मृत पति को मिस कर रही महिला सिपाही ने बेटी संग किया सुसाइड

सीमा और उस का पति हरकेश दोनों ही पुलिस में थे. पति की आकस्मिक मौत के बाद सीमा इस तरह हताश हो गई कि… 

राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल सीमा अपनी 4 वर्षीय बेटी वंशिका के साथ बीछवाल थाना प्रांगण में बने स्टाफ क्वार्टर में रहती थी. उस के साथ उस का भाई सुमित भी रहता था. सुमित भी राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल था. सीमा की ड्यूटी बीकानेर पुलिस लाइन में थी. करीब डेढ़ महीना पहले ही वह पाली जिले से ट्रांसफर करा कर बीकानेर आई थी. पहले उस की पोस्टिंग पाली के औद्यौगिक थाने में थी25 मार्च, 2018 की शाम को सीमा बेटी के साथ थी. उस का भाई सुमित किसी काम से बाजार गया हुआ था. जब वह बाजार से घर लौटा तो घर में कमरे का दरवाजा अंदर से बंद मिला. सुमित ने दरवाजा खटखटा कर बहन को आवाज दी पर दरवाजा नहीं खुला.

कई बार आवाज देने के बावजूद भी जब अंदर से कोई हलचल नहीं हुई तो सुमित ने खिड़की से अंदर झांक कर देखा तो उसे बहन सीमा व वंशिका फंदे पर झूलती दिखाई दीं. यह देख कर सुमित की चीख निकल गई. उस के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी वहां आ गए. सुमित ने लोगों की सहायता से खिड़की तोड़ी. उस ने सब से पहले अपनी बहन और भांजी को फंदे से उतारा. तब तक बीछवाल के थानाप्रभारी धीरेंद्र सिंह पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच चुके थे. दोनों को तुरंत पीबीएम अस्पताल ले जाया गया. जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

मृतका सीमा के कमरे से पुलिस को एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ. उस में कांस्टेबल सीमा ने सासससुर से माफी मांगते हुए लिखा कि सभी ने उस का और बेटी वंशिका का खयाल रखा, लेकिन पति हरकेश की मौत के बाद से मैं बहुत तनाव में हूं. इसलिए बेटी के साथ फांसी लगा कर आत्महत्या कर रही हूं. सीमा ने पत्र में इच्छा जताई कि मेरा अंतिम संस्कार भी वहीं हो, जहां पति का किया गया था और उस की और बेटी की आंखें दान कर दी जाएं. ताकि किसी को रोशनी मिल सके. चूंकि मामला एक पुलिसकर्मी से संबंधित था, इसलिए थानाप्रभारी की सूचना पर एसपी दीपक भार्गव भी वहां पहुंच गए. उन्होंने भी मौका मुआयना किया. थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए पीबीएम अस्पताल भेज दिया.

सीमा सरकारी मुलाजिम थी, उसे कोई आर्थिक परेशानी नहीं थी. ससुराल में सभी लोग उस का बहुत खयाल रखते थे. इन सब बातों के बावजूद आखिर ऐसी क्या वजह रही जो उस ने अपने साथ बेटी को भी फंदे पर लटका दिया. जांच करने के बाद पुलिस को इस के पीछे की जो बात पता चली, वह हृदयविदारक थी. सीमा सन 2006 में राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती हुई थी. उसी के बैच में हरकेश मान नाम का युवक भी भरती हुआ था. हरकेश झुंझनू जिले के भीरी गांव का मूल निवासी था. पर बाद में उस का परिवार चिढ़ावा कस्बे में रहने लगा था. साथसाथ पुलिस ट्रेनिंग करने के दौरान सीमा और हरकेश की अच्छी जानपहचान हो गई थी. बाद में घर वालों की मरजी से दोनों की शादी हो गई. सीमा का भाई सुमित भी राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती हो गया था

सीमा पति के साथ बहुत खुश थी. हरकेश भी उस का बहुत ध्यान रखता था. दोनों की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी. इस दौरान सीमा एक बेटी की मां भी बन गई थी जिस का नाम वंशिका रखा गया. सीमा का पति हरकेश एक जांबाज होशियार सिपाही था. अपनी मेहनत के बूते पर उस ने अनेक बडे़ केसों को खोलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस की तैनाती पाली की कोतवाली में थी. अपने प्रयासों के बल पर उस ने दीपक हत्याकांड को खोलने में विशेष भूमिका निभाई थी. इस के अलावा उस ने कंजर गैंग, नायडू शेट्टी गैंग तथा गत दिनों पाली में मोबाइल शोरूम से लाखों रुपए के मोबाइल चुराने वाले गैंग का पता लगा कर उन्हें गिरफ्तार कराने में विशेष भूमिका निभाई थी. इन केसों में मिली सफलता के बाद हरकेश को एसपी के अलावा डीआईजी और आईजी ने भी सम्मानित किया था.

पति की इस उपलब्धि पर सीमा का सीना भी गर्व से चौड़ा हो गया था. चूंकि वह भी पति के साथ उसी थाने में तैनात थी, इसलिए पति से उसे काफी प्रेरणा मिली थी. अपने छोटे से परिवार में सीमा बहुत खुश थी. लेकिन 31 अक्तूबर, 2017 को इन के परिवार में अचानक एक ऐसी घटना घटी जिस से उन की हंसतीखेलती गृहस्थी उजड़ गई. दरअसल हरकेश मान के साले की शादी थी. 31 अक्तूबर, 2017 को हरकेश ड्यूटी से चिड़ावा में स्थित अपने क्वार्टर पर पहुंच कर शादी में जाने की तैयारी करने लगा. सीमा भी भाई की शादी में जाने की तैयारी में जुटी थी. हरकेश ने अपने बालों में मेंहदी लगाई हुई थी. वह बालों की मेंहदी को धो रहा था तभी अचानक आगे की तरफ गिर गया. सामने कोई एक पाइप था जो सीधे हरकेश के सिर में घुस गया.

हरकेश के चीखने पर सीमा बाथरूम में गई तो वहां खून देख कर वह भी घबरा गई. उस ने पड़ोसियों को बुलाया, जिन की मदद से हरकेश को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. लेकिन डाक्टर उसे बचा नहीं सके. उस की मौत हो गई. पति की मौत पर सीमा का तो घरसंसार ही उजड़ गया था. शादी में जाने की खुशी रंज में बदल गई थी. एक तेजतर्रार सिपाही की मौत की खबर पा कर जिले के पुलिस अधिकारी भी वहां पहुंच गए. सभी इस आकस्मित मौत पर आश्चर्यचकित थे. घर वालों का तो रोरो कर बुरा हाल था. घर वालों के अलावा विभाग के लोगों ने भी सीमा को बहुत समझाया. पर वह अपने प्रियतम को भला कैसे भुला सकती थी. लोगों के समझाने पर सीमा ने खुद को संभालने की कोशिश की. वह अपने काम में व्यस्त रह कर दुख को भुलाने की कोशिश करती रही लेकिन रहरह कर उसे पति की यादें बेचैन किए रहती थीं

पहले सीमा की पोस्टिंग पाली थाने में थी जबकि उस का भाई सुमित बीकानेर के महिला थाने में था. अरजी दे कर उस ने करीब डेढ़ महीने पहले ही अपना ट्रांसफर बीकानेर करा लिया था. ताकि भाई के साथ रहने पर वह खुद अकेला महसूस समझे. वह भाई के साथ ही बीछवाल थानापरिसर में बने आईएसी क्वार्टरों में रहती थी. हालांकि ससुराल पक्ष के लोगों की तरफ से भी सीमा का हर तरह से खयाल रखा जा रहा था. इस के बावजूद भी सीमा को रहरह कर पति की यादें रही थी. पति के बिना वह खुद को अकेला महसूस कर रही थी. उसे लगने लगा था कि अब पति के बिना उस का जीना ही बेकार है. वह खोईखोई सी रहने लगी.

फिर एक दिन सीमा ने फैसला कर लिया कि जब उस का पति ही न रहा हो तो अब उस का जीना ही बेकार है. उस ने तय कर लिया था कि वह भी अपनी जीवनलीला खत्म कर पति के पास जाएगी. तभी उसे अपनी बेटी वंशिका का ध्यान आया कि उस के जीवित न रहने पर बिन मांबाप के पता नहीं उस की जिंदगी कैसे कटेगी. लिहाजा उस ने अपने साथ बेटी वंशिका की भी जीवनलीला खत्म करने का निर्णय ले लिया. 25 मार्च की शाम को उसे यह मौका मिल ही गया. उस दिन सीमा का भाई सुमित भी अपनी ड्यूटी से आ गया था. वह शाम के समय बाजार गया. तभी सीमा ने सब से पहले अपनी बेटी को फंदे पर लटकाया इस के बाद वह खुद भी लटक गई. इस से पहले उस ने एक सुसाइड नोट लिख दिया था, जिस में किसी को भी दोषी न ठहराते हुए अपनी और बेटी की आंखें दान करने की बात लिख दी थी.

सीमा ने भले ही अपनी समझ से अपनी और बेटी की सांसें रोक दीं पर ऐसा कर के उस ने कोई समझदारी का काम नहीं किया. बेटी के सहारे वह जिंदगी काट सकती थी. उसे उस समय काउंसलिंग की जरूरत थी. यदि उस की उस समय काउंसलिंग हो जाती तो शायद वह यह कदम नहीं उठाती.

दीवार की नींव खोदी तो मिला तीन किलो सोने का घंटा

नजीर और सुगरा बेहद गरीब थे. बरसात में घर की दीवार गिर जाने के बाद जब उन्होंने नींव खोदी तो 3 सेर का एक घंटा मिला. नजीर ने वह घंटा 50 रुपए में रंजन को बेच दिया. पता चला वह सोने का घंटा था, उसी को ले कर 2 कत्ल हुए लेकिन घंटा…   

ला बिलकुल सीधी पड़ी थी. सीने पर दो जख्म थे. एक गरदन के करीब, दूसरा ठीक दिल पर. नीचे नीली दरी बिछी थी, जिस पर खून जमा था. वहीं मृतक के सिर के कुछ बाल भी पडे़ थे. वारदात अमृतसर के करीबी कस्बे ढाब में हुई थी. मरने वाले का नाम रंजन सिंह था, उम्र करीब 45 साल. उस की किराने की दुकान थी. फिर अचानक ही उस के पास कहीं से काफी पैसा गया था. उस ने एक छोटी हवेली खरीद ली थी. 3 महीने पहले उस ने उसी पैसे से बड़ी धूमधाम से अपनी बेटी की शादी की थी. रंजन का कत्ल उस की नई हवेली में हुआ था. उस के 2 बेटे थे, दोनों अलग रहते थे. बाप से उन का मिलनाजुलना नहीं था. बीवी 3 साल पहले मर चुकी थी. घर पर वह अकेला रहता था. नौकरानी सुगरा दोपहर में रंजन के घर तब आती थी, जब वह अपने काम पर होता था. सुगरा घर का काम और खाना वगैरह बना कर चली जाती थी

रंजन ने घर के ताले की एक चाबी उसे दे रखी थी. कत्ल के रोज भी सुगरा खाना बना कर चली गई थी. रात को रंजन आया और खाना खा कर सो गया. सुबह कोई उस से मिलने आया. खटखटाने पर भी दरवाजा नहीं खुला तो वह पड़ोसी की छत से रंजन के घर में घुसा, जहां खून में लथपथ उस की लाश पड़ी मिली. मैं ने बहुत बारीकी से जांच की. कमरे में संघर्ष के आसार साफ नजर रहे थे. चीजे बिखरी हुई थीं. सबूत इकट्ठा कर के मैं ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. उस के बाद मैं गवाहों के बयान लेने लग गया. सब से पहले पड़ोसी गफूर का बयान लिया गया

उस ने दावे से कहा कि रात को रंजन की हवेली से लड़ाईझगडे़ की कोई आवाज नहीं आई थी. उस ने बताया कि रंजन सिंह बेटी की शादी के बाद से खुद शादी करना चाहता था. उस ने एक दो लोगों से रिश्ता ढूंढने को कहा था. बेटों और बहुओं से उस की कतई नहीं बनती थी. मैं ने गफूर से पूछा, ‘‘तुम पड़ोसी हो तुम्हें तो पता होगा उस के पास 6-7 महीने पहले इतना पैसा कहां से आया था?’’ गफूर ने सोच कर जवाब दिया, ‘‘साहब, यह तो मुझे नहीं मालूम, पर सब कहते हैं कि उसे कहीं से गड़ा हुआ खजाना मिल गया. पर रंजन कहता था उस का अनाज का व्यापार बहुत अच्छा चल रहा है.’’

जरूरी काररवाई कर के मैं थाने लौट आया. शाम को मैं ने बिलाल शाह को भेज कर सुगरा और उस के शौहर को बुलवाया. सुगरा 22-23 साल की खूबसूरत औरत थी. उस की गोद में डेढ़ साल का प्यारा सा बच्चा था. गरीबी और भूख ने उस की हालत खराब कर रखी थी. उस के कपड़े पुराने और फटे हुए थे. यही हाल उस के शौहर का था. उस के हाथ पर पट्टी बंधी हुई थी. मैं ने नजीर से पूछा, ‘‘तुम्हारे हाथ पर चोट कैसे लगी?’’

‘‘साहब, खराद मशीन में हाथ गया था. 2 जगह से हड्डी टूट गई थी. 2-3 औपरेशन हो चुके हैं पर फायदा नहीं है.’’

‘‘क्या खराद मशीन तुम्हारी अपनी है?’’

‘‘नहीं जनाब, मैं दूसरे के यहां 50 रुपए महीने पर नौकरी करता था. हाथ टूटने के बाद उस ने निकाल दिया.’’

दोनों मियां बीवी सिसकसिसक कर रो रहे थे. पर मैं अपने फर्ज से बंधा हुआ था. मैं ने नजीर को बाहर भेज दिया और सुगरा से पूछा, ‘‘सुना है तुम्हारा शौहर पसंद नहीं करता था कि तुम किसी और के घर काम करो. इस बात पर वह तुम से झगड़ता भी था. क्या यह सच है?’’ ‘‘जी हां साहब, उसे पसंद नहीं था पर मेरी मजबूरी थी. मेरे तीनों बच्चे भूखे मर रहे थे. काम कर के मैं उन्हें खाना तो खिला सकती थी. मैं ने गुड्डू के अब्बा से हाथ जोड़ कर रंजन चाचा के घर काम करने की इजाजत मागी थी और वह मान भी गया था.’’

‘‘पर गांव वाले तुम्हारे और रंजन के बारे में बेहूदा बातें करते थे. यह बातें तुम्हें और तुम्हारे शौहर को भी पता चलती होंगी?’’ ‘‘साहब, जिन के दिल काले हैं, वही गंदी बातें सोचते हैं. रंजन चाचा मेरे साथ बहुत अच्छा सलूक करते थे. जब मैं काम करती थी, तब वह घर पर होते ही नहीं थे. लोगों की जुबान बंद करने के लिए मैं अपने बच्चों को भूखा नहीं मार सकती थी.’’

‘‘सुगरा, ऐसा भी तो हो सकता है कि गुस्से में कर नजीर ने रंजन सिंह को मार डाला हो?’’

‘‘नहीं साहब, वह कभी किसी का खून नहीं कर सकता. वैसे भी वह हाथ से मजबूर है, सीधा हाथ हिला भी नहीं सकता.’’

इस बारे में मैं ने नजीर से भी पूछताछ की. उस ने बताया कि उस रात 11 बजे तक वह अपने दोस्त अशरफ के यहां था. मैं ने नजीर से कहा, ‘‘लोग तुम्हारी बीवी के बारे में जो बेहूदा बातें करते थे, उस पर तुम्हें गुस्सा नहीं आता था, कहीं इसी गुस्से में तो तुम ने रंजन को नहीं मार डाला?’’ ‘‘तौबा करें साहब, हम गरीब मजबूर इंसान हैं. ऐसा सोच भी नहीं सकते. हमारी भूख और मजबूरी के आगे गैरत हार जाती है.’’ मैं ने उन दोनों को घर जाने दिया, क्योंकि वे लोग बेकसूर नजर आ रहे थे.

मैं ने एक बार फिर रंजन के घर की अच्छे से तलाशी ली. दरी के ऊपर एक घड़ी पड़ी थी. अलमारियां खुली हुई थीं, पर यह पता लगाना मुश्किल था कि क्याक्या सामान गया है? बेटों को भी कुछ पता नहीं था, क्योंकि वह बाप की दूसरी शादी के सख्त खिलाफ थे, इसलिए आनाजाना बंद था. पोस्टमार्टम के बाद रंजन सिंह का अंतिम संस्कार कर दिया गया. इस मौके पर सभी रिश्तेदार मौजूद थे. उस के दोनों बेटे रूप सिंह और शेर सिंह भी थे. बाद में मैं ने रूप सिंह को बुलाया. वह आते ही फट पड़ा, ‘‘थानेदार साहब, हमारे बापू को किसी और ने नहीं नजीर ने ही मारा है. दोनों मियांबीवी बापू के पीछे हाथ धो कर पड़े थे. सुगरा को पता होगा जेवर और पैसे कहां हैं. उसी के लिए मेरा बापू मारा गया.’’

मैं ने उसे समझाया, ‘‘हमारी नजर सब पर है. तुम उस की फिक्र मत करो. तुम यह बताओ कि हादसे की रात तुम कहां थे और बाप से क्यों झगड़ा चल रहा था?’’

‘‘मैं अपने घर में था. मेरी घर वाली को बेटा हुआ था. दोस्त और रिश्तेदार मिल कर जश्न माना रहे थे.’’

‘‘तुम्हारे यहां बेटा हुआ, जश्न मना, पर बाप को खबर देने की जरूरत नहीं समझी, क्यों? तुम काम क्या करते हो.’’ 

‘‘बापू की दूसरी शादी की वजह से झगड़ा चल रहा था. इसलिए उसे नहीं बताया. मैं मोमबत्ती और अगरबत्ती बनाने का काम करता हूं.’’

दोनों बेटों से पूछताछ करने से भी कोई नतीजा नहीं निकला. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट गई, जिस से पता चला रंजन नींद की गोलियों के नशे में था. इस रिपोर्ट से मेरा शक सुगरा की तरफ बढ़ गया. पर मेरे पास कोई सबूत नहीं था. रिपोर्ट मिलने के बाद मैं रंजन सिंह के घर पहुंचा. वहां देनों बेटे और बेटी भी मौजूद थे. बेटी रोरो कर बेहाल थी. मैं ने नींद की गोलियों की तलाश में अलमारी छान मारी पर कहीं कुछ नहीं मिला. उस की बेटी का कहना था कि उस का बापू नींद की गोलियां नहीं खाता था. 2 दिन बाद डीएसपी बारा सिंह खुद ढाब पहुंचा. वह बहुत गुस्से में था. कहने लगा, ‘‘सारी कहानी और सबूत सुगरा और नजीर की तरफ इशारा कर रहे हैं कि कत्ल उन्होंने ही किया है. फौरन उन्हें गिरफ्तार कर के पूछताछ करो.’’

मैं ने उन दोनों को गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया और सख्ती भी की, पर दोनों रोते रहे, कसमें खाते रहे कि उन्होंने कुछ नहीं किया है. मैं डीएसपी के हुक्म के आगे मजबूर था. डीएसपी के जाने के बाद मैं ने सुगरा को छोड़ दिया, क्योंकि उस की हालत बहुत बुरी थी. वह बच्चों के लिए तड़प रही थी. मेरी हमदर्दी सुगरा के साथ थी. क्योंकि वह बेकसूर लग रही थी, पर नींद की गोलियां का मामला साफ होने के बाद ही यकीन से कुछ कहा जा सकता था. मुझे यह पता करना था कि गोलियां कहां से खरीदी गई थीं. कस्बे में एक ही बड़ी दुकान थी. उस के मालिक गनपत लाल को मैं जानता था

उस ने पूछताछ के बाद बताया कि करीब एक महीने पहले रंजन सिंह उस की दुकान से कुछ दवाइयां ले कर गया था, जिस में नींद की गोलियां भी शामिल थीं. यह एक पक्का सबूत था. मैं ने उस से बयान लिखवा कर साइन करवा लिया. मैं वापस थाने पहुंचा तो सुगरा नजीर से मिलने आई थी. वही बुरे हाल, फटे कपड़े, रोता बच्चा, अखबार में लिपटी 2 रोटियां और प्याज. उसे देख कर बड़ा तरस आया. काश, मैं उस के लिए कुछ कर सकता. दूसरे दिन गांव में एक झगड़ा हो गया. दोनों पार्टियां मेरे पास गईं. मैं उन दोनों की रिपोर्ट लिखवा रहा था. तभी मुझे खबर मिली कि ढाब का नंबरदार लहना सिंह मुझ से मिलने आया है. उस ने अंदर कर कहा, ‘‘नवाज साहब, मुझे आप से बहुत जरूरी बात करनी है. कुछ वक्त दे दें.’’ 

मुझे लगा कि वह इसी लड़ाई के बारे में कुछ कहना चाहता होगा. मैं ने उसे बाहर बैठ कर कुछ देर इंतजार करने को कहा. वह अनमना सा बाहर चला गया. इस झगड़े में एक आदमी बहुत जख्मी हुआ था, जो अस्पताल में भरती था. काम निपटाते निपटाते 2 घंटे लग गए. फिर मैं ने लहना सिंह को बुलवाया तो पता चला वह चला गया है. मैं ने शाम को एक सिपाही को यह कह कर लहना सिंह के घर भेजा कि उसे बुला लाएपता चला कि वह अभी तक घर ही नहीं पहुंचा है. मुझे कुछ गड़बड़ नजर रही थी. 11 बजे के करीब लहना सिंह का छोटा भाई बलराज आया. कहने लगा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, लहना सिंह का कहीं पता नहीं चल रहा है. हम सब जगह देख चुके हैं.’’

मैं परेशान हो गया, क्योंकि लहना सिंह का इस तरह से गायब होना किसी हादसे की तरफ इशारा कर रहा था. मैं ने बलराज से पूछा, ‘‘लहना सिंह की किसी से लड़ाई तो नहीं थी?’’

‘‘साहब, एक दो महीने पहले उन की चौधरी श्याम सिंह से जम कर लड़ाई हुई थी. दोनों एकदूसरे को मरने मारने पर उतारू थे. मेरा पूरा शक श्याम सिंह पर है.’’ मुझे मालूम था कि श्याम सिंह रसूखदार आदमी है. उसी वक्त लहना सिंह का बेटा और एक दो लोग भागते हुए थाने आए और कहने लगे, ‘‘साहब, जल्दी चलिए. श्याम सिंह ने लहना सिंह को कत्ल कर दिया है या फिर जख्मी कर के अगवा कर लिया है. हवेली के पीछे मैदान में खून के धब्बे मिले हैं.’’

मैं फौरन मौका वारदात के लिए रवाना हो गया. उन दोनों की लड़ाई के बारे में मैं ने भी सुना था. श्याम सिंह शहर से एक तवायफ ले आया था, जिसे उस ने अपने डेरे पर रख रखा था. एक दिन मौका पा कर नशे में धुत लहना सिंह वहां पहुंच गया और उस ने दो साथियों के साथ उस तवायफ से ज्यादती कर डाली. इस बात को ले कर दोनों में बहुत झगड़ा हुआ था. यह बात गांव में सब को पता थी. लहना सिंह की हवेली के पीछे एक सुनसान मैदान था. वहां शौर्टकट के लिए एक पगडंड़ी थी. वहीं पर कच्ची जमीन पर 3-4 जगह खून के धब्बे थे. वहीं पर लहना सिंह की एक जूती भी पड़ी थी. संघर्ष के भी निशान थे. कुछ दूर तक जख्मी को घसीट कर ले जाया गया था. उस के बाद उसे उठा कर ले गए थे. मैं ने मौके की जगह की अच्छी तरह जांच की. कुछ बयान लिए. लेकिन हादसे का चश्मदीद गवाह एक भी नहीं मिला.

 मैं थाने पहुंचा तो देखा चौधरी श्याम सिंह शान से बैठा हुआ था. मैं ने उस से अकेले में बात करना बेहतर समझा. मैं ने कहा, ‘‘देखो चौधरी, लंबे चक्कर में पड़ना ठीक नहीं है. अगर लहना सिंह तुम्हारे पास है तो उसे बरामद करा दो. मैं कोई केस नहीं बनाऊंगा.’’ वह मुस्कुरा कर बोला, ‘‘नवाज साहब, हम केस से या कोर्ट कचहरी से नहीं डरते, पर सच्ची बात यह है कि मैं ने एक हफ्ते से लहना सिंह को नहीं देखा. हमारी लड़ाई जरूर हुई थी पर मुझे उसे उठा कर छुपाने की क्या जरूरत है?’’

 छुपाने की बात कहते हुए वह कुछ घबरा सा गया था, इसलिए बात बदलते हुए फिर बोला, ‘‘मुझे पता नहीं है जी उस ने आप के क्या कान भर दिए और वह चंदर तो…’’ फिर वह एकदम चुप हो गया. मैं ने पूछा, ‘‘चंदर कौन?’’

‘‘जीजीवह कोई नहीं आप चाहे तो मेरा पर्चा कटवा दें.’’

मैं समझ गया कि कोई राज की बात थी, जो उस ने भूल से कह दी और अब छुपा रहा है. मुझे यकीन हो गया कि लहना सिंह के अगवा करने में उसी का हाथ है. 2-4 सवाल कर के मैं ने उसे जाने दिया. फिर लहना सिंह के बेटों को बुला कर समझाया कि कोई लड़ाईझगड़ा ना करे, हम शांति से उसे बरामद करेंगे. मैं ने बिलाल शाह को भेजा कि मालूम करे कि चंदर किस का नाम है. दूसरे दिन बिलाल शाह खबर ले कर आया कि चंदर रंजन सिंह का ही दूसरा नाम हैजवानी में वह पहलवानी करता था. लोग उसे चंदर कह कर पुकारते थे. मैं चौंका. इस का मतलब रंजन सिंह के कत्ल और लहना सिंह के गायब होने में कोई संबंध जरूर था. अब मुझे अफसोस हुआ कि काश मैं ने लहना सिंह की बात सुन ली होती.

मैं ने चौधरी श्याम सिंह की निगरानी शुरू करवा दी. इस काम के लिए मेरी नजर शांदा पर अटक गई. वह दाई थी. उस का चौधरियों के यहां खूब आनाजाना था. उन के घर के सभी बच्चे उसी के हाथों पैदा हुए थे. वह लालची या डरने वाली औरत नहीं थी. पर उस की एक कमजोरी मेरे हाथ गई थी. उसी कमजोरी का फायदा उठाते हुए मैं ने उसे चौधरी  के खिलाफ मुखबिरी करने के लिए राजी कर लिया. शांदा से खबर लाने का काम बिलाल शाह के जिम्मे था. तीसरे दिन बिलाल शाह ने आ कर बताया कि शांदा के मुताबिक हवेली का एक कारिंदा जोरा सिंह हवेली से बाहर हैं. पांचवे दिन एक खास खबर मिली कि नंबरदार लहना सिंह चौधरी श्याम सिंह के कारिंदे जोरा सिंह की कुएं वाली कोठरी में जख्मी हालत में बंद है.

पिछली रात जब जोरा सिंह चौधरी से मिलने आया था तो शांदा ने अपने बेटे को उस के पीछे लगा दिया था. उस ने देखा लहना सिंह कुएं के पास बने एक कमरे में बंद था. एक रायफल धारी उस का पहरा दे रहा था. शांदा के बेटे ने अपनी जान जोखिम में डाल कर बहुत बड़ी जानकारी प्राप्त की थी. मैं फौरन मुहिम पर रवाना हो गया. मैं ने अपनी टीम के साथ जोरा सिंह की कोठरी पर धावा बोल दिया. उस वक्त सुबह के 9 बजे थे. खेतखलिहान सुनसान थे. किस्मत से श्याम सिंह बाहर गया हुआ था. हमें देखते ही जोरा सिंह ने छलांग लगाई और खेतों की तरफ भागा. मेरे हाथ में भरा हुआ रिवाल्वर था. मैं चिल्लाया, ‘‘रुक जाओ, नहीं तो गोली चला दूंगा.’’ लेकिन जोरा सिंह नहीं रुका. मैं ने उस की पिंडली का निशाना ले कर गोली दाग दी. वह औंधे मुंह गिरा. 

उसे काबू कर के और उस के 2 आदमियों के हाथ से बंदूक छीन कर हम कमरा खुलवा कर अंदर पहुंचे. लहना सिंह एक कोने में खाट पर सुकड़ासिमटा पड़ा था. वह मुश्किल से पहचाना जा रहा था. उस के कपड़ों पर खून के धब्बे थे. सिर पर जख्म था. 2 दांत टूटे हुए थे. एक कलाई टूट कर लटकी हुई थी. जिस्म पर कुल्हाड़ी के कई जख्म थे. वह बेहोश पड़ा था. हम उसे संभाल कर बाहर ले कर आए. फायरिंग की आवाज से लोग जमा हो गए थे. लहना सिंह को इतनी बुरी हालत में देख कर सब हैरान रह गए. उस की एक जूती भी कमरे से बरामद हुई. मैं ने फौरन गाड़ी का इंतजाम कर के उसे अमृतसर के अस्पताल रवाना किया. उस के जख्म बहुत खराब हो चुके थे. अस्पताल पहुंचने के पांचवे दिन उस की तबीयत जरा संभली और वह बयान देने के काबिल हुआ.

उस से पहले ही मैं चौधरी श्याम सिंह और उस के भाई को गिरफ्तार कर चुका था. क्योंकि मुझे खतरा था कि लहना सिंह के बयान के बाद वह फरार हो जाएगा. चौधरी ने अपना जुर्म कबूल नहीं किया और मुझे धमकियां दे रहा था. लहना सिंह के बयान के बाद चौधरी श्याम सिंह के खिलाफ केस मजबूत हो गया. अस्पताल के सर्जिकल वार्ड के बिस्तर पर लेटेलेटे लहना सिंह ने बहुत कमजोर आवाज में अपना बयान कलमबंद करवाया.

‘‘साहब, रंजन सिंह का कातिल चौधरी श्याम सिंह ही है. उस ने अपने बदमाश जोरा सिंह के जरिए उसे कत्ल करवाया है. मैं उस रोज थाने में यही खबर देने के लिए आप के पास आया था, पर बदकिस्मती से आप से बात नहीं हो सकी. आप अपने काम में बहुत मसरूफ थे

‘‘मैं बैठेबैठे थक गया था. सोचा घर का एक चक्कर लगा लूं. मैं घर के पीछे पहुंचा ही था कि श्याम सिंह के बंदों ने मुझ पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया. फिर उठा कर ले गए और कुएं वाले कमरे में बंद कर दिया. बाकी जो कुछ हुआ वह आप के सामने है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘रंजन सिंह को कत्ल करने की कोई ना कोई वजह होगी. उस ने कत्ल क्यों किया? तुम निडर हो कर बोलो. तुम्हारा एकएक शब्द श्याम सिंह के खिलाफ गवाही बनेगा.’’

