चाहत का कहर : माशूका की खातिर – भाग 2

रामू की इस करतूत से पूरा परिवार हैरान रह गया था. यह कोई अच्छी बात नहीं थी, इसलिए मां ने ही नहीं, भाइयों ने भी रामू को रोका. मारपीट भी की, लेकिन रामू नहीं माना तो नहीं माना. कुसुमा से उसे जो सुख मिलता था, उस की चाहत में वह उस के पास पहुंच ही जाता था. परेशान हो कर एक दिन शांति कुसुमा के घर जा पहुंची और उसे बुराभला कहने लगी.

तब कुसुमा ने कहा, ‘‘काकी, मैं तुम्हारे बेटे को बुलाने नहीं जाती, वह खुद ही मेरे पास आता है. तुम उसी को क्यों नहीं रोक लेती. अब तुम्हारे ही घर कोई आएगा, तो क्या तुम उसे भगा दोगी? तुम उसे तो रोकती नहीं, मुझे बेकार में बदनाम करने चली आई.’’

शांति चुपचाप घर लौट आई. उसी बीच मुकेश गांव आया तो किसी ने उस से रामू और कुसुमा के संबंधों के बारे में बताया. उस ने इस बारे में कुसुमा से पूछा तो रोते हुए उस ने कहा, ‘‘मैं कब से कह रही हूं कि तुम मुझे अपने साथ ले चलो. बीवी को इस तरह गांव में अकेली छोड़ोगे तो दिलजले लोग ऐसी ही बातें करेंगे.’’

मुकेश को लगा कि कुसुमा सच कह रही है, इसलिए उस की बात पर विश्वास कर के वह निश्चिंत हो कर दिल्ली चला गया. लेकिन अब मुकेश जब भी घर आता, गांव का कोई न कोई आदमी कुसुमा और रामू को ले कर उसे जरूर टोकता. इन बातों से उसे लगने लगा कि कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ है. इस के बाद उस ने कुसुमा को मारपीट कर धमकाया कि अब अगर उस ने उस के बारे में कुछ सुना तो वह उसे उस के मायके पहुंचा देगा. यही नहीं, उस ने शांति के घर जा कर उस से भी कहा कि वह रामू को रोके अन्यथा ठीक नहीं होगा.

इस पर जलीभुनी शांति ने कहा, ‘‘मैं खुद ही तुम्हारी पत्नी से परेशान हूं. इस के लिए मैं पंचायत बुलाने वाली हूं.’’

शांति की इस धमकी से मुकेश परेशान हो गया. अगर शांति ने पंचायत बुलाई तो गांव में उस की इज्जत का जनाजा निकल जाएगा. नाराज और दुखी मुकेश ने सारा गुस्सा और क्षोभ घर आ कर कुसुमा की पिटाई कर के निकाला.

अगले दिन शांति ने पंचायत बुलाई, जिस में मुकेश और कुसुमा को भी बुलाया गया. पंचायत में कुसुमा ने साफ कहा कि रामू से उस का कोई संबंध नहीं है. इस बात को ले कर उसे बेकार ही गांव में बदनाम किया जा रहा है.

पंचों ने जब मुकेश से कुछ कहना चाहा तो उस ने कहा, ‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि कुसुमा अब मेरे वश में नहीं है.’’

पंचायत बिना किसी फैसले के ही खत्म हो गई. मुकेश दूसरे दिन शाम को दिल्ली चला गया. इस पंचायत के बाद मोहल्ले का हर आदमी कुसुमा को अपना दुश्मन नजर आने लगा. इसलिए वह मोहल्ले के हर आदमी से पंगा ले कर उस की ऐसीतैसी करने लगी. उस की इस हरकत से हर कोई उस से घबराने लगा. अब किसी की हिम्मत उस से कुछ कहने की नहीं पड़ती थी. इस के बाद उस की और रामू की मोहब्बत की गाड़ी आराम से चलने लगी. डर के मारे मोहल्ले वालों ने उन की ओर से आंखें मूंद लीं.

शांति रामू को कुसुमा से किसी भी तरह अलग नहीं कर पाई तो उस ने सोचा कि रामू की शादी कर दे. नईनवेली दुलहन पा कर वह खुद ही कुसुमा का पीछा छोड़ देगा. उस ने रामू के लिए लड़कियां देखनी शुरू कर दीं. जल्दी ही उस ने जिला मैनपुरी के थाना एलांद के गांव सुशनगढ़ी के रहने वाले मान सिंह की बेटी सुमन से उस की शादी तय कर दी.

कुसुमा को जब पता चला कि रामू की शादी तय हो गई है तो वह सुलग उठी. वह किसी भी कीमत पर यह शादी नहीं होने देना चाहती थी. भला वह कैसे चाहती कि उस का प्रेमी किसी से शादी कर के उसे सुलगने के लिए छोड़ दे. इसलिए उस ने रामू से साफसाफ कह दिया कि अगर उस ने यह शादी की तो वह जान दे देगी.

‘‘शादी के बाद भी मैं तुम्हारा ही रहूंगा भाभी. मां बहुत परेशान हैं. मैं अब उसे और दुखी नहीं कर सकता.’’ रामू ने कुसुमा को समझाना चाहा.

‘‘वाह, क्या बात कही है? तुम्हारी वजह से मैं कितनी बदनामी झेल रही हूं, तुम्हें पता है. लोग मुझे चरित्रहीन कहते हैं. अब बीच मंझधार में तुम मुझे छोड़ कर किसी और का होना चाहते हो. कान खोल कर सुन लो, जीते जी मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगी.’’ कुसुमा ने चेतावनी दी.

रामू घर वालों के बारे में सोच रहा था कि वह घर वालों को क्या जवाब दे. तभी कुसुमा ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो, हम कहीं दूर भाग चलते हैं. अगर तुम ने ऐसा नहीं किया तो मेरा मरा मुंह देखोगे.’’

कुसुमा के तेवर देख कर रामू को यकीन हो गया कि अगर उस ने शादी कर ली तो कुसुमा सचमुच आत्महत्या कर लेगी. तब वह फंस सकता है. काफी सोचसमझ कर उस ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘ठीक है, तुम तैयारी करो. मैं तुम्हें साथ ले कर भागने को तैयार हूं.’’

1 जून, 2013 को रामू की शादी होनी थी. दोनों ओर जोरशोर से शादी की तैयारियां चल रही थीं. शादी की तारीख से 2 दिन पहले रामू घर से गायब हो गया. रामू का गायब होना घर वालों के लिए सदमे की तरह था. उन के लिए परेशानी यह थी कि वे लड़की वालों को क्या जवाब देंगे. रिश्तेदारों को कौन सा मुंह दिखाएंगे. क्योंकि अब तक कार्ड भी बंट गए थे.

कुसुमा भी घर से गायब थी, इसलिए सब को पूरा यकीन था कि जहां भी हैं, दोनों एक साथ हैं. सब से बड़ी परेशानी यह थी कि लड़की वालों को कैसे समझाया जाए. शांति बेटे मनोज को ले कर सुशनगढ़ी पहुंची. जब उस ने मान सिंह को सारी बात बताई तो उस ने अपना सिर पीट लिया. उस की बेटी का क्या होगा, कौन करेगा उस से शादी? लोग पूछेंगे कि शादी क्यों टूटी तो वह क्या जवाब देगा?

मान सिंह को इस तरह परेशान देख कर शांति ने कहा, ‘‘हम बहुत शर्मिंदा हैं समधीजी. अब इज्जत बचाने का एक ही रास्ता है. अगर आप मान जाएं तो सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘कौन सा रास्ता?’’ मान सिंह ने पूछा.

‘‘मेरे बेटे शिवशंकर को तो आप ने देखा ही है. वह बहुत ही नेक है. कमाताधमाता भी ठीकठाक है. वह आप की बेटी को खुश रखेगा. अगर आप तैयार हों तो…?’’

मान सिंह के पास उन की बात मानने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था. उस ने उदास मन से कहा, ‘‘ठीक है, इज्जत बचाने के लिए शिवशंकर से ही सुमन की शादी कर देता हूं.’’

इस के बाद शिवशंकर ने चुपचाप मां की बात मान ली तो 1 जून, 2013 को सुमन से उस की शादी हो गई. इस तरह उस ने 2 परिवारों की इज्जत बचा ली.

11 जून, 2013 को रामू और कुसुमा लौट आए. पत्नी की इस हरकत की जानकारी दिल्ली में रह रहे मुकेश को भी हो गई थी. लेकिन वह हालात के सामने हारा हुआ था. इसलिए चुप्पी साधे दिल्ली में ही पड़ा रहा.

सप्ताह भर बाद रामू घर लौटा तो सभी ने उसे

खूब खरीखोटी सुनाई. इस पर उस ने कहा, ‘‘मैं सुमन को धोखा नहीं देना चाहता था, इसलिए मैं कुसुमा के साथ चला गया था.’’

शांति ने सोचा, जो होता है, वह अच्छा ही होता है.

दो बहनों का एक प्रेमी – भाग 2

11 दिसंबर, 2013 को अब्दुल रशीद और अतीक सुबह को अपने काम पर चले गए. शमीम और आफरीन घर में अकेली रह गईं. उस दिन शमीम के बड़े भाई की पत्नी जरीना ने खीर बनाई थी. शाम को 6 बजे वह एक कटोरे में खीर ले कर शमीम को देने आई. दरवाजा शमीम की जगह आफरीन ने खोला. वह जरीना को देखते ही घबराई सी बोली, ‘‘भाभी, अंदर आओ. देखो, अप्पी को पता नहीं क्या हो गया है. किसी ने उन का गला काट दिया है, लगता है मर गई हैं.’’

जरीना उस वक्त मुख्य दरवाजे की दहलीज पर खड़ी थी. आफरीन की बात सुन कर वह 2 कदम पीछे हट गई. उस ने सहमते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे घर में दाखिल नहीं होऊंगी. मोहल्ले के लोगों को बुला लो.’’

आफरीन ने यह बात सामने पान की गुमटी पर बैठने वाले व्यक्ति को बताई. लेकिन उस ने भी अंदर जा कर देखने की हिम्मत नहीं की. अलबत्ता उस ने यह बात आसपास के लोगों को जरूर बता दी. इस का नतीजा यह हुआ कि कुछ ही देर में यह खबर पूरे इलाके में फैल गई. अब्दुल रशीद के घर के सामने तमाम लोग जमा हो गए. लेकिन डर की वजह से कोई भी अंदर नहीं गया.

