर और मनोज भटनागर के खिलाफ अपराध संख्या-827/13 पर भादंवि की धारा 364 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर गीता के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया.

सर्विलांस सेल के पुलिसकर्मियों की गीता से कई बार बात हुई. गीता उन से कभी गुजरात में होने की बात कहती तो कभी हरियाणा में होने की बात बताती, जबकि उस की लोकेशन बरेली के आसपास की ही थी. पुलिस समझ गई कि गीता बहुत ही शातिर है. गीता के नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि वह सब से अधिक अपनी बड़ी बहन ललिता से बात करती थी. इंसपेक्टर जे.पी. तिवारी ने ललिता और उस के पति प्रमोद को थाने ला कर पूछताछ की तो उन्होंने गीता का ठिकाना बता दिया. गीता उस समय बरेली के थाना मीरगंज के सामने राजेंद्र सेठ के मकान में किराए का कमरा ले कर रह रही थी. उसी के साथ रामचंद्र मौर्य भी था. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. यह 23 दिसंबर, 2013 की बात है.

पूछताछ में गीता और रामचंद्र ने परमानंद की हत्या का अपराध स्वीकार कर के उस की हत्या की पूरी कहानी सिलसिलेवार बता दी. पुलिस ने दोनों को रुद्रपुर ले जा कर उन की निशानदेही पर भाखड़ा नदी से परमानंद की लाश बरामद करने की कोशिश की, लेकिन लाश बरामद नहीं हो सकी. इस के बाद पुलिस ने दोनों को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. लाश की बरामदगी के लिए एक बार फिर पुलिस दोनों को रिमांड पर लेने का प्रयास कर रही थी. लेकिन कथा लिखे जाने तक दोनों का रिमांड मिला नहीं था.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

साले से प्‍यार कर बैठी बहन तो भाई ने मरवा डाला

मीनू की शादी दमकल विभाग में फायरमैन लल्लू सिंह के साथ कर के परिवार के सब लोग खुश थे. लल्लू सिंह हर तरह से मीनू का खयाल रखता था. इसी बीच एक ऐसी घटना घटी कि मीनू के इकलौते भाई धर्मेंद्र सिंह यादव ने न सिर्फ मीनू बल्कि उस के पति और दोनों बच्चों की हत्या कराने के लिए बदमाशों को 10 लाख की सुपारी भी दे दी. आखिर, धर्मेंद्र के दिल में ऐसी कौन सी आग धधक रही थी? पढ़ें, यह दिलचस्प कहानी.

मीनू ने अपने मायके आनाजाना शुरू किया तो पूरे गांव में उस के प्रेम प्रपंच और भागने की चर्चाएं शुरू हो गईं. पुराने घाव हरे हुए तो भाई धर्मेंद्र यादव तिलमिला उठा. गांव में अब फिर से उस की बदनामी होने लगी थी. एक रोज तो हद ही हो गई जब उस के दोस्त ने उसे धिक्कारा, ”धर्मेंद्र, तू कैसा मर्द है. तूने तो यदुवंशियों की नाक ही कटवा दी. यदि मेरी बहन भाग कर वापस आती तो मैं उसे व भगाने वाले को ऐसा सबक सिखाता कि वह ताउम्र नहीं भूलते.’’

दोस्त की बात धर्मेंद्र के दिल में उतर गई. वह मीनू और उस के प्रेमी सूरज को सबक सिखाने की कसम तो पहले ही खा चुका था. लेकिन बेइज्जती का बदला लेने के लिए अब धर्मेंद्र ने सूरज के पूरे परिवार को ही खत्म करने का निश्चय किया. इस के लिए वह सुपारी किलर की तलाश में जुट गया. कुछ समय बाद धर्मेंद्र को अपराधी चतुर सिंह व वीर सिंह के बारे में पता चला. दोनों कुछ दिनों पहले ही जेल से छूट कर आए थे. चतुर सिंह कानपुर देहात के सिकंदरा कस्बे का रहने वाला था, जबकि वीर सिंह कानपुर देहात के किशनपुर गांव में रहता था. वीर सिंह चतुर सिंह का साढ़ू था. दोनों हार्ड क्रिमिनल थे.

धर्मेंद्र सिंह ने एक शाम चतुर सिंह व वीर सिंह से मुलाकात की. धर्मेंद्र ने उन्हें पूरी बात बताई और बहन मीनू के परिवार को मिटाने की बात कही. काफी देर तक चतुर सिंह सोचता रहा, फिर हत्या की सुपारी लेने को राजी हो गया. इस के बाद धर्मेंद्र ने बहन के परिवार को मिटाने के लिए 10 लाख रुपए की सुपारी चतुर सिंह को दे दी. 3 लाख रुपए बतौर एडवांस उस ने चतुर सिंह को दे भी दिए और बाकी रकम काम तमाम होने के बाद देने का वादा किया. इस के बाद चतुर सिंह ने हत्या की योजना में साढ़ू वीर सिंह के अलावा अपने फूफा जगमोहन उर्फ कल्लू तथा कार ड्राइवर संजीव को भी शामिल कर लिया.

जगमोहन उर्फ कल्लू कानपुर देहात के गांव महकापुर का रहने वाला था, जबकि संजीव कानपुर देहात के मंगलपुर कस्बे का रहने वाला था. वह अपनी निजी कार का प्रयोग शादीबारात व धार्मिक स्थानों पर जाने के लिए करता था. अपनी योजना को अंजाम देने के लिए चतुर सिंह ने सब से पहले गुजैनी स्थित उस मकान का पता लगाया, जहां मीनू अपने पति सूरज व बच्चों के साथ रहती थी. चतुर सिंह मीनू के घर के पासपड़ोस में ही किराए का कमरा ले कर उस के परिवार से निकटता बढ़ाना चाहता था. एक दिन वह कमरे की तलाश में मीनू के घर के बाहर चहलकदमी कर रहा था, तभी मीनू के पति सूरज की निगाह उस पर पड़ी. उस ने पूछा, ”चाचा, कुछ परेशान लग रहे हो. किसे खोज रहे हो?’’

चतुर सिंह गमछे से पसीना पोंछता हुआ बोला, ”बेटा, मुुझे एक किराए के कमरे की तलाश है. कई दिनों से ढूंढ रहा हूं. लेकिन कोई सही कमरा मिल नहीं रहा है.’’

सूरज बोला, ”चाचा, इस मकान के ग्राउंड फ्लोर पर एक कमरा खाली तो है, लेकिन मुझे उस के लिए मकान मालिक से बात करनी पड़ेगी. तुम एकदो दिन बाद आना.’’

इस के बाद सूरज ने मकान मालिक अरविंद से बात की फिर चतुर सिंह को वह कमरा किराए पर दिलवा दिया.

हत्यारे ने पहले क्यों सूरज का जीता दिल

किराए का कमरा लेने के बाद चतुर सिंह ने सूरज के परिवार से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दी. वह उन के बच्चों से खूब प्यार जताता तथा उन्हें खिलाता, टौफी, बिसकुट व नमकीन ला कर देता. मीनू व सूरज उसे चाचा कह कर बुलाते थे. वह उस के खानपान का भी खयाल रखता था. जल्द ही चतुर सिंह ने उन का भरोसा जीत लिया. इस बीच वह संजीव की कार से सूरज व उस के परिवार को चित्रकूट के दर्शन भी करा लाया था. भरोसा जीतने के बाद चतुर सिंह ने सूरज के परिवार को मिटाने के लिए एक बार फिर योजना बनाई. इस योजना में वीर सिंह, जगमोहन उर्फ कल्लू, संजीव के अलावा मीनू का भाई धर्मेंद्र भी शामिल हुआ. योजना बनी कि सूरज को परिवार सहित चित्रकूट के दर्शन के बहाने कार से ले जाया जाए, फिर रास्ते में ही सब को निपटा दिया जाए.

इस के बाद चतुर सिंह ने मीनू से चित्रकूट दर्शन के लिए जाने की बात कही तो वह राजी हो गई. उस ने अपने पति सूरज को भी राजी कर लिया. इस के बाद वे तैयारी में जुट गए. योजना के तहत 21 सितंबर, 2024 की शाम संजीव अपनी 7 सीटर अर्टिगा कार ले कर गुजैनी पहुंचा. कार में चतुर सिंह व वीर सिंह भी थे. सूरज अपनी पत्नी मीनू व 10 वर्षीय बेटे तथा 3 वर्षीया बेटी के साथ जैसे ही कार में सवार हुआ, वैसे ही कार चल पड़ी. जोल्हूपुर मोड़ पर चतुर सिंह ने अपने रिश्ते के फूफा जगमोहन उर्फ कल्लू को भी कार में बिठा लिया.

इस के बाद चित्रकूट दर्शन के लिए संजीव ने बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे पर राठ के लिए कार दौड़ा दी. राठ क्रास करते ही चतुर सिंह व जगमोहन सूरज व उस की पत्नी मीनू के गले में गमछा डाल दिया और कसने लगे. सूरज संघर्ष कर चलती कार से कूद गया. उस के बाद चतुर सिंह व जगमोहन ने मीनू का गला घोंट दिया और शव को गोहांड कस्बे के आगे सड़क किनारे खेत की झाडिय़ों में फेंक दिया. इसी बीच वीर सिंह ने 10 वर्षीय बेटे का गला बेल्ट से कसा और उसे मरा समझ कर सड़क किनारे फेंक दिया. फिर संजीव ने कार को वापस कानपुर की ओर मोड़ दी. औरैया के इंडियन आयल पेट्रोल पंप के पास चतुर सिंह ने मासूम बेटी को उतार दिया. उस के बाद सब फरार हो गए.

सूरज रात भर सड़क किनारे दर्द से कराहता रहा. सुबह होते ही वह उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के थाना जरिया पहुंचा. थाने पर उस समय एसएचओ भरत कुमार मौजूद थे. सूरज ने उन्हें सारी बात बताई और आशंका जाहिर की कि उन बदमाशों ने या तो उस की पत्नी व बच्चों का अपहरण कर लिया है या फिर उन्हें मार डाला है. आप रिपोर्ट दर्ज कर बीवीबच्चों की खोज करें.

पुलिस ऐसे पहुंची हत्यारों तक

मामला बड़ा ही गंभीर व पेचीदा था. इसलिए एसएचओ भरत कुमार ने सूचना जिले के पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही एसपी दीक्षा शर्मा थाना जरिया आ गईं. उन्होंने पहले पीडि़त सूरज से पूछताछ की फिर उस के बीवीबच्चों की खोज के लिए पुलिस टीम का गठन कर दिया. इस टीम में एसएचओ भरत कुमार, एसआई रमाकांत शुक्ला, हैडकांस्टेबल शिवेंद्र सिंह, कपिल कुमार, बृजेश कुमार, एसओजी के एसआई सचिन शर्मा तथा सर्विलांस सेल के कांस्टेबल अतुल कुमार, उमाशंकर व सुरेंद्र मिश्रा को शामिल किया गया.

गठित पुुलिस टीम ने जांच शुरू की. जांच करते पुलिस टीम कानपुर टोल प्लाजा पहुंची और सीसीटीवी फुटेज खंगाला. फुटेज में सूरज ने कार पहचान ली. कार नंबर के आधार पर टीम ने संजीव को कार सहित मंगलपुर से धर दबोचा. उसे थाना जरिया लाया गया. उस ने पूछताछ में बताया कि उस का कोई कुसूर नहीं है. वह डर गया था. बदमाश जैसा कह रहे थे, वह वैसा ही कर रहा था. उस ने बताया कि बदमाशों ने कार में बैठी महिला का गला कस कर मार डाला था और शव को सड़क किनारे फेंक दिया था. संजीव की निशानदेही पर पुलिस टीम ने मृतक महिला का शव गोहांड कस्बे से 100 मीटर दूर सीएचसी के पास खेत की झाडिय़ों से बरामद कर लिया.

इस शव को सूरज ने देखा तो बताया कि शव उस की पत्नी मीनू उर्फ अमन का है. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया. इसी बीच पुलिस टीम को डायल 112 पुलिस से सूचना मिली कि एक 10 वर्षीय बालक बदहवासी हालत में सड़क के किनारे मिला है. उस के गले पर खरोंच के निशान हैं. पुलिस तब उसे थाना जरिया लाई. थाने में सूरज को देख कर वह बच्चा उस से लिपट कर रो पड़ा. सूरज भी रोने लगा. वह सूरज का बेटा था. सूरज को बेटा तो सहीसलामत मिल गया था, लेकिन मासूम बेटी का अभी तक पता न चला था. पुलिस ने कार ड्राइवर की बातों पर विश्वास कर लिया था. फिर भी सूचना छिपाने के जुर्म में उसे जेल भेज दिया. उस की कार को जब्त कर लिया.

दोनों बच्चे ऐसे मिले सहीसलामत

इधर औरैया में इंडियन आयल पेट्रोल पंप के पास लोगों ने मासूम बच्ची को रोते देखा तो उन्होंने सूचना पुलिस को दी. पुलिस ने उस बच्ची से नाम पता पूछा तो वह कुछ भी नहीं बता सकी. तब पुलिस ने पहचान करने के लिए उस का फोटो सोशल मीडिया पर डाल दिया. इस फोटो को जब सूरज ने देखा तो औरैया पहुंचा. उस ने पुलिस को पूरी घटना बताई और कहा यह बच्ची उस की बेटी है. बेटी भी अपने पापा से लिपट कर रोने लगी. बेटी मिलने की सूचना सूरज ने जरिया पुलिस को दे दी. दोनों बच्चों को सहीसलामत पा कर सूरज ने थोड़ा संतोष व्यक्त किया.

पुलिस टीम अब महिला के कातिलों को पकडऩे के लिए जीजान से जुट गई. टीम ने अनेक संभावित स्थानों पर ताबड़तोड़ छापे मार कर कई संदिग्धों को पकड़ा. उन से पूछताछ की. लेकिन कुछ पता नहीं चला. तब पुलिस ने खबरियों का जाल बिछाया और सर्विलांस की मदद ली. 9 अक्तूबर, 2024 की सुबह पुलिस टीम को एक मुखबिर ने सूचना दी कि गोहांड तिराहे के पास 2 संदिग्ध व्यक्ति मौजूद हैं. यदि दबिश दे कर उन्हें पकड़ा जाए तो महिला की हत्या का सुराग मिल सकता है. मुखबिर की इस सूचना पर पुलिस टीम ने उन दोनों की घेराबंदी कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन्हें थाना जरिया लाया गया.

थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो एक ने अपना नाम धर्मेंद्र सिंह तथा दूसरे ने अपना नाम जगमोहन उर्फ कल्लू बताया. उन से जब सख्ती से पूछताछ की गई तो धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि मृतका उस की बहन मीनू उर्फ अमन थी. उस ने बताया कि मीनू उस के पति व बच्चों की योजना उस ने ही बनाई थी. उन्होंने हत्या के पीछे की एक ऐसी हैरतभरी कहानी बताई कि पुलिस वाले भी चौंक गए.

मीनू पति से क्यों नहीं थी खुश

उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जनपद के थाना अकबरपुर का एक गांव है खलीलपुर बाराजोर. फूल सिंह यादव इसी गांव का निवासी था. परिवार में पत्नी लौंगश्री के अलावा 5 बेटियां व एक बेटा धर्मेंद्र सिंह यादव था. फूल सिंह मामूली जमीन से होने वाली पैदावार से अपने भारीभरकम परिवार का भरणपोषण करता था. वह हमेशा आर्थिक परेशानी से जूझता रहता था. फूल सिंह की तीसरे नंबर की बेटी का नाम मीनू उर्फ अमन था. वह अपनी अन्य बहनों से कुछ ज्यादा ही खूबसूरत थी. मीनू ने 15 वर्ष की अवस्था पार की तो उस का अंगअंग फूलों की तरह खिल उठा. उस का गोरा रंग और झील सी गहरी आंखें किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकती थीं. कुदरत ने उसे रूपयौवन से नवाजा था.

मीनू हंसमुख व चंचल स्वभाव की थी. उस का मन पढऩेलिखने में कम और संजनेसंवरने में ज्यादा ला रहता था. उस ने जैसेतैसे अकबरपुर इंटर कालेज से हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी. उस के बाद पढ़ाई बंद कर मम्मी के साथ घर के काम में सहयोग करने लगी थी. उस के मम्मीपापा भी उसे आगे नहीं पढ़ाना चाहते थे. गरीब का धन इज्जत होती है. इस के पहले कि उस की अल्हड़ जवान बेटी पर किसी मनचले की बुरी नजर पड़े, फूल सिंह यादव उस का विवाह कम उम्र में ही कर देना चाहता था. इस के लिए वह प्रयास भी करने लगा था. काफी दौडऩेभागने के बाद उसे एक युवक पसंद आ गया. उस का नाम था लल्लू सिंह.

लल्लू सिंह के पिता राजेंद्र सिंह कानपुर देहात जनपद के गांव कथरी में रहते थे. उस के परिवार में पत्नी राजरानी के अलावा 2 बेटियां व 2 बेटे थे. बेटियों का वह विवाह कर चुका था. उस का बड़ा बेटा लल्लू सिंह फायर पुलिस में फायरमैन था. उस समय उस की तैनाती उरई (जालौन) में थी. फूल सिंह ने लल्लू सिंह को देखा तो उस का मन कसैला हो गया. कारण, एक तो उस का रंग सांवला था, दूजे वह उस की बेटी मीनू से दुगनी उम्र का था. लेकिन गरीबी ने उसे मजबूर कर दिया. उस ने सोचा कि उम्र ही तो अधिक है, बाकी सब तो ठीक है. सरकारी नौकरी है. पक्का मकान है. जमीनजायदाद है. बेटी राज करेगी.

फूल सिंह कई दिनों तक पशोपेश में पड़ा रहा. इस बीच उस ने पत्नी व बड़े बेटे धर्मेंद्र यादव से भी सलाहमशविरा किया. जब सब की रजामंदी हो गई, तब फूल सिंह ने बेटी का रिश्ता तय कर दिया. उस के बाद फरवरी 2002 में बसंत पंचमी के दिन मीनू उर्फ अमन का विवाह लल्लू सिंह के साथ कर दिया. शादी के बाद मीनू लल्लू सिंह की दुलहन बन कर ससुराल आ गई. मुंहदिखाई की रस्म में मीनू को जिस ने भी देखा, उसी ने उस के रूप की तारीफ की. सुहागरात को जब लल्लू सिंह ने घूंघट उठाया तो वह पत्नी को देखता ही रह गया. खूबसूरत पत्नी को पा कर वह अपने भाग्य पर इतरा उठा.

दूसरी ओर जब मीनू ने पति को देखा तो वह चिंता में डूब गई. बदसूरत और अपनी उम्र से दोगुनी उम्र के पति को पा कर वह अपने भाग्य को कोसने लगी. उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. उस ने सुहागरात को ले कर न जाने क्याक्या सपने संजोए थे, लेकिन उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे. वह जान गई कि उसे सारी जिंदगी प्यासे ही गुजारनी पड़ेगी. न चाहते हुए भी मीनू पति के साथ रहने लगी. लल्लू सिंह मीनू को खुश रखने की पूरी कोशिश करता था. उस की हर डिमांड भी पूरी करता था, परंतु मीनू खुश नहीं थी. वह हर समय उदास व खोईखोई सी रहती थी.

मीनू व लल्लू सिंह के दांपत्य जीवन की शुरुआत ही घृणा और नफरत से हुई थी. धीरेधीरे यह नफरत बढऩे लगी थी. लल्लू सिंह दमकल विभाग में सिपाही था. उस को बहुत कम छुट्टी मिलती थी. वह जब भी घर आता और पत्नी से प्रणय निवेदन करता तो वह सहवास को राजी नहीं होती. वह उसे ताना भी मारती और कहती, ”तुम में मर्दानगी नहीं है.’’

मीनू और सूरज की ऐसे बढ़ीं नजदीकियां

मर्दानगी पर चोट असहनीय होती है. इसलिए पत्नी की बात सुन कर लल्लू भी उखड़ जाता. दोनों में झगड़ा होता. इस दौरान जोरजबरदस्ती कर वह मीनू से संबंध भी बनाता. छुट्टी खत्म होने के बाद वह चला जाता. मीनू की सास दोनों के झगड़ों के बीच कम ही दखल देती थी. वह बहू को समझाती भी थीं. इस तरह नीरस जिंदगी व्यतीत करते 3 साल से अधिक का समय बीत गया था, लेकिन मीनू की गोद सूनी थी. इस का दोष मीनू पति को देती थी. जबकि लल्लू सिंह मीनू में कमी बताता था. इन बातों को ले कर भी दोनों के बीच खूब तूतूमैंमैं होती थी. मीनू कभी कभी रूठ कर मायके भी चली जाती थी, फिर तभी वापस आती थी जब लल्लू सिंह नाक रगडऩे जाता था.

वर्ष 2007 के मई महीने में मीनू के भाई धर्मेंद्र सिंह यादव की शादी विमला से तय हुई. विमला के पिता छोटेलाल यादव कानपुर के मदारीपुर गांव के रहने वाले थे. उस के 6 बेटे व एक बेटी विमला थी. छोटेलाल दबंग किसान था. ग्राम प्रधान भी चुका था. गांव में उस की तूती बोलती थी. भाई धर्मेंद्र की शादी में मीनू ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और सारी व्यवस्था संभाली. वह बारात में भी गई. भाई की शादी में ही मीनू की मुलाकात भाई के साले सूरज सिंह से हुई. सजीधजी मीनू को देख कर सूरज उस की ओर आकर्षित हो उठा. शादी में दोनों के बीच खूब बातें हुईं. जब तक बहन की डोली उठ नहीं गई, तब तक सूरज मीनू के आगेपीछे ही मंडराता रहा.

लगभग एक सप्ताह बाद सूरज बहन की चौथी लेने आया तो मीनू मायके में ही थी. यहां भी दोनों के बीच खूब हंसीठिठोली तथा बातचीत हुई. मीनू को जहां सूरज की लच्छेदार बातें पसंद थीं तो वहीं सूरज मीनू की खूबसूरती पर फिदा था. अब तक मीनू ने भाभी विमला से भी दोस्ती कर ली थी. ननदभौजाई के बीच भी खूब हंसीमजाक होती थी. विमला अपने भाई सूरज के स्वभाव की खूब तारीफ करती थी. शादीशुदा मीनू सूरज के दिलोदिमाग पर छाई तो वह बहन से मिलने के बहाने उस के घर आने लगा. दरअसल, वह आता तो मीनू के लिए था. बहन से मिलना तो एक बहाना होता था. इसी आनेजाने में मीनू और सूरज के बीच नजदीकियां बढऩे लगीं. दोनों एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे.

भाई की शादी में आई मीनू लगभग 3 महीने तक मायके में रही, उस के बाद वह ससुराल चली गई. अब तक लल्लू सिंह ने उरई में एक मकान किराए पर ले लिया था. इसी मकान में वह पत्नी मीनू के साथ रहने लगा. मीनू उरई में आई तो उस ने कुछ राहत की सांस ली. क्योंकि अब वह बनसंवर कर रहने लगी थी. पति का साथ भी उसे मिलने लगा था. न घूंघट का झंझट रहा था और न ही सासससुर का प्रतिबंध. इधर सूरज को पता चला कि मीनू उरई आई है तो वह उस से मिलने यहां भी पहुंचने लगा. मीनू के करीब आने के लिए सूरज जब भी आता, उस के लिए कोई न कोई गिफ्ट जरूर लाता. वह उस की खूबसूरती की भी खूब तारीफ करता था.

इस से मीनू महसूस करने लगी थी कि उस के पति और सूरज में कितना अंतर है. उस का पति सुबह ड्यूटी पर जाता तो देर रात ही थकाहारा लौटता था. उसे यह तक जानने की फुरसत नहीं थी कि उस का प्यासा मन और भूखा जिस्म क्या चाहता है.