‘‘बड़ी खास वजह थी जनाब, रंजन सिंह के पास सोने का एक घंटा था. इस घंटे का वजन करीब 3 सेर था. जिस के पास 3 सेर खालिस सोना हो उसे कोई भी जान से मार सकता है. चौधरी श्याम सिंह को इस सोने का पता चल गया था. उस ने रंजन का कत्ल करवा कर सोना हड़प लिया. यह सोना चौधरी के पास ही है. उसे जूते पड़ेंगे तो सब सच बक देगा.’’

लहना सिंह की खबर बहुत सनसनीखेज थी. 3 सेर सोना उस वक्त भी लाखों रुपयों का था. मैं ने लहना सिंह से फिर पूछा, ‘‘यह घंटा रंजन को मिला कहां से था?’’

लहना सिंह ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘यह तो पक्का पता नहीं, पर रंजन अपनी दुकान पर पुराना सामान ले कर भी पैसे दिया करता था. सोने का वह घंटा भी किसी को जमीन में से मिला था. टूटाफूटा, मिट्टी में सना हुआ. उस का रंग भी काला थाकोई देहाती बंदा उसे पीतल का समझ कर रंजन को कुछ सौ रुपए में बेच गया था. घंटे के साथ आधा किलो की एक जंजीर भी थी. रंजन बहुत चालाक आदमी था. उस ने लाहौर जा कर पता किया तो वह असली सोना निकला. उस ने जंजीर बेच दी और यह हवेली खरीदी. साथ ही शहर में अनाज की आढ़त का काम शुरू कर दिया. धूमधाम से बेटी की शादी की. फिर अपने लिए रिश्ता ढूंढने लगा.’’

मैं ने लहना सिंह से पूछा, ‘‘तुम्हें इन सारी बातों का कैसे पता चला?’’

उस ने एक लंबी कराह लेते हुए कहा, ‘‘उन दिनों मेरी और श्याम सिंह की अच्छी दोस्ती थी. वह सब बातें मुझे बताता था. उसे अपने किसी मुखबिर के जरिए पता लग चुका था कि रंजन के पास सोने का घंटा है. 3 सेर सोना कोई छोटी बात नहीं थी. उसने सोच लिया था कि रंजन का कत्ल कर के सोने पर कब्जा कर लेगा. यह बात उस ने मुझे खुद बताई थी. 

‘‘उस वक्त वह शराब के नशे में था. जब 2 हफ्ते पहले रंजन का कत्ल हुआ तो मेरा ध्यान फौरन श्याम सिंह की तरफ गया. मुझे पूरा यकीन था रंजन को मार कर घंटा उसी ने गायब किया है. थानेदार साहब, मैं ने आप से वादा किया था झूठ नहीं बोलूंगा. मैं ने सारा सच बता दिया है, अब श्याम सिंह को फांसी के तख्ते पर पहुंचाना आप का काम है.’’

मैं ने ध्यान से उस का बयान सुना फिर पूछा, ‘‘उस ने तुम्हें मारने की कोशिश क्यों की?’’

वह सिसकी ले कर बोला, ‘‘साहब, मैं ने श्याम सिंह से कहा था कि सोने के घंटे में से मुझे भी हिस्सा दे, नहीं तो मैं यह बात पुलिस को बता दूंगा. पहले तो वह मुझे टालता रहा. जब मैं ने धमकी दी तो उस ने मेरा यह हाल कर दिया. उस दिन मैं आप को यही बात बताने आया था.’’

  मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हारे खयाल में अब वह घंटा कहां है?’’

‘‘साहब, उस ने उस घंटे को हवेली में ही कहीं छुपा कर रखा है. हो सकता है कहीं गायब भी कर दिया हो.’’

मैं ने लहना सिंह को तसल्ली दी और अमृतसर से फौरन ढाब के लिए रवाना हो गया. ढाब पहुंचते ही हम ने चौधरी श्याम सिंह की हवेली पर धावा बोल दिया. चौधरी श्याम सिंह और उस का एक भाई गिरफ्तार थे. इसलिए खास विरोध नहीं हुआ. सारी हवेली की बारीकी से तलाशी ली गई. काफी मेहनत के बाद चावल के ड्रम में से सोने का घंटा बरामद हो गया. घंटे को देख कर लगता था कि वह काफी दिन तक जमीन में गड़ा रहा था. निस्संदेह वह या तो किसी मंदिर का घंटा था या फिर किसी राजा महाराजा के हाथी के गले में सजता होगा. घंटे को जब्त कर के थाने में हिफाजत से रखवा दिया गया. उस जमाने में भी उस की कीमत करीब छह लाख होगी.

कोई बदनसीब उस घंटे को रंजन को 2-3 सौ में बेच गया था. इतना कीमती घंटा देख कर कई लोगों के ईमान डोलने लगे, पर मैं इमान का पक्का था. घंटे की बरामदगी बाकायदा दर्ज की गईफिर उसे हिफाजत से कस्बे के चौराहे पर नुमाइश के लिए रख दिया गया. इस का नतीजा बहुत अच्छा निकला. एक घंटे के बाद एक आदमी ने मेरे पास कर कहा, ‘‘थानेदार साहब, मैं इस घंटे को पहचानता हूं. यह मैं ने सुगरा के आदमी नजीर के पास देखा था.’’

मैं भौंचक्का रह गया. फौरन पूछा, ‘‘तुम ने इसे उस के पास कब देखा था?’’

वह दिमाग पर जोर देते हुए बोला, ‘‘करीब 6-7 महीने पहले की बात है. मैं रंजन की दुकान पर खड़ा था. तभी नजीर वहां यह घंटा ले कर आया था. उस का रंग उस वक्त काला था और मिट्टी में लिथड़ा हुआ था. मेरे सामने ही रंजन ने उसे तराजू में डाला और तौल कर कुछ रुपए नजीर के हाथ पर रख दिए. उस के बाद मैं वहां से चला गया. पता नहीं फिर उन दोनों के बीच क्या बात हुई.’’

यह एक सनसनीखेज खबर थी कि लाखों का घंटा कौडि़यों में बिक गया और बेचने वाला दानेदाने को मोहताज था. गरीब नजीर जेल में बंद था. मैं फौरन सुगरा के घर पहुंचा, लेकिन घर बंद था. लोगों का खयाल था कि भूख और गरीबी से तंग आ कर रोजी की तलाश में वह किसी और कस्बे में चली गई होगी. मुझे बेहद अफसोस हो रहा था. उस के मासूम बच्चे याद आ रहे थे. उसे तलाश करने का हुक्म दे कर मैं थाने आ गया. वहां से घंटा ले कर अमृतसर के लिए रवाना हो गए. क्योंकि नजीर अमृतसर में ज्यूडीशियल रिमांड पर जेल में था. मैं ने उसे कपड़े में लिपटा हुआ घंटा दिखा कर पूछा, ‘‘क्या यह घंटा कुछ महीने पहले तुम ने रंजन को बेचा था. इसे लाए कहां से थे?’’

‘‘हां बेचा था. मैं अपने घर से लाया था. बैसाखी के पहले की बात है साहब, एक दिन तेज बारिश हुई. मेरे घर की दीवार गिर गई. जब दोबारा दीवार उठाने के लिए बुनियाद रखी तो यह घंटा मिलाबच्चे मचलने लगे मिठाई खाएंगे. मैं इसे ले कर रंजन के पास गया. उस ने इसे 50 रुपए में मुझ से खरीद लिया. मैं बच्चों के लिए मिठाई ले कर गया. कुछ घर का सामान खरीदा. पर साहब, आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं?’’ मैं ने उसे टाल दिया और सिपाही से कह दिया कि सुगरा आए तो मुझ से जरूर मिलाए. दूसरी दिन सुबह मैं अस्पताल पहुंचा. दरवाजे के करीब ही मुझे स्टै्रचर पर लहना सिंह की लाश मिल गई. बेचारा बेवजह मारा गया. चौधरी श्याम सिंह अब दोहरे कत्ल का दोषी था

लहना सिंह के आखिरी बयान और हवेली से घंटा मिलने से वह पूरी तरह फंस गया था. अब यह बात भी समझ में गई थी कि रंजन सिंह सुगरा के खानदान पर मेहरबान क्यों था? क्यों उन की मदद करता था. क्योंकि वह उन्हीं के पैसे पर ऐश कर रहा था. लोगों ने उस की बिना बात के बदनामी फैला दी थी. मैं ने सुगरा की तलाश में 2 लोग लगा दिए, पर उस का कोई पता नहीं चला. लहना सिंह के बयान के बाद सुगरा और नजीर बेकसूर साबित हो गएरंजन के पेट से मिलने वाली नींद की गोली का मसला भी हल हो गया था. वह उस ने खुद खरीद कर खाई थी. पहले बेटी के सामने वह नींद की गोली नहीं लाता था, पर बाद में लेने लगा. इसलिए उस की बेटी ने नहीं कहा था.

श्याम सिंह ने जोरा सिंह से रंजन का कत्ल  इसलिए करवाया था कि वह उस का सोने का घंटा हासिल कर सके. जब जोरा सिंह रंजन के घर घंटे को ढूंढ रहा था तो रंजन की आंख खुल गई. वह हिम्मत कर के जोरा सिंह पर टूट पड़ा. एक जमाने में वह पहलवानी करता था और चंदर के नाम से जानाजाता थाउस ने अपने बाजूओं में उसे बुरी तरह से जकड़ लिया था. जरा सी छूट मिलते ही जोरा सिंह ने अपनी कृपाण से उस के सीने पर वार कर दिया. जब वह गिर गया तो छाती पर चढ़ कर उसे खत्म कर दिया. उसे मारने के बाद उस ने हवेली से घंटा ढूंढ लिया. इस सारे मामले में सुगरा और नजीर शुरू से आखिर तक बेकसूर थे. उस वक्त के कानून के मुताबिक बरामद होने वाली चीज की हैसियत एंटीक ना हो और किसी का मालिकाना हक ना साबित हो पाए तो यह चीज उस शख्स की मानी जाती थी, जिस के घर से वह बरामद हुई हो

वह घंटा नजीर के घर की टूटी दीवार से बरामद हुआ था. अगर सरकार मामले को हमदर्दी से देखती तो यह घंटा नजीर और सुगरा का था, भले ही वह उस की कीमत समझ सके थे. नजीर के जमानत पर रिहा होने के बाद सुगरा की तलाश और जोर पकड़ गई. मुझे कहीं से खबर मिली कि मरनवाल नाम के गांव में जो ढाब से करीब 20 किलोमीटर दूर था, वहां सुगरा के हुलिए की एक औरत दिखाई दी थीहम लोग वहां पहुंचे तो पता चला वह एक रिटायर्ड हवलदार के यहां काम कर रही थी. उस के घर पूछताछ करने पर उस ने बताया कि एक औरत 3 बच्चों के साथ उस के यहां पनाह लेने आई थी. उस ने उसे रख भी लिया था. फिर एक दिन चोरी करते पकड़ी गई तो मैं ने उसे निकाल दिया.

आसपास के लोगों से पता चला कि वह झूठ बोल रहा था. हवलदार की नीयत सुगरा पर खराब हो गई थी. सुगरा ने शोर मचा दिया. लोगों के पहुंचने पर उस ने सुगरा को मारपीट कर निकाल दिया. किसी ने बताया वह रामपुर की तरफ गई थी. उस बेगुनाह मजबूर औरत की तलाश में हम रामपुर पहुंचे और जगहजगह उस की तलाश करते रहे. रामपुर के छोटे से अस्पताल में हमें सुगरा मिल गई, लेकिन वह जिंदा नहीं लाश की सूरत में मिली. उस के बच्चे वहीं बैठे रो रहे थे. उस की मौत दिमाग की नस फटने से हुई थी. इतने दुख और गरीबी की मार सह कर उस का बच पाना मुश्किल ही था. सुगरा की लाश ढाब पहुंची. पूरा कसबा जमा हो गया. सभी की आंखों में आंसू थे. नजीर रोरो कर पागल हो रहा था. अब लोग सुगरा की तारीफें कर रहे थे.

चौधरी श्याम सिंह और जोरा सिंह पर दोहरे कत्ल का इलजाम साबित हुआ. एक सुबह वह दोनों और उन के 2 साथियों की डिस्ट्रिक्ट जेल के अहाते में फांसी दे दी गईनजीर अपने तीनों बच्चों के साथ ढाब छोड़ कर चला गया. अब उस के पास इतनी रकम थी कि सारी उम्र बैठ कर खा सकता था. 3 सेर सोने के घंटे में से सरकार ने अपना तयशुदा सरकारी हिस्सा काटने के बाद बाकी नकद रकम नजीर के हवाले कर दी थी. इस के बाद 2-3 बार नजीर के घर की खुदाई की गई पर एक खोटा सिक्का नहीं मिला.

इस घटना के सालों बाद भी मैं उस मासूम और मरहूम सुगरा को नहीं भूल सका.

प्रेमी ने शादीशुदा महिला से पीछा छुड़ाने के लिए गोली मारी

अपनी महत्त्वाकांक्षाओं मां रूपम नौजवान रोहित के साथ प्यार की पींगें बढ़ाने लगी और उस के साथ शादी करने का सपना देखने लगी, लेकिन रोहित उसे एंजौय का साधन समझता था. रूपम ने जब उस से जिद की तो…   

9मई की रात तकरीबन साढ़े 8 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के थाना इंदिरापुरम में किसी ने फोन कर के सूचना दी कि न्याय खंड-3 में एक महिला को किसी ने गोली मार दी है.इस संवदेनशील सूचना के मिलते ही थानाप्रभारी वीरेंद्र सिंह मय पुलिस बल के सूचना में बताए स्थान पर पहुंच ग ए. उस इलाके में सैकड़ों की तादाद में जनता फ्लैट बने हुए हैं. जिस जगह यह वारदात हुई, वह गली एकदम सुनसान थी. गली फ्लैटों के पीछे की साइड में होने की वजह से लोग उस का इस्तेमाल कम ही किया करते थे.

थानाप्रभारी ने मौकामुआयना किया तो वहां करीब 28-30 साल की महिला खून से लथपथ पड़ी थी. गोली उस की कनपटी पर मारी गई थी. मौके पर मोबाइल फोन और एक थैला भी पड़ा था, जिस में सब्जियां थीं. महिला शायद जिंदा बच जाए इसलिए आननफानन में पुलिस उसे नजदीक के एक निजी अस्पताल ले गई. लेकिन डाक्टरों ने उस महिला को देख कर मृत घोषित कर दिया. महिला के पास से ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी जिस से तुरंत उस की शिनाख्त हो सके. लिहाजा घटनास्थल के आसपास के फ्लैटों में रहने वाले लोगों से पुलिस उस महिला के बारे में पूछताछ करने लगी

उसी समय अजय झा नाम का एक युवक पुलिस के पास पहुंचा. उस ने बताया कि उस की पत्नी रूपम काफी देर पहले सब्जी लेने गई थी, वह अभी तक नहीं लौटी है. पुलिस ने अजय को लाश दिखाई तो उस ने तुरंत लाश को पहचान लिया और उस की पुष्टि अपनी पत्नी रूपम के रूप में कर दी. मामला हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना आला अधिकारियों को भी दे दी. सूचना मिलने पर एसपी सिटी शिवहरि मीणा और सीओ सिटी रणविजय सिंह भी अस्पताल पहुंच गएमृतका का पति बुरी तरह बिलख रहा था. पुलिस ने उसे ढांढस बंधा कर शुरुआती पूछताछ की. उस ने बताया कि शाम करीब 7 बजे रूपम बाजार से सब्जी लेने के लिए घर से निकली थी. पुलिस ने उस समय उस से ज्यादा पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा और पंचनामा भर कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी

अजय झा की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी ने केस की छानबीन शुरू कर दी. वह इतना तो समझ गए थे कि हमलावर का मकसद केवल रूपम की हत्या करना था और उस के सिर में गोली इसलिए मारी गई थी ताकि वह जिंदा बच सके. चूंकि रूपम का पर्स, पहने हुए आभूषण और मोबाइल फोन सलामत था, इसलिए लूट की वजह से हत्या करने की संभावना बिलकुल नहीं थी. एसएसपी शुचि घिल्डियाल ने अगले दिन मृतका के पति को अपने औफिस में बुला कर पूछताछ की. उस ने बताया कि वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. किसी के साथ अपनी रंजिश या झगड़ा होने से भी उस ने इनकार कर दिया.

उस से पूछताछ में यह पता जरूर चला कि कुछ समय पहले उस ने अंतरिक्ष सोसायटी के पास एक प्रौपर्टी खरीदी थी. सीओ रणविजय सिंह ने एसएसपी के आदेश पर जब प्रौपर्टी वाले बिंदु पर जांच की तो आशंका खारिज हो गई. आगे बढ़ने का कोई और रास्ता देख पुलिस ने रूपम के मोबाइल फोन की जांच की. उस में अंतिम काल उस के पति की थी. इस बारे में पुलिस ने अजय से पूछा तो उस ने बताया, ‘‘मेरे पास रूपम का फोन करीब 8 बजे आया था. उस ने बताया था कि उस की सहेली मिल गई है इसलिए थोड़ा लेट हो जाएगी.’’  जांच के दौरान यह भी पता लगा कि रूपम एक दूसरा मोबाइल भी इस्तेमाल करती थी. पुलिस ने उस का दूसरा नंबर भी हासिल कर लिया. अगले दिन यानी 11 मई, 2014 को उस के नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई गई.

 काल डिटेल्स की जांच में एक ऐसा नंबर पुलिस को मिल गया, जिस पर रूपम अकसर बातें किया करती थी. हत्या वाली शाम भी उस की उस नंबर पर बात हुई थी, लेकिन बात करने के बाद उस ने वह नंबर डिलीट कर दिया था. फोन की डायल सूची से रूपम ने वह नंबर डिलीट क्यों किया, इस बात को पुलिस नहीं समझ पा रही थी. पुलिस ने उस नंबर की पड़ताल की तो वह न्याय खंड-3 के ही फ्लैट नंबर-553जी निवासी रोहित राणा का निकला. एक और चौंकाने वाली बात यह भी थी कि रूपम का जो दूसरा नंबर था, उस का सिम भी रोहित के नाम पर खरीदा गया था.

इन दोनों बातों से रोहित अब पुलिस के शक के दायरे में गया. पुलिस ने उस के घर दबिश दी लेकिन वह लापता था. इस से उस पर पुलिस का शक और भी पुख्ता हो गयासीओ रणविजय सिंह ने यह पूरी जानकारी एसएसपी को दी तो एसएसपी ने रोहित राणा की तलाश करने के लिए एक पुलिस टीम बनाई जिस में थानाप्रभारी वीरेंद्र सिंह, एसएसआई विशाल, एसआई सुभाष गौतम, अंजनी कुमार, कांस्टेबल विपिन चावला आदि को शामिल किया गया. सीओ रणविजय सिंह के निर्देशन में पुलिस रोहित की तलाश में संभावित जगहों पर दबिश डालने लगी. इस की भनक शायद रोहित को लग चुकी थी जिस से वह पुलिस से बचने के लिए इधरउधर भागता रहा. अंतत: एक मुखबिर की सूचना पर उसे रात 8 बजे के करीब एक शौपिंग मौल के पास से गिरफ्तार कर लिया गया.

तलाशी में उस के पास से एक .32 बोर की पिस्टल और एक कारतूस भी बरामद हुआ. थाने ला कर उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने रूपम की हत्या से परदा उठा दिया. वही उस का हत्यारा था. हत्या की जो वजह उस ने बताई. उसे सुन कर सभी चौंक गए. 30 वर्षीया रूपम का पति अजय झा मूलरूप से बिहार के दरभंगा जिले के न्यू बलभद्रपुर, भदेरिया सराय के रहने वाले श्यामधर का बेटा था. सालों पहले अजय भी अन्य युवकों की तरह कामधंधे की तलाश में दिल्ली चला आया था. उस ने कई छोटेमोटे काम कर के किसी तरह अपने पैर जमाए. 8 साल पहले उस का विवाह रूपम झा से हुआ.

रूपम खूबसूरत युवती थी. चूंकि अजय भी दिल्ली में काम करता था इसलिए शादी के बाद वह पत्नी को भी अपने साथ दिल्ली ले आया. रूपम वक्त के साथ 2 बच्चों की मां बन गई थी. वह बनसंवर कर रहती थी. 3 साल पहले अजय ने गाजियाबाद में प्रौपर्टी डीलिंग का मामूली सा काम शुरू किया. बाद में वह दिल्ली से गाजियाबाद शिफ्ट हो गया. अपने काम की उलझनों में अजय पत्नी पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता था. इस के विपरीत रूपम की हसरतें जवान थीं. उसे देख कर नहीं लगता था कि वह 2 बच्चों की मां है. पति सुबह ही घर से निकल जाता था इसलिए घरेलू कामों के लिए रूपम को ही बाजार जाना पड़ता था. इसी दौरान उस की नजरें रोहित से चार हो गईं.

रोहित मूलत: उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के अग्रवाल मंडी, टटीरी कस्बे का रहने वाला था. फिलहाल वह न्याय खंड-3 में ही रहता था. वहीं वह ज्वैलरी की छोटी सी दुकान चलाता था. रोहित नवयुवक थाएक बार रूपम उस के यहां से बिछुए खरीद कर लाई थी. उस छोटी सी मुलाकात में ही वह रोहित को भा गई. यह करीब 5 महीने पहले की बात है. रोहित थोड़ा बातूनी स्वभाव का था. उस ने उस समय रूपम की सुंदरता की थोड़ी तारीफ क्या कर दी कि वह गदगद हो गई. इस के कुछ दिनों बाद रूपम की एक सहेली को भी अपने गले की चेन के लिए एक लौकेट खरीदना था, तब रूपम सहेली को रोहित की दुकान पर ले गई. रूपम को अपनी दुकान पर फिर आया देख रोहित बहुत खुश हुआ. उस के हावभाव और आंखों की भाषा से रूपम उस के मन की बात समझ गई थी.

 शादी के कई साल बाद भी अजय उस की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका था. रोहित की चाहत को देख कर रूपम के दिल की घंटी सी बज उठी. उसे लगा कि रोहित उस के ख्वाबों को हकीकत में बदल सकता है इसलिए मुसकरा कर उस ने रोहित के प्यार को हरी झंडी दे दी. उस दिन रोहित ने रूपम का फोन नंबर ले लिया. बातों ही बातों में रूपम ने उसे बता दिया कि उस का पति प्रौपर्टी डीलर है जो देर रात को ही घर लौटता है. इसलिए रूपम उस की दुकान से जाने के थोड़ी देर बाद ही रोहित ने उसे फोन कर दिया. इधरउधर की बातें करने के बाद रोहित ने उस से अपने मन की बात खुल कर कह दी. रूपम ने भी बिना कोई देर किए उस के प्यार को स्वीकार कर लिया. प्यार का इजहार कर के दोनों ही खुश थे.

 इस के बाद दोनों एकदूसरे से मोबाइल पर अकसर बातें करने लगे. रूपम अपने घर से किसी किसी बहाने निकलती और रोहित के साथ रेस्टोरेंट पार्कों में चली जाती. एकांत में होने वाली बातों के जरिए दोनों एकदूसरे के बेहद करीब गए. दिल तो कब के मिल चुके थे. फिर एक दिन एक होटल में उन्होंने अपनी हसरतें भी पूरी कर लीं. जब पति अपने काम पर निकल जाता और बच्चे स्कूल तभी रूपम रोहित को फोन कर देती. मौका देख कर रोहित उस के घर जाता था. इस तरह वे दोनों खूब मौजमस्ती करते रहे

पति को शक हो, इस से बचने के लिए रूपम मोबाइल पर बातें कर के प्रेमी रोहित का नंबर डिलीट कर देती थी. बाद में रोहित ने उसे एक मोबाइल और सिमकार्ड भी खरीद कर दे दिया. रोहित से बात करने के लिए वह ज्यादातर उसी नए नंबर का उपयोग करती थी. प्यार की दीवानगी हदों को लांघने लगी थी. वह पति और बच्चों को छोड़ कर प्रेमी के साथ ही घर बसाने की सोचने लगी. एक दिन उस ने रोहित से अपने मन की बात कह भी दी, ‘‘रोहित, क्यों हम कहीं जा कर शादी कर लें और फिर एक हो कर रहें.’’

रूपम की बात सुन कर रोहित सकते में आ गया. एकाएक उस से कोई जवाब नहीं बना क्योंकि उस ने कभी सोचा ही नहीं था कि ऐसी नौबत भी आ सकती है. वह रूपम को प्यार तो करता था लेकिन उस से शादी जैसी बात कभी नहीं सोची थी. उसे खामोश देख कर रूपम ने टोका, ‘‘क्या सोच रहे हो, क्या मैं तुम्हें पसंद नहीं?’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है रूपम. तुम ने जो बात कही है उस पर मुझे सोचने का मौका दो.’’ उस रात रोहित को ठीक से नींद नहीं आई. रूपम उस से उम्र में बड़ी थी. वह उसे इस्तेमाल तो करना चाहता था लेकिन उस के साथ बंध कर रहना नहीं चाहता था. काफी सोचनेसमझने के बाद उस ने रूपम से पीछा छुड़ाने का फैसला ले लिया और उस से पीछा छुड़ाने की सोचने लगा.

इस के बाद रोहित ने रूपम से दूरियां बनानी शुरू कर दीं. रूपम को जब लगा कि प्रेमी ने उस से मिलना कम कर दिया है तो एक दिन वह बोली, ‘‘रोहित, तुम आजकल कुछ बदलेबदले लगते हो. कहीं तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रहे?’’ ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है रूपम.’’ रोहित ने कहा.

‘‘तो फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम मुझ से दूर होते जा रहे हो. वैसे शादी के बारे में तुम ने क्या सोचा?’’

‘‘मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं रूपम. मैं तुम से प्यार भी बहुत करता हूं. मेरा कहना यह है कि शादी के लिए अभी रुक जाओ. वैसे भी शादी की तुम इतनी जल्दी क्यों कर रही हो? हम मिलते तो रहते हैं.’’

‘‘रोहित, तुम्हारी बातों से मुझे यह लग रहा है कि तुम मुझे शादी के लिए टाल रहे हो. लेकिन मैं भी तुम्हें एक बात बताना चाहती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘अगर तुम ने मुझ से शादी नहीं की और धोखा दिया तो मैं आत्महत्या कर लूंगी और सुसाइड नोट में तुम्हारा नाम लिख दूंगी.’’ 

रूपम की इस धमकी से रोहित के पसीने छूट गए. वह बोला, ‘‘मुझे थोड़ा समय तो दो.’’

‘‘बस अब और नहीं. मुझे जल्दी जवाब चाहिए.’’ रूपम के तेवर देख कर रोहित डर गया. उस ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

रोहित समझ गया था कि रूपम किसी भी सूरत में उस का पीछा छोड़ने वाली नहीं हैउस से पीछा छुड़ाने के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना ली. रोहित का एक दोस्त था गौरव त्यागी. गौरव को रोहित ने अपनी परेशानी बताई और उस से किसी हथियार का इंतजाम करने को कहा. गौरव ने बहुत जल्द एक पिस्टल का इंतजाम कर के उसे दे दिया. रोहित ने सोच लिया था कि वह आखिरी बार रूपम को समझाने की कोशिश करेगा. अगर वह फिर भी नहीं मानी तो उसे रास्ते से हटा देगा. योजना बना कर उस ने 9 मई, 2014 की शाम को रूपम को फोन किया, ‘‘रूपम, मुझे आज तुम से मिलना है. एक जरूरी बात करनी है.’’

रूपम खुश हुई कि रोहित ने शायद उस की बात मान ली है. वह बोली, ‘‘ठीक है, मैं तुम से 8 बजे के बाद घर के पीछे वाली उसी गली में मिलूंगी, जहां हम पहले मिलते थे.’’ उस गली का चुनाव रूपम ने इसलिए किया था क्योंकि वह सुनसान रहती थी. उस शाम रूपम बाजार के लिए घर से निकली. उस ने घर के लिए सब्जियां खरीदीं. इसी बीच उस ने अपने पति को फोन भी कर दिया कि वह सहेली के पास जाएगी इसलिए घर थोड़ी देरी से आएगी. वह तय समय पर रोहित से मिलने गली में पहुंच गई. रोहित भी वहां पहुंच गया था. वह रोहित के खतरनाक इरादों से पूरी तरह अनजान थी.

 उसे देखते ही रूपम ने पूछा, ‘‘क्या सोचा तुम ने?’’ ‘‘रूपम, तुम मेरी मजबूरी समझो. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ यह सुनते ही रूपम के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे उम्मीद नहीं थी कि रोहित उसे ऐसा जवाब देगा. ‘‘मैं अब तुम्हें छोड़ूंगी नहीं. तुम ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया.’’ कहने के साथ ही रूपम ने गुस्से में रोहित के साथ हाथापाई शुरू कर दी. उसे नहीं पता था कि रोहित उस की मौत बनने जा रहा है.

‘‘पीछा तो तुम्हें छोड़ना ही पड़ेगा रूपम.’’ रोहित गुस्से में बोला और पलक झपकते ही पिस्टल निकाल ली. यह देख कर रूपम के होश उड़ गए. वह कुछ कर पाती, उस से पहले ही रोहित ने उस के सिर से पिस्टल सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही रूपम गिर पड़ी. उसे तड़पता छोड़ रोहित वहां से भाग गया. पुलिस उस तक न पहुंच सके, इसलिए वह घर से भी फरार हो गया. लेकिन पुलिस के जाल में वह फंस ही गया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या के समय पहनी गई टीशर्ट जिस पर खून के छींटे लगे थे, बरामद कर ली. उस का मोबाइल भी पुलिस ने जब्त कर लिया. 

अगले दिन पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया जहां से उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस उसे पिस्टल मुहैया कराने वाले उस के दोस्त गौरव त्यागी की तलाश कर रही थी.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इस फोटो का इस घटना से कोई संबंध नहीं है, यह एक काल्पनिक फोटो है

सच : कोलकाता रेप हत्याकांड की उस रात आखिर हुआ क्या

कोलकाता की ट्रेनी डाक्टर के साथ रेपमर्डर की वारदात का हंगामा सड़क से ले कर संसद तक में गूंज उठा. पूरा देश गुस्से में आ गया. सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और सीबीआई की जांच रिपोर्ट के बाद एक साइको दरिंदे संजय राय की हैवानियत का खुलासा हुआ. लेकिन एक बार फिर वही सवाल उठ गया है कि लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा को ले कर सरकार के पास आखिर क्या उपाय है?

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता शहर में आर.जी. कर मैडिकल अस्पताल (राधा गोविंद कर मैडिकल कालेज ऐंड हौस्पिटल) 10 अगस्त की सुबहसुबह सुर्खियों में आ गया था. कुछ घंटे पहले की शांति भंग हो चुकी थी. पूरे शहर में कोहराम मचा हुआ था. गलीनुक्कड़ की चाय की दुकानों पर सुबह के चाय की चुस्कियां लेते लोगों के होंठ और जीभ जलने लगे थे. उन की जुबान अनहोनी घटना की चर्चाओं से छिलने लगी थी. 

दरिंदों ने लड़की को रौंद डाला! गैंग रेप! मर्डर! और शासनप्रशासन, सरकार… कानून को लात मारता वहशीपन…हैवानियत…बेखौफ दरिंदगी… आदि से असुरक्षित बेटियों की सुरक्षा को ले कर चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं. अस्पतालों में सुबह की पहली पाली की ड्यूटी पर जाने को निकले स्वास्थ्यकर्मियों का मन बेचैन था. दिमाग में खलबली मची हुई थी. फूट पडऩे वाले गुस्से का उबाल उठने लगा था. आसमान में सूरज के चढ़ते ही अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं ठप हो गई थीं.

इंडियन मैडिकल एसोसिएशन ने अहम बैठक कर देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी थी…और फिर इस वारदात ने तेजी से पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया. क्या प्रिंट और क्या इलैक्ट्रौनिक मीडिया, इंटरनेट की वेब और सोशल मीडिया में डाक्टरों का गुस्सा उबाल पर आ गया था. मामला अस्पताल की एक 31 वर्षीया ट्रेनी महिला डाक्टर के साथ ड्यूटी के दरम्यान रेप व मर्डर का था. फिर इस पर जो कुछ लगातार होने लगा, उस की तारीखें इस तरह से आम लोगों को अपनी चपेट में लेती चली गईं. इस केस को ले कर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर सवाल उठे. देशभर में लोगों का आक्रोश दिखा.

रेप और मर्डर केस में कब क्या हुआ?

कोलकाता के व्यस्त इलाके में बंगाल सरकार द्वारा संचालित आर.जी. कर मैडिकल कालेज और अस्पताल के इतिहास में 9 अगस्त, 2024 काला दिन साबित हुआ. सुबह साढ़े 9 बजे आर.जी. कर अस्पताल में स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष की प्रशिक्षु ने एक डैडबौडी को दूर से देखा. इस की जानकारी उस ने तुरंत अपने सहकर्मियों और सीनियर डाक्टरों को दी. फिर सीनियर डाक्टर्स ने अस्पताल प्रशासन को सूचित कर दिया. प्रशासन अलर्ट हो गया.

सुबह 10 बज कर 10 मिनट पर इस की जानकारी आर.जी. कर अस्पताल के प्रशासन की पुलिस चौकी ने टाला पुलिस थाने को दे दी. आननफानन में पुलिस दल वहां पहुंच गया. शुरुआती जांच में उस ने पाया कि आपातकालीन भवन की तीसरी मंजिल पर स्थित सेमिनार कक्ष में एक महिला अचेत अवस्था में लकड़ी के मंच पर पड़ी है. महिला अर्धनग्नावस्था में है. सूचना मिलने पर मानव की हत्या संबंधित जांच करने वाली होमिसाइड टीम मौके पर पहुंच गई. टीम ने घटनास्थल से सबूत जुटाए. उसी वक्त कोलकाता पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए और उन्होंने फोरैंसिक टीम को बुलाया.

 

अपराह्नï एक बजे पीडि़ता के मम्मीपापा अस्पताल पहुंच गए. वे पुलिस और अस्पताल के अधिकारियों से मिले. न्यायिक मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में शाम सवा 6 बजे डाक्टरों के बोर्ड द्वारा पीडि़ता के शव का पोस्टमार्टम किया गया. उस वक्त भी पीडि़ता के परिवार के सदस्य और सहकर्मी मौजूद रहे और पोस्टमार्टम प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई. उसी दिन रात को 8 बजे डौग स्क्वायड को मौके पर ले जाया गया. घटनास्थल की 3डी मैपिंग की गई. इस दौरान फोरैंसिक टीम ने 40 से अधिक वस्तुओं के जांच के नमूने सुरक्षित रख लिए. उसी वक्त पोस्टमार्टम के बाद शव घर वालों को सौंप दिया गया.

पीडि़ता के पापा की शिकायत पर पुलिस ने रेप और मर्डर की रिपोर्ट दर्ज कर ली. ट्रेनी डाक्टर के शव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट बेहद डरावनी है. उसे जान कर किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं. रिपोर्ट के अनुसार उस के प्राइवेट पार्ट समेत 14 जगहों पर गंभीर चोटें चीखचीख कर बताती हैं कि पीडि़ता के साथ कई बार बर्बरता की गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्रूरता का खुलासा मृतका के शरीर पर दरजन भर से अधिक चोटों के निशान से होता है. रिपोर्ट के अनुसार मृतका के सिर, गाल, होंठ, नाक, दाहिना जबड़ा, ठोड़ी, गरदन, बायां हाथ, बायां कंधा, बायां घुटना, टखना और प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान मिले. वहीं, शरीर के अंदरूनी हिस्सों में भी चोटें आईं. शरीर के कई हिस्सों में खून के थक्के जमने के साथ फेफड़ों में रक्तस्राव पाया गया. जननांग के अंदर भी सफेद गाढ़ा चिपचिपा तरल पदार्थ मिला. रिपोर्ट बताती है कि दोनों हाथों से गला घोंटने के कारण पीडि़ता की मृत्यु हुई. रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ कि आरोपी ने कई बार पीडि़ता के साथ जबरदस्ती यौनशोषण किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया स्वत:संज्ञान

कोलकाता डाक्टर रेपमर्डर के इस मामले से न केवल दिल्ली निर्भया कांड की यादें ताजा हो गईं, बल्कि डाक्टरों की सुरक्षा को ले कर भी सवाल खड़े हो गए. डाक्टरों के संगठनों ने देशव्यापी हड़ताल कर दी. दिल्ली के एम्स तक में स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई. सुप्रीम कोर्ट ने इस केस को गंभीरता से लिया और इस में खुद दखल देेते हुए इस मामले को ट्रेनी डाक्टर के रेप एंड मर्डर केसके नाम से लिस्ट किया. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने इस मामले में 20 अगस्त, 2024 को सुनवाई की.

यानी किसी याचिका के बिना ही सुप्रीम कोर्ट ने ऐक्शन लिया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दखल बहुत महत्त्वपूर्ण बन गया. सुप्रीम कोर्ट ने दोहरी भूमिका निभाई. क्योंकि इस घटना का सीधा असर देशभर के डाक्टरों पर पड़ा. देश के अलगअलग शहरों में डाक्टरों का प्रदर्शन होने और अस्पतालों में इलाज में रुकावट आने से ले कर रेपमर्डर के मामले की निष्पक्ष जांच पर नजर भी रखी गई. उधर पुलिस ने जांच के बाद सिविक वालंटियर संजय राय को गिरफ्तार कर लिया. रेप या गैंगरेप का सही जवाब तलाशने के क्रम में अब बारी थी गिरफ्तार आरोपी सिविक वालंटियर संजय राय के साइको टेस्ट की. सीबीआई ने उसे अपनी कस्टडी में ले कर उस की मनोदशा की जांच के लिए मनोविश्लेषणात्मक प्रोफाइल यानी साइको एनालिटिक प्रोफाइल जांच कराने का फैसला किया था.

बेहद गोपनीय रिपोर्ट से हट कर जो बातें सामने आईं, वह बेहद रोंगटे खड़े करने वाली थीं. साइको रिपोर्ट से आरोपी की न केवल रेप जैसी हरकत का पता चला, बल्कि इस से उस के वहशीपन, दरिंदगी और जानवरों जैसी सोच का भी खुलासा हुआ. सीबीआई के साइको टेस्ट में संजय राय ने लगातार अपने बयान बदले. उस ने कभी खुद को फांसी पर लटकाने की बात कही तो अगले ही पल उस ने अपनेआप को निर्दोष बताया. हालांकि पुलिस की जांच और सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार संजय राय ने अपना अपराध कुबूल कर लिया है. सीबीआई संजय को ले कर आर.जी. कर अस्पताल गई थी और वारदात को रिक्रिएट करवाया था. उस से घंटों पूछताछ की गई थी.

दरअसल, सेमिनार हाल की तरफ जाने वाले सीसीटीवी फुटेज में सिर्फ एक संदिग्ध नजर आया था, वह संजय राय ही था. इस के अलावा कुछ लोग कैमरे में वहां से गुजरते दिखाई देने वाले 3 से 5 मिनट के दरम्यान अपनेअपने वार्ड में जाते या अपनेअपने काम में लगे नजर आए थे, जबकि एकमात्र संजय  40 मिनट से अधिक समय तक सेमिनार हाल में नजर आया था.

ब्लूटूथ ने दिया ठोस सबूत

सेमिनार हाल से बरामद एक नेकबैंड ब्लूटूथ भी एक अहम सबूत बन गया था, क्योंकि उस का कनेक्शन संजय के मोबाइल से पाया गया था. उल्लेखनीय है कि इसी आधार पर वह वारदात के 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार कर लिया गया था. इस पूरे मामले का वह इकलौता आरोपी था, जिसे पूछताछ के लिए 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में ले कर प्रेसिडेंसी जेल भेज दिया गया था. उसे सीबीआई ने 14 अगस्त को जब से अपनी हिरासत में लिया था, तब से जांच में संजय ने खुद को सीबीआई के हाथों से बचाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन आखिरकार सीबीआई के उलझा देने वाले सवालों का जवाब देते हुए उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. और तो और, उस ने रात और सुबह की पूरी कहानी बयां कर दी.

जांच में यह भी पता चला कि पीडि़ता के साथ रेप हुआ था, गैंगरेप नहीं. यानी रेप के मामले में अकेला आरोपी संजय राय ही शामिल था. इसी रेप के दौरान आरोपी ने ही जूनियर डाक्टर का कत्ल किया. इस बाबत सीबीआई ने आर.जी. कर अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष से भी पूछताछ की. वारदात के बाद की तमाम लापरवाहियों की कडिय़ों को जोडऩे के लिए ये पूछताछ महत्त्वपूर्ण बताई गई. जांच और पूछताछ रेप के साथसाथ मर्डर की भी थी, जो हैवानियत को दर्शाने वाली थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, इस केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. आरोपी की दरिंदगी की चौतरफा निंदा हुई. 

जांच में पता चला कि आरोपी एक साइको था, जिस ने वारदात से पहले उस रात शराब पी थी, सैक्सवर्कर के बहुचर्चित इलाके सोनागाछी गया था और मोबाइल पर पोर्न वीडियो देखी थी. सीबीआई जांच और पूछताछ के दरम्यान आरोपी संजय के चेहरे पर न डर, न चेहरे पर शिकन दिखाई दी. उस के भीतर छिपे जानवरको देख सीबीआई के अधिकारी हैरान रह गए. क्रिएट किए गए क्राइम सीन पर जो कुछ भी हुआ, उसे बताते समय वह बिलकुल भावशून्य दिख रहा था. उस के बारे में तैयार की गई साइकोएनालिटिक प्रोफाइल के अनुसार उस की तसवीर पशुओं जैसी प्रवृत्ति वाली ही दिख रही थी. रेप और मर्डर का आरोपी संजय को सैक्स एडिक्ट बताया गया है. साइको- एनालिस्ट्स की टीम जब उस से पूछताछ कर रही थी, तब उस के माथे पर कोई शिकन तक नहीं थी. जैसे उसे कोई पछतावा नहीं है. वह बेशरमी से अपना पक्ष रख रहा था, जिसे देख कर सीबीआई भी हैरान रह गई.   

कोलकाता पुलिस की जांच में पाया गया कि आरोपी घटना वाली रात (8 अगस्त) को रेडलाइट एरिया गया था. वहां वह 2 वेश्यालयों में गया और जम कर शराब पी. जब वहां से निकला तो नशे में धुत था. वेश्यालयों में जाने के बाद आरोपी आधी रात के बाद अस्पताल गया, जहां वह काम करता था. उसी दरम्यान वह सीसीटीवी फुटेज में आ गया था. उसी के आधार पर उसे गिरफ्तार किया गया, जिस में वह सेमिनार हाल में घुसता और निकलता हुआ दिखाई दे रहा था. वहीं पीडि़ता जूनियर डाक्टर सोने के लिए गई थी. अस्पताल से इकट्ठा किए गए सीसीटीवी फुटेज में संजय राय को 8 अगस्त को सुबह 11 बजे के आसपास चेस्ट डिपार्टमेंट के वार्ड के पास देखा गया था. उस समय पीडि़ता 4 अन्य जूनियर डाक्टरों के साथ वार्ड में ही थी. जाने से पहले राय कुछ देर तक उसे घूर भी रहा था.

आरोपी के बारे में सीबीआई ने शहर पुलिस कल्याण बोर्ड के सदस्य और सहायक उपनिरीक्षक अनूप दत्ता से पूछताछ में पता चला कि आरोपी की उन से निकटता थी, जिस से पुलिस बैरक में जाने और आर.जी. कर अस्पताल जैसी संस्था में वह दिन या रात के किसी भी समय स्वतंत्र रूप से घूम सकता था. बताते हैं कि सीबीआई को कथित तौर पर अनूप दत्ता और संजीव राय को साथ में दिखाने वाली कई तसवीरें मिल चुकी हैं. मृतका ट्रेनी डाक्टर के नाम की नेमप्लेट कई दिनों तक उन की चैंबर के बाहर लगी रही. वहां के कर्मचारी उन्हें डाक्टर दीदी कह कर बुलाते थे. उन के बारे में अस्पताल के डाक्टरों ने बताया कि वह खुले विचारों वाली थीं. बहुत अच्छी डाक्टर थीं और इत्मीनान से मरीज की समस्याओं को सुनती थी.

बताते हैं कि कि आर.जी. कर अस्पताल की यह डाक्टर जिस इलाके में रहती थी, वहां भी सप्ताह में 2 से 3 दिन मरीजों का इलाज करती थी. सीबीआई के हाथ लगी पीडि़ता की डायरी के मुताबिक उस ने कई सपने देखे थे, जिसे वह पूरा करना चाहती थी. डायरी के पन्ने पर उस की जिंदगी की दास्तान लिखी हुई है. इस डायरी में उस ने वैसी बातें लिखी हुई थीं, जिन्हें वो जिंदगी में करना चाहती थी. सीबीआई ने डायरी के हैंडराइटिंग की जांच के लिए डायरी एक्सपर्ट को भेज दी. उस की हैंडराइटिंग मिलाने के घर से कुछ नोट्स भी हासिल कर लिए थे, ताकि उस की जांच हो सके.

सुप्रीम कोर्ट ने खड़े किए सवाल

इस केस को ले कर सुप्रीम कोर्ट काफी सख्त थी. उस ने वारदात को ले कर कई सवाल पूछे. कोर्ट ने मामले की लगातार सुनवाई के दौरान दूसरे दिन 22 अगस्त को बचाव पक्ष के वकील कपिल सिब्बल से कई सवाल किए, जिस पर वह हक्काबक्का रह गए. चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने वकील कपिल सिब्बल से कड़े सवाल करते हुए पूछे. इन में एक सवाल अप्राकृतिक मौत का मामला (यूडी केस) दर्ज करवाने के समयको ले कर भी था. 

दरअसल, सुनवाई शुरू ही हुई थी कि जस्टिस मनोज मिश्रा ने यूडी केस दर्ज कराने की टाइमिंगपर सवाल किया. उन्होंने पूछा कि आटोप्सी रिपोर्ट के मुताबिक आटोप्सी 9 अगस्त की रात के 9 बजे की गई थी, फिर अप्राकृतिक मौत का मुकदमा रात को 23.30 यानी 11.30  बजे दर्ज किया गया. ऐसा क्योंइस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि नहीं, 23.30 बजे तो एफआईआर दर्ज करवाई गई थी. थोड़ी देर जस्टिस मिश्रा और सिब्बल के बीच बातचीत हुई, फिर जस्टिस जे.बी. पारदीवाला सिब्बल से पूछताछ करने लगे. उन्होंने कहा कि आप अपने रिकौर्ड के मुताबिक बताइए कि पोस्टमार्टम कब हुआ

इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि पोस्टमार्टम शाम 6.10 से 7.10 बजे शाम के बीच हुआ. तब जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि जब मामला अप्राकृतिक मौत का नहीं था तो फिर पोस्टमार्टम करवाने की नौबत क्यों आई? दरअसल, जस्टिस पारदीवाला ये कह रहे थे कि बिना अप्राकृतिक मौत के तो पोस्टमार्टम करवाया नहीं जाता? इस का मतलब है कि आप मान रहे थे कि मौत अप्राकृतिक है, तभी तो आप बौडी को पोस्टमार्टम के लिए ले गए. तब सिब्बल कुछ बोलने लगे तो जस्टिस पारदीवाला ने उन्हें टोका. तब सिब्बल सौरी, सौरीकरने लगे. जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि जब शाम 6.10 से 7.10 बजे के बीच पोस्टमार्टम हो गया तो फिर अप्राकृतिक मौत का केस (यूडी केस) दर्ज करवाने में इतनी देर क्यों हुई? आप ने रात साढ़े 11 बजे यूडी केस क्यों दर्ज करवाया?

इस पर कपिल सिब्बल बोले कि साढ़े 11 बजे तो एफआईआर दर्ज करवाई गई है, यूडी केस नहीं. तब जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि आप के रिकौर्ड के मुताबिक यूडी केस कब दर्ज करवाया गयाइस पर सिब्बल ने कहा कि यूडी केस अपराह्न पौने 2 बजे दर्ज करवाया गया था. तब जस्टिस पारदीवाला ने हैरानी जताई कि आखिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले यूडी केस कैसे दर्ज करवा दिया गया? जब पता ही नहीं कि मामला अप्राकृतिक मौत का है या नहीं तो पहले ही केस कैसे दर्ज हो गयाइस पर कपिल सिब्बल हक्काबक्का रह गए. उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा तो यह बोल कर बच निकले कि ऐसा उन्हें बताया गया है.

जस्टिस पारदीवाला ने सिब्बल का पीछा नहीं छोड़ा. उन्होंने कहा कि अगर आप के आफिसर यहां हैं तो उन से पूछ कर बताइए कि सच्चाई क्या है? अगर यही बात है जो आप बता रहे हैं, तब तो यह बहुत खतरनाक है. तब सिब्बल को मजबूरी में सहमति जतानी पड़ी. वो जस्टिस पारदीवाला के इस तहकीकात पर कहने लगे, ‘जी, मैं आप से सहमत हूं.उस के बाद औफिसर ने माइक पर आ कर बोलना शुरू किया, ‘मी लार्ड, मैं बताना चाहता हूं…तभी न्यायाधीशों ने उन्हें थोड़ी देर रुकने को कहा. जस्टिस पारदीवाला ने सिब्बल से कहा कि वह अपने औफिसर को समझा दें कि सीधासीधा जवाब दें, घुमाफिरा कर नहीं. फिर जस्टिस पारदीवाला ने पूछा, ‘यूडी केस नंबर 861 किस वक्त दर्ज कराया गया?’

इस पर लंबे वक्त तक कोई जवाब नहीं आया तो जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि अगर कुछ गड़बड़ है तो आप सुधार लें, फिर बताएं. इस बीच सौलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हमारी रिपोर्ट उसी केस डायरी पर आधारित है, जो उन्होंने हमें दी है. इस पर जस्टिस पारदीवाला ने रोकते हुए कहा कि आप थोड़ा रुकिए, उन्हें हमारे सवालों का जवाब देने दीजिए. फिर देर तक सिब्बल की तरफ से कोई जवाब नहीं आया तो जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि आखिर आप इतना वक्त क्यों ले रहे हैं? डाक्यूमेंट पर जो वक्त लिखा है, वह देख कर बस बता दें. देर तक सिब्बल कुछ नहीं बोल पाए तो जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि अगली सुनवाई में आप किसी जिम्मेदार पुलिस वाले को यहां मौजूद रखिएगा.

यानी कि 9 अगस्त को अस्पताल प्रशासन की तरफ से हुई देरी और लापरवाही को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने भी तमाम सवाल उठाते हुए बारबार पूछते रहे कि घटना वाले दिन कब डीडी एंट्री हुई? कब केस डायरी दर्ज हुई? कब एफआईआर लिखी गई? पोस्टमार्टम कितने बजे हुआ? लाश घर वालों को कब सौंपी गई? अंतिम संस्कार कब हुआ? पंचनामा कितने बजे किया गया? पश्चिम बंगाल सरकार और खासकर पुलिस के रवैए से कोर्ट बेहद नाराज नजर आया. चीफ जस्टिस ने कहा, ”आप अपने दस्तावेज में देखें. पुलिस डायरी में एंट्री सुबह 5 बज कर 20 मिनट की है. अस्पताल से पुलिस को सुबह 10 बज कर 10 मिनट पर सूचना दी गई कि एक महिला अर्धनग्न हालत में पड़ी हुई है. मैडिकल बोर्ड ने राय दी कि उस के साथ रेप हुआ और पुलिस की जीडी एंट्री ये पता चलता है कि मौकाएवारदात की घेराबंदी पोस्टमार्टम के बाद की गई.’’

पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष भी शिकंजे में

आखिरकार मैडिकल कालेज के पूर्व प्राचार्य संदीप घोष भी सीबीआई के शिकंजे में आ गए. उन के घर और ठिकानों समेत 14 जगहों पर छापेमारी के बाद 25 अगस्त, 2024 को गिरफ्तारी हो पाई. सीबीआई ने उन पर वित्तीय अनियमितता के साथसाथ पीडि़ता को ही दोषी ठहराने का आरोप लगाया है. पीडि़ता के घर वालों ने घोष पर आरोप लगाया कि अस्पताल के प्रिसिंपल (जो उस वक्त संदीप घोष थे) और दूसरे प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें फोन पर बताया कि उन की बेटी ने आत्महत्या कर ली है. उन के खिलाफ एक दिन पहले एफआईआर दर्ज की थी. उस के बाद ताबड़तोड़ छापेमारी शुरू की गई थी.

इस मामले में पहले कोलकाता में बनाई गई एसआईटी जांच कर रही थी. इस दल को तय सीमा के अंदर अपनी जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपनी थी. इस का नेतृत्व राज्य के पुलिस महानिरीक्षक प्रणव कुमार के जिम्मे थे. जांच से जुड़े एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि कई बार नोटिस भेजे जाने के बाद भी संदीप घोष जांच दल के सामने पेश नहीं हो रहे थे. जबकि उन पर लगे आरोपों की जांच के लिए दल में शामिल सीबीआई के अधिकारी और दूसरे अधिकारी अस्पताल के रिकौर्ड खंगालने लगे थे. 

एसआईटी ने 24 अगस्त की सुबह कोलकाता के सीबीआई औफिस जा कर इस केस से संबंधित तमाम दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए. इस से पहले 23 अगस्त को कलकत्ता हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति राजश्री भारद्वाज की एकल खंडपीठ ने डा. संदीप घोष पर लगे आरोपों की जांच का जिम्मा भी सीबीआई को सौंप दिया था. उस के बाद सीबीआई ने अलग से एक विशेष टीम बनाई. डा. संदीप घोष और अस्पताल प्रशासन की कड़ी आलोचना कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हुई. उन से सीबीआई भी लंबी पूछताछ कर चुकी थी. इस घटना के तुरंत बाद उन्होंने कालेज से इस्तीफा दे दिया था. हालांकि कुछ घंटे बाद ही उन की नियुक्ति कलकत्ता नैशनल मैडिकल कालेज और अस्पताल में प्रिंसिपल के पद पर हो गई. 

संदीप घोष ने अपनी स्कूली शिक्षा कोलकाता के पास बोंगांव हाईस्कूल से पूरी की थी. मैडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने आर.जी. कर मैडिकल कालेज में पढ़ाई की. साल 1994 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और एक आर्थोपेडिक सर्जन बने. फिर वह 2021 में आर.जी. कर मैडिकल कालेज के प्रिंसिपल बन गए. 

इस से पहले उन्होंने कलकत्ता नैशनल मैडिकल कालेज में वाइस प्रिंसिपल के रूप में कार्य किया था. बताते हैं कि वह अपने छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय रहे. एक प्रशासक के तौर पर भी उन का बेहद सम्मान रहा. आर.जी. कर कालेज में प्रिंसिपल के तौर पर कार्यभार संभालने के बमुश्किल 2 साल बाद ही उस कालेज के पूर्व उपाधीक्षक अख्तर अली ने राज्य सतर्कता आयोग में उन के खिलाफ एक शिकायत दर्ज करवा दी थी, जिस में संदीप घोष के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे. 

इस के बावजूद पिछले एक साल में डा. घोष के खिलाफ कोई ठोस काररवाई नहीं की गई और वह आर.जी. कर मैडिकल कालेज के प्रिंसिपल बने रहे. डाक्टर के मृत पाए जाने के बाद संदीप घोष और अस्पताल प्रशासन की प्रतिक्रिया को ले कर कोलकाता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा कड़ी आलोचना हुई. हाईकोर्ट ने कहा कि जब मृतक पीडि़ता अस्पताल में कार्यरत एक डाक्टर थी तो यह आश्चर्यजनक है कि प्रिंसिपल/अस्पताल ने औपचारिक शिकायत क्यों नहीं दर्ज की? यह हमारे विचार में एक गंभीर चूक थी, जिस ने संदेह को जगह दी.

हाईकोर्ट ने उन के इस्तीफे के कुछ घंटों बाद डा. घोष को दूसरे कालेज का प्रिंसिपल नामित करने की राज्य की ममता बनर्जी सरकार की अत्यावश्यकतापर भी सवाल उठाया. उन से अब सीबीआई ने लगातार 6 बार पूछताछ की. उन से 5 दिनों में ही 60 घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की गई. राज्य सरकार द्वारा भ्रष्टाचार और बलात्कार हत्या पीडि़ता की पहचान को कथित तौर पर उजागर करने के मामले में भी उन की जांच की गई.

पौलीग्राफ टेस्ट में उलझे आरोपी

सीबीआई ने सच जानने के लिए पौलीग्राफ टेस्ट का सहारा लिया. इस के लिए सीबीआई  अधिकारियों द्वारा 24 अगस्त को संजय राय के पौलीग्राफ टेस्ट की सभी प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए करीब डेढ़ घंटे तक प्रेसीडेंसी जेल में तैयारी की गई. यह टेस्ट आरोपी समेत 7 लोगों के किए जाने हैं, जिस में एक कालेज के पूर्व प्राचार्य संदीप घोष भी हैं. कारण घटना की रात 4 डाक्टर और एक सिविल वालंटियर शामिल था. पौलीग्राफ टेस्ट के दौरान व्यक्ति की ओर से सवालों के जवाब दिए जाने के समय एक मशीन की मदद से उस की शारीरिक प्रतिक्रियाओं की माप की जाती है. इस दौरान आरोपी झूठ बोलता है तो आमतौर पर उस की हृदयगति बढ़ जाती है, रक्तचाप बढ़ जाता है, काफी पसीना आता है, सांस लेने में कठिनाई होती है, त्वचा में कई तरह के बदलाव देखे जाते हैं. इस आधार पर यह पता लगाया जाता है कि वह कितना सच और कितना झूठ बोल रहा है.

हर सवाल को 3 बार पूछा जाता है. आरोपी को हां और न में जवाब देना होता है. यदि जवाब 3 बार का एक ही होता है तो इस का मतलब होता है कि वह झूठ नहीं बोल रहा है और यदि जवाब में अंतर आता है, तब आरोपी के विभिन्न शारीरिक परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं.  इस जांच की जिम्मेदारी दिल्ली के केंद्रीय फोरैंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) में तैनात पौलीग्राफविशेषज्ञों के एक दल को सौंपी गई है. कथा लिखे जाने तक वे कोलकाता के लिए रवाना हो चुके थे. इस जांच की जरूरत के बारे में सीबीआई का कहना था कि इसे सुप्रीम कोर्ट के कहे जाने के बाद जरूरी समझा गया.

सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त को कहा था कि स्थानीय पुलिस ने ट्रेनी डाक्टर से बलात्कार और उस की हत्या के मामले को दबाने का प्रयास किया था और जब तक इस की जांच सीबीआई हाथ में आई, तब तक घटनास्थल पर छेड़छाड़ की जा चुकी थी और इस वारदात के खिलाफ देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. पौलीग्राफ जांच में संदीप घोष से सीबीआई के 12 सवाल पूछे, वे सवाल थे जब ट्रेनी डाक्टर का रेप और हत्या हुई उस रात को आप कहां थे? आप को घटना के बारे में किस ने सूचित किया और आप की पहली प्रतिक्रिया क्या थी? आप ने परिवार को सूचित करने का निर्देश किसे दिया था और कैसे? किस ने पुलिस से संपर्क किया?

मम्मीपापा को शव देखने के लिए करीब 3 घंटे तक इंतजार क्यों कराया? चेस्ट मैडिसिन विभाग का साप्ताहिक रोस्टर क्या था? पीडि़त डाक्टर को लगातार 48 घंटे तक काम करने के लिए क्यों कहा गया था? शव मिलने के 2 दिन बाद आप ने इस्तीफा दे दिया? आप ने ऐसा क्यों किया? सेमिनार रूम का बगल वाला हिस्सा क्यों टूटा हुआ है? आप खुद एक डाक्टर हैं? क्या आप को नहीं लगता है कि क्राइम सीन को सुरक्षित रखना जरूरी है, फिर क्यों और किस के कहने पर रिनोवेशन करवाया? आप ने कलकत्ता हाईकोर्ट से सुरक्षा मुहैया कराने को कहा? आप को किस से अपनी जान का खतरा है? क्या रात से गायब ट्रेनी डाक्टर की सुबह 10 बजे तक किसी को जरूरत नहीं पड़ी?

डाक्टर की डेथ की सूचना मिलने पर आप ने इसे आत्महत्या क्यों बताया? डाक्टर के मम्मीपापा से झूठ क्यों बोला गया और देर से एफआईआर क्यों दर्ज कराई? कैसे संजय राय पुलिस की बाइक ले कर जाता था रेड लाइट एरिया? बहरहाल, इस मामले में अभी दूध का दूध और पानी का पानी होना बाकी है. साथ ही पीडि़ता के मम्मीपापा न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

डैम में मिली दोनों लाशें किसकी थीं, जिनके सिर और हाथपैर गायब थे

डैम से बरामद लाशें और काररवाई करती पुलिस आशीष धस्माना चाहता था कि उस के अस्पताल में जो भी हो, उस की मरजी से हो. नर्स निशा भी उस की चाहत में शामिल थी. जबकि निशा का प्रेमिल संबंध डा. एच.पी. सिंह से था. जब कई कारण एक साथ जुड़ गए तो आशीष ने एच.पी. सिंह को मारने की योजना बनाईएच.पी. सिंह तो बच गए, लेकिन निशा और विजय बेमौत मारे गए.   

उत्तराखंड स्थित सिखों का ऐतिहासिक गुरुद्वारा नानकमत्ता किसी बड़े तीर्थस्थल से कम नहीं है. यहीं पर नानकसागर डैम भी है, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. यहां लोगों की आवाजाही लगी रहती है. 8 सितंबर, 2014 सोमवार की शाम को नानकसागर बिजली कालोनी के कुछ युवक बनबसा में होने वाली सेना की भरती की तैयारी करने के लिए नानकसागर डैम के किनारे दौड़ लगा रहे थे. उसी दौरान उन की नजर झाड़ी में पड़े 2 मानव धड़ों पर पड़ी. इन में एक धड़ युवती का था और दूसरा युवक का. दोनों के ही सिर और हाथपांव गायब थे. मानव धड़ों को देख कर लड़के घबरा गए. उन्होंने लौट कर यह बात कालोनी वालों को बताई. इस बात को ले कर कालोनी में तहलका मच गया, लेकिन तब तक रात हो चुकी थी. 

सुबह को कालोनी के लोगों ने यह बात प्रतापपुर के प्रधान को बताई. ग्रामप्रधान उन लड़कों को ले कर घटनास्थल पर पहुंचे. वहां वाकई 2 धड़ पड़े थे. ग्रामप्रधान ने यह सूचना प्रतापपुर पुलिस चौकीइंचार्ज डी.एस. बिष्ट और थाना नानकमत्ता को दी. खबर मिलते ही डी.एस. बिष्ट और थानाप्रभारी अरुण कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने इस घटना की सूचना डीआईजी अनंतराम चौहान, एसएसपी रिद्विम अग्रवाल, सीओ रामेश्वर डिमरी और सितारगंज के कोतवाल राजनलाल आर्य को भी दे दी थी. मामला गंभीर था, सूचना मिलने पर सारे पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर जा पहुंचे

घटनास्थल पर झाड़ी में नग्नावस्था में पड़े युवती के धड़ के हाथपांव और सिर गायब थे. उस धड़ के पास ही 2 बोरे और पड़े थे, जिन में से एक बोरे में एक युवक का धड़ था, जबकि दूसरे में युवक और युवती के कटे हुए हाथपैर थे. सिर दोनों के ही गायब थे. धड़ और कटे अंगों को देख कर लग रहा था कि हत्यारों ने उन दोनो को मारने में कू्ररता की सारी हदें पार कर दी थीं. जिस झाड़ी में धड़ पड़े थे. वहीं पास में युवक का लोअर (पाजामा) टीशर्ट और युवती के कपड़े और चप्पलें भी पड़ी मिलीं. मृतकों के कपड़ों की तलाशी ली गई तो युवती के कपड़ों से एक चाबी के अलावा कुछ नहीं मिला.

पुलिस ने लाशों की शिनाख्त के लिए काफी कोशिश की, लेकिन लाशें चूंकि सिरविहीन थीं, इसलिए कोई भी उन्हें नहीं पहचान पाया. स्थानीय लोगों से पूछताछ के बाद पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय उधमसिंह नगर भिजवा दिया. इस के साथ ही थाना नानकमत्ता में दोहरी हत्या का केस दर्ज कर लिया गया. लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद पुलिस ने आसपास के सभी थानाक्षेत्रों से उन के इलाके से गुमशुदा लोगों की जानकारी ली. लेकिन कहीं से भी किसी के लापता होने की सूचना नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने आसपास के गांवों में भी मृतकों के बारे में पता लगाने की कोशिश की, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ.

जिन बोरों में लाशें मिली थीं, वह शंकर ब्रांड चोकर के थे. पशुओं के लिए सप्लाई किए जाने वाला यह चोकर इलाके के ही एक फ्लोर मिल द्वारा तैयार किया जाता था. पुलिस ने फ्लोर मिल मालिक से बात की तो पता चला कि उन का यह प्रोडक्ट खटीमा, बनबसा, टनकपुर, सितारगंज और नानकमत्ता के अलावा बरेली, पीलीभीत और रामपुर में भी सप्लाई होता है. चूंकि इस बात की पूरी संभावना थी कि जहांजहां शंकर ब्रांड चोकर सप्लाई होता है, वहीं कहीं युवक और युवती की हत्या की गई होगी. पुलिस ने उत्तराखंड से सटे उत्तर प्रदेश के जिला बरेली, पीलीभीत और रामपुर जिलों में भी अपनी टीमें भेज कर मृतकों के बारे में पता लगाने का प्रयास किया, पर नतीजा कोई नहीं निकला. कहीं से किसी युवकयुवती के गायब होने की जानकारी नहीं मिली.

पोस्टमार्टम हो जाने के बाद पुलिस ने लाशों के टुकड़ों को 72 घंटे के लिए मोर्चरी में सुरक्षित रखवा दिया. अगले दिन यानी 9 सितंबर को पुलिस ने नानकसागर डैम में नाव से मृतकों के सिरों की खोज की, लेकिन एक भी सिर नहीं मिल सकापुलिस अभी मृतकों के सिरों की तलाश कर ही रही थी कि मंगलवार को शाम 5 बजे विडौरा मझौला गांव के चरवाहे जागीर सिंह ने खकरा नदी के किनारे एक कुत्ते को नदी से काली पौलीथिन खींचते हुए देखा, जिस में से तेज दुर्गंध आ रही थी. जागीर सिंह ने यह बात गांव के प्रधान बलवंत सिंह को बताई. 

प्रधान बलवंत की सूचना पर सीओ जे.आर. जोशी और थानाप्रभारी अरुण कुमार पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने खकरा पुल से 5 सौ मीटर की दूरी पर काले रंग की पौलीथिन में पड़ा युवती का सिर बरामद किया. थोड़ी कोशिश के बाद युवक का सिर भी उसी नदी में मिल गया. उस के चेहरे पर चोट के निशान थे. हत्यारों ने निस्संदेह लाशों की पहचान छिपाने के लिए दोनों के सिरों को नानकसागर डैम से 4 किलोमीटर दूर विडौरा मंझोला के पास खकरा नदी के पास फेंका था

पुलिस ने बरामद सिरों की पड़ताल की तो युवक के चेहरे पर मुर्गे के पंख चिपके मिले. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि युवक और युवती की हत्या किसी ऐसे स्थान पर की गई होगी, जहां पर या तो मुर्गी पालन होता होगा या फिर उस जगह मुर्गे काटे जाते होंगे. पुलिस को जिस बोरे में बाकी अंग मिले थे, प्लास्टिक का वह बोरा भी मुर्गियों के दाने का ही था. पुलिस ने उसी दिन खकरा नाले में मिले दोनों सिरों का पोस्टमार्टम कराया और उन्हें भी 72 घंटे के लिए मोर्चरी में सुरक्षित रखवा दिया. न्यायालय के आदेश पर पुलिस द्वारा सिरों को डीएनए जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेज दिया गया, ताकि फोरेंसिक जांच से ये पता चल सके कि वे सिर नानकसागर डैम क्षेत्र से बरामद लाशों के ही हैं या नहीं

दोनों लाशों की शिनाख्त हो पाना पुलिस के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था. उन की शिनाख्त के बिना जांच आगे बढ़ना संभव नहीं लग रहा था, क्योंकि लाशों के पास से ऐसी कोई भी चीज बरामद नहीं हुई थी, जिस के सहारे उन की पहचान हो पाती. कोई रास्ता देख पुलिस ने खकरा नाले से बरामद युवक के सिर का स्कैच बनवाया. युवती का चेहरा चूंकि क्षतविक्षत था, इसलिए उस के चेहरे का स्कैच बनना संभव नहीं थास्कैच बनवाने के बाद पुलिस ने युवक की पहचान हेतु उस के चेहरे के पोस्टर छपवा कर ऊधमसिंहनगर और चंपावत जिले के साथसाथ नेपाल बार्डर पर कई जगहों पर लगवा दिए. साथ ही इस स्कैच को सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी डाल दिया गया

पुलिस ने लापता लोगों की जानकारी जुटाने के लिए दिनरात एक कर रखा था. लापता लोगों का डाटा कलेक्ट करने के लिए एसओजी समेत 4 पुलिस टीमें उत्तर प्रदेश के बरेली, रामपुर और पीलीभीत जिले की खाक छान रही थीं. लेकिन कहीं कोई सफलता हाथ नहीं लगी. पुलिस अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रही थी. कई जगह पुलिस टीमें भेजी गई थीं, पर नतीजा शून्य ही था. इसी बीच 15 सितंबर 2014 को बालकराम नाम के एक व्यक्ति ने बरेली के थाना प्रेमनगर में अपने बेटे विजय के गायब होने की लिखित तहरीर दी. 

बरेली के न्यू सिद्धार्थनगर, सैदपुर निवासी बालकराम ने अपनी तहरीर में लिखा था कि उन का बेटा विजय गंगवार बरेली के आशीर्वाद अस्पताल में काम करता था. उसी अस्पताल में उस के साथ हरचुईया, जहानाबाद निवासी नर्स निशा भी काम करती थी. आशीर्वाद अस्पताल के बंद होने के कारण करीब 2 माह पहले एक डाक्टर विजय और निशा को बनबसा के अस्पताल में काम दिलाने की बात कह कर साथ ले गया था. बालकराम ने बताया कि विजय से उन की 5 सितंबर को मोबाइल पर आखिरी बार बात हुई थी. उस वक्त विजय ने बताया था कि वह बनबसा के धस्माना अस्पताल में काम कर रहा है. उस दिन के बाद विजय से घर वालों की कोई बात नहीं हो पाई तो वह बनबसा जा कर धस्माना अस्पताल के प्रबंधक से मिले. पता चला कि विजय और निशा 5 सितंबर की शाम को वहां से काम छोड़ कर चले गए थे

बरेली पुसिल को नानकमत्ता में 2 शव मिलने की बात पता थी. बालकराम की इस तहरीर से पुलिस को शक हुआ तो उस ने उन्हें नानकमत्ता में 2 लाशें मिलने वाली बात बता कर शवों को देखने की बात कही. इस पर बालकराम अपने परिवार के साथ थाना नानकमत्ता जा कर थानाप्रभारी से मिले. थानाप्रभारी अरुण कुमार ने बालकराम और उन के घर वालों को युवक के कटे अंग दिखाए तो उन्होंने पहचान कर बताया कि मृतक उन का बेटा विजयपाल ही था. बालकराम से निशा का पता भी मिल गया. युवक की शिनाख्त विजयपाल के रूप में हो जाने के बाद पुलिस ने युवती की शिनाख्त के लिए निशा के घर वालों से संपर्क किया, तो पता चला कि निशा भी गायब थी. उस के मातापिता की काफी समय से उस से बात नहीं हो पाई थी.

उस की संभावित हत्या की जानकारी मिलते ही उस के पिता पोशाकी लाल शर्मा और मां कलावती ने भी नानकमत्ता पहुंच कर कपड़ों और अन्य सामान के आधार पर युवती की लाश की शिनाख्त अपनी बेटी निशा शर्मा के रूप में कर दी. युवती की शिनाख्त निशा के रूप में हो गई थी. यह भी पता चल गया था कि वह बनबसा के धस्माना अस्पताल में केवल काम करती थी, बल्कि रहती भी वहीं थी. पुलिस ने बनबसा के धस्माना अस्पताल जा कर पूछताछ की तो इस बात की पुष्टि हो गई. पुलिस ने उस के कपड़ों से मिली ताले की चाबी से उस कमरे का ताला खोला, जिस में वह रहती थी तो वह आसानी से खुल गया

इस से पुलिस को भरोसा हो गया कि मृतक विजयपाल और मृतका निशा ही थे. इसी बीच निशा के मातापिता ने पुलिस को कुछ ऐसी बातें बताईं, जिन से लगता था कि निशा को कुछ ऐसे राज पता थे, जिन के खुलने के डर से उस की हत्या की गई थी. दरअसल, 6 सितंबर के बाद से बेटी से संपर्क होने के बाद निशा के आशंकित मातापिता ने उस की 4 वर्षीय बेटी रिया के साथ बनबसा स्थित धस्माना अस्पताल जा कर उस के बारे में पूछताछ की थी. लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया था कि वह नौकरी छोड़ कर जा चुकी है और उन्हें उस के बारे में कोई जानकारी नहीं है. पोशाकीलाल द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर पुलिस ने अस्पताल के प्रबंधक आशीष धस्माना से पूछताछ की, लेकिन उस से काम की कोई जानकारी नहीं मिली.

विजय और निशा के घर वाले धस्माना अस्पताल पर तरहतरह के आरोप लगा रहे थे. साथ ही वे उन दोनों की हत्या के लिए डा. एच.पी. सिंह को दोषी भी ठहरा रहे थे. क्योंकि डा. एच.पी. सिंह ही निशा और विजय को बरेली से धस्माना अस्पताल लाया था. 10 सितंबर की रात ऊधमसिंह नगर जिले की एएसपी टी.डी. वेला पुलिस टीम के साथ मृतक विजय गंगवार और निशा शर्मा के घर वालों के साथ धस्माना अस्पताल पहुंचीं. उन्होंने अस्पताल के कमरों की जांचपड़ताल की, साथ ही वहां के दस्तावेज भी देखे. लेकिन कोई भी काम की जानकारी नहीं मिली

मृतकों के मांबाप धस्माना अस्पताल के डा. एच.पी. सिंह को मुख्य हत्यारोपी बता रहे थे. लेकिन उन दोनों की हत्या किस ने और कहां की, इसे ले कर पुलिस कोई पुख्ता सुबूत नहीं जुटा पाई थी. ऐसी स्थिति में पुलिस जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहती थी. क्योंकि ऐसा करने से केस कमजोर होने की संभावना थी. हालांकि इस डबल मर्डर केस के सूत्र धस्माना अस्पताल के इर्दगिर्द घूम रहे थे. जिस से इस बात को बल मिल रहा था कि विजय और निशा की हत्या की कोई कोई कड़ी धस्माना अस्पताल से ही जुड़ी है. पूरे मामले में डा. एच.पी. सिंह का नाम विशेष रूप से उभर कर रहा था. लेकिन पुलिस के सामने मजबूरी यह थी कि बिना किसी सुबूत के वह सफेदपोश लोगों पर हाथ नहीं डाल सकती थी

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रिद्धिमा अग्रवाल इस दोहरे हत्याकांड के शीघ्र खुलासे को ले कर बेहद गंभीर थीं. इसलिए उन्होंने इस केस की कमान खुद ही संभाल रखी थी. उन के साथ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक टी.डी. वेला के निर्देशन में नानकमत्ता पुलिस, एसटीएफ और एसओजी की टीमें जांच में जुटी थीं. 8 बेड और 22 कमरों वाले धस्माना अस्पताल के बारे में पता चला कि राजमार्ग पर बना यह अस्पताल 4 महीने पहले ही शुरू हुआ था. अस्पताल का इंचार्ज बरेली के डा. एच.पी. सिंह को बनाया गया था. निशा और विजय को भी डा. एच.पी. सिंह ही लाए थे. यह भी पता चला कि आशीश धस्माना, डा. एच.पी. सिंह, विजय और निशा अस्पताल में ही रहते थे.

पुलिस जांच के दौरान जानकारी मिली कि 6 सितंबर को विजय और निशा अस्पताल के मेडिकल स्टोर में मौजूद कर्मचारी से अपना हिसाब ले कर चले गए थे. यह भी पता चला कि इस के बाद अस्पताल परिसर में ही निशा की डा. एच.पी. सिंह से बात भी हुई थी. अपनी जांच में पुलिस धस्माना अस्पताल के संचालक डा. आशीश धस्माना और डा. एच.पी. सिंह सहित एक दर्जन से अधिक लोगों से पूछताछ कर चुकी थी. इस पूछताछ से पता चला कि डा. एच.पी. सिंह और निशा के बीच केवल अकसर बातचीत होती थी, बल्कि तथाकथित रूप से दोनों के बीच अवैध संबंध भी थे

इस जानकारी के बाद पुलिस को लगा कि यह प्रेमत्रिकोण में हुई हत्या का मामला हो सकता है. दरअसल पुलिस को शक था कि निशा और विजय के बीच अवैधसंबंध रहे होंगे और डा. एच.पी. सिंह के बीच में जाने की वजह से यह मामला इस अंजाम तक पहुंच गया होगालेकिन निशा के घर वालों ने बताया कि विजय निशा का प्रेमी नहीं, बल्कि भाई था. उन के अनुसार निशा की विजय से 3 साल पहले मुलाकात हुई थी. उस का चूंकि कोई भाई नहीं था, इसलिए विजय ने तभी उसे अपनी बहन बना लिया था. निशा उसे न केवल अपना भाई मानती थी, बल्कि पिछले 3 सालों से उसे राखी भी बांध रही थी. इस बार भी रक्षाबंधन पर विजय घर आया था और निशा ने उसे राखी बांधी थी. पुलिस को विजय के कटे हाथ की कलाई पर भी राखी बंधी मिली थी.

इस जानकारी के बाद शक की सुई घूम कर एक बार फिर से डा. एच.पी. सिंह और अस्पताल के संचालक आशीष धस्माना पर टिक गई. हकीकत जानने के लिए पुलिस ने अस्पताल से जुड़े कई लोगों के साथसाथ डा. एच.पी. सिंह से भी कड़ी पूछताछ की. लेकिन कोई खास जानकारी मिलने के कारण उन्हें छोड़ दिया गया. इस के बाद पुलिस ने लोहाघाट के एक फार्मासिस्ट को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. दरअसल धस्माना अस्पताल में जो मेडिकल स्टोर था, वह लोहाघाट के इसी फार्मासिस्ट के लाइसेंस पर चल रहा था. लेकिन उस से पूछताछ से भी कोई नतीजा नहीं निकला

आखिर एएसपी और एसओजी प्रभारी ने एक बार फिर डा. एच.पी. सिंह और आशीष धस्माना को हिरासत में ले कर दोनों से करीब 5 घंटे तक गहन पूछताछ की. लेकिन दोनों से कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई. जब कहीं कोई सूत्र हाथ नहीं लगा तो पुलिस का ध्यान निशा के पति विनोद की तरफ गया. दरअसल, निशा काफी दिनों से अपने पति विनोद से अलग रह रही थी. उस ने अपने ससुराल वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा दर्ज करा रखा था. कहीं परेशान हो कर विनोद ने ही तो निशा और विजय की हत्या नहीं कर दी हो, यह सोच कर पुलिस ने पूछताछ के लिए विनोद को हिरासत में ले लिया.

पूछताछ में विनोद ने बताया कि वह स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस का कर्मचारी था और तीन दिन की छुट्टी ले कर पुलिस के डर से इधरउधर छिपता फिर रहा था. दरअसल, निशा ने उस के खिलाफ बरेली में मुकदमा दर्ज कराया था. जिस की तारीख पर हाजिर होने पर कोर्ट ने उस के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था. गिरफ्तारी से बचने के लिए वह गांव रिछोला, थाना नबाबगंज में अपने फुफेरे भाई सोमपाल के घर रह रहा था. निशा की हत्या की बात उसे 16 सितंबर के बाद पता चली थी. विनोद शर्मा ने बताया कि वह निशा को अपने साथ रखना चाहता था, लेकिन निशा ने उस से शपथ पत्र पर तलाक ले लिया था. विनोद से पूछताछ में भी पुलिस के हाथ निराशा ही लगी. इस के बावजूद पुलिस ने केस खुलने तक उसे हिरासत में रखने का निर्णय लिया.

इस मामले की जांच 2 राज्यों में चल रही थी. पुलिस ने इस केस की तह तक जाने के लिए दिनरात एक कर दिया था, लेकिन उसे कहीं भी आशा की कोई किरण नजर नहीं रही थी. तहकीकात के दौरान पुलिस को बनबसा नानकमत्ता रोड पर लगे सीसीटीवी कैमरे में 6 सितंबर की रात एक अर्टिगा कार के आनेजाने की फुटेज भी मिली थीपुलिस ने पता किया तो जानकारी मिली कि धस्माना अस्पताल के संचालक आशीष धस्माना के पास अर्टिगा कार है. यह जानकारी मिलने पर पुलिस ने यह भी पता लगा लिया कि आशीष धस्माना के फार्महाउस में पोल्ट्री फार्म भी है. इस जानकारी के बाद पुलिस के शक की सुई आशीष धस्माना और उस के फार्महाउस की ओर घूम गई. अब पुलिस ने अपना ध्यान पूरी तरह उसी पर केंद्रित कर के आगे की जांच बढ़ाने का फैसला किया.

जांच के दौरान पुलिस ने गुप्त रूप से धस्माना अस्पताल जा कर छानबीन की. इस छानबीन में पुलिस को अस्पताल में एक ऐसा कमरा मिला, जो हर वक्त बंद रहता था. पुलिस ने उस कमरे में जा कर जांचपड़ताल की तो वहां से काफी मात्रा में बीयर की खाली बोतलें और केन मिलीं. अनुमान लगाया गया कि वहां पर कोई कोई आए दिन बीयर पीता था. लेकिन वहां ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला, जिस के तार इस केस से जुड़ पाते. अलबत्ता पुलिस को पूरी तरह यकीन जरूर हो गया कि इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वाला धस्माना अस्पताल का मालिक ही हो सकता है. इसी के मद्देनजर पुलिस ने धस्माना को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू की.

धस्माना ने पुलिस को चकमा देने की काफी कोशिश की, लेकिन जब उसे लगने लगा कि वह पुलिस के जाल में बुरी तरह से फंस चुका है, तो उस ने सब कुछ उगल दिया. उस ने पुलिस को बताया कि डा. एच.पी. सिंह की वजह से उस का अस्पताल बंद होने के कगार पर पहुंच चुका था. उस ने यह भी स्वीकार किया कि विजय और निशा की हत्या उस ने अपने ड्राइवर इदरीस अहमद के साथ मिल कर की थी. पुलिस ने आशीष धस्माना के ड्राइवर इदरीस अहमद को अस्पताल से ही गिरफ्तार कर लिया. इदरीस कानुपर का रहने वाला था. पुलिस ने उन दोनों की निशानदेही पर विजय और निशा की हत्या से पहले उन्हें बेहोश करने के लिए इस्तेमाल की गई सिरिंज और इंजेक्शन के अलावा वह छुरा और चापड़ भी बरामद कर लिए, जिन से उन के शरीर के टुकड़े किए गए थे.

आशीष धस्माना ने पुलिस को बताया कि डा. एच.पी. सिंह, विजय और निशा की वजह से उस की और उस के अस्पताल की बहुत बदनामी हुई थी. उस का अस्पताल बंद होने के कगार पर पहुंच गया था. इसलिए उस ने उन तीनों को मौत के घाट उतारने का फैसला किया था. सब से पहले वह डा. एच.पी. सिंह को मारना चाहता था, लेकिन घटना वाले दिन वह थोड़ी देर पहले अस्पताल से निकल गया थाइसी बीच निशा और विजय उस के सामने गए. निशा और विजय अधिकांशत: डा. एच.पी. सिंह के संपर्क में रहते थे और उसी की बात मानते थे. इसलिए धस्माना को इन दोनों पर भी गुस्सा था. इसी लिए उस ने पहले इन्हीं दोनों को अपना शिकार बना दिया

आशीष धस्माना का परिवार मूलरूप से पौड़ी गढ़वाल का रहने वाला था. वर्षों पहले उस के दादा पौड़ी गढ़वाल छोड़ कर बनबसा चले आए थे. वह आस्ट्रेलिया में ईएनटी सर्जन रह चुके थेउन्होंने 2002 में बनबसा से करीब 5 किलोमीटर दूर देवीपुरा (गढ़ीगोठ) में जमीन खरीद कर हरिराम धस्माना बरुश मैकुली मेमोरियल हास्पिटल के नाम से अस्पताल की स्थापना की थी. इस अस्पताल को आस्ट्रेलिया के एक ट्रस्ट द्वारा स्थापित किया गया था. आस्ट्रेलिया के उस ट्रस्ट के माध्यम से अस्पताल के नाम पर काफी पैसा आने लगा था. उस अस्पताल को भी आशीष धस्माना ही चलाता था. आशीष धस्माना के पिता शैलेंद्र धस्माना कानपुर में सरकारी नौकरी में थे. उन्होंने कानपुर के किदवईनगर में अपना मकान बनवा रखा था. वहीं पर आशीष और इदरीस की मुलाकात हुई थी और उस ने इदरीस को अपना ड्राइवर रख लिया था.

कुछ समय बाद आशीष धस्माना ने पुराने अस्पताल की जगह पर होटल मैनेजमेंट का कोर्स कराने वाला इंस्टीट्यूट खोल दिया था. उसी समय आशीष ने सूखीढांग के धूरा पाताल में काफी जमीन खरीद ली थी. ट्रस्ट के नाम पर आस्ट्रेलिया से आए पैसे का उस ने भरपूर लाभ उठाया और उसी पैसे से उस ने एक शानदार कोठी भी बनवाईलेकिन कोठी बनवाने के बावजूद वह ज्यादातर बनबसा में ही रहता था. कोठी पर वह कभीकभार दोस्तों के साथ मौजमस्ती करने जाया करता था. आशीष धस्माना ने लखनऊ में भी एक मकान खरीद लिया था. फिलहाल उस के पिता शैलेंद्र धस्माना और उस की पत्नी बच्चे लखनऊ के उसी मकान में रह रहे थे.

साल भर पहले आशीष ने स्ट्रांग फार्म गेट के पास राजमार्ग पर अपना नया अस्पताल बनाया, जो 4 महीने पहले ही शुरू हुआ था. आशीष धस्माना शुरू से ही पैसे में खेलता आया था. पैसे के बल पर उस ने क्षेत्र के कई नेताओं से अच्छे संबंध बना लिए थे. उन्हीं नेताओं की बदौलत आशीष ने अपना करोबार बढ़ाया और लकड़ी की कालाबाजारी शुरू कर दीकुछ समय पहले उस के अस्पताल से बेशकीमती लकड़ी भी पकड़ी गई थी. आशीष आए दिन अस्पताल में बनबसा के पुलिस अफसरों और नेताओं को पार्टी दिया करता था. यह सब अस्पताल के स्टाफ के सामने ही होता था और पार्टी में डा. एच.पी. सिंह भी शामिल होते थे. वहीं से उन्होंने आशीष धस्माना की कमजोरी पकड़ ली थी

जांच में यह बात भी सामने आई कि धस्माना के अस्पताल में मरीजों का उपचार कम और अय्याशी ज्यादा होती थी. इस की तसदीक अस्पताल के आसपास रहने वाले लोगों ने भी की. पुलिस संरक्षण प्राप्त होने के कारण धस्माना को किसी बात का डर नहीं थाआशीष धस्माना शराब और शबाब का शौकीन था. वह अपने अस्पताल में आई सुंदर नर्सों को पैसे के बल पर फंसा कर उन के साथ अय्याशी करने लगा था. जिस की वजह से उस के अस्पताल का कामकाज ठप होने लगा था.

डा. एच.पी. सिंह ने धस्माना अस्पताल में कामकाज संभालते ही अपना पूरा ध्यान अस्पताल के मरीजों की देखरेख पर केंद्रित कर दिया था. उन के काम को देख कर आशीष धस्माना भी काफी खुश था. इसलिए उस ने अस्पताल की पूरी देखरेख का जिम्मा उन्हीं को सौंप दिया थाइसी बीच डा. एच.पी. सिंह ने अपनी कार का लोन चुकाने के लिए धस्माना से साढ़े 12 लाख रुपए उधार लिए और साथ ही अस्पताल के लिए स्टाफ बढ़ाने की बात की. डा. एच.पी. सिंह बरेली के आशीर्वाद अस्पताल में काम कर चुके थे और निशा विजय को पहले से ही जानते थे. निशा देखनेभालने में जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं ज्यादा तेजतर्रार और मिलनसार स्वभाव की थी. वह डा. एच.पी. सिंह की नजरों में पहले से ही चढ़ी हुई थी.

निशा ग्राम हरचुईया, थाना जहानाबाद, पीलीभीत निवासी पोशाकीलाल की बेटी थी. उन की 2 ही बेटिया थीं. उन के पास गांव में जुतासे की मात्र 4 बीघा जमीन थी. उसी के सहारे उन्होंने अपनी बेटियों का पालनपोषण किया था. पोशाकीलाल की बड़ी बेटी राजेश्वरी विकलांग थी. उन की छोटी बेटी निशा ने जैसेतैसे हाईस्कूल पास कर लिया था. निशा देखनेभालने में खूबसूरत भी थी और महत्वाकांक्षी भी. वह घर के बाहर लोगों से अपने पिता को बैंक मैनेजर बताती थी. जबकि हकीकत में उस के पिता पोशाकीलाल बरेली के एक बैंक में चौकीदार की नौकरी करते थे.

3 साल पहले निशा की मुलाकात विजय से हो गई थी. विजय तब बरेली के आशीर्वाद अस्पताल में वार्डबौय की नौकरी करता था. विजय से पहली मुलाकात के बाद निशा काम की तलाश में उस के पास जाने लगी थी. विजय से जानपहचान बढ़ने के बाद निशा ने उसी के साथ अस्पताल में नौकरी कर ली और गांव से ही अस्पताल जाने लगी. उसी दौरान उस ने विजय को अपने मातापिता से भी मिलवाया. विजय न्यू सिद्धार्थनगर, सैदपुर, बरेली निवासी बालकराम का बेटा था. हंसमुख और मिलनसार विजय ने बरेली के आदर्श निकेतन इंटर कालेज से 10वीं तक पढ़ाई की थी. वह शादीशुदा और 3 बेटियों का बाप था

इसी दौरान निशा की शादी जिला पीलीभीत, थाना गजरौला के गांव प्रेमशंकर नवदीप निवासी तुलसीराम के बेटे विनोद से हो गई. निशा से शादी के बाद विनोद खुश था. क्योंकि निशा देखनेभालने में काफी सुंदर थी. लेकिन शादी के बाद निशा केवल 15 दिन ही अपनी ससुराल में रही. इस के बाद वह न तो दोबारा अपनी ससुराल गई और न ही उस ने विनोद को अपने यहां बुलाया. इसी बात को ले कर दोनों परिवारों के बीच मनमुटाव बढ़ा और मामला तलाक तक पहुंच गया. निशा भले ही विनोद के साथ 15 दिन ही रही थी, इस के बावजूद वह एक लड़की की मां बन गई थी. उस के मां बनने से विनोद हैरत में था. उसे लगता था कि शादी से पहले ही निशा का किसी युवक के साथ चक्कर चल रहा था, जिस से वह गर्भवती हो गई थी. अपनी बेटी के इसी पाप को छिपाने के लिए पोशाकी लाल ने आननफानन में निशा की शादी उस के साथ कर दी थी, ताकि समाज में किरकिरी न हो. 

बहरहाल, जब निशा ससुराल नहीं गई तो उस के पिता पोशाकीलाल ने शिवपुरिया, जहानाबाद, जिला पीलीभीत का घर और जुतासे की 4 बीघा जमीन बेच दी और वह बरेली में किराए का मकान ले कर सपरिवार रहने लगे थे. पुलिस पूछताछ में धस्माना अस्पताल के मालिक आशीष धस्माना ने बताया कि डा. एच.पी. सिंह निशा और विजय को जब पहली बार अस्पताल में नौकरी के लिए लाया था तो उस ने दोनों को पतिपत्नी बताया था. निशा को शादीशुदा जान कर अस्पताल स्टाफ के लोग निशा की तरफ आंख उठा कर नहीं देखते थे. इसी वजह से अस्पताल के किसी भी कर्मचारी को डा. एच.पी. सिंह और निशा के बीच संबंधों का पता नहीं चल सका था.

धस्माना ने बताया कि उसी की तरह डा. एच.पी. सिंह भी शराब और शबाब का शौकीन था. इस बात की जानकारी उसे तब हुई, जब उसे पता चला कि डा. एच.पी. सिंह के अस्पताल की एक पूर्व नर्स और निशा के साथ अवैधसंबंध थे. उस की हकीकत जानने के लिए वह चोरीछिपे डा. एच.पी. सिंह के पीछे लग गया था. उसी दौरान उसे निशा और विजय की हकीकत भी पता चली. उन दोनों के बीच पत्नीपति का रिश्ता नहीं था, बल्कि डा. एच.पी. सिंह के काफी समय से निशा के साथ अवैधसंबंध थे. इसी सच्चाई को उजागर करने के लिए धस्माना इन दोनों के पीछे पड़ गया था, ताकि निशा और एच.पी. सिंह को रंगेहाथों पकड़ कर उन की सच्चाई को उजागर कर सके.

धस्माना के अनुसार डा. एच.पी. सिंह ने अस्पताल को केवल अय्याशी का अड्डा बना दिया था, बल्कि शराब और शबाब के चक्कर में उस ने कई केस भी बिगाड़ दिए थे. जिस की वजह से अस्पताल की छवि धूमिल होती जा रही थी. निशा चूंकि देखनेभालने में खूबसूरत थी, इसलिए वह उसे डा. एच.पी. सिंह से अलग कर के अपने चंगुल में फंसाना चाहता था. इस के लिए आशीष धस्माना ने निशा के साथ नजदीकियां बढ़ाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह उस के पास तक नहीं फटकती थी. जिस की वजह से वह उस से चिढ़ने लगा था. इसी दौरान आशीष ने डा. एच.पी. सिंह को औपरेशन थिएटर में निशा के साथ रंगरलियां मनाते हुए रंगेहाथों पकड़ लिया था

रंगहाथों पकड़े जाने के बाद डा. एच.पी. सिंह ने आशीष से माफी मांगी और भविष्य में ऐसा काम करने की कसम भी खाई थी. लेकिन डा. एच.पी. सिंह धस्माना से कहीं ज्यादा तेजतर्रार थे. वह आशीष की हकीकत से पहले से ही वाकिफ थे. उन्होंने अस्पताल के पूर्व स्टाफ से मिल कर उस की पूरी जन्मकुंडली पता कर ली थी. आशीष धस्माना को अपने इशारों पर चलाने के लिए डा. एच.पी. सिंह ने एक गहरी चाल चली. उन्होंने निशा और विजय के सहयोग से एक दिन धस्माना की अय्याशी की मोबाइल क्लिपिंग बनवा ली, ताकि उसे ब्लैकमेल किया जा सके. इस बात की जानकारी आशीष धस्माना को हो भी गई थी. आशीष की क्लिपिंग बनाने के बाद तो डा. एच.पी. सिंह पूरी तरह से लापरवाह हो गए थे. वह सुबह को ही शराब पी लेते और मरीजों की ओर से लापरवाह हो कर मौजमस्ती में डूब जाते. कार लोन चुकाने का बहाना कर के वह आशीष धस्माना के साढ़े 12 लाख रुपए पहले ही हड़प चुके थे.

पुलिस पूछताछ के दौरान धस्माना ने बताया कि उस ने डा. एच.पी. सिंह को विजय और निशा से यह कहते हुए सुन लिया था कि हमें यहां की नौकरी छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि यह अस्पताल जल्दी ही बंद होने वाला है. इस बात से धस्माना को जबरदस्त झटका लगा. केवल इतना ही नहीं, डा. एच.पी. सिंह ने धस्माना को उस की बीवी की नजरों में गिराने के लिए उस की अय्याशी की मोबाइल क्लिपिंग उस की पत्नी तक पहुंचा दी थीजिस के बाद धस्माना और उस की पत्नी के बीच मनमुटाव हो गया था. इस के बाद धस्माना दिन में कईकई बोतल बीयर पीने लगा था. उसे लगने लगा था कि उस की बरबादी का कारण डा. एच.पी. सिंह ही है. उस ने फैसला कर लिया था कि वह डा. एच.पी. सिंह को मार डालेगा. इस के साथ ही उसे निशा और विजय पर भी गुस्सा आता था, क्योंकि वे दोनों डा. एच.पी. सिंह का साथ दे रहे थे.

धस्माना और उस के ड्राइवर इदरीस के बीच काफी घनिष्ठ संबंध थे. दोनों साथसाथ बैठ कर शराब पीते थे. इदरीस को अपना खास मान कर धस्माना ने उसे डा. एच.पी. सिंह की सारी काली करतूत बताई और साथ ही उस की हत्या की भी बात की. धस्माना की वजह से इदरीस को किसी बात की कमी नहीं थी. अच्छा खानापीना, पहनना, रहना, सब कुछ आशीष की जिम्मेदारी थी. इसी वजह से इदरीस उस का मुरीद था. धस्माना ने इदरीस के साथ मिल कर डा. एच.पी. सिंह को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. डा. एच.पी. सिंह धस्माना से किए वादे के अनुसार तो कोई नया डाक्टर लाए थे और ही उन्होंने उधार के साढ़े 12 लाख रुपए वापस किए थे. साथ ही वह निशा और विजय को भी नौकरी छोड़ने के लिए कह रहे थे. इन बातों ने आशीष के गुस्से को और भी बढ़ा दिया.

पुलिस पूछताछ में आशीष धस्माना ने बताया कि डा. एच.पी. सिंह की वजह से उस के अस्पताल की साख खराब हो रही थी. वह मरीजों का इलाज गंभीरता से नहीं करते थे, जिस से उसे अपना पैसा खर्च कर के बिगड़े हुए केस वाले मरीजों को दूसरे अस्पतालों में भेजना पड़ता था. इन सब बातों ने उसे मानसिक रूप से परेशान कर दिया थाडा. एच.पी. सिंह को मारे की योजना 6 सितंबर की थी, लेकिन उन्हें कुछ शक हो गया और वह बरेली चले गए. धस्माना और इदरीस हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर सके. डा. एच.पी. सिंह के बरेली जाने के बाद निशा और विजय ने भी छुट्टी पर जाने की बात कह कर पैसे मांगे. इस पर धस्माना ने दोनों को 5 सौ और 3 सौ रुपए दिलवा दिए.

धस्माना ने बताया कि वह डा. एच.पी. सिंह को मारना चाहता था, लेकिन शक होने की वजह से वह निकल गया था. जब निशा और विजय भी जाने लगे तो उसे झटका लगा. वे दोनों अपने कमरों से बैग ले कर निकले तो आशीष ड्राइवर इदरीस की मदद से बहाना कर के निशा और विजय को अपने साथ अस्पताल से डेढ़ किलोमीटर दूर अपने पेंटर फार्म पर ले गया. वहां जा कर दोनों ने पहले शराब पीनशे में डूब कर आशीष और इदरीस ने निशा से पूछताछ की तो पता चला कि डा. एच.पी. सिंह का इरादा आशीष धस्माना के अस्पताल को नुकसान पहुंचाने का था. यही नहीं, वह उस के साढ़े 12 लाख रुपए भी हड़प लेना चाहता था. उन्होंने बताया कि डा. एच.पी. सिंह जानबूझ कर मरीजों के इलाज में लापरवाही कर रहे हैं, जिस में निशा उन की प्रेमिका होने के नाते और विजय पैसे के लालच में उन का साथ दे रहे थे.

धस्माना निशा के पीछे पड़ा था, लेकिन वह डा. एच.पी. सिंह के प्यार में पागल थी. नशे की हालत में धस्माना के गुस्से का बांध टूट गया. गुस्से के आवेग में उस ने पास पड़ा डंडा उठा कर निशा के सिर पर मार दिया. जिस से वह गिर कर बेहोश हो गई. निशा के बेहोश होते ही धस्माना ने अपना बाकी गुस्सा विजय पर उतारते हुए उसे खूब मारापीटा, जिस से वह भी अधमरा हो गयाइस के बाद आशीष धस्माना ने इदरीस के साथ मिल कर पहले निशा और फिर विजय को जबरन फिनार्गन और फोर्टविन के इंजेक्शन लगाए. कुछ देर बाद दोनों पूरी तरह बेहोश हो गए. उन के बेहोश होते ही धस्माना ने इदरीस के सहयोग से दोनों की गला दबा कर हत्या कर दी. पुलिस पूछताछ में धस्माना ने बताया कि पहले उस ने और इदरीस ने दोनों को बोरों में भर कर ले जाने की कोशिश की, लेकिन दोनों की लाशें बोरों में नहीं आईं.

इस के बाद दोनों बाजार जा कर चिकन और बीयर की बोतलें खरीद कर लाए. बाजार से आने के बाद दोनों ने साथसाथ बैठ कर बीयर पी. जब दिमाग पर नशे का सुरूर चढ़ने लगा तो दोनों ने एक बड़े छुरे और चापड़ से पहले दोनों की गर्दन काट दी. बाद में इदरीस ने शवों को ठिकाने लगाने के लिए उन के हाथपैर काट कर टुकड़े कर दिए. पलभर में आशीष धस्माना और इदरीस कसाई बन बैठे थे. दोनों शवों के टुकड़ेटुकड़े कर बोरों में भर कर बोरे धस्माना की कार में रखे और उन्हें ठिकाने लगाने के लिए बरेली की तरफ चल दिए. दरअसल आशीष धस्माना ने अब इस हत्याकांड का रुख मोड़ कर डा. एच.पी. सिंह को फंसाने के लिए फूलप्रूफ योजना बना ली थी. इसी योजना के तहत उन दोनों की लाशें बरेली क्षेत्र में फेंकने की थी, ताकि पुलिस उन की हत्याओं का शक डा. एच.पी. सिंह पर करे और उसे गिरफ्तार कर ले

लेकिन डा. एच.पी. सिंह की किस्मत अच्छी थी. जैसे ही आशीष और इदरीस दोनों लाशों को गाड़ी में डाल कर बरेली जाने के लिए निकले. रास्ते में पता चला कि सत्रहमील पुलिस चौकी पर पुलिस की चैकिंग चल रही है. धस्माना किसी भी कीमत पर रिस्क नहीं लेना चाहता था. इसलिए उस ने इदरीस से गाड़ी को सितारगंज मार्ग पर ले चलने को कहा. जब दोनों गाड़ी ले कर नानकसागर डैम पर पहुंचे तो वहां ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मियों ने उन की कार पर टार्च की लाइट मारी. इस से धस्माना और इदरीस बुरी तरह घबरा गए. उन्होंने तुरंत लाश वाले बोरों को वहीं पर रास्ते के किनारे झाड़ी में फेंक दिए और आगे बढ़ गए. वहां से 4 किलोमीटर आगे जा कर उन्होंने सितारगंज रोड पर खकरा नदी के पुल से पहले विजय और निशा के बैग फेंक दिए

पुल पर जा कर उन्होंने दोनों काली पौलीथिन भी नीचे फेंक दी, जिन में निशा और विजय के सिर थे. बाद में पुलिस ने उन की निशानदेही पर जगपुड़ा पुल के नीचे से हत्या में प्रयुक्त खून से सना चापड़ और चाकू भी बरामद कर लिया था. धस्माना अस्पताल से वह अर्टिगा कार, जिस में दोनों लाशों को डाल कर ले जाया गया था, पुलिस ने कब्जे में ले ली थी. कार की डिग्गी में खून के दाग भी मिले. यही नहीं, पेंटर फार्म जहां पर दोनों हत्याएं की गईं, की तलाशी लेने पर घटनास्थल के नीचे के कमरे से फिनार्गन और फोर्टविन के 2 इंजेक्शन, एक प्रयोग की गई सीरिंज और फोर्टविन और फिनार्गन के टूटे हुए2 एंपुल भी मिले. इस के अलावा, शंकर ब्रांड चोकर का एक प्लास्टिक का बैग और चार काले पौलीथिन भी बरामद हुए.

आशीष धस्माना को विजय और निशा की हत्या करने का कोई अफसोस नहीं था. उस ने पुलिस के सामने ही कहा, ‘‘अगर मैं छूट कर आया तो 3 दिन के अंदर डा. एच.पी. सिंह को भी मार दूंगा.’’ 

पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 302 और 201 के तहत दर्ज किए गए मुकदमे को आशीष धस्माना और इदरीस के खिलाफ नामजद कर दिया था. दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. इस तरह यह ब्लाइंड डबल मर्डर 15 दिनों में जा कर खुला.

   —पुलिस सूत्रों पर आधारित

  

UP Crime : सीरियल रेपिस्ट बच्चों को बनाता था शिकार

UP Crime – इंट्रो: एक ऐसा सीरियल रेपिस्ट और हवसखोर दरिंदा, जो न सिर्फ छोटेछोटे बच्चों और किशोरों के साथ यौन शोषण करता था, अश्लील वीडियो बना कर ब्लैकमेल पर भी उतारु हो जाता था…

अकसर आप ने टीवी सीरियल्स में रेपिस्ट और हवसखोर दरिंदों की कहानियां सुनी और देखी होंगी, जो इंसानियत को शर्मसार करने के साथसाथ उस बहशी दरिंदे के अंदर छिपे शैतान को भी उजागर कर देती हैं. समाज में छिपे ऐसे भेड़िए को पहचाना तो आसान नहीं होता, मगर आज हम आप को एक ऐसे दरिंदे की कहानी बताने जा रहे हैं, जो सभ्य समाज के मुंह पर एक तमाचा भी है।

जानिए, एक ऐसे दरिंदे को जो महिलाओं और लड़कियों को नहीं, बल्कि छोटे लड़के और किशोरों को अपनी हवस का शिकार बनाता था. यह सनकी उन के साथ यौन संबंध बनाता और फिर उसी दौरान उन की अश्लील वीडियो भी बना लेता था. वीडियो बनाने के बाद शुरू होता था उस दरिंदे का ब्लैकमेलिंग का खेल.

सनसनीखेज वारदात

यह घटना है उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के थाना सरुरपुर क्षेत्र की.

जब पिछले 19 अगस्त को सोशल मीडिया पर 2-3 अश्लील वीडियो वायरल होने शुरू हुए तो पुलिस ने अपने हाथ फैलाने शुरू कर दिए. जब इस शख्स को सूचना मिल गई कि पुलिस आने वाली है तो वह गांव से फरार हो गया. उस के बाद मेरठ पुलिस के द्वारा इस आरोपी को गिरप्तार कर लिया गया.

आरोपी की पहचान अजीत कुमार के तौर पर की गई है. यह आरोपी उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के एक गांव का रहने वाला है और अपने गांव में एक दुकान चलाता है.

पुलिस की पूछताछ

पुलिस ने जब इस दरिंदे से पूछताछ की तो आरोपी ने बताया कि वहां छोटे बच्चों और किशोरों को अपने कमरे पर बुला कर उन को नशीले पदार्थ खिलाता था, फिर उन के साथ कुकर्म करता और फिर वीडियो बना लेता था.

आरोपी ने पुलिस को बताया कि उस ने अपने कमरे में सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए थे ताकि यौन और कुकर्म की वीडियो बना कर छोटे बच्चों और किशोरों को ब्लैकमेल कर उन से पैसे वसूल सके. उस ने गांव के कई लोगों के साथ संबंध भी बनाए और उन के साथ कमरे मे अश्लील वीडियो भी बनाए.

बयान दर्ज

पीड़ितों के पेरेंट्स द्वारा जब पुलिस को आरोपी के बारे में बताया गया तो पुलिस ने आरोपी के खिलाफ कड़ा ऐक्शन लिया.

गांव की एक महिला ने बताया कि आरोपी बच्चों के साथ कुकर्म करता था. फिर वीड़ियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर देता था और उन से पैसे वसूलता था.

इसी गांव के एक अन्य युवक का कहना है कि उन का बेटा आगरा में काम करता है. आरोपी ने हैं के बेटे के साथ मारपीट की थी, लेकिन उस ने घर पर नहीं बताया था बल्कि उस ने झूठ बोला था कि बाइक से मेरा ऐक्सीडैंट हो गया था.

इस पूरे मामले पर मेरठ के एसएसपी कमलेश बहादुर ने बताया कि मामला जब संज्ञान में आया तब आपत्तिजनक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे.

ऐसे आया पकड़ में

आखिरकार इस आरोपी के खुलासे का परदाफाश तब हुआ, जब सोशल मीडिया पर आपतिजनक अश्लील वीडियो वायरल हुआ.

पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस ने उस के पास एक लैपटाप और एक मोबाइल बरामद किया है, जिन्हें जांच के लिए भेज दिया गया है.

आरोपी के पास 350 से ज्यादा अश्लील वीडियो थे, जो उस ने पुलिस की गिरफ्तारी से पहले डिलीट कर दिए .

एसएसपी ने कहा है कि पुलिस ने जांचपड़ताल की तो आरोपी ने 6 लड़कों के साथ कुकर्म करना स्वीकार किया है, लेकिन गांव के लोगों का कहना है कि इस ने 6 नहीं बल्कि 100 से ज्यादा लड़कों के साथ कुकर्म किया है. पुलिस जांच में लगी हुई कि इस ने कितने लोगों को अपना शिकार बनाया.

 

बेहोशी की दवा वाली कोल्ड ड्रिंक पिला कर किया पत्नी का कत्ल

 झोला छाप डाक्टर प्रवीण विश्वास मल्लिका की बदौलत अपना भाग्य बदलना चाहता था, लेकिन उस की असलियत जान कर मल्लिका उसे छोड़ कर जाने लगी तो…     

पश्चिम बंगाल के जिला 24 परगना के थाना गोपालनगर के गांव पावन के रहने वाले प्रभात विश्वास गांव में रह कर खेती करते थे. पत्नी, 2 बेटों और एक बेटी के उन के परिवार का गुजरबसर इसी खेती की कमाई से होता था. उसी की कमाई से वह बच्चों को पढ़ालिखा भी रहे थे और सयानी होने पर बेटी की शादी भी कर दी थी. प्रभात ने बेटी प्रीति की शादी अपने ही जिले के गांव चलमंडल के रहने वाले श्रवण विश्वास के साथ की थी. श्रवण विश्वास झोला छाप डाक्टर था, जो चांदसी दवाखाना के नाम से उत्तर प्रदेश के जिला आगरा के थाना वाह के कस्बा जरार में अपनी क्लिनिक चलाता था

श्रवण की क्लिनिक बढि़या चल रही थी, इसलिए उस से प्रेरणा ले कर प्रभात विश्वास का बड़ा बेटा प्रवीण बहनोई की तरह झोला छाप डाक्टर बनने के लिए पढ़ाई के साथसाथ किसी डाक्टर के यहां कंपाउंडरी करने लगा था. ग्रेजुएशन करतेकरते वह डाक्टरी के काफी गुण सीख गया तो बहनोई की तरह अपनी क्लिनिक खोलने के बारे में सोचने लगा. क्लिनिक खोलने की पूरी तैयारी कर के प्रवीण आगरा के कस्बा जरार में क्लिनिक चला रहे अपने बहनोई श्रवण के पास गया. कुछ दिनों तक बहनोई के साथ काम करने के बाद जब उसे लगा कि अब वह खुद क्लिनिक चला सकता है तो वह अपनी क्लिनिक खोलने के लिए स्थान खोजने लगा.

प्रवीण के एक परिचित पी.के. राय आगरा के ही कस्बा रुनकता में क्लिनिक चलाते थे. उन्हीं की मदद से उस ने रुनकता में एक दुकान ले कर बंगाली दवाखाना के नाम से क्लिनिक खोल ली. रहने के लिए हाजी मुस्तकीम के मकान में 8 सौ रुपए महीने किराए पर एक कमरा ले लिया. मुस्तकीम का अपना परिवार सामने वाले मकान में रहता था. उस मकान में केवल किराएदार ही रहते थे. डा. प्रवीण का कमरा अन्य किराएदारों से एकदम अलग था. प्रवीण विश्वास दिन भर अपनी क्लिनिक पर रहता था और रात को कमरे पर जाता. अकेला होने की वजह से उसे अपने सारे काम खुद ही करने पड़ते थे. वह जिस हिसाब से मेहनत कर रहा था, उस हिसाब से उस की कमाई नहीं हो रही थी. इसलिए अपने हालात से वह खुश नहीं था. लेकिन उस का व्यवहार ऐसा था कि उस से हर कोई खुश रहता था

इस के बावजूद प्रवीण की किसी से दोस्ती नहीं हो पाई थी. इस की वजह शायद यह भी थी कि वह एक ऐसे प्रांत का रहने वाला था, जहां का खानपान, रहनसहन और बातव्यवहार सब कुछ वहां के रहने वालों से अलग था. इस स्थिति में प्रवीण थोड़ा परेशान सा रहता था. एक दिन वह किसी सोच में डूबा था कि उस के फोन की घंटी बजी. उस का फोन डुअल सिम वाला था. एक सिम उस ने आगरा के नंबर का डाल रखा तो दूसरा सिम 24 परगना के नंबर का था. वैसे यहां 24 परगना वाले नंबर की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन उस ने अपना पुराना नंबर इसलिए बंद नहीं किया था कि घर जाने पर शायद इस की जरूरत पड़े.

घंटी बजी तो प्रवीण की नजर मोबाइल के स्क्रीन पर गई. फोन 24 परगना वाले सिम के नंबर पर आया था. स्क्रीन पर जो नंबर उभरा था, वह भी 24 परगना का ही लग रहा था. प्रवीण ने जल्दी से फोन रिसीव कर लिया, ‘‘हैलो, कौन…?’’ उस के हैलो कहते ही दूसरी ओर से किसी लड़की ने मधुर आवाज में कहा, ‘‘सौरी, गलती से आप का नंबर लग गया.’’ प्रवीण कुछ कहता, उस के पहले ही फोन कट गया. लड़की की आवाज ऐसी थी, जैसे किसी ने कान में शहद घोल दिया है. प्रवीण का मन एक बार फिर उस की आवाज सुनने के लिए होने लगा. आवाज पलट कर फोन कर के ही सुनी जा सकती थी. लेकिन यह ठीक नहीं था. इसलिए वह सोचने लगा कि फोन करने पर लड़की बुरा मान सकती है. लेकिन मन नहीं माना तो डरतेडरते उस ने पलट कर फोन कर ही दिया.

 दूसरी ओर से फोन रिसीव कर के लड़की ने कहा, ‘‘अपनी गलती के लिए मैं ने सौरी तो कह दिया. अब कितनी बार माफी मांगूं?’’ ‘‘आप गलत सोच रही हैं. मैं ने आप को फोन इसलिए नहीं किया कि आप दोबारा माफी मांगें. आप की आवाज मुझे बहुत प्यारी लगी, उसे सुनने के लिए मैं ने फोन किया है. मैं आप की आवाज सुनना चाहता हूं. इसलिए आप कुछ अपनी कहें और कुछ मेरी सुनें.’’  प्रवीण का इतना कहना था कि उस के कानों में खिलखिला कर हंसने की आवाज पड़ी. प्रवीण खुश हो गया कि लड़की ने उस की इस हरकत का बुरा नहीं माना. हंसी रोक कर उस ने कहा, ‘‘तो यह क्यों नहीं कहते कि आप मुझ से दोस्ती करना चाहते हैं.’’

‘‘यही समझ लीजिए,’’ प्रवीण ने कहा, ‘‘आप को मेरा प्रस्ताव मंजूर है?’’

  ‘‘क्यों नहीं, बातचीत से तो आप अच्छेखासे पढे़लिखे लगते हैं?’’

‘‘जी, मैं डाक्टर हूं.’’

‘‘कहां नौकरी करते हैं?’’ लड़की ने पूछा.

‘‘नौकरी नहीं करता, मेरी अपनी क्लिनिक है.’’

‘‘तब तो मैं आप को अपना दोस्त बनाने को तैयार हूं.’’

इस तरह दोनों में दोस्ती हो गई तो बातचीत का सिलसिला चल पड़ा. प्रवीण 24 परगना का रहने वाला था तो वह लड़की भी वहीं की रहने वाली थी. लड़की ने अपना नाम मल्लिका बताया था. लेकिन सब उसे मोनिका कह कर बुलाते थे. प्रवीण ने भी उसे अपना नाम बता दिया था. दोनों की ही भाषा बंगाली थी, इसलिए दोनों अपनी भाषा में बात करते थे. प्रवीण ने मल्लिका को यह भी बता दिया था कि वह रहने वाला तो 24 परगना का है, लेकिन उस की क्लिनिक उत्तर प्रदेश के आगरा के एक कस्बे में है.

धीरेधीरे दोनों में लंबीलंबी बातें होने लगीं. इसी तरह 6 महीने बीत गए. प्रवीण ने मल्लिका को अपने बारे में काफी कुछ बता दिया था, लेकिन मल्लिका ने अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताया था. वह प्रवीण के लिए रहस्य बनी रही. प्रवीण ने जब उस पर दबाव डाला तो एक दिन उस ने कहा, ‘‘यही क्या कम है कि मैं तुम से प्यार करती हूं. बस तुम मुझे अपनी प्रेमिका के रूप में जानो.’’ मल्लिका ने जब कहा कि वह उस से प्यार करती है तो प्रवीण ने कहा, ‘‘मैं तुम से मिलना चाहता हूं.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है. मैं भी तुम से मिलना चाहती हूं. तुम्हारी जब इच्छा हो, जाओ. समझ लो मैं तुम्हारा इंतजार कर रही हूं.’’ मल्लिका ने कहा. मल्लिका का इस तरह आमंत्रण पा कर प्रवीण फूला नहीं समाया. वह इस बात पर विचार करने लगा कि मल्लिका को अपनी जिंदगी में आने के लिए तैयार कैसे करे. अब वह सपनों में जीने लगा था. इस तरह के सपनों की दुनिया बहुत ही रंगीन और हसीन होती है. उस ने अपने प्यार को कल्पनाओं का रंग दे कर एक खूबसूरत चेहरे का अक्स बना लिया था. हर वक्त वह उसी में खोया रहता था. वह 24 परगना जा कर मल्लिका से मिलना चाहता था, लेकिन मौका नहीं मिल रहा था.

जब मल्लिका की बातों ने उसे प्यार में पागल कर दिया तो कामधाम छोड़ कर प्रवीण 24 परगना जा पहुंचा. मल्लिका को उस ने अपने आने की सूचना दे दी थी, इसलिए घर पहुंचते ही उस ने मल्लिका से मिलने का स्थान और समय तय कर लिया. मल्लिका ने उसे अगले दिन 24 परगना के बसस्टाप पर दोपहर को बुलाया था. प्रवीण तय जगह पर खड़ा इधरउधर देख रहा था. थोड़ी देर में उसे एक खूबसूरत औरत आती दिखाई दी. वह मन ही मन सोचने लगा कि अगर यही मल्लिका होती तो कितना अच्छा होता.

प्रवीण उस औरत को एकटक ताकते हुए मल्लिका के बारे में सोच रहा था कि तभी वह औरत फोन निकाल कर किसी को फोन करने लगी. प्रवीण के फोन की घंटी बजी तो उस का दिल धड़क उठा. उस ने जल्दी से फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से पूछा गया, ‘‘कहां हो तुम?’’ ‘‘तुम्हारे सामने ही तो खड़ा हूं.’’ प्रवीण के मुंह से यह वाक्य अपने आप निकल गया. कान से फोन लगाए हुए ही उस औरत ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तो तुम हो प्रवीण?’’

‘‘हां, मैं ही प्रवीण हूं, जिसे तुम इतने दिनों से तड़पा रही हो.’’

‘‘अब तड़पने की जरूरत नहीं है. क्योंकि मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूं.’’

मल्लिका को देख कर प्रवीण फूला नहीं समाया, क्योंकि उस ने अपने ख्वाबों में मल्लिका की जो तसवीर बनाई थी, वह उस से कहीं ज्यादा खूबसूरत थी. वह लग भी ठीकठाक परिवार की रही थी.  ‘‘यहीं खड़े रहोगे या चल कर कहीं एकांत में बैठोगे.’’ मल्लिका ने कहा तो प्रवीण को होश आया. प्रवीण उसे एक रेस्टोरैंट में ले गया. चायनाश्ते के साथ बातचीत शुरू हुई तो मल्लिका ने गंभीरता से कहा, ‘‘प्रवीण, तुम सचसच बताना, मुझे कितना प्यार करते हो और मेरे लिए क्या कर सकते हो?’’

‘‘अगर प्यार करने की कोई नापतौल होती तो नापतौल कर बता देता. बस इतना समझ लो कि मैं तुम्हें जान से भी ज्यादा प्यार करता हूं. अब इस से ज्यादा क्या कह सकता हूं.’’ प्रवीण ने मल्लिका के हाथ पर अपना हाथ रख कर कहा. ‘‘जब तुम मुझे इतना प्यार करते हो तो मुझे भी अब तुम्हें अपने बारे में सब कुछ बता देना चाहिए, क्योंकि मैं ने अभी तक तुम्हें अपने बारे में कुछ नहीं बताया है. प्रवीण मैं शादीशुदा ही नहीं, मेरा 10 साल का एक बेटा भी है. मेरा पति कुवैत में रहता है, जिस की वजह से हमारी मुलाकातें 2 साल में सिर्फ कुछ दिनों के लिए हो पाती हैं. मैं यहां सासससुर के साथ रहती हूं. पति के उतनी दूर रहने की वजह से प्यार के लिए तड़पती रहती हूं.’’

मल्लिका की सच्चाई जानसुन कर प्रवीण सन्न रह गया. जैसे किसी ने उसे आसमान से जमीन पर पटक दिया हो. जिसे वह जान से ज्यादा प्यार करता था, वह किसी और की अमानत थी, यह जान कर उस के मुंह से शब्द नहीं निकले. उस की हालत देख कर मल्लिका ने कहा, ‘तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं प्रवीण. मैं भी तुम्हें उतना ही प्यार करती हूं, जितना तुम. मैं तुम्हारे लिए पति और बेटा तो क्या, यह दुनिया तक छोड़ सकती हूं.’’ प्रवीण ने होश में आ कर कहा, ‘‘सच, तुम मेरे लिए सब को छोड़ सकती हो?’’

‘‘हां, तुम्हारे लिए मैं सब को छोड़ ही नहीं सकती, जान तक दे सकती हूं, लेकिन तुम मुझे मंझधार में मत छोड़ना. तुम डाक्टर हो, इसलिए मेरे दिल का दर्द अच्छी तरह समझ सकते हो. बोलो, धोखा तो नहीं दोगे?’’ मल्लिका गिड़गिड़ाई. मल्लिका की इस बात से प्रवीण ने थोड़ी राहत महसूस की. इस के बाद कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘अच्छा, यह बताओ. अब तुम सिर्फ मेरी बन कर रहोगी ?’’ ‘‘हां, अब मैं सिर्फ तुम्हारी ही हो कर रहना चाहती हूं, सिर्फ तुम्हारी,’’ मल्लिका ने कहा, ‘‘चलो, अब यहां से कहीं और चलते हैं.’’

प्रवीण मल्लिका को पूरी तरह अपनी बनाना चाहता था, इसलिए उस ने एक मध्यमवर्गीय होटल में कमरा बुक कराया और मल्लिका को उसी में ले गया. एकांत में होने वाली बातचीत में प्रवीण जान गया कि मल्लिका के मायके और ससुराल वाले काफी संपन्न लोग हैं. उस का पति कुवैत में नौकरी करता था. उस समय भी वह लगभग 4-5 तोले सोने के गहने पहने थी. होटल के उस कमरे में एकांत का लाभ उठा कर प्रवीण ने मल्लिका को अपनी बना लिया. उस ने मल्लिका के बारे में तो सब कुछ जान लिया, लेकिन अपने बारे में उस ने सिर्फ इतना ही बताया था कि वह डाक्टर है और अभी उस की शादी नहीं हुई है

प्रवीण के डाक्टर होने का मतलब मल्लिका ने यह लगाया था कि वह पढ़ालिखा होगा, इसलिए अन्य डाक्टरों की तरह यह भी खूब पैसे कमा रहा होगा. यही सोच कर वह उस के साथ रहने के बारे में सोच रही थी. जबकि स्थिति इस के विपरीत थी. प्रवीण झोला छाप डाक्टर था. उस ने क्लिनिक जरूर खोल ली थी, लेकिन उस की कमाई से किसी तरह उस का खर्च पूरा होता था. मल्लिका के बारे में जान कर अब वह उस की बदौलत अपना भाग्य बदलने के बारे में सोच रहा था.

मल्लिका की शादी 24 परगना के थाना गोपालपुर के कस्बा चलमंडल के रहने वाले कृष्णा से हुई थी. 24 परगना शहर में उस की विशाल कोठी थी. ससुराल में मल्लिका को किसी चीज की कमी नहीं थी. कमी सिर्फ यही थी कि पति कुवैत में रहता था और वह यहां सासससुर के साथ रहती थी. वह पति के साथ रहना चाहती थी, जबकि कृष्णा उसे कुवैत ले जाने को तैयार नहीं था. उस का कहना था कि अगर दोनों कुवैत चले गए तो मांबाप यहां अकेले पड़ जाएंगे.

मल्लिका बेटे अपूर्ण में मन लगाने की कोशिश करती थी, लेकिन बेटा बड़ा हो गया तो उसे पति की कमी खलने लगी थी. उस की जवान उमंगे तनहाई में दम तोड़ने लगी थीं. उस के जिस्म की भूख उसे बेचैन करने लगी थी. ऐसे में ही उस का फोन गलती से प्रवीण के मोबाइल पर लग गया तो दोनों की दोस्ती ही नहीं हुई, अब मेलमिलाप भी हो गया था. उस के बाद उस की जैसे दुनिया ही बदल गई थी.

मुलाकात के बाद जिस्म की भूख भी बढ़ गई और प्यार भी. कुछ दिन गांव में रह कर प्रवीण वापस गया. अब दोनों के बीच लंबीलंबी बातें होने लगीं. मल्लिका उस के सहारे आगे की जिंदगी गुजारने के सपने देखने लगी थी. क्योंकि उसे पता था कि कृष्णा में कोई बदलाव आने वाला नहीं है, इसलिए उस की परवाह किए बगैर एक दिन उस ने प्रवीण से कहा, ‘‘भई, इस तरह कब तक चलेगा. आखिर हमें कोई कोई फैसला तो लेना ही होगा.’’ ‘‘इस विषय पर फोन पर बात नहीं हो सकती. दुर्गा पूजा पर मैं घर आऊंगा तो बैठ कर बातें करेंगे.’’ प्रवीण ने कहा और घर जाने की तैयारी करने लगा.

दुर्गा पूजा के दौरान दोनों की मुलाकात हुई तो तय हुआ कि इस बार प्रवीण आगरा जाएगा तो मल्लिका भी उस के साथ चलेगी. वहां दोनों शादी कर के आराम से रहेंगे. उस समय मल्लिका ने यह भी नहीं सोचा कि कृष्णा घरपरिवार से उतनी दूर उस के और बच्चे के सुख के लिए ही पड़ा है. अपने जिस्म की भूख मिटाने के लिए उस ने अपने 10 साल के बेटे की चिंता भी नहीं की. जिस दिन मल्लिका को प्रवीण के साथ जाना था, वह सास से बाजार जाने की बात कह कर घर से निकली थी. सुबह की निकली मल्लिका जब रात तक घर नहीं लौटी तो सास ने उस की तलाश शुरू की. घर में कोई था नहीं, इसलिए फोन कर के खासखास रिश्तेदारों को बुला लिया. जब मल्लिका का कुछ पता नहीं चला तो कृष्णा को फोन किया गया.

पत्नी के लापता होने की सूचना मिलते ही कृष्णा आ गया. उस ने पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी तो पुलिस भी मल्लिका की तलाश करने लगी. प्रवीण मल्लिका को ले कर पहले जरार में रह रही अपनी बहन के यहां गया. बहन प्रीति ने जब मल्लिका के बारे में पूछा तो प्रवीण ने बताया कि यह उस की पत्नी है. उस ने उस से शादी कर ली है. खूबसूरत मल्लिका को देख कर प्रीति बहुत खुश हुई. उस ने भाई और कथित भाभी मल्लिका की खूब आवभगत की.

बहन के घर रहते हुए प्रवीण ने मल्लिका के साथ नागपुर जाने की योजना बनाई. 18 अक्टूबर, 2014 को छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से उस ने रिजर्वेशन भी करवा लिया. लेकिन जाने क्यों उस ने रिजर्वेशन कैंसिल करा दिया और मल्लिका को ले कर रुनकता स्थित अपने कमरे पर गया. मल्लिका ने रुनकता स्थित प्रवीण का कमरा और क्लिनिक देखा तो सन्न रह गई. वह जो सोच कर प्रवीण के साथ आई थी, यहां उस का एकदम उलटा था. प्रवीण की असलियत जान कर वह बेचैन हो उठी. उस ने गाड़ीबंगला, नौकरचाकर का जो सपना देखा था, उस सब पर पानी फिर गया था.

मल्लिका समझ गई कि उस के साथ धोखा हुआ है. लेकिन अब वह फंस चुकी थी. उस की समझ में नहीं रहा था कि अब वह क्या करे. सिर्फ शारीरिक सुख से तो जिंदगी बीत नहीं सकती थी, इसलिए वह इस बात पर विचार करने लगी कि आगे क्या किया जाए. प्रवीण अगले दिन मल्लिका को ताजमहल दिखाने ले गया. वहां उस ने उस के साथ फोटो भी खिंचवाए. प्रवीण शायद मल्लिका के मन की बात भांप गया था, इसलिए वह उसे समझाने लगा कि जल्दी ही वह दूसरा मकान ले लेगा. बाजार में कोई अच्छी सी दुकान ले कर बढि़या क्लिनिक खोल लेगा. अभी तक वह अकेला रहता था, इसलिए उसे किसी बात की चिंता नहीं थी, लेकिन उस के जाने से उसे चिंता होने लगी है.

दीवाली पर प्रवीण मल्लिका के साथ अपनी बहन के यहां जरार गया, लेकिन अगले ही दिन वापस गया. प्रवीण की लाख कोशिश के बावजूद मल्लिका का मन बदल चुका था. वह समझ गई थी कि यहां जल्दी कुछ बदलने वाला नहीं है. उसे बेटे की भी याद आने लगी थी. उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था, इसलिए उस ने जरार से रुनकता आते समय रास्तें में ही प्रवीण से कह दिया था कि इस स्थिति में वह उस के साथ नहीं रह सकती. घर पहुंच कर मल्लिका वापस जाने की तैयारी करने लगी. प्रवीण उसे समझाने लगा कि अब वह उस के बिना अकेला नहीं रह पाएगा. प्रवीण को इस बात की भी चिंता सता रही थी कि मल्लिका अपने साथ जो लाखों के गहने और नकद ले आई है, उसे भी अपने साथ ले जाएगी. फिर तो इतनी मेहनत कर के भी वह कंगाल का कंगाल रह जाएगा.

25 अक्टूबर को भैया दूज थी, इसलिए क्लिनिक बंद थी. पूरा दिन प्रवीण मल्लिका को समझाता रहा, लेकिन किसी भी तरह मल्लिका रुकने को तैयार नहीं थी. प्रवीण को मल्लिका के जाने की उतनी चिंता नहीं थी, जितनी चिंता उस के गहनों और रुपयों को साथ ले जाने की थी. इसलिए उस ने सोच लिया कि भले ही उसे मल्लिका की हत्या करनी पड़े, लेकिन वह साथ लाया माल मल्लिका को ले नहीं जाने देगा. यही सोच कर वह रात 8 बजे के आसपास मुस्तकीम की दुकान से कोल्ड ड्रिंक की 2 बोतलें खरीद लाया. मल्लिका की नजर बचा कर उस ने एक बोतल में नशे की दवा मिला दी. इस के बाद उस बोतल को मल्लिका को दे कर दूसरी बोतल खुद पीने लगा. कोल्ड ड्रिंक पीते हुए भी उस ने मल्लिका से कहा कि वह जिद छोड़ दे.

लेकिन मल्लिका ने साफसाफ कह दिया कि अब वह यहां रुक कर जिंदगी बरबाद करने वाली नहीं है. इस के बाद प्रवीण चुप हो गया. कोल्ड ड्रिंक पी कर मल्लिका बेहोश हो गई तो खिड़कीदरवाजा बंद कर के प्रवीण ने बांका से मल्लिका का गला रेत दिया. बेहोश होने की वजह से मल्लिका चीख भी नहीं सकी. गुस्से में प्रवीण ने मल्लिका की हत्या तो कर दी, लेकिन लाश देख कर परेशान हो उठा कि अब क्या करे. उसे पुलिस और कानून का डर सताने लगा.

पुलिस से बचने के लिए उस ने कहीं और भाग जाने का विचार किया. लाश को कंबल से ढक कर वह कमरे से बाहर निकल कर दरवाजे पर ताला लगा कर सड़क पर चलने लगा. मल्लिका के कुछ गहने और 15 सौ रुपए नकद उस के पास थे. वह उन्हीं से कहीं दूर जा कर अपनी गृहस्थी बसाना चाहता था. लेकिन उसे लग रहा था कि वह कहीं भी चला जाए, पुलिस और कानून से बच नहीं पाएगा. सुबह किसी ने कस्बे से थोड़ी दूर पर रेल की पटरी के किनारे एक क्षतविक्षत लाश देखी. पुलिस को सूचना दी गई तो थाना सिंकदरा के थानाप्रभारी आशीष कुमार सिंह पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए. मृतक के पास एक बैग था, जिस की तलाशी में कुछ कपड़े और गहने के साथ 15 सौ रुपए मिले. इस के बाद मृतक की तलाशी में उस की जेब से आधार कार्ड मिल गया, जिस से उस की शिनाख्त हो गई. वह लाश किसी और की नहीं, रुनकता कस्बे में क्लिनिक चलाने वाले डा. प्रवीण विश्वास की थी.

पुलिस को जब बताया गया कि इस के घर में इस की नवविवाति पत्नी भी है तो थानाप्रभारी ने उसे सूचना देने के लिए एक सिपाही को भेजा. कमरे में बाहर से ताला बंद था. अब सवाल यह था कि उस की पत्नी कहां गई. किसी ने खिड़की की झिरी से झांक कर देखा तो अंदर एक महिला की लाश दिखाई दी. पुलिस ने ताला तोड़वाया तो पता चला कि अंदर पड़ी लाश उस की नवविवाहिता पत्नी की थी. पुलिस ने काररवाई कर के दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं. प्रवीण के कमरे में मिली डायरी से उस के बहनोई श्रवण विश्वास का फोन नंबर मिल गया तो पुलिस ने उसे फोन कर के डा. प्रवीण की आत्महत्या और उस की पत्नी की हत्या की सूचना दे दी. श्रवण पत्नी प्रीति के साथ रुनकता पहुंचा. इस के बाद पुलिस ने उसी की ओर से प्रवीण के खिलाफ मल्लिका की हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद आत्महत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस को डा. प्रवीण विश्वास के पास से एक मंगलसूत्र, एक जोड़ी कान के टौप्स, 2 जोड़ी बच्चों के चांदी के कड़े और 15 सौ रुपए नकद मिले थे. मल्लिका कान में टौप्स, गले में चेन, अंगूठियां और नाक में जो कील पहने थी, वे उस के शरीर पर मौजूद थे. पुलिस ने मल्लिका के पास से मिले मोबाइल फोन से एक नंबर मिलाया, संयोग से वह उस के पति कृष्णा का था. बातचीत के बाद पुलिस ने जब उसे मल्लिका की हत्या की सूचना दी तो उस ने जल्दी से जल्दी आगरा पहुंचने की बात कही.

कृष्णा ने कहा ही नहीं, बल्कि अगले दिन अपने चाचा विश्वजीत के साथ आगरा पहुंचा. उस ने आगरा में ही मल्लिका का अंतिम संस्कार कर दिया. उस का कहना था कि मल्लिका अपने साथ लाखों के गहने और नकदी ले कर आई थी. डा. प्रवीण के घर वालों ने भी उस का आगरा में ही अंतिम संस्कार कर दिया था. इस तरह स्वार्थ में अंधे प्रवीण ने प्यार की हत्या तो की ही, आत्महत्या कर के अपने साथ एक और घर बरबाद कर दिया.

    

नौकरी से निकाले जाने पर मैनेजर के किए 3 टुकड़े

कीर्ति व्यास फरहान अख्तर की पूर्वपत्नी अनुधा भवानी की कंपनी बीब्लंट में बतौर मैनेजर और लीगल एडवाइजर काम करती थी. खुशी सेजवानी और सिद्धेश तम्हाणकर भी उस के साथ काम करते थे. काम में लापरवाही बरतने के लिए जब कीर्ति ने सिद्धेश को नोटिस थमाया तो उस ने खुशी के साथ मिल कर ऐसी साजिश रची कि…   

67 वर्षीय राजेंद्र व्यास मुंबई की ग्रांट रोड के एम.एस. अली मार्ग स्थित भारतनगर परिसर की सोसायटी में अपने परिवार के साथ रहते थे. वह मुंबई की एक मिल में नौकरी करते थे लेकिन मिल बंद हो जाने के कारण उन का झुकाव शेयर बाजार की तरफ हो गया थापरिवार सुखी और संपन्न था. सोसायटी के लोगों में उन की इज्जत, मानसम्मान और प्रतिष्ठा थी. परिवार में उन की पत्नी सुरेखा व्यास के अलावा 2 बेटियां कीर्ति और शेफाली थीं. उन का कोई बेटा नहीं था, लेकिन उन्हें इस का कोई गम नहीं था. वह अपनी दोनों बेटियों को बेटों जैसा ही प्यार, दुलार करते थे. उन्होंने उन का पालनपोषण भी बेटों की तरह ही किया था.

राजेंद्र व्यास ने दोनों बेटियों को बेटों की तरह शिक्षित कर उन्हें उन के पैरों पर खड़ा किया था. बड़ी बेटी कीर्ति व्यास एमबीए, एलएलबी करने के बाद एक अच्छी पोस्ट पर काम कर रही थी. छोटी बेटी शेफाली भी एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करती थी. सुरेखा गृहिणी के साथसाथ एक अच्छी मां थीं. उन्हें दोनों बेटियों से गहरा प्यार था. परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. लेकिन इस साल मार्च महीने में उन के परिवार में एक ऐसी घटना घटी, जिस से पूरे परिवार में मातम छा गया था

16 मार्च, 2018 की रात राजेंद्र व्यास और उन के परिवार पर भारी थी. उस दिन उन की बेटी कीर्ति सुबह पौने 9 बजे घर से औफिस जाने के लिए निकली थी और देर रात तक वापस नहीं लौटी. सुबह औफिस जाते समय वह किसी बात को ले कर थोड़ा परेशान जरूर थी, लेकिन उस ने परेशानी की वजह किसी से शेयर नहीं की थी. मां सुरेखा के पूछने पर उस ने मुसकरा कर बात टाल दी थी. मां ने भी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. इंतजार की काली रात दोपहर 12 बजे सुरेखा ने घर पर लगे वाईफाई का पासवर्ड जानने के लिए कीर्ति को फोन किया. लेकिन कीर्ति ने फोन रिसीव नहीं किया. उस का फोन कभी स्विच्ड औफ तो कभी आउट औफ कवरेज रहा था

कई बार फोन करने के बाद भी जब कीर्ति का फोन नहीं लगा तो उन्होंने यह सोचा कि हो सकता है उस ने अपना फोन बंद कर रखा हो. क्योंकि कीर्ति कंपनी में एक बड़ी पोस्ट पर थी. ऊपर से मार्च का महीना कंपनी की सालाना क्लोजिंग का होता है. वह किसी मीटिंग वगैरह में भी व्यस्त हो सकती थी. उन्होंने सोचा कि यदि वह मीटिंग में होगी तो मीटिंग के बाद खुद ही फोन कर लेगी. पर पूरा दिन बीत गया, तो कीर्ति का फोन आया और ही उस ने कोई मैसेज भेजा.

कीर्ति का पूरा परिवार तब परेशान हो गया, जब शेफाली अपने औफिस से घर लौट आई, जबकि कीर्ति का कहीं पता नहीं था. दोनों का औफिस आनेजाने का समय लगभग एक ही था. कीर्ति अपने समय की पाबंद थीइसके अलावा वह औफिस से 1-2 बार घर में फोन कर के घर वालों का हालचाल जरूर पूछ लिया करती थी. इस के अलावा अगर उसे देर से आना होता तो इस की जानकारी वह घर वालों को दे दिया करती थी.

लापता हुई कीर्ति जैसेजैसे समय और रात गहरी होती जा रही थी, वैसेवैसे परिवार वालों का दिल बैठता जा रहा था. काफी समय निकल जाने के बाद भी जब कीर्ति घर नहीं पहुंची और ही उस का कोई फोन आया तो घर वालों ने कीर्ति की कंपनी में फोन कर के उस के बारे में पूछा. वहां से पता चला कि कीर्ति तो आज औफिस आई ही नहीं थी. यह सुन कर घर में कोहराम मच गया. परिवार के अलावा जिसे भी कीर्ति के औफिस पहुंचने की खबर मिली, सब स्तब्ध रह गए. घर वालों के अलावा जानपहचान वाले भी कीर्ति की तलाश में लग गए. ऐसी कोई जगह नहीं बची, जहां कीर्ति को नहीं खोजा गया. कीर्ति के साथ काम करने वाले लोग भी घर वालों के साथ मिल कर उसे ढूंढ रहे थे.

सभी यह सोच कर परेशान थे कि कीर्ति सुबह पौने 9 बजे अपनी ड्यूटी के लिए निकली थी तो वह अपने औफिस पहुंच कर कहां चली गई. सभी का मन किसी अनहोनी को ले कर अशांत था. वह रात कीर्ति के घर वालों के लिए बड़ी बेचैनी भरी गुजरीसुरेखा और उन की बेटी शेफाली के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. पिता राजेंद्र व्यास की हालत भी ठीक नहीं थी. सोसायटी वाले और उन के नातेरिश्तेदार उन्हें धीरज बंधा कर पुलिस के पास जाने की सलाह दे रहे थे. 28 वर्षीय कीर्ति व्यास ने अपनी पढ़ाई पूरी कर जब सर्विस की कोशिश की तो उस की योग्यता के आधार पर उसे बड़ी आसानी से अंधेरी पश्चिम लोखंडवाला स्थित एक जानीमानी कंपनी बीब्लंट (सैलून) में नौकरी मिल गई

इस कंपनी की सीईओ और एमडी दोनों मशहूर फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी और जावेद अख्तर के बेटे फरहान अख्तर की पूर्वपत्नी अनुधा भवानी अख्तर थीं. इस कंपनी का फिल्मी सितारों और बड़ेबड़े उद्योगपतियों के बीच एक बड़ा नाम है. यहां हेयर कटिंग और ब्यूटी के लिए आने वालों को 3 हजार से ले कर 10 हजार रुपए तक देने पड़ते हैं. इस कंपनी की दिल्ली, कोलकाता और चेन्नै सहित कई महानगरों में 50 से अधिक शाखाएं हैं, कंपनी का हेडऔफिस मुंबई में है.

यह कंपनी बड़े फिल्मी सितारों, उद्योगपतियों, टीवी कलाकारों आदि की हेयरकटिंग और ब्यूटी ड्रेसिंग का काम तो करती ही है, इस के अलावा टीवी और फिल्मों का फाइनैंस और ऐक्टिंग की कोचिंग क्लासें भी चलाती हैयहां कोचिंग में आने वालों को 6 महीने की कोचिंग दी जाती है, जिस की फीस 3 लाख से ले कर 8 लाख रुपए के बीच होती है. कंपनी का सालाना टर्नओवर कई करोड़ का होता हैबीब्लंट की फाइनैंस मैनेजर और लीगल एडवाइजर थी कीर्ति इस कंपनी में कीर्ति व्यास लगभग 5 साल पहले आई थी. उस ने अपनी मेहनत और जिम्मेदारी से कंपनी के सीईओ और एमडी का दिल कुछ महीनों में ही जीत लिया था. कंपनी में उस की नियुक्ति फाइनैंस मैनेजर के पद पर हुई थी, लेकिन थोड़े ही दिनों में उसे कंपनी का लीगल एडवाइजर भी बना दिया गया था. कीर्ति की मेहनत से कंपनी को काफी लाभ हुआ था और टर्नओवर भी बढ़ गया था.

कंपनी के काम के प्रति वह जिम्मेदार और पाबंद तो थी ही, साथ ही वह वहां के कर्मचारियों के प्रति भी सख्त थी. काम में किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही उसे जरा भी पसंद नहीं थी. कंपनी की लीगल एडवाइजर और फाइनैंस मैनेजर होने के नाते वह किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थी. कंपनी के भले के लिए वह हर उस शख्स के प्रति सख्त थी जो लापरवाह रहता था. वह यह नहीं देखती थी कि कोई सीनियर है या जूनियर. कीर्ति व्यास को गायब हुए अब तक 24 घंटे से अधिक हो चुके थे, लेकिन उस की कोई खबर नहीं मिली थी. घर वालों के सामने अब सिर्फ पुलिस के पास जाने का रास्ता बचा था. लाचार और मजबूर हो कर कीर्ति के पिता राजेंद्र व्यास अपने नातेरिश्तेदारों और कंपनी के कुछ लोगों के साथ थाना डी.बी. मार्ग पहुंचे. उन्होंने थानाप्रभारी से मिल कर उन्हें सारी बातें बताईं. थानाप्रभारी ने उन की बातें सुनने के बाद कीर्ति के अपहरण का मामला दर्ज करवा दिया.

 मामला एक हाईप्रोफाइल कंपनी की अधिकारी से जुड़ा हुआ था, इसलिए थानाप्रभारी किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने अपने अधिकारियों के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को मामले की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर मामले की जांच तेजी से शुरू कर दी. पुलिस ने कीर्ति के घर से ले कर औफिस तक सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, कीर्ति के फोन की काल डिटेल्स हासिल कर उस की कंपनी के सभी कर्मचारियों के बयान लिए. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा. वह मामले को जितना सुलझाने की कोशिश कर रहे थे, उतना ही वह उलझता जा रहा था. जैसेजैसे समय बढ़ता जा रहा था, वैसेवैसे उन के वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव भी बढ़ता जा रहा था. पुलिस अपने तरीके से मामले की जांच तो कर ही रही थी, लेकिन कीर्ति के घर वाले भी उस की तलाश में गलियों और उपनगरों में कीर्ति के पोस्टर ले कर भटक रहे थे

वह उपनगरों के अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों की खाक छान रहे थे. कीर्ति के हजारों पोस्टर छपवा कर मुंबई के गलीमोहल्लों के साथ सभी सार्वजनिक जगहों और वाहनों पर चिपकवा दिए गए. प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया का भी सहारा लिया गया. लेकिन आशा की कोई किरण नजर नहीं आई. सूरज हर दिन निकलता था. रात हर रोज होती थी. मगर कीर्ति के घर वालों का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था.

घर वालों का धैर्य जवाब देने लगा जैसेजैसे कीर्ति व्यास के मामले को ले कर समय निकलता जा रहा था, वैसेवैसे कीर्ति के परिवार वालों का सब्र टूटता जा रहा था. जब एक महीने से अधिक का समय हो गया तो उन का धैर्य टूट गया. स्थानीय पुलिस से उन का भरोसा उठ चुका था. वे अपने परिवार के साथ पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर से मुलाकात कर मामले को क्राइम ब्रांच को सौंपने का निवेदन किया. पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर इस मामले पर पहले से ही नजर बनाए हुए थे, उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए जौइंट पुलिस कमिश्नर संजय सक्सेना और डीसीपी (क्राइम) दिलीप सावंत को मामले की जांच की जिम्मेदारी सौंप दी. क्राइम ब्रांच ने मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी. अब तक इस संबंध में फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर पर काफी कुछ कहासुना जा चुका था

बीब्लंट की मालिक सीईओ अनुधा भवानी अख्तर और बीब्लंट कंपनी को जानने वाले लोगों ने ट्वीट कर के कीर्ति के विषय में जानकारी देने की अपील के साथसाथ पुलिस की जांच पर तमाम प्रश्नचिह्न खड़े किए थे. यह हाईप्रोफाइल केस एक तरह से क्राइम ब्रांच की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था. क्राइम ब्रांच यूनिट-2 के सीनियर पीआई प्रशांत राजे ने सहायक पीआई अर्जुन जगदाले, एपीआई सचिन माने, संतोष कदम, हैडकांस्टेबल संजीव गुडेवार, हृदयनाथ मिश्रा, प्रशांत सिढमे, प्रमोद शिर्के और राजेश सोनावाले के साथ इस मामले की कडि़यों को जोड़ना शुरू किया

उन्होंने अपनी जांच की शुरुआत उन्हीं सूत्रों से की, जिन पर स्थानीय पुलिस कर चुकी थी. उन्होंने कीर्ति के घर वालों के बयान और कीर्ति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स का बारीकी से अध्ययन किया तो जांच में कई खामियां नजर आईं. कीर्ति के घर वालों के बयान के अनुसार कीर्ति सुबह सवा 9 बजे की विरार लोकल ट्रेन से ग्रांट रोड से अंधेरी जाया करती थी. लेकिन घटना वाले दिन सुबह उसे लेने के लिए उस की इमारत के नीचे ब्राउन कलर की एक फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार आई थी, जिस के कांच पर काले रंग की फिल्म चढ़ी हुई थी. इस से अंदर बैठे लोग दिखाई नहीं दे रहे थे. यह कार कीर्ति की कंपनी की मैनेजर खुशी सेजवानी की थी.

लेकिन उन्होंने जांच टीम को जो बयान दिया था, वह विश्वसनीय नहीं था. उन्होंने कहा था कि वह उस दिन कंपनी के अकाउंटेंट सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ग्रांट रोड अपने एक व्यक्तिगत काम से आई हुई थीलौटते समय उन्होंने कीर्ति को यह सोच कर अपने साथ लिया कि वह भी उन के साथ औफिस चली चलेगी. उस के साथ रहने से रास्ते का टाइम भी पास हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. रोड जाम होने के कारण कीर्ति ने यह कह कर उन की कार छोड़ दी कि वह औफिस के लिए लेट हो जाएगी. जबकि सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में ऐसा कुछ नहीं था. उस समय रोड साफ था.

जांच में यह भी पता चला कि उस दिन कीर्ति का मोबाइल फोन वरली के भारतनगर में बंद हुआ था. जिस समय उस का फोन बंद हुआ, उसी समय खुशी सेजवानी और सिद्धेश तम्हाणकर के फोन की लोकेशन भी भारतनगर में पाई गई. पुलिस को इस बात पर शक हो गया कि जब वह ट्रेन से गई थी तो उस का मोबाइल वरली में क्या कर रहा था. और उन दोनों का फोन उस के साथ क्यों था. इन सब सवालों के जवाब के लिए सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी को क्राइम ब्रांच के औफिस बुलाया गया. लेकिन वे पुलिस के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, जिस से पुलिस को उन पर शक हो गया.

खुल गया हत्या का राज संदेह पुख्ता करने के लिए पुलिस ने खुशी सेजवानी की फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार को कब्जे में ले कर जांच के लिए सांताक्रुज की फोरैंसिक लैब में भेज दिया. परीक्षण में कार की डिक्की के अंदर खून के कुछ धब्बे पाए गए, जिस का डीएनए किया गया तो वह कीर्ति के डीएनए से मैच हो गया. इस के बाद तो उन दोनों पर शक की कोई गुंजाइश नहीं बची. अब स्थिति साफ हो चुकी थी. पुलिस ने खुशी सेजवानी और सिद्धेश से पूछताछ की तो उन्होंने कीर्ति की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. उस की हत्या की उन्होंने जो कहानी बताई, वह दिल दहला देने वाली थी

27 वर्षीय सिद्धेश तम्हाणकर अपने पूरे परिवार के साथ परेल, मुंबई के लालबाग में रहता था. उस के पिता सीताराम तम्हाणकर नौकरी से रिटायर हो चुके थे. पूरे परिवार की जिम्मेदारी सिद्धेश के ऊपर थी. परिवार वालों का वह एकलौता सहारा थावह कंपनी में अपना काम ठीक से नहीं करता था. कंपनी के काम के बजाय उस का मन इधरउधर अधिक रहता था. कंपनी के सारे अकाउंट की जिम्मेदारी उस की थी, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी के प्रति जरा भी गंभीर नहीं था.

 व्यास के काम को देखते हुए बीब्लंट कंपनी ने कीर्ति को जो जिम्मेदारियां दी थीं, वह उन का बड़ी ईमानदारी से पालन करती थी. अपने दूसरे सहयोगियों को भी वह कंपनी के प्रति निष्ठावान बनने की सलाह देती थी. वह खुद तो मेहनत करती ही थी, दूसरे कर्मचारियों से भी मेहनत करवाती थी जिस से कंपनी के कई लोग उस से खुश नहीं थे. सिद्धेश तम्हाणकर भी उन्हीं में से एक था लेकिन कीर्ति को इस की कोई परवाह नहीं थी. कीर्ति ने 5 सालों में बीब्लंट कंपनी में अपनी एक खास जगह बना ली थी, जबकि कंपनी के अंदर 10-15 सालों से काम कर रहे लोग ऐसी जगह नहीं बना पाए थे. मेहनत की वजह से कीर्ति को कंपनी के कई अधिकार मिल गए थे. कंपनी की सीईओ और एमडी उस से काफी प्रभावित थीं.

कंपनी के सारे लोगों से कीर्ति का व्यवहार मधुर सरल था. बाहर से आनेजाने वाले लोग भी कीर्ति को भरपूर मानसम्मान देते थे. लेकिन सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ऐसा नहीं था, क्योंकि कीर्ति ने जब कंपनी का काम संभाला था, तब से सिद्धेश तम्हाणकर की मनमानी पर रोक लग गई थी.कीर्ति ने पहले तो सिद्धेश तम्हाणकर की काम के प्रति लापरवाही पर उसे कई बार समझाया, लेकिन सिद्धेश पर उस की बातों का कोई असर नहीं हुआ. उस का रवैया पहले जैसा रहा. वह कंपनी के कामों पर ध्यान नहीं देता था

 जलन बन गई ज्वाला सरकार ने जब से जीएसटी लगाई तो सिद्धेश की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई. क्योंकि जीएसटी की गणना उस की समझ से परे थी. पहले तो थोड़ीबहुत लापरवाही चल जाती थी, लेकिन जीएसटी में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं थी. काम सही ढंग और समय से पूरा करना ही पड़ता था. जीएसटी की कम समझ होने के कारण सिद्धेश के अकाउंट में बहुत सारी गलतियां तो होती ही थीं, काम भी समय से नहीं हो पाता था. इस से कंपनी के नुकसान के साथसाथ बदनामी का भी डर था. चेतावनी के बाद भी सिद्धेश ने जब अपने काम में सुधार नहीं किया तो कीर्ति ने उसे कंपनी से निकालने का नोटिस दे दिया.

 इस नोटिस से सिद्धेश बौखला गया. नौकरी जाने के बाद उस का और उस के परिवार का क्या होगा, सोच कर वह परेशान रहने लगा. कोई रास्ता न देख उस ने उसी कंपनी में काम करने वाली अपनी दोस्त खुशी सेजवानी से सलाह की. बाद में वह कंपनी के सीईओ व एमडी अनुधा अख्तर के पास गया. लेकिन बात नहीं बनी. इस पर उस ने अपनी नौकरी जाने के डर से कीर्ति व्यास के प्रति एक खतरनाक निर्णय ले लिया था. उस ने सोचा कि क्यों न कीर्ति को ही खत्म कर दिया जाए. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी. उसे लग रहा था कि कीर्ति के न रहने से शायद उस की नौकरी भी रहे. इस काम में उस की मदद करने के लिए खुशी भी तैयार हो गई.

37 वर्षीय खुशी सेजवानी बीब्लंट कंपनी में कोचिंग क्लासेज के मैनेजर के पद पर काम करती थी. कंपनी में जितना महत्त्व कीर्ति का था, उतना ही महत्त्व खुशी का भी था. सेजवानी मुंबई सांताक्रुज पश्चिम के एस.बी. रोड स्थित एक अपार्टमेंट में अपने एकलौते बेटे के साथ रहती थीउस के पति एक कामयाब बिजनैसमैन थे. काम के सिलसिले में वह अकसर बाहर ही रहते थे. परिवार संभ्रांत और संपन्न था. घर पर नौकरनौकरानी थे. किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धेश और खुशी की गहरी दोस्ती थी. इतने बड़े अपराध में खुशी सेजवानी ने सिद्धेश का साथ क्यों दिया, पुलिस इस बात की जांच कर रही है.

अपराध की राह पर सिद्धेश और खुशी 16 मार्च, 2018 को सिद्धेश की नौकरी का आखिरी दिन था. इस के पहले कि कीर्ति कंपनी में कर सिद्धेश पर काररवाई करती, सिद्धेश और खुशी योजनानुसार अपनी कार ले कर कीर्ति के घर के पास पहुंच गए. फिर खुशी ने कीर्ति को फोन कर के कहा कि वह किसी काम से भारतनगर आई थी. काम खत्म हो जाने के बाद अब औफिस जा रही है. अगर उसे भी औफिस चलना हो तो जाए, साथसाथ चले चलेंगे.कीर्ति औफिस जाने की तैयारी कर ही रही थी. खुशी का फोन आने के बाद उस ने उस के साथ चलने की हामी भर दी और फटाफट तैयार हो कर उस की गाड़ी में पहुंच गई

गाड़ी खुशी सेजवानी चला रही थी, कीर्ति उस के बराबर में बैठ गई. सिद्धेश पीछे वाली सीट पर बैठा था. कुछ दूर चलने के बाद खुशी सेजवानी ने कीर्ति को मनाने की काफी कोशिश की कि वह सिद्धेश को दिया नोटिस वापस ले ले, लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं हुई. तब पीछे की सीट पर बैठे सिद्धेश ने कीर्ति के गले में सीट बेल्ट डाल कर हत्या कर दी. कीर्ति की हत्या करने के बाद खुशी ने कार अपने घर पर ला कर खड़ी कर दी और उस पर कवर डाल कर दोनों औफिस चले गए. मगर कंपनी के काम में उन का मन नहीं लग रहा था. उस दिन खुशी सेजवानी 4 बजे ही अपने औफिस से घर के लिए निकल गई. कार में शव होने के कारण सिद्धेश भी शाम 5 बजे के करीब खुशी के घर पहुंच गया.

मौका देख कर वे कीर्ति की लाश कार से निकाल कर घर के अंदर ले गए. फिर उसे ठिकाने लगाने के मकसद से उन्होंने लाश के 3 टुकड़े किए. फिर उन्हें कार की डिक्की में डाल कर चेंबूर के माहुल इलाके में ले गए. वहां आगे जा कर उन्होंने कीर्ति की लाश के तीनों टुकड़े नाले में डाल दिए. फिर उन्होंने कार की अच्छी तरह धुलाई करा ली. बाद में कीर्ति के घर वालों के साथ वे दोनों भी उस की तलाश करने का नाटक करने लगे. 

सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 5 मई, 2018 को उन की निशानदेही पर कीर्ति का बैग, मोबाइल फोन, कुछ नकदी भी बरामद कर ली. फिर उन दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 341, 363, 364 और 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस कीर्ति के शव के टुकड़ों को काफी कोशिशों के बाद भी बरामद नहीं कर पाई थी. माना जा रहा है कि वे टुकड़े नाले में बह कर कहीं आगे निकल गए होंगे. फिर भी पुलिस की कोशिश जारी है 

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

पति ने पत्नी को रंगेहाथ पकड़ा, फिर भी रहा चुप

नबी मोहम्मद ने अपनी पत्नी और इरफान के संबंधों को स्वीकार ही नहीं कर लिया बल्कि दोनों का निकाह भी करा दिया. लेकिन परेशानी तब खड़ी हो गई, जब वह इरफान से इस की कीमत वसूलने लगा. दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को दोपहर 3 बजे के आसपास सूचना मिली कि मदनपुर खादर के श्रीराम चौक से आगे
यमुना खादर की झाडि़यों में एक लाश पड़ी है. चूंकि यह इलाका दक्षिणपूर्वी जिले के थाना जैतपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना जैतपुर को दे दी. इसी के साथ पीसीआर वैन भी सूचना में बताए पते पर रवाना कर दी गई. यह 10 दिसंबर, 2013 की बात है. थाने में उस समय इंसपेक्टर रविंद्र कुमार तोमर मौजूद थे. जैसे ही उन्हें थानाक्षेत्र में लाश पड़ी होने की सूचना मिली,

वह सबइंसपेक्टर नरेंद्र, हेमंत कुमार, हेडकांस्टेबल बलिंदर को ले कर श्रीराम चौक के लिए रवाना हो गए. श्रीराम चौकथाने से करीब 200 मीटर दूर था, इसलिए 5 मिनट में ही सभी वहां पहुंच गए. वहां उन्हें पता चला कि लाश पुश्ता से करीब 500 मीटर दूर यमुना खादर की झाडि़यों में पड़ी है. वहीं से झाडि़यों के पास कुछ लोग खड़े दिखाई दिए तो इंसपेक्टर रविंद्र कुमार तोमर साथियों के साथ उसी जगह पहुंच गए. वहां पीसीआर वैन भी खड़ी थी. झाडि़यों के बीच में एक युवक की लाश पड़ी थी. उस की उम्र 25-30 साल रही होगी. वह युवक जींस और गुलाबी रंग का स्वेटर पहने था. उस का सिर और चेहरा कुचला हुआ था. पास ही एक ईंट पड़ी थी, जिस पर खून लगा था. उस में कुछ बाल भी चिपके हुए थे.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारों ने इसी ईंट से इस का चेहरा इसलिए कुचला होगा, ताकि लाश की शिनाख्त न हो सके. लाश देख कर ही लग रहा था कि चेहरे और गरदन का मांस किसी जानवर ने खाया है. चेहरा कुचला होने की वजह से वहां मौजूद कोई भी आदमी लाश की शिनाख्त नहीं कर सका. तलाशी लेने पर उस की जेब से एक पर्स मिला, जिस में 6 फोटोग्राफ्स थे. उन में से 2 फोटोग्राफ्स पुरुष के थे और 4 किसी महिला के. इस के अलावा पर्स में कुछ विजिटिंग कार्ड्स भी थे. वे सभी एसी, कूलर की सर्विस आदि से संबंधित थे. जेब में 1400 रुपए नकद के अलावा बैंक में पैसे जमा करने की एक स्लिप भी थी. वह स्लिप जामिया कोऔपरेटिव बैंक मदनपुर खादर की थी, जिस से नबी मोहम्मद ने शहनाज के खाते में जुलाई महीने में 40 हजार रुपए जमा किए थे. मृतक की जेब से नकदी मिलने के बाद यह तो साफ हो गया था कि हत्या लूट के लिए नहीं की गई थी.

हत्या क्यों की गई और किस ने की, यह जांच का विषय बाद का था. सब से पहला काम लाश की शिनाख्त कराना था. उस की जेब से जो विजिटिंग कार्ड्स मिले थे, पुलिस ने उन में लिखे फोन नंबरों पर संपर्क किया तो उन में से किसी से मृतक के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई. अब पुलिस के पास केवल बैंक पर्ची बची थी. इंसपेक्टर रविंद्र कुमार तोमर ने आगे की जांच के लिए 2 कांस्टेबलों को जामिया कोऔपरेटिव बैंक भेज दिया. वहां से पता चला कि वह एकाउंट जिस शहनाज के नाम था, वह शाहीन बाग में रहती थी. वहां से शहनाज का मोबाइल नंबर भी मिल गया था.

घटनास्थल पर पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की मोर्चरी में रखवा दिया. इस ब्लाइंड मर्डर को सुलझाने के लिए डीसीपी डा. पी. करुणाकरन ने सरिता विहार के एसीपी विपिन कुमार नायर की देखरेख में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में थानाप्रभारी अरविंद कुमार, इंसपेक्टर रविंद्र कुमार तोमर, एसआई नरेंद्र, हेमंत कुमार, रोहित कुमार, हेडकांस्टेबल बलिंदर, रविंदर, कांस्टेबल विकास, कुलदीप, निरंजन, मामचंद, बृजपाल, हवा सिंह आदि को शामिल किया गया.

पुलिस को बैंक से शहनाज का जो फोन नंबर मिला था, उसे अपने फोन से मिलाया. फोन इरफान नाम के किसी आदमी ने उठाया. इंसपेक्टर तोमर ने कहा, ‘‘हमें यमुना खादर की झाडि़यों से एक युवक की लाश मिली है. मरने वाले की जेब से कुछ फोटो भी मिले हैं. उन फोटोग्राफ्स को पहचानने के लिए तुम थाना जैतपुर आ जाओ.’’

‘‘सर, मैं तो इस समय बाहर हूं, लेकिन अपने छोटे भाई को थाने भेज रहा हूं.’’ इरफान ने जवाब दिया.
आधे घंटे बाद ही इरफान का भाई थाने आ गया. पुलिस ने जब उसे वे फोटो दिखाए तो उस ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. इंसपेक्टर तोमर ने अपने मोबाइल फोन से लाश के कुछ फोटो खींच लिए थे. खींचे गए वे फोटो जब उसे दिखाए गए तो वह लाश को भी नहीं पहचान सका. इस के 2 घंटे बाद इरफान भी थाने आ गया. इंसपेक्टर तोमर ने जब पर्स में मिले फोटो उसे दिखाए तो फोटो देखते ही वह बोला, ‘‘ये फोटो तो नबी मोहम्मद के हैं.’’

यह जरूरी नहीं था कि पर्स में नबी मोहम्मद के फोटो मिले थे तो लाश भी उसी की रही हो. इसलिए उन्होंने मोबाइल फोन से खींचे गए लाश के फोटो इरफान को दिखाए तो उस ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. इरफान से पूछताछ में पता चला कि नबी मोहम्मद नोएडा के गांव कुलेसरा का रहने वाला था. चूंकि उस दिन अंधेरा घिर चुका था, इसलिए पुलिस ने अगले दिन नोएडा जाने का कार्यक्रम बनाया.

11 दिसंबर, 2013 को एक पुलिस टीम नोएडा के कुलेसरा स्थित नबी मोहम्मद के घर पहुंची. वहां नबी मोहम्मद की बीवी नूर फातिमा मिली. पुलिस ने जब उस से उस के पति के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘वह कल से कहीं गए हुए हैं. लेकिन मुझे बता नहीं गए कि वह कहां गए हैं? वैसे भी वह अकसर घर से बिना बताए 2-3 दिनों के लिए गायब हो जाते हैं. आज या कल लौट आएंगे. मगर आप लोग उन के बारे में क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘दरअसल कल दिल्ली के यमुना खादर में एक लाश मिली है. थाने चल कर तुम लाश के फोटो और सामान देख लो.’’ पुलिस वालों ने कहा तो नूर फातिमा उन के साथ थाना जैतपुर आ गई. इंसपेक्टर रविंद्र कुमार तोमर ने अपने मोबाइल फोन से खींचे गए लाश के फोटो पर फातिमा को दिखाए तो वह बोली,

‘‘वह कपड़े तो इसी तरह के पहने हुए थे, लेकिन चेहरा कुचला होने की वजह से पहचान में नहीं आ रहा है.’’
मृतक के पर्स से जो फोटो मिले थे, पुलिस ने उन्हें भी नूर फातिमा को दिखाए. पता चला कि उन में से 2 फोटो नबी मोहम्मद के थे और 4 नूर फातिमा के. लाश की शिनाख्त के लिए पुलिस नूर फातिमा को एम्स की मोर्चरी ले गई. लाश का चेहरा भले ही कुचला हुआ था, मगर कपड़े और कदकाठी से उस ने तुरंत पहचान लिया. लाश उस के पति नबी मोहम्मद की ही थी. फातिमा फफकफफक कर रोने लगी.

लाश की शिनाख्त होने पर पुलिस ने राहत की सांस ली. अब पुलिस का अगला काम हत्यारों का पता लगाना था. पुलिस ने सब से पहले नूर फातिमा से नबी मोहम्मद के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘वह मारुति कार सड़क के किनारे लगा कर कपड़ों की सेल लगाते थे. यह कार इरफान की थी और कपड़े भी इरफान ही बिकवाता था. उन्हें तो केवल मजदूरी मिलती थी. कभीकभी वह 1-2 दिनों बाद घर लौटते थे. इस के अलावा उन की रोजाना शराब पीने की आदत थी.

‘‘कल शाम को भी वह कार ले कर घर से निकले थे. रात को जब वह घर नहीं लौटे तो मैं ने सोचा कि कहीं चले गए होंगे. आज इरफान ने मारुति की चाबी और उन का मोबाइल फोन मुझे देते हुए कहा था कि नबी जरूरी काम से कहीं गया है. 1-2 दिन में आ जाएगा. लेकिन अब मुझे पता चल रहा है कि किसी ने उन की हत्या कर दी है.’’

कोई न कोई वजह जरूर रही होगी, जिस से उसे जान से हाथ धोना पड़ा. वह किनकिन लोगों के साथ शराब पीता था और उस की किसी से कोई दुश्मनी वगैरह तो नहीं थी, इस बारे में पुलिस ने फातिमा से पूछा तो उस ने बताया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी रही हो, ऐसी जानकारी उसे नहीं है. उसे यह भी पता नहीं कि वह किसकिस के साथ शराब पीते थे.

पुलिस को फातिमा की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था, इसलिए पुलिस ने नबी मोहम्मद, नूर फातिमा और इरफान के मोबाइल फोनों की काल डिटेल्स निकलवाई. इस काल डिटेल्स से पुलिस को चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. पुलिस को पता चला कि 9 दिसंबर की शाम साढ़े 9 बजे इरफान और नबी मोहम्मद के फोनों की लोकेशन कालिंदी कुंज की जेजे कालोनी, पुस्ता रोड के पास थी और पुश्ते से थोड़ी दूर आगे ही यमुना खादर में नबी मोहम्मद की लाश मिली थी. इस का मतलब यह था कि उस रात दोनों साथसाथ थे.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने इरफान को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. पुलिस ने इरफान से पूछा, ‘‘9 दिसंबर की शाम को तुम कहां थे?’’
‘‘मैं शाम को अपने घर पर था. रात को भी मैं घर पर ही था.’’
‘‘नहीं, तुम झूठ बोल रहे हो. घर के बजाय तुम कहीं और थे?’’ इंसपेक्टर रविंद्र कुमार तोमर ने कहा.
‘‘सर, मैं सच बोल रहा हूं. उस रात मैं घर पर ही था. चाहें तो आप मेरे घर वालों से पूछ लें कि मैं कहां था.’’

इंसपेक्टर तोमर के पास इस बात के पुख्ता सुबूत थे कि इरफान और नबी मोहम्मद के फोन की लोकेशन पुश्ता रोड की थी. वह जान रहे थे कि इरफान झूठ बोल रहा है. इसलिए उन्होंने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में वह सच उगलने को मजबूर हो गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि नबी मोहम्मद ने उस का जीना हराम कर दिया था, इसलिए मजबूरी में उसे उस की हत्या करनी पड़ी. उस ने बताया कि उसे मारने में उस के साथ उस के 2 दोस्त भी थे. इस के बाद उस ने हत्या की जो वजह बताई, वह इस प्रकार थी.

नबी मोहम्मद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के गजरौला का रहने वाला था. उस की शादी नूर फातिमा से हुई थी. नबी मोहम्मद मेहनतमजदूरी करता था. उस के गांव के कई लड़के दिल्ली, नोएडा में काम करते थे. उन लड़कों के पहनावे और खानपान में काफी अंतर था. उन के ठाठबाट देख कर नबी मोहम्मद के मन में भी घर से बाहर जा कर काम करने की इच्छा हुई. करीब 15 साल पहले काम की तलाश में वह नोएडा आ गया. क्योंकि नोएडा में उस का एक करीबी दोस्त रहता था. यहां वह एक ठेकेदार के साथ मकानों की पुताई का काम करने लगा.

नबी ठीकठाक कमाने लगा तो गांव से पत्नी नूर फातिमा को भी नोएडा ले आया और कुलेसरा गांव में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. करीब 3 साल पहले की बात है. नबी मोहम्मद दिल्ली के मदनपुर खादर एक्सटेंशन की कच्ची कालोनी में रहने वाले मोहम्मद इरफान उर्फ फुरकान के यहां पुताई करने गया. मोहम्मद इरफान भी मूलरूप से मुरादाबाद के गजरौला कस्बे का रहने वाला था. उस के परिवार में पत्नी शहनाज के अलावा 4 बच्चे थे. वह अलगअलग इलाकों में सड़क किनारे कार खड़ी कर के कपड़ों की सेल लगाता था. इस के अलावा वह प्रौपर्टी डीलिंग का भी काम करता था. उस के यहां कूलर का भी काम होता था. कुल मिला कर उस की अच्छीखासी आमदनी थी.

घर पर काम करते समय उस की नबी मोहम्मद से बात हुई तो पता चला कि वह भी गजरौला का ही रहने वाला है. इरफान को उस से सहानुभूति हो गई. नबी मोहम्मद अपने काम से परेशान था, इसलिए उस ने इरफान से अपने लिए कोई दूसरा काम बताने को कहा. इरफान के कई तरह के काम थे. उसे अपने साथ काम करने के लिए एक विश्वसनीय आदमी की जरूरत थी. इसलिए उस ने नबी मोहम्मद को अपने साथ काम करने को कहा. नबी मोहम्मद तैयार हो गया और फिर वह उस के साथ काम करने लगा. नबी इरफान के साथ सेल लगा कर कपड़े बेचने लगा. इरफान के साथ नबी मोहम्मद के अलावा 2 अन्य लड़के भी काम करते थे.

चूंकि इरफान और नबी मोहम्मद एक ही जिले के रहने वाले थे, इसलिए उन की आपस में अच्छी पटने लगी थी. इरफान का नबी मोहम्मद के घर भी आनाजाना हो गया. इरफान के ठाठबाट देख कर नबी मोहम्मद की बीवी नूर फातिमा उस से काफी प्रभावित हुई. वह बहुत महत्वाकांक्षी थी. पति की जो आमदनी थी, उस से उस की महत्वाकांक्षाएं पूरी होनी तो दूर, घर का खर्च तक नहीं चलता था. नूर फातिमा का अपनी ओर होने वाला झुकाव 4 बच्चों का बाप इरफान समझ गया था. वह भी खुद को रोक नहीं सका और उसे चाहने लगा. वह नूर फातिमा की आर्थिक मदद भी करने लगा. जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध भी कायम हो गए. लेकिन इस बात का नबी मोहम्मद को पता नहीं चला. करीब 1 साल तक उन के बीच इसी तरह का खेल चलता रहा.

इरफान नबी मोहम्मद को अकसर शराब पीने के लिए पैसे देता रहता था, इसलिए उस का इरफान पर विश्वास बना रहा. उसे पता नहीं था कि दोस्ती की आड़ में इरफान उस की पत्नी के साथ क्या गुल खिला रहा है. कहते हैं, गलत काम की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती. एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. इरफान के साथ भी यही हुआ. एक दिन नबी मोहम्मद ने अपनी बीवी और इरफान को अपने ही कमरे में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. पोल खुलने पर इरफान और नूर फातिमा के चेहरों के रंग उड़ गए. वे घबरा उठे कि पता नहीं अब क्या होगा?

लेकिन नबी मोहम्मद ने उस समय उन दोनों से कुछ नहीं कहा. कोई भी मर्द अपनी पत्नी को किसी गैर की बांहों में देखेगा तो जाहिर है, उस का खून खौल उठेगा. मर्द भले ही बाहर गुलछर्रे उड़ाता फिरे, लेकिन अपनी पत्नी को वह खुद के साथ वफादार बनी रहने की उम्मीद रखता है. लेकिन पत्नी के बेवफा होने पर भी नबी मोहम्मद चुप रहा. उस के चुप रहने की वजह क्या थी, इस बात को न तो नूर फातिमा समझ सकी और न ही इरफान. इरफान के जाने के बाद नूर फातिमा के मन में डर बना था कि कहीं पति उस की पिटाई न करे. लेकिन नबी ने ऐसा भी नहीं किया, बल्कि उस ने पत्नी से साफ कहा, ‘‘तू एक बात कान खोल कर सुन ले, इरफान तेरे साथ जो कुछ कर रहा है, वह मैं फ्री में हरगिज नहीं होने दूंगा. उस ने मुझे बेवकूफ समझ रखा है क्या. उस से कहना कि उसे मेरा रोजाना का खर्च पूरा करना होगा, वरना वह यहां न आए.’’

पति की बात सुन कर नूर फातिमा मन ही मन खुश तो हुई, लेकिन वह अचंभे में भी पड़ गई कि यह क्या कह रहा है. उस ने सोचा कि इरफान तो वैसे भी उस का आर्थिक सहयोग करता रहता है. उस के कहने पर वह थोड़ेबहुत पैसे पति के ऊपर भी खर्च कर देगा. यानी अब वह इरफान के साथ खुलेआम मौजमस्ती कर सकेगी. नूर फातिमा ने यह बात इरफान को बताई तो वह भी खुश हुआ. क्योंकि अब वह बेधड़क हो कर नूर फातिमा से मिल सकेगा. इस के बाद इरफान नूर फातिमा के लिए खानेपीने का इंतजाम करने और बिना किसी डर के उस से मिलने लगा. नबी मोहम्मद को उन दोनों के संबंधों पर कोई ऐतराज नहीं था.

इरफान की पत्नी को पता नहीं था कि पति के किसी दूसरी औरत से भी संबंध हैं. पत्नी के इसी विश्वास का इरफान फायदा उठा रहा था. यही नहीं, अब वह नूर फातिमा से निकाह करने की भी सोचने लगा था. उस ने इस बारे में उस से बात की तो वह भी तैयार हो गई. रही बात नबी मोहम्मद की तो उस ने भी सहमति जता दी. इस के बाद इरफान ने नबी मोहम्मद की मौजूदगी में नूर फातिमा से निकाह कर लिया. यह एक साल पहले की बात है. नूर फातिमा ने इरफान से निकाह जरूर कर लिया था, लेकिन रहती वह नबी मोहम्मद के साथ ही थी. इरफान 1-2 दिन के अंतर पर फातिमा के पास आता रहता था. इस तरह इरफान की 2 नावों की सवारी चलती रही.

चूंकि इरफान का कपड़ों की सेल का काम अच्छा चल रहा था, इसलिए उस ने मारुति कार नबी मोहम्मद को दे दी और अपने लिए सेंट्रो कार खरीद ली. दोनों ही अलगअलग जगहों पर सेल लगाने लगे. कपड़ों की सेल से जो पैसे आते थे, नबी उन्हें इरफान को दे देता था. बदले में इरफान उसे उस की मजदूरी दे देता था. धीरेधीरे नबी मोहम्मद का स्वभाव बदलने लगा. वह चिड़चिड़ा हो गया. इरफान उस के यहां आता तो वह शराब के नशे में उसे गालियां देता और मारपीट करने पर उतारू हो जाता. इस के अलावा वह इरफान से पैसे ऐंठता. इरफान उस के मुताबिक पैसे देने में आनाकानी करता तो वह उस की पत्नी शहनाज के सामने उस की पोल खोलने की धमकी देता. मजबूरी में इरफान को उस के द्वारा मांगे गए पैसे देने के लिए मजबूर होना पड़ता.

इरफान की इसी कमजोरी का नबी मोहम्मद फायदा उठा रहा था. आए दिन की इस ब्लैकमेलिंग से इरफान परेशान रहने लगा था. उस ने नबी को कई बार समझाया भी, लेकिन उस ने उस की बात पर ध्यान नहीं दिया. इरफान को डर लगा रहता था कि कहीं नबी मोहम्मद शहनाज को फातिमा के बारे में बता न दे.
यही वजह थी कि वह इस डर को हमेशा के लिए खत्म करना चाहता था. इस के 2 ही रास्ते थे. पहला यह कि वह हमेशा के लिए फातिमा से संबंध खत्म कर ले और दूसरा यह कि नबी मोहम्मद का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दे.

नबी मोहम्मद को पैसे देने के बाद भी उसे इस बात का विश्वास नहीं था कि वह अपना मुंह बंद रखेगा. इस के लिए उस के दिमाग में एक ही आइडिया आया कि वह नबी मोहम्मद को ठिकाने लगा दे. ऐसा करने से उस की परेशानी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी. नबी मोहम्मद को ठिकाने लगाने वाली बात उस ने नूर फातिमा को भी नहीं बताई. इस काम को वह अकेला अंजाम नहीं दे सकता था, इसलिए उस ने अपने साथ काम करने वाले राकेश और सूरज हाशमी से बात की. राकेश मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के नगला भवानी गांव का रहने वाला था और दिल्ली में कच्ची कालोनी, मदनपुर खादर में रहता था. जबकि सूरज हाशमी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शुक्लागंज का रहने वाला था. वह भी दिल्ली में रह कर इरफान के साथ कपड़ों की सेल लगाता था.

इरफान ने दोनों साथियों के साथ नबी मोहम्मद को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. योजनानुसार इरफान ने 9 दिसंबर की शाम को नबी मोहम्मद को फोन कर के दिल्ली में जैतपुर के पुश्ते पर बुलाया. नबी मोहम्मद शराब के नशे में था. नबी मोहम्मद इस से पहले भी इरफान के बताए गए पते पर पहुंचता रहता था. इसलिए फोन आने पर 9 दिसंबर की रात करीब साढे़ 9 बजे मारुति कार नंबर डीएल 2सी आर 5093 से नोएडा से वह दिल्ली के लिए चल पड़ा.

उधर इरफान भी राकेश और सूरज हाशमी को अपनी सेंट्रो कार नंबर एचआर 26पी 6738 में बिठा कर जैतपुर पुश्ता की तरफ चल पड़ा. श्रीराम चौक से निकलने के बाद यमुना खादर में उन्होंने कार एक किनारे खड़ी कर दी और नबी मोहम्मद का इंतजार करने लगे. नबी मोहम्मद की गाड़ी दिखते ही इरफान ने उसे रुकवा लिया. फिर वे उसे यमुना खादर की तरफ ले गए. नबी मोहम्मद कुछ समझ पाता, तीनों ने उस की पिटाई करनी शुरू कर दी.

नबी मोहम्मद ने खुद को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन 3 लोगों के बीच वह अकेलानिहत्था क्या कर सकता था. तीनों उसे पीटते हुए झाडि़यों में ले गए. पिटतेपिटते नबी लगभग अधमरा हो गया तो उसे जमीन पर गिरा कर वहीं पड़ी ईंट से उस के सिर और चेहरे को कुचलने लगे. थोड़ी देर में नबी मोहम्मद की मौत हो गई. वह जिंदा न रह जाए, इस के लिए इरफान ने साथ लाए छुरे से उस का गला भी काट दिया. इरफान ने नबी मोहम्मद का मोबाइल फोन निकाल लिया. काम हो जाने के बाद सभी अपनेअपने घर चले गए.

लाश खादर में पड़ी थी, इसलिए जंगली जानवरों ने उस की गरदन और चेहरे का मांस खा लिया. अगले दिन इरफान मारुति कार से कुलेसरा नूर फातिमा के पास गया और उस ने नबी मोहम्मद का मोबाइल फोन उसे देते हुए कहा कि वह किसी काम से 2-3 दिनों के लिए बाहर गया है. मारुति कार फातिमा के यहां खड़ी कर के वह दिल्ली वापस आ गया.

पुलिस ने 11 दिसंबर की रात को ही इरफान के साथियों राकेश और सूरज हाशमी को भी गिरफ्तार कर लिया. इन की निशानदेही पर पुलिस ने मारुति कार और सेंट्रो कार के अलावा मृतक और उन के मोबाइल फोन, छुरा आदि बरामद कर लिए. इस के बाद सभी को साकेत कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की विवेचना इंसपेक्टर रविंद्र कुमार तोमर कर रहे हैं.
—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

एक गर्लफ्रेंड, तीन आशिक, एक का हुआ कत्ल

मोना नूरी और हामिद की चाहत थी, जबकि मोना की चाहत विश्वजीत था. मोना ने उन दोनों से किनारा किया तो नूरी को लगा कि मोना उन के हाथ से निकल रही है. अपनी चाहत वापस पाने के लिए जो किया, वह बहुत खतरनाक थादोपहर का खाना खा कर आराम कर रही मोना की नजर दीवार घड़ी पर पड़ी तो वह झटके से उठी और अलमारी खोल कर अपनी पसंद के कपड़े निकालने लगी. उन कपड़ों को पहन कर वह आईने के सामने खड़ी हुई तो 

अपने आप पर मुग्ध हो कर रह गई. सफेद टौप और काली स्किन टाइट जींस में वह सचमुच बहुत खूबसूरत लग रही थी. अपनी उस खूबसूरती पर उस के होंठ स्वयं ही खिल उठे. मोना तैयार हो कर घर से निकली तो खुद ब खुद उस के कदम उस ओर बढ़ गए, जहां वह रोज अपने ब्वायफ्रेंड विश्वजीत से मिलती थी. जब वह उस जगह पहुंची तो विश्वजीत उसे बैठा मिला. वह उस का इंतजार कर रहा था. वह दबे विश्वजीत के पीछे पहुंची और उस की आंखों को अपनी दोनों हथेलियों से बंद कर लिया. अचानक घटी इस घटना से विश्वजीत हड़बड़ाया जरूर, लेकिन तुरंत ही जान गया कि मोना आ गई. उस ने मोना के हाथों को आंखों से हटा कर उस की ओर देखा तो देखता ही रह गया. मोना ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘इस तरह क्या देख रहे हो, पहले कभी नहीं देखा क्या?’’

 ‘‘क्या बात है भई, आज तो तुम बिजली गिरा रही हो?’’

‘‘लगता है, आज सुबह से तुम्हें बेवकूफ बनाने के लिए कोई और नहीं मिला.’’

‘‘मोना, मैं तुम्हें बेवकूफ नहीं बना रहा हूं. सचमुच आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो. हीरे को अपनी चमक का अहसास थोड़े ही होता है, उसे तो जौहरी ही पहचानता है.’’

‘‘अच्छा जौहरी साहब, अब आप ने हीरे की पहचान कर ली है तो अब जरा यह भी बता दीजिए कि हीरा असली है या नकली.’’

‘‘हीरा नकली होता तो मैं उसे हाथ ही लगाता. हांहीरा भले ही असली था, लेकिन अभी तक तराशा नहीं था, इसलिए पत्थर जैसा था. अब मैं ने इसे तराश दिया है तो इस की खूबसूरती और चमक दोगुनी हो गई है.’’ विश्वजीत ने मोना की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

मोना को उस की बात की गहराई समझते देर नहीं लगी. इसलिए लजा कर उस ने नजरें झुका कर कहा, ‘‘यह हीरा तुम्हारे गले में सजना चाहता है.’’

विश्वजीत ने मोना का हाथ अपने हाथ में ले कर बड़े विश्वास के साथ कहा, ‘‘मोना, हम दोनों की यह चाहत जरूर पूरी होगी. हम अपने बीच किसी को नहीं आने देंगे. अगर किसी ने आने की कोशिश की तो उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा.’’

मोना विश्वजीत के प्यार के जुनून को देख कर जहां खुश हुई, वहीं उन दोनों को छिप कर देख रही 2 आंखों में खून उतर आया. इस के बाद उस ने जो निश्चय किया, वह विश्वजीत के लिए ठीक नहीं था. आगे क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा इस कहानी के पात्रों के बारे में जान लेते हैं. मोना दिल्ली के कड़कड़डूमा की रहने वाली थी. उस के पिता वकालत करते थे. वह हिंदू थे, जबकि उन की पत्नी यानी मोना की मां मुस्लिम थीं. वकील साहब की यह दूसरी शादी थी. मोना उन की एकलौती संतान थी, जिसे वे बड़े लाडप्यार से पाल रहे थे. मांबाप के लाडप्यार और विचारों का मोना पर पूरा असर था. लड़कों से दोस्ती करना उन के साथ घूमना उस के लिए आम बात थी.

पहले तो मोना का मन पढ़ाई में खूब लगता था. लेकिन जैसे ही उस ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा और लड़कों ने उसे खूबसूरत होने का अहसास कराया, उस का मन पढ़ाई से उचटने लगा. वह सतरंगी सपनों की दुनिया में खोई रहने लगी. महानगर में पलबढ़ रही मोना के मन में भी अन्य लड़कियों की तरह अच्छे रहनसहन की ललक थी. यही वजह थी कि वह अपनी सहेलियों को कईकई लड़कों के साथ घूमतेफिरते देखती तो उन की किस्मत से जल उठती. जबकि उस की वे सहेलियां उस की खूबसूरती के आगे कुछ भी नहीं थीं. इतनी खूबसूरत होने के बावजूद भी मोना का कोई ब्वायफ्रेंड नहीं था. जबकि उस की उन सहेलियों के ब्वायफे्रंड की लिस्ट काफी लंबी थी.

मोना की मां की कोई दूर की रिश्तेदारी उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के थाना सदर बाजार के शहबाजनगर निवासी बाबू खां के यहां थी. उन का बेटा नूरी उर्फ नूर मियां नई दिल्ली के जीबी रोड स्थित एक बार में वेटर का काम करता था. दिन में वह नौकरी करता था और रात में अजमेरी गेट के पास के एक रैनबसेरा में गुजारता था. रिश्तेदारी होने की वजह से नूरी का मोना के यहां आनाजाना था.

इसी आनेजाने में नूरी मोना को पसंद करने लगा. वह जब भी मोना के यहां आता, उस के आसपास ही मंडराता रहता. नूरी को पता ही था कि मांबाप के काम पर जाने के बाद मोना घर में अकेली रहती है, इसलिए वह ऐसे ही समय उस के पास आनेजाने लगा, जब वह घर में अकेली होती. ऐसे में वह उस से खूब बातें करता और घुमाने भी ले जाता, जहां उसे अच्छीअच्छी चीजें खिलाता. इस से मोना को उस का साथ अच्छा लगने लगा. मोना इतनी भोली नहीं थी कि यह समझ पाती कि नूरी उस में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है? सब कुछ जानते हुए भी वह उस की ओर आकर्षित होने लगी.

एक दिन नूरी मोना के घर पहुंचा तो उस ने ऐसे कपड़ों में दरवाजा खोला कि नूरी उसे देखता ही रह गया. उस ने उसे अंदर आने को कहा, लेकिन वह मोना के उस रूप में इस तरह खो गया था कि उस की बात सुनी ही नहीं. उस का मन कर रहा था कि वह मोना को बांहों में भर ले. नूरी की नजरें उस के शरीर पर ही जमी थीं. उस की नजरों का आशय समझ कर मोना मुसकरा उठी. उस ने नूरी की आंखों के सामने हाथ नचाते हुए कहा, ‘‘कहां खो गए डियर, अंदर भी आओगे या बाहर से इसी तरह ताकते रहोगे?’’

नूरी हड़बड़ा कर बोला, ‘‘सौरी डियर. तुम इस समय कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही हो, इसलिए तुम्हें देखता ही रह गया.’’

‘‘मजाक मत करो. लड़कों की आदत का मुझे अच्छी तरह पता है. वह इसी तरह लड़कियों की तारीफ कर के उन की कमजोरी का फायदा उठाना चाहते हैं.’’ मोना ने कहा.

‘‘मैं सच कह रहा हूं मोना. तुम सचमुच बहुत खूबसूरत लग रही हो. एकदम गजब ढा रही हो.’’ अंदर आ कर नूरी ने कहा, ‘‘मोना मेरी बात तुम्हें अजीब जरूर लगेगी, लेकिन सच्चाई यही है कि मेरी तुम्हारे प्रति चाहत बढ़ती जा रही है. मुझे तुम से लगाव सा हो गया है. यह भी कहा जा सकता है कि मुझे तुम से प्यार हो गया है. अगर ऐसा है तो क्या तुम मेरे प्यार को स्वीकार करोगी?’’

मोना ने मुसकराते हुए अपना एक हाथ उस के कंधे पर रख कर कहा, ‘‘नूरी, मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है. तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो.’’

मोना के इन शब्दों ने नूरी के मन पर कुछ ऐसा असर किया कि उस ने मोना उसे अपनी बांहों में भर लिया और अपने होठों की मुहर उस के गालों पर लगा दी. मोना भी पीछे नहीं रही. लेकिन जब नूरी ने इस मौके का फायदा उठाना चाहा तो मोना ने खुद को बेकाबू होने से रोका और नूरी को धक्का दे कर अलग किया. मोना की यह हरकत नूरी को अच्छी तो नहीं लगी, लेकिन उस समय उस ने बुरा नहीं माना. उस ने सोचा, आज यहां तक पहुंचे हैं तो किसी दिन हद भी पार कर लेंगे. दूसरी ओर मोना सामान्य हुई तो बोली, ‘‘प्लीज नूरी, यहां तक तो ठीक है, लेकिन इस के आगे बढ़ने की कभी कोशिश मत करना.’’

‘‘ठीक है, लेकिन जब हमारे दिल मिल चुके हैं तो शरीरों के मिलने में क्या दिक्कत है?’’

‘‘नहीं, मैं इसे अच्छा नहीं समझती. शारीरिक मिलन के बाद दिल का नहीं, शरीर का प्यार रह जाता है, जो धीरेधीरे खत्म हो जाता है. प्रेमी जब भी मिलते हैं, शरीर के लिए मिलते हैं. मुझे यह पसंद नहीं है.’’

मोना ने नूरी को कुछ इस तरह समझा दिया कि वह बुरा भी माने और उसे अपनी जरूरत पूरी करने का जरिया भी बनाए. क्योंकि मोना उस के साथ प्यार का खेल कुछ इस तरह खेल रही थी कि उसे इस खेल का कभी अहसास नहीं हो सका. नूरी के साथ ही हामिद भी उसी बार में वेटर था. यही नहीं, वह भी उसी रैनबसेरा में सोता था, जहां नूरी सोता था. वह रहने वाला भी उसी के मोहल्ले का था, इसलिए दोनों में पक्की यारी थी. यही वजह थी कि दोनों एकदूसरे से कोई भी बात नहीं छिपाते थे. ऐसे में नूरी और मोना के प्रेमसंबंध वाली बात भला हामिद से कैसे छिपी रह सकती थी. जब हामिद ने नूरी से कहा कि वह उसे भी मोना से मिलवा दे तो वह मना नहीं कर सका.

इस के बाद नूरी मोना से मिलने गया तो साथ में हामिद को भी ले गया. मोना को देख कर हामिद भी नूरी की तरह सुधबुध खो बैठा. वह अपने लिए जिस तरह की लड़की की कामना करता था, मोना हुबहू वैसी थी. हामिद जब उसे एकटक देखता रहा गया तो उस की इस हालत पर नूरी ने मुसकराते हुए उस के कानों के पास फुसफुसा कर कहा, ‘‘क्यों बेटा, मेरी पसंद देख कर होश उड़ गए न?’’

‘‘हां यार, यह तो सचमुच बहुत सुंदर है. तेरी तो किस्मत खुल गई.’’

‘‘किस्मत अच्छी है. तभी तो इस नूरी को इतना खूबसूरत नूर मिला है’’

दोनों को खुसरफुसर करते देख मोना ने पूछा, ‘‘तुम दोनों आपस में इस तरह क्या खुसरफुसर कर रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं मोना, तुम्हें देख कर यह होश खो बैठा है, इसलिए इसे होश में ला रहा था.’’

यह सुन कर मोना खिलखिला कर हंस पड़ी. उस की हंसी ने दोनों के दिलों पर तीर चला दिए. उस दिन हामिद और मोना में भी दोस्ती हो गई. उस के बाद हामिद भी मोना से अकेले में मिलने लगा. उसे भी मोना से मोहब्बत हो गई तो वह भी अपनी कमाई उस पर लुटाने लगा. मोना उस से भी बड़े प्यार से पेश आती थी, जिसे हामिद अपने लिए प्यार समझने लगा था. दोनों दोस्त एक ही लड़की के साथ समय बिताने के साथसाथ जिंदगी बिताने के सपने देखने लगे थे. जबकि मोना को उन दोनों में से किसी से प्यार नहीं था.

नूरी और मोना के बीच चल रहे चक्कर के बारे में जल्दी ही उस के तीसरे दोस्त विश्वजीत सिंह को भी पता चल गया. वैसे भी इस तरह की बातें कहां जल्दी छिपती हैं. खास कर दोस्तों के बीच तो बिलकुल नहीं. विश्वजीत सिंह उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के थाना मरहद के गांव डंडापुर का रहने वाला था. उस के पिता ओमप्रकाश सिंह एक स्थानीय इंटर कालेज में चपरासी थे. परिवार में मां ममता के अलावा एक बड़ी बहन संध्या और एक छोटा भाई सर्वजीत था. संध्या का विवाह हो चुका था, जबकि सर्वजीत अभी पढ़ाई कर रहा है

22 वर्षीय विश्वजीत बीकौम कर के दिल्ली गया था. दिल्ली में उसे अजमेरी गेट के पास एक रैनबसेरा में केयरटेकर की नौकरी मिल गई. उसे वहां से जो भी वेतन मिलता था, वह उसे अपने ऊपर खर्च करता था. उसे महंगे कपड़े पहनने और अच्छा खानेपीने का शौक था. ठीकठाक कपड़े पहन कर वह किसी रईसजादे से कम नहीं लगता था. इस की एक वजह यह भी थी वह स्मार्ट तो था ही, पढ़ालिखा भी था. विश्वजीत को देख कर लोग यही अंदाजा लगाते थे कि यह किसी अच्छे घर का लड़का है. वह रहता भी रौब के साथ था. दबंगई उस के स्वभाव में थी, इसलिए जल्दी उस से कोई उलझने की कोशिश नहीं करता था. वैसे भी वह किसी से नहीं डरता था.

नूरी और हामिद उसी रैनबसेरा में सोने आते थे, जहां का केयरटेकर विश्वजीत था. इस तरह रोजरोज मिलनेजुलने में नूरी किसी लड़की से मिलताजुलता है, इस बात की जानकारी विश्वजीत को हुई तो उस ने भी नूरी से कहा कि वह उसे भी उस लड़की से एक बार मिलवा दे. नूरी उसे इनकार नहीं कर सकता था, इसलिए उसे विश्वजीत को मोना से मिलवाना ही पड़ा. जिस दिन मोना और विश्वजीत एकदूसरे से मिले, उन की नजरें एक हुए बिना नहीं रह सकीं. स्मार्ट विश्वजीत को पहली ही बार देख कर मोना होश खो बैठी. अभी तक वह दूसरों की चाहत थी, लेकिन विश्वजीत को देख कर पहली बार उसे अपनी चाहत का अहसास हुआ. उस का दिल इस तरह मचल उठा था कि वह विश्वजीत के सीने से लग जाए. यही वजह थी कि उस की चाहत उस की नजरों से साफ झलक उठी थी. जिसे विश्वजीत को पढ़ने में देर नहीं लगी.

विश्वजीत मोना की झील-सी आंखों में डूबता चला गया. उस दिन नूरी ने दोनों का परिचय कराया तो कुछ बातें भी हुईं. इस के बाद फिर मिलने का वादा कर के दोनों अपनेअपने रास्ते चले गए. लेकिन वे एकदूसरे को पलभर के लिए भी भुला नहीं सके. दोनों में दोबारा मिलने की चाहत थी, इसलिए जल्दी ही उन की दोबारा मुलाकात हो गई. इस बार केवल वही दोनों थे. विश्वजीत मोना को एक महंगे रेस्टोरेंट में ले गया. विश्वजीत ने बातचीत में मोना को बताया था कि उस का खुद का एक होटल है और गांव में उस के पास काफी पुश्तैनी जमीनजायदाद है. इसलिए उसे किसी बात की चिंता नहीं है.

विश्वजीत के मोहपाश में बंधी मोना ने उस की बातों पर आंख मूंद कर विश्वास कर लिया. विश्वजीत बहुत बड़ा खिलाड़ी तो नहीं था, लेकिन इतना तो जानता ही था कि लड़कियों को किस तरह जाल में फंसाया जाता है. उस ने मोना के सामने अपनी रईसी के ऐसे झंडे इस तरह गाड़े थे कि वह उसे अपना हमसफर बनाने के बारे में सोचने लगी थी. मोना के हिसाब से विश्वजीत सुंदर और स्मार्ट तो था ही, साथ ही उस के पास पैसा और पावर भी था. इसलिए उस में वह जरूरत से ज्यादा रुचि लेने लगी.

विश्वजीत को जब पूरा विश्वास हो गया कि मोना अब पूरी तरह उस के प्रभाव में गई है तो उस ने मोना के हाथ को अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘मोना, मैं ने जिस तरह की लड़की की कल्पना की थी, तुम ठीक वैसी हो. जब से तुम से दोस्ती हुई है, मेरी सोच ही नहीं बदल गई, बल्कि जीने का ढंग भी बदल गया है. तुम खूबसूरत ही नहीं, सलीके वाली भी हो. तुम्हारी आदतें, बातचीत इतनी प्यारी लगती हैं कि मन करता है, हर पल तुम्हारे ही साथ रहूं. तुम से अलग होने पर एकएक पल सदियों जैसा लगता है. मैं यह जानना चाहता हूं कि जो भावनाएं मेरे मन में हैं, क्या वहीं तुम्हारे मन में भी हैं?’’

विश्वजीत के इन जज्बातों को सुन कर मोना ने विश्वजीत की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘विश्वजीत तुम्हारे लिए मेरे मन में भी वही सब है, जो तुम्हारे मन में है. मैं तुम से मन की बात कहना भी चाहती थी, लेकिन यह सोच कर कह नहीं पाती थी कि तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचोगे. क्योंकि अगर तुम मेरे मन की बात समझ न पाए तो मैं टूट जाऊंगी. आज तुम्हारे मन की बात जान कर बहुत खुश हूं. मैं भी तुम्हारे साथ जिंदगी बिताने का सपना देख रही थी, जो आज सच हो गया.’’

इस के बाद दोनों का प्यार तेजी से परवान चढ़ने लगा. विश्वजीत को पता था कि मोना की नूरी और हामिद से भी दोस्ती थी. फिर भी उस के मन में उन के लिए कोई दुर्भावना नहीं थी. वह मोना के प्यार को पाना चाहता था, इसलिए उस के सामने उस ने स्वयं को बहुत बड़ा रईस बताया था. लेकिन जब उस का प्यार बढ़ा तो उस ने सोचा कि वह मोना को अपनी सच्चाई बता देगा, जिस से बाद में कोई भ्रम रहे. लेकिन उसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि यह सब बताने के पहले ही सब खत्म हो गया.

16 नवंबर की सुबह 9 बजे उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर की कोतवाली पुलिस को सुभाषनगरखुदराई मार्ग पर किसी युवक की सिरकटी लाश पड़ी होने की सूचना मिली तो इंसपेक्टर आलोक सक्सेना पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सड़क के किनारे ही खून से सना धड़ पड़ा था. सिर का अतापता नहीं था. सिरविहीन धड़ पर चाकुओं के जख्म साफ नजर रहे थे. पुलिस ने जख्मों को गिना तो वे 14 थे. पुलिस ने सिर की तलाश शुरू की तो थोड़े प्रयास के बाद सड़क के दूसरी ओर सिर भी मिल गया.

कोतवाली पुलिस घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर ही रही थी कि क्षेत्राधिकारी राजेश्वर सिंह भी मौके पर पहुंच गए. अब तक घटनास्थल पर शहर और आसपास के गांवों के तमाम लोग इकट्ठा हो गए थे. पुलिस ने वहां एकत्र लोगों से मृतक की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं सका. इस से पुलिस को लगा कि यह यहां का रहने वाला नहीं है. इसे यहां ला कर मारा गया है. लाश पर जो कपड़े थे, वे ब्रांडेड थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि मृतक ठीकठाक घर का लड़का था.

हत्या बड़ी ही बेरहमी से की गई थी. यह देख कर पुलिस को लगा कि यह हत्या प्रतिशोध के लिए की गई है. मामला प्रेमप्रसंग का नजर रहा था. पुलिस ने डाग स्क्वायड को भी बुला लिया था. लेकिन कुत्ता लाश सूंघ कर थोड़ी दूर जा कर रुक गया. वहां पुलिस को खून सनी एक पैंट मिली. पुलिस ने पैंट की तलाशी ली तो उस में से एक सिम बरामद हुआ, जिसे पुलिस ने कब्जे में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

थाने लौट कर इंसपेक्टर आलोक सक्सेना ने चौकीदार राधेश्याम को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201 के तहत अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया और मामले की जांच की जिम्मेदारी स्वयं संभाल ली. पुलिस के पास जांच का एक ही जरिया था, मृतक की जेब से बरामद सिम. बरामद सिम की डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि वह उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर के थाना मरदह के गांव डंडापुर के रहने वाले ओमप्रकाश सिंह के बेटे विश्वजीत सिंह का है. पुलिस ने उक्त पते पर संपर्क कर के परिजनों को बुलाया तो उन्होंने शव की शिनाख्त विश्वजीत सिंह के रूप में कर दी. पूछताछ में उन से पता चला कि विश्वजीत दिल्ली में रह कर नौकरी करता था.

 पुलिस ने बरामद सिम नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में पुलिस को कुछ नंबरों पर संदेह हुआ. पुलिस ने उन नंबरों को सर्विलांस पर लगवा दिया. आखिर सर्विलांस के माध्यम से मिली जानकारी के आधार पर शाहजहांपुर पुलिस की एक टीम दिल्ली पहुंची और थाना कमला मार्केट पुलिस से संपर्क किया. थाना कमला मार्केट के थानाप्रभारी ने एएसआई प्रमोद जोशी को कुछ सिपाहियों के साथ शाहजहां से गई पुलिस टीम की मदद के लिए लगा दिया.

शाहजहांपुर से गई पुलिस टीम ने एएसआई प्रमोद जोशी की मदद से 18 नवंबर को एक आदमी को गिरफ्तार किया. उसे कमला मार्केट थाने ला कर पूछताछ की गई तो उस ने अपना नाम दीपक शर्मा बताया. वह हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के थाना डेरा के रहने वाले रामपाल शर्मा का बेटा था. वह काफी समय से दिल्ली में रह रहा था और सुपारी ले कर हत्याएं करता था. उस पर दिल्ली में हत्या के कई मामले दर्ज थे.

दीपक से पूछताछ के बाद शाहजहांपुर पुलिस के सामने विश्वजीत हत्याकांड की पूरी सच्चाई तो सामने गई, लेकिन शाहजहांपुर पुलिस उसे अपने साथ शाहजहांपुर नहीं ला पाई. क्योंकि दिल्ली पुलिस ने अपने यहां दर्ज एक मामले में उसे अदालत में पेश किया तो अदालत ने उसे जेल भेज दिया. पुलिस दीपक को भले ही अपने साथ नहीं ला पाई थी, लेकिन उस ने उन लोगों के नाम पुलिस को बता दिए थे, जिन्होंने विश्वजीत की हत्या कराई थी. वे दोनों कोई और नहीं, विश्वजीत के रैनबसेरा में सोने वाले उस के दोस्त नूरी और हामिद थे. पुलिस को दीपक से शाहजहांपुर का उन का पता भी मिल गया था.

पुलिस ने नूरी और हामिद की गिरफ्तारी के प्रयास किए तो 23 नवंबर की सुबह शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन से नूरी को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने मोना के प्यार से ले कर विश्वजीत की हत्या तक की कहानी सुना दी. पुलिस ने पूछताछ कर के उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस हामिद की गिरफ्तारी के प्रयास में लग गई. थोड़ी मेहनत के बाद 29 नवंबर की सुबह पंचपीर तिराहे से हामिद को भी गिरफ्तार कर लिया गया. हामिद ने हत्या की पूरी कहानी सुनाने के बाद वह चाकू भी बरामद करा दिया, जिस से विश्वजीत की हत्या की गई थी. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया. इस पूछताछ में विश्वजीत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मोना विश्वजीत में प्यार हुआ तो मोना ने नूरी और हामिद से मिलनाजुलना बंद कर दिया. उस ने उन से फोन पर भी बातें करनी बंद कर दीं. इस से उन्हें समझते देर नहीं लगी कि अब मोना को उन में जरा भी रुचि नहीं रह गई है. वह पूरी तरह विश्वजीत की हो गई है. साफ था, जेब से कड़के नूरी और हामिद अब उस के किसी काम के नहीं रह गए थे. इसीलिए उस ने उन से दूरी बना ली थी. नूरी ने विश्वजीत से मोना से दूर रहने की बात कही तो वह उस पर भड़क उठा. उस ने गालीगलौज करते हुए उसे ही धमकी दे दी. नूरी उस का कुछ नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘विश्वजीत भाई, मोना मेरी गर्लफ्रेंड है, इसलिए मुझ पर दया कर के तुम उसे छोड़ दो.’’

‘‘अब वह तेरी नहीं, मेरी गर्लफ्रेंड है. उसे मुझ से कोई नहीं छीन सकता. और हां, अब अगर तू ने उस से मिलने की कोशिश की तो ठीक नहीं होगा. कहीं ऐसा हो कि प्रेमिका के चक्कर में जान से हाथ धो बैठो.’’ विश्वजीत ने आंखें तरेरते हुए कहा. इस के बाद नूरी और हामिद ने विश्वजीत को मोना से अलग करने की कई बार कोशिश की, उन के बीच मारपीट भी हुई, लेकिन विश्वजीत के सामने उन की एक चली. तब वे सुपारी किलर दीपक शर्मा की शरण जा पहुंचे. दीपक से नूरी की अच्छी दोस्ती थी, इसलिए बिना पैसे के ही वह उस का काम करने को तैयार हो गया.

नूरी और हामिद विश्वजीत की हत्या ऐसी जगह करना चाहते थे, जहां कोई उसे पहचान सके. इस के लिए वे उसे शाहजहांपुर ले जाना चाहते थे. नूरी और हामिद ने विश्वजीत से माफी मांग कर पुरानी बातें भूलने को कहा तो पुरानी दोस्ती को की वजह से विश्वजीत ने उन्हें माफ कर दिया. उन में फिर से अच्छे संबंध बन गए. इस के बाद नूरी और हामिद ने उस से लखनऊ घूमने की बात कही तो विश्वजीत चलने को तैयार हो गया. उन्होंने दीपक को विश्वजीत से मिला कर कहा कि यह भी हमारे साथ लखनऊ चलेगा तो विश्वजीत ने मना नहीं किया. वह मना भी क्यों करता, क्योंकि वह अपने खर्च पर जा रहा था.

15 नवंबर को चारों टे्रन द्वारा नई दिल्ली से लखनऊ के लिए रवाना हुए. रास्ते में ताजिया दिखाने की बात कह कर नूरी ने विश्वजीत को शाहजहांपुर में उतार लिया. इस के बाद नूरी और हामिद उसे दीपक के साथ अपने घर ले गए. देर रात खाना खा कर टहलने के बहाने नूरी और हामिद विश्वजीत तथा दीपक को साथ ले कर सुभाषनगर-खुदरई मार्ग पर निकले. यह रास्ता रात में सुनसान रहता है. 

मौका देख कर एक जगह नूरी और हामिद ने विश्वजीत को धक्का दे कर सड़क के किनारे गिरा दिया तो दीपक फुर्ती से उस के सीने पर सवार हो गया. विश्वजीत हाथपैर चलाता, उस के पहले ही दीपक ने चाकू से उस के गले पर कई वार कर दिए. विश्वजीत छटपटाता रहा. तभी दीपक ने उस का सिर धड़ से अलग कर के सड़क के दूसरी ओर फेंक दिया. बाद में पैंट भी उतार कर वहां से दूर छिपा दी, जिस से पुलिस को कोई सुराग मिले. इस के बाद नूरी और हामिद ने दीपक को दिल्ली भेज दिया और इस मामले में क्या होता है, यह जानने के लिए नूरी और हामिद शाहजहांपुर में ही रुक गए. लेकिन उन की होशियारी धरी की धरी रह गई और तीनों पुलिस के हत्थे चढ़ गए

 कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित