Haryana Crime Story: मोहब्बत बनी मौत

Haryana Crime Story: अविवाहित मुकेश की फेसबुक द्वारा 2 बच्चों की मां निशा से दोस्ती हुई तो दोनों एकदूसरे से प्यार ही नहीं करने लगे, बल्कि घर छोड़ कर भाग भी गए. लेकिन निशा को अपनी गलती का अहसास हुआ तो वह वापस आ गई. मुकेश को प्रेमिका की यह बेवफाई पसंद नहीं आई और वह उस का खून कर बैठा….

हरियाणा के जिला पानीपत के थाना शहर की राजीव कालोनी में ज्यादातर वे लोग रहते हैं, जो वहां की छोटीबड़ी कंपनियों में काम करते हैं. यहां की आबादी का एक हिस्सा ऐसा भी है, जो बतौर किराएदार रहता है. चोरीचकारी और मारपीट जैसे अपराधों को छोड़ दें तो इस कालोनी में कभी ऐसी कोई बड़ी वारदात नहीं हुई कि यहां के लोग दहल उठते.

लेकिन कब, कहां और किस प्रकार का अपराध घट जाए, इस बात को पहले से कौन जानता है. 3 फरवरी, 2016 की दोपहर को इस कालोनी में जो सनसनीखेज वारदात हुई, उस ने न सिर्फ पुलिस वालों को हैरान कर दिया, वहां रहने वालों को भी डरा दिया. दरअसल, कालोनी के ही एक सिरफिरे नौजवान ने सरेआम चाकू से एक महिला की गला काट कर बेरहमी से हत्या कर दी थी. हैरानी और खौफ पैदा करने वाली बात यह थी कि हत्यारा महिला की लाश के पास ही कुर्सी डाल कर आराम से बैठा था. लोगों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए वह चाकू लहरा कर अंजाम भुगतने की धमकी दे रहा था.

दिल दहलाने वाले इस खूनी मंजर और हत्यारे की धमकी के डर का आलम यह था कि कोई भी आगे बढ़ने की हिममत नहीं जुटा पा रहा था. हत्यारा कह रहा था, ‘‘यह सिर्फ मेरे लिए बनी थी, लेकिन इस ने मेरी होने से मना कर दिया, इसलिए इसे जिंदा रहने का कोई हक नहीं रह गया था.’’

घटना की सूचना पा कर थाना शहर के थानाप्रभारी सुरेश कुमार, किला चौकीइंचार्ज प्रवीण कुमार और महिला एसआई नीलम आर्य पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गई थीं. थोड़ी देर में डीएसपी दलबीर सिंह भी आ गए थे. घटनास्थल की हालत देख कर पुलिस वालों के भी रोंगटे खडे़ हो गए थे. मृतका खून से लथपथ पड़ी थी. लाश के पास ही कुर्सी डाले हत्यारा बैठा था. पुलिस को देख कर वह थोड़ा सतर्क हो गया था. पुलिस ने आगे  बढ़ कर कहा, ‘‘चाकू फेंक कर खुद को कानून के हवाले कर दो. यही तुम्हारे लिए ठीक भी रहेगा.’’

इस से युवक को गुस्सा आ गया. उस ने लाश की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘खबरदार, कोई भी आगे बढ़ा तो उस का भी यही अंजाम कर दूंगा, जो इस का किया है.’’

उस की इस धमकी से पुलिसकर्मियों के भी कदम ठिठक गए. थानाप्रभारी ने उसे समझाना चाहा, ‘‘हमारी बात तो सुनो…’’

उन की बात पूरी होती, उस के पहले ही वह चिल्लाया, ‘‘कहा न, कोई आगे नहीं आएगा. अगर कोई आगे आया तो मैं अपनी गर्दन काट लूंगा.’’

कह कर उस ने चाकू अपनी गर्दन पर रख दिया. उस युवक की इस हरकत से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. वे समझ गए कि इस के सिर पर खून सवार है. इस स्थिति में यह कुछ भी कर सकता है. इसलिए पुलिस उसे समझातीबुझाती रही. मृतका की सास और उस का पति जोरजोर से रो रहे थे. जब युवक को लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो उस ने कहा, ‘‘चलो, पहले लाश उठाओ.’’

पुलिस जैसे ही आगे बढ़ी, उसी बीच उस ने अपने हाथ की कलाई पर चाकू से वार कर लिया. खून की धार फूट पड़ी. ऐसे में ही पुलिस ने चकमा दे कर उसे पकड़ लिया और फुर्ती से चाकू छीन लिया. इस के बाद तुरंत अपनी जीप से अस्पताल पहुंचाया. पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि इतनी बड़ी घटना आखिर घटी क्यों थी? इस बारे में पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि जिस युवक ने खौफनाक तरीके से फिल्मी अंदाज में यह हत्या की थी, उस का नाम मुकेश था. मृतका का नाम निशा था.

जिस समय यह वारदात हुई थी, मृतका निशा छत पर कपड़े फैलाने गई थी. उसी बीच मुकेश चाकू ले कर वहां आ गया. वह सीधे छत पर गया और निशा का हाथ पकड़ कर नीचे खींच लाया. वह उस से साथ चलने को कह रहा था. निशा ने मना किया तो उस ने उस का गला काट दिया. सास ने बहू को बचाने की कोशिश तो की, लेकिन बचा नहीं सकी. बहरहाल, पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद मृतका के पति संजय वर्मा की तहरीर पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया गया. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने मुकेश को कस्टडी में ले लिया और थाने ला कर विस्तार से पूछताछ की.

मुकेश, निशा के घर वालों और पड़ोसियों से पूछताछ में एक ऐसे सिरफिरे आशिक की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई, जो फेसबुक से करीब आई निशा को हमेशा के लिए अपनी बनाने की जिद पर अड़ा था, जबकि उस के प्यार में पड़ कर वादे करने वाली निशा हालात बदलने पर बदल चुकी थी. खूबसूरत और बनसंवर कर रहने वाली 30 वर्षीया निशा संजय वर्मा की पत्नी थी. संजय एक पावरलूम फैक्ट्री में नौकरी करता था. उस के 2 बेटे, 8 साल का आदी और 6 साल का वंश था. उस के मातापिता भी साथ रहते थे. वैसे तो ये लोग मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बलरामपुर के रहने वाले थे, लेकिन लगभग 15 सालों से पानीपत में रह रहे थे. परिवार में खुशियों का बसेरा था. वक्त अपनी गति से चल रहा था.

मूलत: बिहार का रहने वाला 22 वर्षीय मुकेश भी कालोनी में किराए पर रहता था और अमन भवन चौक स्थित एक फैक्ट्री में कपड़ा सिलाई का काम करता था. चूंकि वह संजय के घर के नजदीक रहता था, इसलिए अक्सर उस की नजरें निशा पर पड़ जाती थीं. धीरेधीरे उस की खूबसूरती उसे भाने लगी. फिर तो वह उसे देखने के बहाने तलाशने लगा. निशा जल्दी ही उस की मंशा भांप गई. 3 महीने पहले मुकेश ने निशा को फेसबुक पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी तो उस ने सहर्ष स्वीकार कर ली. इस के बाद दोनों एकदूसरे के दोस्त बन गए.

दोनों के बीच चैटिंग होने लगी. निशा किस डगर पर चल चुकी है, यह बात परिवार का कोई नहीं जानता था. चैटिंग और मोबाइल पर होने वाली बातों से दोस्ती गहराई तो मुकेश निशा से प्यार करने लगा. एक दिन मौका पा कर उस ने प्यार का इजहार भी कर दिया. निशा ने नासमझी दिखाई और परिवार के बारे में सोचे बगैर उस के प्यार पर अपने प्यार की मोहर लगा दी. दिलों में प्यार का पौधा अंकुरित हुआ तो वे एकदूसरे के खयालों में डूबे रहने लगे. जल्दी ही चोरीछिपे दोनों की मुलाकातों का सिलसिला भी चल निकला.

मुकेश रसिया किस्म का युवक था. निशा से मुलाकात होती तो वह उस की इतनी तारीफें करता था कि वह खुशी से फूली नहीं समाती. पति और प्रेमी में फर्क होता है. घरपरिवार की जिम्मेदारियों में पति वह प्रेम प्रदर्शित नहीं कर पाता, जो मुकेश करता था. यह एक बड़ी सच्चाई है कि परिवार सिर्फ प्रेम करने से नहीं चलता. उस के लिए पैसों की भी जरूरत पड़ती है, जिसे हासिल करने के लिए काम करना पड़ता है. संजय परिवार के लिए समर्पित था, जिस के लिए वह मेहनत भी खूब करता था. उसी के बलबूते घर चल रहा था.

दूसरी ओर मुकेश अविवाहित था. उस के पास समय ही समय था. वह निशा से मीठीमीठी बातें कर के अपना वक्त बिता रहा था. एक समय ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवारें टूट गई. मुकेश और निशा एकदूसरे का सान्निध्य पा कर खुश थे. अनैतिक रिश्तों की गर्त ऐसी होती है, जिस पर कदम बढ़ा कर पीछे हटाना मुश्किल होता है. वक्त के साथ निशा और मुकेश के रिश्ते गहराते गए. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. उड़तेउड़ते खबर संजय तक पहुंची, पत्नी के किस्से सुने तो उस ने उस से बात की. लेकिन वह साफ मुकर गई.

प्रेमिल रिश्तों में मुकेश और निशा ने साथ जीने और मरने की कसमें खाईं थीं. मुकेश ने तय कर लिया था कि वह निशा से विवाह कर के उसे अपने साथ रखेगा. सोच को साकार करने के लिए 7 दिसंबर, 2015 को वह निशा को ले कर भाग गया. बहू की इस हरकत से वर्मा परिवार को भारी बदनामी का सामना करना पड़ा. संजय ने किला चौकी में निशा की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा कर सच्चाई पुलिस को बता दी. मोबाइल लोकेशन के जरिए 5 दिनों में ही घर वालों और पुलिस ने निशा को खोज निकाला.

दोनों फरीदाबाद में रह रहे थे. 11 दिसंबर को पुलिस दोनों को पकड़ कर ले आई. इस के बाद दोनों पक्षों के लोग इकट्ठा हुए. निशा को भी समझाया गया और मुकेश को भी. दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया. तय हुआ कि निशा अपने घर रहेगी और मुकेश उसे परेशान नहीं करेगा. निशा का मन बदल जाए और मुकेश भी उसे परेशान न करे, इस के लिए संजय ने उसे दिल्ली स्थित उस के मायके पहुंचा दिया. लेकिन इस तरह भला कब तक चलता. संजय की मां शीला बुजुर्ग थीं, बच्चे स्कूल जाते थे. घर के तमाम काम होते थे, कौन संभालता.

जनवरी के अंतिम सप्ताह में संजय निशा को घर ले आया. घर वालों ने एक बार फिर उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. उस ने वादा किया कि अब वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिस से परिवार की बदनामी हो. उस ने मन ही मन तय भी कर लिया कि अब वह मुकेश से कोई वास्ता नहीं रखेगी. दूसरी ओर मुकेश को पता चला कि निशा आ गई है तो वह उस से मिलने की कोशिश करने लगा. उस ने कई बार मोबाइल से फोन किया, लेकिन निशा ने उस का कोई जवाब नहीं दिया. उस ने निशा को देखने के लिए उस के घर के बाहर के कई चक्कर लगाए, लेकिन निशा की नजर उस पर पड़ती तो वह उसे नजरअंदाज कर देती.

निशा के इस बदलाव ने उसे बेचैन कर दिया. निशा शादीशुदा थी और अपनी गलतियों को सुधार रही थी. मुकेश को भी खुद में सुधार लाना चाहिए था, लेकिन वह निशा पर अपना पूरा हक समझने लगा था. उस ने साथ जीनेमरने की जो कसमें खाई थीं, उन्हें वह भुला नहीं पा रहा था. निशा की उपेक्षा से वह बुरी तरह आहत होता जा रहा था. एक बार मौका देख कर उस ने निशा से कहा, ‘‘निशा, क्या हो गया है तुम्हें, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘मुकेश मेरी मजबूरियों को समझो. और मुझे भूल जाओ. अब मैं शादीशुदा हूं.’’

मुकेश तड़प उठा, ‘‘कैसी बात कर रही हो, मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. मुझे तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘अब यह नहीं हो सकता मुकेश,’’ कहने के साथ निशा ने चेतावनी दी, ‘‘मुझे आइंदा परेशान करने की कोशिश मत करना, वरना ठीक नहीं होगा.’’

मुकेश बुरी तरह हताश हो गया. उस की हालत हारे हुए जुआरी सी हो गई. निशा की बेरुखी से उस की रातों की नींद उड़ गई. उस के सिर पर निशा को हासिल करने का जुनून सवार था, लेकिन उस के सारे प्रयास विफल हो रहे थे. वह दिनरात इसी बारे में सोचता रहता था. यही वजह थी कि उस ने मन ही मन खतरनाक निर्णय ले लिया कि अगर निशा ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे किसी और की भी नहीं रहने देगा. इस के बाद उस ने एक चाकू का इंतजाम किया और निशा से आखिरी बार बात करने की ताक में रहने लगा.

3 फरवरी की दोपहर निशा नहाधो कर कपड़े फैलाने छत पर गई तो मुकेश की नजर उस पर पड़ गई. अपने कपड़ों में चाकू छिपा कर वह संजय के घर में दाखिल हो गया. उस समय निशा की सास शीला रसोई में थीं. वह सीधे छत पर पहुंच गया. उसे सामने पा कर निशा सकपका गई, ‘‘त…त…तुम यहां कैसे आए?’’

‘‘निशा मुझे तुम से आखिरी बार बात करनी है.’’

‘‘लेकिन मुझे तुम से कोई बात नहीं करनी.’’

मुकेश को गुस्सा आ गया. उस ने ताव में निशा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बात तो तुम्हें करनी होगी. तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूंगा.’’

‘‘छोड़ो मुझे, तुम पागल हो गए हो क्या?’’

‘‘हां, मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया हूं.’’ कह कर वह निशा को खींच कर नीचे ले आया.

शीला ने यह नजारा देखा तो हक्कीबक्की रह गईं. उन्होंने मुकेश को रोकना चाहा तो उस ने चाकू निकाल कर उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया. इस के बाद उस ने चाकू दिखा कर निशा से पूछा, ‘‘बोलो, साथ चलोगी या नहीं?’’

‘‘मैं कहीं नहीं जाऊंगी, छोड़ो मुझे.’’

निशा ने खुद को उस के चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की तो वह आपा खो बैठा और पलक झपकते चाकू से उस की गर्दन पर घातक वार कर दिया. निशा फर्श पर गिर पड़ी और कुछ ही सैकेंड में उस ने दम तोड़ दिया. शीला चीखीचिल्लाईं तो आसपास के लोग आ गए. लेकिन मुकेश हाथ में चाकू लिए कुर्सी डाल कर वहीं बेखौफ हो कर बैठ गया और सब को धमकाने लगा. उस की धमकी से डर कर कोई उसे पकड़ने का साहस नहीं कर सका. उस के बाद सूचना पा कर पुलिस आ गई.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन मुकेश को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. निशा उस के प्यार में न पड़ी होती और अपने बहके कदमों को वक्त रहते संभाल लिया होता तो यह नौबत कभी न आती. मुकेश ने भी निशा को जबरन हासिल करने की कोशिश न की होती तो उस का भविष्य चौपट न होता. अब उस की जिंदगी जेल में ही कटेगी. Haryana Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Dhradun Crime: मौत का नजराना

Dhradun Crime: शादीशुदा गुरप्रीत कौर मकान मालिक के निठल्ले और आवारा बेटे आशीष के पे्रेमजाल में फंस गई. उस के खर्चे पर वह ऐश करने लगा और धीरेधीरे 2 लाख रुपए ले लिए. ऐसे बेमेल, गलत और स्वार्थी रिश्तों का आखिर क्या अंजाम हुआ?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के आर्मी एरिया को पार कर के प्रेमनगर से एक किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र शुरू हो जाता है. यहां चाय के बाग भी हैं और अन्य फसलें भी होती हैं. 5 फरवरी, 2016 की शाम सड़क के ठीक किनारे स्थित एक चाय के बाग में पुलिसकर्मियों और आम लोगों की भीड़ लगी थी.  वजह, किसी ने एक खूबसूरत महिला की बेरहमी से हत्या कर दी थी. वहां खून से लथपथ जिस महिला की लाश मिली, वह लाल रंग की जैकेट पहने थी. मृतका की उम्र करीब 35 साल थी और हत्यारे ने किसी तेज धार वाले हथियार से उस की गर्दन पर वार कर के उस की सांसों की डोर काट दी थी.

प्राथमिक जांचपड़ताल में पुलिस महिला की लाश के इर्दगिर्द ऐसे सबूतों को ढूंढ रही थी, जिस के सहारे कातिल तक पहुंचा जा सके. इसी सिलसिले में पुलिस महिला की जेबों की तलाशी भी ले चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं मिला था. अलबत्ता पुलिस को वहां पड़ा एक लेडीज हेलमेट जरूर मिला था. संभवत: वह मृतका का ही था.

दरअसल, करीब 7 बजे किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को वहां लाश पड़ी होने की खबर दी थी. कंट्रोल रूम से सूचना फ्लैश होने के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया और क्षेत्र के थाना प्रेमनगर के थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट मय पुलिस बल के अविलंब वहां पहुंच गए. मामला सनसनीखेज था, इस तरह से किसी महिला की हत्या हो जाना कोई मामूली बात नहीं थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एसएसपी डा. सदानंद दाते, एसपी (सिटी) अजय सिंह, एएसपी मंजूनाथ व सीओ (सिटी) मनोज कत्याल समेत कई थानों की पुलिस घटनास्थल पर आ पहुंची. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया, लेकिन मौके पर कातिल तक पहुंचने लायक कोई सुराग नहीं मिल सका.

आसपास भी पुलिस ने तलाश की, लेकिन हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार वहां नहीं मिला. पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों से पूछा कि किसी ने हत्या करने वाले को तो नहीं देखा. लेकिन ऐसा कोई चश्मदीद नहीं नहीं था. अलबत्ता एक युवक ने इतना जरूर बताया कि उस ने स्कूटी वाले एक आदमी को वहां से भागते जरूर देखा था. पुलिस ने युवक से पूछताछ की. उस के अनुसार, वह टहलने के लिए निकला था. तभी उस ने किसी महिला के चीखने की आवाज सुनी. पहले उसे लगा कि महिला पर जंगली जानवर ने हमला किया है. लेकिन जब उस ने इस ओर स्कूटी स्टार्ट होने की आवाज सुनी तो वह यहां आया.

जब तक वह वहां पहुंचा, तब तक स्कूटी सवार वहां से जा चुका था. चूंकि रात का धुंधलका होने लगा था, इसलिए वह स्कूटी सवार को देख नहीं सका. इस के बाद उस ने 100 नंबर पर फोन कर दिया था. कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने एक युवकयुवती को स्कूटी से उस तरफ आते देखा था. मामला सीधे हत्या का था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारा किसी बहाने महिला को अपने साथ यहां लाया होगा और फिर चालाकी से उस की हत्या कर के भाग गया होगा. घटनास्थल से बरामद हुआ हेलमेट चूंकि लेडीज था, इस से यह संभावना अधिक थी कि स्कूटी मृतका की ही रही होगी, साथ ही यह भी कि हत्यारा उस का कोई खास जानकार रहा होगा, इसीलिए वह उस क्षेत्र में उस के साथ आई होगी.

इस बात की संभावना कतई नहीं थी कि महिला की स्कूटी लूटने के लिए उस की हत्या की गई होगी. अमूमन चोरी और लूट के लिए इस तरह हत्या के मामले पेश नहीं आते. निस्संदेह हत्यारे ने पूरी प्लानिंग के साथ वारदात को अंजाम दिया था. घटना के अंदाज से ऐसा लगता था कि हत्यारे के दिल में मृतका के प्रति गहरी नफरत थी.

हत्यारा चूंकि स्कूटी ले कर भागा था, इसलिए पूरे जिले में संदिग्ध व्यक्ति की तलाश में नाकेबंदी कर के अभियान चलाने के निर्देश दे दिए गए. हत्या के इस मामले में जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतका की शिनाख्त जरूरी थी. पुलिस ने उस के चेहरे के फोटो कराए और पूरे उत्तराखंड की पुलिस को व्हाट्सएप ग्रुप में भेज दिए. इस के साथ ही मृतका की लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

रात को करीब 9 बजे चैकिंग के दौरान पुलिस को शहर के सावलांकला क्षेत्र में एक स्कूटी लावारिस खड़ी मिली. पुलिस ने स्कूटी की डिग्गी खुलवा कर उस की तलाशी ली तो उस में से एक मोबाइल फोन मिला. इसी दौरान पर्वतीय क्षेत्र उत्तरकाशी में तैनात सबइंसपेक्टर कुलदीप पंत ने प्रेमनगर पुलिस को बताया कि शिनाख्त के लिए जिस महिला का फोटो वायरल हुआ है, कुछ समय पहले वह एक महिला के केस की पैरवी के सिलसिले में कोर्ट आती थी. उस का पूरा पता तो वह नहीं जानते, लेकिन इतना पता है कि वह रेसकोर्स इलाके में कहीं रहती थी. कुलदीप चूंकि वर्ष 2013 में देहरादून शहर की लक्खीबाग पुलिस चौकी के इंचार्ज रहे थे, इसलिए उन्हें यह जानकारी थी.

मोबाइल मिलने से पुलिस के लिए मृतका की शिनाख्त की राह आसान हो गई थी. पुलिस ने स्कूटी से बरामद मोबाइल को अनलौक करा कर उस का सिम नंबर हासिल करने के साथ कंपनी से पता किया कि वह किस के नाम था. पता चला कि वह नंबर गुरप्रीत कौर के नाम रजिस्टर्ड था. उस का पता सरकुलर रोड स्थित रैस्ट कैंप कालोनी था. पुलिस अविलंब उस पते पर पहुंची तो जानकारी मिली कि वह वहां अपने पति गुरमीत सिंह के साथ किराए पर रहती थी. वहां से थोड़ी दूर स्थित त्यागी रोड पर उस के मायके वाले रहते थे. पुलिस ने वहां जा कर बरामद शव की फोटो दिखाई तो उन्होंने गुरप्रीत की पहचान अपनी बेटी के रूप में कर दी.

इस के बाद पुलिस ने उस के भाई जगजीत की तरफ से रात पौने 12 बजे भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस केस की विवेचना थानाप्रभारी यशपाल सिंह के सुपुर्द कर दी गई. अब सब से बड़ा सवाल यह था कि गुरप्रीत की हत्या क्यों और किस ने की थी? एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस मामले में अपने अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. हत्या के खुलासे के लिए एसपी (सिटी) अजय सिंह के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी गई, जिस में विवेचनाधिकारी के अलावा एसओजी इंचार्ज अशोक राठौड़, एआई धनराज सिंह, कैंट थानाप्रभारी राजेश शाह, पटेलनगर थानाप्रभारी बी.डी. उनियाल, बसंत विहार थानाप्रभारी अब्दुल कलाम व शहर कोतवाली प्रभारी एस.एस. बिष्ट आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन यानी 6 फरवरी को पुलिस ने गुरप्रीत के नंबर की काल डिटेल्स हासिल की तो उस में अंतिम नंबर एक युवक का निकला. उस युवक का नाम आशीष उर्फ मोनू था. 27 वर्षीय आशीष रेसकोर्स इलाके के त्यागी रोड पर रहता था. उसे संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने तुरंत उस के घर दविश दी तो पता चला कि वह घर से बिना बताए शाम से ही गायब था. घर वालों से भी उस का संपर्क नहीं हुआ था. वहां काम की एक बात यह पता चली कि गुरप्रीत कौर पहले उस के यहां बतौर किराएदार रही थी, लेकिन कुछ महीने पहले उस ने मकान बदल दिया था.

इस से पुलिस का शक और भी बढ़ गया. पुलिस को यह मामला प्रेमप्रसंग का लगा. आगे की जांच में पुलिस को कुछ और भी अहम बातें पता चलीं, जो इसी ओर इशारा कर रही थीं. पुलिस आशीष की तलाश में जुट गई. इस के लिए इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस का भी सहारा लिया गया. इस से पता चला कि उस की न सिर्फ गुरप्रीत से बातें हुई थीं, बल्कि घटना के समय उस की लोकेशन भी गुरप्रीत के साथ थी. जांच आगे बढ़ी तो आशीष की लोकेशन देहरादून से करीब 28 किलोमीटर दूर मसूरी में मिलनी शुरू हुई. यह पता चलते ही एक पुलिस टीम मसूरी के लिए रवाना कर दी गई. तब तक शाम हो चुकी थी.

लोकेशन को ट्रैस करते हुए पुलिस कुल्हाड़ी चौकी स्थित होटल राज पैलेस पहुंची. पुलिस ने होटल का रजिस्टर चैक किया तो पता चला कि आशीष होटल के कमरा नंबर 7 में ठहरा हुआ है. पुलिस ने दरवाजा खुलवाया तो दरवाजा आशीष ने ही खोला. उस पर नजर पड़ते ही पुलिस चौंकी, क्योंकि उस की बाईं कलाई कटी हुई थी. खून बहने से वह लड़खडड़ा रहा था. आननफानन में पुलिस उसे वहां के सेंटमैररी अस्पताल ले गई. पुलिस टीम को कतई उम्मीद नहीं थी कि वह इस हाल में मिलेगा. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने उसे देहरादून ला कर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया.

अब उस की हालत खतरे से बाहर थी. पुलिस ने औपचारिक पूछताछ के बाद उसे आराम करने दिया. अगली सुबह पुलिस ने आशीष से पूछताछ की तो प्यार, लालच, बेवफाई और नफरत में उलझी बेमेल मोहब्बत की एक चौंकाने वाली कहानी सामने आई. दरअसल, गुरप्रीत का परिवार देहरादून में ही रैस्टकैंप में रहता था. 10 साल पहले घर वालों ने उस का विवाह गुरमीत सिंह से कर दिया था. शादी के बाद गुरप्रीत एक बेटे की मां बनी. गुरमीत का औटो स्पेयर पार्ट्स का बिजनैस था. पतिपत्नी त्यागी रोड स्थित रेलवे कर्मचारी सुबोध कुमार के मकान में किराए पर रहते थे.

सुबोध के 3 बेटे थे, अविनाश, आशीष और अंकुश. पौलिटैक्निक का डिप्लोमा करने के बाद पढ़ाई से आशीष का मन उचट गया था. उस ने नौकरी की भी तलाश नहीं की. निठल्लेपन ने उसे आवारा बना दिया. एक वक्त ऐसा भी आया, जब वह घर वालों के हाथों से निकल गया. तेजतर्रार आशीष मनमर्जी करता था और सनकी किस्म का था. गुरप्रीत थोड़ा खुले विचारों वाली थी. किसी से भी हंसबोल लेती थी. गुरमीत बिजनैस के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे. उन के पीछे गुरप्रीत को कोई परेशानी नहीं होती थी. उस का मायका तो नजदीक था ही, सुबोध का भी परिवार उस का खयाल रखता था. घर चूंकि एक ही था, लिहाजा उस के पास आशीष का भी आनाजाना था. आशीष गुरप्रीत की तरफ आकर्षित हो गया.

2 साल पहले दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई, फिर यही दोस्ती प्यार में बदल गई. पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास का होता है. जहां विश्वास, समर्पण और सामाजिक मर्यादाओं को महत्त्व दिया जाता है, वहां रिश्ते की डोर मजबूत होती है. गुरप्रीत के मामले में ऐसा नहीं था. भावावेश में ही सही, आशीष के प्यार में पड़ कर उस ने न केवल अपने विश्वास के रिश्ते को कमजोर किया, बल्कि वह एक बड़ी भूल भी कर रही थी. गुजरते वक्त के साथ गुरप्रीत और आशीष की मोहब्बत परवान चढ़ती गई. जल्दी ही एक ऐसा समय भी आया, जब उन के बीच का रिश्ता मर्यादाओं की दीवार लांघ गया.