एक रोज दोपहर में सूरज मीनू के घर आया तो वह किसी सोच में डूबी थी. उस की हालत देख कर सूरज बोला, ”क्या बात है मीनू, तुम उदास क्यों हो? पति से झगड़ा हुआ है क्या?’’

”नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. मैं तो अपनी किस्मत को कोस रही हूं, जो ऐसा पति मिला है. जब मैं उस के साथ बाजार जाती हूं तो लोग यही समझते हैं कि मैं उस की बेटी हूं. उम्र का फासला लोगों में भ्रम पैदा करता है.’’

”शायद तुम सही कह रही हो मीनू. कहां तुम हूर की परी और कहां वह. तुम दोनों का किसी तरह का मेल नहीं. तुम्हारे तो सारे सपने शायद टूट गए होंगे.’’

सूरज ने मीनू से सहानुभूति जताई तो वह मुसकरा कर उसे ताकने लगी. सूरज के मन में क्या है, यह तो वह पहले से जानती थी, सिर्फ संकोच ही उसे रोके था. मीनू की निगाहों को देखते हुए सूरज मदहोश होने लगा. उस ने बांहें फैलाईं तो मीनू मछली की तरह फिसल कर सूरज की बांहों में आ गई. फिर तो मर्यादा टूटते देर नहीं लगी. दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. शारीरिक सुख की भूखी मीनू को सूरज का साथ मिला तो उसे कुछ खयाल ही न रहा. वह यह भी भूल गई कि वह शादीशुदा है, उस की एक मर्यादा है. लेकिन एक बार मर्यादा टूटी तो फिर दोनों अकसर मन की करने लगे. उन्हें जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में समा जाते. किसी को कानोंकान खबर न लगती.

और खुल गई मीनू और सूरज के संबंधों की पोल

मीनू और सूरज के बीच नाजायज रिश्ता बना तो उस का उरई आनाजाना बढ़ गया. सूरज के आनेजाने की भनक पड़ोसियों को हुई तो उन का माथा ठनका. उन्होंने यह बात लल्लू सिंह को बताई. लल्लू सिंह समझ गया कि पड़ोसी उस से क्या कहना चाहते हैं. शाम को वह घर लौटा तो उस ने मीनू से सीधा सवाल किया, ”मीनू, मेरी गैरमौजूदगी में तुम से मिलने कौन आता है?’’

”अच्छा तो यह बात है. लगता है कि पड़ोसियों ने तुम्हारे कान भरे हैं. लेकिन जान लो, मुझ से मिलने कभीकभार सूरज आता है. वह मेरे भाई धर्मेंद्र का साला है. गांव मदारीपुर का रहने वाला है. उस की बहन विमला मेरे भाई को ब्याही है. सूरज खास रिश्तेदार है. जब कभी किसी काम से उरई आता है तो मुझ से मिलने भी आ जाता है. इस में बुराई क्या है?’’

लल्लू सिंह बोला, ”बुराई है. क्योंकि वह तुम से ही मिलने आता है. उस में खोट न होती तो वह मुझ से भी मिलता, मुझ से भी बात करता. चोर की तरह नहीं आताजाता.’’

पति के तेवर देख कर मीनू समझ गई कि वह उस के और सूरज के संबंधों को भांप गया है, फिर भी उस ने कहा, ”अपनी बीवी पर शक करते हुए शर्म नहीं आती तुम्हें? बाहर किसी ने कुछ उलटासीधा कह दिया तो इस का मतलब यह नहीं कि तुम मुझ पर शक करो?’’

लल्लू सिंह ने ठंडी सांस ले कर सोचा तो उसे लगा कि वह ठीक ही तो कह रही है. लोग तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं. उसे उन की बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए. यह सोच कर उस ने अपने दिल को समझा लिया. बेशक मीनू ने पति की शंका पर परदा डाल कर विराम लगा दिया था, लेकिन उसे और सूरज को ले कर पड़ोस में होने वाली चर्चाएं बंद नहीं हुईं. इंसान का मन कब फिसल जाएगा, कोई नहीं जानता. जब से सूरज के मन में मीनू के लिए प्यार जगा था, तब से वह यह भी भूल गया था कि मीनू उस के बहनोई की बहन है. उसे इस नाजुक रिश्ते को कलंकित नहीं करना चाहिए था. लेकिन इश्क में वह सब भूल गया था.

लल्लू सिंह के मन में शक की फांस चुभने लगी थी. इसलिए वह पत्नी मीनू पर निगरानी रखने लगा था. एक दिन वह ड्यूटी पर जाने के लिए घर से निकला जरूर, लेकिन दोपहर को ही वापस आ गया. घर में उस समय सूरज मौजूद था. कमरे का दृश्य देख कर लल्लू सिंह समझ गया कि कुछ देर पहले ही कमरे में हवस का तूफान गुजरा है. सूरज और मीनू के हावभाव भी बता रहे थे कि दोनों गलती कर चुके हैं. उस रोज लल्लू सिंह अपने गुस्से पर काबू न रख सका. उस ने सूरज को तो डांटाफटकारा और गालीगलौज कर भगा दिया. उस के बाद वह मीनू पर कहर बन कर टूट पड़ा. उस ने मीनू को तब तक पीटा, जब तक वह थक नहीं गया. मीनू रात भर रोतीकराहती रही.

दूसरे रोज लल्लू सिंह अपनी ससुराल पहुंचा और अपने साले धर्मेंद्र यादव को बताया कि उस की बहन मीनू बदचलन है. उस ने उस की इज्जत खाक में मिला दी है. उस का नाजायज रिश्ता उस के साले सूरज से है. तुम सूरज को समझा दो कि वह दूसरे के घर में आग न लगाए. आज के बाद अगर मैं ने उसे घर में देख लिया तो अंजाम बुरा होगा. बहनोई की बात सुन कर धर्मेंद्र सिंह यादव के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. वह बोला, ”जीजाजी, आप को जरूर कोई गलतफहमी हुई है. मेरी बहन मीनू बदचलन नहीं हो सकती. फिर जिस सूरज की आप बात कर रहे हैं, वह मेरा साला है. वह भी ऐसी नीच हरकत नहीं कर सकता.’’

”लेकिन ऐसा ही हुआ है. उन दोनों ने ही मर्यादा तोड़ी है. विश्वास का खंजर उन्होंने हम दोनों की पीठ पर घोंपा है.’’ लल्लू सिंह ने सफाई देते हुए कहा.

सूरज धर्मेंद्र का साला था. उस ने उस की इज्जत पर हाथ डाला था, इसलिए उस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने सूरज को घर बुलवाया फिर उसे खूब डांटा और सख्त हिदायत दी कि वह मीनू से मिलने न जाए. इस के बाद वह उरई पहुंचा और मीनू को भी खूब खरीखोटी सुनाई और सूरज से न मिलने की हिदायत दी. विमला ने भी ननद मीनू व भाई सूरज को खूब समझाया. उस ने आशंका जताई कि उन दोनों के गलत काम से उस का भी घर टूट सकता है.

मीनू और सूरज पर प्रतिबंध लगा तो उन का शारीरिक मिलन बंद हो गया. लल्लू सिंह मीनू पर कड़ी नजर रखने लगा तो धर्मेंद्र साले सूरज की निगरानी करने लगा. जीजासाले के बीच नफरत भी बढ़ गई थी. रिश्ते में आई दरार से विमला परेशान रहने लगी थी. वह पति को समझाने का प्रयास करती थी.

भाग कर सूरज के साथ मीनू ने क्यों की दूसरी शादी

इधर मीनू और सूरज का मिलन बंद हुआ तो वह तड़प उठे. दोनों एकदूसरे की यादों में ही खोए रहते थे. आखिर जब उन दोनों से रहा नहीं गया तो एक दिन मौका देख कर मीनू और सूरज मिले. मीनू ने कहा, ”सूरज, अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. मुझे कहीं दूर ले चलो. मैं हर वक्त शक के घेरे में रहती हूं. तुम्हारी वजह से पिटती रहती हूं.’’

सूरज भी भावुक हो उठा, ”मीनू, जो हाल तुम्हारा है, वही मेरा भी है. मैं भी तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. अब तो बस एक ही रास्ता बचा है कि हम दोनो कहीं दूर भाग चलें और अपनी दुनिया बसा लें. वहां किसी का डर नहीं होगा.’’ इस के बाद उन दोनों ने भागने की तैयारी शुरू कर दी. नवंबर 2010 की 13 तारीख को मीनू और सूरज उरई रेलवे स्टेशन पर मिले, फिर अहमदाबाद जाने वाली ट्रेन में बैठ कर रफूचक्कर हो गए. उन्होंने भागने की ऐसी गुप्त योजना बनाई थी कि किसी को कानोंकान खबर न लगी.

इधर देर शाम लल्लू सिंह ड्यूटी से घर वापस आया तो घर में उस की पत्नी मीनू नदारद थी. उस ने मीनू की हर संभावित जगह खोज की, लेकिन जब नहीं मिली तो वह समझ गया कि मीनू सूरज के साथ भाग गई है. लल्लू सिंह ने मीनू के भागने की सूचना उस के भाई धर्मेंद्र सिंह को दी तो उस का गुस्सा बढ़ गया. उस ने सूरज के संबंध में जानकारी जुटाई तो पता चला सूरज भी घर से नदारद है, इसलिए धर्मेंद्र भी समझ गया कि उस की बहन मीनू साले सूरज के साथ ही भागी है. अच्छी बातें देर से उजागर होती हैं, लेकिन बुरी बातें आंधी की तरह उड़ती है. एक सप्ताह बीततेबीतते खलीलपुर गांव में यह बात फैल गई कि धर्मेंद्र की बहन मीनू उर्फ अमन अपने पति का घर छोड़ कर धर्मेंद्र के साले सूरज के साथ भाग गई है. नातेदारों को भी पता चल गया था. मीनू की ससुराल में भी प्रेम प्रपंच की चर्चाएं शुरू हो गई थीं.

बहन मीनू का साले सूरज के साथ भाग जाना धर्मेंद्र के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने के समान था. उस की गांव व नातेदारों में बहुत बदनामी हुई थी. वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बचा था. गांव के लोग ताने व फब्तियां कसते थे, जिस से गांव में उस का सिर उठा कर चलना दूभर हो गया था. धर्मेंद्र ने कसम खाई कि वह इस अपमान का बदला जरूर लेगा. बहन मीनू व साले सूरज को सबक जरूर सिखाएगा. मीनू आभूषण व रुपए साथ ले कर गई थी. लेकिन न जानें क्यों लल्लू सिंह ने मीनू व सूरज के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी और हाथ पर हाथ रख कर बैठ गया था. मीनू के भाई धर्मेंद्र ने भी उन दोनों के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की थी.

उधर सूरज मीनू को साथ ले कर गुजरात के अहमदाबाद शहर पहुंचा. यहां वह 2-3 दिन एक होटल में रुका. उस के बाद नवरंगपुरा में एक कमरा ले कर मीनू के साथ रहने लगा. घर चलाने के लिए वह किसी कपड़े की दुकान पर काम करने लगा. कुछ महीने बाद सूरज ने मीनू से कोर्ट मैरिज कर उसे पत्नी का दरजा दे दिया. इस के बाद दोनों हंसीखुशी से रहने लगे. सूरज के साथ सुखमय जीवन व्यतीत करते हुए मीनू ने 4 अक्तूबर, 2013 को एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने शिवा उर्फ रामजी रखा. शिवा के जन्म से उन दोनों की खुशियां और भी बढ़ गईं. दोनों उसे खूब प्यार करते थे.

सूरज 6 भाई थे. अब तक उस के पिता छोटेलाल व एक भाई की मौत हो चुकी थी. वह अपने घरवालों से दूर जरूर था, लेकिन मोबाइल फोन के जरिए भाइयों के संपर्क में रहता था. उस ने मीनू से शादी करने और बेटे शिवा के पैदा होने की जानकारी घरवालों को दे दी थी. लेकिन मीनू न तो अपने भाई धर्मेंद्र के संपर्क में थी और न ही पूर्वपति लल्लू सिंह के. अहमदाबाद महंगा शहर था. शिवा उर्फ रामजी के जन्म के बाद खर्च भी बढ़ गया था, इसलिए सूरज ने अपने घर लौटने का निश्चय किया. मार्च 2016 में वह पत्नी मीनू व मासूम बेटे के साथ अपने गांव मदारीपुर लौट आया. गांव में कुछ माह गुजारने के बाद सूरज नौकरी की तलाश में कानपुर शहर आ गया.

कुछ दिन भटकने के बाद सूरज को दादा नगर स्थित एक जूता फैक्ट्री में काम मिल गया. नौकरी लग गई तो सूरज ने गुजैनी मोहल्ले के बी ब्लौक में एक कमरा किराए पर ले लिया. दोमंजिला बने इस मकान में 2 अन्य किराएदार भी रहते थे. यह मकान गोविंद नगर निवासी अरविंद पांडेय का था. कमरा किराए पर लेने के बाद सूरज अपनी पत्नी मीनू व बेटे को भी ले आया. सूरज को नौकरी के साथसाथ घर से भी मदद मिलती थी. अत: वह हंसीखुशी से जीवन बिताने लगा. इधर धर्मेंद्र सिंह यादव को अपनी पत्नी विमला के मार्फत पता चला कि सूरज और मीनू वापस आ गए हैं. उन दोनों ने शादी कर ली है और उन के एक बच्चा भी है. यह जान कर धर्मेंद्र को बहुत बुरा लगा.

वह मन ही मन सोचने लगा कि मीनू जब भाग ही गई थी तो वापस क्यों आ गई. उसे उस के जख्म कुरेदने वापस नहीं आना चाहिए था. धर्मेंद्र अंदर ही अंदर सुलग उठा. लेकिन वह किसी तरह अपने गुस्से को पी गया. उस ने सूरज व मीनू से संपर्क भी नहीं किया. समय बीतता रहा. धर्मेंद्र पहले पेट्रोल पंप पर काम करता था. तब उस की कमाई मामूली थी. लेकिन अब वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करने लगा था और लाखों रुपए कमाने लगा था, अत: उस की आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत हो गई थी. उस ने माती व अकबरपुर कस्बे में कई प्लौट भी खरीद लिए थे. तहसील में उस का दबदबा था. प्लौट की लिखापढ़ी में हेरफेर भी करता था.

गुजैनी में रहते सूरज और मीनू को कई वर्ष बीत गए थे. उन का अब भय भी खत्म हो गया था. बेटा भी अब बड़ा हो गया था और स्कूल जाने लगा था. मीनू बेटे को बेहद प्यार करती थी. वे दोनों बेटे का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाते थे. पड़ोसी और मकान में रहने वाले किराएदारों को दावत भी देते थे. मीनू के व्यवहार से सभी खुश रहते थे. उस की तारीफ भी करते थे. वर्ष 2020 के जून माह में मीनू ने एक बेटी को जन्म दिया. बेटी के जन्म से मीनू की खुशियां और भी बढ़ गईं. बेटी कुछ बड़ी हुई तो मीनू ने मायके जाना भी शुरू कर दिया. उस ने जमीन में दखलअंदाजी भी शुरू कर दी. वह भाई धर्मेंद्र से हिस्सा बांटने की बात करने लगी. इस को ले कर भाईबहन में तकरार भी होने लगी.

मीनू की बदचलनी की वजह से धर्मेंद्र यादव की गांव में पहले से ही बदनामी हो रही थी, जिस से वह उस से खार खाए बैठा था, ऊपर से मीनू मायके की प्रौपर्टी में हिस्सा भी मांग रही थी. इसलिए धर्मेंद्र ने मीनू, सूरज और उस के बच्चों को खत्म करने का फैसला कर लिया और 10 लाख की सुपारी दे दी थी. एसएचओ भरत कुमार ने प्रेम प्रसंग से उपजे फैमिली क्राइम का खुलासा करने और 2 आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी दीक्षा शर्मा को दी तो उन्होंने आननफानन में पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता कर हत्या का खुलासा किया.

चूंकि दोनों आरोपियों ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था, अत: पुलिस ने मृतका मीनू के पति सूरज की तरफ से बीएनएस की धारा 103/109/61 के तहत चतुर सिंह, वीर सिंह, जगमोहन, धर्मेंद्र सिंह यादव व संजीव के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा धर्मेंद्र सिंह व जगमोहन को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. 10 अक्तूबर, 2024 को पुलिस ने हत्यारोपी धर्मेंद्र सिंह व जगमोहन को हमीरपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

अपराधी चतुर पर पुलिस पहले ही 50 हजार का इनाम घोषित कर चुकी थी. उस की तलाश में थाना पुलिस के अलावा एसटीएफ को भी लगा दिया गया. आखिर अथक प्रयास के बाद एसटीएफ और थाना कर्नगंज पुलिस ने 14 नवंबर, 2024 को चतुर सिंह को कानपुर सिटी से गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली.

कथा लिखने तक पुलिस वीर सिंह की तलाश में जुटी थी. संजीव पहले से ही जेल में है. उस पर अन्य धाराएं बढ़ा दी गई थीं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

Crime Story : 23 साल बाद मिला साधु के वेश में कातिल प्रेमी

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी मथुरा के बरसाना का नंदगांव यहीं है कुंजकुटी आश्रम. तपती 25 जून, 2023 को जून की गरमी से बेहाल 3 साधुओं की टोली कुंजकुटी आश्रम के दरवाजे पर आ कर रुक गई. इन के शरीर पर लाल, पीले रंग के साधुओं वाले कपड़े थे, तीनों ने सिर पर सफेद, भगवा अंगौछे बांध रखे थे. गले में रुद्राक्ष की माला और माथे पर चंदन का लेप था. तीनों साधु पसीने से तरबतर थे.

कंधे पर लटक रही लाल रंग की झोली से भगवा रुमाल निकाल कर चेहरे का पसीना पोंछते हुए एक साधु हैरत से बोला, “दरवाजे पर क्यों रुक गए गुरुदेव, भीतर प्रवेश नहीं करेंगे क्या?”

“मछेंद्रनाथ, मैं किसी आश्रम वासी के बाहर आने की राह देख रहा हूं. बगैर इजाजत लिए किसी भी जगह प्रवेश करना उचित नहीं होता.”

“आप का कहना ठीक है गुरुदेव,” मछेंद्रनाथ विचलित हो कर बोला, “लेकिन मुझे जोरों की भूख लग रही है. हम अंदर जाते तो मैं पेट की भूख शांत कर लेता.”

उस की बात पर दोनों साधु हंसने लगे. हंसते हुए गुरुदेव, जिन का नाम हरिहरनाथ था, बोले, “देखा कालीनाथ, इस पेटू मछेंद्र को, इसे खाने के अलावा कुछ नहीं सूझता.”

फिर वह मछेंद्रनाथ की तरफ पलटे और कुछ कहना ही चाहते थे कि आश्रम के दरवाजे पर एक भगवा वस्त्र धारी दुबलापतला साधु आ गया.

“आप दरवाजे पर क्यों रुक गए?” उस साधु के स्वर में हैरानी थी, “कोई और आने वाला है क्या?”

“नहीं महाराज, हम तो अंदर आने की इजाजत की प्रतीक्षा में यहां रुक गए थे.” हरिहरनाथ ने मुसकरा कर कहा.

“यहां इजाजत कौन देगा जी, गुरुजी की ओर से इस आश्रम में हर किसी को आने की छूट है. आप लोग अंदर आ जाइए.”

हरिहरनाथ अपनी साधु टोली के साथ अंदर आ गए. आश्रम में एक ओर रहने के लिए कमरे बने हुए थे. सामने दाहिनी ओर छप्परनुमा शेड था. नीचे चबूतरा था, इस के बीच में अग्निकुंड बना हुआ था. अग्निकुंड में लकडिय़ों की धूनी सुलग रही थी. उस के आसपास कई जटाधारी साधु बैठे हुए थे. कुछ चिलम पी रहे थे. कुछ आपस में बातें कर रहे थे. एक साधु बैठा हुआ कोई धार्मिक ग्रंथ पढऩे में तल्लीन था.

तीनों साधुओं को वहां लाने वाला साधु आदर से बोला, “आप लोग चाहें तो स्नान आदि कर लीजिए. मैं आप के खाने का बंदोबस्त करता हूं, खापी कर आप आराम कर लेना. गुरुदेव अपने कक्ष में हैं, उन से आप की भेंट शाम को 5 बजे होगी.”

“ठीक है महाराज,” हरिहर मुसकरा कर बोले.

वह अपनी टोली के साथ आश्रम के कोने में लगे हैंडपंप पर आ गए. उन्होंने बाहर ही हैंडपंप पर नहानाधोना किया. फिर चबूतरे पर आ गए. उन्हें वहां भोजन परोसा गया. खापी लेने के बाद वे चटाइयों पर विश्राम करने के लिए लेट गए.

अन्य साधुओं से बढ़ाई घनिष्ठता

शाम को उन की मुलाकात इस आश्रम के गुरु महाराज से हुई. वह वयोवृद्ध थे. उन्हें हरिहरनाथ ने हाथ जोड़ कर प्रणाम करने के बाद बताया, “हम काशी विश्वनाथ होते हुए मथुरा आए थे. यहां आप के आश्रम कुंजकुटी की बहुत चर्चा सुनी तो आप के दर्शन करने आ गए. हम यहां कुछ दिन ठहरना चाहेंगे गुरुदेव.”

“आप का आश्रम है हरिहरनाथ, आप अपनी मंडली के साथ ताउम्र यहां रहिए. यह साधुसंतों का डेरा है, यहां कोई भी कभी भी आजा सकता है.”

“धन्यवाद गुरुदेव,” हरिहरनाथ ने कहा.

गुरु महाराज के पास से उठ कर हरिहरनाथ ने चबूतरे के एक कोने में अपने उठने बैठने की व्यवस्था कर ली. तीनों ने वहां चटाइयां बिछा कर बिस्तर लगा लिया.

2-3 दिनों में ही हरिहरनाथ, मछेंद्रनाथ और कालीनाथ वहां आनेजाने और रहने वाले साधुसंतों से घुलमिल गए थे. वह उन से आध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा करते. अपना मोक्ष पाने के लिए साधु वेश धारण करने की बात बता कर यह पूछते कि वह साधु क्यों बने? यह वेश धारण कर के उन्हें कैसा अनुभव हो रहा है?

आज उन्हें कुंजकुटी आश्रम में रुके हुए 4 दिन हो गए थे. गुरु हरिहरनाथ आज सुबह से ही उस साधु के साथ चिपके हुए थे जो पहले दिन उन्हें सब से अलग बैठा कोई धार्मिक ग्रंथ पढ़ता दिखाई दिया था. यह 50 वर्ष से ऊपर का व्यक्ति था. दुबलापतला गेहुंए रंग का वह व्यक्ति लाल कुरता, पीली जैकेट और लुंगी पहनता था. उस की दाढ़ीमूंछ के बालों में सफेदी झलकने लगी थी. यह साधु पहले दिन से ही सभी से अलगथलग रहने वाला दिखाई दिया था.

हरिहरनाथ ने शाम को खाना खा लेने के बाद उस के साथ गांजे की चिलम भर कर पी. गांजे का नशा हरिहरनाथ के दिमाग पर छाने लगा तो वह सिर झटक कर बोले, “मजा आ गया आप की चिलम में महाराज, मैं ने पहली बार गांजा की चिलम पी है. यह नशा मेरा सिर घुमा रहा है.”

“मैं रोज पीता हूं हरिहरनाथ. इसे पी लेने के बाद न अपना होश रहता है, न दुनिया की फिक्र.”

“क्यों क्या आप का इस दुनिया में अपना कोई नहीं है?” हरिहरनाथ ने पूछा.