इसी बीच किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर दिया. शमीम और आफरीन की बड़ी बहन तहसीन और दूसरे भाई की पत्नी भी उसी मोहल्ले में रहती थीं. खबर मिलते ही वे दोनों भी आ गईं. हिम्मत कर के बड़ी बहन और भाभी अंदर गईं. अंदर शमीम की लाश खून से लथपथ पड़ी थी. वे उसे देखते ही रोने लगीं. जरा सी देर में कोहराम मच गया.

पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिलते ही यशोदानगर पुलिस चौकी के इंचार्ज जय वीर सिंह अपने सहयोगियों कांस्टेबल राम नारायण, आजाद, शिव प्रताप यादव, रामलखन और राजेश सिंह के साथ घटनास्थल पर आ गए. घटनास्थल की स्थिति देखने के बाद जयवीर सिंह ने इस मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

राजीवनगर के एफ ब्लौक में एक युवती का कत्ल हो गया है, यह पता चलते ही थाना नौबस्ता के प्रभारी आलोक कुमार यादव कांस्टेबल सुमित नारायण यादव, नीरज कुमार यादव, रणजीत सिंह यादव, देवेश कुमार आदि के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. पुलिस ने अंदर जा कर देखा तो शमीम तख्त के ऊपर बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ी थी. उस के गले से काफी मात्रा में खून रिसा था, जिस से बिस्तर गीला हो गया था.

बिस्तर पर बिछी चादर के एक कोने पर संभवत: हत्यारे ने अपने खून सने हाथ पोंछे थे. वहां भी काफी खून लगा हुआ था. अभी थानाप्रभारी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सीओ रोहित मिश्र फौरेंसिक टीम के साथ आ पहुंचे.

पुलिस ने नंबर पूछ कर शमीम के पिता को इस घटना की खबर देनी चाहिए तो उन का फोन स्विच्ड औफ मिला. आफरीन कुछ नहीं बता पा रही थी, इसलिए पुलिस घर के मुखिया अब्दुल रशीद के आने का इंतजार करने लगी.

अब्दुल रशीद रात 9 बजे अपने बेटे अतीक के साथ घर लौटे तो दरवाजे पर पुलिस की जीप और पुलिस वालों को खड़ा देख परेशान हो गए. उन की समझ में नहीं आया कि उन के घर के बाहर इतनी भीड़ क्यों है. उन्होंने घर के अंदर जा कर देखा तो वह गश खा कर गिरतेगिरते बचे. 3-4 लोगों ने मिल कर उन्हें जैसेतैसे संभाला.

अब्दुल रशीद से भी कोई महत्त्वपूर्ण बात पता नहीं चली तो थानाप्रभारी आलोक कुमार यादव ने प्राथमिक काररवाई पूरी कर के मृतका शमीम की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. इस के साथ ही अब्दुल रशीद की तहरीर पर भादंवि की धारा 302/201 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया.

अब्दुल रशीद ने पुलिस को बताया कि दिल्ली में रहने वाले सिराज के साथ शमीम के प्रेमसंबंध थे. जबकि वह उस की शादी अपनी पसंद के लड़के से करना चाहते थे. उन्होंने उस की शादी भी तय कर दी थी. इस पर सिराज ने धमकी दी थी कि अगर शमीम की शादी कहीं और की तो उसे जान से मार देगा. अब्दुल रशीद ने यह भी बताया कि सिराज से शमीम की जानपहचान रूबीना ने ही कराई थी.

आफरीन ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि दोपहर 2 बजे शमीम के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. फोन पर बात करने के बाद शमीम ने उस से कहा था कि कोई उस से मिलने आ रहा है, इसलिए वह कुछ समय के लिए घर से बाहर चली जाए और उस के सामने न पड़े, क्योंकि उस की नजर अगर उस पर पड़ गई तो वह उसे पसंद कर लेगा.

आफरीन ने आगे बताया कि पहले तो वह घर से बाहर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन जब शमीम ने आने वाले की एक फोटो दिखाई तो वह मान गई और घर से निकल कर अंबेडकर पार्क की तरफ चली गई. उस वक्त शमीम भी उस के साथ थी, क्योंकि आने वाले ने उस से अंबेडकर मूर्ति के पास मिलने को कहा था. यह साढ़े 3 बजे की बात है.

आफरीन के अनुसार वह अंबेडकर पार्क के पास से होते हुए घर के पीछे वाली गली में चली गई थी और वहीं बैठ कर बहन के फोन का इंतजार करने लगी थी. अगले 3 घंटे उस ने वहीं बिताए और जब 6 बजने को आए और अंधेरा छाने लगा तो वह वहां से उठ कर घर लौट आई. उस समय घर का दरवाजा उढ़का हुआ था. वह अंदर पहुंची तो उस ने शमीम को खून से लथपथ मरा हुआ पाया.

यह सब बताने के बाद आफरीन कमरे में गई और एक तसवीर थानाप्रभारी को देते हुए कहा कि शमीम से यही लड़का मिलने आने वाला था. उस ने यही फोटो उसे दिखाई थी.

थानाप्रभारी ने फोटो को गौर से देखा, वह किसी 16-17 साल के लड़के की फोटो थी. उस फोटो को देख कर ऐसा नहीं लगता था कि वह हत्यारा हो सकता है. दूसरी बात यह भी थी कि उस लड़के का नामपता किसी को मालूम नहीं था. ऐसे में उसे तलाश करना आसान नहीं था.

प्यार की वो आखिरी रात – भाग 2

एक रोज दोपहर को दीपक ईरिक्शा ले कर बाजार जा रहा था कि उसे बरखा दिखाई दी. उस ने ईरिक्शा रोक दी. बरखा नजदीक आई तो दीपक ने उसे छेड़ा, “भाभी, क्या भैया को छोड़ कर जा रही हो? बहुत जल्दी में दिख रही हो.”

“तुम्हारे भैया को छोड़ कर भागूंगी तो तुम्हारे साथ न.” बरखा ने बिना संकोच के कहा और उस की ईरिक्शा पर बैठ गई, “चलो, भगा ले चलो मुझे.”

“कहां?” दीपक अब सकपका गया.

“बस निकल गई हवा. बड़े आए भाभी का खयाल रखने वाले. चलो, मुझे बाजार तक छोड़ दो.” बरखा ने उसे टहोका मारा. उस रोज बाजार में बरखा ने शौपिंग की तो दीपक ने उसे इंप्रेस करने के लिए अपनी तरफ से उसे एक अच्छी सी साड़ी खरीदवा दी. फिर एक रेस्तरां में उसे बढिय़ा सा नाश्ता भी कराया.

वापसी में भी दीपक उसे साथ ले कर आया, इस दौरान दोनों काफी खुल चुके थे. दीपक ने दबे स्वर में बरखा को यह जता दिया था कि वह उसे बेइंतहा चाहता है. बरखा अपनी कटीली अदाओं से उसे घायल करती हुई मुसकराती रही.

मोहल्ले से कुछ दूर बरखा को उतारते हुए दीपक बोला, “भाभी, आज मैं ने तुम्हारी इतनी सेवा की, उस की मेवा भी मिलेगी क्या?”

“एक घंटे बाद घर आ जाना, चाय पिला दूंगी.”

“सिर्फ चाय?”

“तो दूध पी लेना,” बरखा ने कामुक आंखों से दीपक की आंखों में झांका और गहरी सांस लेते हुए अपने वक्षों को तान दिया, मानो वह कह रही हो कि इन्हें पी लेना.

दीपक घर पहुंचा. उस ने कपड़े बदले फिर मां से बहाना कर के घर से निकल गया. वह जानता था कि बरखा इस वक्त घर पर अकेली होगी. कृष्णकांत रात 9 बजे के पहले घर नहीं आता था. दीपक उसी रोज बरखा को पा लेना चाहता था, अत: वह बरखा के घर की ओर चल पड़ा.

बरखा ने दीपक को पलंग पर बिठाया. फिर मुसकराते हुए पूछा, “क्या पिओगे देवरजी, चाय या दूध..?”

“यह दूध,” दीपक ने उस की कलाई थामते हुए उस के स्तनों की तरफ इशारा किया.

“हाय दैय्या, कितने बेशरम हो तुम.” बरखा ने लाज का नाटक किया, लेकिन दीपक ने उसे खींच कर गोद में गिरा लिया और उस के वक्ष सहलाने लगा.

“देवरजी, तुम मुझे अच्छे लगते हो,” बरखा ने उस के हाथों के ऊपर हाथ रखते हुए कहा, “पर मैं तुम्हें यह दूध तभी पिलाऊंगी, जब तुम हमेशा इन के वफादार रहने की कसम खाओगे.”

“तुम्हारी कसम बरखा भाभी, तुम्हें कभी दगा नहीं दूंगा,” दीपक ने अपने सिर पर हाथ रख कर कसम खाई.

दीपक गुप्ता से हो गए अवैध संबंध

बरखा प्यासी औरत थी. उस की नजर दीपक की जवानी पर थी. दीपक ही उस की प्यास बुझा सकता था. उस का पति कृष्णकांत उस की पेट की भूख तो मिटा सकता था, पर तन की भूख नहीं. अत: उस ने एक कामुक सीत्कार भरी और बोली, “मैं पहले दरवाजा बंद कर लूं.”

दीपक ने उसे छोड़ा तो वह दरवाजा बंद कर आई. वह जैसे ही पलंग के पास आई, दीपक ने उसे बांहों में भर लिया और पलंग पर लुढक़ गया. उस के बाद तो कमरे में सीत्कार की आवाजें आने लगीं. कुछ देर बाद दोनों अलग हुए तो उन के चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि के भाव थे.

उस रोज बरखा जहां शादी के समय दिए गए सभी वचन भूल गई और पति के साथ विश्वासघात कर बैठी, वहीं दीपक ने दोस्ती को दरकिनार कर दोस्त की पीठ में इज्जत का छुरा घोंप दिया. वह भूल गया कि बरखा उस के दोस्त की पत्नी है.

अवैध संबंधों का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो वक्त के साथ बढ़ता ही गया. दोनों को जब भी मौका मिलता, वे एकदूसरे में समा जाते. बरखा अब दीपक के साथ सैरसपाटा करने भी जाने लगी. दीपक बरखा को ईरिक्शा पर बैठा कर रमणीक स्थल मोतीझील ले जाता. वहां की मखमली घास पर बैठ कर दोनों घंटों तक प्यार भरी बातें करते. फिर झील में नाव पर बैठ कर खूब मस्ती करते. पति के वापस आने के पहले वह घर लौट आती थी.

दीपक का कृष्णकांत के घर आनाजाना बढ़ा तो अड़ोसपड़ोस के लोगों के कान खड़े हो गए. कई लोगों ने बरखा को दीपक के साथ बाजार में भी साथ देखा था, सो वे भी कानाफूसी करने लगे थे. कृष्णकांत को बात पता चली तो उस का माथा ठनका. उस ने बरखा से कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उस पर शक करने लगा.

बरखा पति के सामने बनी सतीसावित्री

एक रोज कृष्णकांत सुबह काम पर गया, लेकिन दोपहर को ही वापस लौट आया. उस समय बरखा घर पर ही थी. कृष्णकांत यह सोच कर घर वापस आया था कि बरखा के साथ प्यार भरे कुछ लम्हे बिताएगा, लेकिन ज्यों ही वह अपने कमरे में दाखिल होने को हुआ, बरखा की आवाज उस के कानों से टकराई, “उस के साथ मेरा विवाह हो गया तो क्या हुआ? मेरा जिस्म और मेरी आत्मा तुम्हारे ही रहेंगे. हमें कोई रोक नहीं सकता.”

कृष्णकांत के कानों में मानो किसी ने पिघला हुआ शीशा डाल दिया हो. उस का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. मारे गुस्से और नफरत के उस के जबड़े भिंच गए. दरवाजे को धकेलते हुए वह कमरे में दाखिल हुआ तो उसे अचानक सामने पति को देख कर बरखा के चेहरे का रंग उड़ गया.

कृष्णकांत उसे घूरते हुए दहाड़ा, “बताओ कौन है वह, जिस से तू फोन पर बातें कर रही थी. जरूर वह तेरा आशिक ही होगा.”

बरखा चुपचाप कृष्णकांत की बात सुनती रही. उस के चेहरे पर ग्लानि या क्षोभ के कोई भाव नहीं थे. बजाय झुकने के बरखा सख्त लहजे में बोली, “तुम्हें यह जानना है न कि मैं किस से बातें कर रही थी तो जान लो, मैं अपनी सहेली से बात कर रही थी. अगर यकीन न हो, तो ये लो फोन और नंबर मिला कर कर लो उस से बात.” कह कर उस ने फोन पति को पकड़ा दिया.

बरखा ने जिस आत्मबिश्वास के साथ यह सब कहा था, उस से कृष्णकांत को लगा कि वह सच बोल रही है. उसे लगा कि पूरी बात जाने बिना उस ने बेकार में पत्नी पर शक किया. यही नहीं, उस ने बरखा से माफी मांगी और उसे मनाने लगा.

बरखा के जब से दीपक के साथ जिस्मानी संबंध बने थे, तब से उस ने पति को भुला ही दिया था, लेकिन उस दोपहर जब माफी मांगने के बाद कृष्णकांत ने बरखा से प्यार भरी बातें की और उसे अपनी बांहों में भरा तो वह पति को समर्पित हो गई. कृष्णकांत खुश था कि आज उस ने बीवी को पा लिया है, पर वह यह नहीं जानता था कि बीवी ने उस के शक को दूर करने के लिए उस के समक्ष जिस्म की गिरह खोली थी.

शादी के नाम पर ऐसे होती है ठगी – भाग 3

अनुष्का का शक गहरा गया. वह दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त रविंद्र यादव से मिली और उन्हें अपने साथ घटी पूरी कहानी बता दी. रविंद्र यादव को यह मामला काफी गंभीर लगा. उन्होंने अनुष्का को क्राइम ब्रांच के पुलिस उपायुक्त भीष्म सिंह के पास भेज दिया साथ ही डीसीपी को निर्देश दिए कि वह जल्द से जल्द जरूरी काररवाई करें.

डीसीपी ने अनुष्का की शिकायत पर थाना क्राइम ब्रांच में 7 मार्च, 2014 को राजीव यादव, अजय यादव, अमित चौहान आदि के खिलाफ धोखाधड़ी करने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. साथ ही उन्होंने एसीपी होशियार सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई जिस में तेजतर्रार सबइंसपेक्टर विनय त्यागी, अतुल त्यागी, हेडकांस्टेबल संजीव कुमार, जुगनू त्यागी, नरेश पाल, राजकुमार, उपेंद्र, कांस्टेबल राजीव सहरावत, विपिन, संदीप आदि को शामिल किया गया.

जिस फोन नंबर से राजीव अनुष्का से बात करता था, वह उस ने बंद कर रखा था. पुलिस टीम ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई और उस काल डिटेल्स का अध्ययन कर के यह जानने में जुट गई कि राजीव यादव की ज्यादातर किन फोन नंबरों पर बातें होती थीं. इस के अलावा जिन बैंक खातों में अनुष्का ने साढ़े 24 लाख रुपए जमा कराए थे, उन की भी जांचपड़ताल शुरू कर दी.

इस जांच से पुलिस को यह जानकारी मिल गई कि राजीव यादव का असली नाम अजय यादव है और जिस अमित चौहान को उस ने अपना बौडीगार्ड बताया था, वह उस का ड्राइवर है. खुफिया तरीके से जांच करने पर पता चला कि अमित चौहान नोएडा के छलेरा गांव का रहने वाला है और अजय यादव दिल्ली के ग्रेटर कैलाश पार्ट-2 का. ये दोनों ही अपने घरों से फरार थे. उन की तलाश के लिए मुखबिर भी लगा दिए.

इसी बीच 21 मार्च, 2014 को पुलिस टीम को सूचना मिली कि अजय यादव आज अपनी होंडा सिटी कार डीएल4सीएएच 9066 से गुड़गांव-आयानगर जाएगा. यह खबर मिलते ही पुलिस टीम बौर्डर पर पहुंच गई और उधर से गुजरने वाली कारों पर नजर रखने लगी. उसी दौरान पुलिस को उक्त नंबर की होंडा सिटी कार आती दिखी तो उस ने उसे रोक लिया. उस समय कार में ड्राइवर के अलावा अधेड़ उम्र का एक आदमी बैठा हुआ था.

कार रुकते ही ड्राइवर बोला, ‘‘आप को पता नहीं गाड़ी किस की है?’’

‘‘नहीं, बताओ तभी तो पता चलेगा.’’ एक पुलिसकर्मी बोला.

‘‘ये गाड़ी डीआईजी साहब की है जो गाड़ी में ही बैठे हुए हैं.’’ ड्राइवर ने बताया.

इस से पहले कि पुलिस कुछ कहती, कार में बैठे शख्स ने ड्राइवर से बात कर रहे पुलिसकर्मी को इशारे से अपने पास बुलाया. पास में खड़े एसआई विनय त्यागी कार में बैठे उस शख्स के पास पहुंचे तो उस शख्स ने खुद को डीआईजी इंटेलीजेंस ब्यूरो बताया.

एसआई विनय त्यागी को यह जानकारी मिल ही चुकी थी कि अजय यादव बहुत ही शातिर किस्म का है. इसलिए उन्होंने उस से आइडेंटिटी कार्ड मांगा तो वह आईडी कार्ड तो क्या ऐसी कोई चीज नहीं दिखा सका जिस से साबित हो सके कि वह पुलिस में है. लिहाजा वह उन दोनों को क्राइम ब्रांच औफिस ले आए.

औफिस में जब उन दोनों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपने नाम अजय यादव उर्फ राजीव यादव व अमित चौहान बताए. इन के खिलाफ ही अनुष्का ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

पूछताछ में पता चला कि अजय यादव बहुत अच्छे परिवार से है. उस के पिता आईएएस औफीसर थे. प्रतिष्ठित परिवार का अजय यादव एक ठग कैसे बना, इस बारे में जब उस से पूछताछ की गई तो उस के शातिर ठग बनने की एक दिलचस्प कहानी सामने आई.

अजय सिंह यादव के पिता जय नारायण सिंह आईएएस अधिकारी थे. वह सन 1979 में दिल्ली में एमसीडी के कमिश्नर रह चुके थे. अजय सिंह ने दिल्ली के किरोड़ीमल कालेज से 1976 में ग्रैजुएशन पूरा किया. पिता चाहते थे कि वह भी भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करे. इस के लिए दिनरात एक करना होता है. यह सब करने के लिए अजय तैयार नहीं था. तब जयनारायण सिंह ने अपने प्रभाव से अजय की नौकरी फल एवं सब्जीमंडी आजादपुर में प्रवर्तन अधिकारी के पद पर लगवा दी.

चूंकि अजय की शुरू से ही खुले हाथों से पैसे खर्च करने की आदत थी. इसलिए नौकरी से उसे जो पैसे मिलते थे, वह उस की आंख तले नहीं आते थे. इस के अलावा उस की नौकरी बड़ी आसानी से लगी थी इसलिए उस नौकरी पर उस का मन नहीं लगा. 5-6 साल बाद ही उस ने वह नौकरी छोड़ दी.

उस का मानना था बिजनैस में मोटी कमाई होती है इसलिए अब वह किसी बिजनैस में हाथ आजमाना चाहता था. उसे चूंकि बिजनैस का कोई अनुभव नहीं था इसलिए पिता ने उसे बिजनैस करने को मना किया, लेकिन वह नहीं माना. उस ने एक नामी ब्रांड के रिफाइंड तेल की डिस्ट्रीब्यूशनशिप ले ली. राजस्थान में उस ने अपना कारोबार शुरू कर दिया. लेकिन घाटा होने की वजह से उस ने इस कारोबार को बंद कर दिया.

अजय यादव तेजतर्रार और पढ़ालिखा युवक था. पिता के प्रभाव की वजह से उस के कुछ राजनीतिज्ञों से भी अच्छे संबंध हो गए थे. रिफाइंड तेल का बिजनैस बंद करने के बाद वह केंद्र सरकार के तत्कालीन कृषि मंत्री का पीए बन गया. वहां उस की मुलाकात तमाम अधिकारियों से होती रहती थी. वहां रह कर वह पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की बात और काम करने की शैली सीख गया था.

अजय यादव अविवाहित था. प्रशासनिक अधिकारी का बेटा होने की वजह से उस के लिए अच्छे परिवारों से रिश्ते आने लगे. सन 1981 में राजस्थान सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री की बेटी से उस की शादी हो गई.

कालेज के दिनों से ही वह खर्चीली लाइफस्टाइल जीने का शौकीन था. यही आदत उस की अब भी बनी हुई थी. मंत्री का पीए बनने के बाद वह जो कमा रहा था, उस कमाई से भी वह संतुष्ट नहीं था. लिहाजा उस ने मंत्री के पीए की नौकरी भी छोड़ दी.

उसी दौरान उस ने दिल्ली में कुछ ब्लूलाइन बसें चलवाईं. बसों से उसे जो आमदनी होती थी, उस से ज्यादा उस के खर्चे थे. ऊपर से बसों की मेंटीनेंस में उस के मोटे पैसे खर्च हो जाते थे लिहाजा उस ने वे भी बेच दीं. सन 1990 में अजय ने देहरादून स्थित अपने बंगले में होटल खोला, लेकिन उस से भी उसे अपेक्षा के मुताबिक इनकम नहीं मिली.

अजय के खर्चे बढ़ते जा रहे थे, लेकिन आमदनी का कोई स्थाई स्रोत नहीं था. लिहाजा वह परेशान रहने लगा. तब उस ने दिल्ली और हरियाणा की रीयल एस्टेट कंपनियों में नौकरियां कीं. नौकरी में उस की भागदौड़ ज्यादा हो गई थी जिस की वजह से उसे शुगर, उच्च रक्तचाप और अन्य कई बीमारियों ने घेर लिया. 2008-09 में वह पूरी तरह बेरोजगार हो गया तो उसे पैसों की तंगी होने लगी.

प्रेमिका को गोली मार की खुदकुशी – भाग 2

नित्या ने दिल में बसा लिया विशाल को

एक दिन महाविद्यालय में आयोजित एक संयुक्त प्रोग्राम में विशाल और नित्या ने गीतों में अपनीअपनी प्रस्तुतियां दीं तो महाविद्यालय के सभी छात्रछात्राओं ने जम कर तालियां बजा कर दोनों का उत्साहवर्धन किया. उसी शाम दोनों की नजरें एकदूसरे से मिलीं, वे दोनों एकटक एकदूसरे की ओर काफी देर तक अपनी नजरें चाह कर भी हटा न सके. एक अजीब कशिश और एक अनोखा सा आकर्षण सा उन दोनों के बीच स्थापित हो चुका था.

दोनों को अपने दिल में यह महसूस सा होने लगा था, मानो वे दोनों केवल एकदूसरे के लिए बने हैं. अब तक न तो विशाल को किसी युवती से न ही नित्या को किसी युवक से प्यार हुआ हुआ था. दोनों के दिल में बस एक यही बात थी कि कब हमें एकदूसरे से बात करने का अवसर मिल पाएगा.

अब तक नित्या यह बात अच्छी तरह से समझ चुकी थी कि विशाल की ओर से तो पहल होने से रही, उसे ही अपनी ओर से पहल करनी पड़ेगी, तभी बात कुछ आगे बढ़ सकती है. दोनों एकदूसरे से मिलते भी थे, पर बातें चाह कर भी नहीं कर पा रहे थे.

एक दिन हिम्मत कर के जब दोनों का आमनासामना हुआ तो नित्या ने विशाल से कहा, आप से एक बात करनी है, क्या आप के पास समय है?

‘जी जरूर. आप के लिए तो मेरे पास हर वक्त समय ही समय है.” विशाल ने मुसकराते हुए कहा.

“ठीक है, कल को शाम 4 बजे यहीं पर आप से मिलती हूं” यह कहते हुए नित्या मुसकरा कर वहां से चली गई थी.

दूसरे दिन शाम को नियत समय पर दोनों मिले तो विशाल ने कहा, कहिए, कहां चलना है?”

एकदूसरे के करीब आए दोनों

इस के बाद विशाल नित्या को अपनी बाइक पर बिठा कर काफी दूर सुनसान से इलाके में ले गया. विशाल ने अपनी बाइक रोक कर किनारे खड़ी कर दी.

‘जी कहिए, मुझ से क्या चाहती हैं आप?” विशाल ने कहा.

“विशाल, आप मुझे बड़े अजीब से इंसान लगे. पता नहीं क्यों यूं अकेलेअकेले से, गुमसुम से रहते हो. कुछ परेशानी या दुख तो नहीं है न आप के जीवन में?” नित्या ने पूछा.

“नित्याजी, मुझे अकेलापन बड़ा अच्छा लगता है. इस अकेलेपन में बड़ा सुकून सा मिलता है. आजकल की दुनिया बड़ी मायावी सी लगती है, इसीलिए कुछ दूरी बना कर रखता हूं.” विशाल ने कहा.

“अच्छा, एक बात बताओ विशाल, तुम्हें क्या कभी से किसी लड़की से रोमांस या प्यार हुआ है? किसी लड़की ने कभी तुम्हारा दिल तो नहीं तोड़ा न?” नित्या ने कहा.

“देखिए, मैं ने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं. न किसी से कभी प्यार हुआ और न ही रोमांस तो मेरा दिल भला कैसे टूट सकता है?” विशाल बोला.

“अच्छा, ये बताओ तुम्हारे मातापिता ने बचपन में तुम्हारा रिश्ता कहीं फिक्स तो नहीं किया हुआ है. मेरा मतलब तुम्हारी बचपन से कोई मंगेतर तो नहीं है न!”नित्या ने पूछा.

“ऐसी कोई बात नहीं है, मुझे मेरे परिवार वाले बहुत स्नेह और दुलार से रखते हैं. मैं परिवार में हमेशा खुश रहता हूं, मेरे जीवन में न तो अभी तक कोई लड़की आई है, जिस ने मेरा दिल तोड़ा हो. मगर मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही है कि तुम ऐसे फिजूल से प्रश्न मुझ से क्यों पूछ रही हो?” विशाल ने कहा.

देखो विशाल, तुम मेरे परफैक्ट मैच हो. देखो, जरा मेरी बातों को ध्यान से सुनो और समझने का प्रयास करो. तुम सुन रहे हो न मेरी बात?” नित्या ने कहा.

हांहां, मैं सब कुछ अपने कानों से आप की बातें सुन रहा हूं. मगर तुम्हारी बातें मेरी समझ में पता नहीं क्यों नहीं आ रही हैं? जरा विस्तार से बताओ आखिर तुम चाहती क्या हो मुझ से?” विशाल ने भी अपने दिल की बात साफसाफ लफ्जों में कह दी.

देखिए विशालजी, मेरा बचपन से बस एक सपना था कि मुझे जब कोई मेरी सोच जैसा आइडियल नौजवान मिलेगा, जो हर गुण संपन्न हो, साहसी हो, शरीफ हो, नारी का दिल से सम्मान करता हो, जिस का अभी तक किसी युवती से प्यार न हुआ हो, वही मेरा परफैक्ट होगा. इतनी कोशिशों के बाद जब मैं ने तुम्हें देखा तो तुम से मुझे सचमुच प्यार सा हो गया. यदि तुम अपने दिल से मुझे स्वीकार करते हो तो मैं तुम्हारे मन मंदिर में हमेशा के लिए बस जाना चाहती हूं.” नित्या ने अपने दिल की बात अपनी जुबां से कह ही डाली.

जीवन भर साथ निभाने के किए वादे

विशाल ने जब यह बात सुनी तो वह मन ही मन बहुत खुश हो गया था. मगर वह भी अपने दिल की बात साफ साफ बता देना चाहता भी था.

देखो नित्या, यह मामला अभी क्षणिक प्रेम का नहीं, जब हम किसी से प्यार करते हैं तो अपने दिल से करते हैं. कहीं तुम मुझे बीच मंझधार में छोड़ गई तो फिर मैं टूट सा जाऊंगा, इसलिए अपना फैसला करने से पहले अपने दिल की इजाजत ले लो. मुझे जीवन में प्यार करना पसंद है पर हमेशा हमेशा के लिए जुदाई और बेवफाई मैं कभी भी सह न पाऊंगा.” विशाल ने कहा.

विशाल, मैं हमेशा हमेशा के लिए तुम्हारी ही रहूंगी.” यह कहते हुए नित्या ने जब अपनी बाहें फैलाई तो विशाल ने उसे आगे बढ़ कर अपने सीने से लगा लिया था. उस के बाद उन दोनों की प्रेम कहानी जो शुरू हुई तो वह पूरे कालेज और पूरे इलाके में एक मिसाल बन गई थी.

उन दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा था. विशाल अपनी प्रेमिका नित्या को उस के जन्मदिन पर अच्छेअच्छे उपहार देता था. बदले में नित्या भी उस की हर ख्वाहिश का ध्यान रखती थी. दोनों एकदूसरे के पूरक से बनते जा रहे थे.

दोनों ने पढ़ाई के बाद एकदूसरे से शादी करने का वादा भी कर लिया था. उन दोनों का यह प्रेम प्रसंग करीब करीब पूरे डेढ़ साल तक चलता रहा, इस दौरान नित्या बीटीसी द्वितीय वर्ष में आ गई थी तो विशाल भी बीए द्वितीय वर्ष में पहुंच चुका था. दोनों का बस एक ही मकसद था कि जल्द से जल्द दोनों की पढ़ाई पूरी हो जिस से वह सदासदा के लिए कर एकदूसरे के बन जाएं.

एक दिन विशाल ने अपने दिल की बात अपने बड़े भाई अनिल को बताते हुए कहा, भैया, मैं एक लड़की से प्यार करने लगा है, उसी से शादी करना चाहता हूं.”

“देख विशाल, अभी तुम छोटे हो. देखो भाई, अभी तो तुम्हारे दोनों बड़े भाइयों की भी शादी नहीं हुई है. तुम्हारा नंबर तो सब से आखिर में है. इसलिए प्रेम के बजाय अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. अच्छी नौकरी पाने की कोशिश करो तो हम तुम्हारा विवाह वहीं करवा देंगे, जहां तुम चाहते हो.” अनिल ने उसे समझाते हुए कहा.

यह बात सुन कर विशाल भी समझ गया कि अभी जल्दबाजी करनी उचित भी नहीं है. इसलिए वह अपनी पढ़ाई और करिअर पर फोकस करने लगा था, मगर नित्या से उस का मिलनाजुलना व प्यार बिलकुल भी कम नहीं हुआ था.

कैसे हुईं 9 दिन में 3 बहनें गायब – भाग 2

बहनों को लापता हुए डेढ़ महीने का समय हो गया था. भाई सलमान अहमद डेढ़ महीने से अपनी छोटी बहनों की तलाश में लगा था. इस दौरान वह अच्छी तरह से रात में सोया भी नहीं. हर समय बहनों की चिंता उसे सताती रहती थी. पता नहीं बहनें किन हालात में होंगी. उस के लिए उस की बहनें ही सब कुछ थीं. वह पिता के साथ शासन-प्रशासन से यही गुहार लगा रहा था कि उस की बहनों को ढंूढने की काररवाई की जाए, नहीं तो वह कोई गलत कदम उठा लेगा.

रोरो कर मां की सूज चुकी थीं आंखें

9 दिन में अपनी तीनों बेटियों के इस तरह लापता हो जाने से मां आहत थी. बोली, “हम अपनी बड़ी बेटी निशा के लिए लडक़ा देख रहे थे. हमें जरा सा भी एहसास नहीं था कि हमारे साथ कुछ ऐसा भी हो जाएगा.”

बेटियों को याद कर के मां की आंखों से आंसूू बहने लगते. वह रोतेरोते बेहोश हो जाती.

तीनों बेटियों के लापता हुए डेढ़ महीना बीत गया था. बेटियों का नाम ले कर उन्हें बारबार पुकारतीं और कहती कि अपनी बेटियों के बिना वह मर जाएगी. कहती अपहत्र्ता उन्हें तड़पा रहे होंगे, मार डालेंगे. इतने दिन हो गए पुलिस भी कुछ नहीं कर पा रही है. हम गरीब हैं, पता नहीं हमें न्याय कब मिलेगा? उसे इस बात का भी डर सता रहा था कि बेटियों के साथ कोई अनहोनी न हो जाए.

एसपी विनोद कुमार ने यही भरोसा दिया कि पुलिस अपराधियों तक पहुंचने की पूरी कोशिश में लगी हुई है. रम्पुरा की एक लडक़ी की लोकेशन पंजाब में मिली थी. पहले पिता व बाद में पुलिस भी वहां गई थी. अब पुलिस की एक स्पैशल टीम को वहां भेजा गया है. उन्होंने जानकारी दी कि अपराधियों को पकडऩे के लिए सर्विलांस और स्वाट टीमों को भी तैनात किया गया है. लड़कियों को जल्द से जल्द बरामद कर लिया जाएगा.

पूरा परिवार आ गया दहशत में

तीनों बेटियों के इस तरह लापता हो जाने से शमशाद का पूरा परिवार दहशत में आ गया. शमशाद ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि पुलिस किडनैप हुई तीनों बेटियों को बरामद करने में गंभीरता नहीं दिखा रही है.

9 जनवरी को बेटी से जब बात हुई तो बेटी ने डरी हुई आवाज में कहा, “पापा, अब मैं वापस नहीं आ पाऊंगी.”

फोन पर वे लोग पीछे से बेटी को धमका रहे थे और उस से अपने मनमुताबिक कहलवा रहे थे. पुलिस ने उस मोबाइल की लोकेशन ट्रैक की. तब 10 जनवरी को पुलिस के साथ पंजाब के लिए निकले. रास्ते में एक स्थान पर पुलिस रात में रुकी. दूसरे दिन जब पुलिस आरोपी के घर पहुंची तो घर पर ताला लटका हुआ था. हम लोगों को दूसरी बार खाली हाथ आना पड़ा. पुलिस को गाड़ी से ले जाने और भागदौड़ में काफी खर्चा भी हो गया. बेटियों की तलाश में जो कुछ धन उस के पास था, सब खर्च हो गया, अब सब्जी खरीदने लायक पैसे भी नहीं बचे थे.

शमशाद को अपनी बेटियों की चिंता सता रही थी कि वे किन हालात में हैं. एकदूसरे के साथ भी हैं या नहीं. सब से छोटी बेटी मनतारा से बात हो गई थी, लेकिन बाकी 2 बेटियों की कोई जानकारी नहीं मिली थी. वे पंजाब में ही हैं या किसी अन्य जगह. पता नहीं मनतारा अपनी 2 बड़ी बहनों के गायब होने की बात जानती है या नहीं. परिजन अब पूरी तरह पुलिस के भरोसे ही थे. पुलिस ही उन्हें उन की तीनों बेटियां वापस दिला सकती थी.

पुलिस सरगरमी से तलाश में जुटी

परिवार अपनी तीनों गायब हुई बेटियों की तलाश में दिनरात एक कर रहा था. वहीं उन की बरामदगी के लिए पुलिस भी अपने स्तर से शमशाद की बड़ी बेटी निशा व उस के साथियों का नंबर ट्रैस कर रही थी. इसी दौरान पुलिस को आरोपी के मोबाइल की लोकेशन पंजाब की मिली. पुलिस टीम ने बिना देर किए दबिश दे कर 20 वर्षीय आरोपी भारत निवासी गोशाला वाली गली, टिस्बी साहेब रोड, मुक्तसर, पंजाब को हिरासत में ले लिया. उस के कब्जे से सब से छोटी बेटी मनतारा को 4 फरवरी, 2023 को बरामद कर लिया.

मनतारा को ले कर कुर्रा थाना पुलिस मैनपुरी आई. यहां मनतारा का मैडिकल कराया गया. तब पता चला कि मनतारा गर्भवती है. पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया. न्यायालय ने नाबालिग मनतारा को परिजनों की सुपुर्दगी में दे दिया.

रहस्यमय तरीके से गायब हुई बहनों के संबंध में बरामद सब से छोटी बहन मनतारा ने पुलिस को जो बताया, उसे सुन कर पुलिस सकते में आ गई. इस मामले में मनतारा ने सनसनीखेज खुलासा कर सभी को चौंका दिया.

बड़ी बेटी निशा ने ही रची थी साजिश

सब से छोटी बेटी 14 वर्षीय मनतारा ने बताया, “हमारे परिवार की हालत बहुत खराब थी. हम लोगों की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती थीं, न हम लोग पढ़ पा रहे थे न ढंग से जी पा रहे थे. इस वास्ते से हम लोग परेशान रहते थे. हम तीनों बहनें अकसर इस पर बात किया करते थे. मुझे याद है कि 18 दिसंबर, 2022 को मैं अपनी बड़ी बहन निशा के साथ घर से बाहर गई हुई थी.

“दीदी से मिलने वहां पर कोई राहुल नाम का लडक़ा आया था. शायद दीदी उस को पहले से जानती थीं. उस ने हम लोगों को वहां चाय पिलाई. फिर हम लोगों ने गोलगप्पे भी खाए. इस के बाद वह लडक़ा हम लोगों को सुंदर सुंदर कपड़े अपने मोबाइल में दिखाने लगा. उस का मोबाइल भी बहुत अच्छा था. उस ने अपने मोबाइल से मेरी फोटो भी खींची थी. उस ने मुझ से पूछा कि क्या तुम ये सब लेना चाहती हो? इस पर मनतारा ने हां बोल दिया.

“उस के बाद राहुल हंसने लगा. फिर उस ने मिठाई दिलाई और कुछ रुपए भी दिए. फिर मैं दीदी के साथ घर वापस आ गई. दीदी ने घर पर ये बात किसी को बताने से मना कर दिया था. उस के बाद दूसरे दिन फिर से दीदी मुझे राहुल से मिलवाने ले गई. उस दिन वह बाइक से आया था. मैं पहली बार बाइक पर बैठ कर घूमी थी. बहुत मजा आया था.”

दिल्ली में जौब दिलाने की बात कही

मनतारा ने आगे बताया कि उस रात दीदी ने मुझ से कहा कि हम लोगों के घर में बहुत परेशानी रहती है. राहुल मेरा दोस्त है. ये हम लोगों को दिल्ली में जौब दिला देगा. ऐसे हम लोग अपने परिवार की सहायता कर पाएंगे. जौब लग जाएगी, उस के बाद घर में सब को ये बात बता देंगे. घरवालों को भी दिल्ली बुला लेंगे.

निशा की बात मनतारा को बहुत अच्छी लगी. उसे लगा कि वह कमा कर घर के दुख दूर कर देगी. फिर बड़ी बहन तो वहां उस के साथ रहेगी ही. इसलिए उस ने निशा को तुरंत ही दिल्ली साथ चलने के लिए हां बोल दिया. उस के बाद निशा ने उस से कपड़े का बैग पैक करने के लिए कहा. निशा ने कहा कि हम लोग रात में चुपचाप घर से निकल जाएंगे, फिर दिल्ली पहुंच कर जौब लगते ही घर में अब्बा, अम्मी और भाई सब को बता देंगे.

21 दिसंबर, 2022 की आधी रात को जब सभी घर के सदस्य गहरी नींद में थे. मनतारा बड़ी बहन निशा के साथ घर से निकल गई. घर से थोड़ी दूर पर उन्हें राहुल मिल गया, वह बाइक से उन्हें स्टेशन ले गया. वहां पर कोई भारत नाम का युवक उन का इंतजार कर रहा था.

शादी के नाम पर ऐसे होती है ठगी – भाग 2

11 दिसंबर, 2013 को राजीव ने अनुष्का को फोन कर के कहा, ‘‘अनुष्का, मेरे साथ एक वाकया हो गया है. कल रात बदमाशों से हुई मुठभेड़ के दौरान मेरे पैर में गोली लग गई है. इस के अलावा मेरे कूल्हे की हड्डी में भी फ्रैक्चर हो गया है. इस समय मैं मिजोरम के एक प्राइवेट अस्पताल में हूं.’’

यह खबर सुनते ही अनुष्का घबरा गई. वह फोन पर ही इस घटना पर दुख जताने लगी. तभी राजीव बोला, ‘‘अनुष्का, तुम मेरी चिंता मत करो. जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा. लेकिन तुम्हें तो मालूम ही है कि कल मेरा एटीएम कार्ड कहीं गिर गया था. यहां अस्पताल में कुछ पैसों की जरूरत है.

यदि संभव हो सके तो कुछ पैसे औनलाइन ट्रांसफर कर दो. ठीक होने के बाद मुझे विभाग से सारा पैसा मिल जाएगा, तब मैं तुम्हारे पैसे लौटा दूंगा. मैं अपने बौडीगार्ड का एकाउंट नंबर मैसेज कर रहा हूं. उसी में डाल देना. बौडीगार्ड बैंक से पैसे ला कर अस्पताल में जमा करा देगा.’’

कुछ ही देर बाद अनुष्का के फोन पर राजीव द्वारा भेजा गया मैसेज मिला. उस ने मैसेज में बैंक का खाता नंबर भेजा था. अनुष्का ने 12 दिसंबर 2013 को राजीव के भेजे गए कार्पोरेशन बैंक के खाता नंबर 124800101003359 में 75 हजार रुपए औनलाइन ट्रांसफर कर दिए.

अनुष्का कामना करने लगी कि राजीव जल्द ठीक हो जाए. चूंकि राजीव उस का होने वाला पति था इसलिए उस का ध्यान उस की तरफ ही लगा हुआ था. वह दिन में कईकई बार फोन कर के उस का हालचाल मालूम करती रहती थी.

19 दिसंबर, 2013 को राजीव ने अनुष्का को फोन कर के कहा कि उस की हालत ठीक न होने की वजह से उसे चेन्नई के अपोलो अस्पताल ले जाया जा रहा है. वहां उस के औपरेशन वगैरह पर मोटा पैसा खर्च होने की उम्मीद है. उस ने उस से और पैसे भेजने को कहा.

अनुष्का नहीं चाहती थी कि राजीव को कुछ हो जाए, इसलिए उस ने उसी दिन उस के द्वारा भेजे गए खाता नंबर में सवा 4 लाख रुपए जमा करा दिए. 13 दिसंबर जो शादी की तारीख मुकर्रर की गई थी, वह अचानक आई विपदा की वजह से निकल गई. धीरेधीरे 2013 बीत कर नया साल 2014 भी आ गया. अनुष्का का मन कर रहा था कि अस्पताल जा कर वह राजीव को देख आए लेकिन बिजनैस और अन्य वजहों से वह चेन्नई नहीं जा सकी. वह फोन पर जरूर उस के संपर्क में रही.

अनुष्का ने राजीव से कह दिया था कि वह इलाज की चिंता न करे. जितना भी संभव हो सकेगा वह उस की मदद करेगी. एक दिन राजीव ने उस से कहा, ‘‘डाक्टरों ने बताया है कि इलाज लंबा चलेगा, जिस में पैसों की भी जरूरत पड़ेगी. मेरे ठीक होने तक तुम जरूरत के मुताबिक पैसे देती रहना. ठीक होने पर मैं तुम्हारे सारे पैसे वापस कर दूंगा.’’

‘‘आप पैसों की चिंता न करें, बस अपना खयाल रखें.’’ अनुष्का बोली.

‘‘अनुष्का मेरे एक दोस्त हैं अजय सिंह यादव जो यहीं पर डीआईजी हैं. मैं उन का आईसीआईसीआई बैंक का खाता नंबर एसएमएस कर रहा हूं. तुम उस में भी पैसे भेज सकती हो. पैसे भेजने के बाद तुम मुझे फोन जरूर कर देना.’’ राजीव ने बताया.

इस तरह 12 दिसंबर, 2013 से 7 फरवरी, 2014 तक अनुष्का अलगअलग बैंक खातों में राजीव यादव के साढ़े 24 लाख रुपए भेज चुकी थी. इसी बीच राजीव ने उसे बताया कि उस का ब्लड प्रेशर लगातार बढ़ रहा है और कूल्हे का औपरेशन करने के लिए उसे चेन्नई से हैदराबाद के अपोलो अस्पताल भेजा जा रहा है.

राजीव की हालत दिनप्रतिदिन बिगड़ने की बात सुन कर अनुष्का को और ज्यादा चिंता होने लगी. उस ने राजीव को अस्पताल जा कर देखने का प्रोग्राम बना लिया. 21 फरवरी, 2014 को वह हैदराबाद के अपोलो अस्पताल पहुंच गई. अस्पताल पहुंचने पर उसे जो सूचना मिली, उसे सुन कर उस के होश ही उड़ गए.

अस्पताल से उसे जानकारी मिली कि राजीव यादव नाम का कोई पुलिस अधिकारी अस्पताल में भरती ही नहीं है. जबकि राजीव ने उसे उसी अस्पताल में भरती होने की बात कही थी.

जब वह इस अस्पताल में नहीं है तो कहां गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे किसी और अस्पताल भेज दिया हो? यह सोच कर उस ने उसी समय राजीव को फोन मिलाया. उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. कई बार फोन मिलाने के बाद भी फोन स्विच्ड औफ मिलता रहा तो निराश हो कर वह कानपुर लौट आई.

घर लौटने के बाद उस ने राजीव को फिर से फोन मिलाया. इस बार फोन मिलने पर बात हुई तो राजीव ने अपनी सफाई में कहा कि सुरक्षा कारणों से वह अस्पताल में दूसरे नाम पर भरती हुआ है.

राजीव ने उस से पैसों की और डिमांड की तो अनुष्का ने उसे अब पैसे न होने का बहाना बना दिया. अनुष्का ने जब उस से पूछा कि वह अस्पताल में किस नाम से भरती है तो उस ने वह नाम नहीं बताया बल्कि उस ने फोन फिर से स्विच्ड औफ कर लिया.

इस से अनुष्का को राजीव की बातों पर शक होने लगा था. उस ने राजीव को आईसीआईसीआई, ओरियंटल बैंक औफ कौमर्स और कार्पोरेशन बैंक के जिन खातों में पैसे भेजे थे. वह अपने स्तर से यह पता लगाने में जुट गई कि यह खाते किन नामों पर हैं.

उसे पता चला कि आईसीआईसीआई बैंक और ओरियंटल बैंक औफ कौमर्स के खाते अजय सिंह यादव के थे, जो ग्रेटर कैलाश पार्ट-2, नई दिल्ली का रहने वाला था जबकि कार्पोरेशन बैंक का खाता अमित चौहान का निकला जो नोएडा के छलेरा गांव का रहने वाला था. जिस वोडाफोन मोबाइल नंबर से राजीव यादव बात करता था वह भी अमित चौहान के नाम पर लिया गया था.

इसी बीच 26 फरवरी, 2014 को अनुष्का को राजीव यादव ने फोन कर के बताया कि वह अस्पताल से डिस्चार्ज हो रहा है. डिस्चार्ज होने के कुछ दिनों बाद उसे आईएएस एकेडमी मसूरी भेजा जाएगा. वह वहां कुछ दिनों इंस्ट्रक्टर के रूप में काम करेगा.

राजीव ने अस्पताल का बिल चुकाने के लिए अनुष्का से कुछ पैसे और भेजने को कहा. चूंकि अनुष्का को राजीव पर शक हो गया था इसलिए उस ने उस की बात को फोन में रिकौर्ड करना शुरू कर दिया था. अपनी मजबूरी बताते हुए उस ने उसे और पैसे देने में असमर्थता जता दी.

और पैसे न मिलने की बात सुन कर राजीव यादव ने फोन फिर से स्विच्ड औफ कर लिया. इस के बाद वह फोन औन नहीं हुआ. शादी के जाल में फंस कर अनुष्का राजीव को साढ़े 24 लाख रुपए दे चुकी थी. और पैसे न मिलने की बात पर जिस तरह राजीव यादव ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर लिया था, उस से अनुष्का को लगा कि उस के साथ कोई बड़ा फ्रौड हुआ है.

अपने स्तर से जानकारी पाने के लिए वह दिल्ली के ग्रेटर कैलाश पार्ट-2 में उस पते पर गई जहां वह रहता था, जिस के खातों में उस ने मोटी रकम ट्रांसफर की थी. राजीव ने अजय यादव को मिजोरम का डीआईजी बताया. लेकिन पड़ोसियों से बात करने पर पता चला कि वहां कोई पुलिस अधिकारी नहीं रहता.

चाहत का कहर : माशूका की खातिर – भाग 1

मैनपुरी के मोहल्ला हिंदपुरम की रहने वाली कुसुमा पूरे मोहल्ले की भाभी थी. ज्यादातर लड़के उस  की गदराई जवानी के दीवाने थे. वे उस के घर के चक्कर लगाते रहते थे. कुसुमा घर पर 2 बच्चों के साथ रहती थी, जबकि उस का पति मुकेश दिल्ली में रहता था. वह 2-3 महीने में 1-2 दिनों के लिए ही घर आता था. पति से दूर रहना कुसुमा को अच्छा नहीं लगता था. वह पति के साथ दिल्ली में रहना चाहती थी.

लेकिन मुकेश की इतनी तनख्वाह नहीं थी कि वह बीवीबच्चों को साथ रख सकता. वह 2-3 महीने में 1-2 दिनों के लिए पत्नी और बच्चों से मिलने घर आ जाता था. कुसुमा जवान थी. उस की भी कुछ हसरतें थीं. लेकिन मुकेश उस तरफ ध्यान नहीं देता था. नतीजतन कुसुमा का झुकाव मोहल्ले के लड़कों की ओर होने लगा.

उन्हीं लड़कों में एक रामू था, जो कुसुमा के घर से तीसरे नंबर के मकान में रहता था. रामू के पिता फूल सिंह की मौत हो चुकी थी. उस के 4 भाई और 2 बहनें थीं. पिता की मौत के बाद मां शांति ने जैसेतैसे घरपरिवार संभाला था. 19 साल का रामू कुसुमा का ऐसा दीवाना हुआ था कि जब देखो, तब उस के घर के चक्कर लगाता रहता था.

शांति को जब इस बात का पता चला तो उस ने रामू को समझाया, ‘‘बेटा, कुसुमा अच्छी औरत नहीं है, इसलिए उस के यहां ज्यादा आनाजाना ठीक नहीं है.’’

मगर रामू कुसुमा के आकर्षण में इस कदर बंधा था कि उसे उस के अलावा कुछ अच्छा ही नहीं लगता था. इसीलिए उस ने मां की बात एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी.

कुसुमा चालू किस्म की औरत थी. रामू उम्र के उस पड़ाव पर था, जहां से फिसलने में देर नहीं लगती. कुसुमा और रामू की जरूरत एक ही थी, इसलिए उन के बीच नजदीकियां और अपनापन बढ़ने लगा. एक शाम कुसुमा के दरवाजे पर दस्तक हुई तो उस ने दरवाजा खोला. सामने रामू खड़ा था.

उसे देखते ही वह चौंक कर बोली, ‘‘रामू…तुम. आओ, अंदर आ जाओ.’’

रामू अंदर आ गया. उस के हाथ में एक पैकेट था. कुसुमा रसोई में जा कर चाय बना लाई. रामू चाय पीने लगा तो कुसुमा ने कहा, ‘‘पैकेट में क्या है?’’

‘‘खुद ही देख लो.’’ रामू ने शरमाते हुए कहा.

कुसुमा ने पैकेट खोला तो उस में साड़ी दिखी. वह बोली, ‘‘रामू, साड़ी बहुत अच्छी है. अपनी मां के लिए लाए हो क्या?’’

‘‘तुम भी भाभी, कैसी बातें करती हो? क्या मैं तुम्हारे लिए एक साड़ी भी नहीं ला सकता? मुझे दुकान पर पसंद आ गई तो मैं ने तुहारे लिए खरीद ली. तुम पहनोगी न?’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. जब तुम इतने प्यार से लाए हो तो जरूर पहनूंगी. लो अभी पहन कर दिखाती हूं.’’ कह कर कुसुमा साड़ी ले कर अंदर चली गई. रामू इस बात से खुश हो रहा था कि कुसुमा ने उस के द्वारा दी गई पहली चीज स्वीकार कर ली. कुछ ही देर में कुसुमा वह साड़ी पहन कर आई तो रामू उसे देखते हुए बोला, ‘‘भाभी इस साड़ी में तुम बहुत ही खूबसूरत लग रही हो. इसे तुम मेरे प्यार का पहला तोहफा समझो.’’

‘‘प्यार का तोहफा? यह तुम क्या कह रहे हो?’’ कुसुमा बोली.

‘‘हां भाभी, सचमुच रातदिन तुम मेरे जेहन में बसी रहती हो. जब मैं काम पर होता हूं, तब भी तुम्हारे ही बारे में सोचता रहता हूं.’’

चाहती उसे कुसुमा भी थी, लेकिन वह इजहार के लिए रामू की तरह बेचैन नहीं थी. इसलिए रामू की बातें सुन कर कुछ पल के लिए वह चुपचाप उसे देखती रही. रामू का मन कर रहा था कि वह कुसुमा को बांहों में भर कर अपनी मोहब्बत का इजहार कर दे, लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. तभी कुसुमा ने रामू के पास आ कर रामू की बातों को टटोलते हुए कहा, ‘‘क्या तुम सचमुच मुझ से प्यार करते हो?’’

‘‘हां, करता हूं. चाहो तो मेरे दिल की आवाज खुद सुन लो.’’ रामू चहक कर बोला.

‘‘मुझे छोड़ कर भाग तो नहीं जाओगे?’’

‘‘कभी नहीं. अपनी जान दे सकता हूं, लेकिन तुम्हें छोड़ नहीं सकता. यह मेरा वादा है.’’

‘‘तो ठीक है, आज रात को आ जाना. फुरसत में बातें करेंगे. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ कुसुमा ने कहा.

कुसुमा के इस प्रस्ताव से रामू का दिल खुशी से उछल पड़ा. वह रात को आने का वादा कर के चला गया. कुसुमा के घर से जाने के बाद रामू का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. वह बस यही सोच रहा था कि जल्द से जल्द दिन ढल कर अंधेरा हो जाए, जिस से वह कुसुमा के साथ मौजमस्ती करे.

कहते हैं, इंतजार के पल लंबे हो जाते हैं. यही हाल राजू का भी हो रहा था. वह अंधेरा होने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था. खैर, रोजाना की तरह उस दिन भी शाम हुई, लेकिन वह दिन रामू के लिए बहुत बड़ा हो गया था.

शाम का खाना खाने के बाद रामू कुछ देर तक इधरउधर घूमता रहा. उस के बाद मौका देख कर कुसुमा के घर में घुस गया. कुसुमा ने खाना खिला कर बच्चों को पहले ही सुला दिया था. जैसे ही रामू ने उस के दरवाजे पर दस्तक दी, कुसुमा ने दरवाजा खोल दिया. रामू को देख कर मुसकराते हुए बोली, ‘‘टाइम के बड़े पाबंद हो. अंदर आ जाओ.’’

‘‘भाभी हम वादा कर के मुकरने वालों में में नहीं हैं.’’ रामू ने अंदर आते हुए कहा.

कुसुमा ने कुंडी बंद कर दी. रामू उस के बेड पर जा कर बैठ गया. कुसुमा उस के पास बैठ गई और उस का हाथ दोनों हाथों में ले कर बोली, ‘‘रामू, अब तुम मुझे भाभी नहीं कहोगे. आज से तुम मेरा नाम ले पुकारोगे.’’

किसी महिला ने रामू का हाथ पहली बार थामा था. इसलिए उस का शरीर सिहर उठा. दोनों के बीच अब किसी तरह की रोकटोक नहीं थी, इसलिए रामू ने कुसुमा के गालों पर होंठ रखते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज से तुम्हें जो अच्छा लगेगा, वही कहूंगा.’’

इस के बाद दोनों एकदूसरे के बदन से खेलने लगे. रामू ने पहली बार इस सुख का अनुभव किया था, इसलिए उसे बहुत अच्छा लगा. लेकिन घर पहुंच कर रामू को लगा कि कुसुमा के साथ संबंध बना कर उस ने अच्छा नहीं किया. अपराधबोध की वजह से उस ने कुसुमा के घर की ओर जाना ही बंद कर दिया. शायद रामू यह नहीं जानता था कि जिस दलदल में उस ने कदम रख दिया है, वहां से निकलना आसान नहीं है.

3-4 दिनों बाद कुसुमा ने ही रामू को फोन किया, ‘‘रामू, कई दिन हो गए तुम दिखाई नहीं दिए, क्या कहीं बाहर चले गए हो क्या?’’

‘‘नहीं, मैं तो घर में ही हूं.’’

‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘हां.’’

‘‘बातें तो तुम बड़ी लंबीचौड़ी कर रहे थे. कहां गई तुम्हारी वह मर्दानगी? तुम इसी समय आ जाओ, तुम से एक जरूरी बात करनी है.

न चाहते हुए भी रामू कुसुमा के घर पहुंच गया. और फिर वही सब हुआ, जो कुसुमा चाहती थी. इस के बाद कुसुमा का जब भी मन होता, रामू को फोन कर के बुला लेती और अपने मन की करती. इस तरह रामू उस के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया. रामू दिन में तो घर से गायब रहता ही था, कुसुमा के पास आनेजाने की वजह से रात में भी गायब रहने लगा. शांति ने जब बेटे के घर से गायब रहने की वजह का पता किया तो उन्हें पता चलते देर नहीं लगी कि उस का बेटा कुसुमा के जाल में फंस गया है.

प्यार की वो आखिरी रात – भाग 1

कानपुर शहर का नवाबगंज मोहल्ला कई मायनों में अपनी पहचान बनाए हुए है. एक तो यह पुराना कानपुर के नाम से जाना जाता है. दूसरे गंगा नदी पर बना गंगा बैराज अपनी अद्भुत छटा बिखेरता है. अटल घाट पर बैठ कर लोग कलकल बहती गंगा की लहरों का लुत्फ उठाते हैं. नौका विहार का आनंद भी लेते हैं.

सैकड़ों की संख्या में यहां लोग रोजाना आते हैं. नवाबगंज का जागेश्वर मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है. यहां हर साल सावन के अंितम सोमवार को दंगल का आयोजन किया जाता है, जिस में पुरुष और महिला पहलवान भाग लेते हैं. दंगल को देखने भारी भीड़ उमड़ती है.

इसी जागेश्वर मंदिर के ठीक सामने ओम प्रकाश सैनी अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सरला के अलावा 3 बेटियां थीं. ओमप्रकाश सैनी फूलों का व्यवसाय करते थे. उन की पत्नी सरला जागेश्वर मंदिर परिसर में फूल बेचने का काम करती थी. पतिपत्नी मिल कर इतना कमा लेते थे, जिस से परिवार का खर्च मजे से चलता था. बड़ी बेटी कुसुम जवान हुई तो उन्होंने उस का विवाह संतोष के साथ कर चुके थे.

मंझली बेटी बरखा थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खूबसूरत थी. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस की खूबसूरती में और निखार आ गया था. हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद वह आगे भी पढऩा चाहती थी, लेकिन सरला ने उस की पढ़ाई बंद करा दी और घरेलू काम में लगा दिया. बरखा बनसंवर कर मंदिर परिसर स्थित फूलों की दुकान पर अपनी मां के साथ बैठती तो अनेक युवकों की निगाहें उसे घूरतीं. चंचलचपल बरखा किसी को अपने पास नहीं फटकने देती थी.

बरखा के जवान होने पर वह उस के लिए उचित लडक़े की तलाश में जुट गए. उन्होंने परिचय के साथ बरखा का नाम सैनी समाज के सामूहिक विवाह रजिस्टर में भी दर्ज करा दिया. लंबी भागदौड़ के बाद उन की तलाश कृष्णकांत पर जा कर खत्म हुई.

बरखा ने सुहागरात को ही फेल कर दिया था पति

कृष्णकांत के पिता रामकुमार सैनी कानपुर शहर के यशोदा नगर मोहल्ले में रहते थे. सैनिक चौराहे पर उन का निजी मकान था. वैसे वह मूल निवासी सकरापुर (बिधनू) के थे. वहां उन का पुश्तैनी मकान और कुछ खेती की जमीन है. रामकुमार के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा एक बेटी शिखा तथा बेटा कृष्णकांत था. शिखा की वह शादी कर चुके थे, जबकि कृष्णकांत अभी कुंवारा था. कृष्णकांत इलैक्ट्रिशियन था. वह क्षेत्र की एक दुकान पर काम करता था.

ओमप्रकाश सैनी ने जब कृष्णकांत को देखा तो वह उस के आचारविचार से प्रभावित हुए. अच्छा घरवर देख कर ओमप्रकाश ने अपनी बेटी बरखा का रिश्ता उस के साथ तय कर दिया. फिर 22 दिसंबर, 2009 को बरखा का विवाह कृष्णकांत सैनी के साथ धूमधाम से कर दिया.

शादी के बाद बरखा कृष्णकांत की दुलहन बन कर ससुराल आई तो उस ने अपने बात व्यवहार से पति और सासससुर का दिल जीत लिया. सुंदर व सुशील बहू पा कर जहां सासससुर खुश थे. सब खुश थे, लेकिन बरखा खुश नहीं थी. उस ने जिस सजीले पति को सपने में संजोया था, कृष्णकांत वैसा नहीं था. वह साधारण रंगरूप वाला, दुबलापतला तथा कम बोलने वाला इंसान था. बरखा ने सुहागरात में ही जान लिया था कि उस का पति पौरुषहीन है. उसे सदैव शारीरिक सुख के लिए तड़पना पड़ेगा.

दिन बीतते रहे. लगभग डेढ़ साल बाद बरखा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस के जन्म से घर की खुशियां और बढ़ गईं. मयंक के जन्म से रामकुमार व उन की पत्नी भी गदगद थी. उन्होंने इस खुशी को साझा करने के लिए सैनी समाज के लोगों को भोज कराया.

बरखा को घर में वैसे तो सब सुख था, लेकिन पति सुख से वंचित रहती थी. कृष्णकांत सुबह 9 बजे घर से निकलता, फिर रात 9 बजे ही घर आता. वह कभी शराब के नशे में धुत हो कर घर लौटता तो कभी बेहद थकाहारा. कभी खाना खाता तो कभी बिना खाए ही चारपाई पर पसर जाता. बरखा रात भर करवटें बदलती रहती और गीली लकड़ी की तरह सुलगती रहती. वह हर रात अरमानों को खाक करती और भाग्य को कोसती. इसी तरह समय बीतता रहा.

पति के दोस्त पर जम गई निगाह

कृष्णकांत का एक दोस्त था दीपक गुप्ता. उस के घर से 4 घर छोड़ कर वह रहता था. दीपक के पिता विमल गुप्ता की घर के बाहर पान की दुकान थी. कृष्णकांत भी उस की दुकान पर पान मसाला खाने जाता था. दुकान पर ही कृष्णकांत की उस की दोस्ती दीपक गुप्ता से हुई थी. समय के साथ उन की दोस्ती गहरी हुई तो दीपक का उस के घर आनाजाना शुरू हो गया. दीपक गुप्ता ई रिक्शा चलाता था. उस की कमाई अच्छी थी. वह बनसंवर कर रहता था.

चूंकि दीपक कृष्णकांत का दोस्त था, इसलिए घर के कामों के लिए वह ज्यादातर उसे ही भेजता था. घर के कामों के साथसाथ दीपक बरखा के छोटेमोटे निजी काम भी कर दिया करता था. दीपक बरखा की हमउम्र था. इसी आनेजाने में ही दीपक की नजरें बरखा के गदराए यौवन पर जम गईं.

फिर तो जब भी उसे मौका मिलता, वह बरखा से ऐसा मजाक करता कि वह शर्म से लाल हो उठती. औरतों को मर्दों की नजरें पहचानने में देर नहीं लगती. बरखा ने भी दीपक की नजरों से उस का इरादा भांप लिया था. बरखा प्यासी औरत थी. इसलिए उस ने दीपक की मजाक का कोई विरोध नहीं किया.

बरखा हसीन तितली थी. होंठों पर हमेशा लुभावनी मुसकान सजाए रखना उस का शगल था. उस का मस्त यौवन और उस की कटीली अदाएं दीपक के दिल पर छुरियां चलाती थीं. चूंकि दोस्ती व मोहल्ले के नाते बरखा दीपक की भाभी थी, अत: उन के बीच कुछ ज्यादा ही हंसीमजाक हो जाता था.

बरखा ने जब से घर की जिम्मेदारी संभाली थी, तब से राजकुमार व उन की पत्नी बहू से बेफिक्र हो गए थे. वह घर का भार बहू को सौंप कर अपने पैतृक गांव सकरापुर रहने लगे. वे कभीकभार ही बेटेबहू के पास आते थे, और कुछ दिन रुक कर फिर वापस चले जाते थे. सासससुर के न रहने से बरखा एकदम आजाद हो गई थी. उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

प्रेमिका को गोली मार की खुदकुशी – भाग 1

दोपहर के 2 बजे का समय हो रहा था. आजमगढ़ उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के जमसर गांव में स्थित रौयल स्टार ढावा एंड फैमिली रेस्टोरेंट पर एक युवक अपनी गर्लफ्रैंड को ले कर बाइक से पहुंचा. पिछले दिनों होली का त्यौहार होने के कारण रेस्टोरेंट में स्टाफ भी कम था, इसलिए होटल संचालक मनीष ने युवक को साफसाफ बता दिया था कि स्टाफ कम होने की वजह से आज खाना नहीं मिल सकेगा. इस पर युवक ने 2 चाय व साथ में कुछ खाने का आर्डर दिया. तब तक रेस्टोरेंट के भीतर स्थित केबिन में बैठे वे दोनों बातें करने लगे.

इधर मनीष चाय बनाने के लिए किचन में चला गया. जैसे ही उस ने चाय का पानी और दूध गैस पर चढ़ाया, तभी उसे गोली चलने की एक तेज आवाज सुनाई दी. गोली की आवाज उसी केबिन से आई थी जहां पर युवक और और युवती बैठ कर आपस में बातचीत कर रहे थे. मनीष और रेस्टोरेंट में मौजूद कर्मचारी जब वहां पर पहुंचे युवक और युवती के बीच तेज लड़ाई की आवाजें और छीनाझपटी, आपस में गुत्थमगुत्था हो रही थी. जबकि युवती के सिर से काफी खून भी बह रहा था.

बाथरूम में मारी गोली

युवक ने जब होटल के कर्मचारियों को अपनी ओर आते देखा तो वह दौड़ कर केबिन के शौचालय के अंदर घुस गया और उस ने बाथरूम में घुसते ही शौचालय का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया, तभी एक फायर की आवाज बाथरूम के अंदर से आई.

होटल संचालक मनीष समझ गया कि मामला गंभीर है, इसलिए उस ने इस वारदात की सूचना कोतवाली जीयनपुर के कोतवाल यादवेंद्र पांडेय को फोन द्वारा दे दी. कोतवाल यादवेंद्र पांडेय ने जैसे ही घटना के बारे में सुना तो वह कुछ पुलिसकर्मियों के साथ तुरंत घटनास्थल की ओर चल पड़े. इसी बीच कोतवाल यादवेंद्र पांडेय ने इस वारदात की खबर अपने उच्चाधिकारियों और एफएससल टीम को भी दे दी थी.

कोतवाली जीयनपुर से घटनास्थल की दूरी महज 2 किलोमीटर थी, इसलिए कोतवाल अपनी टीम के साथ वहां थोड़ी देर में ही पहुंच गए थे. कोतवाल यादवेंद्र पांडेय ने घटनास्थल का निरीक्षण कर शौचालय का दरवाजा तुड़वाया. शौचालय के अंदर युवक मृत अवस्था में पड़ा था.

युवक के शव के पास ही वह तमंचा भी पड़ा हुआ था, जिस के द्वारा युवक ने वारदात को अंजाम दिया था. जबकि दूसरी ओर युवती केबिन में अचेत अवस्था में थी. उस के सिर से खून बह रहा था. उसे तुरंत जिला अस्पताल भेज दिया. युवक और युवती के पास मिले मोबाइल फोन में सेव नंबरों में से उन के घर वालों के नंबर खोज कर दोनों के घर वालों पुलिस द्वारा सूचना दी गई.

उसी बीच घटनास्थल पर एसपी (ग्रामीण) राहुल रूसिया भी पहुंच चुके थे. सूचना पा कर दोनों के घर वाले घटनास्थल पर पहुंच चुके थे. मृतक युवक की शिनाख्त 24 वर्षीय विशाल पुत्र शिववचन निवासी जम्मनपुर, आजमगढ़ के रूप में हुई थी. जबकि युवती की पहचान 23 वर्षीय नित्या निवासी चिलबिली दान, चिलबिली, रौनापार आजमगढ़ के रूप में हुई.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर विशाल के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल, आजमगढ़ भेज दिया और रायल स्टार ढाबा ऐंड फैमिली रेस्टोरेंट को सील कर दिया था. पुलिस की प्रारंभिक जांच में पता चला कि युवक और युवती आपस में अच्छे दोस्त थे और दोनों के बीच पिछले करीब डेढ़ साल से प्रेम संबंध थे.

उसी दिन शाम साढ़े 4 बजे घायल युवती नित्या के पिता ने थाना जीयनपुर में एक लिखित तहरीर दे कर विशाल के खिलाफ उन की बेटी को जान से मारने की नीयत से गोली चलाने की रिपोर्ट दर्ज कराई. यह बात 10 मार्च 2023 की है. जिस का मजमून इस प्रकार था-

उन की तहरीर के आधार पर पुलिस ने भादंवि की धारा 307 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. एसपी अनुराग आर्य ने कोतवाल को आदेश दिए कि वह इस प्रकरण की यथाशीघ्र जांच करें.

11 मार्च, 2023 शनिवार को मृतक विशाल के भाई अनिल ने ग्रामीणों के साथ जीयनपुर कोतवाली पहुंच कर रायल ढाबा ऐंड फैमिली रेस्टोरेंट के संचालक पर साजिश का आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की और कहा कि यह रेस्टोरेंट अवैध रूप से चलाया जा रहा था.

पुलिस तहकीकात के बाद इस मामले की जो कहानी निकल कर सामने आई, जो इस प्रकार थी—

खूबसूरती की मिसाल थी नित्या

मृतक विशाल उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के गांव जम्मनपुर, निवासी शिववचन का पुत्र था. उस के परिवार मां के अलावा 2 बड़े भाई थे. विशाल अपने घर में सब से छोटा था. शिववचन कोलकाता में एक रोलिंग मिल में काम करते थे. बड़ा बेटा अनिल एक कालेज में लेक्चरर था, छोटा सुनील ठेकेदारी और खेती का काम करता था.

सब से छोटे विशाल की उम्र 25 वर्ष की हो चुकी थी. वह अपने गांव से 3 किलोमीटर दूरी पर भदौली में स्थित मैना देवी कालेज में बीए की पढ़ाई कर रहा था. इसी कालेज में गांव चिलबिली दानू निवासी नित्या भी बीटीसी की पढ़ाई कर रही थी. नित्या के पिता डिसपेंसरी चलाते थे. नित्या से छोटा एक भाई था, जो स्कूल में पढ़ाई कर रहा था.

नित्या अपने घर की बड़ी लाडली थी, नित्या खूबसूरत व शांत स्वभाव की थी. पतली कमर, सुडौल बदन, लंबी छरहरी, मृगनयनी, एवं गोरे रंग की नित्या बड़ी शांत रहती थी. उस की आवाज में लोच और मधुरता थी. होंठों पर मुस्कान और चेहरे पर सौम्यता थी. समझदार इतनी कि जिस कला या खेल को सीखती, शीघ्र ही निपुण हो जाती थी. पढ़ने में भी वह काफी अच्छी थी. टीचर बनने का एक दिली जुनून था, इसलिए उस ने बीटीसी में प्रवेश लिया था.

विशाल को गाना गाने और एथलेटिक्स का शौक था. कालेज के समारोह में विशाल लगभग हर प्रोग्राम में गीत जरूर गाता था, उस की आवाज में इतनी कशिश थी कि हर कोई उस का बस मुरीद बन कर रह जाता था. लेकिन विशाल में एक बात यह थी कि वह थोड़ा धीर और गंभीर किस्म का इंसान था.

वह न तो किसी से फालतू बात करता था न ही कभी कोई दिखावा करता था. वह जिस बात पर अड़ जाता था, उस बात पर वह किसी भी हद तक जा सकता था. उस का भी अपना एक मकसद था कि जीवन में कभी भी समझौता नहीं करना है, जो चीज अच्छी लगे वह अच्छी जो बात बुरी लगे, उस में वह किसी भी तरह का कंप्रोमाइज करना बिलकुल भी पसंद नहीं करता था.

विशाल के इसी गंभीर स्वभाव के कारण हर कोई उसे अपना दोस्त बनाने के लिए सदा आतुर सा रहता था. चाहे वह युवक हो या युवती, दूसरा विशाल काफा स्मार्ट भी था. दोनों भाई और मातापिता उस की हर जरूरत का विशेष ध्यान भी रखते थे.