Crime Stories: ममता, मजहब और माशूक

crime stories: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली धार्मिक नगरी चित्रकूट में यों तो साल भर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है, लेकिन तीजत्यौहार के दिनों में भक्तों का जो रेला यहां उमड़ता है, उसे संभालने में पुलिस प्रशासन के पसीने छूट जाते हैं. ऐसे में यदि व्यवस्था में जरा सी चूक हो जाए तो पुलिस प्रशासन के लिए समस्या खड़ी कर सकती है. लिहाजा पुलिस व प्रशासन भीड़भाड़ वाले दिनों में अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं कि व्यवस्था और सुविधाओं में कोई कमी न रह जाए.

इस साल भी जनवरी के दूसरे सप्ताह से ही चित्रकूट में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था, जिन का इंतजार पंडेपुजारियों के अलावा स्थानीय व्यापारी भी करते हैं. कहा जाता है कि मकर संक्रांति की डुबकी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक लाभ पहुंचाती है और यदि डुबकी सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय लगाई जाए तो हजार गुना ज्यादा पुण्य मिलता है.

14 जनवरी, 2018 को मकर संक्रांति की डुबकी लगाने के लिए लाखों लोग चित्रकूट पहुंच चुके थे. श्रद्धालु अपनी हैसियत के मुताबिक लौज, धर्मशाला व मंदिर प्रांगणों में ठहरे हुए थे. वजह कुछ भी हो पर यह बात दिलचस्प है कि चित्रकूट आने वालों में बहुत बड़ी तादाद मामूली खातेपीते लोगों यानी गरीबों की रहती है. उन्हें जहां जगह मिल जाती है, ठहर जाते हैं और डुबकी लगा कर अपने घरों को वापस लौट जाते हैं.

चित्रकूट में दरजनों प्रसिद्ध मंदिर और घाट हैं, जिन का अपना अलगअलग महत्त्व है. हर एक मंदिर और घाट की कथा सीधे राम से जुड़ी है. कहा यह भी जाता है कि चित्रकूट में राम और तुलसीदास की मुलाकात हुई थी. इन्हीं सब बातों की वजह से यहां लगने वाले मेले में देश के दूरदराज के हिस्सों से श्रद्धालु आते हैं.

मेले में आए लोग श्री कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा भी जरूर करते हैं. लगभग 7 किलोमीटर की यह पदयात्रा करीब 4 घंटे में पूरी हो जाती है. 14 जनवरी को भी श्रद्धालु श्री कामदगिरि की परिक्रमा कर रहे थे, तभी कुछ ने यूं ही जिज्ञासावश पहाड़ी के नीचे झांका तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं.

इस की वजह यह थी कि पहाड़ी के नीचे की तरफ लगे बिजली के एक खंभे पर एक लड़की की लाश लटकी थी. शोर हुआ तो देखते ही देखते परिक्रमा करने वाले लोग वहां रुक कर लाश देखने लगे.

पुलिस को बुलाने या सूचना देने के लिए किसी को कहीं दूर नहीं जाना पड़ा. क्योंकि भीड़ जमा होने पर परिक्रमा पथ पर तैनात पुलिस वाले खुद ही वहां पहुंच गए. पुलिस वालों ने जब खंभे पर लटकी लड़की की लाश देखी तो उन्होंने तुरंत इस की खबर आला अफसरों को दी. कुछ ही देर में थाना नयापुरा के थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. पुलिस लाश उतरवाने में लग गई.

पुलिस काररवाई के चलते भीड़ यह निष्कर्ष निकाल चुकी थी कि लड़की अपने घर वालों के साथ आई होगी और खाईं में गिर गई होगी. लेकिन पुलिस ने जब खंभे से लाश उतारी तो न केवल पुलिस वाले बल्कि मौजूद भीड़ भी हैरान रह गई. क्योंकि तकरीबन 11-12 साल की लग रही उस लड़की के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था.

मुंह में कपड़ा ठूंसा होने पर मामला सीधेसीधे हत्या का लगने लगा. पुलिस भी यह मानने लगी कि हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी होगी. क्योंकि अभी तक आसपास के किसी थाने से किसी लड़की की गुमशुदगी की खबर नहीं आई थी.

चित्रकूट में लड़की की लाश मिलने की खबर आग की तरह फैली तो लोग तरहतरह की बातें करने लगे. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में बताया गया कि उस लड़की की हत्या गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धाराओं 302 और 201 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी.

उस वक्त चित्रकूट में बाहरी लोगों की भरमार थी. इसी वजह से लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. फिर भी पुलिस कोशिश में लग गई कि शायद कोई सुराग मिल जाए. अब तक की जांच से यह स्पष्ट हो गया था कि मृतका चित्रकूट की न हो कर कहीं बाहर की रही होगी.

इस तरह के ब्लाइंड मर्डर पुलिस के लिए न केवल चुनौती बल्कि सरदर्द भी बन जाते हैं. इस मामले में भी यही हो रहा था. हत्यारों तक पहुंचने के लिए लाश की शिनाख्त जरूरी थी.

पुलिस वालों ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज देखने का फैसला लिया, लेकिन यह भी आसान काम नहीं था, क्योंकि मकर संक्रांति के वक्त चित्रकूट में सैकड़ों कैमरे लगे हुए थे. यह जरूरी नहीं था कि सभी फुटेज देखने के बाद भी इतनी भीड़भाड़ में वह लड़की दिख जाए. पर सीसीटीवी फुटेज देखने के अलावा पुलिस के पास कोई और रास्ता भी नहीं था.

चित्रकूट में इस हत्या की चर्चा तेज होने लगी तो सतना के एसपी राजेश हिंगणकर ने मामला अपने हाथ में ले लिया. उन्होंने जांच में जुटी पुलिस के साथ बैठक की और कुछ दिशानिर्देश दिए. पुलिस टीम के लिए यह काम भूसे के ढेर से सुई ढूंढने जैसा था. पुलिस टीम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने में जुट गई. पुलिस की मेहनत रंग लाई.

12 जनवरी, 2018 की एक फुटेज में एक युवक और युवती के साथ वह लड़की दिखी तो पुलिस वालों की आंखें चमक उठीं.

उत्साहित हो कर पुलिस ने और फुटेज खंगालीं तो इस बात की पुष्टि हो गई कि जिस लड़की की लाश पुलिस ने बरामद की थी, वह वही थी जो फुटेज में युवकयुवती के साथ थी. यह फुटेज जानकीकुंड अस्पताल की थी, जहां युवक व युवती मरीजों वाली लाइन में लगे थे.

उस दिन स्नान के लिए वहां लाखों लोग आए थे. इसलिए यह पता लगाना आसान नहीं था कि वह युवक और युवती कहां के रहने वाले थे, इसलिए पुलिस ने ये फुटेज सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिए, जिस से उन तक जल्द से जल्द पहुंचा जा सके.

फुटेज सोशल मीडिया पर डालने के बाद भी पुलिस को उन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर हत्यारे का सुराग देने पर 10 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया. इसी दौरान पुलिस वालों ने जानकीकुंड अस्पताल के रजिस्टर की जांच भी शुरू कर दी थी.

अस्पताल में आए मरीज का नामपता जरूर लिखा जाता है लेकिन हजारों की भीड़ में यह पता लगा पाना मुश्किल काम था कि जो चेहरे कैमरे में दिख रहे थे, उन के नाम क्या थे. इस के बाद भी पुलिस वाले नामपते छांटछांट कर अंदाजा लगाने में लगे रहे कि वे कौन हो सकते हैं. इस प्रक्रिया में 25 दिन निकल चुके थे और लाख कोशिशों के बाद भी पुलिस के हाथ कामयाबी नहीं लग रही थी.

चित्रकूट के लोगों की दिलचस्पी भी अब मामले में बढ़ने लगी थी. उन्हें सस्पेंस इस बात को ले कर था कि देखें पुलिस कैसे हत्यारों तक पहुंचती है और पहुंच भी पाती है या नहीं.

अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज जिन नामों पर पुलिस ने शक किया और जांच की, उन में एक नाम उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के विजय और उस की पत्नी आरती का भी था. एसपी के निर्देश पर एक पुलिस टीम विजय के गांव ऐंझी पहुंच गई.

विजय से सीधे पूछताछ करने के बजाय पुलिस ने पहले उस के बारे में जानकारी हासिल की तो एक जानकारी यह मिली कि उस की 10-11 साल की एक बेटी नेहा भी थी, जो लगभग एक महीने से नहीं दिख रही है.

पुलिस ने चित्रकूट से लड़की की जो लाश बरामद की थी, उस की उम्र भी 10-12 साल थी. यह समानता मिलने पर पुलिस की जिज्ञासा बढ़ गई. इस के बाद पुलिस विजय के घर पहुंच गई. उस समय उस की पत्नी आरती भी घर पर मौजूद थी. पुलिस ने जब उन दोनों से उन की बेटी नेहा के बारे में पूछा तो वह बोले कि उन की कोई बेटी नहीं थी, केवल एक बेटा ही है.

उन की बातों से लग रहा था कि वह झूठ बोल रहे हैं क्योंकि उनके पड़ोसियों ने बता दिया था कि इन की 10-11 साल की एक बेटी नेहा थी, जो पता नहीं कहां चली गई है. इसी शक के आधार पर पुलिस विजय और उस की पत्नी आरती को चित्रकूट ले आई.

थाने में उन दोनों से जब पूछताछ शुरू हुई तो दोनों साफ मुकर गए कि उन की कोई बेटी भी है. तब पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई, जिस में उन के साथ 10-11 साल की बच्ची थी. फुटेज देखते ही दोनों बगले झांकने लगे. उसी समय दोनों ने आंखों ही आंखों में कुछ बात की और चंद मिनटों में ही बेटी की हत्या का राज उगल दिया.

पुलिस वाले यह जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि आरती का असली नाम सबीना शेख है और वह मुसलमान है. सबीना की शादी सन 2006 में उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के ही निवासी जाहिद अली से हुई थी. जाहिद से उसे 2 बच्चे हुए, पहली बेटी सिमरन और दूसरा बेटा साजिद जो 5 साल का है.

सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उस के साथ उस की कभी पटरी नहीं बैठी, क्योंकि सबीना किसी और को चाहती थी.

दरअसल सबीना और विजय एकदूसरे को बचपन से चाहते थे, लेकिन सबीना की शादी घर वालों ने उस की मरजी के खिलाफ जाहिद से कर दी थी, इसलिए सबीना जाहिद के साथ रह जरूर रही थी, लेकिन उसे वह दिल से नहीं चाहती थी.

उस ने तो अपने दिल में विजय को बसा रखा था. जब दिल नहीं मिले तो उन के बीच बातबेबात झगड़ा रहने लगा. अपनी कलह भरी जिंदगी सुकून से गुजारने की गरज से सबीना ने शादी के 9 साल बाद विजय को टटोला. उसे यह जान कर खुशी हुई कि विजय उसे आज भी पहले की तरह चाहता है और उसे बच्चों सहित अपनाने को तैयार है.

बस फिर क्या था बगैर कुछ सोचेसमझे एक दिन वह पति को बिना बताए विजय के साथ भाग गई. यह सन 2015 की बात है.  योजनाबद्ध तरीके से दोनों भाग कर ऐंझी गांव आ कर रहने लगे. सबीना अपने बच्चों को भी साथ ले आई थी, जिस पर विजय को कोई ऐतराज नहीं था.

अपने पुराने और पहले आशिक के साथ रह कर सबीना खुश थी. उधर जाहिद ने भी बीवी के गायब होने पर कोई भागदौड़ नहीं की, क्योंकि वह तो खुद सबीना से छुटकारा पाना चाहता था. सबीना अब हिंदू के साथ रह रही थी, इसलिए उस ने खुद का नाम आरती सिंह, बेटी सिमरन का नाम नेहा सिंह और बेटे साजिद का नाम बदल कर आशीष सिंह रख लिया था.

नए पति के साथ खुशीखुशी रह रही सबीना को थोड़ाबहुत डर अपने मायके वालों से लगता था कि अगर उन्हें पता चला तो वे जरूर फसाद खड़ा कर सकते हैं. साजिद उर्फ आशीष ने तो विजय को पापा कहना शुरू कर दिया था, लेकिन सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थी. सिमरन उर्फ नेहा चूंकि 10-11 साल की हो चुकी थी, इसलिए वह दुनियाजहान को समझने लगी थी. उस का दिल और दिमाग दोनों विजय को पिता मानने को तैयार नहीं थे.

आरती की बड़ी इच्छा थी कि नेहा विजय को पापा कहे. इस बाबत शुरू में तो आरती और विजय ने उसे बहुत बहलायाफुसलाया, लेकिन इस्लामिक माहौल में पली सिमरन हमेशा विजय को मामू ही कहती थी. जब इस संबोधन पर सबीना ने सख्ती से पेश आना शुरू किया तो वह सिमरन के इस मासूमियत भरे सवाल का कोई जवाब वह नहीं दे पाई कि आप ही तो कहती थीं कि ये मामू हैं, अब इन्हें पापा कैसे कह दूं. मेरे अब्बू तो दूसरे गांव में रहते हैं.

इस से विजय और सबीना की परेशानी बढ़ने लगी थी. वजह मामू और अब्बा के मुद्दे पर सिमरन बराबरी से विवाद और तर्क करने लगी थी. दोनों को डर था कि यह उजड्ड और बातूनी लड़की कभी भी उन का राज खोल सकती है क्योंकि गांव में कोई इन की असलियत नहीं जानता था. अगर गांव वाले सच जान जाएंगे तो धर्म के ठेकेदार इन का रहना और जीना मुहाल कर देते.

जब लाख समझाने और धमकाने से भी बात नहीं बनी यानी सिमरन विजय को पिता मानने को तैयार नहीं हुई तो खुद सबीना ने विजय को इशारा किया कि इस से तो अच्छा है कि सिमरन का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए. विजय भी इस के लिए तैयार हो गया.

दोनों ने मकर संक्रांति पर चित्रकूट जाने की योजना बनाई और सिमरन से कहा कि वहां तुम्हारी आंखों की जांच भी करा देंगे. सिमरन जिद्दी जरूर थी, पर इतनी समझदार अभी नहीं हुई थी कि सगी मां के मन में पनप रही खतरनाक साजिश को भांप पाती.

12 जनवरी, 2018 को चित्रकूट आ कर दोनों ने जानकीकुंड अस्पताल में सिमरन उर्फ नेहा की आंखों की फ्री जांच करवाई और उस दिन उन्होंने विभिन्न मंदिरों में दर्शन किए. 13 जनवरी, 2018 को इस अंतरधर्मीय परिवार ने चित्रकूट में परिक्रमा की और रात में नरसिंह मंदिर के प्रांगण में आ कर सो गए.

2 दिन घूमनेफिरने के बाद थकेहारे दोनों बच्चे तो जल्द सो गए, लेकिन दुनिया के सामने दोहरी जिंदगी जीते विजय और आरती उर्फ सबीना की आंखों में नींद नहीं थी. रात 12 बजे के लगभग दोनों ने गहरी नींद में सोई नेहा उर्फ सिमरन का गला मफलर से घोंट डाला.

उस के मर जाने की तसल्ली होने के बाद दोनों यह सोच कर लाश को झाडि़यों में फेंक आए कि सिमरन की लाश को जल्द ही चीलकौए और जानवर नोचनोच कर खा जाएंगे और उन के जुर्म की भनक किसी को भी नहीं लगेगी. लाश खाईं में गिराने के बाद वे दोनों बेटे को ले कर गाजियाबाद भाग गए और कुछ दिन इधरउधर भटकने के बाद ऐंझी पहुंच गए.

पहाड़ी से लाश गिराते समय इत्तफाक से नेहा की लाश का बायां पांव खंभे में उलझ गया और लाश लटकी रह गई.

9 फरवरी, 2018 को जब सारे राज खुले तो हर किसी ने इसे वासना के लिए ममता का गला घोंटने वाली शर्मनाक वारदात कहा. बात सच भी थी, जिस का दूसरा पहलू सबीना और विजय की यह बेवकूफी थी कि वे नाम बदल कर चोरीछिपे रह रहे थे.

सबीना जाहिद से तलाक ले कर सीना ठोंक कर विजय से शादी करती तो शायद सिमरन भी विजय को पिता के रूप में स्वीकार कर लेती, पर इसे इन दोनों की बुजदिली ही कहा जाएगा कि धर्म और समाज के दबाव से लड़ने के बजाय उन्होंने एक मासूम की हत्या कर के अपनी जिंदगी खुशहाल बनने का ख्वाब देख डाला. कथा संकलन तक दोनों जेल में थे. Crime Stories

Rajasthan News: पुलिस वाले ने पुलिस से परेशान हो कर खुदकुशी की

Rajasthan News: राजस्थान के नागौर जिले के सुरपालिया थाने के तहत आने वाले एक गांव बाघरासर में रविवार, 21 जनवरी, 2018 की सुबह डीडवाना एएसपी दफ्तर के ड्राइवर कांस्टेबल गेनाराम मेघवाल ने अपनी पत्नी संतोष और बेटे गणपत व बेटी सुमित्रा के साथ फांसी के फंदे पर झूल कर जान दे दी.

21 जनवरी, 2018 को सुबह के 4 बजे गेनाराम के लिखे गए सुसाइड नोट को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया. उस सुसाइड नोट पर गेनाराम समेत परिवार के सभी सदस्यों के दस्तखत थे. 5 पन्नों के उस सुसाइड नोट में एक पुलिस एएसआई राधाकिशन समेत 3 पुलिस वालों पर चोरी के आरोप में फंसाने, सताने व धमकाने को ले कर यह कदम उठाने का आरोप लगाया गया था.

सुसाइड नोट में लिखा था कि मार्च, 2012 में नागौर पुलिस लाइन में रहने वाले एएसआई राधाकिशन सैनी के घर में चोरी हुई थी. राधाकिशन ने गेनाराम, उस के बेटे गणपत और बेटे के दोस्तों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. उन दिनों गेनाराम नागौर में तैनात था. इस मामले में 2 बार एफआईआर हो चुकी थी. लेकिन तीसरी बार यह मामला फिर खुलवा लिया गया. इस के बाद गेनाराम ने कोर्ट में एफआईआर रद्द करने की याचिका लगाई, मगर वह कोर्ट से खारिज हो गई थी.

गेनाराम अपने आखिरी समय में एएसपी दफ्तर, डीडवाना में तैनात था. वहां वह दफ्तर के पास बने सरकारी क्वार्टर में परिवार के साथ रहता था. जांचपड़ताल में यह भी सामने आया  कि गेनाराम और राधाकिशन के बीच गांव ताऊसर में 18 बीघा जमीन को ले कर भी झगड़ा चल रहा था. इस मामले में भी अजमेर पुलिस के अफसरों ने जांच की थी. गेनाराम और उस के परिवार के तनाव की एक खास वजह यह भी थी.

गेनाराम का पिछले कुछ सालों में कई बार तबादला हुआ था. इस के चलते भी वह परेशान था. अपने सुसाइड नोट में उस ने एएसआई राधाकिशन सैनी पर बेवजह परेशान करने का आरोप लगाया था. गेनाराम के खिलाफ चोरी के मामले की जांच कर रहे नागौर सीओ ओमप्रकाश गौतम का कहना है कि मार्च, 2012 के इस मामले की जांच पहले भी सीओ लैवल के कई अफसर कर चुके थे. 2 बार एफआईआर भी कराई गई थी, लेकिन पिछले दिनों यह मामला फिर से खुलवाया गया था.

गेनाराम ने हाईकोर्ट में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कराने के लिए भी याचिका लगाई थी, लेकिन 8 जनवरी, 2018 को कोर्ट ने उस की यह याचिका खारिज कर दी थी. अपने सुसाइड नोट में गेनाराम ने परेशान करने के लिए जिस भंवरू खां का जिक्र किया है, वह रिटायर हो चुका है. गेनाराम के परिवार वालों ने राधाकिशन, उस की पत्नी, भंवरू खां और रतनाराम समेत 3-4 दूसरे लोगों के खिलाफ खुदकुशी करने के लिए उकसाने और दलित उत्पीड़न अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज कराया था.

लोगों ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराने और ताऊसर की 18 बीघा जमीन को सीज करने की मांग की है. यहां यह भी बताना जरूरी है कि राधाकिशन के घर में मार्च, 2012 में जब पुलिस लाइन, नागौर में चोरी हुई थी. तब राधाकिशन को गेनाराम की पत्नी संतोष ने ही चोरी होने की खबर दी थी. पर राधाकिशन और उस के परिवार ने गेनाराम और उस के बेटे गणपत व उस के साथियों पर ही चोरी करने का आरोप लगा दिया और मुकदमा दर्ज करा दिया.

जुर्म साबित नहीं होने के बाद भी दुराचरण रिपोर्ट भेजी गई. गेनाराम ने सुसाइड नोट में लिखा था, ‘हमारी किसी ने नहीं सुनी.’

इस मामले में तब सीओ द्वारा तलबी लैटर जारी किया गया था. दफ्तर पहुंचने पर राधाकिशन ने गेनाराम को फिर धमकाया. राधाकिशन कई सालों से एक ही दफ्तर में तैनात है. गेनाराम एएसपी दफ्तर में ड्राइवर था. नागौर जिला एसपी दफ्तर में मीटिंग होती थी, तो वही एएसपी को ले कर जाता था. एसपी दफ्तर में ही एएसआई राधाकिशन का दफ्तर था. वह गेनाराम को देखते ही धमकाता था. गेनाराम इस वजह से परेशान हो गया था.

गेनाराम और उस के बीवीबच्चे पढ़ेलिखे थे. उन्होंने क्यों नहीं कानूनी लड़ाई लड़ी? शायद उन की उम्मीद जवाब दे गई थी, तभी उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने में ही भलाई समझी और जहर पीने के बाद फांसी के फंदे पर झूल कर मौत के मुंह में जा पहुंचे. सुसाइड नोट में लिखी बातें पढ़ कर लोग हैरान रह गए कि पुलिस वाला भी पुलिस के कहर से नहीं बच सका. ऐसे पुलिस वालों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई इस तरह पूरा परिवार खत्म न हो.

गेनाराम के बेटे गणपत और बेटी सुमित्रा ने सीकर से पौलीटैक्निक का कोर्स किया था. इस के बाद से वे दोनों मातापिता के साथ डीडवाना में ही रह रहे थे. इस परिवार के बाकी सदस्यों का कहना है कि सुमित्रा की सगाई गांव धीरजदेसर में हुई थी, जबकि बेटे गणपत की सगाई गांव सोमणा में की गई थी.

कांस्टेबल गेनाराम के 10 सवाल, जो उस ने अपने सुसाइड नोट में लिखे थे, अब जवाब मांग रहे हैं :

* चोरी का सारा सामान मिल जाना और एफएसएल भी नहीं उठाना घटना का बनावटी होना जाहिर करता है.

* तांत्रिक के कहने, कांच में चेहरा देखने की बात के आधार पर अनुसंधान करना क्या सही है?

* जांच अधिकारी के सामने राधाकिशन द्वारा गणपत के साथ मारपीट की गई. गवाह होने के बाद भी एफआईआर दर्ज करा देना.

* एसपी दफ्तर में नियम विरुद्ध नौकरी करना.

* पुत्र के साथ मारपीट और बिना वारंट 2 दिन थाने में रखना सचाई पर कुठाराघात है.

* पुत्र गणपत अपराधी था तो उसे थाने में रख कर छोड़ा क्यों गया?

* अनुसंधान अधिकारी राजीनामे का दबाव बनाने में जुटे थे. मामला इसी के चलते पैंडिंग रखा गया.

* जांच में पहले पुत्र और फिर पूरे परिवार पर आरोप लगाना शक पैदा करता है.

* चोरी के सामान में मंगलसूत्र गायब बताया जो महिला हमेशा पहने रहती है.

* महिला ने मंगलसूत्र पहन रखा था तो उसे चोरी हो जाना क्यों बताया?

गेनाराम के पूरे परिवार समेत खुदकुशी करने का पता चला तो राधाकिशन, भंवरू खां और रतनाराम फरार हो गए.

कांग्रेस के संसदीय सचिव रह चुके गोविंद मेघवाल ने बताया, ‘‘दलितों पर जोरजुल्म बढ़ रहे हैं. समाज को एकजुट होना पड़ेगा. यह पुलिस और वसुंधरा सरकार की नाकामी है. हमारा समाज इस पर विचार कर रहा है.’’ Rajasthan News

Punjab Murder Case: पत्नी को गंडासे से काट डाला

Punjab Murder Case: एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया. एक पति ने शक के चलते अपनी ही पत्नी की बेरहमी से हत्या कर दी. आखिर ऐसा क्या हुआ कि बात इतनी बढ़ गई? किस वजह से एक हंसताखेलता परिवार खूनखराबे में बदल गया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली घटना की पूरी कहानी, जो रिश्तों में पनपते अविश्वास के खतरनाक परिणामों से सावधान करती है.