“थे. मांबाप, बहनभाई और…” बतातेबताते वह रुक गया.

“एक पत्नी.” हरिहरनाथ ने उस की बात को पूरा किया, “क्यों मैं ने ठीक कहा न?”

वह साधु हंस पड़ा, “पत्नी नहीं थी, वह मेरी प्रेमिका थी, मैं उसे बहुत प्यार करता था.”

“प्यार करते थे तो पत्नी क्यों नहीं बना सके उसे?”

“वह बेवफा निकली हरिहर,” वह साधु गहरी सांस भर कर बोला, “उस ने किसी और से दिल लगा लिया था.”

“ओह!” हरिहरनाथ ने अफसोस जाहिर किया, “ऐसी बेवफा प्रेमिका को तो सजा मिलनी चाहिए थी. मेरी प्रेमिका ऐसा करती तो मैं उस का गला काट देता.”

“नहीं हरिहर, मैं ने उस बेवफा से सच्ची मोहब्बत की थी. मैं उस के गले पर छुरी नहीं चला सकता था. मैं ने उस को नहीं, उस के प्रेमी को यमलोक पहुंचा दिया.”

“ओह! आप ने अपनी प्रेमिका के यार को ही उड़ा डाला.” हरिहर हैरानी से बोले, “फिर तो आप को कत्ल के जुर्म में सजा हुई होगी.”

गांजे के नशे में आई सच्चाई बाहर

चिलम का एक गहरा कश लगा कर धुंआ ऊपर छोड़ते हुए वह साधु हंसने लगा, “सजा किसे मिलती महाराज, कातिल तो कत्ल कर के फुर्र हो गया था. आज 23 साल हो गए उस बात को, मैं साधु बन कर यहां बैठा हूं, पुलिस वहां मेरे लिए हाथपांव पटक रही है. सुना है, मुझ पर 45 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया है पुलिस कमिश्नर ने.” साधु फिर हा…हा… कर के हंसने लगा.

हंसी थमी तो बोला, “हरिहर, मुझ पर पुलिस 45 हजार क्या 45 लाख का इनाम घोषित कर दे, तब भी वह मुझे नहीं पकड़ पाएगी.”

हरिहर के होंठों पर कुटिल मुसकान तैर गई. वह कमर की ओर हाथ बढ़ाते हुए बोले, “तुम ने सुन रखा होगा मिस्टर पदम, कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं. देख लो, फांसी का फंदा तुम्हारे गले तक पहुंच गया.”

“पदम,” वह साधु चौंक कर बोला, “तुम मेरा नाम कैसे जानते हो हरिहर?”

हरिहर का हाथ कमर से निकल कर बाहर आया तो उस में रिवौल्वर था. रिवौल्वर साधु की कनपटी पर सटा कर हरिहर गुर्राए, “मैं तेरा नाम भी जानता हूं और तेरा भूगोल भी. तू सूरत में विजय साचीदास की हत्या कर के फरार हो गया था. आज 23 साल बाद तू हमारी पकड़ में आया है.”

आप को बताते चलें कि साधु के वेश में यह सूरत की क्राइम ब्रांच के तेजतर्रार एएसआई सहदेव थे, इन के साथ जो 2 साधु वेशधारी मछेंद्रनाथ और कालीनाथ थे, उन के नाम जनार्दन हरिचरण और अशोक थे. ये दोनों भी सूरत की क्राइम ब्रांच में एएसआई और हैडकांस्टेबल के पद पर तैनात हैं.

इन दिनों सूरत की पुलिस ने मोस्टवांटेड अपराधियों को पकडऩे की मुहिम शुरू कर रखी है. पदम उर्फ गोरांग चरण पांडा ने 3 सितंबर, 2001 को विजय साचीदास नाम के युवक की हत्या कर दी थी, वह सूरत से भाग गया था. पुलिस उसे सालों तक सूरत और उस के पैतृक गांव ओडिशा के गंजाम जिले में तलाश करती रही. वह हाथ नहीं लगा तो उस पर 45 हजार रुपए का ईनाम घोषित किया गया. निराश हो कर इस केस की फाइल बंद कर दी गई.

23 साल बाद पकड़ा गया हत्यारा

23 साल बाद विजय साचीदास हत्याकांड की फाइल फिर से खोली गई. पुलिस कमिश्नर अजय कुमार तोमर ने भगोड़े मोस्टवांटेड अपराधियों को पकडऩे की मुहिम शुरू की थी. इसी मुहिम के तहत पीसीबी (प्रिवेशन औफ क्राइम ब्रांच) के 2 एएसआई और एक हैडकांस्टेबल को विजय साचीदास हत्याकांड की फाइल सौंपी गई.

हत्यारे पदम उर्फ गोरांग चरण पांडा के बारे में पुलिस को पता चला कि वह पुलिस से बचने के लिए साधु बन गया है और इस समय उत्तर प्रदेश में रह रहा है. उसे ढूंढते हुए यह टीम मथुरा आई. साधु वेश बना कर इस टीम ने 8 दिनों में 100 से अधिक धार्मिकस्थल, आश्रम और मठों की खाक छानी. इसी दौरान एक सर्विलांस टीम ने सूचना दी कि पदम साधु बना हुआ मथुरा के नंदगांव में रह रहा है, इसलिए यह टीम साधु के वेश में कुंजकुटी आश्रम में पहुंची.

पदम उन्हें कुंजकुटी आश्रम में मिला. साधु वेश धारण कर के 23 साल से वह यहां छिपा बैठा था. तेजतर्रार अपराध शाखा की टीम ने उसे अपनी सूझबूझ से ढूंढ निकाला. पदम उर्फ चरण पांडा की कनपटी पर रिवौल्वर रख कर एएसआई सहदेव ने अपने साथियों को इशारा किया. वह तुरंत पदम के सिर पर पहुंच गए.

पदम को घेर कर हथकड़ी लगा दी गई.

आश्रम में हडक़ंप मच गया. एक साधु जो 23 साल से कुंजकुटी आश्रम में रह रहा था, उस के हाथ में हथकड़ी देख कर सभी आश्रमवासी चौंक गए.

एएसआई सहदेव ने उन्हें इस साधु पदम उर्फ गोरांग चरण पांडा की हकीकत बताई तो सभी दंग रह गए. एक हत्यारा 23 सालों से साधु बन कर वहां रह रहा था. अपराध शाखा की टीम पदम उर्फ चरण पांडा को ले कर 28 जून, 2023 को मथुरा से सूरत के लिए रवाना हो गई. जाने से पहले उन्होंने नंदगांव पुलिस चौकी के इंचार्ज सिंहराज के पास अपनी रवानगी दर्ज करवा दी थी.

पदम को रजनी से हुआ प्यार

पदम उर्फ गोरांग चरण पांडा मूलरूप से ओडिशा के गंजाम जिले के श्रीराम नगर इलाके का निवासी था. उस का मांबाप और बहनभाई का एक बड़ा परिवार था, लेकिन इस परिवार के गुजरबसर के लिए ज्यादा कमाई नहीं थी. पदम के पिता मजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार की गाड़ी को धकेल रहे थे.

पदम जवान हुआ तो घर की गरीबी उस से देखी नहीं गई. वह काम की तलाश में ट्रेन में सवार हो कर सूरत शहर आ गया. बहुत कम पढ़ालिखा था, इसलिए कोई अच्छी नौकरी तो मिलने वाली नहीं थी, मेहनत मजदूरी पदम करना नहीं चाहता था. यही करना था तो गंजाम जिले में ऐसे कामों की कमी नहीं थी.

बहुत सोचविचार कर के पदम ने गांधी चौराहे पर थोड़ी सी जगह ढूंढ कर भजिया (पकौड़े) की रेहड़ी लगा ली. पदम का यह काम चल निकला. उस ने शांतिनगर सोसायटी में रहने के लिए एक कमरा किराए पर ले लिया. भजिया रेहड़ी से अच्छी कमाई हो रही थी. पदम बनसंवर कर रहने लगा. कमरे का किराया और अपना खर्चा निकाल कर वह अब गंजाम में अपने मांबाप के पास बचा हुआ पैसा भेजने लगा था.

शांतिनगर सोसायटी में ही किराए पर रजनी नाम की युवती रहती थी. रजनी 23 साल की साढ़े 5 फुट की नवयौवना थी. रंग गोरा, नाकनक्श तीखे, होंठ संतरे के फांक जैसे. जवानी के बोझ से लदी रजनी को देख कर कोई भी फिदा हो सकता था. पदम की नजर सीढिय़ों से उतरते हुए रजनी पर पड़ी तो वह उस के रूपयौवन का दीवाना हो गया. पहली नजर में ही उस को रजनी से प्यार हो गया.

रजनी ने भी किया प्यार का इजहार

वह रोज सीढिय़ों से चढ़ कर ऊपर तीसरी मंजिल पर अपने कमरे में जाता तो रजनी के कमरे के सामने तब तक रुकता था, जब तक रजनी दरवाजे पर नहीं आ जाती थी. रजनी यह भांप चुकी थी कि इसी सोसाइटी में रहने वाला यह युवक उस का दीवाना है. अब वह पदम के शाम को लौट कर आने के वक्त पर खुद दरवाजे पर आ कर खड़ी होने लगी थी.

उस की नजरें पदम से टकरातीं तो वह शरम से नजरें झुका लेती, ठंडी सांस भर कर आह भरता हुआ पदम सीढिय़ां चढ़ जाता था. पदम यह महसूस कर चुका था कि रजनी उसे चाहने लगी है. उस से मेलजोल बढ़ाने के इरादे से एक शाम वह भजिया मिर्च को अखबार में पैक कर के ले आया. रजनी अन्य दिनों की तरह उस दिन भी दरवाजे पर खड़ी मिली. पदम ने हिम्मत बटोर कर भजियामिर्च का पैकेट रजनी की तरफ बढ़ा दिया.

“क्या है इस में?” पहली बार उस की कोयल जैसी आवाज पदम के कानों में पड़ी.

“आप खुद देख लीजिए” पदम कह कर तेजी से सीढ़ियां चढ गया. दिन में रजनी उसे दिखाई नहीं देती थी, शायद वह कहीं काम पर जाती थी, लेकिन सुबह जब पदम सीढ़ियां उतर कर नीचे आया तो रजनी अपने दरवाजे पर खड़ी दिखाई दी.

पदम को देख कर वह मुसकराई, “भजिया स्वादिष्ट थी. कहां से लाए थे?”

“मेरे ठेले की है. मैं गांधी चौक पर भजिया का ठेला लगाता हूं, आप को भजिया स्वादिष्ट लगी है तो मैं रोज शाम को ले आया करूंगा.” पदम के स्वर में उत्साह भरा था.

“नहीं, अब तो मैं तुम्हारे पास गांधी चौक पर आ कर ही भजिया खाया करूंगी,” रजनी ने हंस कर कहा.

“मैं एक शर्त पर आप को भजिया खिलाऊंगा.”

“कैसी शर्त?”

“आप भजिया के पैसे नहीं देंगी.”

“ऐसा क्यों?” हैरानी से रजनी ने पूछा.

“अपनों से कोई पैसा नहीं लेता,” पदम ने हिम्मत बटोर कर कह डाला, “आप को दिल से प्यार करने लगा हूं मिस…”

हया से सिर झुका कर बोली रजनी, “मेरा नाम रजनी है, मैं भी आप को चाहने लगी हूं.”

पदम खुशी से उछल पड़ा. उस ने रजनी का हाथ पकड़ कर चूम लिया. रजनी शरमा कर अंदर भाग गई.

प्यार में मिला धोखा

उस दिन के बाद से रजनी शाम को उस के ठेले पर आने लगी. पदम उसे भजिया खिलाता. इस बीच दोनों प्यार भरी बातें करते. ये मुलाकातें भजिया की ठेली से हट कर सूरत के पिकनिक स्पौट, सिनेमा हाल और रेस्टोरेंट तक पहुंच गईं. पदम जो कमाता था, वह रजनी पर खर्च करने लगा. वह रजनी को सच्चे दिल से चाहने लगा था. रजनी से वह शादी करने का प्लान भी बना रहा था. रजनी से उस ने वादा भी ले लिया था कि वह उस से शादी करेगी.

प्रेम प्रसंग बढ़ने लगा तो पदम अब शादी के लिए रुपए भी जोड़ने लगा था. वह रजनी को पत्नी बना कर अपने घर ओडिशा ले जाना चाहता था, लेकिन एक दिन उस का ख्वाब बिखर गया.उस ने रजनी को एक युवक के साथ हाथ में हाथ डाले शौपिंग माल में खरीदारी करते हुए देखा. पदम वहां अपने लिए शर्ट खरीदने के लिए गया था. वह रजनी को चोरीछिपे देखता रहा.

शाम को उस ने रजनी से उस युवक के बारे में पूछा तो उस ने बड़ी बेशरमी से कहा, “वह विजय साचीदार है. तुम से अच्छा कमाता है. मैं उस के साथ खुश रह सकती हूं.”

“लेकिन तुम ने मेरे साथ शादी करने का वादा किया है रजनी, मुझे तुम छोड़ कर किसी दूसरे से दिल नहीं लगा सकती.”

“दिल मेरा है पदम…” रजनी कंधे झटक कर बोली, “मैं इसे कहीं भी लगाऊं. फिर तुम्हारे पास है भी क्या? किराए का कमरा है, फुटपाथ पर भजिया तलते हो. मैं एक ठेली वाले से शादी कर के अपनी जगहंसाई नहीं करवाना चाहती. अब तुम अपना रास्ता बदल लो.”

“नहीं. मैं अपना रास्ता नहीं बदलूंगा. रास्ता तुम्हें बदलना होगा रजनी. तुम मेरी थी, मेरी ही रहोगी.”

“कोई जबरदस्ती है तुम्हारी.” रजनी गुस्से से चीखी, “मैं विजय से शादी करूंगी, समझे.”

“मैं उस हरामी विजय को काट डालूंगा.” पदम गुस्से से बोला, “देखता हूं तुम कैसे उस से शादी करती हो.”

पदम कहने के बाद गुस्से में भरा वहां से चला गया. वह रात उस ने अपने ठेले पर फुटपाथ पर बिताई. वह विजय साचीदार के विषय में सोच रहा था जो उस के प्यार की राह में कांटा बन गया था. वह कब सोया उसे पता नहीं चला

रजनी के प्रेमी विजय की मिली लाश

4 सितंबर, 2001 दिन मंगलवार को मयूर विहार सोसायटी के शांतिनगर थाने में रजनी ने विजय साचीदार के लापता हो जाने की रिपोर्ट दर्ज करवाते हुए पुलिस के सामने बयान दिया कि विजय साचीदार को जान से मारने की धमकी पदम चरण ने दी थी. पदम चरण शांतिनगर सोसायटी में तीसरी मंजिल पर किराए पर रहता है और गांधी चौक पर भजिया की ठेली लगाता है. विजय साचीदार को लापता करने में पदम चरण का हाथ हो सकता है. उसे गिरफ्तार कर के पूछताछ की जाए.

रजनी द्वारा लिखित रिपोर्ट के आधार पर पुलिस शांतिनगर सोसायटी में पदम चरण के कमरे पर पहुंची. वहां ताला बंद था. पदम चरण की तलाश में उस की भजिया की ठेली (गांधी चौक) पर पुलिस पहुंची तो ठेली पर कोई नहीं था. पदम चरण दोनों जगह से लापता था. इस से उस पर शक गहरा गया कि उस ने विजय साचीदार का अपहरण किया है और कहीं दुबक गया है.

पुलिस पदम चरण का मूल पता लगाने का प्रयास कर ही रही थी कि उसे उधना क्षेत्र (खाड़ी) में विजय साचीदास की लाश मिलने की सूचना कंट्रोल रूम द्वारा दी गई. उधना क्षेत्र की पुलिस को खाड़ी में एक युवक की लाश पड़ी मिली थी. उस युवक की तलाशी में आधार कार्ड मिला, जिस में उस का नाम विजय साचीदार, उस का फोटो और एड्रेस था.

आधार कार्ड से पता चला कि विजय साचीदार शांतिनगर थाना क्षेत्र में रहता था, इसलिए कंट्रोल रूम द्वारा इस थाने को सूचित किया गया. शांतिनगर थाने ने उधना क्षेत्र थाने से यह लाश अपने अधिकार में ले कर जांच की. विजय को गला दबा कर मारा गया था. विजय का पोस्टमार्टम करवा कर लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई. इस मामले को भादंवि की धारा 302 में दर्ज कर के पदम चरण की तलाश शुरू कर दी गई.

पदम चरण के बारे में रजनी से बहुत कुछ मालूम हो सकता था. पुलिस ने रजनी को थाने में बुला कर पूछताछ की तो रजनी ने बताया कि पदम का ओडिशा के गंजाम जिले में बरहमपुर इलाके में घर है. इस से अधिक वह कुछ नहीं जानती. रजनी ने पदम से प्रेम करने के दौरान जो फोटो खींचे थे, वे भी उस ने पुलिस को दे दिए.

शांतिनगर थाने की पुलिस पदम की तलाश में ओडिशा गई. वहां उस के मांबाप को श्रीराम नगर में ढूंढ निकाला गया. उन्होंने बताया पदम कई दिनों बाद घर आया था, लेकिन एक रात रुक कर वह चला गया. वह कहां गया, यह उन्हें नहीं मालूम. पुलिस ओडिशा से खाली हाथ वापस आ गई. इस के बाद पदम को सालों पुलिस यहांवहां ढूंढती रही, लेकिन वह कहां छिप गया, पुलिस को पता नहीं चला.

पदम के ऊपर घोषित हुआ ईनाम

पुलिस द्वारा उस के ऊपर 45 हजार का ईनाम भी घोषित कर दिया गया, लेकिन सब व्यर्थ. हताश हो कर विजय साचीदास हत्या केस की फाइल पुलिस को ठंडे बस्ते में डालनी पड़ी. जून 2023 को पुलिस कमिश्नर अजय कुमार तोमर ने सूरत शहर के भगोड़े व मोस्टवांटेड अपराधियों को पकडऩे की लिस्ट तैयार करवाई तो उस में 23 सालों से फरार चल रहे पदम चरण उर्फ चरण पांडा का भी नाम था. उस पर 45 हजार का ईनाम भी घोषित था.

पदम को पकडऩे का जिम्मा अपराध शाखा के एएसआई सहदेव, एएसआई जनार्दन हरिचरण और हैडकांस्टेबल अशोक को सौंपा गया. इस टीम की पहली सफलता यह थी कि 23 साल से फोन बंद कर के बिल में छिपे पदम ने मोबाइल फोन से अपने परिजनों से संपर्क किया था.

ओडिशा के गंजाम जिले में श्रीराम नगर इलाके से गोपनीय जानकारी अपराध शाखा को मिली तो पदम के परिजनों से पदम का नया नंबर ले कर सर्विलांस पर लगा दिया गया. उस की लोकेशन ट्रेस की गई तो वह मथुरा के बरसाना की थी.

क्राइम ब्रांच को बनना पड़ा साधु

अपराध शाखा की टीम मथुरा के बरसाना पहुंची. वहां से टोह लेती हुई नंदगांव पहुंच गई. यहां की पुलिस चौकी के इंचार्ज सिंहराज की मदद से साधु वेश बना कर 8 दिन आश्रमों, मठों में पदम को तलाश करती रही. अपने असली नाम छिपा कर 100 से ज्यादा धार्मिक स्थलों में उसे खोजा गया, फिर कुंजकुटी आश्रम में तलाश करने पंहुचे तो उन्हें साधु वेश में रह रहे पदम चरण को पकडऩे में सफलता मिल गई.

पदम चरण को शांतिनगर थाना (सूरत) में ला कर पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि विजय साचीदास उस के और रजनी के प्रेम में बाधा बन गया था. उसे समझाने पर भी वह नहीं माना तो उस का अपहरण कर के वह उद्यान खाड़ी क्षेत्र में ले गया और वहां गला दबा कर उस की हत्या करने के बाद वह ओडिशा भाग गया.

एक रात रुक कर वह मथुरा आया, यहां नंदगांव के कुंजकुटी में साधु वेश बना कर रहने लगा. उसे लगा कि विजय की हत्या हुए 23 साल गुजर गए हैं, पुलिस खामोश बैठ गई है तो उस ने मोबाइल खरीद कर परिजनों से बात की. इसी क्लू द्वारा पुलिस उस तक पहुंची और वह पकड़ा गया.

पुलिस ने पदम उर्फ गोरांग चरण पांडा को सक्षम न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में रजनी परिवर्तित नाम है.

Murder Story : भतीजे के इश्क में मारी गई पति के हाथों फरहीन

निकाह के 3 साल बाद जब 28 वर्षीय फरहीन बानो को बच्चा नहीं हुआ तो वह पति गुलफाम की मर्दानगी पर ही सवाल उठाने लगी. इसी दौरान पति से बगावत कर अपनी उम्र से छोटे भतीजे आमिर से संबंध बना लिए. उस से उसे बच्चा तो नहीं मिला, लेकिन उस के जीवन में ऐसा कुछ हो गया कि…

गुलफाम ने बीवी को बेवफाई का सबक सिखाने के लिए पूरी योजना बनाई. उस ने अपनी खतरनाक योजना में घर के किसी सदस्य को शामिल नहीं किया. योजना के तहत वह इटावा के कटरा बाजार गया और 200 रुपए में एक तेज धार वाला बांका खरीद लाया और झोले में रख दिया. 3 सितंबर, 2024 की सुबह 10 बजे गुलफाम झोले में छिपा कर रखा गया बांका ले कर घर से निकला, फिर उझैदी स्थित शराब ठेके पर पहुंचा. वहां उस ने शराब पी, फिर कुछ देर तक बकझक करता रहा. 

लगभग 12 बजे गुलफाम नशे की हालत में अपनी ससुराल नई बस्ती कटरा शमशेर खां, इटावा पहुंचा. उस समय उस की पत्नी फरहीन बानो अपनी बहन रूबी की मासूम बेटी जोया से बातचीत कर रही थी. उस के मां व भाई काम पर गए थे और बहन रूबी पड़ोस में किसी काम से गई थी. शौहर गुलफाम को नशे की हालत में देख कर फरहीन सिहर उठी. वह वहां से उठ कर कमरे में चली गई तो पीछे से गुलफाम भी कमरे में पहुंच गया और उस ने कमरा अंदर से बंद कर लिया. फिर वह बोला, ”फरहीन, मैं तुम्हें आखिरी बार मनाने आया हूं. बोलो, मेरे साथ घर चलोगी या नहीं.’’
मैं एक बार नहीं सौ बार कह चुकी हूं कि मैं तुम्हारे साथ नही जाऊंगी. पता नही क्यों बेशर्म बन कर यहां कुत्ते की तरह पूंछ हिलाते हुए चले आते हो?’’ फरहीन गुस्से से बोली. 

यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ गुलफाम ने पूछा.

हां, यह मेरा आखिरी फैसला है.’’ फरहीन ने जवाब दिया. 

तो अब मेरा फैसला भी सुन ले. यदि तू मेरी बीवी बन कर नहीं रह सकती तो मैं तुझे किसी और की बीवी भी नही बनने दूंगा. तुझ जैसी बेवफा औरत को आज मैं सबक सिखा कर ही दम लूंगा.’’ कह कर गुलफाम ने झोले से बांका निकाल लिया. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर था. 

शौहर के रूप में साक्षात मौत देख कर फरहीन बचाओ…बचाओचीखने लगी. उस की चीख सुन कर उस की बहन रूबी आ गई. अब तक गुलफाम हमलावर हो चुका था. उस ने बांके से कई वार फरहीन के सिर, गरदन व शरीर के अन्य हिस्सों पर किए. बचाव में फरहीन के दोनों हाथों की अंगुलियां भी कट गई थीं और वह खून से लथपथ हो कर जमीन पर गिर गई थी. बहन रूबी ने यह सब नजारा खिड़की से देखा था. उस ने सोचा गुलफाम भाग न जाए, इसलिए उस ने कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और फिर मां, भाइयों व पुलिस को सूचना दी. 

