Hindi Suspense Story : सुहाग का गहना

Hindi Suspense Story. जैतून ने अपनी मोहब्बत को जहर दे कर एक वफादार बीवी, अपने बच्चों को प्यार करने वाली मां और ईमानदार औरत को बचा लिया, जो उस की सुनहरी दुनिया थी.

शाहिद को नींद की हलकी सी झपकी सी आ गई थी. बिलकुल इस तरह, जैसे तेज उमस में ठंडी हवा का कोई आवारा झोंका कहीं से भटक कर आ गया हो. उस ने गहरी सांस ले कर सोचा, ‘काश मुझे नींद आ जाती.’

उसे अब नींद कहां आती थी. वह तो उस के लिए अनमोल चीज बन चुकी थी. दिमाग में उलझेउलझे खयालात पैदा हो रहे थे. दिल का अजीब हाल था. तभी उस की नजर सामने पड़ी, वह चौंका. जैतून चमड़े के बैग पर झुकी हुई थी. कंपार्टमेंट में फैली मद्धिम रोशनी में जैतून के जिस्म का साया बर्थ पर पड़ रहा था. उस की हरकतों से ऐसा लग रहा था, जैसे वह बैग में हाथ डाल कर कोई चीज ढूंढ रही है. शाहिद को न जाने क्यों जैतून की यह हरकत इतनी अजीब लगी कि वह उछल पड़ा.

थोड़ी देर पहले तो उस ने उसे गहरी नींद में डूबी हुई देखा था. वह सो तो रही थी, मगर उस के परेशान चेहरे पर जिंदगी की तमाम फिक्रें और दुख जाग रहे थे. जैतून को देखतेदेखते ही शाहिद को झपकी सी आ गई थी. इस के बाद उस ने जैतून को बैग में कुछ तलाशते देखा था.

बैग में जो रकम थी, वही उन की कुल जमापूंजी थी. वह शाहिद की दवादारू के लिए न जाने किनकिन मुश्किलों से बचाई गई थी. थोड़ी देर के बाद शाहिद जागा तो उस के दिल में शक की लहर दौड़ गई. उस ने एक बार फिर सोचा, ‘कुछ ही देर पहले जैतून जिस तरह की गहरी नींद सो रही थी, क्या वह अदाकारी थी. वह बैग से रकम निकाल रही होगी, ताकि उसे ले कर अगले किसी स्टेशन पर उतर जाए. वह इतना बड़ा कदम इसलिए उठा रही होगी, क्योंकि वह अब उस की बीमारी, दर्द और तकलीफजदा जिंदगी से तंग आ चुकी होगी. अगर जैतून उसे छोड़ कर सदा के लिए किसी स्टेशन पर उतर गई तो बच्चों का क्या होगा? क्या वह उन्हें भी अपने साथ ले जाएगी?’

जैतून बैग बर्थ के ऊपर खिसका कर जैसे ही पलटी, उस की नजरें शाहिद की नजरों से जा टकराईं. वह उस की बर्थ के पास आ कर धीरे से बोली, ‘‘आप तो सो गए थे. मुझे खुशी हुई थी कि आप गहरी नींद सो रहे थे.’’

‘‘काश! मैं हमेशा के लिए सो जाता.’’ शाहिद ने गहरी सांस ले कर कहा. उस के लहजे में सारे जहां का दर्द भरा हुआ था.   जैतून ने तड़प कर उस के मुंह पर अपना हाथ रख दिया, ‘‘फिर आप ने बहकीबहकी बातें शुरू कर दीं.’’

‘‘अब मैं जी कर क्या करूंगा जैतून?’’ शाहिद का लहजा ऐसा दर्दनाक और मायूसी भरा था कि जैतून का दिल भर आया. उस ने जैतून की आंखों में झांका, ‘‘मेरे दिल के किसी भी कोने में जीने की जरा भी ख्वाहिश नहीं रही, न जाने क्यों मुझ से दुनिया की हर चीज रूठ रही है.’’   ‘‘मेरे अल्लाह! आप से कौन रूठा है?’’ जैतून की आवाज उस के हलक में फंसने लगी.

‘‘न जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि तुम भी किसी दिन मुझ से रूठ जाओगी.’’ दिल की बात शाहिद की जुबान पर आ ही गई. जैतून बोली, ‘‘सारी दुनिया आप से रूठ सकती है, पर मैं आखिरी सांस तक नहीं रूठूंगी.’’

शाहिद ने चौंक कर जैतून की तरफ देखा. सोचा, कहीं यह अपनी चोरी पकड़े जाने पर फरेब से काम तो नहीं ले रही. यह बनावट और फरेब का दौर है और किसी पर भरोसा करना बहुत ही मुश्किल है. लेकिन फौरन ही शाहिद ने महसूस किया कि जैतून के लहजे में सच्चाई है. उस की बड़ीबड़ी और खूबसूरत आंखों में मोहब्बत के चिराग जल रहे थे.

जैतून ने शाहिद के चेहरे से महसूस कर लिया कि वह किसी कशमकश में पड़ा है या फिर उसे तकलीफ हो रही है. पूछा, ‘‘कहीं दर्द तो नहीं बढ़ गया?’’

‘‘दर्द तो मेरा मुकद्दर बन चुका है. यह कोई नई बात नहीं है,’’ फिर शाहिद बिना पूछे नहीं रह सका, ‘‘इस वक्त तुम बैग में क्या तलाश रही थीं?’’

जवाब देने से पहले जैतून ने सहमी हुई हिरनी की तरह पूरे कंपार्टमेंट का जायजा लिया, फिर वह शाहिद के चेहरे के बहुत पास अपना चेहरा ला कर फुसफुसाई, ‘‘मैं गहनों की पोटली देख रही थी कि वह हैं या नहीं.’’

‘‘गहनों की पोटली?’’ शाहिद को झटका सा लगा, ‘‘तो तुम गहनों की पोटली भी लेती आई हो? वह किस लिए?’’   ‘‘हमारे पास जो रकम है, क्या वह काफी होगी,’’ जैतून उस के बालों को सहलाते हुए बोली, ‘‘हमारे पास नकदी ही कितनी है.’’

‘‘जितनी भी है, बहुत है,’’ शाहिद ने कहा, ‘‘सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज होता है, दवा भी फ्री मिलती है.’’   ‘‘मैं सरकारी अस्पताल में आप का इलाज नहीं कराऊंगी.’’   ‘‘वह किसलिए?’’ शाहिद धीमे से मुसकराया.   ‘‘सरकारी अस्पतालों में इलाज पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता. मैं आप का इलाज एक बहुत ही अच्छे प्राइवेट अस्पताल में कराऊंगी.’’

शाहिद उछल पड़ा, ‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?’’   ‘‘क्यों, क्या हम प्राइवेट अस्पताल में इलाज नहीं करा सकते?’’   ‘‘तुम नहीं जानतीं, प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने पर पैसा पानी की तरह बहता है.’’   ‘‘जितना खर्च होता है, हो जाने दो,’’ जैतून धीमे से मुसकराई, ‘‘मैं अपना एकएक गहना बेच दूंगी.’’   शाहिद भौचक्का रह गया, ‘‘तुम गहने बेच दोगी?’’

‘‘गहने तो फिर बन सकते हैं, पर अल्लाह न करे, अगर आप को कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगी? कहां जाऊंगी? अगर औरत एक बार शौहर जैसे गहने से महरूम हो जाए तो सारी जिंदगी उसे वह गहना नसीब नहीं होता. औरत के लिए सब से अच्छा, सब से प्यारा गहना उस का शौहर ही होता है.’’

‘‘जैतून,’’ शाहिद की आवाज गले में रुंध गई. उस ने उस का हाथ अपने हाथ में ले कर चूमा, ‘‘तुम कितनी अच्छी हो और मैं कितना खुशनसीब हूं.’’

शाहिद ने कभी भी जैतून को अपने काबिल नहीं पाया था. उसे जैतून इतनी ऊंची लगती थी कि वह उस बुलंदी तक पहुंचने की सोच  भी नहीं सकता था. जब उस ने सुहागरात को पहली बार जैतून को देखा था तो उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ था कि नूर के सांचे में ढली लड़की उस की बीवी बन सकती है. जैतून किस्सेकहानियों की शहजादी की तरह थी. वह किसी शहजादे के ही काबिल थी. किस्मत ने उसे जैतून का जीवनसाथी बना दिया था. वह दहेज में इतने सारे सोने के गहने लाई थी कि शाहिद और भी हीनता महसूस करने लगा था.

जैतून ने अपने हुस्न और मोहब्बत से ही नहीं, बल्कि अपने बातव्यवहार से भी उसे दीवाना बना दिया था. वह सब्रशुक्र से जीवन बिताने वाली औरत साबित हुई थी. शादी के 8-9 साल गुजर जाने के बाद भी जैतून की मोहब्बत में जरा भी फर्क नहीं आया था. शाहिद भी जैतून को उतना ही चाहता था.

लगभग 7 माह पहले शाहिद बच्चों को पढ़ाने साइकिल से स्कूल जा रहा था कि एक हादसे का शिकार हो गया. तेज रफ्तार ट्रक उस की जान तो नहीं ले सका, लेकिन उस का पैर कुचल दिया था. पिंडली की हड्डी बुरी तरह टूट गई थी. अब वह सिर्फ बिस्तर पर ही लेटा रह सकता था. उस छोटे से शहर में होने वाले इलाज से उसे जरा भी फायदा नहीं हुआ था. टांग पर हलका सा भी जोर देने पर दर्द की इतनी तेज लहर उठती थी कि जान निकलने लगती थी.

अस्पताल के डाक्टरों ने उसे किसी बड़े शहर में जा कर दिखाने की सलाह दी थी. टांग के इसी दर्द ने उस की नींद, सुकून, चैन व आराम लूट लिया था. जैतून से उस की तकलीफ देखी नहीं जाती थी. उस ने सुना था कि कराची के एक बड़े अस्पताल में हड्डी के इलाज का अच्छा बंदोबस्त है. वहां शाहिद की टांग इस काबिल हो सकती है कि वह चलफिर सकेगा. आज शाहिद पर यह भेद खुला था कि जैतून उस का इलाज किसी प्राइवेट अस्पताल में कराएगी.

बहुत देर बाद शाहिद ने उस से कहा, ‘‘वहां डाक्टर सिर्फ चेकअप की फीस ही 4-5 सौ रुपए तक लेते हैं.’’   ‘‘मुझे पता है.’’ जैतून ने लापरवाही से कहा.

‘‘बात सिर्फ भारी फीस की ही नहीं है,’’ शाहिद बोला, ‘‘अस्पताल के कमरे का किराया भी 3-4 सौ रुपए से कम नहीं होता. फिर वे दर्जनों टेस्ट भी कराते हैं. हर चीज की फीस अलग होती है. अगर मेरा कोई बड़ा औपरेशन हुआ और पैर काटने की नौबत आ गई तो उस पर भी हजारों रुपए का खर्च आएगा.’’

‘‘खुदा न करे कि पैर कटने की नौबत आए,’’ जैतून तड़प कर रुंधी आवाज में बोली, ‘‘आप ऐसी बातें मत करें, मेरा दिल डूबने लगता है.’’

‘‘मैं खुदा को फरेब नहीं देना चाहता. हकीकत को झुठलाना अक्लमंदी नहीं है,’’ शाहिद ने बड़े हौसले से कहा, ‘‘मैं तुम्हें भी अंधेरे में नहीं रखना चाहता, क्योंकि खुदा के बाद अब तुम ही मेरा सहारा हो और मैं तुम्हारे बिना बिलकुल अधूरा हूं जैतून. अगर मैं एक पैर खो भी बैठा तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा. मेरे अंदर हालात से मुकाबला करने का बहुत हौसला है.’’

डाक्टर नवेद बहुत थक चुका था. उस ने लगातार 5 बड़े औपरेशन किए थे. वह अपने कमरे में आ कर बैठा तो उसे बहुत तेजी से कौफी की तलब लगी. उस ने इंटरकाम पर नर्स से कौफी के लिए कह कर अपने आप को एक सोफे पर गिरा दिया और आंखें बंद कर के टांगें पसार दीं. कुछ ही देर में आंख भी लग गई. अचानक किसी शोर से उस की आंख खुली तो वह हड़बड़ा कर उठ बैठा. कमरे के बाहर एक औरत चीखचीख कर कह रही थी, ‘‘मुझे अंदर जाने दो, डाक्टर से बात करने दो, मेरे शौहर की हालत बहुत नाजुक है.’’

‘‘इस वक्त डाक्टर साहब मरीज नहीं देखते. तुम कल शाम को मरीज को ले कर आना.’’ नर्स उसे समझा रही थी.   ‘‘मेरे शौहर की जान खतरे में है और तुम कल आने के लिए कह रही हो,’’ उस औरत ने पूरी ताकत से चीख कर कहा, ‘‘तुम औरत हो या जानवर, चलो हटो सामने से.’’

फिर अगले ही लम्हे दरवाजा एक धमाके से खुला और एक औरत पागलों की तरह अंदर दाखिल हो गई. उस के पीछे नर्स थी, जो उसे अंदर जाने से रोक रही थी. जैसे ही उस औरत की नजर डा. नवेद पर पड़ी, वह उस की तरफ बिजली की तरह लपकी. लेकिन नवेद के पास पहुंच कर वह ठिठक गई. उस ने नवेद को देखा तो आंखें हैरत से फैल गईं. वक्त की नब्ज रुक सी गई. वह कुछ लमहे तक सकते के आलम में खड़ी रही, फिर उस के होंठों में जुंबिश हुई, ‘‘नवेद… तुम…!’’

‘‘जैतून!’’ नवेद झटके से उठ खड़ा हुआ.   जैतून की आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया. वह किसी नाजुक सी शाख की तरह लहराई, ‘‘मेरा सुहाग बचा लो नवेद… नहीं तो मैं…’’ इस के आगे वह एक भी लफ्ज नहीं बोल सकी. अगर नवेद तेजी से आगे बढ़ कर उसे संभाल न लेता तो वह फर्श पर गिर चुकी होती.

जैतून पलंग पर बेहोशी के आलम में पड़ी थी. नवेद पलंग के पास कुर्सी पर बैठा कौफी की चुस्की ले रहा था. उस की नजरें जैतून के हसीन चेहरे पर जमी थीं. यह वही चेहरा था, जो आज भी उस के दिल पर नक्श था. उसे देखतेदेखते वह बहुत दूर चला गया. उस के दिमाग की खिड़कियां खुलने लगीं. उस ने सोचा, जैतून जो कभी उस की मोहब्बत थी, उन दोनों में बेइंतहा प्यार था. उस की जिंदगी का हर लम्हा जैतून की याद में जकड़ा हुआ था. क्या आज भी जैतून के दिल के किसी कोने में उस की याद बसी होगी?

जैतून तो उस की मोहब्बत में पागल थी. फिर बेवफा कौन था? वह वक्त, जिस पर किसी का अख्तियार नहीं होता है, जो किसी का नहीं होता है. वायदों की जंजीर को किस ने तोड़ा था, उस ने या जैतून ने? जैतून ही तो बेवफा निकली थी. कहा था, ‘मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’ उस ने जैतून से सिर्फ 5 साल इंतजार करने के लिए कहा था. वे 5 साल पलक झपकते गुजर गए थे. लेकिन जब वह वापस आया तो सुना कि जैतून की शादी हो चुकी है.

जब जैतून किसी की हो चुकी थी तो उस की तलाश बेकार थी. उस ने अपने सीने में एक गहरा जख्म ले लिया था, जिस की दवा खुद उस के पास नहीं थी. जिस के पास दवा थी, वह किसी और की हो चुकी थी. अब अचानक जैतून उस की राह में आ कर खड़ी हो गई थी और आज देख कर कि वाकई वह किसी और की बन चुकी है. नवेद को महसूस हो रहा था, जैसे उस के दिल में बर्छियां उतरती जा रही हों. वह सीने में किसी जख्मी परिंदे की तरह फड़फड़ाता हुआ दिल थामे सोचने लगा, आखिर जैतून और उस के शौहर का क्या जोड़ है? शाहिद जैतून के किसी लायक भी तो नहीं है.

नवेद ने जैतून के जिस्म पर परखने वाली एक नजर दौड़ाई. 3 बच्चों की मां बन कर भी वह नहीं ढली थी, बल्कि और भी नशीली हो गई थी. तकदीर ने एक शहजादी को एक मामूली से गुलाम की झोली में डाल दिया था. सोचतेसोचते नवेद का दिमाग अचानक बहकने लगा. वह एक खयाल से अचानक यूं उछल पड़ा, जैसे उसे करंट लगा हो. उस ने सोचा, जैतून को हासिल करने का उसे सुनहरा मौका मिल रहा है.

सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी. वह बड़ी आसानी से जैतून के शौहर को मौत की नींद सुला सकता है. कोई जैतून के शौहर की मौत को चैलेंज भी नहीं कर सकेगा. पर जैतून को क्या वह अपना बना पाएगा? क्या वह यह सदमा सह सकेगी? पर दुनिया की न जाने कितनी औरतें यह सदमा सह जाती हैं. वे मर तो नहीं जातीं, जैतून भी नहीं मरेगी. वह खुद ही नहीं, वक्त भी जैतून के जख्मों को सुखा देगा. दुनिया में वक्त से बड़ा कोई मरहम नहीं है. जैतून बच्चों के लिए उस का सहारा पा कर अपने शौहर की मौत को जल्द ही भुला देगी.

मगर जैतून अपने शौहर की मौत की सूरत में उस पर शक भी तो कर सकती है. नवेद के दिमाग में यह खयाल बिजली की तरह आते ही उस का सारा जिस्म पसीने में डूब गया. नवेद ने इस खयाल को जेहन से झटक दिया. उस का काम किसी की जान लेना नहीं है. बरसों से बसेबसाए घर को उजाड़ना दरिंदगी है, कत्ल है. एक डाक्टर होने के नाते खुदगर्जी के अंधे जुनून में डूब जाना उस के लिए बहुत ही शर्मनाक होगा. नवेद एक नई सोच, नए हौसले के साथ सिर्फ और सिर्फ एक डाक्टर बन कर जैतून के शौहर को देखने के लिए उठ खड़ा हुआ.

चेक करने पर नवेद ने जाना कि औपरेशन के सिवा और कोई चारा नहीं है. वह शाहिद के औपरेशन से फुरसत पाने के बाद जब औपरेशन थिएटर से निकला तो उस ने अपने आप को बेहद हल्काफुल्का और शांत महसूस किया. उस ने जैतून को बेचैनी से इंतजार करते पाया. उस ने बेताबी से उस के पास आ कर पूछा, ‘‘शाहिद कैसे हैं?’’

‘‘वह अब खतरे से बाहर हैं.’’ नवेद ने मुसकराते हुए उसे तसल्ली दी.   ‘‘नवेद,’’ जैतून की आंखें आंसुओं से भर गईं, ‘‘मैं तुम्हारा यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी.’’   ‘‘मगर जैतून, हमें तुम्हारे शौहर की जान बचाने के लिए उन की टांग काटनी पड़ी.’’ नवेद ने ठहरठहर कर धीमे लहजे में बताया.

जैतून की आंखों में अंधेरा सा छा गया. उस ने सदमे से भर कर अपना सीना दबा लिया, ‘‘मेरे अल्लाह! यह क्या हुआ.’’   ‘‘इस के सिवा और कोई चारा नहीं था,’’ नवेद ने कहा, ‘‘टांग में जहर फैल गया था. अगर पहले ही इलाज पर पूरी मेहनत की गई होती तो यह नौबत न आती.’’

नवेद अपनत्व से आगे बोला, ‘‘जैतून, इस क्वार्टर में तुम अपने बच्चों के साथ रह सकती हो. जब तक शाहिद पूरी तरह से सेहतमंद नहीं हो जाते, तुम्हें किसी तरह की फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है. अलबत्ता शाहिद अस्पताल के कमरे में ही रहेंगे, क्योंकि उन्हें जल्दी ठीक होने के लिए आराम की सख्त जरूरत है. इस क्वार्टर में रहने पर बच्चों की वजह से उन्हें आराम नहीं मिल पाएगा.’’

जैतून ने एक पोटली नवेद के सामने रखी तो हैरत से उस ने जैतून की तरफ देखा, ‘‘यह क्या है जैतून?’’

‘‘गहने,’’ वह नवेद से नजरें नहीं मिला सकी, इसलिए नीची कर के बोली, ‘‘यह तुम्हारी और औपरेशन की फीस है. शाहिद के कमरे, खानेपीने और दूसरे मेडिकल खर्चे के लिए मेरे पास कुल पूंजी यही है. अगर इन गहनों को बेचने के बाद भी रकम कम पड़े तो मैं बाद में थोड़ाथोड़ा कर के अदा कर दूंगी.’’

‘‘जैतून!’’ नवेद की आवाज में दुख भर गया, ‘‘क्या तुम मुझे अपनी नजरों में जलील करना चाहती हो? क्या तुम मेरे जज्बात और हमदर्दी की कीमत लगा रही हो?’’   ‘‘नहीं नवेद,’’ वह झुकी पलकों से फर्श को घूरती रही, ‘‘मैं आज खुद ही अपनी नजरों में जलील हो रही हूं. मैं खुद भी नहीं जानती कि तुम्हारे एहसानों का बदला कब और कैसे अदा करूं.’’

‘‘मैं इन गहनों को हाथ लगाना तो दूर, इन की तरफ देखना भी पसंद नहीं करूंगा,’’ नवेद ने उस के चेहरे पर नजरें जमा कर कहा, ‘‘ये गहने तुम्हारे सुहाग, प्यार और मोहब्बत भरी जिंदगी की निशानियां हैं. बस, मैं तुम से आज सिर्फ एक ही सवाल करना चाहता हूं.’’

‘‘मगर आज तुम अपने सवाल का जवाब पा कर क्या पाओगे नवेद? मैं ने अतीत को, और अपने आप को भुला दिया है.’’   ‘‘मुझे क्या पाना है जैतून,’’ नवेद ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे जवाब से मेरे दिल में जो बरसों से फांस गड़ी है, वह निकल जाएगी.’’

‘‘तुम मुझ से यही पूछना चाहते हो न कि मैं ने जब तुम से इंतजार करने का वायदा किया था तो तुम्हारा इंतजार क्यों नहीं किया? झूठ क्यों बोला?’’   ‘‘हां जैतून,’’ नवेद ने सिर हिला दिया, ‘‘जब मैं ने वापस आ कर सुना कि तुम ने शादी कर ली है तो मेरे दिल पर कयामत सी टूट पड़ी.’’

जैतून गुमसुम सी बैठी रही. जैसे वह बहुत शर्मिंदा हो रही हो. उस का दिमाग जैसे भूतकाल की गहराइयों में जा पहुंचा. वह कुछ देर बाद बोली तो उस की आवाज रुंधी हुई थी, ‘‘तुम्हारे जाने के एक साल बाद अम्मी पर अचानक दिल का जबरदस्त दौरा पड़ा. वह उस दौरे से संभल नहीं सकीं.  एक तो उन्हें वक्त पर सही मेडिकल एड नहीं मिली और डाक्टरों की लापरवाही या मौत के बहाने ने उन्हें मुझ से छीन लिया. उन की इस अचानक मौत से मैं इतनी बड़ी दुनिया में अकेली रह गई.

‘‘तुम तो जानते ही हो कि इस दुनिया में मां के अलावा मेरा कोई भी नहीं था. तुम उस वक्त लंदन में थे. मेरे पास तुम्हारा पता भी नहीं था. मैं तुम्हारा पता लेने तुम्हारे घर कैसे जा सकती थी. इतने बड़े घर में जाती तो जलील और रुसवा हो कर आती.

‘‘तुम ने अपनी मोहब्बत को राज रखा था. फिर मैं ने सोचा कि इंतजार के 4 साल काट लूंगी. लेकिन मुझे मालूम हुआ कि जिंदगी बहुत कठिन है. खासतौर पर एक जवान, हसीन और बेसहारा लड़की के लिए तो हर तरफ भेडि़ए ही भेडि़ए मौजूद होते हैं. दुनिया वालों ने मुझे भी लूट का माल समझ लिया था. न जाने कैसेकैसे लोग मेरा हाथ थामने को तैयार थे. अगर मैं तुम्हारा इंतजार करती रहती तो किसी न किसी भेडि़ए का शिकार हो जाती. मुझे उठा ले जाने की कोशिश की गई. 2 बार मेरी आबरू लुटतेलुटते बची. फिर मैं ने शाहिद का हाथ थाम लिया. वह एक स्कूल टीचर था और उस के पास इल्म की दौलत थी.’’

जैतून सांस लेने के लिए रुकी. उस के बाद उस की आवाज फिजा में लहराई, ‘‘सांसारिक दौलत उस के पास नहीं थी. लेकिन जिस दिन शाहिद से मेरी शादी हुई, उसी दिन से मैं ने दिल का वह कोना बंद कर दिया, जिस में तुम्हारी तसवीर छिपी थी. इसलिए कि अब शाहिद ही मेरा सब कुछ था. शाहिद ने मुझे इतनी मोहब्बत दी कि तुम्हारी तसवीर धुंधली पड़ गई. फिर मैं शाहिद की ही दुनिया में खो गई. मैं उस का वजूद बन गई. मैं अगर ऐसा नहीं करती तो फिर क्या करती?’’

‘‘तुम ने बहुत अच्छा किया. एक औरत का ऐसा रूप होना चाहिए,’’ नवेद ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारी हर याद को मिटाने के लिए शादी की थी. मेरा खयाल था कि एक औरत ही मेरा दुख बांट सकती है और वह मुझे तुम्हारी ही तरह से चाहेगी. मगर हम दोनों में 6-7 माह से ज्यादा निबाह न हो सका और हम दोनों सदा के लिए अलग हो गए.’’  ‘‘वह क्यों,’’ जैतून ने हैरत से पूछा, ‘‘मुझे यकीन नहीं आ रहा है.’’

वह भी डाक्टर थी. मैं ने सोचा था कि इस तरह हम जिंदगी के सफर में एकदूसरे के बेहतरीन साथी साबित होंगे, मगर ऐसा नहीं हो सका. वह सिर्फ और सिर्फ लेडी डाक्टर रहना चाहती थी. मुझे तो ऐसी बीवी की जरूरत थी, जिस के वजूद से सारा घर महकता.

‘‘हैरत की बात है. क्या एक औरत भी इस अंदाज में सोच सकती है?’’ जैतून हैरानी से बोली, ‘‘हर औरत तो एक जैसी नहीं होती. अब तुम बस जल्दी से अपना घर बसा लो.’’   ‘‘अब तुम आ ही गई हो तो मेरे लिए भी अपनी जैसी ही औरत ढूंढ देना,’’ नवेद ने कहा, ‘‘ऐसी औरत, जो घर की चारदीवारी में रह कर तुम्हारी ही तरह चाहे.’’

शाहिद की अभी ज्यादा देखभाल की जरूरत थी. कोई और मरीज होता तो डाक्टर नवेद उसे छुट्टी दे देता. मगर शाहिद जैतून का शौहर था और इस नाते नवेद शाहिद को उस वक्त तक अस्पताल में रखना चाहता था, जब तक वह पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो जाता. उस ने जैतून से कह दिया था कि उसे दो-एक महीने तक यहीं रहना होगा. जैतून ने इस शर्त पर वहां रह कर शाहिद का इलाज मंजूर किया था कि वह अस्पताल में कोई नौकरी कर लेगी.

डा. नवेद के लिए जैतून को नौकरी देना कोई बड़ी समस्या नहीं थी. असली मसला तो जैतून के बच्चे थे. वह बच्चों से 8-10 घंटे अलग रह कर कोई काम नहीं कर सकती थी. इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए नवेद ने जैतून को यह काम सौंपा कि वह उस के बंगले पर आ कर उस के लिए नाश्ता और दोनों वक्त का खाना बना दे.

जैतून को नवेद की अमीरी का पहले से कुछ अंदाजा नहीं था. शादी से पहले जब वह नवेद की मोहब्बत में गिरफ्तार हुई थी, तब भी वह सिर्फ यही जानती थी कि वह एक बड़े बाप का बेटा है. वह यही समझती थी कि नवेद इस अस्पताल में नौकर है, पर जब उस ने देखा और सुना कि नवेद ही इस अस्पताल का मालिक है तो वह हैरान भी हुई और खुश भी.

जब उस ने नवेद के घर में कदम रखा तो घर को अंदर से देख कर उस के दिल में कांच की किरच सी चुभ गई. उस ने कभी ऐसे ही घर का ख्वाब देखा था, मगर वे ख्वाब दगाबाज निकले थे. फिर एक आवारा सा खयाल जैतून के दिमाग में आया कि काश! वह नवेद की बीवी होती तो इस घर में राज कर रही होती. फिर उस ने इस बेहूदा खयाल को अपने दिमाग से निकाल फेंका. अब वापसी संभव नहीं थी.फिर ऐसी हालत में शाहिद को मंझधार में छोड़ देना औरत की जात पर बदनुमा धब्बा था.

उधर न जाने क्यों नवेद महसूस कर रहा था कि जैतून फिर से उस के दिमाग पर किसी बदली की तरह छा रही है और वह उस के जादू में कैद हो रहा है. 8-10 दिनों में ही जैतून में अजीब सा निखार आ गया था. बेफिक्री, अच्छे खानपान और मानसिक शांति ने उसे फिर से जवान कर दिया था. उस के गालों पर सुर्खी झलकने लगी थी. जैतून सुबह जब उस के लिए नाश्ता तैयार करने आती थी तो उस का रूप नया होता था और जब वह उस के सामने से गुजरती थी तो जिस्म की खुशबू सुरूर दे जाती थी.

नवेद अपनी पहली बीवी के बारे में सोचता और उस का जैतून से मिलान करता. पहली बीवी खूबसूरत थी, लेकिन नवेद की जिंदगी और घर में कभी उस ने खुशी महसूस नहीं की थी. नवेद को वह हमेशा ठंडी लाश जैसी महसूस होती थी. उस के रहते घर में अजीब सी मुर्दनी और वहशत का एहसास होता था.

लेकिन जब से जैतून ने इस घर में कदम रखा था, सारा घर और उस की जिंदगी जैसे जगमगाने लगी थी. नवेद ने महसूस किया था कि उसे जैतून जैसी सुघड़, सलीकेदार और पुरशबाब औरत कहीं नहीं मिल सकती. वह उस की कमजोरी बनती जा रही थी और अब उसे जैतून के बिना जिंदगी गुजारना मुश्किल नजर आ रहा था.

घर की तनहाई डा. नवेद को किसी सांप की तरह डसती महसूस होती थी. वैसे तो जैतून कभीकभी किसी एक बच्ची को ले आती थी, पर अकसर वह अकेली ही आती थी. उस का अकेले आना नवेद की रगों में खून का बहाव तेज कर देता था. फिर भी उस ने कभी जैतून के भरोसे को ठेस पहुंचाने की कोशिश नहीं की. एक दिन रात के खाने पर जैतून भी थी. वह बच्चों को खिलापिला कर सुला कर आई थी. खाने से फुरसत पा कर वे दोनों बैठे कौफी पी रहे थे कि नवेद ने जैतून की तरफ देखा. वह उसे परेशान और चिंतित दिखाई दी. नवेद ने पूछा, ‘‘जैतून क्या सोच रही हो तुम?’’

‘‘मैं सोच रही हूं कि अब वापस जा कर अपनी जिंदगी की शुरुआत कैसे और किस अंदाज में करूं? मुझे अपनी और शाहिद की फिक्र नहीं है. फिक्र मुझे अपने बच्चों की है. शाहिद ट्यूशन कर के कितना कमा सकेगा? उस आमदनी से तो पेट भरना ही मुश्किल पड़ेगा. मैं अगर घर से काम करने के लिए निकलूं तो घर चौपट हो जाएगा. मालूम नहीं, मुझे कोई काम देगा भी या नहीं.’’

‘‘जैतून, मैं एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानोगी?’’ नवेद की आवाज में अजीब सी कंपकंपाहट थी. जैतून ने उस के आवाज के कंपन पर चौंक कर उस की तरफ देखा, ‘‘मैं और तुम्हारी किसी बात का बुरा मानूं, यह कैसे हो सकता है.’’

‘‘जैतून,’’ नवेद को अपनी आवाज कहीं दूर से आती महसूस हो रही थी, ‘‘मैं आज भी तुम से उतनी ही मोहब्बत करता हूं, जितनी कल करता था. न जाने क्यों यह जानते हुए भी तुम्हें फिर से पाने की चाह पैदा हो रही है कि तुम किसी और की बीवी हो, अमानत हो किसी गैर की. मुझे महसूस होने लगा है कि अब मैं तुम्हारे बिना जिंदगी का एक लम्हा भी नहीं गुजार सकूंगा. अगर तुम मेरी बन गईं तो फिर तुम्हारे लिए कोई समस्या नहीं रहेगी.’’

‘‘नवेद,’’ जैतून इस तरह से उछल पड़ी, जैसे नवेद के शब्द जहरीले डंक बन कर उस के वजूद में गड़ गए हों, ‘‘तुम ने यह क्यों नहीं सोचा कि मैं एक औरत हूं और शाहिद से मुझे जो इज्जत हासिल है, वह किसी और मर्द को अपनाने में नहीं है.

‘‘अब उसे मेरी जरूरत है. वह मेरा वजूद बन गया है.’’ जैतून सांस लेने के लिए रुकी, फिर बोली, ‘‘तुम ही बताओ, क्या औरत अपने शौहर के होते हुए किसी और की भी हो सकती है?’’

‘‘तुम ने मेरी बात का गलत मतलब समझा है,’’ नवेद ने जल्दी से कहा, ‘‘तुम शाहिद से तलाक ले लो. शाहिद का क्या है, वह किसी न किसी तरह जी लेगा.’’

‘‘तो तुम यह चाहते हो कि मैं शाहिद को हालात के रहमोकरम की चक्की में पिसने के लिए छोड़ दूं? क्या तुम मुझ से इस बात की उम्मीद रखते हो?’’ जैतून तेजी से बोली.

‘‘अगर तुम ने मेरी बात पर गंभीरता से गौर नहीं किया और नहीं मानी तो सारी जिंदगी पछताओगी, क्योंकि तुम्हारी बेटियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. आज के जमाने में एक लड़की की शादी करना कितना मुश्किल काम है, तुम अच्छी तरह जानती हो. कल तो और भी मुश्किल होगी. तुम शाहिद को छोड़ कर मेरे पास आ जाओगी तो मेरा फर्ज बनता है कि मैं तुम्हें खुश रखूं और तुम्हारी लड़कियों की शादी खूब धूमधाम से करूं. अब मुझ से जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही.’’

जैतून झटके से कुरसी से उठ खड़ी हुई. वह उस से गिड़गिड़ा कर बोली, ‘‘नवेद, खुदा के लिए मुझे यूं इम्तिहान में मत डालो.’’   ‘‘तुम जज्बाती बन कर मत सोचो. कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा जज्बाती फैसला कल नाउम्मीदी की नजर हो जाए.’’

‘‘शायद तुम ठीक कहते हो,’’ जैतून दरवाजे की तरफ बढ़ी और फिर रुक गई. उस ने नवेद की आंखों में अजीब सी चमक देखी थी. वह बड़े मजबूत लहजे में बोलती चली गई, ‘‘शाहिद से तलाक लेने और तुम से शादी करने पर सारी जिंदगी के लिए मुझ पर दाग लग जाएगा. मुझे मर जाना मंजूर है, लेकिन बदनामी कुबूल नहीं. तुम मुझे मेरे हाल पर ही छोड़ दो.’’

जैतून बंगले से निकल कर अस्पताल के उस कमरे में जा पहुंची, जहां शाहिद गहरी नींद सो रहा था. नींद की गोली की गिरफ्त में जकड़ा वह दुनिया से बेखबर था. जैतून कुछ देर तक उसे खालीखाली नजरों से देखती रही. फिर जब वह अपने क्वार्टर में आई तो उस ने अपनी बच्चियों को गहरी नींद में डूबी पाया. वे नरम नाजुक कलियां सी लग रही थीं. उसे ऐसा लग रहा था कि वे कलियां जमाने की सर्दीगर्मी नहीं सह सकेंगी और कुम्हला जाएंगी. वक्त के बेरहम हाथ उन से सब कुछ छीन लेंगे. शाहिद तो उन्हें पेट भर दो वक्त की रोटी भी नहीं खिला सकेगा.

जैतून जब सोने के लिए बिस्तर पर लेटी तो उस की आंखों के सामने नवेद का चेहरा उभर आया. उस ने महसूस किया कि उस के दिल के किसी कोने में नवेद की मोहब्बत जाग रही है. नवेद की बदौलत ही उस के शौहर को नई जिंदगी मिली थी. वह उस से आज मोहब्बत की भीख मांग रहा था. जैतून ने नवेद से पहली मोहब्बत की थी और फिर उस ने शाहिद को पाने के बाद अपने दिल का दरवाजा हमेशाहमेशा के लिए बंद कर कर लिया था.

इस के बाद उस के दिल में बसी नवेद की तसवीर धुंधली होती चली गई थी. मगर आज फिर से वह दरवाजा खुल गया था. सोई हुई मोहब्बत धीरेधीरे जाग रही थी और नवेद उस के वजूद में रचबस गया था. वह आज अपने आप को दोराहे पर खड़ी महसूस कर रही थी. उस के दिमाग में बहुत से उलझेउलझे और अजीबोगरीब खयाल पैदा हो रहे थे. दिल जैसे डूबता जा रहा था. जैतून ने हैरत से उस शीशी को देखा. उस के बाद प्रश्नवाचक दृष्टि से नवेद को देखने लगी, ‘‘इस में क्या है नवेद?’’

‘‘जहर है.’’ नवेद ने जैतून की कमर में हाथ डाल कर उसे अपने करीब कर लिया.   जैतून के हाथ से शीशी छूटतेछूटते बची. आवाज कंपकंपा सी गई, ‘‘क्या मेरा जुर्म छिप जाएगा?’’

‘‘तुम पर कोई शक नहीं करेगा. इसलिए कि इस तरह का जहर आम आदमी की पहुंच से बाहर की चीज है. यह जहर खाते ही आदमी कुछ ही लमहों में मौत की गोद में समा जाता है. तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि शाहिद की मौत से शक नहीं होगा कि उसे जहर दिया गया है. यह दिल की धड़कन बंद कर देता है. तुम दूध में जहर मिला कर पिलाने के बाद गिलास को कपड़े से अच्छी तरह साफ कर देना. फिर उस के हाथ में गिलास थमा देना, ताकि उस पर उस की अंगुलियों के निशान बन जाएं. अगर किसी शक की बिना पर गिलास का परीक्षण भी किया जाए तो उस पर शाहिद की अंगुलियों के निशान हों, जिस से यही समझा जाएगा कि उस ने आत्महत्या की है. तुम्हें मौका मिले तो उस गिलास को कपड़े से पकड़ कर जरा सा धो देना और उस में बिना जहर मिला थोड़ा सा दूध डाल देना… फिर तो तुम पर कोई आंच नहीं आएगी. पुलिस यही समझेगी कि उस की मौत किसी सदमे से हो गई है.’’

‘‘खुदकुशी की बुनियाद क्या होगी?’’ जैतून ने डरे हुए लहजे में पूछा, ‘‘हार्ट फेल भी किसलिए हो सकता है?’’

‘‘टांग का कट जाना… कुछ मर्द अपाहिजपन और दूसरों पर बोझ बन कर जिंदगी गुजारने से बेजार हो कर मर जाना पसंद करते हैं. यह सदमा जानलेवा भी साबित हो सकता है. तुम तसल्ली रखो, बात पुलिस तक नहीं पहुंचेगी, क्योंकि इस मौत का सर्टीफिकेट तो मैं ही जारी करूंगा.’’

‘‘पुलिस यह भी तो सोच सकती है कि शाहिद को जहर दिया गया है और यह जहर एक मामूली मरीज के पास कैसे और कहां से आया?’’

‘‘तुम किसी फिक्र में मत पड़ो और ज्यादा गहराई में मत जाओ. यह भी कहा जा सकता है कि किसी नर्स को लालच दे कर मरीज ने जहर हासिल कर लिया होगा,’’ नवेद ने उस का हौसला बढ़ा दिया, ‘‘मैं ने तुम्हें जितना बताया, बस तुम उतना ही करो.’’   ‘‘ठीक है, मैं जा रही हूं.’’ जैतून बोली.

‘‘कोशिश करना कि तुम किसी की नजर में न आओ. वहां से तुम सीधी मेरे पास चली आना और कौफी तैयार कर के रखना.’’ नवेद ने जैतून का बाजू पकड़ कर अपने करीब कर लिया.

‘‘तुम्हारे लिए कौफी तैयार कर के अपनी कोठरी में क्यों न चली जाऊं,’’ जैतून कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘तुम्हारे पास आ कर मैं क्या करूंगी?’’   ‘‘इसलिए कि तुम्हारी मौजूदगी मैं अपने यहां साबित कर सकूं?’’

‘‘लेकिन इस में भी तो खतरा है,’’ जैतून बोली, ‘‘सारे अस्पताल वालों को पता है कि मैं तुम्हारे घर पर काम करती हूं. कल मुझ पर यह इलजाम लग सकता है कि मैं ने तुम्हारी मोहब्बत में अपने शौहर की जान ले ली. लिहाजा, मैं उसे जहर दे कर क्यों न अपनी कोठरी में चली जाऊं. मैं अपने शौहर को जहर दे कर बाथरूम के पिछले दरवाजे से निकल जाऊंगी.’’

‘‘मगर तुम मुझे इस की खबर कैसे दोगी? मेरा तुम्हारी कोठरी की तरफ आना मुनासिब नहीं है.’’ नवेद ने कहा.   ‘‘मैं तुम्हारे पास भी पिछले दरवाजे से ही आऊंगी, ताकि तुम्हारे चौकीदार की मुझ पर नजर न पड़ सके. इस तरह हम दोनों पर ही शक नहीं किया जाएगा.’’   ‘‘तुम इतनी अक्लमंद और होशियार होगी, मुझे अंदाजा नहीं था.’’ नवेद खुश हो कर बोला.

जैतून जब पिछले रास्ते से बाहर निकल गई तो डा. नवेद ने चैन की सांस ली. थोड़ी ही देर बाद वह अस्पताल के राउंड पर जाने के लिए निकल पड़ा. गेट पर चौकीदार मौजूद था. जिस वक्त जैतून अंदर आई थी, वह नमाज के लिए गया हुआ था, इसलिए गेट खाली था.

डा. नवेद अस्पताल में 20-25 मिनट तक राउंड पर रहा. उस के लिए वक्त काटना दूभर हो गया था. जब वह घर वापस आ कर अपने बेडरूम में पहुंचा तो उस ने जैतून को देखा, जो उस के बेडरूम में कौफी लिए बैठी थी. डा. नवेद ने जैतून का शांत चेहरा देखा तो उसे यकीन नहीं आया. जैसे वह शाहिद को जहर नहीं, अमृत पिला कर आई हो. आखिर जैतून ने उस की मोहब्बत के आगे हथियार डाल ही दिए. नवेद ने जब उसे बाजुओं में भर लिया तो वह उस के गले में बांहें डाल कर उस की आंखों में झांकने लगी. फिर धीरे से बोली, ‘‘मुझे जल्दी से जाने दो, कहीं बच्चे जाग न जाएं. वे रोने लगेंगे तो पड़ोस में खबर हो जाएगी.’’

चंद लमहों बाद नवेद कुर्सी पर बैठ गया. कौफी का कप उठा कर उस ने एक घूंट लिया और पूछा, ‘‘काम हो गया?’’   ‘‘तुम ने तो मुझे बहुत सख्त इम्तिहान में डाल दिया था नवेद.’’ जैतून धीरे से बोली.

‘‘मोहब्बत का इम्तिहान तो हमेशा ही सख्त होता है जैतून.’’ उस की तरफ मोहब्बत भरी नजरों से देखते हुए नवेद ने दूसरा घूंट लिया.   ‘‘यह मोहब्बत का नहीं, बल्कि एक औरत का इम्तिहान था. औरत कभी मोहब्बत के इम्तिहान में नहीं डगमगाती.’’

‘‘औरत का इम्तिहान,’’ नवेद के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया, ‘‘वह कैसे?’’ उस ने तीसरे घूंट में सारी काफी हलक में उतार ली.   ‘‘मैं जब शाहिद के कमरे में पहुंची तो मेरे दिमाग में यह खयाल बिजली की तरह आया कि मैं शाहिद को नहीं, बल्कि एक औरत, बीवी और मां को जहर दे रही हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ नवेद की आंखों में हैरानी भर गई. उस ने अपनी पलकें झपकाईं, ‘‘मैं तुम्हारी बात समझा नहीं?’’   ‘‘मतलब यह है कि मैं एक वफादार बीवी, शौहरपरस्त औरत और जिम्मेदार मां की पवित्रता पर बदनुमा दाग बन रही हूं, इस अहसास ने मेरा सीना चीर दिया था.’’

‘‘तो क्या तुम ने शाहिद को जहर नहीं दिया?’’ नवेद ने वहशतभरे लहजे में पूछा.   ‘‘जहर तो मैं ने दे दिया, लेकिन शाहिद को नहीं, औरत की मजबूरी यही है कि वह अपनी फितरत और सोच पर काबू नहीं पा सकती.’’   ‘‘फिर तुम ने जहर किसे दिया? क्या तुम ने जहर की शीशी कहीं फेंक दी?’’

‘‘अपनी उस मोहब्बत को, जो नागिन बन कर बीवी, औरत और मां को डसना चाहती थी, मैं ने उसे अर्थात तुम्हें जहर दे दिया. वह जहर उस वक्त मैं ने कौफी के कप में घोल दिया था, जब मैं ने तुम्हारे कदमों की आहट सुनी थी. अब तुम और तुम्हारी मोहब्बत बस कुछ ही लमहों की मेहमान है,’’ नवेद का घबराया हुआ चेहरा देख कर जैतून मुसकरा दी, ‘‘तुम शायद भूल गए थे कि मेरे वजूद के किसी कोने में एक बीवी, मां और ईमानदार औरत अभी जिंदा है, जो अपनी मोहब्बत को तो जहर दे सकती है, मगर उन तीनों को नहीं, जो उस की सुनहरी दुनिया है.’’

नवेद ने चीख कर चौकीदार को आवाज देनी चाही, लेकिन आवाज उस के हलक से नहीं निकल सकी. उस ने अपनी जिंदगी के आखिरी लमहों में जैतून को यह कहते सुना, ‘‘मुझे माफ कर देना नवेद. कभीकभी औरत को अपने हाथों ही अपनी मोहब्बत की कब्र खोदनी पड़ती है.’’

नवेद ने जैतून को जो तरकीब बताई थी, वह उसी पर इस्तेमाल कर के अपनी कोठरी में जा पहुंची. उस ने अंदर आते ही अपनी सोती हुई बच्चियों को चूमा और उन के बगल में लेट कर सुकून से आंखें बंद कर लीं.  Hindi Suspense Story

Friendship Betrayal : विश्वासघात कि सजा 

Friendship Betrayal. गौरव राहुल का जिगरी दोस्त था. लेकिन सपना को ले कर दोनों में जो दुश्मनी पैदा हुई, उस में गौरव को जान से हाथ धोना पड़ा तो राहुल को उस की हत्या के अपराध में जेल जाना पड़ा.

दो पहर को कुछ बच्चे इंदिरानगर स्थित बुद्धा पार्क में क्रिकेट खेलने आए तो झाडि़यों के बीच खून से तरबतर लाश देख कर उन्होंने इस की सूचना पार्क के गार्ड राजेश सिंह को दे दी. उस ने भी झाडि़यों में जा कर देखा तो सचमुच वहां एक युवक की लाश पड़ी थी. उस ने तुरंत इस बात की जानकारी थाना कल्याणपुर पुलिस को दी. यह 13 फरवरी, 2016 की बात है.

थाना कल्याणपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर संतोष कुमार सिंह ने इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ इंदिरानगर स्थित बुद्धा पार्क के लिए निकल पड़े. घटनास्थल पर पहुंच कर लाश के निरीक्षण में उन्होंने देखा, मृतक युवक 20-22 साल का रहा होगा. उस के सिर में पीछे की ओर सटा कर गोली मारी गई थी, जहां से उस समय भी खून रिस रहा था. वह नीले रंग की जींस, कालेसफेद रंग की शर्ट और काले रंग के स्पोर्ट्स शूज पहने था. वहीं भूरे रंग की एक जैकेट भी पड़ी थी.

तलाशी में मृतक की जींस पैंट की जेब से पुलिस को 2 टिकट मिले, जिन में से एक टिकट कस्बा छिबरामऊ से गुरसहायगंज तक का बस का तथा दूसरा गुरसहायगंज से कल्याणपुर रेलवे स्टेशन (कानपुर) तक का ट्रेन का था.

टिकटों से अंदाजा लगाया गया कि मृतक कस्बा छिबरामऊ या उस के आसपास किसी गांव का रहने वाला था. वह छिबरामऊ से बस द्वारा गुरसहायगंज आया होगा और वहां से रेल द्वारा कल्याणपुर (कानपुर) आया था. वह यहां किसी के बुलाने पर आया था, जहां उस की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.

संतोष कुमार सिंह घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (ग्रामीण) सुरेंद्रनाथ तिवारी तथा सीओ राजेश कुमार सिंह भी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया.

इस के बाद पार्क के गार्ड राजेश सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि उस की ड्यूटी पार्क के मुख्य गेट पर रहती है. पार्क के पीछे की बाउंड्री टूटी है, इसलिए अपराधी प्रवृत्ति के लोग उधर से आ जाते हैं. मृतक युवक और उस के साथी भी पार्क में पीछे से ही आए होंगे. उस ने गोली चलने की आवाज भी नहीं सुनी थी.

अब तक घटनास्थल पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. लेकिन उन में से कोई लाश की शिनाख्त नहीं कर सका था. पहचान न होने से पुलिस ने फोटोग्राफर बुला कर लाश के विभिन्न कोणों से फोटो कराए. इस के बाद घटनास्थल की अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया.

मृतक की शिनाख्त के लिए संतोष कुमार सिंह ने लाश के फोटो अखबारों में छपवाए तो जब इसे छिबरामऊ निवासी अवनींद्रमोहन यादव ने देखा तो वह घबरा गए. क्योंकि उन का बेटा गौरव एक दिन पहले यह कह कर घर से निकला था कि वह कानपुर अपने दोस्त राहुल से मिलने जा रहा है.

लेकिन उस के बाद उन का उस से संपर्क नहीं हुआ था. क्योंकि उस का मोबाइल फोन स्विच औफ हो गया था. किसी अनहोनी की आशंका से घबराए अवनींद्रमोहन कुछ खास लोगों के साथ थाना कल्याणपुर पहुंच गए.

थानाप्रभारी संतोष कुमार सिंह को उन्होंने अपना परिचय दे कर थाने आने की वजह बताई तो वह उन्हें पोस्टमार्टम हाउस ले गए. अवनींद्रमोहन ने वहां रखी लाश देखी तो फफक पड़े. उन्होंने संतोष कुमार को बताया कि लाश उन के बेटे गौरव की है.

इस के बाद संतोष कुमार सिंह ने उन्हें धैर्य बंधा कर पूछा, आप बता सकते हैं कि गौरव की हत्या किस ने की होगी? सर, मुझे गौरव के दोस्त राहुल पर शक है. राहुल भी छिबरामऊ का ही रहने वाला है. इधर कुछ महीने से दोनों में किसी बात को ले कर अनबन चल रही थी. उसी से मिलने मेरा बेटा यहां आया था. मुझे लगता है कि राहुल ने ही दोस्तों के साथ मिल कर गौरव की हत्या की है. उसी ने गौरव का महंगा मोबाइल भी गायब किया है.

शक के आधार पर संतोष कुमार सिंह ने अवनींद्रमोहन की ओर से अपराध संख्या 110/2016 पर गौरव की हत्या का मुकदमा राहुल एवं उस के अज्ञात दोस्तों के खिलाफ दर्ज कर जांच शुरू कर दी. उन्होंने राहुल की गिरफ्तारी के लिए छिबरामऊ के मोहल्ला गोपालनगर स्थित उस के घर छापा मारा तो वह घर पर नहीं मिला.

उस के पिता रमेशचंद्र कमल ने बताया कि राहुल पनकी रोड, कल्याणपुर स्थित सेंगर हौस्टल में रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के साथ बीएससी की पढ़ाई कर रहा है. इस के बाद संतोष कुमार सिंह ने सेंगर हौस्टल पर छापा मारा, लेकिन वह वहां भी नहीं मिला. वह अपने रूमपार्टनर अजय के साथ गायब था. उस के कमरे पर ताला लगा था.

संतोष कुमार सिंह ने सर्विलांस की मदद लेने के साथ उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि गौरव की आखिरी बार राहुल के रूमपार्टनर अजय से बात हुई थी. इस के बाद राहुल के साथ अजय भी शक के घेरे में आ गया. क्योंकि वह भी राहुल के साथ गायब था.

17 फरवरी, 2016 की सुबह 10 बजे संतोष कुमार सिंह ने सर्विलांस की मदद से राहुल और उस के दोस्त अजय को कल्याणपुर के बिठूर रोड से पकड़ लिया. थाने ला कर उन से हत्या के संबंध में पूछा गया तो दोनों साफ मुकर गए.

राहुल का कहना था कि गौरव उस का जिगरी दोस्त था, ऐसे में वह उस की हत्या क्यों करेगा. लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो राहुल और अजय को टूटते देर नहीं लगी. राहुल ने गौरव की हत्या का अपराध स्वीकार कर के बताया कि गौरव ने उस की प्रेमिका छीन कर उस के साथ विश्वासघात किया, इसीलिए उस ने अपने दोस्त अजय के साथ मिल कर उसे मौत के घाट उतार दिया.

यही नहीं, इस के बाद उस ने बुद्धा पार्क की झाडि़यों में छिपा कर रखा वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिस से उस ने गौरव की हत्या की थी. अजय के पास से गौरव का मोबाइल भी बरामद कर लिया गया, जिस में से गौरव का सिम निकाल कर उस ने अपना सिम डाल लिया था. पूछताछ में प्रेमसंबंधों में हुई गौरव की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

कन्नौज जनपद का एक औद्योगिक कस्बा है छिबरामऊ. यहां अनाज और खोया की बड़ी मंडी है. इसी कस्बे के गोपालनगर में जगदीप कमल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी माला के अलावा 2 बेटियां सपना, पूनम तथा एक बेटा राजू था. जगदीप का खोया का कारोबार था. उसी से उन के परिवार का भरणपोषण होता था.

जगदीप कमल की बेटी सपना भाईबहनों में सब से बड़ी थी. वह पढ़ने में तेज थी, इसलिए जगदीप चाहते थे कि वह पढ़लिख कर कुछ बन जाए.

राहुल गोपालनगर में ही सपना के घर के पास रहता था. उस के पिता रमेशचंद्र कमल व्यापारी थे. परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे अशोक और राहुल थे. अशोक पिता के कारोबार में हाथ बंटाता था, जबकि राहुल पढ़ने में ठीकठाक था, इसलिए रमेशचंद्र उसे पढ़ालिखा कर अफसर बनाना चाहते थे. वह उस की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दे रहे थे.

एक ही जाति का होने की वजह से राहुल का सपना के घर आनाजाना था. इसी आनेजाने में सपना और राहुल का एकदूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ा तो धीरेधीरे यह आकर्षण प्रेमसंबंध में बदल गया. दोनों एकदूसरे को प्यार ही नहीं करने लगे थे, बल्कि समय के साथ उन का यह प्यार शारीरिक मिलन में बदल गया.

राहुल का जिगरी दोस्त था गौरव यादव. दोनों ही हमउम्र थे, इसलिए उन में गहरी दोस्ती थी. गौरव के पिता अवनींद्रमोहन यादव भी गोपालनगर में ही रहते थे. गौरव उन का एकलौता बेटा था. अवनींद्रमोहन प्रतिष्ठित और पढ़ेलिखे थे, इसलिए बेटे की पढ़ाई में विशेष रुचि लेते थे और उस का मार्गदर्शन भी करते रहते थे.

राहुल के तीन दोस्त थे, गौरव, अभिषेक और रोहित. इन में गौरव उस का सब से घनिष्ठ दोस्त था. उस से वह कभी कोई बात नहीं छिपाता था. उस ने गौरव से अपने और सपना के प्रेमसंबंधों के बारे में भी बता दिया था. एक दिन उस ने सपना से उसे मिला भी दिया था.

एक बार राहुल का किसी से झगड़ा हो गया तो राहुल ने गौरव से तमंचा दिलवाने को कहा. गौरव राहुल का जिगरी दोस्त था, इसलिए उस ने राहुल को एक अपराधी से 27 सौ रुपए में तमंचा दिलवा दिया. इस के बाद राहुल उस तमंचे को अपने साथ रखने लगा.

सपना और राहुल के प्रेमसंबंधों की जानकारी राहुल के घर वालों को हुई तो उस के बड़े भाई अशोक ने उसे डांटाफटकारा और पढ़ाई में मन लगाने को कहा. यही नहीं, उस ने पिता से कह कर जुलाई, 2015 में उसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और बीएससी करने के लिए कानपुर भेज दिया.

सपना के प्रेम में पड़े राहुल का मन घर छोड़ने का नहीं हो रहा था, लेकिन पिता और भाई के दबाव में उसे कानपुर  जाना पड़ा. कानपुर में उस ने पनकी रोड स्थित सेंगर हौस्टल में एक कमरा किराए पर लिया और अजय को रूमपार्टनर के रूप में रख कर पढ़ाई करने लगा.

अजय झारखंड के सौदाडी रामगढ़ पतरात का रहने वाला था. वह भी प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग करने कानपुर आया था. दोनों काकादेव कोचिंग में एडमीशन ले कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे. राहुल के कानपुर आने के बाद से सपना से उस की मुलाकातें बंद हो गई थीं. अब रात में ही दोनों की मोबाइल फोन पर बातें हो जाती थीं. प्रेमी के जाने से सपना उदास और खोईखोई सी रहने लगी थी.

राहुल के जाने के बाद गौरव का ध्यान सपना पर केंद्रित हुआ. वह उसे मन ही मन चाहता था, लेकिन दोस्त की वजह से अपने दिल की बात जुबान पर नहीं ला सका था. उस का सोचना था कि दोस्त की अनुपस्थिति में सपना उस के प्यार को आसानी से स्वीकार कर सकती है.

गौरव सपना से मिलने की जुगत सोचने लगा. इसी जुगत में उस ने सपना के भाई राजू से दोस्ती कर ली. राजू को मालूम नहीं था कि गौरव के मन में क्या है? वह तो यों ही एक दिन दोस्त के नाते गौरव को अपने घर ले आया और उस का परिचय अपने मातापिता तथा बड़ी बहन सपना से कराया.

सपना चाय ले कर आई तो गौरव उसे एकटक ताकता रहा. उस की चितवन में चाहत साफ झलक रही थी, जिसे सपना ने भांप भी लिया था. गौरव दिखने में स्मार्ट था, जिसे कोई भी लड़की पसंद कर सकती थी. इसलिए गौरव के मन में पैदा हुई चाहत सपना को अच्छी लगी.

इस के बाद गौरव सपना के दीदार के लिए बेचैन रहने लगा. यह बेचैनी जब दिल में दर्द बन जाती तो वह किसी न किसी बहाने राजू के घर पहुंच जाता. एक नजर सपना को देख लेता तो उस के कलेजे को ठंडक मिल जाती. धीरेधीरे गौरव के मन में सपना के प्रति चाहत बढ़ती गई. अपने प्रति गौरव को बेचैन देख कर सपना के मन में भी गौरव के लिए बेचैनी होने लगी, जिसे गौरव ने सपना की आंखों में पढ़ लिया.

इस के बाद जल्दी ही दोनों ने प्रेम पथ पर अपने कदम बढ़ा दिए. दोनों घर के बाहर मिलने लगे. कहते हैं, खुशबू को जितना ही दबा कर रखा जाता है, वह उतना फैलती है.   सपना ने गौरव को दिल में बसाया तो राहुल को निकाल फेंका. उस ने राहुल से मोबाइल पर बात करना भी बंद कर दिया. राहुल जब भी उस से बातें करने की कोशिश करता, कभी नेटवर्क की प्रौब्लम बता कर फोन काट देती तो कभी कहती घर वाले हैं.

सपना की हरकतों से राहुल को शक हुआ तो उस ने सपना की निगरानी के लिए अपने दोस्त रोहित को लगा दिया. रोहित ने सपना पर निगरानी रखनी शुरू की तो सारी सच्चाई सामने आ गई. रोहित ने यह सच्चाई राहुल को बताई तो उसे बड़ा दुख हुआ. इस के बाद राहुल का गौरव से आमनासामना हुआ तो सपना को ले कर दोनों में झगड़ा और गालीगलौच हुई.

इस की शिकायत गौरव ने राहुल के बड़े भाई अशोक से की तो उस ने राहुल को खूब डांटाफटकारा और जलील किया. अशोक ने सपना के घर वालों से भी कहा कि वे उस पर नजर रखें, क्योंकि सपना के कारण 2 लड़कों का भविष्य चौपट हो रहा है. इस के बाद सपना के घर वालों ने उस पर पाबंदी लगा दी.

राहुल कानपुर लौट आया. लेकिन उस की अकसर मोबाइल पर गौरव से तूतू मैंमैं होती रहती थी. दोनों एकदूसरे को देख लेने की धमकी भी देते रहते थे. राहुल को पूरा विश्वास था कि गौरव और सपना के बीच प्रेमसंबंध ही नहीं, अनैतिक संबंध भी हैं. यह सोच कर उस का खून खौल उठता था. राहुल को गौरव से नफरत हो गई थी. उस ने दोस्ती में दगा किया था, इसलिए वह उसे माफ नहीं करना चाहता था. वह बदले की आग में जलने लगा. आखिर प्रेमिका छीनने वाले दोस्त गौरव को राहुल ने ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

अपनी इस योजना में राहुल ने अपने रूमपार्टनर अजय को भी शामिल कर लिया. राहुल अब अजय के मोबाइल से गौरव से बातें करने लगा. इस बातचीत में वह यह दिखाता था कि अब उसे उस से कोई शिकायत नहीं है. कभीकभी वह गालीगलौच के लिए माफी भी मांग लेता. ऐसा वह इसलिए कर रहा था, ताकि गौरव को उस पर किसी तरह का शक न हो.

13 फरवरी, 2016 की सुबह राहुल ने अजय के मोबाइल से गौरव से बात की और सपना को ले कर पैदा हुई गलतफहमियों को दूर करने के लिए कल्याणपुर (कानपुर) आने को कहा. गौरव से बात करने के बाद राहुल ने उसी का दिया हुआ तमंचा लोड किया और कमर में खोंस कर अजय के साथ कल्याणपुर रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया.

दूसरी ओर गौरव घर वालों से राहुल से मिलने की बात कह कर घर से निकला और छिबरामऊ से गुरसहायगंज तक बस से आया और वहां से ट्रेन पकड़ कर कल्याणपुर आ पहुंचा.

कल्याणपुर स्टेशन पर राहुल और अजय गौरव को मिले. वहां से वे पैदल ही बुद्धा पार्क की ओर चल पड़े. पार्क के पिछले गेट से अंदर आते समय गौरव आगे चल रहा था, बीच में राहुल और सब से पीछे अजय. तभी राहुल ने तमंचा निकाल कर गौरव के सिर में सटा कर पीछे से गोली मार दी.

गौरव जमीन पर गिर कर तड़पने लगा और कुछ ही पलों में दम तोड़ दिया. दोनों ने लाश और तमंचा झाडि़यों में छिपाया और गौरव का फोन ले कर फरार हो गए.

18 फरवरी, 2016 को थाना कल्याणपुर पुलिस ने अभियुक्त राहुल और अजय को कानपुर की अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हुई थीं.

आखिर राहुल को दोस्त को मार कर क्या मिला? दोस्त तो गया ही, उस की अपनी खुद की भी जिंदगी बरबाद हुई. अपने साथ उस ने अजय की भी जिंदगी बरबाद की. घर वाले उसे पढ़ालिखा कर अफसर बनाना चाहते थे, जबकि झूठे प्यार में वह अपराधी बन गया.Friendship Betrayal

Love Crime Story : बेवफाई का ऐसा सिला

Love Crime Story . शिवप्रसाद सचमुच अर्शली को बहुत प्यार करता था. यही वजह थी कि उस ने उस के लिए अपने घर वालों तक से बगावत कर दी थी. यही नहीं, अपनी सारी कमाई भी उस पर लुटा दी थी. इस के बावजूद जब अर्शली ने उस से किनारा कर लिया तो प्रेमिका की यह बेवफाई उस से बरदाश्त नहीं हुई और…

सपना 22 वर्षीया अर्शली लौरेंस उर्फ जैनी उर्फ छोटी को बेटी की तरह मानती थी. जब वह उसे 2 दिनों सेदिखाई नहीं दी तो उसे चिंता हुई. अर्शली की मां सोफिया भी नजर नहीं आ रही थी. उन के कमरे में बाहर से ताला बंद था. उन की स्कूटी भी गैलरी में नहीं थी. उन का फोन भी बंद था.

सपना की समझ में नहीं आ रहा था कि मांबेटी बिना बताए कहां चली गईं. जबकि इस से पहले वे जब भी कहीं बाहर जाती थीं, बता कर जाती थीं. यही नहीं, घर की चाबी दे कर सारी जिम्मेदारी भी उसे ही सौंप जाती थीं.

सपना किन्नर थी और अपनी साथी बौबी के साथ सोफिया के मकान की पहली मंजिल पर किराए पर रहती थी. वह सुबह निकलती थी तो शाम को ही घर आती थी. 3 अप्रैल की दोपहर सपना घर से निकलने लगी तो सोफिया के कमरे से उसे दुर्गंध सी आती महसूस हुई. उस ने खिड़की के पास खड़ी हो कर लंबी सांस ली तो उसे लगा कमरे से मांस के सड़ने की दुर्गंध आ रही है.

उस की समझ में नहीं आया कि सोफिया के कमरे से इस तरह की दुर्गंध क्यों आ रही है? चूंकि मांबेटी 3 दिनों से गायब थीं, इसलिए सपना को किसी अनहोनी की आशंका हुई. इस के बाद उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया.

चूंकि यह इलाका थानाकोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने इस की सूचना थानाकोतवाली शाहपुर पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही कोतवाली  प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला एसआई विमलेंद्र कुमार, देवेंद्र कुमार सिंह, सिपाही मनीष सिंह, राजीव शुक्ला, रामविनय, रामनिहाल, संतोष कुमार और शिवानंद उपाध्याय को साथ ले कर बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा स्थित सोफिया लौरेंस के घर पहुंच गए.

चूंकि मोहल्ले वालों को अभी तक कुछ पता नहीं था, इसलिए एकाएक इतने पुलिस वालों को देख कर सब हैरान रह गए. सभी अपनेअपने घरों से निकल कर बाहर आ गए. सपना घर के बाहर ही खड़ी थी. पुलिस वालों ने उस से बात की तो उस ने जो आशंका व्यक्त की, सुन कर पुलिस वालों को भी किसी अनहोनी की आशंका हुई.

दरवाजे पर ताला लगा था. आनंद प्रकाश शुक्ला ने दरवाजा खोलने से पहले घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो थोड़ी ही देर में सीओ अभय कुमार मिश्र, एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, एसएसपी अनंतदेव के अलावा कई थानों के थानाप्रभारी भी पुलिस बल के साथ वहां आ गए. इन्हीं के साथ फोरैंसिक टीम भी आ गई थी.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में सोफिया के कमरे के दरवाजे पर लगे ताले को तोड़ कर दरवाजा खोला गया तो तेज दुर्गंध बाहर निकली. दरवाजे के पास खड़े पुलिस अधिकारी पीछे हट गए. थोड़ी देर में दुर्गंध थोड़ी कम हुई तो नाक पर रूमाल रख कर पुलिस अधिकारी कमरे में घुसे.

सामने ही बैड पर 2 महिलाओं की लाशें कंबल से ढकी पड़ी थीं. दोनों ही लाशें बुरी तरह से सड़ चुकी थीं. कमरे का सामान यथावत था. बिस्तर पर खून बहा था, जो सूख कर काला पड़ चुका था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों महिलाओं की हत्या की गई थी.

लाशें बुरी तरह सड़ चुकी थीं, इसलिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि हत्याएं कैसे की गई थीं. पूछने पर पता चला कि मरने वाली दोनों महिलाएं मांबेटी थीं. उस समय उन का वहां अपना कोई नहीं था. इसलिए पुलिस ने किराएदार सपना की उपस्थिति में घर की तलाशी ली.

घर के आंगन के एक कोने में शराब और बीयर की तमाम बोतलें पड़ी थीं. पूछने पर पता चला कि मांबेटी दोनों शराब और बीयर पीती थीं. चूंकि वे क्रिश्चियन थीं, इसलिए पुलिस के लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. पुलिस ने कमरे में मांबेटी के मोबाइल फोन तलाशे तो वे गायब मिले. इस के अलावा सपना ने बताया था कि उन की स्कूटी थी, जो गैलरी में खड़ी रहती थी, वह भी नहीं थी. इस से पुलिस को लगा कि हत्यारा दोनों के मोबाइल फोन के अलावा स्कूटी भी ले गया था.

फोरैंसिक टीम ने अपना काम निबटा लिया तो पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया. उस समय वहां मृतका सोफिया और उस की बेटी अर्शली के बारे में बताने वाला उन का कोई नहीं था.

सोफिया की सास मरियम 3 महीने पहले बड़ी पोती एलिना की हत्या हो जाने के बाद अपनी बेटी सन्नो के पास जौनपुर चली गई थीं. इसलिए इन दोनों हत्याओं की रिपोर्ट किराएदार किन्नर सपना की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई.

मामला गंभीर था, इसलिए इस के खुलासे के लिए एसएसपी अनंतदेव ने अपने औफिस में एसपी (सिटी) हेमराज मीणा, सीओ अभय कुमार मिश्र, कोतवाली शाहपुर के प्रभारी आनंद प्रकाश शुक्ला और क्राइम ब्रांच की एक मीटिंग बुलाई.

मीटिंग में उन्होंने हेमराज मीणा के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस ने सीओ अभय कुमार मिश्र की देखरेख में मामले की जांच शुरू की. जांच के लिए पुलिस टीम घटनास्थल पर दोबारा पहुंची तो पता चला कि मकान के भूतल पर सोफिया लौरेंस अपनी बेटी अर्शली के साथ रह रही थीं, जबकि पहली मंजिल के 2 कमरों में एक में किन्नर सपना और बौबी रहती थीं तो दूसरे कमरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी.

इन किराएदारों को सोफिया की सास मरियम लौरेंस ने रखा था. जबकि इस समय मरियम जौनपुर में अपनी बेटी सन्नो लौरेंस के पास थीं. यह भी पता चला कि मरियम लौरेंस की बड़ी पोती यानी मृतका सोफिया की बड़ी बेटी एलिना लौरेंस की 7-8 दिसंबर, 2015 की रात संदिग्ध परिस्थितियों में जहरीला पदार्थ खाने से मौत हो गई थी. वह मोहल्ले के ही अभिषेक मधई से 7 सालों से प्रेम करती आ रही थी.

अभिषेक भी उसे प्यार करता था. मरने से 3 महीने पहले वह अभिषेक के साथ लिवइन रिलेशन में रहने उस के घर चली गई थी. यह बात अभिषेक के पिता मोटीन मधई और मां अर्चना लौरेन को पसंद नहीं थी. इसलिए वे बेटे अभिषेक और एलिना को ताने मारते रहते थे.

7 दिसंबर, 2015 की रात अभिषेक और एलिना रात 9 बजे के करीब घर लौटे तो उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे शराब पिए हुए हैं. रात के 3 बजे के करीब अभिषेक के कमरे में किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आई तो अर्चना की नींद टूट गई. भाग कर वह अभिषेक के कमरे में पहुंची तो वह बैड पर औंधे मुंह पड़ा उल्टियां कर रहा था, जबकि एलिना फर्श पर निढाल पड़ी थी. पूछने पर अभिषेक ने बताया कि दोनों ने जहरीला पदार्थ खा लिया है.

बेटे की बात सुन कर अर्चना बुरी तरह डर गईं. उस ने पति को जगा कर सारी बात बताई. पतिपत्नी ने तड़पती एलिना को वहीं छोड़ दिया और बेटे को ले कर अस्पताल चले गए. डाक्टरों ने अभिषेक को तो बचा लिया, लेकिन घर में पड़ी एलिना ने दम तोड़ दिया.

एलिना की मौत की खबर मरियम और सोफिया को मिली तो वे सन्न रह गईं. पोती की आकस्मिक मौत से मरियम लौरेंस को गहरा सदमा लगा. सोफिया और मरियम ने कोतवाली शाहपुर में मुकदमा दर्ज कराया कि अभिषेक के घर वालों ने एलिना की हत्या की है. मुकदमा दर्ज होने के बाद कोतवाली पुलिस ने एलिना की हत्या के जुर्म में अभिषेक को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

इस के बाद पुलिस यह पता लगाने लगी कि सोफिया के घर किनकिन लोगों का आनाजाना था. इसी बात की जानकारी जुटाने में पुलिस को पता चला कि मोहल्ले के रहने वाले मिंटू के दोस्त शिवप्रसाद का उस के घर काफी आनाजाना था. लोगों का यह भी कहना था कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे.

पुलिस ने मिंटू से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अर्शली और शिवप्रसाद एकदूसरे से प्यार करते थे. हत्याएं उस ने की हैं या किसी और ने, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता. पुलिस मिंटू को साथ ले कर आम बाजार स्थित शिवप्रसाद के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया.

पुलिस वालों को देख कर जहां शिवप्रसाद के घर वाले हैरान थे, वहीं उस ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि आप लोग जल्दी ही मेरे घर आने वाले हैं. इसीलिए मैं घर छोड़ कर कहीं गया नहीं. क्योंकि अगर मैं घर छोड़ कर कहीं भाग जाता तो आप लोग मेरे घर वालों को परेशान करते. आप लोगों को बता दूं कि मैं ने ही सोफिया और अर्शली की हत्या की है.’’

शिवप्रसाद की बातें हैरान करने वाली थीं. पुलिस को लगा, कहीं यह पागल तो नहीं है. इसलिए उन्हें उस की बातों पर यकीन नहीं हुआ. पुलिस को उस की बातों पर यकीन तब हुआ, जब उस ने अर्शली की स्कूटी, सोफिया तथा अर्शली के मोबाइल फोन और लोहे की वह रौड तथा धारधार रेडियम वाला चाकू बरामद करा दिया, जिस से अर्शली और सोफिया की हत्या की गई थी.

आम लोगों के लिए यह हैरान करने वाली ही बात थी. शायद ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई कातिल घर में बैठ कर पुलिस के आने का इंतजार कर रहा था. आनंद प्रकाश शुक्ल शिवप्रसाद और बरामद सामान ले कर कोतवाली आ गए और हत्यारे की गिरफ्तारी की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी.

अधिकारियों की उपस्थिति में शिवप्रसाद ने अर्शली और सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह प्रेम में धोखा खाने के बाद बदला लेने की कहानी थी.

अगले दिन 4 अप्रैल को एसएसपी अनंतदेव ने पुलिस लाइंस के मनोरंजन कक्ष में पत्रकारवार्ता आयोजित कर शिवप्रसाद को पत्रकारों के सामने पेश किया तो प्रेमिका की बेवफाई की जो कहानी उस ने पुलिस को बताई थी, वही कहानी पत्रकारों को भी सुना दी. सीधेसादे शिवप्रसाद ने हालात और परिस्थितियों के हाथों मजबूर हो कर प्रेमिका अर्शली और उस की मां सोफिया की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की थानाकोतवाली शाहपुर के बशारतपुर के मोहल्ला मोतीपोखरा में ज्यादातर ईसाई रहते हैं. इसी मोहल्ले में मरियम लौरेंस भी रहती थी. उन की 2 संतानें थीं, बेटा एलिसिएंस लौरेंस उर्फ पन्नो तथा बेटी सन्नो. मरियम लौरेंस रेलवे अस्पताल में नर्स थीं. उन के पति की बहुत पहले मौत हो चुकी थी. पति की मौत के बाद उन्होंने ही बेटे और बेटी को पालपोस कर बड़ा किया था.

पन्नो बड़ा हुआ और उस में दुनियादारी की समझ आई तो उस ने परिवार का सहारा बनना चाहा. मरियम ने अपनी मेहनत की बदौलत काफी चलअचल संपत्ति जुटा रखी थी. पन्नो ने नौकरी करने के बजाय घर के सामने पड़ी अपनी खाली जमीन पर आटा चक्की लगा ली. उस की मेहनत रंग लाई और उस की आटा चक्की चल निकली.

लेकिन जब पन्नो के पास पैसे आए तो एकाएक उस के दोस्तों की संख्या बढ़ गई. इन्हीं दोस्तों की वजह से उसे शराब पीने की बुरी लत लग गई. जब इस की जानकारी मरियम को हुई तो बेटे को लाइन पर लाने के लिए उन्होंने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी. पर पन्नो पर इस सब का कोई असर नहीं हुआ. धीरेधीरे पन्नो की लत बढ़ती गई और उस की आटा चक्की की सारी कमाई शराब में उड़ने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि आटा चक्की बंद हो गई.

मरियम बेटे की आदत से परेशान रहने लगी थीं. उसे सुधारने की उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. आखिर में उन्हें एक रास्ता उस की शादी कर देना नजर आया. मरियम ने खूब सोचसमझ कर उस की शादी सोफिया लौरेंस से कर दी. इस के बाद बेटी सन्नो की शादी जौनपुर में कर के वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गईं.

शादी के बाद पन्नो पर गृहस्थी का बोझ पड़ा तो उस ने आटा चक्की की जगह जनरल स्टोर खोल लिया. उस की दुकान चल निकली और ठीकठाक कमाई होने लगी. पन्नो को सोफिया से 2 बेटियां हुई एलिना और अर्शली. इस तरह भरापूरा परिवार हो गया. पोतियों के साथ मरियम का भी समय आराम से कटने लगा.

चूंकि एलिना पहली संतान थी, इसलिए मरियम उसे कुछ ज्यादा ही प्यार करती थीं. अर्शली छोटी थी, इसलिए वह मांबाप को ज्यादा प्यारी थी. वे उसे प्यार से जैनी कहते थे. एलिना और अर्शली बड़ी हुईं तो उन की खूबसूरती में निखार आ गया. दोनों बहनें थीं भी बला की खूबसूरत. पन्नो की बेटियां बड़ी हो रही थीं, जिस से घर का खर्च बढ़ रहा था, लेकिन उस की कमाई घटती जा रही थी.

इस की सब से बड़ी वजह थी पन्नो की शराब पीने की आदत. अब तो उस के साथ सोफिया भी बीयर पीने लगी थी. रोजाना शाम को पतिपत्नी शराब और बीयर की बोतलें ले कर बैठ जाते, इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे दुकान की पूजी शराब में उड़ती गई.

मरियम पोतियों का वास्ता दे कर बेटेबहू को समझातीं तो वे उन की बात समझने के बजाय डांट कर उन्हें ही चुप करा देते. जब उन्होंने देखा कि उन की बातों का बेटे और बहू पर कोई असर नहीं हो रहा है तो चुप रहने में ही वह अपनी भलाई समझने लगीं. बेटेबहू के व्यवहार से वह बहुत दुखी रहती थीं.

पन्नो की कमाई का एक मात्र जरिया दुकान थी. धीरेधीरे दुकान खाली हो गई. इस तरह कमाई का रास्ता बंद हो गया. बेटियां बड़ी हो रही थीं, उन के भी खर्चे थे. पन्नो और सोफिया को चिंता सताने लगी कि परिवार का खर्च कैसे चलेगा. सोचविचार कर पन्नो ने एक औटो खरीद लिया और उसे चलाने लगा.

उसी बीच एलिना अपने घर के पीछे रहने वाले अभिषेक मधई को दिल दे बैठी. उस समय एलिना 17 साल की थी. दोनों छिपछिप कर मिलने लगे. उन के इस प्यार की जानकारी सिर्फ अर्शली को थी. सोफिया के मकान के बगल में मिंटू रहता था. चूंकि मिंटू सोफिया का पड़ोसी था, इसलिए वह उस के घर भी आताजाता था. मिंटू का दोस्त था शिवप्रसाद, जो कोतवाली शाहपुर के अंतर्गत आने वाले आम बाजार के रहने वाले रामप्रसाद का बेटा था.

रामप्रसाद रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, लेकिन नौकरी से रिटायर हो चुके थे, इसलिए घर खर्च चलाने के लिए शिवप्रसाद औटो चलाता था. उस के परिवार में पिता और 2 बहनें थीं.

मिंटू के यहां आनेजाने में शिवप्रसाद की नजर खूबसूरत अर्शली पर पड़ी तो वह उसे भा गई. उस ने उस के बारे में मिंटू से पूछा तो उस ने उस के बारे में उसे सब कुछ बता दिया. अर्शली शिवप्रसाद को इतनी पसंद आ गई कि ईसाई होने के बावजूद वह उसे दिल दे बैठा.

मिंटू के जरिए दोनों का परिचय हुआ तो जल्दी ही उन में दोस्ती हो गई. उन की यह दोस्ती प्यार में बदली तो उन का यह प्यार जुनूनी हो गया. हालत यह हो गई कि दोनों ही रातदिन एकदूसरे के खयालों में खोए रहने लगे. यह करीब 3 साल पहले की बात है.

उसी बीच सोफिया पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. शराब पीने से खोखले हो चुके पन्नो की अचानक मौत हो गई. पति की मौत से जहां सोफिया टूट गई, वहीं अर्शली को भी पिता की मौत का गहरा सदमा लगा था. लेकिन दुख की इस घड़ी में शिवप्रसाद साया की तरह हर घड़ी उस के साथ खड़ा ही नहीं रहा, बल्कि हर तरह से उस की मदद भी की.

उन्हीं दिनों शिवप्रसाद का मकान बन रहा था. उस के पिता रामप्रसाद ने मकान बनवाने के लिए उसे ढाई लाख रुपए दिए थे. अर्शली के प्यार में पागल शिवप्रसाद ने सारे रुपए उस पर लुटा दिए. इन पैसों को ले कर बापबेटे में खूब झगड़ा भी हुआ, लेकिन रामप्रसाद कर ही क्या सकते थे. एकलौती औलाद थी, घर से भी तो नहीं निकाल सकते थे.

शिवप्रसाद औटो से जो कमाता था, अर्शली पर खर्च करता था. पिता की मौत के बाद अर्शली की पढ़ाई छूट गई थी. शिवप्रसाद ने उस का दाखिला कराया, इस साल उस ने 12वीं की परीक्षा दी थी, परीक्षा का परिणाम अभी आया नहीं था.

पन्नो की मौत के बाद कमाई का कोई जरिया नहीं रहा तो मरियम ने अपने मकान की पहली मंजिल पर बने 2 कमरों को किराए पर उठा दिया, जिस से सोफिया और अर्शली का खर्च निकल सके. एक कमरे में किन्नर सपना और बौबी रहती थी, जबकि दूसरे में रीमा अपने परिवार के साथ रहती थी. इसी किराए और मरियम की पेंशन से घर का खर्च चल रहा था.

एलिना और अभिषेक का प्रेमप्रसंग पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गया था. इस की वजह यह थी कि बिना ब्याह के ही एलिना प्रेमी के घर रहने चली गई थी, लेकिन 3 महीने बाद ही प्रेमी के घर जहर खाने से एलिना की मौत हो गई. सोफिया ने बेटी की हत्या का आरोप लगा कर अभिषेक को जेल भिजवा दिया.

एलिना की मौत से मरियम को ऐसा आघात लगा कि वह बीमार रहने लगीं. उन की हालत दिन पर दिन बिगड़ती गई तो मां की हालत देख कर सन्नो उन्हें अपने साथ जौनपुर ले गई. मरियम के जाने के बाद घर में सोफिया और अर्शली ही रह गईं.

सोफिया को अर्शली और शिवप्रसाद के रिश्ते की जानकारी थी. एलिना की मौत के बाद वह डर गई कि अर्शली के साथ भी कहीं वैसा ही हो गया तो उस का एकमात्र सहारा छिन जाएगा. इस के बाद उस ने एलिना का उदाहरण दे कर अर्शली को समझा कर कहा कि अब उस की शादी उस के पसंद के लड़के के साथ होगी.

अर्शली ने मां की भावना का आदर करते हुए वादा किया कि अब वह उन की मर्जी के खिलाफ कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिस से उन्हें परेशानी हो. मां से किए वादे के अनुसार अर्शली ने शिवप्रसाद से अचानक बातचीत बंद कर दी.

उस ने उस से कह भी दिया कि वह उस का पीछा करना छोड़ दे. अगर उस ने उस का पीछा नहीं छोड़ा तो वह उस की शिकायत पुलिस से कर देगी. अब वह वहीं शादी करेगी, जहां मां कहेंगी.

अचानक अर्शली में आए इस बदलाव से शिवप्रसाद हैरान रह गया. उस की समझ में नहीं आया कि अर्शली ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया? वह जब भी उस से बात करने की कोशिश करता, अर्शली पुलिस की धमकी दे कर उसे चुप करा देती. अर्शली की यह बेवफाई शिवप्रसाद को शूल बन कर चुभने लगी.

शिवप्रसाद ने अर्शली से प्यार ही नहीं किया था, बल्कि उस पर लाखों रुपए खर्च भी किए थे. एक तरह से उस ने अर्शली के लिए खुद को बरबाद कर लिया था.

घरपरिवार से उस के लिए बगावत की थी. ऐसे में भला वह कैसे चाहता कि अर्शली किसी और की हो जाए. शायद यही सोच कर शिवप्रसाद ने तय कर लिया कि अर्शली अगर उस की नहीं तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. सोफिया ने अर्शली को उस से दूर किया था, इसलिए शिवप्रसाद की नजरों में असली गुनहगार वही थी.

अर्शली को पाने के लिए शिवप्रसाद पागल था. एक दिन वह बहुत बेचैन हुआ तो ‘रौकी हैंडसम’ फिल्म देखने चला गया. फिल्म में हत्या का एक सीन दिखाया गया था, जिस में रेडियम (चमकदार) चाकू से अंधेरे में हत्या की गई थी. फिर क्या था, शिवप्रसाद ने उसी वक्त तय कर लिया था कि उसे क्या करना है.

उस रात वह बिना कुछ खाएपिए ही सो गया. अगले दिन वह कोतवाली शाहपुर के असुरन चौक की एक दुकान से रेडियम वाला चाकू खरीद लाया. 29 मार्च की रात 11 बजे वह अर्शली के घर के पिछवाड़े से छत पर जा कर छिप गया. चूंकि तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए उसे छत पर चढ़ते किसी ने नहीं देखा था.

सोफिया और अर्शली रात में सोने से पहले बीयर पीती थीं. उस रात भी मांबेटी ने बीयर पी और खाना खा कर एक ही बैड पर सो गईं. यह बात शिवप्रसाद को पता थी. शिवप्रसाद रात गहराने की प्रतीक्षा करता रहा. रात 3 बजे वह दबे पांव सीढि़यों से नीचे उतरा और सीधे सोफिया के कमरे में जा पहुंचा.

मांबेटी को एक ही बैड पर सोई देख कर उस ने कमरे के एक कोने में रखी लोहे की रौड उठाई और सोफिया के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए. सोफिया चीखी तो अर्शली उठ कर बैठ गई और चिल्लाने लगी. शिवप्रसाद डर गया और उस ने अपने बचाव के लिए चाकू से अर्शली के पेट में ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

अर्शली तड़पने लगी तो उस ने खून सने हाथों से उस का गला दबा दिया. मांबेटी मर चुकीं थीं. उन के ऊपर कंबल डाल कर उस ने बैड पर रखे दोनों के मोबाइल फोन उठा कर जेब में डाल लिए.

शिवप्रसाद ने गैलरी में रखी स्कूटी बाहर निकाली और दरवाजे पर ताला बंद कर के उसी स्कूटी से अपने घर चला गया. वह करीब 4 बजे अपने घर पहुंचा और इत्मीनान से सो गया. वह सुबह उठा तो भी घर छोड़ कर कहीं नहीं गया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शिवप्रसाद को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस तरह पुलिस ने 12 घंटे में ही हत्यारोपी शिवप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया था. इस के लिए एसएसपी अनंतदेव ने शिवप्रसाद को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

शिवप्रसाद ने जो किया, शायद अब उसे पछतावा हो रहा होगा. लेकिन अब वह कर ही क्या सकता है. उस की अब बाकी की जिंदगी तो जेल में ही बीतनी है. दुख की बात तो यह है कि सोफिया और अर्शली का अंतिम संस्कार भी करने वाला कोई नहीं था. उन का अंतिम संस्कार पुलिस ने किया था. Love Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Extra Marital Affair Crime : निशा की अधूरी लालसा

Extra Marital Affair Crime. निशा ने लालसा पूरी करने के लिए गलत राह पकड़ी तो वह उसे मौत के द्वार तक घसीट ले गई. लालसा पूरी करने के चक्कर में निशा इस दुनिया में नहीं है तो उस की हत्या के आरोप में शहादत अली जेल में है. 

त्योहार आते ही महिलाओं की व्यस्तता बढ़ जाती है. 2 दिन बाद होली थी, इसलिए शोभा की भी व्यस्तता बढ़ गई थी. अचानक बगल वाले कमरे का दरवाजा खुला. उस कमरे को 2 दिन पहले ही किसी ने किराए पर लिया था. उस ने मकान मालिक से होली के बाद अपना सामान लाने को कहा था तो फिर दरवाजा किस ने खोला, यह जानने के लिए शोभा अपने कमरे से बाहर आई तो देखा जिस ने वह कमरा किराए पर लिया था, वही अपने साथ एक महिला को ले कर आया था. उन के पास केवल एक बैग था. शोभा ने सोचा कि महिला शायद उस की पत्नी है, उसे कमरा दिखाने लाया है. शोभा उन से कुछ पूछे बिना अपने कमरे में चली गई.

कमरे में जा कर वह अपना काम करने लगी. करीब 15 मिनट बाद नए किराएदार के कमरे से लड़ने की आवाजें आने लगीं. हालांकि उन का इस तरह शोर मचाना शोभा को अच्छा नहीं लग रहा था, फिर भी उन के झगड़े में दखलअंदाजी करना उस ने उचित नहीं समझा. वह उन के झगड़े को अनसुना कर के अपने काम में लगी रही कि पतिपत्नी में ऐसी छोटीमोटी नोकझोंक तो होती ही रहती है. आखिर उन के बीच होने वाला झगड़ा कुछ देर में बंद हो गया. इस के बाद शोभा को उन की आवाज नहीं सुनाई दी. शाम को वह कमरे से बाहर निकली तो नए किराएदार के दरवाजे पर ताला लगा देखा. किस समय वे कमरे को बंद कर के चले गए, उसे पता ही नहीं चला. यह 22 मार्च, 2016 की बात थी.

होली वाले दिन शोभा को कमरे में कुछ बदबू महसूस हुई. उस ने सोचा कि शायद कोई चूहा वगैरह मर गया है. उस ने इधरउधर देखा भी, लेकिन वह पता नहीं लगा पाई कि बदबू आखिर कहां से आ रही है. 25 मार्च की सुबह दुर्गंध असहनीय हो गई तो वह परेशान हो उठी. घर के सभी लोग कमरे का सामान हटा कर मरा चूहा खोजने लगे. परंतु वहां चूहा मरा होता तब तो मिलता. कमरे का कोनाकोना छान मारा गया, लेकिन बदबू वाली कोई चीज नहीं मिली. दुर्गंध निकालने के लिए शोभा ने दरवाजा खोल दिया, लेकिन दरवाजा खुलते ही दुर्गंध कम होने के बजाय और बढ़ गई. जब गौर किया गया तो पता चला कि वह दुर्गंध बगल वाले कमरे से आ रही थी. उस कमरे के दरवाजे पर 2 ताले लगे हुए थे. एक किराएदार का तो दूसरा मकान मालिक प्रमोद कुमार का.

शोभा को कुछ शक हुआ तो उस ने मकान मालिक प्रमोद कुमार को बुला लिया. कमरे से आ रही दुर्गंध की वजह से प्रमोद कुमार को भी आशंका हुई. उस ने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के सूचना दी कि पहाड़गंज के संगतराशन मोहल्ले की 3 नंबर की गली के मकान नंबर 40/10 के एक कमरे से तेज दुर्गंध आ रही है.  सूचना देने के थोड़ी देर बाद थानाप्रभारी राजेंद्र कुमार एसआई हरपाल सिंह, हैडकांस्टेबल राकेश कुमार और कांस्टेबल सुरेंद्र को ले कर बताए गए पते पर पहुंचे तो पता चला कि जिस कमरे से दुर्गंध आ रही है, वह तीसरी मंजिल पर है. पुलिस जब तीसरी पर पहुंची तो वाकई उस बंद कमरे से तेज बदबू आ रही थी.

वह बदबू उसी तरह की थी, जैसे किसी लाश के सड़ने पर आती है. कमरे के दरवाजे पर एक नहीं, 2 ताले लटक रहे थे. मकान मालिक प्रमोद कुमार वहीं थे. पुलिस ने दरवाजे पर 2 ताले लगाने की वजह पूछी तो प्रमोद ने कहा, सर, करीब हफ्ता भर पहले एक आदमी ने साढ़े 3 हजार रुपए महीने किराए पर यह कमरा लिया था. पैसे उस ने दिए नहीं थे. कहा था कि होली बाद बीवी बच्चों का लाऊंगा, तभी किराया दूंगा. पर मुझे पता चला कि वह 22 मार्च को अपनी पत्नी के साथ कुछ देर के लिए यहां आया था और जाते समय दरवाजे पर अपना ताला लगा गया था. इस के बाद मैं ने अपना ताला लगा दिया था.

पुलिस के कहने पर प्रमोद ने अपना ताला खोल दिया. दूसरा ताला पुलिस ने तोड़ दिया. दरवाजा खोल कर पुलिस कमरे में घुसी तो देखा, सामने फर्श पर एक महिला की गरदन कटी लाश पड़ी थी. महिला की उम्र 25 साल के करीब थी. उस के दोनों हाथ पीछे की तरफ साड़ी से बंधे थे. फर्श पर फैला खून सूख कर काला पड़ चुका था. मृतका साड़ी पहने थी. शोभा ने लाश देखते ही कहा कि यही महिला 22 तारीख को उस आदमी के साथ आई थी. फर्श पर एक लेडी पर्स मिला. वह मृतका का ही रहा होगा. पुलिस ने पर्स की तलाशी ली तो उस में ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से मृतका की शिनाख्त हो पाती.

थानाप्रभारी ने लाश मिलने की खबर आला अधिकारियों को देने के बाद क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम को बुला लिया. थोड़ी देर में एसीपी ओमप्रकाश यादव और डीसीपी घटनास्थल पर पहुंच गए. क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम ने भी आ कर सबूत जुटा लिए. इस के बाद थानाप्रभारी ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. मृतका कौन थी और कहां की रहने वाली थी, इस का पुलिस को पता नहीं चला. पुलिस की नजरों में एक तरह से यह ब्लाइंड मर्डर था. पुलिस को उस शख्स के बारे में भी कोई जानकारी नहीं मिली थी, जिस ने कमरा किराए पर लिया था.

इस केस को खोलने के लिए डीसीपी ने एसीपी ओमप्रकाश यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी राजेंद्र कुमार, अतिरिक्त थानाप्रभारी सुखदेव मीणा, एसआई परमिंदर, हरपाल सिंह, अजय दलाल, हैडकांस्टेबल राकेश, कांस्टेबल सुरेंद्र आदि को शामिल किया.

जांच की शुरुआत पुलिस ने मकान मालिक प्रमोद कुमार से की. प्रमोद ने बताया, ‘‘19 मार्च को मेरे पास कमरे के लिए एक शख्स आया, जिस ने अपना नाम विशाल बताया. हमारा ऊपर का कमरा खाली था, सो मैं ने साढ़े 3 हजार रुपए में यह कमरा उसे किराए पर दे दिया. उस ने कहा कि 2-4 दिनों में वह बीवीबच्चों और सामान के साथ आएगा, तभी पैसे देगा. अगले दिन विशाल ने फोन कर के बताया कि वह होली के बाद कमरे में शिफ्ट करेगा. परंतु मुझे पता चला कि वह 22 मार्च को इसी महिला के साथ कमरे पर आया था और कुछ देर रुक कर दरवाजे पर अपना ताला लगा कर चला गया था. उस के मैं ने भी अपना ताला लगा दिया था. जब कमरे से कुछ बदबू आई, तब हमें कुछ शक हुआ.

अतिरिक्त थानाप्रभारी सुखदेव मीणा ने प्रमोद से विशाल के बारे में पूछा तो उस ने बताया, सर, उस के बारे में मुझे ज्यादा पता नहीं है, क्योंकि वह मुझ से केवल एक बार ही मिला था. उस की उम्र यही कोई 35 साल थी.  विशाल कहां का रहने वाला था, यह जानकारी प्रमोद से नहीं मिली तो इंसपेक्टर सुखदेव सिंह मीणा ने प्रमोद से विशाल का वह फोन नंबर ले लिया, जिस नंबर से उस ने उसे फोन किया था.

विशाल के पास पहुंचने का उन के पास यही एक जरिया था. उन्होंने उस फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. फोन नंबर की जांच में पता चला कि वह फोन नंबर निशा के नाम पर लिया गया था, जो गुड़गांव में रहती थी.  एसआई हरपाल सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गुड़गांव स्थित निशा के पते पर भेजी गई. दिल्ली पुलिस जब निशा के घर पहुंची तो वहां उस का पति देवतानंद सिंह मिला. पुलिस ने उस से निशा के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि निशा 22 मार्च से गायब है. उस की गुमशुदगी उस ने थाना सिविल लाइंस में दर्ज करा रखी थी.

एसआई हरपाल सिंह के मोबाइल फोन में बरामद की गई महिला की लाश का फोटो था. उन्होंने वह फोटो देवतानंद को दिखाया तो उस ने फोटो पहचानते हुए कहा, सर, यही मेरी पत्नी निशा है. इस का खून किस ने कर दिया? लाश की पहचान हो जाने से एसआई हरपाल सिंह ने राहत की सांस ली. लाश की शिनाख्त होने की बात उन्होंने फोन द्वारा राजेंद्र कुमार को बता दी.

देवतानंद ने फोटो से लाश की पहचान तो कर ही दी थी, लेकिन वह मोर्चरी में रखी लाश भी उसे दिखाना चाहते थे. इसलिए वह देवतानंद को अपने साथ दिल्ली ले आए. मोर्चरी ले जा कर उन्होंने महिला की लाश दिखाई तो उस ने उस की पहचान अपनी पत्नी निशा के रूप में कर दी.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि निशा घर से कुछ दूरी पर एक सिलाई सेंटर में सिलाई सीखने जाती थी. वह 22 तारीख की सुबह 10 बजे सिलाई सेंटर जाने के लिए घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. 23 मार्च को उस ने सिविल लाइंस थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उस ने सीधे कहा कि उस की पत्नी का मर्डर शहादत अली ने किया है.

शहादत अली का नाम सुन कर इंसपेक्टर सुखदेव मीणा चौंके, यह शहादत अली कौन है? सर, यह गुड़गांव के ही राजीवनगर में रहता है.  देवतानंद ने कहा. सुखदेव मीणा देवतानंद को ले कर गुड़गांव स्थित शहादत अली के कमरे पर पहुंचे तो वह वहां से फरार मिला. इस से पुलिस का शक उस पर और बढ़ गया.

पुलिस को पता चला कि शहादत अली एमजीएफ टोयटा कंपनी में नौकरी करता था. वहां जाने पर जानकारी मिली कि वह कई दिनों से ड्यूटी से अनुपस्थित चल रहा था. वहां से पुलिस को शहादत अली के गांव का पता मिल गया. वह मूलरूप से झारखंड के जिला देवघर के थाना मोहनपुर के गांव रघुनाथपुर का रहने वाला था.

एसीपी ओमप्रकाश यादव से विचारविमर्श करने के बाद हरपाल सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम झारखंड स्थित शहादत के घर भेज दी गई. वह घर पर ही मिल गया. पुलिस उसे हिरासत में ले कर दिल्ली लौट आई. उस से निशा की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि निशा की हत्या उसी ने की थी. उस ने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह अनैतिक संबंधों की बुनियाद पर रचीबसी निकली.

गुड़गांव के राजीवनगर में रहने वाला देवतानंद सिंह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. करीब 4 साल पहले उस की शादी निशा से हुई थी. निशा ग्रैजुएट थी. पति को जो 12-13 हजार रुपए तनख्वाह मिलती थी, उसी में उन का गुजारा होता था. दोनों ही हंसीखुशी से रह रहे थे.

लेकिन उन के घर में यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी. इस की वजह यह थी कि शादी के कई सालों बाद भी निशा मां नहीं बन सकी. काफी इलाज कराने के बाद भी निशा की यह ख्वाहिश पूरी नहीं हो रही थी. इस की वजह से निशा चिड़चिड़ी सी हो गई. बातबेबात पर वह पति से झगड़ बैठती. इस से पति भी परेशान रहने लगा. पत्नी की कलह से बचने के लिए वह कंपनी में ओवरटाइम करने लगा, जिस से उसे कम से कम घर पर रहना पड़े. घर पहुंच कर वह खापी कर सो जाता.

राजीवनगर की उसी गली के मकान नंबर-3 में शहादत अली रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 4 बच्चे थे. एक बेटी की वह शादी कर चुका था. 35 साल का शहादत अली एमजीएफ टोयटा कंपनी में स्प्रे पेंटर था. वहां उसे करीब 25 हजार रुपए तनख्वाह मिलती थी. जिस से वह अपने परिवार को अच्छी तरह रखता था.

आसपास रहने की वजह से निशा की शहादत अली की पत्नी से ठीकठाक बोलचाल थी. दोनों का एकदूसरे के यहां आनाजाना भी था. शहादत अली के बच्चों के खानपान और रहनसहन से वह काफी प्रभावित थी. उस का मन भी अच्छे कपड़े पहनने और घूमनेफिरने का करता था, लेकिन पति इन बातों पर ध्यान ही नहीं देता था. वह तो ड्यूटी से आने के बाद खापी कर जल्दी से सो जाता था. लगता था, जैसे उसे घरबार की कोई चिंता ही नहीं थी.

धीरेधीरे उस का मन पति से उचट गया. पति के बजाय उसे अब शहादत अली में रुचि हो गई. हालांकि वह निशा से उम्र में 10 साल बड़ा था, इस के बावजूद वह उसे पति से कई बातों में अच्छा लगा. उस ने शहादत अली की तरफ कदम बढ़ा दिए. शहादत अली इतना नासमझ नहीं था कि वह निशा के हावभाव को न समझता. निशा उस की पत्नी से ज्यादा सुंदर तो थी ही, साथ ही उम्र में भी छोटी थी, इसलिए 5 बच्चों का बाप होने के बावजूद वह खुद को नहीं रोक सका. लिहाजा दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. लेकिन शहादत अली के साथ निशा का ज्यादा दिनों तक जुड़ाव नहीं रह सका. करीब 5-6 महीने बाद ही उस ने शहादत अली से किनारा करना शुरू कर दिया.

इस की वजह यह थी कि निशा की दोस्ती राजीवनगर के ही रहने वाले धर्मवीर से हो गई थी. वह उस के साथ घूमतीफिरती. पति को जब निशा की करतूतों का पता चला तो उस ने उसे समझाया, पर उस ने उस की बातों पर अमल नहीं किया. आखिर थकहार कर पति ने उस से कुछ भी कहनासुनना छोड़ दिया. इस के बाद तो निशा बेलगाम हो गई.  निशा ने शहादत से दूरियां बनाईं तो शहादत को उस पर शक हुआ. उस ने निशा को एक स्मार्ट फोन खरीद कर दिया था. उसी दौरान उस ने निशा की ही आईडी पर सिमकार्ड खरीदे थे. उन में से एक उस ने खुद के मोबाइल में डाला था तो दूसरा निशा ने अपने फोन में डाल लिया था.

एक दिन शहादत ने निशा का फोन देखा तो उस में धर्मवीर से बात होने के सबूत मिल गए. उस ने उन के वाट्सऐप मैसेज भी पढ़ लिए. इस से शहादत निशा के बेरुखेपन की वजह जान गया है. उस ने निशा से धर्मवीर के बारे में पूछा तो उस ने कहा कि वह उस का दोस्त है. लेकिन निशा के फोन के मैसेज पढ़ कर वह समझ गया था कि धर्मवीर सिर्फ दोस्त ही नहीं, बल्कि उस से बढ़ कर है.

शहादत अब भी निशा को पहले की तरह ही चाहता था, बल्कि वह उस से शादी करना चाहता था. उस ने निशा को कई बार समझाया कि वह धर्मवीर से बात न किया करे. निशा ने भी कहा था कि धर्मवीर से उस की सिर्फ दोस्ती है. वह एक अच्छा दोस्त है, इसलिए वह उसे हरगिज नहीं छोड़ेगी. निशा की यह बात शहादत को बहुत बुरी लगी थी. उस ने उसी समय तय कर लिया था कि निशा जब उस की नहीं है तो वह उसे किसी और के लिए भी नहीं छोड़ेगा.

वह निशा को ठिकाने लगाने के उपाय सोचने लगा. मार्च, 2016 में शहादत अली ने बच्चों को किसी बहाने से झारखंड स्थित गांव भेज दिया. 19 मार्च को वह दिल्ली के पहाड़गंज थाने के अंतर्गत संगतराशन मोहल्ले में किराए का कोई ऐसा कमरा तलाशने लगा, जिस का जीना अलग से हो. ऐसा कमरा उसे गली नंबर-3 में प्रमोद कुमार के मकान में तीसरी मंजिल पर मिल गया. कमरा लेने के बाद वह गुड़गांव चला आया. शहादत ने प्रमोद को अपना नाम विशाल बताया था.

उस ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से निशा को मना लिया. उस ने कहा, निशा मैं ने दिल्ली में एक ऐसा कमरा देखा है, जहां हम लोग जब चाहें, तब ठहर सकते हैं. तुम मेरे साथ कमरा देखने चलो. मैं गारंटी से कहता हूं कि वह कमरा तुम्हें भी पसंद आएगा.  निशा उस की बातों में आ गई. उस ने कह दिया कि 2-3 दिनों में वह दिल्ली चल कर कमरा देख लेगी. उसी दौरान 20 मार्च को शहादत अली ने मकानमालिक प्रमोद कुमार को फोन कर के बता दिया कि वह होली के बाद कमरे में शिफ्ट करेगा.

22 मार्च को शहादत निशा को ले कर प्रमोद के कमरे पर पहुंचा. उस ने जैसे ही दरवाजे की कुंडी खोली, पड़ोसन शोभा अपने कमरे से निकल आई. विशाल उर्फ शहादत को उस ने 3-4 दिन पहले देखा था, इसलिए उसे देख कर वह अपने कमरे में वापस चली गई.   कुछ देर बाद शहादत ने धर्मवीर को ले कर निशा से बात करनी शुरू कर दी. वह निशा को एक बार और समझाना चाहता था, पर निशा भड़क उठी. इस विषय पर दोनों के बीच तकरार बढ़ गई. जोरजोर की आवाजें पड़ोसन शोभा के कानों तक भी पहुंचीं.

शहादत को जब लगा कि यह नहीं मानेगी तो उस ने ठान लिया कि अब वह इसे जिंदा नहीं छोड़ेगा. उस ने खुद को नारमल कर के निशा से प्यारभरी बातें करने लगा. निशा उस की योजना से अंजान थी. उस ने निशा से कहा, निशा, एक खेल खेलते हैं. मैं तुम्हारी साड़ी से तुम्हारे हाथ बांध देता हूं. यदि तुम ने किसी तरह उस गांठ से अपने हाथ निकाल लिए तो तुम मुझ से मनचाही चीज ले सकती हो और अगर नहीं निकाल सकी तो मुझे मेरी पसंद की चीज खरीदवानी पड़ेगी.

मौत के इस खेल के मतलब को निशा समझ नहीं पाई. उस ने हां कह दिया. तभी शहादत ने उसी की साड़ी से उस के दोनों हाथ पीछे की तरफ कर के बांध दिए. निशा तो यही सोच रही थी कि किसी तरह वह साड़ी की गांठ से अपने हाथ निकाल कर शहादत को चांदनी चौक ले जा कर महंगा सलवार सूट खरीदेगी. उस के हाथ बांधने के बाद शहादत ने कहा, अब तुम 2 मिनट के लिए अपनी आंखें बंद कर लो. निशा ने जैसे ही आंखें बंद कीं, शहादत ने अपनी पैंट की जेब से चाकू निकाल कर एक हाथ से निशा का मुंह दबोचा और दूसरे हाथ से उस की गरदन रेत दी.

खून का फव्वारा निकला. निशा के मुंह से चीख तक नहीं निकल सकी और वह नीचे गिर पड़ी. निशा की हत्या करने के बाद शहादत ने उस का फोन स्विच्ड औफ कर के अपने पास रख लिया. उस की साड़ी से खून सने हाथ वगैरह पोंछ कर उस ने राहत की सांस ली. योजना के अनुसार, शहादत अली पहले से ही एक ताला खरीद कर लाया था. वह दरवाजे पर ताला लगा कर गुड़गांव स्थित अपने कमरे पर लौट गया. वहां से वह अपने गांव चला गया. उस का सोचना था कि दिल्ली में हत्या करने पर निशा की शिनाख्त नहीं हो पाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. दिल्ली पुलिस आखिर उस तक पहुंच ही गई. उस की निशानदेही पर पुलिस ने निशा का मोबाइल फोन, खून सने कपड़े और चाकू बरामद कर लिया था.

पुलिस ने पूछताछ के बाद शहादत अली को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.  निशा जिन वजहों से अपने पति से असंतुष्ट थी, उस के बारे में वह पति से प्यार से भी बातें कर सकती थी. प्यार से विचार करने पर हर समस्या का समाधान निकल आता है. लेकिन निशा के मन में इस बात की गलतफहमी थी कि पति उस की जरूरतों को नहीं समझ रहा, लिहाजा उन जरूरतों को पूरा करने की लालसा में उस ने खुद से 10 साल बड़े शहादत अली की तरफ कदम बढ़ा दिए.

5 बच्चों के बाप शहादत अली ने भी नहीं सोचा कि पत्नी को धोखा दे कर जिस रास्ते पर वह जा रहा है, वह सरासर गलत है. इस के बाद उस ने दूसरा गलत काम यह किया कि निशा को सबक सिखाने के लिए उस ने उस की हत्या कर दी. बहरहाल, लालसा पूरी करने के चक्कर में निशा को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा तो शहादत को जेल जाना पड़ा. कथा लिखने तक शहादत की जमानत नहीं हो सकी थी. केस की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी सुखदेव मीणा कर रहे हैं.  Extra Marital Affair Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Toxic Love Murder : प्रेमी की जानलेवा जिद 

Toxic Love Murder . दिव्या को जब पता चला कि उस का प्रेमी रविंद्र शादीशुदा है तो वह उस से किनारा करने लगी. लेकिन रविंद्र की तो जिद थी कि वह दिव्या से ही शादी करेगा. उस की इस जिद ने उस की ही नहीं, दिव्या की भी जान ले ली…

मेरठ प्रदेश के जनपद मेरठ के गढ़ मुक्तेश्वर रोड पर स्थित है एलएलआरएम मैडिकल कालेज एवं अस्पताल. इस के परिसर में बैंक, पोस्टऔफिस, थाना, मैडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रछात्राओं के हौस्टल के अलावा चिकित्सकों व कर्मचारियों के आवास भी हैं. अस्पताल में भी रोजाना सैंकड़ों मरीज इलाज के लिए आते हैं.

16 अप्रैल, 2016 की दोपहर को परिसर में अचानक सनसनी फैल गई. एफ ब्लौक के क्वार्टर नंबर-216 के सामने लोगों की भारी भीड़ जुट गई. सनसनीखेज वारदात की सूचना पा कर थाना मैडिकल के थानाप्रभारी रविंद्र वशिष्ठ भी पुलिस बल के साथ वहां आ पहुंचे थे.  पुलिस जब उस क्वार्टर में दाखिल हुई तो अंदर का नजारा दिल दहला देने वाला था. एक युवक व युवती एकदूसरे के नजदीक फर्श पर पड़े थे. उन के सिर से खून बह कर फर्श पर फैल रहा था. लड़की की मौत हो चुकी थी, जबकि युवक की सांसें चल रही थीं. युवक के हाथ में 315 बोर का एक तमंचा था.

खाली खोखा उस में फंसा हुआ था, जबकि एक खोखा नजदीक पड़ा था. युवक को बचाया जा सके, इस के लिए उसे आननफानन में मैडिकल के इमरजेंसी वार्ड में भरती करा दिया गया. थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दे दी थी. सूचना पा कर एसपी (सिटी) ओमप्रकाश सिंह व सीओ बी.एस. वीर कुमार भी मौकाएवारदात पर आ गए थे. इस वारदात से हर कोई सकते में था. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. गोली मृतका के माथे व बाईं कनपटी पर लगी थी, जो सिर के आरपार निकल गई थी.

फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को भी मौके पर बुलवा लिया गया था. टीम ने वहां से जरूरी साक्ष्य एकत्र किए. मैडिकल परिसर में इस तरह से दिल दहला देने वाला यह पहला मामला था. लिहाजा लोगों में दहशत थी. पता चला कि मृतका का नाम दिव्या था, जबकि युवक की पहचान रविंद्र गौतम के रूप में हुई. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि इस घटना के पीछे आखिर वजह क्या थी? इस बारे में लोगों से पूछताछ की गई तो पुलिस अधिकारियों को पता चला कि पूरा मामला प्रेमप्रसंग का था. लेकिन यहीं पर एक सवाल यह भी था कि आखिर ऐसे कौन से हालात थे, जिस की वजह से रविंद्र ने दिव्या को मार कर खुदकुशी करने की कोशिश की?

जिस समय घटना घटी थी, दिव्या के घर वाले कहीं गए हुए थे. खबर सुन कर जब वे घर आए तो बेटी की लहूलुहान लाश देख कर दहाड़े मार कर रोने लगे. उधर अस्पताल में भरती रविंद्र की हालत गंभीर बनी हुई थी.  उस के घर वालों को भी बुलवा लिया गया था. गोली उस के भी सिर के पार निकल गई थी. मैडिकल सुपरिंटैंडेंट डा. सुभाष सिंह और सीएमओ डा. अजीत सिंह की देखरेख में डाक्टर उसे बचाने की हर संभव कोशिश कर रहे थे. उस की जेब से भी पुलिस को एक जीवित कारतूस मिला था.

पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त तमंचे व कारतूस को अपने कब्जे में ले लिया था. इस के बाद जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने रविंद्र के खिलाफ हत्या और आत्महत्या की कोशिश करने का मामला दर्ज कर लिया था.

पुलिस ने मृतका व घायल युवक के घर वालों से घटना के बारे में विस्तार से पूछताछ की तो एक ऐसे जुनूनी प्रेमी की कहानी निकल कर सामने आई, जो अपने ढंग से मनमानी कर के न सिर्फ दिव्या को अपना बनाना चाहता था, बल्कि जिंदगी को अपने हिसाब से जीना चाहता था.

मृतका दिव्या बैंक कर्मचारी सुरेंद्र गौतम की बेटी थी. सुरेंद्र के परिवार में पत्नी कुसुमलता के अलावा 4 बेटियां और एक बेटा था. दिव्या दूसरे नंबर की बेटी थी. करीब 3 साल पहले सुरेंद्र की अकस्मात मृत्यु हो गई थी. कुसुमलता के पिता अतर सिंह मैडिकल कालेज में लाइब्रेरियन थे. चूंकि वह अकेले ही थे, इसलिए उन्होंने अपने नाम आवंटित हुए मैडिकल कालेज परिसर का क्वार्टर बेटी कुसुमलता को रहने के लिए दे दिया था, जबकि वह खुद मवाना से ड्यूटी करने आते थे.

कुसुमलता के परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी. बस किसी तरह जिंदगी बसर हो रही थी. पति की मिलने वाली पेंशन और पिता के सहयोग से वह अपना व बच्चों का खर्च उठा रही थीं. यदाकदा वह पोलियो जैसे सरकारी अभियान का हिस्सा बन कर कुछ रुपए कमा लेती थी. 19 साल की दिव्या इस साल 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी. अपनी पढ़ाई के साथ वह कंप्यूटर की कोचिंग भी कर रही थी. जिस सेंटर पर वह कंप्यूटर सीखने जाती थी, वह मैडिकल के नजदीक ही जागृति विहार में था. यहीं से उस की बड़ी बहन ने भी कंप्यूटर का कोर्स किया था.

यह कंप्यूटर सेंटर गजेंद्र का था. यहीं पर दिव्या की मुलाकात रविंद्र से हुई. रविंद्र मेरठ के ही मवाना कस्बे के पास स्थित नासरपुर गांव का रहने वाला था. वह इस कंप्यूटर सेंटर पर कंप्यूटर सीखने के अलावा प्रशासनिक काम भी देखता था. दरअसल वह सेंटर मालिक गजेंद्र का सगा मौसेरा भाई था. 22 वर्षीय रविंद्र की सोहबत अच्छी नहीं थी. वह अपनी मनमर्जी से जिंदगी जीने वाला युवक था. उस की इस तरह की प्रवृत्ति ने घर वालों को भी परेशान कर रखा था. जिम्मेदारियां आने से शायद उस की आदतें सुधर जाएं, यही सोच कर घर वालों ने उस का विवाह बुलंदशहर जिले की एक लड़की से कर दिया था.

कहते हैं, समय रहते इंसान अपनी गलत आदतें नहीं बदलता तो उस के बुरे नतीजे सामने आते हैं. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. 27 अप्रैल, 2014 को रविंद्र के ही गांव में मोहित नाम के एक युवक की हत्या हो गई. इस हत्या में रविंद्र का भी नाम आ गया. पुलिस से बचने के लिए वह अपने घर से फरार हो गया. कुछ महीने बाद जब मामला थोड़ा शांत हुआ तो वह गांव में वापस आ कर रहने लगा. इस के बाद वह मौसेरे भाई गजेंद्र के यहां कोचिंग सेंटर में कंप्यूटर सीखने के साथसाथ प्रशासनिक काम भी देखने लगा.

दिव्या भले ही गरीब परिवार से थी, लेकिन खूबसूरती के मामले में अव्वल थी. रविंद्र ने जब उसे देखा तो पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठा और उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. दिव्या उम्र के जिस मुकाम से गुजर रही थी, वह बहुत नाजुक और बहकने वाली होती है. रविंद्र का कनखियों से उसे देख कर मुसकराना और मीठे अंदाज में बात करना दिव्या को भी लुभा गया. दिव्या को अहसास हो गया कि रविंद्र उसे चाहता है. रविंद्र हालांकि शादीशुदा था, इस के बावजूद वह अकसर दिव्या के खयालों में डूबा रहने लगा. वह उस से अपने दिल की बात कहने को बेचैन रहने लगा.

एक दिन दिव्या जैसे ही कोचिंग सेंटर से घर जाने को हुई, मौका पा कर उस ने उस के सामने अपना हालएदिल कहने के लिए कहा, दिव्या एक बात बोलूं? हां. दिव्या बोली. जब से मैं ने तुम्हें देखा है, तब से मेरा चैन जैसे कहीं खो गया है. रविंद्र ने कहा.  उस की बात सुन कर दिव्या के चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई और दिल की धड़कनें बढ़ गईं. दिव्या मैं सच कह रहा हूं. मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. रविंद्र बोला.

उस की बात सुन कर दिव्या मुसकरा दी और बिना कोई जवाब दिए चली गई. रविंद्र ने उस से जो कहा था, उसे वह काफी पहले महसूस कर चुकी थी. शर्म के चलते उस ने उस समय उसे कोई जवाब नहीं दिया था. वास्तव में वह भी उस के खयालों में डूबने लगी थी. रविंद्र के इजहार के बाद उस रात दिव्या को ठीक से नींद नहीं आई. वह करवटें बदलती रही.

अगले दिन वह कोचिंग सेंटर पहुंची तो रविंद्र उसे इंतजार करता मिला. उस की नजरें उस के चेहरे पर थीं. जैसे ही दिव्या की नजरें उस से मिलीं, वह मुसकरा दी. इस से रविंद्र मन ही मन खुश हो गया. उस दिन के बाद दोनों के बीच प्रेमभरी बातों का गहरा सिलसिला चल निकला. दोनों एकदूसरे को देखने के लिए बेकरार रहने लगे. प्रेम के पंछियों की अपनी अलग उड़ान होती है. वे सुकून के उन लम्हों की तलाश करते हैं, जहां सिर्फ वही दोनों हों. अब वे कोचिंग के  बाहर भी साथसाथ घूमने लगे थे.

रविंद्र कभी उसे मूवी दिखाने ले जाता तो कभी पार्क में बैठ कर दोनों मन की बातें करते. दिव्या प्यार के नए अहसास से बहुत खुश थी. जिंदगी दोनों के लिए जैसे खुशियों का गुलिस्ता हो गई थी. इन्हीं पलों में उन्होंने साथ जीनेमरने की कसमें भी खाईं. इश्क छिपाए नहीं छिपता. दिव्या की बड़ी बहन दीपा अब भी कभीकभी कोचिंग सेंटर पहुंच जाती थी. वहां उसे पता चल गया कि उस की बहन का रविंद्र के साथ चक्कर चल रहा है. उस ने इस बारे में दिव्या से बात की तो दिव्या ने उसे अपने हिसाब से समझा दिया.

उधर रविंद्र की पत्नी को जब पता चला कि उस का पति किसी लड़की से इश्क लड़ा रहा है तो उस ने घर में तूफान खड़ा कर दिया. रविंद्र दबंग था, उस ने पत्नी को धमका दिया. दिव्या के प्यार में वह इस कदर डूब चुका था कि वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता था. पत्नी के साथ आए दिन कलह होने लगी तो बजाए अपनी आदत सुधारने के रविंद्र पत्नी को मायके छोड़ आया. इस के बाद उस ने उस की तरफ पलट कर नहीं देखा. दिव्या और रविंद्र का इश्क परवान चढ़ रहा था. एक साल कब बीत गया, इस का पता ही नहीं चला.

दोनों के रिश्ते उन के घर वालों से छिपे नहीं थे. रविंद्र दिव्या के घर भी जाने लगा था. दिव्या ने भी मन ही मन सोच लिया था कि वह भी रविंद्र से ही विवाह करेगी. एक दिन रविंद्र ने दिव्या से अपने मन की बात बताते हुए कहा, दिव्या, मेरी जिंदगी अब तुम्हारे बिना अधूरी है. मैं जल्द से जल्द तुम से शादी कर के हमेशा के लिए तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूं. चाहती तो मैं भी यही हूं, लेकिन… वह बोली. लेकिन क्या?  उस ने चौंक कर पूछा. देखो रविंद्र, शादी के लिए अभी मेरी बड़ी बहन भी है. उन की शादी हो जाने के बाद ही यह हो सकता है.

रविंद्र को दिव्या की यह बात अच्छी नहीं लगी. वह तो यही सोच रहा था कि वह उस की बात सुन कर तुरंत शादी के लिए तैयार हो जाएगी. उस दिन बात आई गई हो गई. उस ने सोचा कि वह अपनी बातों से दिव्या को मना लेगा. इस के बाद उस की जब भी दिव्या से मुलाकात होती, वह अकसर इस मुद्दे पर उस से चर्चा करता. सोतेजागते उठतेबैठते वह उसी के बारे में सोचता रहता. रविंद्र जिद्दी इंसान था. वह दिव्या से शादी करने की जिद कर बैठा. वह दिव्या से घर से भाग चलने के लिए कहता. उस की इन आदतों से दिव्या बोझिल होने लगी. इस बीच दिव्या को पता चल गया कि रविंद्र शादीशुदा है और उस ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया है.

यह जानकारी मिलने के बाद दिव्या को दुख हुआ कि रविंद्र ने उस से यह बात क्यों छिपाई? उस ने इस बारे में रविंद्र से कहा तो कुछ नहीं, पर उस से किनारा करने लगी. रविंद्र दिव्या की बेरुखी को समझ नहीं पाया. वह तो दिव्या पर अपना पूरा हक समझने लगा था. रविंद्र को यही लगता था कि दिव्या उस के लिए घरपरिवार सब छोड़ कर उस के इशारे पर वह सब करेगी, जो वह चाहता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जब किसी इंसान की अपेक्षाओं को चोट पहुंचती है तो गलतफहमियां भी जन्म ले लेती हैं और इंसान बातों के मतलब अपने हिसाब से लगाने लगता है.

रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. उसे लगा कि दिव्या उस से किनारा कर के उसे धोखा दे रही है, उस से उस का दिल भर गया है और वह किसी और से प्यार करने लगी है. जबकि वह उस के लिए अपनी पत्नी को छोड़ चुका था. यह बात उसे बहुत कचोटती थी. रविंद्र दिव्या पर जितना दबाव बनाने की कोशिश करता, वह उतना ही दूर होती जा रही थी.

जबकि रविंद्र के सिर पर उसे पाने का जुनून सवार था. उस की इन्हीं सब बातों से परेशान हो कर दिव्या ने कोचिंग सेंटर जाना बंद कर दिया. इस से रविंद्र के दिमाग में गलतफहमी और बढ़ गई. उस के लिए सोचने, समझने और मकसद के रूप में बस दिव्या ही थी. दिव्या अब उस से मिलने के बजाय फोन पर ही बातें कर लेती थी. रविंद्र शादी की रट लगाता तो दिव्या उसे समझाने की कोशिश करती.

रविंद्र की इसी जिद पर एक दिन दिव्या ने कहा, रविंद्र, तुम बात को समझने की कोशिश क्यों नहीं करते? मेरे सामने मेरा परिवार भी है. मैं ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहती, जो परिवार को बदनाम करे. मैं तो तुम्हारे लिए बहुत कुछ खो चुका हूं दिव्या.  रविंद्र ने कहा. तुम्हारी बात अलग है रविंद्र, मैं एक लड़की हूं. इसलिए मैं किसी को खोना नहीं चाहती. बेहतर यही है कि तुम समय का इंतजार करो.  दिव्या ने समझाया. मैं इंतजार नहीं, बल्कि अपनी ख्वाहिश पूरी करना चाहता हूं. तुम नहीं मानोगी तो मुझे दूसरे तरीके भी आते हैं. रविंद्र सीधे धमकी पर उतर आया.

दिव्या के दिल को उस की इस धमकी से गहरी चोट पहुंची. इस के बाद तो उस ने मोबाइल पर भी दूरियां बनानी शुरू कर दीं. रविंद्र को लगने लगा कि दिव्या उसे धोखा दे रही है. अपने दोस्तों से उस ने कहना शुरू कर दिया कि जिस के लिए वह बर्बाद हो गया, वही उस की बात नहीं मान रही. अगर उस की ख्वाहिश पूरी नहीं हुई तो एक दिन वह उसे मार कर खुद को भी खत्म कर लेगा.

रविंद्र बुरी तरह परेशान था. उस ने सोचा कि आखिरी बार वह दिव्या से बात करेगा. इस बार भी उस ने बात नहीं मानी तो वह उसे खत्म कर देगा. शादी के जुनून, गलतफहमी और बेवफाई के शक ने उसे विवेकशून्य कर दिया. रविंद्र ने इस बीच एक तमंचे का इंतजाम कर लिया था. 15 अप्रैल, 2016 की शाम उस ने दिव्या से मोबाइल पर बात कर के अपनी जिद दोहराई तो दिव्या नहीं मानी. उस रात रविंद्र को ठीक से नींद नहीं आ सकी.

अगली दोपहर मन ही मन खतरनाक फैसला ले कर रविंद्र अपने घर से निकला. तकरीबन एक बजे का वक्त था, जब वह दिव्या के घर पहुंचा. उस वक्त दिव्या घर में अकेली थी. उस की मां व बहनें पड़ोस में गई हुई थीं, जबकि छोटा भाई स्कूल गया हुआ था. उस ने दिव्या से एक बार फिर अपनी बात दोहराई. काफी देर तक दोनों बातचीत करते रहे. अंत में दिव्या ने शादी करने से इंकार कर दिया तो गुस्से में आ कर रविंद्र ने तमंचा निकाला और दिव्या पर गोली चला दी. गोली लगते ही दिव्या नीचे गिर पड़ी. इस के बाद उस ने तमंचे में दूसरा कारतूस डाला और खुद को भी गोली मार ली. गोली की आवाज सुन कर आसपास के लोगों में अफरातफरी मच गई.

दिव्या की मांबहनें भी दौड़ कर आ पहुंचीं. दिल दहलाने वाला नजारा देख कर उन की चीखें निकल गईं. दिव्या की बहन ने अपने मामा दीपक को यह खबर दी तो उन्होंने पुलिस को सूचित कर दिया. रविंद्र की जिद व जुनून ने अपनी प्रेम कहानी को भयानक अंजाम पर पहुंचा दिया था.  अस्पताल में रविंद्र की हालत नाजुक बनी हुई थी, जिसे देखते हुए उसे रात में दिल्ली के एम्स के लिए रैफर कर दिया गया. लेकिन 19 अप्रैल को उस की भी मौत हो गई. प्यार हो जाना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन रविंद्र की जिद्दी प्रवृत्ति ने दिव्या को असमय मौत दे कर उस के परिवार को तो गम दिया ही, साथ ही वह अपनी जिंदगी से भी हाथ धो बैठा. Toxic Love Murder

— कथा पुलिस सूत्रों पर

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Baazigar Style Revenge : नफरत का प्यार

Baazigar Style Revenge . पूजा ने गणेश से प्यार ही नहीं किया था, बल्कि उस की जीवनसंगिनी बनने का सपना भी देखने लगी थी. लेकिन गणेश ने तो उस से सिर्फ इसलिए प्यार किया था क्योंकि उसे अपने ताऊ की हत्या का बदला लेना था.

उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के थाना गहमर के गांव देवल के रहने वाले रामअवध चौधरी की बहन पूजा रात 9 बजे घर में कहीं दिखाई नहीं दी तो घर वालों को चिंता हुई. गांव में उस की तलाश हुई, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर पूजा कहां चली गई. रात गहरा गई तो गांव वालों ने कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, जो होना होगा, सुबह ही होगा.

घर वालों ने रात आंखों में काटी.  सुबह होते ही पूरा परिवार पूजा की तलाश में निकल पड़ा. गांव वाले भी मदद कर रहे थे. आसपास के रिश्तेदारों, परिचितों से पता किया गया, लेकिन कोई भी उस के बारे में कुछ नहीं बता सका. जब पूजा के बारे में कहीं से कुछ पता नहीं चला तो किसी अनहोनी की बात सोच कर घर वाले ही नहीं, पूरा गांव परेशान हो उठा.

सुबह से दोपहर हो गई और किसी को कोई लाभ होता नहीं दिखाई दिया तो गांव वालों ने रामअवध चौधरी से पूजा की गुमशुदगी दर्ज कराने को कहा. इस के बाद गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर रामअवध चौधरी थाना गहमर पहुंच गए.

थानाप्रभारी कृष्णप्रताप सिंह को रामअवध चौधरी ने पूरी बात बताई तो उन्होंने उन से तहरीर ले कर गुमशुदगी दर्ज करा दी. इस के बाद उन्हें जरूरी काररवाई का आश्वासन दे कर घर भेज दिया. यह 3 दिसंबर, 2015 की बात थी.

गुमशुदगी के इस मामले की जांच कृष्णप्रताप सिंह ने सबइंसपेक्टर सुधीर त्रिपाठी को सौंप दी थी. उन्होंने मामले की जांच शुरू की तो उन्हें पता चला कि पूजा 2 दिसंबर की रात रहस्यमय ढंग से गायब हो गई थी. मजे की बात यह थी कि उसे किसी ने घर से बाहर जाते नहीं देखा था.

सुधीर त्रिपाठी इस मामले में कुछ कर पाते, अगले दिन यानी 4 दिसंबर, 2015 को उन्हें देवल गांव से सटे एक अरहर के खेत में पूजा की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. उन्होंने यह बात कृष्णप्रताप सिंह को बताई तो वह उन्हें और कुछ सिपहियों को साथ ले कर वहां पहुंच गए, जहां पूजा की लाश पड़ी थी. घटनास्थल पर गांव के काफी लोग जमा थे. लाश के पास ही रामअवध और उस के घर वाले रो रहे थे.

कृष्णप्रताप सिंह ने रामअवध और उन के घर वालों को चुप करा कर लाश से दूर किया और सहयोगियों के साथ अपनी काररवाई में लग गए. लाश के निरीक्षण में पता चला कि पूजा की हत्या उसी के दुपट्टे से की गई थी. दुपट्टा अभी भी उस के गले में लिपटा था. गला कसे जाने से जीभ बाहर निकल आई थी.

शरीर में रगड़ के निशान साफ दिखाई दे रहे थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि जान बचाने के लिए उस ने काफी संघर्ष किया था. लाश के पास ही पुलिस को 470 रुपए और एक वोटर आईडी कार्ड मिला, जो गांव के ही गणेश चौधरी का था. पुलिस ने दोनों चीजें संभाल कर अपने पास रख ली थीं. पुलिस ने लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद कृष्णप्रताप सिंह ने पूछताछ शुरू की तो पता चला कि रामअवध की गांव में किसी से ऐसी कोई दुश्मनी नहीं थी कि वह उन की बहन की हत्या कर देता.

घटनास्थल से उन्हें गणेश चौधरी का जो वोटर आईडी कार्ड मिला था, उन्होंने उस के बारे में पता किया. पता चला कि गणेश गांव का बहुत ही सीधासादा, अपने काम से काम रखने वाला व्यवहारकुशल लड़का था. वह न किसी के घर आताजाता था और न किसी से ज्यादा मतलब रखता था. वह किसी प्रकार का नशा आदि भी नहीं करता था. गांव में उस की गिनती अच्छे लड़कों में होती थी.  गणेश कैसा भी रहा हो, लाश के पास से उस का वोटर आईडी कार्ड मिला था, इसलिए वह शक के घेरे में आ गया था. शायद पूजा के कमरे से कोई सबूत मिल जाए, इस उम्मीद में पुलिस ने उस के कमरे की तलाशी ली. उस के कमरे से पुलिस को एक मोबाइल फोन मिला, जिस के बारे में घर वालों को बिलकुल पता नहीं था.

उस फोन का काल लौग चैक किया गया तो उस में सिर्फ एक ही नंबर से फोन आए थे और उस नंबर पर लंबीलंबी बातें हुई थीं. इस से पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि पूजा का किसी लड़के से प्रेमसंबंध चल रहा था. पुलिस ने पूजा की हत्या का मामला दर्ज करा कर मामले की जांच शुरू कर दी. पुसिल ने पूजा के कमरे में मिला मोबाइल फोन कब्जे में ले लिया था. इस के बाद उस में चल रहे नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई गई. काल डिटेल्स से पता चला कि उस नंबर पर पिछले कई महीनों से उसी एक नंबर से फोन आ रहे थे और दोनों के बीच लंबीलंबी बातें होती थीं. जिस रात पूजा घर से गायब हुई थी, उस दिन शाम साढ़े 7 बजे के करीब उसी नंबर से फोन आया था और करीब 5 मिनट बात हुई थी.

पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो पता चला वह नंबर गणेश चौधरी का था. पुलिस को जैसे ही पता चला, वह नंबर गणेश चौधरी का है, उस का शक यकीन में बदल गया और 7 दिसंबर की सुबह पुलिस ने गणेश चौधरी को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. गणेश को थाने ला कर कृष्णप्रताप सिंह ने जब उस से पूछा कि उस ने पूजा की हत्या क्यों की तो इधरउधर करने के बजाय उस ने बड़ी निर्भीकता से जवाब दिया, मैं ने पूजा की हत्या नहीं की.

गणेश चौधरी ने भले ही पूजा की हत्या करने से इनकार किया था, लेकिन कृष्णप्रताप सिंह के पास उस के खिलाफ सारे सबूत थे. उन्होंने जब घटनास्थल से मिला उस का वोटर आईडी कार्ड, 470 रुपए और काल डिटेल्स उस के सामने रखी तो वह जोर से चीखा, हां, मैं ने ही पूजा की हत्या की है. अपने प्रेमजाल में फांस कर मैं ने ही उसे मारा है. उस की हत्या कर के मैं ने अपने (बड़े पिताजी) ताऊ की हत्या का बदला लिया है. मुझे न अपने किए पर कोई पछतावा है और न जेल जाने का डर है. मुझे खुशी है कि मैं ने गोपाल चौधरी से अपने ताऊजी की हत्या का बदला ले लिया है.

गणेश की बातें सुन कर सभी सन्न रह गए. सीधेसादे गणेश के मन में गोपाल चौधरी के परिवार के प्रति इतना जहर भरा था कि उस ने एक ऐसे बेगुनाह की हत्या कर दी, जिस का उस के ताऊ की हत्या से कोई मतलब नहीं था. इस के बाद गणेश ने दिल दहलाने वाली पूजा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस तरह से थी :

24 वर्षीय गणेश चौधरी देवल गांव के ही रहने वाले चंद्रमा चौधरी का बेटा था. चंद्रमा चौधरी की गिनती गांव में संपन्न किसानों में होती थी. गोपाल चौधरी भी इसी गांव में रहते थे. कभी उन की गांव में तूती बोलती थी. बड़े किसान होने के साथ वह दबंग भी थे. बात 20-22 साल पहले की है. एक जमीन को ले कर चंद्रमा के बड़े भई विक्रम चौधरी और गोपाल चौधरी में ठन गई. वह जमीन विक्रम चौधरी की थी. गोपाल चौधरी उस पर कब्जा करना चाहते थे. उसी जमीन को ले कर दोनों परिवारों में लड़ाईझगड़ा शुरू हुआ तो गोपाल चौधरी के परिवार वालों ने विक्रम चौधरी की गोली मार कर हत्या कर दी थी.

गोपाल चौधरी और उस के घर वालों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ. लेकिन गांव वालों ने दुश्मनी खत्म कराने के लिए इस मामले को अपने स्तर पर निपटाने की कोशिश की. आखिर गांव वालों की कोशिश रंग लाई और दोनों परिवारों में समझौता हो गया. वक्त बड़े से बड़ा घाव भर देता है, ऐसा ही विक्रम चौधरी के हत्या के मामले में भी हुआ. विक्रम चौधरी की मौत को भी उस के परिवार वालों ने भुला दिया.

जिन दिनों विक्रम चौधरी की हत्या हुई थी, गणेश उस समय काफी छोटा था. इस के बावजूद वह अपने ताऊ की हत्या की बात को भूल नहीं पाया. शायद उस हत्या का जख्म उस के दिल में गहरे तक उतर गया था. यह ऐसा जख्म था, जो अंदर ही अंदर उसे साल रहा था. शायद इसीलिए वह बड़ा हुआ तो अपने ताऊ की हत्या का बदला लेने के बारे में सोचने लगा.

इस की वजह यह थी कि घर वालों ने उस के ताऊ की हत्या की बात को लगभग भुला दिया था. उस ने कई बार पिता चंद्रमा चौधरी से इस बारे में कहा भी, तब उन्होंने यह कह कर बात को टाल दिया कि उसे भी इस बात को भूल कर अब आगे के बारे में सोचना चाहिए. इन परिस्थितियों में उस बात को भुला देना ही ठीक है. पिता की इस बात से गणेश बेचैन हो उठा था. यही नहीं, उस ने प्रतिज्ञा ली थी कि कुछ भी हो, वह गोपाल चौधरी के परिवार के किसी आदमी को मार कर ताऊ की हत्या का बदला जरूर लेगा.

गणेश चौधरी बदला लेने के बारे में ही सोच रहा था कि एक दिन टीवी पर उस ने शाहरुख खान, शिल्पा शेट्टी और काजोल अभिनीत फिल्म ‘बाजीगर’ देखी. यह फिल्म देखने के बाद उस के मन में जो विचार आया, उस से उसे लगा कि अब वह ताऊ की हत्या का बदला आराम से ले लेगा. उस ने फिल्म में देखा था कि शाहरुख खान ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए फिल्म में दिलीप ताहिर की बेटी शिल्पा शेट्टी को अपने प्यार में फांस कर बड़ी चालाकी से उसे बिल्डिंग से नीचे फेंक कर हत्या कर दी थी.

इस के बाद गणेश ने इस फिल्म को मोबाइल में डलवा कर कई बार देखी. इस के बाद उस ने योजना बनाई कि उसे क्या करना है. उस ने गोपाल चौधरी की खूबसूरत बेटी पूजा की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया. उस ने अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा था, इसलिए उस ने उस की दोस्ती स्वीकार कर ली. इस तरह गणेश को अपना मकसद कामयाब होता नजर आया. फिल्म बाजीगर में जिस तरह शाहरुख खान ने शिल्पा शेट्टी को टारगेट बनाया था, उसी तरह गणेश ने पूजा को टारगेट बनाया.

पूजा गणेश के इरादों से बेखबर थी. वह नहीं जानती थी कि इस दोस्ती के पीछे गणेश का क्या इरादा है? गणेश के ताऊ विक्रम चौधरी की जिन दिनों हत्या हुई थी, उन दिनों पूजा पैदा भी नहीं हुई थी. उसे अपने परिवार वालों से भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी.

पूजा और गणेश की यह दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. दोनों अकसर गांव के बाहर खेतों में मिलने लगे. गणेश की योजना का यह दूसरा चरण था, जिस में वह सफल हो गया था. उन के प्यार का यह दूसरा साल चल रहा था. पूजा गणेश के प्यार में इस कदर पागल थी कि उस के बुलाने पर वह भागी चली आती थी. इस की वजह यह थी कि पूजा के साथ गणेश ने कभी कोई गलत हरकत नहीं की थी. वह उस से इस तरह की बातें करता था, जिसे सुन कर वह काफी प्रभावित होती थी.

गणेश पूजा की हर छोटीबड़ी जरूरतें पूरी करता था. उस ने उसे एक नया मोबाइल फोन भी ला कर दे दिया था, जिस से दोनों के बीच घंटों बातें होती थीं. यह वही मोबाइल फोन था, जो पूजा के कमरे में मिला था. पूजा खुद को दुनिया की सब से खुशनसीब प्रेमियों में मानती थी. वह गणेश के साथ शादी के सपने देखने लगी थी, क्योंकि वह उसी की जाति का था. जबकि हकीकत इस से अलग थी. गणेश ने देखा कि पूजा अब उस के प्यार में अंधी हो चुकी है और अब उसे कभी भी कहीं भी बुलाया जा सकता है तो उस ने योजना के अंतिम चरण को अंजाम देने के लिए 2 दिसंबर, 2015 की शाम साढ़े 7 बजे उसे फोन किया.

पूजा कमरे में अकेली टेलीविजन देख रही थी. गणेश का नंबर देख कर वह खुश हो गई. उस ने दबी जुबान से कहा, क्या बात है, आज बड़ी जल्दी फोन कर दिया? तुम अभी क्या कर रही हो? गणेश ने पूछा. कुछ खास नहीं, टीवी देख रही थी, बताओ फोन क्यों किया? बताता हूं, कमरे में कोई है तो नहीं? कोई॒ नहीं है, बताओ॒ क्या॒ बात है? तुम थोड़ी देर के लिए खेतों की ओर आ सकती हो? क्यों, क्या बात है?  पूजा ने पूछा. थोड़ी प्यार भरी बातें करने का मन कर रहा है. लेकिन मैं इतनी देर खेतों की तरफ नहीं आ सकती. अभी देर कहां हुई है, शाम ही तो है. अंधेरा हो चुका है. तुम अंधेरे से कब से डरने लगी? तुम्हारे रहते मुझे किसी चीज से डर नहीं लगता. तो फिर तुम कमरे से बाहर निकलो, बाहर मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. गणेश ने कहा. मूड तो नहीं है, लेकिन तुम कह रहे हो तो आ जाती हूं.  पूजा ने तुनक कर कहा. ठीक है, थोड़ी देर बातें कर के आ जाएंगे. तुम चलो, मैं कोई बहाना बना कर आ रही हूं.

प्रेमी के बुलाने पर पूजा मना नहीं कर सकी और मोबाइल अपने कमरे में रख कर दबे पांव गणेश से मिलने के लिए निकल पड़ी. उसे बाहर जाते घर के किसी आदमी ने नहीं देखा था. पूजा गांव के बाहर पहुंची तो गणेश उसे इंतजार करता मिल गया. दोनों खेतों की ओर बढ़ गए. ठंडी का मौसम था, लेकिन प्रेमी से मिलने की चाह में दोनों को ठंड नहीं लग रही थी. गणेश पूजा को अरहर के खेतों में ले गया. प्रेमी के बगल में बैठ कर पूजा बोली, समझ में नहीं आता कि तुम्हें रात में खेतों में आ कर बातें करने में क्या मजा मिलता है? वही जो तुम्हें मिलता है. आखिर तुम भी तो मना नहीं करती. गणेश ने कहा.

इस तरह प्यार की बातें करते काफी समय निकल गया. रात गहरा गई और पूजा को ठंड लगने लगी तो पूजा ने चलने को कहा. तभी गणेश ने पूजा का दुपट्टा ले कर उसे ओढ़ाने के बहाने गले में लपेटा और फुर्ती से कस दिया. गला कसने पर पूजा छटपटाई जरूर, लेकिन ताकतवर गणेश ने उसे छोड़ा नहीं. पूजा मर गई तो उस ने आसमान की ओर देख कर कहा, बड़े पापा, गोपाल चौधरी की बेटी को मार कर मैं ने आप की हत्या का बदला ले लिया, अब तो आप की आत्मा को शांमि मिल गई होगी.

इस के बाद गणेश ने पीछे की जेब से मोबाइल निकाला, तभी जेब में रखे 470 रुपए और वोटर आईडी कार्ड नीचे गिर गया. उस समय अंधेरा था, इसलिए इस का पता उसे नहीं चला और वह घर आ गया. बाद में इन्हीं चीजों से वह शक के घेरे में आ गया. चालाक गणेश ने बड़े ही शातिराना अंदाज में ठंडे दिमाग से पूजा की हत्या की थी, लेकिन उसे उस के किए की सजा मिलनी थी, इसलिए उस के हाथों वहां सबूत गिर गए. गणेश को निर्दोष पूजा की हत्या करने का तनिक भी अफसोस नहीं है.

पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने गणेश चौधरी के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. Baazigar Style Revenge

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana Crime Story: मोहब्बत बनी मौत

Haryana Crime Story: अविवाहित मुकेश की फेसबुक द्वारा 2 बच्चों की मां निशा से दोस्ती हुई तो दोनों एकदूसरे से प्यार ही नहीं करने लगे, बल्कि घर छोड़ कर भाग भी गए. लेकिन निशा को अपनी गलती का अहसास हुआ तो वह वापस आ गई. मुकेश को प्रेमिका की यह बेवफाई पसंद नहीं आई और वह उस का खून कर बैठा….

हरियाणा के जिला पानीपत के थाना शहर की राजीव कालोनी में ज्यादातर वे लोग रहते हैं, जो वहां की छोटीबड़ी कंपनियों में काम करते हैं. यहां की आबादी का एक हिस्सा ऐसा भी है, जो बतौर किराएदार रहता है. चोरीचकारी और मारपीट जैसे अपराधों को छोड़ दें तो इस कालोनी में कभी ऐसी कोई बड़ी वारदात नहीं हुई कि यहां के लोग दहल उठते.

लेकिन कब, कहां और किस प्रकार का अपराध घट जाए, इस बात को पहले से कौन जानता है. 3 फरवरी, 2016 की दोपहर को इस कालोनी में जो सनसनीखेज वारदात हुई, उस ने न सिर्फ पुलिस वालों को हैरान कर दिया, वहां रहने वालों को भी डरा दिया. दरअसल, कालोनी के ही एक सिरफिरे नौजवान ने सरेआम चाकू से एक महिला की गला काट कर बेरहमी से हत्या कर दी थी. हैरानी और खौफ पैदा करने वाली बात यह थी कि हत्यारा महिला की लाश के पास ही कुर्सी डाल कर आराम से बैठा था. लोगों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए वह चाकू लहरा कर अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा था.

दिल दहलाने वाले इस खूनी मंजर और हत्यारे की धमकी के डर का आलम यह था कि कोई भी आगे बढ़ने की हिममत नहीं जुटा पा रहा था. हत्यारा कह रहा था, ‘‘यह सिर्फ मेरे लिए बनी थी, लेकिन इस ने मेरी होने से मना कर दिया, इसलिए इसे जिंदा रहने का कोई हक नहीं रह गया था.’’

घटना की सूचना पा कर थाना शहर के थानाप्रभारी सुरेश कुमार, किला चौकीइंचार्ज प्रवीण कुमार और महिला एसआई नीलम आर्य पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गई थीं. थोड़ी देर में डीएसपी दलबीर सिंह भी आ गए थे. घटनास्थल की हालत देख कर पुलिस वालों के भी रोंगटे खडे़ हो गए थे. मृतका खून से लथपथ पड़ी थी. लाश के पास ही कुर्सी डाले हत्यारा बैठा था. पुलिस को देख कर वह थोड़ा सतर्क हो गया था. पुलिस ने आगे  बढ़ कर कहा, ‘‘चाकू फेंक कर खुद को कानून के हवाले कर दो. यही तुम्हारे लिए ठीक भी रहेगा.’’

इस से युवक को गुस्सा आ गया. उस ने लाश की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘खबरदार, कोई भी आगे बढ़ा तो उस का भी यही अंजाम कर दूंगा, जो इस का किया है.’’

उस की इस धमकी से पुलिसकर्मियों के भी कदम ठिठक गए. थानाप्रभारी ने उसे समझाना चाहा, ‘‘हमारी बात तो सुनो…’’

उन की बात पूरी होती, उस के पहले ही वह चिल्लाया, ‘‘कहा न, कोई आगे नहीं आएगा. अगर कोई आगे आया तो मैं अपनी गर्दन काट लूंगा.’’

कह कर उस ने चाकू अपनी गर्दन पर रख दिया. उस युवक की इस हरकत से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. वे समझ गए कि इस के सिर पर खून सवार है. इस स्थिति में यह कुछ भी कर सकता है. इसलिए पुलिस उसे समझातीबुझाती रही. मृतका की सास और उस का पति जोरजोर से रो रहे थे. जब युवक को लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो उस ने कहा, ‘‘चलो, पहले लाश उठाओ.’’

पुलिस जैसे ही आगे बढ़ी, उसी बीच उस ने अपने हाथ की कलाई पर चाकू से वार कर लिया. खून की धार फूट पड़ी. ऐसे में ही पुलिस ने चकमा दे कर उसे पकड़ लिया और फुर्ती से चाकू छीन लिया. इस के बाद तुरंत अपनी जीप से अस्पताल पहुंचाया. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि इतनी बड़ी घटना आखिर घटी क्यों थी? इस बारे में पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि जिस युवक ने खौफनाक तरीके से फिल्मी अंदाज में यह हत्या की थी, उस का नाम मुकेश था. मृतका का नाम निशा था.

जिस समय यह वारदात हुई थी, मृतका निशा छत पर कपड़े फैलाने गई थी. उसी बीच मुकेश चाकू ले कर वहां आ गया. वह सीधे छत पर गया और निशा का हाथ पकड़ कर नीचे खींच लाया. वह उस से साथ चलने को कह रहा था. निशा ने मना किया तो उस ने उस का गला काट दिया. सास ने बहू को बचाने की कोशिश तो की, लेकिन बचा नहीं सकी. बहरहाल, पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद मृतका के पति संजय वर्मा की तहरीर पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया गया. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने मुकेश को कस्टडी में ले लिया और थाने ला कर विस्तार से पूछताछ की.

मुकेश, निशा के घर वालों और पड़ोसियों से पूछताछ में एक ऐसे सिरफिरे आशिक की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई, जो फेसबुक से करीब आई निशा को हमेशा के लिए अपनी बनाने की जिद पर अड़ा था, जबकि उस के प्यार में पड़ कर वादे करने वाली निशा हालात बदलने पर बदल चुकी थी. खूबसूरत और बनसंवर कर रहने वाली 30 वर्षीया निशा संजय वर्मा की पत्नी थी. संजय एक पावरलूम फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस के 2 बेटे, 8 साल का आदी और 6 साल का वंश था. उस के मातापिता भी साथ रहते थे. वैसे तो ये लोग मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बलरामपुर के रहने वाले थे, लेकिन लगभग 15 सालों से पानीपत में रह रहे थे. परिवार में खुशियों का बसेरा था. वक्त अपनी गति से चल रहा था.

मूलत: बिहार का रहने वाला 22 वर्षीय मुकेश भी कालोनी में किराए पर रहता था और अमन भवन चौक स्थित एक फैक्ट्री में कपड़ा सिलाई का काम करता था. चूंकि वह संजय के घर के नजदीक रहता था, इसलिए अक्सर उस की नजरें निशा पर पड़ जाती थीं. धीरेधीरे उस की खूबसूरती उसे भाने लगी. फिर तो वह उसे देखने के बहाने तलाशने लगा. निशा जल्दी ही उस की मंशा भांप गई. 3 महीने पहले मुकेश ने निशा को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी तो उस ने सहर्ष स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों एकदूसरे के दोस्त बन गए.

दोनों के बीच चैटिंग होने लगी. निशा किस डगर पर चल चुकी है, यह बात परिवार का कोई नहीं जानता था. चैटिंग और मोबाइल पर होने वाली बातों से दोस्ती गहराई तो मुकेश निशा से प्यार करने लगा. एक दिन मौका पा कर उस ने प्यार का इजहार भी कर दिया. निशा ने नासमझी दिखाई और परिवार के बारे में सोचे बगैर उस के प्यार पर अपने प्यार की मोहर लगा दी. दिलों में प्यार का पौधा अंकुरित हुआ तो वे एकदूसरे के खयालों में डूबे रहने लगे. जल्दी ही चोरीछिपे दोनों की मुलाकातों का सिलसिला भी चल निकला.

मुकेश रसिया किस्म का युवक था. निशा से मुलाकात होती तो वह उस की इतनी तारीफें करता था कि वह खुशी से फूली नहीं समाती. पति और प्रेमी में फर्क होता है. घरपरिवार की जिम्मेदारियों में पति वह प्रेम प्रदर्शित नहीं कर पाता, जो मुकेश करता था. यह एक बड़ी सच्चाई है कि परिवार सिर्फ प्रेम करने से नहीं चलता. उस के लिए पैसों की भी जरूरत पड़ती है, जिसे हासिल करने के लिए काम करना पड़ता है. संजय परिवार के लिए समर्पित था, जिस के लिए वह मेहनत भी खूब करता था. उसी के बलबूते घर चल रहा था.

दूसरी ओर मुकेश अविवाहित था. उस के पास समय ही समय था. वह निशा से मीठीमीठी बातें कर के अपना वक्त बिता रहा था. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवारें टूट गई. मुकेश और निशा एकदूसरे का सान्निध्य पा कर खुश थे. अनैतिक रिश्तों की गर्त ऐसी होती है, जिस पर कदम बढ़ा कर पीछे हटाना मुश्किल होता है. वक्त के साथ निशा और मुकेश के रिश्ते गहराते गए. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. उड़तेउड़ते खबर संजय तक पहुंची, पत्नी के किस्से सुने तो उस ने उस से बात की. लेकिन वह साफ मुकर गई.

प्रेमिल रिश्तों में मुकेश और निशा ने साथ जीने और मरने की कसमें खाईं थीं. मुकेश ने तय कर लिया था कि वह निशा से विवाह कर के उसे अपने साथ रखेगा. सोच को साकार करने के लिए 7 दिसंबर, 2015 को वह निशा को ले कर भाग गया. बहू की इस हरकत से वर्मा परिवार को भारी बदनामी का सामना करना पड़ा. संजय ने किला चौकी में निशा की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा कर सच्चाई पुलिस को बता दी. मोबाइल लोकेशन के जरिए 5 दिनों में ही घर वालों और पुलिस ने निशा को खोज निकाला.

दोनों फरीदाबाद में रह रहे थे. 11 दिसंबर को पुलिस दोनों को पकड़ कर ले आई. इस के बाद दोनों पक्षों के लोग इकट्ठा हुए. निशा को भी समझाया गया और मुकेश को भी. दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. तय हुआ कि निशा अपने घर रहेगी और मुकेश उसे परेशान नहीं करेगा. निशा का मन बदल जाए और मुकेश भी उसे परेशान न करे, इस के लिए संजय ने उसे दिल्ली स्थित उस के मायके पहुंचा दिया. लेकिन इस तरह भला कब तक चलता. संजय की मां शीला बुजुर्ग थीं, बच्चे स्कूल जाते थे. घर के तमाम काम होते थे, कौन संभालता.

जनवरी के अंतिम सप्ताह में संजय निशा को घर ले आया. घर वालों ने एक बार फिर उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. उस ने वादा किया कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से परिवार की बदनामी हो. उस ने मन ही मन तय भी कर लिया कि अब वह मुकेश से कोई वास्ता नहीं रखेगी. दूसरी ओर मुकेश को पता चला कि निशा आ गई है तो वह उस से मिलने की कोशिश करने लगा. उस ने कई बार मोबाइल से फोन किया, लेकिन निशा ने उस का कोई जवाब नहीं दिया. उस ने निशा को देखने के लिए उस के घर के बाहर के कई चक्कर लगाए, लेकिन निशा की नजर उस पर पड़ती तो वह उसे नजरअंदाज कर देती.

निशा के इस बदलाव ने उसे बेचैन कर दिया. निशा शादीशुदा थी और अपनी गलतियों को सुधार रही थी. मुकेश को भी खुद में सुधार लाना चाहिए था, लेकिन वह निशा पर अपना पूरा हक समझने लगा था. उस ने साथ जीनेमरने की जो कसमें खाई थीं, उन्हें वह भुला नहीं पा रहा था. निशा की उपेक्षा से वह बुरी तरह आहत होता जा रहा था. एक बार मौका देख कर उस ने निशा से कहा, ‘‘निशा, क्या हो गया है तुम्हें, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘मुकेश मेरी मजबूरियों को समझो. और मुझे भूल जाओ. अब मैं शादीशुदा हूं.’’

मुकेश तड़प उठा, ‘‘कैसी बात कर रही हो, मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. मुझे तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘अब यह नहीं हो सकता मुकेश,’’ कहने के साथ निशा ने चेतावनी दी, ‘‘मुझे आइंदा परेशान करने की कोशिश मत करना, वरना ठीक नहीं होगा.’’

मुकेश बुरी तरह हताश हो गया. उस की हालत हारे हुए जुआरी सी हो गई. निशा की बेरुखी से उस की रातों की नींद उड़ गई. उस के सिर पर निशा को हासिल करने का जुनून सवार था, लेकिन उस के सारे प्रयास विफल हो रहे थे. वह दिनरात इसी बारे में सोचता रहता था. यही वजह थी कि उस ने मन ही मन खतरनाक निर्णय ले लिया कि अगर निशा ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे किसी और की भी नहीं रहने देगा. इस के बाद उस ने एक चाकू का इंतजाम किया और निशा से आखिरी बार बात करने की ताक में रहने लगा.

3 फरवरी की दोपहर निशा नहाधो कर कपड़े फैलाने छत पर गई तो मुकेश की नजर उस पर पड़ गई. अपने कपड़ों में चाकू छिपा कर वह संजय के घर में दाखिल हो गया. उस समय निशा की सास शीला रसोई में थीं. वह सीधे छत पर पहुंच गया. उसे सामने पा कर निशा सकपका गई, ‘‘त…त…तुम यहां कैसे आए?’’

‘‘निशा मुझे तुम से आखिरी बार बात करनी है.’’

‘‘लेकिन मुझे तुम से कोई बात नहीं करनी.’’

मुकेश को गुस्सा आ गया. उस ने ताव में निशा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बात तो तुम्हें करनी होगी. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूंगा.’’

‘‘छोड़ो मुझे, तुम पागल हो गए हो क्या?’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया हूं.’’ कह कर वह निशा को खींच कर नीचे ले आया.

शीला ने यह नजारा देखा तो हक्कीबक्की रह गईं. उन्होंने मुकेश को रोकना चाहा तो उस ने चाकू निकाल कर उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया. इस के बाद उस ने चाकू दिखा कर निशा से पूछा, ‘‘बोलो, साथ चलोगी या नहीं?’’

‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगी, छोड़ो मुझे.’’

निशा ने खुद को उस के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की तो वह आपा खो बैठा और पलक झपकते चाकू से उस की गर्दन पर घातक वार कर दिया. निशा फर्श पर गिर पड़ी और कुछ ही सैकेंड में उस ने दम तोड़ दिया. शीला चीखीचिल्लाईं तो आसपास के लोग आ गए. लेकिन मुकेश हाथ में चाकू लिए कुर्सी डाल कर वहीं बेखौफ हो कर बैठ गया और सब को धमकाने लगा. उस की धमकी से डर कर कोई उसे पकड़ने का साहस नहीं कर सका. उस के बाद सूचना पा कर पुलिस आ गई.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन मुकेश को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. निशा उस के प्यार में न पड़ी होती और अपने बहके कदमों को वक्त रहते संभाल लिया होता तो यह नौबत कभी न आती. मुकेश ने भी निशा को जबरन हासिल करने की कोशिश न की होती तो उस का भविष्य चौपट न होता. अब उस की जिंदगी जेल में ही कटेगी. Haryana Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Dhradun Crime: मौत का नजराना

Dhradun Crime: शादीशुदा गुरप्रीत कौर मकान मालिक के निठल्ले और आवारा बेटे आशीष के पे्रेमजाल में फंस गई. उस के खर्चे पर वह ऐश करने लगा और धीरेधीरे 2 लाख रुपए ले लिए. ऐसे बेमेल, गलत और स्वार्थी रिश्तों का आखिर क्या अंजाम हुआ?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के आर्मी एरिया को पार कर के प्रेमनगर से एक किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र शुरू हो जाता है. यहां चाय के बाग भी हैं और अन्य फसलें भी होती हैं. 5 फरवरी, 2016 की शाम सड़क के ठीक किनारे स्थित एक चाय के बाग में पुलिसकर्मियों और आम लोगों की भीड़ लगी थी.  वजह, किसी ने एक खूबसूरत महिला की बेरहमी से हत्या कर दी थी. वहां खून से लथपथ जिस महिला की लाश मिली, वह लाल रंग की जैकेट पहने थी. मृतका की उम्र करीब 35 साल थी और हत्यारे ने किसी तेज धार वाले हथियार से उस की गर्दन पर वार कर के उस की सांसों की डोर काट दी थी.

प्राथमिक जांचपड़ताल में पुलिस महिला की लाश के इर्दगिर्द ऐसे सबूतों को ढूंढ रही थी, जिस के सहारे कातिल तक पहुंचा जा सके. इसी सिलसिले में पुलिस महिला की जेबों की तलाशी भी ले चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं मिला था. अलबत्ता पुलिस को वहां पड़ा एक लेडीज हेलमेट जरूर मिला था. संभवत: वह मृतका का ही था.

दरअसल, करीब 7 बजे किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को वहां लाश पड़ी होने की खबर दी थी. कंट्रोल रूम से सूचना फ्लैश होने के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया और क्षेत्र के थाना प्रेमनगर के थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट मय पुलिस बल के अविलंब वहां पहुंच गए. मामला सनसनीखेज था, इस तरह से किसी महिला की हत्या हो जाना कोई मामूली बात नहीं थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एसएसपी डा. सदानंद दाते, एसपी (सिटी) अजय सिंह, एएसपी मंजूनाथ व सीओ (सिटी) मनोज कत्याल समेत कई थानों की पुलिस घटनास्थल पर आ पहुंची. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया, लेकिन मौके पर कातिल तक पहुंचने लायक कोई सुराग नहीं मिल सका.

आसपास भी पुलिस ने तलाश की, लेकिन हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार वहां नहीं मिला. पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों से पूछा कि किसी ने हत्या करने वाले को तो नहीं देखा. लेकिन ऐसा कोई चश्मदीद नहीं नहीं था. अलबत्ता एक युवक ने इतना जरूर बताया कि उस ने स्कूटी वाले एक आदमी को वहां से भागते जरूर देखा था. पुलिस ने युवक से पूछताछ की. उस के अनुसार, वह टहलने के लिए निकला था. तभी उस ने किसी महिला के चीखने की आवाज सुनी. पहले उसे लगा कि महिला पर जंगली जानवर ने हमला किया है. लेकिन जब उस ने इस ओर स्कूटी स्टार्ट होने की आवाज सुनी तो वह यहां आया.

जब तक वह वहां पहुंचा, तब तक स्कूटी सवार वहां से जा चुका था. चूंकि रात का धुंधलका होने लगा था, इसलिए वह स्कूटी सवार को देख नहीं सका. इस के बाद उस ने 100 नंबर पर फोन कर दिया था. कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने एक युवकयुवती को स्कूटी से उस तरफ आते देखा था. मामला सीधे हत्या का था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारा किसी बहाने महिला को अपने साथ यहां लाया होगा और फिर चालाकी से उस की हत्या कर के भाग गया होगा. घटनास्थल से बरामद हुआ हेलमेट चूंकि लेडीज था, इस से यह संभावना अधिक थी कि स्कूटी मृतका की ही रही होगी, साथ ही यह भी कि हत्यारा उस का कोई खास जानकार रहा होगा, इसीलिए वह उस क्षेत्र में उस के साथ आई होगी.

इस बात की संभावना कतई नहीं थी कि महिला की स्कूटी लूटने के लिए उस की हत्या की गई होगी. अमूमन चोरी और लूट के लिए इस तरह हत्या के मामले पेश नहीं आते. निस्संदेह हत्यारे ने पूरी प्लानिंग के साथ वारदात को अंजाम दिया था. घटना के अंदाज से ऐसा लगता था कि हत्यारे के दिल में मृतका के प्रति गहरी नफरत थी.

हत्यारा चूंकि स्कूटी ले कर भागा था, इसलिए पूरे जिले में संदिग्ध व्यक्ति की तलाश में नाकेबंदी कर के अभियान चलाने के निर्देश दे दिए गए. हत्या के इस मामले में जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतका की शिनाख्त जरूरी थी. पुलिस ने उस के चेहरे के फोटो कराए और पूरे उत्तराखंड की पुलिस को व्हाट्सएप ग्रुप में भेज दिए. इस के साथ ही मृतका की लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

रात को करीब 9 बजे चैकिंग के दौरान पुलिस को शहर के सावलांकला क्षेत्र में एक स्कूटी लावारिस खड़ी मिली. पुलिस ने स्कूटी की डिग्गी खुलवा कर उस की तलाशी ली तो उस में से एक मोबाइल फोन मिला. इसी दौरान पर्वतीय क्षेत्र उत्तरकाशी में तैनात सबइंसपेक्टर कुलदीप पंत ने प्रेमनगर पुलिस को बताया कि शिनाख्त के लिए जिस महिला का फोटो वायरल हुआ है, कुछ समय पहले वह एक महिला के केस की पैरवी के सिलसिले में कोर्ट आती थी. उस का पूरा पता तो वह नहीं जानते, लेकिन इतना पता है कि वह रेसकोर्स इलाके में कहीं रहती थी. कुलदीप चूंकि वर्ष 2013 में देहरादून शहर की लक्खीबाग पुलिस चौकी के इंचार्ज रहे थे, इसलिए उन्हें यह जानकारी थी.

मोबाइल मिलने से पुलिस के लिए मृतका की शिनाख्त की राह आसान हो गई थी. पुलिस ने स्कूटी से बरामद मोबाइल को अनलौक करा कर उस का सिम नंबर हासिल करने के साथ कंपनी से पता किया कि वह किस के नाम था. पता चला कि वह नंबर गुरप्रीत कौर के नाम रजिस्टर्ड था. उस का पता सरकुलर रोड स्थित रैस्ट कैंप कालोनी था. पुलिस अविलंब उस पते पर पहुंची तो जानकारी मिली कि वह वहां अपने पति गुरमीत सिंह के साथ किराए पर रहती थी. वहां से थोड़ी दूर स्थित त्यागी रोड पर उस के मायके वाले रहते थे. पुलिस ने वहां जा कर बरामद शव की फोटो दिखाई तो उन्होंने गुरप्रीत की पहचान अपनी बेटी के रूप में कर दी.

इस के बाद पुलिस ने उस के भाई जगजीत की तरफ से रात पौने 12 बजे भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस केस की विवेचना थानाप्रभारी यशपाल सिंह के सुपुर्द कर दी गई. अब सब से बड़ा सवाल यह था कि गुरप्रीत की हत्या क्यों और किस ने की थी? एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस मामले में अपने अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. हत्या के खुलासे के लिए एसपी (सिटी) अजय सिंह के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी गई, जिस में विवेचनाधिकारी के अलावा एसओजी इंचार्ज अशोक राठौड़, एआई धनराज सिंह, कैंट थानाप्रभारी राजेश शाह, पटेलनगर थानाप्रभारी बी.डी. उनियाल, बसंत विहार थानाप्रभारी अब्दुल कलाम व शहर कोतवाली प्रभारी एस.एस. बिष्ट आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन यानी 6 फरवरी को पुलिस ने गुरप्रीत के नंबर की काल डिटेल्स हासिल की तो उस में अंतिम नंबर एक युवक का निकला. उस युवक का नाम आशीष उर्फ मोनू था. 27 वर्षीय आशीष रेसकोर्स इलाके के त्यागी रोड पर रहता था. उसे संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने तुरंत उस के घर दविश दी तो पता चला कि वह घर से बिना बताए शाम से ही गायब था. घर वालों से भी उस का संपर्क नहीं हुआ था. वहां काम की एक बात यह पता चली कि गुरप्रीत कौर पहले उस के यहां बतौर किराएदार रही थी, लेकिन कुछ महीने पहले उस ने मकान बदल दिया था.

इस से पुलिस का शक और भी बढ़ गया. पुलिस को यह मामला प्रेमप्रसंग का लगा. आगे की जांच में पुलिस को कुछ और भी अहम बातें पता चलीं, जो इसी ओर इशारा कर रही थीं. पुलिस आशीष की तलाश में जुट गई. इस के लिए इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस का भी सहारा लिया गया. इस से पता चला कि उस की न सिर्फ गुरप्रीत से बातें हुई थीं, बल्कि घटना के समय उस की लोकेशन भी गुरप्रीत के साथ थी. जांच आगे बढ़ी तो आशीष की लोकेशन देहरादून से करीब 28 किलोमीटर दूर मसूरी में मिलनी शुरू हुई. यह पता चलते ही एक पुलिस टीम मसूरी के लिए रवाना कर दी गई. तब तक शाम हो चुकी थी.

लोकेशन को ट्रैस करते हुए पुलिस कुल्हाड़ी चौकी स्थित होटल राज पैलेस पहुंची. पुलिस ने होटल का रजिस्टर चैक किया तो पता चला कि आशीष होटल के कमरा नंबर 7 में ठहरा हुआ है. पुलिस ने दरवाजा खुलवाया तो दरवाजा आशीष ने ही खोला. उस पर नजर पड़ते ही पुलिस चौंकी, क्योंकि उस की बाईं कलाई कटी हुई थी. खून बहने से वह लड़खडड़ा रहा था. आननफानन में पुलिस उसे वहां के सेंटमैररी अस्पताल ले गई. पुलिस टीम को कतई उम्मीद नहीं थी कि वह इस हाल में मिलेगा. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने उसे देहरादून ला कर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया.

अब उस की हालत खतरे से बाहर थी. पुलिस ने औपचारिक पूछताछ के बाद उसे आराम करने दिया. अगली सुबह पुलिस ने आशीष से पूछताछ की तो प्यार, लालच, बेवफाई और नफरत में उलझी बेमेल मोहब्बत की एक चौंकाने वाली कहानी सामने आई. दरअसल, गुरप्रीत का परिवार देहरादून में ही रैस्टकैंप में रहता था. 10 साल पहले घर वालों ने उस का विवाह गुरमीत सिंह से कर दिया था. शादी के बाद गुरप्रीत एक बेटे की मां बनी. गुरमीत का औटो स्पेयर पार्ट्स का बिजनैस था. पतिपत्नी त्यागी रोड स्थित रेलवे कर्मचारी सुबोध कुमार के मकान में किराए पर रहते थे.

सुबोध के 3 बेटे थे, अविनाश, आशीष और अंकुश. पौलिटैक्निक का डिप्लोमा करने के बाद पढ़ाई से आशीष का मन उचट गया था. उस ने नौकरी की भी तलाश नहीं की. निठल्लेपन ने उसे आवारा बना दिया. एक वक्त ऐसा भी आया, जब वह घर वालों के हाथों से निकल गया. तेजतर्रार आशीष मनमर्जी करता था और सनकी किस्म का था. गुरप्रीत थोड़ा खुले विचारों वाली थी. किसी से भी हंसबोल लेती थी. गुरमीत बिजनैस के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे. उन के पीछे गुरप्रीत को कोई परेशानी नहीं होती थी. उस का मायका तो नजदीक था ही, सुबोध का भी परिवार उस का खयाल रखता था. घर चूंकि एक ही था, लिहाजा उस के पास आशीष का भी आनाजाना था. आशीष गुरप्रीत की तरफ आकर्षित हो गया.

2 साल पहले दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई, फिर यही दोस्ती प्यार में बदल गई. पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास का होता है. जहां विश्वास, समर्पण और सामाजिक मर्यादाओं को महत्त्व दिया जाता है, वहां रिश्ते की डोर मजबूत होती है. गुरप्रीत के मामले में ऐसा नहीं था. भावावेश में ही सही, आशीष के प्यार में पड़ कर उस ने न केवल अपने विश्वास के रिश्ते को कमजोर किया, बल्कि वह एक बड़ी भूल भी कर रही थी. गुजरते वक्त के साथ गुरप्रीत और आशीष की मोहब्बत परवान चढ़ती गई. जल्दी ही एक ऐसा समय भी आया, जब उन के बीच का रिश्ता मर्यादाओं की दीवार लांघ गया.

गुरप्रीत विवाहिता थी. आशीष के लिए उस ने पति से बेवफाई की थी. उस के साथ गुरप्रीत का रिश्ता सामाजिक और नैतिक तौर पर पूरी तरह गलत था. जीवन की पगडंडियां बहुत रपटीली होती हैं. जब कोई इंसान पतन की डगर पर उतरता है तो फिर उस की वापसी मुश्किल हो जाती है. गुरप्रीत बिना किसी अंजाम की परवाह किए खुद अपनी इच्छा से इस राह पर चल रही थी. इस तरह के रिश्तों में भले ही खुशियों का बगीचा नजर आता हो, परंतु वह वक्ती होता है. उस के नतीजे कब किस रूप में घातक हो जाएं, यह बात कोई नहीं जानता. सीधे तौर पर कहें तो कालांतर में ऐसे रिश्तों के परिणाम दुखदायक ही होते हैं.

आशीष और गुरप्रीत के प्यार का सिलसिला चलता रहा. गुरप्रीत पूरी तरह आशीष के मोहपाश में बंधी थी. उन दोनों के रिश्तों की भनक किसी को नहीं लग सकी. घर के अलावा दोनों बाहर जा कर भी मिलते थे. गुरप्रीत को विश्वास में ले कर अशीष ने उस का एटीएम कार्ड ले लिया था और धीरेधीरे उस में से 2 लाख रुपए निकाल लिए थे. दरअसल, आशीष को लगता था कि उसे बैठेबिठाए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मिल गई है. सन 2015 में जब गुरप्रीत और आशीष के रिश्ते की हकीकत सामने आई तो गुरमीत ने पत्नी को खूब डांटाफटकारा. गुरप्रीत ने वक्त की नजाकत को भांप कर अपने किए पर माफी मांग ली.

इस के बाद गुरमीत ने आशीष पर रुपए वापसी का दबाव बनाया तो काफी जद्दोजहद के बाद उस ने एक लाख रुपए वापस कर दिए और बाकी बाद में देने को कहा. अपनी गृहस्थी को बचाए रखने के लिए गुरमीत ने 3 महीने पहले सुबोध का मकान छोड़ कर ससुराल के नजदीक किराए पर रहना शुरू कर दिया, साथ ही गुरप्रीत को आगाह भी किया कि वह आशीष से कोई गलत रिश्ता न रखे और उस से अपने पैसे वापस मांगे.

अच्छा इंसान वही होता है, जो वक्त रहते अपनी गलतियों को सुधार ले. गलतियों को बारबार दोहराया जाए तो बुरे नतीजों का रूप ले लेती हैं. गुरप्रीत और आशीष दोनों ही इस बात से जानबूझ कर अंजान थे. कुछ दिनों तक गुरप्रीत और आशीष के बीच दूरियां रहीं, लेकिन मकान बदलने से दोनों के दिल नहीं बदले. इस के बाद भी दोनों मिलते रहे. गुरप्रीत पर पति का दबाव था कि वह आशीष से अपने पैसे वापस ले. इसलिए गुरप्रीत ने पैसों का तकाजा जारी रखा. इस बात पर आशीष से उस की बहस भी हुई. गुरप्रीत आजादख्याल महिला थी. आशीष से उस के आंतरिक रिश्ते थे, लेकिन उस की सोच के हिसाब से वह उस की गुलाम नहीं थी. बाद में उस के रिश्ते कुछ अन्य युवकों से भी हो गए. उस की खुफिया मुलाकातों का सिलसिला गुपचुप चलता रहा.

जब यह बात आशीष को पता चली तो उसे बहुत नागवार गुजरा. एक दिन मुलाकात हुई तो आशीष ने तेवर दिखाने की कोशिश की. इस पर गुरप्रीत ने उसे टका सा जवाब दे दिया, ‘‘मैं तुम्हारी गुलाम नहीं हूं आशीष, वैसे भी तुम मेरे ऊपर झूठा आरोप लगा रहे हो.’’

आशीष गुस्से में था. उस ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं गुरप्रीत, इसलिए तुम किसी दूसरे से मिलो यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता. जरूरत पड़ने पर मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’

‘‘जब तुम प्यार करते हो तो विश्वास भी करो, साथ ही यह भी कि अपनी हद मत भूलो.’’

उस दिन के बाद आशीष अवसादग्रस्त रहने लगा. काम वह कुछ करता नहीं था, खाली दिमाग शैतान का घर होता है. वह दिनरात गुरप्रीत के बारे में ही सोचता रहता था. तरहतरह के खयाल उस के मन को कचोटते रहते थे. सब से ज्यादा वह यही सोचता था कि गुरप्रीत किसकिस से मिल रही होगी.

गुरप्रीत आशीष की ब्याहता नहीं थी, बल्कि पति से बेवफाई कर के उस ने आशीष में खुशियों की नाजायज तलाश की थी. इस के बावजूद आशीष न सिर्फ गुरप्रीत पर अपना पूरा हक समझता था, बल्कि उसे लगता था कि उस ने उस के साथ बेवफाई की है. वह दिलोदिमाग से पूरी तरह गुरप्रीत से जुड़ा था. उस के लिए इस से भी ज्यादा तकलीफदेह बात यह थी कि वह पैसे वापसी के लिए तकाजा करती थी. आशीष अवसादग्रस्त हुआ तो उस ने मन ही मन आत्महत्या कर के अपनी जिंदगी खत्म करने की सोची. कुछ दिनों तक वह इसी उधेड़बुन में रहा.

इस के बाद उस ने यह सोच कर इस खयाल को अपने मन से निकाल दिया कि इस से तो गुरप्रीत और भी आजाद हो जाएगी. उसे कोई सबक नहीं मिल सकेगा. उसे खुद मरने के बजाय गुरप्रीत को ही बेवफाई का सबक सिखाना चाहिए. आशीष ने सोचा कि कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले उसे गुरप्रीत से बात करनी चाहिए. वह यह सब सोच रहा था कि एक दिन उस ने गुरप्रीत को किसी युवक के साथ घूमते देख लिया. यह देख कर उसे बहुत गुस्सा आया. एक दिन उस ने गुरप्रीत से मिलने की इच्छा जाहिर की तो वह चली आई.

गुरप्रीत किसी भी तरह आशीष से अपने पैसे वापस लेना चाहती थी. जबकि रिश्ते तोड़ कर यह मुमकिन नहीं था. आशीष मिला तो उस ने अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘तुम यह मत सोचना गुरप्रीत कि मुझे कुछ पता नहीं है. मैं जानता हूं, तुम अपनी आदतों को बदलने के लिए तैयार नहीं हो. मैं ने कल भी तुम्हें बाजार में एक युवक से मिलते देखा था.’’

उस की बात सुन कर गुरप्रीत गुस्सा हो गई, ‘‘देखो आशीष, यह मेरा निजी मामला है. तुम अपनी हद में रहो.’’

‘‘क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करतीं?’’

‘‘प्यार करती हूं, तभी तो तुम से मिलती हूं. मैं किस से मिलती हूं, तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि मैं तुम से किनारा तो कर नहीं रही. तुम्हें पूरा वक्त दे रही हूं.’’ कुछ पल रुक कर गुरप्रीत आगे बोली, ‘‘और हां, जितनी जल्दी हो सके, तुम मेरे पैसों का इंतजाम कर दो. तुम नहीं जानते मुझे तुम्हारी वजह से क्याक्या सुनने को मिलता है.’’

आशीष शातिर दिमाग युवक था. उसे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने अपने गुस्से को जब्त करने में ही भलाई समझी. उस की हालत हारे जुआरी जैसी हो गई है. अपने गुस्से को दबा कर उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कुछ करूंगा.’’

उस रात आशीष को नींद नहीं आई. वह गुरप्रीत पर अपना हक समझ रहा था, जबकि वह उस के कहे अनुसार चलने को तैयार नहीं थी. वह चाहता था कि गुरप्रीत सिर्फ उसी की बनी रहे और वक्तबेवक्त उस पर पैसे भी खर्च करे. पर अब सब कुछ उस की सोच के विपरीत हो रहा था. नतीजतन वह गुरप्रीत से नफरत करने लगा.  निठल्लेपन का शिकार आशीष घर पर रह कर ज्यादातर आपराधिक घटनाओं पर आधारित सीरियल देखता रहता था. इसी से आइडिया ले कर उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अगर गुरप्रीत ने उस की बात नहीं मानी तो पूरी प्लानिंग के साथ वह उस की हत्या कर देगा.

इस के लिए जनवरी के अंतिम सप्ताह में उस ने एक चाकू खरीद कर अपने पास रख लिया. उस ने सोचा कि ऐसा कर के वह गुरप्रीत से प्रतिशोध भी ले लेगा और उसे उस के तकाजे से भी मुक्ति मिल जाएगी.  फरवरी की शाम आशीष ने तयशुदा प्लानिंग के तहत गुरप्रीत को फोन कर के मिलने की इच्छा जताई. उस ने उस से रेलवे स्टेशन आने को कहा. गुरप्रीत ने जब आने के लिए हामी भर ली तो आशीष अपनी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. उधर गुरप्रीत अपने 8 वर्षीय बेटे शीतल से कुछ देर में वापस आने की बात कह कर अपनी स्कूटी से आशीष से मिलने पहुंच गई.

आशीष ने उस से प्रेमनगर के चाय बागान की तरफ घूमने चलने को कहा. गुरप्रीत उस पर भरोसा करती थी, इसलिए साथ जाने को तैयार हो गई. आशीष उस की स्कूटी पर पीछे बैठ गया और दोनों करीब आधे घंटे में चाय बागान के पास पहुंच गए.

आशीष ने अपने इरादे के बारे में गुरप्रीत को जरा भी शक नहीं होने दिया. अपने मोबाइल से उस ने गुरप्रीत के साथ सैल्फी खींची. इस के बाद वह मुद्दे पर आते हुए बोला, ‘‘क्या सोचा गुरप्रीत तुम ने?’’

‘‘किस बारे में?’’

‘‘तुम बदलोगी या नहीं?’’

वह उस के इस रवैये से बुरी तरह चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, मुझे अभी वापस जाना है.’’

‘‘नहीं, आज तुम सीधे ऊपर ही जाओगी.’’ कहने के साथ ही आशीष के हाथ हरकत में आ गए. उस ने गुरप्रीत का गला पकड़ कर दबाया और जमीन पर पटक दिया. गुरप्रीत को उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस के खतरनाक इरादों से अंजान गुरप्रीत संभल पाती, उस के पहले ही उस ने चाकू निकाला और उस के गले पर वार कर दिया.

इस से गुरप्रीत की चीख निकल गई. आशीष का वार घातक था. कुछ ही देर में तड़प कर गुरप्रीत की सांसों की डोर टूट गई. इस के बाद वह स्कूटी ले कर वहां से निकल गया. गुरप्रीत की चीख के बाद एकदो लोग वहां पहुंचे. उन्होंने ही पुलिस को इस हत्या की सूचना दी थी. गुरप्रीत की स्कूटी ले कर आशीष सीधा सेवलांकला गया और स्कूटी वहां छोड़ कर टैक्सी स्टैंड पहुंचा, जहां से वह मसूरी चला गया. वहां उस ने होटल में अपनी आईडी जमा कर के कमरा ले लिया. किसी को अंदाजा नहीं था कि वह कत्ल कर के आया है. उस ने रात में शराब पी और चिकन खाया. इस के बाद घंटों आराम किया. अगले दिन वह काफी परेशान रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. दिन भर उस ने आराम किया.

शाम को आशीष ने गुरप्रीत की खबर टीवी पर देखी तो अवसाद से ग्रस्त हो कर खुद भी अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला किया और अपनी बाईं कलाई की नसें काट लीं. संयोग से उसी समय पुलिस ने वहां पहुंच कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस के पहुंचने में देरी होती तो रक्तस्राव से उस की मौत हो सकती थी. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने आशीष को अस्पताल से डिस्चार्ज करा लिया. होटल के प्रबंधक प्रकाश सिंह की तरफ से धारा 309 के अंतर्गत आशीष के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. पुलिस ने उस से गुरप्रीत की हत्या में इस्तेमाल चाकू के बारे में पूछताछ की तो उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. पुलिस ने उसे 7 फरवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

बाद में पुलिस ने 10 फरवरी को हत्यारोपी को एक दिन के रिमांड पर लिया. उस की निशानदेही पर उसी दिन मसूरी रोड स्थित डीयर पार्क की झाडि़यों से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू बरामद हो गया. फिलहाल वह जेल में है. गुरप्रीत अपने परिवार से बेवफाई कर के सनकी स्वभाव के आशीष के प्यार में न पड़ी होती तो शायद इस तरह की नौबत कभी न आती. आशीष जैसे युवक महिलाओं की भावनाओं से खेल कर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और उन्हें मौजमस्ती और कमाई का जरिया बना लेते हैं.

कानून आशीष को क्या सजा देगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक परिवार की खुशियों को उस ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्र

True Crime Story: जब सोई मोहब्बत जागी

True Crime Story: शहाना स्कूल के समय से ही सरफराज से मोहब्बत करने  लगी थी. जब उस की शादी  सरफराज से नहीं हो सकी  तो वह सलीम से निकाह  कर के उस की हो गई,  लेकिन बाद में उस ने  सलीम से भी किनारा  कर लिया. इस के बाद  उस का निकाह नवाब से  हुआ लेकिन अपने प्यार के  चक्कर में उस ने नवाब को  ठिकाने लगवा दिया.

8दिसंबर, 2015 की देर रात उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा में किसी राहगीर ने फोन द्वारा सूचना दी कि शेर अली बाबा की मजार के पास एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. शेरअली बाबा की मजार काशीपुरजसपुर राष्ट्रीय राजमार्ग- 74 के किनारे है. लाश पड़ी होने की सूचना मिलते ही थाना कुंडा के थानाप्रभारी रमेश तनवार तुरंत पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश खून से लथपथ जसपुर की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पड़ी थी. वहीं पर कुछ लोग भी खड़े थे.

थानाप्रभारी ने वहां खड़े लोगों से मरने वाले शख्स की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. पुलिस ने मृतक की जेब की तलाशी ली तो जेब में एक परची मिली. उस पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. वह फोन नंबर किस का है, यह जानने के लिए थानाप्रभारी ने अपने फोन से वह नंबर मिलाया  तो दूसरी तरफ से शहाना नाम की औरत ने फोन रिसीव किया. उन्होंने उस महिला से जानकारी ली तो पता चला कि वह जसपुर के मोहल्ला छिपियान के नवाब की पत्नी शहाना परवीन है.

थानाप्रभारी ने शहाना से उन के पति के बारे में पूछा तो उस ने उलटे थाना प्रभारी से ही सवाल किया, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन बोल रहे हैं और आप मेरे पति को क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘देखिए, मैं थाना कुंडा का थानाप्रभारी बोल रहा हूं. दरअसल हमें शेर अली बाबा की मजार के पास एक आदमी की लाश मिली है. उसी लाश की जेब से यह आप का मोबाइल नंबर मिला है. कहीं यह लाश आप के किसी परिचित की तो नहीं है? आप यहां आ कर लाश को देख लीजिए.’’

थानाप्रभारी ने शहाना को लाश का जो हुलिया बताया था, वह जान कर शहाना रोने लगी, क्योंकि वह हुलिया उस के पति के हुलिए से मिल रहा था. उस का पति नवाब भी घर पर नहीं था. देर रात में अचानक शहाना के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर उस के परिवार वाले और मोहल्ले के कुछ लोग जमा हो गए. नवाब के साथ अनहोनी की बात सुनते ही वे सभी रात में ही शहाना के साथ अली बाबा की मजार के पास पहुंच गए. घटनास्थल पर पड़ी लाश देखते ही शहाना दहाड़े मार कर रोने लगी, क्योंकि वह लाश उस के पति नवाब की थी. उस जगह को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे नवाब का किसी वाहन से एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन उस के घर वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि नवाब वहां तक पहुंचा कैसे?

पुलिस ने नवाब के घर वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि नवाब का हरिद्वार और लक्सर में ट्रांसपोर्ट का काम था. उस के घर आनेजाने का भी कोई नियत समय नहीं था. काम में व्यस्त होने की वजह से वह 2-4 दिनों बाद ही जसपुर आता था. 8 दिसंबर को वह घर जरूर आया था. घर से वह काशीपुर कैसे पहुंचा, इस की किसी को जानकारी नहीं थी. उस समय रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए घर वालों से कुछ जानकारी लेने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भिजवा दिया गया. अगले दिन से पुलिस इस केस की जांचपड़ताल में जुट गई. सुबहसुबह पुलिस फिर से उस जगह पहुंच गई, जहां लाश मिली थी, ताकि वहां से कोई सबूत वगैरह मिल सके.

घटनास्थल के आसपास पुलिस ने काफी खोजबीन की, लेकिन वहां से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस घटना की तह तक पहुंच पाती. मृतक का मोबाइल फोन भी गायब था. पुलिस ने सोचा कि दुर्घटना होने पर नवाब सड़क पर गिर गया होगा और उसे एक्सीडेंट करने वाले ने मजार के पास डाल दिया होगा. पुलिस ने मृतक के घर वालों से एक बार फिर बात की तो उन्होंने बताया कि नवाब एक मिलनसार व्यक्ति था. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. वह उस की दुर्घटना वाली बात को मानने को तैयार नहीं थे. इस पर पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

नवाब के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि 8 दिसंबर को उस की कुछ नंबरों पर बातचीत हुई थी. जिनजिन नंबरों पर उस की बातचीत हुई थी, पुलिस उन नंबरों की जांच में जुट गई. उन में 2 नंबर संदिग्ध नजर आए. जांच के दौरान पता चला कि उन में से एक नंबर रामपुर जिले के गांव बैजनी निवासी खालिद का था, जबकि दूसरा नंबर जिला मुरादाबाद के थाना भगतपुर के गांव बहेड़ी के रहने वाले उस्मान का था.

पुलिस इन दोनों ही व्यक्तियों से पूछताछ करना चाहती थी, इसलिए एसएसपी केवल खुराना ने उन की तलाश कि लिए थानाप्रभारी रमेश सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई अशोक कुमार, कांस्टेबल मनोज कोहली, खेम सिंह, जगत सिंह, शहाना परवीन आदि को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम खालिद और उस्मान के घरों पर गई तो वे दोनों ही अपने घरों से गायब मिले. उन के घरों से पुलिस को उन के बारे में यह जानकारी मिल गई कि दोनों काशीपुर में नौकरी कर रहे हैं.

पता चला कि खालिद हमदम अस्पताल में और उस्मान वहीं के सनराईज अस्पताल में कंपाउंडरी कर रहा है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम काशीपुर पहुंची. लेकिन वे वहां भी नहीं मिले. अस्पताल वालों ने बताया कि वे कई दिनों से अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं. इस के बाद पुलिस को इन दोनों पर शक हो गया. लिहाजा पुलिस ने उन की तलाश के लिए मुखबिर लगा दिए. करीब 2 सप्ताह बाद 25 दिसंबर को पुलिस को सुबहसुबह मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि खालिद और उस्मान कहीं जाने की फिराक में काशीपुर बसअड्डे पर खड़े हैं. यह खबर मिलते ही पुलिस टीम तुरंत बस अड्डे पर पहुंच गई. दोनों वहां एक बैंच पर बैठे मिल गए.

पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस कुंडा थाने ले आई. वहां उन से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों जल्दी ही टूट गए. दोनों ने स्वीकार कर लिया कि नवाब की हत्या उन्होंने नवाब की पत्नी शहाना के प्रेमी सरफराज के कहने पर की थी. सरफराज एक प्रतिष्ठित परिवार से था. पुलिस बिना सबूत के उसे गिरफ्तार करना नहीं चाहती थी. इसलिए पुलिस ने सब से पहले सरफराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह दिन में करीब 40 बार बात करता था.

जांच में पता चला कि वह नंबर उसी मोहल्ले की रहने वाली शहाना का है. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि सरफराज और शहाना के बीच जरूर प्रेमसंबंध रहे होंगे, तभी तो वे फोन पर इतनी ज्यादा बातें करते हैं. यानी खालिद और उस्मान ने पुलिस को जो बात बताई थी, उस में सच्चाई नजर आने लगी. इस से पुलिस को कुछ और ही कहानी नजर आने लगी. सरफराज जसपुर के ही मोहल्ला छिपियान में रहता था. पुलिस उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस को देखते ही उस के होश उड़ गए. पुलिस पूछताछ के लिए उसे भी थाने ले आई.

पुलिस ने सरफराज से पूछताछ की तो उस ने साफ कह दिया कि उस का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. इस पर पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स उस के सामने रखी. जिस में उस की शहाना से एक साल में 12995 बार बातें हुई थीं. अब सच्चाई सरफराज के सामने थी, जिसे वह झुठला नहीं सकता था. फिर भी वह खुद को बचाने के लिए यही कहता रहा कि उस की शहाना से दोस्ती है, इसलिए वह उस के साथ इतनी बातें फोन पर करता था. लेकिन नवाब की हत्या से उस का कोई संबंध नहीं है.

इस के बाद पुलिस टीम मृतक नवाब की पत्नी शहाना को पूछताछ के लिए थाने ले आई. शहाना भी पुलिस को घुमाने की कोशिश में लगी रही. लेकिन पुलिस ने जब उसे बताया कि उस का प्रेमी सरफराज पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया है तो शहाना को सांप सूंघ गया. पुलिस उसे सरफराज के पास ले आई. दोनों को आमनेसामने बैठा कर बात की गई तो सरफराज टूट गया. उस ने बताया कि शहाना के कहने पर ही उस ने नवाब को ठिकाने लगवाया था. इस के बाद दोनों ने ही अपना गुनाह कबूल कर लिया. इन दोनों के प्यार से ले कर नवाब की हत्या तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तराखंड के जसपुर शहर के मोहल्ला छिपियान में हाजी फिदा हुसैन का परिवार रहता था. मुसलिम बाहुल्य इस शहर के अधिकांश मुसलिमों का लकड़ी का व्यापार है. फिदा हुसैन का भी लकड़ी का व्यापार था. उन के परिवार में 7 सदस्य थे. शहाना इन की दूसरे नंबर की बेटी थी. वह शुरू से ही पढ़ाईलिखाई में तेज थी. इसीलिए मदरसे की पढ़ाई के बाद फिदा हुसैन ने उस का दाखिला फैजएआम इंटर कालेज में करा दिया था. सरफराज ने भी उसी कालेज में दाखिला लिया था. इस से पहले भी वह मदरसे में शहाना के साथ ही पढ़ता था.

सरफराज फिदा हुसैन के घर के पास अगले नुक्कड़ पर रहने वाले शब्बीर मास्टर का बेटा था. पड़ोसी होने के नाते दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. शब्बीर मास्टर का छोटा परिवार था. शब्बीर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. उन के परिवार में 3 बेटे थे, जिन में सरफराज सब से छोटा था. शब्बीर मास्टर तेजतर्रार व्यक्ति थे. इसलिए मोहल्ले क्या, शहर की पूरी बिरादरी में उन की अच्छी जानपहचान थी.

शब्बीर मास्टर अपने दोनों बेटों की शादी कर चुके थे. सरफराज अभी पढ़ रहा था, इसलिए उन्हें उस की ज्यादा चिंता नहीं थी. सरफराज के इंटरमीडिएट करने के बाद शब्बीर मास्टर ने उस के सामने शादी की बात रखी तो उस ने साफ कह दिया कि जब तक वह कोई कामधंधा नहीं कर लेता, शादी नहीं करेगा. उधर शुरू से साथसाथ पढ़ने के कारण शहाना और सरफराज के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. उन की दोस्ती प्यार में बदल गई थी. और तो और दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं.

उसी दौरान किसी के माध्यम से शब्बीर मास्टर को पता चला कि सरफराज और शहाना के बीच चक्कर चल रहा है. वह समझ गए कि सरफराज शादी के लिए मना क्यों कर रहा है. उन्होंने इस बारे में सरफराज से बात की तो उस ने कह दिया कि वह शहाना से प्यार करता है और उसी से निकाह करना चाहता है. शब्बीर मास्टर ने बेटे की खुशी के लिए शहाना के अब्बू फिदा हुसैन से बात भी की, पर वह तैयार नहीं हुए.

फिदा हुसैन की समाज में अच्छीखासी इज्जत थी. बेटी वाली बात कहीं समाज में न फैल जाए, इसलिए वह उस के लिए अच्छा लड़का तलाशने लगे, ताकि जल्द से जल्द उस की शादी कर सकें. थोड़ी भागादौड़ी कर के उन्हें उस के योग्य वर मिल भी गया. जसपुर के तत्कालीन चेयरमैन मोहम्मद उमर के बेटे सलीम से उन्होंने शहाना की शादी तय कर दी. अच्छी हैसियत वाले परिवार में शादी तय होने के बाद घर वाले गदगद थे. फिदा हुसैन इस बात से खुश थे कि उन की बेटी इतने संपन्न परिवार में खुश रहेगी.

शादी तो तय हो गई, लेकिन फिदा हुसैन को दुविधा इस बात की थी कि कहीं शहाना शादी करने से मना न कर दे. यदि उस ने ऐसा कर दिया तो बिरादरी में उन की किरकरी हो जाएगी. इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिदा हुसैन ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों को बुला कर शहाना को समझाने के लिए कहा. रिश्तेदारों के समझाने पर शहाना सलीम से शादी करने के लिए तैयार तो हो गई, लेकिन उस का दिल सरफराज पर ही लगा रहा. इस के बाद फिदा हुसैन ने शादी की तैयारी शुरु कर दी. उधर जब सरफराज को पता चला कि शहाना की शादी किसी और के साथ होने वाली है तो वह परेशान हो गया. उस ने शहाना से बात की तो शहाना ने कह दिया कि घर वालों और रिश्तेदारों की हठ के आगे उसे मजबूर होना पड़ा. शहाना का फैसला सुन कर सरफराज को दुख हुआ.

उधर बड़ी धूमधाम के साथ शहाना और सलीम का निकाह हो गया. यह सन 1997 की बात है. उस के निकाह के बाद सरफराज परेशान रहने लगा. वह शहाना से फोन पर बातें करता रहता था. शहाना भले ही सलीम की पत्नी बन गई थी लेकिन सरफराज के साथ गुजारे पलों की यादें उस के दिल से अभी भी धूमिल नहीं हो पाई थीं.

वह जब कभी मायके आती, उस की निगाहें हर वक्त सरफराज की राहों पर जमी रहतीं. इत्तफाक से कभी दोनों आमनेसामने पड़ जाते तो एकदूसरे के लिए तड़प उठते. मौका मिलने पर दोनों मुलाकात भी कर लेते. यही वजह थी कि शहाना मायके आने के बाद ससुराल नहीं जाना चाहती थी. वह सरफराज के प्यार में पागल सी हो गई थी. यह बात सलीम को पता चली तो वह परेशान हो उठा. सलीम ने शहाना को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. जब शहाना नहीं मानी तो उस ने उस के साथ रिश्ता तोड़ दिया.

सलीम से रिश्ता टूटने के बाद सरफराज बहुत खुश हुआ. उसे उम्मीद थी कि अब तो उसे उस का खोया प्यार मिल जाएगा. फिदा हुसैन पहले से ही बेटी के कारनामों से तंग आ चुके थे. दोनों के मिलनेजुलने से मोहल्ले वालों ने उन का मोहल्ले में रहना दूभर कर दिया. शहाना अपने अब्बू पर सरफराज से निकाह कराने का दबाव डाल रही थी, लेकिन फिदा हुसैन को सरफराज से इतनी नफरत हो गई थी कि वह किसी भी कीमत पर उस से शहाना का निकाह करने को तैयार नहीं थे.

शहाना फिर से सरफराज की मोहब्बत में पागल हो गई थी. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो अंत में फिदा हुसैन ने शब्बीर मास्टर से इस बारे में बात कर के सरफराज की शादी कहीं और करने की बात कही. शब्बीर मास्टर समझदार व्यक्ति थे. वह जानते थे कि समाज में इंसान की इज्जत की क्या कीमत होती है. यही सोच कर उन्होंने जल्दी ही सरफराज के लिए बिजनौर के स्योहारा कस्बे में एक लड़की देखी और उस का निकाह करा दिया.

सरफराज ने पिता के दबाव में शादी तो कर ली, लेकिन वह अपने दिल से शहाना को नहीं निकाल सका. लेकिन सरफराज के शादी करने की बात शहाना को बहुत बुरी लगी. उस ने उस से मिलनाजुलना बिलकुल बंद कर दिया. इस के बाद सरफराज भी अपनी गृहस्थी के चक्कर में फंस गया और कुछ दिनों के लिए शहाना को भूल गया. जवान बेटी के घर बैठने पर फिदा हुसैन भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने अपनी पत्नी हुसना से कहा कि वह शहाना को दूसरे निकाह के लिए तैयार करे. शहाना सरफराज की मोहब्बत से टूट चुकी थी. वह यह भी जानती थी कि सारी जिंदगी मांबाप के सीने पर मूंग तो नहीं दली जा सकती.

उस ने अपने घर वालों की परेशानी समझ कर दूसरे निकाह के लिए हामी भर दी. शहाना के शादी के लिए तैयार होते ही उस के अब्बू फिदा हुसैन ने फिर से उस के लिए सही लड़का देखना शुरू कर दिया. उसी दौरान उन के एक करीबी रिश्तेदार ने जसपुर के ही मोहल्ले जटवारा के इमरान चौक में रहने वाले मोहम्मद असलम के बेटे नवाब के बारे बताया. नवाब का ट्रांसपोर्ट का अपना काम था. नवाब के कुल मिला कर 6 भाई और 4 बहनें थीं. भले ही मोहम्मद असलम का परिवार बड़ा था, लेकिन उस के सभी बेटे अपनेअपने काम से लगे हुए थे. शादी की बात पक्की होने के बाद 17 मई, 2000 को बड़ी धूमधाम के साथ नवाब और शहाना का निकाह हो गया.

शहाना नवाब के साथ निकाह कर के खुश थी. वह अपनी पुरानी जिंदगी भूल कर नई जिंदगी जीना चाहती थी. नवाब का अपना अच्छा कारोबार था. आमदनी भी अच्छी थी, इसलिए दोनों हंसीखुशी से रह रहे थे. शहाना परवीन लिखीपढ़ी थी, इसलिए उसे आंगनबाड़ी में सहायिका की नौकरी मिल गई. वह आसपास के बच्चों को पढ़ाने लगी. कहते हैं कि वक्त को बदलते देर नहीं लगती. शहाना के आंगनबाड़ी में लगते ही उस का फिर से घर से बाहर आनाजाना शुरू हो गया. उसी दौरान एक दिन उस का आमनासामना फिर से सरफराज से हो गया. सरफराज को सामने से आते देख शहाना ने उस से बचने की कोशिश की, लेकिन सरफराज उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

उस दिन सरफराज ने उस से केवल हालचाल पूछा और वहां से चला गया. लेकिन इस छोटी सी मुलाकात ने शहाना के दिल में पुरानी मोहब्बत को चिंगारी दिखा दी. शहाना कई दिनों तक उस की यादों में जीती रही. उस ने कई बार उस मुलाकात को भूलने की कोशिश की, लेकिन भुला नहीं सकी. हालांकि शहाना और सरफराज दोनों ही एकएक बच्चे के मांबाप बन चुके थे, लेकिन उन के दिलों में पुरानी मोेहब्बत शायद अभी भी जिंदा थी. दोनों के दिलों में छिपी मोहब्बत फिर से जागी तो वे फिर चोरीछिपे मिलने लगे. आंगनबाड़ी के बहाने शहाना कई घंटों तक घर से बाहर रहती थी. उसी दौरान मौका निकाल कर वह सरफराज के साथ इधरउधर मौजमस्ती करने लगी.

उसी बीच शहाना दूसरी बच्ची की भी मां बन गई. लेकिन अब उस का सरफराज से मिलनाजुलना और भी ज्यादा हो गया था. शहाना नवाब का भी पूरा ख्याल रखती थी. इसलिए वह उस पर पूरा भरोसा करता था. लेकिन उसे पता नहीं था कि पत्नी उस की पीठ पीछे क्या गुल खिला रही है? शहाना अपने मकान की ऊपरी मंजिल पर अकेली ही रहती थी. उस का पति नवाब अपने काम से चला जाता और उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं.

इसी का लाभ उठा कर वह हर वक्त सरफराज से मोबाइल पर बतियाती रहती थी. जब उस के मोबाइल में बैलेंस खत्म हो जाता तो सरफराज रिचार्ज करा देता. उसी दौरान सरफराज ने नवाब से भी दोस्ती बढ़ा ली, ताकि वह उस के घर बिना किसी झिझक के आजा सके. लेकिन नवाब उस के मंसूबों को समझ नहीं पाया. नवाब के भाई जसपुर में ट्रांसपोर्ट का धंधा चलाते थे. इस धंधे में अच्छी कमाई थी, इसलिए नवाब ने हरिद्वार के लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. धंधे की वजह से वह अकसर घर से बाहर रहता था. ट्रांसपोर्ट के काम के साथ नवाब ने प्रौपर्टी खरीदनेबेचने का काम भी शुरू कर दिया था. इसी का लाभ उठाते हुए सरफराज और शहाना मौजमस्ती कर रहे थे.

उसी दौरान सरफराज ने भी नवाब के सहयोग से लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. सरफराज ने कुछ दिनों में नवाब के साथ इतनी गहरी दोस्ती कर ली कि वह हर वक्त उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था. सरफराज कभीकभी नवाब के जिम्मे अपना औफिस छोड़ कर जसपुर आ जाता और शहाना के साथ मौजमस्ती करता. नवाब की हत्या से लगभग 5-6 महीने पहले सरफराज ने शहाना से कहा, ‘‘शहाना क्यों न हम आपस में शादी कर लें.’’

‘‘हम दोनों पहले से ही शादीशुदा हैं तो फिर यह आफत मोल लेने से क्या फायदा?’’ शहाना बोली, ‘‘सरफराज, तुम यह बात तो जानते ही हो कि नवाब के जीवित रहते मैं भला तुम्हारे साथ निकाह कैसे कर सकती हूं. यदि तुम यह चाहते हो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा.’’

सरफराज अब शहाना के दिल की बात जान गया था. उस ने पक्का मन बना लिया कि शहाना को पाने के लिए वह कुछ भी करेगा. उधर शहाना भी सरफराज की मोहब्बत में पागल सी हो गई थी. वह यह भी भूल गई थी कि नवाब उसे कितना चाहता है. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद उस की अच्छाबुरा सोचने की शक्ति पर पानी फिर गया था. इसी पागलपन में वह नवाब को अपने और सरफराज के बीच से हटाने के लिए भी राजी हो गई. अब से लगभग ढाई महीने पहले सरफराज का ड्राइवर मकसूद हादसे में घायल हो गया था. उसे इलाज के लिए काशीपुर के हमदम अस्पताल में भरती कराया गया था. यहीं पर सरफराज की मुलाकात खालिद व उस्मान से हुई. हालांकि खालिद और उस्मान दोनों अलगअलग अस्पतालों में काम करते थे, लेकिन दोनों में अच्छी दोस्ती थी.

खालिद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बैजनी गांव का था और उस्मान मुरादाबाद के रोशनपुर बहेड़ी गांव का था. खालिद ओटी टैक्नीशियन था तो उस्मान कंपाउंडर. उसी दौरान बातोंबातों में सरफराज ने उस्मान और खालिद के सामने जिक्र करते हुए पूछा कि कोई ऐसी भी दवा आती है, जिस के प्रयोग से इंसान खत्म हो जाए और किसी को पता भी न चले. इस पर खालिद ने बताया, ‘‘भाई काम सब हो जाते हैं, लेकिन उस के लिए कुछ खर्च करना पड़ता है. यह काम बहुत ही रिस्की होते हैं. आप को अगर किसी का काम कराना है तो पूरे एक लाख रुपए खर्च करने होंगे.’’

सरफराज के लिए एक लाख रुपए कोई मायने नहीं रखते थे. अपने प्यार को पाने के लिए वह कुछ भी खर्च करने को तैयार था. उस ने दोनों को 75 हजार रुपए दे कर नवाब की मौत का सौदा तय कर लिया. बाकी के 25 हजार रुपए उन्होंने काम हो जाने के बाद देने को कह दिया. बातचीत हो जाने के बाद सरफराज ने खालिद और उस्मान को प्रौपर्टी डीलर बताते हुए नवाब से उन की मुलाकात करा दी. उस ने नवाब से कह दिया कि यदि वह किसी प्रौपर्टी का सौदा इन से कराते हैं तो अच्छा कमीशन मिलेगा. नवाब खुश हो गया कि प्रौपर्टी बिकवाने पर उसे अतिरिक्त आमदनी होगी. नवाब शराब पीता ही था, इसलिए उस्मान और खालिद ने नवाब से दोस्ती गांठते हुए उसे शराब भी पिलानी शुरू कर दी.

8 दिसंबर, 2015 को योजना के अनुसार, सरफराज नवाब को साथ ले कर खालिद और उस्मान के पास काशीपुर पहुंचा. नवाब को उन दोनों के पास छोड़ कर वह खुद शहर में कुछ काम होने का बहाना कर के वहां से खिसक लिया. सरफराज के जाने के बाद उस्मान और खालिद ने नवाब को रामनगर रोड पर सड़क के किनारे ही शराब पिलाई. शराब पीने के बाद तीनों सनराइज अस्पताल पहुंचे. उस्मान उसी अस्पताल में कंपाउंडर था. उस ने अस्पताल के मालिक डा. सम्स से जसपुर जाने की बात कह कर उन की नैनो कार मांगी. डा. सम्स ने उसे अपनी कार दे दी. नवाब को उस कार में बिठा कर तीनों जसपुर की ओर चल दिए.

नवाब पर शराब का नशा चढ़ गया था. उसी का लाभ उठाते हुए दोनों ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इंजेक्शन के लगते ही नवाब बेहोश हो कर सीट पर लुढ़क गया. इस के बाद शेर अली बाबा की मजार के पास कार रोक कर उन्होंने उसे ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाला 10 एमएल का पूरा इंजेक्शन लगा दिया और फिर उसे चलती कार से सड़क पर फेंक दिया. बाद में उन्होंने उसी कार से उसे 2-3 बार बेरहमी से कुचल दिया, जिस के बाद नवाब की मौके पर ही मौत हो गई. सरफराज ने घटना वाले दिन ही उस्मान को शहाना का नंबर लिख कर दे दिया था, जो उन्होंने नवाब की जेब में रख दिया था. जिस से पुलिस उस के घर वालों तक आसानी से पहुंच सके. उसी के द्वारा पुलिस ने शहाना को फोन कर के दुर्घटना वाली बात बताई थी.

नवाब को मौत के घाट उतारने के बाद उस्मान और खालिद, दोनों ही काशीपुर वापस चले आए थे. इस घटना को अंजाम देने के बाद ही उस्मान ने मोबाइल से सरफराज को बता दिया था कि उस का काम हो गया है. इस घटना के बाद से खालिद और उस्मान के साथसाथ सरफराज ने भी अपना मोबाइल बंद कर लिया था. सरफराज ने नवाब को मारने की सूचना शहाना परवीन को भी दे दी थी. इस केस का खुलासा होते ही पुलिस ने भादंवि की धारा 302/120 के तहत मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

एसएसपी केवल खुराना ने इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 2,500 रुपए का इनाम देने की घोषणा की थी. वहीं मृतक के घर वालों ने भी पुलिस को 5 हजार रुपए बतौर इनाम दिए. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Story: इश्क की राह में भटकी औरत

Love Story: जिस महेश के लिए राधा ने पति से बेवफाई की, उसी महेश की नीयत जब उस की 14 साल की बेटी पर बिगड़ी तो भला राधा इस बात को कैसे बरदाश्त करती. फिर उस ने जो किया, क्या वह ठीक था

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर देहात के थाना झीझंक का एक गांव है महेवा. इसी गांव में राम सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी राधा थी. राम सिंह घी का कारोबार करता था. वह गांवगांव जा कर लोगों के यहां से घी खरीदता और उसे ले जा कर कानपुर में बेच आता. इस से उसे जो फायदा होता, उसी से उस के परिवार की गुजरबसर होती थी.

राम सिंह की बेटी राधा सुंदर होने के साथसाथ थोड़ी चंचल भी थी. इसलिए सयानी होने पर गांव का हर लड़का उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लग गया था. जब यह सब राम सिंह ने देखा तो उसे लगा कि अब जल्दी ही राधा की शादी कर देनी चाहिए. उस ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू की तो उसे गांव बेलूपुर में एक लड़का मिल गया.

लड़के का नाम अजय था. उस के पिता लाखन सिंह के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. इसी वजह से उस की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. बातचीत शुरू हुई तो राधा और अजय का रिश्ता तय हो गया. इस रिश्ते में अगर कोई खटकने वाली बात थी तो यह कि अजय सांवला था, जबकि राधा गोरी थी. इस के बावजूद अजय का पलड़ा भारी था, क्योंकि उस के पास 10 बीघा जमीन थी. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई.

अजय तो सुंदर पत्नी पा कर खुश था, जबकि राधा अपने सांवले पति से खुश नहीं थी. शादी के पहले उस के मन में पति की जो छवि थी, अजय उस में कहीं भी फिट नहीं बैठता था. लेकिन अब विवाह हो गया था, इसलिए साथ तो रहना ही था. धीरेधीरे राधा एक बेटी अर्पिता और 2 बेटों जय तथा विजय की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी राधा में कोई बदलाव नहीं आया था. उस के मन में न तो बच्चों के प्रति वह मोह जागा था, जो एक मां को अपने बच्चों के प्रति होता है और न ही पति के प्रति वह चाहत जागी थी, जो जागनी चाहिए थी. पत्नी की इस उपेक्षा से अजय काफी दुखी था.

इस दुख को कम करने के लिए वह शराब पीने लगा. जब वह पक्का शराबी हो गया तो खेतीकिसानी से उस का मन हट गया. उसे लगता था कि आखिर वह किस के लिए मेहनत करे. जब वह पूरी तरह से निठल्ला हो गया तो मांबाप ने उसे अलग कर दिया. गांव में अजय का एक और अन्य मकान था, इसलिए मांबाप से अलग होने पर उसे कोई परेशानी नहीं हुई. वह पत्नी और बच्चों के साथ उसी मकान में रहने लगा. वह मेहनत कर नहीं सकता था, इसलिए बाप से मिली जमीन उस ने बटाई पर दे दी.

राधा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अब भी उस की सुंदरता में जरा भी कमी नहीं आई थी. बल्कि शरीर भर गया था, इसलिए वह पहले से भी ज्यादा सुंदर लगने लगी थी. स्वभाव से हंसमुख और चंचल राधा का मन घरगृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि वह कभी अजय को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाई. शायद इसी वजह से उस का मन भटकता रहता था. राधा की सुंदरता और चंचलता की वजह से गांव के महेश का दिल उस पर आ गया था. वह उस तक पहुंचने का तिकड़म भिड़ाने लगा था.

3 भाइयों में महेश सब से बड़ा था. उस के पिता भवानी सिंह ने उस का विवाह शिवली कस्बा की रहने वाली रजनी से कर दिया था. लेकिन अपनी आशिकमिजाजी की वजह से वह पत्नी का हो कर नहीं रह सका. वह इधरउधर मुंह मारता फिरता था. गांव की कई महिलाओं से उस के संबंध थे. लेकिन उन के बारे में कोई नहीं जान सका. राधा पर वह पूरी तरह से मोहित था. इसलिए उस तक पहुंचने के लिए उस ने उस के खेत बटाई पर ले लिए. इस से उसे राधा के घर आनेजाने में आसानी हो गई थी. वह जब भी राधा के घर जाता, मौका मिलने पर उस से हंसीमजाक करने से नहीं चूकता.

राधा भी उस से खुल कर हंसीमजाक करती थी. एक दिन महेश आया तो अजय घर में नहीं था. राधा को अकेली पा कर उस के दिल की धड़कन बढ़ गई. वैसा ही कुछ हाल राधा का भी था. उस ने इठलाते हुए कहा, ‘‘आओ देवरजी, कैसे आना हुआ?’’

‘‘खेतों पर काम कर रहा था, अचानक तुम्हारी याद आई तो मन मचल उठा. पहले तो उसे मनाने की कोशिश की, जब वह नहीं माना तो यह सोच कर चला आया कि चल कर प्यारी भाभी का दीदार कर लूं. कभीकभी सोचता हूं कि इतनी सुंदर भाभी कालेकलूटे अजय भैया के पल्ले कैसे पड़ गईं?’’

‘‘अपनाअपना नसीब है देवरजी. मेरी तकदीर में यही लिखा था.’’ राधा ने लंबी सांस ले कर कहा.

राधा के इस जवाब से महेश को लगा कि उस का तीर सही निशाने पर लगा है. वह उस के एकदम करीब आ कर बोला, ‘‘नसीब अपने हाथ में होता है भाभी, मैं आप से प्यार करता हूं. मैं कोई पराया तो हूं नहीं. वैसे भी मैं न जाने कब से तुम्हारी खूबसूरती का दीवाना हूं.’’

‘‘देवरजी, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं वह आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे?’’ राधा ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

महेश ने उसे बांहों में भर कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, पर खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’

राधा को बांहों में भरते ही उस ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी. राधा ने उस की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया. इस की वजह यह थी कि वह भी यही चाहती थी. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भूखे भेडि़ए की तरह क्यों टूटे पड़ रहे हो, थोड़ा सब्र से काम लो, दरवाजा खुला है. वैसे भी तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक नहीं है.’’

महेश समझ गया कि राधा को कोई आपत्ति नहीं है. इस का उस ने पूरा फायदा उठाया और अपने तथा राधा के बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. इस तरह राधा के कदम एक बार बहके तो बहकते चले गए. मौका मिलते ही महेश राधा के घर आ जाता. राधा भी हर तरह से उस का सहयोग कर रही थी. इस की वजह यह थी कि वह उस के पति से हर मायने में इक्कीस था. महेश और राधा का यह अवैध संबंध चोरीछिपे सालों तक चलता रहा, किसी को पता नहीं चला. आखिर कब तक उन का यह गलत संबंध छिपा रहता. वे समय के साथ लापरवाह होते गए, परिणामस्वरूप एक दिन अजय ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उन के बीच यह खेल काफी दिनों से चल रहा है.

महेश चूंकि दबंग स्वभाव का था, इसलिए अजय ने उस से सीधे टकराना ठीक नहीं समझा. उस के जाने के बाद उस ने राधा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘शरम आनी चाहिए तुम्हें यह सब करते हुए. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद तुम नीचता पर उतर आई हो.’’

इस के बाद जब दोनों में तूतूमैंमैं शुरू हुई तो बात बढ़ती गई. इस के बाद अजय ने राधा की जम कर पिटाई कर दी. लेकिन इस पिटाई के बाद भी राधा ने महेश को नहीं छोड़ा. वह महेश की इतनी दीवानी हो चुकी थी कि जब उसे घर में उस से मिलने का मौका नहीं मिलता तो वह किसी न किसी बहाने खेतों पर जा कर उस से मिल लेती. जब इस का पता अजय को चलता तो वह शराब पी कर राधा और महेश को खूब गालियां देता.

ज्यादा शराब पीने की वजह से अजय बीमार पड़ गया. राधा ने कानपुर ले जा कर उस का इलाज कराया. समय पर सही इलाज मिलने से अजय ठीक हो गया. उस के इलाज में सारा पैसा महेश ने लगाया था, इसलिए वह उस के एहसान तले दब गया. अब उस ने महेश से समझौता कर लिया कि वह उस के और राधा के बीच में बाधा नहीं बनेगा. इस के बाद महेश ने उस की नौकरी झीझंक कस्बा में एक आढ़ती के यहां लगवा दी. अजय सुबह 11 बजे घर से निकलता तो शाम को ही वापस आता. कभीकभी काम ज्यादा होता तो वह आढ़त पर ही रुक जाता.

अब तक राधा की बेटी अर्पिता 14 साल की हो चुकी थी. वह भी मां की तरह सुंदर और चंचल थी. गांव के रिश्ते के नाते वह महेश को भइया कहती थी. मां और महेश के संबंधों की उसे जानकारी थी. लेकिन मां के डर की वजह से वह विरोध नहीं कर पाती थी. इस की एक वजह यह भी थी कि स्कूल की फीस से ले कर बाकी के उस के सारे खर्च महेश ही उठाता था. शायद इसीलिए वह अपनी जुबान बंद रखती थी.

एक दिन अजय ने घर से जाते समय राधा से कहा कि रात को वह घर नहीं आ पाएगा, इसलिए वह बच्चों के साथ खाना खा कर सो जाए. शाम ढलते ही राधा ने महेश को फोन कर के बता दिया कि वह जल्दी से घर आ जाए. आज की पूरी रात उन की अपनी है. क्योंकि अजय घर नहीं आएगा. राधा की बात सुन कर महेश बहुत खुश हुआ. रात 10 बजे के आसपास वह शराब के नशे में झूमता हुआ राधा के घर पहुंचा. अब तक राधा ने बच्चों को खिलापिला कर दूसरे कमरे में सुला दिया था. महेश ने आते ही राधा को बांहों में भरा और उस के साथ कमरे में चला गया.

आधी रात के बाद महेश लघुशंका के लिए कमरे से बाहर निकला तो उस की नजर दूसरे कमरे में सो रही अर्पिता पर पड़ी. उस को उस रूप में देख कर महेश की सांसें तेज हो गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा. उस के बाद लघुशंका कर के लौटा तो एक बार फिर उस की नजरें अर्पिता कर टिक गईं.

उस की नीयत खराब  होने लगी. वह राधा के कमरे में आया तो देखा राधा सो रही थी. अब तक उस की नीयत पूरी तरह खराब हो चुकी थी. वह लौटा और जा कर अर्पिता के बगल में लेट गया. उस ने अर्पिता से छेड़छाड़ की तो उस की नींद खुल गई. उस ने चीखना चाहा. लेकिन महेश ने उस के मुंह पर हाथ रख कर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘चुप रह, मैं हूं महेश.’’

‘‘महेश भइया तुम? यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘चुप रह, मैं जो करने जा रहा हूं, इस में बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘नहीं भइया, यह गलत है. आप को जो करना है, मम्मी के साथ करो. मेरे साथ कुछ किया तो शोर मचा दूंगी.’’ अर्पिता ने धमकाया तो महेश डर गया और चुपचाप राधा के कमरे में चला गया.

अर्पिता राधा से ज्यादा सुंदर थी, इसलिए वह महेश के दिलोदिमाग में बस गई. अर्पिता को पाने के लिए वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. इस छेड़छाड़ का परिणाम यह निकला कि अर्पिता को भी मजा आने लगा. अब वह भी महेश के आने का इंतजार करने लगी. महेश अर्पिता के साथ कुछ कर पाता, इस से पहले ही एक दिन राधा ने उसे अर्पिता से छेड़छाड़ करते देख लिया. उस के बाद तो राधा महेश पर बिफर पड़ी, ‘‘मेरी फूल सी बच्ची को बरगलाने में तुम्हें शरम नहीं आई, मैं ने पति से बेवफाई कर के तुम्हारा साथ दिया, जबकि तुम मेरी ही बेटी को बरबाद करने पर तुले हो. कान खोल कर सुन लो, आज के बाद तुम ने उसे बरगलाने की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा.’’

राधा की धमकी का महेश पर कोई असर नहीं हुआ. उसे जब भी मौका मिलता, वह अर्पिता के साथ छेड़खानी कर बैठता. एक दिन तो हद हो गई, महेश ने राधा के सामने ही अर्पिता को अपनी बांहोें में भर लिया. इस के बाद तो राधा आपा खो बैठी. उस ने महेश और अर्पिता दोनों की पिटाई कर दी. इस के बाद राधा और महेश में जम कर कहासुनी हुई. राधा की समझ में आ गया कि महेश ऐसा सांप है, जो किसी भी दिन उस की बेटी को डंस सकता है, इसलिए उस ने इस सांप का फन कुचलने का निश्चय कर लिया.

14 दिसंबर, 2015 की सुबह राधा थाना झीझंक पहुंची और थानाप्रभारी आर.के. सिंह को बताया कि बेलूपुर के रहने वाले महेश ने उस के घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. उस की इस सूचना पर आर.के. सिंह पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. उस समय राधा के घर के बाहर भीड़ लग चुकी थी. भीड़ को हटा कर थानाप्रभारी वहां पहुंचे, जहां महेश फांसी के फंदे से झूल रहा था. महेश जीने की ग्रिल से लटका था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे. पहली ही नजर में फांसी लगाने जैसा कोई लक्षण नजर नहीं आ रहा था. न तो उस के मुंह से झाग निकला था और न ही मलमूत्र निकला था. शक होने पर आर.के. सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

उन्होंने राधा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि महेश ने उस के खेत बटाई पर ले रखे हैं, इसलिए उस का उस के घर आनाजाना था. उस के पति अजय के नौकरी पर जाने के बाद महेश आया और उस की साड़ी का फंदा बना कर ग्रिल से झूल गया. उस ने महेश को न आते देखा और न फांसी पर झूलते देखा. आर.के. सिंह ने मृतक महेश के पिता भवानी सिंह से पूंछतांछ की तो फफकफफक कर रोते हुए उस ने बताया कि महेश की हत्या राधा और उस के पति अजय ने की है. पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश को फंदे पर लटकाया गया है. हत्या की वजह राधा और मेहश के बीच अवैध संबंध हैं.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो आर.के. सिंह चौंके. क्योंकि महेश की मौत गला दबाने से हुई थी. उस ने आत्महत्या नहीं की थी. चूंकि शक के घेरे में राधा और उस का पति अजय था, इसलिए वह उन्हें हिरासत में ले कर थाने ले आए और पूछताछ की. अजय ने बताया कि वह घर पर नहीं था, इसलिए महेश की हत्या किस ने की, उसे पता नहीं है. अजय ने हत्या करने से साफ मना कर दिया तो आर.के. सिंह ने राधा से पूछताछ की. पहले तो वह उन्हें गुमराह करती रही, लेकिन जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और महेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि उस के और महेश के बीच पिछले कई सालों से संबंध थे. उस के प्यार में अंधी हो कर उस ने पति तक से बेवफाई कर डाली. तब उसे पता नहीं था कि उस की यह बेवफाई उस की बेटी की जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी. महेश उस की बेटी अर्पिता पर बुरी नजर डाल रहा था. राधा ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने साजिश रच कर 14 दिसंबर की सुबह 4 बजे जब अजय काम पर चला गया तो महेश को बुला लिया. आते ही महेश ने जैसे ही उसे पकड़ा, उस ने उस के नाजुक अंग को दांतों से काट लिया.

वह दर्द से तड़पने लगा तो वह उस की छाती पर सवार हो गई और साड़ी से उस का गला घोंट दिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस ने उस की लाश को फंदे से जीने की ग्रिल से लटका दिया. उस के बाद थाने जा कर पुलिस को सूचना दे दी. राधा के इसी बयान के आधार पर आर.के. सिंह ने मृतक के पिता भवानी सिंह की ओर से अपराध संख्या 347/2015 पर महेश की हत्या का मुकदमा राधा के खिलाफ दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

17 दिसंबर, 2015 को थाना झीझंक पुलिस ने राधा को कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. चूंकि अजय निर्दोष था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया. Love Story