Hindi Crime Story: गुनाह जो छिप न सका

Hindi Crime Story: पहली पत्नी की हत्या के आरोप में सजा काट चुके कपिल शर्मा ने दूसरी पत्नी पार्वती की भी हत्या कर आत्महत्या का रूप देना चाहा. पर लाख छिपाने पर भी उस का गुनाह छिप न सका.

24 मार्च, 2016 को शाम करीब 6 बजे 2 युवक एक युवती को एम्स के ट्रामा सेंटर ले कर पहुंचे. उन में से एक का नाम रामबीर और दूसरे का कपिल शर्मा था. जिस युवती को वे ट्रामा सेंटर ले कर आए थे, वह कपिल शर्मा की 27 वर्षीया पत्नी पार्वती थी. कपिल ने डाक्टरों को बताया कि पार्वती आत्महत्या के लिए गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से झूल गई थी.

आपातकालीन सेवा में तैनात डाक्टर पार्वती का परीक्षण करने लगे तो उन्हें वह मृत दिखाई दी. उस की सांसें काफी देर पहले ही बंद हो चुकी थीं और शरीर ठंडा हो चुका था. उस के गले में चारों तरफ रस्सी के बांधने का निशान था. इस के अलावा उस के हाथपैर, ठोड़ी, चेहरे, होंठ आदि पर चोट के निशान थे. उस का होंठ कटा हुआ था, जिस से खून भी निकला था. उस के पति कपिल शर्मा के भी चेहरे व अन्य जगहों पर चोट के निशान थे, जिन से खून छलक आया था. वह भी अपना इलाज करने को कह रहा था.

चोटों के बारे में कपिल ने बताया कि जब वह पत्नी को इलाज के लिए बाइक से अस्पताल ला रहा था तो महारानीबाग टी पौइंट पर एक आटोरिक्शा से एक्सीडेंट हो गया था, जिस से उसे और पत्नी को चोटें आई थीं. इस बात की पुष्टि उस के साथ आए युवक रामबीर ने भी की. पार्वती के गले के चारों तरफ जो निशान था, उस से डाक्टरों को शक हुआ, क्योंकि गले में फंदा लगा कर आत्महत्या के अधिकांश मामलों में फंदे का निशान पूरे गले पर नहीं आता. निशान करीब आधे गले तक ही आता है, इसलिए डाक्टरों ट्रामा सेंटर में मौजूद पुलिस चौकी में इस संदिग्ध केस की सूचना दे दी.

डाक्टरों की सूचना पर कांस्टेबल जगबीर पुलिस चौकी में मौजूद इमरजेंसी वार्ड में पहुंच गए. उन्होंने डाक्टरों से बात की. मृतका के गले का निशान देख कर उसे भी शक हुआ. कपिल शर्मा दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना न्यू फ्रैंड्स कालोनी के तहत तैमूर नगर में रहता था, इसलिए मामले की एमएलसी तैयार कर जगबीर ने सूचना न्यू फ्रैंड्स कालोनी थाने को दे दी. सूचना मिलने पर थाने से एसआई संतोष पाबरी, लोकेंद्र त्यागी, कांस्टेबल संदीप और कांस्टेबल कमलेश ट्रामा सेंटर के लिए निकल पड़े.

पुलिस ने सब से पहले मृतका पार्वती की लाश का मुआयना किया. इमरजेंसी वार्ड में भरती उस के पति कपिल शर्मा का इलाज चल रहा था. उस से पूछताछ की तो उस ने उन्हें वही बताया, जो पहले बताया था. पुलिस को कपिल की बातों पर शक हो रहा था. उसी बीच थानाप्रभारी कुलदीप सिंह भी ट्रामा सेंटर पहुंच गए. उन्होंने भी लाश का मुआयना कर कपिल से पूछताछ की.

कपिल शर्मा के साथ अस्पताल में मौजूद रामबीर से थानाप्रभारी ने बात की तो उस ने बताया कि कपिल के शोर मचाने पर जब वह मोहल्ले के दूसरे लोगों के साथ उस के कमरे में गया तो पार्वती बैड पर पड़ी थी और कपिल उस के पास बैठा रो रहा था. पूछने पर कपिल ने बताया था कि पार्वती गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से लटकी हुई थी. चाकू से दुपट्टा काट कर उस ने उसे उतारा था. उस समय कपिल शर्मा गहरे दुख में था, इसलिए अस्पताल से छुट्टी हो जाने के बाद ही पुलिस ने उस से पूछताछ करना जरूरी समझा. मामला आत्महत्या का है या हत्या का, यह बात पोस्टमार्टम के बाद ही साफ होनी थी. इसलिए लाश को पोस्टमार्टम के लिए एम्स की मार्च्युरी भेज दिया गया.

कुलदीप सिंह कपिल शर्मा के तैमूरनगर स्थित कमरे का मुआयना करने पहुंचे. उस का कमरा पहली मंजिल पर था. वह एक छोटा सा कमरा था, जिस में दरवाजे के दाहिनी ओर एक बैड डला था. कोने में प्लास्टिक का छोटा कूलर रखा था. पुलिस को कमरे में सामान बिखरा हुआ मिला. वहीं पर दुपट्टे के 2 टुकड़े मिले और उन टुकड़ों के पास ही चाकू पड़ा मिला. कोने में बिजली का करीब एक 2 मीटर तार का टुकड़ा भी मिला. बिजली का स्विच बोर्ड भी टूटा हुआ मिला. कमरे के जिस पंखे से लटक कर फांसी लगाने की बात कही गई, उन्होंने उस पंखे का भी निरीक्षण किया. वह पंखा एकदम सहीसलामत था. उस पंखे पर धूल जमी थी.

थानाप्रभारी ने जांच के लिए फोरैंसिक विभाग के फिजिकल डिवीजन की एक्सपर्ट टीम और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया.  दोनों टीमों ने घटनास्थल पर पहुंच कर जांच की और सबूत जुटाए. जिस दुपट्टे से कपिल ने फांसी लगाने की बात की थी, फोरैंसिक टीम ने दुपट्टे के उन दोनों टुकड़ों की जांच की. पता चला कि वह दुपट्टा इतना छोटा था कि उस से गले और पंखे में गांठें नहीं बंध सकती थीं. अब तक जो भी जांच हुई, उस से पार्वती के आत्महत्या करने की कहानी झूठी लग रही थी. कुल मिला कर शक की सूई उस के पति कपिल शर्मा पर ही जा रही थी. अगले दिन पुलिस को पार्वती की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली, उस में बताया गया था कि उस की मौत फांसी लगा कर नहीं, बल्कि मुंह व नाक दबा कर की गई थी.

इतना ही नहीं, उस के शरीर पर चोटों के 26 निशान भी पाए गए थे. पुलिस का शक सही निकला. कपिल भी ट्रामा सेंटर से डिस्चार्ज हो चुका था. वह कहीं भाग न जाए, इसलिए पार्वती के अंतिम संस्कार के समय पुलिस मौजूद रही. पत्नी का क्रियाकर्म करने के बाद पुलिस ने 26 मार्च को थाने बुला कर कपिल शर्मा से पूछताछ की. अपना वही पुराना राग अलापता रहा कि पार्वती ने खुदकुशी की है. लेकिन पुलिस के पास इतने सबूत थे कि उन के आगे वह टिक नहीं सका.

कपिल शर्मा को लगा कि वह अपने बुने जाल में फंस चुका है तो उस ने सच बोलना ही उचित समझा. वह बोला, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही गुस्से में पार्वती की हत्या की थी. लेकिन यह सब अचानक हो गया था.’’

इस के बाद उस ने पार्वती की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

32 वर्षीय कपिल शर्मा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर का रहने वाला था. हाईस्कूल पास करने के बाद वह आगे की पढ़ाई नहीं कर सका तो पिता के साथ खेती के काम में लग गया. कपिल दबंग किस्म का था. छोटीछोटी बातों पर वह मोहल्ले में लोगों से झगड़ बैठता था. उस की इस आदत से घर वाले भी परेशान थे. वह उसे समझासमझा कर हार चुके थे, पर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता था. तब पिता ने यह सोच कर उस की शादी कर दी कि शायद घरगृहस्थी में बंधने के बाद वह सुधर जाए. लेकिन शादी के बाद भी कपिल के स्वभाव में कोई फर्क नहीं आया बल्कि शादी के कुछ दिनों बाद ही उस का अपनी पत्नी से भी झगड़ा रहने लगा. दोनों के बीच की दूरियां बढ़ने लगीं. हालात यहां तक पहुंच गए कि उस ने शादी के डेढ़-दो साल बाद ही पत्नी को जला कर मार दिया. यह सन 2004 की बात है.

कपिल ने इस मामले को भी आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की थी, पर ससुराल वालों के रिपोर्ट करने के बाद कपिल को जेल जाना पड़ा. कोर्ट में केस चला, जिस में उस का दोष सिद्ध हो गया और उसे 7 साल की सजा हुई. जेल के नियम और कानूनों का सही से पालन करने की वजह से उसे साढ़े 4 साल बाद ही रिहाई मिल गई. जेल से छूटने के बाद कपिल अपने एक दोस्त के साथ काम की तलाश में दिल्ली चला आया. उस का दोस्त दिल्ली के एक निजी अस्पताल में नौकरी करता था. दोस्त कपिल के लिए भी नौकरी ढूंढने लगा, लेकिन उस समय उसे नौकरी नहीं मिली.

उसी दौरान हजरत निजामुद्दीन क्षेत्र के एक पुरुष मरीज की देखभाल के लिए एक नर्सिंग अटेंडेंट की जरूरत थी. कपिल को कोई काम नहीं मिल रहा था तो वह यह काम करने को तैयार हो गया. कपिल अस्पताल की ओर से उस मरीज की देखभाल करने के लिए हजरत निजामुद्दीन चला गया. रहने के लिए उसे उसी कोठी में एक कमरा भी मिल गया था. उसी कोठी में पार्वती नाम की एक युवती खाना बनाने आती थी. 21 साल की पार्वती मूलरूप से नेपाल की थी. वह शादीशुदा थी. उस के 2 बच्चे भी थे.

पार्वती भी तेजतर्रार थी, पति से उस की नहीं बनती थी. कुछ दिनों पहले ही वह गुस्से में पति को छोड़ कर दिल्ली चली आई थी. दोनों बच्चों को भी वह पति के पास ही छोड़ आई थी. दिल्ली आ कर वह कोठियों में खाना बनाने का काम करने लगी थी. कपिल और पार्वती एक ही जगह काम करते थे, इसलिए उन की दोस्ती हो गई थी. चूंकि कोठी में दोनों साथसाथ रहते थे, इसलिए उन की नजदीकियां बढ़ती गईं. फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए.

इस के बाद उन्होंने एक मंदिर में शादी कर ली. शादी के बाद वे दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना न्यू फ्रैंड्स कालोनी के तहत तैमूरनगर में किराए का कमरा ले कर रहने लगे. यह बात सन 2011 की है. कपिल और पार्वती दोनों ही कमा रहे थे, इसलिए उन के सामने कोई आर्थिक परेशानी नहीं थी, पर एक चिंता उन्हें सताए जा रही थी कि कई साल बाद भी उन के कोई बच्चा नहीं हुआ. पार्वती को कई बार गर्भ ठहरा भी, लेकिन 1-2 महीने बाद ही किसी वजह से गर्भपात हो जाता था.

बारबार गर्भ गिरने से पार्वती को तो दुख होता ही था, कपिल भी परेशान रहने लगा. इस के लिए वह हर बार पत्नी पार्वती को ही दोषी मानता था. कपिल ने शराब भी पीनी शुरू कर दी थी. नशे में धुत हो कर घर लौटना जैसे उस की आदत हो चुकी थी. पार्वती उसे ज्यादा शराब पीने को मना करती तो वह उस से झगड़ा करने लगता. कभीकभार बात बढ़ने पर वह उस की पिटाई भी कर देता. इसी दौरान हजरत निजामुद्दीन के बाद कपिल को पीतमपुरा में किसी मरीज की देखभाल करने का काम मिल गया. वह वहां अपनी मोटरसाइकिल से आताजाता था. जब कपिल पिता नहीं बन सका तो सोचने लगा कि पार्वती के अंदर ही कोई कमी है, जिस की वजह से उस के गर्भ में बच्चा नहीं रुक रहा.

कपिल ने पार्वती को छोड़ने की धमकी दी तो वह उस के सामने गिड़गिड़ाई, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए अपने पति और बच्चों तक को छोड़ दिया और तुम इस तरह की बात कर रहे हो. बताओ, ऐसे में मैं कहां जाऊंगी.’’

‘‘तुम भाड़ में जाओ. ऐसी औरत का क्या फायदा, जो बच्चा तक न दे सके.’’ कपिल ने गुस्से में कहा.

‘‘यह कोई मेरे हाथ में तो है नहीं, जब इलाज के बाद भी बच्चा नहीं रुक रहा तो मैं क्या करूं.’’ वह बोली.

‘‘अब तू एक ही शर्त पर यहां रहेगी. मैं चाहे कुछ भी करूं, तू मेरे काम में दखल नहीं देगी.’’ कपिल ने फरमान सुनाया.

पार्वती की मजबूरी थी. उस ने भी कह दिया कि वह अब उस से कुछ नहीं कहेगी. इस के बाद कपिल घर कितने बजे लौटता, वह कहां जाता, पार्वती इस बारे में उस से कुछ नहीं पूछती. बस वह उसे समय पर खाना बना कर दे देती थी. लेकिन इसी साल मार्च के महीने में कपिल को जब पता चला कि पत्नी को फिर से गर्भ ठहर गया है तो वह खुश हुआ. उस के मन में फिर से उम्मीद की किरण जाग उठी. उस ने पत्नी के प्रति अपना व्यवहार बदल दिया. वह उस के साथ प्यार से पेश आने लगा. इतना ही नहीं, वह उस के खानपान का भी ध्यान रखने लगा.

लेकिन होली से 2-3 दिन पहले अचानक फिर से गर्भपात हो गया. यह उन दोनों के लिए बड़े दुख की बात थी. इस के बाद कपिल की तो जैसे उम्मीद ही टूट गई. होली के अगले दिन धुलेंदी थी. उस दिन बहुत से लोग रंग में सराबोर और नशे में चूर होते हैं. कपिल उस दिन अपने काम से दोपहर बाद ढाई बजे घर लौट आया था. उस समय भी वह शराब पीए हुए था और शराब की एक बोतल अपने साथ लाया था. कमरे में आते ही वह पत्नी के साथ गालीगलौज करने लगा. पार्वती पहले तो सब बरदाश्त करती रही, जब बातें बरदाश्त से बाहर हुईं तो उस ने जवाब देने शुरू कर दिए.

पार्वती का बोलना ही था कि कपिल का गुस्सा उस पर फूट पड़ा. उस ने उस की लातघूंसों से पिटाई शुरू कर दी. इतना ही नहीं, गुस्से में तमतमाए कपिल ने अपने हाथों से उस की नाक और मुंह दबा कर हत्या कर दी. पत्नी के मर जाने के बाद कपिल का नशा उतर गया. अब उसे पुलिस द्वारा पकड़े जाने का डर था. पुलिस से बचने का वह उपाय सोचने लगा. तभी उस के दिमाग में आया कि यदि वह इस हत्या को आत्महत्या का रूप दे देगा तो वह आसानी से बच सकता है.

आत्महत्या का केस दिखाने के लिए उस ने कमरे में पड़े बिजली के तार को पत्नी की गरदन में डाल कर दोनों हाथों से कस दिया, जिस से उस के गले पर निशान पड़ जाएं. फिर पत्नी के एक दुपट्टे को चाकू से काट कर उसे लाश के पास ही डाल दिया. यह काम करने के बाद वह कमरे का दरवाजा भिड़ा कर हाथ में शराब की बोतल लिए पहली मंजिल से नीचे उतर आया. नीचे कुछ दोस्त मिले तो उन के साथ बैठ कर उस ने शराब पी. 2 पैग पी कर वह दोस्तों के बीच से उठ कर पास में स्थित पान की दुकान पर गया. वहां से पान खाते हुए वह सीधे अपने कमरे पर चला गया.

कमरे में घुसते ही उस ने योजनानुसार शोर मचाना शुरू कर दिया. शोर सुन कर आसपड़ोस के लोग उस के यहां इकट्ठा हुए तो उस ने उन्हें बताया कि पत्नी गले में दुपट्टे का फंदा बना कर पंखे से झूल गई. बड़ी मुश्किल से उस ने चाकू से दुपट्टा काट कर उसे उतारा है. उस समय पार्वती के शरीर में गरमाहट थी. लोगों के कहने पर वह अपने दोस्त रामबीर के साथ पत्नी को एम्स के ट्रामा सेंटर ले गया.

मोटरसाइकिल रामबीर चला रहा था. महारानी बाग के पास उस की बाइक एक औटोरिक्शा से भिड़ गई. रामबीर तो किसी तरह संभल गया, लेकिन कपिल और उस की मृत पत्नी को चोटें आईं. उसी दौरान औटोरिक्शा वाला वहां से भाग गया. जैसे ही वह ट्रामा सेंटर में पार्वती को ले कर पहुंचे, डाक्टरों ने उस के गले पर लगे निशान से ही पहचान लिया कि यह केस आत्महत्या का नहीं हो सकता. कपिल शर्मा से पूछताछ के बाद पुलिस ने 26 मार्च को उसे कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में जरूर सबूत जुटा कर उन्होंने उसे फिर से न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मामले की विवेचना थानाप्रभारी कुलदीप सिंह कर रहे हैं.

पहली पत्नी की हत्या के आरोप में सजा काट चुके कपिल शर्मा को एहसास होना चाहिए था कि जुर्म चाहे कितने भी शातिराना तरीके से किया जाए, वह उजागर हो ही जाता है. पार्वती से शादी करने के बाद उसे फिर से अपनी बाकी की जिंदगी हंसीखुशी से बिताने का मौका मिला था, लेकिन उस की जिद और नासमझी ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा. यदि पार्वती के गर्भ में बच्चा नहीं ठहर रहा था तो उसे किसी अच्छे डाक्टर से इलाज कराना चाहिए था. बहरहाल, कपिल शर्मा के असंयमित काम की वजह से पार्वती को तो अपनी जान से हाथ धोना ही पड़ा, वह खुद भी सलाखों के पीछे पहुंच गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Mumbai Crime: गले की फांस

Mumbai Crime: सबीना से संबंध बनाते समय नसीम ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह उस के गले की फांस बन जाएगी. जिस डर से उस ने उस फांस को निकालना चाहा, आखिर में वही हुआ.

शब्बीर खान के परिवार में पत्नी जन्नतुनिशां के अलावा 26 साल की विवाहिता बेटी सबीना कौसर और 2 साल की नातिन जिया थी. पति से तलाक होने के बाद सबीना बेटी के साथ मांबाप के साथ ही रह रही थी. शब्बीर खान अपने इस छोटे से परिवार के साथ मुंबई के उपनगर कुर्ला वेस्ट, संजय नगर, चांदतारा पुलिस चौकी के पास स्थित चाल नंबर डी-6 के रूम नंबर 6 में रहते थे. उन का अपना खुद का छोटा सा व्यवसाय था.

14 जनवरी, 2016 की शाम के यही कोई 6 बजे जब जन्नतुनिशां घर के कामों में व्यस्त थीं, तभी सबीना मजार पर जाने की बात कह कर घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. वह लगभग रोजाना शाम को मजार पर जाती थी, इसलिए उस दिन भी जब उस ने मजार पर जाने की बात कही तो जन्नतुनिशां ने इजाजत दे दी थी. रोजाना सबीना मजार से जल्दी ही लौट आती थी, लेकिन उस दिन जब उसे लौटने में देर होने लगी तो जन्नतुनिशां को थोड़ा चिंता हुई. सबीना की बेटी जिया भी बारबार मम्मी को पूछ रही थी. थोड़ी देर तक तो जन्नतुनिशां को लगा कि सबीना किसी परिचित के यहां चली गई होगी, लेकिन जब समय ज्यादा होने लगा तो उन्हें चिंता होने लगी.

शब्बीर खान के आने पर सबीना की खोज शुरू हुई. पहले आसपड़ोस वालों से, उस के बाद जानपहचान तथा नातेरिश्तेदारों से पता किया गया. जब सबीना के बारे मे कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो पतिपत्नी घबरा गए. सबीना की बेटी ऊपर से परेशान किए थी. शब्बीर खान और जन्नतुनिशां को जब कोई राह नहीं सूझी तो सवेरा होते ही उन्होंने थाने का रुख किया. थाना घाटकोपर में उन्होंने सबीना की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होते ही पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी. लेकिन कोई सूत्र हाथ न लगने से पुलिस भी उस के बारे में कुछ पता नहीं कर सकी. बेटी के बारे में पता न चलने से शब्बीर खान और जन्नतुनिशां की चिंता और परेशानी बढ़ती जा रही थी.

शब्बीर खान लगभग रोज ही थाने जाते थे, लेकिन वहां उन्हें निराशा के अलावा कुछ नहीं मिलता. इसी तरह 15 दिन बीत गए, लेकिन सबीना के बारे में कुछ पता नहीं चला. अब शब्बीर खान और जन्नतुनिशां के मन में किसी अनहोनी की आशंका होने लगी थी. उसी बीच मुंबई सायन अटौप हिल क्राइम ब्रांच यूनिट-4 के हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे को उन के किसी मुखबिर ने बताया कि एक आदमी किसी महिला की हत्या कर के उस के सारे गहने मुंबई में बेचने की कोशिश कर रहा है.

गंगाधर पिलवटे ने यह बात सीनियर इंसपेक्टर अशोक जाधव को बताई तो उन्होंने इंसपेक्टर सुनील जाधव के नेतृत्व में एसआई प्रदीप गायकवाड, अरुण जाधव, हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे, सुभाष बागुल, दीपक मांढरे, संभाजी सांलुके, प्रताप चौहाण की एक टीम बना कर उस आदमी पर नजर रखने के लिए लगा दिया, साथ ही इस  बात की जानकारी अधिकारियों को भी दे दी. जहांजहां मुखबिर द्वारा बताए आदमी के मिलने की संभावना थी, गंगाधर पिलवटे अपने साथियों के साथ वहांवहां नजर रखने लगे. कुर्ला, विद्याविहार, माटुंगा रेलवे स्टेशनों के साथसाथ धारावी बस्ती पर उन की खास नजर थी. लेकिन कई दिनों की अथक मेहनत के बाद भी मुखबिर द्वारा बताया गया वह आदमी उन की नजर में नहीं आया.

हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे निराश होने लगे थे कि 2 फरवरी, 2016 की दोपहर को मुखबिर के इशारे पर उन्होंने क्रीम रंग की शर्ट और खाकी रंग की पैंट पहने एक आदमी को सायन धारावी की बस्ती की ओर जाते हुए पकड़ लिया. पूछने पर उस ने अपना नाम नसीम खान बताया. उस समय वह भोपाल से आ रहा था. पुलिस टीम ने कुछ लोगों की उपस्थिति में नसीम खान की तलाशी ली तो उस के बैग से ट्रेन की 2 टिकटों के अलावा मैरून रंग के 2 डिब्बे मिले, जिन में से एक डिब्बे में प्लास्टिक की एक थैली में चांदी के कुछ गहने थे तो दूसरे डिब्बे में सोने के 2 हार, कर्णफूल, एक अंगूठी, कान की बालियां, नाक की लौंग थी, जिन की कीमत करीब 3 लाख रुपए थी. पुलिस ने औपचारिक काररवाई कर के सारा सामान अपने कब्जे में ले लिया.

इस के बाद नसीम को क्राइम ब्रांच के औफिस लाया गया, जहां पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में उस से पूछताछ शुरू हुई. इस पूछताछ में उस ने बताया कि ये सारे गहने उस की पत्नी के हैं, जिन्हें बेच कर वह गांव में अपना एक दवाखाना खोलना चाहता है. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि वह इन गहनों को गांव में भी तो बेच सकता था, मुंबई आने की क्या जरूरत थी? पुलिस के इस सवाल का वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका.

इस के बाद पुलिस ने जब उस से इसी तरह के कई और सवाल किए तो घबरा कर उस ने सच्चाई उगल दी. उस ने कहा, ‘‘साहब, ये गहने जिस औरत के हैं, उस की मैं ने हत्या कर दी है.’’

‘‘कहां की है हत्या?’’

‘‘साहब, गांव में.’’

‘‘हत्या गांव में की है और गहने यहां बेचने चला आया?’’ अशोक जाधव ने हैरानी से पूछा.

‘‘साहब, वह औरत यहीं मुंबई में रहती थी. मैं भी यहीं रहता था.’’ नसीम ने कहा.

‘‘क्या नाम था उस का, मुंबई में वह कहां रहती थी?’’

‘‘उस का नाम सबीना कौसर था. मुंबई में वह कुर्ला वेस्ट में रहती थी.’’

‘‘चलो, अच्छा पूरी कहानी विस्तार से बताओ?’’ अशोक जाधव ने कहा.

इस के बाद नसीम खान ने सबीना से प्रेम, उस की हत्या और मुंबई आ कर गहने बेचने की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

38 वर्षीय नसीम खान उर्फ वैद्यराज मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर की थानातहसील ललौली का रहने वाला था. उस के पिता सुलेमान खान मुंबई के सायन धारावी की बस्ती पुट्टागली में रहते थे. वह खटाऊ मिल्स का कबाड़ खरीद कर बाहर बेचते थे. उन की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं थी, लेकिन खराब भी नहीं थी. नसीम का एक भाई था शरीफ खान, जो पिता के साथ रह कर उन के व्यवसाय में हाथ बंटाता था.

नसीम खान की शादी हो चुकी थी. उस की 3 बेटियां और एक बेटा था. सुलेमान की गांव में खेती की कुछ जमीन थी, जिसे नसीम खान ही संभालता था. जब दोनों भाइयों में बंटवारा हुआ तो मुंबई की सारी प्रौपर्टी और कारोबार उस के छोटे भाई शरीफ खान को मिला तो गांव की सारी प्रौपर्टी नसीम खान के हिस्से में आई. नसीम खान ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं था, लेकिन दिमाग का काफी तेज था. वह गांव की जमीन पर खेती तो करवाता ही था, इस के अलावा आयुर्वेदिक दवाओं से इलाज भी करता था. अपनी दवाओं से वह गुप्तरोगों को पूरी तरह से ठीक करने का दावा करता था. इसीलिए गांव में वह वैद्यराज के नाम से मशहूर था.

उस के यहां सैक्स रोग, बवासीर, शुगर और लैंगिक कमजोरी के मरीज आते थे. इन मरीजों को उस की दवा से कितना फायदा होता था, यह तो नहीं मालूम, लेकिन नसीम खान को इन मरीजों से अच्छाखासा फायदा हो रहा था. गांव में तो नसीम खान का यह आयुर्वेदिक दवाखाना चल ही रहा था, खाली समय में वह मुंबई, दिल्ली, इंदौर, कोलकाता और भोपाल जैसे महानगरों के भी चक्कर लगा लेता था. कुछ दिनों में ही वह इन शहरों से अच्छी कमाई कर के लौट आता था. लेकिन इन शहरों में से वह सब से ठीक मुंबई को समझता था. इस की वजह यह थी कि यह महानगर उस का जानासमझा था. यहां उस का एक भाई भी रहता था, इसलिए वहां उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होती थी. यहां उस के ग्राहकों की भी संख्या बहुत थी.

सबीना के पिता शब्बीर खान भी उसी गांव के रहने वाले थे, जिस गांव का नसीम था. शब्बीर खान के बड़े भाई गांव में ही रहते थे, इसलिए वह गांव आतेजाते रहते थे. यही वजह थी कि जब उन की बेटी सबीना शादी लायक हुई तो उन्होंने उस का निकाह गांव में ही अपने एक रिश्तेदार के बेटे से कर दिया था. लेकिन सबीना उस के साथ अधिक दिनों तक रह नहीं सकी. ससुराल वालों के अत्याचारों से तंग आ कर उस ने पति से तलाक ले लिया और मुंबई आ कर मातापिता के साथ रहने लगी. कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा, लेकिन समय के साथ शब्बीर खान और उन की पत्नी जन्नतुनिशां को बेटी की चिंता सताने लगी.

आखिर जवान बेटी को वह कब तक घर में बैठाए रखते. फिर अभी उस की उम्र ही क्या थी. पूरी जिंदगी तो वे बैठे नहीं रहते, यही सोच कर उन्होंने कौशर खान के साथ उस का दूसरा निकाह कर दिया. लेकिन दुर्भाग्य ने यहां भी सबीना का साथ नहीं छोड़ा. बेटी जिया के पैदा होने के बाद कौसर खान का व्यवहार उस के प्रति बदल गया. वह सबीना से मायके से रुपए मांग कर लाने को कहता. मांबाप की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सबीना पैसे मांग कर लाने से मना करती तो वह मारतापीटता. कईकई दिनों तक खानापानी न देता. परेशान और दुखी हो कर सबीना बेटी को ले कर मांबाप के घर आ गई और ससुराल जाने से साफ मना कर दिया. तब से वह मांबाप के साथ ही रह रही थी.

