अंधविश्वास में दी मासूम बच्ची की बलि

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अंधविश्वास में दी मासूम बच्ची की बलि – भाग 3

कंचन के हत्यारों को पकड़ने तथा आला कत्ल बरामद करने की जानकारी थानाप्रभारी ने पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही डीएसपी कपिलदेव मिश्रा, सीओ (सदर) रामप्रकाश तथा सीओ (बिंदकी) अभिषेक तिवारी थाने में पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने अभियुक्त हेमराज व शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास से घटना के संबंध में विस्तार से पूछताछ की. इस के बाद डीएसपी कपिलदेव मिश्रा ने आननफानन में प्रैसवार्ता आयोजित कर कंचन की हत्या का खुलासा किया.

चूंकि अभियुक्त हेमराज व शिवप्रकाश ने कंचन की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था, अत: थानाप्रभारी ने दोनों को अपहरण और हत्या के आरोप में विधिसम्मत बंदी बना लिया. पुलिस जांच और अभियुक्तों के बयानों के आधार पर अंधविश्वास और लालच में मासूम बच्ची कंचन की हत्या की सनसनीखेज कहानी इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के थाना बिंदकी के अंतर्गत एक गांव है नंदापुर. इसी गांव में मुकेश कुशवाहा अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी संध्या के अलावा एक बेटी रमन थी. मुकेश के पास 3 बीघा खेती की जमीन थी. इसी की उपज से वह अपने परिवार का भरणपोषण करता था.

संध्या चाहती थी बेटा

बेटी के जन्म के बाद संध्या एक बेटा भी चाहती थी. लेकिन बेटी रमन 8 साल की हो गई थी, उसे दूसरा बच्चा नहीं हो रहा था. जिस की वजह से संध्या चिंतित रहने लगी थी. अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए वह वह विभिन्न मंदिरों में जाने लगी थी. वह हर सोमवार घाटमपुर स्थित कुष्मांडा देवी मंदिर जाती. एक तरह से वह धार्मिक विचारों वाली हो गई थी.

इसी बीच वह सितंबर 2016 में गर्भवती हो गई और मई 2017 में संध्या ने एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया. इस बच्ची का नाम उस ने कंचन रखा. संध्या को हालांकि बेटे की चाह थी लेकिन दूसरी बच्ची के जन्म से उसे इस बात की खुशी हुई कि उस की कोख तो खुल गई. मुकेश भी कंचन के जन्म से बेहद खुश था. खुशी में उस ने अपने समाज के लोगों को भोज भी कराया.

नंदापुर गांव के पास ही एक किलोमीटर की दूरी पर सैमसी गांव बसा हुआ है. दोनों गांवों के बीच एक नाला बहता है, जो सैमसी नाले के नाम से जाना जाता है. सैमसी गांव में हेमराज रहता था. 3 भाइयों में वह सब से छोटा था. उस की अपने भाइयों से पटती नहीं थी. अत: वह उन से अलग रहता था.

जमीन का बंटवारा भी तीनों भाइयों के बीच हो गया था. हेमराज झगड़ालू प्रवृत्ति का था अत: गांव के लोग उस से दूरी बनाए रखते थे. उस के अन्य भाइयों की शादी हो गई थी, जबकि हेमराज की नहीं हुई थी.

हेमराज का मन न तो खेती किसानी में लगता था और न ही किसी कामधंधे में. उस ने अपनी जमीन भी बंटाई पर दे रखी थी. वह तंत्रमंत्र के चक्कर में पड़ा रहता था. कानपुर, उन्नाव और फतेहपुर शहर के कई तांत्रिकों के पास उस का आनाजाना रहता था.

इन तांत्रिकों से वह तंत्रमंत्र करना सीखता था. तंत्रमंत्र की किताबें भी पढ़ने का उसे शौक था. किताबों में लिखे मंत्रों को सिद्ध करने के लिए वह अकसर देर रात को पूजापाठ भी करता रहता था.

तांत्रिकों की संगत में रह कर हेमराज ने अंधविश्वासी लोगों को ठगने के सारे हथकंडे सीख लिए थे. उस के बाद वह अपने गांव सैमसी में तंत्रमंत्र की दुकान चलाने लगा. प्रचार प्रसार के लिए उस ने कुछ युवक युवतियों को लगा दिया, जो गांवगांव जा कर उस का प्रचार करते थे. इस के एवज में वह उन्हें खानेपीने की चीजों के अलवा कुछ रुपए भी दे देता था.

अंधविश्वासी आने लगे हेमराज के पास

शुरूशुरू में तो उस की तंत्रमंत्र की दुकान ज्यादा नहीं चली लेकिन ज्योंज्यों उस का प्रचार होता गया, उस का धंधा भी चल निकला. फरियादी उस के दरबार में आने लगे और चढ़ावा भी चढ़ने लगा. हेमराज के तंत्रमंत्र के दरबार में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का आनाजाना अधिक होता था. क्योंकि महिलाएं अंधविश्वास पर जल्दी भरोसा कर लेती हैं.

उस के दरबार में ऐसी महिलाएं आतीं, जिन के संतान नहीं होती. तांत्रिक हेमराज उन्हें संतान देने के नाम पर बुलाता और उन से पैसे ऐंठता. कोई कमजोर कड़ी वाली औरत मिल जाती तो उस का शारीरिक शोषण करने से भी नहीं चूकता था. लोकलाज के डर से वह महिला अपनी जुबान नहीं खोलती थी. सौतिया डाह, बीमारी, भूतप्रेत जैसी समस्याओं से ग्रस्त महिलाएं भी उस के पास आती रहती थीं. अंधविश्वासी पुरुषों का भी उस के पास आनाजाना लगा रहता था.

वह आसपास के शहरों में प्रसिद्ध हो गया तो उस के कई चेले भी बन गए. लेकिन सेलावन गांव का शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास उस का सब से विश्वासपात्र चेला था. शिवप्रकाश हृष्टपुष्ट व स्मार्ट था. वह दूध का धंधा करता था. आसपास के गांवों से दूध इकट्ठा कर उसे शहर जा कर बेचता था.

शिवप्रकाश एक बार गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था. बताया जाता है कि तब तांत्रिक हेमराज ने उसे तंत्रमंत्र की शक्ति से ठीक किया था. तब से वह तांत्रिक हेमराज का खास चेला बन गया था. फुरसत के क्षणों में शिवप्रकाश हेमराज के दरबार में पहुंच जाता था.

20 मार्च को होली थी. होली के 8 दिन पहले एक रात हेमराज को सपना आया कि उस के खेत में काफी सारा धन गड़ा है. इस धन को पाने के लिए उसे तंत्रसाधना करनी होगी और मां काली के सामने बच्चे की बलि देनी होगी. सपने की बात को सच मान कर हेमराज के मन में लालच आ गया और उस ने खेत में गड़ा धन पाने के लिए किसी बच्चे की बलि देने का निश्चय कर लिया.

हर होली दिवाली पर चढ़ाता था बलि

तांत्रिक हेमराज वैसे तो हर होली दिवाली की रात मुर्गे या बकरे की बलि देता था, लेकिन इस बार उस ने धन पाने के लालच में किसी मासूम की बलि देने की ठान ली. इस बाबत हेमराज ने अपने खास चेले शिवप्रकाश से बात की तो वह भी उस का साथ देने को तैयार हो गया. फिर गुरुचेला किसी मासूम की तलाश में जुट गए.

शिवप्रकाश उर्फ ननकू का नंदापुर गांव में आनाजाना था. वहां वह दूध व खोया की खरीद के लिए जाता था. होली के 2 दिन पहले ननकू, नंदापुर गांव गया तो उस की निगाह मुकेश कुशवाहा की 2 वर्षीय बेटी कंचन पर पड़ी. वह दरवाजे के पास खड़ी थी और मंदमंद मुसकरा रही थी. शिवप्रकाश ने इस मासूम के बारे में अपने गुरु हेमराज को खबर दी तो उस की बांछें खिल उठीं. फिर दोनों कंचन की रैकी करने लगे.