सूचना पाते ही सदर कोतवाल विक्रम सिंह कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर मौके पर पहुंच गए. हमलावर गुलफाम कमरे में बंद था. पुलिस ने उसे बाहर निकाला. कोतवाल विक्रम सिंह ने उसे आला कत्ल बांका सहित हिरासत में ले लिया. फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया और सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. कुछ देर में एसएसपी (इटावा) संजय कुमार वर्मा, एएसपी अमरनाथ त्रिपाठी और डीएसपी अमित कुमार सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. कमरे के अंदर एक युवती मरणासन्न स्थिति में पड़ी थी. वहां मौजूद तहमीदा ने बताया कि वह उस की बेटी फरहीन बानो है और हमलावर गुलफाम उस का दामाद है. फरहीन के शरीर पर आधा दरजन घाव थे. पुलिस अधिकारियों ने फरहीन बानो को तत्काल जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान उस की मौत हो गई. एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने घटना की प्रत्यक्षदर्शी गवाह मृतका की बहन रूबी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह पड़ोस में गई थी. बहन के चीखने की आवाज सुन कर वह घर आई तो कमरे में गुलफाम उस की बहन पर हमलावर था. वह बांके से प्रहार कर रहा था. गुलफाम बहन की हत्या कर भाग न जाए, इसलिए उस ने बाहर से कमरे को बंद कर दिया.

पुलिस आरोपी गुलफाम को थाने ले आई. उस से वारदात के बारे में पूछताछ की तो उस ने पत्नी फरहीन बानो की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की चाशनी में सराबोर निकली

तहमीदा पर टूट पड़ा दुखों का पहाड़

उत्तर प्रदेश के जिला औरैया का एक कस्बा है- दिबियापुर. रेलवे में यह फफूंद स्टेशन के नाम से जाना जाता है. इसी कस्बे के नहर पुल के समीप लाल मोहम्मद वारिसी सपरिवार रहते थे. उस के परिवार में बीवी तहमीदा बानो के अलावा 4 बेटे नासिर, वाजिद, वारिस, साबिर तथा 4 बेटियां वहीदा, फरहीन, रूबी व शमीम थीं. लाल मोहम्मद कबाड़ का धंधा करते थे. इसी से ही वह अपने भारीभरकम परिवार का पालनपोषण करता था.

लाल मोहम्मद के बच्चे जब बड़े हुए तो वे भी उस के धंधे में हाथ बंटाने लगे. इस से उन की आमदनी बढ़ी और परिवार खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगा. वारिसी परिवार के ही कुछ लोग उन से जलते थे, जिस से वे लोग अकसर बातबेबात झगड़ते रहते थे. बेटियों को भी तंग करते थे. आखिर परेशान हो कर लाल मोहम्मद के परिवार ने वहां से हट जाने का निश्चय कर लिया. वर्ष 2017 में उन्होंने दिबियापुर कस्बा छोड़ दिया और इटावा शहर आ गए. यहां उन्होंने सदर कोतवाली क्षेत्र के नई बस्ती कटरा शमशेर खां मोहल्ले में एक मकान किराए पर ले लिया और सपरिवार रहने लगे. 

अब तक उन के बच्चे जवान हो चुके थे. इसलिए वह अपना कारोबार करने लगे थे. 2 बेटे नासिर व वाजिद अलग हो गए थे. वे अपना घर बसा कर अलग रहने लगे. लाल मोहम्मद बड़ी बेटी वहीदा का भी निकाह कर चुके थे. वहीदा से छोटी फरहीन बानो थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खूबसूरत तथा निपुण थी. वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, लेकिन उस की बातों से लोग यही समझते थे कि वह अच्छीखासी पढ़ीलिखी है. हालांकि 5 जमात पास करने के बाद फरहीन बानो आगे पढऩा चाहती थी, लेकिन अम्मी तहमीदा ने साफ मना कर दिया था. उस के बाद उस ने भी चुप्पी साध ली और अम्मी के घरेलू काम में हाथ बंटाने लगी थी. 

फरहीन बानो शरीर से स्वस्थ व चेहरेमोहरे से खूबसूरत दिखती थी. वह जब भी घर से हाटबाजार के लिए निकलती, हमउम्र लड़के उसे देख कर फिकरे कसते, लेकिन फरहीन बानो उन आवारा लड़कों को लिफ्ट नहीं देती थी. लाल मोहम्मद व उस की बीवी तहमीदा वारिसी को भी अहसास हो गया था कि उन की बेटी जवान हो गई है, अत: वह उस के योग्य लड़के की तलाश में जुट गए. लेकिन इसी बीच लाल मोहम्मद गंभीर बीमार पड़ गए. उसी दौरान उन की मृत्यु हो गई.

शौहर की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी तहमीदा वारिसी पर आ गई. वह अपने बेटे वारिस व साबिर की मदद से परिवार को संभालने लगी. तहमीदा वारिसी को जवान बेटी फरहीन बानो के निकाह की चिंता सता रही थी. वह इज्जत के साथ उस के हाथ पीले कर उसे ससुराल भेज देना चाहती थी. इस के लिए वह जीजान से जुटी थी. एक रोज एक करीबी रिश्तेदार ने तहमीदा वारिसी को गुलफाम के बारे में बताया. गुलफाम को तहमीदा ने देखा तो उसे अपनी बेटी फरहीन बानो के लिए पसंद कर लिया. गुलफाम उत्तर प्रदेश के ही शहर इटावा की सदर कोतवाली के मोहल्ला उझैदी में रहता था. गल्ला मंडी में वह सब्जी का ठेला लगाता था. फेरी लगा कर भी सब्जी बेचता था. उस के मांबाप का इंतकाल हो चुका था. बस भाई अनवर था, जो परिवार के साथ अलग मकान में रहता था. 

न सासससुर के तानों का झंझट था और न ही जेठजेठानी के झगड़ों का. गुलफाम भी स्वस्थ और कमाऊ था. तहमीदा वारिसी ने सोचा कि ससुराल जाते ही उस की बेटी घर की मालकिन बन जाएगी. अत: अगस्त 2018 की 13 तारीख को तहमीदा वारिसी ने फरहीन बानो का निकाह गुलफाम के साथ कर दिया.
फरहीन बानो निकाह के बाद गुलफाम की जीनत बन कर अपनी ससुराल आ गई. ससुराल आते ही फरहीन ने घर संभाल लिया. गुलफाम हर तरह से बीवी का खयाल रखता था. वह जिस चीज की डिमांड करती, गुलफाम उसे पूरा करता था. वह उसे कभीकभी सैरसपाटे के लिए भी ले जाता. 

गुलफाम मेहनती इंसान था. वह सुबह उठ कर सब्जीमंडी जाता और 8 बजे के आसपास सब्जी खरीद कर वापस आता. फिर मियांबीवी मिल कर ठेले पर सब्जी सजाते. उस के बाद नाश्ता कर गुलफाम सब्जी का ठेला ले कर फेरी पर निकल जाता. शौहर के जाने के बाद फरहीन बानो घर का काम निपटाती, फिर खाना पका कर शौहर के लौटने का इंतजार करने लगती. गुलफाम लगभग 2 बजे वापस लौटता फिर दोनों साथ बैठ कर खाना खाते और खूब बातें करते. 

फरहीन बानो पति से क्यों करने लगी नफरत

इस तरह हंसीखुशी व मौजमस्ती से 3 साल बीत गए. लेकिन इन सालों में फरहीन बानो को कोई औलाद नहीं हुई. औलाद का सुख पाना हर औरत के लिए सौभाग्य की बात होती है. लेकिन फरहीन बानो वंचित थी. उस के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर वह इस सुख से क्यों वंचित है. वह यह भी सोचने लगी कि जरूर उस के शौहर में ही कोई कमी है. फरहीन बानो अब उदास रहने लगी. उस का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो गया. वह शौहर से लडऩेझगडऩे भी लगी.

पत्नी को उदास व स्वभाव में परिवर्तन देख कर गुलफाम सोच में पड़ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि फरहीन उदास क्यों रहती है और क्यों बातबात पर झगड़ती है. आखिर जब उस से नहीं रहा गया तो उस ने पूछा, ”फरहीन, मैं तुम्हारा हर तरह से खयाल रखता हूं, फिर तुम मुझ से बेरुखी से पेश क्यों आती हो?’’

फरहीन बानो शौहर को घूरते हुए बोली, ”सुखसाधन से कोई औरत संतुष्ट नहीं होती, उसे तो संतुष्टि तब मिलती है जब उस की गोद भरती है. हमारी शादी को 3 साल से ज्यादा का समय हो गया है, लेकिन हमारी अभी भी कोई औलाद नहीं है. घरपरिवार की औरतें ताने कसती हैं. वे मुझे बांझ समझने लगी हैं.’’

बीवी की बात सुन कर गुलफाम भी भड़क उठा, ”इस में मेरा क्या दोष है. खुदा जब चाहेगा, तभी औलाद होगी. मुझे विश्वास है कि वह जरूर हम पर रहम करेगा. तुम परेशान न हो. रही बात औरतों के तानों की तो तुम उस पर ध्यान मत दिया करो.’’

फरहीन गुस्से से बोली, ”खुदा को बीच में मत लाओ. सारा दोष तुम्हारा ही है. तुम मर्द होते तो एक नहीं, 2 औलाद हमारी गोद में अब तक होतीं. तुम अपना इलाज कराओ. दुआ ताबीज लो. वरना हमारी तुम्हारे साथ नहीं बनेगी.’’

फरहीन ने मर्दानगी पर चोट की तो गुलफाम भी भड़क उठा, ”मुझ में कोई कमी नही है. जो भी कमी है, वह सब तुझ में है. इसलिए न मैं इलाज कराऊंगा और न ही किसी फकीर के पास दुुआताबीज के लिए जाऊंगा. तुझे ही अपना इलाज कराना होगा.’’

इस के बाद तो आए दिन फरहीन और गुलफाम के बीच औलाद न होने को ले कर तकरार होने लगी. कभीकभी तकरार इतनी अधिक बढ़ जाती कि दोनों के बीच हाथापाई हो जाती. गुस्से में गुलफाम शराब के ठेके पर जाता और जम कर शराब पी कर लौटता. धीरेधीरे गुलफाम की शराब पीने की लत पड़ गई. वह पक्का शराबी बन गया. अभी तक फरहीन और गुलफाम के बीच औलाद को ले कर ही झगड़ा होता था, लेकिन अब शराब पीने को ले कर भी झगड़ा होने लगा. कभीकभी झगड़ा इतना बढ़ जाता कि गुलफाम फरहीन को जानवरों की तरह पीट देता. फरहीन समझ गई कि वह शराबी व नाकाबिल शौहर से कभी औलाद का सुख नहीं पाएगी. अत: वह शौहर से नफरत करने लगी. 

इन्हीं दिनों फरहीन बानो के घर आमिर का आनाजाना शुरू हुआ. रिश्ते में आमिर फरहीन का भतीजा था. वह भी नई बस्ती कटरा शमशेर खां मोहल्ले में रहता था. आमिर शरीर से हृष्टपुष्ट तथा सजीला युवक था. वह जो कमाता था, अपनी ही फैशनपरस्ती में खर्च करता था. फरहीन को वह बुआ कहता था. उम्र में वह फरहीन से छोटा था.

फरहीन को किस तरह हुआ भतीजे से प्यार

28 साल की बुआ फरहीन बानो से आमिर की खूब पटती थी. बुआभतीजे के बीच हंसीठिठोली भी होती थी. आमिर को बुआ की सुंदरता और अल्हड़पन बहुत भाता था. कभीकभी वह उसे एकटक प्यार भरी नजरों से देखा करता था. अपनी ओर टकटकी लगाए देखते समय जब कभी फरहीन की नजरें उस से टकरा जातीं तो दोनों मुसकरा देते थे. आमिर फरहीन के शौहर गुलफाम से ज्यादा स्मार्ट और अच्छी कदकाठी का था. इस से फरहीन का झुकाव आमिर के प्रति बढ़ता गया. 

फरहीन बानो स्वभाव से मिलनसार थी. आमिर बुआ के प्रति सम्मोहित था. जब दोनों साथ चाय पीने बैठते, तब फरहीन उस से खुल कर हंसीमजाक करती. फरहीन का यह व्यवहार धीरेधीरे आमिर को ऐसा बांधने लगा कि उस के मन में फरहीन का सौंदर्यरस पीने की कामना जागने लगी. एक दिन आमिर दोपहर को आया तो फरहीन उस के लिए थाली ले कर आई और जानबूझ कर गिराए गए आंचल को ठीक करते हुए बोली, ”लो आमिर, खाना खा लो. आज मैं ने तुम्हारी पसंद का खाना बनाया है.’’

आमिर को बुआ की यह अदा बहुत अच्छी लगी. वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ”बुआ, तुम भी अपनी थाली परोस लो. साथ खाने में मजा आएगा.’’

खाना खाते वक्त दोनों के बीच बातों का सिलसिला जुड़ा तो आमिर बोला, ”बुआ, तुम खूबसूरत और खिदमतगार हो. लेकिन फूफाजान तुम्हारी कद्र नहीं करते. मुझे पता है कि अभी तक तुम्हारी गोद सूनी क्यों है? वह अपनी कमजोरी की खीझ तुम पर उतारते हैं. लेकिन मैं तुम से बेइंतहा मोहब्बत करता हूं.’’

यह कह कर आमिर ने फरहीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया था. सच में फरहीन शौहर से संतुष्ट नहीं थी. उसे न तो औलाद का सुख मिला था और न ही शारीरिक सुख, जिस से उस का मन विद्रोह कर उठा. उस का मन बेइमान हो चुका था. आखिरकार उस ने फैसला कर लिया कि अब वह असंतुष्ट नहीं रहेगी. औलाद के लिए उसे रिश्तों को तारतार क्यों न करना पड़े. उस ने यह भी तय कर लिया कि भले ही उस की कितनी भी बदनामी क्यों न हो. लेकिन वह आमिर का साथ नहीं छोड़ेगी. 

औरत जब जानबूझ कर बरबादी के रास्ते पर कदम रखती है तो उसे रोक पाना मुश्किल होता है. यही फरहीन बानो के साथ हुआ. फरहीन जवान भी थी और शौहर से असंतुष्ट भी. वह औलाद सुख भी चाहती थी. अत: उस ने भतीजे आमिर के साथ नाजायज रिश्ता बनाने का निश्चय कर लिया. आमिर वैसे भी फरहीन का दीवाना था. एक रोज सुबह 9 बजे जैसे ही गुलफाम सब्जी का ठेला ले कर फेरी के लिए निकला, तभी आमिर आ गया. फरहीन उस समय कमरे में चारपाई पर लेटी थी. कमरे में पहुंचते ही वह उस की खूबसूरती को निहारने लगा. फरहीन को आमिर की आंखों की भाषा पढऩे में देर नहीं लगी. फरहीन ने उसे करीब बैठा लिया और उस का हाथ सहलाने लगी. आमिर के शरीर में हलचल मचने लगी.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद होश दुरुस्त हुए तो फरहीन ने आमिर की ओर देख कर कहा, ”आमिर तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन हमारे बीच रिश्ते की दीवार है. अब मैं इस दीवार को तोडऩा चाहती हूं.’’

आमिर ललचाई नजरों से देखता हुआ बोला, ”मैं तुम्हें कभी धोखा नही दूंगा. तुम अपना बनाओगी तो तुम्हारा ही बन कर रहूंगा.’’ कह कर आमिर ने फरहीन को बाहों में भर लिया. ऐसे ही कसमेवादों के बीच संकोच की सारी दीवारें कब टूट गईं, दोनों को पता ही नहीं चला. उस दिन के बाद आमिर और फरहीन बिस्तर पर सामाजिक रिश्तों और मानमर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने लगे. वासना की आग ने इन के इन रिश्तों को जला कर खाक कर दिया. 

आमिर अपनी बुआ की मोहब्बत में इतना अंधा हो गया कि उसे जब भी मौका मिलता, वह फरहीन से मिलन कर लेता. फरहीन भी भतीजे के पौरुष की दीवानी थी. उन के मिलन की किसी को कानोंकान खबर नहीं थी. 

इस तरह खुली बुआभतीजे के संबंधों की पोल

कहते हैं कि वासना का खेल कितनी भी सावधानी से खेला जाए, एक न एक दिन भांडा फूट ही जाता है. ऐसा ही फरहीन और आमिर के साथ भी हुआ. एक दोपहर पड़ोस में रहने वाली जेठानी खातून ने रंगरलियां मना रहे आमिर और फरहीन को चोरीछिपे देख लिया. इस के बाद तो इन की पापलीला की चर्चा पड़ोस में होने लगी. गुलफाम को जब फरहीन और उस के भतीजे आमिर के नाजायज रिश्तों की जानकारी हुई तो उस का माथा घूम गया. उस ने इस बाबत फरहीन से बात की तो उस ने नाजायज रिश्तों की बात सिरे से खारिज कर दी. उस ने कहा, ”आमिर उस का भतीजा है. कभीकभार घर आ जाता है तो उस से हंसबोल लेती हूं. चायनाश्ता करने के बाद वह चला जाता है. पड़ोसी इस का गलत मतलब निकालते हैं. उन्होंने ही तुम्हारे कान भरे हैं.’’

गुलफाम ने उस समय तो फरहीन की बात मान ली, लेकिन मन में शक पैदा हो गया. इसलिए वह चुपकेचुपके बीवी पर नजर रखने लगा. परिणामस्वरूप एक दोपहर गुलफाम ने बुआभतीजे को रंगेहाथ पकड़ लिया. आमिर तो भाग गया, लेकिन फरहीन की गुलफाम ने जम कर पिटाई की. साथ ही संबंध तोडऩे की चेतावनी दी. लेकिन इस चेतावनी का असर न तो फरहीन पर पड़ा और न ही आमिर पर. हां, इतना जरूर हुआ कि अब वे सावधानी बरतने लगे. जिस दिन गुलफाम को पता चलता कि आमिर उस के घर के चक्कर लगा रहा था. उस दिन शराब पी कर वह फरहीन को जानवरों की तरह पीटता और भद्दीभद्दी गालियां बकता. 

फरहीन शौहर की पिटाई से तंग आ चुकी थी, अत: मार्च 2024 के पहले सप्ताह में गुलफाम को बिना बताए अपने मायके नई बस्ती कटरा शमशेर खां आ गई. उस ने मां व भाइयों को आंसू बहा कर बताया कि गुलफाम शराब पी कर उसे बेतहासा पीटता था. उसे भूखाप्यासा रखता था. चरित्र पर लांछन लगाता था, जिस से उसका ससुराल में जीना दूभर हो गया था. इसलिए वह मायके आ गई. आंसू देख कर मां व भाइयों ने सहज ही उस की बातों पर भरोसा कर लिया. मां ने उसे धैर्य बंधाया और कहा कि गुलफाम जब आएगा, तब उसे सबक सिखाएगी. उसे जलील करेगी और माफी मांगने पर भी उसे ससुराल नहीं भेजेगी. 

इधर गुलफाम घर आया तो फरहीन घर पर नहीं थी. उस ने उसे फोन किया, लेकिन फरहीन ने काल रिसीव नहीं की. दूसरे ही दिन गुलफाम अपनी ससुराल जा पहुंचा. ससुराल पहुंचते ही गुलफाम की सास तहमीदा वारिसी उस पर बरस पड़ी, ”गुलफाम, तू इंसान नहीं जानवर है. तू शराब पी कर मेरी बेटी को पीटता था और उसे भूखाप्यासा रखता था. चला जा यहां से, वरना अंजाम बुरा होगा.’’

गुलफाम नरमी से बोला, ”सासू मां, फरहीन ने आप को जो कुछ बताया, वह सब सही नहीं है. फरहीन मेरी इज्जत पर धब्बा लगा रही है. भतीजे आमिर से उस के नाजायज ताल्लुकात हैं. में ने मना किया तो मुझ से ही उलझ गई. रंगेहाथ पकड़ा तो शराब के नशे में उसे पीट दिया. नाराज हो कर वह यहां आ गई.’’

गुलफाम ने लाख सफाई दी, लेकिन उस की बात पर किसी ने यकीन नहीं किया. फरहीन के भाई वारिस व साबिर ने भी गुलफाम को खूब खरीखोटी सुनाई, गालियां भी बकी. धमकी भी दी कि यहां से चला जाए वरना कुछ अनर्थ हो जाएगा. ससुराल में अपमान का घूंट पी कर गुलफाम अपने घर वापस आ गया. गम को भुलाने के लिए उस रात उस ने जम कर शराब पी. गुलफाम को अपमानित कर भगाया गया तो फरहीन मन ही मन खुश हुई. अब वह मायके में स्वच्छंद रूप से रहने लगी. भतीजा आमिर भी बेरोकटोक उस से मिलने आने लगा. आमिर अब उसे खर्च के लिए रुपए भी देने लगा. 

जिस दिन मां और भाई घर पर नहीं होते, उस दिन फरहीन फोन कर आमिर को बुला लेती और मिलन कर लेती. घर में मौका न मिलता तो आमिर के साथ होटल चली जाती.

और प्रेमी आमिर के साथ फुर्र हो गई फरहीन

एक रोज फरहीन ने बिस्तर पर मस्ती के दौरान कहा, ”आमिर, हम कब तक इस तरह छिपतेछिपाते मिलते रहेंगे. यदि तुम मुझे अपना बनाना चाहते हो तो मुझे अपने साथ कहीं और ले चलो, जहां हम खुल कर जी सकें.’’

मई 2024 में फरहीन भतीजे आशिक आमिर के साथ मायके से भाग गई. लेकिन मायके वालों ने फरहीन के भाग जाने की जानकारी उस के शौहर गुलफाम को नहीं दी. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां हैं? एक सप्ताह बाद ही गुलफाम को पता चल गया कि फरहीन अपने आशिक आमिर के साथ फरार हो गई है. बेटी के भाग जाने की रिपोर्ट तहमीदा वारिसी ने पुलिस में दर्ज नहीं कराई. वह अपने बेटों के साथ उस की खोज करने लगी. गुलफाम भी अपने स्तर से बीवी की तलाश में जुट गया. लेकिन सफलता नहीं मिली. 

लगभग 3 महीने बाद फरहीन घर वापस आ गई. मां ने डांटाफटकारा तो वह बोली, ”मां, मैं आमिर के साथ धार्मिक स्थानों पर माथा टेकने गई थी. अजमेर शरीफ एक महीने तक रही. दिल्ली, आगरा शहर भी घूमा. इस के बाद वापस आ गई.’’

बेटी की बात सुन कर तहमीदा को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह अपने गुस्से को पी गई और फरहीन को शराफत से रहने की नसीहत दी. उस ने आमिर को भी खूब खरीखोटी सुनाई और फरहीन से मिलने पर रोक लगा दी. इधर गुलफाम बीवी के बिना बेचैन रहता था. अधिक शराब पीने से उस का सब्जी का धंधा चौपट हो गया था. उस पर कर्ज भी चढ़ गया था. एक रोज उसे पता चला कि फरहीन वापस घर आ गई है तो वह उसे मनाने ससुराल पहुंच गया. लेकिन फरहीन ने उस के साथ जाने से साफ मना कर दिया. तहमीदा अब तक जान गई थी कि बेटी के कदम बहक गए हैं, सो वह भी चाहती थी कि वह ससुराल चली जाए. उस ने उसे समझाया भी. लेकिन फरहीन ने शौहर के साथ जाने से इंकार कर दिया. 

इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. गुलफाम हर हफ्ते बीवी को मनाने ससुराल जाता. लेकिन वह उसे दुत्कार कर भगा देती. अगस्त के दूसरे सप्ताह में वह अपने बड़े भाई अनवर को भी साथ ले गया. अनवर ने फरहीन की मां व भाइयों से बात की तथा फरहीन को भी समझाया. लेकिन फरहीन राजी नहीं हुई. अपमानित हो कर गुलफाम व अनवर वापस घर आ गए. गुलफाम बखूबी जानता था कि फरहीन पर इश्क का भूत सवार है. वह भतीजे आमिर के प्यार में अंधी हो चुकी है. इसलिए वह उस के साथ आने को नानुकुर कर रही है. काफी सोचविचार के बाद गुलफाम ने सोच लिया कि वह आखिरी बार और फरहीन को मनाने जाएगा. यदि इस बार उस ने इंकार किया तो वह बरदाश्त नहीं करेगा और बेवफा बीवी को सबक सिखा कर ही रहेगा. 

इस के लिए उस ने एक बांका भी खरीद लिया था. फिर वह 3 सितंबर, 2024 को अपनी ससुराल पहुंच गया. उस ने बड़े प्यार से बीवी फरहीन को मनाने की कोशिश की, लेकिन फरहीन ने उस की एक नहीं सुनी. इतना ही नहीं, उस ने पति गुलफाम की उस दिन भी बेइज्जती की. तब गुलफाम ने बांके से वार कर उसे मौत के घाट उतार दिया. गुलफाम से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने मृतका के भाई वारिस की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103 के तहत गुलफाम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. 

4 सितंबर, 2024 को पुलिस ने हत्यारोपी गुलफाम को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

Crime Cases : ट्रॉली बैग में 72 घंटे तक रखा प्रेमिका की लाश को

ज्योति और शिवम की दोस्ती कहें या प्यार, लुधियाना से ही शुरू हो गया था. शिवम का जब बीसीए का कोर्स पूरा हो गया तो उस ने नोएडा कर वीवो कंपनी के कस्टमर केयर विभाग में नौकरी कर ली. उस ने ज्योति को भी नोएडा बुला लिया. लेकिन…   

नोएडा के खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव स्थित 4 मंजिला मकान में कुल 33 कमरे थे. सभी कमरों में नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली में काम करने वाले किराएदार रह रहे थे. इन में से कुछ लोग अपने परिवार के साथ रहते थे. लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे थे जो अकेले ही रहते थे. चूंकि सभी लोग नौकरीपेशा थे, इसलिए वे सुबह ही अपनी ड्यूटी पर चले जाते और देर शाम या रात को वापस अपने कमरों पर लौटते थे. 12 जून, 2018 की रात करीब 11 बजे की बात है. उस समय अधिकांश लोग अपने कमरों में सोने की तैयारी में थे. तभी कुछ लोगों को भयंकर बदबू आई. बदबू कहां से रही है, यह जानने के लिए कुछ किराएदार अपने कमरों से बाहर निकल आए. उसी समय एक युवक चौथी मंजिल से एक बड़े आकार का भूरे रंग का ट्रौली बैग अपने साथ ले कर सीढि़यों से उतरता दिखा.

वहां रहने वाले उस युवक के बारे में केवल इतना जानते थे कि वह ऊपर की मंजिल पर रहता है. उस का नाम किसी को मालूम नहीं था. ट्रौली बैग ले कर वह जिधर जा रहा था, उधर ही बदबू बढ़ती जा रही थीलोगों को शक हुआ कि उस के बैग में ऐसा क्या है जो इतनी बदबू रही है. एकदो लोगों ने उस से इस बारे में पूछा भी, लेकिन उस ने ठीक से कोई जवाब देने के बजाए उन्हें झिड़क दिया. इस के बाद उन लोगों को उस पर और भी ज्यादा शक बढ़ गया और वे उत्सुकतावश नीचे ग्राउंड फ्लोर पर गए. दरअसल, पिछले 2 दिनों से उस मकान में एक अजीब तरह की सड़ांध रही थी. कई किराएदारों ने सड़ांध का पता लगाने की कोशिश की थी लेकिन कुछ भी पता नहीं चल पाया था. लेकिन ट्रौली बैग देख कर वे लोग समझ गए कि सड़ांध उसी बैग से रही है.

ग्राउंड फ्लोर पर उतरने के बाद वह युवक लाल रंग की कार की तरफ बढ़ रहा था, तभी लोगों ने इस की सूचना उस मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी को दे दी. राधेमोहन त्रिपाठी उस ट्रौली बैग वाले युवक के पास पहुंचे. वह उस युवक को पहचान गए. वह युवक चौथी मंजिल पर रहने वाला किराएदार शिवम विरदी था. राधेमोहन ने शिवम से बैग के बारे में पूछा तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. इस पर राधेमोहन ने उसे कार में बैठने से रोक लिया और नोएडा पुलिस के कंट्रोलरूम को फोन कर दिया. जो किराएदार नीचे उतर आए थे, वे उस लाल रंग की कार के आगे खड़े हो गए ताकि वह कार ले कर वहां से भाग सके. तब तक शिवम वह ट्रौली बैग ले कर कार में बैठ चुका था. उस ने कार का हौर्न बजा कर सामने खडे़ लोगों से हट जाने का संकेत किया. लेकिन वे नहीं हटे तो शिवम के चेहरे पर घबराहट दिखाई देने लगी.

शिवम ने जब देखा इतने सारे लोग उस के पीछे पड़ गए हैं तो वह कार से उतरा और उसे लौक कर के वहां से पैदल ही भाग खड़ा हुआ. लोग उस के पीछे भागे भी पर वह किसी की पकड़ में नहीं आया. थोड़ी देर में खोड़ा थाने के थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार वहां गए. लोगों ने उन्हें पूरी बात बताई. कार के सामने पहुंच कर वह उस का मुआयना करने लगे. कार के दरवाजे लौक थे, इस के बावजूद कार से कुछ बदबू बाहर रही थी. उन्होंने साथ में आए स्टाफ से कार का शीशा तोड़ कर कार में रखा ट्रौली बैग बाहर निकालने को कहा.

पुलिसकर्मियों ने कार का शीशा तोड़ कर ट्रौली बैग बाहर निकाला तो उस में से बहुत तेज बदबू रही थी. इस से थानाप्रभारी ने बैग खुलवाया तो उन की शंका सच साबित हुई. उस में एक लड़की की लाश थी. लाश काफी खराब अवस्था में थी. लाश देख कर लोगों ने बताया कि लाश शिवम की पत्नी ज्योति की है. ज्योति कई दिनों से दिखाई भी नहीं दे रही थी. लाश का मुआयना करने पर थानाप्रभारी ने देखा उस पर घाव के निशान थे. थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार ने वरिष्ठ अधिकारियों को फोन कर के मामले की सूचना दे दी और जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उन्होंने लाल रंग की स्विफ्ट कार अपने कब्जे में ले ली.

मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी से पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि कार छोड़ कर फरार हुआ शिवम लुधियाना, पंजाब का रहने वाला है और पिछले 8 महीने से वह अपनी पत्नी ज्योति के साथ यहां रह रहा था. केयरटेकर को साथ ले कर थानाप्रभारी चौथी मंजिल स्थित शिवम के कमरे पर पहुंचे. कमरे पर ताला लगा हुआ था. ताला तोड़ कर पुलिस टीम अंदर पहुंची तो देखा फर्श की अच्छी तरह सफाई कर दी गई थी. कमरे की तलाशी में पुलिस को कुछ कागजात मिले, उन में से एक में ज्योति के भाई का पता और फोन नंबर मिल गया

थानाप्रभारी ने उस के भाई को फोन कर के बताया कि उस की बहन के साथ अनहोनी हो गई है, इसलिए वह जितनी जल्दी हो सके, नोएडा के खोड़ा थाने पहुंच जाए. उस कमरे को सील कर के पुलिस टीम थाने लौट गई. अगले दिन सुबह फरार शिवम का हुलिया पता कर के नोएडा के बसस्टैंड तथा मैट्रो स्टेशन पर उस की तलाश की गई, मगर वह कहीं नहीं मिला. उधर थानाप्रभारी को बेसब्री से ज्योति के भाई के आने का इंतजार था. उस के आने के बाद ही आगे की काररवाई की जानी थी. 12 जून, 2018 की शाम को ज्योति का भाई लोधी सिंह वर्मा खोड़ा थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी ने सब से पहले उसे अस्पताल में रखी लाश दिखाई. लाश देखते ही वह रोने लगा. उस ने उस की शिनाख्त अपनी छोटी बहन ज्योति के रूप में कर दी. लोधी सिंह की शिकायत पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

पुलिस ने लोधी सिंह से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की बहन पिछले साल अक्तूबर में दिल्ली के एक सैलून में जौब मिलने की बात बता कर लुधियाना से नोएडा चली आई थीचूंकि उस ने परिवार को अच्छी सैलरी मिलने की बात बताई थी, वैसे भी ज्योति तेजतर्रार थी, इसलिए उस के दिल्ली आने पर किसी ने ऐतराज नहीं किया थानौकरी लग जाने पर उस ने बताया था कि वह दिल्ली में अपनी एक सहेली के साथ किराए पर कमरा ले कर रहती है. यहां आने के बाद भी वह प्रतिदिन अपने घर फोन कर के अपने बारे में जानकारी देती रहती थी. जब तक वह यहां रही, परिवार का कोई सदस्य उसे देखने के लिए नहीं आया.

इस वारदात के बाद लोधी सिंह को पता लगा कि वह किसी सहेली के साथ नहीं बल्कि शिवम के साथ रह रही थी. लोधी सिंह से बात करने के बाद थानाप्रभारी ने फरार शिवम को तलाशने के लिए मुखबिर लगा दिए. 13 जून, 2018 की शाम को खोड़ा के कुछ लोगों ने नोएडा के लेबर चौक के पास शिवम को खड़े देखा. वह शायद किसी गाड़ी के इंतजार में वहां खड़ा था. पुलिस को सूचना देने से पहले ही लोगों ने उसे पकड़ लिया और इस की सूचना खोड़ा पुलिस को दे दी. शिवम के पकड़े जाने की बात सुन कर थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार फौरन पुलिस टीम के साथ लेबर चौक पहुंच गए. वहां कुछ लोग शिवम को दबोचे खड़े थे. पुलिस ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से उस की पत्नी ज्योति की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि ज्योति की हत्या उस ने नहीं की है, बल्कि उस ने आत्महत्या की थी.

शिवम ने बताया कि 9 जून की रात को वह शराब पी कर घर लौटा तो ज्योति उस से नाराज हो गई. दोनों के बीच कहासुनी हुई तो ज्योति गुस्से में बाथरूम में गई और फंदा बना कर लटक गईआधी रात होने पर जब उस का नशा उतरा तो उस ने ज्योति को ढूंढना शुरू किया. वह उसे ढूंढते हुए बाथरूम में पहुंचा तो उस की लाश फंदे में झूल रही थी. यह देख कर वह घबरा गया और पुलिस से बचने के डर से उस ने 2 दिनों तक उस की लाश कमरे में ही छिपाए रखी. कल जब वह उसे ठिकाने लगाने के लिए जा रहा था, तभी लोगों ने उसे घेर लिया और लाश ठिकाने नहीं लगा सका.

यह सब बतातेबताते शिवम थानाप्रभारी से बारबार नजरें चुरा रहा था. यह देख कर थानाप्रभारी को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. इस के बाद उन्होंने शिवम से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि ज्योति की हत्या उस ने ही की थी. उस ने ज्योति की हत्या के पीछे की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली

26 वर्षीय शिवम लुधियाना के फतेहपुर अवाना राजगुरू नगर में अपने पिता जगदीश विरदी और मां के साथ रहता था. उस के पिता एक फैक्ट्री में काम करते थे. 2 साल पहले वह लुधियाना के एक मौडर्न सैलून के सामने से गुजर रहा था, तो उस की मुलाकात ज्योति से हुई. ज्योति उसी सैलून में नौकरी करती थी. पहली ही नजर में ज्योति की खूबसूरती उस के दिल को भा गई. उस ने उत्सुकतावश पूछ लिया कि इस सैलून में लेडीज और जेंट्स दोनों की हेयर सेटिंग होती है? इस पर ज्योति ने उसे बताया कि यहां दोनों के लिए अलगअलग सैलून हैं और वह भी इसी सैलून में काम करती है. अगर उसे कभी जरूरत हो तो उसे फोन कर के जाए.

इस के बाद उस ने अपना फोन नंबर बताया तो शिवम ने जल्दी से उस का नाम पूछ कर उस का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया. इस के बाद उस ने अपना नाम और नंबर भी ज्योति को बता दिया. यह उन दोनों की पहली मुलाकात थी. इस के बाद तो आए दिन किसी किसी बहाने से दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया जो जल्दी ही प्यार में बदल गया. दोनों का जब भी दिल करता, आपस में प्यार की मीठीमीठी बातें कर अपनी चाहतों का इजहार करने से नहीं चूकते थे. धीरेधीरे 2 साल गुजर गए. इस बीच शिवम ने लुधियाना के नामी इंस्टीट्यूट से बीसीए का कोर्स भी पूरा कर लिया. अब उसे भी नौकरी की तलाश थी. वह जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो कर ज्योति को अपनी दुलहन बनाना चाहता था.

ज्योति के परिवार में उस के पिता की कुछ साल पहले ही मौत हो चुकी थी. इस समय घर में 2 बडे़ भाई धर्मेंद्र सिंह वर्मा और लोधी सिंह वर्मा तथा 5 बहनें थीं. बहनों में वह सब से छोटी थीदोनों को ऐसा लगता था कि उन की शादी में परिवार वाले बाधक नहीं बनेंगे. फिर भी दोनों फूंकफूंक कर कदम रख रहे थे. मजे की बात यह थी कि काफी समय गुजर जाने के बाद भी उन के परिवार वालों को उन के अफेयर की जानकारी नहीं थी. इस बीच एक दिन जब दोनों मिले तो शिवम ने उसे बताया कि वह नौकरी की तलाश में दिल्ली जा रहा है और नौकरी मिलते ही उसे भी वहां बुला लेगा. ज्योति इस के लिए पहले से ही राजी थी, इसलिए उस ने शिवम के प्रस्ताव पर फौरन हामी भर दी.

ज्योति के साथ नया जीवन गुजारने की उमंग में वह मन में नएनए सपने बुनता हुआ नोएडा गया. यहां उसे वीवो कंपनी में नौकरी मिल गई. वह कंपनी के कस्टमर केयर डिपार्टमेंट में काम करने लगा. 6 महीने बाद उस ने ज्योति को भी फोन कर के अपने पास बुला लिया. अक्तूबर में ज्योति नोएडा गई. साथ रहने के लिए दोनों ने खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव में वन रूम सेट किराए पर ले लिया और लिवइन में रहने लगे. वहां शिवम ने ज्योति को अपनी पत्नी बताया था. कुछ दिन बाद ज्योति वर्मा को भी गाजियाबाद के वसुंधरा एनक्लेव के एक ब्यूटीपार्लर में ब्यूटीशियन की नौकरी मिल गई. चूंकि दोनों ही नौकरी कर रहे थे, इसलिए उन्हें अब किसी तरह की टेंशन नहीं थी. दोनों खुश थे.

ज्योति और शिवम के शुरुआत के 3-4 महीने बेहद खुशनुमा थे, लेकिन परेशानी तब शुरू हुई, जब ज्योति शिवम के जल्दी शादी करने के प्रस्ताव को किसी किसी बहाने टालने लगी. यह देख कर शिवम मन ही मन बहुत परेशान रहने लगा. इस के अलावा उन दोनों की सैलरी में भी भारी अंतर था. शिवम को जहां 14 हजार रुपए मिलते थे, वहीं ज्योति की सैलरी 22 हजार रुपए महीने थी. इस के अलावा ज्योति ने अप्रैल महीने से घर लेट पहुंचना शुरू कर दिया था. इस से शिवम ने मन में सोचा कि ज्योति को कोई अमीर आशिक मिल गया है, इसलिए वह उस से किनारा करना चाह रही है. अपना शक दूर करने के लिए वह रोज ज्योति के घर लौटने पर उस का मोबाइल चैक करने लगा

शिवम को अपना मोबाइल चैक करते देख कर ज्योति लपक कर उस से मोबाइल छीन लेती थी, साथ ही ऐसा करने से मना भी करती थी. इस के बाद शिवम का शक और बढ़ गया. नतीजतन आए दिन दोनों के बीच रोज लड़ाई होने लगी. शिवम को अब पक्का यकीन हो गया कि ज्योति जरूर किसी के साथ डेट पर जाने लगी है. 9 जून, 2018 की शाम शिवम विरदी ने शराब पी. उस ने सोचा कि आज वह ज्योति का मोबाइल छीन कर उस के वाट्सऐप और फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट चैक करेगा. देर शाम जब ज्योति घर लौटी तो पहले से गुस्से में भरे बैठे शिवम ने उस से मोबाइल छीन लिया. जब ज्योति ने इस का पुरजोर विरोध किया तो दोनों के बीच जम कर लड़ाई हो गई

गुस्से में शिवम रसोई से चाकू उठा लाया और उस के पेट पर कई वार कर दिए. थोड़ी देर तड़प कर ज्योति ने दम तोड़ दिया. ज्योति के मरने के बाद शिवम को लगा, उस से बहुत बड़ी गलती हो गई. लेकिन अब क्या हो सकता था. वह 72 घंटों तक लाश को एक ट्रौली बैग में बंद कर के रखे रहा और उसे ठिकाने लगाने के बारे में सोचता रहा12 जून को उस ने दिल्ली के लक्ष्मीनगर से एक सेल्फ ड्राइव स्विफ्ट कार किराए पर ली और उसे वंदना एनक्लेव स्थित मकान के सामने ले आया. जब वह ट्रौली बैग को उस में रखने जा रहा था, उसी समय ज्योति की लाश से निकलने वाली बदबू के कारण उस का भांडा फूट गया और वह खोड़ा के थानाप्रभारी के हत्थे चढ़ गया.

14 जून, 2018 को नोएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण, एसपी आकाश तोमर ने नोएडा स्थित अपने औफिस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर मीडिया को ज्योति वर्मा मर्डर केस का खुलासा होने की जानकारी दी. उसी दिन आरोपी शिवम विरदी को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

तमाम युवक और युवतियां लिवइन में रहते हैं और अपनीअपनी नौकरी करते हैं, लेकिन सभी के अनुभव अच्छे नहीं होते. इस की वजह होती है दोनों की अंडरस्टैंडिंग ठीक बन पाना. ज्योति और शिवम के मामले में भी यही हुआ.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime : विवाहिता के प्यार में 4 हत्याएं

सरकारी टीचर सुनील गौतम अपनी पत्नी पूनम भारती और 2 बेटियों के साथ अमेठी में रहता था. वह अपने काम से काम रखता था. फिर एक दिन किसी ने सुनील, उस की पत्नी और दोनों बेटियों को घर में घुस कर गोलियों से भून डाला. आखिर कौन था हत्यारा और क्यों की उस ने ये हत्याएं?

चंदन वर्मा ने 12 सितंबर, 2024 को अपने वाट्सऐप पर लिखा, ‘5 लोग मरने वाले हैं. मैं जल्दी कर के दिखाऊंगा (5 people are going to die. I will show you soon.)उस का इशारा अपनी प्रेमिका पूनम व उस के परिवार, स्वयं और पूनम के भाई सोनू की तरफ था. चंदन वर्मा ने इस के लिए अवैध पिस्टल का इंतजाम तो कर लिया था, लेकिन गोलियों का इंतजाम नहीं हो पा रहा था. इस के लिए उस ने जानपहचान के अपराधियों से संपर्क किया और 10 राउंड गोलियों वाली मैगजीन मुंहमांगी कीमत पर खरीद कर रख ली, लेकिन यह इंतजाम करने में उसे 15 दिन का समय लग गया था. 

3 अक्तूबर, 2024 को नवरात्रि का प्रथम दिन था. जगहजगह पंडाल सजे थे. चंदन वर्मा पिस्टल में मैगजीन लोड कर शाम करीब साढ़े 6 बजे बाइक से अमेठी के मंदिर रोड अहोरवा चौराहा स्थित मुन्ना अवस्थी के मकान पर पहुंचा. इसी मकान में पूनम अपने पति सुनील व 2 बच्चों के साथ किराए पर रहती थी. चंदन वर्मा ने घर से करीब 50 मीटर दूर स्थित दीपक की मोबाइल शाप के सामने अपनी बाइक खड़ी कर दी. उस ने दीपक से कहा कि वह मंदिर दर्शन करने जा रहा है. जल्दी ही वापस आ जाएगा. 

इस के बाद वह पूनम के घर पहुंचा. पूनम उस समय घर पर ही थी. वह पति व बच्चों से बतिया रही थी. चंदन वर्मा को देख कर पूनम व सुनील सहम गए. चंदन वर्मा ने जेब से 10-10 के 2 नोट निकाले. उस ने एक नोट सुनील की बेटी 5 वर्षीया सृष्टि के हाथ में तथा दूसरा नोट 2 वर्षीया समीक्षा के हाथ में थमा दिया. इस के बाद वह पूनम की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, ”पूनम, तुम मेरे साथ चलो. तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊंगा.’’

यह सुनते ही पूनम बोली, ”तुम पागल हो गए हो क्या? मैं अपने पति व बच्चों को छोड़ कर भला कैसे जा सकती हूं. तुम ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है. चले जाओ यहां से वरना मैं पुलिस बुला लूंगी.’’

पूनम की धमकी सुन कर चंदन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने लोडेड पिस्टल निकाली और 2 गोलियां पूनम के सीने में दाग दीं. सुनील सामने आया तो उस पर भी 3 गोलियां दाग दीं. इस के बाद उस ने सृष्टि और मासूम समीक्षा पर भी एकएक गोली चला दी. सभी खून से लथपथ हो कर जमीन पर बिछ गए. कुछ क्षण बाद ही सभी ने दम तोड़ दिया. चारों को मौत के घाट उतारने के बाद चंदन वर्मा ने सुसाइड करने के लिए खुद को गोली मारनी चाही. लेकिन पिस्टल की स्प्रिंग निकल कर गिर गई, जिस से गोली नहीं चली. इस के बाद वह डर गया और बाइक मोबाइल की दुकान पर ही छोड़ कर घर के पीछे के रास्ते से फरार हो गया.

अवस्थी निवास में ही रोड पर अमित मैडिकल स्टोर था. इस के संचालक रामनारायन यादव ने जब लगातार गोलियों के चलने की आवाज सुनी तो वह घबरा गए. लगभग 100 मीटर की दूरी पर देवी पंडाल सजा था. वहां पुलिस तैनात थी. रामनारायन पुलिस के पास तेज कदमों से पहुंचे और गोलियां चलने की जानकारी दी. यह खबर सुन कर 2 सिपाही मकान के अंदर दाखिल हुए तो वहां 4 लाशें बिछी देख कर उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी.  4 हत्याओं की सूचना मिलते ही अमेठी के शिवरतनगंज थाने की पुलिस अधिकारियों के होश उड़ गए. कुछ देर बाद ही अमेठी के एसपी अनूप कुमार सिंह, एएसपी हरेंद्र सिंह तथा डीएम निशा अनंत घटनास्थल पहुंच गईं. शिवरतनगंज थाने की पुलिस पहले से ही वहां मौजूद थी. सूचना पर मीडियाकर्मियों का भी जमावड़ा लग गया. 

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो उन के माथे पर बल पड़ गए और वे सिहर उठे. घर के अंदर 4 लाशें खून से लथपथ पड़ी थीं. अधिकारियों ने जानकारी जुटाई तो पता चला कि इस मकान में शिक्षक सुनील कुमार गौतम अपनी पत्नी पूनम व 2 बेटियों के साथ किराए पर रहते थे. इन्हीं की गोली मार कर हत्या की गई थी. 

सुनील कुमार व उन की पत्नी पूनम के शव नल के पास पड़े थे, जबकि दोनों बेटियों के शव जीने के पास पड़े थे. मृतक सुनील की उम्र 34 वर्ष के आसपास तथा पूनम की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. उन की बेटियों की उम्र क्रमश: 5 वर्ष और 2 वर्ष थी. निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों ने वारदात की सूचना मृतकों के घर वालों को दे दी. 

मुख्यमंत्री योगी क्यों हुए सक्रिय

इसी बीच प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दलित परिवार की हत्या की जानकारी हुई तो उन्होंने शोक संवेदना प्रकट की और पुलिस के आला अधिकारियों को तत्काल घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. आदेश पाते ही आईजी (अयोध्या जोन) प्रवीण कुमार तथा एडीजी (लखनऊ जोन) एस.वी. शिरोडकर घटनास्थल (अमेठी) पहुंच गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और घटना के संबंध में एसपी अनूप कुमार सिंह से जानकारी हासिल की. 

उन्होंने निरीक्षण और साक्ष्य जुटाने में जुटी फोरैंसिक टीम से भी जानकारी ली. घटनास्थल से टीम ने कारतूस के 9 खोखे, एक जिंदा कारतूस तथा बाइक बरामद की. अब तक सूचना पा कर मृतक सुनील के पिता रामगोपाल गौतम घटनास्थल पर आ चुके थे. बेटाबहू व नातिनों के शवों को देख कर वह बदहवास हो गए. पूछताछ में रामगोपाल ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि इस घटना को अंजाम उस के बेटे सुनील के दोस्त चंदन वर्मा ने दिया है, जो रायबरेली के मटिया इलाके में रहता है.

घटनास्थल की जांच और पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने चारों शवों को पोस्टमार्टम हेतु अमेठी के जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद रामगोपाल की तहरीर पर शिवरतनगंज थाने में बीएनएस की धारा 103 (1) के तहत चंदन वर्मा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. चूंकि मामला दलित परिवार की सामूहिक हत्या का था, अत: पुलिस अधिकारियों ने चंदन वर्मा को गिरफ्तार करने के लिए एसटीएफ की 4 टीमें लगा दीं. ये टीमें आरोपी की टोह में लग गईं. 

पुलिस ने रात में ही चारों शवों का पोस्टमार्टम करा दिया. सीएमओ अंशुमान सिंह की देखरेख में डा. विवेक चौधरी व डा. अभय गोयल की टीम ने पोस्टमार्टम किया. पूनम को 2, सुनील को 3 तथा बेटियों को 1-1 गोली मारी गई थी. पोस्टमार्टम के बाद शव सुनील के पिता रामगोपाल को सौंप दिए गए. 4 अक्तूबर, 2024 की सुबह पुलिस सुरक्षा में चारों शव मृतक शिक्षक सुनील के पैतृक गांव सुदामापुर (रायबरेली) पहुंचे तो गांव मेें कोहराम मच गया. पूरा गांव शवों को देखने उमड़ पड़ा. शवों को देख कर सुनील की मां राजवती तथा पूनम की मां कृष्णावती बदहवास हो गईं. पूजा व सोनू भी बहनबहनोई का शव देख कर बिलख पड़ी थीं. भीड़ में गम व रोष था. वहां पुलिस विरोधी नारे भी गूंजने लगे थे. 

राजनीतिक लाभ पाने की क्यों मची होड़

इस घटना को ले कर राजनीतिक गलियारे में भी भूचाल आ गया था. सब से पहले अमेठी के सांसद किशोरी लाल शर्मा सुदामापुर गांव पहुंचे. उन्होंने मृतक के पिता रामगोपाल को धैर्य बंधाया और राहुल गांधी से उन की मोबाइल पर बात कराई. राहुल गांधी ने कानूनव्यवस्था पर सवाल उठाते हुए रामगोपाल को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया. भाजपा के राज्यमंत्री मयंकेश्वर शरण तथा ऊंचाहार के विधायक मनोज पांडेय भी सुदामापुर गांव पहुंचे. उन्होंने पीडि़त परिवार को हरसंभव मदद का भरोसा दिया. यही नहीं, इन दोनो नेताओं ने अंतिम संस्कार के बाद पीडि़त परिवार की मुलाकात लखनऊ ले जा कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कराई. 

रामगोपाल गौतम ने मुख्यमंत्री सेे आर्थिक मदद, आवास व बड़े बेटे को सरकारी नौकरी दिलाने की मांग की. मुख्यमंत्री ने सभी मांगों को पूर्ण करने का आश्वासन दिया. इधर एसटीएफ की एक टीम को पता चला कि आरोपी चंदन वर्मा प्रयागराज में है. अत: एसटीएफ की टीम प्रयागराज पहुंच गई. लेकिन वहां पता चला कि वह बस से दिल्ली की ओर रवाना हो चुका है. सर्विलांस के जरिए एसटीएफ की टीम ने उस का पीछा किया और 4 अक्तूबर की अपराह्नï पौने 3 बजे उसे नोएडा के जेवर टोल प्लाजा से गिरफ्तार कर लिया. रात 11 बजे अमेठी के एसपी अनूप सिंह ने प्रैसवार्ता की और इस चौहरे हत्याकांड का खुलासा कर दिया.

5 अक्तूबर, 2024 की सुबहसुबह पुलिस टीम आरोपी चंदन वर्मा को ले कर हत्या में इस्तेमाल पिस्टल बरामद कराने को ले जा रही थी. इस दौरान मोहनगंज थाना क्षेत्र के पियरे विंध्या दीवान नहर पटरी पर पहुंचने पर चंदन वर्मा ने फुरती से थानेदार मदन वर्मा की रिवौल्वर छीन ली और फायर करते हुए भागने की कोशिश करने लगा. पुलिस की जवाबी फायरिंग में उस के पैर में गोली लगी. वह घायल हो गया. पुलिस ने उसे सीएचसी सिंहपुर में भरती कराया. इस मामले की रिपोर्ट थानेदार मदन वर्मा ने थाना मोहनगंज में बीएनएस की धारा 109 के तहत चंदन वर्मा के खिलाफ दर्ज कराई. 

6 अक्तूबर, 2024 की शाम ऊंचाहार क्षेत्र के विधायक मनोज पांडेय, प्रभारी मंत्री राकेश सचान के साथ सुदामापुर गांव पहुंचे. वहां उन्होंने मृतक शिक्षक सुनील कुमार के पिता रामगोपाल गौतम व मां राजवती से मुलाकात की. उन्होंने उन्हें 5 लाख रुपए का चैक दिया. उन्होंने मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत एक आवास, 5 बीघा कृषि भूमि का पट्टा आवंटन तथा परिजनों को आयुष्मान व अंत्योदय कार्ड दिए. इस के अलावा अत्याचार से उत्पीडि़त राशि 33 लाख रुपए का चैक भी सौंपा. साथ ही मृतक के भाई को मृतक आश्रित कोटे से सरकारी नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया. 

आरोपी चंदन वर्मा से पूछताछ करने के बाद इस चौहरे हत्याकांड के पीछे की जो कहानी सामने आई, वह बहुत हैरान कर देने वाली निकली.

हंसमुख स्वभाव की पूनम ने संभाली घर की जिम्मेदारी

सुनील कुमार के पिता राम गोपाल गौतम उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के सुदामापुर गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी राजवती के अलावा 2 बेटे सोनू, सुनील व एक बेटी रूपा थी. राम गोपाल गरीब किसान थे. उन के पास मात्र एक बीघा जमीन थी. इस कम उपजाऊ भूमि से उन के परिवार का भरणपोषण नहीं हो पाता था. अत: वह मेहनतमजदूरी कर किसी तरह परिवार का गुजारा करते थे. रामगोपाल गौतम के दोनों बेटे सोनू व सुनील जब बड़े हुए तो वह भी पिता के साथ मेहनत मजदूरी करने लगे. रामगोपाल अपने बेटों को अच्छे स्कूल में नहीं पढ़ा सके. बड़ा बेटा सोनू तो पढऩे में कमजोर था, लेकिन छोटा बेटा सुनील पढऩे में तेज था. वह मेहनतमजदूरी के साथ पढ़ाई भी करता था. 

चूंकि गांव में मजदूरी कम मिलती थी, इसलिए सोनू का मन गांव में नहीं लगता था. गांव के कुछ लड़के मुंबई में काम करते थे. सोनू भी उन्हीं के साथ मुंबई चला गया और वहीं काम करने लगा. अब वह गांव में तीजत्यौहारों पर ही आता और कुछ दिन तक रुक कर वापस चला जाता था. सुनील पहले बीए करने के बाद सरकारी नौकरी पाने की कोशिश में जुट गया था. अब तक रामगोपाल बड़े बेटे सोनू व बेटी रूपा की शादी कर चुके थे. सब से छोटा सुनील था. वह 20 वर्ष की उम्र पार कर चुका था. अत: रामगोपाल उस की शादी करना चाहते थे. 

एक रोज कृष्णावती अपनी बेटी पूनम भारती का रिश्ता लेकर रामगोपाल के घर आई. कृष्णावती रायबरेली के उत्तर पारा बेला भेला गांव की रहने वाली थी. परिवार में पति राजाराम भारती के अलावा 2 बेटे मोनू व भानू के अलावा 2 बेटियां पूजा व पूनम थीं. बड़ी बेटी पूजा की शादी हो चुुकी थी. छोटी बेटी पूनम थी. वह पढ़ीलिखी व दिखने में सुंदर थी. कृष्णावती ने सुनील को देखा तो उस ने अपनी बेटी पूनम भारती के लिए उसे पसंद कर लिया. उस के बाद पूनम और सुनील ने भी एकदूसरे को देखा और फिर दोनों शादी के लिए राजी हो गए. दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद कृष्णावती ने 12 अप्रैल, 2016 को पूनम का विवाह सुनील कुमार के साथ कर दिया. 

वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 41,250 पदों पर पुलिस भरती निकाली. सुनील ने भी सिपाही पद पर भरती के लिए आवेदन किया. इस के बाद वह जीजान से तैयारी में जुट गया. सुनील की मेहनत रंग लाई. उस का चयन सिपाही पद पर हो गया था. ट्रेनिंग के बाद उसे नियुक्ति मिल गई. इन्हीं दिनों उसे एक और खुशी मिली. पूनम ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सृष्टि रखा. सृष्टि के जन्म से उस का घरआंगन किलकारियों से गूंजने लगा था. उस के मातापिता भी खुश थे. 

सुनील पुलिस में भरती तो हो गया था, लेकिन उसे वह नौकरी रास नहीं आ रही थी. क्योंकि एक तो वह परिवार को ज्यादा समय नहीं दे पा रहा था और दूसरे उसे पुलिसिया भाषा अच्छी नहीं लगती थी. पुलिस की नौकरी से मन हटा तो वह शिक्षा विभाग में नौकरी खोजने लगा. बीएड तो वह कर ही चुका था, फिर उस ने बीए शिक्षक पात्रता परीक्षा भी पास कर ली. जब शिक्षक की वैकेंसी निकली तो उस ने भी आवेदन कर दिया. 

शहर जा कर क्यों उडऩे लगी पूनम भारती

10 दिसंबर, 2020 को सुनील कुमार की बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक की नौकरी लग गई. उस की पहली तैनाती रायबरेली में बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में हुई. शिक्षा विभाग में नौकरी पाने के बाद सुनील ने सिपाही पद से इस्तीफा दे दिया. शिक्षा विभाग में नौकरी मिलने पर घर में एक बार फिर खुशी की लहर दौड़ गई. सुनील कुमार का गांव सुदामापुर, रायबरेली से 35 किलोमीटर दूर था. नौकरी के लिए उसे रोजाना अपडाउन करना पड़ता था. इस में पैसा तो खर्च होता ही था, समय की बरबादी भी होती थी. इसलिए उस ने रायबरेली के मटिया इलाके में 2 कमरे वाला मकान किराए पर लिया और पत्नी पूनम भारती और बेटी सृष्टि के साथ रहने लगा.

पूनम भारती गांव से शहर आई तो उस के रंगढंग ही बदल गए. वह खूब सजसंवर कर रहने लगी और स्वच्छंद हो कर बाजारहाट घूमने लगी. पति की जिस दिन छुट्टी होती, उस दिन वह बेटी को साथ ले कर पति के साथ सैरसपाटे के लिए निकल जाती. रेस्टोरेंट में खाना खाती. सुनील पत्नी की हर बात मान लेता था. एक तरह से वह सुनील को अपनी अंगुलियों पर नचाने लगी थी. सुनील कुमार गौतम ने मटिया इलाके के जिस मकान में कमरा किराए पर लिया था, उसी मकान के पीछे वाले भाग में चंदन वर्मा नामक युवक किराए पर रहता था. 25-26 वर्षीय चंदन वर्मा मैकेनिकल इंजीनियर था. वह अस्पतालों की एक्सरे, सीटी स्कैन और दूसरी अन्य मशीनों की मरम्मत करता था. इस में उस की अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. 

चंदन वर्मा के पिता मायाराम वर्मा मूलरूप से अंबेडकर नगर के टांडा के रहने वाले थे. उस के 7 भाई और थे. मायाराम 1990 के दशक में अपने भाइयों के साथ टांडा छोड़ कर रायबरेली आ गए थे. रायबरेली के तेलिया कोट मोहल्ले में वह भाइयों के साथ अवधेश गुप्ता के मकान में किराए पर रहने लगे थे. साल 2010 में मायाराम वर्मा अपने परिवार के साथ रायबरेली छोड़ कर दिल्ली चले गए, लेकिन उस के अन्य भाई उस के साथ नहीं गए. उन भाइयों ने तेलिया कोट में ही जमीन खरीद कर अपने घर बना लिए. दिल्ली जाने के बाद भाइयों ने मायाराम से दूरियां बना ली. 

लेकिन वर्ष 2019 के नवंबर माह में मायाराम फिर रायबरेली आ गए. इस बार उन्होंने तेलिया कोट के बजाय मटिया इलाके में कमरा किराए पर लिया, जो तेलिया कोट से 2 किलोमीटर दूर था. यहां पर वह अपनी पत्नी व बेटे चंदन के साथ रहने लगा. चूंकि चंदन वर्मा अच्छा कमाता था, अत: उस को कोई चिंता नहीं थी. चूंकि शिक्षक सुनील कुमार गौतम व चंदन वर्मा एक ही मकान में किराएदार थे, अत: उन दोनों के बीच जल्द ही जानपहचान हो गई. धीरेधीरे जानपहचान दोस्ती में बदल गई. सुनील से मिलने के बहाने चंदन वर्मा का पूनम के घर आनाजाना शुरू हो गया. खूबसूरत पूनम पहली ही नजर में चंदन के दिल में रचबस गई थी. नजदीकियां बढ़ाने को वह उस के करीब आने की कोशिश करने लगा था. 

पूनम की बेटी सृष्टि अब तक 2 साल की हो चुकी थी. चंदन वर्मा उसे खिलाने के बहाने अपने साथ ले जाता और खूब लाड़प्यार करता. उसे कभी चौकलेट तो कभी खिलौने ला कर देता. चंदन जब कभी पूनम की गोद से सृष्टि को अपनी गोद में लेता तो जानबूझ कर उस के नाजुक अंगों को छेड़ देता. पूनम तब बनावटी गुस्सा दिखाती फिर हंस कर टाल देती. चंदन पूनम की खूबसूरती की भी खूब तारीफ करता और उसे अपनी लच्छेदार बातों से रिझाने की कोशिश करता. साथ ही वह उस के नजदीक जाने की कोशिश करता. 

घर आतेजाते चंदन वर्मा और पूनम भारती की नजदीकियां बढऩे लगीं. पूनम को भी चंदन के दिल की बात का आभास हो गया था. वह भी उस की ओर आकर्षित होने लगी थी. दोनों के बीच अब हंसीमजाक भी होने लगा था. चंदन ऐसे समय पूनम से मिलने आता था, जब सुनील घर पर नहीं होता था. 

चंदन की बांहों में ऐसे समा गई पूनम

एक दिन चंदन आया तो पूनम सजधज कर बाजार जाने की तैयारी कर रही थी. उस की खूबसूरती देख कर चंदन मचल उठा. उस ने पूनम को बांहों में भर लिया और बोला, ”भाभी, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना अब रहा नहीं जाता.’’

चंदन, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं मास्टर साहब आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे.’’ पूनम ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा. 

भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, लेकिन खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’ कहते हुए उस ने पूनम को फिर से बाहों में कैद कर लिया. पूनम ने उस की बांहों से छूटने का बनावटी विरोध किया. उस के बाद स्वयं सहयोग करने लगी. फिर तो उस रोज दोनों के बीच मर्यादा की दीवार ढह गई.

मर्यादा की दीवार टूटी तो पूनम को अपने किए पर पछतावा हुआ था, लेकिन जो नहीं होना चाहिए था, वह हो चुका था. लेकिन पछतावे के बावजूद पूनम के कदम नहीं रुके. जब भी पूनम और चंदन को मौका मिलता, वे सुनील के साथ विश्वासघात करने से नहीं चूकते थे. पूनम और चंदन जो भी करते थे, पूरी चौकसी से करते थे, लेकिन उन के ये संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. एक दिन सुनील को पूनम के मोबाइल पर वाट्सऐप चैट दिखी. उसे यकीन हो गया कि दोनों के बीच नाजायज रिश्ता है. उस ने पूनम और चंदन दोनों को समझाया, लेकिन चंदन नहीं माना. वह किसी न किसी बहाने उस के घर आ जाता. 

12 मार्च, 2021 को सुनील कुमार गौतम का तबादला अमेठी हो गया. अमेठी जिले के सिंहपुर ब्लौक के पनहौना प्राथमिक विद्यालय में उसे शिक्षक पद पर तैनाती मिली. दरअसल, सुनील ने अपना परिवार टूटने से बचाने के लिए रायबरेली से दूर अपना ट्रांसफर खुद कराया था, ताकि चंदन वर्मा वहां आजा न सके.  तबादले के बाद सुनील ने रायबरेली वाला कमरा खाली कर दिया और जुलाई, 2024 में अमेठी में मुन्ना अवस्थी के मकान में परिवार के साथ रहने लगा. अमेठी में कुछ माह तो सुकून से बीते, उस के बाद चंदन वर्मा फिर चोरीछिपे वहां आने लगा. पूनम और चंदन के बीच हर रोज मोबाइल फोन पर वीडियो कालिंग के जरिए बात होती. दोनों खूब बतियाते. 

पूनम के प्यार में चंदन वर्मा इतना अंधा हो गया था कि वह पूनम को अपनी पत्नी बनाने का ख्वाब देखने लगा था. वह जो कमाता था, उस का आधा भाग पूनम पर खर्च करता था. उस ने अपने घर के जेवर तक पूनम को दे दिए थे. वह पूनम से कहता भी था कि इस मास्टर को छोड़ दो और उस की बीवी बन जाओ, लेकिन पूनम राजी नहीं होती थी. अप्रैल 2024 में सुनील कुमार ने मकान बनाने के लिए अमेठी में 2 बिस्वा जमीन खरीदी. जमीन की लिखापढ़ी में गवाह की जरूरत थी. पूनम के कहने पर सुनील ने चंदन वर्मा को गवाह बना लिया. इस के बाद चंदन का बेधड़क घर में आनाजाना फिर बढ़ गया. हालांकि चंदन का घर आना सुनील को कांटे की तरह चुभता था. 

सुनील क्यों डरने लगा पत्नी के प्रेमी से

एक रोज सुनील शाम को स्कूल से घर आया तो चंदन घर में मौजूद था. वह पूनम से बतिया रहा था. यह देख कर उस का खून खौल उठा. उस के जाने के बाद सुनील ने पूनम को आड़े हाथों लिया और कहा कि वह चंदन को लिफ्ट न दे. उस से दूरियां बनाए ताकि उस का परिवार न बिखरे. पति की बात मान कर पूनम ने चंदन को लिफ्ट देना बंद कर दिया. वह अब न तो उस से मोबाइल फोन पर बात करती और न ही वीडियो काल पर. इस पर वह घर आ कर पूनम को धमकाता कि वह बात नहीं करेगी तो वह सिर में गोली मार कर आत्महत्या कर लेगा. पूनम तब डर जाती और उस की बात मान लेती. 

अब तक सुनील 2 बेटियों का बाप बन चुका था. बड़ी बेटी सृष्टि 5 साल की थी और छोटी बेटी समीक्षा डेढ़ वर्ष की थी. चंदन वर्मा दबंग था. उस के संबंध अपराधियों से भी थे. शराब पीना तथा दबंगई दिखाना उस का शौक था. वह अपने चाचा के घर तेलिया कोट में भी दबंगई दिखाता था. हालांकि वे लोग चंदन से ज्यादा संपर्क नहीं रखते थे. चंदन पूनम को धमकाता कि मास्टर को छोड़ कर उस से ब्याह रचा ले, अन्यथा तुम्हारे कुछ आपत्तिजनक फोटो मेरे मोबाइल में हैं. मैं उन्हें वायरल कर दूंगा. फिर तुम और मास्टर किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे. 

चंदन वर्मा की धमकी से पूनम और सुुनील डरेसहमे रहने लगे. सुनील ने पूनम से कहा भी कि वह चंदन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दे. लेकिन पूनम उस सनकी और दबंग चंदन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सकी. 18 अगस्त, 2024 को पूनम की बड़ी बेटी सृष्टि की तबियत खराब थी. वह उसे डाक्टर को दिखाने सुनील के साथ रायबरेली के सुमित्रा हौस्पिटल गई. बेटी को दिखाने के बाद जब वह वापस घर आ रही थी तो रास्ते में उसे चंदन मिल गया. वह पूनम को छेडऩे लगा और साथ चलने का दबाव बनाने लगा. 

सुनील ने विरोध किया तो वह उस से भिड़ गया. पहले उस ने जातिसूचक गालियां बकीं, फिर 4-5 थप्पड़ सुनील के गाल पर जड़ दिए. दोनों को जान से मारने की धमकी भी दी. सुनील के सब्र का बांध अब टूट चुका था, अत: वह पूनम को साथ ले कर सीधा सदर कोतवाली पहुंच गया और पूनम से रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा. पूनम अब भी रिपोर्ट दर्ज कराने को राजी नहीं थी, लेकिन पति के कहने पर किसी तरह वह राजी हुई. इस के बाद पूनम ने तहरीर दी. तहरीर के आधार पर कोतवाली पुलिस ने चंदन वर्मा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 74, 115(2) तथा 352 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. 

दूसरे रोज पुलिस ने चंदन वर्मा को गिरफ्तार कर लिया. सप्ताह भर के भीतर ही उस की जमानत हो गई. जमानत पर छूटने के बाद चंदन वर्मा ने फिर नौटंकी शुरू की. उस ने आत्महत्या का प्रयास किया. अस्पताल से छुट्टी मिली तो उस ने पूनम व सुनील से माफी मांग ली और भविष्य में ऐसी गलती न करने का वादा किया. लेकिन वह अपनी जुबान से पलट गया. वह फिर पूनम तक पहुंचने का प्रयास करने लगा. वह पूनम से मोबाइल फोन पर बात करने का प्रयास करता, लेकिन पूनम उस की काल रिसीव ही नहीं करती. इस से उस का गुस्सा बढ़ गया. 