नसीम खान और शब्बीर खान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए कभीकभार जब नसीम खान उधर से गुरजता तो शब्बीर खान से मिलने उस के घर चला जाता था. पति का घर छोड़ कर आने के बाद सबीना मर्द सुख से वंचित थी, इसलिए घर आनेजाने में नसीम खान उसे भा गया. स्वस्थ, सुंदर, हट्टेकट्टे नसीम को देख कर सबीना की कोमल भावनाएं जाग उठीं. उस का मन नसीम की नजदीकी के लिए मचल उठा. इस के बाद नसीम खान जब भी शब्बीर के घर आता, सबीना की नजरें उसी पर जमी रहतीं.

शुरूशुरू में तो नसीम ने सबीना की ओर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब उस ने सबीना की नजरों के भाव को समझा तो उस के नजदीक जाने से खुद को रोक नहीं सका. सबीना भी सुंदर और आकर्षक थी. 2 शादियों और एक बच्चे की मां होने के बाद भी उस में किसी भी पुरुष को आकर्षित करने की क्षमता थी. नसीम खान को सबीना की उतनी जरूरत नहीं थी, जितनी सबीना को उस की थी. इस की वजह यह थी कि नसीम खान महीने, 2 महीने में गांव जाता रहता था, जहां उस की पत्नी रहती थी. जबकि सबीना जब से पति से अलग हुई थी, उसे पुरुष का साथ नहीं मिला था. शायद यही वजह थी कि नसीम खान के आते ही वह उस के आगेपीछे घूमने लगती थी.

सबीना की इस मूक चाहत के आगे आखिर नसीम खान का ईमान डिग गया. वह भी सबीना की नजदीकियां पाने के लिए बेचैन हो उठा. नतीजा यह निकला कि जल्दी ही दोनों करीब आ गए. एक बार मर्यादा टूटी तो सिलसिला बन गया. कुछ दिनों तक तो नसीम और सबीना के ये संबंध छिपो रहे, लेकिन कुछ दिनों बाद पहले आसपड़ोस वालों को, उस के बाद मातापिता को बेटी के इस संबंध की जानकारी हो गई. कोई कुछ कह न सके, इस के लिए सबीना ने मातापिता और पड़ोसियों को यह कह कर चुप करा दिया कि नसीम से वह अपने किसी गुप्त रोग का इलाज करा रही है.

नसीम खान के संपर्क में आने के बाद जहां सबीना का उदास चेहरा खिल उठा था, वहीं नसीम खान का खिला चेहरा उदास रहने लगा था. इस की वजह यह थी कि नसीम खान अब इस अनैतिक संबंध को ढोना नहीं चाहता था. क्योंकि उसे लगता था कि जिस दिन सबीना और उस के संबंधों की जानकारी गांव में रह रही उस की पत्नी और बच्चों को हुई, वह कहीं का नहीं रहेगा. इस से सबीना का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन उस की गृहस्थी में जरूर आग लग सकती है.

इसी बात से डर कर वह सबीना से दूरी बनाने लगा. घरपरिवार और समाज के डर से नसीम खान ने खुद पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया, लेकिन सबीना उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी. नसीम खान को आने में ज्यादा दिन होने लगता तो वह कहीं भी होता, सबीना उसे फोन करकर के परेशान कर देती. मजबूरन उसे सबीना से मिलने आना पड़ता. वह उसे समझाता भी, लेकिन उस के समझाने का सबीना पर कोई असर नहीं पड़ता. अब तो वह उस के साथ  रहने की जिद करने लगी थी. जबकि नसीम खान के लिए यह संभव नहीं था.

जब सबीना हाथ धो कर नसीम खान के पीछे पड़ गई तो मजबूरन वह उसे गांव ले जा कर उस से किसी भी तरह पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगा, क्योंकि अब वह उस के गले की फांस बन गई थी. 14 जनवरी, 2016 को नसीम खान को गांव जाना था. जब इस बात की जानकारी सबीना को हुई तो वह भी उस के साथ जाने को तैयार हो गई. उस ने बेटी जिया को मां के पास छोड़ा और मसजिद जाने के बहाने घर से निकल कर नसीम खान के पास पहुंच गई. नसीम उसे जीप से नासिक रेलवे स्टेशन पर ले आया और वहां से कानपुर जाने वाली ट्रेन पकड़ कर कानपुर पहुंच गया. कानपुर से उस ने बस पकड़ी और रात 10 बजे ललौली स्थित अपने घर पहुंच गया.

सर्दी के दिन थे, इसलिए रात 10 बजे गांव में सन्नाटा पसरा था. इस स्थिति में नसीम खान सबीना को अपने घर ले जाने के बजाय उसे उस के चाचा के घर ले गया. वहां नसीम खान ने ही नहीं, उस के चाचाचाची ने भी सबीना को समझाया कि वह उस का पीछा छोड़ दे और मुंबई जा कर अपनी बेटी की देखभाल करे. लेकिन नसीम खान के प्यार में पागल सबीना ने किसी की कोई बात नहीं मानी. इस पर उस की अपने चाचाचाची से भी कहासुनी हो गई. कहासुनी में ही बात हाथापाई तक पहुंच गई तो सबीना का सिर दीवार से कुछ इस तरह टकराया कि वह बेहोश हो कर जमीन पर गिरी तो उसे होश नहीं आया.

इस से सभी घबरा गए. अब क्या किया जाए, इस बारे में सोचा जाने लगा. जब किसी की समझ में कुछ नहीं आया तो उन्होंने सबीना के प्रति एक क्रूर फैसला ले लिया. नसीम खान रसोई से छुरी उठा लाया और बेहोश पड़ी सबीना की गला काट कर हत्या कर दी. उस ने सिर को एक प्लास्टिक की थैली में भर कर उसे पत्थरों के साथ गांव के बाहर स्थित तालाब में फेंक दिया, जबकि धड़ को एक बोरी में भर कर दूसरे मोहल्ले में फेंक आया. उसे लगता था कि बिना सिर के कोई उस की पहचान नहीं कर सकेगा.

सबीना मुंबई से अपने साथ जो गहने, कपड़े ले गई थी, नसीम खान ने उन्हें अपने पास रख लिया. इस तरह सबीना से पीछा छुड़ा कर नसीम खान अपने घर चला गया.mसुबह जब वह सो कर उठा तो गांव में हड़कंप मचा था. गांव के चौकीदार ने धड़ मिलने की सूचना थाना पुलिस को दी तो इंसपेक्टर मनोज कुमार तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल की काररवाई कर के उन्होंने धड़ को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. चूंकि धड़ की शिनाख्त नहीं हो सकी थी, इसलिए मनोज कुमार की जांच आगे नहीं बढ़ रही थी. फिर भी वह मामले की जांच में लगे थे. मामले में पुलिस की सक्रियता देख कर नसीम खान ने गांव में रुकना उचित नहीं समझा और सबीना के गहने ले कर भोपाल चला गया.

भोपाल में एक सप्ताह रह कर वह गहने बेचने के लिए मुंबई चला गया. वह अपने मकसद में कामयाब हो पाता, उस के पहले ही क्राइमब्रांच यूनिट-4 के एक मुखबिर को उस के इरादे की भनक लग गई और उस ने उसे गिरफ्तार करा लिया. पूछताछ के बार जांच अधिकारी सुनील जाधव ने नसीम खान के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर फतेहपुर के थाना ललौली पुलिस को उस के पकड़े जाने की सूचना दे दी. थाना ललौली पुलिस उसे पूछताछ के लिए ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ फतेहपुर ले गई. कथा लिखे जाने तक वह ललौली पुलिस की हिरासत में था. आगे की जांच इंसपेक्टर मनोज कुमार कर रहे थे. Mumbai Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime Story: बीवी का तोहफा

Love Crime Story: शाहिद से प्यार करने वाली तरन्नुम की शादी भले ही अलाउद्दीन से हो गई थी, लेकिन उस ने उसे मन से शौहर नहीं माना था. तभी तो जब प्रेमी ने उस से पूछा कि वह वैलेंटाइन डे पर क्या तोहफा लेगी तो उस ने शौहर का सिर मांग लिया…

17 जनवरी, 2016 को रविवार था. हनीफ खां के लिए यह दिन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था. क्योंकि उस दिन उन की जिंदगी की ख्वाहिश पूरी होने जा रही थी. उन का एक ही सपना था कि उन के जीवित रहते उन के बेटे अलाउद्दीन की शादी हो जाए. अलाउद्दीन से बड़े उन के तीनों बेटों शफरुद्दीन, जाकिर व भूरे खां की शादियां हो चुकी थीं और वे बालबच्चेदार भी थे. जिला अलीगढ़, थाना कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला भुजपुरा के नए बसे इब्राहिमनगर में हनीफ खां का पूरा परिवार संयुक्त रूप से एक ही मकान में रहता था.

अलाउद्दीन 20 साल का हो चुका था. हनीफ खां ने उस का रिश्ता अलीगढ़ के ही थाना सिविललाइंस के मोहल्ला हमदर्दनगर, जमालपुर निवासी अलाउद्दीन उर्फ पप्पू की बेटी तरन्नुम से तय कर दिया था. शादी की तारीख भी निश्चित हो गई थी 17 जनवरी 2016. अंतत: हनीफ खां का सपना पूरा हो गया था. 17 जनवरी, 2016 को उन का बेटा तरन्नुम से निकाह कर के उसे घर ले आया था. अलाउद्दीन खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था.

तरन्नुम 3 दिनों तक ससुराल में रही. चौथे दिन उसे मायके वाले विदा करा कर ले गए. 10 दिनों बाद अलाउद्दीन ससुराल जा कर अपनी पत्नी को ले आया. लेलिन इस के चौथे दिन ही तरन्नुम की जिद पर अलाउद्दीन को उसे उस के मायके छोड़ कर आना पड़ा. अलाउद्दीन कोई बच्चा तो था नहीं, पति के पास रहने के बजाय तरन्नुम के इस तरह मांबाप के घर जाने की जिद ने उस के मन में शक का बीज बो दिया था. जब शक की सुई घूमी तो उस की आंखों के सामने पहली रात से ले कर अब तक का सारा घटनाक्रम घूम गया.

तरन्नुम ने उसे अपने बदन को छूने तक नहीं दिया था. कभी सिर दर्द का बहना तो कभी कुछ और. उसे अपनी भाभी की बात भी याद आई. भाभी ने उसे बताया था कि तरन्नुम उस की गैरमौजूदगी में मोबाइल पर किसी से लंबीलंबी बातें करती है. जब दिमाग में इधरउधर की बातें आईं तो अलाउद्दीन मोटरसाइकिल से ससुराल जा पहुंचा और अम्मी की तबीयत खराब होने का बहाना बना कर बीवी को घर ले आया. ससुराल आने के दूसरे दिन जब तरन्नुम नहाने के लिए बाथरूम जाने लगी तो अलाउद्दीन ने उस से कहा कि वह एक जरूरी काम से बाहर जा रहा है. तरन्नुम जब बाथरूम में घुसी तो अलाउद्दीन धीरे से पलंग के नीचे घुस गया.

तरन्नुम नहा कर बाहर आई तो कमरा खाली था. मौका अच्छा था, वह बालों को तौलिए में लपेट कर बैठ गई और मोबाइल पर बातें करने लगी. अलाउद्दीन सारी बातें सुन रहा था. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो वह पलंग के नीचे से बाहर निकला और मोबाइल छीन कर बोला, ‘‘किस से बातें कर रही थी? क्या नाम है तेरे आशिक का?’’

‘‘जब सब कुछ सुन ही लिया है तो फिर पूछ क्यों रहे हो? यह पूछो कि मेरा उस से संबंध क्या है?’’ तरन्नुम ने बेशर्मी से कहा.

‘‘अगर तुम्हारे किसी और से संबंध थे तो उसी से शादी कर लेती. मेरी जिंदगी को नरक बनाने की क्या जरूरत थी?’’ अलाउद्दीन ने गुस्से में कहा.

तरन्नुम ने पलटवार करते हुए कहा, ‘‘चलो अच्छा ही हुआ, आप ने हमारी बातें सुन लीं. अगर थोड़ी देर और नीचे लेटे रहते तो आप को यह भी पता चल जाता कि मैं ने उसे यह कहने के लिए फोन किया था कि अब वह मुझे भूल जाए, क्योंकि मैं किसी और की बीवी बन चुकी हूं.’’

‘‘बीवी बनने की बात तो कहने वाली थीं, लेकिन आज तक तुम ने बीवी का कौन सा संबंध निभाया है?’’ अलाउद्दीन ने तीखे स्वर में पूछा.

‘‘जब तबीयत ही ठीक नहीं थी तो कैसे संबंध निभाती.’’ कहते हुए तरन्नुम ने अलाउद्दीन को पकड़ कर पलंग पर लिटा दिया और उस के सीने पर सिर रख कर बोली, ‘‘मुझ से अनजाने में जो भी गलती हुई, वह मेरी भूल थी. लेकिन अब मैं नादान नहीं हूं. मैं जानती हूं कि मैं आप की बीवी हूं. आप के खानदान की इज्जत हूं, माफ कर दो मुझे.’’

एक तो नईनई शादी थी, दूसरे पत्नी का पहला सान्निध्य. फलस्वरूप अलाउद्दीन तरन्नुम के त्रियाचरित्र को समझ नहीं पाया. इसे पत्नी की नादानी समझ कर उसे माफ कर दिया और सीने से लगा लिया. 2 दिनों तक तरन्नुम रातदिन अलाउद्दीन से बेल की तरह लिपटीचिपटी रही. उस ने अलाउद्दीन को वह सब भूलने को मजबूर कर दिया, जो वह उस के बारे में सोचता था. तरन्नुम उसे पूरी तरह समर्पित हो गई. तीसरे दिन तरन्नुम की मां का फोन आया तो अलाउद्दीन ने ही बातें कीं. बात करने के बाद उस ने तरन्नुम से कहा, ‘‘तैयार हो जाओ, तुम्हारी अम्मी ने हमें दावत पर बुलाया है.’’

‘‘मेरा मन नहीं है, अब वहां जाने का. तुम साथ हो तो मेरे लिए दावत कोई अहमियत नहीं रखती.’’ तरन्नुम उस के गले में बाहें डाल कर बोली.

‘‘मैं ने अम्मी से कह दिया है, जाओ जल्दी तैयार हो जाओ.’’

तरन्नुम ने दिखाने के लिए भले ही कुछ भी कहा हो, पर वह मन ही मन खुश थी. अलाउद्दीन के कहने पर वह तैयार हो गई. थोड़ी देर बाद दोनों बाइक से जमालपुर के लिए रवाना हो गए. मायके जा कर तरन्नुम ने अपनी मां से कह दिया कि उसे 2-4 दिन के लिए रोक ले. उस की तबीयत ठीक नहीं है. दावत खाने के बाद जब अलाउद्दीन चलने को हुआ तो सास ने उस से मनुहार कर के कहा कि तरन्नुम को 4-5 दिनों के लिए वहीं छोड़ दे. फलस्वरूप अलाउद्दीन को बात माननी पड़ी. वह अकेला ही घर लौट आया.

दूसरे दिन सुबह जब तरन्नुम चाय बना रही थी तो उस के मोबाइल की घंटी बजी. मां ने किचन में आ कर बताया तो तरन्नुम किचन से बाहर जाते हुए बोली, ‘‘मां चाय देखना, पता नहीं कौन बद्तमीज है, चाय भी नहीं पीने देता.’’

‘‘कौन क्या, तेरा शौहर होगा. शौहर को क्या ऐसे बोलते हैं. कुछ सलीका सीख ले.’’

मां को किचन में छोड़ कर तरन्नुम मोबाइल ले कर छत पर चली गई. ऊपर जा कर वह बनावटी गुस्से में बोली, ‘‘क्या बात है शाहिद, हम ने तो रात में ही फोन पर कह दिया था कि हम तुम्हारी खातिर घर रुक गई है. फिर सुबहसुबह क्या जरूरत आन पड़ी, जो घंटी बजा दी?’’

‘‘तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया है. 3 बजे फूफी के घर आ जाना.’’ दूसरी ओर से यह कहने वाला उस का आशिक शाहिद था.

‘‘आ जाएंगे, हम वादा खिलाफी नहीं करते.’’ कह कर तरन्नुम नीचे आ गई. तब तक चाय बन गई थी. मां ने उसे चाय का प्याला देते हुए पूछा, ‘‘क्या कह रहे थे अलाउद्दीन?’’

‘‘3 बजे अमींनिशा बाजार बुलाया है.’’

‘‘तो चली जाना. शौहर ही तो है, कोई गैर तो नहीं.’’ मां ने कह दिया. उसे क्या पता था कि फोन पर दूसरी ओर अलाउद्दीन नहीं शाहिद था.

शाहिद 3 बजे से पहले ही फूफी के घर पहुंच कर तरन्नुम का इंतजार करने लगा. यह वह घर था, जहां दोनों की मोहब्बत जवान हुई थी. इसी घर की एकांत जगहों पर दोनों के बीच की दूरियां मिटी थीं. फूफी उन दोनों के संबंधों की राजदार थी. शाहिद बैठक में अकेला बैठा था. फूफी ने चाय का प्याला मेज पर रखते हुए उसे सलाह दी, ‘‘अब तुझे भी कोई लड़की ढूंढ़ कर निकाह कर लेना चाहिए. तरन्नुम अब किसी और की बीवी बन चुकी है. अगर भूल से भी कभी उस के शौहर को तुम दोनों की कहानी पता चल गई तो तरन्नुम की जिंदगी में तूफान आ जाएगा.’’

जब फूफी और शाहिद बात कर रहे थे, तभी तरन्नुम आ गई. बड़े अदब से फूफी को सलाम कर के वह सोफे पर बैठ गई. फूफी चुपचाप बाहर निकल गई.

‘‘क्या बात है शाहिद, तुम्हें इतनी बेसब्री क्यों हो जाती है?’’ तरन्नुम ने सोफे से उठ कर शाहिद की गोद में बैठते हुए पूछा.

‘‘मैं ने तो तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया था.’’ शाहिद ने तरन्नुम के बालों से खेलते हुए कहा.

‘‘मैं ने तो यहां आते ही बता दिया था कि मैं तुम्हारे लिए आ गई हूं, फिर टाइम को कैसे भूल जाती? पर तुम्हें चैन कहां, जब मन आता है, मिला दिया फोन.’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकता. वैसे भी परसों ‘वैलेंटाइन डे’ है, बोलो इस बार क्या तोहफा लोगी?’’ शाहिद ने पूछा.

‘‘मैं जो मागूंगी, तुम दे नहीं पाओगे शाहिद.’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों में मचलते हुए कहा.

‘‘तुम मांगो तो. हम न दें तो लानत है हम पर.’’

‘‘और अगर मुकर गए तो…?’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों से फिसल कर सामने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘मैं भी पहलवान की औलाद नहीं, जो मुंह मांगा तोहफा न दूं. बताओ क्या चाहिए?’’ शाहिद ने उत्तेजना में कहा.

तरन्नुम यही चाहती थी. उस ने तुरंत कह दिया, ‘‘अलाउद्दीन का सिर.’’

‘‘शौहर का सिर?’’ ठगे से रह गए शाहिद ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जी हां, शौहर का सिर.’’ कहते हुए तरन्नुम ने शाहिद को सारी बातें बता कर कहा कि उसे सब कुछ पता लग चुका है.

तरन्नुम पूरी चालाकी से ख्ेल ख्ेल रही थी. शाहिद कुछ सोचता, इस से पहले ही वह बोली, ‘‘मैं तुम्हारी अमानत को पहली रात से ही बचाती आ रही थी, लेकिन मजबूरी में उसे भी लुटाना पड़ा.’’

14 फरवरी, 2016 को वैलेंटाइन डे के दिन दोपहर को तरन्नुम को मोबाइल पर उस के शौहर अलाउद्दीन का फोन आया कि ‘आज हमारा पहला ‘वैलेंटाइन डे’ है, मैं शाम को तुम्हें लेने आ रहा हूं, तैयार रहना.’ तरन्नुम ने फोन कर के यह बात शाहिद को बता दी. अलाउद्दीन ससुराल आया और खापी कर तरन्नुम के साथ बाइक से घर के लिए निकला. उस वक्त पौने 8 बजे थे. शाहिद अपने एक दोस्त के साथ बाइक से उस का पीछा कर रहा था. रात साढ़े 8 बजे अलाउद्दीन की बाइक टावर वाले रास्ते से भुजपुरा में घुसी तो पीछे आ रहे शाहिद ने सुनसान जगह टक्कर मार कर अलाउद्दीन को गिरा दिया.

तरन्नुम भी गिर पड़ी. जब तक अलाउद्दीन संभल पाता, तब तक शाहिद ने बाइक से उतर कर उस के सिर में गोली मार दी. एक चीख के साथ ही अलाउद्दीन जमीन पर पड़ा रह गया. शाहिद तरन्नुम को उठाते हुए बोला, ‘‘जो तोहफा मांगा था, वही दिए जा रहा हूं.’’

‘‘भाग जाओ शाहिद, कोई पहचान लेगा. जल्दी भागो यहां से.’’ तरन्नुम ने कहा और सड़क पर पड़े तड़पते शौहर को देख कर रोनेचीखने लगी.

इत्तफाक से यह सारा नजारा वहां से गुजर रहे एक आदमी ने देख लिया था. हमलावरों के भागते ही वहां लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. किसी ने खबर दी तो अलाउद्दीन के घर वाले भी दौड़े चले आए. तब तक घटना की सूचना पुलिस को भी मिल चुकी थी. पुलिस के पहुंचने से पहले ही चश्मदीद ने पूरी हकीकत अलाउद्दीन के घर वालों को बता दी थी. दूसरी ओर सूचना मिलते ही थाना कोतवाली के इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी बिना देर किए पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे.

खून से लथपथ अलाउद्दीन को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे जे.एन मेडिकल भेजा गया. उसे बचाने के लिए डाक्टरों की टीम जुट गई. उसी रात अलाउद्दीन के भाई भूरे खां की तहरीर पर तरन्नुम, शाहिद उर्फ लड्डन व एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ भादंवि की धारा 307 व 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. हकीकत सुननेसमझने के बाद इंसपेक्टर जैदी ने अलाउद्दीन के घर वालों को सचेत करते हुए कहा कि अलाउद्दीन के होश में आने तक तरन्नुम को घर से बाहर न जाने दें, साथ ही उस की हर गतिविधि पर नजर रखने के अलावा यह भी ध्यान रखें कि वह कुछ खा न ले.

2 दिनों तक अलाउद्दीन जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा. उस की स्थिति कोमा जैसी थी. 16 फरवरी की रात उस ने दम तोड़ दिया. अलाउद्दीन की मौत की सूचना मिलते ही हैदर रजा जैदी ने तरन्नुम को उस की ससुराल पहुंच कर गिरफ्तार कर लिया और उसे कोतवाली ले आए. उस से पूछताछ की गई तो उस ने सब कुछ सचसच बता दिया. इसी के साथ इस मामले में दर्ज मुकदमा धारा 302 में तरमीम कर दिया गया. शाहिद की गिरफ्तारी के लिए कई जगह दबिश दी गई. पुलिस की काररवाई से परेशान हो कर शाहिद ने 19 फरवरी को अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कोतवाली इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी ने अदालत में प्रार्थनापत्र दे कर शाहिद को 3 मार्च, 2016 को पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपने साथी का नाम मुस्तकीम निवासी हमदर्दनगर, जमालपुर बताया. साथ ही उस ने वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिस से अलाउद्दीन की हत्या की गई थी. शाहिद को जेल भेजने के बाद पुलिस ने मुस्तकीम की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए. 8 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर जैदी को सूचना मिली कि मुस्तकीम जमालपुर गंदा नाले के पास खड़ा है. पुलिस ने वहां जा कर उसे भी गिरफ्तार कर लिया. वह कहीं बाहर जाने के लिए अपने घर से आया था.

कोतवाली में मुस्तकीम ने बताया कि वह सिर्फ दोस्ती के नाते यह काम करने के लिए तैयार हो गया था. घटना के वक्त वह बाइक चला रहा था, जबकि शाहिद पीछे बैठा था. पूछताछ के बाद मुस्तकीम को भी अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों जेल में थे. तरन्नुम को वैलेंटाइन का तोहफा तो मिल गया, लेकिन बाकी की उस की जिंदगी जेल में जो बीतेगी, वह भी उस के लिए तोहफे जैसी ही होगी. Love Crime Story

Real Crime Story: मुंबई की सायरा मनीमाजरा में दफन

Real Crime Story: पैसे कमाने के लिए मनोहरलाल गुप्ता जो कर रहा था, वह वैसे ही गलत था, लेकिन सायरा बानो के साथ उस ने जो किया वह उस से भी ज्यादा गलत हुआ. परंतु ऐसे लोगों के लिए तो पैसा ही सब कुछ होता है. पैसे के लिए किसी की जान भी लेनी पड़े तो वे पीछे नहीं हटते.

उस काली लांसर का नंबर था एचआर 20 एफ 4529. रफ्तार ज्यादा नहीं थी, इसलिए पीसीआर की गाड़ी पर सवार एएसआई दर्शन सिंह की निगाह अचानक उस के भीतर चली गई. गाड़ी की पिछली सीट पर पड़ा कंबल उन्हें संदिग्ध लगा. ऐसा लग रहा था, जैसे कंबल के नीचे कुछ छिपाया गया है. उस वक्त सुबह के साढ़े 5 बजे थे. तारीख थी 13 जनवरी, 2016. दर्शन सिंह नाइट ड्यूटी खत्म कर के लौट रहे थे.

काली लांसर उन की पुलिस वैन के एकदम पास से निकल कर आगे बढ़ गई थी. एक तो लांसर ने पीसीआर की गाड़ी को बाईं तरफ से ओवरटेक किया था, जो यातायात नियम के विरुद्ध था, दूसरे बगल से निकलते ही लांसर के ड्राइवर ने रफ्तार बढ़ा दी थी. इस से वह संदेह के दायरे में आ गया था.  उस समय दर्शन सिंह की वैन पंचकूला के सैक्टर-19 स्थित अमरटैक्स चौक के पास थी. दर्शन सिंह ने अपने साथी एएसआई अनिल कुमार, जो गाड़ी ड्राइव कर रहे थे, से लांसर को रुकवाने को कहा.

लांसर रिहाइशी एरिया की तरफ से निकल कर चौक से वीरान जगहों की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ गई थी. अनिल कुमार ने वैन की रफ्तार बढ़ा कर लांसर से आगे निकाली और लांसर के ड्राइवर को रुकने का इशारा किया. ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने रफ्तार कम कर के सड़क के बाएं किनारे पर कार रोक दी. ड्राइविंग सीट पर जो व्यक्ति बैठा था, वह मजबूत कदकाठी वाला था. कड़ाके की ठंड के बावजूद उस ने आधे बाजू वाली शर्ट के साथ हाफ स्वेटर पहन रखा था. भीतर बैठेबैठे ही वह नरमी से बोला, ‘‘जी सर, कोई गलती हो गई हो तो हुक्म करें.’’

लांसर के रुकते ही एएसआई दर्शन सिंह वैन से उतर कर उस के पास आ गए थे. उन्होंने ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति से पूछा, ‘‘पुलिस को देख कर तुम ने अपनी गाड़ी की रफ्तार क्यों बढ़ाई और इस कंबल के नीचे क्या छिपा रखा है?’’

वह आदमी भी अपनी कार से बाहर आ गया था. आगे बढ़ कर दर्शन सिंह के पैर छूते हुए वह दोनों हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘नहीं सर, आप लोगों को देख कर रफ्तार नहीं बढ़ाई. पहुंचने की जल्दी में खाली सड़क देख कर यूं ही एक्सेलेटर दबा दिया था. कंबल ठंड की वजह से रख रखा है. इस के नीचे कुछ नहीं है, अभी दिखाए देता हूं.’’

कहने के साथ ही उस आदमी ने गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल कर कंबल बाहर निकाल लिया. उस के नीचे कुछ नहीं था, न ही उस में कुछ लिपटा था. इस के बाद एएसआई अनिल कुमार ने गाड़ी के अंदर की पूरी तलाशी ले ली. गाड़ी में कोई संदिग्ध चीज नहीं मिली.

‘‘ठीक है सर, अब मैं जाऊं? अगर चायनाश्ते की कोई सेवा हो तो बता दीजिए.’’ लांसर ड्राइवर ने कहा और बिना पुलिस वालों की ओर देखे, कंबल को मोड़ कर गाड़ी में रख दिया और ड्राइविंग सीट पर बैठने लगा.

तभी दर्शन सिंह ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे गाड़ी में बैठने से रोकते हुए कहा, ‘‘ठहरो, ऐसी भी क्या जल्दी है. जरा अपना नाम, पता वगैरह तो नोट करवा दो. यह भी बताओ कि इतनी सुबह तुम कहां से आ रहे हो और कहां जा रहे हो?’’