21 मार्च को होली का रंग खेला जा रहा था तथा फाग गाया जा रहा था. शाम 5 बजे के लगभग शिवप्रकाश अपने गुरु हेमराज को साथ ले कर अपनी मोटरसाइकिल से नंदापुर गांव पहुंचा फिर फाग की टोली में शामिल हो गया.

शाम 7 बजे के लगभग दोनों मुकेश कुशवाहा के दरवाजे पर पहुंचे. उस समय कंचन घर के बाहर खेल रही थी. तांत्रिक हेमराज ने दाएं बाएं देखा फिर लपक कर उस बच्ची को गोद में उठा लिया. इस के बाद बाइक पर बैठ कर दोनों निकल गए.

रात के अंधेरे में हेमराज कंचन को अपने घर लाया और नशीला दूध पिला कर उसे बेहोश कर दिया. इस के बाद उस ने बेहोशी की हालत में कंचन का शृंगार किया. शरीर पर भभूत और सिंदूर लगाया. पांव में महावर लगाई, माथे पर टीका तथा गले में फूलों की माला पहनाई. फिर तंत्रमंत्र वाले कमरे में ला कर उसे मां काली की मूर्ति के सामने लिटा दिया. कमरे में हेमराज के अलावा उस का चेला शिवप्रकाश भी था.

हेमराज ने कंचन की पूजाअर्चना की तथा कुछ मंत्र बुदबुदाता रहा. इस के बाद वह गंडासा लाया और मां काली के सामने हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मां, मैं बच्चे की बलि आप को भेंट कर रहा हूं. इस बलि को स्वीकार कर के आप मेरी इच्छा पूरी करना.’’

कहते हुए हेमराज ने गंडासे से कंचन का एक हाथ व एक पैर काट दिया. इस के बाद उस ने उस बच्ची का पेट भी चीर दिया. ऐसा होते ही खून कमरे में फैलने लगा. वह कुछ क्षण छटपटाई, फिर दम तोड़ दिया.

दूसरी रात उस ने कंचन के शव को सफेद कपड़े में लपेटा और शिवप्रकाश के साथ गांव के बाहर नाले में फेंक आया. इधर मुकेश फाग गा कर घर आया तो उसे कंचन नहीं दिखी, तो उस ने उस की खोज शुरू कर दी. दूसरे दिन उस के चाचा ने थाना बिंदकी में गुमशुदगी दर्ज कराई.

पुलिस ने तथाकथित तांत्रिक हेमराज और उस के चेले शिवप्रकाश से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें 28 मार्च, 2019 को रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक दोनों की जमानत नहीं हुई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अंधविश्वास में दी मासूम बच्ची की बलि – भाग 2

सूचना पा कर थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल पुलिस टीम के साथ नाले की ओर रवाना हो गए. थाना बिंदकी से सैसमी गांव करीब 5 किलोमीटर दूर है. कुछ ही देर में पुलिस वहां पहुंच गई. थानाप्रभारी ने नाले में तैरते हुए उस सफेद कपड़े को बाहर निकलवाया, जिस में कुछ बंधा था. पुलिस ने जैसे ही वह कपड़ा हटाया तो उस में वास्तव में एक बच्ची की लाश निकली. उस लाश को देखते ही वहां खड़ा मुकेश कुशवाहा दहाड़ मार कर रो पड़ा. वह लाश उस की मासूम बच्ची कंचन की ही थी.

2 वर्षीय मासूम कंचन की लाश जिस ने भी देखी, उसी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. क्योंकि कंचन की हत्या किसी रंजिश के चलते नहीं की गई थी. बल्कि उस की बलि दी गई थी. उस बच्ची का शृंगार किया गया था. पैरों में महावर (लाल रंग) तथा माथे पर टीका लगा था. उस का एक हाथ व एक पैर काटा गया था. उस का पेट भी फटा हुआ था.

बच्ची की बलि चढ़ाई जाने की खबर जंगल की आग की तरह पासपड़ोस के गांवों में फैली तो घटनास्थल पर भीड़ और बढ़ गई. बलि चढ़ाए जाने के विरोध में भीड़ उत्तेजित हो गई और शव रख कर हंगामा करने लगी. भीड़ तब और उग्र हो गई जब थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह ने भीड़ को यह कह कर समझाने का प्रयास किया कि कंचन की मौत नाले में डूबने से हुई है.

लोगों को उत्तेजित देख कर थानाप्रभारी के हाथ पांव फूल गए. उन्होंने उपद्रव की आशंका को देखते हुए कंचन का शव ग्रामीणों से छीन लिया और थाने में ले आए. पुलिस की इस काररवाई से लोग और भड़क गए. तब लोग ट्रैक्टर ट्रौलियों में भर कर बिंदकी थाने पहुंचने लगे.

कुछ ही समय बाद सैकड़ों लोग थाने में जमा हो गए. ग्रामीणों ने थाने का घेराव कर दिया. उन्होंने ट्रैक्टर ट्रौलियों को सड़क पर आड़ेतिरछे खड़ा कर मुगल रोड जाम कर दिया. इस से कई किलोमीटर तक जाम लग गया. घटना के विरोध में लोग हंगामा कर पुलिस विरोधी नारे लगाने लगे.

थानाप्रभारी की वजह से भड़क गए लोग

थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को यकीन था कि वह हलका बल प्रयोग कर ग्रामीणों को शांत करा देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ. बल प्रयोग के बावजूद उत्तेजित भीड़ ने पुलिस के कब्जे से कंचन का शव छीन लिया और उसे सड़क पर रख कर हंगामा करने लगे. मजबूरन थानाप्रभारी को हंगामा व सड़क जाम की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को देनी पड़ी. उन्होंने अधिकारियों से अतिरिक्त पुलिस फोर्स भेजने का भी आग्रह किया.

कुछ ही समय बाद एसपी कैलाश सिंह, डीएसपी कपिलदेव मिश्रा, सीओ (सदर) रामप्रकाश तथा सीओ (बिंदकी) अभिषेक तिवारी भारी पुलिस बल के साथ बिंदकी थाने पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने उत्तेजित ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि जिस ने भी मासूम की बलि दी है, उसे बख्शा नहीं जाएगा.

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने यदि कोताही बरती है तो संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. डीएसपी कपिलदेव मिश्रा ने कहा कि आप लोग सिर्फ 2 दिन का समय दें. इस बच्ची का कातिल आप लोगों के सामने होगा.

पुलिस अधिकारियों के आश्वासन पर उत्तेजित ग्रामीणों ने कंचन का शव पुलिस को सौंप दिया और जाम हटा दिया. फिर पुलिस अधिकारियों ने आननफानन में कंचन के शव को पोस्टमार्टम हाउस फतेहपुर भिजवा दिया. साथ ही बवाल की आशंका को देखते हुए नंदापुर गांव में पुलिस तैनात कर दी.

थाना बिंदकी पुलिस को आशंका थी कि कंचन की मौत नाले में डूबने से हुई है. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुलिस की आशंका को खारिज कर दिया. रिपोर्ट के अनुसार कंचन की हत्या की गई थी. उस के एक हाथ व एक पैर को किसी धारदार हथियार से काटा गया था. पेट को किसी नुकीली चीज से फाड़ा गया था. अधिक खून बहने से ही उस की मौत होने की बात कही गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल ने मुकेश के चाचा रामखेलावन की तरफ से भादंवि की धारा 364, 302 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और मासूम कंचन के हत्यारों की तलाश शुरू कर दी.

तांत्रिक ने स्वीकारी बलि देने की बात

चूंकि कंचन की बलि देने की बात कही जा रही थी और बलि किसी न किसी तांत्रिक ने ही दी होगी. अत: थानाप्रभारी ने तंत्रमंत्र करने वालों की खोज शुरू कर दी. इस के लिए उन्होंने अपने खास मुखबिर भी लगा दिए. मुखबिरों ने नंदापुर व उस के आसपास के गांवों में अपना जाल फैला दिया. जल्द ही उस का परिणाम भी सामने आ गया.

27 मार्च, 2019 की शाम 7 बजे मुखबिर ने थानाप्रभारी को बताया कि सैमसी गांव का हेमराज तंत्रमंत्र करता है. उस के यहां लोगों का आनाजाना लगा रहता है. लेकिन कंचन के गुम होने के बाद उस ने अपनी तंत्रमंत्र की दुकान बंद कर दी है. गांव के लोगों को शक है कि हेमराज ने ही मासूम की बलि चढ़ाई होगी.

मुखबिर की सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी अपनी टीम के साथ रात 10 बजे सैमसी गांव में हेमराज के घर पहुंच गए. वह घर पर ही मिल गया तो वह उसे हिरासत में ले कर थाने आ गए.

हेमराज से कंचन की हत्या के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. उस ने कहा कि वह तंत्रमंत्र करता है और होली, दिवाली जैसे बडे़ त्यौहारों पर बलि देता है. लेकिन इंसान की बलि नहीं देता. वह तो साधना के बाद मुर्गा या बकरा की बलि देता है. फिर मांस को प्रसाद के तौर पर अपने खास मित्रों में बांट देता है. कंचन की बलि देने का उस पर झूठा आरोप लगाया जा रहा है.

तांत्रिक हेमराज ने जिस तरह से अपने बचाव में दलील दी थी, उस से श्री चंदेल को एक बार ऐसा लगा कि हेमराज सच बोल रहा है. लेकिन दूसरे ही क्षण वह सोचने लगे कि अपराधी अपने बचाव में ऐसी दलीलें अकसर ही पेश करता है. अत: उन्होंने उस की बात को नकारते हुए उस से पुलिसिया अंदाज में पूछताछ शुरू की. लगभग एक घंटे की मशक्कत के बाद रात करीब 12 बजे तांत्रिक हेमराज टूट गया और उस ने कंचन की बलि देने की बात कबूल कर ली.

तांत्रिक हेमराज ने बताया कि उस ने तंत्रमंत्र सिद्ध करने तथा जमीन में गड़ा धन प्राप्त करने के लिए ही कंचन की बलि दी थी. तंत्रसाधना के इस अनुष्ठान में सेलावन गांव का रहने वाला उस का चेला शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास भी शामिल था.

लालच में चढ़ाई थी बलि

उसी की मोटरसाइकिल पर कंचन के शव को रख कर गांव के बाहर नाले में फेंक दिया था. तांत्रिक हेमराज के चेले शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास को पकड़ने के लिए रात के अंतिम पहर में पुलिस ने उस के घर दबिश दी. वह भी घर पर मिल गया और उसे बंदी बना लिया गया. उसे भी थाने ले आए.

थाने में जब उस की मुलाकात हेमराज से हुई तो वह सब समझ गया. अत: उस ने आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. हेमराज की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त गंडासा बरामद कर लिया, जिसे उस ने अपने घर में छिपा दिया था.

पुलिस ने हेमराज के कमरे से पूजन सामग्री, फूल माला, भभूत, सिंदूर, तंत्रमंत्र की किताबें आदि बरामद कीं. पुलिस ने शिवप्रकाश की वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली, जो उस ने शव ठिकाने लगाने में प्रयोग की थी.

अंधविश्वास में दी मासूम बच्ची की बलि – भाग 1

ज्योंज्यों अंधेरा घिरता जा रहा था, त्योंत्यों मुकेश की परेशानी बढ़ती जा रही थी. वह कभी दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देखता तो कभी टिकटिक करती घड़ी की सुइयों को निहारने लगता. दरअसल, बात ही कुछ ऐसी थी जिस से मुकेश परेशान था. उस की 2 साल की बेटी कंचन अचानक गायब हो गई थी. शाम को वह घर के बाहर खेल रही थी. पर वह वहां से अचानक कहां गुम हो गई, किसी को पता न चला. यह बात 21 मार्च, 2019 की है.

उस दिन होली का त्यौहार था. नंदापुर गांव के लोग रंगों से सराबोर थे. फाग गाने वालों की टोली अपना जलवा अलग से बिखेर रही थी. कई लोग ऐसे भी थे, जो नशे में झूम रहे थे. कंचन का पिता मुकेश भी फाग गाता था. फाग गा कर मुकेश जब घर लौटा, तब उसे मासूम कंचन के गुम होने की जानकारी हुई थी. उस के बाद वह कंचन को ढूंढने निकल गया.

लेकिन उस का कुछ भी पता न चल पा रहा था. धीरेधीरे गांव में जब कंचन के गुम होने की खबर फैली तो लोग स्तब्ध रह गए. आज भी अनेक गांवों में ऐसी परंपरा है कि किसी के दुख तकलीफ में लोग एकदूसरे की मदद करते हैं. फाग गाने वाली टोलियों को जब मुकेश की बेटी के गायब होने की जानकारी मिली तो टोलियों ने फाग गाना बंद कर दिया. इस के बाद वे मुकेश के घर पहुंच गए.

घर पर मुकेश की पत्नी संध्या का रोरो कर बुरा हाल था. परिवार की महिलाएं उसे सांत्वना दे रही थीं. लेकिन संध्या का हाल बेहाल था. उस के मन में तमाम तरह की आशंकाएं उमड़ने लगीं.

उधर कंचन की खोज के लिए पूरा गांव एकजुट हो गया था. मुकेश के चाचा रामखेलावन ने 10-10 लोगों की टीमें बनाईं. चारों टीमों ने टौर्च व लालटेन की रोशनी में अलगअलग दिशाओं में कंचन की खोज शुरू कर दी. गांव के हर खेत, बागबगीचे, नदीनाले व झुरमुटों के बीच टीमों ने कंचन की खोज की लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला.

एक आशंका यह भी थी कि कहीं कंचन भटक कर गांव के बाहर न पहुंच गई हो और कोई जंगली जानवर उसे उठा ले गया हो. अत: इस दिशा में भी गांव के आसपास के जंगल व ऊंचीनीची जमीन के बीच कंचन की खोज की गई, लेकिन ऐसा कोई सबूत नही मिला. रात भर कंचन की खोज हुई. परंतु कंचन के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली.

जब मासूम कंचन का कुछ भी पता नहीं चला तो मुकेश अपने चाचा रामखेलावन के साथ थाना बिंदकी पहुंच गया. थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को उस ने अपनी 2 वर्षीय बेटी कंचन के लापता होने की जानकारी दे दी.

थानाप्रभारी ने कंचन की गुमशुदगी दर्ज कर जरूरी काररवाई करनी शुरू कर दी. उन्होंने फतेहपुर के समस्त थानों को वायरलैस से 2 साल की कंचन के गुम होने की खबर भेजवा दी. थानाप्रभारी को लगा कि जब कंचन तलाश करने के बाद भी कहीं नहीं मिली है तो जरूर उस का किसी ने अपहरण कर लिया होगा और अपहरण फिरौती के लिए नहीं बल्कि किसी रंजिश या दूसरे किसी इरादे से किया होगा.

इस की 2 वजह थीं. पहली यह कि मुकेश कुशवाहा की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि कोई फिरौती के लिए उस की बेटी का अपहरण करे. दूसरी वजह यह थी कि 2 दिन बीत जाने के बाद भी मुकेश के पास किसी का फिरौती के लिए फोन नहीं आया था. रंजिश का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी चंदेल, मुकेश के गांव नंदापुर पहुंचे.

वहां उन्होंने मुकेश से कुछ देर तक रंजिश के संबंध में पूछताछ की. मुकेश ने बताया कि गांव में उस की किसी से कोई रंजिश नहीं है. रुपयों के लेनदेन तथा जमीन से जुड़ा कोई विवाद भी नहीं है.

इस के बाद थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को शक हुआ कि कहीं मासूम का अपहरण किसी सिरफिरे या नशेबाज ने दुष्कर्म के इरादे से तो नहीं कर लिया. फिर दुष्कर्म के बाद उस की हत्या कर दी हो और शव को किसी नदी नाले या झाडि़यों में छिपा दिया हो.

इस प्रकार का शक उन्हें इसलिए हुआ, क्योंकि होली का त्यौहार था. नशेबाजी जम कर हो रही थी. हो सकता है कि किसी नशेबाज की नजर बच्ची पर पड़ी हो और वह उसे गलत इरादे से उठा कर ले गया हो. शक के आधार पर उन्होंने पुलिस टीम के साथ नदीनालों, जंगल, झाडि़यों आदि में कंचन की खोज की. लेकिन कंचन का सुराग नहीं मिला.

इधर कंचन के लापता होने से कुशवाहा परिवार की आंखों की नींद उड़ी हुई थी. घर के सभी लोगों को इस बात की चिंता सता रही थी कि कंचन पता नहीं कहां और किस हाल में होगी. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था त्योंत्यों मुकेश व उस की पत्नी संध्या की चिंता बढ़ती जा रही थी.

धीरेधीरे 3 दिन बीत गए, लेकिन अब तक कंचन का पता न तो घर वाले लगा पाए थे और न ही पुलिस को सफलता मिली थी. तब मुकेश अपने सहयोगियों के साथ फतेहपुर के एसपी कैलाश सिंह से मिलने गया. लेकिन एसपी से उस की मुलाकात नहीं हो सकी. तब मुकेश ने एसपी कपिलदेव मिश्रा से मुलाकात की और अपनी व्यथा व्यक्त की.

एएसपी ने उसी समय थाना बिंदकी के थानाप्रभारी से बात की और कंचन को हर हाल में खोजने का आदेश दिया. इस के बाद थानाप्रभारी जीजान से कंचन को ढूंढने में जुट गए. उन्होंने अपने खास मुखबिर भी लगा दिए. पुलिस टीम ने क्षेत्र के आपराधिक प्रवृत्ति के कुछ लोगों को उन के घरों से उठा लिया और थाने  ला कर उन से सख्ती से पूछताछ की. लेकिन उन से कंचन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्हें छोड़ना पड़ा.

नाले में मिला कंचन का शव

25 मार्च, 2019 की शाम 4 बजे चरवाहे सैमसी नाले के पास बकरियां चरा रहे थे. तभी उन की निगाह नाले में उतराते हुए एक सफेद रंग के कपड़े पर पड़ी. लग रहा था उस में किसी बच्चे की लाश हो.

चरवाहे नंदापुर व सैमसी गांव के थे, अत: उन्होंने भाग कर गांव वालों को यह बात बता दी. यह खबर मिलते ही सैमसी व नंदापुर गांव के लोग नाले की ओर दौड़ पड़े. मुकेश भी बदहवास हालत में वहां पहुंचा. उसी दौरान किसी ने फोन कर के यह सूचना बिंदकी थाने में दे दी.

देवर को बचाने के लिए ननद की हत्या

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के गैनी गांव में छोटेलाल कश्यप अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में उन की पत्नी रामवती के अलावा 2 बेटे नरेश व तालेवर, 2 बेटियां सुनीता व विनीता थीं. छोटेलाल खेती किसानी का काम करते थे. इसी की आमदनी से उन्होंने बच्चों की परवरिश की. बच्चे शादी लायक हो गए तो उन्होंने बड़े बेटे नरेश का विवाह नन्ही देवी नाम की युवती से करा दिया.

कालांतर में नन्ही ने एक बेटे शिवम व एक बेटी सीमा को जन्म दिया. बाद में उन्होंने बड़ी बेटी सुनीता का भी विवाह कर दिया. अब 2 बच्चे शादी के लिए रह गए थे. छोटेलाल उन दोनों की शादी की भी तैयारी कर रहे थे.

इसी बीच दूसरे बेटे तालेवर ने ऐसा काम कर दिया, जिस से उन की गांव में बहुत बदनामी हुई. तालेवर ने सन 2014 में अपने ही पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ रेप कर दिया था. जिस के आरोप में उस को जेल जाना पड़ा था.

उधर छोटेलाल की छोटी बेटी विनीता भी 20 साल की हो चुकी थी. यौवन की चमक से उस का रूपरंग दमकने लगा था. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, पर उसे फिल्म देखना, फैशन के अनुसार कपड़े पहनना अच्छा लगता था. उस की सहेलियां भी उस के जैसे ही विचारों की थीं, इसलिए उन में जब भी बात होती तो फिल्मों की और उन में दिखाए जाने वाले रोमांस की ही होती थी. यह उम्र का तकाजा भी था.

विनीता के खयालों में भी एक अपने दीवाने की तसवीर थी, लेकिन यह तसवीर कुछ धुंधली सी थी. खयालों की तसवीर के दीवाने को उस की आंखें हरदम तलाशती थीं. वैसे उस के आगेपीछे चक्कर लगाने वाले युवक कम नहीं थे, लेकिन उन में से एक भी ऐसा न था, जो उस के खयालों की तसवीर में फिट बैठता हो.

बात करीब 2 साल पहले की है. विनीता अपने पिता के साथ एक रिश्तेदारी में बरेली के कस्बा आंवला गई, जो उस के यहां से करीब 13 किलोमीटर दूर था. वहां से वापसी में वह आंवला बसअड्डे पर खड़ी बस का इंतजार कर रही थी तभी एक नवयुवक जोकि वेंडर था, पानी की बोतल बेचते हुए उस के पास से गुजरा.

उस युवक को देख कर विनीता का दिल एकाएक तेजी से धड़कने लगा. निगाहें तो जैसे उस पर ही टिक कर रह गई थीं. उस के दिल से यही आवाज आई कि विनीता यही है तेरा दीवाना, जिसे तू तलाश रही थी. उस युवक को देखते ही उस के खयालों में बनी धुंधली तसवीर बिलकुल साफ हो गई.

वह उसे एकटक निहारती रही. उसे इस तरह निहारता देख कर वह युवक भी बारबार उसी पर नजर टिका देता. जब उन की निगाहें आपस में मिल जातीं तो दोनों के होंठों पर मुसकराहट तैरने लगती.

उसी समय बस आ गई और विनीता अपने पिता के साथ बस में बैठ गई. वह पिता के साथ बस में बैठ जरूर गई थी, पर पूरे रास्ते उस की आंखों के सामने उस युवक का चेहरा ही घूमता रहा. विनीता उस युवक के बारे में पता कर के उस से संपर्क करने का मन बना चुकी थी.

अगले ही दिन सहेली के यहां जाने का बहाना बना कर विनीता आंवला के लिए निकल गई. बसअड्डे पर खड़े हो कर उस की आंखें उसे तलाशने लगीं. कुछ ही देर में वह युवक विनीता को दिख गया. पर उस युवक ने विनीता को नहीं देखा था.

विनीता उस पर नजर रख कर उस का पीछा कर के उस के बारे में जानने की कोशिश में लग गई. कुछ देर में ही उस ने उस युवक के बारे में किसी से जानकारी हासिल कर उस का नाम व मोबाइल नंबर पता कर लिया. उस युवक का नाम हरि था और वह अपने परिवार के साथ आंवला में ही रहता था.

एक दिन हरि सुबह के समय अपनी छत पर बैठा था, तभी उस का मोबाइल बज उठा. हरि ने स्क्रीन पर बिना नंबर देखे ही काल रिसीव करते हुए हैलो बोला.

‘‘जी, आप कौन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी युवती की मधुर आवाज सुनाई दी तो हरि चौंक पड़ा.

वह बोला, ‘‘आप कौन बोल रही हैं और आप को किस से बात करनी है?’’

‘‘मैं विनीता बोल रही हूं. मुझे अपनी दोस्त से बात करनी थी, लेकिन लगता है नंबर गलत डायल हो गया.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा होगा तो दोबारा गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘जी नहीं, आम आदमी हूं.’’

‘‘किसी के लिए तो खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है, मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी थी हरि की. वह जोर से हंसा, फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताइए, मैं क्या करूं?’’ हरि ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल विनीता को हरि का मोबाइल नंबर तो मिल गया था. लेकिन विनीता के पास खुद का मोबाइल नहीं था, इसलिए उस ने अपनी सहेली का मोबाइल फोन ले कर बात की थी. पहली ही बातचीत में दोनों काफी घुलमिल गए थे. दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों एकदूसरे के प्रति अपनापन महसूस करने लगे.

फिर उन के बीच बराबर बातें होने लगीं.  विनीता ने हरि को बता दिया था कि उस दिन अनजाने में उस के पास काल नहीं लगी थी बल्कि उस ने खुद उस का नंबर हासिल कर के उसे काल की थी और उन की मुलाकात भी हो चुकी है.

जब हरि ने मुलाकात के बारे में पूछा तो विनीता ने आंवला बसअड्डे पर हुई मुलाकात का जिक्र कर दिया. हरि यह जान कर बहुत खुश हुआ क्योंकि उस दिन विनीता का खूबसूरत चेहरा आंखों के जरिए उस के दिल में उतर गया था.

इस के बाद दोनों एकदूसरे से रूबरू मिलने लगे. इसी बीच एक मुलाकात में दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया. दिनप्रतिदिन उन का प्यार प्रगाढ़ होता जा रहा था. विनीता तो दीवानगी की हद तक दिल की गहराइयों से हरि को चाहने लगी थी.

धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. प्रेम दीवानों के प्यार की खुशबू जब जमाने को लगती है तो वह उन दीवानों पर तरहतरह की बंदिशें लगाने लगता है. यही विनीता के परिजनों ने किया. विनीता के घर वालों को पता चल गया कि वह जिस लड़के से मिलती है, वह बदमाश टाइप का है.

इसलिए उन्होंने विनीता पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. लेकिन तमाम बंदिशों के बाद भी विनीता हरि से मिलने का मौका निकाल ही लेती थी.

धीरेधीरे दोनों के इश्क के चर्चे गांव में होने लगे. गांव के लोगों ने कई बार विनीता को हरि के साथ देखा. इस पर वह तरहतरह की बातें बनाने लगे. गांव वालों के बीच विनीता के इश्क के चर्चे होने लगे. इस से छोटेलाल की गांव में बदनामी हो रही थी.

घरपरिवार के सभी लोगों ने विनीता को खूब समझाया लेकिन प्यार में आकंठ डूबी विनीता पर इस का कोई असर नहीं हुआ. पूरा परिवार गांव में हो रही बदनामी से परेशान था. रोज घर में कलह होती लेकिन हो कुछ नहीं पाता था.

29 सितंबर की सुबह करीब 8 बजे विनीता अपनी भाभी नन्ही देवी के साथ दिशामैदान के लिए खेतों की तरफ गई थी. कुछ समय बाद नन्ही देवी घर लौटी तो विनीता उस के साथ नहीं थी. घर वालों ने उस से विनीता के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि जब वह दिशामैदान के बाद बाजरे के खेत से बाहर निकली तो उसे विनीता नहीं दिखी.

उस ने सोचा कि विनीता शायद अकेली घर चली गई होगी. लेकिन यहां आ कर पता चला कि वह यहां पहुंची ही नहीं है. नन्ही ने कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि विनीता अपनी किसी सहेली के यहां चली गई हो.

कुछ ही देर में गांव के एक किसान चंद्रपाल ने विनीता के घर पहुंच कर बताया कि रामानंद शर्मा के बाजरे के खेत में विनीता की लाश पड़ी है. उस समय छोटेलाल पत्नी के साथ डाक्टर के पास दवा लेने गए थे. छोटेलाल के धान के खेत के बराबर में ही रामानंद का बाजरे का खेत था.

यह खबर सुन कर सभी घर वाले लगभग दौड़ते हुए घटनास्थल पर पहुंचे. विनीता की लाश देख कर सब बिलखबिलख कर रोने लगे. इसी बीच वहां गांव के काफी लोग पहुंच गए थे. ग्रामप्रधान भी मौके पर थे. उन्होंने घटना की सूचना स्थानीय थाना अलीगंज को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. विनीता के पेट में गोली लगने के निशान थे. निशान देख कर ऐसा लग रहा था कि किसी ने काफी नजदीक से गोली मारी है. इस का मतलब था कि हत्यारे को विनीता काफी अच्छी तरह से जानती थी. इसी बीच रोतेबिलखते छोटेलाल और उन की पत्नी भी वहां पहुंच गए.

थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह ने नन्ही और बाकी घर वालों से आवश्यक पूछताछ की. फिर विनीता की लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

थाने वापस आ कर उन्होंने छोटेलाल कश्यप की लिखित तहरीर पर गांव के ही इंद्रपाल, हरपाल, उमाशंकर और धनपाल के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. तहरीर में हत्या का कारण इन लोगों से रंजिश बताया गया था.

थानाप्रभारी सिंह ने केस की जांच शुरू की तो पता चला कि विनीता का भाई तालेवर अपने मकान के पीछे रहने वाली युवती से दुष्कर्म के मामले में 2014 से जेल में बंद है. पुलिस को पता चला कि जिस युवती ने रेप का आरोप लगाया था, छोटेलाल ने उस युवती के पिता को भी विनीता की हत्या में आरोपी बनाया गया था.

साथ ही विनीता के किसी हरि नाम के युवक से प्रेम संबंध की बात पता चली. बेटी की इस हरकत से घर वाले काफी परेशान थे. इस से पुलिस का शक विनीता के परिवार पर केंद्रित हो गया.

थानाप्रभारी ने सोचा कि कहीं एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश तो नहीं की गई. विनीता से छुटकारा तो मिलता ही साथ ही तालेवर को जेल भेजने वाले को भी जेल की चारदीवारी में कैद कराने में सफल हो जाते.

पूरी घटना की जांच में यही निष्कर्ष निकला कि परिवार का ही कोई सदस्य इस घटना में शामिल है. लेकिन मांबाप तो थे नहीं, उन का बेटा नरेश गांव में नहीं था. बची बेटे की पत्नी नन्ही जो विनीता के साथ ही गई थी और अकेली वापस लौटी थी. नन्ही पर ही हत्या का शक गहराया. थानाप्रभारी ने गांव के लोगों से पूछताछ की तो ऐसे में एक व्यक्ति ऐसा मिल गया, जिस ने ऐसा कुछ बताया कि थानप्रभारी की आंखों में चमक आ गई.

इस के बाद 2 अक्तूबर को उन्होंने नन्ही देवी को घर से पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. जब महिला आरक्षी की उपस्थिति में नन्ही से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई. उस ने विनीता की हत्या अपने नाबालिग बेटे शिवम के साथ मिल कर किए जाने की बात स्वीकार कर ली और पूरी कहानी बयान कर दी.

विनीता के हरि नाम के युवक से प्रेम संबंध की बात से घर का हर कोई नाराज था. समझाने के बावजूद भी विनीता नहीं मान रही थी. गांव में हो रही बदनामी से घर वालों का जीना मुहाल हो गया था.

नन्ही अपनी ननद विनीता की कारगुजारियों से कुछ ज्यादा ही खफा थी. वह अपने परिवार को बदनामी से बचाना चाहती थी. इसलिए उस ने विनीता की हत्या अपने नाबालिग बेटे शिवम से कराने का फैसला कर लिया.

इस हत्या में उस इंसान को भी फंसा कर  जेल भेजने की योजना बना ली, जिस की बेटी से दुष्कर्म के मामले में उस का देवर तालेवर जेल में बंद था. उस इंसान के जेल जाने पर उस से समझौते का दबाव बना कर वह देवर तालेवर को जेल से छुड़ा सकती थी. घर में एक .315 बोर का तमंचा पहले से ही रखा हुआ था. नन्ही ने शिवम के साथ मिल कर विनीता की हत्या की पूरी योजना बना ली.

29 सितंबर की सुबह 8 बजे नन्ही ने बेटे शिवम को तमंचा ले कर घर से पहले ही भेज दिया. फिर विनीता को साथ ले कर दिशामैदान के लिए खुद घर से निकल पड़ी. विनीता को ले कर नन्ही अपने धान के खेत के बराबर में बाजरे के खेत में पहुंची. शिवम वहां पहले से मौजूद था.

विनीता के वहां पहुंचने पर शिवम ने तमंचे से विनीता पर फायर कर दिया. गोली सीधे विनीता के पेट में जा कर लगी. विनीता जमीन पर गिर कर कुछ देर तड़पी, फिर शांत हो गई.

विनीता की लीला समाप्त करने के बाद शिवम ने अपने धान के खेत में तमंचा छिपाया और वहां से छिपते हुए निकल गया. नन्ही भी वहां से घर लौट गई. लेकिन पुलिस के शिकंजे से वह न अपने आप को बचा सकी और न ही अपने बेटे को.

थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह ने नन्ही को मुकदमे में 120बी का अभियुक्त बना दिया. शिवम की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा भी पुलिस ने बरामद कर लिया.

आवश्यक लिखापढ़ी के बाद नन्ही को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया, और शिवम को बाल सुधार गृह.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में शिवम नाम परिवर्तित है.

विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर – भाग 4

स्थानीय थानों में भी रहता था दबदबा

बात जनवरी, 2017 की है. विनोद उपाध्याय के दोस्त और खोराबार कजाकपुर का प्रौपर्टी डीलर संजय यादव घर से निकलते समय रहस्यमय तरीके से लापता हो गया.

उन दिनों योगी आदित्यनाथ प्रदेश के नएनए मुख्यमंत्री बने थे. भाई की गुमशुदगी का मामला ले कर पीडि़त दीपक मुख्यमंत्री के दरबार (गोरखनाथ मंदिर में) पेश हुआ और मामले की पूरी जानकारी दे कर भाई की हत्या किए जाने की आशंका जताई थी.

चूंकि मामला मुख्यमंत्री के गृह जनपद से जुड़ा हुआ था और एक बड़े प्रौपर्टी डीलर से भी जुड़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और गोरखपुर पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए तुरंत काररवाई करने का आदेश दिया.

मुख्यमंत्री के सख्त तेवर के बाद पुलिस हरकत में आई और संजय यादव की तलाश तेजी से शुरू की. लापता होने के बाद संजय यादव की आखिरी लोकेशन बेलीपार थाना क्षेत्र के चोरिया की मिली. बाद में दानबहादुर के खेत में उस की लाश मिली.

जिस क्षेत्र में संजय की लाश बरामद हुई थी, उसी इलाके में मृतक लाल बहादुर यादव का घर था. इस मौके को विनोद अपने हाथों से जाने देना नहीं चाहता था.

लाल बहादुर गैंग के लोगों ने विनोद के 2 आदमियों को दर्दनाक तरीके से मौत के घाट उतारा था. यह बात विनोद अभी तक नहीं भूल पाया था. उस ने इसी बात का फायदा उठाया और दोस्त संजय यादव की हत्या में लाल बहादुर गैंग के दुश्मनों को झूठे केस में फंसा दिया.

दरअसल, दीपक को भरोसा नहीं था कि खोराबार पुलिस मामले की जांच ठीक तरीके से करेगी. विनोद के बहकावे में दीपक पूरी तरह आ गया था, जो वह यही चाहता था. विनोद के उकसाने पर दीपक ने मामले की जांच खोराबार से शाहपुर थाने में स्थानांतरित करवा दी.

शाहपुर थाने में विनोद उपाध्याय की तूती बोलती थी. थाने की पुलिस उस के इशारों पर नाचती थी. संजय यादव हत्याकांड की जांच एसआई विमलेंदु को सौंपी गई थी. विमलेंदु विनोद का खासमखास था. उसी के इशारों पर विवेचक विमलेंदु ने फरजी नाम जोड़ दिया था और लाल बहादुर गैंग के दुश्मनों को आरोपी बना दिया था.

सच्चाई जब सामने आई तो वादी मुकदमा दीपक यादव को शासन के सामने पेश कर आरोपी पक्ष के मुकदमे को कुशीनगर जिले स्थानांतरण करवा दिया. बाद में गोरखपुर से लखनऊ तक पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था.

17 सालों से माफिया विनोद उपाध्याय पुलिस की आंखों की किरकिरी बन गया था. आतंक के बल पर अपराध की दुनिया में बादशाहत का परचम लहराया था. साथ ही उस ने फिरौती की रकम से करीब 6 करोड़ की संपत्ति भी बना ली थी. यही नहीं उस ने अपनी संपत्ति का विस्तार गोरखपुर, लखनऊ और प्रयागराज तक कर लिया था.

फिलवक्त विनोद गुलरिहा थाने के मोगलहा मोहल्ले में आलीशान इमारत बनवा कर परिवार सहित रहता था. जुर्म की दौलत से खड़ा मकान पुलिस ने बुलडोजर चलवा कर जमीदोंज कर दिया.

बात 25 मई, 2023 की है. कैंट मोहल्ले के दाउदपुर नहर रोड पर रहने वाले प्रवीण श्रीवास्तव ने गुलरिहा थाने में माफिया विनोद कुमार उपाध्याय, उस के भाई संजय, नौकर छोटू और 2 अन्य व्यक्तियों के खिलाफ रंगदारी मांगने, जान से मारने की धमकी देने और तोडफ़ोड़ करने का मुकदमा दर्ज कराया था.

प्रवीण का आरोप था कि जमीन बेचने के लिए उन के ऊपर दबाव बनाया जा रहा था. बात न मानने पर प्रति प्लौट 5 लाख रुपए मांग रहा था. इस मामले में मुकदमा दर्ज होने के बाद संजय और नौकर छोटू गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए थे. विनोद चकमा दे कर फरार हो गया था.

इस के ठीक 9वें दिन यानी 3 जून, 2023 को कोतवाली थानाक्षेत्र स्थित धम्माल मोहल्ला निवासी राजकुमार श्रीवास्तव ने विनोद उपाध्याय, सहयोगी बाबू नंदन यादव, रमेश शर्मा और 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ रंगदारी और जान से मारने की धमकी का मुकदमा दर्ज कराया था. इन्हीं दोनों मुकदमों में विनोद की तलाश तेज कर दी गई थी.

फरारी के दौरान विनोद लखनऊ में मंत्री बन कर छिपा था. वहीं उस की बेटी एक कौन्वेंट स्कूल में पढ़ती थी. उस ने बेटी का नाम कटवा कर वहां से हटा दिया था. विनोद को इस बात की भनक लग चुकी थी, पुलिस कभी भी उस की बेटी को मोहरा बना कर उसे हाजिर होने के लिए दबाव बना सकती थी. वह हरगिज ऐसा होने देना नहीं चाहता था, इसीलिए उस ने बेटी का नाम कटवा दिया था.

खैर, फरारी के दौरान आईजी रेंज ने अगस्त 2023 में विनोद के ऊपर 50 हजार का इनाम घोषित किया. सितंबर में एडीजी (जोन) डा. के.एस. प्रताप कुमार ने इनाम की राशि बढ़ा कर एक लाख रुपए कर दी थी. इस के बाद उस का नाम मोस्टवांटेड अपराधियों की सूची में जुड़ा और उसे गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी एसटीएफ को सौंपी गई. अदालत से कुख्यात डौन विनोद उपाध्याय के खिलाफ गैरजमानती वारंट भी जारी हो चुका था. जबकि विनोद किसी कीमत पर पुलिस के हाथों चढऩा नहीं चाहता था.

आखिरकार लखनऊ से प्रयागराज आते समय सुलतानपुर के हनुमानगंज गोपालपुरवा इलाके में एसटीएफ ने उसे घेर लिया. 4/5 जनवरी, 2024 की सुबह साढ़े 3 बजे आतंक का पर्याय बने विनोद उपाध्याय की कहानी उस के गुरु श्रीप्रकाश शुक्ला की तरह खत्म कर दी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सुहागरात के बाद खुल कर नाची मौत

विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर – भाग 3

बात 2007 की है. किसी बात को ले कर विनोद के छोटे भाई संजय का पुलिसकर्मियों से विवाद हो गया. शाहपुर थाने की पुलिस संजय को हिरासत में कौवा बाग पुलिस चौकी पर ले गई.

विनोद को जैसे ही पता चला कि भाई को पुलिस पकड़ कर ले गई है तो वह अपने साथ बड़े लावलश्कर को साथ ले कर कौवा बाग चौकी पहुंच गया और पुलिस के कब्जे से दबंगई के बल पर भाई को छुड़ा कर ले गया. पुलिस वालों के साथ मारपीट भी की.

इस मामले में विनोद और उस के भाइयों पर केस भी दर्ज हुआ. धीरेधीरे मामला राजनैतिक रूप लेने लगा, जिस के बाद विनोद उपाध्याय और संजय उपाध्याय को जेल जाना पड़ा.

अपराधी से राजनेता और फिर राजनेता से माफिया बन चुका था विनोद उपाध्याय. साल 2007 में हुई कैंट थानाक्षेत्र के पीडब्ल्यूडी कांड की याद जब आती है तो रूह अपने आप कांप जाती है. माफिया विनोद उपाध्याय और माफिया लालबहादुर यादव के बीच लोक निर्माण विभाग के ठेके को ले कर लंबे समय से तनातनी चल रही थी.

टेंडर वाले दिन टेंडर डालने को ले कर विनोद के साथियों का लाल बहादुर यादव के साथ विवाद हो गया था. धीरेधीरे मामला बढ़ता गया. मामला बढऩे पर लालबहादुर ने उपाध्याय के साथियों को घेर लिया. दोनों ओर से गोलियां चलीं.

विनोद उपाध्याय गिरोह पर माफिया लाल बहादुर यादव भारी पड़ा. इस गैंगवार में उपाध्याय के 2 करीबी साथी रिपुंजय राय और सत्येंद्र कुमार मौत के घाट उतार दिए गए. रिपुंजय की तो खोपड़ी ही उड़ गई थी. जिलाधिकारी आवास के पास हुई दिनदहाड़े हुई इस लोमहर्षक घटना के बाद पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी.

इस मामले में अजीत शाही, संजय यादव, संजीव सिंह, इंद्रकेश पांडेय सहित 6 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ, लेकिन लालबहादुर यादव को आरोपी नहीं बनाया गया. यह देख विनोद का खून खौल उठा और उस दिन से दोनों गुटों में दुश्मनी और भी ज्यादा बढ़ गई थी.

इस घटना ने विनोद उपाध्याय को एक शातिर खिलाड़ी के रूप में कुख्यात कर दिया था. साथी की मौत से विनोद उपाध्याय पागल सा हो गया था और लाल बहादुर यादव से बदला लेने के लिए इंतकाम की आग में जल रहा था.

अब लाल बहादुर इस के निशाने पर था. उस ने शतरंज के बिसात पर अपने मोहरों को खेलना शुरू कर दिया था. शातिर विनोद ने लाल बहादुर को अंजाम तक पहुंचाने के लिए चक्रव्यूह की रचना शुरू की. 2014 की शाम कैंट थाने के पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मुख्य गेट के सामने लाल बहादुर यादव की गोली मार कर हत्या करवा दी थी. इस मामले में विनोद सहित कुल 11 लोग आरोपी बनाए गए.

घटना की जांच चली तो 3 महीने बाद प्रकाश में आया कि चिडिय़ाघर बनाने के लिए गिराई जा रही मिट्टी को ले कर लालबहादुर और विनोद के करीबी धनंजय तिवारी के बीच में अदावत चल रही थी.

धनंजय विनोद का पक्का दोस्त था. उस का सपोर्ट खुद विनोद कर रहा था. धनंजय के कंधे पर विनोद ने बंदूक रख कर घटना की रोचक पटकथा लिखी. बाद में विनोद सहित सभी आरोपी जेल भेज दिए थे.

विनोद उपाध्याय कितना शातिर किस्म का माफिया था, इस घटना से साफ जाहिर होता है. लाल बहादुर यादव हत्याकांड के जुर्म में विनोद गोरखपुर मंडलीय कारागार में बंद था.

जेल में बंद होते ही वहां अपनी हुकूमत चलानी शुरू कर दी थी. इस बात को ले कर डिप्टी जेलर राजेश मौर्या और विनोद उपाध्याय के बीच ठन गई थी. किसी भी कीमत पर जेलर राजेश मौर्या उस की गुंडागर्दी की खेती जेल के अंदर फैलने देना नहीं चाहते थे.

जेलर राजेश मौर्या को उन की औकात बताने के लिए जेल में रह कर ही माफिया विनोद ने खतरनाक साजिश रच कर सनसनी फैला दी थी. 8 दिसंबर, 2014 की रात डिप्टी जेलर राजेश मौर्या के सरकारी आवास में पिस्टल ले कर एक बदमाश घुस गया. जेलर मौर्या को पिस्टल सटा कर नकदी, गहने, मोबाइल फोन और सरकारी रिवौल्वर छीनने के बाद उन की स्कूटी की चाबी ले कर बदमाश फरार हो गया.

इस घटना से पुलिस महकमा दहल गया तो वहीं पुलिसकर्मी भी रात को कमरे से बाहर निकलने में बुरी तरह कांपते थे. फिर जेलर की सुरक्षा के लिए पीएसी की बड़ी टुकड़ी तैनात कर दी गई थी. लेकिन जेलर मौर्या बुरी तरह अंदर से भयभीत हो गए थे और कुछ दिनों बाद उन्होंने वहां से अपना स्थानांतरण करवा लिया था.

फिलहाल, पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू की. जांच के दौरान पता चला कि घटना की साजिश जेल के भीतर ही रची गई थी. साजिश को रचने वाला कोई और नहीं बल्कि माफिया विनोद ही था. 3 महीने बाद 6 मार्च, 2015 की रात जेल परिसर में फिर से एक घटना घटी.

जेल टावर पर चढ़े मंकी कैप पहने बदमाश ने ड्यूटी कर रहे सिपाही की पिस्टल की नोक पर वरदी उतरवा ली. बदमाश ने दूसरे टावर पर तैनात बंदीरक्षक के साथ भी ऐसा ही किया. इस घटना के बाद जेल में हड़कंप मच गया. एक बार फिर जेल के सिपाही बुरी तरह दहशत में आ गए थे.

घटना की जांच हुई. 27 मार्च, 2015 को पुलिस ने शाहपुर थानाक्ष़ेत्र स्थित घोषीपुरवा पुरानी मसजिद निवासी सैफ अली उर्फ सोनू और सुडिय़ाकुंआ बशारतपुर के रहने वाले विजय उपाध्याय को गिरफ्तार कर घटना का परदाफाश किया.

जेल में कैसे रची खौफनाक साजिश

दोनों बदमाश जेल में बंद माफिया विनोद उपाध्याय के इशारे पर दहशतगर्दी का नंगा खेल खेले थे. हद तो तब हो गई थी, जब 2014 में एक घटना को ले कर गोरखपुर के एक एसएसपी ने विनोद उपाध्याय को गिरफ्तार कर जेल भिजवाया था. इस ने अपनी राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल कर एसएसपी पर उसे छोडऩे का दबाव बना रहा था, लेकिन एसएसपी ने उस की एक न सुनी.

फिर क्या था, सत्ता के गलियारे में अपनी पहुंच के बल पर उस ने एसएसपी का ट्रांसफर पीएसी में करा दिया. हालांकि बाद में उन का स्थानांतरण इसी पद पर बड़े जिले में कर दिया गया.

माफिया विनोद उपाध्याय के नाम से पुलिस विभाग में दहशत कायम थी. सलाखों के पीछे रहते हुए भी अपना वर्चस्व बनाए रखता था. लाल बहादुर यादव हत्याकांड के बाद एक बार फिर विनोद चर्चाओं में था.

सलाखों के पीछे कैद विनोद बाहर आने के लिए तड़प रहा था. साम, दाम, दंड, भेद सारी नीति अपना कर हर हाल में जेल के बाहर आना चाहता था. 2017 में ही एक और घटना घटी थी, जिस में खुद को बचाने के लिए अपने दुश्मनों को झूठे केस में फंसा दिया था.

विनोद उपाध्याय : एक थप्पड़ ने बनाया गैंगस्टर – भाग 2

1997 के दौर में श्रीप्रकाश शुक्ला एक कुख्यात डौन का नाम था, जिस के नाम से बड़ेबड़े सूरमाओं की घिग्घी बंध जाती थी. उस के एक फोन से व्यापारियों की तिजोरियों के ताले खुल जाया करते थे. मंत्रियों और राजनेताओं की जान उन के गले में अटकी रहती थी कि किस गोली पर उन का नाम लिखा है. उस के नाम से वे थरथर कांपते थे.

हालांकि विनोद उपाध्याय कभी डौन श्रीप्रकाश शुक्ला से मिला नहीं था, लेकिन 1997 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही को लखनऊ में गोलियों से भून डाला, तब विनोद उपाध्याय का कहीं नाम भी नहीं था. श्रीप्रकाश शुक्ला के उस खूनी खेल को देख विनोद को हाथों में बंदूक थामने की सनक सवार हुई और वह गिरोह के सदस्यों से संपर्क में आ गया.

जब श्रीप्रकाश शुक्ला गाजियाबाद में एसटीएफ के हाथों मुठभेड़ में मारा गया था, तब विनोद गिरोह के सदस्यों सत्यव्रत राय और सुजीत चौरसिया के नजदीक आ गया था. उस के दिलोदिमाग पर श्रीप्रकाश शुक्ला के कारनामों की अमिट छाप छप गई और उस के आदर्श का चोला पहन कर अपने जीवन में पूरी तरह से उतार लिया और उस के जैसा डौन बनने का संकल्प ले लिया था.

सत्यव्रत राय की अंगुलियां पकड़ कर विनोद उपाध्याय ने जुर्म की डगर पर चलना शुरू किया था. एक तरह से वह अपराध के विश्वविद्यालय का एक माहिर प्रोफेसर था. अपराध के हर एक दांवपेंच को बखूबी जानता था. अपराध के चक्रव्यूह में प्रवेश करने और उस के सभी द्वारों को सफलतापूर्वक तोड़ कर बाहर निकलने की कला में भी वह माहिर था. विनोद धीरेधीरे सारे गुणों में माहिर हो चुका था.

विनोद और सत्यव्रत राय ने जमीन के कारोबार से अपने दोस्ताना सफर को आगे बढ़ाना शुरू किया. जमीन खरीदफरोख्त को ले कर गोरखपुर में जमीन के एक मालिक से विवाद हो गया. दबंग विनोद ने उसे जान से मारने की कोशिश की, लेकिन वह बच गया. जमीन मालिक ने उस के खिलाफ गोरखपुर के गोरखनाथ थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया.

1999 में विनोद के खिलाफ पहली बार हत्या का प्रयास (धारा 307 आईपीसी) का मुकदमा दर्ज हुआ था और उसे जेल भेज दिया गया. कुछ दिन जेल में रहने के बाद उस की जमानत हो गई और वह जेल से बाहर आ गया और फिर जुर्म की राह चल निकला.

जेल से बाहर आने के बाद विनोद और सत्यव्रत राय दोनों फिर से अपने जमीन और सूद वाले धंधे में जुड़ गए थे. इस बार दोनों की यह दोस्ती ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी, बल्कि कुछ ही समय में दोनों के बीच दुश्मनी की बड़ी लकीर खिंच गई.

जुर्म की दुनिया का बड़ा खिलाड़ी था सत्यव्रत राय. जबकि विनोद जुर्म के बीज से अंकुरित हुआ एक पौधा था. उस के सामने उस की न कोई औकात थी और न कोई वजूद ही. उस ने अपनी तिकड़म वाली चाल से विनोद उपाध्याय को जेल भिजवा दिया.

वह साल 2004 था, जब विनोद विवाद में गोरखपुर जिला कारागार में बंद हुआ था. वह गजब का शातिर और उतना ही मनबढ़ किस्म का बदमाश था. जेल में बंद दबदबे को ले कर वहां पहले से निरुद्ध नेपाल के भैरहवा जिले के माफिया डौन जीतनारायण मिश्र से कहासुनी हो गई थी. माफिया जीत के सामने विनोद बौना था. उस ने विनोद को जम कर अपमानित करने के साथ ही एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिया था.

थप्पड़ इतना जोरदार था कि उसे दिन में तारे नजर आने लगे थे. इस के बाद माफिया जीतनारायण मिश्र को बस्ती जेल भेज दिया गया.

कुछ दिनों बाद विनोद जमानत पर जेल से बाहर आया और जीतनारायण से बदला लेने की जुगत में जुट गया था. जेल में हुआ अपमान और थप्पड़ की मार वह चाह कर भी भुला नहीं पा रहा था.

उस दिन साल 2005 के अगस्त की 7 तारीख थी. विनोद को पता चला कि जेल से छूटने के बाद जीतनारायण मिश्र बहनोई गोरेलाल मिश्र के साथ नेपाल जा रहा है. इसी मौके के इंतजार में विनोद कब से फडफ़ड़ा रहा था.

जैसे ही उसे जानकारी हुई, उस ने साथियों के साथ संतकबीर नगर के बखिरा क्षेत्र में जीतनारायण मिश्र और बहनोई गोरेलाल को घेर लिया. और दोनों को गोलियों से भून कर मौत के घाट उतार दिया. विनोद ने अपने अपमान का बदला ले लिया. इस के बाद वह पूर्वी उत्तर प्रदेश में चर्चा में आ गया था.

अपराध सिंडीकेट में विनोद ने अपना नाम दर्ज करा लिया था और दुस्साहस का एक पर्याय बन गया था. उस के नाम का डंका बजने लगा था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय को उस ने राजनीति का अखाड़ा बना लिया था.

उस के सामने कोई भी खड़ा होने का दुस्साहस नहीं कर सकता था. जो भी टकराने की जुर्रत करता, उस के हाथपांव तोड़वा कर अपाहिज बना देता था. अब उस के साथ युवाओं की एक बड़ी फौज तैयार हो चुकी थी.

अपराधी से राजनेता कैसे बना विनोद

विनोद उपाध्याय ने छात्र राजनीति से सियासी शुरुआत की. वह खुद छात्र संगठन का चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि अपने प्रत्याशी मैदान में उतारने लगा. जिस प्रत्याशी के सिर पर हाथ रखता था, उस का विजयी होना तय था. उस से विनोद का जलवा और भी ज्यादा बढ़ गया था. अब तो उस के नाम पर छात्र हफ्तावसूली करने लगे.

इसी दौरान पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बाहुबली और कद्दावर नेता की जब उस पर नजर पड़ी तो उस ने उस के सिर पर अपना हाथ रख दिया था.

उस बाहुबली नेता का वरदहस्त प्राप्त होते ही विनोद के पैर जमीन पर नहीं थे. उसी नेता ने बहुजन समाज पार्टी की मुखिया बहन मायावती से उसे मिलवाया और साल 2007 में बसपा से गोरखपुर सदर विधानसभा से टिकट दिलवाया.

विनोद के चुनाव प्रचार में खुद बसपा सुप्रीमो मायावती ने हिस्सा लिया और उस के हिस्से में वोट डालने की जनता से अपील की थी, लेकिन गोरखपुर की जनता ने उसे सिरे से नकार दिया.

चुनाव में उसे बुरी तरह हार का सामना करना पड़़ा और दूसरी बार जीत का सेहरा भाजपा के कद्दावर नेता राधामोहन दास अग्रवाल के सिर बंधा और वह एक बार फिर से विधायक बनेे.

विनोद उपाध्याय का आपराधिक चरित्र उस के सामने आया, जो हार का सब से बड़ा कारण बना था और वह चौथे स्थान पर आ गया था. इस हार के बाद मायावती ने उसे बसपा की सदस्यता से बरखास्त कर दिया और किसी राजनैतिक पार्टी ने उसे अपने यहां स्थान नहीं दिया तो उस ने अपना पुराना धंधा शुरू कर दिया.