उस ने पूनम की उस के साथ खिंची आपत्तिजनक तसवीरें उस के मायके वालों तथा ससुराल वालों को भेज दीं. यही नहीं, उस ने पूनम की मां कृष्णावती व भाई सोनू को भी धमकाया कि वे पूनम को समझा दें. वह उस की बन जाए, अन्यथा अंजाम बुरा होगा. पूनम की बेरुखी से चंदन वर्मा को गहरा आघात पहुंचा था. वह समझ गया था कि पूनम उस के हाथ से फिसल गई है. उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम हो गई थी. आखिर उस ने फैसला किया कि वह पूनम व उस के परिवार को मिटा देगा. इस के लिए वह योजना बनाने लगा. अपनी योजना उस ने किसी अन्य के साथ साझा नहीं की. 

फिर 12 सितंबर, 2024 को उस ने न सिर्फ पूनम बल्कि उस के पति सुनील और दोनों बच्चों की गोली मार कर हत्या कर दी. 5 अक्तूबर, 2024 को उपचार के बाद पुलिस ने चंदन वर्मा से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे जिला सत्र न्यायाधीश के आवास पर पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.  दरअसल, उसे न्यायाधीश के समक्ष कोर्ट में पुलिस को पेश करना था, लेकिन कोर्ट में जनता व वकीलों में भारी रोष था. अनहोनी की आशंका को देखते हुए पुलिस को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी.

 

 

Honey Trap gang में फसाकर लूटती थी लाखों

जेल से छूटने के बाद फिरोज ने 7 लोगों के साथ हनीट्रैप का एक गैंग बना लिया था. गैंग में शामिल निशा और जुनैदा फोन से नए लोगों से बात कर दोस्ती करतीं और शारीरिक संबंध बनाने के लिए किसी होटल में बुलाती थीं. इस के आगे का काम गैंग के अन्य सदस्य करते थे. फिर शुरू होती थी शिकार से लाखों रुपए की वसूली. आप भी जानें कि ऐसे गैंग से कैसे बचा जाए?

जेल से बाहर आने के बाद फिरोज ने अपना एक हनीट्रैप गैंग बना लिया, जिस में उस ने अपनी प्रेमिका निशा खान के अलावा जुनैदा खान, आसिफ, फहीम, अनिकेत और दीपक को शामिल कर लिया. ये सभी सोशल मीडिया के माध्यम से पुरुषों से दोस्ती करते थे. निशा और जुनैदा हिंदू नाम रख कर अधिकतर हिंदू पुरुषों को अपने मोहजाल में फंसाती थीं. इन सब का गैंगमास्टर और स्क्रिप्ट राइटर फिरोज था. फिरोज पुरुषों को चिह्निïत करता था. उस के बाद उन के फोन नंबर निशा और जुनैदा को दे देता था. फिर निशा और जुनैदा अपनेअपने काम पर लग जाती थीं. 

कई बार जब दूसरी ओर से उन से कोई यह प्रश्न करता था कि आप कौन हैं, मैं तो आप को जानता तक नहीं हूं. तब जुनैदा और निशा गलत नंबर मिल जाने की बात कर देती थीं. अधिकतर काल्स में तो शिकार खुद ही फंस जाता था, उस के बाद खुद लोगों का फोन उन के पास आ जाता था. वे खुद ही दोस्ती करने की बात करने लगते थे. इस के बाद जुनैदा और निशा लोगों के साथ होटल में शारीरिक संबंध बनाती थीं. कई बार मोबाइल से ही वीडियो बना लेती थीं, उस के बाद उन के गिरोह के अन्य सदस्य आ कर उस व्यक्ति को पकड़ कर उसे ब्लैकमेल करते थे और फिर पुलिस में रेप की रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी दे कर उस से लाखों रुपए ऐंठ लेते थे.

आकिल कैसे फंसा हनीट्रैप रैकेट के चंगुल में  

एक दिन आकिल अपनी दुकान पर बैठा था, उस का छोटा भाई और नौकर भी दुकान में ग्राहकों को सामान देने में व्यस्त थे. तभी मोबाइल की घंटी बजी. आकिल की नजर जब स्क्रीन के डिसप्ले पर पड़ी तो उस में शालू शर्मा का नाम आ रहा था. हालांकि आकिल शालू शर्मा नामक किसी युवती या महिला को नहीं जानता था, फिर भी उस ने काल रिसीव करते हुए जवाब दिया, ”हैलो, आप कौन हैं?’’

हाय मेरी जान! मुझे इतनी जल्दी भूल भी गए, आप की आवाज सुनने के लिए तो मैं न जाने कब से तरस रही थी.’’ दूसरी ओर से आने वाला प्यार भरा नारी स्वर तो जैसे आकिल के कानों में एक उत्तेजना भरी मिठास घोल गया था. 

आप शालू बोल रही हैं न?’’ आकिल बात करने अब दुकान से दूर निकल गया था.

जानू! कम से कम आप ने मुझे पहचाना तो सही.’’ दूसरी ओर से शालू ने कहा.

देखिए शालूजी, मैं ने तो अपने मोबाइल के स्क्रीन डिसप्ले में आप का नाम देखा था, इसलिए कह दिया. वैसे सच बात तो यह कि मैं ने न तो आप को कभी देखा है और न ही आप से कभी बात की है. वैसे आप की आवाज बहुत स्वीट है,’’ कह कर आकिल मुसकराने लगा था.

वैसे आकिल शादीशुदा था. उस की शादी हुए 7 साल हो चुके थे. उस के 2 बच्चे भी थे, लेकिन आकिल ने सोचा कि जब हुस्न खुद ही चल कर उस के पास आ रहा है तो डुबकी लगा ही लेते हैं. उस ने सोचा यह लड़की शालू कुछ चालू किस्म की लगती है. शायद उस की कोई अतृप्त इच्छा हो या शादीशुदा होगी और अपने मर्द से खुश नहीं रह पाती होगी. स्क्रीन में उसे शालू के मोबाइल नंबर पर उस की फोटो की भी एक झलक दिखी थी. जब से आकिल ने उस की फोटो देखी थी, वह तो उस का दीवाना ही हो गया था.

आकिलजी, मेरी तारीफ करने के बाद आप ने तो चुप्पी ही साध ली है. कहां खो गए आप? अच्छा चलो बताओ, तुम ने अभी तक शादी की है या नहीं?’’ उधर से शालू ने पूछा.

शालूजी, देखिए मैं झूठ बिलकुल भी नहीं बोलता. शादीशुदा हूं. आप बताएं, आप विवाहित हैं या अविवाहित?’’ आकिल ने पूछा.

आकिलजी, मैं भी विवाहित हूं. शादी को 2 साल हो गए, मगर मेरे पति दुबई में नौकरी करते हैं. साल में बस एक बार ही यहां आते हैं. वैसे मुझे अब आप के ऊपर विश्वास होने लगा है कि आप वही मर्द हैं, जिसे मैं पसंद करती हूं. मैं वाट्सऐप पर काल करती हूं. इस से आप भी मुझे देख लेंगे और मैं भी आप का दीदार कर लूंगी. वैसे आप का ये वाट्सऐप नंबर है न?’’ शालू ने कहा.

शालूजी, यह मेरा वाट्सऐप नंबर यही है, आप मुझे काल कर सकती हैं. मैं तो आप का दीदार करने के लिए बहुत बेचैन हूं.’’ यह कहते हुए आकिल अपनी दुकान के अंदर वाले कमरे में घुस गया और किवाड़ें भीतर से बंद कर लीं. 

आकिल का घर उस की दुकान से काफी दूर था. दुकान के अंदर एक छोटा सा कमरा भी था, जिस में वह आराम कर लिया करता था.

दोनों अब वाट्सऐप पर बातें करने लगे थे. तभी आकिल ने कहा, ”शालूजी, आप तो बला की खूबसूरत हैं, कहीं किसी की नजर न लगे.’’

आकिलजी, आप भी बहुत हैंडसम हैं. वैसे अब तक आप समझ ही गए होंगे कि मैं आप पर मर मिटी हूं. सच बात यह है कि मुझे एक बार जो मर्द पसंद आ जाता है, उस के लिए तो मैं किसी भी हद तक जा सकती हूं.’’ शालू ने कहा.

शालूजी, मेरी एक बहुत बड़ी दुकान है, खासा पढ़ालिखा भी हूं, इतना तो मैं समझ ही लेता हूं.’’ आदिल ने मुसकराते हुए कहा

आकिलजी, सचमुच एक नजर में ही आप ने मेरे दिल को भीतर तक छू लिया है. जैसे आप बाहर से दिखते हैं, मुझे लगता है कि भीतर से भी आप काफी जानदार होंगे.’’ शालू ने अपनी आवाज को सैक्सी बनाते हुए कहा. 

शालूजी, आप हमें एक बार मौका दे कर तो देखिए, आप की हर हसरत को पूरी न किया तो मेरा नाम आकिल नहीं.’’ आकिल ने कहा.

तो आप बताइए, कहां मिल सकते हैं? किसी होटल में मिलें?’’ शालू बोली.

शालूजी, आप ने तो मेरे दिल की बात ही कह डाली. आप बताएं, किस होटल में मिलना चाहेंगी आप मुझ से?’’ आकिल ने पूछा. 

देखो यार आकिल, पहली बार मिल रहे हैं हम दोनों, इसलिए होटल तो कम से कम अच्छा ही होना चाहिए. मेरठ में तो कई सारे अच्छेअच्छे होटल हैं, वहीं पर किसी अच्छे होटल में कमरा बुक कर मुझे बताना, मैं आ जाऊंगी,’’ शालू ने कहा.

इस का मतलब आप मेरठ में नहीं रहतीं? मैं तो सोच रहा था कि आप मेरठ की रहने वाली होंगी. वैसे यह तो बताइए आप आखिर रहती कहां हैं?’’ आकिल ने पूछा. 

मैं तो दिल्ली में रहती हूं,’’ शालूू बोली.

ठीक है शालूजी, जैसे ही मैं खाली रहूंगा, किसी अच्छे होटल में कमरा बुक कर के आप को बता दूंगा. अच्छा अब फोन रखता हूं.’’  कहते हुए आकिल ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

होटल के बंद कमरे में क्या हुआ

उस के बाद वे दोनों कई दिनों तक फोन पर मीठीमीठी बातें करने लगे. शालू से मिलने की आकिल की बेताबी बढ़ती जा रही थी. एक दिन आकिल ने शालू को बता दिया कि उस ने 2 दिन के लिए दिल्ली रोड रिठानी स्थित व्यू वैली होटल में कमरा बुक कर दिया है. आकिल अपने भाई को दोस्त की शादी में जाने को कह कर 4 सितंबर, 2024 की सुबह ही अपनी बाइक से घर से निकल गया था. उस ने शालू को फोन किया और मेरठ रेलवे स्टेशन के पास मिलने के लिए बुलाया. जब आकिल शालू के बताए गए स्थान पर पहुंचा तो शालू वहां उसी का ही इंतजार कर रही थी. 

दिल्ली से आप कैसे और कब आईं?’’ आकिल ने पूछा.

मैं ने टैक्सी बुक की थी, बस अभी 5 मिनट पहले ही पहुंची हूं. जैसे ही मैं यहां पर पहुंची तो आप का फोन आ गया.’’ शालू ने आकिल से हाथ मिलाते हुए कहा. 

बैठो मेरी बाइक पर, आप को होटल ले चलता हूं.’’ आकिल बोला.

आकिल शालू को मेरठ के व्यू वैली होटल ले गया. काउंटर पर आकिल ने अपनी आईडी जमा कर दी तो शालू ने भी अपना आधार कार्ड वहां पर जमा करवा दिया. काउंटर में बैठे रिसैप्शनिस्ट ने उन की आईडी की फोटोकौपी करने के बाद ओरिजिनल आईडी दोनों को वापस कर दी थी. उन्हें वहां पर कमरा नंबर 83 मिला था. कमरे में घुसते ही आकिल ने दरवाजा भीतर से बंद कर दिया और शालू से चिपट गया.

अरे छोड़ो भी, इतनी जल्दी क्या है? मैं कोई भागी तो नहीं जा रही हूं. देखो, मुझे अभी काफी थकान सी हो रही है. इसलिए पहले मैं शावर ले लेती हूं.’’ कहते हुए शालू तौलिया ले कर बाथरूम में घुस गई.

शालू बाथरूम से बाहर निकली तो उस ने अपने बदन पर केवल तौलिया लपेटा हुआ था. आकिल आगे बढ़ा. वह शालू के सौंदर्य पर फिदा हो चुका था. वह अब इंतजार करने के मूड में बिलकुल भी नहीं था. उस के बाद वे दोनों एकदूसरे से अठखेलियां करने लगे थे. दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं.

काफी देर के बाद जब दोनों थक कर चूर हो गए तो आकिल ने नाश्ता मंगवा लिया था. इस बीच शालू मोबाइल पर लगी थी. कुछ देर के बाद दोनों ने नाश्ता किया. 

आकिल, चलो अब कुछ देर बाहर घूम कर आते हैं.’’ शालू ने कहा तो आकिल तैयार हो कर उस के साथ चल पड़ा था.

होटल से बाहर निकलते ही शालू के मोबाइल पर एक फोन आ गया. फोन में बात करने के बाद शालू के चेहरे पर घबराहट साफसाफ नजर आ रही थी, ”शालू, क्या बात है? किस का फोन था? तुम इतनी घबराई हुई और परेशान क्यों लग रही हो?’’ आकिल ने पूछा.

आकिल, यहां तो गजब हो गया. यहां आने की बात मेरे भाई और भाभी को पता चल गई है, अब तो हम फंस गए,’’ शालू के चेहरे पर साफसाफ घबराहट दिखाई देने लगी थी.

यार, तुम घबराओ मत. वे यहां पर थोड़ी आएंगे.’’ आकिल ने शालू को दिलासा देते हुए कहा.

लेकिन तभी वहां पर होटल के बाहर एक स्विफ्ट गाड़ी आ कर रुकी. उस में से 2 युवक बाहर निकले और उन्होंने जबरदस्ती आकिल को गाड़ी में डाल दिया. शालू भी उस गाड़ी में बैठ गई. वहां पर एक बाइक भी खड़ी थी. गाड़ी के स्टार्ट होते ही 2 युवक बाइक पर बैठ गए और स्विफ्ट गाड़ी के पीछेपीछे चलने लगे. दिल्ली रोड पर गाड़ी काफी देर घूमती रही. आकिल के गाड़ी में बैठते ही 2 युवक बुरी तरह उसे पीटने लगे थे.

अब देख साले, हम तुझे कैसे सलाखों के पीछे करते हैं.’’ उन में से एक युवक ने आकिल के गाल पर थप्पड़ मारते हुए कहा.

आकिल ने गाड़ी में चारों ओर नजर घुमाते हुए देखा तो वहां पर उसे मिला कर कुछ 6 लोग बैठे थे, उन में से 2 युवतियां भी थीं. युवतियों में एक तो शालू थी और दूसरी सिमरन थी, जिसे शालू भाभी कह कर संबोधित कर रही थी. पिटते हुए एक बार आकिल ने शालू की भाभी सिमरन की तरफ असहाय नजरों से देखा, जैसे वह उस से रहम की भीख मांग रहा हो. सिमरन ने उसे देखा तो वह समझ गई थी कि आकिल अब पश्चाताप कर रहा है.

अरे छोड़ोछोड़ो, बेचारे की जान ही ले लोगे क्या?’’ सिमरन ने युवकों को रोकते हुए कहा. 

मुझे बचा लो सिमरन भाभी, ये लोग तो मेरी जान लेने पर तुले हुए हैं. मैं अकेला ही दोषी नहीं हूं. मुझे शालूजी का एक दिन फोन आया था, मैं इन की बातों में बह गया था. मुझे माफ कर दीजिए प्लीज.’’ आकिल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

देख आकिल, अगर तू बचना चाहता है तो तू हमें अभी 50 लाख रुपए दे दे, नहीं तो हम तेरे खिलाफ पुलिस में रेप का मुकदमा करवा देंगे. फिर तू सड़ता रहेगा जेल में.’’ सिमरन बोली.

शालू ने क्यों लिखाई बलात्कार की रिपोर्ट

वे सब जब आपस में बातें कर रहे थे तो आपस से एकदूसरे को सिमरन, आसिफ, अनिकेत, दीपक, फिरोज और फहीम के नाम से संबोधित कर रहे थे. इसलिए अब आकिल उन सब के नाम भी जान चुका था. 50 लाख रुपए की बात सुन कर तो आकिल एकदम से घबरा ही उठा था वह बोला, ”यह तो बहुत बड़ी रकम है. यह रकम तो मैं अपनी सारी जमीन बेच कर भी नहीं दे सकता हूं.’’ 

देख आकिल, पैसे तो तुझे देने ही पड़ेंगे. अगर तुझे ये ज्यादा लग रहे हैं तो तू ही बता कितने रुपए में फाइनल करें.’’ फिरोज ने कहा.

देखो भाई, मैं तो ज्यादा से ज्यादा 75 हजार या एक लाख तक ही दे सकता हूं. इस से ज्यादा मेरी सामथ्र्य नहीं है.’’ आकिल ने गिड़गिड़ाते हुए कहा. 

अबे कहां 50 लाख और कहां एक लाख, इस का कोई मेल नहीं बैठता. देख आकिल, मैं 10 लाख रुपए पर यह डील फाइनल कर रहा हूं. अब तुझे ये रकम हमें देनी पड़ेगी, तभी हम तुझे आजाद कर पाएंगे.’’ फिरोज ने कहा.

फिरोज भाई, इतनी बड़ी रकम तो मैं न दे पाऊंगा.’’ आकिल बोला.

अच्छा, तो फिर तू हमारी बात अपने अब्बूअम्मी, अपनी बीवी से करवा. हम उन्हीं से बात कर लेते हैं.’’ फिरोज ने आकिल का फोन उस के हाथों में देते हुए कहा.

देखो भाई, मेरे घर वालों को कुछ मत बताना, नहीं तो मेरी बदनामी हो जाएगी. देखो न, मेरे मोबाइल की बैटरी भी खत्म हो गई है.’’ आकिल ने उन्हें अपना फोन दिखाते हुए कहा.

अब तुझे बदनामी दिखाई दे रही है, जब शालू को फंसा रहा था, तब तुझे शरम नहीं आई. तेरा सिम मैं ने अपने मोबाइल में डाल दिया है. अब बात कर,’’ फिरोज ने फोन आकिल के हाथों में देते हुए कहा.

आकिल ने पहले अपने भाई को फोन लगाया और उसे सारी बात बताई. उस के बाद फिरोज ने आकिल को उस की पत्नी को फोन करने को कहा. आकिल ने अपनी पत्नी से बात की तो उसी बीच फिरोज ने आकिल की पत्नी को धमकाते हुए कहा कि तुम्हारे शौहर आकिल ने हमारी बहन की इज्जत पर हाथ डाला है. उस ने बलात्कार किया है. इसलिए तुरंत 10 लाख रुपयों का इंतजाम कर लो, नहीं तो हम पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे. 

उस के बाद फिरोज, फहीम और आसिफ ने एक बार फिर आकिल की जम कर पिटाई की और से फिर उसे कार से नीचे फेंक दिया. जातेजाते वे आकिल को यह चेतावनी दे कर चले गए कि तू ऐसे रास्ते पर आने वाला नहीं है, हम अब तेरी रिपोर्ट पुलिस में कराने जा रहे हैं. इस के बाद आकिल ने एक टेलीफोन बूथ से अपने भाई को फोन किया, क्योंकि वह उस समय चलने की स्थिति में भी नहीं था.

मेरठ के थाना परतापुर के एसएचओ सुभाष गौतम अपने औफिस में बैठे थे, तभी 2 युवतियां और 4-5 युवक उन के पास आ पहुंचे. एसएचओ को सिमरन नाम की युवती ने बताया कि मेरठ निवासी आकिल ने उस की ननद शालू के साथ प्रेम का झांसा दे कर रेप किया है. लिहाजा आप उसे तुरंत गिरफ्तार कर उस के ऊपर कड़ी काररवाई करें. एसएचओ ने अपने अधीनस्थ कर्मचारी से उन की लिखित रिपोर्ट दर्ज करने को कहा. तभी वहां पर आकिल भी अपने भाई व पत्नी के साथ आ पहुंचा और उस ने अपनी पूरी दास्तान एसएचओ को बता दी. 

आकिल बहुत बुरी स्थिति में था. वह अपने बयान भी बड़ी मुश्किल से दे पा रहा था. उस के बयान देते ही पांचों युवक और अपने आप को पीडि़त शालू की भाभी बताने वाली सिमरन एकएक कर के वहां से खिसक गए. अब तक यह मामला एसएचओ सुभाष गौतम की समझ में आ चुका था कि यह रिपोर्ट फरजी है और यह हनीट्रैप का मामला है. अब थाने से शालू शर्मा भी धीरे से खिसकने लगी तो परतापुर पुलिस ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उस से विस्तृत पूछताछ करनी शुरू कर दी. इंसपेक्टर सुभाष गौतम ने इस घटना की सूचना तुरंत अपने उच्च अधिकारियों दे दी और एसआई मोहित सक्सेना के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित कर आरोपियों की तलाश शुरू कर दी. 

4 सितंबर, 2024 को शाम 5 बजे मुखबिर की सूचना पर मेरठ के काशी गांव के निवासी आकिल की लिखित तहरीर पर परतापुर पुलिस ने दिल्ली की रहने वाली 2 मुसलिम युवतियों के साथ हनीट्रैप के जरिए रंगदारी मांगने वाले पांचों युवकों को गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार आरोपियों में आसिफ निवासी राजीव नगर थाना हर्ष विहार, पूर्वी दिल्ली, फिरोज (गैंग लीडर) निवासी राजीव नगर, थाना हर्ष विहार, दिल्ली, फहीम निवासी शहीद नगर, साहिबाबाद, गाजियाबाद, अनिकेत निवासी सैनिक कालोनी, कसेरूखेड़ा थाना लालकुर्ती, मेरठ, दीपक निवासी डीलना थाना भोजपुर, गाजियाबाद निशा खान उर्फ शालू शर्मा निवासी दिल्ली और जुनैदा खान उर्फ सिमरन निवासी दिल्ली शामिल थे.

जेल में ही बना ली थी हनीट्रैप की योजना

दरअसल, रेप के आरोप में 24 वर्षीय फिरोज पहली बार जेल गया तो उसे इस बात की घबराहट हो रही थी कि पता नहीं जेल में उस के साथ क्या होगा. उसे जिस बैरक में भेजा गया, वहां पर 4 बंदी पहले से ही थे, जिस में से एक जो उन का बौस था, वह मजे से चबूतरे के ऊपर अपनी दोनों टांगें फैलाए सुस्ता रहा था. 2 बंदी उस की खुशामद करने में लगे थे. एक पैर दबा रहा था तो दूसरा उस के कंधों को दबा रहा था. चौथा बंदी सब को कुछ सुना कर महफिल को रंगीन कर रहा था.

फिरोज उन से कुछ दूरी पर खड़े हो कर वहां का दृश्य देखने लगा. वह कभी सलाखों के पास जा कर बाहर ताकझांक करने लगता तो कभी थोड़ा इधरउधर टहल लेता था. पहले से बैरक में रह रहे बंदियों से बात करने की वह चाह कर भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. 

अरे भाई, ऐसे मत शरमाओ, हमारे पास आओ. ये हमारे उस्ताद हैं, ये तुम्हें सारी दुनियादारी सिखा देंगे. मेरा नाम अनूप है भाई.’’ अनूप ने उसे अपने पास आने का निमंत्रण दिया.