यह वारदात पंजाब के संगरूर जिले के पास स्थित गांव खंडेबाद की है. मंगलवार को गांव में उस समय हड़कंप मच गया जब कुलदीप सिंह ने अपनी पत्नी हरकीरत कौर उर्फ गीतू पर घर के बेडरूम में तेजधार गंडासे से ताबड़तोड़ हमला कर दिया. पत्नी के चरित्र पर संदेह को ले कर दोनों के बीच तनाव बताया जा रहा है. गुस्से में आ कर कुलदीप ने एक के बाद एक वार किए, जिस से हरकीरत की मौके पर ही मौत हो गई.

हैरानी की बात यह है कि वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी ने घटना का वीडियो भी बनाया. वीडियो में उस ने अपना जुर्म कुबूल किया और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया. इस के बाद वह खुद थाना लहरागागा पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया.

घटना की सूचना मिलते ही डीएसपी रणबीर सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे. बेडरूम का दृश्य दिल को झकझोरने वाला था. खून से लथपथ शव बिस्तर के पास जमीन पर पड़ा था, जबकि पास में ही वारदात में इस्तेमाल किया गया गंडासा भी मिला. पुलिस ने तुरंत शव और हथियार को कब्जे में ले कर आगे की काररवाई शुरू की. फोरैंसिक टीम ने मौके पर पहुंचकर साक्ष्य जुटाए और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुलदीप सिंह गांव के पूर्व कार्यकारी सरपंच तरसेम सिंह का बेटा है. उस की शादी हरकीरत कौर के साथ हुई थी और दोनों के 3 बच्चे हैं. 2 बेटियां और एक बेटा. शुरुआती जांच में सामने आया है कि आरोपी लंबे समय से अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करता था. इसी शक ने आखिरकार इस खौफनाक वारदात का रूप ले लिया.

फिलहाल पुलिस ने कुलदीप सिंह के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जांच जारी है. Punjab Murder Case

UP Crime News: अवैध संबंधों के चलते पति की कुल्हाड़ी से हत्या

UP Crime News: एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिस ने पारिवारिक रिश्तों को झकझोर कर रख दिया. आरोप है कि पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी. आखिर ऐसी क्या वजह बनी थी कि मामला हत्या तक पहुंच गया? इस सनसनीखेज वारदात के पीछे की पूरी कहानी क्या है? आइए जानते हैं विस्तार से, ताकि रिश्तों में पनपते अविश्वास और गलत फैसलों के खतरनाक परिणाम समझे जा सकें.

यह घटना उत्तर प्रदेश के इटावा जिले से सामने आई है. जहां रात के समय पूजा ने अपने प्रेमी अर्पित के साथ मिलकर पति रनवीर सिंह यादव पर कुल्हाड़ी से हमला कर हत्या कर दी. बताया जाता है कि करीब 8 साल पहले रनवीर की शादी मथुरा निवासी पूजा से हुई थी. वैवाहिक जीवन की शुरुआत से ही दोनों के संबंध तनावपूर्ण रहे. कुछ समय बाद पूजा मायके चली गई थी. करीब 3 साल बाद रनवीर उसे समझाकर वापस अपने साथ ले आया था.

गांव में रहने वाले अर्पित, जो सर्वेश का बेटा है, का उस के घर पर आनाजाना था. इसी दौरान पूजा और अर्पित के बीच नजदीकियां बढ़ीं. पति की गैरमौजूदगी में मुलाकातें बढ़ती गईं और दोनों के संबंधों की चर्चा धीरेधीरे गांव में फैलने लगी. जब रनवीर को इन संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने इस का विरोध किया.

एएसपी (ग्रामीण) श्रीशचंद्र के अनुसार, रविवार को कथित तौर पर पूजा ने अर्पित को घर बुलाया. पहले रनवीर को शराब पिलाई गई और फिर रात करीब 8 बजे उस पर घर के भीतर कुल्हाड़ी से कई वार किए गए. हमले की गंभीरता के चलते रनवीर की मौके पर ही मौत हो गई.

सोमवार सुबह जब उस के पिता लाखन सिंह घर पहुंचे तो उन्होंने चबूतरे पर बेटे का खून से लथपथ शव पड़ा देखा. पास ही खून से सनी कुल्हाड़ी भी पड़ी थी.  घटना के बाद पूजा और अर्पित फरार हो गए थे.

मृतक के भाई प्रदीप उर्फ लालू की शिकायत पर पुलिस ने पूजा, उस के प्रेमी अर्पित और अर्पित के पिता सर्वेश के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है. आरोपियों की तलाश में 3 पुलिस टीमें गठित की गईं. मंगलवार सुबह करीब सवा 10 बजे भरथनाबिधूना रोड स्थित अहनैया नदी के पास से पूजा और अर्पित को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ के दौरान पूजा ने स्वीकार किया कि अवैध संबंधों का पति द्वारा विरोध किए जाने के कारण उस ने साजिश रचकर यह कदम उठाया. फिलहाल पुलिस मामले की विस्तार से जांच कर रही है. UP Crime News

Social stories: एक नया कौंसेप्ट भाबीजी घर पर हैं

Social stories: आजकल टीवी मनोरंजन का सब से बड़ा साधन है. लेकिन टीवी पर अच्छे मनोरंजक प्रोग्राम कभीकभी ही नजर आते हैं. ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ऐसा सीरियल है, जिसे हर दृष्टि से मनोरंजक कहा जा सकता है. साथ ही सोद्देश्य भी.

टी वी जिसे दूरदर्शन के जमाने में बुद्धू बक्सा कहा जाता था, अब बुद्धू नहीं रहा. बुद्धू इसलिए नहीं क्योंकि अब यह स्मार्ट बन कर मोटी कमाई करने लगा है. लाखों लोगों की रोजीरोटी चलाने लगा है. और हां, अच्छे पढ़ेलिखों को बेवकूफ भी बनाने लगा है. कमाई को देखते हुए अब कभी के इस बुद्धू बक्से पर दर्जनों इंटरटेनमेंट चैनल आ गए हैं. न्यूज चैनलों की तो भरमार है ही. टीवी पर तमाम प्रोग्राम बने हैं, बन रहे हैं. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे लेकिन अपनेअपने कंटेंट के हिसाब से चलते सब हैं. वैसे यह सब भी चैनल्स पर निर्भर करता है कि किस प्रोग्राम को कितने दिन चलाना है, दर्शकों पर नहीं. अब कलर्स के ‘बालिका वधू’ को ही ले लीजिए, जो एक अच्छे उद्देश्य, अच्छी कहानी और अच्छे कलाकारों के साथ शुरू हुआ था.

लोगों ने इसे पसंद भी किया लेकिन अब बोझ से लगने वाले इस सीरियल को चैनल रबर की तरह खींचे जा रहा है. टीआरपी से भी उसे कोई लेनादेना नहीं. कहानी तो मूल कहानी से भटक कर कहीं से कहीं चली ही गई, कलाकार भी वक्तवक्त पर बदलते रहते हैं. शुरू की बालिका वधू भी अब जवान हो गई.

ऐसा नहीं है कि दूरदर्शन या दूसरे चैनल्स पर अच्छे प्रोग्राम्स नहीं आते. कई यादगार सीरियल्स आए. दूरदर्शन के ‘हमलोग’, ‘बुनियाद’, ‘ये जो जिंदगी’, ‘कथा सागर’ और ‘तमस’ को भला कौन भूल सकता है. जहां सवाल दूसरे इंटरटेनमेंट चैनल्स का है तो उन पर सिर्फ इंटरटेनमेंट (उन के हिसाब से) रचा जाता है. इस इंटरटेनमेंट में अगर आप समाज या परिवार के लिए कोई मैसेज ढूंढने लगें तो यह सिर्फ एक छलावा ही साबित होगा. अलबत्ता भव्यता जरूर आप को प्रभावित करेगी.

भव्यता इसलिए क्योंकि यह व्यवसाय का एक हिस्सा है. विज्ञापन देने वाली कंपनियों को अपना प्रचार कर के अपने प्रोडक्ट बेचने होते हैं. जाहिर है, सौंदर्य प्रसाधन सजीधजी महिलाओं को देख कर खरीदे जाते हैं और घरेलू प्रोडक्ट जगमगाते बड़ेबड़े घरों को देख कर पसंद किए जाते हैं. इस चक्कर में सीरियल्स की कहानी कहीं गौण हो जाती है, रह जाते हैं गोलगोल घूमते दृश्य. रियलिटी शोज और कौमेडी शोज का हाल भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इन के अपने अलग दर्शक होते हैं. जहां सवाल कौमेडी शोज का है तो इन में दर्शकों को हंसाने के नाम पर ज्यादातर अश्लीलता ही परोसी जाती है. लाफ्टर चैलेंज, कौमेडी सर्कस सीरीज, कौमेडी क्लासेज, कौमेडी नाइट्स बचाओ जैसे कौमेडी शोज में ह्यूमर नाममात्र का और अश्लीलता अधिक नजर आती थी.

हां, कपिल शर्मा का ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ अपने कौंसेप्ट और कपिल की माइंड औफ प्रजेंस की वजह से कामयाब जरूर रहा. लेकिन अब इस में भी सेंस और ह्यूमर की कमी नजर आने लगी है. कह सकते हैं कि इस से भी अब दर्शकों का मोह भंग होने लगा है. इसी सब के बीच 2 मार्च, 2015 से एंड टीवी पर एक शो शुरू हुआ है, ‘भाबीजी घर पर हैं’. कौमेडी टच वाले इस शो में लंपटपन तो है लेकिन सेंस औफ ह्यूमर भी है. खास बात यह है कि इस शो में कलाकारों का चयन बहुत सोचसमझ कर किया गया है.

मसलन, शिल्पा शिंदे यानी अंगूरी सीधीसादी खूबसूरत महिला के रूप में एक अलग ही तरह का करेक्टर है, जो अंगरेजी के शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाती. जब उस का पति जगमोहन तिवारी या लंपट पड़ोसी विभूति नारायण मिश्रा उस के गलत उच्चारण को सही करते हैं तो अनायास उस के मुंह से निकल जाता है ‘सही पकड़े हैं’. सही मायनों में देखा जाए तो यही तीन शब्द अंगूरी के करेक्टर की जान हैं.

वैसे बात बोलने के अंदाज की हो, अदाओं की हो या फिर चलनेफिरने की. निस्संदेह शिल्पा शिंदे ने अपने करेक्टर के लिए बहुत मेहनत की होगी. सीरियल की दूसरी महिला यानी अनीता भाभी का करेक्टर भी भूमिका के हिसाब से कम नहीं है. ग्रूमिंग क्लास चलाने वाली यह महिला स्टाइलिश भी है और अपने निठल्ले पति विभूति को अपने कंट्रोल में भी रखती है. यह भूमिका सौम्या टंडन ने निभाई है जो पहले ही कई शो कर चुकी हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ के सब से मंझे हुए कलाकार हैं आशिफ शेख, जो करीब 65 फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं. अंगरेजी, उर्दू और हिंदी तीनों ही भाषाओं पर उन की अच्छी पकड़ है. विभूति नारायण मिश्रा की भूमिका को वह एक लंपट पति के रूप में बखूबी निभा रहे हैं. अंगूरी के पति जगमोहन तिवारी की भूमिका रोहिताश गौड़ ने निभाई है. रोहिताश भी दर्जनों फिल्मों और सीरियल्स में काम कर चुके हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ का कौंसेप्ट दरअसल इस अधार पर रखा गया है कि पत्नी भले ही कितनी खूबसूरत और सुशील क्यों न हो, लंपट पति पड़ोसी की पत्नी पर लाइन मारने से बाज नहीं आता. इस सीरियल में भी कुछ ऐसा ही है. विभूति नारायण मिश्रा की नजर मनमोहन तिवारी की पत्नी अंगूरी पर है और मनमोहन तिवारी की निगाह विभु की पत्नी अनीता पर. जाहिर है, दोनों ही लंपट स्वभाव के हैं, लेकिन अंदर ही अंदर संस्कारी भी हैं. इसी वजह से दोनों में से कोई भी अपने मन की बात नहीं कह पाता. दूसरी ओर दोनों महिलाएं पूरी तरह संस्कारी भी और अपनेअपने पतियों को प्यार करने वाली भी हैं. इसलिए जरूरत पड़ने पर दोनों मिल कर अपने ढंग से बिगड़े हुए पतियों को लाइन पर भी लाती हैं.

इस सीरियल का तानाबाना पड़ोसी की पत्नी पर नजर रखने वाले पतियों की पंचलाइन के साथ बुना गया है. कहानी कोई एक नहीं है. हर दूसरे तीसरे एपीसोड के बाद कहानी बदल जाती है. विषय भी सामाजिक और आम आदमी की जिंदगी से जुडे़ होते हैं, जिन्हें चंद कलाकारों के माध्यम से रोचक बनाने की कोशिश की जाती है. पृष्ठभूमि चूंकि कानपुर की रखी गई है, इसलिए ज्यादातर जगहों पर स्थानीय भाषा का ही इस्तेमाल किया जाता है. छोटी सी जगह, दो मामूली से घरों, चाय की दुकान और एक गली को सेट बना कर ऐसा धारावाहिक खड़ा करना जिसे सब पसंद करें, आसान नहीं है.

विभूति नारायण मिश्रा और मनमोहन तिवारी, जिस का कच्छेबनियान का बिजनैस है, एकदूसरे को कभी नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं तो कभी एकदूसरे को उस की बीवी की नजरों में गिराने की, ताकि वे एकदूसरे की बीवी की नजरों में श्रेष्ठ बन जाएं. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि उन्हें कहीं न कहीं मात खानी पड़ती है. कहानी को आगे बढ़ाने के लिए सीरियल में बीचबीच में दूसरे करेक्टरों को भी लाया जाता है. इन में एक करेक्टर है सक्सेना, जिस ने खुद को पागल घोषित कर रखा है और पागलपन के लिए बिजली के शाक लेता है. कोई उसे थप्पड़ मारता है तो वह ‘आई लाइक इट’ बोलता है यानी उसे पिटने से शाक मिलता है जो उसे अच्छा लगता है.

उस का बोलने का अंदाज और मासूमियत भरी हास्यप्रद बातें सहज ही प्रभावित करती हैं. दूसरा करेक्टर है दरोगा हप्पू सिंह का, जिस के माथे पर तेल वाले बालों की लटें लटकी रहती हैं. दरोगा हप्पू सिंह जब अपने 9-9 ठैंया बच्चों और प्रेग्नेंट बीवी के नाम पर न्यौछावर मांगता है तो उस के इस अंदाज में रिश्वत मांगना नहीं, बल्कि हास्य का पुट ज्यादा नजर आता है. उस के इस तरह रिश्वत मांगने पर कानूनव्यवस्था पर गुस्सा नहीं आता बल्कि हप्पू सिंह पर प्यार आता है. हप्पू सिंह का उठतेबैठते ‘अरे दादा’ बोलना भी एक अलग तरह का हास्य और चुटीलापन पैदा करता है. साथ ही अनीता को गोरी मैम कहना भी, जिसे सुन कर विभूति नारायण मिश्रा चिढ़ता है.

कहानी आगे बढ़ाने के लिए दो छिछोरों मलखान और टेका के अलावा एक सब्जी वाले को भी रखा गया है, जिन के रोल तो खास नहीं हैं, पर मन को भाते हैं. लेखक ने अपनी कल्पना का कमाल दिखाया है 2 करेक्टरों को रचने में. इन में एक है रिक्शावाला पेलू जिस के चेहरे पर कोई भाव नहीं आता, जो बोल नहीं सकता. अलबत्ता कुछ पूछने पर वह अपने कानों पर बंधे अंगोछे से कागज की परची निकाल कर देता है जिस पर कुछ न कुछ चुटीला लिखा होता है. मानो उसे पहले ही पता हो कि उस से क्याक्या पूछा जा सकता है. पेलू का करेक्टर बिना भाव, बिना कुछ बोले भी बहुत कुछ कह जाता है.

दूसरा करेक्टर है मनमोहन तिवारी की मां का जो कहीं दूर अलग रहती हैं और अपनी बहू अंगूरी को बहुत प्यार करती हैं. तिवारी मां से बहुत डरता है जबकि अंगूरी मां को ही पति के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है. तिवारी की मां भले ही एक फ्रेम में नजर आती है, पर वह उसी में ऐसा कुछ कर जाती है कि हास्य खुद उभर आता है. मसलन छज्जे पर खड़े हो कर अंगूरी से बतियाना, तिवारी को बैल कहना, बात खत्म होते ही उस के हाथ से टकरा कर कोई चीज नीचे गिरना, नीचे किसी का चिल्लाना और उस का तुरंत वहां से हट जाना, जैसी बातें अलग तरह का हास्य पैदा करती हैं.

‘भाबीजी घर पर हैं’ में कहींकहीं तो इतने अच्छे पंच होते हैं जो मानव मन पर गहरे तक असर करते हैं. मसलन, इस सीरियल के एक एपिसोड में अनीता भाभी ब्लड डोनेशन कैंप लगाती है. उस के पति के अलावा सभी अनीता को प्रभावित करने के लिए ब्लड डोनेट करते हैं. उस का खास आशिक तिवारी तो 2 बार बेहोश हो जाने के बाद भी कई बार ब्लड डोनेट करता है.

इस मामले में दरोगा हप्पू सिंह भी पीछे नहीं रहता. वह एक कैदी का 2 बोतल खून निकलवा कर ले आता है और उसे अपना बताता है. उधर कैदी कहता है, ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, लेकिन आजकल तो लोग खून चूस कर भी आजाद नहीं करते.’

यह बात नेताओं और अफसरों के लिए बहुत सटीक है.

खास बात यह है कि दो लंपट पुरुषों और उन की पत्नियों के इर्दगिर्द बुनी गई सामाजिक सरोकार वाली इस सीरियल की कहानियों में भले ही कुछ खास न हो पर अश्लीलता बिलकुल नहीं है. हां, चुटीलापन जरूर है जो दर्शकों को बांधे रखता है. कई सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य भी इस में नजर आता है. किसी भी विषय को इस तरह संदेश के साथ हास्य में बांध देना हंसीखेल नहीं है. आज के समय में जब अच्छे सीरियल्स देखने को नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में यह सीरियल ‘भाबीजी घर पर हैं’ एक ताजे हवा के झोंके की तरह है जो मनोरंजन की प्राणवायु देता है. साथ ही यह भी बताता है कि भव्यता से इतर कम संसाधनों में भी अच्छा काम किया जा सकता है. बस करने वाला चाहिए.  Social stories

Hindi Kahani: छिताई का कन्यादान

Hindi Kahani: राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. वह दिन में अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. दोनों का प्रेम अमर था. लेकिन सुलतान अलाउद्दीन ने छिताई पर नजर डाली तो सब कुछ गड़बड़ा गया. इस के बावजूद दोनों मिल कर ही रहे.

सुलतान अलाउद्दीन खिलजी बुरी तरह फंस गया था. उसे गुमान नहीं था कि यादव राजा रामदेव की दासियां इतनी तेज हैं कि उड़ती चिडि़यों को पहचान ही नहीं लेतीं, जमीन से उन के कान भी काट लेती हैं. अलाउद्दीन अपना नाम सुन कर भागना चाहता था, मगर वह औरत जो दासी मालूम पड़ती थी, उस से अधिक फुर्तीली निकली. उस ने अपनी कमर में बंधी कमंद को भागने वाले पर निशाना लगा कर फेंका. भागने वाला कमंद में फंस कर रह गया. उस की मुश्कें कस चुकी थीं और वह अपनी कमर में एक ओर बंधे नेजे को निकाल नहीं पा रहा था.

तब तक वह औरत एकदम रूबरू आ खड़ी हुई. बोली, ‘‘कटारी मेरे पास भी है बादशाह सलामत. हथियार मत इस्तेमाल कीजिए वरना पछताइएगा. मैं जरा भी आवाज दूंगी तो हमारे सिपाही दौड़े आएंगे. आप के इस तरह पकड़े जाने पर आप की फौज को भागने का रास्ता न मिलेगा, जान लीजिए.’’

अलाउद्दीन खूब अच्छी तरह जानता था कि वह चालाक औरत एकदम सही कह रही थी. उस के पकड़े जाते ही लड़ाई का पासा पलट जाएगा. चाहे बाद में दिल्ली की फौज उसे छुड़ा ले, इस राज्य को नूस्तनाबूद कर दे, मगर उस पर जो धब्बा लग जाएगा, वह फिर न मिटेगा. यह भी हो सकता है कि राजा रामदेव उसे हाथियों से कुचलवा दें या भयानक खाई में फेंकवा दें. वह एकबारगी सिहर उठा. उस ने अपनी हेकड़ी में अकेले इधर आ कर कितनी बड़ी गलती की है. राघो (राघव) चेतन से अलाउद्दीन का प्रस्ताव सुन कर राजा रामदेव का उबल पड़ना बिलकुल वाजिब था.

राघव ने मना किया था कि वह सांप के बिल में न घुसे. मगर सुलतान को अपनी सूझबूझ और बहादुरी पर कुछ ज्यादा ही इत्मीनान हो गया था. अब वह क्या कर सकता था, सिवाय गिड़गिड़ाने के. न जाने यह शैतान की खाला क्या गुल खिलाएगी?

चापलूसी और चालाकी में अदाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप तो बेकार नाराज हो रही हैं. मैं तो शिकार करने आया था. सोचा, कोई परिंदा है. इसी वास्ते लपका था. बताइए, मैं आप की क्या खिदमत कर सकता हूं?’’

उस दासी ने, जिस का नाम मैनरूह था, जवाब दिया, ‘‘सेवा तो हमारे महाराज आप को बताएंगे. मैं क्या बताऊंगी? बस, अब आप चले चलिए चुपचाप.’’

बड़ी आजिजी से अलाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप खामखा नाराज हो रही हैं. शाम हो रही है. मुझे नमाज पढ़ना है. आप जानती हैं. मशहूर है, मैं दीन ईमान का पाबंद और मजहबी सुलतान हूं. मैं इस वक्त खजाने के साथ तो नहीं आया. मगर मेरा ईमान मेरे साथ है. मैं आप को रानी बना दूंगा. जितनी चाहिए, दौलत मैं आप को दे दूंगा. गले का हार बतौर इत्मीनान अभी दे दूंगा. बस मुझे आजाद कर दीजिए.’’

दासी मैनरूह ने सख्ती से उत्तर दिया, ‘‘सुलतान, माफ करना, जिस इंसान को जिस चीज की भूख होती है, उसे वही हर कदम पर याद आती है. आप के पास अगर सही मायने में दौलत होती तो आप मुझे यह लालच न देते. मेरे महाराज ने आज तक किसी को इस तरह का लालच नहीं दिया, क्योंकि देवगिरि देवताओं और ऋषियों का बसाया है. यहां जीने वाली ताउम्र रानी रहती है. मुझे क्या कमी है, जो आप मुझे देंगे? आप को महाराज के सामने जरूर ले जाऊंगी. वही न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन एकदम घबरा उठा. उसे यह अंदाज हो गया था कि यह दासी गरीब हो या न हो, मगर अपने मजहब में और अपने स्वामी राजा रामदेव में विश्वास रखती है. उस ने चट दूसरा पासा फेंका, ‘‘आपा जान, आप ने मेरी बात समझी नहीं. मैं आप को आप के ईमान से रत्ती भर नहीं डिगाना चाहता. आप सोचिए, एक बहन के जरिए एक सुलतान को बेबस बना कर दरबार में पेश किया जाए तो क्या उस के लिए यह डूब मरने की बात नहीं है? मैं इसी तालाब में कूद कर जान दे दूंगा, मगर अपनी शान में हरगिज बट्टा नहीं लगने दूंगा. आप मुझे जिंदगी नहीं दे सकतीं, तो क्या? आप मेरी मौत नहीं रोक सकतीं. अगर ऐसा हो गया तो आप को आप की सौगंध है, आप हमेशा अपने पाप में झुलसती रहेंगी. एक मजहबी सुलतान को आप ने बिना लड़े या चेतावनी दिए धोखे से पकड़ लिया है.’’

मैनरूह एक बार कांप गई. अगर अलाउद्ीन तालाब में कूद पड़ा, या उस ने हीरा चूस लिया या सीने में छुरी घोंप ली और मर गया तो इस का पाप किसे लगेगा? उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘नहीं नहीं, तुम हमारे महाराज का भेद लेने यहां आए थे. मैं पेश कर दूंगी. वही तुम्हारा न्याय करेंगे.’’

अलाउद्दीन के मन में उम्मीद जगी. बोला, ‘‘अगर मुझे भेद लेने के लिए आना होता तो खुद अकेले बिना तलवार क्यों आता? मैं तो आप लोगों के ईमान को जानता हूं. आप कभी किसी निहत्थे को नहीं छुएंगे. यह आप के धरम का कौल है. भेद लेने के वास्ते मैं भेष बदल कर अपने लोगों को भेजता. मैं तो बस चिडि़यों का शिकार करता हुआ यहां आया था. आप ने देखा होगा बड़ी बी.’’

मैनरूह बोली, ‘‘मैं तो बस यही जानती हूं कि आप का न्याय अब हमारे महाराज करेंगे.’’

अलाउद्दीन ऐसे उछला, जैसे वह कमंद सहित लहराते तालाब में कूद जाएगा. कहने लगा, ‘‘बस, मैं ने जान लिया. मेरी जिंदगी आज तक की थी. मेरी मौत का पाप आप के सिर. अलविदा.’’

मैनरूह फिर घबराई. बोली, ‘‘सुलतान, आप उतावले क्यों हैं? मैं महाराज के पास ले चलती हूं.’’

अलाउद्दीन रुआंसा हो कर बोला, ‘‘अगर महाराज के सामने जा सकता तो आप से दया की भीख क्यों मांगता? आप को अपनी बहन बनाया. आप अपने बड़े भाई की इज्जत को खाक मत कीजिए. आप यही चाहती हैं कि मैं घेरा उठा लूं. मैं अपनी फौज ले कर यहां से चला जाऊंगा.’’

मैनरूह चाहती तो यही थी. खुद महाराज रामदेव भी यही चाहते थे. मगर मैनरूह महाराज की प्रजा ही नहीं थी, बल्कि राजकुमारी छिताई की दासी भी थी. सब से बढ़ कर वह एक औरत होने से उस की पीड़ा को जानती थी. उस ने रुखाई से कहा, ‘‘बहन बनाया है तो यही मेरी इच्छा नहीं है. इस से भी बड़ी इच्छा है. वह पूरी होनी हो तो बताऊं.’’

अलाउद्दीन के बहुत आग्रह करने पर उस ने कहा, ‘‘राजकुमारी छिताई मेरी बेटी की तरह है. आप भी उसे अपनी बेटी मानिए और दोस्ती कर के तब आदर से जाइए.’’

अलाउद्दीन एकदम आसमान से गिरा. छिताई ही नहीं मिली तो इस जद्दोजहद से क्या हासिल? तो भी वह आजाद तो होना ही चाहता था. उस का खून खौल रहा था. मगर किसी तरह इस खूसट औरत को टालना भी था. उस ने कहा, ‘‘जब तुम कहती हो तो इस में कौन सी मुश्किल है. मैं तुम्हारी बात मान लेता हूं.’’

मैनरूह अलाउद्दीन से भी चालाक निकली. दृढ़ता से बोली, ‘‘बादशाह, इस में एतबार की तो नहीं, इत्मीनान की बात है. आप उस मसजिद की ओर रूबरू हो कर कुरान पाक की कौल ले कर कहिए कि छिताई को मैं अपनी बेटी मानता हूं. तभी मैं हुजूर को छोड़ पाऊंगी.’’

अलाउद्दीन दांत पीस कर रह गया. उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. अंधेरा होता जा रहा था. चारों तरफ वे परिंदे हौसले से बोल रहे थे, जिन का शिकार करने वह आया था. लगा, जैसे वे उस की बेबसी पर कलरव कर रहे हों. क्यों वह इस शहर की चहारदीवारी में आया? उसे क्या मालूम था कि यादव राजा रामदेव तो सीधा है, मगर उस के कारकुन बाज की मानिंद चालाक हैं. वह इस एकांत बाग में चिडि़यों का शिकार खेलने लगा. शिकार के बजाय शैतान की खाला गले पड़ी, जिसे इसलाम के सब कायदेकानून मालूम हैं. अगर इस ने इस वक्त राजा रामदेव के सामने उसे खड़ा कर दिया तो बेशक वह उस के सर को कलम करा देगा.

अपनी लड़की के बारे में राघव चेतन की बात सुन तो वह बिफर रहा होगा. सुलतान ने हड़बड़ा कर मसजिद की तरफ मुंह किया और बोला, ‘‘मैं अपने रसूल व कुरान पाक की कसम उठाता हूं, मैं हमेशा छिताई को अपनी बेटी की मानिंद मानूंगा.’’

यह सुन कर मैनरूह बहुत खुश हुई. उस ने झुक कर सलाम किया और सविनय अपनी गुस्ताखी के लिए क्षमा मांगते हुए सुलतान के बंधन खोल दिए. आजाद होते ही एक बार फिर अलाउद्दीन का खून खौल उठा. उस के जी में आया, कमर के नेजे को निकाल कर अभी इस औरत को मार डाले. मगर उस ने अपने को रोका. अगर यह एक बार भी चीखी तो दर्जनों लोग आ कर अलाउद्दीन को पकड़ लेंगे. अगर न भी चीख पाए तो उस के खून के कुछ धब्बे उस के कपड़ों पर पड़ेंगे, जिस से बादशाह फिर खतरे में पड़ सकता है. किले की घेरेबंदी में होने से तमाम चौकसी चारों तरफ होगी. खून का घूंट पी कर सुलतान बोला, ‘‘बड़ी बी, आप ने वही किया, जो आप का फर्ज था. अब आप मुझे महफूज बाहर निकलने में मदद कीजिए.’’

मैनरूह ने फिर क्षमा मांगी. बोली, ‘‘आप ने मुझे बहन कहा तो मेरा कर्तव्य है कि मैं आप की सहायता करूं. बस आप कुछ बोलिएगा नहीं. मुझे सब पहचानते हैं. मुझे कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’

मैनरूह चलने लगी. पीछे चलते सुलतान को फिर नेजे का खयाल कौंधा. मगर उस ने मन मार लिया. उल्टे उस ने एक मोती की माला निकाली और मैनरूह को नजर करनी चाही. मगर उस सजग दासी ने कान पकड़ कर कहा, ‘‘हुजूर, आप ने मुझे बहन का रिश्ता बख्शा, मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’

बारबार कहने पर भी दासी ने स्वीकार नहीं किया. बोली, ‘‘जब आप दिल्ली बुलाएंगे तो ले लूंगी.’’

सचमुच मैनरूह का सब अदब कर रहे थे. उस ने गेट खुलवाया. शहर के फाटक से बाहर होते ही अलाउद्दीन जो भागा तो उस ने अपनी छावनी में जा कर ही दम लिया. वहां उस की खोज हो रही थी. उस शाम जो गुजरी, उस ने ताउम्र किसी के सामने उस का खुलासा नहीं किया. उस ने इस बात का बारबार शुक्र अदा किया कि पकड़ लिए जाने पर भी मैनरूह ने उस की बिना किसी को कानोंकान खबर हुए रिहाई करा दी थी.

जब अलाउद्दीन ने खापी लिया तो राघव चेतन लौट आया. बादशाह को बाखैरियत देख कर उस की जान में जान आई. उस की आपबीती बहुत खराब थी. राजा रामदेव आपे से बाहर हो गया था. किसी म्लेच्छ को कन्यादान करना उस की कल्पना के बाहर था. तो भी उस ने दूत के नाते राघव चेतन को जाने दिया था. दूतियां उस के बाद लौटीं. उन्होंने बताया कि औरों की तरह रामदेव के रनिवास में भी सब मरने को तैयार हैं, परंतु मुसलमानों के हाथ में पड़ने को नहीं. चित्तौड़ में पद्मिनी के जौहर और रणथंभौर में राजपूतों के बलिदान को वह भूला नहीं था. जब छिताई नहीं मिलनी है तो घेरा डालने से क्या फायदा? देवगिरि को लूटने का काम तो वह बरसों पहले ही कर चुका था. सोते समय वह सारी बातों पर विचार करने लगा.

कई साल हो गए. उस ने पहलेपहल नुसरत खां को सेनापति बना कर देवगिरि को खूब लूटा था. फिर वह राजा रामदेव को भी दोस्ती का लालच दे कर दिल्ली ले गया था. बीती बातें उस के मन में कौंध रही थीं…

पराजय की चिंता में राजा रामदेव ने दौलत देने में कसर नहीं की थी. अलाउद्दीन रामदेव को मोहरा बना कर दक्खिन की अकूत दौलत, जो दक्खिनी राजाओं के पास थी, हासिल करना चाहता था. रामदेव बूढ़ा हो रहा था, सोचता था कि अलाउद्दीन से आश्रय पा कर वह पड़ोसी राजाओं को दबा सकेगा. अलाउद्दीन ने दिल्ली में अपने सिपहसालार उलूम खां को राजा के स्वागत में भेजा था और दरबार में खूब आवभगत की थी.

दरबार के स्वागतसत्कार, ठाठबाट और रागरंग में 3 साल बीत गए. रामदेव को पता ही नहीं चला. जब देवगिरि से रानी का दूत आया तो उसे होश हुआ. राजकुमारी छिताई समय के साथ सयानी होती जा रही है. राजा के अनुरोध को अलाउद्दीन मान गया. विदाई के समय राजा ने देवगिरि के राजप्रासाद को सज्जित कराने की दृष्टि से एक चित्रकार की मांग की, क्योंकि दिल्ली के महलों में चित्रकारी देख कर वह प्रफुल्लित हुआ था. सुलतान ने अपना खास चित्रकार साथ भेजा. लौट कर राजा ने जब बेटी को देखा तो चौंका. 3 साल में ही राजकुमारी कितनी यौवन संपन्न हो गई थी.

राजा ने पुराने भवनों के साथ नए प्रासाद का भी निर्माण करा कर पौराणिक ग्रंथों के विविध प्रसंगों को अपनी इच्छा से चित्रित कराया. चित्रकार नए चित्रों में नए रंग भरता तथा नई आकृतियां अंकित करता रहता था. मन में बसे चित्रों की छवि को वह तूलिका के जादू से अधिक ललित, जीवंत एवं मनोहर बना कर प्रस्तुत कर देता था. एक दिन वह तन्मय हो कर चित्र बना रहा था कि उस की दृष्टि पार्श्व के द्वार पर गई. दमकते सौंदर्य तथा छलकते यौवन की साक्षात स्वामिनी खड़ी थी. उस ने बहुत सुंदरता को सिरजा था, मगर आज विधाता की इस चपल, नवल तथा विरल सृष्टि को निहार कर चकित रह गया था. जिस तन्मयता से वह चित्र की सृष्टि में लीन था, उतना ही वह लालित्य की देवी उस क्षणक्षण संवरती कृति को निहारने में खोई थी.

जैसे ही चित्रकार का ध्यान भंग हुआ और उस ने पीछे देखा, वैसे ही वह सुंदरी जल में फिसलती मीन की तरह अंतराल में विलीन हो गई. चित्रकार के मन में उस अनुपम सौंदर्य को चित्रित करने की लालसा घर कर गई. चित्रकार को यह आभास हो गया था कि वह राजकुमारी छिताई थी. चित्रकार दरबार के साथ ही अंत:पुर में भी चित्र बना रहा था. अतएव उस ने फिर से उस दमकते सौंदर्य का दर्शन कर लिया और इस बार उस ने पूरी सजगता से चुपचाप छिताई की छवि अपनी तूलिका से उतार ली और चित्र को अपने पास रख लिया.

इस बीच राजा ने बेटी हेतु वर की तलाश जारी रखी. उस ने पुत्री का विवाह द्वारसमुद्र के राजा भगवान नारायण के पुत्र राजकुमार सौंरसी के साथ निश्चित कर दिया. चित्रांकन का कार्य समाप्त होने के पश्चात विवाह का मंडप सजाया गया और विवाह कार्य सकुशल संपन्न हो गया. राजकुमारी पति के साथ डोली में ससुराल चली गई. चित्रकार भी पुरस्कार पा कर और अपने स्वामी हेतु उपहार ले कर दिल्ली चला गया. कुछ ही दिनों बाद प्रिय पुत्री के बिना घर सूना पा कर राजा रामदेव ने छिताई को बुला लिया. छिताई और सौंरसी, दोनों देवगिरि आ गए. वैभव और दुलार की कमी न थी. युवक सौंरसी रात्रि में छिताई के साथ रमण करता और दिन में ऊबने लगता तो आखेट के लिए निकल जाता.

राजा रामदेव दामाद को अनजाने क्षेत्र में अकेले जाने से रोकते थे. मगर नवयौवन के अल्हड़पन में सौंरसी परवाह नहीं करता था. एक दिन मृग के पीछे घोड़ा दौड़ाता वह जंगल में घुस गया. मृग आश्रय पा कर एक आश्रम में घुस गया. आश्रमवासी बाहर निकल आए और दयावश राजकुमार से मृग को छोड़ देने का अनुरोध किया. राजकुमार जोश में था. उस ने हिरण को नहीं छोड़ा. तब उस आश्रमवासी ने कुपित हो कर कहा, ‘‘जैसे तुम ने मृगी को दुखी किया है, उसी प्रकार तुम जिस स्त्री के मोह में पड़े हो, वह दूसरे पुरुष के वश में पड़ेगी और तुम दुख भोगोगे.’’

सुन कर सौंरसी अवाक रह गया. उस के प्रार्थना करने पर आश्रमवासी बोले, ‘‘तुम पश्चाताप करोगे तो तुम्हारा दुख दूर होगा.’’

सौंरसी लौट तो आया मगर उस का मन शंकित रहने लगा. उस ने आखेट पर जाना एकदम बंद कर दिया. इस से छिताई और राजा प्रसन्न रहने लगे. राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. अब दिन में वह अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां भी होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. सौंरसी ने अपनी प्रणयिनी छिताई को वीणा सिखाना शुरू किया. धीरेधीरे संगीत ने उन की संगति में ऐसा माधुर्य घोल दिया कि लययुक्त स्वरलहरियां उन के एकांत की निर्विघ्न साधना बन गईं. सुख के ये सरकते दिन आनंद के नित नूतन सोपान बनते चले गए.

उधर चित्रकार जब काम पूरा कर के दिल्ली पहुंचा तो उस ने राजा रामदेव के व्यवहार की प्रशंसा करते हुए राजा के उपहार बादशाह अलाउद्दीन को दिए. अलाउद्दीन ने अपने मित्र की प्रशंसा की. एक दिन अवसर पा कर चित्रकार ने एकांत में संजो कर बनाए और रखे गए राजकुमारी छिताई के चित्र को सम्राट अलाउद्दीन को दिखाया.

बादशाह एकटक उसे निहारते हुए कल्पना के नवीन संसार में विलुप्त हो गया. उस ने तय कर लिया कि ऐसी सुकुमारी सुंदरी कन्या का भोग अवश्य करना चाहिए. वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि आक्रमण किस बहाने किया जाए क्योंकि अपनी खुशी से तो अपनी ब्याहता कन्या अथवा पत्नी न राजा रामदेव दे पाते और न सौंरसी. जब उसे पता चला कि सौंरसी और छिताई देवगिरि में हैं तो उसे लगा कि देवगिरि पर इस समय आक्रमण से जहां छिताई मिलेगी, वहीं फिर से दौलत हासिल होगी.

अत: उस ने प्रकट में बहाना बनाया कि उसे अपने मित्र राजा रामदेव को देखे बहुत दिन हो गए हैं और वह उन्हें लड़की के ब्याह पर बधाई देगा. इस बहाने के कारण उसे राजा ने बीच में रोकने का प्रयास नहीं किया. वह देवगिरि आया और राजधानी को चारों तरफ से घेर लिया. राजा कुछ समझ न सका. परंतु देवगिरि दुर्ग की दुर्गमता के आगे अलाउद्दीन की एक न चली. अत: अब अलाउद्दीन ने छिताई को उसे सौंपने पर घेराबंदी उठाने की शर्त पेश की तो राजा ही नहीं, पूरी प्रजा इस अपमान पर भड़क उठी.

परिणामस्वरूप युद्ध छिड़ गया. सौंरसी वहां फंस गया था और विशेष क्रोध में था. अत: उस के नेतृत्व में देवगिरि के वीर आतताई पर टूट पड़े. अनेक वीर मारे गए. अलाउद्दीन के साधन बड़े थे और वह दूसरे स्थानों से सेना मंगा कर क्षति को पूरी कर लेता था. इसलिए देवगिरि सेना बारबार आक्रमण कर के भी विजयी नहीं हो पाती थी. परंतु जैसे आज देवगिरि दुर्ग की रक्षा व्यवस्था 7 सौ वर्षों के बाद भी रोमांचित कर देती थी, उसी तरह उस समय भी वह अपराजेय थी. इस से अलाउद्दीन पूरी कोशिश के बावजूद जीत न सका.

महीने पर महीने बीत रहे थे. किले में रसद और सैन्य बल की प्रतिदिन कमी होती जा रही थी. अतएव राजा ने विचार प्रकट किया कि सौंरसी और छिताई को किसी तरह सुरक्षित निकाल कर और निश्चिंत हो कर अत्याचारी अलाउद्दीन पर टूट पड़ा जाए. पहले तो सौंरसी रणक्षेत्र से हटने को कतई तैयार न था. उसे उस शाप की भी याद थी कि दुर्ग से बाहर निकलते ही कहीं छिताई आक्रामकों के हाथ न पड़ जाए. परंतु जब उसे सैनिकों की कमी बताई गई तो वह इस शर्त पर अकेले बाहर जाने को तैयार हो गया कि वह अपने राज्य द्वारसमुद्र जा कर वहां की सेना लाएगा और बाहरभीतर दोनों तरफ से अलाउद्दीन पर जोरदार आक्रमण किया जाएगा.

सौंरसी को भेष बदलना पड़ा था. उस ने अपने सारे राजकीय शृंगार छिताई को सौंप दिए. तरुण पतिपत्नी एकदूसरे पर मर मिटने की कसम खाते हुए विलग हुए. जब तक नीचे उतरता हुआ सौंरसी दिखाई दिया, छिताई देखती रही. फिर सिसकते हुए उस ने अपने भी सारे आभूषण उतार दिए और तपस्विनी का जीवन जीने लगी. कई दिनों बाद जब सुलतान को सौंरसी के निकल जाने की खबर मिली तो वह आशंकित हो गया कि कहीं छिताई भी उस के साथ फुर्र न हो गई हो. अलाउद्दीन को यह भी उम्मीद बंधी कि सौंरसी के चले जाने से वृद्ध राजा लाचार हो गया होगा. अत: उसे पुरानी दोस्ती की याद दिला कर छिताई मांग ली जाए.

इस से दोस्ती स्थाई हो जाएगी. छिताई के दुर्ग में होने का सही पता करने के लिए महिला गुप्तचर भेजे गए. जब इत्मीनान हो गया तो अलाउद्दीन ने विशेष कुटनी दूतियों को छिताई के पास भेजा जो उसे सौंरसी से विमुख कर के सुलतान की तरफ ललचा सकें. लेकिन दूतियां छिताई पर कोई प्रभाव न डाल सकीं. वे यह खबर ले आईं कि छिताई प्रतिदिन राम सरोवर आती है. अलाउद्दीन को चित्तौड़ और रणथंभौर में सौंदर्य के प्रति अपनी आसक्ति को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिला था. अत: यहां वह विशेष सजग था.

सुलतान ने अपने एक ब्राह्मण दरबारी राघव चेतन को छिताई सौंपने के आग्रह के साथ राजा रामदेव को समझाने भेजा. ब्राह्मण होने से यह अंदेशा नहीं था कि दूत राघव चेतन का वध होगा. साथ ही अलाउद्दीन ने दूतियों को हिंदू साध्वी का रूप बना कर भेजा जो छिताई को फिर से राजी करें. अलाउद्दीन ने अपनी एक योजना मन में बना ली थी. उसे छिताई को देखे बिना चैन नहीं था. अतएव राघव चेतन के सेवक के रूप में वह खुद परकोटे के भीतर प्रवेश कर गया. राघव चेतन दरबार में गया. दूतियां रनिवास की ओर गईं. सुलतान रामसरोवर में छिताई के दर्शन करने आने की प्रतीक्षा करने लगा. आसपास का वातावरण रमणीय था और तरहतरह के पंछी जलक्रीड़ा कर रहे थे. सुलतान ने समय बिताने के लिए पंछियों का शिकार करना शुरू कर दिया, जिस में वह इतना रम गया कि जब छिताई सखियों सहित आई तो वह जान न सका.

पंछियों के आर्तनाद तथा बेबस कलरव से आकृष्ट हो कर छिताई तो दर्शन कर के चली गई, किंतु मैनरूह को उस ने कारण पता लगाने भेजा. मैनरूह ने सुलतान को छिताई की बेटी मानने की ईमान से कौल उठाने की बात मनवा कर मुक्त किया. सुलतान ने घेरा उठा लिया और लौटने की तैयारी करने लगा.

मैनरूह ने पूरी घटना राजा रामदेव को बता दी. वह प्रसन्न हुआ कि मुसीबत टली. उस ने दासी की खूब प्रशंसा की. जलने वाले हर दरबार में होते हैं. सौंरसी की अनुपस्थिति में जो प्रधान सेनापति थे, उन्होंने इस में भी अलाउद्दीन शासक की कोई चाल बताई. उन्होंने कहा कि दासी की बातों पर विश्वास कर के वे अलाउद्दीन की पकड़ में आ जाएंगे. उन्होंने यहां तक डींग मारी कि जब सुलतान हारने वाला है तो वह शराफत की आड़ में बचना चाहता है. उन्होंने दासी के विरुद्ध काररवाई करने को कहा. यदि वह सचमुच सुलतान था तो उसे किसी भी शर्त पर छोड़ने के बजाय पकड़ कर राजा के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए था. अत: या तो दासी झूठी है या सुलतान.

प्रधान सेनापति की बातों से लोग असमंजस में पड़ गए. सचमुच यह अजीब बात थी कि इतना बड़ा सुलतान निपट अकेले वाटिका में आए, फंसे और निकल जाए. प्रधान सेनापति चित्तौड़, गुजरात और रणथंभौर में अलाउद्दीन की मक्कारियों का विवरण देते हुए जोर देने लगे कि सुलतान की यह भी कोई जालसाजी है. अतएव देवगिरि को युद्ध करना चाहिए. अन्य दरबारी भी सशंकित थे. पुराना पापी पाप छोड़ भी दे तो शक उस का पीछा नहीं छोड़ता. सब की आशंका एवं आक्रोश से राजा को कहना पड़ा कि मैनरूह को अलाउद्दीन ने बहन कहा है तो एक बार आजमाइश की जाए. बात सही है तो उस के कहने पर अलाउद्दीन फिर से घेरा डाल दे.

दासी के माध्यम से सुलतान को खबर मिली. सेनापति की आज्ञा से देवगिरि के सैनिकों ने आक्रमण जारी रखा. इस पर सुलतान का क्रोध उबल पडा़. उस ने फिर से मोर्चे बांधे. अबकी बार लड़ाई प्रतिष्ठा की थी. अलाउद्दीन ने अपनी योजना के अनुसार शह दी. छिताई जहां दर्शन के निमित्त आती थी, वह स्थान मुख्य दुर्ग तथा उस की खाई के बाहर था. अलाउद्दीन के कमंद के सहारे उस जगह आहिस्ताआहिस्ता अपने सैनिक उतारे और उन्हें पेड़ों पर छिप कर बैठा दिया. रक्षकों का ध्यान बंटाने के लिए दुर्ग की दूसरी ओर शोरगुल के साथ आग जलवा दी.

दूसरे दिन जब छिताई आई तो अलाउद्दीन के छिपे सैनिक उस की टोली पर टूट पड़े. छिताई के साथ आई 40 दासियां मार डाली गईं. दूसरी तरफ निकटस्थ फाटक पर अलाउद्दीन के सैनिक पूरे वेग से टूट पड़े. छिताई पकड़ ली गई और सुलतान के सामने पेश की गई. छिताई एकदम भावशून्य हो गई थी. सुलतान ने उसे दिलासा दिया कि वह छिताई को बेटी की तरह रखेगा. कह तो दिया मगर छिताई के ललित सौंदर्य को सम्मुख पा कर एक बार सुलतान का चित्त चंचल हो उठा. मगर अपने कौल को याद कर के वह सहम गया.

छिताई के पीछे कुटनियां लगा दी गईं, जो उसे सजनेधजने और पथभ्रष्ट होने के लिए तैयार करें. छिताई ने उन का मर्म समझते ही आंखकान मूंद लिए. अब उस ने खाना तो दूर, पानी पीना भी छोड़ दिया. उस ने प्रतिज्ञा की कि उस विधर्मी महल में अनशन कर के वह प्राण त्याग देगी. जब यह खबर बादशाह को मिली तो वह खुद छिताई के पास आया और उसे समझाने की कोशिश की.

छिताई ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया और अपने हठ पर अडिग रही. छिताई का चेहरा बुझ गया और कंचनवत शरीर की कांति मलीन हो गई थी. सुलतान को लगा कि यदि और देर हुई तो छिताई मर जाएगी. तब उस ने छिताई को अपने विश्वस्त राघव के महल में भेज दिया. अलाउद्दीन ने उस की सुरक्षा की इस आशय से अलग व्यवस्था की कि भविष्य में समय बदलने पर उस का मन भी बदल जाए. साथ लाई उस की वीणा भी मन बहलाने के लिए भेज दी.

उधर जब सौंरसी तैयारी के साथ देवगिरि वापस पहुंचा तो उसे छिताई के अपहरण की सूचना मिली. यह आघात वह सहन न कर सका. उस ने दुर्ग, सेना, महल, राजपाट सब त्याग दिया. उस की दशा एक बार तो विक्षिप्त की भांति हो गई. वह जंगल में चला गया और उस ने वैरागी रूप धर लिया. जो मिला, खा लिया और इधरउधर घूमने लगा. वह छिताई की हर ओर खोज करने लगा. अपने असह्य वियोग की करुणा को उस ने वीणा में झंकृत करना आरंभ किया.

संगीत अन्य कलाओं की भांति साधना है जो भावातिरेक में स्वरों को चमत्कार के रूप में प्रकट करता है. भावों की गहनता कला को साधना के सोपानों से सिद्धि के शिखर का स्पर्श करा देती है. जब छिताई की अतृप्त स्मृति को सौंरसी वीणा के विराट सुरों से तृप्त करने का प्रयास करता तो प्रतीत होता जैसे अदृश्य से दृश्य हो रहा हो. एकांत में सौंरसी के वीणा वादन पर पशुपक्षी स्तब्ध हो कर मुग्ध हो जाते. पुष्प झूमने लगते. प्रकृति थिरकने लगती. वैरागी सौंरसी रुकता नहीं था, टोह लेतेलेते मंजिल की ओर बढ़ा जाता था.

वियोगी हृदयों की भी कोई अनजानी आहट होती होगी. भावी प्रेरणावश सौंरसी दिल्ली पहुंच गया. उस ने एक उपवन में डेरा डाला. प्रात: संध्या अथवा जब उस को भावोद्वेग होता, वह वीणा के तार छेड़ देता. तब बटोही थम जाते. पखेरू चित्रलिखित बन जाते और जल का निर्झर संगत करने लगता था.

उधर अलाउद्दीन ने छिताई के पास इस लालसा से वीणा भेज दी थी कि वह जब प्रकृतिस्थ होगी तो मन बहलाएगी. राघव चेतन के महल में वह कुछ संयमित तो हुई, परंतु स्वाभाविक न बन सकी. राघव चेतन की बातों तथा प्रेरक आशावादिता से वह शरीर संरक्षण हेतु कुछ खानेपीने लगी, मगर वीणा को उस ने हाथ नहीं लगाया. यह वही वीणा थी, जिस पर सौंरसी ने उसे वीणा बजाना सिखाया था. वह वीणा को छेड़ती तो न थी, परंतु उसे छोड़ती भी नहीं थी. वह वीणा उसे प्रियतम की सुधि दिलाती रहती थी.

सुलतान छिताई की वीणा सुनना चाहता था. मगर अन्यमनस्का छिताई उन तारों पर अंगुली नहीं रखती थी. अंत में बादशाह की आज्ञा से दिल्ली के प्रसिद्ध वीणावादक गोपाल नायक छिताई को वीणा झंकार की शिक्षा देने हेतु भेजे गए. सुलतान ने वादा किया कि जिस दिन छिताई वीणावादन करेगी, गोपाल नायक को मुंहमांगा ईनाम मिलेगा.

गोपाल नायक ने बारंबार चेष्टा की. गायन और वादन से छिताई में छिपे कलाकार को जगाने की चेष्टा की परंतु सफल न हुए. अलबत्ता दोनों कलाकारों ने एकदूसरे में अंतर्निहित कला को पहचान लिया. परस्पर सहानुभूति भी हुई. गोपाल नायक छिताई की यातना को समझते थे. छिताई कम से कम एक बार वीणा बजा कर उन की प्रतिष्ठा सुलतान की निगाह में बढ़ाना चाहती थी, मगर कर न सकी.

अंत में उस ने वह वीणा स्वयं गोपाल नायक को दे दी. उस ने कहा, ‘‘गुरुजी, इसे रख लीजिए. शायद कभी वे आएंगे तो देख कर पहचान तो लेंगे अपनी वीणा को. फिर वे इसे बजाएंगे अवश्य. जब उन के हाथ से वीणा बजेगी तो कितना ही शोर हो, मैं सो भी रही होऊं तो इस वीणा के सुरों को पहचान कर जान लूंगी.’’

दिल्ली में सौंरसी के वीणा वादन की अलौकिकता की ख्याति बढ़ रही थी. उस ने भी संगीतज्ञ एवं वीणावादक गोपाल की पारंगतता के विषय में सुना. सौंरसी गोपाल नायक के घर गया. गोपाल नायक ने सम्मानपूर्वक अपने कक्ष में बैठाया. वार्ता करते हुए सौंरसी ने वहां छिताई द्वारा प्रदत्त अपनी वीणा देखी तो उसे बजाने की अभिलाषा व्यक्त की. जैसे ही सौंरसी ने उस वीणा के सुर झनझनाए तो वे चिरपरिचित स्वर छिताई के कानों में गूंज उठे.

उसे प्रियतम के आगमन का आभास हो गया. वह भावातिरेक में विह्वल हो उठी. सुलतान की पाबंदियों के चलते वह अपने स्वामी से मिल नहीं सकती थी. गोपाल नायक इस कौशल से वीणा बजाने और सौंरसी के उत्साह से जान गए कि यह युवक छिताई की प्रियतम है. उन्होंने उसे राघव चेतन की मार्फत सुलतान से मिलने की सलाह दी, परंतु छिताई के विषय में कुछ नहीं बताया.

योगी वेश में सौंरसी राघव चेतन से मिला और उन से सुलतान से मिलाने की प्रार्थना की. राघव योगी की वीणा वादन कला तथा व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ. उस ने योगी की भेंट दरबार में सुलतान से कराई. योगी ने बताया कि वह दक्षिण में सिंहल से आया है और उस का सब कुछ दिल्ली के बाहर के उद्यान में छिन गया है. सुलतान को आश्चर्य हुआ, क्योंकि उद्यान में कोई आताजाता न था. फिर योगी के पास ऐसी क्या संपत्ति होगी जो कोई छीनेगा.

योगी की बातें रहस्यमय लगीं तो भी अलाउद्दीन ने उसे परखने की दृष्टि से वीणा बजाने को कहा. योगी ने सिर झुका कर अनुरोध किया कि सुलतान यदि एक बार उद्यान में दरबार लगाएं तो उसे उस का खोया सब कुछ मिल जाएगा. वहीं वह वीणा भी बजाएगा. सुलतान मुसकराया.

उद्यान के सुरम्य वातावरण में दरबार का आयोजन किया गया. सुलतान ने अनुभव किया कि योगी का वीणा वादन शुरू होते ही दिल गुलाब के फूल की तरह खिल उठा. फिजा खुशगवार होने लगी. लगा, जैसे कुदरत ने नींद से जाग कर अंगड़ाई ली हो. पशुपक्षी एकत्रित होने लगे. जब तक वीणा बजती रही, पूरा दरबार, पशुपक्षी, पेड़पौधे सब चुपचाप सुनते रहे. वीणा वादन खत्म होने पर सुलतान बोल उठा, ‘‘मरहबा! क्या खूब!’’

उसे छिताई से अपना वादा याद आया. इस वीणा पर भी यदि छिताई ने वीणा नहीं बजाई तो वह बहरी हो चुकी होगी. उस ने राघव चेतन से छिताई को वीणा सहित बुला लाने का आदेश दिया. जब तक छिताई आ नहीं जाती, उस ने योगी को वीणा बजाने का आदेश दिया. सुलतान ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी वीणा से छिताई की तकलीफ दूर हो जाए तो तुम जो मांगोगे, तुम्हें ईनाम दिया जाएगा.’’

सौंरसी तन्मय हो कर बजाने लगा. दूर से आती हुई छिताई ने जब वीणा की वह चिरपरिचित स्वरलहरी सुनी तो उस का दिल उछलने लगा. छिताई के पांव स्वचालित से उठने लगे. जब उस ने सौंरसी को देखा, तो दाढ़ीमूंछ, केश तथा जोगिया भेष के बावजूद पहचान गई. फिर तो प्रच्छन्न आह्लाद का ज्वार उमड़ आया. मुखमंडल प्रफुल्लता की आभा से दीप्त हो उठा. सारी सभा उस की इस असाधारण मन:स्थिति से प्रमुदित हो उठी.

राघव चेतन ने वीणा निकाली. गोपाल नायक ने उसे ला कर बीच सभा में छिताई के सामने वादन की स्थिति में प्रस्तुत कर दिया. आनंद की उदात्त लहरियां सौंरसी तथा छिताई के मानस में गूंज रही थीं. आंखों के मिलते ही वे एकदूसरे को पहचान ही नहीं गए, बल्कि उन में वियोग का संताप, उलाहना, यातना, सब आनंद में परिवर्तित हो गए. उस आनंद में संगीत सुख की वर्षा बन निर्झर सा फूट पड़ा.

अनजाने में छिताई ने सौंरसी की दी हुई वीणा को उठा लिया. लगा कि वह सुहाग के दिनों की पारंगतता को पुन: प्राप्त कर चुकी है. न जाने कब तक दोनों एकदूसरे की ओर अपलक निहारते हुए वीणा बजाते रहे. पशुपक्षी एकटक उन्हें देख रहे थे. संगीत के ताल पर मोर नाचने लगे. मृग थिरकने लगे. लगता था, जैसे वीणा की स्वर लहरियों से सब अलौकिक हो उठा हो.

धीरेधीरे सौंरसी ने वीणा की गति धीमी की. छिताई ने भी साथ दिया. जब उन्होंने वीणा वादन रोका तो पूरी सभा सन्नाटे से करतल ध्वनि में बदल गई. सुलतान ने छिताई को इतनी उत्फुल्ल कभी नहीं देखा था. छिताई ने वीणा ही नहीं बजाई, उस ने अपनी कला और उल्लास से पूरी सभा को आह्लादित कर दिया था. सुलतान को अपना वादा याद आया. उस ने सौंरसी से पूछा, ‘‘तुम्हारा ईनाम पक्का. बताओ, तुम्हें क्या चाहिए. आज हमें पता चला कि मौसीकी भी एक तरह की इबादत है. और छिताई, हम ने तुम्हारी बारीकियों को भी परखा. गजब का हुनर है तुम दोनों में.’’

सौंरसी बुत बना बैठा रहा. वीणा वैसे ही पकड़े रहा. एकटक सुलतान को देखता रहा. सुलतान ने फिर शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘जोगी, बताओ तुम क्या चाहते हो? तुम जो मांगोगे, वह तुम्हें मिलेगा.’’

जोगी ने अदब से सिर झुकाया, मुसकराया. फिर फरमाया, ‘‘मान्यवर, आप मुझे वचन देते हैं?’’

अलाउद्दीन की पारखी नजरों ने परख लिया था कि वे दोनों एकदूसरे के निकट रहे हैं. तुरंत उसे शक हो गया कि यही सौंरसी है. परंतु सभा के सम्मुख वह दो बार पूर्व ही वचन दे चुका था. उस ने बेसाख्ता कह दिया, ‘‘बेशक, हम अपनी बात पर कायम रहेंगे. अपना ईनाम मांगो.’’

जोगी ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘श्रीमान, मुझे छिताई को ही दान में दे दीजिए.’’

सुलतान कुछ बोले, इस के पहले ही छिताई आर्तस्वर में, जिस में संयोग का आवेग और विरह की विवशता निहित थी, सिसकती हुई अपने पति के चरणों में गिर पड़ी. सुलतान ने एक बार सभा को देखा, फिर राघव चेतन को निहारते हुए बोला, ‘‘पंडित, वो क्या कहते हैं, तुम्हारे मजहब में? हां, कन्यादान. जोगी, तुम चाहे जो भी हो, मैं छिताई को तुम्हें कन्यादान करता हूं.’’

सौंरसी ने उठ कर 3 बार बंदगी की. पूरी सभा में वाहवाह, बाखूब, वल्लाह, आमीन की आवाजें गूंज उठीं. सुलतान ने हंसते हुए फरमाया, ‘‘मगर मैं ने बेटी को तो कुछ दिया ही नहीं. छिताई, बताओ, तुम क्या चाहती हो?’’

कुछ लोग कठोर अलाउद्दीन की इस दरियादिली पर चकित थे. चित्तौड़ और रणथंभौर के किलों को पत्थर के खंडहरों में तब्दील करने वाले अलाउद्दीन ने सब के सामने छिताई को अपनी बेटी पुकारा था. सौंरसी तथा छिताई की तपस्या ने पत्थर को भी पिघला दिया था. संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था. छिताई ने सिसकते हुए, हाथ जोड़ कर भूमि पर सिर रखा. बोली, ‘‘हे सम्राट, हे पिता, मुझे आप का बस आशीर्वाद चाहिए. आप ने मुझे सब कुछ दे दिया.’’

सौंरसी ने विनयपूर्वक अपना वास्तविक परिचय तथा छिताई को अपनी परिणीता बताया. पूरी सभा इस अद्भुत जोड़ी पर स्नेह की वर्षा करने लगी. अलाउद्दीन ने शाही ढंग से छिताई और सौंरसी की विदाई की. देवगिरि पहुंचने पर दोनों का भव्य स्वागत हुआ. छिताई ने अपने धैर्य से विजय प्राप्त की थी. कुछ दिन वहां रह कर दोनों द्वारसमुद्र चले गए. कोई 5 सौ वर्ष पूर्व कवि नारायण दास ने ‘छिताई वार्ता’ प्रेम काव्य की रचना की थी, जिस का विवरण डाक्टर राजमल वोरा ने अपनी पुस्तक ‘देवगिरि के यादव राजा’ में उल्लिखित किया है. Hindi Kahani

लेखक – जगदीश जगेश   

 

UP News: खत्म हो गया खूबसूरत रिश्ता

UP News: परिवार पैसों से नहीं, प्यार से खुश रहता है, जिस के लिए संयम, विवेक, समर्पण और आपसी तालमेल जरूरी है. डा. विशाल यही नहीं कर पाए, जिस की वजह से आज वह पत्नी को प्रताडि़त कर मौत के मुंह तक पहुंचाने के आरोप में जेल में हैं.

किसी परिवार की खुशहाली का मूल आधार सिर्फ दौलत ही नहीं, त्याग, समर्पण, विश्वास, आपसी प्यार, अपनापन और भावनाओं का संगम होना जरूरी है. जहां यह सब नहीं होता, वहां खुशियां पानी के बुलबुले और कोहरे जैसी होती हैं. जिस तरह कुछ वक्त के बाद बुलबुला अपना वजूद खो देता है और कोहरा छंट जाता है, कुछ वैसा ही खुशियों के साथ होता है. दौलत की चकाचौंध से प्यार करने वालों की अन्य मामलों में झोलियां खाली ही रह जाती हैं, क्योंकि पैसा जरूरतों को तो जरूर पूरी कर देता है, लेकिन वह सब नहीं दे पाता, जो खुशहाल जिंदगी के लिए जरूरी होता है.

राजेश कौड़ा इन बातों को अच्छी तरह जानतेसमझते थे. व्यवहारकुशल राजेश के लिए उन का अपना परिवार ही पूरी दुनिया था. वह सरकारी मुलाजिम थे. हर आम आदमी की तरह वह भी चाहते थे कि उन के परिवार में खुशियों के जुगनू हमेशा रोशनी बिखेरते रहें. इसी सोच के समुद्र में उन्होंने प्यार, समर्पण और जिम्मेदारियों की किश्ती को हमेशा चलाया था. राजेश कौड़ा उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के मोहल्ला अरविंदपुरी के रहने वाले थे. परिवार के संचालन व बच्चों की संस्कारपूर्ण परवरिश में गृहणियों का बड़ा योगदान होता है. उन की पत्नी प्रेमलता ने इस काम को दिल के साथसाथ दिमाग से पूरा किया. उन की 3 बेटियां, शालिनी, सोनिया और शिवानी थीं. बच्चे मातापिता के लिए अनमोल पूंजी की तरह होते हैं, जिसे वे अपने ढंग से सहेज कर रखते हैं.

राजेश की मानसिकता ऐसी नहीं थी कि बेटियों के साथ कोई भेदभाव करते. वह इस से पूरी तरह मुक्त थे. ज्ञान की रोशनी दुनिया के हर खजाने से ज्यादा अनमोल होती है. वह इस बात को जानते और समझते थे. इसी वजह से उन्होंने बेटियों को बेटा समझा और उन्हें शिक्षा की आजादी दी. परिवार का माहौल, मातापिता के विचार, संस्कार और जिम्मेदारियां अच्छी हों तो उस का असर बच्चों पर पड़ता ही है. कोड़ा दंपत्ति की बेटियां न सिर्फ उन की उम्मीदों पर खरी उतरीं, बल्कि उन्होंने ऊंची शिक्षा हासिल कर के उन का नाम भी रोशन किया. उन में एमबीबीएस, एमडी की पढ़ाई करने वाली शालिनी गोल्ड मैडलिस्ट थी. तीनों बेटियां पढ़लिख कर कामयाब हुईं तो उन्होंने एकएक कर के सभी का विवाह कर दिया.

शालिनी का विवाह मेरठ शहर के ही थाना सदर बाजार के पौश इलाके थापरनगर में विशाल से हुआ था. विशाल खुद भी डाक्टर थे. उन्होंने विदेश से मैडिकल की पढ़ाई की थी. उन के पिता डा. सी.एल. आर्य की गिनती नामी डाक्टरों में होती थी. वह सादगी पसंद अच्छे स्वभाव के डाक्टर थे. कोठी के बाहरी हिस्से में ही वह ‘आर्य चेस्ट क्लीनिक’ चलाते थे. उन के परिवार में पत्नी वीना आर्य के अलावा एक बेटी थी सपना, जिस का विवाह हो चुका था. शालिनी का विवाह विशाल के साथ सन 2002 में हुआ था. विवाह और उस की खुशियां बसंत ऋतु की तरह होती हैं, जिस में हजारों रंगबिरंगे फूल एक साथ खिल कर जिंदगी को महका देते हैं. जीवन के इस पायदान पर अनोखी मादकता होती है. लगता है, वह पल ठहर जाए और खुशियों का घरौंदा आबाद रहे.

लेकिन यह सिर्फ खूबसूरत सोच भर होती है, वास्तविकता में ऐसा कतई नहीं होता. इस के पीछे आईने की तरह साफ वजह यह होती है कि एक तो वक्त अपनी चाल नहीं छोड़ता, दूसरे जिंदगी कभी घुमावदार होती है तो कभी सीधी. समय अपनी गति से चलता रहा. समय के साथ शालिनी 2 बेटियों, वर्णिका और निकिता की मां बनी. शालिनी और उस के पति विशाल भी डा. सी.एल. आर्य की क्लिनिक में ही मरीजों को देखते थे. क्लिनिक के बोर्ड पर तीनों का संयुक्त नाम था. आर्य परिवार के पास नाम, दौलत और शोहरत, सभी कुछ था. अच्छी जिंदगी के लिए यह सब खुशनसीब लोगों के पास ही होता है या यूं कहें कि इस तरह की जिंदगी के लिए न जाने कितने लोग तरसते हैं.

आधुनिकता के दौर में चकाचौंध भरी जिंदगी के पीछे कुछ ऐसी हकीकतें होती हैं, जो सामाजिक तौर पर प्रत्यक्ष नजर नहीं आतीं. बहुत से घरों की दीवारों की पीछे न जाने कितने तूफान चल रहे होते हैं. यानी सिर्फ दौलत और शोहरत देख कर यह अंदाजा लगाना कठिन होता है कि वहां सब खुश हैं. डा. आर्य के परिवार में भी कुछ ऐसा ही था. हंसमुख स्वभाव की शालिनी बेहद मृदुभाषी थी. उस के इस स्वभाव को न सिर्फ मरीज, बल्कि आसपास के लोग भी पसंद करते थे. उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य स्वभाव के जितने अच्छे थे, उन की पत्नी वीना ठीक इस के उतना ही विपरीत थीं. तेजतर्रार वीना हर बात पर टीकाटिप्पणी करना और परिवार को अंगुलियों पर नचाना अपना हुनर समझती थीं.

ऐसी बातों का दायरा हद से ज्यादा फैल जाए तो घर की शांति को ग्रहण लग जाता है. उन की इन बुरी आदतों का शिकार शालिनी भी हो चुकी थी. पढ़ेलिखे होने के बावजूद डा. विशाल और उन की मां वीना आर्य रूढि़वादी सोच और कुरीतियों का शिकार थीं. उन्हें शालिनी से शिकायत थी कि उस ने बेटे को जन्म नहीं दिया. इस के अलावा दहेज से ले कर छोटीछोटी बातों पर बतंगड़ बन जाना आम बात हो गई थी. ऐसी बातें खुशियों पर ग्रहण लगाने वाली होती हैं. शालिनी कभी झगड़े का तो कभी मारपीट का शिकार हो जाती थी, लेकिन पिता के घर से मिले संस्कार उसे बांधे रखते थे.

इस के अलावा एक बात यह भी थी कि डा. सी.एल. आर्य बहू शालिनी को बेटी की तरह मानते थे. वह बहू की काबलियत और व्यवहार की कद्र करते थे. सामाजिक अच्छाइयों और बुराइयों का भी उन्हें खयाल था. जब भी झगड़े के हालात उत्पन्न होते थे, डा. आर्य शालिनी की ढाल बन कर खड़े हो कर मामले को शांत करा देते थे. शालिनी की अपनी बहनों और मातापिता से बातें होती रहती थीं. इन कड़वाहटों से वे भी वाकिफ थे, लेकिन मामला चूंकि बेटी की ससुराल का था, इसलिए किसी प्रकार का वे हस्तक्षेप नहीं करते थे. बहुत सी बातों को खामोशी के धागों से शालिनी अपने होंठों को सिल लेती थी. शालिनी की परेशानी तब और बढ़ गई, जब उस के ससुर डा. सी.एल. आर्य की मौत हो गई.

कौडा दंपति ने शालिनी को नाजों से पाला था. हर मातापिता चाहते हैं कि उन की बेटी ससुराल में खुश रहे. वे भी ऐसा ही चाहते थे, लेकिन शालिनी के मामले में ऐसा नहीं हो सका था. वह बेटी को समझाते हुए वैवाहिक जीवन का वास्ता दे कर परिवार को संभालने की नसीहतें दिया करते थे. उसे भी परिवार के संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं का खयाल था. अब तक शालिनी की बड़ी बेटी वर्णिका नौवीं कक्षा में आ चुकी थी, जबकि उस से छोटी निकिता पांचवीं कक्षा में थी. वक्त अपनी गति से चल रहा था. बुरा वक्त किसी की जिंदगी में कब दस्तक दे दे, इस बात को कोई नहीं जानता. शालिनी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ.

30 अगस्त, 2015 की सुबह करीब साढ़े 11 बजे शालिनी की बेटी वर्णिका का अपनी नानी प्रेमलता के पास फोन आया तो वह चौंकीं. वजह यह थी कि उस ने बताया था कि घर में झगड़ा हो रहा है. उस के पिता और दादी मम्मी को परेशान कर रहे हैं. बेटी को ले कर पहले से ही चिंतित कौड़ा दंपति पर यह खबर बिजली बन कर गिरी. प्रेमलता ने यह बात पति को बताई तो वह मेरठ में ही रहने वाली अपनी बहन उमा और बहनोई राजकुमार को साथ ले कर कुछ ही देर में बेटी की ससुराल थापरनगर पहुंच गए.

उस वक्त घर में महाभारत छिड़ा हुआ था. उन लोगों का इस तरह अचानक आना विशाल और वीना को नागवार गुजरा. वीना उन की आवभागत करने के बजाय बेरुखी से बोली, ‘‘भाईसाहब, आप को इस तरह नहीं आना चाहिए, यह हमारे घर का मामला है.’’

राजेश हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘माफ कीजिए बहनजी, कौन पिता चाहता है कि उस की बेटी दुखी रहे. फिक्र तो सभी को होती है. आप लोग मेरी बेटी को इस तरह परेशान करते हैं, यह ठीक नहीं है. ऐसी क्या भूल हो गई हमारी बेटी से?’’

इस पर वीना हाथ नचा कर बोलीं, ‘‘हमें आप को यह बताने और समझाने की जरूरत नहीं है, आप यहां से चले जाएं तो बेहतर होगा.’’

राजेश को बेटी की ससुराल में अपने साथ इस तरह के रूखे और अपमानजनक व्यवहार की उम्मीद नहीं थी. वह शर्मिंदा हो गए. अपने सामने पिता की इस तरह बेइज्जती होते देख शालिनी की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा, ‘‘पापा, आप चले जाइए. यहां तो यह रोज का हाल है.’’

राजेश का दिल नहीं माना. उन्होंने विशाल से कहा, ‘‘बेटा, अपने पविर को संभाल कर रखो. बुजुर्गों ने कहा है कि रोजरोज की कलह अच्छी नहीं होती. वैसे तो यह आप के घर का मामला है, लेकिन बड़ा होने के नाते तुम्हें समझा तो सकता ही हूं.’’

राजेश का इस तरह समझाना विशाल को कांटे की तरह चुभा. वह भी बेरुखी से ही पेश आया. उस ने कहा, ‘‘हम सब संभाल लेंगे पापाजी, आप चिंता न करें. मैं कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूं. प्लीज, आप यहां से चले जाइए.’’

राजेश मन मसोस कर वहां से चले आए. मातापिता बेटी को ससुराल में सुखी रहने की उम्मीद करते हैं, लेकिन वहां जो हालात थे, उन्होंने राजेश और उन की पत्नी को चिंता में डाल दिया था. हंसमुख स्वभाव की बेटी कब गंभीर हो गई थी, उन्हें पता ही नहीं चला था. उन्होंने सोचा कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा. उन्हें क्या पता था कि इस से भी बुरा होने वाला है. उसी रात करीब 2 बजे किसी व्यक्ति ने फोन कर के उन्हें बताया कि उन की बेटी को जहर दे दिया गया है. उसे जबरदस्ती इंजेक्शन लगा कर मारने की कोशिश की गई है. इस सूचना ने उन की नींद उड़ा दी. आननफानन में उन्होंने अपने नातेरिश्तेदारों को फोन किया और धड़कते दिल से शालिनी के घर जा पहुंचे. वहां पता चला कि शालिनी को जसवंतराय अस्पताल ले जाया गया है.

सभी लोग जसवंतराय अस्पताल पहुंचे. शालिनी की हातल गंभीर थी और उसे आईसीयू में भरती कराया गया था. डा. विशाल तब तक वहीं था, लेकिन उन लोगों को देखते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. बातचीत में उस की ससुराल वालों से झड़प हो गई तो वह भाग निकला. घटना की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना मिलते ही थाना सदर बाजार के थानाप्रभारी राजेंद्रपाल सिंह मौके पर पहुंच गए.

शालिनी का इलाज कर रहे डाक्टरों का कहना था कि उस के शरीर में सल्फास की प्रकृति का जहर है. उस के हाथ, कमर व अन्य जगहों पर चोट के भी निशान थे. इस का मतलब उस के साथ मारपीट भी की गई थी. राजेश परिवार के हालातों से वाकिफ थे. शालिनी की इस हालत के लिए उस की ससुराल वाले जिम्मेदार थे. उन्होंने हत्या का आरोप लगा कर हंगामा शुरू कर दिया. शालिनी की हालत बेहद नाजुक थी. उसे वेंटीलैटर पर रखा गया था. वह बोलने की स्थिति में नहीं थी. घर वाले परिवार के हालात और उत्पीड़न का हवाला दे कर सल्फास या जहरीला इंजेक्शन जबरन लगाने का आरोप लगा रहे थे.

एसएसपी डी.सी. दुबे को इस हाईप्रोफाइल मामले की सूचना मिली तो उन्होंने पुलिस को निष्पक्ष काररवाई के निर्देश दिए. इस बीच शालिनी की बेटियों को ननिहाल भेज दिया गया. अपने मरीजों के लिए संवेदनशील रहने वाली डा. शालिनी खुद मौत से लड़ रही थी. जहर उस के शरीर में पूरी तरह घुल चुका था. डाक्टर उसे बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे, लेकिन अथक प्रयास के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. करीब 28 घंटे मौत से लड़ कर शालिनी की सांसों की डोर टूट गई. इस से उस के परिवार में कोहराम मच गया. अस्पताल में पूछताछ में पता चला कि शालिनी को वहां सीने व पेट दर्द की शिकायत के बहाने भरती कराया गया था.

पुलिस ने राजेश की तहरीर पर पुलिस ने अपराध संख्या 414/15 पर भादंवि की धारा 307, 328, 504, 506 व दहेज अधिनियम की धारा 498ए के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद शालिनी के शव के पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया. अब तक डा. विशाल और शालिनी की सास वीना, दोनों ही कोठी में ताला लगा कर फरार हो चुके थे. शालिनी की मौत से हर कोई आहत और आक्रोशित था. पोस्टमार्टम के बाद 1 सितंबर को गमगीन माहौल में उस के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. शालिनी की बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. कभी दुलहन के रूप में बेटी को विदा करने वाले राजेश कौड़ा ने सोचा भी नहीं था कि उन्हें होनहार बेटी की अर्थी को कंधा देना पड़ेगा.

इस बीच लोगों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर जाम लगा दिया. मौके पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक (नगर) ओमप्रकाश सिंह ने जल्द गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर जाम खुलवाया. पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए 4 पुलिस टीमों का गठन किया तो ये टीमें मांबेटे की तलाश में लग गईं. अगले दिन शालिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. उस की मौत शरीर में जहर घुलने से हुई थी. लीवर, किडनी से ले कर शरीर के हर अंग में जहर फैल गया था. उस के बाएं हाथ में इंजेक्शन लगाने का निशान था. डाक्टर ने पुलिस के कहने पर जांच के लिए बिसरा सुरक्षित रख लिया था. बाद में उसे जांच के लिए आगरा स्थित फोरैंसिंक लैब भेज दिया गया था.

उधर पुलिस ने आरोपियों की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी थी, लेकिन वे हत्थे नहीं चढ़ रहे थे. विशाल विदेश भाग सकता था, इस आशंका के तहत लुकआउट नोटिस जारी करा दिया गया था. विशाल का मोबाइल स्विच औफ था. उस की काल डिटेल्स से पता चला कि उस के कई लड़कियों और महिलाओं से संबंध थे. शालिनी के घर वालों ने विशाल और वीना की गिरफ्तारी को ले कर मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे से भी मुलाकात की. 4 सितंबर को शालिनी की तेहरवीं की रस्म में आर्य परिवार की छोड़ो, उन का कोई रिश्तेदार तक नहीं आया था.

गिरफ्तारी न होने से शालिनी के घर वालों में गुस्सा था. आरोपियों का कुछ पता नहीं चल रहा था. शालिनी के परिजनों ने 5 सितंबर को विशाल की कोठी पर उस के और वीना के कातिल होने संबंधी पोस्टर चस्पा कर के धरना दे दिया. पुलिस ने गिरफ्तारी का आश्वासन दे कर धरना खत्म कराया. पुलिस को बिसरा रिपोर्ट का इंतजार था. इस बीच पुलिस ने अदालत से दोनों आरोपियों का गैर जमानती वारंट हासिल कर लिया. देखतेदेखते कई दिन बीत गए. मामला मीडिया की सुर्खियां बना था.

शालिनी की बिसरा जांच रिपोर्ट आ गई. उस में एल्यूमिनियम फास्फाइड (सल्फास) नामक जहर के अंश पाए गए थे. उसे जहर दिया गया था या उस ने मानसिक दबाव में खुद खाया था, इस का जवाब गिरफ्तारी के बाद ही मिल सकता था. अभियुक्तों की गिरफ्तारी को ले कर लोग सड़कों पर उतर आए. उन्होंने कैंडल मार्च निकाले और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर से भी मुलाकात की. पुलिस विशाल तक भले पहुंच नहीं पा रही थी, लेकिन अदालत से उस के घर की कुर्की का वारंट हासिल कर के चस्पा जरूर कर दिया था. पुलिस से बचने के लिए अपनी गिरफ्तारी पर स्टे हेतु विशाल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अरजी लगाई, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया.

आखिर 16 सितंबर को डा. विशाल की फरारी का पटाक्षेप हो गया. उसे पुलिस ने उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह अदालत में आत्मसमर्पण करने जा रहा था. विशाल से विस्तृत पूछताछ की गई. शालिनी के घर वालों और विशाल से पूछताछ में जो कहानी निकल कर आई, वह आर्थिक संपन्न परिवार में  घरेलू हिंसा के सामाजिक कलंक व उजले चेहरों के पीछे की चौंकाने वाली हकीकत थी. शालिनी होनहार थी. एमबीबीएस की पढ़ाई में वह अपने बैच की टौपर रही. इस के लिए उसे गोल्ड मैडल भी मिला. इस के साथ ही वह बालीबौल की भी अच्छी खिलाड़ी थी. राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले कर उस ने कई इनाम जीते थे. डाक्टर की डिग्री हासिल करने के साथ ही कौड़ा दंपति ने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी थी.

शालिनी खूबसूरत होने के साथ होशियार थी, इसलिए थोड़े प्रयास के बाद 12 साल पहले उन्होंने शालिनी का रिश्ता डा. सी.एल. आर्य के एकलौते बेटे डा. विशाल में तय कर दिया. आर्थिक रूप से संपन्न डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव और आचरण के व्यक्ति थे. समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चेस्ट स्पैशलिस्ट के रूप में उन का नाम था. समाज में उन्हें इज्जत की नजरों से देखा जाता था. राजेश को लगा कि वह खुशनसीब हैं, जो उन्हें बेटी के लिए इतना अच्छा रिश्ता मिल गया. उन्होंने सोचा कि हमपेशा पति के साथ शालिनी खुश रहेगी.

रस्मी बातचीत के बाद शालिनी और विशाल ने एकदूसरे को पसंद कर लिया. राजेश के परिवार को पहला झटका तब लगा, जब श्रीमती वीना आर्य ने दहेज की ख्वाहिश जाहिर की. दहेज को भले ही बुराई, कुप्रथा, कानून के खिलाफ कहा जाए, लेकिन यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है कि दहेज समाज में परंपरा बन गया है. शादियों में लाखोंकरोड़ों खर्च किए जाते हैं. कभी लड़के वालों की मांग पर तो कभी सामाजिक दिखावे के लिए तो कभी हैसियत के अनुसार. राजेश ने भी अपनी हैसियत के अनुसार शहर के एक बड़े फार्महाउस में 1 नवंबर, 2002 को धूमधाम से विवाह समारोह आयोजित कर के भारी मन से बेटी को विदा कर दिया. इस विवाह में उन्होंने 25 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए.

हर लड़की की तरह शालिनी ने भी मन में ढेरों उमंगे और सपने लिए ससुराल में पहला कदम रखा. विवाह का एक साल हंसीखुशी से बीत गया. ससुर के क्लीनिक में ही शालिनी ने प्रैक्टिस शुरू कर दी. शालिनी ने बेटी को जन्म दिया तो सास के अरमानों पर जैसे पानी फिर गया. वह बेटे की ख्वाहिश रखती थीं. बहुत जल्द उन्होंने ताने देने शुरू कर दिए तो सास की बातें शालिनी के हृदय पर तीर की तरह चुभने लगीं. इतना ही नहीं, उन्होंने नवजात बेटी के पालनपोषण से भी इंकार कर दिया. डा. सी.एल. आर्य अच्छे स्वभाव के व्यक्ति थे. वह बहू का पक्ष लेते तो वीना उन्हें भी आड़े हाथों लेती, ‘‘यह तुम्हारी बहू है बेटी नहीं, जो इस का पक्ष लेते हो.’’

डा. आर्य समझाने की कोशिश करते, ‘‘बहू भी बेटी समान होती है वीना, तुम्हें इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए.’’

डा. आर्य कहते जरूर थे, लेकिन उन की इस तरह की बातें वह एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती थीं. शालिनी ने सास की आए दिन होने वाली तानेबाजियों की शिकायत पति विशाल से की. उसे उम्मीद थी कि वह उस के दिल के घावों पर सहानुभूति का फीहा रखेगा, लेकिन उस ने भी अपनी मां का समर्थन कर के उसे निराश कर दिया. वीना आर्य दानदहेज से भी नाखुश थीं. इसे ले कर भी वह ताने मारने लगीं थीं.

शालिनी एक बार मायके आई तो हमेशा खिलखिलाने वाली बेटी का बुझा चेहरा देख कर राजेश और प्रेमलता को लगा कि वह बीमार रही है. उन्होंने उस के दुखी और उदास रहने की वजह पूछी तो मातापिता के प्यारभरे बोलों से टूटी हुई शालिनी के सब्र का बांध टूट गया. कंपकंपाते होंठों से उस ने आपबीती कह सुनाई. कौड़ा दंपति ने बेटी को समझाया, विवाह के बाद बहुत कुछ सहना पड़ता है.

शालिनी ने एक बार फिर बच्चे के नवजीवन की तैयारी की तो वीना खुश हुई कि इस बार जरूर बेटा होगा. यह बात अलग थी कि उन के अरमानों पर एक बार फिर पानी फिर गया. शालिनी को दोबारा भी बेटी हुई तो उन पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाने लगा. हर रोज लगता था, जैसे पति और सास अपने दिलों की भड़ास निकालते हैं. उन के शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह उतरते थे. समय बीतता गया. शालिनी बेटियों को बहुत प्यार करती थी. वह चाहती थी कि वे पढ़लिख कर नाम रोशन करें. उधर बेटी का जीवन सुखद रहे, यह सोच कर राजेश कौड़ा ने कुछ रस्मी अवसरों पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार वीना आर्य को नकद रुपए भी दिए.

इस बीच डा. सी.एल. आर्य कैंसर से पीडि़त हो गए. ऐसे बुरे वक्त में विशाल ने पिता को उपेक्षित सा कर दिया. शालिनी ने एक अच्छी बहू का फर्ज निभा कर उन की खूब सेवा की. बेटे से ज्यादा उन्होंने शालिनी पर नाज किया. विशाल उन की कसौटी पर काबिल बेटे के तौर पर खरा नहीं उतरा. शालिनी को अपनी विरासत का सही उत्तराधिकारी मान कर उन्होंने अपनी करोड़ों की संपति का बड़ा हिस्सा उस के नाम कर दिया.

यह परिवार में विवाद की नई वजह बन गया. एक साल पहले डा. सी.एल. आर्य इस दुनिया से विदा हो गए. ससुर की मौत के बाद तो शालिनी के लिए प्रताड़नाओं का जैसे दौर ही शुरू हो गया. पति और सास को उस से मारपीट करने में कोई गुरेज नहीं था. शालिनी अपनी सोच सकारात्मक रखती थी. उस ने सोचा कि वक्त के साथ उन का व्यवहार सुधर जाएगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ. विशाल और वीना किसी दूसरी ही मिट्टी के बने थे. उन के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया. शालिनी की किस्मत में शायद दुख ही दुख लिखे थे. सन 2015 में वीना और विशाल ने शालिनी से नई मांग शुरू कर दी कि वह अपने पिता से दोनों बेटियों के नाम 10-10 लाख रुपए की एफडी कराने को कहे.

राजेश कौड़ा रिटायर हो चुके थे. उन की हैसियत ऐसी नहीं थी. शालिनी इस बात को जानती थी. जब यह आए दिन की बात हो गई तो शालिनी ने दबी जबान से अपनी मां से यह बात कही. बेटी की खुशी के लिए उन्होंने किसी तरह 2 लाख रुपए नकद दे दिए. आर्थिक संपन्न होने के बावजूद वीना और विशाल के लिए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के समान थी. वह अपनी मांग पर अड़े रहे.

शालिनी परिवार की अनेक बातों को कड़वा घूंट समझ कर पी जाती थी और मायके में नहीं बताती थी. वह नहीं चाहती थी कि मातापिता को उस के कारण कोई दुख पहुंचे. जीवन घिसटता हुआ सा चल रहा था. मानसिक प्रताड़ना झेलना जैसे शालिनी की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. एक बार यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर थमा नहीं. घर का माहौल अशांत हो चुका था. बातचीत भी गालीगलौज से की जाती थी. दुत्कार और उत्पीड़न हदों को लांघ रहा था. पतिपत्नी के बीच अक्सर तनाव रहता था.

उा. विशाल अक्सर अकेले ही विदेश घूमने चला जाता था. वह सिंगापुर, पेरिस, स्वीटजरलैंड और मलेशिया जाता था. वह क्यों जाता था, यह शालिनी को बताना जरूरी नहीं समझता था. एक मायने में वह पिता की दौलत पर मौज करने वाला बेटा था. काम में उस का मन कम ही लगता था. विशाल की लड़कियों से दोस्ती थी. शालिनी इस का विरोध करती तो उस की आवाज को दबाने के लिए उस के साथ मारपीट की जाती.

शालिनी सहनशील थी, लेकिन तनाव के बीच घुटघुट कर जी रही थी. बेटियों की खातिर वह अपने परिवार को किसी भी सूरत में टूटने नहीं देना चाहती थी. शालिनी उस बंधन को निभा रही थी, जो वक्त के साथ खोखला सा हो गया था. खुशियां जैसे उस से रूठ चुकी थीं. वह दर्द के दरिया में सफर कर रही थी. आसपड़ोस के लोगों को बाहरी तौर पर सब ठीक लगता था, लेकिन अंदर भूचाल चल रहा था. वह अपना दिन मरीजों में बिता देती थी. उस का स्वभाव अच्छा था. मरीजों के प्रति वह संवेदनशील रहती थी, इसलिए मरीज उसे ही दिखाना पसंद करते थे. उस की शोहरत काबिल डाक्टर के रूप में हो रही थी. डा. विशाल इस बात से बहुत चिढ़ता था. मौका मिलते ही वह अपनी इस भड़ास को निकाल भी देता था. कहते हैं कि अति का अंत कभी सुखद नहीं होता.

30 अगस्त रविवार के दिन जब झगड़ा ज्यादा बढ़ गया और शालिनी से मारपीट की जाने लगी तो उस की बेटी वर्णिका ने घबरा कर अपनी नानी को फोन कर दिया. राजेश कौड़ा वहां आए, लेकिन उन्हें अपमानित कर के वापस कर दिया गया. घर का माहौल काफी खराब हो चुका था. बात घर से बाहर न जा पाए, शालिनी को मनाने के उद्देश्य से विशाल शालिनी और बच्चों को ले कर मूवी दिखाने गया. रात में वे वापस आए तो घर में फिर विवाद हो गया. इस के बाद कुछ ऐसा हुआ कि बुरी खबर मिलने के बाद राजेश कौड़ा ने बेटी को अस्पताल में पाया. चाह कर भी वह उसे बचा नहीं सके.

पुलिस ने विशाल को साथ ले कर कोठी का मुआयना किया, लेकिन वहां सल्फास की शीशी या सीरींज नहीं मिली. पूछताछ के बाद पुलिस ने विशाल को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. विशाल का कहना था कि उस ने पत्नी को नहीं मारा. वह अपनी बेटियों के लिए उसे जिंदा रखना चाहता था. शालिनी खुद भी बेटियों के लिए जिंदा रहना चाहती थी.

कथा लिखे जाने तक विशाल की जमानत नहीं हो सकी थी, जबकि पुलिस वीना आर्य की सरगरमी से तलाश कर रही थी. शालिनी की दोनों बेटियां अपने ननिहाल में रह रही थीं. डा. शालिनी को जहर दिया गया या उन्होंने खुद खाया, यह तो जांच के बाद ही स्पट होगा, लेकिन आर्थिक संपन्नता के बावजूद संबंधों की कड़वाहट से संयम, विवेक और समर्पण के अभाव में एक परिवार तो बिखर ही गया. मासूम बच्चियां भी उस की त्रासदी झेलने को विवश हो गई हैं. UP News

(कथा पात्रों से बातचीत व पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Hindi stories: तवायफ का प्यार

Hindi stories: समाज की यही सोच है कि तवायफ सिर्फ पैसों से प्यार करती है, लेकिन कजरी अपने प्रेमी जावेद के बेटे को जिस तरह पालपोस कर बड़ा कर रही है, उस से साफ साबित होता है कि तवायफ के अंदर भी दिल होता है, जो किसी से प्यार भी कर सकता है.

शहर के बीच बने उस प्रमुख बाजार में काफी रौनक थी. सड़क किनारे दोनों ओर दुकानें बनी थीं तो उन के ऊपर रहने के लिए मकान बने थे. उन मकानों पर जाने के लिए दुकानों के बराबर सीढि़यां बनी थीं. यह बात अलग थी कि उन पर चढ़ने से ज्यादातर लोग कतराते थे. मकानों की रैलिंग और खिड़कियों पर रंगबिरंगी भड़काऊ पोशाक व चेहरोें पर गाढ़ा मेकअप पोते लड़कियां खड़ी रहती थीं. सड़क पर आनेजाने वाले लोग कनखियों से उन की ओर देखते तो आंखों व हाथों को नचा कर इशारे कर दिया करती थीं. जहां वे रह रही थीं, वहां की भाषा में वे तवायफों के कोठे थे.

नीचे जो बाजार थी, वहां कपड़े, राशन, हार्डवेयर, चाय आदि की दुकानें थीं. ये कोठे अंगरेजों के जमाने से भी पहले से आबाद थे. लोग समाज से नजरें चुराने की नाकाम कोशिश करते हुए सीढि़यां चढ़ जाया करते थे और उसी अंदाज में तेजी से उतर कर बाजार की भीड़ का हिस्सा बन कर ओझल हो जाया करते थे. मुद्दतों से यही सिलसिला चला आ रहा था. सीढि़यों से कोठे तक न जाने कितनी यादें, किस्से और कद्रदानों के राज दफन थे. उन कोठों की चारदीवारियों ने कई तवायफों की इठलाती जवानी और उन की रेशमी जुल्फों में बड़ेछोटे धन्नासेठों को उलझते देखा था. जिन चेहरों का आकर्षण लोगों को अपनी तरफ खींचता था, उन्हें वक्त के साथ बेरौनक होते हुए भी देखा था.

ऐसी जगहों की खास बात यह होती है कि जब सूरज अपनी रेशमी लालिमा बिखेरता है, तब एकदम उलट सुबह वहां अलसाई हुई होती है, लेकिन रातें इस तरह आबाद होती हैं, जैसे वहां सुबह का आगाज हुआ हो. शाम का धुंधलका जैसे ही दस्तक देता है, वैसे ही घुंघरुओं और सुरताल की आवाज फिजा में बहनी शुरू हो जाती है. तवायफों के नृत्य और उन के इर्दगिर्द दायरा बनाने के शौकीन खुदबखुद अपनीअपनी पसंद के कोठे पर चले जाते थे. ऐसे शौकीनों में रानी मौसी के कोठे पर कजरी का नाम खूब मशहूर था. जब वह खूबसूरत लिबास में आ कर महफिल में अपने चांद से चेहरे से घूंघट उठाती तो लोगों की सांसें थम जाया करती थीं.

वह बला की सुंदर थी. खूबसूरती के साथ वह सुरताल व नृत्य की कला के संगम में पूरी तरह पारंगत थी. वह नाचनागाना शुरू करती तो कद्रदानों की फरमाइशें बढ़ जाया करती थीं. इतना ही नहीं, वे खुश हो कर उस पर नोटों की जैसे बरसात करते थे. जितने भी नोट उस पर लुटाए जाते, वे उस की मौसी की थैली में समा जाते थे. यह बात उसे अखरती नहीं थी, क्योंकि रानी से उस का खून का रिश्ता था. वह उस की सगी मौसी थी. उस शाम भी साफसफाई के बाद कोठे के बरामदेनुमा कमरे को लड़कियों ने करीने से सामान लगा कर सजा दिया था. जगहजगह इत्र भी लगा दिया था, जिस की भीनीभीनी खुशबू पूरे कमरे में फैल रही थी. हारमोनियम वादक और तबला, ढोलक उस्ताद तयशुदा जगह पर बैठ कर रियाज में मशगूल हो गए थे.

कद्रदानों के बैठने के लिए सोफा था और नीचे सलीके से मैरून रंग का खूबसूरत कालीन बिछा दिया गया था. कमर व हाथ टिकाने के लिए सिरहाने पर मसनद लगा दिए गए थे. धीरेधीरे लोगों का आना शुरू हुआ तो रानी ने दिलकश मुसकान से उन का स्वागत किया.

‘‘तशरीफ लाइए, हुजूर.’’ रानी अपने पुराने चाहने वालों को ज्यादा तवज्जो दिया करती थी. इस की खास वजह भी थी. वे उस की आमदनी का बड़ा जरिया थे. ऐसे लोग शानोशौकत दिखा कर पैसे तो लुटाते ही थे, साथ ही खुश हो कर अलग से भी कुछ पैसे दे जाया करते थे. महफिल की तैयारी पूरी हो चुकी थी. एक पुराना कद्रदान रानी से मुखातिब हुआ, ‘‘कजरी को बुलाइए मौसी, सच पूछिए तो हम उसी के दीदार के लिए आते हैं.’’

‘‘मेहरबानी आप की. ऊपर वाला आप की हसरतों को बरकरार रखे.’’ मौसी ने शोखी से कहा और एक लड़की को इशारे से कजरी को बुलाने के लिए कह दिया.

कमरे में सरगोशियां थीं. कुछ लम्हों के बाद कजरी दाखिल हुई तो खामोशी पसरी और सभी की निगाहें उसी पर टिक गईं. कजरी ने लाल रंग का सुर्ख रेशमी लिबास पहना हुआ था. कमरे में जल रहीं लाइटों की रौशनी में उस के लिबास पर टांके गए सफेद, पीले व गुलाबी रंग के सितारे जगमगा रहे थे. धीरेधीरे चल कर कजरी बीच में आ कर खड़ी हो गई. एक लड़की ने आगे बढ़ कर पीतल के घुंघरुओं का जोड़ा उस के पैरों में बांध दिया. कजरी ने अपनी गोरी कलाइयों में कोहनी से आधा नीचे तक रंगबिरंगी चमकीली चूडि़यां पहनी हुई थीं.

अगले लम्हों में कजरी ने मोर की तरह पंख फैलाने के अंदाज में कलाइयों को आगे बढ़ा कर उन में कंपन कर के चूडि़यों को खनकाया तो एक पुरानी गजल के साथ सुरताल शुरू हो गई. सभी एकटक उसे ही निहार रहे थे. शबाबनुमा महफिल के आगाज से मौसी खुश थी, लेकिन चंद मिनटों में ही उस की खुशी मायूसी में बदल गई. क्योंकि पारखी मौसी ने यह बात पकड़ ली कि उस दिन कजरी की थिरकन में वह बात नहीं थी, जो और दिनों में हुआ करती थी. ढोलक व तबले की ताल तो बराबर थी, लेकिन कजरी के कदमों के साथ घुंघरुओं की खनक बदली सी लग रही थी.

उस की आवाज में भी उदासी थी. मौसी ने कद्रदानों के चेहरों पर गौर किया, वे भी उतने खुश नहीं थे. साफ लग रहा था कि कजरी का मन उस समय कहीं और था. गजल का दौर खत्म हुआ तो कजरी ने नए मेहमानों की तरफ रुख कर के दोनों हाथों से घूंघट पलट दिया. उस दिन उस का चेहरा बेनूर था. मानो सारे जहां की उदासी वहां सिमट आई थी. जल्दी से मेहमानों को सलाम कर के वह अपने कमरे में चली गई. अन्य लड़कियों ने भी नृत्य दिखाए, लेकिन उस दिन की महफिल बेरौनक ही रही. मेहमान नाखुशी से गए. मेहमानों की बेरुखी देख कर मौसी भी नाखुश थी. उस दिन पहली मर्तबा कजरी ने सभी को निराश किया था.

मेहमानों के रुखसत होते ही मौसी सीधे कजरी के कमरे में पहुंची. वह बिस्तर पर उदास बैठी नींद के आगोश में समाए मासूम बच्चे को निहार रही थी. मौसी उस के बराबर में बैठ कर बोली, ‘‘खुद को दर्द से उबार ले कजरी, तेरी वजह से आज पहली बार महफिल वीरान सी रही है.’’

‘‘कोशिश तो कर रही हूं मौसी.’’ कजरी ने उदासी से कहा.

‘‘जरा सोच इस तरह जिंदगी कैसे कटेगी? तू जो आज कमा लेगी, वह कल तेरे ही बुढ़ापे में काम आएगा.’’ मौसी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘मैं ने जमाना देखा है कजरी. तवायफ की जवानी तो सुंदर बगीचे जैसी होती है, जिस पर भंवरे दूरदूर से आ कर मंडराते हैं, लेकिन बुढ़ापा तो उजड़ा चमन किसी दोजख की तरह होता है.’’

‘‘मैं क्या करूं मौसी? जावेद की याद मेरे दिल से नहीं निकलती.’’ कजरी बोली.

‘‘बेटा, यादें जाने के लिए नहीं होतीं. फिर इस का मतलब यह भी तो नहीं कि हम अतीत को याद करकर के खुद को ही परेशान कर लें. जावेद की मोहब्बत की निशानी तो तेरे पास है.’’ मौसी ने फिर समझाया.

‘‘यही तो सहारा है मौसी.’’ कहते हुए कजरी ने बच्चे को उठा कर अपने सीने से चिपका लिया.

‘‘अपने लिए न सही, कम से कम इस बच्चे की खातिर तो दर्द से निकल जा. इसे पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बना. जिस दिन यह काबिल हो जाएगा, तू अपनी मोहब्बत पर नाज करेगी,’’ मौसी बोली, ‘‘अब तू आराम कर. इस बारे में हम कल सुबह बात करेंगे. इस के बाद कजरी उस 4 महीने के बच्चे के साथ सो गई.’’

अगले दिन दोपहर के वक्त कजरी रोजमर्रा की भांति खिड़की पर बैठी थी, लेकिन उसे बाजार सूना लग रहा था. जावेद को वह बाजार की भीड़ में दूर से पहचान लेती थी. उस के लिए निगाहों में बेकरारी होती थी. यादों के साए मंडराए तो उस ने खिड़की के कपाट बंद कर दिए और सिसकियां भरने लगी.

मौसी ने नजदीक आ कर उस के आंसू पौंछे और प्यार से गले लगा कर समझाया, ‘‘कब तक गम मनाएगी पगली. जाने वाले कभी लौट कर नहीं आया करते.’’ मौसी की बातें उस के दिल पर फाहा रख देती थीं, ‘‘हम तवायफें हैं बेटा. दर्द से हमारा करीब कर रिश्ता होता है. अब तू काम में मन लगा कर बच्चे की परवरिश की सोच.’’

मौसी की बातें ठीक थीं. चंद रोज में ही कजरी का उस बच्चे से गहरा रिश्ता हो गया था. उस का नाम अकरम था. वह हर तरह से उस का खयाल रखती और अपने से चिपकाए रखती. अकरम उस की मोहब्बत की निशानी था. कजरी ने सोच लिया था कि अब वह उस के लिए मां का हर फर्ज निभाएगी.  4 महीने का अकरम उस की मोहब्बत की निशानी तो था, लेकिन वह उस की अपनी औलाद नहीं था. वह बिन ब्याही मां भी नहीं थी. बावजूद इस के मां होने के सभी अहसास से वह रूबरू हो गई थी. वक्त की अजीब चाल से वह जिस किरदार में पहुंची थी, उस के पीछे भी एक रोचक कहानी थी—

दरअसल, कजरी खानदानी तवायफ थी. 15 साल पहले उस के घर वालों ने उसे उत्तर प्रदेश के एक बड़े शहर में उस की मौसी रानी के पास भेज दिया था. रानी का अपना कोठा था. किसी तवायफ का अपना कोठा होना बिरादरी में बड़ी बात होती है. पूरे तवायफ बाजार में रानी का रुतबा था. कजरी को वह बेटी की तरह मानती थी. रानी के चाहने पर ही कजरी को उस के पास भेजा गया था. कुछ ही दिनों में कजरी वहां के माहौल में रचबस गई थी. रानी के कोठे पर यूं तो और लड़कियां भी थीं, लेकिन कजरी उन में सब से ज्यादा खूबसूरत और नाचगाने की कला में पारंगत थी.

कुछ ही दिनों में कजरी कोठे के सारे तौरतरीके जान गई. जल्दी ही कजरी का जादू रानी के कोठे पर आने वाले लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा. तवायफों की सच्ची मोहब्बत दौलत होती है. कजरी आई तो रानी की झोली में नोटों की जैसे बारिश होने लगी. कजरी उस की सगी बहन की बेटी थी, इसलिए पैसे का बंटवारा भी नहीं होता था. मौसी ने कह दिया था कि उस के कोठे की उत्तराधिकारी कजरी ही होगी. कजरी के चर्चे ऐसे हुए कि कद्रदान भी वहां आने लगे.

कजरी अपने पेशे की हकीकत जानती थी. ऐसा नहीं था कि वहां आने वाले सभी लोग नाचगाने के ही शौकीन होते थे. बहुतों की ख्वाहिश उस से आगे होती थी. तब मोटी रकम के बदले मौसी उन के कदमों को बढ़ा देती थी. कजरी जानती थी कि आज नहीं तो कल, उसे यह सब अपनाना ही पड़ेगा, क्योंकि यह उस के खानदान की परंपरा रही थी. रानी मौसी उसे अपने खानदान में नानी के जमाने तक के रोमांचक किस्से भी सुनाया करती थी.

रानी का ताल्लुक जिस जाति से था, वहां तवायफ होना कोई बुरी बात नहीं थी. वह बताती थी कि किस तरह धन्नासेठों से ले कर बड़े जमींदार तक उस के मुरीद थे. दरअसल उस की मां रेशमाबाई का ऐसा नाम था, जिन की महफिल में 5 सौ मील से भी लोग चल कर आते थे. उन्हें विशेष मौकों पर अपने यहां इज्जत से बुलाया जाता था. उन के लिए बैलगाड़ी या घोड़ाबग्गी भेजी जाती थी. उस जमाने में रईस लोगों के पास यातायात का यही साधन होता था. जिस के पास बैलों की जोडि़यां होती थीं, दूरदूर के गांवों तक उन का नाम होता था.

रेशमा के पास तबला व हारमोनियम वाले अपने उस्ताद थे. उन की उंगलियों की थिरकन से निकलने वाला संगीत महफिल में चारचांद लगा दिया करता था. मशालों, लालटेन व मिट्टी के तेल वाले हंडों की रौशनी में महफिल पूरे अदब से सजती थी. नक्काशीदार सुराहियों में मदिरा भर कर मेहमानों को पीतल के बेलुओं व कटोरों में परोसा जाता था. रेशमाबाई जब लहरा कर नाचती थी तो रात जैसे जवान हो जाती थी. लोगों के दिलों में चटक कर जैसे कलियां सी खिलती थीं. हर कोई बेसाख्ता कह उठता था, ‘‘वाह, रेशमाबाई, कमाल कर दिया तुम ने.’’

महफिल में फिर नाचगाने की फरमाइश होती तो रेशमा पानी पी कर फिर नए सुरताल पर थिरकने लगती. रेशमा ने जमाना देखा था. उन्होंने अपने सामने जवानों को बूढ़ा व बच्चों को जवान होते देखा था. दोनों ही पीढि़यां उन की कला की कद्रदान थी. रेशमा महफिलों से अशर्फियां ले कर निकलती थीं. खास बात यह थी कि इस तरह के चंद अवसरों को छोड़ कर महफिल में फूहड़ता नहीं होती थी. इस की वजह यह थी कि रईस लोग अमीराना तरीके से अदब से रहते थे. तवायफ होने का मतलब उन्हें बेइज्जत करना नहीं था. रेशमाबाई ने कला के दम पर ही दौलत और शोहरत कमाई थी. दरजनों तवायफों ने उन्हें अपनी उस्ताद मान कर कला के हुनर सीखे थे.

घुंघरू बांध कर तबले पर थिरक देना भर ही उन के लिए कला नहीं थी. कितनी थाप पर कितनी बार पैरों, कमर, गरदन व कलाइयों में थिरकन हो, इस तक का हिसाब पारखी नजरों व उंगलियों पर रखा जाता था. जरा सी गलती होने पर वह टोक देती थीं, ‘‘अपने कदमों को ताल से मिलाओ बेटियों, वरना मेरा नाम भी खराब कर दोगी. लोग कहेंगे कि रेशमा जैसी उस्ताद की चेलियां बढि़या नहीं नाचतीं.’’

वह समझाती थीं कि हुस्न के साथ कला भी जरूरी है. जो कला के फन में माहिर होता है वह कभी भूखा नहीं मरता. कुदरत कला को तब और भी निखार देती है, जब कोई उस के लिए दिल से जिए. बारबार गलती करने पर सजा भी दी जाती थी. दरअसल जिसे उस्ताद समझा जाता था, उसे बहुत इज्जत बख्शी जाती थी. दूसरे शब्दों में मातापिता से भी ज्यादा अधिकार उस्ताद या गुरु के पास होते थे. उस्ताद के कहे शब्द पत्थर की लकीर हुआ करते थे. उस के खिलाफ जाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता था.

रेशमा अपने साथ एक पानदान जरूर रखती थी. वह कांसे का बना था. उस पर खूबसूरत नक्काशी के साथ मूंगे भी जड़े थे, जिस में अलगअलग आकार के खाने बने थे. उस में पका कर फेंटा गया सुर्ख कत्था, छाली (सुपारी), खुशबूदार इलायची और गीले कपड़े में गोलाई से बांध कर पान रखे होते थे. जो लड़की नानी को उस्ताद मानती थीं, वे उस में साफ सुपारियां सरौते से कतर कर रख दिया करती थीं.

वह बताती थी कि पानदान उन की मां के जमाने का था. दूर कस्बे का एक पंसारी नानी की कला का मुरीद था. एक पोटली में वह ताजा सुपारियां दे जाया करता था. वह कहता था, ‘‘रेशमा तुम्हारे लिए ताजा सुपारियों के ढेर से ये नगीने निकाल कर लाता हूं. मैं ने अपने तिजारती को बोला हुआ है कि मुझे माल एकदम बेहतरीन चाहिए.’’

तब रेशमा खुश हो कर कहतीं, ‘‘हां, हां खूब समझती हूं. रेह लाए हो या नहीं?’’

‘‘गुस्ताखी माफ, वह तो भूल ही गया. अगली बार आऊंगा तो ले आऊंगा.’’ रेह दरअसल कपड़े धोने वाली मिट्टी थी. पहले साबुन नहीं था और देहात के इलाकों में लोग कपड़े धोने में इसी मिट्टी का इस्तेमाल किया करते थे.

रेशमा नामी पंसारी के आने का मकसद खूब समझती थी. वह ऐसे वक्त ही आता था, जब वह लड़कियों को कला सिखा रही होती थी. कुछ देर बैठ कर वह चला जाता था. तब के बड़े दुकानदार, तिजारत करने वाले सूदखोर भी हुआ करते थे, जो अपने बहीखातों में न जाने कितनों की मजबूरियां कैद किए रखते थे. रेशमा के पास आने वाले उस पंसारी की पहचान सूदखोर के रूप में भी थी. जातेजाते एक दिन उस ने कहा, ‘‘रेशमा, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरूर बताना.’’

‘‘सेवा तो है पंसारी बाबू.’’ रेशमा ने झट से कह दिया.

उस ने एकदम अधीर हो कर पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘तुम जितनी बार यहां आया करो, उतनी बार अपने बहीखाते से किसी गरीब की मजबूरियों को आजाद कर दिया करो.’’ रेशमा के इतना कहने पर उस व्यापारी को मानो झटका सा लगा. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरा पेशा ही ऐसा है तो क्या करूं.’’

‘‘पेशा तो हमारा भी है, लेकिन लोगों की दुआएं भी ले लिया करो. बुरे वक्त में काम आया करती हैं.’’ यह सुनते ही खिन्नतापूर्ण मौन धारण कर के वह चला गया था.

शादियों के मौकों पर रेशमा की व्यस्तता बढ़ जाती थी. दरअसल शादियां पहले महज एक रात या दिन की नहीं होती थीं. बारातें एकएक सप्ताह रुका करती थीं. इस दौरान उन की खूब आवभगत हुआ करती थी. खाना ढाक के चौड़े सूखे पत्तों से बनी पत्तलों पर परोसा जाता था. चावलकढ़ी के साथ मोटे अनाज की बनी रोटियों का चलन था. चावल के साथ गन्ने के रस से बनी शक्कर व खांड भी होती थी. उड़द की धुलवां दाल व गेहूं की रोटियां तो बिरले ही बनाते थे. एक तो उन की पैदाइश कम थी, दूसरे महंगे भी होते थे. मीठे  में बूंदी के लड्डू, गन्ने के रस की खीर, कलाकंद और हलवा बनता था. खाने के साथ मट्ठे के सन्नाटे (रायते) का भी खूब चलन था.

बड़ा हो या छोटा, सभी लोग जमीन पर बैठ कर खाना खाते थे. उस जगह को पहले झाड़ू से बुहारा जाता था. फिर पानी के छींटे मार कर सूत या जूट से बुनी हुई पट्टियां बिछाई जाती थीं. कतारबद्ध बैठ कर खाना खाने वाले लोगों के इस समूह को पंगत कहते थे. सभी खाना एक साथ शुरू करते थे और एक साथ उठते थे. कोई अपना खाना खा कर बीच में ही उठ जाए तो इसे अच्छा नहीं माना जाता था. एक पंगत के उठने के बाद फिर से झाड़ू लगा कर पानी का छिड़काव किया जाता. फिर पट्टियों को झाड़ कर बिछाया जाता था. मिट्टी के मटकों, शहतूत की टहनियों (शाखाओं) से बने टोकरों व कागज की रद्दी से बनी पल्लियों (बड़ेछोटे आकार के बरतन का रूप) से खाना परोसा जाता था. खाना भट्ठियों पर तांबे, पीतल के बरतनों व लोहे की कड़ाहियों में पकता था.

उस जमाने की सादगी में लोगों में इतना मेलजोल था कि सभी एकदूसरे के मेहमानों की सेवा में जुट जाते थे. पड़ोसियों के बीच मनमुटाव या कोई भेदभाव नहीं होता था. छलकपट से दूर लोगों में आपसी प्रेम बहुत होता था. बड़ेबुजुर्गों को इतनी इज्जत बख्शी जाती थी कि धमाचौकड़ी मचाते व गलती करते बच्चे छिप जाया करते थे या एकदम शरीफ बन कर दुआसलाम करते थे. उन्हें डांटे जाने व घर पर शिकायत होने का डर होता था. यदि कोई जना बच्चे की गलती की शिकायत उस के मांबाप से करता था तो मातापिता नाराज नहीं होते थे, बल्कि खुश होते थे कि कोई अपना ही बच्चों की गलतियां बता रहा है.

मेहमानों के मनोरंजन के लिए महफिलें सजाई जाती थीं. अपनीअपनी हैसियत के अनुसार तवायफों को बुलाया जाता था. रेशमा ऐसी ही महफिलों में व्यस्त हो जाती थी. समय के साथ नानी के कदम बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे थे. अब वह सिर्फ एक उस्ताद बन कर रह गई थीं. उन्होंने अपना पंसदीदा फूलों के छापे वाला चूड़ीदार लहंगा, जिस में रंगबिरंगे गोटे लगे थे, कोटी (कमर के ऊपर का ब्लाउजनुमा कपड़ा) व ओढ़नी (दुपट्टे का रूप) पुराने संदूक में सहेज कर रख दिया था. बरसात के बाद सीलन दूर करने के लिए वह उन्हें धूप दिखा दिया करती थीं. आभूषणों में कंठा, हार, कड़े, पायल, माथे का टीका व तगड़ी भी उन के पास थी. तगडि़यां अधिकांश चांदी की होती थीं, जिन्हें लहंगे के ऊपर कमर पर सजाते हुए पहना जाता था. अपनी बेटियों को उन्होंने कला सिखा दी थी. रानी मौसी भी उन में से एक थी.

कजरी नाचगाना बचपन से ही सीखती आई थी. वह जवानी की दहलीज पर पहुंची तो उसे मौसी के पास भेज दिया गया था. तवायफों को एक सबक यह भी दिया जाता था कि मोहब्बत जैसी गिरफ्त से दूर रहो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि उन में दिल या नाजुक भावनाएं नहीं होती. यह बात अलग थी कि कजरी के दिल पर अब तक किसी ने दस्तक नहीं दी थी. जिंदगी के किसी मोड़ पर किस को किस से मोहब्बत हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. कोठे पर आने वाले नए कद्रदानों में एक कद्रदान से उस की भी नजरें चार हो गईं. उस का नाम जावेद था. नौजवान जावेद उसी शहर का बाशिंदा था. एक दिन वह कजरी से बोला, ‘‘मेरे पास इतनी दौलत तो नहीं है, जो तुम्हें उस से खुश रखूं, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए चाहत है.’’

कजरी ने उस की बात हंसते हुए एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी थी.

जावेद का कोठे पर आने का सिलसिला शुरू हो गया. कजरी समझ गई कि वह उस पर डोरे डालने की कोशिश कर रहा है. उस की आंखों में एक अजीब सी कशिश होती थी. इसी कशिश ने ताकीदों के बावजूद कजरी के दिल पर दस्तक दे दी. यह सोच कर परेशान भी थी कि तवायफों से लोग इस तरह तो दिली रिश्ता कायम नहीं करते. वह पैसा फेंक कर तमाशा देख कर चले जाते हैं. वह तवायफ थी. उस की शख्शियत किसी को इस कदर प्रभावित कर रही थी. यह अजीब सी ही बात थी. उलझन तब वाकई बहुत बढ़ जाती थी, जब आप को पता हो कि सामने वाला जान कर भी अंजान बन रहा है. कजरी ने उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की.

दूसरी तरफ जावेद ने सोचा कि कभी तो कजरी उस की चाहत कबूल कर लेगी. उस के पास जाते समय उस के दिल में उम्मीद का एक दीया रौशन होता था, लेकिन वापसी तक दिल में अंधेरा ही होता था. रौशनी और अंधेरे का यह खेल कई दिनों तक चलता रहा. जावेद के इस जुनून को देख कर कजरी उस से बातें कर लिया करती थी. बातों से ही उसे पता चला कि जावेद शादीशुदा है. यह बात साफगोई से जावेद ने उसे खुद बताई थी. कजरी ने उसे समझाया जरूर कि वह उस के ज्यादा चक्कर में न पड़े, लेकिन जावेद की भावनाओं ने उस पर ऐसा असर डाला कि वह भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी.

हालांकि वह यह भी जानती थी कि उस की मोहब्बत किसी मुकाम पर नहीं पहुंचेगी, क्योंकि न तो वह अपना पेशा छोड़ सकती थी और न जावेद समाज में उसे अपना सकता था. फिर भी वह जावेद को अपने दिल से नहीं निकाल पा रही थी. दिलों में उठते अरमानों का सिलसिला चाहत के दरख्त के अंतिम छोर पर पहुंचा तो जावेद ने एक दिन उसे दिल की बात बताने का फैसला कर लिया.

एक दिन वह कजरी के पास आया. कुछ देर बातचीत कर के वह जाने लगी तो वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘कजरी मेरी बात सुनो.’’

‘‘फरमाइए?’’ कजरी ने अदा के साथ कहा.

‘‘मैं तुम से दिली मोहब्बत करता हूं.’’ जावेद ने एक ही बार में मन की बात कह दी.

कजरी ने नजाकत के साथ अपने होंठों पर प्यारी मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘यह तो हम बहुत पहले से जानते हैं. हम इसे कबूल कर लेते हैं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ वह आश्चर्य से उस का चेहरा देखते हुए बोला.

‘‘तुम निकाहशुदा शख्स हो.’’ कजरी बोली.

‘‘वह ठीक, लेकिन यकीन मानो मैं इस मोहब्बत की खातिर अपनी बीवी का दिल नहीं दिखाऊंगा.’’ जावेद ने साफसाफ बता दिया.

कजरी जानती थी, जावेद दिल से नेक इंसान है. वह उसे समझा कर भी थक चुकी थी. न जाने कौन से पल थे, जो सारी बातें जानने के बावजूद उस की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गई थी. कोई रास्ता न देख उस ने मोहब्बत कबूल कर ली थी.

इस के बावजूद उस ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘तवायफ के कोठे पर आते हो, जानते हो जमाना क्या कहेगा?’’

जावेद आशिकाना अंदाज में अपने सीने पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जमाना चाहे कुछ भी कहे, मुझे इस की चिंता नहीं.’’ वह मुसकरा कर बोला, ‘‘एक और बात कहूं कजरी?’’

‘‘बिलकुल.’’ लंबी सांस लेते हुए कजरी ने कहा.

‘‘मैं अपनी मोहब्बत को ताजिंदगी आबाद रखूंगा.’’

उस की बातें सुन कर कजरी के पास कहने को कुछ नहीं रहा. क्योंकि जावेद की मोहब्बत में कोई स्वार्थ नहीं था. इसी तरह उन की मोहब्बत आगे बढ़ती रही. मोहब्बत के पक्षी की उड़ान कितनी ऊंची होती है, आज तक कोई नहीं जान पाया. वैसे तो जावेद रोजाना ही कजरी से मिलने आता था, पर एक बार कई दिनों तक वह उस के पास नहीं आया तो उसे चिंता सताने लगी. जावेद के इंतजार में वह हर रोज खिड़की के सामने बैठ जाया करती. सड़क पर आनेजाने वाले लोगों में उस की नजरें जावेद को तलाशती थीं. लेकिन उस की आंखें थक जाती थीं. वह दिखाई नहीं देता.

वह एक अजीब कशमकश के दौर से गुजर रही थी. उसे यह तक नहीं पता था कि जावेद रहता कहां है. उस ने अपने दिल को समझाया कि यदि पता भी होता तो भी वह शायद उस की दहलीज पर नहीं जा पाती. इस से उस की बीवी की नजरों में छिपा रिश्ता उजागर होने से तूफान खड़ा हो सकता था. तकरीबन 15 दिनों बाद उसे जावेद आता दिखाई दिया तो उस की आंखों को जैसे करार मिला. वह ऊपर आया तो वह अपनेपन से शिकायत लहजे में बोली, ‘‘कहां थे इतने दिन? मुझे कितनी फिक्र हो रही थी.’’

‘‘मेरी तबीयत खराब थी कजरी. तुम से मिलने की बेकरारी मुझे भी बेचैन करती थी, लेकिन बुखार ने जैसे शरीर की जान ही निकाल ली थी.अब चलने के काबिल हुआ तो चला आया.’’

‘‘पता है जावेद, मैं ने कभी किसी के लिए इतनी तड़प महसूस नहीं की, जो तुम्हारे लिए की है.’’

जावेद को उस की नरगिसी आंखों में बेपनाह मोहब्बत का दरिया तैरता नजर आ रहा था. वक्त के साथ उन की मोहब्बत का सिलसिला चलता रहा. एक दिन जावेद उस के पास आया तो दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं. जावेद ने मोहब्बत से कजरी को अपनी बांहों के दायरे में ले लिया. कजरी का सारा शरीर रोमांचित हो गया. मोहब्बत की पनाह में सिर रखा तो जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में खो गई. जावेद के प्यार की कशिश दिनबदिन उसे उस के नजदीक ले जा रही थी.

उस की मोहब्बत का किस्सा मौसी से छिपा नहीं रहा. वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘ऐसे चक्कर में ना पड़ कजरी.’’

तब कजरी सफाई देती, ‘‘मौसी वह दिल का अच्छा है और वाकई मुझ से मोहब्बत करता है.’’

इस पर मौसी ने हंस कर कहा, ‘‘देख बेटी, हम ठहरीं तवायफें. हमारे लिए दिल से की गई मोहब्बत किसी ग्रहण की तरह होती है. तुम यह ग्रहण अपनी जिंदगी में क्यों लगा रही हो. हमारे नसीब में पाक मोहब्बत नहीं होती.’’ मौसी इतने पर ही नहीं रुकी, ‘‘पहले मोहब्बत फिर शादी. अरे पगली हम सदा सुहागनें होती हैं. शादियां नहीं करतीं, लेकिन सोलह शृंगार करती हैं. वह इसलिए कि हमारे कद्रदान खुश रहें. हमारे पास आते रहें.’’

जावेद की मोहब्बत पा कर कजरी बेहद खुश थी. ऊपर वाले ने उसे जैसे खुशियों से नवाज दिया था. खुशियों के बीच कभीकभी अंधेरे साए भी मंडरा जाया करते हैं. अनहोनी जैसे शिद्दत से उन के पीछे आ रही थी. एक दिन कजरी को एक आदमी ने आ कर बताया, ‘‘जावेद का ऐक्सीडैंट हो गया है. अस्पताल में उस की हालत नाजुक है और तुम्हें अपने पास बुलाया है.’’

यह सुन कर एक लम्हे के लिए कजरी के हवास उड़ गए. उस का कलेजा धक्क से रह गया. उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था. उस ने रानी मौसी को साथ लिया और बताए गए अस्पताल पहुंच गई. पता चला कि जावेद अपनी बीवी और 4 महीने के फूल से बेटे के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था, तभी दुर्घटना का शिकार हो गया था. जावेद और उस की बीवी बुरी तरह घायल थे, जबकि बेटा सहीसलामत था. यह हालत देख कर कजरी की आंखों में आंसुओं के सिवा कुछ नहीं था. जावेद की हालत बिगड़ती जा रही थी.

वह लगातार कजरी को निहारे जा रहा था. कुछ इस तरह जैसे अलविदा कहने से पहले कोई किसी को जी भर कर निहार लेना चाहता था. उस ने कजरी से कहा, ‘‘कजरी, मैं शायद न बच पाऊं, लेकिन तुम मुझ से एक वादा करो.’’

‘‘क्या?’’ कजरी ने पूछा.

‘‘मेरा अपना तो कोई नहीं है. मुझे व मेरी बीवी को यदि कुछ हो जाए तो तुम मेरे बेटे अकरम की हमारे मजहब के हिसाब से बेहतर परवरिश कर देना.’’

कजरी के लिए सब कुछ बुरे ख्वाब जैसा था. वक्त जैसे थम सा गया था. कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था. कुछ देर बाद जावेद और उस की बीवी ने दम तोड़ दिया. जावेद की इस तरह हुई मौत कजरी पर बिजली बन कर गिरी थी. मौसी के शब्द भी जैसे कानों में गूंज रहे थे कि तवायफों के नसीब में पाक मोहब्बत नहीं हुआ करती. जावेद के दूरदराज के रिश्तेदार थे. खबर मिलने पर वे भी आ गए थे. उन्होंने ही जावेद और उस की बीवी को नमाज ए जनाजा के बाद सुपुर्द ए खाक कर दिया. जावेद ने जो आखिरी ख्वाहिश जाहिर की थी, उस पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं था.

कजरी ने अकरम को अपना लिया. जावेद की जुदाई के गम में ही वह आंसू बहाती थी. और तभी से रात की महफिल में घुंघरुओं की खनक जाती रही. गम दिलोदिमाग पर काबिज था, इसलिए महफिल बेरौनक हो गई थी. मौसी ने उसे समझाने की भरसक कोशिश की. कजरी ने किसी तरह खुद को संभाल लिया. इस के बाद उस के दिल में किसी शख्स के लिए मोहब्बत की धड़कन जैसे हमेशा के लिए बंद हो गई. कजरी तवायफ थी. यह उस का खानदानी पेशा था. उस के हिसाब से उसे छोड़ा नहीं जा सकता था और वह छोड़ना भी नहीं चाहती थी.

क्योंकि उस के पास कमाई का और कोई जरिया नहीं था. हालांकि वह नहीं चाहती थी कि कोठे के माहौल में अकरम की परवरिश हो. वह उसे पढ़ाना चाहती थी. इसलिए जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो कजरी ने उस का दाखिला शहर के एक नामी स्कूल में करा दिया. स्कूल में हौस्टल भी था, जहां दूरदूर से आए बच्चे रह कर पढ़ते थे. अपने माहौल से दूर रखने के लिए उस ने अकरम को हौस्टल में रख दिया. उस की मां के रूप में अपना नाम लिखाया. कजरी हफ्तापंद्रह दिन में अकरम से मिलने जाया करती थी. वह उसे घुमाने भी ले जाती थी.

वह उस की परवरिश मुसलिम रीतिरिवाज से कर रही थी. बाजारों की रौनक ईद की नजदीकी का ऐलान करती तो वह अकरम को बाजार भी घुमाती. अकरम की खुशियों में ही उस की खुशियों की दुनिया सिमटी हुई थी. अकरम के मनपसंद के कपड़े सिलवाए जाते और ईद पर सिवइयां बना कर मुंह मीठा कराया जाता. मुसलिम रस्मोरिवाज को अकरम अच्छे से समझ सके, इसलिए वह बीचबीच में उसे मदरसे में तालीम भी दिलाती. ईद पर ईदगाह पर अकरम कजरी के साथ ही नमाज अदा करने जाया करता.

समय अपनी गति से चलता रहा. वह अपने पेशे से जो कमाती, उसी से बेटे की फीस भरती और उस के बाकी खर्चे उठाती. समाज से वह यह राज छिपाने की कोशिश करती रही कि उस की मोहब्बत की निशानी नामी स्कूल में पढ़ रहा है. वह नहीं चहती थी कि अकरम की पढ़ाई में उस की वजह से कोई परेशानी आए. अकरम बड़ा हो गया था. वह सीबीएसई बोर्ड में पढ़ाई करते हुए हाईस्कूल में आ गया था.

अकरम का वार्षिक परीक्षाफल आया तो पता चला कि उस ने अपनी कक्षा में टौप किया है. बेटे की इस उड़ान से कजरी बेहद खुश थी. बेटा उस की उम्मीदों पर खरा उतरा था. खुशियों और नाखुशियों की दस्तक वक्त के हाथ में होती है. इंसान कठपुतली बनता है और वक्त सब तय कर देता है. कजरी भी वक्त की इस चाल का शिकार हुई. अकरम के स्कूल में कोई नहीं जानता था कि अकरम की मां कजरी का पेशा क्या है? लेकिन एक दिन यह राज बेपर्दा हुआ तो कजरी के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

दरअसल, वह अकरम का रिजल्ट लेने उस के स्कूल गई थी. वहां छात्रों की भीड़ थी. अकरम टौपर छात्र था. उस की फोटो के साथ कब कजरी का फोटो भी खिंच गया. यह उसे पता ही नहीं चला. वह फोटो अखबार में छपा तो रात के अंधेरे में मुंह छिपा कर कजरी के कोठे पर जाने वाले उजले चेहरे वालों ने उसे पहचान लिया. बस, यहीं से जैसे कयामत की बुनियाद रख दी गई. लोगों की फितरत होती है, वह इस तरह की बातों को सामने लाने में पूरी जान लगा देते हैं. मनोविज्ञान के हिसाब से यह एक बीमारी है. यह बात स्कूल प्रबंधन तक पहुंचा दी गई.

कथित सभ्य समाज के लोगों के तर्क थे कि इस से उन के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. वह किसी तवायफ के बेटे के साथ अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकते. यह बात अलग थी कि ऐसी तवायफों के पहलू में ही हजारोंलाखों कथित सभ्य लोग समाज में मुंह छिपा कर अपने गम मिटाया करते हैं. नोटों की खनक पर उन्हें एक रात की दुलहन बना कर मोहब्बत बरसाते हैं.

कायदे से तो कजरी की तारीफ होनी चाहिए थी कि उस ने गलीच समझे जाने वाले ऐसे पेशे में रह कर भी बेटे की जिंदगी को रोशन कर दिया था. परंतु हुआ इस का उलटा. स्कूल प्रबंधन ने कजरी को स्कूल बुला कर कहा, ‘‘माफ करना, हमें आप के बेटे को स्कूल से निकालना होगा.’’

‘‘ऐसा मत कीजिए. मेरा बच्चा तो नर्सरी से आप के यहां पढ़ रहा है. वह होनहार है.’’ आहत कजरी ने हाथ जोड़ लिए.

‘‘तब हमें पता नहीं था.’’

कजरी की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘क्या मैं इंसान नहीं हूं या मेरा बेटा इंसान नहीं है? कौन कहता है कि तवायफ के बेटे को पढ़ने का हक नहीं है? मैं उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती हूं. मैं तो पहले ही अपने कलेजे के टुकड़े को दूर रखे हुए हूं. ऊपर से आप इस तरह की बात कह रहे हैं.’’

कजरी की बातें अपनी जगह ठीक थीं, लेकिन उन्हें मानने को कोई तैयार नहीं था. स्कूल प्रबंधन ने उस की एक न सुनी.

‘‘मुझे थोड़ा वक्त दीजिए.’’ कह कर कजरी वहां से चली आई. उस का अपमान हुआ था, लेकिन वह जिस पेशे में थी, उस में मानअपमान के उस के लिए कोई मायने नहीं थे. कजरी एक सामाजिक संस्था की संचालक को जानती थी. कजरी की वह बहुत इज्जत करती थी. अकरम के दाखिले में भी उन्होंने ही भूमिका निभाई थी. कजरी ने नई मुसीबत उन्हें बताई.

कजरी की समस्या बड़ी जटिल थी. फिर भी उन्होंने वादा किया कि उस का बेटा उसी स्कूल में पढ़ेगा. कोई भी उसे जबरदस्ती नहीं निकाल सकेगा. सामाजिक संस्था संचालिका स्कूल गई. तर्कवितर्क के बीच उन की स्कूल प्रबंधन के साथ हंगामा हुआ. स्कूल के पास टौपर छात्र को निकालने की कोई मजबूत वजह नहीं थी. एनजीओ की दखल के बाद उन्हें अपना निर्णय बदलना पड़ा. अकरम हौस्टल में ही रहा.

उम्र और वक्त ने अकरम को भी समझदार बना दिया था. उस ने कजरी से कभी अपने पिता का नाम नहीं पूछा. शायद उसे अंदाज हो गया था कि तवायफों के बच्चों के पिता नहीं हुआ करते. समय चक्र और स्कूल में हुई बेरुखी की घटना से आहत अकरम जान चुका था कि उस की मां का पेशा इज्जत का नहीं है. एक दिन वह कजरी की गोद में सिर रख कर बोला, ‘‘आप को पता है कि मैं काबिल बन कर सब से पहला क्या काम करूंगा.’’

‘‘क्या?’’ कजरी आश्चर्य से बोली.

‘‘आप को इस माहौल से निकालूंगा.’’

उस की बात और प्यार से कजरी की आंखें नम हो गईं, ‘‘मैं अपने हालात से खुश हूं अकरम. बस, तू कामयाब हो जा.’’

कजरी अकरम की हर वह ख्वाहिश पूरी करती है, जिस का वह तलबगार होता है. वह मातापिता दोनों का प्यार उसे दे रही है. उस की जिंदगी का एक ही बड़ा मकसद है कि अकरम बड़ा हो कर एक अच्छा इंसान बने. कजरी का किरदार वाकई बहुत ऊंचा है, लेकिन उस के पेशे की पहचान उसे आगे नहीं आने दे रही. वह जानती है कि समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा. बेटे के भविष्य की फिक्र भी उस के कदमों को थामे रखती है. वह असल जिंदगी में मां नहीं बनी, लेकिन उस में एक मां का अहसास है. दिल में प्यार है और समर्पण भी.

कजरी अकरम को बताना नहीं चाहती कि वह उस की असल मां नहीं है. वह नहीं चाहती कि उस के बेटे का दिल टूटे. ढोलक की थाप और घुंघरुओं के शोर में जिम्मेदारी और मोहब्बत का वादा उस के कानों में गूंजता है. कजरी ने अपनी मोहब्बत और मां के फर्ज के लिए जो कर दिया, वह वाकई प्रशंसनीय है. जो लोग कजरी की इस हकीकत को जानते हैं, वे उस की दिल से इज्जत करते हैं. Hindi stories

—कथा सच्ची घटना पर आधारित, पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.    (सभी फोटो: मौडलिंग)

 

True Crime Story: तेजाब की आंच से ताउम्र झुलसेंगे आरोपी

True Crime Story:अपनी प्रेमिका लावण्या को पाने के लिए हरदीप ने दोस्त के साथ मिल कर तेजाब कांड को अंजाम दिया. इस कांड के बाद उसे प्रेमिका तो नहीं मिली, लेकिन अदालत से ऐसी सजा जरूर मिल गई कि ताउम्र वह प्रेमिका से नहीं मिल सकेगा.

राकेश रेखी पंजाब पुलिस के रिटायर्ड एसपी देशराज के बेटे थे. मोहाली की फेज-1 मार्केट में रुद्राक्ष ग्रुप इमीग्रेशन नाम से उन की एक कंपनी थी. उन के दफ्तर में कई युवकयुवतियां काम करते थे. धार्मिक विचारों के राकेश जब भी माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाते, अपने औफिस के कुछ कर्मचारियों को भी साथ ले जाते थे. पहली सितंबर, 2011 को भी एक कार्यक्रम बना कर अपनी फोर्ड आईकान कार नंबर सीएच03जे 2042 से माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर के लिए निकले. इस बार भी वह अपने साथ औफिस से 4 जनों को ले गए थे. कार वह खुद चला रहे थे.

स्टाफ की 25 वर्षीया स्वातिका उन के बगल वाली सीट पर बैठी थी, जबकि 24 वर्षीया शिवालिका कार की पिछली सीट पर थी. स्टाफ के 2 लोग शेर खान और नवनीत इन के पीछे दूसरी गाड़ी में आ रहे थे. राकेश को अपनी गाड़ी में पैट्रोल भरवाना था, इसलिए वह राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर मोहाली और खरड़ के बीच स्थित एक पैट्रोल पंप पर चले गए. उस समय शाम के करीब 5 बजे थे, वह अकसर उसी पैट्रोल पंप पर कार में पैट्रोल भरवाने जाते थे. पैट्रोल टैंक फुल करवाने के बाद पेमेंट करने के लिए उन्होंने खिड़की का शीशा नीचे किया कि तभी उन के ऊपर जैसे कहर बरपा गया.

विपरीत दिशा से 2 बाइक सवार उन की कार के पास पहुंचे. आगे वाले ने हैलमेट लगा रखा था, जबकि दूसरा बिना हैलमेट के था. उस के हाथ में 5 लीटर की कैन थी, जिस का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ था. जो शख्स कैन पकड़े था, वह राकेश के एकदम पास आ गया. राकेश को यह सब अजीब सा लगा. वह उस से कुछ बोलने को हुए, तभी उस युवक ने कैन में भरा तरल पदार्थ कार के अंदर बैठी युवतियों पर फेंक दिया. तरल पदार्थ फेंक कर वह युवक उसी बाइक से फरार हो गया. इस के बाद तो कार के भीतर चीखपुकार मच गई.

राकेश भी कराह उठे. कार का दरवाजा खोल कर वह बाहर आ गिरे थे. वह दर्द से तड़प रहे थे. कार के अंदर बैठी दोनों युवतियां भी चीखतीचिल्लाती हुई कार से बाहर निकल आई थीं. जरा सी देर में बात साफ हो गई कि बाइक सवारों द्वारा उन पर जो तरल पदार्थ डाला गया था, वह तेजाब था. उन का मुख्य निशाना वह लड़की थी, जो राकेश के बगल वाली सीट पर बैठी थी. वही तेजाब से सब से ज्यादा झुलसी थी. इस घटना के बाद पैट्रोल पंप पर भी अफरातफरी मच गई. कार में से बह कर तेजाब फर्श पर फैलने लगा था, जिस पर पैट्रोल पंप कर्मियों ने फोम डाल दी, ताकि अफरातफरी में वहां कोई फिसल कर न गिरे. पैट्रोल पंप कर्मियों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी और तीनों घायलों को पीजीआई अस्पताल ले गए.

सूचना मिलते ही थाना बलौंगी के थानाप्रभारी भूपेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. बाद में खरड़ के डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क और मोहाली के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद राकेश के कर्मचारी शेर खान और पैट्रोल पंप कर्मियों से घटना के बारे में पूछताछ की. घायलों से मिलने के लिए पुलिस अधिकारी पीजीआई अस्पताल भी गए और शेर खान की तरफ से अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज कर ली. एसपी ने इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए डीएसपी सुखदेव सिंह विर्क के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई.

पुलिस ने पैट्रोल पंप पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच शुरू की. इस में बाइक और उस पर सवार 2 लोग दिखाई तो दे रहे थे, मगर न तो बाइक का नंबर साफ पढ़ने में आ रहा था और न ही उस पर बैठे लड़के किसी की पहचान में आ रहे थे. घटना की सूचना पा कर राकेश की कंपनी के कई कर्मचारी अस्पताल और थाने पहुंचे. पुलिस ने उन्हें सीसीटीवी फुटेज दिखाई तो उन्होंने बताया कि तेजाब फेंकने वाला युवक उन के औफिस में काम करने वाली स्वातिका का बौयफ्रैंड हो सकता है. इस वारदात में स्वातिका भी झुलस चुकी थी, इसलिए पुलिस ने भी यही अनुमान लगाया कि शायद उस लड़के ने प्यार में नाकाम होने पर स्वातिका को निशाना बनाया होगा.

पुलिस ने जांच की तो पता चला कि स्वातिका का वह कथित बौयफ्रैंड पहले गुड़गांव में काम करता था, बाद में वह डेरा बस्ती की किसी फैक्ट्री में नौकरी करने लगा था. लेकिन इन दिनों उस के चंडीगढ़ में काम करने की जानकारी मिली. बिना नामपते के उस के पास पहुंचना आसान नहीं था. पुलिस ने स्वातिका की सहेलियों से इस बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि स्वातिका की उस लड़के से बोलचाल थी, वह उसे प्रपोज भी करने लगा था लेकिन स्वातिका उसे खास पसंद नहीं करती थी. फिर वह अकसर उसे परेशान करने लगा था. स्वातिका ने जब उस के प्रति अपना रुख सख्त किया तो वह उसे देख लेने की धमकियां भी देने लगा था.

पुलिस ने उन सभी सहेलियों से कहा कि वह उस के कथित बौयफ्रैंड का नामपता जुटाने में पुलिस का सहयोग करें. संदर्भवश बता दें कि 80 के दशक में सर्वथा पहली बार यह तेजाबकांड सुर्खियों में तब आया था, जब मध्यप्रदेश के जिला जबलपुर में एक सिरफिरे ने अपनी प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब उड़ेला था. उसे अपनी प्रेमिका पर शक था कि उस के संबंध किसी और से हैं. हालांकि उस समय निजी न्यूज चैनल नहीं थे, इस के बावजूद भी इस घटना से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद तो देश भर में इस तरह की घटनाएं जैसे आम हो गईं. मजबूरन सरकार को तेजाब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना पड़ा.

खैर, इस ताजा केस में तेजाब के हमले से 3 लोग घायल हो गए. स्वातिका 80 प्रतिशत, शिवालिका 10 प्रतिशत और राकेश रेखी 40 प्रतिशत झुलस चुके थे. तीनों पीजीआई के इमरजेंसी वार्ड में भरती थे. पुलिस अभी तक उन के बयान नहीं ले पाई थी. फिलहाल अनुमान यही लगाया जा रहा था कि यह एकतरफा प्यार का मामला है. साफ नजर आ रहा था कि स्वातिका के उन्मादी प्रेमी का निशाना वही थी, बाकी दोनों तो उस के साथ बैठे होने की वजह से लपेटे में आ गए थे. स्वातिका के कथित प्रेमी का पता लगाने को पुलिस ने अपने मुखबिर भी सक्रिय कर दिए थे. मुखबिरों से ही पता लग गया कि जिस शख्स ने तेजाब फेंका था, उस का नाम भावेश है और वह चंडीगढ़ के सेक्टर-49 का रहने वाला है.

एसएसपी के आदेश पर सीआईए इंसपेक्टर गुरचरन सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम भावेश की तलाश में उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. अगले दिन एक गुप्त सूचना के आधार पर सीआईए टीम ने भावेश को चंडीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. रातभर उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पता चला कि वह भारतीय जीवन बीमा निगम में एजेंट था. डेढ़ साल पहले स्वातिका भी एलआईसी की उसी शाखा में एजेंट थी. एक ही जगह काम करने की वजह से दोनों की आपस में मुलाकात होती रहती थी.

उसी दौरान भावेश ने स्वातिका से प्यार का इजहार कर दिया. स्वातिका ने साफ कह दिया कि वह प्यारव्यार के चक्कर में न पड़ कर, अपने संबंध केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती है. लेकिन भावेश तो जैसे उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गया. तब स्वातिका ने परेशान हो कर एलआईसी का काम ही करना बंद कर दिया. इस के बाद वह राकेश रेखी के यहां नौकरी करने लगी. भावेश को जब पता चला तो वह उस का वहां भी पीछा करने लगा. अपनी एकतरफा प्यार की कहानी तो भावेश ने तमाम शिद्दत से सुना दी. लेकिन पुलिस द्वारा अपने सभी तरीकों से पूछताछ कर लेने पर भी वह यही दोहराता रहा कि स्वातिका पर तेजाब फेंकने में उस का कोई हाथ नहीं है.

उस ने भावुक हो कर कहा था, ‘‘सर, स्वातिका को मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता हूं. उसे नुकसान पहुंचाने की तो मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता. मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उस के साथ ऐसी दुश्मनी निभाने की हिमाकत किस ने की.’’

गहन पूछताछ कर के इंसपेक्टर गुरचरन सिंह को वह बेकुसूर लगा तो उन्होंने हिदायत दे कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने जिस एंगल से जांच करनी शुरू की थी, वहां से कोई सफलता नहीं मिल पाई. पुलिस ने स्वातिका के घर वालों से भी बात की, लेकिन वहां से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से एक खास जानकारी मिली. उस सूचना पर पुलिस ने काम किया तो 16 सितंबर, 2011 को 2 ऐसे आदमी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जिन्होंने पुलिस की प्रारंभिक पूछताछ में स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही इस तेजाब कांड को अंजाम दिया था.

उन्होंने बताया कि उन का निशाना कोई और न हो कर राकेश रेखी था. दोनों लड़कियां तो राकेश के साथ कार में बैठी होने की वजह से लपेटे में आ गई थी, जिस का उन्हें भारी अफसोस हुआ. उन दोनों से की गई पूछताछ से जो खुलासा हुआ वह इस तरह से था कि गांव देसूमाजरा के रहने वाले हरदीप सिंह उर्फ दीपा और जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू आपस में गहरे दोस्त थे. बिट्टू अपना निजी कारोबार करता था और दीपा मोहाली के कस्बे कुराली में अपना नशामुक्ति केंद्र चलाता था. एक बार एक औरत अपने शराबी पति के साथ उस की शराब छुड़ाने की दरकार को ले कर दीपा के नशामुक्ति केंद्र आई. वह औरत इतनी खूबसूरत थी कि पहली ही नजर में हरदीप उर्फ दीपा का उस पर दिल आ गया. खूबसूरती के अनुरूप उस का नाम भी निहायत खूबसूरत था— लावण्या.

हरदीप अभी कुंवारा था और लावण्या शादीशुदा थी. उस से बात करने के बाद हरदीप अपने दिल पर काबू नहीं रख सका. लावण्या तो जैसे सीधे उस के दिल में उतर कर उस के तनमन को सराबोर कर गई थी.  उस के पति को हरदीप ने अपने नशामुक्ति केंद्र में भरती कर लिया. इस के बाद वह लावण्या से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा. उसे विश्वास में लेने के लिए उस ने उसे यह गारंटी दे दी थी कि आने वाले चंद महीनों में वह उस के पति में इतना सुधार कर देगा कि वह कभी शराब को हाथ नहीं लगाएगा. हरदीप की बात सुन कर लावण्या बहुत खुश हुई. बाद में वह 4-5 दिन पर पति के हालचाल जानने के लिए उस के नशामुक्ति केंद्र आने लगी. बीच में भी वह फोन कर के हरदीप से पति की जानकारी लेती रहती थी.

इस तरह लावण्या और हरदीप एकदूसरे के करीब आते गए. नशेड़ी पति के बजाय उस का झुकाव हरदीप की तरफ बढ़ता गया. लावण्या राकेश लेखी की कंपनी में काम करती थी. लावण्या का पति पुराना नशेड़ी था. इसलिए उस का नशा इतनी जल्दी नहीं छूट सकता था. इसलिए हरदीप को भरोसा था कि इस बीच वह लावण्या को अपने प्रेमजाल में फांस कर उस के पति से तलाक दिलवा कर उसे अपनी बना लेगा. इस तरह दोनों का मिलनाजुलना जारी रहा. लावण्या ने एक दफा हरदीप को मुलाकात का समय दे दिया. हरदीप निश्चित जगह पर उस का इंतजार करने लगा. काफी देर इंतजार के बाद भी वह उस से मिलने नहीं आई. हरदीप ने जब उसे फोन किया तो उस का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. इस से हरदीप को गुस्सा आ गया.

अगले दिन लावण्या ने ही हरदीप को फोन कर के मुलाकात न हो पाने की मजबूरी बताई. उस ने कहा कि उस का बौस राकेश रेखी मां चिंतपूर्णी देवी मंदिर जाता है तो कंपनी के कुछ कर्मियों को अपने साथ ले जाता है. इस के लिए कोई इनकार नहीं करता. इस दफा उस ने एकदम अंतिम समय पर उसे साथ चलने को कहा. वह उसे मना नहीं कर पाई और अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर उस के साथ चली गई. अभी तक तो हरदीप को अपनी प्रेमिका लावण्या पर नाराजगी थी. पर जब उसे पता चला कि इस में गलती लावण्या की नहीं, बल्कि उस के बौस राकेश रेखी की है तो उस का खून खौल उठा. राकेश जब भी कहीं बाहर जाते तो लावण्या को अपने साथ जरूर ले जाते थे.

इस से हरदीप राकेश को अपना जानी दुश्मन समझने लगा. मन ही मन उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. इस बारे में अपने खास दोस्त जगवंत सिंह बिट्टू से बात की तो वह उस का साथ देने को तैयार हो गया. दोनों ने राकेश को सबक सिखाने के लिए एक फूलपू्रफ योजना बना ली. हरदीप ने मोहाली की एक दुकान से तेजाब खरीदा. फिर उसे ऊपर से कटी हुई कैन में डाल लिया, ताकि वह आसानी से डाला जा सके. फिर योजना को अंजाम देने का मौका ढूंढने लगा. उसे पता चला कि पहली सितंबर को राकेश ने चिंतपूर्णी देवी जाने का प्रोग्राम बनाया है और इस बार वह लावण्या के बजाय अन्य लोगों को ले जा रहे हैं.

हरदीप औफिस से राकेश के निकलने का इंतजार करने लगा. वह मौका उसे पैट्रोल पंप पर उस समय मिल गया, जब राकेश ने पैट्रोल के पैसे देने के लिए खिड़की खोली. लेकिन जैसे ही उस ने राकेश को निशाना बना कर तेजाब फेंका, राकेश ने अपना चेहरा पीछे हटा लिया, जिस से निशाना अगली सीट पर बैठी स्वातिका बन गई. राकेश के बजाय दोनों युवतियों के जख्मी होने का हरदीप को बहुत अफसोस हुआ. दोनों अभियुक्तों से पूछताछ पूरी कर पुलिस ने उन्हें अदालत पर पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

उधर अस्पताल में भरती देहरादून की रहने वाली स्वातिका की हालत बिगड़ती जा रही थी. इन्फैक्शन बढ़ जाने के कारण 19 सितंबर को उस की अस्पताल में ही मौत हो गई. उस की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने इस केस में धारा 302 भी बढ़ा दी. तेजाब की वजह से राकेश रेखी की एक आंख की रोशनी चली गई और उन के जिस्म पर इतनी सर्जरी हुई कि इस की गिनती उन्हें भी नहीं मालूम. बिना सहारे के वह कहीं आजा भी नहीं सकते. 90 दिनों के भीतर पुलिस ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर इलाका मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर यह केस मोहाली के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह की अदालत में चला.

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को तमाम तवज्जो दे कर सुना और सभी साक्ष्यों को विधिपूर्वक जांचापरखा. अभियोजन पक्ष की ओर से 48 गवाहों ने अपने बयान अदालत में दर्ज करवाए. 27 मई, 2015 को इस केस का फैसला सुना दिए जाने की उम्मीद थी. दोनों अभियुक्तों को सुबह ही अदालत में बैठा दिया गया था. उस दिन इस चर्चित केस की सुनवाई कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई. अदालत के भीतरबाहर दोनों पक्षों की हिफाजत के लिए बाऊंसरों की भरमार थी. पुलिस द्वारा भी अदालत में आनेजाने वाले लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. किसी को भी बिना पर्याप्त चैकिंग व पूछताछ के भीतर नहीं जाने दिया जा रहा था. राकेश रेखी अभी तक भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे. वह अपने वकीलों के साथ अदालत में हाजिर थे.

सक्षम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश परमिंदरपाल सिंह ने उस दिन दोनों अभियुक्तों को धारा 302 एवं 307 का दोषी करार देते हुए 29 मई को सजा सुनाए जाने की बात कही. तब तक के लिए दोषियों को वापस जेल भिजवाने के आदेश दिए. 3 पुलिसकर्मी दोनों अभियुक्तों को ले कर कोर्ट रूम से बाहर निकले. वहां मीडिया के कुछ लोग खड़े थे, जिन्हें देखते ही दोनों अभियुक्तों ने पुलिस वालों से अपने हाथ छुड़वा कर मीडियाकर्मियों पर ही हमला बोल दिया. इस हमले में फोटो जर्नलिस्ट अमित वालिया की इन्होंने काफी पिटाई कर दी. बाद में इस पत्रकार ने इस संबंध में न केवल पुलिस को शिकायत दी, बल्कि अदालत को भी घटना के बारे में लिख कर दिया.

बहरहाल, 29 मई, 2015 को विद्वान एवं सक्षम जज परमिंदरपाल सिंह ने हरदीप सिंह उर्फ दीपा व जगवंत सिंह उर्फ बिट्टू को उक्त केस में ताउम्र कैद की सजा के अलावा 5-5 लाख रुपयों का जुरमाना भी किया. इस राशि में 4.60 लाख रुपए मृतका के परिजनों व 4.60 लाख राकेश रेखी को अदा करने के साथ 80 हजार रुपए सरकारी खजाने में जमा कराने के आदेश दिए. 29 मई, 2015 को दोनों अभियुक्तों को सजा सुनाई जानी थी. उस दिन मोहाली अदालत का परिदृश्य बाकी दिनों से एकदम अलग था. चारों तरफ पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी. दोनों अभियुक्तों के परिजन व अनेक दोस्त भी वहां पहुंचे थे. राकेश की हालत दयनीय थी, इस के बावजूद भी 50 बाउंसरों के घेरे में वहां आए हुए थे. वह अदालत के फैसले से बहुत खुश हुए.

उन का कहना था कि जिस लड़ाई को वह पिछले 4 सालों से जारी रखे हुए थे, उस का परिणाम संतोषजनक निकला. जिन लोगों ने एक युवती की जान लेने के साथ उन्हें जिंदा लाश बना कर रख दिया, उसे देखते हुए ऐसी सख्त सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए थी. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

लावण्या नाम परिवर्तित है.

True Crime Story: जयपुर की रेव पार्टी – बेटे के कंलक से आहत गुलाबो

True Crime Story: अपने कालबेलिया डांस से दुनिया भर में पहचान बनाने वाली गुलाबो की नृत्य कला वाकई अनूठी है. इसी के बूते पर उस ने दौलत और शोहरत अर्जित की, लेकिन उस के बेटे भवानी सिंह ने फार्महाउस पर रेव पार्टी कर के मां को शर्मसार तो किया ही, कानून के पचड़े में भी फंसा दिया.

उस दिन तारीख थी 31 अगस्त. रात काफी गहरा गई थी. घड़ी की सूइयों ने कुछ ही देर पहले 12 बजाए थे. कैलेंडर के हिसाब से 1 सितंबर की तारीख शुरू हो चुकी थी. जयपुर के पुलिस कमिश्नर जंगा श्रीनिवास राव अपने सरकारी आवास पर बैडरूम में लेटे सोने की तैयारी कर रहे थे. दिन भर की भागदौड़ और औफिस में लंबी सिटिंग से वह बुरी तरह थक चुके थे. बैडरूम की दीवार पर लगे टीवी पर दिन भर की खबरें चल रही थीं. उस समय करीब सभी चैनलों पर सब से ज्यादा चर्चित शीना मर्डर केस और इंद्राणी की खबरें आ रही थीं. हालांकि शीना मर्डर केस 2-3 दिनों से मीडिया में हौट बना हुआ था. उस दिन नई बात यह थी कि इंद्राणी कोर्ट में बेहोश हो गई थीं.

सीनियर आईपीएस औफिसर होने के नाते जंगा के दिमाग में इंद्राणी केस को ले कर कई तरह के सवाल उमड़घुमड़ रहे थे. साथ ही वह आजकल के सामाजिक पतन के बारे में भी सोच रहे थे. उन की सोच का दायरा उन हाईप्रोफाइल लोगों के इर्दगिर्द सिमटा था, जो धनदौलत, अय्याशी और शोहरत के लिए अपने खून के रिश्तों को भी तारतार करने में पीछे नहीं रहते.

टीवी बंद कर के राव बिस्तर पर लेट गए और आंखें मूंद कर सोने का प्रयास करने लगे. तभी उन के मोबाइल पर एक काल आई. नंबर अनजाना था. फिर भी उन्होंने फोन रिसीव करते हुए कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘पुलिस कमिश्नर साहब बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हां, मैं पुलिस कमिश्नर बोल रहा हूं.’’ राव ने शालीनता से कहा.

‘‘सर, जयपुर में एक नामी महिला के फार्महाउस पर रेव पार्टी हो रही है, जिस में विदेशी महिलाएं भी आई हुई हैं. उन के साथ कई युवक हैं, सब के सब पैसे वालों की बिगड़ी औलादें.’’ फोन करने वाले ने कहा.

‘‘आप कौन बोल रहे हैं और यह पार्टी हो कहां रही है?’’ पुलिस कमिश्नर ने फोन करने वाले से पूछा.

‘‘सर, मुझे अपना शुभचिंतक समझ लीजिए. नाम बताने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि आप के पास मेरा मोबाइल नंबर आ गया है. मैं जानता हूं, आप को झूठी सूचना दूंगा तो मुझे हवालात जाना पड़ेगा.’’ फोन करने वाले ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘सर, आप जगह पूछ रहे हैं, जो बताना जरूरी है. यह रेव पार्टी हरमाड़ा में सीकर रोड से निकलने वाली नींदड़ जयरामपुरा रोड पर हो रही है. वहां कई गाडि़यां भी खड़ी हैं.’’ कह कर सूचना देने वाले ने फोन काट दिया.

जंगा श्रीनिवास राव अनुभवी पुलिस औफिसर थे. वे फोन करने वाले की विश्वासपूर्वक कही गई बातों से ही समझ गए कि सूचना गलत नहीं है. फोन करने वाले ने केवल अपना नाम छिपाया था, नंबर नहीं इसलिए विश्वास किया जा सकता था कि सूचना सही है. नवधनाढ्य वर्ग में आजकल तरहतरह की नैतिकअनैतिक पार्टियों का चलन बढ़ रहा है. जयपुर राजस्थान का महानगर है, देश भर में हीरेजवाहरात का सब से बड़ा कारोबार जयपुर में ही होता है. कालेसफेद धंधों से अथाह पैसा कमाने वालों की संख्या रोजाना बढ़ रही है. जयपुर के चारों ओर छोटेबड़े तमाम फार्महाउस हैं.

राजनेताओं से ले कर आला अफसरों, बड़े व्यापारियों और कारोबारियों के फार्महाउसों पर आए दिन छोटीमोटी पार्टियां होती रहती हैं. लेकिन जयपुर में रेव पार्टी का आयोजन कभीकभार ही सुनने में आता है. इसलिए रेव पार्टी की सूचना पर राव ने तुरंत काररवाई करने का फैसला कर लिया. उन्होंने अपने अधीनस्थ 5 अधिकारियों को शौर्ट नोटिस पर अपने घर बुला लिया. रात करीब डेढ़ बजे तक पांचों अधिकारी पुलिस कमिश्नर के बंगले पर पहुंच गए. जंगा ने उन अधिकारियों को मोबाइल पर मिली सूचना के बारे में बताते हुए कहा कि तुरंत काररवाई करनी है.

अगर गैरकानूनी रूप से कोई पार्टी हो रही है तो कोई कितना भी बड़ा आदमी हो, उसे पकड़ने में हमें जरा भी नहीं झिझकना है. इसी के साथ पुलिस कमिश्नर ने पांचों अधिकारियों को अलगअलग थानों से 70-75 जवानों की टीम बना कर छापा मारने के निर्देश दिए. पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर पांचों अधिकारियों ने फोन कर के अपने अधीनस्थ थानाप्रभारियों को तुरंत एकएक पुलिस टीम बनाने को कहा. साथ ही उन्हें यह भी निर्देश दिए कि वह हरमाड़ा थाना इलाके में नींदड़-जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास पहुंच जाएं. कुछ ही देर में जयपुर के विभिन्न थानों से अलगअलग टीमों के साथ पुलिस की गाडि़यां दौड़ पड़ीं. दूसरी ओर पुलिस कमिश्नर के बंगले से निकल कर पांचों अधिकारी भी गणेश मंदिर के पास पहुंच गए. उस समय तक रात के लगभग 3 बज चुके थे.

जयरामपुरा रोड पर गणेश मंदिर के पास कई फार्महाउस बने हुए हैं. एडिशनल डीसीपी (पश्चिम) करण शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की टीमें गणेश मंदिर के आसपास के फार्महाउसों की टोह लेती हुई आगे बढ़ने लगीं. कुछ ही देर में पुलिस को सड़क किनारे एक फार्महाउस के अंदर कई गाडि़यां खड़ी नजर आईं. फार्महाउस में बाहर ज्यादा रोशनी नहीं थी. अंदर की ओर केवल एक बल्ब जल रहा था, लेकिन अंदर से तेज धूमधड़ाके की आवाजें आ रही थीं. पुलिस दल ने अपनी गाडि़यां कुछ दूर रोक दीं और फार्महाउस का बाहर से जायजा लिया. मेनगेट अंदर से बंद था. पुलिस दल को 2-3 लोग अंदर अंधेरे में पेड़ों के आसपास खड़े नजर आए. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि अंदर जरूर कोई न कोई पार्टी चल रही है और ये लोग बाहर की निगरानी के लिए खड़े हैं.

एडिशनल डीसीपी ने अपने साथी अधिकारियों और जवानों से तुरंत एक्शन लेने को कहा. देखते ही देखते 70 से ज्यादा पुलिस जवानों ने फार्महाउस को घेर लिया. कुछ जवान गेट फांद कर अंदर दाखिल हो गए. उन्होंने सब से पहले अंधेरे में निगरानी कर रहे लोगों को दबोचा. इस के बाद उन्होंने मेनगेट खोल कर अधिकारियों को अंदर बुला लिया. पुलिस अफसर जब फार्महाउस के अंदर एक विशाल हाल में पहुंचे तो दंग रह गए. वहां तमाम युवक डीजे की धुन पर झूम रहे थे. तेज आवाज में अंगरेजी संगीत बज रहा था. डांस के नाम पर झूमने वाले सभी युवक नशे में थे.

शराब की बोतलें खुली हुई थीं. वहां मौजूद सभी युवक बरमूडा टीशर्ट पहने हुए थे और पूरी मस्ती के मूड में थे. उन के साथ एक विदेशी युवती भी मौजूद थी. उस समय पार्टी पूरे शबाब पर थी. सारे युवा अपनेअपने तरीके से मौजमस्ती कर रहे थे. उन में से कई तो मदमस्त हो कर थिरक रहे थे. पुलिस को देखते ही पार्टी में भगदड़ मच गई. नशे में झूमते युवा इधरउधर भागने लगे. पुलिस ने भागदौड़ कर के 26 युवकों को पकड़ लिया. साथ ही पार्टी में शामिल फिनलैंड की एक युवती भी पकड़ी गई. पुलिस ने मौके से महंगी शराब की बोतलें, चरस, गांजा, एनर्जी ड्रिंक्स, शक्तिवर्धक दवाएं और आपत्तिजनक सामान के अलावा कार तथा 13 हाईपावर बाइकें जब्त कीं. पुलिस की इस काररवाई के  दौरान पार्टी में एंजौय कर रहे कई युवा अंधेरे का फायदा उठा कर इधरउधर भाग कर आसपास के फार्महाउसों में उगी फसलों में छिप गए.

फार्महाउस से पकड़े गए सभी लोगों को पुलिस हरमाड़ा थाने ले आई. वहां एडिशनल डीसीपी ने पकड़े गए युवकों से पूछताछ शुरू की तो उन्हें बड़ा झटका लगा. यह फार्महाउस अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना गुलाबो का था. दुनिया भर में अपने कालबेलिया डांस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली वही गुलाबो, दौलत और शोहरत जिस के कदम चूमती थी. स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी जिसे अपनी बहन मानते थे. कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी भी जिसे ननद मानती हैं. पकड़े गए युवाओं में गुलाबो का बेटा भवानी सिंह भी था.

पूछताछ में पता चला कि फिनलैंड की रहने वाली 24 वर्षीया युवती तरू आरियो नेपाल में अपने पुरुष मित्र के पास आई थी. तरू ने नेपाली मित्र से भारत घूमने की इच्छा जताई तो उस ने अपनी व्यस्तता के बारे में बता कर तरू आरियो को अपने एक नेपाली साथी के साथ भारत भेज दिया. तरू टूरिस्ट वीजा पर हिमाचल होते हुए राजस्थान आई थी. राजस्थान में कई जगह घूमने के बाद वह पुष्कर पहुंची थी. पुष्कर से उसे वही नेपाली युवक इस रेव पार्टी में जयपुर ले आया था. पुलिस ने पकड़े गए युवाओं की मैडिकल जांच कराई, ताकि यह पता चल सके कि उन्होंने नशे के लिए कौनकौन से ड्रग लिए थे?

आवश्यक काररवाई के बाद पुलिस ने हर्षित कौशिक, ऋषि कौशिक, सुनील मोतियानी, आकाश रोचवानी, भवानी सपेरा, अभिमन्यु, उवेश करणी, चिराग मीणा, हर्ष शेखावत, विजय प्रकाश, आलविन, राजेंद्र सैनी, पूर्व सिंह राठौड़, मुकेश धानका, कदीर, अक्षत स्थापक, आशीष भावन, प्रखर मिश्रा, श्रेय वर्मा, विशाल चंदानी, गौरव, राज शर्मा, सर्वोत्तम शर्मा, हर्ष को एनडीपीएस एक्ट में और फिनलैंड निवासी युवती तरू ओरियो को शांतिभंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए युवकों में कई निजी कालेजों के छात्र भी थे. पुलिस ने हरमाड़ा थाने में मुकदमा दर्ज कर के उस में गुलाबो को भी नामजद किया. पुलिस ने 1 सितंबर को सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया.

अदालत ने 25 युवकों को जेल भेज दिया, जबकि विदेशी युवती को जमानती मुचलके पर छोड़ दिया गया. गुलाबो के बेटे भवानी सपेरे का पुलिस ने 2 दिनों का रिमांड लिया, ताकि उस से विस्तृत पूछताछ की जा सके. बाद में उसे भी जेल भेज दिया गया. पुलिस को गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि रेव पार्टी का आयोजन गुलाबो के बेटे भवानी ने किया था. यह पार्टी भवानी के दोस्त ऋषि कौशिक ने अपने जन्मदिन की आड़ में आयोजित की थी. पकड़े गए युवक भवानी और ऋषि के जानकार थे. पुलिस के सामने यह बात भी आई कि पार्टी में आए युवाओं को भवानी ने ही स्मैक, गांजा सहित अन्य नशीले पदार्थ उपलब्ध कराए थे. पुलिस को इस फार्महाउस पर पहले भी इस तरह की पार्टियां आयोजित होने की बातें पता चली है.

भवानी की गिरफ्तारी पर पुलिस ने पुष्टि करने के लिए गुलाबो को फोन किया. गुलाबो ने पुलिस को बताया कि वह अपने भाई को राखी बांधने के लिए पुष्कर गई थी. इसी दौरान उस के बेटे भवानी का फोन आया था. उस ने कहा था कि वह रात को अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में जाएगा. इस पर गुलाबो ने भवानी को रात में जल्दी घर पहुंचने की ताकीद की थी. गुलाबो का कहना है कि भवानी ने उस से झूठ बोला और गलत गतिविधि में पकड़ा गया. अगर उस ने गलती की है तो उसे सजा मिलनी चाहिए.

बेटे भवानी के इस तरह अपने ही फार्महाउस पर आयोजित रेव पार्टी में पकड़े जाने से गुलाबो को बड़ा झटका लगा. झटका इसलिए कि उस ने जीवन भर अपनी कला और मेहनत के बल पर दुनिया में जो नाम और शोहरत हासिल की थी, वह सब बेटे भवानी ने एक ही दिन में मिट्टी में मिला दी थी. बेटे की करतूतों पर गुलाबो की परेशानी स्वाभाविक ही थी. राजस्थान के कालबेलिया समुदाय में सन 1960 में जन्मी गुलाबो अपने मातापिता की सातवीं संतान थी. गुलाबो का असली नाम धनवंतरि है. गुलाबो नाम उस के पिता ने दिया था. जन्म के एक घंटे बाद ही परिजनों ने उसे दुत्कार दिया था, लेकिन परिवार की ही एक बेऔलाद आंटी ने उसे गोद ले लिया था. गुलाबो का बचपन मातापिता की उपेक्षा और आर्थिक तंगी में गुजरा.

सपेरा परिवार से होने के कारण गुलाबो सांपों के बीच खेलतीकूदती हुई बड़ी हुई. कई बार उस ने सांपों का जूठा दूध पी कर अपनी भूख मिटाई. घरपरिवार में सांप व बीन रहती थी, इसलिए वह 2 साल की उम्र से ही बीन की धुन पर डांस करने लगी थी. जैसेजैसे वह बड़ी होती गई, उस के सपेरा नृत्य में निखार आता गया. डांस में अपने शारीरिक लोच के कारण वह बचपन से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करने लगी थी. 12 साल की उम्र में गुलाबो ने अजमेर जिले के पुष्कर में आयोजित ऊंट महोत्सव में पहली बार हजारों देसीविदेशी पर्यटकों के सामने कालबेलिया नृत्य की अपनी कला का प्रदर्शन किया.

राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से किए गए काफी प्रयासों के बाद गुलाबो के घर वालों ने उसे स्टेज पर परफौरमेंस की अनुमति दी थी. गुलाबो के घर वालों का कहना था कि कालबेलिया समाज के लोग स्टेज पर परफौरमेंस नहीं करते. गुलाबो ने पुष्कर में अपनी नृत्यकला दिखाने के बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वह पुष्कर से जयपुर, फिर दिल्ली और इस के बाद दुनिया के तमाम बड़े देशों में अपने डांस का जादू बिखेरती चली गई. इसी दौरान सन 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने विदेशों में भारत की अच्छी छवि बनाने के लिए फेस्टिवल औफ इंडिया सीरीज शुरू कराई.

इसी सीरीज में अपने नृत्य के बल पर गुलाबो ने राजीव गांधी और सोनिया गांधी का दिल जीत लिया. इस के बाद से राजीव गांधी गुलाबो को अपनी बहन मानने लगे थे. राजीव गांधी की अकाल मौत के बाद सोनिया गांधी ने भी गुलाबो पर स्नेह बनाए रखा. इसी दौरान गुलाबो की शादी सोहन नाथ से हो गई. सोहननाथ कालबेलिया समुदाय से नहीं था, लेकिन बाद में वह कालबेलिया समाज में कनवर्ट हो गया. शादी के बाद गुलाबो जयपुर आ कर शास्त्रीनगर में मकान बना कर रहने लगी.  दुनिया भर में डांस की परफौरमेंस से गुलाबो के पास शोहरत के साथ पैसा भी आया.

पैसा आया तो गुलाबो ने जयपुर में सीकर रोड स्थित नींदड़-जयरामपुरा रोड पर एक जमीन खरीद ली. बाद में इस जमीन को उस ने फार्महाउस के रूप में विकसित कर लिया. कालांतर में गुलाबो के 5 बच्चे हुए. गुलाबो रियलिटी शो बिग बौस के पांचवें सत्र की प्रतिभागी भी रह चुकी है. फिल्म अभिनेता संजय दत्त की मेजबानी वाला यह सीजन 2 अक्तूबर, 2011 से 7 जनवरी, 2012 तक प्रसारित किया गया था. इस सीजन के दिवाली स्पैशल एपिसोड की शुरुआत अभिनेता सलमान खान की मेजबानी से हुई थी. इस सत्र की विजेता अभिनेत्री जूही परमार रही थीं.

गुलाबो आज राजस्थान ही नहीं, भारतीय कला संस्कृति की रोल मौडल है. वह इंटरनेशनल कल्चर एवं म्यूजिक सर्किट का एक हिस्सा है. इतना ही नहीं, वह कई फिल्मों में मशहूर अभिनेताओं के साथ अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन भी कर चुकी है. पिछले दिनों गुलाबो ने राजस्थान के चर्चित भंवरी केस पर बनी फिल्म में एक आइटम नंबर भी किया था. इस आइटम नंबर में गुलाबो के साथ उस की 3 बेटियों ने भी अपनी नृत्य कला दिखाई है. गुलाबो हर साल डेनमार्क के कोपेनहेगन में बच्चों को डांस का प्रशिक्षण देने जाती है.

गुलाबो के डांस में बिजली जैसी तेजी और शरीर में गजब की लचक है. सलमासितारों से जड़े काले लहंगे पर कांचली कुर्ती और ओढ़नी ओढ़ कर गुलाबो जब संगीत की धुन पर फिरकी की तरह तेजी से घूमते हुए कालबेलिया डांस करती है तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं. गुलाबो कालबेलिया डांस का प्रशिक्षण स्कूल खोलना चाहती है, लेकिन फिलहाल बेटे भवानी की करतूत से उसे गहरा झटका लगा है. इस से उबरने में उसे समय लगेगा. True Crime Story