दोस्त के प्यार पर डाका – भाग 4

प्रेमिका की याद में घुट रहा था नवीन

नंदिनी भले ही अपने दिल से नवीन की यादें मिटा दी थीं, लेकिन नवीन उसे अभी भी भुला नहीं पाया था. उस के दिल में अब भी नंदिनी के साथ बिताए सुनहरे पल की यादें जवां थी. उस की एकएक सांस पर प्रेमिका का नाम लिखा हुआ था. जब उस की याद आती थी, उस की पलकें भीग जाती थीं. घुटता था वह दिल ही दिल में. आज भी वह इस बात को सोच कर परेशान हो जाता था कि नंदिनी ने किस कुसूर के लिए उसे अपने दिल से निकाल दिया.

तभी तो 2 साल बाद हिम्मत जुटा कर एक दिन नवीन ने नंदिनी को मैसेज किया. सालों बाद आए मैसेज को पढ़ कर वह हैरान रह गई थी. उस ने नवीन के भेजे गए मैसेज का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि उस ने यह बात हरिहर कृष्णा को बता दी.

हरिहर कृष्णा ने जैसे ही सुना कि नवीन ने प्रेमिका को मैसेज किया है, वह सतर्क हो गया और डर भी गया कि सालों से पड़ा परदा नंदिनी के सामने कहीं उठ न जाए. वरना बना बनाया खेल बिगड़ सकता है, उस की सच्चाई जान कर नंदिनी उस से दूर चली जाएगी. वह ऐसा होने नहीं देना चाहता था.

उस ने प्रेमिका को समझाया कि वह उस के किसी भी मैसेज का जवाब नहीं दे. इस के बाद भी अगर वह मैसेज करता है तो कोई और रास्ता निकालना होगा.

उस दिन के बाद से नवीन नंदिनी को मैसेज बराबर भेजने लगा था. उस के बारबार मैसेज आने से वह बुरी तरह परेशान हो गई थी और हरिहर कृष्णा से एकएक बात बताती थी. नवीन के प्यार भरे मैसेज भेजने से वह जलभुन उठता था. उसे इस बात का डर सताने लगा था कि कहीं नंदिनी उस के हाथ से निकल न जाए.

नंदिनी ने नवीन से पीछा छुड़ाने की कोई कारगर युक्ति निकालने की बात कही तो उस ने उसे यकीन दिलाया कि जल्द ही नवीन नाम के कांटे से छुटकारा दिला देगा, इस की वह चिंता न करे.

हरिहर कृष्णा भी यही चाहता था कि नवीन जो उस के प्रेम की राह में कांटा बना हुआ है, उस कांटे को सदा के लिए रास्ते से उखाड़ फेंके. फिर प्रेमिका ने तो फरमान ही जारी कर दिया था तो भला उस के फरमान को वह कैसे पूरा न करता.

शातिर दिमाग वाला हरिहर कृष्णा ने फैसला कर लिया था उसे क्या करना है. उस ने मन ही मन खतरनाक योजना भी बना ली थी. योजना थी नवीन की हत्या. अब इसे यह तय करना था कि नवीन को नेलगोंडा से हैदराबाद कैसे बुलाया जाए. क्योंकि इस ने नवीन की हत्या की पटकथा इसी शहर में लिखी थी यानी उसे यहीं मारने का प्लान बनाया था.

अपनी योजना में उस ने नंदिनी को भी शामिल कर लिया था. उसे इस की हर गतिविधियों की पलपल की जानकारी दी.

दोस्त ने ही नवीन को लगा दिया ठिकाने

सूत्रों के अनुसार, 17 फरवरी 2023 की सुबह हरिहर कृष्णा ने नवीन को फोन किया और धोखे से उसे पुराने दोस्तों के साथ गेट टुगेदर पार्टी के लिए हैदराबाद बुलाया. इस पर नवीन ने अपनी तरफ से हां कह दिया और दोस्त (रूम पार्टनर) प्रदीप से हैदराबाद जाने और हरिहर कृष्णा के साथ पार्टी करने की बात कह कर हैदराबाद के लिए रवाना हो गया.

हरिहर कृष्णा ने जैसे ही सुना कि नवीन आ रहा है, उस ने छोटे आकार के पिट्ठू बैग में एक जोड़ा दस्ताना, नायलौन की रस्सी और फलदार चाकू रख लिया था ताकि मौका मिलते ही उसे रास्ते से हटा देगा.

सुबह 10 बजे के करीब नवीन हैदराबाद बस स्टैंड पहुंचा. वहां बाइक लिए हरिहर कृष्णा पहले से ही उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. बस से नीचे उतरते हुए दोस्त को देख कर हरिहर कृष्णा बुरी तरह जलभुन उठा, लेकिन चेहर ेपर जहरीली मुसकान थिरक रही थी.

दोस्त नवीन को बाइक पर बैठा कर हरिहर कृष्णा रेस्टोरेंट ले गया. वहां दोनों ने छक कर शराब पी. थोड़ी देर बाद शराब ने जब अपना रंग नवीन पर दिखाना शुरू कर दिया तो दिल में भरा गुब्बार फूट गया. उस ने अपनी प्रेमिका के छीनने का आरोप जब हरिहर कृष्णा पर मढ़ दिया तो हरिहर कृष्णा आगबबूला हो उठा और दोनों आपस में भिड़ गए.

एक पल को हरिहर कृष्णा उसे वहीं खत्म कर देने का मन बना लिया, लेकिन वहां भीड़ काफी थी, उसे अपने पकड़े जाने का भय सताने लगा था, इसलिए उस ने चुप रहने में ही भलाई समझी और बड़ी चालाकी से माहौल को दूसरी ओर घुमा दिया था.

फिर हरिहर कृष्णा नवीन को बाइक पर बैठा कर इधरउधर घुमाता रहा ताकि अंधेरा हो जाए. शाम 6 बजे के करीब बाइक ले कर वह अब्दुल्लापुरमेट थानाक्षेत्र के पेड्डा अंबरपेट की घनी झाडिय़ों के पास पहुंचा, जहां चारों ओर सन्नाटा और दूरदूर तक अंधेरा फैला था.

झाडिय़ों के पास उस ने बाइक रोक दी और दोनों पास स्थित रमादेवी पब्लिक स्कूल की ओर बढ़े, जहां पार्टी चलने की बात हरिहर कृष्ण ने बताई. आगेआगे लडख़ड़ाता हुआ नवीन चल रहा था, जबकि हरिहर कृष्णा उस के पीछेपीछे. यही सही मौका था. उस ने धीरे बैग से नायलौन की रस्सी निकाली और नवीन का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. उस के बाद उस ने नफरत से एक लंबी हुंकार भरी.

हरिहर ने दिखा दी नफरत की इंतहा

फिर पिट्ठू बैग से दस्ताना निकाल कर हाथों में पहना और चाकू से उस का गला काट कर सिर धड़ से अलग कर दिया और मोबाइल की टार्च की रोशनी में मोबाइल कैमरे से फोटो खींचा और नंदिनी के वाट्सऐप पर भेज दिया. पुराने प्रेमी का कटा सिर देख कर नंदिनी बहुत खुश हुई.

हरिहर कृष्णा की नफरत की इंतहा यहीं खत्म नहीं हुई थी, उस ने उसी चाकू से नवीन का पेट फाड़ कर दिल बाहर दिया और नफरत व गुस्से से कहा, “ये दिल मेरी नंदिनी के लिए धडक़ता था न?” चाकू से दिल के कई टुकड़े कर डाले.

फिर उस ने कहा, “इन्हीं अंगुलियों से तू मेरी नंदिनी को मैसेज भेजता था न?” फिर उस ने दोनों हाथों की दसों अंगुलियों को काट कर अलग कर दिया.

फिर उस ने कहा, “तू मेरी नंदिनी के साथ शादी कर बच्चे पैदा करना चाहता था न?” उस के बाद उस ने उस के प्राइवेट पार्ट को भी काट कर अलग कर दिया और सबूत के तौर फोटो मोबाइल में उतार कर प्रेमिका के वाट्सऐप पर भेज दिया.

फिर उस की लाश को जला दिया ताकि कोई सबूत न मिले और रूमाल से अपने हाथों आदि पर खून पोंछ कर, चाकू, ग्लव्स वहीं फेंक दिया. उस के बाद वह अपने दोस्त हसन के कमरे पर पहुंचा. तब तक काफी रात हो चुकी थी, उस ने उसे सारी बात बता दी थी.

हरिहर कृष्णा की बात सुन कर वह सन्न रह गया था. फिर वह उस के वाशरूम में नहाया और उस के कपड़े पहने. उसी रात वह शहर छोड़ कर भाग जाना चाहता था तो उस ने नंदिनी से पैसे मांगे तो उस ने अपने मोबाइल से 1500 रुपए उस के अकांउट में ट्रांसफर किए और वह दूसरे शहर को फरार हो गया.

नवीन ने एक चालाकी की थी. हौस्टल से हैदराबाद के लिए निकलते समय उस ने बता दिया था कि अपने दोस्त हरिहर कृष्णा के पास पार्टी में जा रहा है. शाम तक वापस लौट आएगा. जब वह रात तक हौस्टल नहीं लौटा तो रूम पार्टनर प्रदीप ने पूरी बात उस के पिता शंकराय को बता दी थी. इसी वजह से पुलिस को यह केस खोलने में आसानी हुई.

पुलिस ने हरिहर कृष्णा से पूछताछ करने के बाद उस की प्रेमिका नंदिनी और दोस्त हसन को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों आरोपियों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

कथा लिखने पुलिस कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में नंदिनी परिवर्तित नाम है.

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दोस्त के प्यार पर डाका – भाग 3

नंदिनी ने बना ली नवीन से दूरी

हरिहर कृष्णा ने अपना दांव चल दिया था. कान की कच्ची नंदिनी उस की बातों में आ गई थी. वैसे भी नारी यह कब बरदाश्त कर सकती है कि एक म्यान में 2 तलवार रह सके.

हरिहर कृष्णा ने जब से नवीन के खिलाफ उस के कान भरे थे, तब से नंदिनी ने उस से दूरी बना ली. वह न तो उस से बात करती थी और न ही उस की काल रिसीव कर रही थी. अचानक प्रेमिका में आए बदलाव को देख कर नवीन परेशान हो गया था. वह उस से यह जानने की कोशिश करता था कि आखिर उस से ऐसी कौन सी गलती हुई है कि उस ने उस से बातचीत करनी बंद कर दी.

यहां तक कि काल रिसीव करना भी छोड़ दिया था वरना एक घंटी बनते ही झट से उस की काल रिसीव कर लेती थी. नवीन को क्या पता था कि उस की प्रेमिका को अपनी प्रेमिका बनाने के लिए उसी के अजीज यार ने गद्दारी की थी. उसी ने भोलीभाली नंदिनी को उस के खिलाफ भडक़ाया था. बिना सोचेसमझे नंदिनी भी शक के दरिया में रफ्तार से बढ़ गई थी.

इस घटना के महीने भर बाद शाम की छुट्ïटी के बाद एक दिन रास्ते में नवीन ने नंदिनी को रोक लिया, “एक मिनट के लिए नंदिनी, प्लीज मेरी बात सुन लो.” नवीन उस के सामने गिड़गिड़ाया.

“मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनने वाली. और फिर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई जो तुम ने मेरा रास्ता रोका?” गुस्से से नंदिनी तमतमा उठी थी.

“प्लीज नंदिनी, गुस्सा मत होओ,” एक बार फिर उस के सामने नवीन गिड़गिड़ाया, “सिर्फ इतना बता दो कि आखिर मुझ से ऐसी क्या गलती हुई है, जो तुम ने मुंह मोड़ लिया. प्लीज नंदिनी, प्लीज एक बार बता दो.”

“मैं ने कहा न, मुझे तुम से कोई बात नहीं करनी है तो नहीं करनी है. प्लीज मेरा रास्ता छोड़ दो. प्लीज.. प्लीज.. प्लीज… मुझे घर पहुंचना है, मम्मी मेरी राह देख रही होगी.”

इस के बाद नवीन ने प्रेमिका के सामने दोनों हाथ जोड़ कर अपने प्यार की दुहाई दी कि उसे उस की गलती तो एक बार बता दो ताकि जीवन में दोबारा वैसी कोई गलती न हो. वह उस के बिना नहीं जी सकता, उस की जुदाई का गम बरदाश्त नहीं कर सकता. लेकिन नंदिनी ने उस से कुछ नहीं कहा तो नहीं कहा. हार कर नवीन ने उसे छोड़ दिया और वहीं खड़ाखड़ा एकटक उसे तब तक देखता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हुई.

हारे हुए जुआरी की तरह नवीन घर पहुंचा. दिल उस का नंदिनी के लिए सिसकियां भर रहा था, गंगा यमुना की धारा उस की आंखों से छलक रहा था. नंदिनी के वियोग में वह विरह की अग्नि में जल रहा था. आंखों के सामने बारबार नंदिनी का मुसकराता हुआ चेहरा थिरक उठता था.

बस, वह इसी उलझन में जकड़ा रहा कि आखिर उस से कौन सी गलती हुई थी, जो उस ने उसे इतनी बड़ी सजा दी. बहरहाल, क्या हुआ जो उस ने सच नहीं बताया, लेकिन वह भी चुप बैठने वालों में नहीं था. इस बात की सच्चाई पता लगा कर ही रहेगा. इस के बाद दोनों के बीच ब्रेकअप हो गया.

नवीन को छोड़ दोस्त की हो गई नंदिनी

आखिरकार, नवीन ने सच का पता लगा ही लिया था. गद्दार दोस्त हरिहर कृष्णा की सच्चाई जब खुल कर उस के सामने आई तो नवीन आगबबूला हो गया. दुख तो इस बात का था कि उस की प्रेमिका नंदिनी न तो उस की कोई बात सुनने के लिए तैयार थी और न ही उस से मिलना ही चाहती थी.

नवीन सही समय आने के इंतजार में बैठ गया कि एक न एक दिन वह समय आएगा, जब वह हरिहर कृष्णा की कलई उस के सामने खोल कर रख देगा.

शातिर हरिहर कृष्णा अपनी चाल की कामयाबी पर बेहद खुशी महसूस कर रहा था, उस ने अपनी दोगली चाल और दांवपेंच से 2 प्रेमियों को अलग कर दिया था. वह मन ही मन खुश था कि अब नंदिनी को अपना बनाने से कोई रोक नहीं सकता.

नंदिनी के दिल में हरिहर कृष्णा ने नवीन के खिलाफ इतना जहर भर दिया था कि वह उस के नाम से गुस्से की आग में जल उठती थी, ऐसा लगता था नवीन अगर उस के सामने आ जाए तो उस का खून पी जाएगी. हरिहर कृष्णा यही चाहता भी था कि नंदिनी के दिल और दिमाग से उस का पहला प्यार पूरी तरह खाली हो जाए ताकि उस के दिल के कैनवास पर अपने प्यार का मनचाहा रंग भर सके.

भले ही नंदिनी ने अपने दिल और दिमाग से नवीन को निकाल फेंका था, लेकिन जब वह अकेली होती थी तो उस की यादों के बादल और उस के साथ बिताए पल आंखों के सामने उमड़ पड़ते थे. वह उदास हो जाती थी, हरिहर इसी पल का इंतजार करता था ताकि उसे संभालने के बहाने उस के दिल के करीब पहुंच सके और अपने प्यार का मरहम लगा सके.

चतुर खिलाड़ी हरिहर कृष्णा धीरेधीरे नंदिनी के दिल के करीब पहुंचने में कामयाब हो गया. दिल के हरे जख्म को भरने के लिए उस ने सहानुभूति का जो मरहम लगाया था, नंदिनी उस की मुरीद हो गई थी. नंदिनी के दिल पर उस के प्यार का रंग चढऩे लगा था. वह उस के प्यार के रंग में रंगने लगी थी.

नंदिनी और हरिहर कृष्णा दोनों एकदूसरे से टूट कर प्यार करने लगे थे. उस ने नंदिनी के दिल पर अपने प्यार की ऐसी हुकूमत बैठा दी कि उस का दिल हरिहर कृष्णा के अलावा किसी और के बारे में धडक़ने की गुस्ताखी नहीं करता था.

धीरेधीरे 2 साल का समय बीत चुका था नंदिनी को हरिहर कृष्णा का हुए और पहले प्रेमी नवीन से दूरियां बनाए हुए. दोनों ही अपने प्यार की दुनिया में बहुत खुश थे. हरिहर कृष्णा ने जो चाहा था सो पा चुका था.

इधर नवीन ने नंदिनी से ब्रेकअप करने के बाद अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया. इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने नेलगोंडा जिले के महात्मा गांधी इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला ले लिया था, जबकि हरिहर कृष्णा जडीगुड़ा के इंजीनियरिंग कालेज से बी.टेक कर रहा था और नंदिनी हैदराबाद में ही रह कर बीएससी की पढ़ाई कर रही थी.

दोस्त के प्यार पर डाका – भाग 2

22 वर्षीय हरिहर कृष्णा मूलरूप से वेरांगल जिले का रहने वाला था. 3 भाईबहनों में वह सब से बड़ा था. उस के पिता एक बिजनैसमैन थे. बेटे की पढ़ाई पर वह खूब पैसे खर्च कर रहे थे. उन का सपना था कि बेटा पढ़लिख कर इंजीनियर बने तो उन का जीवन सार्थक हो जाए. भले ही उस की पढ़ाई पर ज्यादा खर्च आए, इस की कोई चिंता नहीं. उन का सोचना था कि जब हरिहर का जीवन संवर जाएगा तो बाकी दोनों बच्चों का भी भविष्य बन जाएगा.

नवीन और हरिहर कृष्णा एक ही कालेज और एक ही कक्षा में पढ़ते थे. इन दोनों के साथ ही हैदराबाद के हस्तिनापुरम की रहने वाली नंदिनी भी पढ़ती थी.

नंदिनी इकहरी बदन की दुबलीपतली और छरहरी लडक़ी थी. उस में कोई खास आकर्षण भी नहीं था, लेकिन न जाने क्यों नवीन उस की ओर चुंबक की तरह खिंचता चला जा रहा था. शायद नवीन को उस से प्यार हो गया था. तभी तो उस ने अपने दिल का दरवाजा नंदिनी के लिए खोल दिया था.

उस के दीदार के लिए हर घड़ी पलकें बिछाए रहता था. ऐसा नहीं था यह एकतरफा प्यार हो, नंदिनी भी नवीन को बेहद चाहती थी. अपने कोरे दिल पर अपने सपनों के राजकुमार के रूप में नवीन का नाम लिख दिया था. यह बात घटना से करीब 3 साल पहले 2020 की थी.

नंदिनी नवीन का पहला प्यार थी और नवीन भी उस का पहला प्यार. इन दोनों का प्यार ठीक उसी तरह था जैसे बाती बिन दीया नहीं, चांदनी बिन चांद नहीं और तपिश बिन सूरज नहीं. बेपनाह प्यार था दोनों के दिलों में एकदूसरे के लिए.

नंदिनी और नवीन ने एकदूजे को ले कर अपने भविष्य की कुछ सपने देखे थे. साथसाथ रहने की, साथसाथ जीवन के सुनहरे पल बिताने की. पते की बात तो ये थी कि नवीन अपने प्यार की पलपल की स्टोरी अपने अजीज दोस्त हरिहर कृष्णा को बताए बिना नहीं रहता था. इस से एकएक बात शेयर करता था.

हरिहर ने डाला दोस्त के प्यार पर डाका

हरिहर कृष्णा चटखारे ले कर मजे से दोनों की प्रेम कहानी सुनता था. दोनों की प्रेम कहानी सुनतेसुनते भी उस के दिल में दोस्त की प्रेमिका के लिए खास जगह बनने लगी थी. धीरेधीरे वह उस के प्रति आकर्षित होता चला गया था. जबकि हरिहर कृष्णा जानता था कि नंदिनी से उस का दोस्त प्यार करता था. किसी के प्यार को छीनना गलत है, लेकिन उस ने इस बात की परवाह किए बिना ही प्रेम और जंग में सब कुछ जायज है वाली नीति अपनाते हुए उसी ओर अपना कदम बढ़ा दिया था.

सीधासादा नवीन दोस्त हरिहर कृष्णा के मन में क्या चल रहा है, जान ही नहीं सका. वह समझ ही नहीं सका कि वह उस के प्यार पर डाका डालने के लिए कुंडली मार कर बैठा है. उसे अगर तनिक भी अंदेशा होता तो शायद अपने प्यार को दोस्त से कभी भी न तो शेयर करता और न ही उसे कुछ बताता. लेकिन हरिहर कृष्णा के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

नंदिनी को पाने के लिए हरिहर कृष्णा के मन में हसरतें जिंदा हो चुकी थीं. उसे किसी भी तरह हासिल करने की उस ने सौगंध ले ली थी. लेकिन उसे हासिल करे तो करे कैसे, इस जुगत में दिनरात परेशान रहा करता था. आखिरकार दोनों को अलग करने की उस ने तरकीब निकाल ही ली.

शातिर दिमाग वाले हरिहर कृष्णा ने दोनों को अलग करने के लिए उन में इस तरीके से फूट डाल दी थी कि बरसों का प्यार पल भर में रेत के मकान की तरह ढह गया था. एक दिन मौका देख कर हरिहर कृष्णा ने नंदिनी को भडक़ाया, “जानती हो नंदिनी, तुम जितनी भोली हो, नवीन उतना ही कमीना है.”

“तुम्हें शर्म नहीं आती अपने अजीज दोस्त के खिलाफ ऐसी बातें करते हुए.” प्रेमी की बुराई सुन कर नंदिनी गुस्सा हो गई थी.

“तभी तो कहता हूं नंदिनी तुम बहुत भोली हो. दोस्त के दोहरे चेहरे को तुम देख नहीं सकती.” हरिहर कृष्णा ने भडक़ाया.

“क्या मतलब है तुम्हारा, मैं अंधी हूं मुझे कुछ दिखता नहीं है?”

“नाराज क्यों होती हो यार, तुम्हें अपना समझ कर दोस्त की सच्चाई बता रहा हूं. तुम हो कि मेरी बात सुनने के बजाय मुझ पर ही नाराज हो रही हो. पता नहीं क्यों मुझ से तुम्हारे साथ हो रहा धोखा देखा नहीं जा रहा है.” इस बार हरिहर कृष्णा ने तीर निशाने पर लगाया था.

“कौन धोखा दे रहा है मुझे?” नंदिनी ने सवाल किया.

“तुम्हारा प्यार, नवीन. वही तुम्हें धोखा दे रहा है.”

“इसे मैं कतई मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि नवीन मुझे कभी धोखा दे सकता है. वो मुझ से बहुत प्यार करता है, अंधा प्यार.”

“इसी बात का तो रोना है. उस ने तुम से अंधे प्यार वाली बात कर दी और तुम भी उसी तरह अंधी हो गई. पर इस में कोई सच्चाई नहीं है कि वो तुम से अंधा प्यार करता है.”

“तो फिर?”

“कई लड़कियों से उस के नाजायज संबंध हैं.”

“क्या?” नंदिनी उस की बात सुन कर बुरी तरह उछली.

“क्या कहते हो तुम? नवीन और कई लड़कियां? मैं और मेरा दिल इसे कभी मानने के लिए तैयार नहीं होगा कि मुझे छोड़ कर वह किसी और लडक़ी से प्यार करता है. नो…नेवर.”

“इसी बात का तो रोना है, तुम मेरी किसी बात को सीरियसली लेती नहीं हो. यह सब तुम्हें बता कर मुझे क्या बेनिफिट होने वाला, जरा सोचो.” इतना कह कर हरिहर कृष्णा ने नंदिनी के चेहरे पर अपनी शातिर नजरें गड़ा दी थीं और उस के हावभाव को पढऩे की कोशिश करने लगा था, जिस से उसे पता चल सके कि अब वह क्या सोच रही है.

कुछ पल के लिए वह गंभीर हुई, फिर कुछ सोच कर उस ने कहा, “पता नहीं क्यों मेरा दिल इसे मानने को तैयार नहीं हो रहा है कि नवीन के और लड़कियों से संबंध होंगे? लेकिन तुम कहते हो तो…”

“मेरा काम तुम्हें एलर्ट करना था, सो मैं ने कर दिया नंदिनी. बाकी मानना, न  मानना तुम्हारा काम. अच्छा चलता हूं. एक सच्चा दोस्त होने का फर्ज निभाया है मैं ने. बाकी सब ऊपर वाले के हाथ में…” कहते हुए वह आगे बढ़ गया.

बहुत हुआ अब और नहीं

जब पुलिस की जीप एक ढाबे के आगे आ कर रुकी, तो अब्दुल रहीम चौंक गया. पिछले 20-22 सालों से वह इस ढाबे को चला रहा था, पर पुलिस कभी नहीं आई थी. सो, डर से वह सहम गया. उसे और हैरानी हुई, जब जीप से एक बड़ी पुलिस अफसर उतरीं.

‘शायद कहीं का रास्ता पूछ रही होंगी’, यह सोचते हुए अब्दुल रहीम अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया कि साथ आए थानेदार ने पूछा, ‘‘अब्दुल रहीम आप का ही नाम है? हमारी साहब को आप से कुछ पूछताछ करनी है. वे किसी एकांत जगह बैठना चाहती हैं.’’

अब्दुल रहीम उन्हें ले कर ढाबे के कमरे की तरफ बढ़ गया. पुलिस अफसर की मंदमंद मुसकान ने उस की झिझक और डर दूर कर दिया था.

‘‘आइए मैडम, आप यहां बैठें. क्या मैं आप के लिए चाय मंगवाऊं?

‘‘मैडम, क्या आप नई सिटी एसपी कल्पना तो नहीं हैं? मैं ने अखबार में आप की तसवीर देखी थी…’’ अब्दुल रहीम ने उन्हें बिठाते हुए पूछा.

‘‘हां,’’ छोटा सा जवाब दे कर वे आसपास का मुआयना कर रही थीं.

एक लंबी चुप्पी के बाद कल्पना ने अब्दुल रहीम से पूछा, ‘‘क्या आप को ठीक 10 साल पहले की वह होली याद है, जब एक 15 साला लड़की का बलात्कार आप के इस ढाबे के ठीक पीछे वाली दीवार के पास किया गया था? उसे चादर आप ने ही ओढ़ाई थी और गोद में उठा उस के घर पहुंचाया था?’’

अब चौंकने की बारी अब्दुल रहीम की थी. पसीने की एक लड़ी कनपटी से बहते हुए पीठ तक जा पहुंची. थोड़ी देर तक सिर झुकाए मानो विचारों में गुम रहने के बाद उस ने सिर ऊपर उठाया. उस की पलकें भीगी हुई थीं. अब्दुल रहीम देर तक आसमान में घूरता रहा. मन सालों पहले पहुंच गया. होली की वह मनहूस दोपहर थी, सड़क पर रंग खेलने वाले कम हो चले थे. इक्कादुक्का मोटरसाइकिल पर लड़के शोर मचाते हुए आतेजाते दिख रहे थे.

अब्दुल रहीम ने उस दिन भी ढाबा खोल रखा था. वैसे, ग्राहक न के बराबर आए थे. होली का दिन जो था. दोपहर होती देख अब्दुल रहीम ने भी ढाबा बंद कर घर जाने की सोची कि पिछवाड़े से आती आवाजों ने उसे ठिठकने पर मजबूर कर दिया. 4 लड़के नशे में चूर थे, पर… पर, यह क्या… वे एक लड़की को दबोचे हुए थे. छोटी बच्ची थी, शायद 14-15 साल की.

अब्दुल रहीम उन चारों लड़कों को पहचानता था. सब निठल्ले और आवारा थे. एक पिछड़े वर्ग के नेता के साथ लगे थे और इसलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था. वे यहीं आसपास के थे. चारों छोटेमोटे जुर्म कर अंदर बाहर होते रहते थे.

रहीम जोरशोर से चिल्लाया, पर लड़कों ने उस की कोई परवाह नहीं की, बल्कि एक लड़के ने ईंट का एक टुकड़ा ऐसा चलाया कि सीधे उस के सिर पर आ कर लगा और वह बेहोश हो गया. आंखें खुलीं तो अंधेरा हो चुका था. अचानक उसे बच्ची का ध्यान आया. उन लड़कों ने तो उस का ऐसा हाल किया था कि शायद गिद्ध भी शर्मिंदा हो जाएं. बच्ची शायद मर चुकी थी.

अब्दुल रहीम दौड़ कर मेज पर ढका एक कपड़ा खींच लाया और उसे उस में लपेटा. पानी के छींटें मारमार कर कोशिश करने लगा कि शायद कहीं जिंदा हो. चेहरा साफ होते ही वह पहचान गया कि यह लड़की गली के आखिरी छोर पर रहती थी. उसे नाम तो मालूम नहीं था, पर घर का अंदाजा था. रोज ही तो वह अपनी सहेलियों के संग उस के ढाबे के सामने से स्कूल जाती थी.

बच्ची की लाश को कपड़े में लपेटे अब्दुल रहीम उस के घर की तरफ बढ़ चला. रात गहरा गई थी. लोग होली खेल कर अपनेअपने घरों में घुस गए थे, पर वहां बच्ची के घर के आगे भीड़ जैसी दिख रही थी. शायद लोग खोज रहे होंगे कि उन की बेटी किधर गई.

अब्दुल रहीम के लिए एकएक कदम चलना भारी हो गया. वह दरवाजे तक पहुंचा कि उस से पहले लोग दौड़ते हुए उस की तरफ आ गए. कांपते हाथों से उस ने लाश को एक जोड़ी हाथों में थमाया और वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा. वहां चीखपुकार मच गई.

‘मैं ने देखा है, किस ने किया है.

मैं गवाही दूंगा कि कौन थे वे लोग…’ रहीम कहता रहा, पर किसी ने भी उसे नहीं सुना.

मेज पर हुई थपकी की आवाज से अब्दुल रहीम यादों से बाहर आया.

‘‘देखिए, उस केस को दाखिल करने का आर्डर आया है,’’ कल्पना ने बताया.

‘‘पर, इस बात को तो सालों बीत गए हैं मैडम. रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हुई थी. उस बच्ची के मातापिता शायद उस के गम को बरदाश्त नहीं कर पाए थे और उन्होंने शहर छोड़ दिया था,’’ अब्दुल रहीम ने हैरानी से कहा.

‘मुझे बताया गया है कि आप उस वारदात के चश्मदीद गवाह थे. उस वक्त आप उन बलात्कारियों की पहचान करने के लिए तैयार भी थे,’’ कल्पना की इस बात को सुन कर अब्दुल रहीम उलझन में पड़ गया.

‘‘अगर आप उन्हें सजा दिलाना नहीं चाहते हैं, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. बस, उस बच्ची के साथ जो दरिंदगी हुई, उस से सिर्फ वह ही नहीं तबाह हुई, बल्कि उस के मातापिता की भी जिंदगी बदतर हो गई,’’ सिटी एसपी कल्पना ने समझाते हुए कहा.

‘‘2 चाय ले कर आना,’’ अब्दुल रहीम ने आवाज लगाई, ‘‘जीप में बैठे लोगों को भी चाय पिलाना.’’

चाय आ गई. अब्दुल रहीम पूरे वक्त सिर झुकाए चिंता में चाय सुड़कता रहा.

‘‘आप तो ऐसे परेशान हो रहे हैं, जैसे आप ने ही गुनाह किया हो. मेरा इरादा आप को तंग करने का बिलकुल नहीं था. बस, उस परिवार के लिए इंसाफ की उम्मीद है.’’

अब्दुल रहीम ने कहा, ‘‘हां मैडम, मैं ने अपनी आंखों से देखा था उस दिन. पर मैं उस बच्ची को बचा नहीं सका. इस का मलाल मुझेआज तक है. इस के लिए मैं खुद को भी गुनाहगार समझता हूं.

‘‘कई दिनों तक तो मैं अपने आपे में भी नहीं था. एक महीने बाद मैं फिर गया था उस के घर, पर ताला लटका हुआ था और पड़ोसियों को भी कुछ नहीं पता था.

‘‘जानती हैं मैडम, उस वक्त के अखबारों में इस खबर ने कोई जगह नहीं पाई थी. दलितों की बेटियों का तो अकसर उस तरह बलात्कार होता था, पर यह घर थोड़ा ठीकठाक था, क्योंकि लड़की के पिता सरकारी नौकरी में थेऔर गुनाहगार हमेशा आजाद घूमते रहे.

‘‘मैं ने भी इस डर से किसी को यह बात बताई भी नहीं. इसी शहर में होंगे सब. उस वक्त सब 20 से 25 साल के थे. मुझे सब के बाप के नामपते मालूम हैं. मैं आप को उन सब के बारे में बताने के लिए तैयार हूं.’’

अब्दुल रहीम को लगा कि चश्मे के पीछे कल्पना मैडम की आंखें भी नम हो गई थीं.

‘‘उस वक्त भले ही गुनाहगार बच गए होंगे. लड़की के मातापिता ने बदनामी से बचने के लिए मामला दर्ज ही नहीं किया, पर आने वाले दिनों में उन चारों पापियों की करतूत फोटो समेत हर अखबार की सुर्खी बनने वाली है.

‘‘आप तैयार रहें, एक लंबी कानूनी जंग में आप एक अहम किरदार रहेंगे,’’ कहते हुए कल्पना मैडम उठ खड़ी हुईं और काउंटर पर चाय के पैसे रखते हुए जीप में बैठ कर चली गईं.

‘‘आज पहली बार किसी पुलिस वाले को चाय के पैसे देते देखा है,’’ छोटू टेबल साफ करते हुए कह रहा था और अब्दुल रहीम को लग रहा था कि सालों से सीने पर रखा बोझ कुछ हलका हो गया था.

इस मुलाकात के बाद वक्त बहुत तेजी से बीता. वे चारों लड़के, जो अब अधेड़ हो चले थे, उन के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई. अब्दुल रहीम ने भी अपना बयान रेकौर्ड करा दिया. मीडिया वाले इस खबर के पीछे पड़ गए थे. पर उन के हाथ कुछ खास खबर लग नहीं पाई थी.

अब्दुल रहीम को भी कई धमकी भरे फोन आने लगे थे. सो, उन्हें पूरी तरह पुलिस सिक्योरिटी में रखा जा रहा था. सब से बढ़ कर कल्पना मैडम खुद इस केस में दिलचस्पी ले रही थीं और हर पेशी के वक्त मौजूद रहती थीं. कुछ उत्साही पत्रकारों ने उस परिवार के पड़ोसियों को खोज निकाला था, जिन्होंने बताया था कि होली के कुछ दिन बाद ही वे लोग चुपचाप बिना किसी से मिले कहीं चले गए थे, पर बात किसी से नहीं हो पाई थी.

कोर्ट की तारीखें जल्दीजल्दी पड़ रही थीं, जैसे कोर्ट भी इस मामले को जल्दी अंजाम तक पहुंचाना चाहता था. ऐसी ही एक पेशी में अब्दुल रहीम ने सालभर बाद बच्ची के पिता को देखा था. मिलते ही दोनों की आंखें नम हो गईं.

उस दिन कोर्ट खचाखच भरा हुआ था. बलात्कारियों का वकील खूब तैयारी के साथ आया हुआ मालूम दे रहा था. उस की दलीलों के आगे केस अपना रुख मोड़ने लगा था. सभी कानून की खामियों के सामने बेबस से दिखने लगे थे.

‘‘जनाब, सिर्फ एक अब्दुल रहीम की गवाही को ही कैसे सच माना जाए? मानता हूं कि बलात्कार हुआ होगा, पर क्या यह जरूरी है कि चारों ये ही थे? हो सकता है कि अब्दुल रहीम अपनी कोई पुरानी दुश्मनी का बदला ले रहे हों? क्या पता इन्होंने ही बलात्कार किया हो और फिर लाश पहुंचा दी हो?’’ धूर्त वकील ने ऐसा पासा फेंका कि मामला ही बदल गया.

लंच की छुट्टी हो गई थी. उस के बाद फैसला आने की उम्मीद थी. चारों आरोपी मूंछों पर ताव देते हुए अपने वकील को गले लगा कर जश्न सा मना रहे थे. लंच की छुट्टी के बाद जज साहब कुछ पहले ही आ कर सीट पर बैठ गए थे. उन के सख्त होते जा रहे हावभाव से माहौल भारी बनता जा रहा था.

‘‘क्या आप के पास कोई और गवाह है, जो इन चारों की पहचान कर सके,’’ जज साहब ने वकील से पूछा, तो वह बेचारा बगलें झांकनें लगा.

पीछे से कुछ लोग ‘हायहाय’ का नारा लगाने लगे. चारों आरोपियों के चेहरे दमकने लगे थे. तभी एक आवाज आई, ‘‘हां, मैं हूं. चश्मदीद ही नहीं भुक्तभोगी भी. मुझे अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए.’’

सब की नजरें आवाज की दिशा की ओर हो गईं. जज साहब के ‘इजाजत है’ बोलने के साथ ही लोगों ने देखा कि उन की शहर की एसपी कल्पना कठघरे की ओर जा रही हैं. पूरे माहौल में सनसनी मच गई.

‘‘हां, मैं ही हूं वह लड़की, जिसे 10 साल पहले होली की दोपहर में इन चारों ने बड़ी ही बेरहमी से कुचला था, इस ने…

‘‘जी हां, इसी ने मुझे मेरे घर के आगे से उठा लिया था, जब मैं गेट के आगे कुत्ते को रोटी देने निकली थी. मेरे मुंह को इस ने अपनी हथेलियों से दबा दिया था और कार में डाल दिया था.

‘‘भीतर पहले से ये तीनों बैठे हुए थे. इन्होंने पास के एक ढाबे के पीछे वाली दीवार की तरफ कार रोक कर मुझे घसीटते हुए उतारा था.

‘‘इस ने मेरे दोनों हाथ पकड़े थे और इस ने मेरी जांघें. कपड़े इस ने फाड़े थे. सब से पहले इस ने मेरा बलात्कार किया था… फिर इस ने… मुझे सब के चेहरे याद हैं.’’

सिटी एसपी कल्पना बोले जा रही थीं. अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए उन की करतूतों को उजागर करती जा रही थीं. कल्पना के पिता ने उठ कर 10 साल पुराने हुए मैडिकल जांच के कागजात कोर्ट को सौंपे, जिस में बलात्कार की पुष्टि थी. रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कल्पना को जान से मारने की कोशिश की गई थी.

कल्पना अभी कठघरे में ही थीं कि एक आरोपी की पत्नी अपनी बेटी को ले कर आई और सीधे अपने पति के मुंह पर तमाचा जड़ दिया.

दूसरे आरोपी की पत्नी उठ कर बाहर चली गई. वहीं एक आरोपी की बहन अपनी जगह खड़ी हो कर चिल्लाने लगी, ‘‘शर्म है… लानत है, एक भाई होते हुए तुम ने ऐसा कैसे किया था?’’

‘‘जज साहब, मैं बिलकुल मरने की हालत में ही थी. होली की उसी रात मेरे पापा मुझे तुरंत अस्पताल ले कर गए थे, जहां मैं जिंदगी और मौत के बीच कई दिनों तक झूलती  रही थी. मुझे दौरे आते थे. इन पापियों का चेहरा मुझे हर वक्त डराता रहता था.’’

अब केस आईने की तरह साफ था. अब्दुल रहीम की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे. कल्पना उन के पास जा कर उन के कदमों में गिर पड़ी.

‘‘अगर आप न होते, तो शायद मैं जिंदा न रहती.’’

मीडिया वाले कल्पना से मिलने को उतावले थे. वे मुसकराते हुए उन की तरफ बढ़ गई.

‘‘अब्दुल रहीम ने जब आप को कपड़े में लपेटा था, तब मरा हुआ ही समझा था. मेज के उस कपड़े से पुलिस की वरदी तक के अपने सफर के बारे में कुछ बताएं?’’ एक पत्रकार ने पूछा, जो शायद सभी का सवाल था.

‘‘उस वारदात के बाद मेरे मातापिता बेहद दुखी थे और शर्मिंदा भी थे. शहर में वे कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे थे. मेरे पिताजी ने अपना तबादला इलाहाबाद करवा लिया था.

‘‘सालों तक मैं घर से बाहर जाने से डरती रही थी. आगे की पढ़ाई मैं ने प्राइवेट की. मैं अपने मातापिता को हर दिन थोड़ा थोड़ा मरते देख रही थी.

‘‘उस दिन मैं ने सोचा था कि बहुत हुआ अब और नहीं. मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए परीक्षा की तैयारी करने लगी. आरक्षण के कारण मुझे फायदा हुआ और मनचाही नौकरी मिल गई. मैं ने अपनी इच्छा से इस राज्य को चुना. फिर मौका मिला इस शहर में आने का.

‘‘बहुत कुछ हमारा यहीं रह गया था. शहर को हमारा कर्ज चुकाना था. हमारी इज्जत लौटानी थी.’’

‘‘आप दूसरी लड़कियों और उन के मातापिता को क्या संदेश देना चाहेंगी?’’ किसी ने सवाल किया.

‘‘इस सोच को बदलने की सख्त जरूरत है कि बलात्कार की शिकार लड़की और उस के परिवार वाले शर्मिंदा हों. गुनाहगार चोर होता है, न कि जिस का सामान चोरी जाता है वह.

‘‘हां, जब तक बलात्कारियों को सजा नहीं होगी, तब तक उन के हौसले बुलंद रहेंगे. मेरे मातापिता ने गलती की थी, जो कुसूरवार को सजा दिलाने की जगह खुद सजा भुगतते रहे.’’

कल्पना बोल रही थीं, तभी उन की मां ने एक पुडि़या अबीर निकाला और उसे आसमान में उड़ा दिया. सालों पहले एक होली ने उन की जिंदगी को बेरंग कर दिया था, उसे फिर से जीने की इच्छा मानो जाग गई थी.

पत्नी का प्रेमी : क्यों मारा गया किशोर? – भाग 3

पूछताछ में बालकराम ने पुलिस को बताया था कि घर से निकलते समय किशोर ने अपने किसी घनश्याम नाम के दोस्त से मिलने की बात कही थी. पुलिस ने तुरंत घनश्याम के बारे में पता किया. पता चला वह घर में नहीं है. पुलिस ने घरवालों से उस का मोबाइल नंबर ले लिया. जब उस के नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई गई तो पता चला कि उस के फोन की भी लोकेशन उस स्थान की थी, जहां किशोर की हत्या हुई थी.

इस के अलावा जहांजहां की नाई के फोन की लोकेशन थी, वहांवहां घनश्याम उर्फ साहेब के फोन की भी लोकेशन थी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. साफ हो गया था कि घनश्याम ही किशोर का हत्यारा है. किशोर की कुछ ही दिनों पहले उस से दोस्ती हुई थी.

अभी जल्दी ही किशोर की शादी बाराबंकी में हुई थी. घनश्याम बाराबंकी का था, इस से पुलिस को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि किशोर की पत्नी घनश्याम को जानती हो. उस का घनश्याम से प्रेमप्रसंग रहा हो, जिस की वजह से किशोर मारा गया हो.

इंसपेक्टर विजयमल यादव ने किशोर की नवब्याहता रिशा से पूछताछ की तो उस ने घनश्याम से अपने प्रेमप्रसंग की बात स्वीकार कर ली. उस ने यह भी बताया कि घनश्याम ने उस से कहा भी था कि वह किशोर को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ेगा.

इस के बाद 21 मार्च को इंसपेक्टर विजयमल यादव ने टीम के साथ बाराबंकी जा कर घनश्याम उर्फ साहेब को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर उस के घर से पुलिस ने किशोर का मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया था.

कोतवाली ला कर घनश्याम से पूछताछ की गई तो उस ने किशोर की हत्या का अपराध स्वीकार कर के उस की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

रिशा की शादी हो जाने से घनश्याम उर्फ साहेब काफी बौखलाया हुआ था. क्योंकि वह रिशा से दूरी किसी भी हाल में बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. जब साहेब को पता चला कि रिशा मायके आई है तो वह उस से मिलने को बेताब हो उठा. उसे रिशा से अपने सवालों के जवाब लेने के साथ अपना फैसला भी सुनाना था.

रिशा को पता चला तो वह साहेब से मिली. तब साहेब ने उस की आंखों में आंखें डाल कर बेचैनी से पूछा, ‘‘रिशा, जब तुम प्यार मुझ से करती थी तो शादी दूसरे से क्यों कर ली?’’

‘‘मैं एक लड़की हूं, इसलिए घर वालों का विरोध नहीं कर सकी. अगर शादी से मना करती तो पापा मुझे जिंदा नहीं छोड़ते. तब मैं तुम से बहुत दूर चली जाती. हमारे मिलन का सपना अधूरा ही रह जाता.’’

‘‘वैसे भी हमारा मिलन कहां हो रहा है?’’ निराश साहेब ने कहा.

‘‘होगा, जरूर होगा. शादी होने के बावजूद मैं तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगी. हम दोनों के संबंध पहले की ही तरह चलते रहेंगे.’’ रिशा ने समझाया.

‘‘नहीं रिशा, तुम मेरी हो और सिर्फ मेरी ही रहोगी. मैं तुम्हें किसी और की बांहों में नहीं देख सकता. इसलिए मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

‘‘नहीं साहेब, उस के साथ कुछ मत करना. उस का इस में क्या दोष है?’’ रिशा ने कहा.

लेकिन साहेब ने उस की बात पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि उस ने तो ठान लिया था कि वह अपने और रिशा के बीच किसी को नहीं आने देगा. यही वजह थी कि उस ने किशोर की हत्या की योजना बना डाली. उसी योजना के तहत उस ने किशोर से दोस्ती गांठ ली. दोस्ती होने के बाद दोनों की शराब की महफिलें जमने लगीं.किशोर को घनश्याम के बारे में कुछ पता तो था नहीं, इसलिए वह उस पर एक दोस्त की तरह ही विश्वास करने लगा था.

14 मार्च को साहेब नाई की दुकान पर बाल कटवाने गया तो काउंटर पर रखे नाई के मोबाइल को देख कर उस की नीयत खराब हो गई. उसे इस तरह के एक मोबाइल की जरूरत भी थी, जिस से फोन कर के वह किशोर को कहीं एकांत में बुला सकें.

क्योंकि वह जानता था कि अगर उस ने अपने मोबाइल से फोन किया तो पकड़ा जाएगा. उस ने नाई को कुछ खरीदने के बहाने बाहर भेज दिया और उस के जाते ही उस का मोबाइल ले कर निकल आया. यह मोबाइल किशोर की हत्या की योजना का एक अहम हिस्सा था.

18 मार्च की दोपहर एक बजे साहेब ने चोरी के मोबाइल से किशोर को फोन कर के पौलिटेक्निक चौराहे पर बुलाया. उस से मिलने के लिए घर से निकलते समय किशोर ने मां को बता दिया था कि वह अपने दोस्त घनश्याम से मिलने जा रहा है. वह पौलिटेक्निक चौराहे पर पहुंचा तो घनश्याम वहां उस का इंतजार करता मिला. घनश्याम उसे साथ ले कर सिटी बस से चिनहट आ गया.

घनश्याम ने शराब की एक दुकान से किशोर के लिए शराब और अपने लिए बीयर खरीदी. घनश्याम उसे छोटा भरवारा मल्हौर रेलवे क्रासिंग के पास ले गया और वहां एक खाली पड़े प्लौट में बैठ गया. घनश्याम ने किशोर को शराब पिलाई, जबकि खुद बीयर पी. शराब पिलाने के बाद उस ने किशोर को साथ लाई भांग भी खिला दी. इस के बाद नशे की अधिकता की वजह से किशोर की आंखें मुंदने लगीं.

घनश्याम ने कहा, ‘‘लगता है, नशा ज्यादा हो गया है. ऐसा करो, लेट कर कुछ देर सो लो. नशा कम हो जाए तो घर चले जाना.’’

किशोर वहीं घास पर लेट गया और कुछ ही देर में बेसुध हो गया. इस के बाद घनश्याम ने वहीं पडे़ भारी पत्थर को उठाया और किशोर के चेहरे पर पटक दिया. इस के बाद उस ने कई बार ऐसा किया. ऐसा करने से किशोर की मौत हो गई. इस तरह किशोर की हत्या कर वह वहां से चला गया.

बाराबंकी जाते हुए घनश्याम ने रास्ते से किशोर के पिता बालकराम को फोन कर के किशोर की लाश के बारे में बता कर उसे वहां से लाने के लिए कह दिया था. इस के बाद उस ने चोरी किए गए मोबाइल से सिम निकाल कर तोड़ दिया और उस के साथ मोबाइल को फेंक दिया.

घनश्याम ने किशोर की हत्या में होशियारी तो बहुत दिखाई, लेकिन उस ने जो होशियारी दिखाई थी, उसी की वजह से पकड़ा गया. उस ने चोरी के मोबाइल के साथ अपना निजी मोबाइल भी साथ रखा था, जिस का उस ने स्विच औफ नहीं किया था. यही गलती उसे भारी पड़ गई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने घनश्याम उर्फ साहेब को सीजेएम आनंद कुमार की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नफरत की गोली – भाग 3

एक तरफ मिथिलेश के सामने दो वक्त की रोटी के लिए दूसरों पर आश्रित होने वाली स्थिति थी तो वहीं दूसरी ओर जेठानी लाखों रुपयों का मकान, गहने आदि खरीदने में लगी हुई थी. मिथिलेश को इस बात की कोई शिकायत नहीं थी. लेकिन उसे दुख इस बात का था कि जेठानी उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करती रहती थी.

देवरानी जेठानी के बीच चल रही रार पर न तो जोदसिंह ही ध्यान देता था और न ही उस के पिता. इस से मिथिलेश कुंठित हो गई थी.वह अभी तक पति की रहस्यमय हत्या को भूल नहीं पाई थी, उस का मन जेठानी को सबक सिखाने का करता था. लेकिन वह बच्चों के भविष्य को देखते हुए चुप हो जाती. मगर उस के सीने में एक आग सुलग रही थी. यह आग कब विकराल रूप धारण कर लेगी, ये कोई नहीं जानता था.

जोदसिंह के बच्चों की शीतकालीन छुट्टियां हो गईं तो उस ने परिवार सहित अपने गांव जाने का कार्यक्रम बना लिया. वह पिछले कई महीनों से अपने घर वालों से नहीं मिला था. छोटे भाई टिंकू के लिए भी कोई रिश्ता पक्का करना था.

टिंकू नेवी में नौकरी करता था. फिलहाल उस की पोस्टिंग सऊदी अरब में थी. इस के अलावा उसे अपने लिए आगरा में फ्लैट भी खरीदना था और दिवंगत भाई बंटू की पहली बरसी पर होने वाले शांति पाठ में शरीक होना था. ये सब काम निपटाने के लिए जोदसिंह पत्नी और बच्चों को ले कर 18 जनवरी की शाम को आगरा से निकल पड़ा.

पत्नी की जिद के कारण उसे पहले अपनी ससुराल जाना पड़ा. अगली सुबह करीब 11 बजे तीनों बच्चों को उन के नानानानी के पास छोड़ कर जोदसिंह ने सब से पहले अपने लिए फ्लैट तलाशने का मन बनाया. ससुराल से बाइक ले कर वह हेमलता के साथ देवरी रोड पर बनी कालोनी में गया. वहां उन्हें एक फ्लैट पसंद आ गया तो जोदसिंह ने बयाना भी दे दिया.

फ्लैट का सौदा पक्का होने की खुशी में उन्होंने बाजार से मिठाई खरीदी और फिर निकल पड़े मलपुरा की ओर. हेमलता ने अपने मायके वालों का मुंह मीठा कराया और फिर करीब आधा घंटे बाद दोनों शंकरपुर के लिए रवाना हो गए. करीब 6 बजे दोनों शंकरपुर पहुंच गए.

घर पर जोदसिंह के 2 मामा भी आए हुए थे. एक अपनी बेटी के लिए रिश्ता देखने आए थे. जबकि दूसरे अपनी दवाई लेने के लिए. चूंकि 2 दिन बाद ही उन के दिवंगत भांजे बंटू की बरसी थी तब तक के लिए दोनों ही वहां रुक गए.

घर पहुंच कर हेमलता और जोदसिंह ने घर पर मौजूद सभी का अभिवादन किया हलकीफुलकी बात की. फिर हेमलता सास व देवरों से बातचीत करने में मशगूल हो गई तो वहीं जोदसिंह पड़ोस के बीमार बुजुर्ग  के पास जा कर अलाव पर हाथ सेंकने लगा.

बातचीत के बीच हेमलता ने बाइक की डिक्की में रखा लड्डुओं का डिब्बा मंगवा लिया और फ्लैट खरीदने की बात कह कर इतराती हुई सब का मुंह मीठा कराने लगी. इस बीच जब मिथिलेश का छोटा बेटा अंकित लड्डू लेने ताई हेमलता के पास पहुंचा तो हेमलता ने उसे दुत्कार दिया.

ये बात अंकित ने अपनी मां को बताई. मिथिलेश के मन में हेमलता को ले कर जो नफरत सुलग रही थी वह आज ज्वालामुखी में बदलने लगी. उस ने अंकित को कहा कि वह कमरे में जाए और टीवी देख ले. अंकित कमरे में चला गया.

उधर मिथिलेश अपने कमरे में गई और संदूक में रखा तमंचा निकाल लाई. वह तमंचा उस के पति का था. पति ने जीवित रहते हुए मिथिलेश को तमंचा चलाना सिखा दिया था. उस तमंचे को छिपा कर वह छत पर ले गई और वहीं रख आई. इस के अलावा योजना के अनुसार उस ने हथौड़ा भी छत पर ले जा कर रख दिया था. अब उसे केवल सही समय का इंतजार था.

करीब पौने 8 बजे हेमलता जब सास और देवरों के बीच से उठ कर लघुशंका के लिए सीढि़यों के नीचे बने बाथरूम में जा रही थी तो वहीं पर मिथिलेश ने उस के पैर पकड़ कर उस से एकांत में बात करने का 10 मिनट का समय मांगा. उस ने कहा कि वह दोनों के बीच चल रहे मनमुटाव को दूर करना चाहती है.

देवरानी जब पैरों में पड़ गई तो हेमलता को भला 10 मिनट देने में क्या एतराज था. देवरानी के अनुरोध पर एकांत में बातचीत करने के लिए वह उस के साथ छत पर चली गई. छत पर अंधेरा था. हेमलता के कहने पर मिथिलेश ने छत पर लगा बल्ब जला दिया. मिथिलेश ने बैठने के लिए वही जगह चुनी जहां पर उस ने हथौड़ा और तमंचा छिपा कर रखा था. जेठानी को बैठने के लिए उस ने पटरा उसी स्थान पर लगाया जिस से उसे बार करने में आसानी हो.

करीब 2-3 मिनट तक दोनों इधरउधर की बातें करते रहीं जब हेमलता को लगा कि मिथिलेश के पास बातचीत करने का कोई ठोस मुद्दा नहीं है, तो वह वहां नीचे आने को जैसे ही उठी, मिथिलेश ने फुरती से हथौड़ा निकाल कर उस से भरपूर वार उस के सिर पर किया. हेमलता के मुंह से आवाज भी न निकल पाई. उस के सिर से खून बहने लगा और वह बेहोश हो गई.

तभी उस ने तुरंत तमंचा निकाला और जेठानी को हिकारत भरी नजरों से देखा. फिर उस ने उस के सिर पर तमंचा सटा कर ट्रिगर दबा दिया. एक आवाज हुई और हेमलता का खेल खत्म हो गया. जेठानी को मारने के बाद वह छत की दीवार पर पीठ टिका कर इस तरह बैठ गई जैसे कि ये काम कर के उसे बहुत बड़ा सुकून मिला हो.

कुछ देर बाद हेमलता का पति जोदसिंह उसे ढूंढता हुआ जब छत पर पहुंचा तब उसे पता चला कि उस ने जो गोली की आवाज सुनी थी वह उस की पत्नी को ही मारी गई थी.

थानाप्रभारी ने जब मिथिलेश से पूछा कि क्या उसे अपनी जेठानी की हत्या करने का कोई पछतावा है तो उस ने तपाक से कहा, ‘‘कैसा पछतावा, मुझे कोई पछतावा नहीं है. जेठानी ने सारे परिवार के साथ मिल कर मेरे पति को मारा था, मैं ने उसे मार कर अपने पति की मौत का बदला ले लिया.’’

पूछताछ के बाद मिथिलेश को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. जबकि उस के चारों बच्चों की देखभाल उन के दादादादी कर रहे हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

4 लाख में खरीदी मौत – भाग 3

काशीपुर पहुंच कर जयप्रकाश ने बहन से पत्नी के बारे में बता कर कहा कि अब वह उस से किसी तरह पीछा छुड़ाना चाहता है. भाभी की बदचलनी की बात सुन कर केला देवी को बहुत गुस्सा आया. जयप्रकाश ने बहन से यह भी कहा था कि अगर इस काम के लिए उसे 2-4 लाख रुपए खर्च भी करने पड़े तो वह खर्च कर देगा. वह हरजीत, पत्नी सुनीता और बढ़े बेटे विशाल की हत्या कराना चाहता था.

केला देवी ने इस काम के लिए जयप्रकाश की मुलाकात अपने देवर के बेटे पंकज से करा दी. जयप्रकाश उस का मामा लगता था. पंकज अभी छोटा था. उस का बाप नन्हे कटरा मालियान में पान की दुकान चलाता था. वह भी बाप के साथ दुकान पर बैठता था.

पंकज ने कभी हत्या जैसे काम के बारे में सोचा भी नहीं था. लेकिन जब जयप्रकाश ने 4 लाख रुपए देने की बात कही तो वह लालच में पड़ गया और हामी भर दी. इस के बाद उस ने अपने दोस्तों शिवअवतार पुत्र सोमपाल निवासी बरखेड़ा, कपिल पुत्र बाबूराम निवासी कटरामालियान, दीपक पुत्र गोपाल यादव निवासी काशीपुर को 2 लाख रुपए देने की बात कह कर 3 हत्याएं करने के लिए राजी कर लिया.

कपिल एक अस्पताल में एक्सरे टेक्नीशियन था तो शिवअवतार उर्फ बबलू एक पैथालौजी लैब में लैब टेक्नीशियन था. दीपक यादव एक मेडिकल स्टोर पर काम करता था.  इस तरह जयप्रकाश ने 4 लाख रुपए में 3 हत्याओं का सौदा कर डाला. इस के बाद उस ने 3 लाख 60 हजार रुपए दे भी दिए. बाकी रकम काम हो जाने के बाद देने को कहा.

पंकज और उस के दोस्तों ने 3-3 हत्याओं की सुपारी ले तो ली, लेकिन चारों ही इस काम के लिए एकदम नए थे. इंसान की कौन कहे, इन में से किसी ने कभी चूहा तक नहीं मारा था. जिस ने कभी चूहा तक न मारा हो, वह आदमी कैसे मार सकता था.

बहरहाल, पंकज ने अपने दोस्तों को 2 लाख रुपए दे कर इस झंझट से खुद को अलग कर लिया. लेकिन हत्या करवाने की जिम्मेदारी उसी की थी, इसलिए हत्याएं कैसे की जाएं, योजना बनवाने में वह भी साथ रहता था.

चारों हर रोज बैठ कर इस काम के लिए नईनई योजनाएं बनाते, लेकिन अंजाम न दे पाते. धीरेधीरे एक सप्ताह गुजर गया, उन की योजना सफल न हो पाई. अब तक मिली रकम से उन्होंने काफी पैसे खर्च कर डाले थे.  हत्याएं करवाने की वजह से जयप्रकाश अपना घर छोड़ कर काशीपुर में पड़ा हुआ था. उस का सोचना था कि उस के काशीपुर रहते हत्याएं होंगी तो पुलिस उस पर शक नहीं करेगी.

जब सप्ताह भर से ज्यादा का समय गुजर गया और पंकज कुछ नहीं कर पाया तो जयप्रकाश को लगा कि यह काम उस के वश का नहीं है. उस ने पंकज से अपने रुपए वापस मांगे. लेकिन पंकज और उस के साथियों ने काफी रुपए खर्च कर दिए थे, इसलिए रुपए लौटाते कहां से.

जयप्रकाश ने पंकज पर रुपए लौटाने के लिए दबाव बनाया तो वह परेशान हो उठा. इस के बाद चारों ने बैठ कर एक नई योजना बना डाली. यह योजना थी जयप्रकाश की हत्या की. उन्हें पता ही था कि जयप्रकाश का उस की पत्नीबच्चों से मनमुटाव चल ही रहा है.

ऐसे में अगर जयप्रकाश की हत्या हो जाती है तो शक उस की पत्नी पर जाएगा और वे साफ बच जाएंगे. 3 लोगों की हत्या करने के बजाय एक की हत्या करना आसान भी था. उन्हें 3 की जगह एक ही हत्या करने पर सारे पैसे मिल जाएंगे.

पंकज मामा को मरवाना तो नहीं चाहता था, लेकिन मामा से सुपारी ले कर वह बुरी तरह से फंस चुका था, क्योंकि मामा से ली गई रकम से काफी रुपए खर्च हो चुके थे. इसीलिए दोस्तों के कहने पर मजबूरन उसे मामा की हत्या के लिए हामी भरनी पड़ी.

इस के बाद जयप्रकाश की हत्या की योजना बन गई. पंकज और उस के दोस्तों को पता था कि करवा चौथ के त्यौहार पर जयप्रकाश जसपुर जाने के लिए राजी हो जाएगा. दरअसल वे जयप्रकाश को जसपुर ले जा कर मारना चाहते थे. क्योंकि वहां मारे जाने पर उस की हत्या की शंका पत्नीबच्चों और प्रेमी पर होती. वे पुलिस की गिरफ्त से दूर रहते.

योजना बनाने के बाद पंकज और उस के साथियों ने जयप्रकाश को विश्वास में ले कर जसपुर चलने के लिए राजी कर लिया. बहाना था, उस के द्वारा कही गई 3 हत्याओं को अंजाम देने का. जयप्रकाश किसी भी तरह पत्नी नामक झंझट से मुक्ति चाहता था, इसलिए वह उन के साथ जाने को राजी हो गया. चारों ने जो योजना बनाई थी, उस के अनुसार जयप्रकाश को जसपुर ले जा कर खत्म कर देना था.

12 अक्तूबर की रात शिवअवतार और कपिल ने जयप्रकाश को साथ ले जा कर काशीपुर के एक होटल में शराब पिलाई और खाना खिलाया. पत्नी की करतूतों से दुखी जयप्रकाश बातबात में ज्यादा शराब पी गया. शिवअवतार और कपिल चाहते भी यही थे, इसलिए वे उसे ज्यादा से ज्यादा शराब पीने के लिए उकसाते रहे.

जयप्रकाश नशे में होश खो बैठा तो शिवअवतार और कपिल उसे मोटरसाइकिल पर बीच में बैठा कर जसपुर की ओर चल पड़े. संन्यासियों वाला रोड पर पहुंच कर वे ऐसी जगह की तलाश करने लगे, जहां वे उसे मार सकें. कुछ दूर चलने पर अहमदनगर गांव के पास जब उन्हें सुनसान मिला तो उन्होंने उसे मोटरसाइकिल से उतार कर गोली मार दी.

इस के बाद जयप्रकाश की लाश को वहीं छोड़ कर शिवअवतार और कपिल लौट पड़े. रास्ते से ही शिवअवतार ने पंकज को फोन कर दिया कि बाकी 40 हजार रुपए वह दीपक को दे दे. जयप्रकाश ने सुपारी तो दी थी पत्नी, बेटे और पत्नी के प्रेमी हरजीत को मारने की, लेकिन मारा गया खुद.

पंकज के बयान के आधार पर पुलिस ने शिवअवतार उर्फ बबलू, कपिल, दीपक यादव को भी गिरफ्तार कर लिया. इन में शिवअवतार और कपिल पर तो हत्या का आरोप है, जबकि पंकज पर षडयंत्र रचने का तथा दीपक यादव पर साक्ष्य छिपाने का.

पुलिस ने हत्यारों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा, 2 जीवित कारतूस तथा 1 लाख 60 हजार रुपए नकद बरामद कर लिए हैं. सारे साक्ष्य जुटा कर पुलिस ने चारों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पहले से हिरासत में लिए गए मास्टर हरजीत और मृतक जयप्रकाश की पत्नी सुनीता को पुलिस ने पंकज के अपराध स्वीकार करते ही रिहा कर दिया. सुनीता ने भले ही पति को नहीं मरवाया था, लेकिन अगर वह गलत न होती तो आज यह नौबत न आती. उसी की वजह से आज उस के 4 बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है.

एहसान के बदले मिली मौत – भाग 3

डर के मारे वह ऊपर की ओर भागे. कमरे में रखी बड़ी सी कुरसी पर 5-6 कंबल ओढ़ कर छिप गए. कदमों की आहट उन्हें साफ सुनाई दे रही थी, जो उन्हीं की ओर बढ़ रहे थे.

सन्नाटे को चीरती हुई एक मर्दाना आवाज गूंजी, ‘‘डा. फेंज गनीमत इसी में है कि तुम जहां भी छिपे हो निकल आओ वरना हम तो तुम्हें ढूंढ ही लेंगे.’’

यह आवाज थमी नहीं कि दूसरी आवाज उभरी, ‘‘आज बच नहीं पाओगे डा. फेंज.’’

खौफ से डा. फेंज की नसों का खून जम सा गया. वह सांस खींचे दुबके रहे. तभी पहले वाली आवाज फिर गूंजी, ‘‘डा. फेंज, हमें बता दो कि तुम ने नकद राशि कहां छिपा रखी है? हम तुम्हारी जान बख्श देंगे.’’

कंबलों में हलचल सी हुई. डा. फेंज में जाने कहां से हिम्मत आ गई कि वह झटके से बाहर आ गए. 2 लोग उन्हें खोज रहे थे. उन्होंने फुर्ती से एक युवक का सिर पकड़ कर खिड़की की चौखट से दे मारा. चीख के साथ उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. दूसरा उन की ओर लपका. उस ने डा. फेंज की कलाई पकड़ कर फर्श पर गिरा दिया.

इस के बाद घसीटता हुआ दीवार तक ले गया और उन का सिर पकड़ कर जोर से दीवार से मारा. इसी के साथ उस के घायल साथी ने डा. फेंज पर कुल्हाड़ी से जोरदार वार सिर पर किया. बस, एक ही वार में हलकी सी चीख के साथ वह बेहोश हो गए. इस के बाद भी दोनों युवकों ने ताबड़तोड़ कई वार उन के सिर और सीने पर किए. उन्हें लगा कि डा. फेंज खत्म हो गए हैं, लेकिन यह उन का भ्रम था.

डा. फेंज की सांसें चल रही थीं. दोनों का अगला निशाना वहां रखी अलमारी थी. अलमारी के दरवाजे को कुल्हाड़ी से तोड़ कर उसे खंगाला तो उस में 5 हजार यूरो मिले, जिन्हें ले कर दोनों भाग खड़े हुए. उन के जाने के बाद घिसटघिसट कर डा. फेंज उस टेबल तक आए, जहां फोन रखा था. किसी तरह नंबर मिला कर उन्होंने पुलिस को कराहती आवाज में घटना की सूचना दी.

10 मिनट में टौप एक्शन पुलिस फोर्स वहां पहुंच गई. गंभीर रूप से घायल डा. फेंज को तुरंत अस्पताल ले जाया गया. 11 सप्ताह तक जिंदगी और मौत से जूझते हुए डा. फेंज ने आखिर 26 मार्च, 2008 को दम तोड़ दिया.

पुलिस जांच में मिले सुबूत डा. फेंज की पत्नी ततजाना के दोषी होने का इशारा कर रहे थे. ततजाना को हिरासत में ले कर पूछताछ की गई. वह खुद को बेकुसूर बताती रही. उस का तर्क था कि एक साल से डा. फेंज से उस का कोई संबंध नहीं था. वह अपने प्रेमी हीलमुट बेकर के साथ रह रही थी. मगर उस की कोई भी दलील काम नहीं आई. मई, 2008 में अदालत के आदेश पर उसे डा. फेंज की हत्या और चोरी के आरोप में जेल भेज दिया गया.

16 महीने बर्लिन कोर्ट में यह मुकदमा चला. लेकिन सुबूतों और गवाहों के अभाव में अक्तूबर, 2009 को कोर्ट ने ततजाना को बेगुनाह करार देते हुए जेल से रिहा करने का आदेश दे दिया.

कहा जाता है कि ततजाना को अपनी बदसूरती के चलते पहले जीवन से खास लगाव नहीं रहा था. लेकिन जब डा. फेंज ने 20 औपरेशन कर के उसे खूबसूरती का तोहफा दिया तो उस के अंदर की दम तोड़ चुकी महत्त्वाकांक्षाएं और हसरतें फिर से उमंगे भरने लगी थीं. इसी के चलते उस ने अपने से 44 साल बड़े डा. फेंज के प्यार को स्वीकार कर के शादी कर ली थी, क्योंकि डा. फेंज के पास अरबों डौलर की दौलत थी.

पुलिस के अनुसार शादी के बाद 9 सालों तक ततजाना ने ऐश की जिंदगी बसर करते हुए अपने सभी अरमान पूरे कर लिए. इस के बाद उस का मन डा. फेंज से भर गया तो वह कार व्यापारी हीलमुट बेकर के पहलू में जा गिरी. वह उस के साथ एक साल रही, लेकिन डा. फेंज को उस ने तलाक नहीं दिया. शायद उस की निगाह डा. फेंज की बेशुमार दौलत पर थी. उस पर उस का कब्जा डा. फेंज की मौत के बाद ही हो सकता था. इसी वजह से उस ने डा. फेंज की हत्या पेशेवर हत्यारों से करवा दी थी. लेकिन सुबूतों के अभाव में वह निर्दोष मानी गई.

खैर, सच्चाई चाहे जो भी रही हो, जेल से रिहा होने के बाद ततजाना डा. फेंज की बेवा होने के नाते उस की 11 मिलियन यू.एस. डौलर की एकलौती वारिस हो गई. उस की जिंदगी फिर उसी पुराने ढर्रे पर चल पड़ी. पार्टीक्लबों में रात रंगीन करना, पुरुष मित्रों की बांहों में बांहें डाल कर डांस करना, महंगी कारों में घूमना और भोग विलास भरा जीवन उस की दिनचर्या में शुमार हो गया.

एक हाईफाई पार्टी में ही ततजाना की मुलाकात नवंबर, 2011 में जर्मनी के सेक्सोनिया राज्य के आखिरी राजा 68 वर्षीय प्रिंस वौन हौमजोर्लन से हुई तो वह उस से दिल लगा बैठी. प्रिंस वौन भी उस की खूबसूरती और जवानी के ऐसे दीवाने हुए कि बस उसी के हो कर रह गए. दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन प्रिंस वौन की पत्नी और बच्चों के रहते यह संभव नहीं था.

मिसकाल बनी काल – भाग 3

सुवेश सचिन का अच्छा दोस्त था. उस की परेशानी समझ कर उस ने कहा, ‘‘मेरा एक दोस्त है अजय. उस का घर रुचिखंड में है. उस के मकान का ऊपर वाला हिस्सा खाली है. मैं उस से बात करता हूं. अगर अजय तैयार हो गया तो तुम्हें कमरा मिल जाएगा. वह 2 हजार रुपए कमरे का किराया लेगा. साथ ही एक महीने का एडवांस देना होगा.’’

सचिन इस के लिए तैयार हो गया. सुवेश ने अजय से बात की और अजय ने अपने पिता से. अजय का कोई दोस्त अपनी पत्नी के साथ रहेगा यह जान कर अजय के पिता गुलाबचंद राजी हो गए. सचिन ने कमरा देख कर एडवांस किराया दे दिया. इस के बाद उस ने 8 दिसंबर को सोफिया को फोन कर के कहा, ‘‘सोफिया, मैं तुम्हें लखनऊ बुलाना चाहता हूं. मैं 10 तारीख को तुम्हें अजगैन में मिलूंगा. हम 1-2 महीने अकेले रहेंगे. इस बीच मैं अपने घर वालों को राजी कर लूंगा और फिर तुम्हें अपने घर ले जाऊंगा.’’

सोफिया यही चाहती थी. वह पहले से ही सचिन के साथ जिंदगी जीने के सपने देख रही थी. योजनानुसार सोफिया 10 दिसंबर की सुबह अपने घर से निकली तो उस की मां ने पूछा, ‘‘आज स्कूल नहीं जाएगी क्या?’’

‘‘नहीं मां, आज दादी की दवा लेनी है, वही लेने जा रही हूं. थोड़ी देर में लौट आऊंगी.’’ कह कर सोफिया घर से निकल गई. उस ने घर से 10 हजार रुपए और चांदी की एक जोड़ी पायल भी साथ ले ली थी. अपने गांव से वह सीधी अजगैन पहुंची. सचिन उसे तयशुदा जगह पर मिल गया. उस से मिलने की खुशी में 17 साल की सोफिया अपने मांबाप की इज्जतआबरू, मानसम्मान, प्यार और विश्वास सब भूल गई. वहां से दोनों लखनऊ आ गए. सचिन सोफिया को अपने कमरे पर ले गया. खाना वगैरह दोनों ने बाहर ही खा लिया था.

कमरे पर पहुंचते ही सोफिया सचिन से शादी की बात करने लगी. सचिन ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘मुझ पर भरोसा रखो. हम जल्द ही शादी भी कर लेंगे. मैं तुम्हें सारी बातें पहले ही बता चुका हूं.’’

दरअसल सचिन किसी भी तरह जल्द से जल्द सोफिया को हासिल कर लेना चाहता था. गहराती रात के साथ सचिन की जवानी हिलोरें मारने लगी तो वह सोफिया के न चाहते हुए भी अकेलेपन का लाभ उठा कर उसे हासिल करने की कोशिश करने लगा. सोफिया ने काफी हद तक खुद को बचाने की कोशिश की. लेकिन धीरेधीरे उस का विरोध कम हो गया और सचिन मनमानी करने में सफल रहा. सोफिया खुद को यह दिलासा दे रही थी कि आज न सही कल शादी तो होनी ही है. जो शादी के बाद होना था वह पहले ही सही.

अगले दिन सोफिया सचिन से शादी करने की जिद करने लगी. जबकि सचिन चाहता था कि वह किसी तरह अपने घर वापस चली जाए. उस ने बहानेबाजी कर के उसे लौट जाने को कहा तो सोफिया बोली, ‘‘घर से भाग कर आने वाली लड़की के लिए घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं. मैं अब वापस नहीं लौट सकती.’’

सचिन और सोफिया का वह पूरा दिन प्यार और मनुहार के बीच गुजरा. रात गहरा गई तो सोफिया खाना खा कर सो गई. जबकि सचिन जाग रहा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि सोफिया से कैसे पीछा छुड़ाए.

उस के मन में खयाल आया कि क्यों न वह गला दबा कर सोफिया को मार डाले. लेकिन उसे लगा कि इस से उस की अंगुलियों के निशान सोफिया के गले पर आ जाएंगे और वह पकड़ा जाएगा. आखिरकार काफी सोचविचार कर उस ने अपने हाथों पर पौलीथिन लपेट ली और सोती हुई सोफिया का गला दबाने लगा.

इस से सोफिया जाग गई और अपना बचाव करने का प्रयास करने लगी. सचिन जवान था और सोफिया से ताकतवर भी. वैसे भी वह योजना बना कर उस की हत्या कर रहा था. सोफिया एक तो शरीर से कमजोर थी, दूसरे उसे सचिन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. इस के बावजूद वह पूरा जोर लगा कर बचने की कोशिश करने लगी. इस पर सचिन ने उस के सिर पर जोरो से वार किया. इस से वह बेहोश हो गई. सचिन को मौका मिला तो उस ने सोफिया का गला दबा कर उसे मार डाला.

सोफिया के मरने के बाद सचिन के हाथपांव फूल गए. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. रात भर वह सोफिया की लाश के पास बैठा रोता रहा. काफी सोचने के बाद जब उसे लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो वह सुबह 4 बजे आशियाना थाने जा पहुंचा. उस ने अपने बचाव के लिए झूठी कहानी भी गढ़ी, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सीओ बबीता सिंह के सामने उस का झूठ टिक नहीं सका.

पुलिस ने मामले की जानकारी सोफिया के घर वालों को दी तो वे लखनऊ आ गए. उन लोगों ने बताया कि सोफिया किसी लड़के के साथ भाग आई थी. उन्हें सोफिया का शव सौंप दिया गया. लंबी पूछताछ के बाद सचिन के बयान की पुष्टि के लिए पुलिस ने मकान मालिक गुलाबचंद और उन के बेटे अजय व उस के दोस्त सुवेश से भी पूछताछ की.

आशियाना पुलिस ने सचिन के खिलाफ भादंवि की धारा 363, 376, 302 और पोक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन औफ चिल्ड्रन फ्राम सैक्सुअल आफेंसेज एक्ट) की धारा 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. पूछताछ के बाद उसे जेल भेज दिया गया.

इस में कोई दो राय नहीं कि सचिन के पास बचने के तमाम रास्ते थे. वह सोफिया को कहीं बाजार में अकेला छोड़ कर भाग सकता था. उसे उस के घर पहुंचा सकता था. सोफिया नादान और नासमझ थी. वह 2 माह पुरानी मोबाइल की दोस्ती पर इतना भरोसा कर बैठी कि परिवार छोड़ कर लखनऊ आ गई. उस ने जिस पर भरोसा किया, वही उस का कातिल बन गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में सोफिया नाम परिवर्तित है.