अब तक फिरोज ने यही सब कुछ सुना था कि जेल के भीतर पुराने कैदियों की हुकूमत चलती है. उस ने ऐसा कुछ फिल्मों में भी देखा था कि नए आने वाले बंदियों के साथ पुराने बंदी पता नहीं कैसाकैसा जुल्म कर डालते हैं. जेल के सारे लोग भी उन्हीं के साथ मिले होते हैं. उस ने सोचा अब आ गई है मेरी शामत. डरते, सकुचाते हुए वह उन लोगों के पास पहुंचा. अनूप ने उसे बैठने का इशारा किया तो वह उन के पास बैठ गया.

सब से पहले मैं अपना परिचय दे दूं. मेरा नाम दिलशाद है. प्यार से लोग मुझे मुन्ना भाई या उस्ताद कहते हैं. तुम बताओ, पहली बार ससुराल आए हो या पहले भी कभी आए थे. नाम भी बताओ,’’ गैंग लीडर ने अपना परिचय देते हुए कहा.

जी, मेरा नाम फिरोज है. जी ससुराल का मतलब मैं समझा नहीं!’’ फिरोज ने हिचकिचाते हुए कहा. 

फिरोज भाई, हमारी भाषा में जेल को ही ससुराल कहते हैं. आगे बताओ.’’ दिलशाद ने कहा.

जी, मैं पूर्वी दिल्ली के राजीव नगर, हर्ष विहार का रहने वाला हूं. एक लड़की ने मेरे ऊपर रेप का झूठा केस लगा दिया, इसलिए पहली बार ससुराल आया हूं.’’ फिरोज ने डरतेडरते कहा.

अच्छा तो पहले दोनों में प्यार रहा होगा, फिर घर वालों के दबाब में आ कर तेरी प्रेमिका ने तेरे ऊपर अपहरण और रेप का चार्ज लगा दिया होगा. ऐसे ही हुआ था न?’’ दिलशाद ने कहा.

जी भाईजान, आप एकदम ठीक कह रहे हैं. यही सब कुछ हुआ था, मैं उस लड़की को छोड़ूंगा नहीं, जान से मार दूंगा उसे.’’ फिरोज ने तैश में आ कर कहा.

देख भाई फिरोज, ठंडे दिमाग से काम ले कर ही आगे बढ़ा जा सकता है. अभी तू बलात्कार के आरोप में बंद है. उस के बाद तेरे ऊपर मर्डर का मुकदमा और हो जाएगा. फिर सारी जिंदगी जेल के अंदर ही सड़ता रहेगा.’’ दिलशाद बोला.

भाईजान, अब आप ही बताओ मुझे क्या करना चाहिए, मुझे तो यह भी पता नहीं कि अब मेरी जमानत भी हो पाएगी या नहीं. मैं जेल से कैसे छूटूंगा?’’ 

कहते हुए फिरोज रो पड़ा था.

फिरोज, देख बात को समझ, अब जब तू जेल में आ ही गया है तो इत्मीनान से रह. मैं हूं न, यह बात अब गांठ बांध ले कि न तो तू जेल से जल्दी रिहा होने वाला है और न ही हम. पता नहीं कितने महीने हमें यूं ही साथसाथ रहना है.’’ दिलशाद ने कहा.

फिरोज, एक बात अच्छी तरह से समझ ले कि ये जो हमारे उस्ताद हैं दिलशाद भाईजान, वह सब के लिए फरिश्ते के समान हैं. अब तू अपना दिल छोटा न कर, तेरे मुकदमे में तुझे कैसे बाहर निकालना है, तेरी जमानत कब और कैसे होगी, अब तुझे चिंता करने की जरूरत नहीं. बस, तू हमारे उस्तादजी की सेवा करता रह और उन की बात को समझने की कोशिश कर.’’ अनूप ने फिरोज के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा. 

उस के बाद तो जैसे फिरोज दिलशाद का एक अच्छा शागिर्द हो गया था. उस ने अपराध जगत के कारनामों के बारे में शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी. उस ने अपने मन में एक ऐसा प्लान बना लिया था कि जेल से बाहर निकलने के बाद वह क्या काम करेगा, जिस से उस पर नोटों की बरसात होने लगे. पकड़ी गई युवती निशा खान शालू शर्मा के नाम से अपनी पहचान बदल कर लोगों को फंसाती थी. निशा खान के पास शालू शर्मा नाम का आधार कार्ड भी मिला, जो जांच में नकली निकला. जबकि आरोपी महिला के पैन कार्ड में उस का नाम निशा पुत्री अजर मुस्तफा लिखा हुआ था. 

निशा खान शालू शर्मा बन कर और जुनैदा खान सिमरन बन कर सोशल मीडिया पर युवकों को फंसाती थीं, जिस के बाद युवकों को मिलने के लिए होटल बुलाया जाता था. पुलिस ने आरोपियों के पास से मोबाइल फोन, कार, बाइक और फरजी आधार कार्ड बरामद किए हैं. पकड़े गए आरोपियों में से दीपक पर गाजियाबाद के भोजपुर में 2 मुकदमे पहले से ही दर्ज हैं. बाकी सभी पर मेरठ के परतापुर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है.

कहानी लिखे जाने तक मेरठ की परतापुर पुलिस द्वारा अपराध संख्या 338/2024 धारा 308 (5), 115 (2), 61 (2) बीएनएस के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित निशा खान और जुनैदा खान बदले हुए नाम हैं.

 

 

शराब पिलाया, कार में सुलाया फिर लगा दी आग

रानी को फांसा तो था देशराज ने, लेकिन मजबूरन उसे इस अवैध रिश्ते में रंजीत को भी हिस्सेदार बनाना पड़ा. जाहिर है इस तरह की हिस्सेदारी ज्यादा दिनों तक नहीं चलती. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ.   लखनऊ के थाना मडि़यांव के थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को सुबहसुबह किसी ने फोन कर के सूचना दी कि ककौली में बड़ी खदान के पास एक कार में आग लगी है. सूचना मिलते ही रघुवीर सिंह ककौली की तरफ रवाना हो गए. थोड़ी ही देर में वह ककौली की बड़ी खदान के पास पहुंच गए. उन्होंने एक जगह भीड़ देखी तो समझ गए कि घटना वहीं घटी है. जब तक पुलिस वहां पहुंची, कार की आग बुझ चुकी थी. पुलिस ने देखा, कार के अंदर कोई भी सामान सलामत नहीं बचा था

यहां तक कि कार की नंबर प्लेट का नंबर भी नहीं दिखाई दे रहा था. इसी से अंदाजा लगाया गया कि आग कितनी भीषण रही होगी. जली हुई कार के अंदर कुछ हड्डियां और 2 भागों में बंटी इंसान की एक खोपड़ी पड़ी थी. उन्हें देख कर थानाप्रभारी चौंके. हड्डियों और खोपड़ी से साफ लग रहा था कि कार के अंदर कोई इंसान भी जल गया थाथानाप्रभारी ने अपने आला अधिकारियों को भी इस घटना की सूचना दे दी थी. इस के बाद थोड़ी ही देर में क्षेत्राधिकारी (अलीगंज) अखिलेश नारायण सिंह फोरेंसिक टीम के साथ वहां पहुंच गए. कार के अंदर जली अवस्था में एक छोटा गैस सिलेंडर और शराब की खाली बोतल भी पड़ी थी. फोरेंसिक टीम ने अपना काम निपटा लिया तो पुलिस ने अपनी जांच शुरू की.

कार की स्थिति देख कर पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि साजिशन इसे अंजाम दिया गया है. कार एक खुले मैदान में थी. आबादी वहां से कुछ दूरी पर थी. इसलिए हत्यारों ने वारदात को आसानी से अंजाम दे दिया था. यह 4 दिसंबर, 2013 की बात हैकार में कोई ऐसी चीज नहीं मिली थी, जिस से जल कर खाक हो चुके व्यक्ति की शिनाख्त हो पाती. इसलिए पुलिस ने घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटा कर बरामद हड्डियों और खोपड़ी को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया, जहां से हड्डियों को फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया.

अब तक इस घटना की खबर जंगल की आग की तरह आसपास फैल चुकी थी. ककौली के ही रहने वाले सुरजीत यादव का छोटा भाई रंजीत यादव 3 दिसंबर को कार से कटरा पलटन छावनी एरिया में किसी शादी समारोह में शामिल होने के लिए घर से निकला था. उसे उसी रात को लौट आना था. लेकिन वह नहीं लौटा तो घर वालों को उस की चिंता हुई. यही वजह थी कि यह खबर सुनते ही सुरजीत बड़ी खदान की तरफ चल पड़ा. वहां पहुंच कर कार देखते ही वह समझ गया कि यह कार उसी की है. सुरजीत ने थानाप्रभारी रघुवीर सिंह को अपने भाई के गायब होने की पूरी बात बता कर आशंका जताई कि कार में जल कर जो व्यक्ति मरा है, वह उस का भाई रंजीत हो सकता है. इस के बाद सुरजीत की तहरीर पर थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ रंजीत की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

सुरजीत से बातचीत के बाद थानाप्रभारी रघुवीर सिंह ने तहकीकात शुरू की तो पता चला कि रंजीत शादी समारोह में जाने के लिए घर से निकला तो था, लेकिन समारोह में पहुंचा नहीं था. अब सोचने वाली बात यह थी कि वह शादी समारोह में नहीं पहुंचा तो गया कहां था. यह जानने के लिए उन्होंने मुखबिर लगा दिए. एक मुखबिर ने बताया कि 3 दिसंबर की शाम रंजीत को देशराज और अजय के साथ देखा गया था. देशराज हरिओमनगर में रह कर सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. रंजीत उसी की सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था

देशराज से पूछताछ के बाद ही सच्चाई का पता चल सकता था, इसलिए पुलिस ने उस की तलाश शुरू कर दी. 5 दिसंबर, 2013 को सुबह 5 बजे के करीब उसे रोशनाबाद चौराहे के पास से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब देशराज से पूछताछ की गई तो उस ने सारा सच उगल दिया. इस के बाद उस ने रंजीत यादव को जिंदा जलाने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर का रहने वाला देशराज लखनऊ के हरिओमनगर में एक सिक्योरिटी एजेंसी चलाता था. वहीं पर उस ने एक मकान किराए पर ले रखा था. वह लखनऊ में अकेला रहता था, जबकि उस की पत्नी और बच्चे सीतापुर में रहते थे. समय मिलने पर वह अपने परिवार से मिलने सीतापुर जाता रहता था.

उस की एजेंसी अच्छी चल रही थी. जिस से उसे हर महीने अच्छी आमदनी होती थी. कहते हैं, जब किसी के पास उस की सोच से ज्यादा पैसा आना शुरू हो जाता है तो कुछ लोगों में नएनए शौक पनप उठते हैं. देशराज के साथ भी यही हुआ. वह शराब और शबाब का शौकीन हो गया था. वह पास के ही ककौली गांव भी आताजाता रहता था. वहीं पर एक दिन उस की नजर रानी नाम की एक औरत पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा. रानी की अजीब ही कहानी थी. उस का विवाह उस उम्र में हुआ था, जब वह विवाह का मतलब ही नहीं जानती थी. नाबालिग अवस्था में ही वह 2 बेटों अजय, संजय और एक बेटी सीमा की मां बन गई थी. उसी बीच किसी वजह से उस के पति की मौत हो गई. पति का साया हटने से उस के ऊपर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. जब कमाने वाला ही रहा तो उस के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया. मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे वह दो जून की रोटी का इंतजाम करने लगी

देशराज ने उस की भोली सूरत देखी तो उसे लगा कि वह उसे जल्द ही पटा लेगा. रानी से नजदीकी बढ़ाने के लिए वह उस से हमदर्दी दिखाने लगा. रानी देशराज के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी. बस इतना ही जानती थी कि वह पैसे वाला है. एक पड़ोसन से रानी ने देशराज के बारे में काफी कुछ जान लिया था. इस के बाद धीरेधीरे उस का झुकाव भी उस की तरफ होता गयाएक दिन देशराज रानी के घर के सामने से जा रहा था तो वह घर की चौखट पर ही बैठी थी. उस समय दूरदूर तक कोई नजर नहीं रहा था. मौका अच्छा देख कर देशराज बोल पड़ा, ‘‘रानी, मुझे तुम्हारे बारे में सब पता है. तुम्हारी कहानी सुन कर ऐसा लगता है कि तुम्हारी जिंदगी में सिर्फ दुख ही दुख है.’’

‘‘आप के बारे में मैं ने जो कुछ सुन रखा था, आप उस से भी कहीं ज्यादा अच्छे हैं, जो दूसरों के दुख को बांटने की हिम्मत रखते हैं. वरना इस जालिम दुनिया में कोई किसी के बारे में कहां सोचता है?’’

‘‘रानी, दुनिया में इंसानियत अभी भी जिंदा है. खैर, तुम चिंता मत करो. आज से मैं तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. चाहो तो बदले में तुम मेरे घर का कुछ काम कर दिया करना.’’

‘‘ठीक है, आप ने मेरे बारे में इतना सोचा है तो मैं भी आप के बारे में सोचूंगी. मैं आप के घर के काम कर दिया करूंगी.’’

इतना कह कर देशराज ने रानी के कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रखा तो रानी ने अपनी गरदन टेढ़ी कर के उस के हाथ पर अपना गाल रख कर आशा भरी नजरों से उस की तरफ देखा. देशराज ने मौके का पूरा फायदा उठाया और रानी के हाथ पर 500 रुपए रखते हुए कहा, ‘‘ये रख लो, तुम्हें इस की जरूरत है. मेरी तरफ से इसे एडवांस समझ लेना.’’

रानी तो वैसे भी अभावों में जिंदगी गुजार रही थी, इसलिए उस ने देशराज द्वारा दिए गए पैसे अपने हाथ में दबा लिए. इस से देशराज की हिम्मत और बढ़ गई. वह हर रोज रानी से मिलने उस के घर पहुंचने लगा. वह जब भी उस के यहां जाता, रानी के बच्चों के लिए खानेपीने की कोई चीज जरूर ले जाता. कभीकभी वह रानी को पैसे भी देता. इस तरह वह रानी का खैरख्वाह बन गया. रानी हालात के थपेड़ों में डोलती ऐसी नाव थी, जिस का कोई मांझी नहीं था. इसलिए देशराज के एहसान वह अपने ऊपर लादती चली गई. पैसे की वजह से उस की बेटी सीमा भी स्कूल नहीं जा रही थी. देशराज ने उस का दाखिला ही नहीं कराया, बल्कि उस की पढ़ाई का सारा खर्च उठाने का वादा किया.

स्वार्थ की दीवार पर एहसान की ईंट पर ईंट चढ़ती जा रही थी. अब रानी भी देशराज का पूरा खयाल रखने लगी थी. वह उसे खाना खाए बिना जाने नहीं देती थी. लेकिन देशराज के मन में तो रानी की देह की चाहत थी, जिसे वह हर हाल में पाना चाहता था. एक दिन उस ने कहा, ‘‘रानी, अब तुम खुद को अकेली मत समझना. मैं हर तरह से तुम्हारा बना रहूंगा.’’ 

यह सुन कर रानी उस की तरफ चाहत भरी नजरों से देखने लगी. देशराज समझ गया कि वह शीशे में उतर चुकी है, इसलिए उस के करीब गया और उस के हाथ को दोनों हथेलियों के बीच दबा कर बोला, ‘‘सच कह रहा हूं रानी, तुम्हारी हर जरूरत पूरी करना अब मेरी जिम्मेदारी है.’’

हाथ थामने से रानी के शरीर में भी हलचल पैदा हो गई. देशराज के हाथों की हरकत बढ़ने लगी थी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों बेकाबू हो गए और अपनी हसरतें पूरी कर के ही माने. देशराज ने वर्षों बाद रानी की सोई भावनाओं को जगाया तो उस ने देह के सुख की खातिर सारी नैतिकताओं को अंगूठा दिखा दिया. अब वह देशराज की बन कर रहने का ख्वाब देखने लगी. देशराज और रानी के अवैध संबंध बने तो फिर बारबार दोहराए जाने लगे. रानी को देशराज के पैसों का लालच तो था ही, अब वह उस से खुल कर पैसों की मांग करने लगी

देशराज चूंकि उस के जिस्म का लुत्फ उठा रहा था, इसलिए उसे पैसे देने में कोई गुरेज नहीं करता था. इस तरह एक तरफ रानी की दैहिक जरूरतें पूरी होने लगी थीं तो दूसरी तरफ देशराज उस की आर्थिक जरूरतें पूरी करने लगा था. वर्षों बाद अब रानी की जिंदगी में फिर से रंग भरने लगे थे. ककौली गांव में ही भल्लू का परिवार रहता था. पेशे से किसान भल्लू के 2 बेटे रंजीत, सुरजीत और 2 बेटियां कमला, विमला थीं. चारों में से अभी किसी की भी शादी नहीं हुई थी. 24 वर्षीय रंजीत और 22 वर्षीय सुरजीत, दोनों ही भाई देशराज की सिक्योरिटी एजेंसी में काम करते थे. रंजीत और देशराज की उम्र में काफी लंबा फासला था. देशराज की जवानी साथ छोड़ रही थी, जबकि रंजीत की जवानी पूरे चरम पर थी. वैसे भी वह कुंवारा था. देशराज और रंजीत के बीच बहुत अच्छी दोस्ती थी. दोनों साथसाथ खातेपीते थे.

एक दिन शराब के नशे में देशराज ने रंजीत को अपने और रानी के संबंधों के बारे में बता दिया. यह सुन कर रंजीत चौंका. यह उस के लिए चिराग तले अंधेरे वाली बात थी. उसी के गांव की रानी अपने शबाब का दरिया बहा रही थी और उसे खबर तक नहीं थी. वह किसी औरत के सान्निध्य के लिए तरस रहा था. रानी की हकीकत पता चलने के बाद जैसे उसे अपनी मुराद पूरी होती नजर आने लगी. रंजीत के दिमाग में तरहतरह के विचार आने लगे. वह मन ही मन सोचने लगा कि जब देशराज रानी के साथ रातें रंगीन कर सकता है, तो वह क्यों नहीं? वह देशराज की ब्याहता तो है नहीं. अगले दिन रंजीत देशराज से मिला तो बोला, ‘‘रानी की देह में मुझे भी हिस्सा चाहिए, नहीं तो मैं तुम दोनों के संबंधों की बात पूरे गांव में फैला दूंगा.’’

देशराज को रानी से कोई दिली लगाव तो था नहीं, वह तो उस की वासना की पूर्ति का साधन मात्र थी. उसे दोस्त के साथ बांटने में उसे कोई परेशानी नहीं थी. वैसे भी रंजीत का मुंह बंद करना जरूरी था. इसलिए उस ने रानी को रंजीत की शर्त बताते हुए समझाया, ‘‘देखो रानी, अगर हम ने उस की बात नहीं मानी तो वह हमारी पोल खोल देगा. पूरे गांव में हमारी बदनामी हो जाएगी. इसलिए तुम्हें उसे खुश करना ही पड़ेगा.’’

रानी के लिए जैसा देशराज था, वैसा ही रंजीत भी था. उस ने हां कर दी. इस बातचीत के बाद देशराज ने यह बात रंजीत को बता दी. फलस्वरूप वह उसी दिन शाम को रानी के घर पहुंच गया. एक ही गांव का होने की वजह से दोनों केवल एकदूसरे को जानते थे, बल्कि उन में बातें भी होती थीं. रंजीत उसे भाभी कह कर बुलाता था. सारी बातें चूंकि पहले ही तय थीं, सो दोनों के बीच अब तक बनी संकोच की दीवार गिरते देर नहीं लगी. दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने तो रानी को एक अलग ही तरह की सुखद अनूभूति हुई. रंजीत के कुंवारे बदन का जोश देशराज पर भारी पड़ने लगा. उस दिन के बाद तो वह अधिकतर रंजीत की बांहों में कैद होने लगी. रंजीत भी रानी की देह का दीवाना हो चुका था.

इसलिए वह भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करने लगा. रंजीत ने मारुति आल्टो कार ले रखी थी, जो उस के भाई सुरजीत के नाम पर थी. रंजीत रानी को अपनी कार में बैठा कर घुमाने ले जाने लगा. वह उसे रेस्टोरेंट वगैरह में ले जा कर खिलातापिलाता और गिफ्ट भी देता.

रानी की जिंदगी में रंजीत आया तो वह देशराज को भी और उस के एहसानों को भूलने लगी. रंजीत उस के दिलोदिमाग पर ऐसा छाया कि उस ने देशराज से मिलनाजुलना तक छोड़ दिया. इस से देशराज को समझते देर नहीं लगी कि रानी रंजीत की वजह से उस से दूरी बना रही है. उसे यह बात अखरने लगी. रानी को फंसाने में सारी मेहनत उस ने की थी, जबकि रंजीत बिना किसी मेहनत के फल खा रहा था. इसी बात को ले कर रंजीत और देशराज में मनमुटाव रहने लगा. देशराज ने रंजीत से उस की कुछ जमीन खरीदी थी, जिस का करीब 5 लाख रुपया बाकी था. रंजीत जबतब देशराज से अपने पैसे मांगता रहता था. इस बात को ले कर रंजीत कई बार उसे जलील तक कर चुका था.

एक तरफ रंजीत ने देशराज की मौजमस्ती का साधन छीन लिया था तो दूसरी ओर उसे 5 लाख रुपए भी देने थे. इसलिए सोचविचार कर उस ने रंजीत को अपने रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने अपने यहां सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहे अजय पांडेय को भी लालच दे कर अपनी योजना में शामिल कर लिया. अजय सीतापुर के कमलापुर थानाक्षेत्र के गांव रूदा का रहने वाला था. 3 दिसंबर की शाम को रंजीत को कटरा पलटन छावनी में एक वैवाहिक समारोह में जाना था. यह बात देशराज को पता थी. उस ने उसी दिन अपनी योजना को अंजाम देने के बारे में सोचा. उस दिन देर शाम रंजीत घर से तैयार हो कर कार से कटरा पलटन जाने के लिए निकला. रास्ते में एक जगह उसे देशराज और अजय पांडेय मिल गए. वहां से वे हाइवे पर ट्रामा सेंटर के पास गए और शराब खरीद कर बड़ी खदान के पास गए.

तीनों ने कार के अंदर बैठ कर शराब पी. देशराज और अजय ने खुद कम शराब पी, जबकि रंजीत को ज्यादा पिलाई. जब रंजीत नशे में धुत हो गया तो दोनों ने उसे पिछली सीट पर लिटा दिया. कार में एक छोटा गैस सिलेंडर भरा रखा था, जिसे रंजीत घर से गैस भराने के लिए लाया था. साथ ही कार में एक बोतल पेट्रोल भी रखा था. देशराज ने कार के सभी शीशे चढ़ा कर गैस सिलेंडर की नौब खोल दी, जिस से तेजी से गैस रिसने लगीदेशराज पेट्रोल की बोतल उठा कर कार से बाहर गया और कार के सभी दरवाजे बंद कर दिए. इस के बाद उस ने कार के ऊपर सारा पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. चूंकि कार के अंदर गैस भरी थी, इसलिए आग की लपटें तेजी से बाहर निकलीं. देशराज का चेहरा और हाथ जल गए. गैस और पेट्रोल की वजह से कार धूधू कर के जलने लगी. नशे में धुत अंदर लेटे रंजीत ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन वह नाकामयाब रहा. अपना काम कर के देशराज और अजय वहां से भाग खडे़ हुए.

देशराज मौके से तो भाग गया, लेकिन कानून से नहीं बच सका. इंसपेक्टर रघुवीर सिंह ने रानी से भी पूछताछ की. हत्या के इस मामले में उस की कोई भूमिका नहीं थी. अलबत्ता जब गांव वालों को यह पता चला कि हत्या की वजह रानी थी तो लोगों ने उस के साथ भी मारपीट की.

पुलिस ने देशराज को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. कथा संकलन तक पुलिस अजय पांडेय को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित