Bihar Crime News: क्या सचमुच लौट आया बिहार में जंगलराज

Bihar Crime News: 2 दशक पहले बिहार नक्सलियों के जिस कहर से आतंकित था, आतंक के वही पूत अब फिर से अपने पांव पसारने लगे हैं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के 2 इंजीनियरों की हत्या के खौफनाक मंजर से यही लगता है कि बिहार में फिर से जंगलराज लौट आया है.

बिहार के दरभंगा जिले के शिवराम चौक से बरुआर होते हुए रसियारी पुल तक 120 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग-88 का काम पिछले 2 सालों से बड़ी तेजी से चल रहा है. 750 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली इस सड़क का ठेका बीसिनैया प्राइवेट लिमिटेड एंड चड्ढा एवं चड्ढा कंस्ट्रक्शन कंपनियों को दिया गया है. काम की मौनिटरिंग रोडिया कंसल्टैंट कंपनी कर रही है. इस मार्ग के बन जाने से सहरसा से राजधानी पटना की दूरी काफी कम हो जाएगी. वैसे तो सड़क निर्माण का यह काम अक्तूबर, 2015 तक पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन किसी वजह से यह तय समय में पूरा नहीं हो सका.

सरकार की नाराजगी से कंपनियां काम को जल्द से जल्द पूरा करने में लगी थीं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह 26 दिसंबर, 2015 की दोपहर को करीब डेढ़ बजे शिवराम चौक पहुंचे और काम की मौनिटरिंग कर के वहां पड़ी प्लास्टिक की कुरसी पर बैठ गए. रोडिया कंसल्टैंट कंपनी के फील्ड इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह उन्हीं के पास खड़े हो कर काम की निगरानी कर रहे थे. राष्ट्रीय राजमार्ग होने की वजह से छोटेबड़े वाहन आजा रहे थे. उसी समय विपरीत दिशा से 2 मोटरसाइकिलें आईं और इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह के पास रुक गईं. दोनों मोटरसाइकिलों पर 4 लोग सवार थे. सभी की उम्र 20-25 साल के बीच थी. उसी समय एक मर्सिडीज कार भी वहां आ कर रुक गई.

मोटरसाइकिलों से आए लड़कों में से एक ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह से धमकी भरे अंदाज में कुछ कहा तो उन्होंने भी उसे पलट कर जवाब दे दिया. इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. उसी बीच उस लड़के ने पिस्तौल निकाल कर उन के ऊपर 3 गोलियां दाग दीं. एक गोली सिर में और 2 गोलियां उन के पेट में लगीं. गोली चलते ही वहां खड़े इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह और बाकी कर्मचारी अपनी जान बचाने के लिए भागे. लेकिन बाकी के तीनों लड़कों ने दौड़ कर इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह को एके 47 से भून दिया.

इस के बाद उन लड़कों ने वहां एक परची फेंक दी और ‘बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जिंदाबाद’, ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए चले गए. बदमाशों के जाने के बाद इधरउधर दुबके कर्मचारी बाहर निकले. घायल मुकेश और ब्रजेश बुरी तरह से तड़प रहे थे. किसी कर्मचारी ने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के इस लोमहर्षक घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद पुलिस बल ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने दोनों घायल इंजीनियरों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करने से जिले के उच्च पुलिस अधिकारियों को भी इस सनसनीखेज घटना की सूचना मिल गई थी. इसलिए एसएसपी ए.के. सत्यार्थी, एसपी (सिटी) हरकिशोर राय, डीएसपी दिलनवाज अहमद, डीएसपी (बेनीपुर) अंजनी कुमार, थाना सदर के थानाप्रभारी हरिमोहन प्रसाद, थाना बेंता के थानाप्रभारी सुरेंद्र पासवान और डौग स्क्वायड तथा फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंच गई थीं. दिल दहला देने वाली घटना की सूचना प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डीजीपी पी.के. ठाकुर तक भी पहुंच गई थी. एक महीने के भीतर इंजीनियरों के साथ हुई यह दूसरी बड़ी वारदात थी.

पुलिस ने मौके से 9 एमएम और एके 47 के 20 खोखे बरामद किए थे. सड़क निर्माण में जुटे चश्मदीदों से भी पुलिस ने पूछताछ की. घटनास्थल की जांच करने के बाद पुलिस अधिकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और लाशों का निरीक्षण कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए दरभंगा के जिला अस्पताल भिजवा दिया. इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह बेगूसराय के थाना सरलाही के गांव सोम्हो के और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह रोहताश जिले के थाना डेयरी के गांव करमनगंज के रहने वाले थे. पुलिस ने दोनों के घर वालों को घटना की सूचना दे दी थी. ए.के. सत्यार्थी ने थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद को तत्काल निलंबित कर दिया और उन की जगह पर रामशंकर सिंह को बहेड़ी का थानाप्रभारी बनाया.

दरअसल, सीताराम प्रसाद ने बगैर सूचना दिए कंपनी के प्लांट से बीएमपी के जवानों को अचानक एक दिन पहले हटा कर नगर पार्षद के चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया था. एसएसपी को इस मामले में उन की भूमिका संदिग्ध लगी, इसलिए उन्होंने उन के खिलाफ तत्काल काररवाई की थी. दिनदहाड़े 2-2 इंजीनियरों की हत्या के इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डीजीपी पी.के. ठाकुर को आड़े हाथों लिया. उन्होंने सख्त हिदायत दी कि अपराधी कितने भी पावरफुल क्यों न हों, उन की गिरफ्तारी हर हाल में होनी चाहिए. इस के बाद दरभंगा जोन के आईजी अमित कुमार जैन ने पुलिस की 8 टीमें गठित कीं और इन का नेतृत्व एसएसपी शिवदीप लांडे को सौंप दिया.

घटनास्थल से हत्यारों की जो परची मिली थी, शिवदीप लांडे ने उसे जांच के लिए भेज दिया. 24 दिनों पहले 2 दिसंबर, 2015 को जिला शिवहर में इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद की हत्या के बाद पुलिस ने वहां से भी एक परची बरामद की थी. उस परची में भी ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ का नारा लिखा था. परची की जांच में पता चला कि दोनों घटनाओं को मुकेश पाठक के गैंग ने ही अंजाम दिया था. कहने को तो पिछले 3 सालों से मुकेश पाठक गैंग का सरगना संतोझ झा गया जिले की जेल में बंद था, लेकिन वह जेल से ही अपना नेटवर्क चला रहा था. पिछले एक दशक से कुख्यात संतोष झा और मुकेश पाठक प्रदेश पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए थे.

शिवदीप लांडे ने पता लगा लिया कि मुकेश पाठक के गैंग में कौनकौन शामिल हैं. उन की तलाश में उन के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारे जाने लगे. इस का परिणाम यह निकला कि तीसरे दिन यानी 28 दिसंबर को पुलिस ने एक बदमाश पिंटू लालदेव को उस के गांव से गिरफ्तार कर लिया गया. पिंटू लालदेव बहेड़ी की ब्लाक प्रमुख मुन्नी देवी का देवर था. पुलिस को मुन्नी देवी के पति संजय लालदेव की भी तलाश थी, लेकिन वह फरार हो चुका था. मुन्नी देवी कुख्यात डान संतोष झा की बहन थी. पिंटू लालदेव को गिरफ्तार कर के पुलिस थाना बहेड़ी ले आई. सूचना मिलते ही ए.के. सत्यार्थी पूछताछ करने थाने पहुंच गए.

पुलिस ने उसे मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया का फोटो दिखा कर पूछताछ शुरू की तो थोड़ी सख्ती के बाद उस ने स्वीकार कर लिया कि मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया से उस के संबंध हैं और मुकेश पाठक के ही इशारे पर दोनों इंजीनियरों की हत्या की गई थी. पिंटू लालदेव के अपराध स्वीकार करने के बाद उसी दिन शाम को पुलिस लाइंस में ए.के. सत्यार्थी ने पत्रकारवार्ता आयोजित कर पत्रकारों के सामने आरोपी पिंटू लालदेव को पेश किया. इस के बाद उसे कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पिंटू को जेल भेजने के बाद शिवदीप लांडे ने उसी रात 2 बजे सीतामढ़ी के थाना रुन्नीसैदपुर के गांव कमलदह की घेराबंदी कर के चंद्रकेतु झा को गिरफ्तार कर लिया. चंद्रकेतु भी इस दोहरे हत्याकांड में वांछित था. इस के पहले भी वह आर्म्स एक्ट में जेल जा चुका था.

चंद्रकेतु झा से की गई पूछताछ में उस के कई साथियों के नाम पुलिस को पता चले. इस के बाद उस की निशानदेही पर पुलिस ने अलगअलग जगहों से उस के 3 साथियों चंदन झा, अंचल झा और दिलीप झा को गिरफ्तार किया. सख्ती से की गई पूछताछ में उन्होंने घटना में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. अंचल झा ने बताया कि इंजीनियरों की हत्या की योजना उसी के घर बनी थी. योजना को अंतिम रूप मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, टुन्ना झा, सुझोध झा, अभिषेक मिश्र, ऋषि झा, चंद्रकेतु झा, चंदन झा, दिलीप झा, पिंटू लालदेव और उस के बड़े भाई संजय लालदेव ने दी थी.

बदमाशों द्वारा दिए गए बयान के बाद दोहरे इंजीनियर हत्याकांड की तसवीर बिलकुल साफ हो गई. पता चला कि यह खूनी खेल गिरोह के दूसरे नंबर के खतरनाक बदमाश मुकेश पाठक के इशारे पर 75 लाख की रंगदारी न देने के एवज में खेला गया था. गिरोह के शार्प शूटर विकास झा उर्फ कालिया और अभिषेक मिश्र ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह की गोली मार कर हत्या की थी. इस के बाद पुलिस विकास और अभिषेक की तलाश में जुट गई.

पुलिस जांच के अनुसार, कुख्यात बदमाश मुकेश पाठक ने अपने साथियों विकास झा उर्फ कालिया, अभिषेक मिश्र आदि के साथ नेपाल में पनाह ले रखी थी. पुलिस ने इस बारे में नेपाल पुलिस से भी संपर्क किया. ए.के. सत्यार्थी को यह भी पता चला कि बदमाश कंपनी से पिछले 3 महीने से 75 लाख रुपए की रंगदारी की मांग कर रहे थे. घटना से एक सप्ताह पहले कंपनी के मैनेजर देवेश राठौर ने मौखिक रूप से इस की सूचना पुलिस को दी थी. मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने उसी दिन 6 बीएमपी के जवानों को सुरक्षा में लगा दिया था.

लेकिन थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद ने उन जवानों को पंचायत चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया. इस के बाद यह घटना घट गई. पुलिस ने गिरफ्तार पांचों बदमाशों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया था. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. इस कहानी के असली खलनायक माफिया डौन संतोष झा के बारे में जानना जरूरी है कि आखिर वह कौन है? बेहद कमजोर और डरडर कर जिंदगी जीने वाले संतोष झा के साथ ऐसा क्या हुआ कि गांव का एक सीधासादा नौजवान खतरनाक डौन बन गया? यहां उन पहलुओं पर रौशनी डालना बेहद जरूरी है.

37 वर्षीय संतोष झा बिहार के जिला शिवहर के पुरनहिया शहर के दोस्तियां गांव का रहने वाला था. वह एक मजदूर का बेटा था. बात उन दिनों की है, जब बिहार में नक्सलियों का बोलबाला था. इंसान गाजरमूली की तरह काटे जा रहे थे. जिस की लाठी में दम था, जयजयकार उसी की हो रही थी. जिस दोस्तियां गांव का संतोष झा रहने वाला था, उसी गांव में मुखिया नवल राय की तूती बोलती थी. उन की बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी. गांव में एक जमीन को ले कर संतोष के पिता और मुखिया नवल राय के बीच ठन गई. मुखिया उन की जमीन हथियाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाने लगा.

संतोष उस समय किशोरावस्था की दहलीज पर था. मुखिया का जुल्म जब असहनीय हो गया तो नक्सली नेता गौरीशंकर झा ने संतोष के हाथों में लाल झंडा और बंदूक थमा दी. देखतेदेखते संतोष माओवाद का एक मजबूत स्तंभ बन गया. उसी समय वह माओवादी संगठन की नीतियों को भुला कर अपराध की डगर पर चल निकला.

माओवादियों को संतोष का काम नागवार लगा तो उन्होंने उसे संगठन से निकाल दिया. इस के बाद संतोष ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नामक संगठन बना लिया. इस संगठन से उस ने कमउम्र के अतिमहत्त्वाकांक्षी युवकों को जोड़ा. उन में ज्यादातर पढ़ेलिखे युवा थे. संतोष जिस समय माओवादियों के संगठन से जुड़ा था, उसी समय उस ने परशुराम सेना नामक एक और संगठन बनाया था. उस की कमान भी उसी के हाथ में थी. संगठन जब धन और अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गया तो संतोष ने अपने दुश्मन मुखिया नवल राय से बदला लेने की योजना बनाई.

सन 1999 में रामनवमी पर नवल राय के घर के बाहर खाली मैदान में रामलीला हो रही थी. उस समय नक्सली नेता गौरीशंकर झा संतोष के साथ था. मौका मिलते ही उस ने नवल राय के ऊपर हमला बोल दिया. लेकिन इस हमले में नवल राय बालबाल बच गया. इस के बाद वह सतर्क हो गया. मगर संतोष मौके की फिराक में था. उस ने साथियों की मदद से 3 मार्च, 2003 को दोस्तियां स्थित नवल राय के मकान को डायनामाइट से उड़ा दिया. संयोग से इस हमले में भी नवल राय और उस का पूरा परिवार बालबाल बच गया.

9 महीने बाद 12 दिसंबर को संतोष ने दोबारा उस पर हमला करने की रणनीति बनाई. वह उसे मारने निकला तो किसी ने इस की मुखबिरी पुलिस से कर दी. जैसे ही वह रीगा के बराही पहुंचा, पुलिस के साथ उस की मुठभेड़ हो गई. इस मुठभेड़ में उसे कई गोलियां लगीं. इस के बावजूद वह भागने में सफल रहा. आज भी उस समय की लगी एक गोली उस के सीने में फंसी है. संतोष की बदले की आग अभी ठंडी नहीं हुई थी. नवल राय की हत्या की फिराक में वह लगा रहा. उस की हत्या तो वह नहीं कर सका, लेकिन सन 2004 में उस ने शिवहर जिले के थाना रीगा के बराही गांव के रहने वाले पूर्व मुखिया दिनेश सिंह को गोलियों से छलनी कर के मौत के घाट उतार दिया.

बेहद कमजोर और बेबस संतोष झा पूर्व मुखिया की हत्या कर के आतंक के पर्याय के रूप में जाना जाने लगा. लोगों के दिलों में उस के नाम का खौफ बैठ गया. लेकिन ज्यादा दिनों तक वह आजाद नहीं घूम पाया. पुलिस ने दिसंबर, 2004 में उसे पटना से गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. 5 साल जेल में रहने के बाद दिसंबर, 2009 में वह जमानत पर रिहा हो कर बाहर आया. जेल से बाहर आते ही वह मुखिया नवल राय के पीछे हाथ धो कर पड़ गया.

आखिरकार 15 जनवरी, 2010 को उस ने नवल राय को उसी के गांव में गोलियों से भून डाला. उस की हत्या करने के बाद जिले के अन्हारी कस्बा स्थित सेंट्रल बैंक के गार्ड की हत्या कर बैंक से लाखों रुपए लूट लिए. इन घटनाओं को अंजाम देने के बाद संतोष झा अपने गुरु और माओवादी नेता गौरीशंकर झा के पास लौट गया. गौरीशंकर झा ने संतोष को संगठन में यह कह कर लेने से मना कर दिया कि वह अपराध की डगर पर चल निकला है. गुरु की यह बात उसे काफी नागवार लगी और फिर 24 नवंबर, 2011 को उस ने अपने साथियों मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, ऋषि झा और लंकेश के साथ दोस्तियां पहुंच कर माओवादी नेता गौरीशंकर झा को मार दिया.

इस हमले में गांव के पूर्व मुखिया, उन की पत्नी देवता झा और बेटी भी बुरी तरह से घायल हो गई. संतोष झा के संगठन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ताकत उस समय दोगुनी हो गई, जब मुकेश पाठक ने उस के गैंग में कदम रखा. 32 वर्षीय मुकेश पाठक उर्फ चुटुल पाठक मूलरूप से मोतिहारी जिले के थाना मेहसी के मोरियाबाद गांव का रहने वाला था. मुकेश पाठक बचपन से ही काफी दबंग था. बातबात पर लड़ जाना उस की आदत थी. पुसाबाद, बरहरवा गांव के मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर उर्फ चुन्नू ठाकुर मुकेश के गुरु थे.

लेकिन एक किसी बात को ले कर मुखिया चंद्रकिशोर से उस की ठन गई थी. जिद्दी स्वभाव के मुकेश ने अपने साथियों ऋषि झा, श्यामसुंदर पाठक, पवन कुमार, गौतम ठाकुर और निकेश दुबे के साथ 11 दिसंबर, 2010 को मेहसी ब्लाक औफिस जा कर दिनदहाड़े मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर को गोलियों से भून डाला. दिनदहाड़े मुखिया की हत्या कर के मुकेश पाठक भी सुर्खियों में छा गया. संतोष झा की नजर मुकेश पर पड़ी तो उस ने उसे अपने गिरोह में शामिल कर लिया. गैंग में संतोष ने उसे सैकेंड बौस बना दिया.

अब संतोष और मुकेश मिल कर काम करने लगे. उन्होंने तय किया कि वे बड़ी कंपनियों को निशाना बनाएंगे, जहां से एक बार में करोड़ों रुपए वसूले जा सकें. उन्होंने उन बड़ीबड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों को टारगेट पर लिया, जिन के बजट कम से कम 500-600 करोड़ के होते थे. उन कंपनियों से वे उन के बजट का 10 प्रतिशत लेवी (रंगदारी, गुंडा टैक्स) के रूप में वसूलते थे. जिन कंपनियों ने उन की बात नहीं मानी या लेवी नहीं दी, वे उन के बेकसूर इंजीनियरों की हत्या कर के दहशत फैला देते थे. इस तरह इन के गैंग ने अब तक दरजन भर इंजीनियरों को मौत के घाट उतार दिया है.

स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने आतंक के पर्याय बने संतोष झा और मुकेश पाठक को 17 फरवरी, 2012 को रांची के बूटी मोड़ से गिरफ्तार किया था. दोनों को शिवहर लाया गया था. सरगना संतोष को गया जेल में बंद कर दिया गया, जबकि मुकेश पाठक को शिवहर जेल में. शातिर मुकेश ने जेल में बंद के दौरान बीमारी का बहाना बनाया. जेल अधिकारियों ने इलाज के लिए उसे जिला अस्पताल में दाखिल करा दिया. 15 जुलाई, 2015 को पुलिस को चकमा दे कर वह अस्पताल से भाग गया.

तब से अब तक वह फरार चल रहा है. पुलिस रिकौर्ड में मुकेश पाठक की छवि उत्तर बिहार के शातिर अपराधियों की है. उस ने पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर और मुजफ्फरपुर में तमाम घटनाओं को अंजाम दिया है. 2 इंजीनियरों के हत्याकांड की जांच में बेहद चौंका देने वाली घटना खुल कर सामने यह आई कि इस डबल मर्डर केस के मुख्य अभियुक्त मुकेश पाठक की पत्नी पूजा गर्भवती है. वह भी अपहरण के किसी मामले में जेल में बंद है. पुलिस ने इसे गंभीरता से लिया है.

दरअसल, जेल में रहते हुए मुकेश पाठक ने पूजा से शादी की थी. दोनों की शादी अक्तूबर, 2013 में शिवहर जेल में जेल प्रशासन की निगरानी में हुई थी. पूजा मुकेश पाठक की दूसरी पत्नी थी. उस ने पहली पत्नी की हत्या कर दी थी. शादी के बाद दोनों को अलगअलग वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था. किसान की बेटी पूजा मुजफ्फरपुर के सकरा गांव की रहने वाली थी. पटना में रह कर वह पौलीटैक्निक कर रही थी. पैसों के लिए उस ने सन 2013 में अपने साथी कैलाश फौजी के साथ मिल कर एक दिन में 2 लोगों का अपहरण किया था. कैलाश फौजी भी मुजफ्फरपुर के सकरा का ही रहने वाला था.

अप्रैल में पूजा की डिलीवरी होने वाली थी. वह पुलिस की कड़ी निगरानी में है. पुलिस को लगता है कि पूजा की डिलीवरी के दौरान मुकेश पत्नी से मिलने जरूर आएगा, तभी उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इसी बीच 3 मार्च, 2016 को पुलिस ने माफिया डौन संतोष झा के खास शूटर विकास झा उर्फ कालिया, करण झा, अभिषेक झा, पिंटु झा उर्फ बाबा और निकेश दूबे को अलगअलग जगहों से गिरफ्तार कर लिया है. विकास झा, पिंटू झा उर्फ बाबा और करण झा की गिरफ्तारी पर सरकार ने एकएक लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था.

पुलिस ने शिवहर की ब्लौक प्रमुख मुन्नी देवी और उस के पति संजय लालदेव को भी भादंवि की धारा 120बी के तहत गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया है. अब पुलिस को मुकेश पाठक की सरगर्मी से तलाश है. कथा लिखे जाने तक वह पुलिस की गिरफ्त से बहुत दूर था. Bihar Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Delhi Crime: मंगोलपुरी में पीजी के बेड बॉक्स में मिली महिला की लाश

Delhi Crime News: किसी सामान की तरह औरतों को इस्तेमाल कर उसे डस्टबीन में फेंक देने की मानसिकता आज भी कई मर्दों में बरकरार है. रेप, यौन-उत्पीड़न और घरेलू हिंसा इस बात का सबूत है. कहीं प्यार के नाम पर तो कहीं जाती के नाम पर औरतों की हत्याएं होती हैं इस मामले में भारत सबसे आगे है. NCRB के 2023 के आंकड़ों को देखें तो औरतों के खिलाफ अपराध के कुल 4,48,211 केस दर्ज हुए. इसमें रेप, उत्पीड़न, दहेज़ हत्या के अलावा मामूली बात पर औरतों की हत्यायों के तक़रीबन 17 हजार मामले हैं. दिल्ली के मंगोलपूरी में हुई यह वारदात भी इसी कड़ी का मामूली उदाहरण है जहाँ मामूली सी बात पर औरत की हत्या कर दी गई.

दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके के PG में एक 35 साल की औरत की लाश मिली. पुलिस जाँच में पता चला की इस औरत के प्रेमी दीपक ने धारदार हथियार से हमला करके घायल किया फिर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी और हत्या के बाद दीपक ने औरत की लाश को कंबल में लपेटकर डबल बेड के स्टोरेज बॉक्स में छिपा दिया गया.

पुलिस के अनुसार यह औरत 6 अप्रैल की शाम करीब 4 बजे घर से 2 लाख रुपये लेकर घर से निकली थी. वह अपनी बेटी को ट्यूशन छोड़ने जा रही थी.
दीपक और इस औरत के बीच पिछले ढाई सालों से अफेयर था. औरत के घर के पास ही दीपक की मीट की दुकान थी. दीपक ने इस औरत को फोन कर PG में बुलाया. PG कमरे में दोनों के बीच कहासुनी हो गई. दीपक ने पहले धारदार हथियार से हमला किया, फिर गला घोंटकर हत्या कर दी. हत्या के बाद लाश को कंबल में लपेटकर बेड के बॉक्स में छुपा दिया. दीपक के रिश्तेदार सुरेंद्र और दोस्त जोगिंदर ने लाश छिपाने में दीपक की मदद की.

PG कर्मचारी को शक हुआ तो उसने बेड के बॉक्स को खोलकर लाश देख ली और तुरंत पुलिस को सूचना दी. दिल्ली पुलिस ने लाश बरामद की और पोस्टमार्टम के लिए संजय गांधी अस्पताल भेज दिया. हत्या के आरोप में दीपक, सुरेंद्र और जोगिंदर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया है.

मृतक महिला के परिवार का आरोप है कि दीपक कई साल से महिला को ब्लैकमेल करता था और जबरन मिलने बुलाता था. औरत शादीशुदा थी और दीपक के पडोस में अपने पति, दो बेटों और एक बेटी के साथ रहती थी. Delhi Crime News

Family Dispute: बेरोजगार पति की खूनी कुल्हाड़ी

Family Dispute: 34 वर्षीय राहुल हरिभाऊ म्हस्के के जीवन में एक तरफ बेरोजगारी के ताने थे तो वहीं दूसरी तरफ बीवी की बेवफाई का संदेह. इसे ले कर पतिपत्नी के बीच अकसर जुबानी जंग छिड़ जाती थी. उन के मासूम बच्चे तमाशा देखते थे. एक रात बेरोजगार पति बेकाबू हो गया. फिर जो कुछ हुआ, वह कतई नहीं होना चाहिए था. क्या हुआ, पढ़ें इस डबल मर्डर की स्टोरी में…

रूपालीः बेरोजगार पति राहुल को कामधंधा करने के लिए ताने दिया करती थी, जो उसे नागवार लगता था. फिर तो एक दिन के लिए अपने फादर के पैसों पर ही निर्भर था. रूपाली पास के ही गांव मोला से व्याह कर आई थी.

राहुल हरिभाऊ म्हस्के 34 साल का युवक था. वह 2 बच्चों का बाप बन चुका था. सुंदर पत्नी और बच्चों के अलावा उस का अपने मम्मीपापा के साथ एक खुशहाल संयुक्त परिवार था. वे सभी महाराष्ट्र के अमरावती मंडल के तहत बुलढाना जिले में स्थित मेहकर की टीचर्स कालोनी में रहते थे. राहुल अपने पेरेंट्स का दुलारा था, लेकिन उस में एक ही ऐब था कि वह बेरोजगार था. उस की बेरोजगारी का कारण भी वह खुद था. उस का आलसी स्वभाव और कामचोरी के चलते वह कहीं काम नहीं कर पाता था या फिर इस वजह से उसे कहीं काम नहीं मिलता था.

यही बात उस की पत्नी रूपाली को चुभती थी. उसे उस का निकम्मापन खटकता था.  इस बात ले कर वह राहुल को बारबार टोकती थी. उसे कहीं काम करने की सलाह देती थी. अपनी मेहनत का पैसा कमाने के लिए कहती थी. इस पर वह चिढ़ जाता था. उल्टे पत्नी को ही भलाबुरा कहने लगता था. देखते ही देखते उन के बीच बहस होने लगती. बात इतनी बढ़ जाती कि वे गालीगलौज पर उतर आते थे और एकदूसरे के चरित्र पर लांछन लगाने लगते थे. ऐसा करते हुए उन्हें जरा भी खयाल नहीं आता था कि बच्चों पर उन के इन झगड़े का क्या असर होगा.

बच्चे उन को लड़तेझगड़ते देखते रहते थे. उन के झगडऩे के चलते उन्हें कई बार खाना तक नहीं मिल पाता था. वे बिस्तर पर दुबक कर चुपचाप सो जाते थे. उस के पापा हरिभाऊ राठौर आर्मी से रिटायर होने के बाद अपने निवास स्थान मेहकर में ही स्टेट बैंक औफ इंडिया की एक ब्रांच में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. राहुल उन में बड़ा बेटा था.

कहने को तो राहुल के पास एक गाड़ी थी, जिस की मदद से उस ने अपना धंधा शुरू किया था, लेकिन उसे कामचोरी के चलते चला नहीं पाया और गाड़ी बेचनी पड़ गई थी. गाड़ी के बिकते ही राहुल अपनी पत्नी की निगाह में पूरी तरह से बेरोजगार पति बन कर रह गया था. उस का बेरोजगार होना रूपाली की आंखों में चुभता था. इसे ले कर वह बारबार ताने मारती थी. राहुल अपने परिवार के लिए अपने फादर के पैसों पर ही निर्भर था. रूपाली पास के ही गांव मोला से ब्याह कर आई थी.

ताने नहीं हुए बरदाश्त

बात सर्दी की उस रात की है, तारीख थी 24 दिसंबर, 2025. रात के करीब डेढ़ बज रहे थे. रूपाली तेवर में थी. रात का खाना पकाते वक्त रसोई में सास से थोड़ी बहस हो गई थी. सास ने उसे तेल का सही इस्तेमाल करने की हिदायत दी थी. सास ने कहा था कि महीना खत्म होने में अभी हफ्ते बचे हैं. तेल हिसाब से खर्च किया करे. इसी बात पर वह बिफर गई थी. किसी तरह गुस्से को दबाए हुए थी. घरेलू काम निपटा कर जब वह बैडरूम में आई, तब उस ने बिस्तर पर बिखरे कपड़े देखे. सो रहे बच्चों के शरीर पर से कंबल हटे हुए थे. उसी कंबल में राहुल लेटालेटा मोबाइल देख रहा था.

कमरे में घुसते ही वह चिल्लाती हुई बोली, ”तुम कितने बेशर्म और कमीने इंसान हो? बच्चों का कंबल खुद ओढ़ रखा है…और बच्चे बेचारे ठंड से सिकुड़े हुए हैं.’’

पीछे से आई रूपाली की अचानक तेज आवाज से राहुल हड़बड़ा कर बैठ गया. उस ने बच्चों पर नजर दौड़ाई. वाकई बच्चे आधे कंबल में लेटे ठंड में सिकुड़े हुए थे.

”अरे! मैं ने ध्यान नहीं दिया…अभी ढंक देता हूं.’’ राहुल धीमी आवाज में बोला.

”तुम्हारा ध्यान तो मोबाइल पर पिक्चर और रील देखने में लगा रहता है. कुछ कामधाम तो है नहीं और न कुछ करना है. कम से कम घर का ही कुछ काम कर लिया करो.’’ रूपाली बोलने लगी. मगर राहुल चुप्पी साधे बच्चों को कंबल ओढ़ाने के बाद बैड पर बिखरे सामान को सहेजने लगा.

उस के हाथ से अपना स्वेटर छीनती हुई बोली, ”चलो, इधर दो मुझे…नामर्द… हरामजादे कहीं के… कोई काम करना है नहीं… घर में पूरे दिन रोटियां ठूंसना और तरहतरह की फरमाइश करना. बाप बेचारा दिन भर गार्ड की नौकरी कर 4 पैसे लाता है और बेटा 2 पैसा कमाने लायक भी नहीं है…’’

”देखो बहुत हो गया… गालियां मत बको… मेरा दिमाग मत खराब करो.’’ राहुल अब थोड़ा सख्ती से बोला.

”हां, दूंगी गालियां… तुम इसी लायक हो नामर्द, कमीना… हरामजादा. कुछ कमा कर लाओ, तब जानूं तुम मर्द कहलाने के लायक भी हो या नहीं?’’

”बकवास करने की जरूरत नहीं है…देख रहा हूं, जब से तुम ने घर से बाहर कदम रखा है, तब से तुम्हारे रंगढंग बहुत बदल गए हैं. बाहर क्या जाने लगी, पति को गालियां देने लगी हो!’’

”मेरा घर से बाहर जाना भी तुम्हारी नामर्दी की वजह से हुआ है…सिलाई सीखने जाती हूं. सीख लूंगी, तब घर पर ही कोई काम कर दोचार पैसे कमा लूंगी.’’

”मुझे सब मालूम है…तुम इसी बहाने बाहर क्या करती हो.’’

”मैं क्या करती हूं…सुनूं तो जरा…तुम्हारे दिमाग में क्या जहर भरा हुआ है.’’ रूपाली बोली.

”यही कि तुम किसी और के साथ देखी गई हो…सिलाई के बहाने से अपने पुराने प्रेमी से मिलने जाती हो.’’ राहुल बोला.

”तुम मुझ पर झूठा लांछन लगा रहे हो…शर्म नहीं आती है, अपनी पत्नी पर ऐसे शक करते हुए?’’

”शक नहीं कर रहा, सच्चाई बता रहा हूं… यह छिपाने के लिए तुम गालियां दे कर मुझे दबाना चाहती हो. छोटीछोटी बात पर आग उगलती हो.’’

”क्या सच्चाई बता रहे हो…मैं एक बार नहीं हजार बार कहूंगी… तुम हरामजादे हो तो हो. हरामजादे, कमीने किस्म के इंसान हो.  तुम्हारी कोई औकात नहीं है… जो मर्दानगी दिखा सको. अगर इतनी ही ताकत है तो पैसे कमा कर दिखाओ, अपनी कमी और नकारेपन का दोष छिपा कर मुझे दोषी मत ठहराओ.’’ रूपाली तेजतेज आवाज में बोलती चली गई.

इसी के साथ उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी भीतर से लगा दी, ताकि बाहर आवाज न निकले और घर में सो रहे दूसरे लोगों को उन के झगड़े के बारे में पता न चल पाए.

झगड़ा पहुंचा चरम पर

दोनों के बीच झगड़ा चरम पर पहुंच चुका था. उन की आवाज सुन कर सो रहे बच्चों की नींद खुल गई. उन्हें रूपाली ने तुरंत थपकी दे कर सुला दिया. कुछ मिनट में उन्हें नींद में आते ही रूपाली ने फिर से वही राग छेड़ दिया, लेकिन इस बार चीखनेचिल्लाने की बारी राहुल की थी.

वह शांत बैठा था, लेकिन उस के भीतर गुस्सा भर चुका था. जैसे ही रूपाली ने बोलना शुरू किया, ”तुम्हारे साथ निभाना बहुत मुश्किल हो गया है…अब और बरदाश्त नहीं करूंगी…’’

मासूम रियांशः पापा के वार से बचने के लिए मम्मी से लिपट गया, फिर भी बच नहीं पाया

और आगे बोलने से पहले ही राहुल ने उस के बाल खींचते हुए गरदन पकड़ ली. दूसरे हाथ से मुंह बंद कर दिया. उस के कानों के पास मुंह लगा कर चीखते हुए बोला, ”कुतिया कहीं की… जगहजगह मुंह मारती फिरती है कमीनी… हरामजादी! पुराने यार से मिलती है!… और मुझ पर ही ताने मारती है.’’

पति के हाथों में जकड़ी रूपाली ने किसी तरह से खुद को छुड़ाया और राहुल का कौलर पकड़ गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया. थप्पड़ उस के कान पर भी लगा था. वह तिलमिला कर गिर गया. चोट लगे कान को सहलाने लगा. महसूस हुआ जैसे कान के परदे फट गए हों. सनसनाहट की आवाज आ रही थी. कुछ सुन नहीं पा रहा था. सामने तन कर खड़ी रूपाली नजर आ रही थी. उस के हाथ में कुल्हाड़ी थी. उस ने राहुल को धमकाने के लिए कमरे के कोने में रखी कुल्हाड़ी उठा ली थी.

ससुर राहुल हरिभाऊ की पत्नी की हत्या करने के बाद बेटे रियांश को भी कुल्हाड़ी से काट डाला. बाएं पेज पर – राहुल के घर के बाहर एकत्र भोड़

”तो…तो! तू अब इस हरकत पर उतर आई है?’’ राहुल बोला और एक झटके में उठ कर खड़ा हो गया. झट से रूपाली के हाथ से कुल्हाड़ी छीन ली और उसे धक्का दे कर बिस्तर पर गिरा दिया.

उस के गिरते ही राहुल ने उस पर उसी कुल्हाड़ी से हमला बोल दिया. हमले से रूपाली बच नहीं पाई. उस की चीख निकल पड़ी थी. चीख इतनी तेज थी कि ठीक बगल में सोए 4 साल के  बेटे रियांश की नींद खुल गई. उस के सामने मम्मी खून से लथपथ पड़ी थी. सामने पापा के हाथ में कुल्हाड़ी से खून टपक रहा था. इस डरावने दृश्य को देख कर वह डर गया. न रो पा रहा था, न कुछ बोल पा रहा था.

जब बेटे की पड़ी नजर...

राहुल ने जब जाग उठे बेटे रियांश को देखा तो सहम गया. वह उसे आंखें फाड़े देख रहा था. आशंका से घिर गया, क्योंकि बेटा रियांश ही उस के कारनामे का एकलौता चश्मदीद था. इसलिए राहुल ने तुरंत कुल्हाड़ी का एक वार रियांश पर भी कर दिया. तब तक रूपाली की सांस चल रही थी और रियांश मम्मी से लिपटने के कारण हमले से बच गया था. राहुल और भी आक्रामक हो चुका था. उस ने पत्नी को जमीन पर गिरा दिया और उन पर कुल्हाड़ी से कई वार कर डाले.

रूपाली दर्द से कराहती, चिल्लाती रही. वह खून से लथपथ जमीन पर गिर कर तड़पने लगी. रियांश भी तड़पता हुआ कुछ सेकेंड में ही बिस्तर पर ढेर हो गया. उस के सिर पर कुल्हाड़ी लगी थी.  दोनों की मौत के बाद राहुल वहीं बगल में बैठ गया. तब तक इस का शोरगुल कमरे के बाहर राहुल के पेरेंट्स सुन चुके थे. वे दरवाजा खटखटा कर खोलने को कह रहे थे, किंतु राहुल दरवाजा नहीं खोल रहा था. मजबूरन उन्होंने पड़ोसियों को बुलाया और दरवाजा तोड़ कर खोल दिया.

भीतर कमरे का दृश्य बेहद भयाभह था. वह नजारा जिस ने भी देखा, वह दहल गया. भारी ठंड में भी सभी पसीने से तरबतर हो गए थे. रूपाली खून से लथपथ जमीन पर मृत पड़ी थी, जबकि बेटा रियांश बिस्तर पर मृत था. उस के सिर से खून बह रहा था. वहीं राहुल पड़ा था. इस खूनखराबे को देख कर मौजूदा लोगों के साथ म्हस्के परिवार के लोग भी काफी सन्नाटे में आ गए. म्हस्के परिवार के घर के सारे लोग इस घटना से आक्रोशित भी हो उठे. तब तक कुछ पड़ोसी भी आ चुके थे. उन्हीं में से किसी ने इस वारदात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम के नंबर 112 पर दे दी.

घायल रूपाली और उस के बेटे की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई थी फिर भी उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया

कुछ देर में ही पुलिस आ गई. साथ में एंबुलेंस भी थी. दोनों को तुरंत सरकारी अस्पताल ले जाया गया. किंतु वहां के डौक्टरों ने नन्हें बच्चे रियांश को मृत घोषित कर दिया. खून से लथपथ रूपाली की सांस चल रही थी. इसे देखते हुए उसे संभाजी नगर के अस्पताल में ले जाने को कहा गया. बुलढाना के मेहकर थाने के सीनियर इंसपेक्टर वेंकटेश मालेवार ने अपनी टीम के साथ मौकाएवारदात की जांच की. फोरैंसिक टीम को बुलाया गया था. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल पर पड़ी खून से सनी कुल्हाड़ी कब्जे में ली और राहुल म्हस्के को हिरासत में ले लिया गया. दूसरी तरफ संभाजी नगर के अस्पताल में इलाज के लिए ले जाते समय घायल रूपाली ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

उन दोनों के शव पोस्टमार्टम के बाद उन के परिजनों को सौंप दिए गए. रूपाली और उस के बेटे रियांश की हत्या के मामले में रूपाली के फादर भास्कर शंकर वानखेड़े (55 वर्ष) ने अपने दामाद राहुल हरिभाऊ म्हस्के पर दफा 103 (1) भारतीय न्याय संहिता के तहत रिपोर्ट दर्ज करवा दी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में राहुल ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. क्रूरता से भरी इस अपराध की जांच के लिए बुलढाना के एसपी निलेश तांबे ने एडिशनल एसपी अमोल गायकवाड़ के निर्देशन एवं डीवाईएसपी संतोष खाडे की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई.

टीम में मेहकर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर वेंकटेश मालेवार, एपीआई अवचार नरवाड़े, बिरंजे, हैडकांस्टेबल लक्ष्मण कटक, रवि चिचोले, सुखदेव गव्हाणे एवं प्रभाकर शिवनकर को शामिल किया गया. हत्या की मुख्य वजह पत्नी के चरित्र पर शक करना सामने आया. आरोपी ने बताया कि पत्नी उस पर ताने मारती थी और वह उस पर लंबे समय से किसी और व्यक्ति से प्रेम करने का संदेह करता था, जिस से घर में विवाद होता था.

इस मामले में आरोपी की मानसिक स्थिति और पारिवारिक विवाद की भी जांच की गई.  इस डबल मर्डर केस की सभी तरह के जांच में पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बयान, मोबाइल कौल डिटेल्स और आरोपी की मानसिक स्थिति का आकलन शामिल था. इस की फोरैंसिक जांच रिपोर्ट में हथियार और घटनास्थल से मिले सबूत मैच कर गए. साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने हथियार से गंभीर हमला  होने की पुष्टि कर दी.

पुलिस द्वारा तैयार की गई चार्जशीट की प्रक्रिया लिखे जाने तक जारी थी. इस के तहत आरोपी का कबूलनामा, हत्या का हथियार (कुल्हाड़ी), पोस्टमार्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान, कौल रिकौर्ड और पारिवारिक विवाद के सबूत इकट्ठा किए जाने थे. पुलिस ने आरोपी राहुल हरिभाऊ म्हस्के से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया. Family Dispute

 

Village Stories: वह पागल नहीं था

Village Stories: मास्टर अब्दुर्रहमान की हरकतों से सभी को यही लगता था कि वह पागल हो गया है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसे उस औरत के धोखा देने का ऐसा सदमा लगा था कि उस की हालत पागलों सी हो गई थी.

अब्दुर्रहमान प्राइमरी स्कूल का अध्यापक था. वह जिस स्कूल में पढ़ाता था, वह शहर के किनारे ऐसी जगह पर था, जहां आसपास जड़ीबूटियों से इलाज करने वाले बंजारे डेरा डाले रहते थे. वह जब भी खाली होता, उन बंजारों के पास चला जाता और कईकई घंटे उन के पास बैठा रहता. कभीकभी वह छुट्टी के दिन भी उन के पास चला जाता और पूरा का पूरा दिन वहीं गुजार देता.

ये बंजारे जड़ीबूटियों से दवाएं बनाते थे और जहां कहीं भी डेरा लगाते, आसपास के रहने वाले लोग उन के पास इलाज के लिए आ जाते थे. उन के पास जड़ीबूटियों के ऐसे नुस्खे और दवाइयां होती थीं, जो बाजार की दुकानों में नहीं मिलती थीं. कुछ बीमारियों में उन की दवाएं इतना सटीक फायदा करती थीं, जिन का इलाज बड़ेबड़े डाक्टर भी नहीं कर पाते थे.

मास्टर अब्दुर्रहमान उन बंजारों के बीच अपना काफी समय बरबाद करता था, इसलिए लोग उस की हंसी उड़ाते थे कि पता नहीं इन बंजारों के बीच इस मास्टर को क्या मिलता है, जो वह अपना इतना समय बरबाद करता है. जबकि अब्दुर्रहमान का कहना था कि इन बंजारों के पास ऐसीऐसी दवाएं हैं, जो मुरदों में भी जान डाल सकती हैं. जब लोग उन से कहते कि अगर ये इतने ही होशियार हैं तो दरदर भटकते क्यों हैं? मास्टर अब्दुर्रहमान के पास उन की इस बात का कोई जवाब नहीं होता था.

कभी मन में आता तो हंसते हुए यह जरूर कह देते, ‘भटकना तो इन का पेशा है. घूमघूम कर ही तो ये जड़ीबूटियां खोज कर लाते हैं और उन से दवाएं बनाते हैं. अगर ये होशियार नहीं हैं तो लोग इन के पास दवा लेने आते क्यों हैं. उन्हें फायदा होता है, तभी तो आते हैं.’ अब्दुर्रहमान की गरमियों की डेढ़ महीने की छुट्टियां और सर्दियों की 10 दिनों की छुट्टियां उन्हीं बंजारों के बीच गुजरती थीं. इस से लोगों ने अंदाजा लगाया कि बंजारों ने उसे अपना चेला बना लिया है. क्योंकि वह उन की बहुत खिदमत करता था. कभी वह उन के लिए गांव से दूध या छाछ ले कर जाता तो कभी सब्जियां.

एक दिन लोगों ने देखा, मास्टर अब्दुर्रहमान के आंगन में उपलों का ढेर जल रहा है. वह उस आग को दूर पलंग पर बैठा ध्यान से देख रहा था. जब लोगों ने पूछा कि यह क्या कर रहे हो तो उस ने कहा, ‘‘दवा बन रही है. इन उपलों के बीच जड़ीबूटियां हैं, जो जल कर भस्म हो जाएंगी. उस के बाद उस भस्म से दवा बनेगी. दवा क्या, अमृत बनेगा. जो उस दवा को पूरे परहेज के साथ एक सप्ताह खा लेगा, उसे कोढ़ और चेचक कभी नहीं होगा.’’

इस के बाद दवाएं बनाना मास्टर अब्दुर्रहमान का शौक ही नहीं रहा, बल्कि जुनून बन गया. वह वैज्ञानिकों की भांति तरहतरह के प्रयोग करता रहता था. मास्टर अब्दुर्रहमान की बीवी ने उस के लगभग सभी दोस्तों से कहा कि वे किसी भी तरह उस का ध्यान इस ओर से हटाएं, पर मास्टर ने किसी की नहीं सुनी. अब्दुर्रहमान ने दवाएं तो तमाम बना डालीं, लेकिन उस से इलाज कराने को कोई तैयार नहीं था. संयोग से एक रात अचानक गांव के एक 2 साल के बच्चे की तबीयत खराब हो गई. वह बारबार सीने पर हाथ रख कर जोरजोर से रो रहा था. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे दौरा पड़ा हो.

कोई उपाय न देख बच्चे का बाप उसे मास्टर अब्दुर्रहमान के पास ले गया. उस ने बच्चे की नब्ज देखी, चेहरा देखा उस के बाद कहा कि इसे निमोनिया है. उस ने अपनी बनाई एक दवा उसे दी. 3-4 घंटे बाद बच्चे को ऐसा पसीना आया, जैसे उस के शरीर का सारा पानी निकल गया हो. इस के बाद बच्चे का रोनातड़पना बंद हो गया. मास्टर की दवा से वह बच्चा 3 दिनों में चंगा हो गया. इस के बाद मास्टर के यहां भीड़ लगने लगी. लोगों को फायदा भी हो रहा था.

मास्टर अपने यहां आने वाले मरीजों को जो दवाएं देता था, उन के नुस्खे उस ने उन्हीं बंजारों से सीखे थे. धीरेधीरे उस के यहां सब तरह के मरीज आने लगे. कुछ ही दिनों में मास्टर अब्दुर्रहमान ठीकठाक वैद्य बन गया. लेकिन जब भी उसे पता चलता कि बंजारे आए हैं, वह उन के पास जरूर पहुंच जाता. जब वह अच्छाखासा वैद्य बन गया तो उस ने नौकरी छोड़ दी. उसे पैसा कमाने की उतनी फिक्र नहीं थी, जितनी इल्म हासिल करने की थी. कभी वह किसी जड़ीबूटी की तलाश में निकल जाता तो कईकई दिनों घर से बाहर रहता. और जब वापस आता तो अजीबअजीब तरह की जड़ीबूटियां ले कर आता.

कभीकभी उस के पास कोई ऐसा भी मरीज आ जाता, जिस के मर्ज को वह समझ नहीं पाता. तब वह साफ कह देता कि इसे शहर के अस्पताल ले जाओ, क्योंकि वह रोग के बारे में जाने बिना दवा नहीं देता था. आजकल के डाक्टरों की तरह इंसानों को जानवर नहीं समझता था. सरकारी अस्पताल में पढ़ेलिखे डाक्टर होते थे, इसलिए उन गरीब मरीजों को उन के पास भेज देता था. मास्टर अब्दुर्रहमान का घर एक तरह से दवाखाना बन गया था. दूसरे गांवों से भी मरीज उस के पास दवा लेने आते थे. बगल के गांव की एक बहुत ही खूबसूरत औरत अकसर उस के पास दवा लेने आती थी. उस की उम्र 27-28 साल रही होगी. वह ऊंचे खानदान की शादीशुदा औरत थी.

वह नौकरानी के साथ घोड़ागाड़ी से आती थी. उस औरत को ले कर गांव में तमाम तरह की अफवाहें फैली हुई थीं. उन्हीं अफवाहों में एक यह भी थी कि यह औरत जितनी चालाक और होशियार है, उस का शौहर उतना ही सीधासादा है. मास्टर अब्दुर्रहमान उस की बड़ी तारीफें करता था. ईद पर उस ने मास्टर अब्दुर्रहमान को कपड़ों का जोड़ा और पगड़ी दी थी. उस के बच्चों को भी पैसे दिए थे.

एक दिन सुबहसुबह खबर आई कि उस औरत का शौहर मर गया है. इस में हैरानी की कोई बात नहीं थी, क्योंकि मौत तो किसी की भी हो सकती है. लेकिन यहां हैरानी की बात यह थी कि थोड़ी देर में पुलिस आ गई थी. इस का मतलब था, वह अपनी मौत नहीं मारा था. मामला कुछ गड़बड़ था, तभी पुलिस आई थी. इलाके के दरोगा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए शहर के अस्पताल भिजवा दिया. पता चला कि मरने वाले के रिश्तेदारों ने शक जाहिर किया था कि वह किसी बीमारी से नहीं मरा, बल्कि उसे जहर दे कर मारा गया है. उस की बीवी की कोशिश थी कि जल्दी से जल्दी उस का अंतिम संस्कार कर दिया जाए, लेकिन मरने वाले के रिश्तेदारों ने लाश का चेहरा देखा तो थाने चले गए और पुलिस को बुला लाए थे.

पुलिस ने शक के आधार पर मृतक की बीवी और नौकरानी को हिरासत में ले लिया था. अगले दिन मास्टर अब्दुर्रहमान को भी थाने बुलाया गया था. शाम को दरोगा सिपाहियों की पूरी टीम के साथ मास्टर अब्दुर्रहमान के घर आया तो पुलिस के साथ वह भी था. उसे हथकड़ी लगी हुई थी. पति को उस हालत में देख कर उस की बीवी और बच्चे रोने लगे. लेकिन मास्टर अब्दुर्रहमान कुछ नहीं बोला.

मास्टर के घर की तलाशी ली गई. लेकिन किसी को पता नहीं चला कि मास्टर के घर क्या मिला. थोड़ी देर बाद पुलिस मास्टर को ले कर चली गई. अगले दिन पता चला कि मास्टर की निशानदेही पर पुलिस ने एक शीशी बरामद की थी. उसी शीशी से उस ने उस खूबसूरत औरत की नौकरानी को जहर दिया था. नौकरानी ने उस से यह कह कर जहर मांगा था कि घर में चूहे बहुत परेशान कर रहे हैं, इसलिए चूहों को मारने वाला जहर चाहिए. मास्टर अब्दुर्रहमान ने 2 लोगों की मौजूदगी में उसे वह जहर दिया था. पुलिस ने उन दोनों को भी इस मामले में गवाह बनाया था. इस से यह बात साफ हो गई थी कि उस औरत ने अपने शौहर को जो जहर दिया था, उसे चूहों को मारने के बहाने मास्टर अब्दुर्रहमान से हासिल किया गया था.

औरत वाकई बहुत हसीन थी. मास्टर अब्दुर्रहमान के पास आती भी रहती थी. मास्टर ऐसा आदमी नहीं था कि वह किसी जवान और हसीन औरत से प्रभावित हो कर कोई उलटासीधा काम कर बैठता. लेकिन कानून की निगाहें कुछ और ही होती हैं. कानून तो यह देखता है कि एक आदमी जहर से मर गया है और जहर देने वाली ने जहर किस आदमी से हासिल किया है.

मास्टर अब्दुर्रहमान का जुर्म यह था कि उस ने जहर दिया था. दूसरे उस ने वैद्यकी की पढ़ाईलिखाई भी नहीं की थी. पुलिस ने चालान बना कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस की वजह यह थी कि उस औरत की नौकरानी ने अपने बयान में कहा था कि मास्टर अब्दुर्रहमान के कहने पर वह जहर ले गई थी. उसे क्या पता था कि उस की मालकिन ने वह जहर किसे दिया, जबकि उस औरत ने नहीं कबूला था कि वह जहर उसी ने शौहर को दिया था.

इस के बाद लोग सोचने लगे कि आखिर उस औरत ने शौहर को जहर क्यों दिया? उन्हें लगता था कि औरत किसी लड़के को चाहती रही होगी, जबकि उस की शादी किसी और से हो गई होगी. लेकिन यहां यह मामला नहीं था. औरत किसी को भी नहीं चाहती थी. उस ने उसे शौहर के रूप में कबूल भी कर लिया था. कोई परेशानी भी नहीं थी. शौहर बिलकुल सीधासादा, एकदम बुद्धू था. बीवी को रौब में रखने के बजाय वह बीवी के रौब में रहना पसंद करता था. उस के पास जमीन भी काफी थी. साथ ही ऊंची जाति वाला भी था.

औरत का शौहर जिस तरह का था, देहातों में इस तरह के लोग सीधेसादे और बुद्धू नहीं होते. वे हुक्म में रहने के बजाय हुक्म चलाते हैं. लेकिन यहां मामला उल्टा था. औरत खूबसूरत, चंचल और जिंदादिल थी. जबकि शौहर में मर्दों वाली रौब और अकड़ नहीं थी. औरत ने किसी तरह 3 साल तो उस के साथ गुजार लिए. आखिर वह अपने इस शौहर से तंग आ गई, क्योंकि उस की सहेलियां उस का मजाक उड़ाती थीं. वह शौहर से खिंचीखिंची रहने लगी. 4 साल बीत गए, कोई बच्चा भी नहीं हुआ. इस के बाद गांव का एक आदमी औरत को अच्छा लगने लगा. वह उस की बिरादरी का भी था.

शौहर को पहले तो पता ही नहीं चला कि उस के घर में क्या हो रहा है? जब उसे पता चला तो उस ने उस आदमी को अपने घर आने से रोक दिया. एकाएक वह मर्द बन गया, जबकि औरत उसे नौकर से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी. एक दिन शौहर ने उसे रंगेहाथों पकड़ लिया तो दोनों की जम कर पिटाई की. इस के बाद उस ने औरत पर पाबंदी लगा दी. घर से बाहर जाना बंद कर दिया. नौकरानी उस पर नजर रखती थी. इसी तरह 4-5 महीने बीत गए. औरत को कोई तकलीफ हुई तो शौहर से इजाजत ले कर वह मास्टर अब्दुर्रहमान के पास आनेजाने लगी. नौकरानी उस के साथ आतीजाती थी. इस के बाद उस ने नौकरानी से मास्टर के यहां से जहर मंगा कर एक रात शौहर को दूध में पिला दिया.

वह जिस आदमी से मिलतीमिलाती थी, वह भी पकड़ा गया था. इस तरह पुलिस ने इस मामले में 3 लोगों को मुल्जिम बनाया था, एक वह औरत, मास्टर अब्दुर्रहमान और तीसरा उस का दोस्त, जिसे प्रेमी भी कह सकते हैं. मुकदमा चला, इस्तगासा इतना कमजोर था कि सेशन कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए तीनों को छोड़ दिया. दरअसल बाद में मास्टर पलट गया था. उस ने अदालत में कहा कि उस ने जहर दिया ही नहीं था. वह देसी वैद्य है, दवाएं देता है, जिस से जिंदगी मिलती है. जिंदगी देने वाला जहर दे कर किसी की जिंदगी क्यों लेगा?

मास्टर अब्दुर्रहमान छूट तो गया, लेकिन इस घटना से उसे ऐसा सदमा लगा था कि जेल से आने के बाद वह एकदम खामोश हो गया. गांव के लोगों ने उसे जेल से छूटने की मुबारकबाद दी तो उस ने कहा, ‘‘किस बात की मुबारकबाद? मेरे जहर से एक आदमी की मौत हुई है. मेरे ऊपर एक हत्या का पाप चढ़ गया है.’’

उस ने उन तमाम दवाओं, जिन्हें न जाने कितनी मेहनत से तैयार किया था, उन तमाम जड़ीबूटियों को जिन्हें उस ने न जाने कहांकहां भटक कर इकट्ठा किया था, एक गड्ढा खोद कर गाड़ दिया. हर किसी ने उसे समझाया कि उस ने उस आदमी को मारने के लिए जहर नहीं दिया था, उस ने तो चूहे मारने के लिए जहर दिया था, इस में उस का कोई दोष नहीं है. लेकिन मास्टर ने किसी की एक नहीं सुनी.

गांव का जब भी कोई आदमी बीमार होता, मास्टर के पास आता और दवा बना कर देने को कहता. लेकिन मास्टर तो जैसे किसी की सुनता ही नहीं था. वह जहां भी बैठता, एक ही बात पर दुख जताता रहता कि उसी के जहर से वह आदमी मरा था. नौकरी उस ने पहले ही छोड़ दी थी. दवा दे कर जो 4 पैसे कमाता था, वह भी बंद कर दिया था. खेतीबाड़ी थी नहीं, इसलिए बीवीबच्चे भूखे मरने लगे.

इस के बावजूद मास्टर ने कुछ नहीं किया. मजबूरी में बीवीबच्चों को ले कर मायके चली गई. मास्टर हमेशा गुमसुम बैठा रहता था, कोई कुछ खाने को देता तो ठीक, वरना उसे खाने की भी चिंता नहीं थी. गांव वालों को लगने लगा कि मास्टर पागल हो गया है.

जबकि सही बात यह थी कि वह पागल नहीं था. गांव के एकदो लोगों से वह कभीकभी कुछ बातें कर लेता था. उन्हीं बातों से लगता था कि मास्टर पागल नहीं है. उसे गहरा सदमा लगा है. एक दिन शाम को वह गांव के मुखिया रहमान अली के सामने से गुजर रहा था तो उन्हें देख कर रुक गया. मुखिया से भी वह कभीकभी अपने मन का दुख कह देता था. उस दिन कुरते की जेब से एक शीशी निकाल कर वह मुखिया को दिखाते हुए मरीजों की सी मद्धिम आवाज में धीरे से बोला, ‘‘इस शीशी में जहर है, इसे मैं ने ही तैयार किया है. मैं रोज उधर जाता हूं, लेकिन वह मिलती ही नहीं.’’

‘‘कौन नहीं मिलती?’’ रहमान अली ने पूछा.

‘‘अरे वही, जिस ने अपने पति को जहर दे कर मारा था. ऐसा कर के उस ने मुझे बदनाम कर दिया था न.’’

‘‘वह मिल जाएगी तो क्या करोगे?’’

‘‘यह नहीं बताऊंगा.’’ कह कर मास्टर चला गया.

एक दिन मास्टर उसी औरत के गांव की ओर से चला आ रहा था तो रास्ते में वह मिल गई. मास्टर को देख कर वह उस के पास आ गई. मास्टर भी यही चाहता था. पास आ कर औरत ने पूछा, ‘‘हकीमजी, इधर कहां से आ रहे हैं?’’

‘‘पीर साहब की मजार से आ रहा हूं, उन के पास पानी दम कराने गया था.’’ मास्टर ने जेब से एक शीशी निकालक                                                                                                                                    रदिखाते हुए कहा, ‘‘यह दम किया हुआ पानी है. इसे पीने से सारी मुश्किलें खत्म हो जाती हैं. लो इस में से थोड़ा पानी तुम भी लो. तुम्हारी भी सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी.’’

मास्टर उसे जहर पिला कर मारना चाहता था. सोचा कि इस औरत ने जिस तरह धोखे में रख कर उस पर कलंक का टीका लगाया है, उसी तरह धोखे में रख कर वह इसे खत्म कर देगा. कातिल को मौत की सजा मिलनी ही चाहिए.nऔरत ने हाथ फैलाए तो मास्टर ने उसे वह शीशी दे दी. औरत जैसे ही शीशी मुंह के पास ले गई, मास्टर को न जाने क्या सूझा कि उस ने झपट कर शीशी छीन ली. औरत डर गई. उस ने पूछा, ‘‘आप ने शीशी क्यों छीन ली?’’

मास्टर कुछ नहीं बोला. शीशी का ढक्कन बंद कर के उसे जेब में डाल लिया. औरत ने कहा, ‘‘लगता है, पागल हो गए हो?’’

‘‘आज नहीं तो कल जरूर पागल हो जाऊंगा.’’ मास्टर ने कहा.

शायद मास्टर को लगता था कि उस औरत को मार कर उसे चैन मिल जाएगा. लेकिन उस ने तो उस के मुंह तक पहुंचे जहर को छीन लिया था. अगले दिन सुबह गांव वाले मसजिद से नमाज पढ़ कर निकल रहे थे, तभी पता चला कि मास्टर अपने घर के बरामदे में पड़ा है. मास्टर अकेला ही था, इसलिए गांव का मुखिया होने के नाते रहमान अली गांव के कुछ बुजुर्गों को साथ ले कर उस के घर पहुंच गए. चूंकि उन्हें मास्टर के बारे में सब पता था, इसलिए संदेह होने पर उन्होंने तकिए के नीचे हाथ फेरा. वहां कुछ नहीं मिला. चारपाई के नीचे देखा तो उन्हें वह शीशी नजर आ गई, जिस में जहर था. शीशी खाली थी. इस तरह मास्टर अब्दुर्रहमान ने खुद को बदनामी से मुक्त कर लिया था. Village Stories

 

Inspirational Story: नीरजा के बलिदान की कहानी – फिल्मी नहीं जमीनी हकीकत

Inspirational Story: नीरजा भनोट ने अपनी जान दे कर 359 लोगों की जान बचाने का जो कारनामा किया था, वह उन की बेमिसाल बहादुरी थी. उन की इसी बहादुरी पर आधारित बायोपिक फिल्म बनी है ‘नीरजा’.

नि र्देशक राम माधवानी की फिल्म ‘नीरजा’ 19 फरवरी को रिलीज हो गई. नीरजा भनोट की जिंदगी और बलिदान पर आधारित इस बायोपिक में नीरजा भनोट की भूमिका सोनम कपूर ने निभाई है. सोनम ने अपनी ओर से अपने किरदार में जान डालने की पूरी कोशिश की है. जब भी कोई बायोपिक बनती है, तो उस में कुछ मसाले डालना निर्मातानिर्देशक की मजबूरी होती है. क्योंकि इस के बिना फिल्म चलाना संभव नहीं है.

 

‘नीरजा’ लोगों को कितनी पसंद आई, कितनी सफल रही, फिल्म में कितना मसाला मिलाया गया, अगर कुछ देर के लिए इन बातों को दरकिनार कर दें तो यह सच है कि नीरजा एक बहादुर लड़की थी और उस ने अपनी जान की परवाह न कर के 359 लोगों की जान बचाई थी. संदर्भवश हम यहां नीरजा भनोट की असली कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं.

नीरजा का जन्म 7 सितंबर, 1963 को चंडीगढ़ में हुआ था. उन के पिता हरीश भनोट हिंदुस्तान टाइम्स के जानेमाने पत्रकार थे. उन के 3 बच्चे थे, 2 लड़के अखिल और अनीश तथा एक बेटी नीरजा. एकलौती बेटी होने की वजह से नीरजा अपनी मां रमा भनोट और पिता हरीश भनोट की बहुत लाडली थी. पतिपत्नी उसे बेटों से भी ज्यादा चाहते थे, इसीलिए वे उसे लाडो कहते थे. नीरजा की शिक्षा चंडीगढ़ के सेक्रेड हार्ट कान्वेंट से शुरू हुई.

मार्च, 1974 में जब नीरजा करीब साढ़े 10 साल की थी और छठी कक्षा में पढ़ रही थी, हरीश भनोट का तबादला मुंबई हो गया. मुंबई में हरीश भनोट ने बेटी का दाखिला ख्यातनाम बौंबे स्कौटिश स्कूल में कराया. हाईस्कूल पास कर लेने के बाद नीरजा ने सेंट जेवियर कालेज में एडमिशन लिया और वहां से अर्थशास्त्र और सामाजिक विज्ञान विषयों से स्नातक की डिग्री ली.

कालेज के दिनों में एक दोपहर नीरजा अपनी फ्रैंड्स के साथ कालेज गेट के पास खड़ी थी. तभी ‘बांबे’ पत्रिका के संवाददाताओं और फोटोग्राफर्स की एक टीम वहां से गुजरी. उन लोगों की नजर नीरजा पर पड़ी तो उन्हें पत्रिका के नए शुरू हुए फीचर ‘दि गर्ल नैक्सट डोर’ के लिए नीरजा का चेहरा बिलकुल सटीक लगा. उन्होंने बात की तो नीरजा इस के लिए तैयार भी हो गईं. फलस्वरूप पत्रिका के आगामी अंक में फीचर के साथ पूरे पेज पर नीरजा का फोटो भी छपा. चित्र के नीचे कैप्शन था नीरजा भनोट. दाहिने गाल पर डिंपल, बास्केट बौल की रसिया और सेंट जेवियर में बीए की छात्रा.

इस तरह अचानक किसी पत्रिका में चित्र छप जाना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होती, मगर नीरजा के लिए यह उपलब्धि ही रही. क्योंकि यहीं से उस की मौडलिंग की शुरुआत हो गई. इस के बाद उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. करीब 3 सालों तक वह देश के कई प्रतिष्ठित उत्पादों बिनाका टूथपेस्ट, फोरहंस और गोदरेज आदि के विज्ञापनों में दूरदर्शन व सिनेमा के परदे पर दिखाई देती रहीं.

मौडलिंग में मिली अपार सफलता के बाद उन के पास सीरियल और फिल्मों के प्रस्ताव भी आने लगे. लेकिन इन प्रस्तावों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने से पहले ही नीरजा के सामने शादी का प्रस्ताव आ गया. मार्च, 1985 में वैवाहिक विज्ञापन के माध्यम से नीरजा का रिश्ता तय हुआ और वह शादी कर के ससुराल चली गईं. यह रिश्ता नीरजा के लिए जीवन की सब से बड़ी त्रासदी साबित हुई. 2 ही महीने में उन की ससुराल वालों की दहेज की नाजायज मांगें सामने आने लगीं.

यह न नीरजा को स्वीकार था न भनोट परिवार को. फलस्वरूप शादी के चंद महीनों बाद ही नीरजा को वापस उन के मायके भेज दिया गया. बाद में यह रिश्ता तलाक में बदल गया. इस बीच नीरजा भीतर तक छलनी हो चुकी थीं. ससुराल में बारबार मिले तानों ने उन का मन अवसाद से भर दिया था. जो अपमान उन्हें अपनी ससुराल में मिला था, उस की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वहां निरंतर उन के वजूद को ललकारा जाता था. वह देश के जानेमाने पत्रकार की बेटी थीं, उन की अपनी खुद की भी एक अलग पहचान थी. पढ़ीलिखी तो थी ही, आकर्षक व्यक्तित्व भी था.

बहरहाल, तलाक के बाद नीरजा ने मौडलिंग से मुंह मोड़ लिया था. टीवी धारावाहिकों और फीचर फिल्म निर्माताओं को वह पहले ही मना कर चुकी थीं. हालांकि नीरजा को अपने पिता के घर में कोई कमी न थी, न ही किसी तरह की कोई परेशानी थी. फिर भी जीवन इतना सरल नहीं होता. आखिर सोचविचार कर उन्होंने नौकरी करने की ठान ली. नौकरी भी कोई आम तरह की नहीं, दूसरों से एकदम हट कर. एक ऐसी नौकरी जो केवल पैसा कमाने के लिए ही न हो, बल्कि जिस में आत्मसंतुष्टि का भी अहसास हो.

आखिर सोचविचार कर नीरजा ने ‘पेन एम’ में फ्लाइट अटैंडेंट की नौकरी के लिए आवेदन कर दिया. इस पद के लिए करीब 10 हजार युवकयुवतियों ने आवेदन किया था. जिन में कुल 80 लोगों को चुना जाना था. नीरजा का नाम भी उन्हीं 80 लोगों में आया. इस के बाद शुरू हो गया नीरजा के जीवन का एक अनोखा अध्याय.

जिस रोज से नीरजा ने पेन एम में काम करना शुरू किया, उसी दिन से हरीश भनोट अपनी पत्नी रमा व कुत्ते टिप्सी को ले कर नीरजा के उड़ान पर जाते वक्त उसे विदा करने जाया करते थे. इतना ही नहीं, उन की वापसी के वक्त भी ये सब उसे घर के दरवाजे पर ही खड़े मिलते थे. ऐसा कभी नहीं हुआ कि नीरजा को घर पहुंच कर डोरबैल बजानी पड़ी हो.

वक्त के साथ नीरजा का जीवन फिर से व्यवस्थित होने लगा था. पिछले जख्म भूल कर वह सामान्य होने की कोशिश करने लगी थीं. इस बीच उन्होंने कुछ शुभचिंतकों के समझाने पर मौडलिंग व अभिनय के छिटपुट कार्यों को भी थोड़ीबहुत तरजीह देना शुरू कर दिया था. 2 सितंबर, 1986 की सुबह नीरजा फ्रैंकफर्ट से वापस आई थी. अगले रोज वह दिन भर शूटिंग में व्यस्त रहीं. इस के अगले दिन उन्हें एक बड़ा असाइनमैंट मिला. उस सुबह 9 बजे वह शूटिंग पर गईं और रात में करीब 8 बजे घर लौटीं. घर पहुंच कर उन्होंने खुशी से चहकते हुए पिता को बताया कि उन्होंने पूरा दिन निर्देशक आयशा सयानी के साथ शूटिंग में बिताया था.

कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद नीरजा ने खाना खाया. फिर मां से पेन एम की पिकअप कार आने से डेढ़ घंटा पहले जगाने का कहते हुए सो गईं. पेन एम से सूचना मिली कि पिकअप कार नीरजा को लेने सवा एक बजे आएगी. अत: साढ़े 11 बजे उन्हें जगाने की प्रक्रिया शुरू हुई जो उन की मां के लिए एक कठिन कार्य था. गहरी नींद में सोई नीरजा को उठाने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी.

मौसम में हलकी ठंडक थी, फिर भी वह हमेशा की तरह ठंडे पानी से नहाई. तैयार होतेहोते नीरजा मां से बतियाती भी रहीं. 7 सितंबर को नीरजा का जन्मदिन था. इस अवसर पर कितने लोगों को बुलाने की बात पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इस बार वह घर पर रह कर सादे तरीके से जन्मदिन मनाएंगी. सवा एक बजे पिकअप कार उन्हें लेने आ पहुंची. बैग से लदी ट्रौली थामे नीरजा आत्मविश्वास के साथ चलती हुई फ्लैट से बाहर निकल गईं. जब वह कार में बैठ गईं तो मातापिता ने उन्हें हाथ हिला कर विदा किया. तब वे लोग कहां जानते थे कि वे अपनी लाडली बेटी को अंतिम यात्रा पर जाने के लिए विदा कर रहे हैं.

5 सितंबर, 1986 को शुक्रवार था. सुबहसुबह का वक्त. इतनी सुबह कि अभी मसजिदों में अजान के स्वर तक नहीं उभरे थे. कुछ ही देर पहले मुंबई से आया पेन एम विमान कराची की धरती पर उतरा था. और अब फिर से उड़ान भरने की तैयारी में था. विमान में सवार करीबकरीब सभी बच्चे सो रहे थे. केबिन में कुछ यात्री नींद में थे तो कुछ बैठे हुए चायकौफी की चुस्कियां ले रहे थे. वरिष्ठ परिचारिका होने के नाते नीरजा भनोट विमान में चहलकदमी कर रही थीं. विमान चलने में जब कुछ ही वक्त रह गया, तो नीरजा ने सीढि़यों के रास्ते आधुनिक हथियारों से लैस 4 व्यक्तियों को विमान में आते देखा. नीरजा को भांपते देर नहीं लगी कि वे आतंकवादी हैं. उन के हावभाव से लग रहा था कि संभवत: वे जहाज को हाईजैक करना चाहते हैं.

नीरजा ने सब से पहला काम यह किया कि वह इस की सूचना देने के लिए कौकपिट की ओर दौड़ पड़ीं. लेकिन इस के पहले ही एक आतंकवादी ने आगे बढ़ कर उन्हें बालों से पकड़ लिया. इस पर उन्होंने चिल्लाते हुए सांकेतिक भाषा में संभावित विमान अपहरण की घोषणा कर दी. एक अन्य परिचारिका नीरजा का हाईजैक कोड सुनते ही भाग कर इस की सूचना कौकपिट अधिकारियों को दे आई.

सूचना मिलते ही तीनों कौकपिट अधिकारी, पायलट और इंजीनियर विमान के आपातद्वार से कूद कर हवाईअड्डे के टर्मिनल में जा पहुंचे. नीरजा को जैसे ही उन लोगों के भागने की जानकारी हुई, उन्होंने बचाव अभियान की कमान खुद संभालने का निर्णय ले लिया.

अब तक उन्हें बालों से पकड़ने वाला आतंकवादी उन्हें धकेलते हुए विमान के कोने में ले गया था. इस बीच नीरजा संभल चुकी थीं. उन्हें मालूम था कि विमान में उस वक्त अन्य 13 कर्मचारियों के सहित करीब 400 यात्री सवार हैं. नीरजा ने पहला काम यह किया कि आतंकवादियों के साथ वार्ता शुरू कर दी. बातचीत में उन्होंने उन का मकसद जानने की कोशिश की, उन की मांगों के बारे में पता लगाने का प्रयास किया. इस बातचीत में आतंकी नेता ने यह बात पक्की तरह जाहिर कर दी कि विमान को अपहृत कर लिया गया है. उस ने यह भी कहा कि अगर उन की मांगें नहीं मानी गईं तो विमान में सवार सभी लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाएगा.

इस बात ने नीरजा को भीतर तक हिला कर रख दिया. उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि चाहे उन की खुद की जान क्यों न चली जाए, वह विमान में सवार किसी भी शख्स पर आंच नहीं आने देगी. उन्होंने किया भी यही. पूरे 17 घंटों तक जितना भी संभव था, नीरजा अकेली ही सारे यात्रियों की देखभाल करने का प्रयास करती रहीं. इस दौरान उन की मुसकान यात्रियों व अन्य विमानकर्मियों को इस बात पर आश्वस्त करती रही कि खतरा उतना बड़ा नहीं है, जितना उन्होंने सोच लिया था.

नीरजा की भावभीनी मुसकान से आभास होता था कि बस कुछ देर की बात है, फिर सब ठीक हो जाएगा. जबकि नीरजा जानती थीं कि भले ही वह अपनी सूझबूझ और चतुराई से वहां खूनखराबा नहीं होने दे रहीं, लेकिन वक्त गुजरने के साथ अन्य कई तरह की परेशानियां सामने आ सकती हैं. उन्हें और उन की सहयोगी परिचारिकाओं को उड़ान के तकनीकी पक्ष की बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी. पावर जैनरेटर का ईंधन खत्म होता जा रहा था, जिस की वजह से वोल्टेज कम होने लगा था.

इस दौरान नीरजा शायद मन ही मन एक ही बात सोच रही थीं कि विमान के भीतर इस तरह की परेशानी पैदा होने से पहले ही वह किसी भी तरह यात्रियों को बाहर निकालने में सफल हो जाएं. वोल्टेज खत्म होते ही बच्चों का दम घुटने की आशंका थी.

तब तक नीरजा ने अपनी आत्मविश्वास भरी बातों से आतंकवादियों का भी मन मोह लिया था. यही वजह थी कि वे पहले की तरह डरानेधमकाने के बजाय अब उन से दोस्ताना लहजे में बातें करने लगे थे. उस वक्त नीरजा आतंकवादियों के नेता के बिलकुल करीब खड़ी थीं. इस बीच जरा सी देर पहले उन्होंने एक यात्री को पानी का गिलास दिया था. विमान के भीतर रोशनी काफी मंद हो गई थी. ठीक उसी वक्त अचानक जाने क्या हुआ कि विमान के भीतर गोलियों की तड़तड़ाहट शुरू हो गई.

दरअसल, अपने मंसूबे कामयाब न होते देख किसी बात पर खफा हो कर अपहर्ताओं ने फायरिंग शुरू कर दी थी. नीरजा को मौका मिला तो वह छलांग लगा कर विमान के इमरजेंसी द्वार के पास जा पहुंची. उन्होंने जल्दी से विमान का दरवाजा खोल कर 100 से ज्यादा यात्रियों को बाहर निकाल दिया. बच्चों को उन्होंने हाथों से उठाउठा कर बाहर किया. इस का नतीजा यह निकला कि आतंकवादियों के सरदार ने नीरजा के पास पहुंच कर उन के पेट में गोली दाग दी. तभी दूसरे आतंकी ने एक और गोली चलाई, जो नीरजा के हाथ में लगी.

इस आतंकवादी ने 2 बच्चों को भी निशाने पर ले लिया था. इस से पहले कि वे बच्चे गोलियों का शिकार होते, नीरजा ने उन के सामने पहुंच कर सारी गोलियां अपने जिस्म पर झेल लीं. नीरजा का समूचा शरीर गोलियों से छलनी हो गया था. बेतहाशा खून बह रहा था. इतना सब होने पर भी उन्होंने यात्रियों को आपातद्वार से कूदने के बारे में समझाना जारी रखा. इस के बाद की नीरजा की दास्तान केवल इतनी है कि उन्हें किसी तरह अस्पताल ले जाया गया, मगर तक तक वह इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थीं. उन की बहादुरी के विवरण कई दिनों तक दुनिया भर के समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ पर विस्तार से छपते रहे.

पूरे विश्व से असंख्य संवेदना संदेश भनोट परिवार के पास पहुंचे. उस वक्त विमान में फंसे यात्रियों ने पूरी घटना और नीरजा की दिलेरी का विवरण देते हुए अपने पत्रों में लिखा था कि यदि आज वे जीवित हैं तो नीरजा के पराक्रम की बदौलत. नीरजा की याद को ताजा रखने के लिए उन की स्मृति में अनेक लोगों ने पेड़ लगाए. कइयों ने अपनी बेटियों का नाम बदल कर नीरजा रख दिया. कई महानुभावों ने उन की बहादुरी पर कविताएं लिखीं. इन में चर्चित अंगरेजी कवि हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय भी थे.

असाधारण वीरता के लिए दिया जाने वाला ‘अशोक चक्र’ देश का सर्वोच्च पुरस्कार है. तब तक कुल 16 गैरसैनिकों को इस पुरस्कार से नवाजा गया था. 26 जनवरी, 1987 को नीरजा को मरणोपरांत जब यह सर्वोच्च पुरस्कार दिया गया तो वह इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली देश की सब से कम उम्र की महिला थीं. अमेरिका की विश्वविख्यात संस्था ‘दि नैशनल सोसायटी औफ दि संस औफ दि अमेरिकन रेवोल्यूशन’ ने ‘हीरोइन नीरजा’ को विशेष उपाधि से सम्मानित करते हुए नीरजा के बारे में घोषित किया, ‘नीरजा ने क्रूरतम संकट के समक्ष अद्वितीय वीरता का परिचय देते हुए अपना बलिदान दे कर उन ऊंचे आदर्शों का पालन किया, जिन से हमारे देशभक्त पूर्वज अनुप्रमाणित हुए थे.’

पेन एम ने नीरजा को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने उद्गार कुछ इस तरह से सार्वजनिक किए, ‘अपनी असाधारण कर्त्तव्यपरायणता व निश्चित मृत्यु के समक्ष भी नीरजा ने अपनी निर्भयता व अथक प्रयासों से सैंकड़ों भयभीत यात्रियों और अपने सहकर्मियों को मौत के जबड़े से बाहर खींचा. अपना कर्त्तव्य निभाते हुए उन्होंने अपने जीवन का उत्सर्ग कर डाला. नीरजा का यह निस्वार्थ बलिदान और उन की निष्ठापूर्ण सेवाभावना मानवता के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी, इस में दो राय नहीं.’

पाकिस्तान की प्रमुख संस्था ‘कैदी सहायक सभा’ ने नीरजा को मरणोपरांत अपने प्रथम मानवता पदक ‘तमगा ए इंसानियत’ से नवाजा था.

इन के अलावा और भी बीसियों संस्थाएं थीं, बीसियों पुरस्कार थे, जिन के माध्यम से नीरजा की स्मृतियों को ताजा रखने के प्रयास किए गए थे. भारतीय डाक विभाग ने उन पर विशेष डाक टिकट जारी किया था. पिता हरीश भनोट ने ‘नीरजा भनोट पेन एम ट्रस्ट’ की स्थापना कर के वह पूरा पैसा इस ट्रस्ट के खाते में डाल दिया, जो उन्हें नीरजा के बलिदान के एवज में विभिन्न संस्थाओं से मिला था. यह खाता साढ़े 36 लाख रुपए की धनराशि से खोला गया था.

इस के तहत सामाजिक उत्थान के अन्य कार्यों के अलावा हर साल 2 ऐसी महिलाओं को ‘नीरजा भनोट अवार्ड’ से सम्मानित किया जाने लगा, जिन्होंने बहादुरी की अद्भुत मिसाल कायम करते हुए अन्य महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया हो. आज इस की गिनती देश के गौरवशाली पुरस्कारों में होती है. इस साल 26वें अवार्ड के रूप में यह पुरस्कार 13 जनवरी, 2016 को बंगलुरु की सुभाषिनी वसंत को दिया गया. इस बार यह पुरस्कार हासिल करने वाली वह अकेली महिला थीं.

उन्हें डेढ़ लाख रुपए नकद के साथ एक साइटेशन व एक ट्रौफी दी गई थी. इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने के लिए फिल्म ‘नीरजा’ की हीरोइन सोनम कपूर आई थीं. उल्लेखनीय है कि फौक्सस्टार स्टूडियोज के बैनर तले राम माधवानी के निर्देशन में निर्माता अतुल कासबेकर ने नीरजा के जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्म का निर्माण किया है, जिस का टाइटल भी ‘नीरजा’ ही रखा गया है. इस फिल्म में शबाना आजमी, शेखर खजियानी, उदय चोपड़ा एवं अबरार जहूर के अलावा नीरजा के किरदार में सोनम कपूर हैं. यह फिल्म 19 फरवरी, 2016 को रिलीज हो चुकी है. Inspirational Story

 

Crime Story: खतरनाक मंसूबे में शामिल लड़की

Crime Story: गलती सुरजीत की बहन सुधा की थी, लेकिन उस की गलती मान कर उसे समझाने के बजाय सुरजीत ने अपने अहं और झूठी शान की खातिर एक निर्दोष को ही फंसाने का खतरनाक मंसूबा बना लिया था.

बात उतनी बड़ी नहीं थी, लेकिन इतनी छोटी भी नहीं थी कि हलके में लिया जाता. उस के पीछे का मकसद और साजिश इतनी खतरनाक थी कि पूरी घटना जानने के बाद मैं दंग रह गया था. इस बात ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि आजकल के बच्चे छोटीछोटी बातों को ले कर इतने बड़ेबड़े मंसूबे कैसे बना लेते हैं?

उस दिन मैं थोड़ी देर से थाने पहुंचा था. इस की वजह यह थी कि मेरे बेटे के स्कूल में सालाना समारोह था, इसलिए मुझे वहां जाना पड़ा था. थाने पहुंच कर मैं ने ड्यूटी अफसर परमजीत सिंह को बुला कर पूछा, ‘‘कोई खास बात तो नहीं है?’’

‘‘जी कोई खास बात नहीं, बस एक…’’

परमजीत बात पूरी कर पाता, मुख्य मुंशी गुरजीत सिंह कुछ फाइलें ले कर हस्ताक्षर कराने आ गया. मैं ने फाइलों पर दस्तखत करते हुए परमजीत सिंह को हाथ से बैठने का इशारा किया. वह मेरे सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गए. सभी फाइलों पर दस्तखत कर के मैं ने मुंशी से 2 चाय भिजवाने को कहा. मुंशी चला गया तो मैं परमजीत से मुखातिब हुआ, ‘‘हां, तो तुम क्या कह रहे थे?’’

‘‘सर, लगभग 12 बजे टोल नाके पर तैनात हमारे थाने के पुलिसकर्मियों के पास एक लड़की भागतीहांफती आई. उस की हालत बता रही थी कि किसी बात को ले कर वह काफी परेशान थी.  पुलिसकर्मियों ने आगे बढ़ कर उस की उस हालत की वजह पूछी तो उस ने हांफते हुए कहा कि वह सतलुज नदी में कोई पूजा सामग्री फेंकने आई थी. सामग्री फेंक कर जैसे ही वह लौटी 2 लड़कों ने उसे पकड़ लिया और जबरदस्ती खींच कर खेतों में ले गए, जहां उन्होंने उस के साथ जबरदस्ती की. लड़कों ने उस का मुंह दबा रखा था, जिस से वह चीख भी नहीं सकी.’’

परमजीत इतनी बात कर चुप हुआ तो पूरी बात जानने के लिए मैं ने कहा, ‘‘आगे क्या हुआ?’’

‘‘लड़की ने अपना नाम जीतो बताया था. उस की बात सुन कर हवलदार चरण सिंह और इंद्र सिंह ने फोन द्वारा मुझे घटना की सूचना दे कर खुद जीतो द्वारा बताए गए खेत की ओर चल पड़े. उन के खेतों में पहुंचने तक मैं भी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया.’’

जीतो का कहना था कि वे लड़के अभी यहीं कहीं छिपे होंगे, इसलिए हम सभी लड़कों की तलाश करने लगे. थोड़ी तलाश की तो 2 लड़के सतलुज किनारे एक झाड़ी के पास बैठे मिल गए. जीतो ने उन की शिनाख्त करते हुए कहा कि इन दोनों ने उस के साथ दुष्कर्म नहीं किया, इन्होंने केवल छेड़छाड़ की थी. दुष्कर्म करने वाला कोई और लड़का था.

‘‘तो क्या 3 लड़के थे?’’ मैं ने पूछा तो परमजीत ने कहा, ‘‘जी सर, दुष्कर्म करने वाला तीसरा लड़का भाग गया था. सर, मैं जीतो और उन दोनों लड़कों को थाने ले आया हूं. अब आप बताइए कि आगे क्या किया जाए?’’

‘‘अरे भई करोगे क्या, लड़की का मैडिकल कराओ, बयान लो और उस फरार लड़के के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उसे पकड़ो और क्या करोगे. वैसे ये सब रहने वाले कहां के है. दुष्कर्म कर के जो लड़का भागा है, उस का क्या नाम है, वह कहां रहता है?’’ मैं ने पूछा.

मेरी इस बात पर परमजीत कुछ परेशान सा हो गया. मैं ने आंखों से आगे बताने का इशारा किया तो उस ने कहा, ‘‘सर, इन दोनों लड़कों के नाम तो नरेश और कुलदीप हैं. दुष्कर्म कर के जो लड़का भागा है. उस का नाम राज है और वह आप के दोस्त पत्रकार अमन सिंह का बेटा है.’’

‘‘क्या… अमन का बेटा राज?’’ मैं चौंका. पत्रकार अमन सिंह सचमुच मेरा अच्छा दोस्त था. वह निहायत ही शरीफ और शांतिप्रिय आदमी था. झूठ से उसे सख्त नफरत थी. उस ने कभी झूठी खबरें नहीं लिखी थीं.

अपने काम से काम रखने वाला अमन अपनी नेकनीयती की वजह से हमेशा आर्थिक तंगी से जूझता रहता था. उस के सिखाए दर्जनों लड़के दुनियादारी के मजे कर रहे थे, लेकिन वह वैसा नहीं बन पाया था. मैं ने दिमाग पर जोर डाला तो मुझे याद आया कि अमन के बेटे का नाम राज ही है, क्योंकि 2-3 महीने पहले अमन किसी मामले में मुझ से सलाह लेने आया था, तब उस ने बेटे का नाम ले कर कोई चर्चा की थी. तब मुझे पता चला था कि उस के बेटे का नाम राज है.

मैं हैरान था कि अमन जैसे शरीफ आदमी का बेटा इस तरह का काम कैसे कर सकता है? लेकिन आज के समय में किसी के बारे में कोई राय रखना उचित नहीं है. जरूरी नहीं कि बाप शरीफ हो तो बेटा भी शरीफ ही हो. बहरहाल, अमन को उस दिन मेरे पास आना था, क्योंकि उसे कुछ रुपयों की जरूरत थी. 2 दिन पहले उस ने फोन कर के  मुझ से कहा था तो मैं ने उसे उस दिन आ कर रुपए ले जाने के लिए कहा था. वह किसी भी समय आ सकता था. मैं सोचने लगा कि अमन जब अपने बेटे की इस करतूत के बारे में सुनेगा तो उस पर क्या गुजरेगी?

‘‘उन दोनों लड़कों को ले आओ.’’ मैं ने कहा.

मेरे कहने पर परमजीत सिंह ने नरेश और कुलदीप को ला कर मेरे सामने खड़ा कर दिया. दोनों देखने में ही आवारा लग रहे थे. उन्हें देख कर मैं सोच भी नहीं सकता था कि ऐसे घटिया लड़कों से राज की दोस्ती हो सकती है. फिर भी मैं ने पूछा, ‘‘सचसच बताओ, क्या बात है?’’

नरेश थोड़ा तेज दिखाई दे रहा था. उसी ने कहा, ‘‘सर, हम ने उसे मना किया था. कहा कि छेड़छाड़ की बात और है, लेकिन वह नहीं माना. लड़की को पकड़ खेत में ले गया और लड़की की इज्जत खराब कर दी.’’

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन उस लड़के का नाम क्या है, कौन है वह?’’

‘‘सर, उस का नाम राज है. उस के पापा पत्रकार हैं. उन का नाम अमन सिंह है. राज एक फाइनैंस कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर है.’’

इस के बाद उस ने वही सब मुझे भी बताया, जो उस ने परमजीत को बताया था. नरेश के साथी कुलदीप ने भी वही सब बताया था, जो नरेश ने बताया था. मैं उन से पूछताछ कर ही रहा था कि अमन आ पहुंचा. मुझ से हाथ मिला कर वह मेरे सामने कुरसी पर बैठ गया तो मैं ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘तुम्हारे बेटे ने जो किया है, मुझे उस से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी. तुम ने यही सब सिखाया है उसे?’’

‘‘मेरा बेटा… आप मेरे किस बेटे की बात कर रहे हैं?’’

‘‘राज की और किस की..?’’

‘‘क्यों, क्या किया राज ने?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.

‘‘एक लड़की के साथ जबरदस्ती की है.’’

‘‘जबरदस्ती… क्या मतलब?’’

‘‘भई एक लड़की के साथ दुष्कर्म किया है राज ने.’’ मैं ने आवाज पर जोर दे कर कहा.

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं? कहां किस के साथ दुष्कर्म किया है? राज ऐसा कतई नहीं कर सकता.’’ अमन ने जिद सी करते हुए कहा.

‘‘ऐसा नहीं कर सकता तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं. पूछो राज के इन साथियों से.’’ मैं ने नरेश और कुलदीप की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘अपने इन्हीं साथियों के साथ उस ने घटना को अंजाम दिया है. दोनों उसी के दोस्त हैं.’’

‘‘आप यह क्या कह रहे हैं. ये आवारा लड़के राज के दोस्त कतई नहीं हो सकते. राज के सिर्फ 3 दोस्त हैं, जिन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूं. तुम इन सड़कछाप लड़कों को राज का दोस्त कह दोगे तो क्या मैं मान लूंगा.’’

दुष्कर्म के मामले में राज का नाम आने से अमन काफी नाराज था. उस ने खीझते हुए कहा, ‘‘अच्छा, अब बात समझ में आई, मैं ने आप से कुछ रुपए मांगे थे, नहीं देने का मन था तो मना कर देते. मेरे बेटे पर इस तरह का झूठा आरोप लगाने की क्या जरूरत थी? सच ही कहा गया है, पुलिस वाले की न दोस्ती अच्छी होती है और न दुश्मनी.’’

‘‘अमन ये तुम क्या बेकार की बातें कर रहे हो? मैं कुछ भी नहीं कह रहा हूं. जो कुछ भी कह रहे हैं, वह ये लड़के और वह लड़की कह रही है, जिस के साथ राज ने दुष्कर्म किया है. रही बात पैसों की तो उस के लिए मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था. तुम्हें रुपए देने के लिए ही तो मैं ने बुलाया था.’’

‘‘मुझे अब आप की कोई मदद नहीं चाहिए. आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए.’’

मैं खामोश हो गया. अमन सिर झुकाए किसी सोच में डूबा बैठा रहा. कुछ देर बाद मैं ने अमन को प्यार से समझाया. लड़की को बुला कर पूरी बात उस के सामने कहलवाई. नरेश और कुलदीप से भी बात कराई. तब जा कर बात उस की समझ में आई.

वह कुछ देर शांत बैठा रहा. उस के बाद अचानक जेब से मोबाइल फोन निकाला और किसी से बात करने लगा. उस की बातचीत से समझ में आया कि उस ने राज को फोन किया था और अपने 2-4 दोस्तों के साथ आने को कहा था. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अमन करना क्या चाहता है. मैं ने अमन के लिए चाय मंगाई. चाय पी कर हम सभी चुपचाप बैठे रहे. वहां की खामोशी बता रही थी कि कोई किसी से बात नहीं करना चाहता. लगभग आधे घंटे बाद अमन के फोन की घंटी बजी. फोन रिसीव कर के उस ने कहा, ‘‘आ जाओ.’’

इस के बाद अमन उस से मुखातिब हुआ, ‘‘इन तीनों से कहो कि अभी जो लड़के आएंगे, उन में पहचान कर बताएं कि राज कौन है, जिस ने इस लड़की के साथ जबरदस्ती की है.’’

अमन के इतना कहतेकहते 6 लड़के मेरे औफिस में आ कर खड़े हो गए. सभी लड़के नरेश और कुलदीप से एकदम अलग पढ़ेलिखे और अच्छे घरों के लग रहे थे. मैं ने सब से पहले जीतो से कहा, ‘‘बताओ, इन लड़कों में से कौन राज है, जिस ने तुम्हारे साथ जबरदस्ती की है?’’

मेरी बात सुन कर वह बगलें झांकने लगी. मैं ने डांटा तो हड़बड़ा कर उस ने एक लड़के की ओर इशारा कर दिया. मेरे कहने पर परमीत सिंह ने उस लड़के को खड़ा कर दिया. इस के बाद मैं ने नरेश और कुलदीप से कहा कि वे बताएं कि उन में इन का दोस्त राज कौन है?’’

जीतो की तरह वे भी एकदूसरे का मुंह देखने लगे. मैं ने डांटते हुए कहा, ‘‘अब पहचान कर बताओ न तुम्हारा दोस्त राज कौन है?’’

दोनों हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे, ‘‘साहब, हम नहीं जानते कि इन में से राज कौन है? हमें तो राज का नाम लेने के लिए रुपए दिए गए थे.’’

‘‘जी साहब,’’ नरेश और कुलदीप के सच उगलते ही जीतो ने भी बीच में सच उगल दिया, ‘‘ये सच कह रहे हैं साहब. राज को दुष्कर्म के मामले में फंसाने के लिए हम सभी को रुपए दिए गए थे. मैं न तो राज को जानती हूं और न मैं ने कभी उसे देखा है.’’

इस के बाद उन तीनों ने जो बताया, उसे सुन कर मैं हैरान रह गया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आज की युवा पीढ़ी को यह क्या हो गया है, जो छोटीछोटी बातों पर इतने खतरनाक मंसूबे बना लेती हैं. इस के बाद जीतो, नरेश और कुलदीप से की गई पूछताछ में इस फरजी दुष्कर्म की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी.

राज जिस फाइनैंस कंपनी में काम करता था, उसी में उस के साथ ही किशोरीलाल भी काम करता था. उस का काम लोन पास करवाना था. वह सीधासादा पारिवारिक आदमी था. इसलिए राज उस की बहुत इज्जत करता था. इस के अलावा एक वजह यह भी थी कि वह उस के पिता की उम्र का था.

किशोरीलाल की एक जवान बेटी थी सुधा, जो ग्रैजुएशन कर के उन दिनों घर में बैठी थी. वह पोस्टग्रैजुएशन करना चाहती थी, लेकिन एडमिशन में देरी थी. किशोरीलाल ने सोचा कि सुधा पूरे दिन घर में बैठी बोर होती रहती है, क्यों न इस बीच अस्थाई रूप से उसे अपनी कंपनी में लगवा दे. मन भी बहलता रहेगा, 4 पैसे कमा कर भी लाएगी. उस ने इस विषय पर राज से बात की तो उसे भला क्या ऐतराज होता. जहां 40-50 लड़केलड़कियां काम कर रहे थे, वहां एक और सही. सुधा ने फाइनैंस कंपनी जौइन कर ली. वह खुले विचारों वाली आधुनिक युवती थी. बातचीत में किसी से भी जल्दी घुलमिल जाना और दोस्ती कर लेना उस की फितरत थी.

स्कूल में पढ़ते समय से ही उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. उन में से किसी एक ने उसे धोखा भी दिया था. बहरहाल राज को देखते ही वह उस की ओर आकर्षित हो गई थी, क्योंकि राज के खूबसूरत होने के साथसाथ कंपनी में भी उस की बड़ी इज्जत थी. कोई न कोई बहाना बना कर सुधा राज के नजदीक जाने की कोशिश करने लगी. इस कोशिश में उस ने घुमाफिरा कर कई बार उस से प्यार करने का इशारा किया. उस ने उस से यहां तक कह दिया कि वह एक लड़के से प्यार करती थी, लेकिन उस ने उसे धोखा दे दिया था. अब मांबाप उस की शादी करना चाहते हैं, लेकिन वह अभी शादी नहीं करना चाहती.

राज ने उस की कोशिश को नाकाम करते हुए उसे समझाया कि उसे इन बातों पर ध्यान न दे कर अपने काम पर ध्यान देना चाहिए. फिर अभी उसे आगे की पढ़ाई भी करनी है. उसे अपना कैरियर बनाना है. अभी उस का पूरा जीवन पड़ा है. उसे इस तरह की फिजूल की बातें दिमाग में नहीं लाना चाहिए. राज की बातों पर गौर किए बगैर सुधा सुधरने के बजाय मैसेज करने लगी. उन संदेशों में वह राज से सलाह मांगती कि अब उसे क्या करना चाहिए, साथ ही बीचबीच में प्यार के इजहार वाले मैसेज भी कर देती थी.

सुधा के इन संदेशों से परेशान हो कर राज ने उसे संदेश भेजा कि वह उस का समय बरबाद न करे, जैसा उस ने उसे समझाया है, वह वैसा ही करे. संयोग से किसी दिन सुधा का फोन उस के भाई सुरजीत के हाथ लग गया. उस ने मैसेज बौक्स में बहन के भेजे मैसेज देखे तो गुस्से से पागल हो उठा. उस ने बहन को समझाने के बजाय राज को सबक सिखाने का इरादा बना लिया. जबकि राज का इस मामले में कोई दोष नहीं था. बहन से उस ने कुछ कहना इसलिए उचित नहीं समझा, क्योंकि वह उस की फितरत को जानता था. उस ने मैसेज वाली बात मांबाप को भी बता दी थी.

यह सब सुन कर किशोरीलाल तो इतना शर्मिंदा हुए कि उन्होंने नौकरी पर जाना ही बंद कर दिया. सुधा की भी नौकरी छुड़वा दी गई. सुरजीत ने राज को सबक सिखाने के लिए थाने के अपने एक परिचित हवलदार को कुछ रुपए दे कर कहा कि राज उस की बहन से छेड़छाड़ कर के उसे परेशान करता है. वह उसे किसी झूठे मुकदमे में फंसा कर जेल भिजवा दे.

हवलदार, जिस का नाम जसबीर था, ने फोन कर के राज को थाने बुलाया. फोन पर उस ने राज को धमकाते हुए कहा था कि थाने में उस के खिलाफ रेप का मुकदमा दर्ज है. अगर वह थाने नहीं आया तो वह उसे उस के औफिस से गिरफ्तार कर लेगा. समझदारी दिखाते हुए राज ने यह बात अपने पत्रकार पिता अमन सिंह को बता दी, साथ ही सुधा द्वारा भेजे गए संदेशों के बारे में भी बता दिया. अमन इस बारे में मेरे पास सलाह लेने आया. मेरे पास आने से पहले उस ने हवलदार जसबीर सिंह को फोन कर के अपना परिचय दे कर पूछा था कि उस के बेटे राज से उसे ऐसा क्या काम है, जो वह उसे थाने बुला रहा है.

पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने भी फोन कर के हवलदार जसबीर सिंह से यही बात पूछी तो उस दिन के बाद उस ने राज को कभी फोन नहीं किया. इस के बाद अमन सिंह इस मामले को सुलझाने के लिए राज की कंपनी के मैनेजर से मिले. उन्होंने किशोरीलाल को औफिस में बुलवाया, जिस से आमनेसामने बैठ कर बातचीत हो सके और जो भी गलतफहमी हो दूर की जा सके. तय समय पर राज, अमन सिंह और किशोरीलाल मैनेजर की केबिन में इकट्ठा हुए. किशोरीलाल के साथ उस की पत्नी और बेटा सुरजीत भी आया था.

सुरजीत के बारे में जैसा मुझे पता चला था, उस के हिसाब से वह अपनी मां के लाड़प्यार में बिगड़ा आवारा किस्म का लड़का था. वह दिन भर गुंडागर्दी और आवारागर्दी किया करता था. वह खुद को किसी तीसमार खां से कम नहीं समझता था. बातचीत शुरू हुई तो सुरजीत और उस की मां किशोरीलाल को चुप करा कर जोरजोर से बोल कर राज पर झूठे आरोप लगाने लगे. बात यहीं तक सीमित नहीं रही, वे उसे सजा दिलाने की बात कर रहे थे. अंत में मैनेजर साहब को हस्तक्षेप करना पड़ा. उन्होंने कहा, ‘‘मैं राज को 5 सालों से जानता हूं. वह कैसा है, यह तुम लोगों को बताने की जरूरत नहीं है. रही बात सुधा की तो उसे भी 10 दिनों में जान लिया. फायदा इसी में है कि बात को यहीं खत्म कर दिया जाए.’’

उस दिन समझौता तो हो गया, लेकिन जातेजाते सुरजीत ने राज को धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें देख लूंगा.’’

यह बात भी यहीं खत्म हो गई. उस दिन जो समझौता हुआ था, सुरजीत उस से बिलकुल खुश नहीं था. वह राज को सजा दिलाना चाहता था. सजा भी ऐसी कि वह मुंह दिखाने लायक न रहे. 2 महीने तक शांत रहने के बाद सुरजीत ने राज को सबक सिखाने के लिए एक योजना बनाई. उस योजना में उस ने कालगर्ल जीतो और 2 आवारा लड़कों नरेश तथा कुलदीप को शामिल किया. उस ने उन से कहा कि योजना सफल होने पर वह उन्हें मोटी रकम देगा.

उस की योजना के अनुसार, नरेश को किसी सुनसान जगह पर जीतो के साथ शारीरिक संबंध बनाना था. उस के बाद जीतो थाने जा कर शिकायत दर्ज कराती कि उस के साथ दुष्कर्म हुआ है. जीतो पुलिस को उस जगह ले जाती, जहां दुष्कर्म हुआ था. नरेश और कुलदीप वहीं छिपे रहेंगे, जिन्हें पुलिस दुष्कर्म का साथी मान कर थाने ले आती. थाने आ कर जीतो बताती कि इन दोनों ने दुष्कर्म नहीं किया, इन्होंने केवल छेड़छाड़ की थी. दुष्कर्म इन के दोस्त ने किया था, जो भाग गया है. पुलिस जब नरेश और कुलदीप से उन के दोस्त का नाम पूछती तो वे उस का नाम राज बता कर उस का मोबाइल नंबर देते हुए उस के बारे में पूरी जानकारी दे देते.

जीतो के बयान और नरेश तथा कुलदीप की गवाही के आधार पर पुलिस राज के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भिजवा देगी, क्योंकि जीतो के मैडिकल में इस बात की पुष्टि हो जाती कि उस के साथ शारीरिक संबंध बनाया गया है. छेड़छाड़ के आरोप में तुरंत दोनों की जमानत हो जाती, जबकि दुष्कर्म के आरोप में राज को जेल भेज दिया जाता. इस काम के लिए सुरजीत ने नरेश और कुलदीप को 5-5 हजार रुपए तथा जीतो को 10 हजार रुपए एडवांस भी दिए थे. इतने ही रुपए उन्हें तब और मिलने थे, जब वे रिपोर्ट की कौपी सुरजीत को देते. यह सारी कारगुजारी सुरजीत की बनाई थी.

बहरहाल, मैं ने परमजीत सिंह से उन तीनों के बयान दर्ज कर के जीतो को अस्पताल ले जा कर मैडिकल कराने को कहा. इस के बाद मैं ने थाना मानावाला से हवलदार जसबीर को बुलवा कर पूछा, ‘‘यह राज वाला क्या मामला है?’’

उस ने सब कुछ सचसच बता दिया. उस ने कहा कि वह न राज को जानता है और न ही उसे उस के द्वारा की गई किसी छेड़छाड़ की बात मालूम है. सुरजीत ने उसे रुपए दे कर राज पर झूठा मुकदमा दर्ज कराने के लिए कहा था. लेकिन बीच में राज के पत्रकार पिता के आ जाने से वह राज पर कोई काररवाई नहीं कर सका था. जसबीर ने यह भी बताया था कि उस के बाद भी सुरजीत उस के पास आया था और कह रहा था कि वह चाहे जितने रुपए ले ले, लेकिन राज पर दुष्कर्म का केस बना कर उसे जेल भिजवा दे. लेकिन उस ने उसे साफ मना कर दिया था. शायद इसीलिए वह उस का थानाक्षेत्र छोड़ कर अपने मंसूबे को पूरे करने के मेरे थानाक्षेत्र में आया था.

मैं ने जसबीर की मुलाकात राज और अमन सिंह से भी कराई और उसे पूरी कहानी बताई. इस के बाद मैं ने उस से कहा कि सुरजीत ने राज के खिलाफ अपनी बहन से छेड़छाड़ की जो झूठी रिपोर्ट दी थी, उस पर वह उस के खिलाफ काररवाई करे. जसबीर इस के लिए तैयार हो गया.

अब तक परमजीत सिंह जीतो का मैडिकल करवा कर लौट आए थे. इस के बाद मैं ने नरेश, कुलदीप और जीतो से पूछा, ‘‘इस के बाद सुरजीत ने तुम लोगों से क्या करने को कहा था?’’

‘‘उस ने कहा था कि रिपोर्ट दर्ज होने के बाद मैं उसे फोन करूं. इस के बाद वह आता और रिपोर्ट की कापी ले कर मेरे बाकी रुपए देता.’’ जीतो ने कहा.

‘‘ठीक है, तुम उसे फोन कर के बताओ कि रिपोर्ट दर्ज हो गई है. पुलिस राज को पकड़ने उस के औफिस गई है.’’

मेरे कहने पर जीतो ने सुरजीत को फोन कर के वही सब कहा, जो मैं ने उसे समझाया था. सुरजीत ने जीतो से आधे घंटे बाद मेन बाईपास चौक पर मिलने को कहा. मैं ने परमजीत सिंह और जसबीर के नेतृत्व में एक टीम तैयार की और जीतो के साथ सुरजीत को पकड़ने के लिए भेज दी. दरअसल, मुझे सुरजीत पर बहुत गुस्सा आ रहा था. इसलिए नहीं कि राज मेरे दोस्त अमन सिंह का बेटा था, गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि बहन की गलती मान कर उसे समझाने के बजाय वह एक निर्दोष को सजा दिलवाना चाहता था, वह भी सिर्फ अपने अहं और झूठी शान के लिए. इस तरह के लोग एक तरह से समाज पर कलंक हैं और घृणा के पात्र बन जाते हैं.

बहरहाल, सुरजीत को पकड़ने गई टीम खाली हाथ लौट आई. वह बाईपास पर नहीं आया. पुलिस टीम उस के घर भी गई, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. जीतो ने कई बार फोन कर के उस से बात करने की कोशिश की, लेकिन उस ने अपना फोन बंद कर दिया था. शायद उसे पुलिसिया काररवाई की भनक लग गई थी. वह फरार हो गया था. बहरहाल, जीतो, नरेश और कुलदीप के खिलाफ मैं ने काररवाई करनी शुरू कर दी. नरेश पर मैं ने जीतो से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करना चाहा तो जीतो और नरेश मेरे पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगे.

नरेश ने जीतो के साथ शारीरिक संबंध तो बनाए ही थे, जो मैडिकल रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गए थे. लेकिन जीतो ने कहा, ‘‘साहब, हम से गलती हो गई है, हमें माफ कर दें. यह संबंध मेरी मरजी से बने थे.’’

जीतो के इस नए बयान पर मैं ने नरेश के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज करने के बजाय इम्मोरल ट्रैफिकिंग एक्ट (देह व्यापार) का मुकदमा दर्ज कर उन्हें हिरासत में ले लिया. कुलदीप के खिलाफ मैं ने जीतो से छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज किया. अगले दिन तीनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जमानत मिल गई.

यह संयोग की ही बात थी कि राज मेरे पत्रकार दोस्त का बेटा था, वरना सुरजीत अपनी घिनौनी योजना को अंजाम दे कर एक भले लड़के को जेल भिजवा कर उस पर एक ऐसा कलंक का टीका लगा देता, जो पूरी जिंदगी न छूटता. इस से उस का जीवन भी अंधकारमय हो जाता. Crime Story

 

—कथा सत्य घटना पर आधारित, पात्रों के नाम बदले गए हैं.

 

Social Story: पत्नी पर दाव

Social Story: गांव के गरीब मजदूर आसरे की खूबसूरत पत्नी राधा पर छोटे ठाकुर बिच्छू सिंह का दिल आया तो उसे पाने के लिए उस ने आसरे को शराब पीना ही नहीं, जुआ खेलना भी सिखा दिया. क्या जुआ में राधा को जीत कर वह राधा को अपनी अंकशायिनी बना सका?

दिलीप को पता था कि उस के गुरू पं. भगवती प्रसाद चौबे सवेरेसवेरे मोहल्ले के नाई से मालिश करवाते थे. उस वक्त वह फुरसत में होते थे, इसलिए उन से बातचीत की जा सकती थी. वह चोटी के वकील थे. उन की बैठक में पहुंच कर दिलीप ने नमस्ते किया तो वह मुसकुराए.

उन्होंने दिलीप को देखते ही पूछा, ‘‘आओ दिलीप बेटा, सुबहसुबह कैसे?’’

‘‘बाबूजी, मैं ने वकालत तो शुरू कर दी है, पर मेरी मां कहती हैं कि इस पेशे में झूठ बहुत बोलना पड़ता है, जिस से चरित्रहीनता आ जाती है.’’

‘‘बेटे, हर झूठ, झूठ नहीं होता. हमें देखना होता है कि क्या, किस से, कहां और क्यों बोला जा रहा है और कितना बोला जा रहा है.’’

‘‘यानी झूठ कई तरह के होते हैं?’’

‘‘यही तो समझने की बात है. मिसाल के तौर पर एक फौजदारी अदालत में पुलिस ने एक नाजायज तमंचा रखने पर अभियुक्त को न्यायालय में पेश कर दिया. पुलिस ने 4 चश्मदीद गवाह पेश किए, जिन्होंने अभियुक्त के पास से पिस्तौल की बरामदगी की पक्की गवाही दी. जबकि अभियुक्त ने अपने वकील को बताया है कि रंजिश की वजह से उस पर झूठा मुकदमा बनाया गया है और गवाह पुलिस के दबाव से झूठी गवाही दे रहे है. वकील साहब जिरह करतेकरते थक गए, पर कोई गवाह सच नहीं बोला.’’

‘‘इस का मतलब बेगुनाह गया जेल.’’ दिलीप ने कहा.

‘‘अब या तो वकील यह नाइंसाफी देखता रहे या फिर इस की कुछ काट कर के अभियुक्त को बचा ले.’’

‘‘बाबूजी, ऐसी स्थिति में भला क्या हो सकता है?’’

‘‘हो क्यों नहीं सकता.’’ भगवतीप्रसाद चौबे बोले, ‘‘वकील को जैसे का तैसा जवाब देना चाहिए, मतलब उसे भी 4 झूठे गवाह पेश करने चाहिए. यह झूठ चूंकि सच उगलवाने के लिए बोला जाएगा, इसलिए झूठ नहीं कहलाएगा. क्योंकि इस से किसी निर्दोष की जान बचेगी.’’

‘‘ऐसा भी होता है क्या?’’ दिलीप ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा.

‘‘ज्यादातर मामलों में ऐसा ही करना पड़ता है, वरना हमारी तो वकालत ही बंद हो जाएगी.’’

चौबे साहब से बात कर के दिलीप जब वापस अपने औफिस पहुंचा तो वहां करीब 60 साल की उम्र वाला एक व्यक्ति बैठा था. अभिवादन करने के बाद उस ने कहा, ‘‘वकील साहब, मेरा एक औरत भगाने का मुकदमा है. आप उस की पैरवी कर दीजिए. फीस जो आप कहेंगे, मिल जाएगी.’’

‘‘यह तो बहुत गंभीर केस है, इस के लिए किसी सीनियर वकील की सेवाएं लो. मैं तो अभी बहुत जूनियर हूं.’’

‘‘उन लोगों के पास हो कर यहां आया हूं. सब ने इनकार कर दिया है. मेरा यह केस अब आप को ही लड़ना होगा. वकील साहब मैं आप को दोगुनी फीस दूंगा.’’

दिलीप ने उस के कागजात, गवाहों के बयान, एफआईआर तथा डाक्टरी रिपोर्ट देख कर उस के बारे में पूरी जानकारी ली. उस व्यक्ति ने इस मुकदमे के बारे जो बताया, वह कुछ इस तरह था. रायबरेली जिले में एक कस्बा है बछरावां. वहां से 4 किलोमीटर दूर ठाकुरों का एक गांव था, जिस के प्रधान थे रंजीत सिंह. उन का एक बेटा था बिच्छू सिंह, जो 22 साल का दबंग व रंगीला नौजवान था. वह खूब शराब पीता था और अपने साथियों के साथ जुआ खेलने के अलावा मेलेठेले में अपनी पसंद का शिकार करता था.

इसी गांव का एक पुरवा था राधेग्राम, जहां गरीब खेतिहर मजदूर रहते थे. इसी पुरवा में आसरे नाम का एक 20 साल का लड़का रहता था. इस के पास थोड़ी खेती की जमीन थी, बाकी वह मेहनतमजदूरी कर के अपना काम चला लेता था. राधा से उस की नईनई शादी हुई थी. राधा एक सुंदर सुशील लड़की थी. उसने एक गाय पाला रखी थी, जिस का दूध बेच कर कुछ आमदनी हो जाती थी.

बिच्छू सिंह के गुर्गों ने जब उसे राधा की सुंदरता के बारे में बताया तो बिच्छू सिंह उसे पाने के लिए अपने अवारा साथियों से सलाह करने लगा. उस ने आसरे को अपने खेतों पर डबल मजदूरी पर काम दे दिया और उस के साथ देसी शराब के ठेके पर भी जाने लगा. वहां वह एक बोतल शराब और एक प्लेट मछली ले कर उस के साथ खातापीता. कुछ दिनों बाद बिच्छू सिंह ने आसरे से कहा, ‘‘का रे आसरे, ताश खेलना जानता है? हमारे सब साथी तो रात में ताश खेलते है.’’

‘‘छोटे ठाकुर, हम तो ताश कभी देखे भी नहीं, भला खेलेंगे क्या?’’

‘‘लो कर लो बात, इतना बड़ा हो गया और ताश खेलना भी नहीं जानता. चल मैं तुझे सिखाता हूं. पहले तू ताश के पत्ते पहचान ले, बाकी खेल देख कर खुद ही सीख जाएगा.’’

इस तरह छोटे ठाकुर ने आसरे को न केवल शराब का आदी बना दिया, बल्कि जुआ खेलना भी सिखा दिया. वह आसरे के साथ ऐसी तिकड़म से जुआ खेलता कि आसरे हर बार 100-200 रुपए जीत कर नशे की हालत में घर जाता और पत्नी से छोटे ठाकुर की बहुत तारीफ करता.

एक दिन राधा ने उसे समझाया, ‘‘देखो जी, शराब व जुआ बहुत बुरी चीज है. इस से घर बरबाद हो जाते हैं. महाभारत का युद्ध इसी जुए के कारण हुआ था.’’

‘‘मैं क्या तुम्हें बेवकूफ लगता हूं? मुझे जिस काम में फायदा नजर आएगा, वही करूंगा न, तुझे तो पूरा पैसा देता हूं.’’ आसरे ने गुस्से में जवाब दिया.

‘‘मुझे हराम का पैसा नहीं चाहिए. बरकत ईमानदारी के पैसे से होती है. वैसे भी शराब से तुम्हारा शरीर खराब हो रहा है.’’

‘‘तू बड़े आदमियों को नहीं जानती. वे मुझे अपना दोस्त कहते हैं. चल खाना दे, बड़े जोर की भूख लगी है.’’

एक दिन छोटे ठाकुर ने आसरे से कहा, ‘‘आज हम तुम्हारे घर ताश खेलने चलेंगे. वहीं शराब भी चलेगी.’’

आसरे तैयार हो गया और सब को साथ ले कर अपने घर आ गया. सब ने बाहरी कोठरी में अड्डा जमाया. छोटे ठाकुर ने बोतल खोली और आसरे की पत्नी से कुछ नमकीन मांगी. जब वह चना ले कर आई तो बिच्छू सिंह ने कहा, ‘‘तेरी पत्नी तो हीरोइन है आसरे. बहुत किस्मत वाला है. बोल मेरी पत्नी से बदलेगा.’’

इस फूहड़ मजाक पर सब जोरजोर से हंसने लगे. राधा जल्दी से अंदर चली गई. जुआ शुरू हुआ. उस दिन आसरे हारने लगा. जब उस के सारे पैसे खत्म हो गए तो छोटे ठाकुर ने खेलने के लिए उसे कुछ रुपए उधार दे दिए. जब आसरे उन्हें भी हार गया तो उस ने कहा,‘‘छोटे ठाकुर, अब हमारे पल्ले कुछ नहीं बचा. खानेपीने के भी लाले पड़ जाएंगे.’’

‘‘तू घबरा मत, मैं हूं ना. अभी भी तू हारी हुई अपनी सारी रकम जीत सकता है.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘एक तगड़ा दाव खेल जा, सब कुछ तेरा.’’

‘‘कैसे खेलूं ठाकुर, मेरे पल्ले तो अब कुछ है नहीं.’’

‘‘जैसे महाभारत में युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाया था, उसी तरह तू भी लगा दे पत्नी को दांव पर, पत्नी का तो कुछ नहीं होगा. ढेर सारा पैसा जरूर आ जाएगा.’’

एक तो आसरे पहले ही नशे में था, ऊपर से ठाकुर ने उसे चढ़ा दिया. कुछ सोचने के बाद वह उस दांव को खेलने के लिए राजी हो गया. इस बार खेल बड़ा था. वही हुआ, जो ठाकुर चाहता था. आसरे अपनी पत्नी हार गया. उस के हारते ही ठाकुर के तेवर बदल गए. उस ने गुर्रा कर कहा, ‘‘अब राधा मेरी हो गई. तेरा उस पर कोई अधिकार नहीं रहा. रात को इसे खेतों वाले मकान पर पहुंचा देना, नहीं तो जबरदस्ती करनी पड़ेगी.’’

इस के बाद वे भी चले गए, आसरे मुंह लटकाए बाहर बैठा सोचता रहा कि पत्नी को कैसे बचाए. काफी देर बाद जब वह घर के अंदर आया तो राधा गायब थी. उस ने चारों ओर ढूंढा, ठाकुर से पूछा, पर राधा का कुछ पता नहीं चला. राधा के बारे में जैसे ही ठाकुर को पता चला, उस ने साइकिलों से अपने आदमी थानेचौकी व रेलवे स्टेशन की ओर दौड़ाए और खुद बसअड्डे जा पहुंचा. वहीं उस ने राधा को एक तैयार बस में बैठे देख लिया. वह भी उस बस में चढ़ गया और राधा से बहुत प्यार एवं इज्जत से बोला, ‘‘राधा, तुम ख्वाहमख्वाह नाराज हो कर चली आईं. अरे हम तो रामलीला की तरह महाभारत लीला खेल रहे थे. भला आजकल के जमाने में कोई पत्नी को संपत्ति समझ कर जुआ खेल सकता है? पुलिस हमारी हड्डीपसली तोड़ देगी. चलो घर चलो, मजाक को मजाक ही समझा करो.’’

लेकिन राधा इन चिकनीचुपड़ी बातों में नहीं आई. उस ने साफसाफ कहा, ‘‘ठाकुर, तुम नीचे उतरो, वरना हम शोर मचा कर सामने खड़ी पुलिस को बुला लेंगे.’’

ठाकुर बाजी हार कर बस से नीचे उतर आया, बस चली गई. रास्ते में एक शरीफ आदमी मिला तो उस ने राधा के सिर पर हाथ रख कर उस की मदद की जिम्मेदारी ली. राधा के पिता के उम्र का वह आदमी अगले स्टाप पर उसे फुसला कर अपने घर ले गया.

‘‘बेटी, तुम आराम करो. खानापानी कर लो. अभी रात हो गई. सुबह मैं तुम्हें तुम्हारे पिता के पास पहुंचा दूंगा. और हां, दरवाजा अंदर से बंद कर लेना.’’

राधा ने ऐसा ही किया. परंतु राधा के कान तब खड़े हुए, जब वह व्यक्ति अपनी पत्नी से कहने लगा, ‘‘तुम्हारे भाई की शादी कहीं नहीं हो रही है. उस के लिए एक दुलहन ले कर आया हूं. सुबह को इसे तेरे गांव ले जा कर साले से इस की शादी करा दूंगा. लड़की अच्छी है, लगता है घर से भागी है.’’

सुन कर राधा सन्न रह गई. जिस पर विश्वास किया, वही दामन चाक करने को तैयार था. कमरे की पिछली खिड़की खुली थी, उस में सलाखें भी नहीं लगी थीं. राधा धीरे से उस खिड़की से बाहर आई और रात भर सड़क पकड़ कर चलती रही. उसे कुछ पता नहीं था कि वह कहां है और किधर जा रही है. भोर होतेहोते वह एक गांव में पहुंची, जहां लोगों ने उस अजनबी महिला को देख कर चोर समझ लिया, वे उसे ले कर प्रधान के पास पहुंचे, ‘‘वीरजी, यह महिला गांव की नहीं है. चुपकेचुपके गांव में घुस रही थी. हम इसे पकड़ लाए. कोई चोर लगती है. घरों का भेद जान कर यह अपने साथियों को इशारे से बुला लेगी.’’

वीरजी को लड़की परेशान व थकी हुई लगी. उस ने पूछा ‘‘भूखी हो?’’

‘‘हां, लेकिन मैं चोर नहीं, बल्कि एक दुखयारी औरत हूं. मेरे पीछे बदमाश पड़े हैं और मेरी इज्जत खतरे में है. आप मेरी मदद कर के मुझे मेरे पिता के घर पहुंचा दीजिए.’’

वीरजी ने उस से उस के पिता का पता पूछा. फिर कहा कि वह थोड़ा आराम कर ले, कुछ खापी ले. उसे उस के घर पहुंचा दिया जाएगा. अब उसे डरने की जरूरत नहीं है. वीरजी ने राधा की कदकाठी और उम्र देखी तो उस के मुंह में पानी आ गया. उस ने सोचा कि क्यों न इसे पुत्तनबाई के हाथ बेच दिया जाए. वहां से अच्छे पैसे मिल जाएंगे, साथ ही वहां उस का आनाजाना भी होता रहेगा. राधा थकी थी. नाश्ता कर के लेटी तो उसे नींद आ गई. उस की आंख खुली तो देखा वीरजी पास खड़ा उसे ललचाई नजरों से देख रहा है. वह हड़बड़ा कर उठ बैठी तो वीरजी बोले, ‘‘बेटी, बस का समय हो गया है. मैं तुम्हें जगाने आया था. चलो, पास ही बस स्टाप है, वहीं से बस पकड़ लेंगे.’’

राधा अपनी साड़ी ठीक कर के तैयार हो गई. दोनों बसस्टाप पर आ गए. बस आई तो वह वीरजी के साथ बस में बैठ गई. अब वह बहुत चौकन्नी थी. उसे वीरजी अच्छा आदमी नहीं लग रहा था. बस जब फर्रुखाबाद बस अड्डे पर पहुंची तो वीरजी ने राधा को बस से उतारा और बाहर की ओर ले कर चल दिया. वहीं फाटक पर एक सिपाही ड्यूटी पर था. राधा जोर से चिल्लाई तो सिपाही ने पास आ कर पूछा, ‘‘क्या बात है, क्यों शोर मचा रही है?’’

‘‘यह आदमी मुझे घर से भगा कर कहीं खतरे की जगह ले जा रहा है. आप मेरी मदद कीजिए.’’

वीरजी ने पासा पलटते देखा तो धीरे से वहां से खिसक गया. राधा के इशारे पर सिपाही ने उसे रोक लिया और दोनों को सीधे पुलिस थाने ले गया. राधा ने वहां अपना पूरा हाल बताया तो थानेदार ने रिपोर्ट लिख कर वीरजी को लौकअप में डाल दिया और राधा को डाक्टरी मुआएने के लिए भेज दिया. बाद में राधा तो अपने पिता के घर पहुंच गई, परंतु वीरजी को मजिस्ट्रेट ने जेल भेज दिया. वीरजी ने अपने घर वालों को बुला कर जमानत कराई और सीधे रायबरेली पहुंच कर दिलीप के पास पहुंचा. चूंकि मुकदमा इसी जिले का था, इसलिए फर्रुखाबाद थाने ने बछरावां थाने को तफतीश के लिए कागजात भेज दिए. मुकदमा यहीं चलना था.

बछरावां के थानेदार ने बिच्छू सिंह से ले कर वीरजी तक सभी को इस मुकदमे में मुलजिम बनाया और न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी. चूंकि मुकदमा भादंवि की धारा 365, 366 के अंतर्गत था, इसलिए निचली अदालत ने इसे सेशन कोर्ट के सुपुर्द कर दिया. जब इस न्यायालय में काररवाई शुरु हुई तो सब से पहले सरकारी वकील ने अभियुक्तों को न्यायालय में हाजिर किया. उस के बाद अभियुक्तों के विरुद्ध अभियोग पढ़ा और बताया कि इसे सिद्ध करने के लिए वकील साहब क्या साक्ष्य पेश करेंगे. न्यायालय ने कागजात और अभियोग को देखते हुए दिलीप से इस पर बहस करने को कहा, पर दिलीप ने इनकार कर दिया.

इस के बाद जज ने अभियुक्तों पर धारा 365, 366, 368 का अभियोग लगाया तो अभियुक्तों ने यह आरोप मानने से इनकार करते हुए मुकदमा लड़ने की प्रार्थना की. इस पर जज साहब ने अगली तारीख पर अभियोजन पक्ष को साक्ष्य पेश करने को कहा. साथ ही उन के गवाहों को सम्मान जारी कर के बुलाया गया.

अगली तारीख पर सरकारी वकील ने 3 गवाह व अन्य सबूत न्यायालय में पेश किए, जिन से दिलीप ने एक ही प्रश्न पूछा, ‘‘क्या आप ने देखा था कि राधा अपने घर से बिच्छू सिंह के साथ जबरदस्ती ले जाई जा रही थी?’’

‘‘जी नहीं, मुझे गांव में पता चला था.’’ गवाह ने जवाब दिया.

‘‘आप राधा को पहचानते हैं?’’ दिलीप का अगला सवाल था.

‘‘जी हां, उसे गांव में देखा था.’’

‘‘बताइए, न्यायालय में हाजिर 4 महिलाओं में राधा कौन है?’’ दिलीप ने पूछा.

गवाहों ने राधा को नहीं पहचाना.

‘‘आप बिच्छू सिंह और वीरजी को इस अदालत में 10 आदमियों के बीच में पहचान सकते हैं?’’

‘‘जी हां.’’

लेकिन उन्होंने 3 गलतियां करने के बाद भी उन्हें नहीं पहचाना.

सरकारी गवाह जब पूरे उतर गए तो दिलीप ने बचाव में कोई गवाह पेश नहीं किया. इस के बाद मुकदमा बहस में पहुंच गया. बहस में सरकारी वकील ने कहा, ‘‘सर, औरत चूंकि 18 साल से अधिक उम्र की है, इसलिए यह अपहरण का मुकदमा बनता है.’’

वकील एक पल रुक कर बोला, ‘‘पहली बात तो यह कि बिच्छू सिंह ने बुरी नीयत से आसरे से राधा को जुए के दांव पर लगवाया और उसे चालाकी से जीत कर अपने खेतों वाले घर पर जबरन बुलाया. यह बात गवाही से साबित हो चुकी है. दूसरे शेष 2 अभियुक्तों, जिन में वीरजी भी शामिल हैं, ने राधा को बुरी नीयत से अपनेअपने घरों में बंद कर के रखा, जो कानूनन उतना ही बड़ा जुर्म है, जितना अपहरण. इतना ही नहीं, राधा को शादी के लिए मजबूर करना भी गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है.’’

सरकारी वकील ने आखिर में कहा कि गवाहों और राधा द्वारा यह आरोप पूरी तरह सिद्ध कर दिए गए हैं कि इन लोगों ने कानूनी अपराध तो किया ही है, एक महिला के साथ दुर्व्यवहार भी किया है, जो एक सामाजिक अपराध है. इसलिए इन्हें सख्त सजा दी जाए.’’

इस के बाद दिलीप ने अपना बचाव पक्ष रखा, ‘‘सर, मैं सच्चाई से पूरा खुलासा करना चाहता हूं ताकि न्यायालय को न्याय करने में आसानी रहे.’’

आरोपियों की ओर देख कर दिलीप ने कहना शुरू किया, ‘‘पहली बात तो यह कि अपहरण का आरोप साबित नहीं हो सका कि बिच्छू सिंह ने राधा को उस के घर से भगाया था. वह उसे बसअड्डे पर मिली थी, वहां भी उस के साथ कोई जोरजबरदस्ती नहीं की गई. वीरजी राधा को उस के पिता के घर ले जा रहा था. वह पुलिस को देख कर डर कर भागा, जो अपराध नहीं है.

‘‘वीरजी के मन की बात सरकारी वकील नहीं साबित कर सके. लिहाजा वही माना जाए, जो उस ने राधा से चलते समय कहा. दूसरे न तो गवाहों ने यह नहीं कहा और न ही राधा ने दुर्व्यवहार की शिकायत की. यह सरकारी वकील का अनुमान ही हो सकता है. तीसरे आसरे को धोखा दे कर जुआ खिलाया गया और शराब पिला कर राधा को दांव पर लगवाया गया. अत: उस की भी गलती सिद्ध नहीं हुई.’’

अंत में दिलीप ने कहा, ‘‘सर, निवेदन है कि अभियुक्तों को बेगुनाह मानते हुए इज्जत के साथ दोषमुक्त कर दिया जाए.’’

अगली तारीख पर जज साहब ने सभी अभियुक्तों को मुक्त कर दिया, पर बिच्छू सिंह को धोखाधड़ी के इलजाम में 6 महीने की सजा बामशक्कत सुनाई गई. Social Story

लेखक – हसन अस्करी एडवोकेट       

Hindi Crime Story: प्रेम में डूबी जब प्रेमलता

Hindi Crime Story: प्रेमलता की अच्छीभली गृहस्थी थी, सरकारी नौकरी वाला पति था. लेकिन बबलू के प्यार और महत्त्वाकांक्षा में वह कुछ इस तरह उलझी कि अपने ही हाथों सुहाग उजाड़ कर गृहस्थी बरबाद कर दी.

अभी सुबह का उजाला भी ठीक से फैला नहीं था कि मैनपुरी कोतवाली के गेट से एक महिला अंदर घुसी. वह काफी अस्तव्यस्त और घबराई हुई लग रही थी,

इसलिए ड्यूटी पर तैनात संतरी ने आगे बढ़ कर पूछा, ‘‘कहो, कैसे आई?’’

‘‘साहब से मिलना है.’’

‘‘क्यों, क्या परेशानी है?’’ संतरी ने पूछा.

संतरी का इतना कहना था कि महिला रोने लगी. संतरी ने उसे चुप कराते हुए कहा, ‘‘साहब तो अभी आए नहीं हैं. तुम अपनी परेशानी बताओ. अगर कोई ज्यादा परेशानी वाली बात होगी तो मैं साहब से जा कर बता दूंगा.’’

‘‘मेरे पति ने रात में आत्महत्या कर ली है. उन की लाश घर में पड़ी है.’’ महिला ने सिसकते हुए कहा.

इस के बाद संतरी महिला को ड्यूटी पर तैनात मुंशी के पास ले गया और उसे पूरी बात बताई. मामला गंभीर था, इसलिए मुंशी ने संतरी से कोतवाली प्रभारी को सूचना देने के लिए कहा.

सूचना पा कर कुछ ही देर में कोतवाली प्रभारी मनोहर सिंह यादव आ गए. उन्होंने महिला को अपने कक्ष में बुला कर पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘जी प्रेमलता, घर में सब पिंकी कहते हैं.’’

‘‘कहां से आई हो?’’

‘‘नगला कीरत से. वहीं अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी.’’

‘‘पति का क्या नाम था?’’

‘‘गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू.’’

‘‘बच्चे कितने हैं?’’

‘‘2, बेटा 8 साल का और बेटी 5 साल की है.’’

प्रेमलता जिस तरह टकरटकर मनोहर सिंह के सवालों का जवाब दे रही थी, उस से उन्हें उस पर संदेह हुआ. जिस औरत का पति मरा हो, वह इस तरह कतई बातें नहीं कर सकती. उन्होंने पूछा, ‘‘यह सब हुआ कैसे?’’

‘‘साहब, हम क्या बताएं. रात को हम सब खाना खा कर सोए और सवेरे उठे तो उन की लाश मिली. आप चलिए और लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम करा दीजिए. हम उन का जल्दी से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं.’’

आगे कुछ पूछने के बजाय कोतवाली प्रभारी कुछ सिपाहियों और प्रेमलता को साथ ले कर कीरतपुर नगला जा पहुंचे. प्रेमलता के घर के सामने भीड़ लगी थी. भीड़ को हटा कर मनोहर सिंह अंदर पहुंचे तो कमरे में पड़ी चारपाई अस्तव्यस्त हालत में पड़ी थी.

मनोहर सिंह ने लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर चोट का कहीं कोई निशान नहीं था. गले पर जरूर कुछ इस तरह का निशान था, जो गला दबाने पर पड़ जाते हैं. उन्हें जो आशंका थी, लाश देख कर वह सच नजर आ रही थी. घर में एक ही दरवाजा था, उसी से अंदर आया या बाहर जाया जा सकता था. प्रेमलता का कहना था कि रात में उस ने खुद कुंडी लगाई थी.

मनोहर सिंह ने औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उन्होंने एक बार फिर प्रेमलता से पूछताछ की. उस का कहना था कि वह रहते भले तनाव में थे, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़े. शाम को सब ठीकठाक था. बात भी अच्छी तरह कर रहे थे. कहीं से नहीं लगता था कि वह रात में आत्महत्या कर लेंगे.

पूछताछ में पता चला कि मृतक गवेंद्र सिंह की सरकारी नौकरी थी. वह सरकारी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. वह बहुत खुशदिल था. हर किसी से हमेशा हंस कर मिलता था. मनोहर सिंह को गवेंद्र सिंह की आत्महत्या का यह मामला पूरी तरह से संदिग्ध लग रहा था, लेकिन जब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आ जाती, वह कुछ नहीं कर सकते थे.

प्रेमलता ने 6 बजे ही अपने ससुर रामसेवक को फोन कर के गवेंद्र की मौत की सूचना दे दी थी. उसी सूचना पर रामसेवक 9 बजे घर वालों के साथ नगला कीरतपुर पहुंचे तो पुलिस वहां मौजूद थी. बेटे की लाश देख कर रामसेवक ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरे बेटे ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई है. आखिर वह आत्महत्या क्यों करेगा, उसे किसी चीज की कमी थोड़े ही थी.’’

‘‘कोई बात नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सब पता चल जाएगा. उस के पहले हम कुछ नहीं कह सकते.’’ मनोहर सिंह ने उसे आश्वासन दिया.

मनोहर सिंह ने मृतक के पिता रामसेवक की ओर से अपराध संख्या 1341/2015 पर अज्ञात लोगों के खिलाफ गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया था. मनोहर सिंह ने मुखबिरों से प्रेमलता के बारे में पता लगाने को कहा, क्योंकि उन्हें उस का चरित्र संदिग्ध लग रहा था. आखिर जब उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो सारा मामला साफ हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक की मौत दम घुटने से हुई थी. उस की गला दबा कर हत्या की गई थी. ऐसे में संदेह प्रेमलता पर ही था, क्योंकि घर में मृतक के साथ वही थी और थाने आ कर उस ने झूठ भी बोला था.

मनोहर सिंह ने पूरे परिवार को इकट्ठा किया तो उन की नजरें मृतक के बच्चों पर जम गईं. हत्या वाली रात वे भी साथ थे. बच्चे डरे हुए लग रहे थे. बेटी तो छोटी थी, लेकिन बेटा उमंग 8 साल का था. वह कुछ बता सकता है, यह सोच कर उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से पुचकार कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मम्मी ने बबलू अंकल और 2 लोगों के साथ मिल कर पापा को मारा है.’’

अब क्या था, पुलिस ने तुरंत प्रेमलता उर्फ पिंकी को हिरासत में ले लिया. लेकिन जब उस से हत्या में शामिल बबलू तथा 2 अन्य लोगों के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि न वह बबलू को जानती है और न 2 अन्य लोगों को. उमंग ने बबलू का नाम तो बता दिया था, लेकिन वह कौन था, कहां का रहने वाला था, यह सब वह नहीं बता सका था.

पुलिस बबलू के बारे में पता करने लगी. उसी बीच उसे पता चला कि प्रेमलता इन दिनों आगरा की लायर्स कालोनी स्थित आईआईएमटी से नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी और वहीं कमरा ले कर रहती थी. इस से पुलिस को लगा कि कहीं बबलू आगरा का ही रहने वाला तो नहीं है. पुलिस वहां जा कर बबलू के बारे में पता लगाने की सोच ही रही थी कि प्रेमलता से मिलने एक लड़का आया. उस ने थानाप्रभारी से प्रेमलता को अपनी बहन बता कर मिलने की गुजारिश की तो मनोहर सिंह ने उसे प्रेमलता से मिलने की इजाजत दे दी.

उन्होंने उस लड़के को प्रेमलता से मिलने की इजाजत तो दे दी, लेकिन महिला सिपाही रेनू सारस्वत को उस के पीछे लगा दिया कि वह किसी भी तरह उन की बातें सुनने की कोशिश करे. रेनू उधर से गुजरी तो लड़का कह रहा था, ‘‘तुम ने ताजमहल वाले फोटो जला दिए हैं न?’’

‘‘हां, जला दिए हैं. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है?’’

यह सुन कर रेनू चौंकी. वह तुरंत मुंशी मंसूर अहमद के पास पहुंची और उन से बता दिया कि प्रेमलता से जो लड़का मिलने आया है, वही बबलू है.

मंसूर अहमद तेजी से बाहर आए. बबलू को शायद शक हो गया था, इसलिए वह तेजी से बाहर की ओर चला जा रहा था. मंसूर अहमद ने संतरी को आवाज देते हुए तेजी से उस की ओर दौड़े. आखिर उन्होंने उसे दबोच ही लिया.

इस के बाद उसे अंदर ला कर पूछताछ की गई तो एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस में प्रेम की राह में रोड़ा बनने वाले गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या कर दी गई थी. यह पूरी कहानी इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी का एक गांव है भरथरा, जहां महेशचंद फौजी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 4 बेटियां थीं. प्रेमलता उन में सब से बड़ी थी. उस ने बीए करने के बाद बीएड किया और नौकरी की तलाश में लग गई. इसी के साथ महेशचंद उस की शादी के लिए लड़का ढूंढ़ने लगे.

महेशचंद की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी, बेटी भी पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह उस के लिए खातेपीते परिवार का पढ़ालिखा लड़का तलाश रहे थे. इसी तलाश में उन्हें किसी से जिला एटा के थाना बागवाला के गांव लोहाखार के रहने वाले रामसेवक के बेटे गवेंद्र के बारे में पता चला तो वह उस के घर जा पहुंचे. रामसेवक का खातापीता परिवार था. उस के पास ठीकठाक जमीन थी. गांव में पक्का मकान था, एक मकान मैनपुरी के नगला कीरतपुर में भी था. गवेंद्र ने पौलिटैक्निक करने के साथ बीए भी कर रखा था. वह नौकरी की तलाश में था.

महेशचंद को गवेंद्र प्रेमलता के लिए पसंद आ गया. उसे लगा कि गवेंद्र को जल्दी ही कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. उस के बाद उन की बेटी की जिंदगी संवर जाएगी. उस ने गवेंद्र को प्रेमलता के लिए पसंद कर लिया और उस के साथ प्रेमलता की शादी कर दी. प्रेमलता ससुराल आ गई. रामसेवक का छोटा सा परिवार था. पतिपत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी नीरज थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. इसलिए घर में सिर्फ 4 ही लोग बचे थे. प्रेमलता को पूरा विश्वास था कि उस के पति को जल्दी ही कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल जाएगी. वैसे घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पति की कमाई की बात अलग ही होती है.

गवेंद्र नौकरी की कोशिश में लगा था, लेकिन नौकरी मिल नहीं रही थी. इस बीच वह 2 बच्चों उमंग और तमन्ना का पिता बन गया. प्रेमलता खुद भी बीए, बीएड थी. लेकिन बच्चे छोटे थे, दूसरे गवेंद्र नहीं चाहता था कि वह नौकरी करे, इसलिए प्रेमलता ने अपने लिए कोशिश नहीं की. सन 2012 में गवेंद्र को मैनपुरी के कीरतपुर स्थित सेवाराम जूनियर हाईस्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिल गई. नौकरी भले ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की थी, लेकिन सरकारी थी, इसलिए उस ने इसे जौइन कर लिया.

लेकिन प्रेमलता को यह नौकरी पसंद नहीं थी, वह शायद किसी अधिकारी की बीवी बनना चाहती थी. चपरासी की बीवी कहलवाना उसे बिलकुल भी पसंद नहीं था. इसलिए उस ने सोचा कि अब उसे ही कुछ करना होगा. वह अपने कैरियर के बारे में सोचने लगी. उस के बच्चे भी बड़े हो गए थे, इसलिए वह खुद कुछ कर के समाज में नाम और पैसा कमाना चाहती थी.

उसी बीच ससुराल जाते समय बस में उस की मुलाकात बबलू से हुई. बबलू भी उसी सीट पर बैठा था. रास्ते में बबलू उस के बच्चों से बातें करतेकरते उस से भी बातें करने लगा. उस ने बताया कि वह आगरा के आईआईएमटी कालेज से जीएनएम (जनरल नर्सिंग मिडवाइफरी) का कोर्स कर के आगरा के पुष्पांजलि अस्पताल में नौकरी करता है.

जब प्रेमलता ने कहा कि उस ने भी बीए, बीएड किया है, लेकिन लगता नहीं कि उसे नौकरी मिलेगी तो उस ने कहा, ‘‘अगर तुम जीएनएम का कोर्स कर लो तो जल्दी ही तुम्हें कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी. रही बात दाखिले की तो वह तुम मुझ पर छोड़ दो.’’

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. 2-4 दिन ससुराल में रह कर प्रेमलता पति के पास आई तो उस ने गवेंद्र से कहा, ‘‘भई अब इस तरह काम नहीं चलेगा. बच्चों के भविष्य के लिए मुझे भी कुछ करना होगा. बीए, बीएड से तो नौकरी मिल नहीं सकती, इसलिए मैं जीएनएम का कोर्स करना चाहती हूं. इस से किसी न किसी अस्पताल में नौकरी मिल जाएगी.’’

गवेंद्र को लगा कि अब बच्चे समझदार हो गए हैं. ऐसे में प्रेमलता कुछ करना चाहती है तो इस में बुराई क्या है. वह प्रेमलता को जीएनएम का कोर्स कराने के लिए राजी हो गया. गवेंद्र के पिता रामसेवक रिटायर हो चुके थे. इसलिए अब वह भी उसी के साथ रहने लगे थे.

प्रेमलता ने बबलू की मदद से आईआईएमटी में अपना दाखिला करा लिया.  बबलू उसे सुनहरे भविष्य का सपना दिखाने लगा. प्रेमलता की पढ़ाई शुरू हो गई. बबलू लायर्स कालोनी में कमरा किराए पर ले कर रहता था. प्रेमलता को भी उस ने उसी कालोनी में कमरा दिला दिया. अब दोनों की रोज मुलाकात होने लगी. बबलू प्रेमलता के कमरे पर भी आनेजाने लगा.

लगातार मिलने और कमरे पर आनेजाने से प्रेमलता और बबलू में प्यार ही नहीं हो गया, प्रेमलता ने उस से शारीरिक संबंध बना कर उस ने रिश्तों की मर्यादा भंग कर दी. सपनों को ख्वाहिश बनाया तो तन और मन से पति से ही नहीं, बच्चों से भी दूर हो गई.

बबलू को जब लगा कि प्रेमलता पूरी तरह से उस की हो गई है तो उस ने उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. तब प्रेमलता ने कहा, ‘‘बबलू यह सब इतना आसान नहीं है. क्योंकि गवेंद्र मुझे आसानी से छोड़ने वाला नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, मैं उसे रास्ते से हटाए देता हूं.’’ बबलू ने कहा तो प्रेमलता गंभीर हो कर बोली, ‘‘यह तो और भी आसान नहीं है.’’

प्रेमलता भी अब गवेंद्र से छुटकारा पा कर बाकी की जिंदगी बबलू के साथ बिताना चाहती थी, लेकिन वह उसे छोड़ कर बबलू से शादी नहीं कर सकती थी. क्योंकि ऐसा करने पर मायके वाले उस का साथ न देते. इसलिए वह बड़ी उलझन में फंसी थी. वह इस बारे में कुछ करती, उस के पहले ही उस की पोल खुल गई. स्कूल में छुट्टी होने की वजह से गवेंद्र पत्नी से मिलने आगरा पहुंच गया. उस का वहां आना प्रेमलता को अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन वह उसे भगा भी नहीं सकती थी. रात का खाना खा कर वह सो गया.

अचानक उस की आंख खुली तो उस ने प्रेमलता को मोबाइल पर किसी से हंसहंस कर बात करते पाया. उस की बातचीत सुन कर पता चला कि वह किसी बबलू से बातें कर रही थी. उस ने फोन काटा तो गवेंद्र ने पूछा, ‘‘यह बबलू कौन है, जिस से तुम इतनी रात को बातें कर रही थी?’’

‘‘यहीं पड़ोस में रहता है. उस से किसी काम के लिए कहा था, उसी के बारे में बात कर रही थी.’’

‘‘उस के बारे में तुम सुबह भी तो पूछ सकती थी.’’

‘‘अभी पूछ लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा.’’ प्रेमलता ने तमक कर कहा.

इस के बाद गवेंद्र को नींद नहीं आई. सुबह दोनों में बबलू को ले कर खूब झगड़ा हुआ. बबलू को पता नहीं था कि गवेंद्र अभी गया नहीं है, इसलिए जब दोनों में झगड़ा हो रहा था तो वह प्रेमलता के कमरे पर आ पहुंचा. उसे देख कर गवेंद्र ने पूछा, ‘‘तो तुम्हीं बबलू हो?’’

गवेंद्र के इस सवाल पर बबलू सिटपिटा गया. घबराहट में बोला, ‘‘जी, हम ही बबलू हैं. पिंकी दीदी से कुछ काम था, इसलिए आ गया. जरूरत पड़ने पर कुछ मदद कर देता हूं.’’

‘‘कोई अपनी दीदी से देर रात को बातें नहीं करता. बबलू यह सब ठीक नहीं है. मेरे खयाल से तुम्हारा यहां आनाजाना ठीक नहीं है. इन की मदद के लिए मैं हूं न.’’

गवेंद्र ने बबलू को दरवाजे से वापस कर दिया. प्रेमलता को यह बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. इसलिए उस ने तय कर लिया कि अब उसे किसी भी तरह गवेंद्र से छुटकारा पाना है.

दूसरी ओर गवेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि वह प्रेमलता के बारे में पिता को बताए या न बताए. उसे लगा कि यह पतिपत्नी के बीच मामला है, इस में पिता को बता कर परेशान करना ठीक नहीं है. इस तरह रामसेवक को कुछ पता नहीं चला. बच्चों की छुट्टियां पड़ गईं तो गवेंद्र ने बच्चों को आगरा पहुंचा दिया. इस बीच बबलू के साथसाथ उस के दोस्तों विनयकांत और सर्वेंद्र का भी प्रेमलता के यहां आनाजाना हो गया. सर्वेंद्र और विनयकांत भी उसी कालेज से बीएमएस कर रहे थे. वहां रहते हुए उमंग और तमन्ना भी बबलू से हिलमिल गए थे.

एक दिन सभी ताजमहल देखने गए, जहां बबलू ने प्रेमलता के साथ फोटो खिंचवाए. इस तरह उन के प्यार का एक प्रमाण भी हो गया. इस के बाद तय हुआ कि गवेंद्र को रास्ते से हटा कर दोनों शादी कर लेंगे. यही नहीं, उस ने पूरी तैयारी भी कर ली. अब उसे मौके की तलाश थी. 30 नवंबर को प्रेमलता ने गवेंद्र को फोन किया तो पता चला कि रामसेवक वोट डालने गांव गए हैं. खेतों की बुवाई भी करानी है, इसलिए वह खेतों की बुवाई कराने तक गांव में ही रहेंगे. प्रेमलता ने बबलू से कहा कि गवेंद्र को निबटाने का यह अच्छा मौका है. बबलू ने अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत को दोस्ती के नाम पर साथ देने के लिए राजी कर लिया. इस तरह गवेंद्र की हत्या की पूरी तैयारी हो गई.

31 दिसंबर, 2015 को प्रेमलता बच्चों के साथ कीरतपुर आ गई. उसे देख कर गवेंद्र ने कहा, ‘‘फोन कर देती तो मैं बच्चों को लेने आ जाता.’’

‘‘मैं ने फोन इसलिए नहीं किया कि यहां आ कर घर भी देख लूंगी और तुम से भी मिल लूंगी.’’ प्रेमलता ने कहा.

योजना के अनुसार, 4 दिसंबर, 2015 को बबलू अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ मैनपुरी आ गया. कीरतपुर में ही उस का एक दोस्त रहता था, वे उसी के घर ठहर गए. उन का खाना प्रेमलता ने ही उमंग के हाथों भिजवाया था. 5 दिसंबर को गवेंद्र अपनी स्कूल की ड्यूटी कर के घर आया तो प्रेमलता उसे काफी बेचैन लगी. गवेंद्र ने पूछा तो प्रेमलता ने कहा, ‘‘मैं आगरा में रहती हूं तो तुम्हारी और बच्चों की चिंता लगी रहती है.’’

गवेंद्र ने कहा, ‘‘कुछ दिनों की ही तो बात है. पढ़ाई पूरी होने पर मैनपुरी के आसपास नौकरी की कोशिश की जाएगी.’’

प्रेमलता की इन बातों से गवेंद्र का मन साफ हो गया. उसे क्या पता था कि अब उस की जिंदगी कुछ ही घंटों की बची है. रात का खाना बना कर प्रेमलता ने सब को खिलाया. गवेंद्र को खाना खातेखाते ही नींद आने लगी. वह बिस्तर पर जा कर सो गया. प्रेमलता ने बच्चों को भी सुला दिया. जब मोहल्ले में सन्नाटा पसर गया तो उस ने बबलू को फोन कर के आने को कहा. बबलू तो तैयार ही बैठा था. वह अपने दोनों साथियों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ आ पहुंचा. प्रेमलता उन्हें उस कमरे में ले गई, जहां गवेंद्र सो रहा था. प्रेमलता ने गवेंद्र को खाने में नींद की गोलियां दे कर सुला दिया था, इसलिए सभी उस की ओर से निश्चिंत थे.

बबलू गवेंद्र का गला दबाने लगा तो वह जाग गया. उस के विरोध में हुए शोर से दूसरे कमरे में सो रहे उमंग की नींद टूट गई. शोर क्यों हो रहा है, यह जानने के लिए वह उस कमरे में आया तो देखा 4 लोग उस के पापा को दबोचे हुए थे. लेकिन तब तक गवेंद्र मर चुका था. उमंग को देख कर सभी के होश उड़ गए. जो जहां था, वहीं खड़ा रह गया. अब सब की नजरें उमंग पर टिकी थीं. बबलू एकदम से बोला, ‘‘यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई, इस ने जो देखा है, किसी से भी बता सकता है. अब इसे भी खत्म करना होगा.’’

‘‘नहीं, इसे कोई हाथ नहीं लगा सकता. तुम लोग लाश को इसी तरह पड़ी रहने दो. मैं इसे भी संभाल लूंगी और लाश को भी संभाल लूंगी. आगे क्या करना है, यह तुम मुझ पर छोड़ दो.’’ प्रेमलता ने कहा.

इस के बाद बबलू, सर्वेंद्र और विनयकांत चले गए. उन के जाने के बाद प्रेमलता बेटे को डराती रही कि वह किसी से कुछ नहीं बताएगा. अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो वह उसे भी मार देगी. सवेरा होने पर प्रेमलता ने रोरो कर मोहल्ले वालों को इकट्ठा कर के बताया कि गवेंद्र ने आत्महत्या कर ली है. इस के बाद खुद ही थाने जा कर पति की आत्महत्या की सूचना दे दी. बबलू को उमंग से तो खतरा था ही, ताजमहल में उस ने प्रेमलता के साथ जो फोटो खिंचवाए थे, उन से भी वह पकड़ा जा सकता था. इसीलिए वह उन के बारे में पता करने थाने आ गया और पकड़ा गया.

सर्वेंद्र और विनयकांत भी उमंग से डर रहे थे, इसलिए उन्होंने उस का अपहरण करना चाहा, लेकिन रामसेवक को इस की भनक लग गई तो उन्होंने इस बात की जानकारी थाना विछवां के थानाप्रभारी जी.पी. गौतम को दे दी. जी.पी. गौतम ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करा दी. पूछताछ के बाद बबलू और प्रेमलता को जेल भेज दिया गया है. फरार सर्वेंद्र और विनयकांत की पुलिस तलाश कर रही है.

मनोहर सिंह यादव ने इस मामले का खुलासा मात्र 9 दिनों में कर दिया. इस से खुश हो कर एसएसपी ने उन्हें 5 हजार रुपए ईनाम दिया है. रेनू और मंसूर अहमद ने जिस तरह सूझबूझ से पकड़वाया, इस के लिए उन्हें भी ढाईढाई हजार रुपए ईनाम दिया गया है. Hindi Crime Story

 

Meerut Crime: अपराध का सौफ्टवेयर

Meerut Crime: महत्त्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं है. बुराई तब आती है जब महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति मेहनत और लगन के बजाय अपराध की डगर पर उतर जाता है. उस स्थिति में इंसान के लिए नातेरिश्ते भी कोई मायने नहीं रखते. प्रतीक और तुषार के साथ भी यही हुआ, जिन्होंने इंजीनियर होने के बावजूद अपना भविष्य अपराध की दलदल में ढूंढने की कोशिश की.

उत्तर प्रदेश, मेरठ शहर के टीपी नगर थानांतर्गत पौश कालोनी पंजाबीपुरा स्थित मयंक जैन की कोठी में 19 फरवरी, 2016 की शाम को अजीब सी हलचल थी. ऐसी हलचल वहां पहले कभी नहीं देखी गई थी. दरअसल इस परिवार का बेटा अतिशय जैन सुबह घर से स्कूल जाने के लिए निकला था. लेकिन शाम तक भी वापस नहीं लौटा था. जैन दंपत्ति के कई नातेरिश्तेदार भी कोठी में मौजूद थे. हर किसी के चेहरे पर चिंता की लकीरें झलक रही थीं. गुरजते वक्त के साथ बीचबीच में सभी की निगाहें दरवाजे की तरफ उठ जाती थीं.

दरअसल, मयंक जैन युवा कारोबारी थे. शहर में ही उन का विवाह मंडप था. उन के परिवार में पत्नी शिखा जैन के अलावा 2 बेटे थे. 13 वर्षीय अतिशय उन का छोटा बेटा था. वह शहर के ही एक स्कूल में कक्षा 6 का छात्र था. वह सुबह को घर से निकल कर करीब 100 मीटर दूर बसस्टाप पर जाता था और वहां से स्कूल बस में बैठ कर स्कूल चला जाता था. उस दिन जब दोपहर में वह वापस नहीं लौटा तो शिखा ने मयंक को फोन कर के बताया. वह तुरंत घर आ गए. पहले उन्होंने सोचा कि अतिशय कहीं किसी दोस्त के पास न चला गया हो. जब घंटों बाद भी वह नहीं आया तो मयंक स्कूल पहुंचे.

स्कूल से पता चला कि वह तो उस दिन स्कूल पहुंचा ही नहीं था. यह सुन कर उन की चिंता बढ़ गई. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से वह काफी खोजबीन कर चुके थे. शाम तक कई रिश्तेदार उन के घर पर एकत्र हो गए थे. सभी अतिशय को ले कर फिक्रमंद थे. बेटे के गायब होने से शिखा का रोरो कर बुरा हाल था. अतिशय के इस तरह लापता होने से किसी अनहोनी की आशंकाएं जन्म ले रही थीं. लोगों से विचारविमर्श के बाद मयंक ने थाने में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी. आशंका अपहरण की थी, सो पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी प्रशांत कपिल ने अतिशय के स्कूल जा कर पूछताछ की. स्कूल बस के चालक परिचालक से भी पूछताछ की. पता चला कि उस दिन बसस्टाप पर उन्होंने अतिशय को नहीं देखा था. जो अन्य छात्र बसस्टाप से बस में बैठते थे, उन्होंने भी अतिशय को नहीं देखा था. अतिशय खुद ही नाराज हो कर कहीं न चला गया हो, इस बिंदु पर भी पुलिस ने जांच की. लेकिन इस बात से घर वालों ने साफ इनकार कर दिया. पुलिस ने शहर के बसअड्डों, सिनेमाघरों व शौपिंग सैंटरों के सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग की भी जांच की. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली.

अगर अतिशय का अपहरण हुआ था तो हैरानी की बात यह थी कि अपहर्त्ताओं ने उस के घर वालों से कोई संपर्क क्यों नहीं किया था? सीओ रफीक अहमद भी जांच में लग गए थे. एसएसपी डी.सी. दुबे के निर्देश पर कई स्थानों पर अतिशय की गुमशुदगी से संबंधित पोस्टर चस्पा कर दिए गए. आसपास के जिलों में भी इस की सूचना भेज दी गई. 3 दिन होने को आए थे, लेकिन अतिशय का पता नहीं चल सका था. इस बीच मामला तूल पकड़ने लगा था. 22 फरवरी की रात एक अंजान नंबर से मयंक के मोबाइल पर फोन आया तो उन्होंने काल रिसीव की. दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘बेटे को ले कर परेशान हो न?’’

‘‘आप कौन?’’

‘‘आप का बेटा हमारे कब्जे में है.’’

‘‘कैसा है मेरा बेटा, क्या हुआ उस को?’’ उन्होंने उत्सुकता से पूछा. लेकिन अगले ही पल उन्हें झटका लगा.

‘‘वह बिलकुल ठीक है. हम ने उस का अपहरण कर लिया है.’’ दूसरी ओर से यह कहा गया तो मयंक के पैरों तले से जमीन खिसक गई, चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि अतिशय का इस तरह अपहरण हो जाएगा.

‘‘कौन बोल रहे हैं आप?’’ मयंक ने सहमते पूछा.

‘‘बता देंगे, इतनी भी क्या जल्दी है. हम ने अपहरण उस की रखवाली करने के लिए नहीं, बल्कि फिरौती के लिए किया है. हमें 2 करोड़ रुपए चाहिए, पूरे 2 करोड़. एक बात और बता दूं आप को, हम अच्छे लोग नहीं हैं. पलक झपकते ही जान भी ले सकते हैं. पुलिस को बीच में ला कर बेटे की जान जोखिम में मत डालना, वरना इस गलती की सजा भुगतनी पड़ेगी. इसे मार कर कहीं भी फेंक देंगे, फिर पुलिस से ही जिंदा करा लेना.’’

‘‘प्लीज तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे.’’ मयंक फोन पर गिड़गिड़ाए.

‘‘बताया न, हम कुछ भी कर सकते हैं. हां, अगर तुम चाहोगे तो उसे कुछ नहीं होगा. फिरौती की मांग पूरी होते ही हम उसे छोड़ देंगे. तुम रुपयों का इंतजाम करो. हम तुम्हें बाद में फोन करेंगे.’’ कहने के साथ ही उस ने फोन काट दिया. फिरौती के लिए फोन आने से जैन परिवार में कोहराम मच गया. उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दे दी. बच्चे के अपहरण की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग में भागदौड़ शुरू हो गई.

एसएसपी डी.सी. दुबे ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह के निर्देशन में पुलिस की 5 टीमें गठित कर के उन्हें तुरंत काम पर लगा दिया. आला अधिकारियों तक मामला पहुंचा तो आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह भी अतिशय जैन की अविलंब बरामदगी के लिए सक्रिय हो गए. अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया तो मयंक ने मजबूरी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अपना सब कुछ बेच कर भी हम इतनी रकम का इंतजाम नहीं कर सकते.’’ इस पर अपहर्त्ता सौदेबाजी पर उतर आए. मयंक गिड़गिड़ाए, ‘‘मैं जितना भी इंतजाम कर सकता हूं, करूंगा. लेकिन अतिशय को कुछ नहीं होना चहिए’’

‘‘जैन साहब, आप चाहेंगे तो आप के बेटे को कुछ नहीं होगा. लेकिन अपना उसूल है, इस हाथ दो, उस हाथ लो.’’ इतना कह कर अपहर्त्ता ने फोन काट दिया. इस के बाद अपहर्त्ता लगातार मयंक के संपर्क में बने रहे. इस बीच पुलिस ने अपहर्त्ताओं के मोबाइल नंबर की जांच कराई तो वह बदायूं जनपद के एक गलत पते का निकला. फलस्वरूप पुलिस के लिए अपहर्त्ताओं तक पहुंचने का यह माध्यम भी बंद हो गया.

दूसरी तरफ मयंक जैन ने जैसेतैसे 23 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया. उन्होंने अपहर्त्ताओं से साफ कह दिया कि वह इस से ज्यादा रकम नहीं दे पाएंगे. अपहर्त्ता इतनी ही रकम ले कर अतिशय को लौटाने को तैयार हो गए. अलबत्ता उन्होंने मयंक को एक बार फिर धमकाया, ‘‘अगर तुम ने पुलिस को हमारे पीछे लगाया या चालाकी दिखाई तो बेटे की लाश भी सहीसलामत देखने को नहीं मिलेगी. यह तुम्हें तय करना है कि बेटा जिंदा चाहिए या नहीं?’’ अतिशय उन के कब्जे में है, यह बात साबित करने के लिए अपहर्त्ताओं ने मयंक से उस की बात भी कराई.

‘‘मेरी तरफ से ऐसा नहीं होगा.’’ मयंक ने उन्हें आश्वस्त कर दिया. मयंक जैन को बेटे की चिंता थी, इसलिए उन्होंने अपहर्त्ताओं की बात मान कर पुलिस से दूरी बना ली. उन्होंने पैसा दे कर बेटे को छुड़ाने का फैसला कर लिया. दूसरी ओर पुलिस अपनी जांच में लगी रही. अपहर्त्ताओं ने मयंक जैन से 24 फरवरी की रात गाजियाबाद के वैशाली मैट्रो स्टेशन के बाहर रुपए ले कर पहुंचने को कहा. मयंक वहां पहुंचे भी, लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी कोई रुपए लेने नहीं आया.

अपहर्त्ता अपनी बात कहने के बाद मोबाइल फोन बंद कर देते थे. अगले दिन उन्होंने मयंक को रुपए ले कर दिल्ली के कनाट प्लेस बुलाया. पर वहां भी कोई रुपए लेने नहीं आया. मयंक परेशान थे. अगले दिन अपहर्त्ताओं ने कहा कि पैसा ले कर वह गुड़गांव आएं. मयंक वहां भी पहुंचे, लेकिन अपहर्त्ता पैसा लेने नहीं आए. पुलिस ने सर्विलांस का सहारा भी लिया, लेकिन गच्चा खा गई. क्योंकि अपहर्त्ताओं के मोबाइल की लोकेशन उत्तर प्रदेश के अलावा कभी दिल्ली तो कभी हरियाणा तो कभी बिहार आती थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि अपहर्त्ता आखिर इतने प्रोफेशनल कैसे हो सकते हैं.

इस बीच पुलिस की समझ में यह बात आ गई कि मयंक जानबूझ कर पुलिस से दूरी बनाए हुए हैं और अपहर्त्ताओं से फिरौती का लेनदेन तय हो गया है. पुलिस अधिकारियों ने जैसेतैसे मयंक जैन को इस वादे के साथ विश्वास में लिया कि वह उन के बेटे को कुछ नहीं होने देंगे. इस से पुलिस को पता चला कि 27-28 फरवरी की मध्यरात्रि में अपहर्त्ता फिरौती की रकम लेने के लिए दिल्लीजयपुर हाईवे पर आएंगे.

यह पता चलते ही केस की मौनीटरिंग कर रहे आईजी सुजीत पांडेय और डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने आननफानन में एसपी सिटी ओ.पी. सिंह व एसपी (क्राइम) अजय सहदेव के नेतृत्व में पुलिस की 5 टीमों का गठन कर के उन्हें निगरानी पर लगा दिया. इस के साथ ही 2 दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में भी लगाए गए. पुलिस किसी भी स्थिति में अपहर्त्ताओं को पकड़ कर अतिशय को सकुशल बरामद करना चाहती थी.

पुलिस की टीमें संभावित ठिकानों पर लग गईं. रात करीब 1 बजे अपहर्त्ताओं ने मयंक को एक स्थान पर सड़क किनारे बैग छोड़ कर चले जाने को कहा. उन्होंने ऐसा ही किया. लेकिन पुलिस के वहां पहुंचने से पहले ही एक आईटैन कार में सवार अपहर्त्ता बैग उठा कर चले गए. यह सब इतनी तेजी से हुआ कि पुलिस देखती ही रह गई. लेकिन पुलिस इस मामले में बेफिक्र थी, क्योंकि उस ने मयंक जैन की सहमति से अपहर्त्ताओं तक पहुंचने के लिए रुपयों वाले बैग में जीपीएस टै्रकिंग सिस्टम लगा दिया था. भागते वक्त अपहर्त्ताओं की कार का रुख दिल्ली की तरफ था. जीपीएस से लोकेट हुआ कि अपहर्त्ता एक स्थान पर ठहर गए हैं. पुलिस पीछा करते हुए वहां पहुंच भी गई, लेकिन पुलिस को तब झटका लगा, जब सड़क किनारे सिर्फ खाली बैग पड़ा मिला.

पुलिस समझ गई कि अपहर्त्ता बेहद शातिर हैं और पुलिस की सर्विलांस की काररवाई के अच्छे जानकार भी. यही वजह थी कि उन्होंने फिरौती की रकम वाले बैग को रास्ते में ही फेंक दिया था. पुलिस ने अपहर्त्ता के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया हुआ था. सर्विलांस के हिसाब से अब तक कार का रुख दिल्ली से निकल कर देहरादून हाईवे की तरफ हो गया था. मुखबिरों के जरिए चूंकि आईटैन कार चिह्नित हो चुकी थी, इसलिए मेरठ में भी पुलिस टीम को अलर्ट कर दिया गया. मेरठ में वेदव्यासपुरी के पास पुलिस ने घेराबंदी कर के संदिग्ध कार की तलाशी ली तो उस में न केवल अतिशय सकुशल मिल गया, बल्कि उस में सवार 2 युवक व एक युवती भी कब्जे में आ गए. अतिशय बेहद डरासहमा था.

पुलिस सब को थाने ले आई और आला अधिकारियों को खबर कर दी. पुलिस ने उन से पूछताछ की. गिरफ्तार किए गए अपहर्त्ताओं में प्रतीक जैन उर्फ मोनू, तुषार जैन उर्फ नीशू और आस्था विश्वास शामिल थे. पुलिस के लिए नि:संदेह यह बड़ी सफलता थी. उस दिन यानी 28 फरवरी को प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद को नोएडा आना था. तय हुआ कि अपहरण का खुलासा उन्हीं के द्वारा हो. डीआईजी लक्ष्मी सिंह, एसएसपी डी.सी. दुबे व एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह नोएडा पहुंच गए. जावीद अहमद ने प्रैसवार्ता में पूरे केस से पर्दा उठाया. अतिशय के अपहरण में शामिल युवक युवती न केवल हाईप्रोफाइल थे, बल्कि उन में से एक अतिशय के पिता मयंक जैन का रिश्तेदार भी था.

दरअसल, गिरफ्तार अपहर्त्ता तुषार जैन मेरठ शहर की हनी गोल्फ कालोनी की कोठी नंबर-70 में रहता था. उस के पिता सिंचाई विभाग में अधिकारी थे. सन 2012 में उस ने गाजियाबाद के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक किया था. इस के बाद उस ने 2 साल का साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट का डिप्लोमा भी किया था. डिग्रीधारी हो कर भी जब उसे नौकरी नहीं मिली तो उस ने स्वतंत्र एक्सपर्ट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया.

उस ने पुलिस विभाग के लिए भी कई काम किए. बड़ेबड़े केस खोलने में इंटरनेट के जरिए उस ने पुलिस की मदद की. एक तरह से वह साइबर मामलों में पुलिस का एडवाइजर था. समयसमय पर पुलिस उस की मदद लेती रहती थी. साइबर के जो सेमिनार आयोजित किए जाते थे, उन में वह लैक्चर देता था. इस के बाजवूद वह गुजारे लायक ही कमा पाता था. बाद में वह अपनी मौसी के लड़के प्रतीक जैन के पास चला गया था. प्रतीक जैन हरियाणा, गुड़गांव के सेक्टर-82 स्थित प्रथम तल के फ्लैट नंबर-31 में किराए पर रहता था. प्रतीक ने कंप्यूटर साइंस से बीटेक करने के साथ ही लंदन की एक यूनिवर्सिटी से भी इंजीनियरिंग का डिप्लोमा किया था. प्रतीक जयपुर, राजस्थान के जवाहर नगर निवासी कपड़ों के बड़े कारोबारी संजय जैन का बेटा था. प्रतीक के दादा सेवानिवृत्त आईएएस औफिसर थे. पढ़ाई के बाद वह गुड़गांव आ गया था.

गुड़गांव में चूंकि कई नामी कंपनियां थीं, इसलिए उसे उम्मीद थी कि मोटी तनख्वाह की नौकरी मिल जाएगी. लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उस ने कौंटे्रक्ट पर सौफ्टवेयर बनाने शुरू कर दिए थे. वह अच्छा सौफ्टवेयर डेवलपर था. उस ने चूंकि लंदन में पढ़ाई की थी, इसलिए कंपनियां उसे महत्त्व और रकम दोनों देती थी. प्रतीक अपनी कमाई का हिस्सा अपने परिवार को भी भेजता था.

प्रतीक यूं तो हर महीने 5-6 लाख रुपए कमाता था. तुषार भी लाख 2 लाख कमा लेता था. यह बात अलग थी कि इतनी कमाई भी उस के लिए कम पड़ जाती थी. इस की भी एक बड़ी वजह थी. तुषार व प्रतीक दोनों ही लग्जरी लाइफ जीने के आदी थे. इस के अलावा वह अय्याशी भी करते थे. ये लोग अक्सर महंगे होटलों में जा कर मौजमस्ती करते थे. उन की साथी आस्था विश्वास मूलत: कोलकाता, पश्चिमी बंगाल के थाना धानतल क्षेत्र के अंतर्गत कलामपुर की रहने वाली थी. वह एक कंपनी में बतौर एडवाइजर नौकरी करती थी. एक साल पहले प्रतीक से मुलाकात के बाद दोनों की नजदीकियां बढ़ गई थीं.

धीरेधीरे दोनों के बीच प्रेमिल रिश्ते बन गए थे. दोनों ने एकदूसरे से विवाह का वादा भी कर लिया था. आस्था चूंकि परिवार से दूर थी, इसलिए वह प्रतीक के साथ ही लिवइन रिलेशन में रहने लगी थी. बात यहीं तक होती तो भी ठीक थी. प्रतीक व तुषार होटलों में हाईप्रोफाइल कौलगर्ल के साथ रातें रंगीन किया करते थे.

एकएक रात में वे 50 हजार रुपए से ज्यादा की रकम अपने अय्याशी के शौक पर लुटा देते थे. इंसान यदि बुरी लतों का शिकार हो कर अपनापशनाप खर्च करे तो बड़ी से बड़ी दौलत भी कम पड़ जाती है. इन दोनों के साथ भी ऐसा ही हुआ. प्रतीक और तुषार दोनों ही आर्थिक रूप से परेशान रहने लगे. जब पैसा होता मौज करते और जब पैसा खत्म हो जाता तो परेशान रहने लगते. मयंक जैन रिश्ते में प्रतीक का चाचा था. उन से मिलने के लिए कभीकभी वह मेरठ जाता रहता था.

दोनों महत्त्वाकांक्षी युवक थे. उन के सपने ऊंचे थे और खर्चे बेशुमार. अच्छी नौकरी उन्हें मिल नहीं रही थी. महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने कोई शौर्टकट रास्ता अख्तियार करने का मन बनाया. यह अलग बात थी कि काफी विचारविमर्श के बाद भी वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए. कहते हैं कि दिलओदिमाग में कोई खुराफाती विचार पनप जाए और इंसान उस के बारे में लगातार सोचता रहे तो वह अपने हिसाब से कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेता है.

फरवरी, 2016 के पहले सप्ताह में तुषार अपने घर मेरठ आया तो वह अपने साथ प्रतीक को भी ले आया. एक शाम दोनों बैठे तो तुषार ने उस की मुलाकात अपने 2 दोस्तों सोनू और राहुल से कराई. वे भी बीटेक किए हुए थे और उन के जैसी महत्त्वाकांक्षी सोच के शिकार थे. चारों ने बैठ कर अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने पर चर्चा की. सभी ने पैसे का रोना रोया. इसी दौरान प्रतीक ने कहा, ‘‘तुम लोग यदि साथ दो तो मेरे पास रातोंरात करोड़पति बनने का एक सुपर आइडिया है.’’

‘‘क्या?’’ सभी ने जिज्ञासावश पूछा तो उस ने राजदाराना अंदाज में बताया, ‘‘मेरे रिश्ते के चाचा मयंक जैन काफी पैसे वाले हैं.’’

‘‘इस से क्या होगा भाई, क्या वह हमें मालामाल कर देंगे?’’ तुषार के सवाल पर प्रतीक हंस दिया, ‘‘बिलकुल, इतना मालामाल कर देंगे कि सभी के दिन बदल जाएंगे और कभी पैसे की दिक्कत नहीं आएगी.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अगर हम उन के बेटे का अपहरण कर लें तो वह मुंहमांगी रकम देंगे.’’

‘‘यह काम इतना आसान नहीं है. पुलिस जमीनआसमान एक कर देगी.’’ राहुल ने आशंका जाहिर की तो प्रतीक तुषार की तरफ इशारा कर के बोला, ‘‘इस सब की जरा भी फिक्र मत करो. अपना तुषार साइबर एक्सपर्ट है. सारे हथकंडे जानता है कि पुलिस ऐसे मामलों में कैसे काररवाई करती है. हम पुलिस को बहुत आसानी से नाच नचा देंगे. वह हम तक कभी नहीं पहुंच पाएगी.’’

तुषार ने भी उस की बात का समर्थन किया, ‘‘उस की चिंता तुम छोड़ दो, हम पूरी प्लानिंग से काम करेंगे.’’

काफी विचारविमर्श के बाद उन्होंने मयंक के बेटे अतिशय का अपहरण कर के फिरौती वसूलने की योजना बना ली. प्रतीक ने मयंक को यूं ही टारगेट नहीं बनाया था. इस की एक वजह तो यही थी कि मयंक जैन पैसे वाले थे और प्रतीक को यह बात पता थी. उन्होंने कुछ समय पहले एक महंगी लग्जरी कार भी खरीदी थी. इस से प्रतीक को लगा कि मयंक नोटों में खेल रहे हैं. इसी वजह से उस ने उन के बेटे को निशाने पर ले लिया. अगले कुछ दिनों तक अमीरी के सपने देख कर वह सभी प्लानिंग करते रहे. इस बीच उन्होंने 315 बोर के 2 तमंचों का इंतजाम भी कर लिया. अपनी योजना में उन्होंने आस्था को भी शामिल कर लिया था.

पूरी योजना तैयार कर के 18 फरवरी को वे मेरठ पहुंचे. प्रतीक चूंकि मयंक के घर आताजाता रहता था, इसलिए उसे उन के बेटे अतिशय के आनेजाने का समय और बसस्टाप का पता था. उस दिन अतिशय बसस्टाप पर पहुंचा, लेकिन चूंकि वहां कई बच्चे थे, इसलिए उन्होंने अपहरण का इरादा छोड़ दिया. अगले दिन यानी 19 फरवरी की सुबह तुषार व प्रतीक आईटैन कार संख्या यूपी 12 डब्ल्यू-3273 से फिर मेरठ पहुंच गए. यह कार प्रतीक की थी. तय स्थान पर उन्हें मोनू व राहुल भी मिल गए.

करीब 8 बजे अतिशय रोजाना की तरह स्कूल जाने के लिए बसस्टाप पर पहुंच गया. इत्तेफाक से उस समय अतिशय अकेला था. दूर से निगाह रख रहे वह चारों वहां पहुंचे तो प्रतीक ने अतिशय को बुला कर कहा, ‘‘आओ अतिशय आज मैं तुम्हें स्कूल छोड़ देता हूं.’’

‘‘ओके भैया,’’ कहते हुए अतिशय खुशीख्ुशी कार में बैठ गया. उस के बैठते ही कार नेशनल हाइवे की तरफ जाने लगी तो अतिशय ने उसे टोका, ‘‘आप लोग मुझे कहां ले जा रहे हैं?’’ जवाब में उन लोगों ने उस के  साथ मारपीट कर के उसे डरा दिया और चुप रहने की धमकी दी.

बाद में उन्होंने नशीला पदार्थ सुंघा कर उसे बेहोश कर दिया. गाजियाबाद पहुंच कर सड़क पर उन्होंने एक रिक्शेवाले को मोबाइल पर बात करते देखा. प्रतीक व तुषार कार रोक कर उस के नजदीक पहुंचे और एक अर्जेंट काल करने के लिए उस से मोबाइल मांगा. उन्होंने उसे बताया कि उन के मोबाइल रास्ते में एक होटल में चोरी हो गए हैं. एक काल करने के बदले में उन्होंने रिक्शा वाले को 5 सौ रुपए का नोट निकाल कर दे दिया. रिक्शे वाले ने खुश हो कर उन्हें अपना मोबाइल दे दिया. मोबाइल ले कर दोनों कार से भाग निकले. यह उन की योजना का एक हिस्सा था. कुछ घंटों के सफर में वे अतिशय को गुड़गांव वाले फ्लैट पर ले गए और उस के हाथपैर बांध कर मुंह पर टेप लगा दी. उस की निगरानी का जिम्मा आस्था को सौंप दिया गया. फिरौती के लिए फोन करने में उन्होंने जल्दी नहीं की, बल्कि अखबारों के जरिए हालात पर नजर रखे रहे.

3 दिनों बाद 22 फरवरी को तुषार ने आवाज बदल कर रिक्शेवाले से छीने गए मोबाइल से मयंक को फोन कर के 2 करोड़ की फिरौती मांगी. कई दौर की बातचीत के बाद सौदा 23 लाख रुपए में तय हो गया. प्रतीक ने भी आवाज बदल कर मयंक को फोन किया. 24, 25 व 26 फरवरी को उन्होंने मयंक को रकम ले कर बुलाया. दूर से वह उस पर नजर रखते रहे, परंतु फिरौती नहीं ली.

वे नजर रख कर पूरी चालाकी बरतते हुए आश्वस्त हो जाना चाहते थे कि मयंक के साथ पुलिस तो नहीं है. पुलिस ने मोबाइल का पता निकलवाया तो वह बदायूं का निकला, लेकिन उस का सिम फर्जी पते पर लिया गया था. तुषार व प्रतीक टैक्नीकली मजबूत थे. वह काल करने में लोकेशन बदलने के लिए एक खास सौफ्टवेयर का इस्तेमाल करते थे. 27-28 फरवरी की रात फिरौती की रकम वसूलने के लिए प्रतीक, तुषार और आस्था कार से अतिशय को साथ ले कर निकले. पहले से तय जगह से रकम का बैग उठा कर उन्होंने कार में रखा. तुषार साइबर एक्सपर्ट था. उस ने सब से पहले रुपए निकाल कर दूसरे बैग में रखे. उसी वक्त उस ने बैग को चैक किया तो पाया कि उस में जीपीएस डिवाइस लगी है. उस ने बैग रास्ते में फेंक दिया.

इस बीच प्रतीक बोला, ‘‘हम लोगों का काम हो गया है. अब वक्त आ गया है, जब अतिशय से पीछा छुड़ा लिया जाए. यह जिंदा रहेगा तो हम सब पकड़े जाएंगे. हम हरिद्वार की तरफ चलते हैं. रास्ते में इसे मार कर कहीं फेंक देंगे और हरिद्वार में गंगा नहा कर इस मामले की इतिश्री कर देंगे.’’ लेकिन वह अपने घृणित मकसद में कामयाब हो पाते, उस से पहले ही पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

पुलिस ने उन के कब्जे से फिरौती के 23 लाख रुपए, 315 बोर के 2 तमंचे, अपहरण में प्रयुक्त कार, नायलौन की रस्सी व सेलो टेप आदि चीजें बरामद कीं. पुलिस ने उन के साथी अपहर्त्ताओं मोनू व राहुल की तलाश की, परंतु वे हाथ नहीं आ सके. पुलिस ने अपहर्त्ताओं पर धारा-364ए, 307, 25 आर्म्स एक्ट व 7/8 पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया. विस्तृत पूछताछ के बाद अगले दिन मेरठ पुलिस ने भी प्रैसवार्ता की और तीनों आरोपियों को अपर जिला जज की विशेष अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की भी जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस बाकी आरोपियों की तलाश कर रही थी.

प्रतीक, तुषार  और उन के साथियों के पास अच्छी डिग्रियां थीं, वे थोड़ा सब्र से काम लेते तो अच्छी नौकरियां पा कर अपना कैरियर बना सकते थे, लेकिन उन की महत्वाकांक्षाओं, शौर्टकट से दौलत कमाने की ललक और खुराफाती दिमाग ने उन का भविष्य चौपट कर दिया. दूसरी ओर केस के खुलासे पर डीजीपी जावीद अहमद ने अधिकारियों को प्रशस्ति पत्र और पुलिस की टीम को 50 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. Meerut Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: ठगी का बड़ा खिलाड़ी

True Crime Story: नौवीं फेल अजय पंडित देश की राजनैतिक पार्टियों के बड़ेबड़े नेताओं और नौकरशाहों से संबंध बना कर सफेदपोश बन गया. वीआईपी सुरक्षा में रह कर उस ने करोड़ों ठगे. जब उस की हकीकत सामने आई तो पता चला कि राजनीति की आड़ में कैसेकैसे लोग पलते हैं.

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या एक पर स्थित हरियाणा के जिला करनाल की पहचान विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के रूप में तो है ही, इस के अलावा यह धान की खेती के रूप में भी प्रसिद्ध है. यहां पैदा होने वाले उच्च गुणवत्ता वाले धान के चावल को विदेशों तक भेजा जाता है. यहां की दुनार राइस मिल का बड़ा नाम है. जाटान रोड स्थित इस मिल के मालिक सुरेंद्र गुप्ता बहुत ही सधे हुए अदांज में अपनी यह राइस मिल चला रहे हैं. उन की राइस मिल का चावल देशविदेश भेजा जाता है. सुरेंद्र एक बड़ी शख्सियत हैं, लिहाजा उन के संबंध भी वैसे ही लोगों से हैं. वह अपने कारोबार को और ऊंचाई तक ले जाना चाहते थे, जिस के लिए उन्हें करोड़ों रुपए की बड़ी रकम की जरूरत थी.

वैसे तो यह रकम उन्हें बैंकों से कर्ज के रूप में मिल सकती थी, लेकिन एक तो मोटी रकम, दूसरे बैंकों द्वारा लिया जाने वाला मोटा ब्याज, उन्हें परेशान करता था.

इंसान किसी बात की चाहत रखता है तो कई बार उस के रास्ते खुदबखुद खुल जाते हैं. सुरेंद्र गुप्ता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उन की मुलाकात एक आदमी और उस के साथियों से हुई तो उन्होंने अपनी समस्या उन से कही, उस आदमी के साथियों में से एक ने कहा, ‘‘गुप्ताजी, सोच लीजिए, आप का काम हो गया.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘आप को मोटा और सस्ती ब्याज दर पर एक आदमी लोन दिला सकता है, क्योंकि उस के लिए यह बाएं हाथ का खेल है.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘आप ने अजय पंडित का नाम तो सुना ही होगा. वह ऐसे आदमी हैं कि उन के पास पहुंचते ही हर समस्या का हल निकल आता है.’’

इस के बाद उस आदमी और उस के साथियों ने अजय पंडित के बारे में जो कुछ बताया, उसे सुन कर सुरेंद्र गुप्ता हैरान रह गए.

अजय पंडित वह नाम था, जिस के बड़ेबड़े राजनेताओं से सीधे संबंध थे. बड़ेबड़े लोग अपने काम कराने उस के यहां लाइन लगाए खड़े रहते थे. यह बात अलग थी कि अजय सिर्फ करोड़पतियों या अरबपतियों के ही काम कराता था. अजय मूलरूप से रहने वाला तो हरियाणा के सिरसा जिले का था, लेकिन वह दिल्ली के छतरपुर स्थित एक फार्महाउस में रहता था. सुरेंद्र गुप्ता से मिलने वाला वह आदमी और उस के साथियों ने जो बताया था, उस के अनुसार अजय पंडित सोनिया गांधी एसोसिएशन का राष्ट्रीय अध्यक्ष था. इस के अलावा वह अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा का भी अध्यक्ष था.

राजनीतिज्ञों से चूंकि उस के गहरे रिश्ते थे, इसलिए वह लोगों के काम आसानी से करा देता था. वे लोग अजय को जानते ही नहीं थे, बल्कि उस से उन के अच्छे रिश्ते भी थे. इन लोगों से मिलने के बाद सुरेंद्र को लगा कि उन की इच्छा पूरी हो जाएगी. अजय पंडित के बारे में कुछ थोड़ा उन्होंने भी सुन रखा था. वह काफी ऊंची पहुंच वाला आदमी था.

उन लोगों ने सपने दिखाए तो सुरेंद्र अजय से मिलने के लिए ललायित हो उठे. उन्होंने कहा, ‘‘इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है. आप लोग उन से मेरी मुलाकात करा दीजिए.’’

‘‘ठीक है, हम कोशिश करते हैं. समय ले कर आप को फोन पर बता देंगे.’’ रितेश और उस के साथियों ने कहा.

इस के बाद वे चले गए, लेकिन उन का संपर्क सुरेंद्र से बना रहा. एक दिन उन्होंने बताया कि सोमवार की दोपहर वह छतरपुर आ जाएं. इस के बाद तय दिन पर सुरेंद्र गुप्ता बताए गए पते पर पहुंच गए.

दिल्ली के छतरपुर इलाके में बड़ी हैसियत वाले नामीगिरामी लोगों के फार्महाउस हैं. उन्हीं में से राधामोहन लेन स्थित एक फार्महाउस पर वह पहुंचे तो वहां की कड़ी सुरक्षा के तामझाम देख कर एकबारगी वह ठिठक गए. मुख्य दरवाजा बंद था और वहां हथियारों से लैस प्राइवेट सुरक्षाकर्मी और पुलिसकर्मी खड़े थे. उन की गाड़ी रुकी तो एक सुरक्षाकर्मी ने उन के नजदीक आ कर पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘अजयजी से. अपाइंटमेंट है मेरा.’’

‘‘एक मिनट ठहरिए.’’ कह कर सुरक्षाकर्मी पलटा और मुख्यद्वार पर बनी केबिन में जा कर वहां रखे टेलीफोन से बात की. उस ने फोन रख कर दरवाजा खुलवाने के साथ ही उन्हें अंदर जाने का इशारा कर दिया.

फार्महाउस के अंदर का नजारा बड़ा ही आकर्षक था. वहां हर तरफ हरियाली थी. पार्किंग में पहले से ही कई महंगी और लग्जरी कारें खड़ी थीं. उन्होंने भी अपनी कार वहां खड़ी कर दी और उतर कर कोठी की तरफ बढ़े. कोठी के बरामदे में बने औफिसनुमा कमरे में कई लोग बैठे थे. वहां मौजूद लोगों ने उन से आने का कारण पूछा तो उन्होंने बता दिया.

‘‘ठीक है, आप को थोड़ा इंतजार करना होगा, साहब बाहर हैं. कुछ देर में आते ही होंगे.’’ कह कर एक आदमी उन्हें अंदर ड्राइंगरूम में ले गया. वहां पड़े बेशकीमती सोफों पर पहले से ही तमाम लोग बैठे थे. वह भी एक सोफे पर बैठ गए. वहां की भव्यता देख कर उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. चमकदार मार्बल, कालीन, फर्नीचर, दीवारें, उन पर लगी पेंटिंग्स और छत में लटकते झूमर, सभी कुछ भव्यता प्रदर्शित कर रहे थे.

इस के अलावा दीवारों पर नामचीन राजनेताओं के साथ मुसकराते हुए एक ही शख्स के तमाम फोटो टंगे थे. वह समझ गए कि यही अजय पंडित हैं. ड्राइंगरूम की शान भी अलग ही थी. क्लोजसर्किट कैमरे भी वहां लगे थे. इस से भी ज्यादा खास बात यह थी कि वहां बैठे लोग चाय, कौफी, स्नैक्स, फू्रट्स आदि इस अंदाज में खापी रहे थे, जैसे वहां कोई पार्टी चल रही हो. 3-4 वेटर खातिरदारी में लगे थे. एक वेटर उन्हें भी पानी दे गया. उस के बाद उन से और्डर लिया, ‘‘आप के लिए क्या लाएं सर?’’

‘‘कौफी ले आओ.’’ सुरेंद्र ने कहा तो कुछ देर बाद एक वेटर गोल्डन कप में उन्हें कौफी दे गया. वह जिस ड्राइंगरूम में बैठे थे, वहां से बाहर का भी नजारा दिखाई दे रहा था. वहां अनगिनत देशीविदेशी पेड़पौधों ने वातावरण को सुंदर बनाया हुआ था. कुछ ही वक्त बीता था कि वह आदमी और उस के साथी भी आ गए. उन्होंने गर्मजोशी से सुरेंद्र गुप्ता का स्वागत किया. वे भी बातचीत में मशगूल हो गए.

कुछ और वक्त बीता होगा कि सायरन बजाती एक जिप्सी फार्महाउस में दाखिल हुई. उस के ठीक पीछे काले रंग की चमचमाती मर्सिडीज कार थी और उस के पीछे एक और जिप्सी. दोनों जिप्सियों पर बीसियों कमांडों और सुरक्षाकर्मी सवार थे. सभी के पास हथियार और वौकीटौकी थे. एक सुरक्षाकर्मी ने चमचमाती कार का पिछला दरवाजा खोला तो उस में से जो शख्स उतरा, वह निहायत ही आकर्षक था. उस ने नीले रंग का सूट पहना हुआ था. उस ने अपने नजदीक आए स्टाफ से कुछ गुफ्तगू की और ड्राइंगरूम की तरफ बढ़ने लगा. उस की चालढाल में भी रुआब झलक रहा था. उस के चारों ओर सुरक्षाकर्मी इस तरह घेरा सा बनाए चल रहे थे कि कोई परिंदा भी नजदीक नहीं आ सकता था. अंदर पहुंच कर उस ने मुसकरा कर सभी से मुलाकात की.

सुरेंद्र के परिचित ने उन का परिचय कराया, ‘‘सर, आप ही हैं सुरेंद्र गुप्ताजी, जिन के बारे में आप से बात हुई थी.’’

‘‘ओके…ओके… आप के बारे में इन लोगों ने मुझे सब बता दिया है. आप अभी बैठिए, मैं बाकी लोगों से मिल कर आप से बात करता हूं.’’

सभी अपनीअपनी जगह पर बैठ गए. सारा तामझाम देख कर सुरेंद्र समझ गए कि अजय पंडित बहुत पहुंची हुई हस्ती है.

करीब आधे घंटे बाद अजय पंडित से उन के मिलने की बारी आ गई. औपचारिक बातचीत के बाद उस ने पूछा, ‘‘इन लोगों ने बताया तो था आप के काम के बारे में, लेकिन आप खुद विस्तार से मुझे बताइए कि आप चाहते क्या हैं?’’

‘‘सर, मुझे करीब 2 सौ करोड़ का लोन चाहिए.’’

सुरेंद्र की बात पर अजय इस तरह मुसकराया, जैसे यह बहुत छोटी बात हो. उस ने कहा, ‘‘2 सौ ही क्यों, आप 3 सौ करोड़ का लोन ले लीजिए. ऐसी कई विदेशी कंपनियां हैं, जो भारत में अपना पैसा निवेश करना चाहती है. बस, उन्हें गारंटी चाहिए, वह आप के लिए हम ले लेंगे. ब्याज भी केवल 7 प्रतिशत होगा. अभी पिछले महीने उन्होंने दिल्ली की एक पार्टी को 2 सौ करोड़ रुपए दिए भी हैं.’’

यह सुन कर सुरेंद्र गुप्ता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

‘‘बात करोड़ों की है, इसलिए एक बार कल मैं उन लोगों से बात कर लेता हूं. अगर उन्होंने कहीं इन्वैस्टमेंट नहीं किया होगा तो आप अपना काम पक्का समझिए.’’ कुछ पल रुक कर उस ने आगे कहा, ‘‘हां, एक जरूरी बात, कस्टम, पुलिस क्लियररैंस और सभी फाइल चार्ज आप को देने होंगे.’’

‘‘वह मैं दे दूंगा.’’ सुरेंद्र गुप्ता ने उत्साह से कहा. अच्छे माहौल में बातचीत के बाद सुरेंद्र खुशीखुशी वापस आ गए.

अजय के साथियों ने एक सप्ताह बाद ही सुरेंद्र गुप्ता को बता दिया कि उन का काम हो जाएगा. कागजी औपचारिकताओं और कमीशन के नाम पर पहली किश्त के रूप में उन्होंने एक करोड़ रुपए अजय तक पहुंचा दिए. इस के साथ अपने कुछ फोटो, प्रौपर्टी दस्तावेजों की फोटोकौपी भी दे दी थी. अगले कुछ महीनों में कस्टम, पुलिस क्लीयरेंस, सिक्योरिटी और अन्य कमीशन के नाम पर उन्होंने 3 करोड़ रुपए और भी दे दिए. 3 सौ करोड़ के लोन के लिए यह रकम कुछ भी नहीं थी. इतना बड़ा लोन उन्हें मिलने जा रहा था, यही क्या कम था.

इस बीच कई तरह के फार्म जो कस्टम, बैंकों और विदेशी मनी ट्रांसफर की सरकारी परमीशन से संबंधित थे, सुरेंद्र गुप्ता से हस्ताक्षर करा लिए गए थे. कई बार इंसान जैसा सोचता है, वैसा होता नहीं. लोन मिलने की उम्मीद में समय और तारीखें बढ़ती चली गईं. सुरेंद्र बहुत खुश थे, लेकिन उन की खुशी को पहला झटका तब लगा, जब अजय के साथियों ने उन्हें नजरंदाज करना शुरू कर दिया.

आशंकित हो कर सुरेंद्र गुप्ता ने अपने स्तर से अजय पंडित के बारे में पता लगाना शुरू किया, लेकिन उस के रसूख में कहीं कोई शक नहीं हुआ. उन के एक परिचित ने यह जरूर कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें ठग लिया गया हो? यह ख्याल मन में आते ही उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने अजय के साथियों से भी बात की. वे काम के लिए तो हामी भरते रहे, लेकिन टरकाते भी रहे. अजय से मिलने की उन्होंने कई कोशिशें कीं, लेकिन वीआईपी सुरक्षा के चक्रव्यूह में उन का उस से मिलना नहीं हो सका. वह हर बार नाकाम रहे. किसी से बात भी होती तो नेताओं का रौब दिखा दिया जाता.

सुरेंद्र ने जो रकम दी थी, वह कोई छोटी रकम नहीं थी. धीरेधीरे जब विश्वास हो गया कि उन्हें ठग लिया गया है तो वह बेचैन हो उठे. अजय पंडित भले ही रसूख वाला था, लेकिन करोड़ों रुपए की ठगी का मामला था, इसलिए सुरेंद्र भी कैसे चुप बैठते. उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का फैसला कर लिया. इस के बाद वह करनाल के एसपी पंकज नैन से मिले और उन्हें आपबीती सुनाई. पुलिस ने उन्हें शीघ्र काररवाई का आश्वासन दिया.

शिकायत पर गहराई से विचार कर के पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श किया. पुलिस ने अजय के बारे में जानकारियां जुटाईं तो पता चला कि उस के बड़ेबड़े नेताओं से संबंध हैं. वह काफी उच्चस्तर पर संबंध रखने वाला आदमी है. उस की पैठ न केवल हर बड़ी पार्टी में हैं, बल्कि पुलिस प्रशासन, नौकरशाहों और उद्योगपतियों से भी उस के अच्छे रिश्तों की बात सामने आ रही थी. निस्संदेह वह ऊंची पहुंच वाला आदमी था. ऐसे आदमी पर बिना पर्याप्त सबूत या एफआईआर के हाथ डालना संभव नहीं था. इस से पुलिस की काररवाई शुरू होने से पहले ही खत्म हो सकती थी. इसी छानबीन में पुलिस रिकौर्ड से पता चला कि सन 2013 में पानीपत शहर में अजय के खिलाफ नौकरी के नाम पर 20 लाख रुपए की ठगी का एक मामला दर्ज हुआ था.

यह मामला अदालत में चल रहा था. इस से पुलिस का यह शक पुख्ता हो गया कि अजय राजनीतिक संबंधों की आड़ में लोगों के साथ ठगी कर रहा है. इस के बाद थाना मधुबन में सुरेंद्र गुप्ता की तहरीर पर भादंवि की धारा 420 और 506 के तहत मामला दर्ज हो गया. इस के बाद अधिकारियों ने विचारविमर्श के बाद उस की गिरफ्तारी का फैसला कर लिया. प्रदेश पुलिस के मुखिया यशपाल सिंघल और आईजी हनीफ कुरैशी ने भी इस मामले में काररवाई के निर्देश दे दिए. इस के लिए एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम भी बना दी गई. इस टीम में कई तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को शामिल करते हुए इस की कमान डीएसपी जिंतेंद्र गहलावत को सौंप दी गई. अब पुलिस उसे घेरने की कोशिश में जुट गई.

16 जनवरी, 2016 को पुलिस ने चंडीगढ़अंबाला रोड पर अजय को पूछताछ के बहाने बुलाया गया तो उस ने अपनी पहुंच का हवाला दे कर पुलिस को रौब में लेने की कोशिश की. लेकिन पुलिस ने उस के प्रभाव में आए बिना उसे गिरफ्तार कर लिया. जबकि पुलिस ने इस गिरफ्तारी की तत्काल किसी को भनक नहीं लगने दी और अदालत में पेशी के बाद उसे 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. प्राथमिक पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे साथ ले कर छतरपुर स्थित फार्महाउस पर छापा मारा तो वहां से सुरेंद्र गुप्ता द्वारा दिए गए 2 करोड़ रुपए बरामद हो गए. हरियाणा पुलिस के लिए किसी मामले में अब तक बरामद की गई सब से बड़ी रकम थी. इसी के साथ अजय की गिरफ्तारी की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई.

पुलिस तब चौंके बिना नहीं रह सकी, जब उस के सामने 2 और ऐसे शिकायतकर्ता आ गए, जो अजय पंडित की ठगी का शिकार हुए थे. उन में से करनाल के वीरेंद्र सिंह से गैस एजेंसी और पैट्रोल पंप दिलाने के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपए ठगे गए थे, जबकि पुणे के आर.एस. यादव से केंद्र सरकार में नेशनल सिक्योरिटी कमीशन में मेंबर बनवाने के नाम पर 50 लाख रुपए की रकम ऐंठी गई थी. पुलिस ने इन दोनों मामलों में भी मुकदमा दर्ज कर लिया और अजय पंडित से विस्तृत पूछताछ की. इस बीच उसे 21 जनवरी को पुन: अदालत में पेश किया गया. इस बार भी उसे 9 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

अजय पंडित से पूछताछ और उस के कारनामों की चर्चाओं एवं जांचपड़ताल में जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इसलिए चौंकाने वाली थी, क्योंकि एक नौवीं फेल शख्स ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और शातिर दिमाग के बल पर इतनी ऊंची पहुंच बना ली थी, जिस की जल्दी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. जानीमानी पार्टियों के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से ले कर वरिष्ठ अधिकारियों से उस के सीधे और मजबूत संबंध थे. उस का रसूख और राजशाही ठाठ देख कर बड़ेबड़े लोग प्रभाव में आ जाते थे.

अजय शर्मा उर्फ सरजू को जानने वाले बताते हैं कि वह नौवीं फेल था. उस के पिता का कभी छोटा सा क्लिनिक हुआ करता था. वह सिरसा में गोदाम रोड पर रहते थे. उस की प्रारंभिक शिक्षा यहीं हुई थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी था. पढ़ाई में मन नहीं लगा, इस के बावजूद वह ऊंचे सपने देखने लगा. कुछ लोग अपने सपनों को पढ़ाई और काबलियत के बलबूते पूरा करते हैं, परंतु कुछ लोग शौर्टकट के जरिए. फर्क इतना होता है कि जो सपने काबलियत से पूरे होते हैं, वे स्थाई होते हैं, जबकि जिन्हें शौर्टकट के जरिए पूरा किया जाता है, उन की कोई बुनियाद नहीं होती, वे वक्ती होते हैं. यह फर्क कलांतर में आईने की तरह एकदम साफ दिखता है. इस बड़ी हकीकत से अंजान अजय का थकी सी जिंदगी में मन नहीं लगता था.

पढ़ा हुआ वह भले ही कम था, लेकिन दिमाग का तेज था. उस का व्यक्तित्व भी आकर्षक था. उस के आर्थिक हालात कतई अच्छे नहीं थे. उसे लगता था कि हवाई चप्पलों में टहलते हुए उस की उम्र यूं ही कट जाएगी. सन 1997 में ही यह बात उस की समझ में आ गई थी कि आज के जमाने में राजनीतिक ताकत से बड़ी कोई ताकत नहीं है. उस ने राजनीति से जुड़े लोगों से रिश्ते बनाने शुरू कर दिए, साथ ही गुजारे के लिए प्रौपर्टी का छोटामोटा काम करने लगा.

बातों से किसी को भी प्रभावित करने की कला उस में थी ही, उस की पैठ बढ़ी तो उस ने दिल्ली का रुख किया. इस के बाद उस ने कई सालों तक सिरसा की ओर पलट कर नहीं देखा. राजनीतिज्ञों की शागिर्दी के साथ उस ने लोगों के छोटेमोटे काम कराने शुरू किए तो उस के बदले वह पैसे लेने लगा. इसी के साथ प्रौपर्टी के काम में भी वह हाथ आजमाता रहा. कई शराब कारोबारियों से भी उस के रिश्ते बन गए थे. विवादित प्रौपर्टी पर उस की खास नजर होती थी, क्योंकि वहां नेताओं और नौकरशाहों की पौवर का इस्तेमाल कर के वह अपने रिश्तों को भुना लेता था.

हैसियत बढ़ी तो पंजाबी बाग जैसे पौश इलाके में किराए पर रहना शुरू कर दिया. इन्हीं कामों से उस ने इतनी दौलत कमाई कि 10 सालों में वह काफी दौलतमंद हो गया. इस बीच फिल्मों से प्रभावित हो कर उस ने अपना नाम अजय पंडित रख लिया. अजय का काम करने का तरीका एकदम अलग था. उस ने तमाम चेलेचपाटे बना लिए थे, जो पहले शिकार को टारगेट करते थे. इस के बाद उसे शान दिखा कर संपर्क बढ़ा कर उसे राजनीतिक घरानों से ले कर बड़े नौकरशाहों से मिलवा कर अपना विश्वास जमाते. और जब विश्वास जम जाता था तो उसे कोई ख्वाब दिखा कर चाल चलना शुरू कर देते थे.

इस मामले में अजय करिश्माई व्यक्तित्व का स्वामी था. लोग न सिर्फ उस पर भरोसा कर लेते थे, बल्कि उसे काम के बदले मोटी रकम भी दे देते थे. जिन के काम नहीं होते थे, उन के रुपए फंस जाते थे. अजय रसूख की बदौलत तरहतरह के हथकंडे अपना कर ऐसे लोगों को किनारे कर देता था. किसी को राजनीतिक पार्टी का टिकट दिलाने, किसी को नौकरी, किसी को पैट्रोल पंप व गैस एजेंसी का लाइसैंस दिलाने तो किसी को बडे़ काम के ठेके दिलाने का झांसा दे कर वह ठगी करता था. ऐसा भी नहीं था कि वह लोगों के काम बिलकुल नहीं कराता था. लेकिन जिन का काम नहीं होता था, उन के पैसे फंस जाना तय था.

दौलत और ताकत में इजाफा हुआ तो अजय ने छतरपुर में एक फार्महाउस किराए पर ले लिया. उस ने सिरसा के सैक्टर-20 में एक आलीशान कोठी बनवाई. कई लग्जरी गाडि़यां खरीद लीं. राजनीतिक लोगों और नौकरशाहों पर भी उस का दबदबा रहता था. सरकारी सुरक्षा के अलावा प्राइवेट सिक्योरिटी में पहलवान जैसे लड़कों को वह साथ रखता था. अजय खुद को राजशाही घराने का बताता था. उस ने तमाम नामीगिरामी लोगों से संपर्क बना लिए थे. उस के रहनसहन, राजसी ठाटबाट, सुरक्षा तामझाम, लग्जरी गाडि़यों और बड़े संपर्कों को देख कर कोई भी प्रभाव में आ जाता था. वह लोगों से बड़ेबड़े कामों को कराने के बदले मोटी रकम लेता था. राजनीतिक संबंधों को भुनाने का हुनर उसे खूब आता था.

उस ने सोनिया गांधी एसोसिएशन बना ली, जिस का वह खुद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गया. इसी के साथ उस ने ब्राह्मणसभा भी बनाई और उस का भी खुद ही अध्यक्ष बन गया. वह सफेदपोश बन कर ऐशोआराम की जिंदगी जीता था. अजय के जिंदगी जीने का अंदाज एकदम अलग था. वह रौबरुतबे से रहता था. उस का हुक्म बजाने के लिए नौकरों और सुरक्षाकर्मियों की फौज तैयार रहती थी. राष्ट्रीय पहुंच के नेताओं से संबंध बनाए रखने की कला का वह बाजीगर था. लखपति लोगों के काम कराना वह अपनी तौहीन समझता था, इसलिए करोड़पति और अरबपति लोगों को ही अपना निशाना बनाता था. किसी का काम कराने के बदले वह करोड़ो रुपए एडवांस में ले लेता था. शातिर दिमाग अजय ने दिखावटी शान से ही बड़ोंबड़ों को झांसे में लिया था.

दौलत और रसूख हासिल करने के बाद अजय ने सन 2012 से सिरसा आना शुरू किया तो वह जब भी वहां आता, उसे देख कर लोगों की आंखें फटी रह जातीं. कारों और वीआईपी सिक्योरिटी ही नहीं, अजय हैलीकौप्टर से भी आता था. लोगों में जिज्ञासा बढ़ाने के लिए वह शहर के ऊपर हैलीकौप्टर का चक्कर लगवा कर एयरफोर्स स्टेशन पर उतरता था. तब लोगों को पता चल जाता था कि उन का अजय उर्फ सरजू आया है. वह दान भी दोनों हाथों से करता था. यह दान वह धार्मिक आयोजनों, पूजास्थलों से ले कर गरीबों तक में करता था. उस ने दान भी इतना किया था कि उस की पहचान बड़े दानवीरों में होने लगी थी. उस के रसूख और दान देने की दिलदारी को देख कर लोग उसे कार्यक्रमों मे बुलाने लगे थे.

विशेष अवसरों पर जब उस के आने पर गरीबों की लाइन लगती थी तो उस के कारिंदे हजार व 5 सौ के नोटों की गड्डियां खोल कर उसे देते और वह बिना गिने बांटता चला जाता था. गरीबों के प्रति उस की यह दरियादिली जितनी सुर्खियों में आती, वह उतना ही खुश होता और गर्व महसूस करता. उस ने किसी गरीब को कभी हजार या 5 सौ से कम का नोट नहीं दिया, क्योंकि उस से कम देना वह अपनी तौहीन समझता था. उसे ऐसा करते देख बड़ेबड़े रईस भी हैरान रह जाते थे.

अजय को जब भी सिरसा आना होता, उस के स्वागत में शहर में बड़ेबड़े होर्डिंग और बैनर कुछ इस अंदाज में लगाए जाते थे, जैसे किसी बड़ी राजनैतिक हस्ती का स्पैशल दौरा हो. जब सारी तैयारियां पूरी हो जातीं, उस के बाद ही भारी सुरक्षा तामझाम और काफिले के साथ अजय फिल्मी स्टाइल में एंट्री करता था. उस के आगेपीछे पुलिस और कमांडों दस्ते की जिप्सियां चलती थीं. उन के बीच वह महंगी लग्जरी कार में रहता था. लोग उसे देख सकें, इस के लिए कार का शीशा उतार दिया जाता था. जिप्सियों पर 2-2 पुलिसकर्मी गले में कारबाइन डाल कर खड़े हो कर चलते थे. शायद ऐसा इसलिए किया जाता था कि लोग देख सकें कि पुलिस किस मुस्तैदी से उसे वीआईपी सुरक्षा दे रही है. इस सब के पीछे उस की मंशा लोगों को अपना रसूख दिखाने की होती थी. वह हमेशा वीआईपी सिक्योरिटी रखता था.

उस की सुरक्षा में पंजाब, हरियाणा और दिल्ली पुलिस के जवान होते थे. जितनी सुरक्षा उस के पास होती थी, किसी कैबिनेट मंत्री के पास भी नहीं होती थी. सन 2016 के विधानसभा चुनावों के समय सिरसा में चर्चा हो रही थी कि कांगे्रस अजय को अपना उम्मीदवार बनाएगी तो पूर्व मंत्री गोपाल कांडा से उस का कांटेदार मुकाबला होगा. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. अजय की रईसी का आलम यह था कि वह अपने नातेरिश्तेदारों को महंगी कारें तक गिफ्ट करता था. उस के पास जो लग्जरी गाडि़यां थीं, वे उस के नाम नहीं थीं. उस की बीएमडब्ल्यू, मर्सडीज, औडी व हुंडई कारें उस के साथियों और पीए के नाम पर थीं.

अजय की शान से प्रभावित हो कर बड़ेबड़े लोग अपने काम कराने के लिए उस के पास आते और उस के जाल में फंस जाते थे. उन्हीं में पुणे के एक बड़े शिक्षण संस्थान के संचालक आर.एस. यादव भी थे. वह अकसर अपने कामों से दिल्ली आते रहते थे. इसी आनेजाने में उन की मुलाकात अजय से हुई तो उस ने उन्हें ऐसा झांसा दिया कि वह भी उस के जाल में फंस गए. उस ने उन से कहा था कि सरकार एक सिक्योरिटी कमीशन बनाने जा रही है, अगर वह चाहें तो गृह मंत्रालय में सिफारिश कर के उन्हें वह उस में मेंबर बनवा सकता है. उन्हें तमाम सरकारी सुविधाओं के साथ लाल बत्ती लगी गाड़ी और सुरक्षा भी मिलेगी.

आर.एस. यादव इस के लिए सहज ही तैयार हो गए. अजय का रसूख चूंकि वह देख चुके थे, इसलिए शक जैसी कोई बात नहीं थी. उन्होंने 50 लाख रुपए अजय को आने वाले दिनों में दे भी दिए. ऐसा कोई कमीशन बनना ही नहीं था, इसलिए रुपए हाथ में आते ही अजय उन्हें टरकाने लगा. उन्हें लगा कि वह फंस गए हैं तो पैसे वापस मांगे. इस के बाद वह आए दिन रुपए वापसी के लिए चक्कर लगाने लगे तो एक दिन फार्महाउस पर अजय से उन की कहासुनी हो गई. आर.एस. यादव अड़ गए. उन्होंने कहा, ‘‘अजयजी बहुत हो गया, आप मेरा हिसाब कर दीजिए. उस के बाद हमारा आप का रिश्ता खत्म.’’

उन की बात पर अजय ने मुसकरा कर कहा, ‘‘ठीक है, तुम यही चाहते हो तो आज मैं मामला साफ किए देता हूं. आज के बाद तुम मुझ से कभी नहीं मिल सकोगे.’’

इस के बाद अजय ने सुरक्षाकर्मियों को इशारा किया तो उन्होंने उसे धकिया कर फार्महाउस के बाहर कर दिया. उस ने ताकीद भी कर दी थी कि यह आदमी आइंदा कभी कोठी में नहीं दिखना चाहिए. बाहर से ही इसे भगा देना. इस तरह आर.एस. यादव को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया तो वह चाह कर भी कभी उस से नहीं मिल सके. अजय की पहुंच को देखते हुए उन्होंने उस के खिलाफ जान के डर से पुलिस में शिकायत करने की भी हिम्मत नहीं की. कोशिश कर के हरियाणा में शिकायत भी की तो वह दब कर रह गई.

सन 2013 में अजय ने पानीपत के एक आदमी से सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर 20 लाख रुपए ठग लिए थे. ठगी का शिकार हुए आदमी ने चुप बैठने के बजाय उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था. पानीपत में उस के खिलाफ 20 लाख रुपए की ठगी का मुकदमा तो दर्ज हुआ, लेकिन अपनी पहुंच के बल पर वह कानून के शिकंजे में फंसने से बचता रहा. मामला अदालत में पहुंचा. अजय को उम्मीद थी कि एक दिन यह सब रफादफा करा देगा. अजय की ठगी का सिलसिला यहीं नहीं थमा. उस ने करनाल के सेक्टर-1 निवासी वीरेंद्र सिंह से भी पैट्रोल पंप और गैस एजेंसी दिलाने के नाम पर डेढ़ करोड़ रुपए ठग लिए थे. वीरेंद्र को न एजेंसी मिली, न रुपए. अजय की पहुंच के आगे वह भी थक कर बैठ गए थे.

इस के बाद उस ने सुरेंद्र गुप्ता को ठगी का शिकार बनाया. उसे कहीं से पता चला था कि सुरेंद्र को लोन की जरूरत है. यह पता चलते ही उस ने अपने साथियों को उन के पीछे लगा दिया. गुप्ता उन के जाल में एक बार फंसे तो फिर फंसते ही चले गए. अजय के कारनामों का खुलासा हुआ तो हर कोई हैरान था. पुलिस हिरासत में भी वह अपने परिचित नेताओं के नाम ले कर पुलिस को डराता रहा. उस की गिरफ्तारी की सूचना मिलने के बाद गैस एजेंसी के नाम पर डेढ़ करोड़ गंवाने वाले वीरेंद्र सिंह और पुणे के आर.एस. यादव ने भी मुकदमा लिखाया था.

दरअसल, आर.एस. यादव कुछ ऐसे लोगों के बराबर संपर्क में थे, जो अजय को जानते थे. उन्हें गिरफ्तारी की खबर पा कर वह करनाल से आ पहुंचे थे. पुलिस ने कई राज्यों में उस की गिरफ्तारी की सूचना भेज दी है, ताकि अन्य मामले भी पकड़ में आ सकें. 27 जनवरी, 2015 को पुलिस ने अजय के एक साथी रिषी विश्नोई को भी गिरफ्तार किया है. उसी ने डेढ़ करोड़ की ठगी का शिकार हुए वीरेंद्र की मुलाकात अजय से कराई थी और ठगी के इस मामले में अहम भूमिका निभाई थी.

रिमांड अवधि खत्म होने पर पुलिस ने अजय को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस उस के शेष कारनामों की जांच के साथ ही उस के बाकी साथियों की तलाश कर रही थी. पुलिस के पास अजय की ठगी का शिकार हुए लोग पहुंच रहे थे. True Crime Story