गुरप्रीत विवाहिता थी. आशीष के लिए उस ने पति से बेवफाई की थी. उस के साथ गुरप्रीत का रिश्ता सामाजिक और नैतिक तौर पर पूरी तरह गलत था. जीवन की पगडंडियां बहुत रपटीली होती हैं. जब कोई इंसान पतन की डगर पर उतरता है तो फिर उस की वापसी मुश्किल हो जाती है. गुरप्रीत बिना किसी अंजाम की परवाह किए खुद अपनी इच्छा से इस राह पर चल रही थी. इस तरह के रिश्तों में भले ही खुशियों का बगीचा नजर आता हो, परंतु वह वक्ती होता है. उस के नतीजे कब किस रूप में घातक हो जाएं, यह बात कोई नहीं जानता. सीधे तौर पर कहें तो कालांतर में ऐसे रिश्तों के परिणाम दुखदायक ही होते हैं.

आशीष और गुरप्रीत के प्यार का सिलसिला चलता रहा. गुरप्रीत पूरी तरह आशीष के मोहपाश में बंधी थी. उन दोनों के रिश्तों की भनक किसी को नहीं लग सकी. घर के अलावा दोनों बाहर जा कर भी मिलते थे. गुरप्रीत को विश्वास में ले कर अशीष ने उस का एटीएम कार्ड ले लिया था और धीरेधीरे उस में से 2 लाख रुपए निकाल लिए थे. दरअसल, आशीष को लगता था कि उसे बैठेबिठाए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मिल गई है. सन 2015 में जब गुरप्रीत और आशीष के रिश्ते की हकीकत सामने आई तो गुरमीत ने पत्नी को खूब डांटाफटकारा. गुरप्रीत ने वक्त की नजाकत को भांप कर अपने किए पर माफी मांग ली.

इस के बाद गुरमीत ने आशीष पर रुपए वापसी का दबाव बनाया तो काफी जद्दोजहद के बाद उस ने एक लाख रुपए वापस कर दिए और बाकी बाद में देने को कहा. अपनी गृहस्थी को बचाए रखने के लिए गुरमीत ने 3 महीने पहले सुबोध का मकान छोड़ कर ससुराल के नजदीक किराए पर रहना शुरू कर दिया, साथ ही गुरप्रीत को आगाह भी किया कि वह आशीष से कोई गलत रिश्ता न रखे और उस से अपने पैसे वापस मांगे.

अच्छा इंसान वही होता है, जो वक्त रहते अपनी गलतियों को सुधार ले. गलतियों को बारबार दोहराया जाए तो बुरे नतीजों का रूप ले लेती हैं. गुरप्रीत और आशीष दोनों ही इस बात से जानबूझ कर अंजान थे. कुछ दिनों तक गुरप्रीत और आशीष के बीच दूरियां रहीं, लेकिन मकान बदलने से दोनों के दिल नहीं बदले. इस के बाद भी दोनों मिलते रहे. गुरप्रीत पर पति का दबाव था कि वह आशीष से अपने पैसे वापस ले. इसलिए गुरप्रीत ने पैसों का तकाजा जारी रखा. इस बात पर आशीष से उस की बहस भी हुई. गुरप्रीत आजादख्याल महिला थी. आशीष से उस के आंतरिक रिश्ते थे, लेकिन उस की सोच के हिसाब से वह उस की गुलाम नहीं थी. बाद में उस के रिश्ते कुछ अन्य युवकों से भी हो गए. उस की खुफिया मुलाकातों का सिलसिला गुपचुप चलता रहा.

जब यह बात आशीष को पता चली तो उसे बहुत नागवार गुजरा. एक दिन मुलाकात हुई तो आशीष ने तेवर दिखाने की कोशिश की. इस पर गुरप्रीत ने उसे टका सा जवाब दे दिया, ‘‘मैं तुम्हारी गुलाम नहीं हूं आशीष, वैसे भी तुम मेरे ऊपर झूठा आरोप लगा रहे हो.’’

आशीष गुस्से में था. उस ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं गुरप्रीत, इसलिए तुम किसी दूसरे से मिलो यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता. जरूरत पड़ने पर मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’

‘‘जब तुम प्यार करते हो तो विश्वास भी करो, साथ ही यह भी कि अपनी हद मत भूलो.’’

उस दिन के बाद आशीष अवसादग्रस्त रहने लगा. काम वह कुछ करता नहीं था, खाली दिमाग शैतान का घर होता है. वह दिनरात गुरप्रीत के बारे में ही सोचता रहता था. तरहतरह के खयाल उस के मन को कचोटते रहते थे. सब से ज्यादा वह यही सोचता था कि गुरप्रीत किसकिस से मिल रही होगी.

गुरप्रीत आशीष की ब्याहता नहीं थी, बल्कि पति से बेवफाई कर के उस ने आशीष में खुशियों की नाजायज तलाश की थी. इस के बावजूद आशीष न सिर्फ गुरप्रीत पर अपना पूरा हक समझता था, बल्कि उसे लगता था कि उस ने उस के साथ बेवफाई की है. वह दिलोदिमाग से पूरी तरह गुरप्रीत से जुड़ा था. उस के लिए इस से भी ज्यादा तकलीफदेह बात यह थी कि वह पैसे वापसी के लिए तकाजा करती थी. आशीष अवसादग्रस्त हुआ तो उस ने मन ही मन आत्महत्या कर के अपनी जिंदगी खत्म करने की सोची. कुछ दिनों तक वह इसी उधेड़बुन में रहा.

इस के बाद उस ने यह सोच कर इस खयाल को अपने मन से निकाल दिया कि इस से तो गुरप्रीत और भी आजाद हो जाएगी. उसे कोई सबक नहीं मिल सकेगा. उसे खुद मरने के बजाय गुरप्रीत को ही बेवफाई का सबक सिखाना चाहिए. आशीष ने सोचा कि कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले उसे गुरप्रीत से बात करनी चाहिए. वह यह सब सोच रहा था कि एक दिन उस ने गुरप्रीत को किसी युवक के साथ घूमते देख लिया. यह देख कर उसे बहुत गुस्सा आया. एक दिन उस ने गुरप्रीत से मिलने की इच्छा जाहिर की तो वह चली आई.

गुरप्रीत किसी भी तरह आशीष से अपने पैसे वापस लेना चाहती थी. जबकि रिश्ते तोड़ कर यह मुमकिन नहीं था. आशीष मिला तो उस ने अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘तुम यह मत सोचना गुरप्रीत कि मुझे कुछ पता नहीं है. मैं जानता हूं, तुम अपनी आदतों को बदलने के लिए तैयार नहीं हो. मैं ने कल भी तुम्हें बाजार में एक युवक से मिलते देखा था.’’

उस की बात सुन कर गुरप्रीत गुस्सा हो गई, ‘‘देखो आशीष, यह मेरा निजी मामला है. तुम अपनी हद में रहो.’’

‘‘क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करतीं?’’

‘‘प्यार करती हूं, तभी तो तुम से मिलती हूं. मैं किस से मिलती हूं, तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि मैं तुम से किनारा तो कर नहीं रही. तुम्हें पूरा वक्त दे रही हूं.’’ कुछ पल रुक कर गुरप्रीत आगे बोली, ‘‘और हां, जितनी जल्दी हो सके, तुम मेरे पैसों का इंतजाम कर दो. तुम नहीं जानते मुझे तुम्हारी वजह से क्याक्या सुनने को मिलता है.’’

आशीष शातिर दिमाग युवक था. उसे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने अपने गुस्से को जब्त करने में ही भलाई समझी. उस की हालत हारे जुआरी जैसी हो गई है. अपने गुस्से को दबा कर उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कुछ करूंगा.’’

उस रात आशीष को नींद नहीं आई. वह गुरप्रीत पर अपना हक समझ रहा था, जबकि वह उस के कहे अनुसार चलने को तैयार नहीं थी. वह चाहता था कि गुरप्रीत सिर्फ उसी की बनी रहे और वक्तबेवक्त उस पर पैसे भी खर्च करे. पर अब सब कुछ उस की सोच के विपरीत हो रहा था. नतीजतन वह गुरप्रीत से नफरत करने लगा.  निठल्लेपन का शिकार आशीष घर पर रह कर ज्यादातर आपराधिक घटनाओं पर आधारित सीरियल देखता रहता था. इसी से आइडिया ले कर उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अगर गुरप्रीत ने उस की बात नहीं मानी तो पूरी प्लानिंग के साथ वह उस की हत्या कर देगा.

इस के लिए जनवरी के अंतिम सप्ताह में उस ने एक चाकू खरीद कर अपने पास रख लिया. उस ने सोचा कि ऐसा कर के वह गुरप्रीत से प्रतिशोध भी ले लेगा और उसे उस के तकाजे से भी मुक्ति मिल जाएगी.  फरवरी की शाम आशीष ने तयशुदा प्लानिंग के तहत गुरप्रीत को फोन कर के मिलने की इच्छा जताई. उस ने उस से रेलवे स्टेशन आने को कहा. गुरप्रीत ने जब आने के लिए हामी भर ली तो आशीष अपनी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. उधर गुरप्रीत अपने 8 वर्षीय बेटे शीतल से कुछ देर में वापस आने की बात कह कर अपनी स्कूटी से आशीष से मिलने पहुंच गई.

आशीष ने उस से प्रेमनगर के चाय बागान की तरफ घूमने चलने को कहा. गुरप्रीत उस पर भरोसा करती थी, इसलिए साथ जाने को तैयार हो गई. आशीष उस की स्कूटी पर पीछे बैठ गया और दोनों करीब आधे घंटे में चाय बागान के पास पहुंच गए.

आशीष ने अपने इरादे के बारे में गुरप्रीत को जरा भी शक नहीं होने दिया. अपने मोबाइल से उस ने गुरप्रीत के साथ सैल्फी खींची. इस के बाद वह मुद्दे पर आते हुए बोला, ‘‘क्या सोचा गुरप्रीत तुम ने?’’

‘‘किस बारे में?’’

‘‘तुम बदलोगी या नहीं?’’

वह उस के इस रवैये से बुरी तरह चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, मुझे अभी वापस जाना है.’’

‘‘नहीं, आज तुम सीधे ऊपर ही जाओगी.’’ कहने के साथ ही आशीष के हाथ हरकत में आ गए. उस ने गुरप्रीत का गला पकड़ कर दबाया और जमीन पर पटक दिया. गुरप्रीत को उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस के खतरनाक इरादों से अंजान गुरप्रीत संभल पाती, उस के पहले ही उस ने चाकू निकाला और उस के गले पर वार कर दिया.

इस से गुरप्रीत की चीख निकल गई. आशीष का वार घातक था. कुछ ही देर में तड़प कर गुरप्रीत की सांसों की डोर टूट गई. इस के बाद वह स्कूटी ले कर वहां से निकल गया. गुरप्रीत की चीख के बाद एकदो लोग वहां पहुंचे. उन्होंने ही पुलिस को इस हत्या की सूचना दी थी. गुरप्रीत की स्कूटी ले कर आशीष सीधा सेवलांकला गया और स्कूटी वहां छोड़ कर टैक्सी स्टैंड पहुंचा, जहां से वह मसूरी चला गया. वहां उस ने होटल में अपनी आईडी जमा कर के कमरा ले लिया. किसी को अंदाजा नहीं था कि वह कत्ल कर के आया है. उस ने रात में शराब पी और चिकन खाया. इस के बाद घंटों आराम किया. अगले दिन वह काफी परेशान रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. दिन भर उस ने आराम किया.

शाम को आशीष ने गुरप्रीत की खबर टीवी पर देखी तो अवसाद से ग्रस्त हो कर खुद भी अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला किया और अपनी बाईं कलाई की नसें काट लीं. संयोग से उसी समय पुलिस ने वहां पहुंच कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस के पहुंचने में देरी होती तो रक्तस्राव से उस की मौत हो सकती थी. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने आशीष को अस्पताल से डिस्चार्ज करा लिया. होटल के प्रबंधक प्रकाश सिंह की तरफ से धारा 309 के अंतर्गत आशीष के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. पुलिस ने उस से गुरप्रीत की हत्या में इस्तेमाल चाकू के बारे में पूछताछ की तो उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. पुलिस ने उसे 7 फरवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

बाद में पुलिस ने 10 फरवरी को हत्यारोपी को एक दिन के रिमांड पर लिया. उस की निशानदेही पर उसी दिन मसूरी रोड स्थित डीयर पार्क की झाडि़यों से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू बरामद हो गया. फिलहाल वह जेल में है. गुरप्रीत अपने परिवार से बेवफाई कर के सनकी स्वभाव के आशीष के प्यार में न पड़ी होती तो शायद इस तरह की नौबत कभी न आती. आशीष जैसे युवक महिलाओं की भावनाओं से खेल कर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और उन्हें मौजमस्ती और कमाई का जरिया बना लेते हैं.

कानून आशीष को क्या सजा देगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक परिवार की खुशियों को उस ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्र

True Crime Story: जब सोई मोहब्बत जागी

True Crime Story: शहाना स्कूल के समय से ही सरफराज से मोहब्बत करने  लगी थी. जब उस की शादी  सरफराज से नहीं हो सकी  तो वह सलीम से निकाह  कर के उस की हो गई,  लेकिन बाद में उस ने  सलीम से भी किनारा  कर लिया. इस के बाद  उस का निकाह नवाब से  हुआ लेकिन अपने प्यार के  चक्कर में उस ने नवाब को  ठिकाने लगवा दिया.

8दिसंबर, 2015 की देर रात उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा में किसी राहगीर ने फोन द्वारा सूचना दी कि शेर अली बाबा की मजार के पास एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. शेरअली बाबा की मजार काशीपुरजसपुर राष्ट्रीय राजमार्ग- 74 के किनारे है. लाश पड़ी होने की सूचना मिलते ही थाना कुंडा के थानाप्रभारी रमेश तनवार तुरंत पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश खून से लथपथ जसपुर की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पड़ी थी. वहीं पर कुछ लोग भी खड़े थे.

थानाप्रभारी ने वहां खड़े लोगों से मरने वाले शख्स की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. पुलिस ने मृतक की जेब की तलाशी ली तो जेब में एक परची मिली. उस पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. वह फोन नंबर किस का है, यह जानने के लिए थानाप्रभारी ने अपने फोन से वह नंबर मिलाया  तो दूसरी तरफ से शहाना नाम की औरत ने फोन रिसीव किया. उन्होंने उस महिला से जानकारी ली तो पता चला कि वह जसपुर के मोहल्ला छिपियान के नवाब की पत्नी शहाना परवीन है.

थानाप्रभारी ने शहाना से उन के पति के बारे में पूछा तो उस ने उलटे थाना प्रभारी से ही सवाल किया, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन बोल रहे हैं और आप मेरे पति को क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘देखिए, मैं थाना कुंडा का थानाप्रभारी बोल रहा हूं. दरअसल हमें शेर अली बाबा की मजार के पास एक आदमी की लाश मिली है. उसी लाश की जेब से यह आप का मोबाइल नंबर मिला है. कहीं यह लाश आप के किसी परिचित की तो नहीं है? आप यहां आ कर लाश को देख लीजिए.’’

थानाप्रभारी ने शहाना को लाश का जो हुलिया बताया था, वह जान कर शहाना रोने लगी, क्योंकि वह हुलिया उस के पति के हुलिए से मिल रहा था. उस का पति नवाब भी घर पर नहीं था. देर रात में अचानक शहाना के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर उस के परिवार वाले और मोहल्ले के कुछ लोग जमा हो गए. नवाब के साथ अनहोनी की बात सुनते ही वे सभी रात में ही शहाना के साथ अली बाबा की मजार के पास पहुंच गए. घटनास्थल पर पड़ी लाश देखते ही शहाना दहाड़े मार कर रोने लगी, क्योंकि वह लाश उस के पति नवाब की थी. उस जगह को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे नवाब का किसी वाहन से एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन उस के घर वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि नवाब वहां तक पहुंचा कैसे?

पुलिस ने नवाब के घर वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि नवाब का हरिद्वार और लक्सर में ट्रांसपोर्ट का काम था. उस के घर आनेजाने का भी कोई नियत समय नहीं था. काम में व्यस्त होने की वजह से वह 2-4 दिनों बाद ही जसपुर आता था. 8 दिसंबर को वह घर जरूर आया था. घर से वह काशीपुर कैसे पहुंचा, इस की किसी को जानकारी नहीं थी. उस समय रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए घर वालों से कुछ जानकारी लेने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भिजवा दिया गया. अगले दिन से पुलिस इस केस की जांचपड़ताल में जुट गई. सुबहसुबह पुलिस फिर से उस जगह पहुंच गई, जहां लाश मिली थी, ताकि वहां से कोई सबूत वगैरह मिल सके.

घटनास्थल के आसपास पुलिस ने काफी खोजबीन की, लेकिन वहां से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस घटना की तह तक पहुंच पाती. मृतक का मोबाइल फोन भी गायब था. पुलिस ने सोचा कि दुर्घटना होने पर नवाब सड़क पर गिर गया होगा और उसे एक्सीडेंट करने वाले ने मजार के पास डाल दिया होगा. पुलिस ने मृतक के घर वालों से एक बार फिर बात की तो उन्होंने बताया कि नवाब एक मिलनसार व्यक्ति था. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. वह उस की दुर्घटना वाली बात को मानने को तैयार नहीं थे. इस पर पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

नवाब के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि 8 दिसंबर को उस की कुछ नंबरों पर बातचीत हुई थी. जिनजिन नंबरों पर उस की बातचीत हुई थी, पुलिस उन नंबरों की जांच में जुट गई. उन में 2 नंबर संदिग्ध नजर आए. जांच के दौरान पता चला कि उन में से एक नंबर रामपुर जिले के गांव बैजनी निवासी खालिद का था, जबकि दूसरा नंबर जिला मुरादाबाद के थाना भगतपुर के गांव बहेड़ी के रहने वाले उस्मान का था.

पुलिस इन दोनों ही व्यक्तियों से पूछताछ करना चाहती थी, इसलिए एसएसपी केवल खुराना ने उन की तलाश कि लिए थानाप्रभारी रमेश सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई अशोक कुमार, कांस्टेबल मनोज कोहली, खेम सिंह, जगत सिंह, शहाना परवीन आदि को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम खालिद और उस्मान के घरों पर गई तो वे दोनों ही अपने घरों से गायब मिले. उन के घरों से पुलिस को उन के बारे में यह जानकारी मिल गई कि दोनों काशीपुर में नौकरी कर रहे हैं.

पता चला कि खालिद हमदम अस्पताल में और उस्मान वहीं के सनराईज अस्पताल में कंपाउंडरी कर रहा है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम काशीपुर पहुंची. लेकिन वे वहां भी नहीं मिले. अस्पताल वालों ने बताया कि वे कई दिनों से अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं. इस के बाद पुलिस को इन दोनों पर शक हो गया. लिहाजा पुलिस ने उन की तलाश के लिए मुखबिर लगा दिए. करीब 2 सप्ताह बाद 25 दिसंबर को पुलिस को सुबहसुबह मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि खालिद और उस्मान कहीं जाने की फिराक में काशीपुर बसअड्डे पर खड़े हैं. यह खबर मिलते ही पुलिस टीम तुरंत बस अड्डे पर पहुंच गई. दोनों वहां एक बैंच पर बैठे मिल गए.

पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस कुंडा थाने ले आई. वहां उन से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों जल्दी ही टूट गए. दोनों ने स्वीकार कर लिया कि नवाब की हत्या उन्होंने नवाब की पत्नी शहाना के प्रेमी सरफराज के कहने पर की थी. सरफराज एक प्रतिष्ठित परिवार से था. पुलिस बिना सबूत के उसे गिरफ्तार करना नहीं चाहती थी. इसलिए पुलिस ने सब से पहले सरफराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह दिन में करीब 40 बार बात करता था.

जांच में पता चला कि वह नंबर उसी मोहल्ले की रहने वाली शहाना का है. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि सरफराज और शहाना के बीच जरूर प्रेमसंबंध रहे होंगे, तभी तो वे फोन पर इतनी ज्यादा बातें करते हैं. यानी खालिद और उस्मान ने पुलिस को जो बात बताई थी, उस में सच्चाई नजर आने लगी. इस से पुलिस को कुछ और ही कहानी नजर आने लगी. सरफराज जसपुर के ही मोहल्ला छिपियान में रहता था. पुलिस उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस को देखते ही उस के होश उड़ गए. पुलिस पूछताछ के लिए उसे भी थाने ले आई.

पुलिस ने सरफराज से पूछताछ की तो उस ने साफ कह दिया कि उस का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. इस पर पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स उस के सामने रखी. जिस में उस की शहाना से एक साल में 12995 बार बातें हुई थीं. अब सच्चाई सरफराज के सामने थी, जिसे वह झुठला नहीं सकता था. फिर भी वह खुद को बचाने के लिए यही कहता रहा कि उस की शहाना से दोस्ती है, इसलिए वह उस के साथ इतनी बातें फोन पर करता था. लेकिन नवाब की हत्या से उस का कोई संबंध नहीं है.

इस के बाद पुलिस टीम मृतक नवाब की पत्नी शहाना को पूछताछ के लिए थाने ले आई. शहाना भी पुलिस को घुमाने की कोशिश में लगी रही. लेकिन पुलिस ने जब उसे बताया कि उस का प्रेमी सरफराज पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया है तो शहाना को सांप सूंघ गया. पुलिस उसे सरफराज के पास ले आई. दोनों को आमनेसामने बैठा कर बात की गई तो सरफराज टूट गया. उस ने बताया कि शहाना के कहने पर ही उस ने नवाब को ठिकाने लगवाया था. इस के बाद दोनों ने ही अपना गुनाह कबूल कर लिया. इन दोनों के प्यार से ले कर नवाब की हत्या तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तराखंड के जसपुर शहर के मोहल्ला छिपियान में हाजी फिदा हुसैन का परिवार रहता था. मुसलिम बाहुल्य इस शहर के अधिकांश मुसलिमों का लकड़ी का व्यापार है. फिदा हुसैन का भी लकड़ी का व्यापार था. उन के परिवार में 7 सदस्य थे. शहाना इन की दूसरे नंबर की बेटी थी. वह शुरू से ही पढ़ाईलिखाई में तेज थी. इसीलिए मदरसे की पढ़ाई के बाद फिदा हुसैन ने उस का दाखिला फैजएआम इंटर कालेज में करा दिया था. सरफराज ने भी उसी कालेज में दाखिला लिया था. इस से पहले भी वह मदरसे में शहाना के साथ ही पढ़ता था.

सरफराज फिदा हुसैन के घर के पास अगले नुक्कड़ पर रहने वाले शब्बीर मास्टर का बेटा था. पड़ोसी होने के नाते दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. शब्बीर मास्टर का छोटा परिवार था. शब्बीर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. उन के परिवार में 3 बेटे थे, जिन में सरफराज सब से छोटा था. शब्बीर मास्टर तेजतर्रार व्यक्ति थे. इसलिए मोहल्ले क्या, शहर की पूरी बिरादरी में उन की अच्छी जानपहचान थी.

शब्बीर मास्टर अपने दोनों बेटों की शादी कर चुके थे. सरफराज अभी पढ़ रहा था, इसलिए उन्हें उस की ज्यादा चिंता नहीं थी. सरफराज के इंटरमीडिएट करने के बाद शब्बीर मास्टर ने उस के सामने शादी की बात रखी तो उस ने साफ कह दिया कि जब तक वह कोई कामधंधा नहीं कर लेता, शादी नहीं करेगा. उधर शुरू से साथसाथ पढ़ने के कारण शहाना और सरफराज के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. उन की दोस्ती प्यार में बदल गई थी. और तो और दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं.

उसी दौरान किसी के माध्यम से शब्बीर मास्टर को पता चला कि सरफराज और शहाना के बीच चक्कर चल रहा है. वह समझ गए कि सरफराज शादी के लिए मना क्यों कर रहा है. उन्होंने इस बारे में सरफराज से बात की तो उस ने कह दिया कि वह शहाना से प्यार करता है और उसी से निकाह करना चाहता है. शब्बीर मास्टर ने बेटे की खुशी के लिए शहाना के अब्बू फिदा हुसैन से बात भी की, पर वह तैयार नहीं हुए.

फिदा हुसैन की समाज में अच्छीखासी इज्जत थी. बेटी वाली बात कहीं समाज में न फैल जाए, इसलिए वह उस के लिए अच्छा लड़का तलाशने लगे, ताकि जल्द से जल्द उस की शादी कर सकें. थोड़ी भागादौड़ी कर के उन्हें उस के योग्य वर मिल भी गया. जसपुर के तत्कालीन चेयरमैन मोहम्मद उमर के बेटे सलीम से उन्होंने शहाना की शादी तय कर दी. अच्छी हैसियत वाले परिवार में शादी तय होने के बाद घर वाले गदगद थे. फिदा हुसैन इस बात से खुश थे कि उन की बेटी इतने संपन्न परिवार में खुश रहेगी.

शादी तो तय हो गई, लेकिन फिदा हुसैन को दुविधा इस बात की थी कि कहीं शहाना शादी करने से मना न कर दे. यदि उस ने ऐसा कर दिया तो बिरादरी में उन की किरकरी हो जाएगी. इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिदा हुसैन ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों को बुला कर शहाना को समझाने के लिए कहा. रिश्तेदारों के समझाने पर शहाना सलीम से शादी करने के लिए तैयार तो हो गई, लेकिन उस का दिल सरफराज पर ही लगा रहा. इस के बाद फिदा हुसैन ने शादी की तैयारी शुरु कर दी. उधर जब सरफराज को पता चला कि शहाना की शादी किसी और के साथ होने वाली है तो वह परेशान हो गया. उस ने शहाना से बात की तो शहाना ने कह दिया कि घर वालों और रिश्तेदारों की हठ के आगे उसे मजबूर होना पड़ा. शहाना का फैसला सुन कर सरफराज को दुख हुआ.

उधर बड़ी धूमधाम के साथ शहाना और सलीम का निकाह हो गया. यह सन 1997 की बात है. उस के निकाह के बाद सरफराज परेशान रहने लगा. वह शहाना से फोन पर बातें करता रहता था. शहाना भले ही सलीम की पत्नी बन गई थी लेकिन सरफराज के साथ गुजारे पलों की यादें उस के दिल से अभी भी धूमिल नहीं हो पाई थीं.

वह जब कभी मायके आती, उस की निगाहें हर वक्त सरफराज की राहों पर जमी रहतीं. इत्तफाक से कभी दोनों आमनेसामने पड़ जाते तो एकदूसरे के लिए तड़प उठते. मौका मिलने पर दोनों मुलाकात भी कर लेते. यही वजह थी कि शहाना मायके आने के बाद ससुराल नहीं जाना चाहती थी. वह सरफराज के प्यार में पागल सी हो गई थी. यह बात सलीम को पता चली तो वह परेशान हो उठा. सलीम ने शहाना को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. जब शहाना नहीं मानी तो उस ने उस के साथ रिश्ता तोड़ दिया.

सलीम से रिश्ता टूटने के बाद सरफराज बहुत खुश हुआ. उसे उम्मीद थी कि अब तो उसे उस का खोया प्यार मिल जाएगा. फिदा हुसैन पहले से ही बेटी के कारनामों से तंग आ चुके थे. दोनों के मिलनेजुलने से मोहल्ले वालों ने उन का मोहल्ले में रहना दूभर कर दिया. शहाना अपने अब्बू पर सरफराज से निकाह कराने का दबाव डाल रही थी, लेकिन फिदा हुसैन को सरफराज से इतनी नफरत हो गई थी कि वह किसी भी कीमत पर उस से शहाना का निकाह करने को तैयार नहीं थे.

शहाना फिर से सरफराज की मोहब्बत में पागल हो गई थी. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो अंत में फिदा हुसैन ने शब्बीर मास्टर से इस बारे में बात कर के सरफराज की शादी कहीं और करने की बात कही. शब्बीर मास्टर समझदार व्यक्ति थे. वह जानते थे कि समाज में इंसान की इज्जत की क्या कीमत होती है. यही सोच कर उन्होंने जल्दी ही सरफराज के लिए बिजनौर के स्योहारा कस्बे में एक लड़की देखी और उस का निकाह करा दिया.

सरफराज ने पिता के दबाव में शादी तो कर ली, लेकिन वह अपने दिल से शहाना को नहीं निकाल सका. लेकिन सरफराज के शादी करने की बात शहाना को बहुत बुरी लगी. उस ने उस से मिलनाजुलना बिलकुल बंद कर दिया. इस के बाद सरफराज भी अपनी गृहस्थी के चक्कर में फंस गया और कुछ दिनों के लिए शहाना को भूल गया. जवान बेटी के घर बैठने पर फिदा हुसैन भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने अपनी पत्नी हुसना से कहा कि वह शहाना को दूसरे निकाह के लिए तैयार करे. शहाना सरफराज की मोहब्बत से टूट चुकी थी. वह यह भी जानती थी कि सारी जिंदगी मांबाप के सीने पर मूंग तो नहीं दली जा सकती.

उस ने अपने घर वालों की परेशानी समझ कर दूसरे निकाह के लिए हामी भर दी. शहाना के शादी के लिए तैयार होते ही उस के अब्बू फिदा हुसैन ने फिर से उस के लिए सही लड़का देखना शुरू कर दिया. उसी दौरान उन के एक करीबी रिश्तेदार ने जसपुर के ही मोहल्ले जटवारा के इमरान चौक में रहने वाले मोहम्मद असलम के बेटे नवाब के बारे बताया. नवाब का ट्रांसपोर्ट का अपना काम था. नवाब के कुल मिला कर 6 भाई और 4 बहनें थीं. भले ही मोहम्मद असलम का परिवार बड़ा था, लेकिन उस के सभी बेटे अपनेअपने काम से लगे हुए थे. शादी की बात पक्की होने के बाद 17 मई, 2000 को बड़ी धूमधाम के साथ नवाब और शहाना का निकाह हो गया.

शहाना नवाब के साथ निकाह कर के खुश थी. वह अपनी पुरानी जिंदगी भूल कर नई जिंदगी जीना चाहती थी. नवाब का अपना अच्छा कारोबार था. आमदनी भी अच्छी थी, इसलिए दोनों हंसीखुशी से रह रहे थे. शहाना परवीन लिखीपढ़ी थी, इसलिए उसे आंगनबाड़ी में सहायिका की नौकरी मिल गई. वह आसपास के बच्चों को पढ़ाने लगी. कहते हैं कि वक्त को बदलते देर नहीं लगती. शहाना के आंगनबाड़ी में लगते ही उस का फिर से घर से बाहर आनाजाना शुरू हो गया. उसी दौरान एक दिन उस का आमनासामना फिर से सरफराज से हो गया. सरफराज को सामने से आते देख शहाना ने उस से बचने की कोशिश की, लेकिन सरफराज उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

उस दिन सरफराज ने उस से केवल हालचाल पूछा और वहां से चला गया. लेकिन इस छोटी सी मुलाकात ने शहाना के दिल में पुरानी मोहब्बत को चिंगारी दिखा दी. शहाना कई दिनों तक उस की यादों में जीती रही. उस ने कई बार उस मुलाकात को भूलने की कोशिश की, लेकिन भुला नहीं सकी. हालांकि शहाना और सरफराज दोनों ही एकएक बच्चे के मांबाप बन चुके थे, लेकिन उन के दिलों में पुरानी मोेहब्बत शायद अभी भी जिंदा थी. दोनों के दिलों में छिपी मोहब्बत फिर से जागी तो वे फिर चोरीछिपे मिलने लगे. आंगनबाड़ी के बहाने शहाना कई घंटों तक घर से बाहर रहती थी. उसी दौरान मौका निकाल कर वह सरफराज के साथ इधरउधर मौजमस्ती करने लगी.

उसी बीच शहाना दूसरी बच्ची की भी मां बन गई. लेकिन अब उस का सरफराज से मिलनाजुलना और भी ज्यादा हो गया था. शहाना नवाब का भी पूरा ख्याल रखती थी. इसलिए वह उस पर पूरा भरोसा करता था. लेकिन उसे पता नहीं था कि पत्नी उस की पीठ पीछे क्या गुल खिला रही है? शहाना अपने मकान की ऊपरी मंजिल पर अकेली ही रहती थी. उस का पति नवाब अपने काम से चला जाता और उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं.

इसी का लाभ उठा कर वह हर वक्त सरफराज से मोबाइल पर बतियाती रहती थी. जब उस के मोबाइल में बैलेंस खत्म हो जाता तो सरफराज रिचार्ज करा देता. उसी दौरान सरफराज ने नवाब से भी दोस्ती बढ़ा ली, ताकि वह उस के घर बिना किसी झिझक के आजा सके. लेकिन नवाब उस के मंसूबों को समझ नहीं पाया. नवाब के भाई जसपुर में ट्रांसपोर्ट का धंधा चलाते थे. इस धंधे में अच्छी कमाई थी, इसलिए नवाब ने हरिद्वार के लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. धंधे की वजह से वह अकसर घर से बाहर रहता था. ट्रांसपोर्ट के काम के साथ नवाब ने प्रौपर्टी खरीदनेबेचने का काम भी शुरू कर दिया था. इसी का लाभ उठाते हुए सरफराज और शहाना मौजमस्ती कर रहे थे.

उसी दौरान सरफराज ने भी नवाब के सहयोग से लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. सरफराज ने कुछ दिनों में नवाब के साथ इतनी गहरी दोस्ती कर ली कि वह हर वक्त उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था. सरफराज कभीकभी नवाब के जिम्मे अपना औफिस छोड़ कर जसपुर आ जाता और शहाना के साथ मौजमस्ती करता. नवाब की हत्या से लगभग 5-6 महीने पहले सरफराज ने शहाना से कहा, ‘‘शहाना क्यों न हम आपस में शादी कर लें.’’

‘‘हम दोनों पहले से ही शादीशुदा हैं तो फिर यह आफत मोल लेने से क्या फायदा?’’ शहाना बोली, ‘‘सरफराज, तुम यह बात तो जानते ही हो कि नवाब के जीवित रहते मैं भला तुम्हारे साथ निकाह कैसे कर सकती हूं. यदि तुम यह चाहते हो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा.’’

सरफराज अब शहाना के दिल की बात जान गया था. उस ने पक्का मन बना लिया कि शहाना को पाने के लिए वह कुछ भी करेगा. उधर शहाना भी सरफराज की मोहब्बत में पागल सी हो गई थी. वह यह भी भूल गई थी कि नवाब उसे कितना चाहता है. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद उस की अच्छाबुरा सोचने की शक्ति पर पानी फिर गया था. इसी पागलपन में वह नवाब को अपने और सरफराज के बीच से हटाने के लिए भी राजी हो गई. अब से लगभग ढाई महीने पहले सरफराज का ड्राइवर मकसूद हादसे में घायल हो गया था. उसे इलाज के लिए काशीपुर के हमदम अस्पताल में भरती कराया गया था. यहीं पर सरफराज की मुलाकात खालिद व उस्मान से हुई. हालांकि खालिद और उस्मान दोनों अलगअलग अस्पतालों में काम करते थे, लेकिन दोनों में अच्छी दोस्ती थी.

खालिद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बैजनी गांव का था और उस्मान मुरादाबाद के रोशनपुर बहेड़ी गांव का था. खालिद ओटी टैक्नीशियन था तो उस्मान कंपाउंडर. उसी दौरान बातोंबातों में सरफराज ने उस्मान और खालिद के सामने जिक्र करते हुए पूछा कि कोई ऐसी भी दवा आती है, जिस के प्रयोग से इंसान खत्म हो जाए और किसी को पता भी न चले. इस पर खालिद ने बताया, ‘‘भाई काम सब हो जाते हैं, लेकिन उस के लिए कुछ खर्च करना पड़ता है. यह काम बहुत ही रिस्की होते हैं. आप को अगर किसी का काम कराना है तो पूरे एक लाख रुपए खर्च करने होंगे.’’

सरफराज के लिए एक लाख रुपए कोई मायने नहीं रखते थे. अपने प्यार को पाने के लिए वह कुछ भी खर्च करने को तैयार था. उस ने दोनों को 75 हजार रुपए दे कर नवाब की मौत का सौदा तय कर लिया. बाकी के 25 हजार रुपए उन्होंने काम हो जाने के बाद देने को कह दिया. बातचीत हो जाने के बाद सरफराज ने खालिद और उस्मान को प्रौपर्टी डीलर बताते हुए नवाब से उन की मुलाकात करा दी. उस ने नवाब से कह दिया कि यदि वह किसी प्रौपर्टी का सौदा इन से कराते हैं तो अच्छा कमीशन मिलेगा. नवाब खुश हो गया कि प्रौपर्टी बिकवाने पर उसे अतिरिक्त आमदनी होगी. नवाब शराब पीता ही था, इसलिए उस्मान और खालिद ने नवाब से दोस्ती गांठते हुए उसे शराब भी पिलानी शुरू कर दी.

8 दिसंबर, 2015 को योजना के अनुसार, सरफराज नवाब को साथ ले कर खालिद और उस्मान के पास काशीपुर पहुंचा. नवाब को उन दोनों के पास छोड़ कर वह खुद शहर में कुछ काम होने का बहाना कर के वहां से खिसक लिया. सरफराज के जाने के बाद उस्मान और खालिद ने नवाब को रामनगर रोड पर सड़क के किनारे ही शराब पिलाई. शराब पीने के बाद तीनों सनराइज अस्पताल पहुंचे. उस्मान उसी अस्पताल में कंपाउंडर था. उस ने अस्पताल के मालिक डा. सम्स से जसपुर जाने की बात कह कर उन की नैनो कार मांगी. डा. सम्स ने उसे अपनी कार दे दी. नवाब को उस कार में बिठा कर तीनों जसपुर की ओर चल दिए.

नवाब पर शराब का नशा चढ़ गया था. उसी का लाभ उठाते हुए दोनों ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इंजेक्शन के लगते ही नवाब बेहोश हो कर सीट पर लुढ़क गया. इस के बाद शेर अली बाबा की मजार के पास कार रोक कर उन्होंने उसे ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाला 10 एमएल का पूरा इंजेक्शन लगा दिया और फिर उसे चलती कार से सड़क पर फेंक दिया. बाद में उन्होंने उसी कार से उसे 2-3 बार बेरहमी से कुचल दिया, जिस के बाद नवाब की मौके पर ही मौत हो गई. सरफराज ने घटना वाले दिन ही उस्मान को शहाना का नंबर लिख कर दे दिया था, जो उन्होंने नवाब की जेब में रख दिया था. जिस से पुलिस उस के घर वालों तक आसानी से पहुंच सके. उसी के द्वारा पुलिस ने शहाना को फोन कर के दुर्घटना वाली बात बताई थी.

नवाब को मौत के घाट उतारने के बाद उस्मान और खालिद, दोनों ही काशीपुर वापस चले आए थे. इस घटना को अंजाम देने के बाद ही उस्मान ने मोबाइल से सरफराज को बता दिया था कि उस का काम हो गया है. इस घटना के बाद से खालिद और उस्मान के साथसाथ सरफराज ने भी अपना मोबाइल बंद कर लिया था. सरफराज ने नवाब को मारने की सूचना शहाना परवीन को भी दे दी थी. इस केस का खुलासा होते ही पुलिस ने भादंवि की धारा 302/120 के तहत मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

एसएसपी केवल खुराना ने इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 2,500 रुपए का इनाम देने की घोषणा की थी. वहीं मृतक के घर वालों ने भी पुलिस को 5 हजार रुपए बतौर इनाम दिए. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Story: इश्क की राह में भटकी औरत

Love Story: जिस महेश के लिए राधा ने पति से बेवफाई की, उसी महेश की नीयत जब उस की 14 साल की बेटी पर बिगड़ी तो भला राधा इस बात को कैसे बरदाश्त करती. फिर उस ने जो किया, क्या वह ठीक था

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर देहात के थाना झीझंक का एक गांव है महेवा. इसी गांव में राम सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी राधा थी. राम सिंह घी का कारोबार करता था. वह गांवगांव जा कर लोगों के यहां से घी खरीदता और उसे ले जा कर कानपुर में बेच आता. इस से उसे जो फायदा होता, उसी से उस के परिवार की गुजरबसर होती थी.

राम सिंह की बेटी राधा सुंदर होने के साथसाथ थोड़ी चंचल भी थी. इसलिए सयानी होने पर गांव का हर लड़का उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लग गया था. जब यह सब राम सिंह ने देखा तो उसे लगा कि अब जल्दी ही राधा की शादी कर देनी चाहिए. उस ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू की तो उसे गांव बेलूपुर में एक लड़का मिल गया.

लड़के का नाम अजय था. उस के पिता लाखन सिंह के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. इसी वजह से उस की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. बातचीत शुरू हुई तो राधा और अजय का रिश्ता तय हो गया. इस रिश्ते में अगर कोई खटकने वाली बात थी तो यह कि अजय सांवला था, जबकि राधा गोरी थी. इस के बावजूद अजय का पलड़ा भारी था, क्योंकि उस के पास 10 बीघा जमीन थी. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई.

अजय तो सुंदर पत्नी पा कर खुश था, जबकि राधा अपने सांवले पति से खुश नहीं थी. शादी के पहले उस के मन में पति की जो छवि थी, अजय उस में कहीं भी फिट नहीं बैठता था. लेकिन अब विवाह हो गया था, इसलिए साथ तो रहना ही था. धीरेधीरे राधा एक बेटी अर्पिता और 2 बेटों जय तथा विजय की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी राधा में कोई बदलाव नहीं आया था. उस के मन में न तो बच्चों के प्रति वह मोह जागा था, जो एक मां को अपने बच्चों के प्रति होता है और न ही पति के प्रति वह चाहत जागी थी, जो जागनी चाहिए थी. पत्नी की इस उपेक्षा से अजय काफी दुखी था.

इस दुख को कम करने के लिए वह शराब पीने लगा. जब वह पक्का शराबी हो गया तो खेतीकिसानी से उस का मन हट गया. उसे लगता था कि आखिर वह किस के लिए मेहनत करे. जब वह पूरी तरह से निठल्ला हो गया तो मांबाप ने उसे अलग कर दिया. गांव में अजय का एक और अन्य मकान था, इसलिए मांबाप से अलग होने पर उसे कोई परेशानी नहीं हुई. वह पत्नी और बच्चों के साथ उसी मकान में रहने लगा. वह मेहनत कर नहीं सकता था, इसलिए बाप से मिली जमीन उस ने बटाई पर दे दी.

राधा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अब भी उस की सुंदरता में जरा भी कमी नहीं आई थी. बल्कि शरीर भर गया था, इसलिए वह पहले से भी ज्यादा सुंदर लगने लगी थी. स्वभाव से हंसमुख और चंचल राधा का मन घरगृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि वह कभी अजय को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाई. शायद इसी वजह से उस का मन भटकता रहता था. राधा की सुंदरता और चंचलता की वजह से गांव के महेश का दिल उस पर आ गया था. वह उस तक पहुंचने का तिकड़म भिड़ाने लगा था.

3 भाइयों में महेश सब से बड़ा था. उस के पिता भवानी सिंह ने उस का विवाह शिवली कस्बा की रहने वाली रजनी से कर दिया था. लेकिन अपनी आशिकमिजाजी की वजह से वह पत्नी का हो कर नहीं रह सका. वह इधरउधर मुंह मारता फिरता था. गांव की कई महिलाओं से उस के संबंध थे. लेकिन उन के बारे में कोई नहीं जान सका. राधा पर वह पूरी तरह से मोहित था. इसलिए उस तक पहुंचने के लिए उस ने उस के खेत बटाई पर ले लिए. इस से उसे राधा के घर आनेजाने में आसानी हो गई थी. वह जब भी राधा के घर जाता, मौका मिलने पर उस से हंसीमजाक करने से नहीं चूकता.

राधा भी उस से खुल कर हंसीमजाक करती थी. एक दिन महेश आया तो अजय घर में नहीं था. राधा को अकेली पा कर उस के दिल की धड़कन बढ़ गई. वैसा ही कुछ हाल राधा का भी था. उस ने इठलाते हुए कहा, ‘‘आओ देवरजी, कैसे आना हुआ?’’

‘‘खेतों पर काम कर रहा था, अचानक तुम्हारी याद आई तो मन मचल उठा. पहले तो उसे मनाने की कोशिश की, जब वह नहीं माना तो यह सोच कर चला आया कि चल कर प्यारी भाभी का दीदार कर लूं. कभीकभी सोचता हूं कि इतनी सुंदर भाभी कालेकलूटे अजय भैया के पल्ले कैसे पड़ गईं?’’

‘‘अपनाअपना नसीब है देवरजी. मेरी तकदीर में यही लिखा था.’’ राधा ने लंबी सांस ले कर कहा.

राधा के इस जवाब से महेश को लगा कि उस का तीर सही निशाने पर लगा है. वह उस के एकदम करीब आ कर बोला, ‘‘नसीब अपने हाथ में होता है भाभी, मैं आप से प्यार करता हूं. मैं कोई पराया तो हूं नहीं. वैसे भी मैं न जाने कब से तुम्हारी खूबसूरती का दीवाना हूं.’’

‘‘देवरजी, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं वह आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे?’’ राधा ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

महेश ने उसे बांहों में भर कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, पर खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’

राधा को बांहों में भरते ही उस ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी. राधा ने उस की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया. इस की वजह यह थी कि वह भी यही चाहती थी. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भूखे भेडि़ए की तरह क्यों टूटे पड़ रहे हो, थोड़ा सब्र से काम लो, दरवाजा खुला है. वैसे भी तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक नहीं है.’’

महेश समझ गया कि राधा को कोई आपत्ति नहीं है. इस का उस ने पूरा फायदा उठाया और अपने तथा राधा के बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. इस तरह राधा के कदम एक बार बहके तो बहकते चले गए. मौका मिलते ही महेश राधा के घर आ जाता. राधा भी हर तरह से उस का सहयोग कर रही थी. इस की वजह यह थी कि वह उस के पति से हर मायने में इक्कीस था. महेश और राधा का यह अवैध संबंध चोरीछिपे सालों तक चलता रहा, किसी को पता नहीं चला. आखिर कब तक उन का यह गलत संबंध छिपा रहता. वे समय के साथ लापरवाह होते गए, परिणामस्वरूप एक दिन अजय ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उन के बीच यह खेल काफी दिनों से चल रहा है.

महेश चूंकि दबंग स्वभाव का था, इसलिए अजय ने उस से सीधे टकराना ठीक नहीं समझा. उस के जाने के बाद उस ने राधा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘शरम आनी चाहिए तुम्हें यह सब करते हुए. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद तुम नीचता पर उतर आई हो.’’

इस के बाद जब दोनों में तूतूमैंमैं शुरू हुई तो बात बढ़ती गई. इस के बाद अजय ने राधा की जम कर पिटाई कर दी. लेकिन इस पिटाई के बाद भी राधा ने महेश को नहीं छोड़ा. वह महेश की इतनी दीवानी हो चुकी थी कि जब उसे घर में उस से मिलने का मौका नहीं मिलता तो वह किसी न किसी बहाने खेतों पर जा कर उस से मिल लेती. जब इस का पता अजय को चलता तो वह शराब पी कर राधा और महेश को खूब गालियां देता.

ज्यादा शराब पीने की वजह से अजय बीमार पड़ गया. राधा ने कानपुर ले जा कर उस का इलाज कराया. समय पर सही इलाज मिलने से अजय ठीक हो गया. उस के इलाज में सारा पैसा महेश ने लगाया था, इसलिए वह उस के एहसान तले दब गया. अब उस ने महेश से समझौता कर लिया कि वह उस के और राधा के बीच में बाधा नहीं बनेगा. इस के बाद महेश ने उस की नौकरी झीझंक कस्बा में एक आढ़ती के यहां लगवा दी. अजय सुबह 11 बजे घर से निकलता तो शाम को ही वापस आता. कभीकभी काम ज्यादा होता तो वह आढ़त पर ही रुक जाता.

अब तक राधा की बेटी अर्पिता 14 साल की हो चुकी थी. वह भी मां की तरह सुंदर और चंचल थी. गांव के रिश्ते के नाते वह महेश को भइया कहती थी. मां और महेश के संबंधों की उसे जानकारी थी. लेकिन मां के डर की वजह से वह विरोध नहीं कर पाती थी. इस की एक वजह यह भी थी कि स्कूल की फीस से ले कर बाकी के उस के सारे खर्च महेश ही उठाता था. शायद इसीलिए वह अपनी जुबान बंद रखती थी.

एक दिन अजय ने घर से जाते समय राधा से कहा कि रात को वह घर नहीं आ पाएगा, इसलिए वह बच्चों के साथ खाना खा कर सो जाए. शाम ढलते ही राधा ने महेश को फोन कर के बता दिया कि वह जल्दी से घर आ जाए. आज की पूरी रात उन की अपनी है. क्योंकि अजय घर नहीं आएगा. राधा की बात सुन कर महेश बहुत खुश हुआ. रात 10 बजे के आसपास वह शराब के नशे में झूमता हुआ राधा के घर पहुंचा. अब तक राधा ने बच्चों को खिलापिला कर दूसरे कमरे में सुला दिया था. महेश ने आते ही राधा को बांहों में भरा और उस के साथ कमरे में चला गया.

आधी रात के बाद महेश लघुशंका के लिए कमरे से बाहर निकला तो उस की नजर दूसरे कमरे में सो रही अर्पिता पर पड़ी. उस को उस रूप में देख कर महेश की सांसें तेज हो गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा. उस के बाद लघुशंका कर के लौटा तो एक बार फिर उस की नजरें अर्पिता कर टिक गईं.

उस की नीयत खराब  होने लगी. वह राधा के कमरे में आया तो देखा राधा सो रही थी. अब तक उस की नीयत पूरी तरह खराब हो चुकी थी. वह लौटा और जा कर अर्पिता के बगल में लेट गया. उस ने अर्पिता से छेड़छाड़ की तो उस की नींद खुल गई. उस ने चीखना चाहा. लेकिन महेश ने उस के मुंह पर हाथ रख कर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘चुप रह, मैं हूं महेश.’’

‘‘महेश भइया तुम? यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘चुप रह, मैं जो करने जा रहा हूं, इस में बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘नहीं भइया, यह गलत है. आप को जो करना है, मम्मी के साथ करो. मेरे साथ कुछ किया तो शोर मचा दूंगी.’’ अर्पिता ने धमकाया तो महेश डर गया और चुपचाप राधा के कमरे में चला गया.

अर्पिता राधा से ज्यादा सुंदर थी, इसलिए वह महेश के दिलोदिमाग में बस गई. अर्पिता को पाने के लिए वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. इस छेड़छाड़ का परिणाम यह निकला कि अर्पिता को भी मजा आने लगा. अब वह भी महेश के आने का इंतजार करने लगी. महेश अर्पिता के साथ कुछ कर पाता, इस से पहले ही एक दिन राधा ने उसे अर्पिता से छेड़छाड़ करते देख लिया. उस के बाद तो राधा महेश पर बिफर पड़ी, ‘‘मेरी फूल सी बच्ची को बरगलाने में तुम्हें शरम नहीं आई, मैं ने पति से बेवफाई कर के तुम्हारा साथ दिया, जबकि तुम मेरी ही बेटी को बरबाद करने पर तुले हो. कान खोल कर सुन लो, आज के बाद तुम ने उसे बरगलाने की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा.’’

राधा की धमकी का महेश पर कोई असर नहीं हुआ. उसे जब भी मौका मिलता, वह अर्पिता के साथ छेड़खानी कर बैठता. एक दिन तो हद हो गई, महेश ने राधा के सामने ही अर्पिता को अपनी बांहोें में भर लिया. इस के बाद तो राधा आपा खो बैठी. उस ने महेश और अर्पिता दोनों की पिटाई कर दी. इस के बाद राधा और महेश में जम कर कहासुनी हुई. राधा की समझ में आ गया कि महेश ऐसा सांप है, जो किसी भी दिन उस की बेटी को डंस सकता है, इसलिए उस ने इस सांप का फन कुचलने का निश्चय कर लिया.

14 दिसंबर, 2015 की सुबह राधा थाना झीझंक पहुंची और थानाप्रभारी आर.के. सिंह को बताया कि बेलूपुर के रहने वाले महेश ने उस के घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. उस की इस सूचना पर आर.के. सिंह पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. उस समय राधा के घर के बाहर भीड़ लग चुकी थी. भीड़ को हटा कर थानाप्रभारी वहां पहुंचे, जहां महेश फांसी के फंदे से झूल रहा था. महेश जीने की ग्रिल से लटका था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे. पहली ही नजर में फांसी लगाने जैसा कोई लक्षण नजर नहीं आ रहा था. न तो उस के मुंह से झाग निकला था और न ही मलमूत्र निकला था. शक होने पर आर.के. सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

उन्होंने राधा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि महेश ने उस के खेत बटाई पर ले रखे हैं, इसलिए उस का उस के घर आनाजाना था. उस के पति अजय के नौकरी पर जाने के बाद महेश आया और उस की साड़ी का फंदा बना कर ग्रिल से झूल गया. उस ने महेश को न आते देखा और न फांसी पर झूलते देखा. आर.के. सिंह ने मृतक महेश के पिता भवानी सिंह से पूंछतांछ की तो फफकफफक कर रोते हुए उस ने बताया कि महेश की हत्या राधा और उस के पति अजय ने की है. पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश को फंदे पर लटकाया गया है. हत्या की वजह राधा और मेहश के बीच अवैध संबंध हैं.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो आर.के. सिंह चौंके. क्योंकि महेश की मौत गला दबाने से हुई थी. उस ने आत्महत्या नहीं की थी. चूंकि शक के घेरे में राधा और उस का पति अजय था, इसलिए वह उन्हें हिरासत में ले कर थाने ले आए और पूछताछ की. अजय ने बताया कि वह घर पर नहीं था, इसलिए महेश की हत्या किस ने की, उसे पता नहीं है. अजय ने हत्या करने से साफ मना कर दिया तो आर.के. सिंह ने राधा से पूछताछ की. पहले तो वह उन्हें गुमराह करती रही, लेकिन जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और महेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि उस के और महेश के बीच पिछले कई सालों से संबंध थे. उस के प्यार में अंधी हो कर उस ने पति तक से बेवफाई कर डाली. तब उसे पता नहीं था कि उस की यह बेवफाई उस की बेटी की जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी. महेश उस की बेटी अर्पिता पर बुरी नजर डाल रहा था. राधा ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने साजिश रच कर 14 दिसंबर की सुबह 4 बजे जब अजय काम पर चला गया तो महेश को बुला लिया. आते ही महेश ने जैसे ही उसे पकड़ा, उस ने उस के नाजुक अंग को दांतों से काट लिया.

वह दर्द से तड़पने लगा तो वह उस की छाती पर सवार हो गई और साड़ी से उस का गला घोंट दिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस ने उस की लाश को फंदे से जीने की ग्रिल से लटका दिया. उस के बाद थाने जा कर पुलिस को सूचना दे दी. राधा के इसी बयान के आधार पर आर.के. सिंह ने मृतक के पिता भवानी सिंह की ओर से अपराध संख्या 347/2015 पर महेश की हत्या का मुकदमा राधा के खिलाफ दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

17 दिसंबर, 2015 को थाना झीझंक पुलिस ने राधा को कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. चूंकि अजय निर्दोष था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया. Love Story

 

ExtraMarital Affair: अवैध संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

ExtraMarital Affair: विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

crime

अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

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वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी. ExtraMarital Affair

Short Hindi Story: सब्र की सीमा

Short Hindi Story: हर बात की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाएगा. प्रेम और धोखेबाजी की एक दुखांत कथा…

राजेंद्र तिवारी ने क्याक्या सपने नहीं संजोए थे, क्याक्या नहीं सोचा था, अपने लिए…उस के लिए और अपने भावी जीवन के लिए. जबकि वह जानता था कि सपने कभी सच नहीं होते, अपना सोचा कभी पूरा नहीं होता. शायद यही वजह थी कि आज उसे उस का खून अपने ही हाथों करने पर मजबूर होना पड़ा. दरअसल इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता शायद उसे सूझा ही नहीं.  शादी के 10 महीनों का जीवन उस के लिए नारकीय था. हर पल उस की यही कोशिश रही कि यह जीवन किसी तरह सुखमय हो जाए. लेकिन कलयुग में शायद यह उस के लिए संभव नहीं था.

उस ने विश्वास किया तो दगा मिली. प्यार दिया तो घृणा हाथ लगी. जहर का घूंट पीतेपीते वह पूरी तरह थक चुका था. जब सहन की सीमा पार हो गई तो वह कर बैठा, जो कानून की नजरों में अपराध था. उस का कहना था कि यह अपराध तो बहुत पहले हो चुका होता, अगर वह गांधीवादी सोच का न होता. इतना घृणित दृश्य देखने के बाद शायद ही कोई अधिक समय तक चुप बैठता. लेकिन वह शांति का उपासक था, अहिंसा का पुजारी था, इसीलिए सोचता था कि बाकी जिंदगी अहिंसा और नेकी की राह पर चलते हुए कट जाए तो बेहतर होगा.

लेकिन ऐसा हो नहीं सका. क्योंकि वह जितना टालता, समस्या उतनी ही उलझती रही. एक बार तो उस ने उस की ओर से एकदम से निगाहें हटा लीं, परंतु उसे यह भी अच्छा नहीं लगा. मजबूर हो कर यह कठोर कदम उठाना पड़ा. वह मानता है कि इस सब का गुनहगार वही है. लेकिन उस के द्वारा किए गए इस अपराध का एक अच्छा परिणाम यह निकला कि समाज को कलंकित करने वाला सदा के लिए मिट गया. उस का मानना है कि उस ने अपराध नहीं, समाज पर एहसान किया है.

उसे वह पहली मुलाकात आज भी अच्छी तरह याद है. वह लखनऊ के हजरतगंज में एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षक था. वह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का था. अग्रवाल शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे. वह कभीकभार ही वहां आते थे. इंस्टीट्यूट की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी राजेंद्र तिवारी पर ही थी.

उस दिन क्लास के बाद राजेंद्र औफिस में बैठा आराम कर रहा था, तभी एक लड़की उस के औफिस में आई. बहुत खूबसूरत थी वह. गजब का आकर्षण था उस में. वह अपलक उस की ओर देखता रहा.

‘‘मैं कंप्यूटर सीखना चाहती हूं.’’ उस के स्वर में मिठास थी.

राजेंद्र हड़बड़ा कर बोला, ‘‘हां..हां, बैठिए.’’

‘‘कितने दिनों में मैं कंप्यूटर सीख जाऊंगी.’’ सामने की कुरसी पर बैठते हुए उस ने पूछा.

‘‘यह तो सीखने वाले पर डिपेंड करता है. वैसे थोड़ी सी प्रैक्टिस से 6 महीने में अच्छाखासा सीख जाएंगी.’’

‘‘ठीक है, मुझे एडमीशन के लिए फार्म दे दीजिए.’’

‘‘आप का नाम?’’ मेज की दराज से फार्म निकाल कर उस की ओर बढ़ाते हुए राजेंद्र ने पूछा.

‘‘अमिता सक्सेना. मैं सर्विस करती हूं, इसलिए शाम को ही आ सकूंगी.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप फार्म भर दीजिए.’’

उस ने सरसरी निगाह फार्म पर डाली. फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘मैं इसे भर कर बाद में ले आऊं तो कोई हर्ज है?’’

‘‘नहीं, कोई हर्ज नहीं है. फार्म के साथ आप फीस जमा कर दीजिएगा. उसी दिन आप का एडमीशन हो जाएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं जब भी आऊंगी, इसे भर कर ले आऊंगी.’’ इतना कह कर अमिता चली गई.

अमिता राजेंद्र को अच्छी लगी थी. ऐसा नहीं कि वह कोई आशिकमिजाज था. लड़कियों से खासतौर पर वह दूर ही रहता था. पर अमिता में न जाने क्या खासियत थी कि वह काफी देर तक उस के खयालों में खोया रहा. उस ने जैसे उस के ऊपर कोई जादू कर दिया था. वह दोबारा उस की एक झलक पाने के लिए बेचैन हो उठा था. उस के बारे में उस के मन में इस बात का भी संदेह था कि कहीं वह विवाहित तो नहीं. वह अगले दिन अमिता का इंतजार करता रहा कि शायद वह आए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.

3 दिनों बाद अमिता आई. फार्म उस ने राजेंद्र को दे दिया. फार्म में उस के नाम के पहले ‘कुमारी’ शब्द देख कर उसे बड़ा सुकून मिला. फार्म पर सरसरी नजर डाल कर उस ने पूछा, ‘‘आप कहां नौकरी करती हैं?’’

‘‘स्टेशन रोड पर एक बिल्डर के औफिस में. यह इंस्टीट्यूट आप का है?’’

वह बीच में ही बोल उठा, ‘‘मुझे राजेंद्र तिवारी कहते हैं. मैं यहां प्रशिक्षक हूं. यह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का है. लेकिन देखभाल मैं ही करता हूं. कभी कोई चीज समझ में न आए तो बिना झिझक पूछ लेना, शरमाना नहीं.’’

‘‘जी, वैसे मैं कल से जौइन करूंगी.’’ कह कर अमिता मुसकराई और कुरसी से उठ खड़ी हुई.

उस ने अगले दिन से जौइन कर लिया. कंप्यूटर सिखाते समय राजेंद्र की नजरें उसी पर टिकी रहतीं. अमिता ने उस का कहा माना था, मतलब उसे जो समझ में न आता, झट पूछ लेती. राजेंद्र भी पूरे मनोयोग से उसे कंप्यूटर सिखा रहा था.

कोई एक सप्ताह बाद एक दिन क्लास समाप्त होने पर अमिता औफिस में आई, ‘‘मुझे आप से कुछ पूछना है?’’

‘‘पूछो, क्या पूछना है?’’

उस ने कुछ सवाल पूछे. राजेंद्र ने उत्तर समझा दिए. बाद में व्यंग्य करते हुए उस ने कहा, ‘‘लगता है, मेरा बताया तुम्हारी समझ में नहीं आता.’’

‘‘नहीं, आप बतातेसिखाते तो बहुत अच्छा हैं, पर मेरी ही समझ में देर से आता है.’’ चेहरे पर मासूमियत लाते हुए वह बोली.

‘‘हां, बेवकूफों के साथ यही होता है.’’

राजेंद्र के इस मजाक पर उस ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘चलिए, आप ने पहचान तो लिया. गुरु को अपना ही गुण शिष्य में दिखाई पड़ता है.’’

कुछ देर तक दोनों यूं ही हंसीमजाक करते रहे. बातोंबातों में अमिता बोली, ‘‘किसी दिन मेरे घर चाय पर आइए. मेरा घर पता है आप को?’’

उस ने राजेंद्र को बताया कि अमीनाबाद में वह अपने चाचा के साथ रहती है. उस के मातापिता लखनऊ में ही तालकटोरा थानाक्षेत्र स्थित राजाजीपुरम कालोनी में रहते हैं. राजेंद्र भी राजाजीपुरम में ही रहता था. यह बात उस ने अमिता को बताई तो उस ने पूछा, ‘‘आप किस ब्लौक में रहते हैं?’’

‘‘ई ब्लौक में.’’

‘‘अरे, मैं भी ई ब्लौक में रहती हूं.’’

‘‘तुम अब वहां क्यों नहीं रहती?’’

वह टालते हुए बोली, ‘‘ऐसे ही, अच्छा अब मैं चलूंगी, काफी देर हो गई है.’’

इस बातचीत के बाद दोनों काफी घुलमिल गए थे. इस बीच एक बार राजेंद्र उस के घर भी हो आया. उस के चाचा हंसमुख और मिलनसार लगे. उस ने लौटते समय अमिता के चाचा को अपने घर आने के लिए आमंत्रित किया. उस का अनुमान था कि उन के साथ अमिता भी आएगी. पर न तो चाचा आए और न अमिता. अचानक एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस जा पहुचा. ज्यादा बड़ा औफिस नहीं था. फिर भी 15-20 लोग काम करते थे. उसे देख कर अमिता मुसकरा दी. वह झेंप सा गया. उस समय उस की ड्यूटी समाप्त होने वाली थी. उसे बैठने के लिए कह कर वह एक केबिन में गई. शायद वह उस के बौस की केबिन थी, 2 मिनट बाद ही बाहर आ कर बोली, ‘‘आइए, चलें.’’

दोनों एक रेस्तरां में जा पहुंचे. कौफी पीते हुए उस ने राजेंद्र को छेड़ा, ‘‘आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए?’’

‘‘तुम से मिलने का मन था, चला आया.’’

राजेंद्र की इस बात पर वह गुमसुम हो गई. उसे लगा, जैसे उस ने कुछ गलत कह दिया हो. झट सफाई दी, ‘‘मुझे गलत मत समझो.’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है. आज पहली बार मुझ से किसी ने इतने अपनत्व से बात की है, वरना सब मुझे काट खाने दौड़ते हैं. मातापिता से भी मुझे प्यार नहीं मिला. घर में हर एक ने मुझे दुत्कारा. मजबूरी में मैं चाचा के यहां रहने लगी. वहां सब मुझे ऊपर से तो प्यार दिखाते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर जलते हैं. एक भी महीने अगर पूरी तनख्वाह उन्हें न दूं तो मुझ पर पहाड़ टूट पड़ता है. समझ में नहीं आता, मैं क्या करूं.’’ कहतेकहते अमिता की आंखें सजल हो गईं.

उस समय राजेंद्र को ऐसा लगा कि अमिता दुनिया में बिलकुल अकेली है, बेसहारा है. शायद वह अपने अंदर दुख ही दुख समेटे है. वह अपने को उस का सब से बड़ा हमदर्द समझ कर बोल पड़ा, ‘‘इस में इतना परेशान होने की क्या बात है? मैं तो हूं, सब ठीक हो जाएगा.’’

राजेंद्र की इस सहानुभूति ने अमिता को आत्मबल दिया. उस के काफी समझानेबुझाने पर वह सामान्य हो गई. इस के बाद दोनों काफी करीब आते गए. दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. मुलाकातों का सिलसिला तेजी से चल निकला. रोज ही मिलना, बातें करना, साथ घूमना जैसे जरूरी हो गया. अमिता की बातों से राजेंद्र को लगता कि जैसे वह उस के बिना रह नहीं पाएगी. वह भी उस का जीवन सुखमय बनाना चाहता था. इसीलिए उस ने उस का हाथ थामने का निर्णय ले लिया. जबकि राजेंद्र उस से 4 साल छोटा था. लेकिन उस ने इस की भी परवाह नहीं की. उसे डर था कि उस के कदम पीछे खींच लेने से एक इंसान की जिंदगी चली जाएगी और उस का जिम्मेदार वह होगा.

राजेंद्र के पिता शिवप्रसाद तिवारी रायबरेली की डलमऊ तहसील स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हेड क्लर्क थे. रायबरेली में ही उस का पैतृक घर था. 3 भाइयों और एक बहन में वह दूसरे नंबर पर था. सब से बड़े भाई देवेंद्र कुमार तिवारी घर पर ही खेतीबाड़ी का काम देखते थे. उस से छोटा नरेंद्र और बहन थी. दोनों पढ़ रहे थे. राजेंद्र के इस निर्णय की जानकारी उस के पिता को होगी तो उन का क्या रुख होगा, यह उसे अच्छी तरह पता था. एक तो प्रेम विवाह, दूसरा अपने से बड़ी उम्र की लड़की से, तीसरा विजातीय. उस के निर्णय का पता चलते ही उन्होंने उस से संबंध तोड़ लिए. उस ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, पर उन्होंने उस की एक न सुनी.

घर वालों से बगावत कर के राजेंद्र ने अमिता से प्रेम विवाह कर लिया. इस विवाह में दोनों के ही परिवारों के लोग शामिल नहीं हुए. शादी के बाद वह अमिता को राजाजीपुरम स्थित अपने मकान में ले आया. वैवाहिक जीवन हंसीखुशी बीतने लगा. इंस्टीट्यूट में नौकरी करने के साथसाथ राजेंद्र किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था. शादी के बाद उस ने इस ओर खास ध्यान देना शुरू कर दिया. अमिता नियमित रूप से अपनी नौकरी पर जा रही थी.

एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस पहुंचा तो उस के बौस दिनेश मेहरा कहीं जाने की तैयारी में थे. अमिता ने राजेंद्र का परिचय उन से कराया तो वह तपाक से बोले, ‘‘अरे तुम राजेंद्र हो, कहो कैसी कट रही है?’’

‘‘सब बढि़या चल रहा है.’’ राजेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘कभी कोई काम हो तो बताना.’’ कहते हुए उन्होंने राजेंद्र के कंधे पर हाथ रखा और आगे बढ़ गए. मेहराजी पहली मुलाकात में राजेंद्र को काफी भले आदमी नजर आए. उस समय उसे क्या पता था कि ऊपर से सज्जन लगने वाले यह शख्स उस की जिंदगी में जहर घोल कर रख देंगे. अमिता ने एक दिन उसे बताया कि मेहराजी बड़ी दिलचस्पी से हमारे घर की बातें पूछा करते हैं. यह बात उसे बड़ी अजीब लगी कि आखिर उन का उस के घर से क्या मतलब. बहरहाल उस ने उस समय इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया.

धीरेधीरे छोटीछोटी बातों पर अमिता राजेंद्र से झगड़ने लगी. उस की सही बात को भी गलत बताती. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अमिता के व्यवहार में अचानक यह बदलाव क्यों आ गया. एक रात जब उस ने उस के व्यवहार में आए बदलाव के बारे में पूछा तो उस से मिली जानकारी से वह दंग रह गया. अमिता ने बताया कि मेहराजी अकसर उस के घर के बारे में राय दिया करते थे कि यह काम ऐसे होना चाहिए, फलां काम नहीं करना चाहिए. मेहराजी अमिता को जिस तरह की सलाह देते थे, उस के हिसाब से वह बिलकुल बेतुकी होती थीं. चूंकि अमिता पूरी तरह उन की सलाह पर चल रही थी, इसीलिए उन दोनों में मनमुटाव हो रहा था.

उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह कौन सी राजनीति है? आखिर मेहराजी उस के परिवार में कलह पैदा करने पर क्यों तुले हैं? राजेंद्र ने इस ओर गंभीरता से ध्यान शुरू किया. उसी बीच उसे पता चला कि उस की शादी के पहले से ही मेहराजी के अमिता से काफी आत्मीय संबंध थे. दरअसल शादी से पहले जब अमिता अपनी पारिवारिक स्थिति से परेशान थी तो मेहराजी उस के साथ सहानुभूति जता कर उस के हमदर्द बन गए थे. लेकिन शादी के बाद अमिता की स्थिति बदल गई थी. शायद यही कारण था कि मेहराजी ने कूटनीति अपना कर उस के वैवाहिक जीवन में फूट डालने की कोशिश शुरू कर दी थी, ताकि वे फिर अमिता के हितैषी बन सकें.

सीधे स्वभाव की अमिता को मेहराजी ने अपने व्यवहार से काफी प्रभावित कर रखा था. जबतब काम के बहाने वह उसे साथ ले जाते. घुमातेफिराते, ऊंचेऊंचे ख्वाब दिखाते, कीमती सामान खरीद कर देते. राजेंद्र ने अमिता को समझाने का भरसक प्रयास किया. पर उसे लगा कि वह मेहराजी से जलता है, इसलिए ऐसी बातें कर रहा है. यही वजह थी कि उस के समझानेबुझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. मेहराजी से वह इतना अधिक प्रभावित थी कि उन के आगे उस की हर बात महत्त्वहीन थी. अब उसे विश्वास हो गया कि अमिता के सीधे और सरल स्वभाव का मेहरा नाजायज फायदा उठा रहा है.

राजेंद्र ने अमिता को बहुत समझाया, मेहराजी के साथ घूमनेफिरने से मना किया, उन की मक्कारी के बारे में बताया. एक बार तो अमिता को उस की बातें समझ में आ गईं. उस ने वादा किया कि अब वह कभी मेहराजी से औफिस के काम के अलावा कोई बात नहीं करेगी. कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन जल्दी ही मेहराजी ने उसे फिर बहकाना शुरू कर दिया. इस बार उन्होंने अमिता को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ा दिया. अब जब भी राजेंद्र उसे समझाता तो जवाब मिलता, ‘‘मैं स्वतंत्र हूं, बंधुआ नहीं.’’

अजीब थी उस की स्वतंत्रता और मेहराजी का स्वतंत्रता पाठ. राजेंद्र के सामने ही उस का घर उजड़ रहा था और वह असहाय था. लेकिन वह कठोर कदम उठा कर मेहराजी को कोई आसान मौका नहीं देना चाहता था. वह नहीं चाहता था कि उस का घर बिखरे. राजेंद्र ने अमिता को समझाया कि ये पैसे वाले लोग उन की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. पैसे के बल पर वे उन्हें खरीदने तथा गुलाम बनाने की कोशिश करते हैं. उन का हित इसी में है कि मेहनत से जो कुछ कमाएं, उसी में गुजारा करें. दूसरों के पैसों के पीछे न भागें.

अमिता ने महसूस किया कि राजेंद्र की बात सही है. इसीलिए उस ने फिर वादा किया कि अब वह मेहराजी की बातों पर ध्यान नहीं देगी. लेकिन अगले ही दिन जब वह औफिस से लौटी तो मेहराजी ने उस के सारे उपदेश गलत सिद्ध कर दिए. उसी शाम मेहराजी उस के घर आ धमके. उन्होंने राजेंद्र को चेतावनी दी, ‘‘अमिता तुम से जो कुछ कहे, वह तुम्हें मानना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो अंजाम ठीक नहीं होगा.’’

यह सुन कर राजेंद्र सन्न रह गया. शांत और विनम्र भाव से उस ने जवाब दिया, ‘‘ठीक है, जो आप चाहते हैं, वही होगा. साथ ही मैं कोशिश करूंगा कि जितनी जल्दी हो, अमिता की जिंदगी से दूर हो जाऊं.’’

राजेंद्र मेहराजी के सामने इसलिए विनम्र हो गया था कि शायद उस के दुख को समझ कर उन्हें सद्बुद्धि आ जाए. पर हुआ इस के विपरीत. मेहराजी ने अपनी जीत पर प्रसन्न हो कर राजेंद्र के सामने ही उस की पत्नी को ले कर घूमने चले गए. उन के जाने के बाद राजेंद्र आंसू बहाता रहा. सोचता रहा कि क्या दुनिया में कमजोर लोगों के साथ ऐसा ही होता है? लौटने पर अमिता को जब उस ने समझाया तो वह बोली, ‘‘मेहराजी तो मजाक कर रहे थे, आप बुरा मान गए.’’

उस के साथ मजाक? आखिर क्या रिश्ता है मेहराजी से उस का, जो वह उस से मजाक कर रहे थे? उस की समझ में नहीं आ रहा था. इसलिए चुप रह गया. इस गंभीर समसया के समाधान का वह रास्ता ढूंढने लगा. काफी माथापच्ची के बाद भी उसे कोई उपाय नहीं सूझा. हां, इस बीच मेहराजी और अमिता का मिलनाजुलना और भी आसान हो गया. हुआ यह कि गरमियों में राजेंद्र के मकान मालिक सपरिवार घूमने चले गए. इस बीच अमिता ने 15 दिनों की छुट्टी ले ली. राजेंद्र के नौकरी पर जाने के बाद घर में केवल अमिता ही रह जाती थी. मेहराजी उस की अनुपस्थिति में घर आ जाते. दोनों घंटों बैठ कर गपशप करते या फिर घूमने चले जाते.

राजेंद्र को इस बात का आभास तब हुआ, जब घर लौटने पर कमरे में मेहराजी का कोई न कोई सामान पड़ा मिलता. बरतन जूठे मिलते. आखिर एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, आज चाय बहुत बनी है?’’

‘‘मेहराजी आए थे.’’ अमिता ने बड़े तीखे स्वर में कहा. राजेंद्र चुप रह गया.

राजेंद्र ने उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर असफल रहा. इसी बीच उस के इंस्टीट्यूट का समय भी बदल गया. जिस दिन समय बदला था, उस दिन जल्दी छुट्टी हो गई. वह घर आ गया. वहां बाउंड्री वाले मेनगेट पर अंदर से ताला बंद था. अंदर के दरवाजे भी बंद थे. ग्रिल वाला गेट फांद कर वह खिड़की के पास पहुंचा. एक कब्जा टूटा होने के कारण खिड़की ठीक से बंद नहीं होती थी. चुपके से उस ने अंदर झांका तो अमिता और मेहरा को आपत्तिजनक अवस्था में देख कर उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वह तो सिर्फ यही समझता था कि दोनों के बीच मामला केवल घूमनेफिरने तक ही सीमित था.

उस समय राजेंद्र की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. एक बार उस के मन में आया कि पड़ोसियों को बुला कर मेहराजी को मजा चखा दे. फिर यह सोच कर चुप रह गया कि इस में बदनामी उसी की होगी. गेट फांद कर वह फिर बाहर आ गया. कुछ देर इधरउधर चहलकदमी कर सोचता रहा, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया. फिर कुछ देर बाद उस ने जोर से गेट भड़भड़ाया. अमिता बाहर निगली. गेट पर उसे देख कर चौंकी. उस ने ग्रिल वाले मेनगेट का ताला खोला. वह अंदर पहुंचा. सामने मेहराजी बैठे थे. उन्हें यह जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने सब कुछ देख लिया था. वह बनावटी हंसी हंसता रहा. कुछ देर बाद मेहराजी चले गए.

राजेंद्र ने इस बारे में अमिता से भी कुछ नहीं कहा. लेकिन इधरउधर की बात कर उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर कोई नतीजा नहीं निकला. वह बराबर यही कहती रही, ‘‘मेहराजी बहुत अच्छे आदमी हैं. तुम नाहक उन से जलते हो. वह हमारी हर तरह से मदद कर रहे हैं. उन का एहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती.’’

उन्हीं दिनों अमिता ने अपने मातापिता के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. उस के मातापिता पास में ही रहते थे. अब वह सुबह बहुत जल्दी औफिस जाने के लिए निकलती और रात देर से घर लौटती. राजेंद्र फोन कर के पूछ भी नहीं सकता था कि वह कहां है और कब तक आएगी. जल्दी जाने और  देर से लौटने का कारण पूछने पर राजेंद्र को धमकी मिलती, ‘‘मेरी जो इच्छा होगी करूंगी, तुम मुझे रोक नहीं सकते.’’

राजेंद्र की विनम्रता और सीधेपन का नाजायज फायदा उठाया जाता रहा. वह उसे कमजोर और डरपोक समझ रही थी. वह नहीं चाहता था कि उस की इज्जत चौराहे पर नीलाम हो, लोग उस पर हंसें. लेकिन अब उसे इस बात का पश्चाताप हो रहा था कि उस ने मातापिता की बात नहीं मानी. उन के न चाहते हुए भी प्रेमविवाह क्यों कर लिया? अब महसूस हो रहा था कि मांबाप हमेशा अपनी संतान के हित की सोचते हैं. अपने अनुभवों के आधार पर ही संतान को उचित राय देते हैं. मांबाप की याद आते ही वह दुखी हो उठता. प्रेम के नाम से उसे नफरत होने लगी थी.

दूसरी ओर मेहराजी ने अमिता को यह आश्वासन दे रखा था कि अगर पति उसे छोड़ देगा तो वह उसे अपनी पत्नी बना लेंगे. मेहराजी की संपत्ति की वह मालकिन हो जाएगी. शायद यही वजह थी कि जब भी राजेंद्र उसे समझाने की कोशिश करता, वह बेबाक कह देती, ‘‘ठीक है, मैं मेहराजी के साथ जा रही हूं, रात देर से लौटूंगी.’’

मेहरा और अमिता ने राजेंद्र के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि एक ही रास्ता शेष था कि वह उन के बीच से हट जाए. मेहरा के औफिस के तमाम कर्मचारी अमिता और बौस के रिश्ते को जान गए थे. इस से राजेंद्र को खुद पर शरम महसूस हो रही थी. वह अपने प्रेम और धोखेबाजी के बारे में सोचसोच कर परेशान हो रहा था. आखिर क्या उसे सारी जिंदगी यही देखना पड़ेगा. उस दिन तो वह जैसे आसमान से गिर पड़ा, जब अमिता को अपने सगे भाई अश्विनी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस ने भाईबहन के पवित्र रिश्ते पर बदनुमा दाग लगा दिया था. अब राजेंद्र समझ गया कि असली दोषी कौन है. वह अभी तक सारा दोष मेहराजी को ही दे रहा था, जबकि अपना ही सिक्का खोटा था. इस घटना के बाद वह पूरी तरह टूट गया.

आखिर कोई कब तक अपने स्वाभिमान को तिलांजलि देता रहेगा? कितना झुकेगा? कितना दबेगा? राजेंद्र ने काफी प्रयास किया कि बात उसी तक सीमित रहे, आगे न बढ़े. पर उस का चुप रहना उस की कमजोरी माना जा रहा था. वह इस विचार का था कि वह प्यार सच्चा नहीं होता, जिस में प्रेमी को क्षमा न किया जा सके. इसी कारण वह अमिता को समझाबुझा कर सही रास्ते पर लाने का असफल प्रयास करता रहा. लेकिन उस के मनमस्तिष्क को तो मेहराजी ने विकृत कर दिया था. ‘वाह रे मेहराजी, तुम ने अजीब राजनीति का खेल खेला. तुम समझते होगे कि राजेंद्र घुटघुट कर मर जाएगा या फिर जहर खा लेगा. फिर तुम मनचाहा राज करोगे.’ लेकिन राजेंद्र ऐसा करने वालों में नहीं था. शायद वह कोई कठोर कदम उठाने से रुक जाता था. उसे विश्वास था कि कुदरत उन्हें उन के कर्मों का दंड अवश्य देगा.

लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अगर अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाता है. किसी चीज की अति करने का अर्थ होता है विनाश. वे दोनों अति की ओर अग्रसर हो रहे थे. राजेंद्र शांत रह कर बुरे दिन टलने का इंतजार करता रहा. वह अपनी पत्नी को अब न तो कुछ समझाता था और न ही उस की किसी हरकत का विरोध करता था. उसे बिलकुल स्वच्छंद छोड़ दिया था, इसलिए कि शायद कभी ठोकर खा कर वह अपने कर्मों पर शर्मिंदगी महसूस करे. लेकिन वे घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. एक दिन अमिता ने राजेंद्र से कहा, ‘‘आज मैं अपनी मां के साथ बाजार जाऊंगी.’’

राजेंद्र ने उस की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तो उस ने अपने कुछ कपड़े लिए और घर से निकल गई. उसे इस तरह कपड़े ले जाते देख उसे शक हुआ. उस के जाने के थोड़ी देर बाद वह घर से निकला और अपनी ससुराल जा पहुंचा. वहां मजदूर घर की पुताई कर रहे थे. अमिता की मम्मी और पापा बाजार गए थे. घर में केवल अमिता का भाई अश्विनी था. वह सीधे उस के कमरे की ओर बढ़ा. कमरे के दरवाजे को हाथ से धकेलने की कोशिश की, लेकिन वह अंदर से बंद था. उस ने अपना शक मिटाने के लिए खिड़की से अंदर झांका. वहां का दृश्य देख कर वह कांप उठा. वह चुपचाप वापस लौट आया.

राजेंद्र ने तय कर लिया कि अब वह यह घर छोड़ कर चला जाएगा. उस का मन वैराग्य की ओर मुड़ गया. लेकिन उस के संन्यासी हो जाने से उस के दुश्मनों का मतलब हल हो जाएगा. यह सोच कर उस ने तय किया कि दुनिया से पूछ लिया जाए कि आखिर कौन गलत है, कौन सही? जब उस का जीवन बरबाद हो ही गया है तो फिर सच उजागर करने में ज्यादा से ज्यादा उस की जान ही तो जाएगी. वैसे भी कैसा डर? इस जिंदगी से तो मौत ही अच्छी है. वह जानता था कि अन्याय करने वाले से ज्यादा दोषी अन्याय सहने वाला होता है. पर वह मजबूर था. किसी को दंड नहीं दे सकता था. क्योंकि किसी को दंड देने का कोई अधिकार उस के पास नहीं था. यही सोच कर उस का संन्यास ले लेने का निर्णय पक्का होता गया.

लेकिन शायद ऐसा नहीं होना था. 21 जनवरी को रात साढ़े 8 बजे अमिता औफिस से घर लौटी. उस के इतनी देर से आने के बावजूद राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा. उस ने कपड़े बदले. वह विचारों में खोया था. अचानक उस के दिमाग में आया कि क्यों न घर छोड़ने से पूर्व अमिता को आखिरी बार समझाने की कोशिश करे. राजेंद्र ने उस से बात छेड़ी ही थी कि वह बिफर उठी. उसे दुत्कारने लगी. इस के बावजूद वह उसे समझाने की कोशिश करता रहा. उस के समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने उसे खरीखोटी सुनानी शुरू कर दी. वह भी थोड़ा उत्तेजित हुआ. दोनों में झगड़ा होने लगा. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम मेरे जीवन से निकल जाओ. तुम्हारे लिए अब मेरी जिंदगी में कोई जगह नहीं है. न ही अब मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. अब मैं मेहराजी की पत्नी बन कर रहूंगी.’’

राजेंद्र ने उसे अपने प्यार की दुहाई दी. परंतु वह जानबूझ कर उस की खिल्ली उड़ा रही थी. वह अपना होश खो बैठा. मेज पर पड़ी कैंची उस के हाथ में आ गई. उस ने कैंची का भरपूर वार उस के पेट पर कर दिया. वह चीख उठी. परंतु उस पर तो जैसे शैतान सवार हो गया था. वह कैंची से उस के शरीर को गोदता चला गया. वह जमीन पर गिर पड़ी. कुछ देर तड़पने के बाद उस ने दम तोड़ दिया. अमिता की मृत देह देख कर राजेंद्र के सिर पर सवार शैतान उतर गया. सामने लाश देख कर वह कांप उठा. अब क्या होगा? उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. उस ने क्या सोचा था और क्या कर बैठा. कहां सब कुछ त्याग कर वह संन्यासी बनने चला था, कहां अब खूनी बन गया.

स्वयं को संतुलित कर उस ने आपबीती लिखनी शुरू की. उस के साथ जो कुछ हुआ था, सब लिख डाला. यह घटना स्पष्ट रूप से दिनेश मेहरा तथा अमिता के भाई के कारण ही हुई थी. राजेंद्र ने सब कुछ होशोहवास में लिखा था. 28 पृष्ठों के उस पत्र की कौपियां राष्ट्रपति, भारत सरकार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री और लखनऊ के जिलाधिकारी को आवश्यक काररवाई हेतु भेज दिया. राजेंद्र कुमार तिवारी द्वारा लिखे गए इस पत्र को पढ़ कर थाना तालकटोरा के थानाप्रभारी रामकुमार यादव की आंखें फटी रह गईं. हत्यारे ने न केवल अपना अपराध स्वीकार किया था, बल्कि हत्या के कारण को भी स्पष्ट लिख दिया था. हत्या करने के बाद ही यह पत्र लिखा गया था, क्योंकि पत्र के अंत में राजेंद्र कुमार ने अपने हस्ताक्षर करने के साथ खून की छींटें भी डाली थीं.

थानाप्रभारी को यह पत्र अमिता की लाश के समीप एक मेज पर मिला था, जिसे वह उसी समय पूरा पढ़ गए थे. मेज पर ही खून से सनी कैंची भी रखी थी. कमरे की दीवारों पर भी खून के छींटे पड़े थे. मृत अमिता के शरीर पर सलवारकुर्ता था. राजेंद्र कुमार तिवारी की मकान मालकिन श्रीमती बाधवा भी उसी मकान के एक हिस्से में रहती थीं. पूछताछ के दौरान श्रीमती बाधवा ने पुलिस को बताया कि बीती रात उन्होंने राजेंद्र तथा उस की पत्नी के बीच हुए झगड़े की आवाजें सुनी थीं. घटना वाली सुबह जब वह बाहर निकलीं तो राजेंद्र के घर का दरवाजा बंद था. उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि उस समय तक दोनों लौन में बैठ कर अखबार पढ़ते हुए दिखाई देते थे.

उन्होंने दरवाजा खटखटाया. राजेंद्र को आवाज दी, पर अंदर से कोई जवाब नहीं मिला. वह सशंकित हो उठीं. मकान के पिछले हिस्से की तरफ जाने पर उन्होंने बाथरूम के दरवाजे पर ताला बंद पाया. श्रीमती बाधवा ने यह बात अमिता के पिता को बता देना उचित समझा. उन का फोन नंबर उन के पास था. उन्होंने फोन कर के उन्हें पूरी बात बता दी. एकदो पड़ोसियों को साथ ले कर अमिता के पापा राजेंद्र के मकान पर पहुंचे. उन लोगों ने भी दरवाजा खटखटाया. ताला तोड़ने की कोशिश की, पर सफल न हो सके. राजेंद्र को फोन किया. उस का फोन बंद था. किसी अनिष्ट की आशंका से उन्होंने थाना तालकटोरा पुलिस को फोन किया. थानाप्रभारी रामकुमार यादव पुलिस दल के साथ मौके पर पहुंचे. ताला तोड़ कर जब उन्होंने अंदर प्रवेश किया तो वहां अमिता का शव पड़ा था.

रामकुमार यादव इस घटना से काफी परेशान हो उठे थे. सुबहसुबह उन के थानाक्षेत्र में 2 अन्य घटनाएं भी हो चुकी थीं. एक अन्य युवती की हत्या का मामला था और तालकटोरा थानाक्षेत्र के डी-ब्लौक स्थित रेलवे लाइन पर एक घायल युवक मिला था. उस युवक को कुछ लोग बेहोशी की हालत में उठा कर थाने ले आए थे. उसे उपचार हेतु अस्पताल भेज दिया गया था. युवक की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. थानाप्रभारी ने संभावित स्थानों पर खोज की, परंतु राजेंद्र नहीं मिला. उस का फोन बंद ही था, इसलिए संपर्क नहीं हो सका. उस की तलाश में पुलिस टीम रायबरेली गई. वह अपने पिता के यहां भी नहीं मिला. पुलिस उस के पिता शिवप्रसाद तिवारी को अपने साथ लखनऊ ले आई. उन से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक बार फिर राजेंद्र की तलाश की, पर उस का पता नहीं चला.

अचानक थानाप्रभारी का माथा ठनका कि कहीं रेलवे लाइन पर घायल मिला युवक ही राजेंद्र न हो. इस के बाद उन्होंने शिवप्रसाद तिवारी को साथ लिया और बलरामपुर अस्पताल जा पहुंचे. वह युवक अभी तक बेहोश था. शिवप्रसाद तिवारी उसे देखते ही रो पड़े. वह राजेंद्र ही था. उस की निगरानी के लिए 2 सिपाहियों को वहां तैनात कर दिया गया. तीन दिनों बाद 25 जनवरी को राजेंद्र को होश आ गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस का कहना था, ‘‘मैं ने जो कुछ किया, उस का मुझे कोई दुख नहीं है. मलाल तो इस बात का है कि मेरा परिवार तबाह करने वालों को कानून ने कोई सजा नहीं दी. अब कुदरत ही उन के कर्मों का फल उन्हें देगा, ऐसा मेरा विश्वास है.’’

लेकिन सवाल उठता है कि क्या अमिता की हत्या के बाद राजेंद्र द्वारा लिखे गए पत्र में लगाए गए आरोपों की कोई सजा कथित दोषियों को मिल सकती है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ लोगों को बदनाम करने के लिए हत्या के बाद लिखे गए पत्र में राजेंद्र ने उन का नाम लिखा हो? शायद यही वजह है कि दिनेश मेहरा (55 वर्ष) का कहना है, ‘‘मेरा और अमिता का रिलेशन केवल औफिशियल था. राजेंद्र ने अपने पत्र में मेरा जिक्र क्यों किया, यह मुझे नहीं पता. हो सकता है, उस ने मुझे बदनाम करने के लिए ऐसा किया हो. जहां तक सवाल है कि राजेंद्र ने अमिता की हत्या क्यों की तो इस का पता लगाना पुलिस का काम है, मेरा नहीं. हां, मैं यह जरूर कह सकता हूं कि अमिता बहुत ही मेहनती महिला थी. औफिस का काम भी वह पूरी ईमानदारी और लगन से करती थी. उस की मौत का मुझे दुख है.’’

दूसरी ओर अमिता के भाई अश्विनी का कहना था, ‘‘मुझे जो कुछ कहना है, पुलिस के सामने या अदालत में कहूंगा. लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि राजेंद्र न केवल सनकी, बल्कि पागल था. उस ने जो कुछ लिखा है, अपनी सनक और पागलपन की झोंक में लिखा है. हत्या के असली कारण से पुलिस का ध्यान हटाने के लिए उस ने ऊलजुलूल बातें अपने पत्र में लिखी हैं. आखिर इन बातों का कोई सुबूत तो होना चाहिए.’’

एक अहम सवाल यह भी है कि जब राजेंद्र अपना अपराध स्वीकार कर रहा है तो उसे हत्या का असली कारण छिपाने से क्या लाभ? उस ने अमिता से प्रेमविवाह किया था. दोनों साथसाथ रह रहे थे. दोनों ही सर्विस में थे. इसलिए न तो आर्थिक संकट जैसा कोई कारण था और न ही सर्विस को ले कर कोई मनमुटाव था. बहरहाल, पुलिस का कहना है कि उसे हत्या का अपराधी मिल गया है. पुलिस का काम तो हत्या के अपराधी को पकड़ने के साथ ही समाप्त हो गया है. किसी को सजा देने का काम अदालत का है. शायद इसी कारण पुलिस ने राजेंद्र द्वारा पत्र में लिखी गई बातों की वास्तविकता का पता नहीं लगाया और न ही इस संबंध में कोई छानबीन की.

थानाप्रभारी रामकुमार यादव इस बारे में कहते हैं, ‘‘राजेंद्र ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है. उस ने अपने पत्र में किस पर क्या आरोप लगाया है, इस की जांच का काम हमारा नहीं है. हां, इतना जरूर है कि पाप का प्रायश्चित करने वाला व्यक्ति न झूठ बोल सकता है और न झूठ लिख सकता है. अदालत भले ही किसी को सजा न दे सके, लेकिन कुदरत जरूर सजा देगी.’’

कथा लिखे जाने तक राजेंद्र को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. पुलिस आरोपपत्र तैयार करने में जुटी थी. Short Hindi Story

—कथा सत्य घटना पर आधारित है. कथा में पात्रों एवं स्थानों के नाम बदले हुए हैं.

 

Hindi Stories: कातिल दरोगा

Hindi stories: फरियाद ले कर पुलिस चौकी पहुंची खूबसूरत ईशा को देख कर दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह इतना प्रभावित हुआ कि शादीशुदा होते हुए भी वह उसे चाहने लगा. इतना ही नहीं, खुद को अविवाहित बता कर उस ने ईशा से शादी भी कर ली. बाद में यही झूठ ऐसा जी का जंजाल बना कि वह एक खौफनाक अपराध कर बैठा. कानपुर के थाना काकादेव क्षेत्र में एक मोहल्ला है नवीन नगर. कौशलेश सचान अपनेपरिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विनीता के अलावा एक बेटा ऐश्वर्य राज, 2 बेटियां ईशा व प्रगति थीं. कौशलेश साधन संपन्न व्यक्ति थे. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

कौशलेश सचान की बड़ी बेटी का नाम वैसे तो ईशा था लेकिन घर में सब लोग उसे ईशू कहते थे. गोरी, तीखे नाकनक्श और बड़ीबड़ी आंखों वाली ईशा सुशील और विनम्र स्वभाव की थी. ईशा तनमन से जितनी खूबसूरत थी, पढ़नेलिखने में भी उतनी ही तेज थी. उस ने कानपुर के सरस्वती बालिका इंटर कालेज से प्रथम श्रेणी में इंटरमीडिएट और एएनडी कालेज में बीए पास किया. ईशा की इच्छा थी कि वह आईएएस बने. इसलिए प्रथम श्रेणी में बीए पास करने के बाद उस ने आईएएस की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू कर दी थी. लेकिन लगातार 3 साल तक परीक्षा देने के बाद भी वह सिविल सर्विस में न निकल सकी.

एक दिन ईशा अपनी मां विनीता के साथ जेके मंदिर गई. दर्शन करने के बाद जब वह गेट के बाहर निकली, तो एक झपटमार ने उस के गले की सोने की चेन खींच ली और साथ ही उस का पर्स भी छीन कर भाग निकला. बदहवास मांबेटी थाना नजीराबाद पहुंचीं. उस इलाके के चौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल उस समय थाने में ही थे. ईशा ने ज्ञानेंद्र सिंह को लूट की पूरी घटना बताई तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर के लुटेरे की तलाश शुरू कर दी. 3-4 दिन बाद ही ज्ञानेंद्र ने छोटे यादव नाम के लुटेरे को पकड़ लिया. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह की इस त्वरित काररवाई से ईशा काफी प्रभावित हुई.

बयान दर्ज कराने, लुटेरे और सामान की शिनाख्त करने के लिए ईशा को कई बार थाना नजीराबाद आनाजाना पड़ा. इसी आनेजाने में ईशा और दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. ज्ञानेंद्र सिंह जहां ईशा की खूबसूरती पर फिदा था, वहीं ईशा भी शरीर से हृष्टपुस्ट व स्मार्ट दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को देख कर उस की ओर आकर्षित हो गई थी. दोनों को एक अनजाना आकर्षण एकदूसरे की तरफ खींचने लगा था. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को ईशा कुछ ज्यादा ही पसंद आ गई थी, इसलिए उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया था. वह जब तब ईशा से बातें करने लगा. ईशा को भी उस की रसभरी बातों में प्यार झलकता था. वह भी उस से खूब बातें करने लगी. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें भी होने लगीं. बात आगे बढ़ी तो दोनों साथसाथ सैरसपाटे के लिए भी जाने लगे. ज्ञानेंद्र ईशा को फिल्म भी दिखाता और रेस्तरां में खाना भी खिलाता.

सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल मूल रूप से चित्रकूट जिले के मऊ थाना अंतर्गत आने वाले गांव छिवलहा का रहने वाला था. उस का सलेक्शन 2007 के बैच में हुआ था. उस की पहली पोस्टिंग कानपुर के किदवई नगर थाने की साकेत नगर पुलिस चौकी में हुई थी. इस के बाद वह कानपुर शहर और देहात के कई थानों में तैनात रहा. कुछ समय वह क्राइम ब्रांच में भी रहा. ज्ञानेंद्र सिंह नौकरी के अलावा प्लौटिंग का भी काम करता था. इस काम में उस ने खूब पैसा कमाया. उस के पास 4-5 लग्जरी कारें थीं, जिन्हें उस ने एक ट्रैवलिंग एजेंसी में लगवा रखा था. ज्ञानेंद्र सिंह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. उस की शादी मध्य प्रदेश स्थित सतना जिले की बछरांवा निवासी नीलम के साथ हुई थी.

पत्नी और बच्चों के साथ वह साकेत नगर, कानपुर में रह रहा था. जबकि ईशा से उस ने खुद को अविवाहित बताया था. एक रोज ज्ञानेंद्र सिंह ईशा के घर पहुंचा, तो उस वक्त वह घर में अकेली थी. उस के मातापिता किसी काम से माल रोड गए हुए थे, और भाईबहन कालेज में थे. ज्ञानेंद्र सिंह और ईशा कमरे में बैठ कर बातचीत करने लगे. बातोंबातों में ज्ञानेंद्र ने ईशा की खूबसूरती के कसीदे काढ़ने शुरू कर दिए. यह देख उस ने ज्ञानेंद्र की बेचैन आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘ज्ञानेंद्र, क्या सचमुच मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं? कहीं तुम मुझे खुश करने के लिए मेरी झूठी तारीफ तो नहीं कर रहे?’’

ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा को चाहत भरी नजरों से देखा, वह उसे ही अपलक निहार रही थी. ज्ञानेंद्र ने महसूस किया कि दिल की बात कहने का ऐसा मौका मुश्किल से ही मिलेगा. इसलिए वह ईशा की कलाई थामते हुए बोला, ‘‘ईशा, मुझे तुम से प्यार हो गया है. तुम्हारे बगैर सबकुछ सूनासूना सा लगता है. मुझे लगता है कि तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए ऐसी ही फीलिंग्स हैं. अगर ऐसा है तो प्लीज मेरा प्यार स्वीकार कर लो.’’

‘‘ज्ञानेंद्र, तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये शब्द सुनने के लिए कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपने दिल की बात कहने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि मैं तुम से कितना प्यार करती हूं. आई लव यू ज्ञानेंद्र.’’

उस दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया, इस के बाद जैसे दोनों की दुनिया ही बदल गई. समय के साथ उन की मोहब्बत दिन दूनी रात चौगुनी परवान चढ़ती गई. ज्ञानेंद्र जब ड्यूटी पर होता तो ईशा से मोबाइल पर बातें करता और जब समय मिलता तो उस के साथ घूमताफिरता. इस तरह दोनों एकदूसरे के इतना करीब आ गए कि उन्हें लगने लगा, अब एकदूसरे के बिना नहीं रहा जा सकता. अंतत: शुरुआत ईशा ने की. उस ने अपने दिल की बात घरवालों को बता कर ज्ञानेंद्र सिंह से शादी करने की इच्छा जाहिर की.

ईशा की बात सुन कर पहले तो उस की मां विनीता और पिता कौशलेश चौंके, लेकिन बाद में बेटी की खुशी के लिए राजी हो गए. दरअसल ईशा ने उन्हें समझाया था कि दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह उन की ही जातिबिरादरी का है. अच्छा कमाता है और पुलिस विभाग में अच्छे पद पर तैनात है. बेटी की मरजी जान कर वे लोग ईशा की शादी ज्ञानेंद्र से करने को राजी हो गए. सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र से बात की गई तो उस ने बताया कि कुछ कारणों से उस ने अपने घर वालों से संबंध विच्छेद कर रखा है इसलिए उस के परिवार का कोई सदस्य शादी में शामिल नहीं हो पाएगा.

बहरहाल, बातचीत के बाद कौशलेश ने 10 मार्च, 2013 को अपनी बेटी ईशा का विवाह ज्ञानेंद्र सिंह के साथ कर दिया. शादी के बाद ज्ञानेंद्र उसे साकेत नगर स्थित अपने घर ले गया. उस वक्त उस की पत्नी नीलम मायके गई हुई थी. इस के बाद ईशा ज्यादातर मायके में ही रही. वह उसे अपने घर तभी ले जाता था, जब नीलम मायके गई होती थी. बहरहाल, हंसीखुशी से एक वर्ष कब बीत गया, पता ही न चला. इसी बीच ईशा ने एक खूबसूरत बच्ची को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सान्या रखा. सान्या के जन्म से जहां ईशा के जीवन में बहार आ गई थी, वहीं ज्ञानेंद्र खोयाखोया सा रहने लगा था. दिखावे के तौर पर तो वह उसे प्यार करता था, लेकिन अंदर ही अंदर परेशान रहता था.

ईशा और ज्ञानेंद्र में पहली बार तकरार तब शुरू हुई जब वह अपनी बेटी सान्या का बर्थडे सर्टिफिकेट बनवाने नगर निगम पहुंची. दरअसल, ज्ञानेंद ने सर्टिफिकेट में पिता की जगह अपना नाम लिखवाने से मना कर दिया था. इस बात को ले कर ईशा और ज्ञानेंद्र में काफी विवाद हुआ. यहीं से ईशा को ज्ञानेंद्र पर शक हुआ. जब ईशा ने गुप्त रूप से ज्ञानेंद्र के संबंध में जानकारी हासिल की तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि ज्ञानेंद्र शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता है. वह अपनी पत्नी नीलम और बच्चों के साथ कानपुर में ही रहता है. वह उसे तभी अपने घर ले जाता है, जब नीलम मायके गई होती है.

उस दिन देर रात ज्ञानेंद्र सिंह घर आया तो ईशा ने उस से पूछा, ‘‘मैं कौन हूं तुम्हारी. पत्नी, प्रेमिका या रखैल?’’

‘‘यह तुम कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो? तुम पत्नी हो मेरी.’’ ज्ञानेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘झूठ बोल रहे हो, तुम शादीशुदा और 2 बच्चों के पिता हो. तुम्हारी पत्नी का नाम नीलम है, जिस के साथ तुम वैवाहिक जीवन बिता रहे हो. तुम फरेबी और धोखेबाज हो. प्यार का नाटक कर के तुम ने मुझे धोखा दिया और मुझ से शादी कर ली. लेकिन अब मैं चुप नहीं बैठूंगी. तुम्हारे खिलाफ लड़ाई लड़ूंगी. जरूरत पड़ी तो रिपोर्ट भी दर्ज कराऊंगी.’’

ज्ञानेंद्र सिंह समझ गया कि ईशा को असलियत का पता चल गया है, इसलिए उस ने माफी मांग ली. फिर बोला, ‘‘ईशा तुम मेरी दूसरी पत्नी बन कर रह सकती हो. मैं तुम्हें पूरा सम्मान दूंगा. कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. चाहो तो अपने और बेटी के नाम पर जितना चाहे पैसा जमा करा सकती हो. मैं खुशीखुशी जमा कर दूंगा.’’

‘‘मिस्टर ज्ञानेंद्र, पत्नी दूसरी पहली नहीं होती. पत्नी सिर्फ पत्नी होती है. अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो अपनी पत्नी नीलम को तलाक दे दो.’’

‘‘उसे तलाक देना आसान नहीं है.’’ ज्ञानेंद्र ने मजबूरी जाहिर की तो ईशा बोली, ‘‘मेरा क्या होगा. यह सोचा है तुम ने? अपनी पत्नी और बच्चों की चिंता थी तो मेरे साथ प्यार का स्वांग कर के धोखे से शादी क्यों की? अगर तुम ने नीलम को तलाक नहीं दिया तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा. मैं जहर खा कर जान दे दूंगी या फिर तुम्हारे खिलाफ धोखाधड़ी से शादी रचाने और शारीरिक शोषण करने की रिपोर्ट दर्ज कराऊंगी.’’

ईशा की धमकी सुन कर ज्ञानेंद्र सिंह अंदर तक कांप गया.वह तनाव में रहने लगा. ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियां बढ़ना स्वभाविक था. फलस्वरूप दोनों में आएदिन झगड़ा होने लगा. लड़झगड़ कर ईशा मायके आ गई. आखिरकार इस गंभीर समस्या के निदान के लिए दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा के कत्ल की योजना बना डाली. अपनी इस योजना में उस ने अपने साथी मनीष कठेरिया, उस के भाई बच्चा और मनीष के साथी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को शामिल कर लिया. मनीष कठेरिया किदवई नगर में रहता था. वह दबंग किस्म का आदमी था. साकेत नगर में उस की ‘टेलीकाम विला’ नाम से मोबाइल शौप तथा ‘बालाजी ट्रैवल्स’ के नाम से ट्रैवलिंग एजेंसी थी. इस के अलावा वह कमेटी भी चलाता था. पुलिस से दोस्ती करना उस का शौक था.

दर्जनों थानेदारों से उस के दोस्ताना संबंध थे. जिन्हें वह मुफ्त में मोबाइल फोन और आनेजाने के लिए लग्जरी गाडि़यां मुहैया कराता था. इस सेवा के एवज में वह अपने काम निकलवाता था. ज्ञानेंद्र सिंह जब साकेत नगर चौकी इंचार्ज था, तभी उस की दोस्ती मनीष से हुई थी. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती बढ़ती गई. अर्जुन जूही बारादेवी में रहता था और मनीष कठेरिया का दोस्त था. वह मनीष की ट्रैवलिंग एजेंसी में लग्जरी कार चलाता था. अर्जुन की प्रेमिका अवंतिका किदवई नगर में रहती थी. दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया था. मनीष कठेरिया ने ही अर्जुन और अवंतिका का परिचय दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह से कराया था. मनीष का भाई बच्चा गोविंद नगर में रहता था.

आर्थिक मदद के लिए वह मनीष के पास आता था. मनीष के कहने पर बच्चा हर काम करने के लिए तत्पर रहता था. मनीष की कमेटी का पैसा बच्चा ही वसूल किया करता था. वह हमेशा मारपीट पर आमादा रहता था. इसी बीच ज्ञानेंद्र सिंह का तबादला प्रतापगढ़ हो गया था. वहां वह आंसपुर (देवसरा) थाने में तैनात रहा. बाद में काम में लापरवाही बरतने के कारण उसे लाइन हाजिर कर दिया गया था. लाइन हाजिर होने के बाद वह पुलिस लाइन में ड्यूटी कर रहा था. ईशा की धमकी ने उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम कर दी थी. उसे पता था कि ईशा ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो उस की नौकरी तो जाएगी ही उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी. इसलिए वह जल्द से जल्द ईशा का काम तमाम करना चाहता था. इस के लिए वह बराबर अपने दोस्तों से संपर्क बनाए हुए था. उस ने उन से मिल कर ईशा की हत्या की योजना बना ली थी.

अपनी योजना के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह 17 मई, 2015 को ईशा के घर नवीन नगर, काकादेव पहुंचा. वहां उस ने ईशा की मां, मौसी, मामा व अन्य घरवालों से माफी मांगी और वादा किया कि वह ईशा को शारीरिक या मानसिक पीड़ा नहीं पहुंचाएगा और जैसा वह कहेगी, वैसा ही करेगा. उस के कहने पर पहली पत्नी नीलम को तलाक भी दे देगा. उस ने यह भी कहा कि अगर किसी वजह से वह नीलम को तलाक न दे सका तो ईशा व उस की बेटी के भरणपोषण के लिए मोटी रकम देगा. ईशा के घरवालों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया. 18 मई, 2015 की शाम 4 बजे दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह अपने साथी मनीष कठेरिया के साथ लग्जरी कार से ईशा के घर पहुंचा और उस की मां विनीता के पैर छू कर बोला, ‘‘मांजी, हम ईशा को कुष्मांडा देवी के दर्शन कराने ले जाना चाहते हैं. हमें आप की इजाजत चाहिए.’’

ईशा ज्ञानेंद्र की पत्नी थी, सो उन्हें क्या ऐतराज हो सकता था. लिहाजा उन्होंने ईशा को ज्ञानेंद्र के साथ जाने की इजाजत दे दी. ईशा व ज्ञानेंद्र को रात 8 बजे तक मंदिर से वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन जब दोनों रात 10 बजे तक वापस नहीं आए तो ईशा की मां विनीता सचान को चिंता हुई. उन्होंने ईशा और ज्ञानेंद्र से मोबाइल पर बात करनी चाही, लेकिन दोनों के मोबाइल स्विच्ड औफ थे. रात भर विनीता बेटी के आने का इंतजार करती रहीं, लेकिन वह वापस नहीं लौटी. सुबह को परेशानहाल विनीता सचान थाना काकादेव पहुंचीं. थाने पर उस समय थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव मौजूद थे. उन्होंने सारी बात बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगई. लेकिन विभाग का मामला होने की वजह से पुलिस ने उन्हें टरका दिया. इस पर विनीता सचान डीआईजी आशुतोष पांडेय से मिलीं और शक जताते हुए रिपोर्ट दर्ज कराने की विनती की.

डीआईजी आशुतोष पांडेय को मामला गंभीर लगा. अत: उन्होंने थानाप्रभारी उदय प्रताप को तत्काल रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दे दिया. आदेश मिलते ही उदय प्रताप ने विनीता सचान की ओर से भादंवि की धारा 364 के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. 20 मई को काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को कौशांबी के थाना महेवाघाट द्वारा एक युवती की सिर विहीन लाश मिलने की सूचना दी गई. शक के आधार पर थानाप्रभारी विनीता सचान, उन के पुत्र ऐश्वर्य राज व अन्य घरवालों के साथ महेवाघाट थाना पहुंचे. पुलिस ने लाश मोर्चरी में रखवा दी थी. विनीता सचान ने जब उस लाश को देखा तो वह फफक कर रो पड़ीं. यह लाश उन की बेटी ईशा की ही थी. विनीता ने लाश की पहचान ईशा के हाथ में बंधी कलाई घड़ी तथा बांह पर गुदे लव आकार के टैटू से की थी.

लाश की शिनाख्त होने पर महेवाघाट थाना पुलिस ने अपने यहां दर्ज हत्या के मामले को थाना काकादेव, कानपुर ट्रांसफर कर दिया. चूंकि ईशा की लाश की शिनाख्त हो चुकी थी, इसलिए काकादेव पुलिस ने अपहरण के इस मामले में धारा 302/201/120बी और जोड़ दी. साथ ही विनीता के बयान के आधार पर ज्ञानेंद्र सिंह के साथसाथ बच्चा, मनीष कठेरिया, अर्जुन और उस की कथित पत्नी अवंतिका को भी आरोपी बना दिया. चूंकि यह मामला पुलिस के एक दरोगा से जुड़ा था इसलिए डीआईजी आशुतोष पांडेय ने ईशा के हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने, कत्ल में प्रयुक्त हथियार और सिर बरामद करने के लिए एक विशेष पुलिस टीम बनाई. इस टीम में सीओ स्वरूप नगर आतिश कुमार, क्राइम ब्रांच के सीओ अमित कुमार राय, प्रभारी आर.के. सक्सेना तथा काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने ज्ञानेंद्र, बच्चा, मनीष कठेरिया तथा उस के साथी अर्जुन के ठिकानों पर ताबड़तोउ़ छापे मारे. लेकिन सभी आरोपी फरार थे. पुलिस टीम ने उन के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. साथ ही करीब एक दर्जन लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की. निर्दोष पाए जाने पर बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. पुलिस टीम को ईशा के मोबाइल की लोकेशन आगरा में मिली. पुलिस टीम आगरा गई और हाइवे के एक ढाबे के कर्मचारी से ईशा का मोबाइल बरामद कर लिया. उस कर्मचारी ने बताया कि कुछ लोग यह मोबाइल खाना खाने के बाद मेज पर छोड़ गए थे. पुलिस टीम को समझते देर नहीं लगी कि हत्यारोपियों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए ऐसा किया होगा.

25 मई, 2015 को पुलिस टीम ने हत्यारोपी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को छपेड़ा पुलिया, काकादेव से कार सहित गिरफ्तार कर लिया. अर्जुन अपनी प्रेमिका को स्विफ्ट डिजायर कार से घुमाने बिठूर जा रहा था. यह कार मनीष कठेरिया की थी. अर्जुन और अवंतिका के पास से ईशा का एक कंगन भी बरामद हुआ. पूछताछ में अर्जुन ने बताया कि घटना वाले दिन शाम 4 बजे ज्ञानेंद्र सिंह स्विफ्ट कार से ईशा के घर पहुंचा था. उस वक्त कार में मनीष और उस का भाई बच्चा भी मौजूद था. ईशा को साथ ले कर तीनों नौबस्ता आए. मनीष ने उसे व अवंतिका को फोन कर के वहीं बुला लिया.

सभी 6 लोग 2 गाडि़यों के साथ विधनू, घाटमपुर, फतेहपुर होते हुए कौशांबी की ओर बढ़े. रास्ते में एक सुनसान जगह पर ज्ञानेंद्र ने गाड़ी रोक दी. उसी वक्त मनीष ने ईशा को दबोच लिया और ज्ञानेंद्र ने तेज धार वाले चाकू से ईशा का सिर धड़ से अलग कर दिया. धड़ से खून का फव्वारा छूटा तो मनीष ने अपनी शर्ट उतार कर सिर को धड़ से बांध दिया. फिर ईशा के शरीर से कपड़े और जेवर उतार कर सिर को यमुना नदी में तथा धड़ को महेवाघाट यमुना पुल के पास फेंक दिया. तत्पश्चात गाड़ी की अदलाबदली कर के तथा कंगन दे कर उसे वापस भेज दिया गया. मनीष, बच्चा व दरोगा ज्ञानेंद्र दूसरी गाड़ी से कहीं चले गए. अर्जुन व अवंतिका का बयान दर्ज करने के बाद काकादेव पुलिस ने दोनों को जेल भेज दिया.

अब पुलिस टीम ने शातिर दिमाग ज्ञानेंद्र सिंह, उस के साथी मनीष कठेरिया व बच्चा को गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया. इस से घबरा कर 30 मई को मनीष कठेरिया ने सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे 3 दिनों की रिमांड पर ले लिया. मनीष से कोहना व किदवई नगर थाने में कड़ाई से पूछताछ की गई, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने उस की मां उषा को थाने बुलवा लिया. दोनों को आमनेसामने बैठा कर पुलिस टीम ने पूछताछ शुरू की. जबान न खुलने पर पुलिस ने उस की मां उषा को जेल भेजने की धमकी दी. इस धमकी से मनीष टूट गया और उस ने जबान खोल दी.

वह पुलिस टीम को महेवाघाट थाना क्षेत्र ले गया. वहां उस ने एक गड्ढे से मृतक ईशा का पर्स व सोने का एक कंगन बरामद करा दिया. पर्स में कुछ नकदी व जरूरी कागजात थे. पुलिस टीम ने यहीं से मनीष की खून से सनी शर्ट भी बरामद कर ली, जिसे उस ने हत्या के बाद खून रोकने के लिए इस्तेमाल किया था. बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने मनीष को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. मनीष को जेल भेजने के बाद पुलिस टीम ने ईशा की हत्या के मुख्य आरोपी दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को पकड़ने की कवायद शुरू की. एसएसपी शलभ माथुर ने उसे पकड़ने के लिए 12 हजार का ईनाम घोषित कर दिया था. लेकिन दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह पुलिस की हर युक्ति को धता बता कर 8 जून को कोर्ट में हाजिर हो गया. पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम हाथ मलती रह गई.

दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा आत्मसमर्पण की बात कानपुर कोर्ट में फैली तो वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वे झुंड बना कर सीजेएमएम कोर्ट जा पहुंचे. पुलिस जब ज्ञानेंद्र को ले जाने लगी तो वकील उस पर टूट पड़े और उसे लातघूंसों से जम कर पीटा, उन्होंने उस के कपड़े फाड़ दिए और मुंह पर थूका. बड़ी मसक्कत के बाद पुलिस उसे जेल ले जा सकी. कत्ल में इस्तेमाल हथियार और मृतका का सिर बरामद करने के लिए पुलिस टीम ने दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को 17 जून को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. काफी जद्दोजहद के बाद ज्ञानेंद्र सिंह ने मुंह खोला. वह पुलिस टीम को महेवाघाट, कौशांबी में यमुना नदी के दूसरी तरफ ले गया, जहां उस ने जमीन में गड़े सर्जिकल चाकू, ईशा का मंगलसूत्र, चेन और अंगूठी बरामद कराई. ईशा के सिर के संबंध में पूछने पर ज्ञानेंद्र ने बताया कि उसे यमुना नदी की तेज धारा में फेंक दिया गया था.

सिर को बरामद करने के लिए पुलिस ने यमुना नदी में जाल डलवाया, लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका था. पुलिस पूछताछ में ज्ञानेंद्र ने बताया कि ईशा उस पर पहली पत्नी नीलम को तलाक देने का दबाव बना रही थी. जिस से परेशान हो कर उस ने उसे ठिकाने लगा दिया. वह उसे मंदिर दर्शन कराने के बहाने ले गया था. रास्ते में कार के भीतर ही उस का काम तमाम कर दिया गया. फिर धड़ को महेवाघाट थाने के पास यमुना नदी के पास फेंक दिया गया और सिर यमुना नदी में. वारदात के वक्त मनीष कठेरिया, उस का भाई बच्चा, अर्जुन तथा उस की प्रेमिका अवंतिका उस के साथ थे.

19 जून, 2015 को काकादेव पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह को सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. अभियुक्त बच्चा फरार था. Hindi stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News: मोहब्बत की बुनियाद पर रची साजिश

UP News: सना ने प्यार की बुनियाद रखी तो थी प्रेमी सौरभ सक्सेना के साथ, लेकिन महत्त्वाकांक्षाओं ने उस के कदम खुरशीद आलम की तरफ मोड़ दिए. फिर सना ने सौरभ को रास्ते से हटाने के लिए खुरशीद के साथ मिल कर ऐसी साजिश रची कि…

मुरादाबाद शहर की रामगंगा विहार फेज-2 कालोनी का रहने वाला सौरभ सक्सेना रोज की तरह 6 फरवरी, 2015 को भी सुबह साढ़े 6 बजे मौर्निंग वौक के लिए घर से निकला. वह घूमटहल कर घंटे-2 घंटे में घर लौट आता था, लेकिन उस दिन वह 2-3 घंटे तक नहीं लौटा तो पिता के.सी. सक्सेना  ने यह जानने के लिए उसे फोन लगाया कि वह कहां है और अब तक घर क्यों नहीं लौटा? लेकिन उस का फोन बंद था. घर वालों ने सौरभ के दोस्तों को फोन किया तो पता चला कि वह उन के पास भी नहीं गया. उस का कहीं पता न चलने पर घर वाले परेशान हो गए.

सौरभ ने कुछ दिनों पहले ही आशियाना मोहल्ले में स्थित बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी जिम जाना शुरू किया था. यह बात उस के बड़े भाई गौरव को पता थी. सौरभ जिम गया था या नहीं, यह जानने के लिए वह वहां गया तो उस के गेट पर ताला लटका मिला. वहां से वह निराश हो कर घर लौट आया. दोपहर के समय के.सी. सक्सेना के फोन पर सौरभ का फोन आया तो वह खुश हुए कि बेटे का फोन आ गया. उन्होंने जैसे ही हैलो कहा, दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘पापा, मैं इस समय नवीननगर में हूं.’’

इस के बाद दूसरी तरफ से फोन काट दिया गया. के.सी. सक्सेना उस आवाज को सुन कर हैरान थे, क्योंकि वह आवाज सौरभ की नहीं थी. वह सोच में पड़ गए कि आखिर कौन है, जो सौरभ बन कर बात कर रहा है. उसी दिन सौरभ के फोन से हिमांशु के फोन पर भी फोन आया था कि उस के पास पापा का फोन तो नहीं आया था? हिमांशु सौरभ का दोस्त था. वह आवाज सुन कर हिमांशु भी चौंका था, क्योंकि वह आवाज सौरभ की नहीं थी. हिमांशु ने यह बात सौरभ के पिता के.सी. सक्सेना को बता दी थी. के.सी. सक्सेना अब और ज्यादा परेशान हो गए कि उन का जवान बेटा न जाने कहां है और उस के फोन से न जाने कौन बात कर रहा है? वह अपने परिचितों को ले कर थाना सिविल लाइंस पहुंचे और बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

सौरभ की चिंता में उस के घर वाले रात भर परेशान रहे. अगले दिन के.सी. सक्सेना एसएसपी लव कुमार से मिले. मामले की गंभीरता को समझते हुए एसएसपी ने उसी समय एसपी (सिटी) प्रदीप गुप्ता को अपने औफिस में बुलवाया और इस मामले में आवश्यक काररवाई करने को कहा. के.सी. सक्सेना ने एसपी (सिटी) प्रदीप गुप्ता को विस्तार से पूरी बात बता कर कहा कि जिस शख्स ने सौरभ के फोन से बात की थी, वह उस शख्स को नहीं जानते. उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश वगैरह भी नहीं है. जिस समय के.सी. सक्सेना के फोन पर सौरभ के फोन से बात की गई थी, उस समय उस की लोकेशन कहां थी, यह जानने के लिए एसपी (सिटी) प्रदीप गुप्ता ने सौरभ के फोन की काल डिटेल्स निकलवाने के साथ उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया.

एसपी (सिटी) के निर्देश पर सिविल लाइंस के सीओ मोहम्मद इमरान ने सौरभ की काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो पता चला कि 6 फरवरी को उस के फोन से दोपहर एक बजे के करीब मुरादाबाद शहर के ही पीली कोठी इलाके से बात की गई थी. इसी के साथ एक फोन नंबर ऐसा भी मिल गया, जिस से सौरभ के मोबाइल पर 6 फरवरी को सुबह 6 बज कर 25 मिनट पर बात की गई थी. उसी नंबर से 26 जनवरी, 2015 से 7 फरवरी, 2015 तक सौरभ के मोबाइल पर 6 बार बात हुई थी. यह फोन नंबर यूनिनार कंपनी का था.

यूनिनार कंपनी का यह फोन नंबर पुलिस के शक के दायरे में आ गया. मोहम्मद इमरान ने यूनिनार कंपनी के इस फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई. इस में पुलिस को चौंकाने वाली यह जानकारी मिली कि इस नंबर से केवल सौरभ के मोबाइल पर ही बातें की गई थीं. इस से पुलिस को यह समझने में देर नहीं लगी कि यह नंबर केवल सौरभ से बात करने के लिए ही लिया गया था. अब पुलिस यह जानने में लग गई कि यूनिनार कंपनी का यह नंबर किस के नाम से लिया गया था. पुलिस को यूनिनार कंपनी से जो जानकारी मिली, उस से पता चला कि वह नंबर रेलवे हरथला कालोनी के दुकानदार मुन्ना पहाड़ी से खरीदा गया था. नंबर लेते समय 2-2 आईडी प्रूफ लगे थे.

ताज्जुब की बात यह थी कि दोनों आईडी पर अलगअलग लोगों के फोटो लगे थे. एक आईडी संभल के किसी आदमी की थी तो दूसरी मुरादाबाद के आदमी की थी. दोनों ही पतों पर पुलिस टीमें भेजी गईं, लेकिन दोनों पते फरजी निकले. इस से पुलिस की जांच जहां की तहां रुक गई. कहीं से कोई सुराग मिले, इस के लिए पुलिस टीम फिर से यूनिनार के उस फोन नंबर की काल डिटेल्स खंगालने लगी. पता चला कि इस नंबर की 3 दिन पहले की लोकेशन आशियाना इलाके की थी. सीओ मोहम्मद इमरान ने के.सी. सक्सेना से पूछा कि आशियाना इलाके में सौरभ का कोई परिचित तो नहीं रहता? इस पर उन्होंने बताया कि आशियाना इलाके के बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी नाम के जिम में सौरभ जाता था.

सौरभ के गायब होने का राज कहीं इस जिम में तो नहीं छिपा, यह जानने के लिए मोहम्मद इमरान बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी नाम के उस जिम में पहुंचे. वहां जिम संचालक खुरशीद आलम और जिम की रिसैप्शनिस्ट सना उर्फ सदफ मिली. उन्होंने दोनों से सौरभ के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि सौरभ उन के जिम में आता तो था, लेकिन 6 फरवरी से वह जिम नहीं आ रहा है. उन से बात करने के बाद सीओ साहब अपने औफिस लौट आए. कई दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस को सौरभ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी. उस का मोबाइल फोन बंद था. सौरभ अगवानपुर के एक इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहा था. मोहल्ले में और कालेज में उस के जो भी नकदीकी दोस्त थे, पुलिस ने उन सब से पूछताछ की. उन से भी सौरभ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

11 फरवरी, 2015 को मुरादाबाद के ही थाना मझोला के अंतर्गत आने वाले भोला सिंह की मिलक के पास नाले में एक ड्रम देखा गया. ड्रम का आधा भाग पानी में डूबा था और आधा पानी के ऊपर दिखाई दे रहा था. शक होने पर किसी ने इस की सूचना थाना मझोला पुलिस को दे दी. मझोला पुलिस ने मौके पर पहुंच कर उस ड्रम को नाले से निकलवाया तो उस में से प्लास्टिक के बोरे में बंद एक युवक की लाश निकली. वह युवक ट्रैक सूट और स्पोर्ट्स शूज पहने था. मझोला पुलिस ने लाश का हुलिया बताते हुए इस बात की सूचना वायरलैस द्वारा जिला पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

सिविल लाइंस के थानाप्रभारी ने वायरलैस की यह सूचना सुनी तो वह चौंके, क्योंकि लाश का जो हुलिया बताया गया था, वही हुलिया उन के क्षेत्र के गायब युवक सौरभ सक्सेना का था. थानाप्रभारी ने फोन कर के तुरंत सौरभ के पिता को थाने बुलाया और उन्हें ले कर भोला सिंह की मिलक के पास उस जगह पहुंच गए, जहां ड्रम में लाश मिली थी. जैसे ही के.सी. सक्सेना ने लाश देखी, वह दहाड़ें मार कर रोने लगे. क्योंकि वह लाश उन के 19 वर्षीय बेटे सौरभ की ही थी. उस का सिर फूटा हुआ था. उस के मुंह में एक लंगोट ठूंसा हुआ था और दूसरे लंगोट से उस की नाकमुंह को कवर करते हुए गले को बांधा गया था. देख कर ही लग रहा था किसी भारी चीज से उस के सिर पर कई वार किए गए थे. सौरभ की हत्या की खबर मिलते ही उस के घर में कोहराम मच गया. परिवार के लोग और संबंधी रोतेबिलखते घटनास्थल पर पहुंच गए.

सूचना मिलने के बाद एसएसपी लव कुमार और अन्य पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए थे. जरूरी काररवाई के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. 11 फरवरी की शाम को ही डाक्टरों के एक पैनल ने सौरभ सक्सेना की लाश का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार सौरभ की हत्या करीब 5 दिनों पहले की गई थी यानी जिस दिन वह गायब हुआ था, उस के कुछ घंटे बाद ही उसे मार दिया गया था. हत्यारों ने लोहे की रौड जैसी किसी भारी चीज से उस के सिर पर 18 वार किए थे. वार इतनी ताकत से किए गए थे कि उस के सिर की हड्डियां तक टूट गई थीं. इस के बाद सिर को बुरी तरह कुचला गया था. डाक्टरों ने मौत की वजह हेड इंजरी बताया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारों ने सौरभ के मुंह में लंगोट ठूंस कर दूसरे लंगोट से जिस तरह उस की नाक और मुंह को बांधा था, हत्या करने वालों की संख्या 2 से अधिक रही होगी. ऐसा उन्होंने इसलिए किया होगा, ताकि उस की चीख न निकल सके. यह सब किस ने किया था, यह पता लगाना पुलिस के लिए आसान नहीं था. लाश के पास ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला था, जिस से हत्यारों तक जल्दी पहुंचा जा सके. लंगोट और ड्रम के सहारे पुलिस ने जांच आगे बढ़ाने की कोशिश शुरू की. सब से पहले पुलिस ने के.सी. सक्सेना से पूछा कि सौरभ लंगोट बांधता था क्या?

‘‘नहीं, वह घर पर कभी लंगोट नहीं बांधता था. हो सकता है कि जिम में एक्सरसाइज करते समय लंगोट बांधता रहा हो.’’ के.सी. सक्सेना ने बताया तो सीओ मोहम्मद इमरान के नेतृत्व में एक पुलिस टीम एक बार फिर आशियाना कालोनी स्थित जिम बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी पहुंची. उस जिम के बाईं ओर रेड सफायर नाम का बैंक्वेट हाल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. जिम के दाईं ओर एक अस्पताल था, उस के बाहर भी सीसीटीवी कैमरे लगे थे. 6 फरवरी को सौरभ जिम में आया था या नहीं, यह बात सीसीटीवी फुटेज से पता लग सकती थी. पुलिस ने बैंक्वेट हाल और अस्पताल के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो उस में 6 फरवरी की सुबह सौरभ एक लड़की के साथ जिम की तरफ आता दिखाई दिया.

सौरभ के भाई गौरव ने उस लड़की को तुरंत पहचान कर बताया कि यह लड़की उस के घर में काम करने वाली नौकरानी की बेटी सना उर्फ सदफ है. यह बौडी फ्यूल फिटनेस जिम में नौकरी करती है. फुटेज देखने के बाद पुलिस को इस बात पर हैरानी हुई कि जिम संचालक खुरशीद आलम और सना ने उस से यह झूठ क्यों बोला कि 6 फरवरी को सौरभ जिम नहीं आया था. जबकि फुटेज में वह सना के साथ जिम में जाता दिखाई दिया था. पुलिस टीम खुरशीद आलम के जिम पहुंची. सीओ मोहम्मद इमरान को देखते ही खुरशीद घबरा गया. उस से बात किए बिना ही पुलिस ने जिम की तलाशी ली तो वहां उसी तरह के लंगोट टंगे हुए मिले, जिस तरह के मृतक सौरभ के मुंह और गरदन पर बंधे मिले थे. उसी दौरान खुरशीद ने मोहम्मद इमरान से पूछा, ‘‘सर, सौरभ के हत्यारों का कुछ पता चला?’’

‘‘देखो, अभी पता चल जाएगा,’’ कह कर उन्होंने एक थप्पड़ खुरशीद आलम के गाल पर जड़ दिया.

खुरशीद को ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह हक्काबक्का रह गया. उस के मुंह से कोई जवाब नहीं निकला. सीओ ने पूछा, ‘‘तुम लोगों ने सौरभ को क्यों मारा?’’

रिसैप्शनिस्ट सना उर्फ सदफ यह देख कर घबरा गई. सीओ के निर्देश पर महिला पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. दोनों को हिरासत में ले कर इमरान मोहम्मद ने उन से सौरभ की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि सौरभ की हत्या उन्होंने ही इसी जिम में की थी. उन्होंने उस की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. मुरादाबाद महानगर के सिविल लाइंस में है एक कालोनी रामगंगा विहार फेज-2. इसी कालोनी में के.सी. सक्सेना अपनी पत्नी अलका सक्सेना और 3 बच्चों के साथ रहते थे. बच्चों में बेटा गौरव, सौरभ और बेटी साक्षी थी. के.सी. सक्सेना प्रथमा बैंक में शाखा प्रबंधक थे और उन की पोस्टिंग महानगर से 10 किलोमीटर दूर पाकबड़ा शाखा में थी. अपने छोटे परिवार के साथ वह हंसीखुशी से रह रहे थे.

पढ़ाई पूरी करने के बाद बड़ा बेटा गौरव सक्सेना चड्ढा ग्रुप के मुरादाबाद स्थित वेब मौल में नौकरी करने लगा था, जबकि सौरभ अभी अगवानपुर के एक कालेज से 12वीं की पढाई कर रहा था. के.सी. सक्सेना के यहां किसी तरह की आर्थिक समस्या नहीं थी. लेकिन वह शारीरिक रूप से अस्वस्थ थे. वह हार्ट पेशेंट थे. उन की 2 बार हार्ट सर्जरी हो चुकी थी. उन के साथसाथ उन की पत्नी अलका भी अकसर बीमार रहती थीं. जिस से उन्हें घर के काम करने और खाना बनाने में परेशानी होती थी. घर के काम करने और खाना बनाने के लिए उन्होंने शबनम को रख लिया था.

शबनम रामगंगा विहार की ही ईडब्ल्यूएस कालोनी में रहने वाले मोहम्मद इमरान की पत्नी थी. मोहम्मद इमरान टूव्हीलर मैकेनिक था और उस की 2 बीवियां थीं. शबनम उस की दूसरी बीवी थी. कभीकभी शबनम अपनी बेटी सना उर्फ सदफ को भी ले आती थी. सना के.सी. सक्सेना की बेटी साक्षी की ही उम्र की थी, इसलिए उन दोनों में दोस्ती हो गई थी. सना भी पढ़ाई कर रही थी. कभी शबनम को के.सी. सक्सेना के यहां आने में देर हो जाती तो सौरभ बाइक से उस के घर पहुंच जाता और उसे बाइक पर बैठा कर ले आता. शबनम की बेटी सना जवान और सुंदर थी. वह महानगर के ही दयानंद डिग्री कालेज से बीए की पढ़ाई कर रही थी.

घर आनेजाने की वजह से सौरभ और सना के बीच दोस्ती हो गई. धीरेधीरे यही दोस्ती प्यार में बदल गई. प्यार जब परवान चढ़ा तो उन के बीच जिस्मानी संबंध भी बन गए. हालांकि दोनों के सामाजिक स्तर में जमीनआसमान का अंतर था. इस के अलावा वे अलगअलग धर्मों से भी थे, फिर भी उन्होंने शादी कर के जिंदगी भर साथ रहने की कसमें खाईं. काफी दिनों तक उन के संबंधों की भनक किसी को नहीं लगी. सना सौरभ पर शादी के लिए दबाव डालने लगी तो वह बोला, ‘‘सना, हमारे और तुम्हारे बीच सब से बड़ी बाधा धर्म की है. तुम मुसलिम हो और मैं हिंदू.’’

सौरभ की बात पूरी होने से पहले ही सना ने कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो सौरभ? यह बात तो तुम्हें पहले सोचनी चाहिए थी.’’

‘‘सना, तुम नाराज मत होओ. देखो, जब तक बड़े भाई गौरव की शादी नहीं हो जाती, तब तक इस बारे में घर वालों से बात करना बेकार है. गौरव की शादी के बाद मैं घर वालों को समझाने की कोशिश करूंगा.’’ सौरभ ने सना को सममझाया.

झूठी दिलासा के सहारे 3 साल गुजर गए. सना मन ही मन यही सपना संजोए बैठी थी कि सौरभ से शादी करने के बाद वह ऐश की जिंदगी जिएगी. लेकिन प्रेमी के झूठे वादों से उसे अपने सपने धूमिल होते नजर आ रहे थे. इसलिए उस ने सौरभ से दूरी बनानी शुरू कर दी.

सना पढ़ीलिखी खूबसूरत युवती थी. उसे अब अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए उस ने नौकरी तलाशनी शुरू कर दी. कोशिश करने पर उसे महानगर में कांठ रोड पर स्थित एक जिम में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई. बाद में वह उसी जिम में ट्रेनर हो गई. वहां नौकरी पर लगे उसे कुछ ही दिन हुए थे कि उसे पता चला कि आशियाना कालोनी में बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी नाम का एक नया जिम खुला है और वहां रिसैप्शनिस्ट की जगह खाली है. यह खबर मिलते ही वह नौकरी के लिए उस जिम में पहुंच गई, ताकि वहां उसे ज्यादा तनख्वाह मिल सके. वहां उस की बात बन गई. यानी बौडी फ्यूल जिम में उसे रिसैप्शनिस्ट व महिला ट्रेनर की नौकरी मिल गई. यह जिम हरथला कालोनी के रहने वाले खुरशीद आलम का था.

जब लोगों को पता चला कि जिम में महिला ट्रेनर भी है तो वहां महिलाओं ने भी आना शुरू कर दिया, जिस से जिम की आमदनी बढ़ने लगी. दिन भर जिम में साथ रहने की वजह से सना और खुरशीद एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए. उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. खुरशीद की बांहों में जाने के बाद सना सौरभ को भूल चुकी थी. वह खुरशीद के साथ ही बाइक पर घूमती. चूंकि दोनों एक ही धर्म के थे, इसलिए खुरशीद ने सना से शादी का वादा किया. उधर जब सौरभ को सना और खुरशीद के संबंधों के बारे में पता चला तो उसे बहुत दुख हुआ. उस ने इस बारे में सना से फोन पर बात करनी चाही, लेकिन सना ने उस का फोन रिसीव नहीं किया. जबकि इस से पहले उस की सना से फोन पर कभीकभार बात हो जाया करती थी.

तब सौरभ उस से मिलने के लिए बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी जिम जाने लगा. इतना ही नहीं, वह सना पर जिम की नौकरी छोड़ने के लिए दबाव भी बनाने लगा. लेकिन सना ऐसा करने को तैयार नहीं थी. सौरभ के बारबार जिम जाने पर खुरशीद को शक हो गया. खुरशीद ने सना से सौरभ के बारे में पूछा. तब सना ने खुरशीद को सौरभ के साथ रहे अपने संबंधों के बारे में बता दिया. उस ने यह भी बता दिया कि सौरभ उस पर जिम से नौकरी छोड़ने को कह रहा है. सना ने सौरभ से जिम आने से मना करते हुए कहा कि बेहतर यही होगा कि वह उसे भूल जाए. पर सौरभ उसे भूलने को तैयार नहीं था. उस ने कहा कि वह उस के बिना जिंदा नहीं रह सकता. इतना ही नहीं, उस ने सना को धमकी भी दे दी कि अगर उस ने खुरशीद से शादी कर ली तो वह उस के अश्लील फोटो इंटरनेट पर डाल देगा.

इस धमकी से सना डर गई. उस ने फोटो वाली बात खुरशीद को बता कर इस का कोई वाजिब हल निकालने को कहा. खुरशीद सना के प्यार में पागल था. वह उस पर अंधाधुंध पैसे खर्च कर रहा था. अकसर सना के साथ घूमनेफिरने से उस के धंधे पर भी असर पड़ना शुरू हो गया था. उस का लगातार नुकसान हो रहा था, जिस से वह लोगों का कर्जदार भी हो गया था. पिछले 2 महीने से उस ने सना की तनख्वाह और बिल्डिंग का किराया भी नहीं दिया था. लगातार हो रहे घाटे से वह परेशान रहने लगा था. खुरशीद ने एक दिन अपनी परेशानी सना को बताई और कहा कि वह कोई ऐसा काम करना चाहता है, जिस में एक ही झटके में लाखों रुपए आ सकें.

सना ने सौरभ के घरपरिवार के बारे में खुरशीद को पहले ही बता दिया था. इसलिए दोनों ने प्लान बनाया कि अगर सौरभ का अपहरण कर लिया जाए तो उस के घर वालों से लाखों रुपए की फिरौती मिल सकती है. क्योंकि उस के पिता बैंक में मैनेजर हैं. खुरशीद का बचपन का एक दोस्त था निहाल जैदी. निहाल जैदी के पिता सैयद अली आजम जैदी व खुरशीद के पिता निजामुद्दीन अंसारी दोनों ही रेलवे में टीटीई थे और एक साथ मुरादाबाद मंडल में रह चुके थे. दोनों के घर वालों का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. इसीलिए खुरशीद और निहाल जैदी में गहरी दोस्ती थी.

सैयद अली आजम जैदी मूलरूप से मुफ्तीगंज लखनऊ के रहने वाले थे. रिटायर होने के बाद वह लखनऊ चले गए थे. निहाल जैदी आवारा किस्म का था, इसलिए घर वालों ने उसे घर से निकाल दिया था. लखनऊ से वह अपने दोस्त खुरशीद के पास चला आया और उसी के साथ ही रह रहा था. निहाल जैदी भी जिम का काम देखता था. सना और खुरशीद ने निहाल को भी अपनी योजना में शामिल कर लिया था. तीनों ने योजना बनाई थी कि सौरभ का अपहरण कर उस के घर वालों से 10 लाख रुपए की फिरौती वसूल कर उसे ठिकाने लगा देंगे. योजना को सुरक्षित ढंग से अंजाम देने के लिए खुरशीद ने फरजी आईडी पर एक सिम खरीदा. यह सिम उस ने महानगर की ही रेलवे हरथला कालोनी के दुकानदार मुन्ना पहाड़ी से खरीदा था. उस सिम को उस ने अपने फोन में डालने के बजाय इस के लिए एक चाइनीज फोन खरीदा.

इस के बाद सौरभ को झांसे में लेने की जिम्मेदारी सना को सौंप दी गई. सना ने 26 जनवरी, 2015 से इसी नए नंबर से सौरभ से बात करनी शुरू कर दी. सौरभ ने फिर उस से नौकरी छोड़ने की बात कही. 26 जनवरी को सना ने सौरभ को फोन कर के कहा था, ‘‘सौरभ, मैं काम छोड़ने को तैयार हूं, लेकिन खुरशीद ने 2 महीने से मेरी तनख्वाह नहीं दी है. ऐसा करो, तुम भी जिम जौइन कर लो. हम यहीं पर मिलते रहेंगे और जैसे ही मेरी तनख्वाह मिल जाएगी, मैं नौकरी छोड़ दूंगी.’’

यह बात सौरभ की समझ में आ गई और उस ने बौडी फ्यूल फिटनेस एकेडमी जौइन कर ली. यह बात घटना से 4 दिन पहले की थी. जिम जाने की बात उस ने अपने बड़े भाई गौरव को बता दी थी. 6 फरवरी, 2015 को सुबहसुबह सौरभ के मोबाइल पर सना का फोन आया, ‘‘सौरभ, तुम अभी तक जिम नहीं आए. जल्दी आ जाओ. इस समय यहां कोई नहीं है.’’

‘‘बस, मैं थोड़ी देर में पहुंच रहा हूं.’’ सौरभ ने कहा.

सौरभ मौर्निंग वौक के लिए निकलता था. इस के बाद वह उधर से ही जिम चला जाता था. लेकिन उस दिन उस का फोन आने पर वह सीधा जिम चला गया था. जिम के पास सना उस का पहले से ही इंतजार कर रही थी. उसे देखते ही सौरभ खुश हो गया. सना ने गर्मजोशी से उस का स्वागत किया और उसे अपने साथ जिम ले गई. जिम में पहुंच कर सना ने कहा, ‘‘सौरभ, तुम चेंजिंग रूम में कपड़े बदल लो, मैं यहीं बैठी हूं. सौरभ चेंजिंग रूम में गया तो वहां पहले से ही खुरशीद और निहाल जैदी मौजूद थे. दोनों ने उस की पिटाई शुरू कर दी. सौरभ चीखने लगा तो उन्होंने जिम में रखा एक लंगोट उस के मुंह में ठूंस दिया और दूसरा उस के मुंह और नाक में लपेट कर गले में बांध दिया.

इस के बाद भी वह हाथपैर चलाने लगा तो खुरशीद ने लोहे की रौड से उस के सिर पर कई वार कर दिए, जिस से उस का सिर फट गया और खून बहने लगा. इस के बाद सौरभ उन का मुकाबला नहीं कर सका और जमीन पर गिर गया. उधर सना ने डेक बजा कर उस की आवाज तेज कर दी थी, जिस से सौरभ चीखचिल्लाहट की आवाज बाहर किसी को सुनाई नहीं दी. खुरशीद और निहाल ने देखा कि सौरभ मर गया है तो उन्होंने सना को बुला लिया. सना ने कहा कि किसी भी हालत में अब यह जिंदा नहीं बचना चाहिए. वह एक सीरिंज में बाथरूम में रखा तेजाब भर लाई और तेजाब का इंजेक्शन उस के सीने में लगा दिया.

तीनों को लगा कि सौरभ मर गया है तो उन्होंने उस की लाश पहले से ला कर रखे पौलीथिन के एक बैग में भर दी. अब उन के सामने समस्या यह थी कि वह लाश को ठिकाने लगाने के लिए बाहर कैसे ले जाएं. हरथला में ही खुरशीद के बहनोई नदीम रहते थे. उन का वहीं पर एक कौनवेंट स्कूल था. उन्होंने ही खुरशीद को यशवीर चौधरी का बड़ा हौल किराए पर दिलवाया था, जिस का किराया 20 हजार रुपए महीना था. लाश ठिकाने लगाने के लिए तीनों ने एक प्लान तैयार कर लिया. प्लान के अनुसार खुरशीद अकेला जिम से चला गया और अपने एक परिचित की माल ढोने वाली छोटी टाटा मैजिक गाड़ी ले आया.

जिम के बराबर वाली इमारत में यशवीर चौधरी का प्रौपर्टी डीलिंग का औफिस था. उन्होंने जिम के बाहर माल ढोने वाली टाटा मैजिक गाड़ी देखी तो उन्हें लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि खुरशीद उन का किराया दिए बिना हौल खाली कर के जा रहा है. क्योंकि खुरशीद ने उन का 2 महीने का किराया नहीं दिया था, इसलिए जब उन्होंने जिम के सामने गाड़ी खड़ी देखी तो खुरशीद से पूछा. तब खुरशीद ने बताया कि दौड़ने वाली मशीन खराब हो गई है, उसे ठीक कराने ले जाना है. खुरशीद, सना और निहाल ने मिल कर एक इलैक्ट्रौनिक मशीन जिम से निकाल कर उस गाड़ी में रख दी. उसे खुरशीद व निहाल ले कर चले गए.

करीब आधे घंटे बाद खुरशीद और निहाल जैदी उस मशीन को ले कर वापस आ गए. वह अपने साथ एक ड्रम भी ले आए थे. वह ड्रम एक निर्माणाधीन इमारत से लाए थे. मशीन और ड्रम को वह जिम में ले गए. उस ड्रम में उन्होंने सौरभ की लाश डाल दी. फिर उस ड्रम को उसी टाटा मैजिक गाड़ी में रख लिया. पुन: गाड़ी देख कर मकान मालिक यशवीर चौधरी ने खुरशीद से ड्रम के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि कुछ मशीनों के पार्ट्स खराब हो गए हैं. इस ड्रम में वही खराब पार्ट्स हैं, जिन्हें सही करा कर लाना है. यशवीर चौधरी को उस पर विश्वास नहीं हुआ तो उस ने खुरशीद के बहनोई नदीम को फोन किया, जिन की जमानत पर चौधरी ने उसे कमरा किराए पर दिया था.

नदीम ने भी उसे यही बताया कि उस की कुछ मशीनें खराब हो गई हैं. नदीम के कहने पर यशवीर चौधरी को विश्वास हो गया. वह अपने औफिस में बैठ कर पार्टी से बात करने लगे. खुरशीद, सना और निहाल लाश वाला ड्रम गाड़ी में रख कर निकल गए और जिम में ताला लगा दिया. वहां से खुरशीद सीधे हरथला स्थित अपने बहनोई के स्कूल पहुंचा. स्कूल के कंप्यूटर लैब में उस ने लाश वाला ड्रम रखवा दिया. बहनोई को भी उस ने यही बताया कि ड्रम में मशीनों के पुरजे हैं. अगले दिन 7 फरवरी, 2015 की रात को वह टाटा मैजिक गाड़ी से वह उस ड्रम को ले कर निकल गया और उसे भोला सिंह की मिलक के पास नाले में फेंक आया. लाश ठिकाने लगा कर वह अपने घर चला गया. डर की वजह से उन्होंने घर वालों को फिरौती के लिए फोन नहीं किया.

सना और खुरशीद से पूछताछ के बाद पुलिस ने तीसरे अभियुक्त निहाल जैदी की तलाश शुरू कर दी. पता चला कि वह लखनऊ भाग गया है. एक पुलिस टीम निहाल जैदी की तलाश में लखनऊ भेजी गई, लेकिन वह वहां भी नहीं मिला. पुलिस ने सना और खुरशीद को मुरादाबाद के एसीजेएम प्रथम की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीसरा अभियुक्त निहाल जैदी गिरफ्तार नहीं हो सका था. UP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Story in Hindi: दिलजला दोस्त

Love Story in Hindi: सकीना कासिम को प्यार करती थी, जबकि कासिम का दोस्त शाहीन सकीना को प्यार करता था. यह बात शाहीन को बिलकुल अच्छी नहीं लगी. आखिर शाहीन ने ऐसा क्या किया कि सकीना न कासिम की रही और न उस की. सपने पूरे हों या न हों, लेकिन देखने में कोई बुराई नहीं है. आज हर कोई ज्यादा से ज्यादा पाने की कोशिश में लगा है. इसी ज्यादा पाने की कोशिश में कभी आदमी कुछ गलत भी कर बैठता है. कासिम और शाहीन भले ही निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से थे, लेकिन टीवी और मोबाइल ने उन्हें महत्त्वाकांक्षी बना दिया था. छोटा परदा उन्हें नएनए सपने दिखाता था और उस पर दिखाई देने वाली लड़कियां दोनों को बहुत अच्छी लगती थीं.

इटावा के मोहल्ला गाड़ीपुरा का रहने वाला इश्तियाक मजदूरी कर के अपने परिवार को पाल रहा था. लेकिन उस का बेटा कासिम सपनों की दुनिया में जीने वाला युवक था. मोहल्ले के ही रहने वाले सलीम के बेटे शाहीन से उस की पक्की दोस्ती थी, दोनों अक्सर साथसाथ रहते थे. इसलिए दोनों को एकदूसरे का हर राज पता होता था. एक दिन मोहल्ले के ही रहने वाले शकील की बेटी सकीना से कासिम की नजरें लड़ीं तो वह मुसकरा उठी. कासिम दिल थाम कर रह गया. सकीना की मुसकराहट ने उस के दिल पर जादुई असर किया था. इस के बाद वह अपने दिल की बात कहने को बेचैन रहने लगा था.

उसी दिन के बाद से कासिम सकीना के घर के इर्दगिर्द मंडराने लगा था. वह उस से दिल की बात कहना चाहता था, लेकिन यह इतना आसान नहीं था. इसलिए वह मौका तलाश रहा था कि सकीना कब अकेले में मिले. जहां चाह होती है, वहां राह मिल ही जाती है. ऐसा ही कुछ कासिम के साथ भी हुआ. मोहल्ले में होने वाली एक शादी समारोह में कासिम की मुलाकात सकीना से हो गई. उस ने उस के पास जा कर कहा, ‘‘सकीना, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

कासिम भले ही मोहल्ले का रहने वाला था, लेकिन सकीना से उस की कभी बात नहीं हुई थी. इसलिए उस ने झिझकते हुए पूछा, ‘‘कोई खास काम है क्या?’’

‘‘खास काम है, तभी तो कह रहा हूं.’’

‘‘तो बताओ न क्या काम है?’’ सकीना ने पूछा.

‘‘इस भीड़ में नहीं कह सकता. अकेले में मिलोगी, तब कहूंगा.’’ कसिम ने सकीना को चाहत भरी नजरों से ताकते हुए कहा.

‘‘ठीक है, कल शाम को सब्जी मंडी सब्जी लेने आऊंगी, वहीं मिलना. तुम अपना मोबाइल नंबर दे दो, मैं तुम्हें फोन कर दूंगी.’’ सकीना ने कहा.

कासिम ने सकीना को मोबाइल नंबर दे दिया. सकीना तो चली गई, पर कासिम के दिल में हलचल मचा गई. कासिम को उस रात नींद नहीं आई. वह यही सोचता रहा कि दिल की बात सकीना से कैसे कहेगा? सकीना ने मिलने के लिए हामी भर दी थी, जिस से वह इतना तो समझ ही गया था कि सकीना उस की बात को हवा में नहीं उड़ाएगी.

अगले दिन सुबह से ही उसे सकीना के फोन का इंतजार था. 5 बजे के आसपास घंटी बजते ही उस का दिल धड़क उठा. सकीना के बुलाने पर वह सब्जी मंडी पहुंच गया. सकीना वहां उस का इंतजार कर रही थी. कासिम उसे चाट के एक ठेले पर ले गया. गोलगप्पे खाते हुए सकीना ने कहा, ‘‘तुम कुछ कहना चाहते थे न?’’

‘‘हां, पहले गोलगप्पे खा लो, उस के बाद कह दूंगा.’’ कासिम ने कहा.

गोलगप्पे खाने के बाद मुंह पोंछते हुए सकीना ने कहा, ‘‘जो भी कहना है, जल्दी कहो, मुझे घर भी जाना है. तुम्हारे साथ किसी ने देख लिया तो…?’’

‘‘सकीना, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, इसलिए मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. मन करता है, तुम्हें ही देखता रहूं.’’ कासिम ने बिना किसी भूमिका के दिल की बात कह दी.

कासिम की इस बात पर सकीना गंभीर हो कर बोली, ‘‘कासिम, तुम्हें पता होना चाहिए कि हमारे यहां प्यारमोहब्बत कोई मायने नहीं रखता. हमारे यहां तो वैसे भी आए दिन मेरी शादी की बात होती रहती है.’’

कासिम ने सकीना का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘सकीना, मैं तुम्हारे बिना जिंदा नहीं रह सकता. अब तुम्हीं बताओ, मैं अपने इस दिल का क्या करूं जो तुम पर आ गया है.’’

सकीना का दिल तेजी से धड़कने लगा था. उस ने कासिम का हाथ मुट्ठी में ले कर कहा, ‘‘अधर में तो नहीं छोड़ दोगे, निभाओगे मेरा साथ?’’

अपना दूसरा हाथ सकीना के हाथ पर रख कर कासिम बोला, ‘‘वादा करता हूं, मरते दम तक मैं तुम्हारा ही रहूंगा सकीना. हम और तुम एकदूसरे के लिए बने हैं, तभी तो अचानक तुम मुझे अच्छी लगने लगी हो.’’

उस दिन के बाद कासिम और सकीना की जिंदगी बदल गई. दोनों ही एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताने के सपने बुनने लगे. लेकिन ये सपने आगे चल कर किस कदर महंगे पड़ने वाले हैं, यह कोई नहीं जानता था. मोहब्बत के रंग लाते ही दोनों के रात और दिन खुशियों से भर गए. समय के साथ दोनों एकदूसरे के करीब आते गए. वे जब भी मिलते, दिल की बातें करते और भविष्य के सपने बुनते. इन बहारों के दिन में दोनों बहुत खुश थे, पर उन की खुशियों को नजर लगते देर नहीं लगी.

सकीना से प्यार होने के बाद कासिम का दोस्तों से मिलनाजुलना काफी कम हो गया. एक दिन शाहीन ने उसे टोका, ‘‘क्या बात है भई, कहां रहता है, जो दिखाई नहीं देता?’’

‘‘अब्बा के साथ काम पर जाता हूं. सोचता हूं, कुछ कमाईधमाई कर लूं, जो आगे जरूरत पड़ने पर काम आएगी.’’

‘‘यार, अभी तो तेरी उम्र मौजमस्ती करने की है. तू कहां कमाईधमाई के चक्कर में पड़ गया? तेरा बाप तो वैसे भी 5 सौ रुपए रोज के ले आता है.’’

कासिम ज्यादा बहस नहीं करना चाहता था, इसलिए उस ने कहा, ‘‘भाई शाहीन, निठल्ले बैठे रहना ठीक नहीं है. अब तुझे भी कामधाम करना चाहिए.’’

कासिम की सलाह पर शाहीन को हैरानी हुई. उस की समझ में नहीं आया कि कासिम को अचानक क्या हो गया कि वह कमाई के चक्कर में पड़ गया. लेकिन ज्यादा दिनों तक उसे हैरान नहीं रहना पड़ा. जल्दी ही उसे पता चल गया कि कासिम की दोस्ती मोहल्ले की ही सकीना से हो गई है. पूरी बात उस की समझ में आ गई, लेकिन इस बात से उसे गहरा धक्का लगा, क्योंकि वह खुद भी सकीना को पसंद करता था. उस ने कई बार सकीना से बात करने की कोशिश भी की थी, पर सकीना ने उसे मौका नहीं दिया था. उसे कासिम से ईर्ष्या हो गई.

सकीना और कासिम के प्रेमसंबंधों का पता चलते ही शाहीन सकीना को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगा. उसे ऐसे मौके की तलाश रहने लगी, जब सकीना से वह दिल की बात कह सके. आखिर एक दिन वह बाजार में मिल गई तो उस ने कहा, ‘‘यहां बाजार में क्या कर रही हो सकीना?’’

‘‘बाजार में कोई क्या करने आता है?’’ सकीना ने पलट कर पूछा.

‘‘मुझे तुम से कुछ कहना था सकीना.’’ शाहीन ने कहा तो सकीना बोली, ‘‘अगर तुम्हें कुछ कहना है तो मेरे घर आ जाना. यहां बाजार में कोई बात नहीं हो सकती. अम्मीअब्बू को पसंद नहीं कि मैं बाहर सड़क पर किसी से बातें करूं.’’

सकीना की इस बात से शाहीन को बहुत गुस्सा आया. लेकिन गुस्से का वहां कोई मतलब नहीं था. उस ने एक बार और कोशिश की, ‘‘मेरी बात तो सुन लो सकीना.’’

‘‘शाहीन, अगर तुम ने मुझे परेशान किया तो मैं अब्बू से तुम्हारी शिकायत कर दूंगी. तुम्हें क्या कहना है, मुझे पता है. एक बात ध्यान से सुन लो, फिर कभी मेरे सामने आए तो ठीक नहीं होगा.’’ कह कर सकीना चली गई.

शाहीन का दिल जल उठा. आखिर कासिम में ऐसी क्या खासियत है, जो सकीना उस से प्यार करने लगी. जबकि उस की बात तक सुनने को तैयार नहीं है. लौटते समय उसे तसलीम मिल गया. वह भी मोहल्ले के रहने वाले मोहम्मद सरवर का बेटा था. शाहीन की उस से दोस्ती थी. उस ने सारी बात तसलीम को बताई तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘भई उन दोनों का प्यार पूरे शबाब पर है. ऐसे में वह तुम्हें क्यों घास डालेगी.’’

‘‘भई, तुम्हें कैसे पता कि दोनों का प्यार शबाब पर है?’’

‘‘मैं ने खुद दोनों को स्कूल के पास बातें करते देखा है. आखिर तू सकीना को ले कर इतना परेशान क्यों है? मोहल्ले में और भी तो लड़कियां हैं.’’ तसलीम ने कहा.

‘‘जो बात सकीना में है, वह किसी और में नहीं है. सब से बड़ी बात तो यह है कि कासिम से उस ने प्यार कर लिया और मुझ से बात तक नहीं करना चाहती.’’

शाहीन किसी भी तरह सकीना से प्यार करना चाहता था, साथ ही ईर्ष्या की आग में जल रहा था. इसीलिए जब भी कासिम मिलता, उस पर दगाबाजी के लिए ताने कसता, दोस्तों के बीच उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता. एक दिन उस ने कासिम से कहा, ‘‘यार कासिम, एक बार मुझे भी सकीना से मिलवा दे.’’

कासिम सन्न रह गया. उस ने हैरानी से कहा, ‘‘मैं तुझे उस से कैसे मिलवा सकता हूं?’’

‘‘भाई मुझे पता है कि तू सकीना से प्यार करता है, इसलिए तू चाहे तो मुझे उस से मिलवा सकता है.’’ शाहीन ने कहा तो कासिम को गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘मैं सकीना से प्यार करता हूं तो भाई तुझे क्यों परेशानी हो रही है? जब देखो, तब उलटीसीधी बातें किया करता है.’’

‘‘भाई, मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि हम दोस्त हैं तो हमें मिलबांट कर खाना चाहिए न?’’ शाहीन ने हंसते हुए कहा.

कासिम को शाहीन की यह बात बुरी तो बहुत लगी, पर उस ने कहा कुछ नहीं, जबकि दूसरी ओर शाहीन ने मन ही मन तय कर लिया कि सकीना अगर उस की नहीं हो सकती तो वह उसे कासिम की भी नहीं होने देगा. शकील सकीना के लिए लड़का तलाश रहा था, इसलिए कासिम सोच रहा था कि उस के पास कुछ पैसे हो जाएं तो वह सकीना को ले कर कहीं दूर निकल जाए और अपनी दुनिया बसा ले. सकीना को भी कासिम पर पूरा विश्वास था, लेकिन उसे यह भी पता था कि वह अपने प्यार को आसानी से छिपा नहीं सकती.

शाहीन को पूरा विश्वास था कि सकीना उसे किसी भी कीमत पर मिलने वाली नहीं है, इसलिए उस ने तय कर लिया कि जैसे भी होगा, वह कासिम को सकीना से अलग कर देगा. यही सोच कर एक दिन वह शकील से मिला और उस से कहा, ‘‘अंकल, आप को कुछ मालूम भी है, आप के घर में क्या हो रहा है?’’

‘‘क्या हो रहा है भाई?’’ शकील ने पूछा.

‘‘या तो आप को पता नहीं है या फिर आप जानबूझ कर अनजान बन रहे हैं कि आजकल आप की बेटी क्या गुल खिला रही है?’’

‘‘क्या बकवास कर रहा है तू?’’ शकील गुस्से से बोला.

‘‘बकवास नहीं कर रहा, बल्कि सच कह रहा हूं. सकीना कासिम के साथ खुलेआम इश्क फरमा रही है. यह बात पूरे मोहल्ले को पता है, जबकि तुम कह रहे हो कि तुम्हें कुछ नहीं पता ही है. लगता है तुम बड़े भोले हो.’’ शाहीन ने कहा और चल दिया.

शाहीन तो चला गया, लेकिन शकील के दिल में आग लगा गया. गुस्से में भरा वह घर पहुंचा और बिना कुछ पूछे सकीना को धुन दिया.

‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’ शकील की बीवी आमना ने पूछा तो उस ने पूरी बात उसे बता दी. इस के बाद आमना ने कहा, ‘‘यह तो चिंता की बात है. हमें तुरंत इस के लिए लड़का ढूंढना चाहिए, वरना यह हमारी नाक कटा देगी.’’

इस के बाद सकीना का घर से निकलना बंद हो गया और उस के लिए लड़के की तलाश तेजी से शुरू हो गई. किसी दिन सकीना के हाथ फोन लग गया तो उस ने कासिम को फोन कर के सारी बात बता दी. उस ने यह भी बता दिया कि शाहीन ने ही उस के अब्बू से चुगली की है. कासिम हैरान था कि उस के दोस्त ने ऐसा क्यों किया? लेकिन अब वह क्या कर सकता था. घर वालों से सकीना के बारे में बता नहीं सकता था और उस के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह सकीना को ले कर भाग जाता. इस के बावजूद उस ने कोशिश की. हिम्मत कर के उस ने इश्तियाक से कहा, ‘‘अब्बू, मैं सकीना से प्यार करता हूं और उस से निकाह करना चाहता हूं.’’

इश्तियाक ने कहा, ‘‘बेटा, मौजमस्ती के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है. पहले कुछ कमाईधमाई कर के घर की गाड़ी चलाने की कोशिश करो. उस के बाद निकाह की सोचो.’’

सकीना उस से अलग न हो जाए, यह सोच कर कासिम तनाव में रहने लगा. उस का मन भी काम में नहीं लग रहा था. गुस्से में भरा वह शाहीन के पास पहुंचा. उस ने शाहीन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘तू तो बड़ा कमीना निकला. मैं तो तुझे अपना दोस्त समझता था, जबकि तू ने मेरी पीठ में छुरा घोंप दिया.’’

‘‘मैं ने क्या किया, पूरा मोहल्ला जानता है कि तू सकीना से प्यार करता है. किसी से उस के घर वालों को पता चला गया होगा.’’

कासिम समझ गया कि शाहीन सचमुच गद्दार दोस्त है. दोस्त की वजह से वह परेशानी में पड़ गया, लेकिन अभी तो बहुत कुछ होना बाकी था. शाहीन खुश था कि उस ने सकीना को कासिम से अलग कर दिया था. अब वह खुद शकील के घर के इर्दगिर्द मंडराने लगा कि कासिम से अलग होने के बाद शायद सकीना उस की हो जाए.

एक दिन उस ने मौका पा कर सकीना से कहा, ‘‘सकीना, मैं तुम से प्यार करता हूं.’’

यह सुनते ही सकीना भड़क उठी, ‘‘खबरदार, तुम मुझ से दूर ही रहना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. तू कितना कमीना है, मैं यह अच्छी तरह जानती हूं.’’

सकीना की बात सुन कर शाहीन सन्न रह गया. यह सब कासिम की वजह से हुआ था. उस ने तय कर लिया कि किसी भी कीमत पर कासिम को नहीं छोड़ेगा, क्योंकि उस के रहते सकीना उसे कभी नहीं मिलेगी. वह सकीना और कासिम को सबक जरूर सिखाएगा. उस ने तय कर लिया कि कासिम को खत्म कर देगा. लेकिन यह काम वह अकेला नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने अपने दोस्त तसलीम से बात की. तब तसलीम ने कहा, ‘‘लेकिन ऐसा करने से सकीना तो तुझे मिलेगी नहीं.’’

‘‘भले न मिले, लेकिन कासिम की वजह से मेरी जो बेइज्जती हुई है, उस का बदला तो ले लूंगा.’’

शाहीन अब कासिम की जान ले कर ही मानेगा, यह सोच कर तसलीम ने बिना सोचेसमझे उस का साथ देने के लिए हामी भर दी. शाहीन के संबंध कासिम से बिगड़ चुके थे, इसलिए उसे बहलाफुसला कर कहीं एकांत में लाने की जिम्मेदारी उस ने तसलीम को सौंप दी. योजना के अनुसार तसलीम ने कासिम के पास जा कर कहा, ‘‘यार, मैं चाहता हूं कि हम तीनों दोस्तों को एक बार फिर से एक साथ होना चाहिए.’’

‘‘अब इन बातों के लिए दिल में कोई जगह नहीं है. फिर मैं अपना काम छोड़ कर आवारागर्दी नहीं कर सकता.’’ कासिम ने कहा. तसलीम अपनी बातों से कासिम को फुसलाता रहा. अंतत: उस ने कासिम को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वह शाहीन के साथ घूमने चलेगा. न चाहते हुए भी कासिम मान गया.

22 मई, 2014 को देर रात कासिम घर नहीं पहुंचा तो घर वालों को चिंता हुई. पूरे मोहल्ले में उसे तलाशा गया, दोस्तों और रिश्तेदारों को फोन किए गए, लेकिन कासिम का कुछ पता नहीं चला. अगले दिन इश्तियाक परिजनों के साथ कोतवाली पहुंचा और कोतवाली प्रभारी एफ.एस. जाफरी को सारी बात बता कर कासिम की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पूरा घर परेशान था कि कासिम किसी को बिना कुछ बताए कहां चला गया, जबकि वह ऐसा कभी नहीं करता था.

अगले दिन कोतवाली पुलिस को सूचना मिली कि कब्रिस्तान में एक युवक की लाश पड़ी है. कोतवाली प्रभारी ने इस बात की सूचना इश्तियाक को दे कर खुद पुलिस बल के साथ कब्रिस्तान पहुंच गए. युवक की हत्या ईंटपत्थर से मार कर की गई थी. लाश देख कर इश्तियाक दहाड़ें मार कर रोने लगा. इस से साफ हो गया कि मृतक युवक इश्तियाक का गुमशुदा बेटा कासिम था. पूछताछ में वह यह नहीं बता सका कि हत्या किस ने की होगी. पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैलाया तो पता चला कि शकील की बेटी सकीना से कासिम का प्रेमसंबंध था. पुलिस ने मोहल्ले में पूछताछ की तो पता चला कि घटना वाले दिन से कासिम के 2 दोस्त शाहीन और तसलीम गायब हैं.

गायब होने से पुलिस को उन्हीं दोनों पर शक हुआ. पुलिस ने शकील से पूछताछ की तो उस ने बताया कि एक दिन शाहीन कासिम के खिलाफ उस के कान भरने आया तो था, पर कासिम के साथ उस के संबंध कैसे थे, यह उसे नहीं मालूम. पुलिस को इस से पूरा विश्वास हो गया कि कासिम की हत्या में शाहीन और तसलीम का हाथ है. पकड़े जाने के डर से दोनों फरार हैं. दोनों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने बहुत हाथपैर मारे, लेकिन वे पकड़ में नहीं आए. घर वाले भी दोनों के बारे में कुछ नहीं बता पा रहे थे. आखिर कोई कब तक छिपा रह सकता है.

6 दिसंबर को शाहीन तसलीम के साथ दिल्ली से इटावा आने वाली ट्रेन से उतरा तो किसी मुखबिर ने उसे देख लिया. इस के बाद उस ने पुलिस को यह बात बताई तो कोतवाली प्रभारी एफ.एस. जाफरी ने पुलिस टीम के साथ पहुंच कर दोनों को पकड़ लिया. पुलिस के शिकंजे में फंसने पर दोनों हैरान रह गए. उन्होंने सोचा था कि अब तक सब ठीक हो गया होगा. थाने ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने कासिम की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. शाहीन ने बताया कि वह सकीना से प्यार करता था, जबकि कासिम ने उस का अपमान किया. उसी का बदला लेने के लिए उस ने तसलीम के साथ कासिम को ठिकाने लगा दिया.

पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों की जमानत नहीं हुई थी. Love Story in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Romantic Story: प्यार के पंछी

Romantic Story: ठाकुर जोरावर सिंह ने प्रेमरस में डूबी खूबसूरत चांदनी को पाने की पूरी कोशिश की. यहां तक कि उस ने चांदनी से जबरन विवाह भी रचा लिया. लेकिन प्यार की पंछी चांदनी उस के हाथ आने वाली कहां थी, वह अपने प्रेमी जय के साथ लंबी उड़ान पर उड़ गई. दी नगढ़ के ठाकुर जोरावर सिंह अपने पड़ोसी जागीरदार विक्रम सिंह के बेटे किशन सिंह की शादी में शामिल होने गए थे. बारात काठा जा रही थी. इंतजाम इतना भव्य था, जैसे किसी राजामहाराजा का विवाह हो. किशन सिंह ने तिजोरियों के मुंह खोल दिए थे. आसपास के पचासों गांवों से खासखास लोगों को आमंत्रित किया गया था.

पूरा गांव रोशनियों से जगमगा रहा था. गांव भर के लोग शादी में निमंत्रित थे. एक हफ्ते तक लगातार खुला रसोड़ा चला, गलीगली में सजावट हुई, जगहजगह गीत गाए गए. बाहर से आने वालों की विशेष खातिरदारी हुई. सारा गांव नाचगाने और रागरंग में डूब गया. प्रभावशाली और अत्यधिक धनी लोग ऐसे मौकों पर धन बहाने में अपनी शानोशौकत समझते हैं. वे चाहते हैं कि ऐसा कुछ करें कि लोग सदियों तक याद रखें. विक्रम सिंह ने भी यही किया. उन्होंने अपने पुत्र किशन सिंह की शादी में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी.

लगभग 5 सौ लोगों की बारात सजी. दूल्हा हाथी पर बैठा. माणक मोती की झालरें और चांदी का हौदा. दूल्हे की आरती उतारी गई. मंगल गीत गाए गए. हवेली से बाग तक कालीन बिछाए गए. फिर हाथी पर सवार विक्रम सिंह के पुत्र किशन सिंह की बारात निकली. बारात की रवानगी के समय सोने की मोहरें उछाली गईं. मार्ग के दोनों ओर भीड़ उमड़ पड़ी. उन के सामने एक यादगार दृश्य था. सब से आगे कई गांवों के नामीगिरामी मांगणहार शहनाईनौबत बाजे बजाते निकले. फिर मंगल कलश ले कर बालिकाएं, मंगल गीत गाती महिलाएं. उन के पीछे सजेधजे घोड़ों पर रियासत के हाकिम, ठाकुर, अमीरउमराव चल रहे थे. घोड़ों के पीछे माणिकमोती की झालरें और सोने का मुकुट पहने चांदी के हौदे में बैठे दूल्हे किशन सिंह का हाथी था. उस के पीछे तमाम बाराती.

गांव के बाहर बाग के पास सोनेचांदी के काम वाला 4 घोड़ों से युक्त एक रथ खड़ा था, जो चारों तरफ से बंद था. हाथी से उतार कर दूल्हे को इसी रथ में बैठाया गया. सारे बाराती अपनेअपने सजेधजे ऊंट और घोड़ों पर सवार हो गए. विक्रम सिंह ने ‘मोहरें’ उछाल कर बारात रवाना की. बारात के पड़ावों की जगह पहले से तय थीं. खानेपीने और रागरंग का भी पूरा इंतजाम था. बाराती हो या कोई और, रास्ते में सब के लिए रसोड़ा खुला था. रास्ते के गांवों में जबरदस्त हलचल थी. दूरदूर से लोग बारात देखने आ रहे थे. कुछ बारात में शामिल भी हो रहे थे. ठाकुर सा की तरफ से सब को छूट थी, जो चाहे चल सकता था.

ठाकुर सा चाहते थे कि लोगों की 7 पीढि़यों को याद रहे कि विक्रम सिंह के बेटे की बारात कैसे निकली थी. इसीलिए कई लोग यह सोच कर भी शामिल हो गए थे कि कुछ दिन खाने के लिए पकवान मिलेंगे. गत 2 वर्षों से रियासत में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था. नदी, नाले, तालाब सूखे हुए थे. बरसात शुरू नहीं हुई थी. तपता हुआ ज्येष्ठ झुलसा कर चला गया था, आषाढ़ दस्तक दे चुका था. कुओं में पानी था, लेकिन जिस इलाके से बारात गुजरती, वहां के कुएं खाली हो जाते. घास के मैदान साफ हो जाते. वहां की घास बारात के घोड़े, ऊंट और बैल साफ कर देते. स्थानीय लोग खुद को लुटा हुआ महसूस करते.

चौथे दिन बारात काठा पहुंची. बड़ी संख्या में लोगों को आते देख गांव की प्रोलें बंद कर दी गईं. उन्हें आशंका हुई कि बारात के मुगालते में दीनगढ़ वाले आक्रमण करने आए हैं. वे युद्ध की तैयारी करने लगे. यह तय था कि बारात सेठ की हवेली में रुकेगी. गांव के ठाकुर मोहन सिंह ने अपने दीवान के साथ कुछ सैनिक बारात के पास भेज कर वस्तु स्थिति का पता किया. जब उन्हें भरोसा हो गया कि यह बारात ही है तो जा कर उसे सेठजी की हवेली में आने की इजाजत दी गई. रात में फेरे हो गए और खूब खातिरदारी भी.

सुबह का सूरज निकल आया था. दीनगढ़ के ठाकुर जोरावर सिंह हवेली के झरोखें में बैठे सुबह की ताजी हवा का आनंद ले रहे थे कि उन्हें खिलखिलाती हंसी की गूंज सुनाई दी, सोनचिड़ी की चिहुंक सी मिठास. बरसाती हवा सी ठंडक, सैकड़ों झांझरों की खनक, चिर प्रतीक्षा के बाद मिले प्रियतम सा रोमांच, दूर से आती विह्वल पुकार सी गूंज. मीठी हंसी ने कानों में जैसे अमृत उड़ेल दिया. जोरावर सिंह का रोमरोम स्पंदित हो उठा. दिल जैसे छाती से निकल सामने आ खड़ा हुआ. लगा जैसे वह यही है, जिस की तलाश में मन जन्मभर भटकता रहा. इसी की तलाश में कई नीड़ उजाड़े, कई दिशाएं लूटीं.

हवा में तैरती खिलखिलाती हंसी दिलोदिमाग पर छा गई. अंतर मन में खनक गूंजने लगी. दिल बेचैन हो उठा. मन चंचल, निगाहें भटकने लगीं. बाहर देखा तो केसर सी दमक वाली अप्सरा सी सुंदरी, लाल चूनर ओढ़े खड़ी थी. उगते सूरज की किरणों ने उस पर अपनी आभा का पीला रंग चढ़ा दिया था. पृष्ठभूमि में उठी गोधूलि के परदे पर एक ऋषि कन्या सी सुंदर सुकोमल षोडसी अपने यौवन से बेखबर अज-शावक के साथ खेलते हुए उसे पकड़ने का प्रयत्न कर रही थी. लेकिन वह बारबार हाथ से छूट कर भाग जाता था. आखिर उस ने उसे पकड़ ही लिया.

वह विजयनी की तरह उसे पकड़े दर्प से चल रही थी कि उस की नजर सामने खुली खिड़की से निहारते जोरावर पर पड़ी, वह कांप उठी, हाथ से शावक छूट गया. उस के होठ थरथरा उठे, माथे पर पसीना आ गया, आंखें फटी की फटी रह गईं. जोरावर अपलक लगातार उस के सौंदर्य का पान कर रहा था. पर पुरुष को इस तरह घूरते देख वह घबरा कर भाग खड़ी हुई. जोरावर चकित था. काठा में इतनी सुंदर कन्या है और उसे पता तक नहीं. यह लड़की कुछ अलग है, कुछ विशेष. उस के अंतर के तार झंकृत हो उठे थे. वह सोचने लगा, इसे हासिल करना ही है, वह भी शाम तक. युवती घबराई हुई वापस घर में घुसी. वह बुरी तरह कांप रही थी. वह आ कर बिस्तर पर औंधी पड़ गई.

घर की सारी औरतें और लड़कियां आसपास आ खड़ी हुईं. ‘क्या हुआ…क्या हुआ’ का शोर मच गया. कोई हवा करने लगी, कोई पानी ले आई, कोई सिर और पीठ सहलाने लगी. मगर वह न तो पलट कर सीधी हो रही थी, न ही आंखें खोल रही थी. पूरे मामले की प्रत्यक्षदर्शी उस की सहेली चंपा बोली, ‘‘मैं बताती हूं क्या हुआ है. चांदनी को मैं ने मना किया था कि जहां बारात का डेरा है, उस हवेली की तरफ मत जाना. वहां ठाकुर सा ठहरे हुए हैं. अगर तू उन की नजर में आ गई तो सोच लेना तू गई. इस ने मेरा मजाक उड़ाया और वहां चली गई. खिड़की से ठाकुर सा ने इसे देख लिया है. अब कांप रही है.’’

चंपा की बात खत्म होते ही सन्नाटा छा गया. जैसे उस ने सब के हलक में हाथ डाल कर आवाज निकाल फेंकी.

‘‘उन्हें देखते ही इस के हाथ का मेमना छूट गया. मेमना नहीं, मैं तो कहती हूं कि जमारा छूट गया.’’ चंपा ने फिर खामोशी तोड़ी.

यह सुन कर चांदनी पलट कर बोली, ‘‘मैं किसी से नहीं डरती.’’

‘‘तो कांप क्यों रही थी?’’ चंपा ने पूछा.

‘‘उस की नजरें बहुत बुरी थीं. लगा जैसे मुझे खा जाएगा.’’ चांदनी की आवाज भर्राने लगी. जैसे भय उस के अंतरमन में उतर गया था. उस की मां ने उस के मुंह पर हाथ फेरा, लोटा भर पानी पिलाया. फिर उस का माथा सीने से लगाती हुई बोली, ‘‘बारात आज नहीं तो कल चली ही जाएगी. अब तू बाहर मत निकलना. हम कोई उस की रियाया हैं, जो खा जाएगा.’’

चांदनी के पिता चंदन सिंह काठा के ही रहने वाले थे. सच्चे राजपूत अपनी आन, बान और शान के लिए जान तक न्यौछावर करने वाले. लेकिन जोरावर सिंह से कमजोर होने के कारण वह उस से टक्कर नहीं ले सकते थे. इसलिए बेटी को छिपा कर रखना चाहते थे. मगर काइंया ठाकुर जोरावर सिंह ने चांदनी को जब टेढ़ी नजर से देख लिया था तो उस का बचना मुश्किल था. ठाकुर जोरावर ने अपने खासमखास आदमी को उस की टोह में लगा दिया. उस का आदमी जानता था कि वह लड़की राजपूत हुई तो ठाकुर सा ब्याह कर लेंगे और किसी अन्य जाति की हुई तो मसल कर फेंक देंगे. थोड़ी देर में सब पता लग गया.

ठाकुर जोरावर सिंह ने पंडित को बुलवा कर विवाह का मुहूर्त निकलवाया. फिर चंदन सिंह को बुला कर कहा, ‘‘आज रात्रि में मैं आप की पुत्री का विवाह संस्कार करूंगा. सारी तैयारी कर ली जाए. आप की भीतीजी का विवाह तो कल संपन्न हो चुका है, आज हमारा होगा. बारात आज भी रुकी रहेगी.’’

चंदन सिंह हाथ जोड़े पत्थर की तरह खड़े रहे. ठाकुर जोरावर 50 का और उन की बेटी 17 बरस की. उन्होंने अपनी बेटी चांदनी की सगाई देवीकोट में कर रखी थी. इसलिए बोले, ‘‘क्षमा करें हुकम, मेरी बेटी का सगपण (सगाई) हो चुकी है, वरना आप की कृपा तो भाग्यशालियों को मिलती है.’’

‘‘भूल जाओ उसे. मैं ठाकुर जोरावर सिंह रियासत के राजा का सगा छोटा भाई हूं. आज से आप की बेटी हमारी हवेली की शोभा होगी. अब वह किसी ढ़ाणी के झोपड़े में नहीं रहेगी.’’ फिर उस ने चंदन सिंह के बड़े भाई की ओर देख कर कहा, ‘‘अवतार सिंहजी, आप ही अपने भाई को समझाओ.’’

ठाकुर ने अपने स्वभाव के अनुसार ही आदेशात्मक प्रार्थना की.

‘‘चंदन सिंह, यह तो अपना अहोभाग्य है कि ठाकुर सा से सूर्यवंशी नाता जोड़ रहे हैं. आप की बेटी भाग्यशाली है, जिस की ठाकुर सा ने मांग कर ली है. पीछे मत हटो.’’

जोरावर की तरफ मुखातिब हो कर अवतार सिंह आगे बोले, ‘‘हुकम, आप निश्चिंत रहें. सब तैयारी हो जाएगी. आज ही विवाह हो जाएगा हुकम, आज ही. चलो चंदन सिंह, समय कम है.’’

चंदन सिंह को ले कर अवतार सिंह घर आए. रास्ते में उन्होंने एक ही बात कही, ‘‘ठाकुर सा की हवेली में रह कर राज करेगी चांदनी.’’

‘‘मगर उन की उम्र.’’ चंदन सिंह ने कहा तो अवतार सिंह ने बात काट दी, ‘‘आदमी की उम्र का क्या? राजपुरुष कभी बूढे़ होते हैं क्या? आप भी क्या भोली बातें कर रहे हैं.’’

उन की बात यहीं खत्म हो गईं. मगर औरतों में बात यहीं पर खत्म नहीं हुई. सुनते ही चांदनी बिफर उठी, ‘‘मैं ठाकुर से विवाह नहीं करूंगी. मेरी उम्र के उस के पुत्रपुत्रियां हैं. मैं मर जाऊंगी, मगर उस से विवाह नहीं करूंगी.’’

उस की आंखों के आगे उस के मंगेतर जय सिंह का चेहरा घूम रहा था, जिस से वह कई बार चुपकेचुपके मिलती और बातें करती रही थी. वह उसी की उम्र का लड़का था. जब वह हवेली की तरफ गई थी तो उस ने सोचा भी नहीं था कि वह किसी ऐसे गर्त की तरफ जा रही है, जहां से कभी वापस नहीं लौट पाएगी. वह दिन भर रोतीबिलखती बिसूरती रही, वह एकएक कर सब से इस विवाह को टाल देने की प्रार्थना करती रही. जिबह के लिए ले जाए जाने वाले जानवर की तरह तड़पती रही. लेकिन सब जगह से उसे निराशा ही मिली. सब के चेहरों पर लाचारी पुती हुई थी. सब की आंखों में जोरावर सिंह के भय की दहशत टपक रही थी. वह हार गई.

चांदनी ने अपने संगीसाथी राम सिंह से कहा, ‘‘रामू, किसी तरह यह समाचार देवीकोट जा कर जय सिंह तक पहुंचा दो. मैं तुम्हारा अहसान उम्र भर नहीं भूलूंगी. मेरे तनमन पर सिर्फ जय सिंह का हक है, अगर वह नहीं मिला तो मैं मर जाना पसंद करूंगी.’’

चांदनी ने रोरो कर राम सिंह को अंदर तक हिला दिया था. वह अपने ऊंट पर सवार हो कर चांदनी के दिल की बात जय सिंह तक पहुंचाने के लिए देवीकोट के लिए निकल पड़ा. सुबह का निकला राम सिंह देर रात देवीकोट जा पहुंचा. जय सिंह को चांदनी का पैगाम सुना कर उस ने कहा, ‘‘जय सिंह, अब तक चांदनी से जोरावर का पाणिग्रहण संस्कार तो हो चुका होगा और सुबह होते ही वह उसे विदा करा कर बारात के साथ दीनगढ़ के लिए रवाना हो जाएगा. 4 दिनों बाद बारात दीनगढ़ पहुंचेगी. तुम्हें रास्ते में मौका देख कर चांदनी से मिल कर आगे की योजना बनानी होगी.’’

सुन कर जय सिंह ने एक लंबी सांस छोड़ी. उस ने क्याक्या सपने संजोए थे मगर जोरावर रूपी राक्षस ने सब कुछ उजाड़ कर रख दिया था. उस ने राम सिंह का तहेदिल से शुक्रिया अदा कर सुबह आने को कहा. जय सिंह ने सुबह होने से पहले अपने घोड़े पर सवार हो कर काठा की राह पकड़ ली. उस का घोड़ा उसे पीठ पर लादे उड़ा जा रहा था. वह मन ही मन योजना बनाते हुए आगे बढ़ा जा रहा था. उधर चांदनी ने मन ही मन कसम खा ली थी कि वह जोरावर को कभी भी अपने तनमन पर हक नहीं जमाने देगी. भले ही दुनिया की नजर में वह उस की ब्याहता रहे, उस के मन में तसवीर सिर्फ जय सिंह की ही रहेगी. अपनी इसी सोच के साथ वह अल्हड़, चुलबुली युवती अपनी खिलखिलाती आत्मिक हंसी को 7 तालों में बंद कर के ठाकुर जोरावर सिंह की ब्याहता बन गई.

अगली सुबह बारात की विदाई हो गई. चांदनी को दहेज में उस की सहेली चंपा जो दासी थी, दी गई. वह चांदनी के साथ दीनगढ़ के लिए रवाना हो गई. चांदनी का रोरो कर बुरा हाल था, वह चंपा से बोली, ‘‘चंपा, आज मेरी डोली नहीं अर्थी उठी हैं. मैं अब इन गलियों में कभी लौट कर नहीं आऊंगी. मुझे विश्वास है, मेरे इस अंतिम सफर में जय मेरा साथ जरूर देगा, वह जरूर आएगा. उसे एक बार जी भर कर देख लूं, उस के बाद उस के साथ अंतिम सफर पर चली जाऊंगी?’’

चंपा कुछ भी नहीं समझ पाई. चांदनी का मन उन गलियों में भटकने लगा, जहां दोनों बचपन से ले कर अब तक खेलकूद कर जवान हुई थीं. मांबाप, बहनभाई के चेहरे उस के सामने घूम रहे थे. वे कभी हंसते, कभी मुसकराते, कभी उदास हो जाते, तो कभी रो पड़ते. चांदनी खुद को संभाल नहीं पा रही थी, वह रोने लगी. चंपा दिलासा दे कर उसे संभालने की कोशिश जरूर कर रही थी, मगर सब व्यर्थ? चांदनी मन ही मन कल्पना कर रही थी कि उस का सिर अपने प्रेमी जय की छाती पर रखा है. जय की छाती आंसुओं से तर हो चुकी है. वह उस के सिर पर धीरेधीरे हाथ फिराते हुए रो रहा है. रोतेरोते वह जैसे कह रहा है, ‘‘चांदनी, अच्छी प्रीत निभाई तू ने, ठाकुर मिला तो छोड़ गई मुझे. बड़ी खुदगर्ज निकली तू.’’

वह उसे आश्वस्त करना चाहती थी, उस के चेहरे को प्यार से छूना चाहती थी. लेकिन उस का चेहरा खयालों से अचानक गायब हो गया. तभी हल्ले की आवाज सुनाई पड़ी. चांदनी ने पूछा, ‘‘चंपा, यह हल्ला कैसा?’’

चंपा बाहर का नजारा देख रही थी. वह बोली, ‘‘पता नहीं, शायद कोई झगड़ा हो रहा है?’’

बारात के वापस लौटते समय रास्ते के गांव वालों से झगड़े शुरू हो गए थे. झगड़े का कारण था अकाल के समय लोगों को सहायता के बदले उन का चारापानी बारात के घोड़ोंऊंटों और बैलों द्वारा खापी जाना. पानी पीपी कर उन्होंने कुएं सुखा दिए थे. अकाल के समय इस बारात ने कोढ़ में खाज का काम किया था. इस बात ने लोगों पर गहरा असर किया था. बारात से लौटते बारातियों के साथ ग्रामीणों के झगड़े शुरू हो गए थे. उसी की आवाज चांदनी व चंपा को सुनाई दे रही थी. कई जगह मारपीट और खूनखराबा हुआ. कई लोग मारे गए. ज्यादा नुकसान बारातियों का हुआ. उन पर अचानक हमले हुए, उन्हें लूट लिया गया.

बाराती कई ग्रामीणों के मवेशी ले कर भाग गए. दोनों दूल्हों और खासखास बारातियों को लूटा गया. उन का सोना, चांदी, बरतन, ऊंट, घोड़े छीन लिए गए. कुछ लोगों ने दूल्हादुल्हनों को सुरक्षित निकाल कर दीनगढ़ का रास्ता पकड़ा. उधर दोपहर में जय सिंह काठा पहुंचा और वहां से पता कर के बारात के पीछे निकल गया. बारात धीरेधीरे जा रही थी और लड़ाईझगड़े के कारण तितरबितर हो गई थी. खैर, जय सिंह उस मार्ग पर बढ़ता गया, जिस रास्ते से बारात गुजरी थी. जब शाम का धुंधलका गहराने लगा तो जय सिंह बारात से जा मिला. उस ने अपना परिचय दे कर कहा, ‘‘रिश्तेदारी में जा रहा हूं.’’ उस की बात सुन कर जोरावर ने साथ चलने का प्रस्ताव रखते हुए कहा, ‘‘हमारे साथ ही चलो. अच्छेखासे मर्द हो, काम आओगे.’’

‘‘ठीक है?’’ जय सिंह ने कहा. वह यही चाहता भी था.

रात गहराने लगी तो एक कुएं के पास तंबू गाड़ दिया गया. जनाना तंबू अलग गाड़ा गया, जिस में किशन सिंह की नवब्याहता और जोरावर सिंह की दुलहन चांदनी के अलावा दहेज में आई दासियों को ठहराया गया. जय सिंह और दीनगढ़ के ठाकुर अफीम और मदिरा पान करने लगे. जय सिंह ने कम शराब पी. जनाना तंबू में बैठी चांदनी को जब जय सिंह की आवाज सुनाई दी तो वह निहाल हो उठी. रात का दूसरा प्रहर लगते ही सब लोग खापी कर सो गए. जय सिंह और चांदनी की आंखों से नींद कोसों दूर थी. दिन भर की थकान व नशे के कारण सब लोग सो गए, तो जय सिंह धीरेधीरे सरक कर जनाना तंबू के गेट पर आ खड़ा हुआ.

उस ने हौले से पुकारा, ‘‘चांदनी, ओ चांदनी?’’

सुन कर चांदनी दौड़ी चली आई. अपने प्रियतम को देख कर उस की आंखों से सावनभादो की बरसात होने लगी. वह जय के सीने में धंसती चली गई. दोनों वहां से निकल कर कुएं के पास आ बैठे. वहां पर दोनों रात भर अपने मन की बातें करते रहे. चांदनी बोली, ‘‘मैं ने कहा था न जय कि मैं जन्मजन्म तक तुम्हारी ही रहूंगी. इस जन्म में हम एकसाथ नहीं रह सके, मगर अगले जन्म में हम जरूर मिलेंगे.’’

‘‘हमारा प्यार पवित्र है, हम प्यार के पंछी एकदूजे के बिना नहीं रह सकते. हम भले ही साथ नहीं जी सके, लेकिन मर तो साथ सकते हैं?’’

दोनों प्रेमी अगले जन्म में मिलने के वादे के साथ अपने कपड़े व जूते कुएं की पाट पर रख कर कुएं में कूद गए. सुबह जब जोरावर को सच पता चला तो वह हाथ मलता रह गया. दोनों के मृत शरीर कुएं से निकाल कर वहीं पर उन्हें एक चिता पर लेटा कर अंतिम यात्रा पर विदा किया गया. उस कुएं का नाम आज भी प्रेमियों के कुएं के नाम से जाना जाता है. ठाकुर जोरावर सिंह कभी किसी से नहीं हारा था, मगर आज वह पहली बार सच्ची मोहब्बत से हार गया था. जब तक ठाकुर जोरावर सिंह जिंदा रहा, उसे यह घटना उद्वेलित करती रही. Romantic Story