‘‘जी सर,’’ उस ने पीछे मुड़ते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम मनोहरलाल गुप्ता है और पिता का नाम अच्छेलाल गुप्ता. मैं चंडीगढ़ के सैक्टर 56 के फ्लैट नंबर 6308 में रहता हूं. यह मेरा अपना फ्लैट है.’’

‘‘तो इधर पंचकूला में क्या करने आए थे?’’ दर्शन सिंह ने पूछा.

‘‘पंचकूला में सैक्टर 10 में मेरा एक दोस्त रहता है.’’

‘‘क्या नाम है उस का और सैक्टर 10 के किस नंबर के मकान में रहता है तुम्हारा दोस्त?’’

‘‘उस का नाम राजन है और वह कोठी नंबर 1081 में किराए पर रहता है. वह कोठी चंडीगढ़ के किसी पुलिस अफसर की है. कल मैं अपने दोस्त से मिलने आया था तो उस ने जिद कर के अपने पास रोक लिया था. अब मैं वहीं से आ रहा हूं और घर जा रहा हूं.’’

‘‘लेकिन तुम तो चंडीगढ़ के बजाय उलटी दिशा में जा रहे हो?’’

‘‘सर, मैं ने शिमलाअंबाला हाईवे से जीरकपुर के रास्ते चंडीगढ़ जाने की सोची थी. दूसरी तरफ से जाने पर घर दूर पड़ता है.’’

‘‘चलो ठीक है, गाड़ी के कागजात चैक करवाओ, फिर चले जाना.’’

‘‘सर, गाड़ी के कागज तो इस वक्त मेरे पास नहीं हैं.’’

‘‘क्यों, यह गाड़ी तुम्हारी नहीं है क्या?’’

‘‘नहीं सर, यह मेरे एक दोस्त निशांत की गाड़ी है. उस का चंडीगढ़ के सैक्टर 45 में अपना होटल था, कुछ दिनों पहले वह होटल बेच कर कहीं चला गया. जाते वक्त यह कह कर अपनी यह कार मेरे पास छोड़ गया कि कुछ दिनों बाद आ कर गाड़ी ले जाएगा.’’

‘‘गाड़ी के कागजात नहीं दे गया?’’

‘‘नहीं सर, गाड़ी के सारे कागजात उसी के पास हैं.’’

‘‘निशांत का फोन नंबर होगा तुम्हारे पास, उस से बात करवाओ.’’ दर्शन सिंह ने कथित मनोहरलाल को गौर से देखते हुए कहा.

‘‘सर, निशांत ने अपना पुराना नंबर बदल दिया है, नया नंबर मुझे अभी तक नहीं दिया.’’

‘‘तो पुराना नंबर ही बता दो. क्या था पुराना नंबर?’’

‘‘सर, वह तो मैं ने डिलीट कर दिया है.’’

दर्शन सिंह को उस की इन बातों पर यकीन नहीं हुआ. उन का संबंध कंट्रोल रूम से था, जबकि संदिग्ध व्यक्ति से वांछित पूछताछ करना थाना या चौकी पुलिस के अधिकार में होता है. इसलिए उन्होंने मनोहरलाल से ज्यादा पूछताछ न कर के उस के बारे में सैक्टर 19 की पुलिस चौकी को बता दिया. थोड़ी देर में पुलिस चौकी के इंचार्ज एसआई राजेंद्र सिंह और थाना सैक्टर 20 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अजीत सिंह पुलिस टीम के साथ वहां आ पहुंचे. उन्हें संदेह था कि पकड़े गए व्यक्ति के पास चोरी की कार है और इस का संबंध किसी बड़े कार चोर गिरोह से है. उन्हें लगा कि पूछताछ में किसी बड़े कार चोर गिरोह का खुलासा हो सकता है.

मनोहरलाल से हल्कीफुल्की पूछताछ के बाद अजीत सिंह ने बरामद कार की तलाशी के लिए डिक्की खुलवाई. डिक्की में एक बोरी रखी थी, जिस का मुंह सिला हुआ था. बोरी में पालक, धनिया और मेथी भरी होने की बात कह कर मनोहरलाल ने बताया कि उस के परिवार में एक पारिवारिक फंक्शन है, उसी के लिए उस ने बीते दिन चंडीगढ़ की सदर सब्जी मंडी से ये सब्जियां खरीदी थीं. इस में संदेह जैसा कुछ नजर नहीं आया. फिर भी पुलिसिया स्वभाव के चलते अजीत सिंह ने पूछ लिया कि बोरी में कुल कितने वजन का सामान है. इस सवाल का जवाब देने में मनोहरलाल की जुबान लड़खड़ा गई. इस पर अजीत सिंह ने अपने 2 सिपाहियों से बोरी उठा कर उस के वजन का अनुमान लगाने को कहा.

पालक और धनिया वगैरह का वजन ज्यादा नहीं होता, लेकिन पुलिस के 2 जवान भी उस बोरी को आसानी से नहीं उठा सके. उन्होंने बताया कि बोरी का वजन एक क्विंटल के आसपास है. निस्संदेह बोरी में अन्य कोई भारी चीज थी. इस से संदेह का दायरा और बढ़ गया. बोरी की सिलाई उधेड़ कर उस के भीतर भरे सामान को देखने का प्रयास किया गया तो एक ऐसा अप्रत्याशित दृश्य पुलिस के सामने आया, जिसे देख सब की आंखें फटी की फटी रह गईं. बोरी में पालक व धनिया के बीच एक युवती की लाश को मोड़ कर रखा गया था. उस के हाथ और पैर पीछे की ओर बंधे हुए थे. उस की नाक से कुछ खून भी निकला था, जो जम गया था.

कार और उस के ड्राइवर की हकीकत सामने आने के बाद अजीत सिंह ने मोबाइल द्वारा घटना की सूचना जिला पंचकूला के डीसीपी अनिल धवन को दे कर उन से दिशानिर्देशन हासिल किए. इस के बाद उन्होंने पीसीआर 19 के इंचार्ज एएसआई दर्शन सिंह से तहरीर ले कर धारा 302/201/34 के तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए थाने भिजवा दी. इसी के साथ उन्होंने मनोहरलाल गुप्ता को विधिवत हिरासत में ले कर मौके पर ही उस से पूछताछ शुरू कर दी. उस ने जल्दी ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. मनोहरलाल ने बताया कि मृतका का नाम सायरा बानो था और वह मुंबई की रहने वाली थी.

मनोहरलाल ने आगे बताया, ‘‘इसे मैं ने अपने दोस्त राजन गुप्ता और उस की पत्नी पायल गुप्ता के साथ मिल कर मारा है. इस की हत्या के पीछे एक लंबी कहानी है. मैं आप को हर बात विस्तारपूर्वक बताऊंगा, कोर्ट में भी वही बयान दूंगा. मैं आप लोगों का पूरा सहयोग करूंगा. बस आप लोग मेरा टौर्चर मत कीजिएगा. मैं पहले भी कुछ केसों में गिरफ्तार हो कर पुलिस की मार झेल चुका हूं.’’  कुछ देर बाद डीसीपी

अनिल धवन के अलावा सीआईए इंसपेक्टर नरेंद्र कादियान भी वहां आ पहुंचे. इन पुलिस अधिकारियों ने भी मनोहरलाल से पूछताछ की. उस के बाद अनिल धवन के निर्देश पर अजीत सिंह ने मौके की बाकी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए पंचकूला के सिविल अस्पताल भिजवा दिया. जरूरी काररवाई निपटा कर पुलिस मनोहरलाल को थाने के बजाय पहले पंचकूला के सेक्टर-10 स्थित राजन गुप्ता की कोठी 1081 ले गई. वह पहले ही बता चुका था कि जिस चादर में सायरा की लाश लपेट कर रखी गई थी और जिस तौलिए पर उस के खून के छीटें पड़े थे, वे राजन के घर पर ही रह गए थे.

इस समय इन चीजों को वे दोनों कहीं छिपाने गए होंगे. मनोहरलाल ही उन दोनों को पहचानता था. लिहाजा उसे साथ ले कर पुलिस गुप्ता दंपति की तलाश में लग गई. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और उसी दिन दोपहर बाद 3 बजे दोनों पंचकूला के माजरी चौक पर पुलिस को मिल गए. पुलिस ने तीनों को ले जा कर थाने में अलगअलग लौकअप में बंद कर दिया. रात में उन से कोई खास पूछताछ नहीं की गई. अगले दिन पुलिस ने तीनों को इलाका मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर के एक सप्ताह के कस्टडी रिमांड पर ले लिया.

दालत से निपटने के बाद पूछताछ के लिए तीनों को सीआईए के पूछताछ केंद्र ले जाया गया, जहां तीनों से विस्तृत पूछताछ की गई. इस पूछताछ में तीनों ने पुलिस को जो बताया, उस से सायरा बानो हत्याकांड की सारी कहानी खुल कर सामने आ गई : चंडीगढ़ का रहने वाला मनोहरलाल गुप्ता खूब पैसा कमा कर बड़ा आदमी बनने के सपने देखता था. उस के पिता सब्जी बेचने का काम करते थे. इस काम में उसे इतनी कमाई नहीं थी कि बच्चों को साफसुथरे माहौल में रख कर सलीके से पढ़ायालिखाया जा सकता. मनोहरलाल का बड़ा भाई अशोक भी रेहड़ी पर सब्जियां लाद कर गलीमोहल्लों में बेचने जाता था. गुजारे लायक पढ़ाई कर लेने के बाद मनोहरलाल भी भाई के साथ वही काम करने लगा.

सन 2000 में जब वह 20 साल का हुआ तो सब्जी बेचने के साथसाथ वह स्थानीय सिनेमाघरों में जा कर टिकटें ब्लैक करने लगा. बाद में उसे जुए की लत लग गई तो उस का उठनाबैठना गलत लोगों के साथ हो गया. इस का नतीजा यह निकला कि वह 2 बार दुष्कर्म के केस में और एक बार ब्लाइंड मर्डर केस में जेल गया. हालांकि इन सभी आरोपों से वह बरी हो गया. लेकिन पुलिस की मार खाने के अलावा उस ने अपनी जिंदगी का काफी समय जेल में गुजारा था.

जेल से निकलने के बाद उस ने इन कामों से तौबा कर के सेक्टर-45, चंडीगढ़ के एक होटल में नौकरी कर ली. इस होटल का मालिक निशांत कुछ रहस्यमय सा व्यक्ति था. उस के बारे में मनोहरलाल बस इतना ही जान पाया था कि वह मूलरूप से हिमाचल प्रदेश का रहने वाला था. मनोहरलाल को वह समझाया करता था कि इस दुनिया में सीधे रास्ते से इतना ही कमाया जा सकता है कि गुजर होता रहे. मजे की जिंदगी जीने के लिए मोटा पैसा कमाना हो तो किसी भी उलटेसीधे काम से गुरेज नहीं करना चाहिए. दरअसल वह अपने होटल में आने वाले अपने ग्राहकों को कालगर्ल्स उपलब्ध करा कर उन से अच्छा पैसा वसूलता था. उस ने इस काम के गुर मनोहरलाल को भी सिखा दिए थे.

इस का नतीजा यह निकला कि थोड़े ही दिनों में वह भी इस काम से पैसों में खेलने लगा. इस बीच उस ने शादी कर ली और 2 बेटियों तथा एक बेटे का पिता बन गया. रहने को उस ने चंडीगढ़ के सैक्टर-56 में एक बढि़या फ्लैट खरीद लिया. निशांत के संपर्क में कई कालगर्ल्स थीं. इन्हीं में एक थी सायरा बानो. वह खुद को मुंबई की रहने वाली बताया करती थी. निशांत इस तरह की लड़कियों के बारे में जानने के लिए ज्यादा गहराई में नहीं जाता था. वह इन के जिस्म व हुस्न के हिसाब से कीमत लगा कर उन्हें ग्राहक के पास भेज देता था, जिस का 2 तिहाई हिस्सा वह अपने पास रखता था.

लड़कियों को नए नाम दे कर वह नसीहत दे दिया करता था कि वे किसी भी ग्राहक को न तो अपना असली नाम बताए और न ही कभी अपने मूल पते व परिवार वगैरह की जानकारी दें. सायरा बानो को उस ने पूनम नाम दे रखा था. निशांत बिना मेहनत के खूब पैसे बटोर रहा था. फिर भी एक दिन कई लड़कियों की कमाई समेट कर वह चंडीगढ़ छोड़ कर चला गया. होटल उस ने किसी को बेच दिया था. उस के जाने के बाद लड़कियों ने दूसरे ठिकाने ढूंढ़ लिए.

मनोहरलाल इस धंधे के गुर सीख गया था. लेकिन होटल बिक जाने की वजह से उसे आगे यह धंधा चलतेफिरते ही करना था. इसी सिलसिले में उस ने मोटी रकम का लालच दे कर सायरा को अपने साथ रख लिया. निशांत की लांसर कार उस के पास रह गई थी, जिसे वह अपने इसी काम के लिए इस्तेमाल करने लगा था. मनोहरलाल का एक जानकार था राजन गुप्ता. वह शिवमंदिर वाली गली, कीर्तिनगर, सिरसा हरियाणा का रहने वाला था. उस ने नेपाली लड़की पायल से शादी कर रखी थी और इसी तरह के धंधे के लिए पंचकूला में रह रहा था.

एक दिन अचानक उस की मुलाकात पुराने जानकार मनोहरलाल से हुई तो उस ने उसे व उस की पत्नी को पार्टनर बना कर इस काम को बड़े स्तर पर करने का मन बना लिया. धंधा करने वाली लड़कियां अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा या तो अपने घर भेज देती थीं या फिर किसी विश्वसनीय व्यक्ति पर भरोसा कर के उस के पास जमा करवाती रहती थीं.जब उन्हें जरूरत होती थी, वे अपना पैसा वापस ले लेती थीं. निशांत पर तमाम लड़कियों ने भरोसा किया था, लेकिन वह उन्हें धोखा दे कर उन का पैसा ले उड़ा था. इन में सायरा भी थी. इस स्थिति में उसे आगे किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए था. लेकिन उसे मनोहरलाल के अलावा राजन और पायल भी भले लोग लगे थे.

एक बार सायरा बीमार हुई तो इन लोगों ने एक प्राइवेट क्लीनिक में उस का इलाज कराया. वहां पता चला कि उसे एड्स है. यह जानते हुए भी कि उस के संपर्क में आने वाले लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है, इन्होंने उस से धंधा करवाना बंद नहीं किया. सायरा ने एक बार इन लोगों को बताया भी था कि उस की मां बीमार रहती है, मां के इलाज के लिए वह पैसा इकट्ठा कर रही है ताकि मुंबई जा कर ठीक से मां का इलाज करा सके. 11 जनवरी, 2016 को सायरा इन लोगों को बिना बताए सीधे एक ग्राहक के पास चली गई. रात में उस ने मनोहरलाल को पंचकूला की एक जगह के बारे में बता कर वहां से पिकअप करने को कहा. मनोहरलाल बताई गई जगह पर पहुंचा तो वह शराब के नशे में धुत्त थी. वह उसे राजन के यहां ले गया.

वहां पहुंच कर सायरा ने झगड़ा करते हुए कहा, ‘‘आप लोगों के पास मेरे जो ढाई लाख रुपए जमा हैं, वे मुझे दे दो. मुझे अपनी मां का इलाज कराने मुंबई जाना है.’’

‘‘देखो,’’ मनोहरलाल ने उसे समझाना चाहा, ‘‘तुम्हारे इलाज पर काफी पैसा खर्च हो रहा है. फिर भी तुम चिंता मत करो, एक हफ्ते के अंदर हम तुम्हें तुम्हारा सारा पैसा लौटा देंगे.’’

‘‘अपना इलाज भी मैं खुद करवाऊंगी. बस तुम लोग अभी के अभी मेरा ढाई लाख रुपया वापस कर दो.’’

इस के बाद वह चिल्लाने लगी. समझाने पर भी वह नहीं मानी तो पायल ने आगे बढ़ कर उसे 5-6 थप्पड़ जड़ दिए. इस पर चुप होने के बजाय वह और जोरों से चिल्लाने लगी. राजन को गुस्सा आया तो उस ने रसोई से बेलन ला कर उस के सिर व कंधे पर कई वार कर दिए.

सायरा को निढाल होते देख मनोहरलाल ने उसे धक्का दे कर बैड पर गिरा दिया. पायल ने तुरंत उस के मुंह में रूमाल ठूंस कर उस के हाथपैर पीछे ले जा कर बांध दिए. मुंह में रूमाल ठूंसते वक्त उस के मुंह से खून निकलने लगा था. इस पर मनोहरलाल ने उस की नाक व मुंह को दबा दिया, जिस से उस की मौत हो गई. तीनों ने मिल कर उस की लाश को मखमल की चादर में लपेट कर एक जगह छिपा कर रख दिया. उस रात और अगले पूरे दिन लाश उसी तरह पड़ी रही. अब तक उस में से हलकी बदबू आने लगी थी. ऐसे में लाश को जल्दी ठिकाने लगाना जरूरी था.

3 जनवरी की सुबह मनोहरलाल अकेला जा कर बड़ी सी बोरी में पालक, धनिया और गोभी वगैरह ले आया. उसी में लाश को रख कर बोरी को सिल दिया और अकेला ही सायरा की लाश को ठिकाने लगाने के लिए घर से निकल पड़ा. संयोग से रास्ते में ही पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया. इस बीच राजन व पायल वारदात में इस्तेमाल चादर व तौलिया किसी वीरान जगह पर फेंकने चले गए थे, बाद में उन्हें भी उसी दिन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर पुलिस ने चादर, तौलिया और बेलन बरामद कर लिए. कार पहले ही कब्जे में ली जा चुकी थी.

सायरा के फोन में उस की बड़ी बहन शबाना बानो का फोन नंबर था. उस से संपर्क कर के पुलिस ने उन लोगों से पंचकूला आ कर शव की पहचान करने के लिए कहा, ताकि पोस्टमार्टम करवाया जा सके. लेकिन शबाना व उस की मां फातिमा ने कहा कि वह तो उन के लिए 10 साल पहले तब ही मर चुकी थी, जब वह 16 साल की उम्र में घर से भाग गई थी. उन लोगों ने अपनी बदतर माली हालत का हवाला दे कर पंचकूला आने में असमर्थता जाहिर की. उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि सायरा का अंतिम संस्कार वही करवा दें.

इस के बाद पुलिस के सामने दूसरा कोई चारा नहीं बचा था. 72 घंटों तक शव को मार्च्युरी में रखने के बाद उस का पोस्टमार्टम करवा कर 7 जनवरी, 2016 की शाम पुलिस की देखरेख में मनीमाजरा के कब्रिस्तान में दफना दिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने मनोहरलाल गुप्ता, राजन गुप्ता व पायल गुप्ता को फिर से न्यायालय में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Delhi Crime Story: प्रियंका के आखिरी खत की दर्दनाक कहानी

Delhi Crime Story: इवेंट मैनेजर प्रियंका कपूर चावला अपनी जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीना चाहती थीं. वह जिंदगी की ऊंची उड़ान भर कर शोहरत पाना चाहती थीं, लेकिन बिजनेसमैन नितिन चावला की मोहब्बत में फंस कर उस से शादी करना उन की जिंदगी की एक बड़ी भूल साबित हुई.

प्रियंका से शादी करने के बाद नितिन चावला ने दक्षिणी दिल्ली के पौश इलाके डिफेंस कालोनी में रहने लगा था. वह एक बिजनेसमैन था, जबकि प्रियंका इवेंट मैनेजर थी. उन की शादी करीब सवा महीने पहले हुई थी. 25 मार्च को प्रियंका ने अपनी मां रूमा को दोपहर बाद फोन कर के कहा, ‘‘मम्मी आज शाम को मैं घर आऊंगी. आप मेरे पसंद का खाना राजमा चावल बना कर रखना.’’

बेटी के घर आने की बात सुन कर रूमा खुश हो गईं. उन्होंने अपने यहां खाना बनाने वाली नौकरानी को बेटी की पसंद का खाना बनाने के लिए कह दिया. प्रियंका कितने बजे आएगी, यह जानने के लिए उन्होंने शाम 5 बजे फोन किया. घंटी जाती रही, पर उस ने फोन रिसीव नहीं किया. उन्होंने सोचा कि वह किसी काम में व्यस्त होगी, इसलिए दोबारा फोन नहीं किया. आधे घंटे बाद उन्होंने फिर से फोन किया. इस बार भी फोन की घंटी बजती रही, लेकिन उस ने फोन नहीं उठाया. इसी तरह रात 11 बजे तक उन्होंने प्रियंका को कई बार फोन किए, पर उस ने एक बार भी फोन रिसीव नहीं किया.

रूमा को चिंता हुई कि प्रियंका फोन क्यों नहीं उठा रही. उन्होंने प्रियंका के यहां काम करने वाले नेपाली नौकर को फोन किया तो उस ने बताया कि सुबह 9 बजे से मेमसाब अपने कमरे में हैं.

‘‘उस ने सुबह से कुछ खायापीया भी है या नहीं?’’ रूमा ने पूछा.

‘‘मेमसाब जब से कमरे में गई हैं, तब से मुझ से कोई चीज नहीं मंगाई है.’’ नौकर ने कहा.

नौकर से बात करने के बाद रूमा परेशान हो गईं, क्योंकि प्रियंका पिछले 14 घंटों से भूखी अपने कमरे में थी. उसे तो उन के यहां आना था, आखिर वह बंद कमरे में क्या कर रही है? उन्होंने उसी समय नितिन को फोन किया, ‘‘नितिन बेटा, मैं ने प्रियंका को कई बार फोन किया, वह फोन नहीं उठा रही.’’

‘‘आप फ्लैट पर जा कर देख लें.’’ नितिन ने कहा.

‘‘बेटा, तुम्हारे नौकर ने बताया है कि वह सुबह 9 बजे से अपने कमरे में है. तब से उस ने कुछ खायापीया नहीं है.’’ रूमा ने कहा.

‘‘उस ने खाना नहीं खाया तो आप को तकलीफ हो रही है. ऐसी तकलीफ मुझे उस वक्त हुई थी, जब मैं अपने 11 साल के बेटे को घर लाया था और प्रियंका ने उसे भूखा रखा था.’’ नितिन ने ताना देते हुए कहा.

नितिन की पहली पत्नी से एक बेटी और एक बेटा है. पहली पत्नी को वह तलाक दे चुका है. उस के बाद ही उस ने प्रियंका से शादी की थी. कुछ दिनों पहले वह अपने बेटे को फ्लैट पर लाया था. नितिन का आरोप है कि उस वक्त प्रियंका ने उसे खाना नहीं खिलाया था. रूमा को नितिन की पुरानी बातें याद आ गईं. उस ने उन से प्रियंका की शिकायत की थी. रूमा ने इस बारे में जब प्रियंका से पूछा था तो उस ने कहा था कि उस ने उस के बच्चे को बारबार खानेपीने की तमाम चीजें दी थीं, लेकिन उस ने कोई भी चीज नहीं खाई थी.

रूमा समझ गईं कि नितिन के मन में अब भी पुरानी बातें बैठी हुई हैं. उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारी जो शिकायत है, उस पर हम बाद में बात कर लेंगे, लेकिन तुम इसी समय घर आ जाओ. आखिर देखो तो प्रियंका सुबह से कमरे में क्यों बंद है?’’

‘‘मम्मी, मैं अभी नहीं जा सकता. अभी मुझे द्वारका में समय लगेगा. ऐसा करें, आप ही फ्लैट पर चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

‘‘इतनी रात को मैं अकेली कैसे जा सकती हूं?’’ रूमा ने कहा.

‘‘ऐसा करता हूं, मैं ड्राइवर को गाड़ी ले कर आप के पास भेज देता हूं. उस के साथ आप चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

कुछ देर बाद नितिन का ड्राइवर उन के यहां आया तो वह अपनी ननद की बेटी नेहा को साथ ले कर प्रियंका के यहां पहुंच गईं. फ्लैट पर उन्हें बेटी का नौकर मिला. उन्होंने बेटी के कमरे का दरवाजा खटखटाया. अंदर से जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन्होंने आवाज दी. उन की आवाज सुन कर आसपास रहने वाले निकल आए, लेकिन प्रियंका के कमरे का दरवाजा नहीं खुला. रूमा को बेटी को ले कर चिंता हुई. उन्होंने दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को फोन कर के सारी जानकारी दे दी. चूंकि पुलिस को दरवाजा अंदर से बंद होने की जानकारी मिली थी, इसलिए थाना डिफेंस कालोनी की पुलिस और दिल्ली फायर ब्रिगेड के जवान फ्लैट पर पहुंच गए.

पुलिस ने पहले दरवाजा खटखटाया. जब दरवाजा नहीं खुला तो कुछ आशंका नजर आई. दरवाजे पर इंटरलौक लगा था. पुलिस ने नौकर से चाबी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि इस की चाबी साब और मेमसाब के पास ही रहती है. दरवाजा नहीं खुला तो फायर ब्रिगेड के जवानों ने अपने साथ लाए औजारों से दरवाजे को उखाड़ दिया. दरवाजा खुलने पर प्रियंका घुटनों के बल पलंग पर बैठी दिखी, गले में दुपट्टा बंधा हुआ था, जिस का दूसरा सिरा पंखे से बंधा था और गरदन एक ओर झुकी थी. बैड पर एक ट्रे रखी थी, जिस में कांच का बड़ा सा कटोरा पानी से भरा रखा था. ट्रे में ही एक रेजर और एक छोटा सा चाकू रखा था.

बेटी के शरीर में जब कोई हरकत नहीं हुई तो रूमा रोते हुए पुलिस वालों से हेल्प करने को कहने लगीं. इस पर एक पुलिस वाले ने ट्रे में रखे चाकू से दुपट्टा काट कर प्रियंका के गले का फंदा खोला. इसी बीच नितिन भी वहां आ गया. पुलिस वालों के कहने पर रूमा ने बेटी को बिस्तर पर लिटा कर उस के सीने पर हाथों से दबाना शुरू किया, ताकि उस के फेफड़े काम करना शुरू कर दें. इस के बाद नितिन ने भी यही प्रक्रिया दोहराई, पर कोई लाभ नहीं हुआ. पुलिस उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने जांच की तो उस के शरीर पर कई स्थानों पर चोट के निशान मिले. उस के बाएं हाथ की कलाई पर कटे के निशान थे.

बेटी की मौत की खबर पा कर रूमा फूटफूट कर रोने लगीं. उन्होंने यह खबर गुड़गांव में नौकरी कर रहे अपने पति अशोक कपूर, घर पर मौजूद छोटी बेटी डिंपी कपूर और अपने नातेरिश्तेदारों को दी. थोड़ी ही देर सभी एम्स अस्पताल पहुंच गए.

थानाप्रभारी सतीशचंद्र शर्मा ने घटनास्थल की जांच के लिए क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को बुला लिया था. टीम ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. छानबीन में पुलिस को कमरे से 2 पेज का एक सुसाइड नोट मिला, जिस में लिखा था, ‘मेरे पास जानीपहचानी तकलीफ है, खुशी है, दुख है और इमोशंस है. लेकिन पति ने पहली बार बेबस कर दिया. नितिन पर मुंबई में रेप का केस दर्ज है. मालूम नहीं था कि वह मेरे साथ इतना बुरा करेगा. वही एकमात्र ऐसा इंसान है, जिस से मैं डरती हूं.

‘शादी के एक महीने बाद ही उस ने मुझे राक्षस की तरह मारा. मैं ने अपनी फैमिली को बुलाने को कहा तो उस ने और बुरी तरह मारा. मैं ने नितिन से सिर्फ इसलिए शादी की थी, क्योंकि उस ने कहा था कि वह मुझ से बहुत प्यार करता है और हमेशा करता रहेगा. लेकिन अब वही इंसान मुझे घर छोड़ने को कहता है. इस आदमी के साथ रहने के लिए मैं ने अपनी मां से संबंध खत्म कर लिए थे. वह सब से ज्यादा स्वार्थी है.

‘मुझे लगा कि यहां मुझे मोहब्बत मिलेगी, लेकिन दर्द मिला. नितिन की मां के मुताबिक नितिन ने कुछ गलत नहीं किया. पिछली 3 रातों से नितिन घर पर नहीं है. उस ने मुझे वाट्सऐप पर मैसेज किया कि मैं घर खाली कर दूं, अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.’

पुलिस ने सुसाइड नोट सहित अन्य जरूरी सबूत अपने कब्जे में ले लिए. थानाप्रभारी ने प्रियंका के घर वालों से बात की तो उस की मां रूमा ने बताया कि शादी के बाद नितिन के घर वालों ने प्रियंका की सारी गोल्ड और डायमंड ज्वैलरी अपने पास रख ली थी. यही नहीं, उस ने मायके से उस की महंगी घडि़यां भी मंगा ली थीं. इस के बावजूद वह उस पर दबाव बना रहा था कि वह अपने मायके वालों से कार खरीदवा कर दे. इस के लिए नितिन ने उन पर भी दबाव डाला था. रूमा और उन की बेटी डिंपी कपूर ने आरोप लगाया कि प्रियंका की मौत में उस के पति नितिन चावला, सास हर्ष चावला और देवर जतिन चावला का हाथ है.

चूंकि मामला दहेज एक्ट के तहत दर्ज हुआ था, इसलिए इस में मजिस्ट्रैट के सामने पीडि़त पक्ष के बयान होने जरूरी थे. इसलिए एसआई शिवदेव सिंह डिंपी और उस की मां रूमा को तहसील कालकाजी के तहसीलदार अजीत कुमार चौधरी के पास ले गए. तहसीलदार ने रूमा और डिंपी के बयान दर्ज किए. उन्होंने कमरे से मिले सुसाइड नोट को भी पढ़ा. उन के बयानों के आधार पर ही पुलिस ने नितिन चावला, उस के भाई जतिन चावला और मां हर्ष चावला के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए/304बी/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

अस्पताल में जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने प्रियंका की लाश पोस्टमार्टम के लिए एम्स की मोर्चरी में भेज दी थी. इस के बाद नितिन को हिरासत में ले लिया गया. जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह प्रियंका का बहुत ध्यान रखता था, इस के बावजूद उस ने सुसाइड क्यों कर लिया, इस के बारे में उसे कुछ नहीं पता. प्रियंका मूलरूप से हरियाणा के रोहतक जिले के रहने वाले अशोक कपूर की बड़ी बेटी थी. इस के अलावा अशोक कपूर की एक बेटी और थी डिंपी. अशोक कपूर भारतीय वायु सेना में औफिसर थे.

अशोक कपूर की पोस्टिंग लंबे समय तक चंडीगढ़ में रही. वहीं पर दोनों बच्चों की स्कूली पढ़ाई हुई. उन का दिल्ली ट्रांसफर हुआ तो वह परिवार के साथ दिल्ली आ गए और लाजपत नगर में रहने लगे. वह नौकरी के बजाय अपना कोई बिजनैस करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने वीआरएस (ऐच्छिक सेवानिवृत्ति) ले कर गुड़गांव में टेलीकौम का बिजनैस शुरू किया. लेकिन घाटा होने से उन्हें बिजनैस बंद करना पड़ा. इस के बाद उन्होंने गुड़गांव की एक निजी कंपनी में नौकरी कर ली. दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद प्रियंका ने एक जर्मन कंपनी में नौकरी की. उसे डांसिंग का शौक था. नौकरी से छुट्टी होने के बाद वह डांस सीखने चली जाती थी.

वह चाहती थी कि उस की मधुर आवाज को दुनिया भर में नई पहचान मिले, इसलिए उस ने रेडियो जौकी का कोर्स किया. रेडियो जौकी का कोर्स करने के बाद उसे आस्ट्रेलियन रेडियो में रेडियो जौकी की नौकरी मिल गई. प्रियंका बेहद खूबसूरत थी. अपनी काया को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उस ने योगा में भी डिप्लोमा ले रखा था. इस के अलावा वह मैडिटेशन, हीलिंग और विपश्यना में एक्सपर्ट थी.

प्रियंका एक संपन्न परिवार से थी. नौकरी को वह किसी मजबूरी की वजह से नहीं, बल्कि शौक के तौर पर कर रही थी. कुछ दिनों बाद उस ने रेडियो जौकी की नौकरी छोड़ दी और एक गैरसरकारी सामाजिक संस्था से जुड़ कर काम करने लगी. इस के बाद वह एक कंपनी में अपनी दोस्त तेहरीमा जाकी के साथ इवेंट मैनेजर के रूप में काम करने लगी. प्रियंका की नितिन चावला से पहली मुलाकात ग्रैटर कैलाश पार्ट-2 में उस के ही सिनेमा लाउंज पब में हुई थी. नितिन चावला एक बड़ा बिजनेसमैन था. ग्रेटर कैलाश के आलवा पंजाबी बाग और चंडीगढ़ में उस के सिनेमा लाउंज नाम से 5 पब हैं. इस के अलावा दिल्ली एनसीआर में उस का स्टील का कारोबार है. वह दिल्ली के पंजाबी बाग में अपने परिवार के साथ रहता था.

पहली ही मुलाकात में नितिन चावला प्रियंका का दीवाना हो गया. उस ने प्रियंका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो खुले विचारों की प्रियंका ने उस से दोस्ती करने में कोई गुरेज नहीं समझा. उन की फोन पर बातचीत होने लगी. इस से उन की दोस्ती और गहरी हो गई. प्रियंका से फोन पर बात कर के वह कार ले कर निश्चित जगह पहुंच जाता, जहां दोनों कार से घूमते और महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाते. प्रियंका को प्रभावित करने के लिए वह उसे उस की पसंद के गिफ्ट भी देता. एक दिन उस ने प्रियंका से अपने प्यार का इजहार भी कर दिया. इस पर प्रियंका चौंकी, ‘‘नितिन, अभी मुझे अपना कैरियर बनाने दो. इस के बाद ही मैं प्यारव्यार के बारे में सोचूंगी.’’

‘‘प्रियंकाजी, प्यार के बारे में सोचा नहीं जाता, बल्कि खुदबखुद हो जाता है. जैसे कि मुझे हो गया.’’ नितिन बोला, ‘‘क्या मुझ में कोई कमी है, जिस की वजह से तुम मुझे पसंद नहीं करतीं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. अगर तुम पसंद नहीं होते तो मैं दोस्ती ही क्यों करती, लेकिन यह संबंध अभी मैं केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती हूं.’’

‘‘चलो मैं उस वक्त का इंतजार करूंगा, जब तुम्हारे दिल में मेरे प्रति चाहत पैदा होगी. प्रियंका मैं केवल इतना जानता हूं कि मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं.’’ नितिन ने कहा.

प्रियंका मुसकराई, ‘‘हां…हां, यह बात मैं भी महसूस कर रही हूं कि तुम मजनूं हुए जा रहे हो, पर अपना ध्यान रखो.’’

इस के बाद वह कई महीनों तक दोस्त की तरह ही मिलते रहे. वह प्रियंका के घर भी जाने लगा. उस का जब मन करता, वह प्रियंका को फोन कर देता. बारबार फोन करने पर वह भी परेशान हो जाती थी. तब वह उस की काल रिसीव नहीं करती. इस तरह लगातार मिलते रहने का नतीजा यह निकला कि प्रियंका नितिन को प्यार करने लगी.  इतना ही नहीं, नितिन ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह तैयार हो गई.

प्रियंका ने नितिन से शादी करने का प्रस्ताव घर वालों के सामने रखा तो मां रूमा ने नितिन से शादी करने को मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि नितिन प्रियंका से 15 साल बड़ा था. पर प्रियंका शादी के लिए अड़ गई. न चाहते हुए भी घर वालों को प्रियंका की बात माननी पड़ी. 6 जनवरी, 2016 को नितिन चावला और प्रियंका की शादी सामाजिक रीतिरिवाज से हो गई. नितिन ने डिफेंस कालोनी में जो फ्लैट किराए पर लिया था, शादी का कार्यक्रम उसी फ्लैट की छत पर आयोजित किया गया. इस शादी में दोनों परिवारों की तरफ से चुनिंदा लोग ही शामिल हुए थे.

शादी के बाद प्रियंका खुश थी, क्योंकि नितिन उसे बहुत प्यार करता था. इस के अलावा दूसरी बात यह थी कि जिस फ्लैट में वह रह रही थी, वहां पर उन दोनों के अलावा घर का कोई और सदस्य नहीं रहता था. केवल एक नौकर ही था. प्रियंका की शादी को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि उसे ऐसी खबर मिली, जिस ने उसे झकझोर कर रख दिया. उसे पता चला कि जिस नितिन से उस ने शादी की है, वह पहले से शादीशुदा ही नहीं, बल्कि 2 बच्चों का बाप है. यह उस के साथ एक बड़ा धोखा था. इस बारे में उस ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि उस ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है और बच्चे भी उसी के साथ हैं. उस से उस का अब कोई मतलब नहीं है.

नितिन ने अपनी बातों से प्रियंका को भले ही समझाने की कोशिश की थी, लेकिन प्रियंका को इस बात का दुख था कि उस ने खुद के शादीशुदा होने वाली बात उसे बताई क्यों नहीं? बात छिपा कर उस ने उस के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. उस ने नितिन से अपनी नाराजगी भी प्रकट की, लेकिन नितिन ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से उसे मना लिया. प्रियंका ने भी होहल्ला मचाना उचित नहीं समझा, लिहाजा वह चुप हो गई. जो हो चुका, उस पर तनाव में रहने के बजाय वह अपनी लाइफ को खुशमिजाजी के साथ जीने की कोशिश में लग गई.

मूलचंद फ्लाईओवर के पास प्रियंका के एक दोस्त का रेस्टोरेंट है. शादी के बाद वह दोस्त प्रियंका और उस के पति नितिन चावला को अपने रेस्टोरेंट में पार्टी के लिए बुलाना चाहता था. उस ने जनवरी के आखिरी हफ्ते में नितिन और प्रियंका को कई बार फोन कर के बुलाया, पर नितिन को टाइम नहीं मिल रहा था. नितिन से बात करने के बाद प्रियंका ने दोस्त से कह दिया कि वह 29 जनवरी को पति के साथ रेस्टोरेंट पर पहुंच जाएगी. शाम को प्रियंका पार्टी में जाने की तैयारी करने लगी. नितिन उस समय घर पर नहीं था. उस ने उसे फोन किया तो उस ने कहा कि उसे घर आने में देर हो जाएगी. वह उस का इंतजार न करे और अकेली पार्टी में चली जाए.

उसी समय प्रियंका का दोस्त उस के यहां आ गया. वह उस के साथ जैसे ही उस की कार में बैठने को हुई, तभी नितिन आ गया. प्रियंका नितिन को देख कर खुश हो गई. उस ने नितिन से चलने को कहा तो उस ने पार्टी में जाने से साफ मना कर दिया. तब प्रियंका अकेली ही चली गई और एकडेढ़ घंटे में वहां से लौट आई. प्रियंका घर लौटी तो नितिन वहीं था. वह एकदम सामान्य था. बातचीत कर के दोनों सो गए. उसी रात को अचानक नितिन के दिमाग में न जाने क्या फितूर पैदा हुआ कि रात 3 बजे उठ कर उस ने प्रियंका की पिटाई शुरू कर दी. लातघूसों से उस ने उसे बुरी तरह पीटा.

पिटाई से प्रियंका का चेहरा सूज गया, होंठ फट गए. इस के अलावा उस के शरीर पर भी चोटें आईं. खून से उस की टीशर्ट भी भीग गई. प्रियंका समझ नहीं पाई की आखिर उस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन ने उसे सजा दी. इस पिटाई से वह बुरी तरह डर गई. सुबह 4 बजे के करीब प्रियंका ने अपने सूजे हुए चेहरे की सेल्फी ले कर वाट्सऐप से मां रूमा के पास भेज दी. उस ने उन्हें अपने पिटाई करने की बात भी बता दी.

बेटी की पिटाई की बात सुन कर रूमा का खून खौल उठा. उन्होंने बेटी पर कभी हाथ तक नहीं उठाया था. आखिर उस ने उस की बेटी को इतनी बेदर्दी से क्यों मारा. उन का मन कर रहा था कि वह उसी समय उस के पास जाएं, पर उस समय एक तो अंधेरा था और दूसरे उन के पति घर पर नहीं थे.

बेटी डिंपी भी दोस्त की शादी में पूर्वी दिल्ली गई हुई थी. रूमा ने तुरंत डिंपी को फोन कर के प्रियंका के घर पहुंचने को कहा. उजाला होने पर रूमा बेटी प्रियंका के घर पहुंच गईं. डिंपी भी अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंच चुकी थी. प्रियंका की चोटें देख कर सभी हैरान थे कि आखिर इस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन इतना बेदर्द हो गया. रूमा ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि यह बातबात पर बहसबाजी करती है. उसी बहसबाजी में बात इतनी बढ़ गई कि वह अपना आपा खो बैठा.

रूमा ने उस समय उस से ज्यादा बात करनी जरूरी नहीं समझी. वह प्रियंका को अपने घर ले आईं. जाने से पहले नितिन ने खून से सनी उस की टीशर्ट उतरवा कर दूसरी पहना दी थी. उन्होंने उसे एक क्लिनिक में भरती करा दिया. प्रियंका का अंगअंग दुख रहा था. इतनी पिटाई होने के बाद भी प्रियंका ने पुलिस काररवाई करने से मना कर दिया था. रूमा ने नितिन के पिता दलजीत चावला को फोन कर के जानकारी दी तो उन्होंने कहा कि वह अभी अपने किसी रिश्तेदार के अंतिम संस्कार में आए हुए हैं. नितिन के भाई जतिन को फोन किया तो उस ने भी कोई बहाना बना दिया.

उस के घर वालों ने जब उन की बात को गंभीरता से नहीं लिया तो उन्हें गुस्सा आ गया. उन्होंने जतिन को धमकी दी कि अगर वह नहीं आए तो उस के भाई के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी. इस से जतिन डर गया और प्रियंका के घर पहुंच गया. जतिन ने नितिन को भी वहीं बुला लिया. प्रियंका की चोटें देख कर जतिन भी हैरान था. उस ने नितिन को समझाया. तब नितिन ने अपनी गलती मानी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा.

इस के बाद नितिन प्रियंका को लिवाने ससुराल गया, लेकिन रूमा ने कह दिया कि जिस घर में उन की बेटी के साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाए, वहां वह उसे हरगिज नहीं भेजेंगी. नितिन ने अपनी इस गलती की कई बार माफी मांगी. इस पर प्रियंका के दिल में रहम आ गया और वह उस के साथ जाने के लिए तैयार हो गई. नितिन उसे अपने फ्लैट पर ले आया. नितिन शक्की स्वभाव का था. 2 हफ्ते बाद ही नितिन ने प्रियंका के साथ फिर से सख्ती बरतनी शुरू कर दी. जब प्रियंका पूरी तरह स्वस्थ हो गई तो वह अपने खाली समय में सोशल साइट्स पर दोस्तों आदि से बातें करती रहती थी. नितिन को शक था कि वह अपने किसी बौयफ्रैंड से बात करती है. इसलिए उस ने प्रियंका के फोन से वाट्सऐप और फेसबुक अनस्टाल करा दी.

इस के अलावा नितिन ने प्रियंका के अकेली घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी. खुले आसमान में उड़ने वाली प्रियंका अब पिंजड़े में बंद एक चिडि़या बन कर रह गई थी. यही नहीं नितिन के तुगलकी फरमान की वजह से घर का खाना उसे खुद बनाना पड़ता था. जबकि खाना बनाने के लिए रखा नौकर दिन भर खाली रहता था. अब प्रियंका को नितिन  के साथ शादी करने का पछतावा हो रहा था. प्रियंका कभी किसी बात पर बहस करती तो नितिन उस की पिटाई कर देता. इस से उस के अंदर इतना खौफ बैठ गया कि वह उस के सामने अपना मुंह नहीं खोल पाती थी. वह उसी के आदेशानुसार काम करती थी.

एक दिन नितिन अपनी पहली पत्नी से पैदा हुए बेटे को फ्लैट पर लाया. उसे उसी समय बिजनैस के सिलसिले में कहीं जाना था तो वह 8 वर्षीय बेटे को प्रियंका के पास छोड़ कर चला गया. उस के जाने के बाद उस लड़के ने प्रियंका के हाथों खाना तो दूर, कोई दूसरी चीज भी नहीं खाई. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे किसी ने सिखा कर भेजा हो कि कोई चीज नहीं खानी है. शाम को जब नितिन को पता चला कि उस का बेटा दिन भर भूखा रहा है तो उसे पत्नी पर बहुत गुस्सा आया. उस ने उसे जम कर डांटा.

प्रियंका मां को फोन कर के अपना दुखड़ा रोती, तब मां को लगता कि उन की आपस की बातों में ज्यादा टांग अड़ाना ठीक नहीं है. छोटेमोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं. बेटी की ससुराल के मामलों में ज्यादा दखलंदाजी करने पर कभीकभी रिश्ते बिगड़ जाते हैं. उन्होंने सोचा कुछ दिनों में रिश्ते सामान्य हो जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा. रूमा ने 24 मार्च, 2016 को भी प्रियंका से बात की थी, तब प्रियंका ने कहा था कि वह कल शाम को नितिन के साथ घर आएगी और खाना खाने के बाद लौट आएगी. 25 मार्च को उन्होंने फिर से प्रियंका से बात की. इस के बाद उन की उस से बात नहीं हो सकी.

पूछताछ में नितिन चावला बारबार खुद को बेगुनाह बता रहा था. वह पत्नी की मौत को आत्महत्या ही कह रहा था. नितिन से पूछताछ करने पर पुलिस को कोई खास जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उसे 27 मार्च, 2016 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. प्रियंका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं हो सका कि प्रियंका ने आत्महत्या की थी या उस की हत्या कर आत्महत्या का रूप दिया गया था. इसलिए डाक्टरों ने उस का विसरा सुरक्षित कर जांच के लिए भेज दिया.

प्रियंका के मातापिता का आरोप है कि उन की बेटी इतनी कमजोर नहीं थी कि वह सुसाइड करती. वह हीलिंग, मैडिटेशन और विपश्यना की एक्सपर्ट थी. मार्च के पहले हफ्ते में भी वह 15 दिनों के लिए विपश्यना के लिए पुष्कर गई थी. उन्होंने बताया कि जिस समय फ्लैट का दरवाजा तोड़ा गया था, वह बिस्तर पर घुटनों के बल बैठी थी. उस स्थिति में फांसी लगा कर किसी की भी मौत नहीं हो सकती. पुलिस को उस स्थिति का फोटो खिंचवाना चाहिए था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया.

फ्लैट पर जो नेपाली नौकर था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ नहीं की. सुसाइड नोट में प्रियंका ने लिखा था कि नितिन 3 दिनों से घर नहीं आ रहा. जबकि नौकर ने रूमा को बताया था कि साहब कल भी घर पर थे. इस से तो यही लग रहा है कि वह सुसाइड नोट 25 मार्च से पहले का लिखा है. शायद पहले कभी प्रियंका ने सुसाइड करने की कोशिश की होगी. अगर पुलिस नितिन के मोबाइल फोन की डिटेल्स निकलवाती तो कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती थीं.

प्रियंका को डेली डायरी लिखने का शौक था. रूमा का कहना था कि अगर उस ने सुसाइड किया है तो इस बात को उस ने अपनी डायरी में जरूर लिखा होगा, लेकिन पुलिस डायरी के बारे में कुछ भी नहीं बता रही. जिस कमरे में उन की बेटी मरी मिली, उस कमरे का लौक सिस्टम ऐसा है, जो अंदर और बाहर दोनों तरफ से बंद किया जा सकता है. इसलिए उन का कहना यही है कि प्रियंका की हत्या करने के बाद नितिन कमरे का ताला लगा कर चला गया था.

पिता अशोक कपूर का कहना है कि सन 2014 में नितिन के खिलाफ मुंबई की किसी मौडल ने वर्सोवा थाने में रेप का केस दर्ज कराया था. इस की जानकारी प्रियंका को भी हो गई थी. वह नितिन के जुल्मोसितम से तंग आ कर घर लौटना चाहती थी. यह जानकारी नितिन को लग गई थी, इसलिए उस ने उन की बेटी की हत्या कर दी.

उन्होंने इस केस की निष्पक्ष जांच करा कर दोषियों के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग की है. बहरहाल मामला चाहे जो भी हो, यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा. मामले की जांच एसआई शिवदेव सिंह कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक नितिन की मां हर्ष चावला और भाई जतिन चावला पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सके थे. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और मृतका के घर वालों से की गई बातचीत पर आधारित

 

Social Story: समाज से जुड़ने की चाह में चंबल के डाकू

Social Story: समाज या परिवार के लिए कुछ करने की उम्र में जिन लोगों ने समाज या घर वालों से बगावत कर के बीहड़ में जा कर बंदूक उठाई, अब वही जीवन के अंतिम दौर में समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन समाज आज भी उन से दहशत खाता है, जिस से उन्हें अपने साथ जोड़ने से कतरा रहा है.

आज डाकू भले ही किस्सेकहानियों के पात्र बन कर रह गए हों, लेकिन कभी इन का बोलाबाला था. कुछ डाकुओं का तो इतना आतंक था कि लोग उन के नामों से कांपते थे. कुछ महिलाएं भी डाकू बनीं, जिन्हें आज दस्यु सुंदरी कहा जाता है. डाकुओं और उन की दहशत पर तमाम फिल्में भी बनी हैं, जिन में सब से चर्चित फिल्म शोले रही है.

शोले में दिखाए गए गब्बर सिंह को लोग शायद ही कभी भूल पाएंगे. फिल्म में गब्बर सिंह की भूमिका अभिनेता अमजद खान ने निभाई थी. फिल्म के तमाम डायलौग लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे. इस के अलावा भी डाकुओं पर तमाम फिल्में बनीं, लेकिन शोले जैसी सफलता किसी दूसरी फिल्म को नहीं मिली. अब समय बदल गया है, अपराध भले ही पहले से ज्यादा हो रहे हैं, लेकिन आज अपराधों और अपराधियों का ट्रेंड बदल गया है. अब बंदूकों की बदौलत डकैती नहीं, अपहरण होने लगे हैं. डकैत बीहड़ों और जंगलों में रहते थे, जहां रहना खाना पेड़ों के नीचे या छोटीमोटी गुफाओं में होता था.

जबकि अब विकास के नाम पर जंगल उजड़ते जा रहे हैं. डकैतों का लगभग सफाया हो चुका है. अपराधों का स्वरूप बदल गया है तो अपराधी भी सुविधाभोगी हो गए हैं. घोड़ों का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है, उन की जगह कारों या जीपों ने ले ली हैं.

राजस्थान से ले कर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक पसरी चंबल की घाटी अवैध खनन की वजह से सिमटती जा रही है. जंगल खत्म होते जा रहे हैं. उन की जगह बहुमंजिली इमारतें बनती जा रही हैं यानी हरेभरे जंगलों की जगह कंकरीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं. बीहड़ों और जंगलों को कुख्यात बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली यहां से बहने वाली चंबल नदी है.nमध्य प्रदेश में इंदौर के पास बसे शहर महू से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल की पहाडि़यों से निकलने वाली यह नदी राजस्थान के कुछ हिस्से से गुजरते हुए मध्य प्रदेश के भिंडमुरैना के इलाके से निकल कर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की ओर बढ़ जाती है.

पानी के कटाव से चंबल नदी के किनारेकिनारे सैकड़ों मीलों तक ऊंचे घुमावदार बीहड़ों की संरचना हुई है. चंबल के यही बीहड़ डाकुओं के छिपने के अभेद्य ठिकाने रहे हैं. डाकुओं की पहली पीढ़ी में मान सिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लक्का डाकू, सुल्ताना डाकू, पन्नाबाई, पुतलीबाई, पान सिंह तोमर आदि बड़े नाम रहे हैं. इस के बाद मलखान सिंह, माधो सिंह, मोहर सिंह, माखन चिड्डा, बाबा मुस्तकीम, फूलन देवी, विक्रम मल्लाह, श्रीराम, लालाराम और ददुआ जैसे दुर्दांत डाकुओं का चंबल घाटी पर दबदबा रहा है.

डकैत, जो कभी आतंक का पर्याय माने जाते थे, कुछ लोगों की पहल पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. सजा भुगतने के बाद आज वे समाज की मुख्य धारा से जुड़ गए हैं. दस्यु सुंदरी फूलन देवी 2 बार सांसद बनी थीं. दूसरी बार सांसद बनने के बाद सन 2001 में शेर सिंह राणा ने दिल्ली में उन के आवास पर गोली मार कर उन की हत्या दी थी.  सन 1981 में फूलन देवी तब चर्चा में आई थीं, जब उन के गिरोह पर बेहमई गांव में सवर्ण जाति के 22 लोगों की हत्या का आरोप लगा था.

सालों तक चंबल के बीहड़ों में भटकने वाले पूर्व दस्यु अब जीवन के इस पड़ाव पर समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं. इसी उद्देश्य से 20 मार्च को होली आने से 3 दिन पहले गुलाबी नगर जयपुर में देशभर के नामी डाकू इकट्ठा हुए. सिर पर साफा बांधे, ललाट पर रोली का तिलक लगाए, कंधे पर दुनाली लटकाए ये डकैत यहां कोई अपराध करने नहीं, बल्कि अपने दस्यु जीवन की दास्तां सुनाने और बीहड़ बचाने के लिए इकट्ठा हुए थे.

प्रकृति एवं संस्कृति संरक्षण व संवर्धन को समर्पित जयपुर के श्री कल्पतरू संस्थान ने दस्युओं का यह महाकुंभ विश्व वानिकी दिवस की पूर्व संध्या पर पूर्व आयोजित किया था. जयपुर के इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान औडिटोरियम में आयोजित इस ऐतिहासिक आयोजन का नाम दिया गया था, ‘पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़.’

कभी दस्यु सुंदरी के नाम से मशहूर रही सीमा परिहार भी इस आयोजन में आई थीं. सीमा परिहार अपनी मरजी से डकैत नहीं बनी थीं. उन का अपहरण कर के चंबल में ले जाया गया था. वह पहली दस्यु सुंदरी थीं, जिन्होंने बागी रहते हुए बच्चे को जन्म दिया था. उन के जीवन पर बुंडेड नाम से फिल्म भी बन चुकी है, जल्दी ही उन्होंने एक और फिल्म साइन की है. इस बार वह सलमान खान के साथ फिल्मी परदे पर नजर आएंगी. वह बिग बौस में भी भाग ले चुकी हैं.

सीमा परिहार 13 साल की थीं, तब डाकू उन्हें उठा ले गए थे. डाकुओं के साथ रह कर उन्होंने भी बंदूक उठा ली थी. दस्यु जीवन में उन पर कुल 29 मुकदमे दर्ज हुए, जिन में 4 हत्याओं के थे, बाकी पुलिस मुठभेड़, लूट और अन्य मामलों के थे. 1 दिसंबर, 2000 को उन्होंने अधिकारियों के सामने औरैया जिले में आत्मसमर्पण किया था. कहा जाता है कि उन का इतना खौफ था कि जिस दिन वह जेल गई थीं, वहां सजा काट रहे अन्य कैदी डर के मारे रात को पेशाब करने नहीं निकले थे. उन का बच्चा तब उन की गोद में था. उस समय जेल में 35 अन्य महिला कैदी थीं. वह सन 2004 रिहा हुईं. उन के रिहा होने के बाद सन 2006 में उन के भाई को झूठे एनकाउंटर में मरवा दिया गया था.

सीमा परिहार का कहना था कि चंबल में जो गए थे, वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले थे. असली डकैत तो समाज में हैं, वही अपराधी बनाते हैं. दस्यु सुंदरी या डकैत मांबाप के दिए नाम नहीं होते. समाज, पुलिस और सरकार ही उन्हें डकैत बनाती है. सरकार वादे तो बड़ेबड़े करती है, लेकिन वे पूरे नहीं होते. दस्यु सुंदरी सीमा का कहना था कि पेड़पौधों के बारे में जितना दस्यु जानते हैं, उतना कोई और नहीं जान सकता. बीहड़ में डाकुओं को पेड़ की ही छाया मिलती थी, क्योंकि वहां छत नहीं होती. बीहड़ में कभी कोई डकैत सांपबिच्छू के काटने से नहीं मरता. 20 साल पहले जो जंगल थे, अब वे नहीं रहे. जीवन को बचाने के लिए पेड़पौधे लगाना जरूरी है. सरकार इस के लिए मुहिम चला रही है. इस मुहिम में डाकुओं को भी जुड़ना चाहिए. अगर हर कोई चाह ले तो जंगलों को बचाया जा सकता है.

इस आयोजन में आई 28 साल की दस्यु सुंदरी रेणु यादव जब नौवीं क्लास में पढ़ती थीं, तब सन 2003 में 29 नवंबर को बदमाश चंदन यादव ने स्कूल से आते समय उन का अपहरण कर लिया था. उन्हें छोड़ने के लिए उस ने उन के घर वालों से 10 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. उन के पिता किसान थे, 5-6 बीघा जमीन थी. वह 10 लाख रुपए कहां से देते. पैसे नहीं मिले तो बदमाशों ने उन्हें मारापीटा, प्रताडि़त किया और कुछ दिनों बाद उन्हें डाकू बना दिया.

रेणु के पास डाकुओं की बात मानने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. इस के बाद उन्हीं के नाम पर अपराध किए जाने लगे. धीरेधीरे उन का नाम मशहूर हो गया और लोग उन के नाम से खौफ खाने लगे. इस के बाद चंदन यादव द्वारा की गई हत्या, लूट, डकैती और अपहरण जैसे 17 मामलों में उन का नाम बतौर मुलजिम दर्ज हो गया. इसी तरह 4 जनवरी, 2005 तक चलता रहा. उसी बीच एक दिन रामवीर गुर्जर और चंदन यादव में गैंगवार हुई, जिस में चंदन मारा गया. रामवीर गुर्जर ने रेणु को बंधक बना कर गलत नीयत से उन पर हमला किया. उस समय उन के पास एसएलआर थी, जिस की सारी गोलियां उस ने रामवीर के सीने में उतार दीं. इस के बाद 7-8 दिनों तक जंगल में भटकती रही.

उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, कहां जाएं? आखिर वह अपने घर आ गईं. खबर पा कर पुलिस आ गई और उन्हें भरोसे में ले कर कोतवाली ले गई, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर कई आरोप थे. आखिर उन्हें जेल भेज दिया गया. वह 3 अलगअलग जेलों में रहीं. 7 साल 3 महीने 15 दिन तक जेल में रहने के बाद 29 मई, 2012 को लखनऊ के नारी बंधी निकेतन से रेणु रिहा हुईं. जेल से रिहा होने के बाद अब भी कुछ बदमाश उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह वापस आ कर गैंग का मोर्चा संभाल लें, वरना उन्हें मार दिया जाएगा. वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलीं और सुरक्षा की गुहार लगाई. इस के बाद उन्हें गनमैन मुहैया करा दिया गया.

रेणु यादव का कहना था कि पुलिस ने उन्हें डाकू माना, लेकिन न्यायपालिका से उन्हें न्याय मिला. उन पर फिल्म बीहड़ बन रही थी, जो अभी विवादों में फंस गई है. वह न टीवी देखती हैं न फिल्में, लेकिन कोई अच्छा डाइरैक्टर मिल जाए तो वह उस के साथ काम करना चाहती हैं. फिलहाल वह गौ सेवा में लगी हैं. वह गायों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाती हैं. अब तक वह हजारों गायों को कटने से बचा चुकी हैं. उन्हें जेल से बाहर आए 2 साल हो गए हैं. वह एनजीओ चलाती हैं, जिस के माध्यम से वह गायों को बचाने के साथ दानदहेज को ले कर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने की कोशिश कर रही हैं.

पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान का समर्थन करते हुए रेणु ने कहा कि अगर सरकार सहयोग करे तो बीहड़ ही नहीं, पूरे चंबल में पेड़ों की कटाई को छोड़ो, वह किसी को हरा पत्ता तक न तोड़ने दें, अवैध खनन के नाम पर एक पत्थर न उठाने दें और शिकार के नाम पर एक चिडि़या न मारने दें. इस आयोजन में भाग लेने आए डाकुओं में पंचम सिंह एक बड़ा नाम रहा है. उन के नाम से आम आदमी ही नहीं, पुलिस भी खौफ खाती थी. बरसों तक डकैत के रूप में बीहड़ों की खाक छानने वाले और दहशत का पर्याय रहे पंचम सिंह ने अब संन्यास ले लिया है. पीत वस्त्र धारण करने वाले पंचम सिंह की उम्र इस समय 84 साल है, लेकिन उन की आवाज आज भी बुलंद है.

जयप्रकाश नारायण के प्रयास से साढ़े 5 सौ डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था, उन्हीं में एक पंचम सिंह भी थे. उन्हें दुख इस बात का है कि आज भी डाकुओं को सामाजिक कार्यों से नहीं जोड़ा जाता. वह पूरे 14 साल बीहड़ में रहे. उन्होंने राज सत्ता, डाकू सत्ता और धर्म सत्ता देखी है. पंचम सिंह का कहना था कि डाकुओं के बारे में फिल्मों में जो दिखाया जाता है, वह सब झूठ है. डाकुओं के अपने नियमकानून होते थे. उन में एकता होती थी, जो आज राज सत्ता और धर्म सत्ता में नहीं है. साढ़े 5 सौ डाकुओं ने एकता के दम पर ही भारत सरकार को हिला कर रख दिया था.

पंचम सिंह के गिरोह का सफाया करने के लिए सरकार ने एक करोड़ रुपए का इनाम रखा था. यह तब की बात है, जब सौ रुपए में एक तोला सोना मिलता था. पंचम सिंह ही नहीं, उस समय के लगभग सभी डाकू चरित्रवान थे, किसी की मांबहन को गलत नजर से नहीं देखते थे. पंचम सिंह ने एक बलात्कारी को पेड़ से बांध कर जिंदा जला दिया था. वे अमीरों का धन लूट कर गरीबों में बांटते. यही वजह थी कि किसी डाकू की कोई कोठी नहीं बनी है. पंचम सिंह का 45 जिलों में बोलबाला रहा. उन्हें गाड़ीघोड़ों की कोई कमी नहीं थी. उन का आतंक ऐसा था कि स्टेशन न होने पर भी ट्रेन रुकती थी.

पंचम सिंह चौथी तक पढ़े थे. 14 साल की उम्र में उन की शादी हो गई थी. गांव में हुए एक झगड़े के बाद बदले की भावना से वह चंबल के डाकुओं से जा मिले थे. उस के बाद एक दिन गांव आए और 6 लोगों को मार दिया और डाकू बन गए. वह भले ही पढ़ेलिखे नहीं थे, लेकिन डकैत जीवन में स्कूल बनवाए, हजारों कन्याओं की शादी कराई. जंगल के आदिवासी उन की मदद करते थे. चंबल में उन्होंने जो स्कूल खोला था, उस में 17 मास्टर थे और लगभग 5 सौ बच्चे पढ़ते थे. उन के स्कूल का रिकौर्ड रहा है कि कोई बच्चा फेल नहीं हुआ. मास्टर हो या छात्र, गलती करने पर पंचम सिंह उसे स्कूल में 24 घंटे के लिए बंद कर देते थे.

पंचम सिंह के हथियार हेलीकौप्टर द्वारा बांग्लादेश से आते थे. उन के पास हर तरह के हथियार थे. वह जिस नेता को सपोर्ट करते थे, वही चुनाव जीतता था. वह एक दिन में सरपंच और 3 दिन में एमएलए बनाते थे. आत्मसमर्पण के समय लोकनायक जयप्रकाश नारायण के माध्यम से उन्होंने 8 शर्तें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने रखी थीं. सन 1972 में सरकार ने उन शर्तों को मान लिया तो उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. उन्हें और मोहर सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में राष्ट्रपति ने फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल दी थी.

पंचम सिंह का कहना था कि सन 1972 में समर्पण करने वाले साढ़े 5 सौ डकैतों में करीब 2 सौ डाकू आज भी जीवित हैं. ये डकैत पहले गोलियों से उस के बाद फांसी से बचे. अब जीवन के आखिरी दिनों में वह उस पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेंगे, जिस ने उन्हें मां की तरह रखा. अगर समाज साथ दे तो ये डाकू बलिदान देने को तैयार हैं. डाकू गब्बर सिंह पर बनी थी, वह भी इस महाकुंभ में जयपुर आए थे.

उत्तर प्रदेश के ललितपुर के गांव रामपुर के रहने वाले गब्बर सिंह का असली नाम प्रीतम सिंह है. गब्बर सिंह बीड़ी जरूर पीते हैं, लेकिन फिल्म शोले के गब्बर की तरह तंबाकू नहीं खाते. फिल्म शोले का गब्बर सिंह खूंख्वार था, जबकि असली गब्बर सिंह की छवि उस से बिलकुल अलग है. वह अब तक सैकड़ों लड़कियों का विवाह करवा चुके हैं. गब्बर सिंह 10 साल बीहड़ में रहे. सन 1986 में उन्होंने आत्मसमर्पण किया तो 7-8 साल जेल में रहे. उन्होंने डाकू जीवन में गुनहगारों को ही मारा. गलती से एक बार एक बच्चा और एक औरत मर गई थी, जिस का उन्हें आज भी मलाल है. उन का कहना था कि बागी को दर्द नहीं होता है. उन के पास मारने वाला दिल होता है, रहम का दिल नहीं होता.

सरकार ने डेढ़ सौ से अधिक पुलिस वालों को उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी, लेकिन वे उन्हें पकड़ नहीं पाए. बाद में धीरज सिंह, राम सिंह और रामपाल के साथ उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. सरकार ने उन से जो वादे किए थे, उन में से एक भी पूरे नहीं किए. जेल में अलग रहने और खाने की व्यवस्था जरूर हो गई थी. जेल में रह कर गीतारामायण जैसी धार्मिक किताबें पढ़ कर धीरेधीरे उन्होंने खुद को बदला. उन का कहना था कि अब वह गांव और इलाके के लोगों की सेवा कर के अपराध जीवन के दाग धोने की कोशिश कर रहे हैं.

देशभर में महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचारों से वह काफी दुखी हैं. उन का निशाना आज भी अचूक है. अब वह कानून का सम्मान करते हुए खुद को देश की सेवा में लगाए रखना चाहते हैं. चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे पान सिंह तोमर के भतीजे बलवंत सिंह तोमर का पुलिस रिकौर्ड में नाम बलवंता है. बलवंता इस परिवार के एकमात्र ऐसे सदस्य हैं, जो पुलिस से हुई अंतिम मुठभेड़ में बच गए थे. करीब 13 घंटे तक चली मुठभेड़ में पान सिंह तोमर सहित गैंग के 28 डकैत मारे गए थे. बलवंता पर 70 मुकदमे दर्ज थे, जिन में 30 हत्या के थे.

पान सिंह तोमर भारतीय सेना में थे और अंतर्राष्ट्रीय धावक भी. बाद में वह बागी बन गए. उन के नाम से ही फिल्म भी बनी है. बलवंता का कहना था कि फिल्म में सब कुछ सच दिखाया गया है. अभिनेता इरफान खान ने अच्छा अभिनय किया था, लेकिन फिल्म निर्देशक ने धोखा दिया. फिल्म बनाने की अनुमति के समय उन का इंटरव्यू लिया था. तब जो शर्तें तय हुई थीं, बाद में वह उन से मुकर गया. फिलहाल मामला अदालत में चल रहा है. बलवंता जिन दिनों चंबल में थे, अगर कोई पेड़ काटता था, वह उसे कुल्हाड़ी से मारते थे, क्योंकि बीहड़ में पेड़पौधे ही उन के घर थे.

बलवंता ने जंगलों पर मंडराते खतरे पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि जंगल नहीं रहेगा तो किसान भी नहीं रहेगा. क्योंकि जंगलों के साफ हो जाने से अकाल पड़ेगा. काली मां के अनन्य भक्त बलवंता ने पान सिंह तोमर के समय लूट के पैसों से मंदिर भी बनवाया था. खारिया गांव के रहने वले अध्यापक के बेटे से बागी बने मुन्ना सिंह मिर्धा के लिए एके 47 चलाना खेल था. उन का निशाना अचूक है. बंदूक से उन्हें आज भी मोहब्बत है. वह दद्दा मलखान सिंह गैंग में थे. 18 साल की उम्र में बागी बन कर 12 सालों तक बीहड़ों में राज किया. 1982 से उन्होंने गैंग के साथ आत्मसमर्पण किया था.

उन का कहना था कि जब तक उन के पास बंदूक रही, लोग उन की बात सुनते थे, लेकिन आज हालात बदल गए हैं. अब वह बंदूक साथ नहीं रखते, जिस से उन्हें काम कराने के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं. बागी रहते हुए उन से जो हुआ, उस का उन्हें पछतावा नहीं है. लेकिन जो गलती से मर गया, उस का दुख आज भी है. अब उन की इच्छा है कि वह पर्यावरण के लिए काम करें और अपने गांव को आदर्श गांव बनाएं.

सन 1993 में जेल से बाहर आते ही मुन्ना सिंह ने पहला पेड़ अपनी जन्मभूमि पर लगाया था. वह जेल में जो मांगते थे, वह उन्हें मिलता था. उन के लिए जेल में अलग से खीरपूरी बनाई जाती थी. जेल से ही जिस कागज पर दस्तखत कर के भेज देते थे, तुरंत वह काम हो जाता था. जंगल में रहने पर भी उन की नेताओं से सांठगांठ थी. मुन्ना सिंह पर 135 मुकदमे दर्ज थे. उन में हत्या के कितने थे, पता नहीं. उन के हथियार विदेश से आते थे. उन का कहना था कि शासनप्रशासन अगर उन का साथ दे तो वह पर्यावरण को बचा सकते हैं.

चंबल का शेर कहलाने वाले मलखान सिंह को आज भी लोग दद्दा कहते हैं. मंदिर की सौ बीघा जमीन को मंदिर में मिलाने की मांग को ले कर 26 साल की उम्र में पंच रहते हुए बागी बने मलखान सिंह को बागी रहते हुए जो कुछ हुआ, उस का उन्हें जरा भी मलाल नहीं है.  उन्होंने जो कुछ भी किया, वह अन्याय के खिलाफ किया. वह 15 साल बीहड़ में रहे, वहां उन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई. जेल में रहते खाने या किसी तरह की कोई परेशानी हुई तो वह जेलर से भिड़ जाते थे. उन का कहना था कि आज भी जेलों में कैदियों की स्थिति दयनीय है. जेलों में आधे लोग बेकसूर बंद हैं.

अन्याय सहन करने के बजाय बीहड़ को अच्छा बताने वाले मलखान सिंह ने बागी रहते गरीब और जरूरतमंदों के अलावा ईमानदार लोगों की भी मदद की, आदर्श गांव बनाए. उन कहना था कि अगर सरकार सहयोग करे तो वह आज भी आदर्श गांव बनाने की इच्छा रखते हैं. अपने समय में वह गाय काटने वाले को छोड़ते नहीं थे.

मलखान सिंह को बीबीसी लंदन ने कई बार दस्यु सम्राट कह कर संबोधित किया था. उन के जीवन पर आर.के. चौकसे दद्दा मलखान सिंह नाम से फिल्म बना रहे हैं. फिल्म में डिंपल कपाडि़या व मुकेश तिवारी भी अभिनय कर रहे हैं. फिल्म की शूटिंग ग्वालियर की जेल में भी हुई है, जहां मलखान सिंह बंद रहे थे.  मलखान सिंह पर 32 पुलिसकर्मियों सहित 185 हत्याओं और डकैती के सैकड़ों मामले दर्ज थे. उन के गिरोह में 17 लोग थे, जो उन के गांव और आसपास के इलाकों के रहने वाले थे. चंबल घाटी में डेढ़ दशक तक बागी रहने के बाद करीब 32 साल पहले अर्जुन सिंह सरकार के समक्ष उन्होंने आत्मसमर्पण किया था.

दद्दा मलखान सिंह के साथी रहे पूर्व दस्यु रामप्रकाश ने सन 1979 में पहली बार बंदूक उठाई थी और दद्दा की गैंग में शामिल हो गए थे. तब से अब तक वह दद्दा के साथ ही बंदूक लिए खड़े नजर आते हैं. उत्तर प्रदेश के बड़ा कस्ता गांव के रहने वाले रामप्रकाश ने बताया कि बाबू गुर्जर महिलाओं से दुराचार करता था. उन्होंने विरोध किया तो उस ने उन्हें इतना मारा कि वह सिर्फ मरे नही. इस के बाद उन्होंने 3 लोगों की दिनदहाड़े गांव के चौराहे पर गोली मार कर हत्या कर दी और दद्दा की शरण में चले गए. तब से आज तक वह उन्हीं की शरण में हैं. आत्मसमर्पण भी उन्हीं के साथ किया था.

70 के दशक में चंबल घाटी में डाकू सरू सिंह का बड़ा आतंक था. वह 17 साल की उम्र में बागी बने थे. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और 12 सालों तक बीहड़ों पर राज किया. जयप्रकाश नारायण के समझाने पर सन 1972 में आत्मसमर्पण किया था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी मदद की थी. अदालत से उन्हें आजीवन कारावास हुई थी, लेकिन 8 सालों में ही वह जेल से बाहर आ गए थे. बस्तूरी गांव के रहने वाले सरू सिंह पर 540 केस दर्ज थे. इन में हत्या के 65 मामले थे. उन के गिरोह में 60 लोग थे. एक बार पुलिस से हुई मुठभेड़ में 9 पुलिस वाले तो 4 उन के साथी मारे गए थे. इस मुठभेड़ में सरू सिंह की गर्दन में गोली लगी थी, लेकिन 14 दिनों में ही वह घाव भर गया था.

उस समय जंगल में 11 दिनों तक उन्हें अन्न नहीं मिला था. उन का कहना था कि जंगल में जिस किसी ने उन्हें खाना दिया, वह सुरक्षित रहा. वह खुद को डकैत नहीं बागी कहते हैं. उन का कहना था कि डकैतों के समय में महिलाएं सुरक्षित थीं. मोहर सिंह और उन के नाम की आज भी कसमें खाई जाती हैं. आज भी वे एकदूसरे के लिए बंदूक उठा सकते हैं.

पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान में 7 राज्यों के करीब 30 पूर्व दस्युओं ने शिरकत की. उन्होंने वीरान और उजाड़ हो कर अपना अस्तित्व खोते जा रहे बीहड़ों को फिर से हराभरा कर पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली, साथ ही लोगों को पेड़ लगाने की मुहिम में शामिल होने का आह्वान किया. अब देखना यह है कि इन डाकुओं ने पर्यावरण की रक्षा का सिर्फ संकल्प ही लिया है या पहले की ही तरह अपने दिए वचन को पूरा भी करेंगे. Social Story

Crime Story: सिपाही ने किया खुद का अपहरण

Crime Story: दिल्ली पुलिस का सिपाही रविंद्र एक समृद्ध परिवार से था. लेकिन अपनी बुरी लतों की वजह से उस पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया. इस कर्ज को अदा करने और सुखसुविधाओं वाली जिंदगी जीने के लिए उस ने अपने अपहरण का जो ड्रामा रचा, उस से आखिर उसे क्या मिला…

किसी पुलिस वाले के साथ कोई वारदात पेश आ जाए तो पूरा पुलिस विभाग बिजली की सी गति से सक्रिय हो जाता है. इस की 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक तो यह कि वह विभाग का आदमी होता है, दूसरे प्रतिष्ठा दांव पर लगने के साथ कानूनव्यवस्था पर भी सवालिया निशान लग जाते हैं. सिपाही रविंद्र के मामले में भी ऐसा ही हुआ था. उस के अपहरण की खबर से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था.

उत्तर प्रदेश के कृषि प्रधान जनपद बागपत के एसएसपी रविशंकर छवि ने एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय के निर्देशन में आननफानन में पुलिस टीमों का गठन कर उस की तलाश में लगा दिया था. रविंद्र के अपहरण से न सिर्फ उस के परिवार वाले परेशान थे, बल्कि गांव वाले भी हैरान थे. अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ने के बदले 20 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. सिपाही रविंद्र कुमार जिला बागपत के थाना चांदीनगर के गांव ढिकौली का रहने वाला था. वह दिल्ली पुलिस में था और उस समय दिल्ली के थाना नरेला में तैनात था.

उस का परिवार काफी मजबूत हैसियत और रसूख वाला था. उस के पिता राजकुमार दिल्ली पुलिस से सबइंसपेक्टर सेवानिवृत्त हुए थे. गांव में उन के पास काफी खेतीबाड़ी थी. रविंद्र का एक और भाई था सुधीर, जो गांव में ही रहता था. दिल्ली के थाना नरेला में तैनात रविंद्र, बीचबीच में छुट्टी ले कर घर भी आता रहता था. वह छुट्टी पर घर आया था, तभी 22 फरवरी, 2016 की सुबह रहस्यमय स्थितियों में उस का अपहरण हो गया था. अपहरण की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार पुलिस बल के साथ उस के घर पहुंच गए थे. मामला चूंकि सिपाही के अपहरण का था, इसलिए एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय भी पहुंच गए थे.

रविंद्र के घर वालों ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार रविंद्र सुबह 10 बजे के करीब घर से थोड़ी दूरी पर अपने चचेरे भाई सत्यवीर और पड़ोसी सुकरमपाल से बातें कर रहा था. सत्यवीर और सुकरमपाल अपनेअपने घर चले गए. रविंद्र भी अपने घर की ओर आ रहा था, तभी वह रहस्यमय स्थितियों में गायब हो गया था. वह कहां, किस के साथ गया, इस की किसी को खबर नहीं थी. उस के घर वालों ने सोचा कि वह छुट्टी पर आया है, इसलिए गांव में किसी से मिलने चला गया होगा. लेकिन दोपहर 12 बजे के आसपास सुधीर के मोबाइल पर उस के मोबाइल से फोन आया. सुधीर ने फोन उठा कर पूछा, ‘‘हैलो रविंद्र कहां हो तुम?’’

सुधीर को तब झटका लगा, जब पलभर की खामोशी के बाद दूसरी ओर से रविंद्र के बजाय किसी दूसरे आदमी की आवाज आई, ‘‘रविंद्र हमारे कब्जे में है. अगर तुम उसे सहीसलामत पाना चाहते हो तो बहुत जल्द 20 लाख रुपए का इंतजाम कर लो.’’

यह सुन कर सुधीर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह सन्न रह गया. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘अ…अ…आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘इस बात पर ज्यादा ध्यान मत दो. जितना कहा है, उतना करो.’’ कुछ पल रुक कर फोन करने वाले ने कहा, ‘‘और हां, पुलिस को खबर करने की गलती मत करना, वरना हम रविंद्र को जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

इतना कह कर फोन करने वाले ने फोन काट दिया. उस ने पलट कर फोन किया तो मोबाइल स्विच्ड औफ हो चुका था. इस से घर वाले घबरा गए. रविंद्र की जान खतरे में थी. अपहर्त्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. अपहर्त्ताओं ने पुलिस में न जाने की धमकी दे कर उलझन पैदा कर दी थी. घर वालों ने आपस में विचारविमर्श किया. वे किसी नतीजे पर पहुचं पाते, एक घंटे बाद दोबारा दूसरे नंबर से फोन आया. इस बार उस ने कहा, ‘‘पैसे का इंतजाम जल्द से जल्द करो. पैसा कहां पहुंचाना है, इस के लिए हम दोबारा फोन करेंगे.’’

‘‘रविंद्र को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ रविंद्र के घर वालों ने कहा.

‘‘कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर पैसे नहीं मिले और तुम ने पुलिस को खबर कर दी तो हम अपना वादा भूल जाएंगे. फिर वह आप को जिंदा नहीं मिलेगा.’’ अपहर्त्ता ने धमकी भरे लहजे में कह कर फोन काट दिया.

राजकुमार बेटे के अपहरण से बुरी तरह परेशान थे. उन्होंने पुलिस की नौकरी की थी. मामले को छिपाना ठीक नहीं था, इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी. इस के बाद पुलिस उन के घर पहुंच गई. पुलिस को उम्मीद थी कि अपहर्त्ताओं ने रविंद्र को आसपास कहीं खेतों में छिपा दिया होगा, इसलिए पुलिस ने आसपास के खेतों में उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस ने गांव के अन्य लोगों से इस उम्मीद में पूछताछ की कि कोई सुराग या चश्मदीद मिल जाए. लेकिन इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. इस बीच थाने में रविंद्र के भाई सुधीर की तहरीर पर अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस अधिकारी पसोपेश में थे. इस बात का अंदेशा था कि रविंद्र का अपहरण किसी बड़े गिरोह ने किया होगा. अपहर्त्ता उसे नुकसान भी पहुंचा सकते थे. क्राइम ब्रांच की टीम को भी इस मामले में लगा दिया गया. अगले दिन रविंद्र के अपहरण की खबर अखबारों में छपी तो जिले में सनसनी फैल गई. थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार अपने सहयोगियों एसआई सतबीर सिंह भाटी और कर्मवीर सिंह के साथ सुरागरसी में लगे थे. जिस नंबर से अपहर्त्ताओं का फोन आया था, पुलिस ने उस नंबर की जांच की. उस की लोकेशन गाजियाबाद जिले के लोनी इलाके की पाई गई.

तुरंत एक पुलिस टीम गाजियाबाद भेजी गई. पुलिस के साथ रविंद्र के घर वाले और नातेरिश्तेदार भी अपने स्तर से उस की खोजबीन में जुटे थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. दिल्ली पुलिस को भी इस की सूचना दे दी गई थी. अपने सिपाही के अपहरण के बारे में जान कर थाना नरेला पुलिस सन्न रह गई थी. अपहर्त्ताओं ने उस दिन के बाद घर वालों से कोई संपर्क नहीं किया था. इस बात ने पुलिस की चिंता और बढ़ा दी थी. पुलिस रविंद्र की खोजबीन में लगी थी कि एक नाटकीय घटना घट गई. अगले दिन रविंद्र ने शाम को अपने घर वालों को फोन किया कि वह खेकड़ा इलाके में रेलवे स्टेशन के पास है, वे उसे लेने आ जाएं. घर वाले वहां पहुंचे तो रविंद्र डरासहमा खड़ा मिल गया. वे उसे घर ले आए.

इस की सूचना पुलिस को दी गई तो पुलिस उस के घर पहुंच गई. उस की सकुशल रिहाई से घर वाले खुश थे. इस बीच चर्चएं भी चलीं कि घर वाले उसे फिरौती दे कर ले आए हैं. रविंद्र बेहद हताश नजर आ रहा था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि सुबह जब वह घर की ओर जा रहा था, तभी एक कार उस के पास आ कर रुकी. कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स ने उस की तरफ एक विजिटिंग कार्ड बढ़ा कर कहा, ‘‘भाईसाहब, यह पता बता देंगे?’’

रविंद्र विजिटिंग कार्ड चेहरे के नजदीक ला कर पढ़ने लगा, तभी उसे चक्कर आ गया. बस उतने में ही कार सवार बदमाशों ने उसे खींच कर कार में डाल लिया. रविंद्र के अनुसार, विजिटिंग कार्ड में कोई ऐसा नशीला पदार्थ था, जो सांसों के जरिए शरीर में गया और उसे चक्कर आ गया. बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के उस का मोबाइल छीन लिया. एक बदमाश ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारा अपहरण किया है. अब हम तुम्हें तभी छोडेंगे, जब हमें 20 लाख रुपए मिल जाएंगे.’’

रविंद्र ने पूरी ताकत से विरोध किया, छूटने की भी कोशिश की. इस पर बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के हथियार तान कर कहा, ‘‘जरा भी चालाकी दिखाई तो तुम्हारा काम तमाम कर देंगे.’’

वे कार से उसे कहीं दूर ले गए और खेत में बांध कर बैठा दिया. इस बीच उन्होंने जबरन उसे नशे की गोलियां खिला कर उसे पानी पिला दिया. बीचबीच में उसे होश आता रहा. वह बुरी तरह आतंकित था. अगले दिन बदमाश आपस में बातें कर रहे थे कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. इसलिए इसे ज्यादा रखा गया तो खतरा बढ़ सकता है. पुलिस एनकाउंटर के डर से शाम के समय वे उसे कार में डाल कर खेखड़ा कस्बे तक लाए और स्टेशन के पास धकेल कर चले गए.

पुलिस ने रविंद्र से बारीकी से पूछताछ करनी चाही तो उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी तबीयत अभी ठीक नहीं है. मेरे साथ जो हुआ है, मैं उसे भूलना चाहता हूं. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि बदमाश मेरा ही अपहरण कर लेंगे.’’

पुलिस को लगा कि इस की मनोस्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन यह साफ हो गया था कि पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ दिया था. रविंद्र भले ही अपहर्त्ताओं के चंगुल से छूट कर आ गया था, लेकिन पुलिस अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. अपहर्त्ताओं के नंबर के साथ पुलिस ने अगले दिन रविंद्र के मोबाइल की भी लोकेशन हासिल कर ली. उसे देख कर पुलिस को हैरानी हुई, क्योंकि रविंद्र के मोबाइल की लोकेशन उन स्थानों से नहीं मिल रही थी, जहांजहां उस ने अपहर्त्ताओं द्वारा ले जाने की बात बताई थी.

अपहरण के बाद उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली के नांगलोई की भी थी. यह बड़ी अजीब बात थी. पुलिस ने उस से गहराई से पूछताछ करनी चाही तो वह कन्नी काटते हुए बोला, ‘‘सर, जो होना था, सो हो गया. जांच करने से क्या फायदा. बदमाशों ने मुझे जिंदा छोड़ दिया, यही बहुत बड़ी बात है, वरना वे मेरी जान भी ले सकते थे.’’

यह बात पुलिस अधिकारियों को अजीब लगी. क्योंकि रविंद्र खुद पुलिस वाला था. वह पुलिस जांच में सहयोग देने से न जाने क्यों कतरा रहा था. इस से पुलिस को दाल में काला नजर आने लगा. लेकिन कोई पुख्ता वजह पुलिस के हाथ नहीं लगी. इस बीच पुलिस को पता चला कि अपहर्त्ताओं ने जिस नंबर से फिरौती के लिए फोन किया था, वह सिमकार्ड दिल्ली के नरेला से खरीदा गया था. जांच को दिशा मिली तो पुलिस सिम बेचने वाले तक पहुंच गई. पुलिस ने सिम बेचने वाले अबरार को हिरासत में ले लिया.

अबरार नरेला का ही रहने वाला था और मोबाइल की दुकान चलाता था. पुलिस ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, सुन कर पुलिस चकरा गई. पता चला कि वह सिम सिपाही रविंद्र ने ही खरीदा था. जांच नाटकीय मोड़ पर आ गई. पुलिस ने 25 फरवरी को रविंद्र को हिरासत में ले लिया. पहले तो वह सिम खरीदने वाली बात से इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने मोबाइल लोकेशन दिखा कर अबरार से उस का सामना कराया तो वह टूट गया. पुलिस ने जब उस से विस्तार से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था.

बुरी लतों के शिकार रविंद्र ने खुद ही अपने अपहरण की ऐसी पटकथा लिखी थी, जिस से वह अपने ही घर वालों से फिरौती के रूप में मोटी रकम वसूल करना चाहता था. दरअसल, रविंद्र महत्वकांक्षी युवक था. उस ने पुलिस की नौकरी जरूर कर ली थी, लेकिन वेतन के रूप में मिलने वाली रकम से वह संतुष्ट नहीं था. वह तमाम सुखसुविधाओं के बीच ऐश की जिंदगी जीना चाहता था. जल्द अमीर बनने की चाहत में वह पुलिस होने के बावजूद जुएसट्टे की लत का शिकार हो गया था. इस तरह की लत इंसान को बर्बादी की ही ओर ले जाती है. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ.

धीरेधीरे वह करीब 5 लाख रुपए का कर्जदार हो गया था. बड़ा झटका तब लगा, जब जनवरी, 2016 के पहले सप्ताह में वह 44 हजार 600 रुपए सट्टे में हार गया. इस से उसे बड़ा झटका लगा. इस बीच एएसआई बनने के लिए वह एग्जाम भी दे चुका था. रविंद्र ने सोचा था कि वहां भी शायद उसे रकम खर्च करनी पडे, जबकि उस के पास कोई जमापूंजी नहीं थी. वह चाहता था कि उस के पास स्विफ्ट डिजायर कार हो. वह चाहता तो सब्र व समय के साथ घर वालों की मदद से उस की ये इच्छाएं पूरी हो सकती थीं, लेकिन सोच फितरती हो जाए तो बेलगाम हो जाती हैं. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. उस ने सोच लिया कि एक ही झटके में वह अपने सारे सपने पूरे कर लेगा.

कई दिनों की उधेड़बुन के बाद उस ने अपने ही अपहरण का नाटक कर के घर वालों से रुपए वसूलने की योजना बनानी शुरू कर दी. योजना के तहत उस ने अबरार की दुकान से फर्जी पते पर 2 सिमकार्ड खरीद कर एक्टिवेट करा लिए. योजना को अंजाम देने के लिए वह छुट्टी पर घर आ गया. 22 फरवरी की सुबह अपने चचेरे भाई और पड़ोसी से बात करने के बाद वह घर की तरफ चला जरूर, लेकिन उन लोगों के ओझल होते ही चुपचाप गांव से बाहर निकल गया. खेतों के रास्ते से होते हुए उस ने रास्ते से ही आवाज बदल कर अपने मोबाइल से फिरौती के लिए अपने  भाई को फोन कर दिया. आवाज बदलने की वह पहले ही कई दिनों से प्रैक्टिस कर रहा था.

वहां से निकल कर पहले वह लोनी पहुंचा, जहां से नए सिमकार्ड से उस ने एक बार फिर आवाज बदल कर फिरौती की रकम मांगी और धमकाया भी. इस के बाद वह दिल्ली पहुंचा और नांगलोई में रुक गया. रविंद्र को पूरी उम्मीद थी कि उस की जान की कीमत पर घर वाले फिरौती की रकम दे देंगे और उस की धमकी से डर कर पुलिस को सूचना नहीं देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, घर वालों ने पुलिस को सूचना दे दी. उस ने अगले दिन के अखबार देखे तो अपने अपहरण को ले कर पुलिस की सक्रियता की खबर पढ़ कर उस के होश उड़ गए. इस से उसे अपनी योजना धराशाई होती नजर आई.

वह जानता था कि सर्विलांस के जरिए उस की पोल खुल जाएगी. उस ने अपनी योजना बदल दी. वह नहीं चाहता था कि उस के अपहरण की जांच पुलिस आगे बढ़ाए. उस ने सोचा कि अगर वह सकुशल वापस घर पहुंच जाएगा तो मामला अपने आप ठंडे बस्ते में चला जाएगा. पुलिस जांच को आगे नहीं बढाएगी. इसी सोच के तहत वह अगले दिन खेखड़ा पहुंचा और घर वालों को फोन कर के अपने पास बुला लिया. घर आ कर उस ने पुलिस और घर वालों को मनगढंत कहानी सुना दी. पुलिस बारीकियों में न जाए, इस के लिए उस ने पहले तबीयत खराब होने का बहाना और फिर जांच न करने का आग्रह किया. लेकिन वह अपने ही बुने जाल में उलझ गया. पुलिस ने उस के मोबाइल से वह सिमकार्ड बरामद कर लिया.

पूछताछ के बाद एएसपी विद्यासागर मिश्र ने प्रेसवार्ता कर के उसे पत्रकारों के सामने पेश किया. बाद में रविंद्र और अबरार को अदालत में पेश किया. माननीय अदालत ने दोनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थे. उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं. योजना में रविंद्र का कोई साथी तो नहीं शामिल था. पुलिस इस की भी जांच कर रही थी. रविंद्र बुरी लत का शिकार न हुआ होता  और अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखा होता तो आज यह नौबत न आती. बागपत पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली पुलिस ने भी उसे सस्पैंड कर दिया था. हालांकि जेल जाने से पूर्व रविंद्र का कहना था कि उस का अपहरण हुआ था और बदमाशों ने ही फिरौती मांगी थी. उस पर लगे आरोप गलत हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: हौंसले वाली लड़की

Hindi Stories: इंसान की जिंदगी में यादों का खास महत्व होता है. जो यादें मन को सुकून देती हैं, उन्हें कोई भूलना नहीं चाहता. जबकि कड़वी यादों को इंसान भूल से भी याद नहीं करना चाहता. लेकिन यादों की डोर आदमी के अपने वश में नहीं होती. दिमाग के परदे पर गाहेबगाहे हर तरह की यादें दस्तक देती रहती हैं. तकलीफ तब होती है, जब कड़वी यादें वर्तमान को प्रभावित करने लगती हैं.

एक शाम ऐलिशिया कोजाकीविक्ज अपने कमरे में बैठी थी, अनायास ही पुरानी यादें उस के सुकून पर हावी हो गईं. उस ने उन से पीछा छुड़ाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह उन बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ा सकी. जब मन परेशान  होने लगा तो उस ने उन यादों को मन के द्वार से निकाल कर आंखों की ऊपरी सतह पर लाने की सोची, ताकि डरावने दृश्य शब्द बन जाएं.

ऐलिशिया ने उन बुरी यादों की अखबारी कटिंग काट कर एक फाइल बना ली थी. उस फाइल में केवल बुरी यादों की ही खबरें नहीं थीं, बल्कि उस की तारीफ में छपी कुछ खबरें और रिपोर्ताज भी थे. वह उस फाइल को ले कर टेबल पर बैठ गई और एकएक खबर को उचटती नजरों से देखने लगी. सभी ऐसी खबरें थीं, जिन्हें उस ने सैकड़ों बार पढ़ा था, इसलिए जानीपहचानी थीं. मन की दिशा बदलने के लिए उस ने सतही तौर पर खबरें पढ़ीं तो, लेकिन बुरी यादों के किसी भी चित्र को आंखों के द्वार पर दस्तक नहीं देने दी. ऐलिशिया अभी उन खबरों की फाइल को उलटपुलट ही रही थी कि उस ने अपने कंधे पर हाथ का स्पर्श महसूस किया. उस ने पलट कर देखा, पीछे उस की मां मैरी खड़ी थीं.

ऐलिशिया के चेहरे पर नजर पड़ी तो वह उस की उदासी और परेशानी को भांप कर थोड़ी नाराजगी से बोलीं, ‘‘ऐलिशिया बेबी, तुम फिर उन्हीं बुरी यादों में डूबी हो न? इट इज नौट गुड बेबी. अब तुम उस सब से बहुत दूर आ चुकी हो. भूल कर भी तुम्हें उस सब के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए. इस के बजाय तुम्हें यह सोच कर खुश होना चाहिए कि लोग तुम्हें पसंद करते हैं. बच्चों के लिए तुम एक नेक काम कर रही हो.’’

‘‘सौरी मम्मा, बट…’’

मैरी ने उस की बात को बीच में ही काट कर समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘कम औन ऐलिशिया, जो बीत गया सो बीत गया. तुम सिर्फ अपने फ्यूचर पर फोकस करो. हमें नाज है तुम पर. अब तुम्हें गुजरे जमाने की बातों को ले कर बिलकुल नहीं सोचना चाहिए. बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ाओगी तो वे तुम्हें परेशान करती रहेंगी. हम अपनी बेटी के चेहरे पर जरा सी भी उदासी नहीं देखना चाहते.’’

‘‘ओके मम्मा, अब ऐसा नहीं होगा.’’ ऐलिशिया ने मुसकरा कर कहा और खड़ी हो कर मां के गले लग गई.

ऐलिशिया कई साल पहले जिस भयानक हादसे से रूबरू हुई थी, वह उस के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ गया था. उस हादसे में उस का दिल ही नहीं, आत्मा तक घायल हुई थी. ऐलिशिया के दिमाग में एक अंजाना सा डर घर कर गया था. परिवार की सहानुभूति, मनोचिकित्सकों के उपचार और खुशनुमा माहौल दे कर जैसेतैसे उस डर को ऐलिशिया के दिमाग से निकाला गया था.

ऐलिशिया ने खुद भी उस डर से उबरने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन इस सोच के साथ कि वह कुछ ऐसा करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी दूसरे के साथ न हो. इसी सोच के चलते उस ने अपने साथ हुई भयानक घटना को एक उद्देश्य में बदल दिया. यह सब निस्संदेह आसान नहीं था. लेकिन ऐलिशिया ने मजबूत इरादों के साथ जो मुहिम चलाई, वह काफी हद तक कामयाब रही.

उस की यह मुहिम थी, आधुनिकता की चकाचौंध भरे इस साइबर युग में बच्चों को उन के सिर पर मंडराते खतरों से बचाने की. इस का परिणाम अच्छा ही निकला. जल्दी ही वह बच्चों को जागरूक करने वाली रोल मौडल बन गई. न केवल उस के काम को सराहना मिली, बल्कि सरकार ने उस के नाम पर बच्चों को सुरक्षा देने वाला एक कानून भी बना दिया. ऐलिशिया अब वाकई एक बड़ा नाम है.

ऐलिशिया कमउम्र में जिस घटना का शिकार हुई थी, वह वाकई खौफनाक थी. उस का गुनाह सिर्फ इतना था कि वह इंटरनेट चैटिंग की लत का शिकार थी. भावनाओं में बह कर वह अपनी सोचनेसमझने की क्षमता भी खो बैठी थी. इंटरनेट की सोशल साइट पर एक शख्स पर विश्वास करना उस के लिए बहुत खौफनाक साबित हुआ था.

गनीमत बस इतनी थी कि वह उस शख्स के चंगुल में फंसी होने के बाजवूद जिंदा थी और पुलिस ने वक्त पर पहुंच कर उसे छुड़ा लिया था. ऐलिशिया अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य के खूबसूरत शहर पीटर्सबर्ग की रहने वाली थी. उस के पिता चार्ल्स एक समृद्ध कारोबारी थे. परिवार में कुल जमा 4 लोग थे, ऐलिशिया, उस की मां मैरी और एक बड़ा भाई.

घटना के समय ऐलिशिया महज 13 साल की थी. पढ़ाई के दौरान कंप्यूटर इंटरनेट का इस्तेमाल उस की आदत में शुमार था. उस का भाई भी यह सब करता था. ऐलिशिया ने अपने हमउम्र दोस्तों और उन के संपर्क के लोगों से औनलाइन चैटिंग शुरू कर दी. पढ़ाई के बाद उस का ज्यादातर वक्त इसी में बीतता था. कह सकते हैं कि वह इस लत का शिकार हो गई थी. उस के कई दोस्त बने, जिन में एक नया दोस्त स्कौट भी था. स्कौट बातें बनाने में माहिर था. उस की बातों का अंदाज ऐलिशिया को गुदगुदाता था. चैटिंग का दायरा बढ़ा तो ऐलिशिया को अपने नए दोस्त के बारे में बहुत सी बातें पता चलीं. उसे भी वही चीजें पसंद थीं, जो ऐलिशिया को पसंद थीं.

कई बार बच्चों को पता नहीं चलता कि वह स्मार्ट और खूबसूरत हैं. उन्हें तब बहुत खुशी मिलती है, जब कोई दूसरा बताता है कि वे स्मार्ट हैं, सुंदर हैं. ऐलिशिया के साथ भी यही हुआ. स्कौट ने ऐसी बातें कर के कुछ ही दिनों में उस का विश्वास जीत लिया. ऐलिशिया दूसरों पर बहुत जल्द विश्वास करने वाली मासूम लड़की थी. उस का परिवार एकदूसरे के बहुत करीब था. पिता व्यस्त रहते थे, फिर भी परिवार की खुशियों के बीच वक्त जरूर निकाल लेते थे. मैरी दोनों बच्चों को बहुत प्यार करती थीं. बेटी को इंटरनेट पर उलझी देख कर वह उसे अंजान लोगों से सावधान रहने के लिए कहती रहती थीं.

ऐलिशिया का दोस्त स्कौट बहुत दिलचस्प था. उसे गुडमौर्निंग कहने से ले कर गुडनाइट कहने तक वह छोटीछोटी बातों तक का खयाल रखता था. वह कभी भी किसी भी बात पर ऐलिशिया से नाराज नहीं होता था. कभी ऐेलिशिया उस से नाराज हो जाती तो वह उसे मना लेता था. दोनों ही एकदूसरे में दिलचस्पी लेते थे और रोजाना घंटोंघंटों तक चैटिंग करते थे. महीनों तक चली चैटिंग ने दोनों को काफी करीब ला दिया था.

स्कौट के कहने पर ऐलिशिया ने उसे अपनी कई फोटो भेजी थीं. उस के हर फोटो की वह दिल खोल कर तारीफ करता था. इस सब से ऐलिशिया को बहुत खुशी मिलती थी. इस के बावजूद दोनों की कभी मुलाकात नहीं हुई थी. ऐलिशिया ने उसे अपने परिवार के बारे में सारी जानकारियां दे रखी थीं. स्कौट उसे समझाता था कि वह अपनी इस दोस्ती के बारे में किसी को न बताए.

दिसंबर, 2001 में स्कौट ने ऐलिशिया के सामने मिलने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस ने इनकार कर दिया. इस पर स्कौट ने उस से मीठीमीठी बातें कीं, कसमें दीं, अपनी कई महीनों की दोस्ती का वास्ता दिया. अंतत: किसी तरह वह ऐलिशिया को मनाने में कामयाब हो गया. दोनों ने तय कर लिया कि वे 31 दिसंबर की रात न्यू ईयर पर मिलेंगे. स्कौट ने उसे बताया था कि जिस ब्लौक में उस का घर है, वह वहां से कुछ दूर खड़ा मिल जाएगा. ऐलिशिया इस के लिए तैयार हो गई. उस ने सोशल साइट के उस दोस्त पर पूरा विश्वास कर लिया, जिस से वह पहले कभी नहीं मिली थी. चैटिंग से उपजी भावनाओं और विश्वास ने स्कौट को उस के सपनों का राजकुमार बना दिया था.

31 दिसंबर की रात को न्यू ईयर का जश्न पूरी दुनिया में मनाया जाता है. क्रिसमस के बाद आने वाली 31 दिसंबर की रात अमेरिकियों के लिए तो और भी खास होती है. ऐलिशिया के परिवार के लिए भी वह रात खास थी. लोग नए साल के जश्न की तैयारियों में डूबे थे. छोटीबड़ी इमारतें रोशनी से नहाई हुई थीं.

उस दिन शाम से ही मौसम बेहद सर्द था. रुकरुक कर बर्फ गिर रही थी. ऐलिशिया स्कौट से मिलने की कल्पनाओं में डूबी थी. उस के घर में भी सब खुश थे. सभी ने एकसाथ डिनर किया. 9 बजने वाले थे. ऐलिशिया को सब की नजरों से बच कर घर से निकलना था. उस ने अपनी मां मैरी से कहा, ‘‘मम्मा, आई एम गोईंग. मुझे नींद आ रही है.’’

‘‘ओके, हैप्पी न्यू ईयर बेबी.’’ मां ने प्यार से कहा.

इस के बाद नींद के बहाने ऐलिशिया उन लोगों से अलग हो कर अपने कमरे में चली गई. उम्र के बहाव ने उसे जरूरत से ज्याद चालाक बना दिया था. स्कौट को साढ़े 9, 10 बजे आना था. यह सब गलत था, पर दोस्ती की खातिर वह स्कौट से मिलने के लिए तैयार हो गई थी. साढ़े 9 बजने को आए तो उस ने चुपके से घर का जायजा लिया. घर के सभी लोग डाइनिंग हौल में बैठे टीवी देखने में मशगूल थे. ऐलिशिया चुपके से मुख्य दरवाजा खोल कर घर से बाहर निकल गई.

बाहर बहुत ठंड थी. एकदम सन्नाटा पसरा था. सड़कों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी थी. मौसम से लड़ती स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी भी धुंधलाई हुई थी. ऐलिशिया ने ठंड से बचने के लिए जींस, टौप, जैकेट और स्टालर पहन रखा था. ठंड से बचने की कोशिश करते हुए वह सड़क पर चलने लगी. सन्नाटे में उसे केवल अपने पैरों के नीचे बर्फ के कुचलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी.

मन ही मन वह डर भी रही थी. डरावनी खामोशी के साए में वह अपने ब्लौक को पार कर के कोने पर पहुंची. तभी उस के दिल ने कहा कि वह गलत कर रही है, उसे वापस चले जाना चाहिए. अपने इस खयाल पर अमल करने के लिए वह मुड़ी, लेकिन तभी उस के कानों में आवाज पड़ी, ‘‘हाय ऐलिशिया, प्लीज कम.’’

ऐलिशिया ने आवाज की दिशा में पलट कर देखा. आवाज सड़क किनारे खड़ी एक कार से आई थी. ड्राइविंग सीट पर एक शख्स बैठा नजर आ रहा था. उस ने सोचा कि वह स्कौट ही होगा, जो सर्द मौसम में कार लिए उस का इंतजार कर रहा है. वह कार की ओर लपकते हुए ड्राइविंग सीट के बगल वाले दरवाजे के नजदीक पहुंची. कार में ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने उस के वहां पहुंचते ही दरवाजा खोल दिया. ऐलिशिया ने झुक कर देखा तो बुरी तरह चौंकी. कार में बैठा शख्स अधेड़ उम्र का व्यक्ति था. निस्संदेह वह उस का दोस्त स्कौट कतई नहीं था. क्योंकि उस की फोटो उस ने इंटरनेट पर मंगा कर कितनी ही बार देखी थी.

ऐलिशिया कुछ सोचसमझ पाती, इस के पहले ही उस व्यक्ति ने उस का बाजू पकड़ कर खींचा और कार की सीट पर बैठा दिया. ऐलिशिया बुरी तरह डर गई. दिमाग जैसे शून्य हो गया. इसी दरम्यान उस व्यक्ति ने फुरती दिखाते हुए एक रस्सी से उस के हाथ बांध दिए. साथ ही गुर्राया भी, ‘‘शोर मत मचाना वरना मार कर पीछे कार की डिक्की में डाल दूंगा.’’

डरीसहमी ऐलिशिया को जान का खतरा सताने लगा. वह समझ गई कि वह बड़े खतरे में फंस गई है. उस व्यक्ति ने तेजी से कार चलानी शुरू कर दी. सड़क पर पड़ी बर्फ को कुचलती हुई कार पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. कार से ऐलिशिया सड़कों पर लगे साइनबोर्ड्स ही देख पा रही थी. वे उस के रोज के जानेपहचाने थे. उस सड़क पर आगे टोलबूथ पड़ने वाला था. ऐलिशिया को वहां बचने की उम्मीद नजर आई, क्योंकि बूथ के अंदर बैठे कर्मचारी बच्चों को बहुत प्यार करते थे. वे उन का हालचाल पूछते थे और कभीकभी टाफियां भी देते थे. ऐलिशिया जब मातापिता के साथ जाती थी तो भी ऐसा ही होता था. वह सोच रही थी कि जब बूथकर्मी उसे सीट पर रोते हुए देखेंगे तो पूछेंगे कि क्या हुआ?

इस के बाद उस अंजान खतरनाक शख्स का भेद खुल जाएगा. वह पुलिस बुला कर उसे आजाद करा लेंगे. कार बूथ पर पहुंची. लेकिन उसे किसी ने नहीं देखा. ठंडे मौसम की वजह से कर्मचारी एक छोटी खिड़की के जरिए ही टोलटैक्स का लेनदेन कर रहा था. कार आगे बढ़ गई. इस के साथ ही ऐलिशिया की उम्मीद भी टूट गई. ऐलिशिया बुरी तरह डरी हुई थी. उसे लग रहा था कि वह शख्स अब कहीं कार रोकेगा, उसे मारेगा और सड़क किनारे फेंक देगा. रास्ते में टेलीफोन बूथ भी था. वह सोच रही थी कि काश वह अपने घर एक फोन कर पाती तो उसे खतरे से आजादी मिल जाती. वह कसमसाती तो वह व्यक्ति गुर्रा कर उसे जान से मारने की धमकियां दोहराता.

करीब 4 घंटे के सफर के बाद कार एक घर के पोर्च में जा कर रुकी. वह व्यक्ति नीचे उतरा. उतरने से पहले वह फिर गुर्राया, ‘‘चुप रहना, वरना अच्छा नहीं होगा.’’

उस ने ताला खोल कर घर का दरवाजा खोला. इस के बाद उस ने ऐलिशिया को खींच कर नीचे उतारा और उसे धकेलते हुए घर में बने बेसमेंट में ले गया. वहां एक ताला लगा दरवाजा था. वह बोला, ‘‘तुम्हारे साथ इतना बुरा होने जा रहा है, जिस के बारे में तुम ने सोचा भी नहीं होगा. अब तुम जितना चीखना चाहो, चीखो.’’

‘‘प्लीज मुझे छोड़ दो.’’ ऐलिशिया गिड़गिड़ाई.

लेकिन तब तक उस ने दरवाजा खोल कर उसे अंदर खींच लिया. वह हैवान उस के साथ क्रूर ढंग से पेश आ रहा था. उस ने ऐलिशिया के कपड़े उतार कर उस के गले में कुत्ते का पट्टा डाल कर उसे जमीन पर खींचा और फिर खींचते हुए ही बिस्तर पर गिरा दिया. इस के बाद उस ने ऐलिशिया के साथ जबरदस्ती की. ऐलिशिया डर, दहशत और दर्द से बेहाल रोती और तड़पती रही. उस की बातों, उस के गिड़गिड़ाने या रोने का उस पर कोई असर नहीं पड़ा. अगले 3 दिनों तक वह उसे मारतापीटता और उस के साथ जबरदस्ती करता रहा. वह उसे खानेपीने के लिए भी बहुत कम देता था. ऐलिशिया के आंसू खत्म हो चुके थे. उसे विश्वास हो गया था कि जब उस हैवान का मन भर जाएगा तो वह उसे मार ही देगा.

ऐलिशिया भावनाओं में किए गए विश्वास पर पछता रही थी. उसे अपने परिवार की याद भी सता रही थी. वह सोच रही थी कि घर वाले उसे जिंदा रहते या मरने के बाद ढूंढ़ ही लेंगे. चौथे दिन शाम को उस हैवान ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें मारने वाला था, लेकिन मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं, इसलिए जिंदा रखूंगा. तुम अब सब कुछ भूल कर मेरे साथ रहने की आदत डाल लो.’’

उस आदमी की आंखों में हैवानियत, बातों में कठोरता और चेहरे पर क्रूरता थी. यकीनन वह बेहद खतरनाक किस्म का आदमी था. शाम ढले वह खाना लाने की बात कह कर ऐलिशिया को कमरे में बंद कर के चला गया. प्यार जताने की कोशिश में उस ने ऐलिशिया को पूरी तरह नहीं बांधा था. उस ने बिस्तर पर उसे खुला छोड़ कर बैडरूम के बाहर का ताला लगा दिया था. अलबत्ता जाने से पहले वह उस के हाथ बांधना नहीं भूला था. ऐलिशिया के ऊपरी हिस्से को उस ने बेपर्दा ही रहने दिया था. वह टेलीफोन पर अपने दोस्तों से कहा करता था कि वह जिंदगी के मजे ले रहा है और उन्हें भी मजे करा सकता है. ऐलिशिया को यह डर भी सता रहा था कि वह अपने दोस्तों के सामने उसे शिकार की तरह डाल सकता है.

रात हो चुकी थी. तभी ऐलिशिया ने दरवाजे पर एक साथ कई कदमों की आहट सुनी. वह बुरी तरह डर गई. उस ने सोचा कि वह अपने साथ दोस्तों को लाया होगा. ऐलिशिया बिस्तर से उतर कर बैड के नीचे छिप गई. दरवाजा खुला, उसे बैड के नीचे से कई बूट दिखाई दिए. एक व्यक्ति ने उसे बैड के नीचे से ढूंढ़ निकाला. उस ने कहा, ‘‘बाहर निकल आओ, हम तुम्हें बचाने के लिए आए हैं.’’

डरीसहमी ऐलिशिया बाहर निकली. उस के अर्द्धनग्न बदन पर नजर पड़ते ही सशस्त्र लोगों ने पीठ घुमा ली. उन के हाथों में पिस्तौलें और वर्दी देख कर वह समझ गई कि ये पुलिस वाले हैं. उन में एक महिला पुलिसकर्मी भी थी. उस ने ऐलिशिया के हाथ खोले और सोफे पर पड़ी उस की जैकेट उसे पहनने को दी. उन लोगों के कब्जे में वह हैवान आदमी भी था. उस के हाथों को पीछे कर के हथकडि़यां लगा दी गई थीं, वह कसमसा रहा था.

पुलिस ऐलिशिया को गाड़ी से थाने ले गई. उसे सब से ज्यादा खुशी तब मिली जब उस के मातापिता ने दौड़ कर उसे गले लगा लिया. ऐलिशिया के लिए एक तरह से यह दूसरी जिंदगी थी. नरक से निकल कर मां की बांहों में वह खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी. पुलिस ने उस आदमी से पूछताछ की तो पता चला कि वह एक हैवान की घिनौनी मानसिकता का शिकार हुईर् थी.

पुलिस ने जिस व्यक्ति को पकड़ा था, उस का नाम टैरी था. 38 वर्षीय टैरी वर्जीनिया का रहने वाला था. किशोर उम्र की लड़कियों को ले कर वह विकृत मानसिकता का शिकार था. वह अकेला रहता था और उस में कई बुरी आदतें थीं. इंटरनेट चैटिंग से वह लड़कियों को अपने जाल में उलझाता था और उन के साथ गंदी बातें किया करता था. टैरी ने कई नामों से अपनी आईडी बनाई हुई थी. उस का ज्यादातर वक्त चैटिंग में ही बीतता था. ऐलिशिया को भी उस ने अपने जाल में उलझा लिया था. अपनी उम्र व पहचान छिपा कर वह खुद को उस का हमउम्र लड़का बन कर चैटिंग करता था. उस ने इंटरनेट से एक किशोर के कई फोटो चुरा लिए थे, जिन्हें वह ऐलिशिया को भेजता था.

ऐलिशिया किशोर थी. उस में बहुत ज्यादा समझ नहीं है, यह बात टैरी चंद रोज की चैटिंग में ही समझ गया था. उसे वह आसान शिकार लगी. उस की भावात्मक बातों से वह उस पर विश्वास करने लगी थी. ऐलिशिया जब पूरी तरह भावात्मक रूप से उस के साथ जुड़ गई तो टैरी ने उसे मिलने के लिए तैयार कर लिया. जब वह उस के कब्जे में आ गई तो वह हैवान बन गया. उधर ऐलिशिया का परिवार उस के रहस्यमय तरीके से गायब होने से बुरी तरह परेशान था. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से उन्होंने उस की बहुत खोजबीन की.

परिवार पर नए साल की खुशियों पर गम और परेशानी की धुंध जम गई थी. पूरी रात की परेशानी और उलझन के बाद चार्ल्स ने ऐलिशिया का फोटो दे कर पुलिस में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. पुलिस सक्रिय हो गई और ऐलिशिया के फोटो व पहचानशुदा इश्तहार जारी कर दिए. कोई नहीं जानता था कि ऐलिशिया कहां चली गई. 2 दिनों बाद एक व्यक्ति ने पुलिस को गुप्त सूचना दी कि उस ने इंटरनेट पर औनलाइन एक व्यक्ति को एक बच्ची का यौनशोषण करते देखा है. वह मुसीबत में थी और बचने के लिए छटपटा रही थी. ऐलिशिया लापता थी, पुलिस उसे खोज रही थी. इस बात से उसे लगा कि वह ऐलिशिया भी हो सकती है. ऐलिशिया न भी होती तो भी यह एक बच्ची के शोषण का गंभीर मामला था.

पुलिस ने उस व्यक्ति से पूछताछ कर के पता किया तो उस ने वह इंटरनेट आईडी लिंक पुलिस को दे दी, जिस पर उस ने लाइव वीडियो देखा था. पुलिस सुरागरसी में जुट गई. पुलिस ने उस आईडी का आईपी ऐड्रेस निकलवाया तो वह टैरी का निकला. पुलिस ने टैरी की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की तो वे पूरी तरह संदिग्ध पाई गईं. एक शाम पुलिस टीम उस के घर तक पहुंच गई. इत्तफाक से टैरी तभी खाना पैक करा कर वापस आया था. उसे कब्जे में ले कर ऐलिशिया को बरामद कर लिया गया. ऐलिशिया को उस के परिवार के सपुर्द कर के टैरी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया.

इस घटना के बाद ऐलिशिया को लगने लगा था कि उस के लिए दुनिया में कुछ नहीं बचा है. वह डर का शिकार हो गई थी. दिलोदिमाग पर सिर्फ डर छाया था. बेटी को दर्द से निकालने के लिए उस के मातापिता ने मनोचिकित्सकों का सहारा लिया. खुद भी वह उस का बड़ा सहारा बने. अमूमन ऐसे मामलों में लोग बच्चों को भी दोषी मान लेते हैं, लेकिन चार्ल्स और मैरी ने ऐसा कतई नहीं किया. उन्होंने उसे प्यार से संभाला. लंबे समय के बाद वह स्कूल गई. समय अपनी गति से चलता रहा. ऐलिशिया की कड़वी यादों ने साथ नहीं छोड़ा था. उधर एक साल बाद सन 2003 में अदालत ने टैरी को दोषी पा कर उसे 20 साल कैद की सजा सुनाई.

ऐलिशिया ने पढ़ाई में मन लगाया. अब वह काफी समझदार हो गई थी. वह चाहती थी कि वह बच्चों के लिए ऐसा कुछ करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी और के साथ न हो. इस के लिए उस ने झिझक छोड़ कर बिना यह सोचे कि लोग क्या कहेंगे, बच्चों को जागरूक करना शुरू किया. उस ने इंटरनेट के खतरों पर सार्वजनिक रूप से बोलना शुरू किया. वह स्कूलों में जाती और अपनी आपबीती बता कर बच्चों को आगाह करती. अभिभावकों, शिक्षकों को भी आगाह करती. वह जानती थी कि इंटरनेट को ले कर ऐसी कोई शिक्षा नहीं दी जाती कि बच्चे इंटरनेट के खतरों से सतर्क रह सकें. अगर उसे भी उदाहरणों के साथ ऐसी शिक्षा दी गई होती, तो शायद वह इस खतरे से बच जाती.

अब वह बच्चों को जागरूक कर के खुद उदाहरण बनना चाहती थी. अपने साथ घटी इस भयानक घटना को उस ने उद्देश्य में बदल दिया. लेकिन पहली बार जब उस ने एक स्कूल में बोलना चाहा तो अपने साथ घटी घटना को पूरी तरह बयान नहीं कर पाई. बस माइक पर खड़ी रोती रही. इस के बावजूद ऐलिशिया ने बच्चों को इंटरनेट के उस जाल से बचाना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया, जिस में वह खुद फंस गई थी. वह चाइल्ड वैलफेयर एक्टीविस्ट बन गई. ऐलिशिया खुद जिस हादसे का शिकार हुई थी, उस में पहचान छिपाने की जरूरत थी. लेकिन ऐलिशिया का मनाना था कि अगर वह ऐसा करेगी तो वे बच्चे खतरे में पड़ जाएंगे, जिन्हें जागरूक कर के वह बचा सकती है.

इस चिंता को उस ने अपने पास नहीं फटकने दिया. मीडिया में ऐलिशिया सुर्खिया बनने लगी. उस के काम की सराहना होती थी. बच्चों के अधिकारों के लिए वह आगे बढ़ कर सरकार तक उन की बात पहुंचाती थी. अब वह अलग किस्म की लड़की बन चुकी थी. ऐलिशिया ने पौइंट पार्क यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया तो उस ने ग्रेजुएशन के लिए फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय का चुनाव किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो इस विषय की गहराई में जा कर वह खुद की बुरी यादों को धुंधला कर सकती थी, दूसरे बच्चों को भी वह मनोवैज्ञानिक ढंग से अपनी बात समझा सकती थी. ऐलिशिया के इंटरनेट सिक्योरिटी और बच्चों के मानवाधिकार संरक्षण की पैरोकारी व लापता बच्चों के लिए किए जा रहे उस के काम को बहुत ख्याति मिली.

धीरेधीरे ऐलिशिया एक बड़ा नाम बन गई. सन 2007 में उस ने नेशनल एसोसिएशन प्रोजेक्ट टू चिल्ड्रेन संस्था के साथ मिल कर सरकार के सामने बच्चों को इंटरनेट के खतरों से बचाने, उन्हें शिकार बनाने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाने तथा बच्चों की तस्करी रोकने का मुद्दा उठा कर पुख्ता कानून बनाने की जरूरत के साथ प्रोजैक्ट रखा. अमेरिकी सरकार ने उस पर गंभीरता से विचार कर के ‘इंटरनेट क्राइम्स अगेंस्ट चाइल्ड टास्क फोर्स’ (आईसीएसी) का गठन किया. उस के साथ घटी घटना को उदाहरण बना कर सरकार ने सन 2008 में ‘ऐलिशियाज लौ’ नाम से बच्चों के संरक्षण देने वाला एक कानून भी बना दिया.

इस कानून को वर्जीनिया, टेक्सास, कैलीफोर्निया, टैनिसी व आईदाहो आदि कई राज्यों में लागू कर दिया गया. ऐलिशिया शेष राज्यों में कानून लागू कराने के लिए प्रयासरत है. ऐलिशिया के प्रयासों से न सिर्फ अब तक अनेक बच्चे खतरों से बचे हैं, बल्कि उस की सक्रियता की बदौलत पुलिस भी कई लापता लड़कियों को खोजने में कामयाब रही है.

ऐलिशिया को शहर, राज्य व राष्ट्रीय स्तर के सेमिनारों और सरकार के बड़े आयोजनों में बुलाया जाता है. वह सब जगह अपनी बात रखती है. उस के काम को हर जगह सराहा जाता है. वह जबतब ‘ऐलिशिया प्रोजैक्ट’ नाम से इंटरनेट सिक्योरिटी और जागरूक करने वाला प्रोग्राम करती रहती है. ‘रेडी चिल्ड्रेन’, ‘सेफ कौंफ्रेंस’ नाम से भी ऐलिशिया समयसमय पर प्रोग्राम करती है. इस समय वह फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय से मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रही है. ऐलिशिया का कहना है कि वह जिंदगी भर कोशिश करती रहेगी कि कोई भी किशोर उम्र लड़की उस की तरह धोखे और शोषण का शिकार न हो. Hindi Stories

—कथा पात्र से बातचीत पर आधारित

 

ISIS Terrorist Organization: खौंफ का खलीफा आईएसआईएस

ISIS Terrorist Organization: आईएसआईएस एक दुर्दांत और क्रूर आतंकी संगठन है जो पत्रकारों, मानवाधिकार के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधियों को मौत के घाट उतारते हुए जश्न मनाता है और उस की वीडियो बना कर दुनिया को दिखाता है. इस के बावजूद बहुत से देश उसे आतंक फैलाने के लिए फंडिंग तो कर ही रहे हैं, कट्टरपंथी सोच वाले कितने ही युवा और महिलाएं भी इस संगठन से जुड़ने के लिए लालायित हैं.

पहले पेरिस, एक बार फिर पेरिस, उस के बाद बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स. आईएसआईएस ने यूरोप में पिछले 3 सालों में इस तरह की एक दर्जन से ज्यादा खूनखराबे की घटनाओं को अंजाम दिया है, लेकिन इन 3 आत्मघाती हमलों ने यूरोप के समूचे मनोविज्ञान में ही दहशत बैठा दी है. पिछले दिनों यूरोप के कई अखबारों द्वारा अलगअलग देशों में इस खूंखार संगठन को ले कर जाने गए लोगों के मनोविज्ञान का साझा निष्कर्ष यह था कि आज की तारीख में यूरोप के 60 फीसदी से ज्यादा लोग इस वहशी संगठन से बेहद डरे हुए हैं. वे इस से किस कदर भयग्रस्त हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस का डर उन की हड्डियों तक में समा गया है.

सन 2001 में अलकायदा ने अमेरिका के ट्रेड टावर में हवाई जहाजों को मिसाइल की तरह इस्तेमाल करते हुए जो हमला किया था, उस ने अमेरिकियों के दिलोदिमाग में जबरदस्त खौफ पैदा कर दिया था. तकरीबन वैसा ही खौफ और वैसी ही दहशत इन दिनों यूरोपीय लोगों के दिलोदिमाग में घर किए हुए है. यह दहशत कितनी हौलनाक है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंदन के 50 फीसदी से ज्यादा लोग मानते हैं कि सुबह जब वे घर से निकलते हैं तो एक बार सीने में कहीं धक सा कुछ होता है कि क्या शाम को वे सहीसलामत वापस आ पाएंगे?

सवाल है, हथियार, तकनीक, धन और वर्चस्व से लबालब यूरोप जैसे भूखंड में एक जिहादी संगठन ने इस कदर अपना आतंक क्यों मचा रखा है? क्या यह महज संयोग है या फिर खौफ और आतंक कि इस समूची दास्तां में तमाम व्यवस्थित षडयंत्रों का भी गुप्त योगदान है? निश्चित रूप से ऐसा ही है. लेकिन यह सब इतना जटिल है कि आईएसआईएस की शुरू से आखिर तक दास्तां को जाने बिना श्यामश्वेत ढंग से कुछ भी कह देना खतरे से खाली नहीं है. आइए, इस खूंखार संगठन के गठन से ले कर इस के इस भयानक आतंक के सौदागर होने तक के सफर में एक संपूर्ण नजर डालें.

आईएसआईएस कब, कैसे और क्यों बना?

संगठित खौफ के इतिहास में आज तक आईएसआईएस जितना दुर्दांत और मनुष्य को पीड़ा पहुंचाने वाला कोई दूसरा संगठन नहीं हुआ. आईएसआईएस यानी ‘इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया’ नाम से इस संगठन के मौजूदा स्वरूप का गठन अप्रैल, 2013 में हुआ था, लेकिन इस की जड़ें इस से भी एक दशक पुरानी हैं. इब्राहिम अव्वद अल बदरी उर्फ अबु बक्र अल बगदादी इस का मौजूदा मुखिया है, जिसे अब तक के दुनिया के इतिहास का सब से दुर्दांत रक्तपिपासु माना जाता है.

दुनिया के मौजूदा कायदेकानूनों के हिसाब से यह संगठन, जो खुद को इराक और सीरिया के भौगोलिक क्षेत्र को मिला कर इस्लामिक राज्य कहना पसंद करता है, एक अमान्य राज्य तथा इराक एवं सीरिया में सक्रिय जिहादी सुन्नी सैन्य समूह है. अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है ‘अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’ जिस का हिंदी में मतलब है, ‘इराक एवं शाम का इस्लामी राज्य’. शाम सीरिया का प्राचीन नाम है.

लेकिन इस के यही 2 नाम भर नहीं हैं. इस दुर्दांत संगठन के और भी कई नाम हैं. मसलन, आईएसआईएल या दाइश इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड लेवांट. पुराने समय में लेवांट उस इलाके को कहा जाता था, जिस में आज सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन आते हैं. कहने का मतलब यह है कि लेवांट एक ऐसे इलाके के रूप में जाना जाता है, जहां दुनिया के लिखित इतिहास में सब से अधिक खूनी संघर्ष हुए हैं. इस संघर्ष के दायरे में दुनिया के जो मौजूदा देश शामिल रहे हैं, वे हैं—जौर्डन, इजरायल, कुवैत, फिलिस्तीन, लेबनान, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की के कुछ भाग.

खौफ के पर्याय इस संगठन को इराक और सीरिया के लोग इशारों में ‘दौलत’ अर्थात सरकार भी कहते हैं. यह सशस्त्र तकफीरी सलफी और जेहादी संगठन है. इस का घोषित उद्देश्य इस्लामी शासन व्यवस्था और इस्लामी कानून को लागू करना है. इस आतंकी संगठन के गठन, इस के अस्तित्व में आने, इस की गतिविधियों, लक्ष्यों और कौन से देशों से इस के संपर्क हैं, इस बारे में दुनिया के हर देश के पास एकदूसरे से भिन्न यानी विरोधाभासी सूचनाएं हैं, जो खुद एक रणनीति के तहत इस ने और इस संगठन के मददगारों ने फैलाई हैं.

मसलन कुछ लोगों और देशों का मानना है कि यह संगठन सीरिया में अलकायदा की एक शाखा है, जबकि दूसरे लोगों का कहना है कि यह एक स्वतंत्र संगठन है, जो इस्लामी सरकार के गठन का प्रयास कर रहा है. इसी तरह कुछ अन्य सूचना समूहों और देशों का मानना है कि यह सीरिया सरकार के विरोधियों को विभाजित करने के लिए सीरिया की सरकार और पश्चिमी देशों के षडयंत्रों का सांगठनिक विस्तार है. इस की पुष्टि अमेरिका के एक पुराने जासूस एडवर्ड स्नोडेन के इंटरव्यू से होती है, जो उस ने जुलाई, 2014 में ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स को दिया था. गौरतलब है कि एडवर्ड स्नोडेन सन 2013 तक अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी) में था.

सन 2013 में जब उस की सीआईए की नौकरी छूट गई तो वह हांगकांग भाग गया और फिर वहां से रूस. आज भी वह रूस में ही किसी अज्ञात स्थान में छिपा है. स्नोडेन ने अमेरिका की करतूत के बहुत सारे काले चिट्ठे पूरी दुनिया की मीडिया के सामने खोले हैं, जिस से पता चलता है कि कैसे अमेरिका ने ही ओसामा बिन लादेन की तरह खौफ के मौजूदा सौदागर अबू बक्र अल बगदादी को पैदा किया. बहरहाल, स्नोडेन द्वारा तेहरान टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल ने मिल कर बगदादी और उस के संगठन आईएसआईएस को खड़ा किया है.

स्नोडेन ने अपनी इस बातचीत में खुलासा किया था कि वह इजरायल ही था, जिस ने बगदादी को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी थी. वास्तव में इस पूरे खुफिया षडयंत्र को जिस कोड नाम से अंजाम दिया गया था, वह था ‘बीहाइव’ यानी मधुमक्खी का छत्ता. स्नोडेन के मुताबिक बगदादी और उस के संगठन को खड़ा करने के पीछे अमेरिका और उस के साथी देशों का मकसद था कि इजरायल के आसपास वाले देशों में आतंकवाद की एक ऐसी ताकत खड़ी कर दी जाए, जिस से इजरायल के दुश्मन उस ताकत से लड़ने में ही उलझ कर रह जाएं और इस तरह इजरायल सुरक्षित रहे.

स्नोडेन के मुताबिक, जहां साल भर से ज्यादा समय तक इस काम को अंजाम देने के लिए इजरायल ने बगदादी को अत्याधुनिक हथियारों को चलाने की ट्रेनिंग दी थी, वहीं खुद अमेरिका ने भारीभरकम आर्थिक सहायता दे कर बगदादी से मिडिल ईस्ट के अपने दुश्मन देशों पर हमला कराया था. वास्तव में इस के पीछे मकसद था कि इस आतंक की दहशत से अमेरिका द्वारा मध्यपूर्व के उन तमाम देशों में भी अपनी सेना की तैनाती थी, जहां फिलहाल वह नहीं है या सन 2012-13 में नहीं था.

यह स्नोडेन का शिगूफा भी हो सकता है, लेकिन जहां तक आईएसआईएस के खौफनाक इतिहास की बात है तो उस की जड़ें हाल के इन सालों से भी कहीं पीछे हैं. वास्तव में इस संगठन के गठन का इतिहास सन 2004 से शुरू होता है. जब खूंखार आतंकवादी अबू मुस्सअब जरकावी ने जमातुत्तवहीद और अल जेहाद नामक संगठनों का गठन किया. जरकावी ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में काम कर चुका था. उस ने ओसामा की मदद से अपने संगठन का इराक में काफी हद तक विस्तार कर लिया था. दरअसल इस संगठन ने इराक में अमेरिका के हमले का बदला लेने की कसम खाई थी.

यही वजह थी कि इस ने इराक के कोनेकोने से नौजवानों को अमेरिकी सैनिकों के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया. अपनी आक्रामक अमेरिका विरोधी नीतियों के चलते यह संगठन न सिर्फ बहुत कम समय में ही इराकी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गया, बल्कि मध्यपूर्व और उस के बाहर के अन्य देशों के युवाओं में भी इस संगठन के प्रति तेजी से झुकाव बढ़ा. सन 2006 में अबू मुस्सअब जरकावी ने अपने एक वीडियो संदेश में अब्दुल्लाह रशीद अल बगदादी के नेतृत्व में मुजाहिदीन परिषद का गठन किया. लेकिन दुर्भाग्य से उसी महीने जरकावी मारा गया, जिस से उस की जगह अबू हमजा अल मुहाजिर को इराक में अलकायदा का मुखिया बना दिया गया.

सन 2006 के अंत तक इराक के और भी कई छोटेछोटे संगठन, जो अमेरिकी हमले के विरोध में छिटपुट मोर्चा संभाले हुए थे, वे सब भी इस से आ मिले और इस तरह इस संगठन का नाम हो गया ‘दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’, जिस का मतलब हम ऊपर ही बता चुके हैं. इस संगठन का मुखिया अबू उमर अल बगदादी था. संगठन का उद्देश्य बिलकुल साफ था, इराक से अमेरिका को उखाड़ फेंकना और इसलाम की पाबंद सरकार का गठन करना.

कौन है अबू बक्र अल बगदादी?

आज पूरी दुनिया जानना चाहती है कि खौफ का सौदागर अबू बक्र अल बगदादी आखिर है कौन और वह आईएसआईएस का मुखिया कब और कैसे बना? पहले यह जानते हैं कि आखिर ईदी अमीन और हिटलर से भी बड़ा खूंखार तानाशाह अबू बक्र अल बगदादी है कौन? बगदादी का जन्म सन 1971 में इराक के सामर्रा शहर में हुआ था. आज की तारीख में इस के कई नाम हैं जैसे, अल बदरी सामर्राई, अबू दुआ, डाक्टर इब्राहिम, अल कर्रार और अबू बक्र अल बगदादी.

बगदादी एक जमाने में दुनिया के आतंकी नंबर एक रहे ओसामा बिन लादेन की ही तरह बेहद पढ़ालिखा शख्स है. सच बात तो यह है कि वह ओसामा से भी ज्यादा पढ़ालिखा है. उस ने इस्लामिक स्टडीज से डाक्टरेट यानी पीएचडी कर रखी है. बगदादी बगदाद के इस्लामी विज्ञान विश्वविद्यालय से इस्लामी विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की है और बाद में यहीं से पीएचडी की डिग्री अर्जित की. बगदादी के पिता अल बदरी हैं. वह भी तकफीरी सलफी विचारधारा को मानते हैं. अबू बक्र बगदादी की कट्टरपंथ में आमद धर्म के प्रचार और उस की विधिवत शिक्षा से हुई. बचपन से ही उस में जेहाद के प्रति झुकाव था. इसीलिए वह इराक के दियाला और सामर्रा में जेहादी पृष्ठभूमि के 2 केंद्रों में से एक के रूप में उभरा.

तमाम जेहादी वेबसाइटों के मुताबिक वह अच्छीखासी आर्थिक और प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से है. सन 2003 में जब इराक में अमेरिकी सेनाओं ने घुसपैठ की थी, तभी वह अल जेहाद, जो बाद में अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम बना, संगठन के साथ जुड़ गया था. वह बहुत दिलेरी के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था. उसी दौरान लड़ते हुए अमेरिकी फौजों द्वारा पकड़ लिया गया था, जिस की वजह से उसे सन 2005-09 तक दक्षिणी इराक में अमेरिकी सेना द्वारा बनाए गए गिरफ्तार आतंकी कैंप उर्फ बक्का जेल में रखा गया. सन 2009 में उसे अमेरिकी सेना ने छोड़ दिया, लेकिन अमेरिका के प्रति उस के गुस्से और नफरत में कमी नहीं आई.

वह सन 2010 में फिर से पुराने संगठन में ही लौट गया और पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर ढंग से अमेरिकी फौजों पर हमले किए. इस के बाद की कहानी पूरी दुनिया जानती है कि कैसे उस ने खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफा घोषित किया और कैसे इराक व सीरिया के तमाम ऐतिहासिक शहरों को खंडहरों में बदल दिया.

कैसे शुरू हुआ आईएसआईएस के खौफ का सफर?

एक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था. मगर इस आजादी को हासिल करने के लिए उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. एक तरफ जहां इराक अमेरिकी फौजों के बूटों तले रौंदे जाने से तहसनहस हो चुका था, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी सेनाएं भी युद्ध लड़तेलड़ते पस्त हो चुकी थीं. जब अमेरिकी सेनाओं ने सन 2011 में इराक छोड़ा, तब वे इतनी जर्जर हो चुकी थीं कि उन के सामने ही धीरेधीरे सिर उठा रही फिदायीन ताकतों की अमेरिकी फौजों ने एक तरह से अनदेखी कर दी थी. अब तक सद्दाम हुसैन मारा जा चुका था. लेकिन इराक में आतंक का इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी मौजूद था.

हालांकि यह बात भी थी कि अमेरिकी सेनाओं के जाने के बाद भी संसाधनों की कमी के चलते बगदादी जैसे आतंकी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे. अब तक उस ने अपने संगठन का नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट औफ इराक रख लिया था. बरबाद बगदाद में बड़े पैमाने पर सद्दाम हुसैन की सेना के ऐसे पुराने सैनिक मौजूद थे, जिन के अंदर गहरे तक ग्लानि और अवसाद था कि वे अमेरिकी फौजों को हरा नहीं पाए. अब तक अमेरिकी फौजें जा चुकी थीं, लेकिन उन की नुमाइंदगी कर रहीं मौजूदा इराकी सेनाओं को भी वे पुराने सिपाही देश के गद्दारों में गिनती कर रहे थे. यही कारण थे कि वे उन के खिलाफ लड़ने को बगदादी के आह्वान पर उस के संगठन आईएसआई से जुड़ गए.

बगदादी ने बड़ी ही खुशी और चतुराई से सद्दाम हुसैन की सेना के इन कमांडरों और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया. इस के बाद उस ने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चैक पौइंट्स और भरती दफ्तरों को बनाना शुरू किया. धीरेधीरे उसे सफलताएं मिलने लगीं और उस के लड़ाकों की संख्या कई हजार हो गई.

मगर अब भी बगदादी को इराक में वह कामयाबी नहीं मिल रही थी, जो उस के जेहन में थी. उसे लगा, शायद जर्जर इराक में यह कामयाबी उसे मिलेगी भी नहीं, इसलिए वह थोड़ी निराशा और बड़ी ही चतुराई से इराक छोड़ सीरिया पहुंच गया, जो एक तरह से इराक का पड़ोसी है. सीरिया उन दिनों जबरदस्त गृहयुद्ध की चपेट में था. अलकायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के 2 सब से बड़े गुट थे, जो सीरियाई राष्ट्रपति असद के विरुद्ध मोर्चा बांधे थे. लेकिन सीरिया में भी घुसते ही उसे कामयाबी नहीं मिल गई. कई सालों तक सीरिया में भी बगदादी का कोई नामलेवा नहीं था.

अलबत्ता उस ने अब तक अपने संगठन का नाम एक बार फिर बदल लिया था और अब की बार वह आईएसआईएस हो चुका था, जोकि अभी तक है. बताने की जरूरत नहीं कि आईएसआईएस का मतलब इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया था. एक  तरफ जहां बगदादी बड़े मंसूबे बांध कर यहां आया था, वहीं दूसरी तरफ असद की सेनाओं से दोदो हाथ कर रही फ्री सीरियन आर्मी जून, 2013 को अपने खस्ता हालत हो चुकने के चलते पहली बार सामने आई और इस के मुखिया ने दुनिया से अपील की कि उसे हथियार दिए जाएं, वरना असद की फौजें उसे नेस्तनाबूद कर देगी और निर्णायक रूप से वे महज एक महीने के अंदर हार जाएंगे.

यहां॒से॒पलटे॒आईएसआईएस॒के॒दिन

इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इजरायल, जौर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी. इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइलें, गोलाबारूद, सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया. बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए.

दरअसल, हुआ यह कि जो हथियार फ्री सीरियन आर्मी के लिए आ रहे थे, बड़े पैमाने पर उन्हें या तो पहले ही रास्ते में आईएसआईएस के लड़ाकों ने लूट लिया या फ्री सीरियन आर्मी के तमाम कमांडर गुपचुप रूप से आईएसआईएस से जा मिले थे और इस तरह दुनिया भर से आए हथियारों का 90 फीसदी सीरियन आर्मी के पास पहुंचने के बजाय आईएसआईएस के पास पहुंच गए. फ्री सीरियन आर्मी में गहरी निराशा थी, इस का मुख्य कमांडर पहले ही हार की आशंका और हताशा का बयान दे चुका था. नतीजतन बचेखुचे फ्री सीरियन आर्मी के सदस्यों ने आईएसआईएस से लड़ने का इरादा त्याग दिया और ज्यादातर उसी से जा मिले.

अगर कहा जाए उन दिनों तमाम आईएस लड़ाके फ्रीडम फाइटर का नकाब ओढ़ कर हथियार लूटे और अमेरिकी कमांडरों से बेहतरीन ट्रेनिंग हासिल की तो भी गलत नहीं होगा, क्योंकि सीरिया में लड़ रहे संगठन फ्री आर्मी के पीछे अमेरिका की ही ताकत, हथियार और रणनीति रही है. एक बार जब बड़े पैमाने पर आईएसआईएस के पास हथियारों का जखीरा हो गया तो फिर उस ने खौफ का ऐसा कहर बरपाया कि हजारों लोगों को मौत के घाट उतारते हुए महज एक साल के भीतर सीरिया और इराक दोनों ही देशों के एक बड़े हिस्से में कब्जा कर लिया.

इन में इन दोनों देशों के तमाम बड़े शहर भी शामिल थे. इराक में तो आईएसआईएस अब लगातार बगदाद की तरफ कूच कर रहा था. दूसरी तरफ इस ने सीरिया के तमाम प्राचीन शहरों को अपने गोलाबारूद से खंडहरों में बदल दिया था. जून, 2014 से आईएसआईएस की लगातार विजयगाथा में हर रोज कोई न कोई नया पन्ना जुड़ रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है. आईएसआईएस के आतंकी इराक और सीरिया के तकरीबन आधे से ज्यादा बड़े शहरों में आज की तारीख में कब्जा जमाए हुए हैं और अपनी सरकार चला रहे हैं.

आईएसआईएस ने सीरिया के रक्का, पामयेरा, दियर, इजौर, इसाक्का, एलेप्पो, हम्मास और यारमुक इलाके के तमाम शहरों पर कब्जा कर लिया है. इस ने इराक में भी रमादी, अनबार, तिकरित, मोसुल और फालुजा शहरों को तहसनहस कर दिया है और अब यहां इसी का हुक्म चलता है. मगर सवाल है कि क्या इराक की इस दुर्दशा के लिए यहां का शिया समुदाय दोषी है? एक तरह से देखें तो यही सच है, क्योंकि सद्दाम की मौत के बाद अमेरिका की सरपरस्ती में सन 2006 में यहां एक तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार बनी, जिस के मुखिया शिया समुदाय के नूर अल मलीकी थे.

कहते हैं कि इस शिया सरकार ने इराक के सुन्नियों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया था. जबकि अमेरिका ने न केवल इस ओर से आंखें मूंदे रखीं, बल्कि कहीं न कहीं इस सब को बढ़ावा भी दिया, ताकि इराक में अल्पसंख्यक मलीकी सरकार पर उस का मजबूत कब्जा बना रहे. इस का नतीजा यह निकला कि आईएसआईएस के पक्ष में इराक के ज्यादातर सुन्नी होते चले गए. कोढ़ में खाज की स्थिति यह हुई कि सन 2011 के बाद राष्ट्रपति ओबामा ने इराक से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला कर लिया. अमेरिकी सेनाओं के चले जाने के बाद हर गुजरते दिन के साथ आईएसआईएस इतना मजबूत होता गया कि इराक सरकार कमजोर होती गई.

आईएसआईएस के लड़ाकों की संख्या इसी बीच 10 हजार से बढ़ कर 1 लाख की संख्या भी पार कर गई है. लेकिन जिस समय आईएसआईएस ताबड़तोड़ खौफ की काररवाहियां कर के ज्यादा से ज्यादा इलाकों में कब्जा जमा रहा था, उस समय इराक की सेना उस से कई गुना ज्यादा संख्या में थी और ज्यादा हथियारों से भी लैस थी, फिर भी आईएसआईएस के लड़ाकों ने इराकी सेना से बड़े पैमाने में उस के टैंक, हेलीकौप्टरों और लड़ाकू विमान छीन लिए.

कैसे फंडिंग जुटाता है आईएसआईएस?

अखबार ग्लोबल न्यूज के मुताबिक आईएसआईएस आतंकी संगठन न सिर्फ दुनिया का सब से खूंखार और क्रूर संगठन है, बल्कि यह खर्च के मामले में भी बहुत शाहाना है. यह दुनिया का सब से धनी आतंकी संगठन है. माना जाता है कि इस के पास 1 हजार अरब डौलर से ज्यादा की संपत्ति है, जिस में से 5 सौ अरब डौलर की संपत्ति तो उस ने इराक के विभिन्न शहरों, बैंकों और तेल कुओं को लूट कर हासिल की है. यह आतंकी संगठन तकरीबन 9 हजार बैरल तेल रोज बेचता है और उस से हर दिन 26 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाता है.

जब इराक के मोसुल शहर पर इस ने कब्जा किया था, उन दिनों 7 बैंकों को लूट कर कई करोड़ डौलर अपने खजाने में जमा कर लिए थे. कहते हैं, आईएसआईएस के पास इतना पैसा है कि वह अपने 60 हजार से 90 हजार के बीच लड़ाकों को हर महीने 42 हजार से 50 हजार रुपए महीने की तनख्वाह देता है, जबकि इस में खानापीना, रहना और सैक्स शामिल नहीं होता.

द एक्सप्रैस ट्रिब्यून और न्यूयार्क टाइम्स के हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान, इजिप्ट, जौर्डन, बांग्लादेश, अल्जीरिया, फिलिपींस, इंडोनेशिया, गाजा और लेबनान से न केवल इसे अपने 90 फीसदी लड़ाके मिलते हैं, बल्कि इन देशों से बड़े पैमाने पर हवाला के जरिए फंड भी इसे हासिल होता है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के मुताबिक, 22 देशों से भी ज्यादा के 3 सौ बैंक आईएसआईएस के फंड जुटाने के काम में हाथ बंटाते हैं. इस सब के अलावा आईएसआईएस बडे़ पैमाने पर खुद भी फंड जुटाता है, जिस में एक जरिया है अफगानिस्तान में पैदा होने वाले हेरोइन को अमेरिका और यूरोप के बाजारों में बेचना.

माना जाता है कि आईएसआईएस हर साल तकरीबन 70 अरब रुपए की हेरोइन अकेले अमेरिका के बाजारों में बेच देता है. इस सब के अलावा तमाम मुसलिम देश विशेषकर सुन्नी मुसलमानों वाले देश इस खूंखार संगठन को लड़ने के लिए धन देते हैं. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक आईएसआईएस को फंड देने वाली सरकारों में कतर की सरकार भी शामिल है. हालांकि एडवर्ड स्नोडेन जैसे अमेरिका के भगोड़े जासूसों का तो यह भी कहना है कि एक बड़ी मात्रा में आईएसआईएस को अमेरिका भी फंडिंग करता है. हालांकि अमेरिका इस खुलासे को बकवास बताता है.

आईएसआईएस दुनिया का न सिर्फ पहला ऐसा खूंखार संगठन है, जिस ने तमाम देशों की ताकत को खुलेआम चुनौती दी है, बल्कि यह पहला ऐसा संगठन है, जिस के पास इतना धन है कि वह यूरोप के कई छोटे मगर विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से टक्कर लेता है.

निस्संदेह इस की इस भारीभरकम अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान खुद उन आत्मघाती आतंकियों का है, जो अपनी जान हर समय हथेली पर रख कर दुनिया भर में आईएसआईएस के खौफ का सिक्का जमाते हैं. मसलन जिस आतंकी ने पेरिस में हमले की अगुवाई की थी (जिस हमले में 130 से ज्यादा लोग मारे गए थे) अकेले इस आतंकी ने 30 हजार यूरो या 32 हजार अमेरिकी डौलर का फंड उन आत्मघाती लड़ाकों के लिए इकट्ठा किया था, जिन्होंने इस हमले को अंजाम दिया था. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया का यह खूंखार संगठन क्यों कभी पैसे की दिक्कत महसूस नहीं करता.

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आईएसआईएस का खौफनाक चेहरा आखिर आईएसआईएस के युवा इतने दीवाने क्यों हैं?

एक संगठन, जो हजारों लोगों की मौजूदगी में पिंजरे में जानवरों की तरह बंद कर के बेकसूर पत्रकारों, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधी संगठनों के सैनिकों पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है और उन के धूधू कर के जलने का सामूहिक उत्सव मनाता है. एक ऐसा संगठन, जो किसी मां के बेटे को ही मजबूर करता हो कि वह अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दे. एक ऐसा संगठन, जो बाकायदा 4-4 कैमरों के सामने इस बर्बरता से विदेशी पत्रकारों की गरदन हलाल करता हो, जैसे बकरे की कुरबानी कर रहा हो.

एक ऐसा संगठन, जो ज्ञानविज्ञान की हजारों किताबों को यह कह कर जला देता हो कि ये युवाओं को इसलाम से विमुख कर रही हैं. सवाल है, ऐसे क्रूर और खौफनाक संगठन में शामिल होने के लिए दुनिया भर से युवक और युवतियां भागे क्यों चले आते हैं? ट्यूनीशिया के गृहमंत्री लोफी बेन जेडौअ के मुताबिक तो उन के देश से हजारों युवतियां सीरिया में विद्रोह की कमान संभाले लड़ाकों को सैक्स सुख देने के लिए तथा उन के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ने के लिए चोरीछिपे देश से भाग रही हैं. ट्यूनीशिया के गृहमंत्री इसे ‘सैक्स जिहाद’ की संज्ञा देते हैं और उन के मुताबिक इसे चला रही हैं खुद ट्यूनीशिया की युवतियां.

यह बात संसद के भीतर कही गई है, जिस से इस की गंभीरता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. बेन के मुताबिक, ‘ये औरतें 20, 30 या 100 के करीब विद्रोहियों के साथ सैक्सुअल रिलेशनशिप बनाती हैं. वे इसे जिहाद-अल-निकाह (सैसुअल होली वार) की संज्ञा देते हैं और प्रैग्नेंट हो कर घर लौट आती हैं.’ इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस संगठन के प्रति युवाओं में चाहे वे लड़कियां हों या लड़के, एक अजीब किस्म की दीवानगी है. पिछले 3 सालों में हिंदुस्तान से भी कई दर्जन युवक चोरीछिपे इस में हिस्सा लेने के लिए जा चुके हैं, जिन में से कइयों को एयरपोर्ट से वापस किया गया है तो कइयों के शहीद होने की खबरें ही लौट कर आई हैं.

जबकि यह संगठन अपने लड़ाकों से भी क्रूरता बरतने में पीछे नहीं रहता. अगर इसे अंदाजा हो गया कि कोई लड़ाका छोड़ कर भागने की फिराक में है तो यह संगठन बहुत नृशंसता से उस लड़ाके को बाकी तमाम लड़ाकों के सामने मौत के घाट उतार देता है, जिस से कि बाकी लड़ाके खौफ से भर जाएं और कभी वापस जाने का साहस न कर सकें.

यह संगठन लड़कियों के साथ तो और भी ज्यादा क्रूर है. यह संगठन लड़कियों को 7 से 9 साल की उम्र में भी शादी को मंजूरी देता है और 16 साल तक में हर हाल में शादी करने की हिदायत देता है. यह संगठन खुलेआम अपने लड़ाकों को सैक्स के लिए महिलाओं की मांग करता है और साफ चेतावनी देता है कि अगर उस की बात अनसुनी की गई तो खैर नहीं. यह हैरानी की ही बात है कि इस के बावजूद इस अमानवीय और बर्बर संगठन के प्रति लड़कियां और लड़के खिंचे चले आते हैं. सवाल है कि आखिर क्यों? उन में इस के लिए इतनी दीवानगी क्यों है?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं, पूरी दुनिया के समाजशास्त्रियों और सरकारों को भी परेशान कर रहे हैं. दि इंस्टीट्यूट फौर स्ट्रैटजिक डायलौग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया या इराक जाने वाले करीब 3 हजार यूरोपीय युवाओं में 5 सौ से ज्यादा युवतियां शामिल हैं. कुछ तो किशोर उम्र की और कुछ भले ही अपवाद के तौर पर हों, मगर 50 साल के पार की प्रौढ़ महिलाएं भी हैं.

‘बिकमिंग मुलान’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये तमाम महिलाएं फिर चाहे वे जिस उम्र समूह से रिश्ता रखती हों, इस बात से प्रभावित होती हैं कि मुसलमानों के लिए नए इलाके का निर्माण हो रहा है. एक नई दुनिया, जहां किसी और के लिए कोई जगह नहीं होगी. यहां तक कि मुसलमानों में भी गैरसुन्नियों के लिए भी नहीं.

इसीलिए तमाम सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड की लड़कियां भी रोमांचित हो कर इस सपने वाले देश या भूखंड की तरफ कूच कर रही हैं. जाहिर है, वे उस सपने का हिस्सा होना चाहती हैं. यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर डंट कर भी और लड़ाकों के लिए सेज में बिछ कर भी. सवाल है, क्या ये युवा, खासकर लड़कियां दिमागी रूप से बीमार हैं? समाजशास्त्रियों की मानें तो हां, कुछकुछ ऐसा ही है. इन में से कई युवाओं का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बंटा सा लगता है, विशेषकर युवतियों का. ऐसी कुछ महिलाओं, जिन के बारे में माना जाता है कि वे इस वक्त सीरिया या इराक में हैं, के ट्विटर या फेसबुक एकाउंट को देखने पर भी यह बात साफ प्रतीत होती है.

क्योंकि ये महिलाएं जहां एक पल को किसी फिल्म से संबंधित कोई बात कहती हैं या अपने पालतू कुत्ते के बच्चे के साथ अपनी वाल पर तसवीर लगाती हैं, वहीं दूसरे ही पल वे किसी सार्वजनिक जगह पर आईएस के लड़ाकों की किसी का सिर काटते या नृशंसता से पेश आने वाली तसवीरें पोस्ट कर रही होती हैं. सवाल है, आखिर ये महिलाएं ऐसा क्यों कर रही हैं? बहुचर्चित हो रही बिकमिंग मुलान रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये महिलाएं भी वही चाहती हैं, जो इन दिनों आईएसआईएस की तरफ आकर्षित दुनिया भर के खासतौर पर पश्चिम के युवा मुसलिम चाहते हैं या कहें जिन बातों से मुसलिम युवक प्रेरित हैं, उन्हीं से महिलाएं भी प्रेरित हैं.

मुसलिम युवाओं की तरह ही ये मुसलिम महिलाएं भी आईएसआईएस की तरफ खलीफा के शासन की स्थापना, पश्चिम से नफरत, पहचान की तलाश जैसे वैचारिक कारणों से प्रेरित हैं. आईएस के आतंकियों के उन के कब्जे वाले इलाके में, ऐसे ही अफगानिस्तान या बाल्कन में सक्रिय कट्टरपंथियों से इसलिए भूमिका बिलकुल अलग है, क्योंकि आईएस के आतंकी यहां एक राष्ट्र का निर्माण करना चाह रहे हैं. इसलिए यहां स्थानीयता के साथ कोई टकराव नहीं है.

इसीलिए ये गतिविधियां आतंक के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर एक ‘राष्ट्र निर्माण’ की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाती हैं. इसीलिए इस में भाग लेते हुए महिलाएं भी इतिहास रचने वालों में शामिल होना चाहती हैं. फिर चाहे भले ही लड़ाकों के लिए सैक्स परोस कर या उन के लिए घर की देखरेख कर के ही क्यों न ये संभव हो. सच तो यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी भूमिका घर की देखरेख करने वाले के तौर पर ही देख रही हैं. इसीलिए ये महिलाएं जेहादियों को अपने पति के रूप में चुन रही हैं. कुछ महिलाओं के सोशल मीडिया एकाउंट के अनुसार, जिहादी लड़ाके से शादी करने पर उन्हें घर इत्यादि की सुविधाएं मिलती हैं यानी इस उन्माद में आर्थिक असुरक्षा भी एक कारण है.

इन महिलाओं की मंशा को उजागर करने वाली कई वेबसाइटों के मुताबिक सीरिया में होने का दावा करने वाले कुछ लोग ‘खलीफा के राज्य’ में शादी की संभावना से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं. हालांकि इन में से कई शादियां ज्यादा समय तक नहीं चलतीं, क्योंकि उन के पति लड़ाई में मारे जाते हैं. ऐसे में ये महिलाएं ट्विटर पर अपने पतियों के शहीद हो जाने की घोषणा करती हैं. आईएस से तेजी से जुड़ रही ये महिलाएं एक मामले में पुरुषों से काफी हद तक अलग हैं. इन में से ज्यादातर ने इस्लाम में धर्मांतरण  किया है यानी ये जन्म से मुसलमान नहीं थीं. इसलिए ये इस्लाम से बहुत गहरे तक वाकिफ भी नहीं हैं. शायद यही इस सवाल का जवाब भी है कि कमउम्र की लड़कियां ऐसा माहौल क्यों स्वीकार करना चाहती हैं?

असली सवाल इन के इस्लाम की ओर झुकाव का है. आईएस की तरफ तीव्रता से आकर्षित हो रही ज्यादातर लड़कियों की उम्र 18 से 25 साल के बीच है. इस्लाम ग्रहण करने वाली इन ज्यादातर लड़कियों को इस्लाम धर्म के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता. वास्तव में उन्होंने इंटरनेट पर इस के बारे में सर्च किया होता है, जैसा आम लोग करते हैं.

उन्होंने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो देखे होते हैं, जिन में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए होते हैं. धर्म के बारे में जानने के लिए उन के पास यही एक आधुनिक और आसान रास्ता होता है. ऐसी लड़कियां न कभी मसजिद गई होती हैं, न किसी लाइब्रेरी. वे सौ प्रतिशत यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया पर निर्भर होती हैं. इसीलिए ये इस्लाम की संवेदनशीलता से परिचित नहीं होतीं. ऐसे में ये अपना भी नुकसान करती हैं और इस्लाम को भी बदनाम करती हैं. ISIS Terrorist Organization

 

Hindi Stories: खामियों के बावजूद लहराया परचम

Hindi Stories: लक्ष्य को ध्यान में रख कर अगर मजबूत इरादों के साथ काम किया जाए तो विकलांगता भी बौनी साबित होती है, देखने और सुनने में अक्षम मनीराम शर्मा ने आईएएस अफसर और नेत्रहीन ब्रह्मानंद शर्मा ने जज बन कर यही कर दिखाया.

कहते हैं, आदमी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. अगर वह ठान ले तो कोई भी काम उस के लिए मुश्किल नहीं है. जिन लोगों ने अपनी कमी और कमजोरी को हथियार बना कर मेहनत की, उन्होंने कामयाबी की मंजिल निश्चित रूप से हासिल की. ऐसे अनेक लोगों की कामयाबी के किस्सेकहानियां हमें सुनने को मिलते रहते हैं. जो देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते या बोल नहीं सकते थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मन की आवाज को सुनी, जुनून के साथसाथ तब तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा, जब तक उन्होंने कामयाबी हासिल नहीं कर ली.

ऐसे दिव्यांग लोगों ने अपनी शारीरिक कमियों को अपनी पढ़ाई या दूसरी विधा पर हावी नहीं होने दिया. अपनी जिद और जज्बे से दुनिया में कामयाबी की कहानी लिखी. शारीरिक रूप से विकलांग ऐसे ही कुछ लोगों की सफलता की कहानी यहां पेश है, जो आज हीरो बन कर समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं. सब से पहले हम भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी मनीराम शर्मा के बारे में बताना चाहेंगे. वह इस समय हरियाणा के मेवात के नूंह जिले में जिला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर तैनात हैं. राजस्थान के जिला अलवर की तहसील कठूमर के बदनगढ़ी गांव के रहने वाले मनीराम शर्मा जन्म से ही न तो पूरी तरह बोल सकते थे और न पूरी तरह सुन सकते थे. उन के पिता मजदूरी करते थे और मां बधिर थीं. पूरा परिवार अनपढ़ था.

घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर थी. गुजरबसर मुश्किल से होती थी. ऐसे में बच्चे का इलाज कैसे होता? इलाज न होने से 9 साल की उम्र में मनीराम की सुनने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई, लेकिन उन में पढ़ने की ललक थी. पढ़ाई के लिए उन्होंने तमाम पापड़ बेले. बदनगढ़ी गांव काफी पिछड़ा था, वहां कोई स्कूल नहीं था. आज भी इस गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं है. मनीराम पढ़ने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चल कर या कभी किसी की साइकिल पर बैठ कर पास के गांव अखैगढ़ जाते थे. बाद में खेड़ली कस्बे में पढ़ने जाने लगे.

स्कूल के कुछ बच्चे उन के गूंगाबहरा होने का मजाक उड़ाते थे. लेकिन उन्होंने उन की बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया. अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाए रहा. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने सन 1990 में दसवीं की परीक्षा न सिर्फ अच्छे अंकों से पास की, बल्कि प्रदेश में उन की पांचवीं रैंक आई. स्कूल में साथी विद्यार्थी और अध्यापक जो उन्हें गूंगाबहरा कहते थे, इस के बाद उन्होंने उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया. अच्छे अंकों से दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद मनीराम के पिता ने सोचा कि बेटे को कहीं चपरासी की नौकरी ही मिल जाए तो अच्छा रहेगा. चार पैसे मिलेंगे तो घर के हालात में कुछ तो सुधार होगा.

यही सोच कर वह मनीराम को अपने परिचित एक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पास ले गए. उन्होंने उन से कहा, ‘‘साहब, बेटा बड़े अच्छे नंबरों से पास हुआ है. इसे कहीं चपरासी ही लगवा दो.’’

बीडीओ को जब पता चला कि मनीराम बोल और सुन नहीं सकता तो उन्होंने कहा, ‘‘यह न तो बोल सकता है और न ही सुन सकता है. ऐसे में इसे कैसे नौकरी पर रखा जा सकता है?’’

बीडीओ की बात सुन कर मनीराम के पिता की आंखों में आंसू आ गए. बापबेटे बीडीओ के औफिस से अपना सा मुंह ले कर लौट आए. घर आ कर मनीराम ने पिता को अपने इशारों से भरोसा रखने को कहा. उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वह अपनी विकलांगता को सीढ़ी बना कर सफलता का मुकाम हासिल करेंगे. इस के बाद वह जीजान लगा कर पढ़ाई करने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने बारहवीं कक्षा में पूरे प्रदेश में सातवीं रैंक हासिल की. बाद में उन्होंने बीए औनर्स में राजस्थान विश्वविद्यालय में टौप किया और गोल्ड मैडलिस्ट बने. ग्रैजुएट होने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी पाने के प्रयास शुरू किए.

राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) की परीक्षा दी. पहली परीक्षा में ही वह पास हो गए. तब उन्हें अलवर जिले के गंडाला गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौकरी मिली. मनीराम के परिवार में इस से पहले कोई सरकारी नौकरी में नहीं रहा था, इसलिए उन के लिए यही सब से बड़ी नौकरी थी. मनीराम भले ही सरकारी नौकरी पा गए थे, लेकिन उन के सपनों की उड़ान अभी थमी नहीं थी. स्कूल की नौकरी करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और राजनीति विज्ञान से प्राइवेट एमए किया. इस के बाद परीक्षा पास कर के वह राजकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता बन गए. हालांकि कि उन्हें अब पहले से ज्यादा तनख्वाह मिलने लगी थी, लेकिन वह अभी संतुष्ट नहीं थे.

वह प्रशासनिक सेवा की तैयारी में जुट गए. इस के लिए वह अथक परिश्रम करने लगे, जिस की बदौलत उन्होंने सन 2001 में राजस्थान लोक सेवा आयोग की राजस्थान प्रशासनिक सेवा की एलाइड परीक्षा पास की. इस के बाद देवस्थान विभाग में निरीक्षक के पद पर भरतपुर में उन की नियुक्ति हुई. इस बीच उन्होंने एमफिल, नेट, जेआरएफ करने के साथ पीएचडी भी कर ली थी. बाबू से अफसर बनने के बाद भी मनीराम चैन से नहीं बैठे. उन्हें अपनी मंजिल आगे नजर आ रही थी. हर शिक्षित युवा की तरह मनीराम का सपना भी आईएएस औफिसर बनने का था. नौकरी करते हुए वह संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी करने लगे.

उन्होंने सन 2005 में पहली बार यह परीक्षा दी और पहली बार में ही उन्होंने यह परीक्षा पास कर ली. पूरे देश में उन की 27वीं रैंक आई. वह बहुत खुश हुए. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. लेकिन यह खुशियां ज्यादा दिनों की नहीं रहीं. आईएएस परीक्षा का परिणाम आने के कुछ दिनों बाद सरकार ने उन्हें सौ फीसदी डीफनेस (बहरेपन) की वजह से रिजैक्ट कर दिया. रिजैक्ट होने से मनीराम उदास हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बल्कि दोगुने उत्साह से फिर आईएएस परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. सन 2006 में उन्होंने फिर आईएएस परीक्षा पास की. अफसरों ने इस बार भी उन्हें डीफनेस के कारण मैडिकल ग्राउंड पर अनफिट घोषित कर दिया.

मनीराम को फिर झटका लगा. उन का बहरापन उन की आईएएस की नौकरी में आड़े आ रहा था. जबकि वह हर हाल में आईएएस की नौकरी करना चाहते थे. यह तभी संभव था, जब उन के कान का इलाज हो यानी कान का औपरेशन. इस औपरेशन में कई लाख रुपए का खर्चा था और उन के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे. अब तक लोग मीडिया द्वारा इस विलक्षण प्रतिभा के बारे में जान चुके थे. मीडिया में खबरें छपने पर लोगों ने उन के इलाज के लिए पैसे देने शुरू कर दिए.

इस अभियान में 8 लाख रुपए इकट्ठा हुए. इस धनराशि से जून, 2007 में उन के कान का औपरेशन कराया गया. औपरेशन के बाद उन्हें आंशिक रूप से सुनाई देने लगा. डाक्टरों के प्रयास से मनीराम ने बुदबुदा कर थोड़ाबहुत बोलना भी शुरू कर दिया. इस के बाद मनीराम शर्मा ने सन 2009 में तीसरी बार आईएएस की परीक्षा पास की. मैडिकल बोर्ड ने उन की जांच की. उन की विलक्षण लिप रीडिंग देख कर सारे अधिकारी दंग रह गए. मैडिकल जांच की मशीनें उन के सौ फीसदी बहरेपन की पुष्टि कर रही थीं. लेकिन उन की कार्यशैली बता रही थी कि बहरापन आंशिक है.

मैडिकल बोर्ड ने शर्मा को आंशिक डीफनेस का प्रमाणपत्र दे दिया. आंशिक डीफनेस के कारण इस बार भी आईएएस की नौकरी मिलने में तमाम तरह की अड़चनें आईं. काफी भागदौड़ के बाद प्रधानमंत्री औफिस की पहल पर मनीराम को आईएएस की नौकरी के योग्य माना गया. इस तरह बधिर होने वाले वह देश के पहले आईएएस बने. मनीराम को मणिपुर त्रिपुरा कैडर मिला. मणिपुर के तमेंगलोंग तथा चुरा चांदपुर में मनीराम शर्मा ने असिस्टैंट कमिश्नर ऐंड सब डिवीजनल मजिस्ट्रैट के पद पर करीब 5 सालों तक नौकरी की.

उस के बाद जनवरी, 2015 में केंद्रीय कैबिनेट की अपौइंटमेंट कमेटी ने उन के कैडर बदलने को स्वीकृति दे दी. कैडर बदलने पर मनीराम हरियाणा आ गए. हरियाणा सरकार ने उन्हें सब से पहले एडिशनल डिप्टी कमिश्नर एंड डिस्ट्रिक्ट रूरल डैवलपमेंट अथौरिटी का चीफ एक्जीक्यूटिव औफिसर नियुक्त किया. मनीराम शर्मा का कहना है कि बहरापन उन के परिवार में वंशानुगत है. उन की नानी बहरी थीं. नानी के कारण मां और मामा भी बहरे थे. उन के भाईबहन भी बहरे हैं. उन का बेटा भी बहरा था. नानी से चले आ रहे बहरेपन के कारण परिवार में 35 लोग बहरे हैं. लेकिन मनीराम ने अपनी इस कमी को दरकिनार कर हिम्मत और हौसलों के जरिए एक प्रेरणादायक इतिहास रच दिया.

हम आगे बात करते हैं, राजस्थान के पहले दृष्टिहीन जज ब्रह्मानंद शर्मा की. नियति भले ही किसी को कमजोर कर दे, लेकिन मन और हौसला मजबूत हो तो किसी को भी मनचाही ऊंचाई छूने से नहीं रोका जा सकता. अपनी कमजोरी को ताकत बना कर आगे बढ़ने वाले ही सफलता की मंजिल हासिल करते हैं. राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोटरास गांव के रहने वाले ब्रह्मानंद शर्मा ऐसी ही शख्सियत हैं. उन्होंने इसी साल 11 जनवरी को चित्तौड़गढ़ में अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रैट का पद संभाला है. दृष्टिहीनता को मात दे कर वह अब न्यायिक क्षेत्र जैसी महत्त्वपूर्ण सेवा में चयनित हो कर लोगों के लिए न्याय की ज्योति जला रहे हैं. वह राजस्थान न्यायिक सेवा के पहले दृष्टिहीन मजिस्ट्रैट हैं.

ब्रह्मानंद शर्मा जन्म से दृष्टिहीन नहीं थे. वह पहले भलेचंगे थे. उन की नेत्र ज्योति भी ठीक थी. उन के सामने किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने बचपन से ही न्यायाधीश बनने का सपना देखा था. स्कूल और कालेज की पढ़ाई के दौरान वह विभिन्न अदालतों के फैसलों की कतरनें घर ला कर उन का अध्ययन किया करते थे. पिता के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद घर में कुछ आर्थिक परेशानी हुई तो ब्रह्मानंद ने पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी की कोशिश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप सन 1996 में राजस्थान के सार्वजनिक निर्माण विभाग में उन्हें कनिष्ठ लिपिक की नौकरी मिल गई.

उन की पहली पोस्टिंग उन के गृह जनपद भीलवाड़ा में हुई.  लेकिन अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं थे. उन का सपना मजिस्ट्रैट बनने का था. अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह दोगुने उत्साह से जुट गए. इसी बीच कुछ कारणों से उन की आंखों का रेटिना कमजोर होता चला गया, जिस से उन की आंखों की रोशनी कम होती चली गई. आंखों से कम दिखाई देने के कारण उन्हें कामकाज के साथ पढ़ाई करने में परेशानी होने लगी. उन्होंने अपना बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसी बीच उन्हें तेज बुखार आया. कई दिनों तक बुखार रहने के कारण उन की आंखों की रौशनी पूरी तरह से चली गई. बुखार तो उतर गया, लेकिन उन की आंखों की रौशनी वापस नहीं आ सकी.

आंखों से दिखना बंद होने से ब्रह्मानंद शर्मा की जिंदगी में ही अंधेरा छा गया. उन्हें अपने सपने मिट्टी में मिलते नजर आने लगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि उन्हें न्यायाधीश बनना है तो बनना है. इस के लिए कानून की पढ़ाई करनी जरूरी थी. उन्होंने एक लौ कालेज में दाखिला ले लिया. चूंकि वह देख नहीं सकते थे, इसलिए अपनी पत्नी और भतीजे की आवाज में कोर्स को रिकौर्ड करवा कर उसे रात में सुनते थे. इसी तरह उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद उन्होंने पहली बार सन 2008 में राजस्थान न्यायिक सेवा (आरजेएस) की परीक्षा दी, लेकिन इस परीक्षा में वह सफल नहीं हो सके.

उन्हें भीलवाड़ा में पढ़ाई के पूरे संसाधन नहीं मिल रहे थे, इसलिए वह जयपुर आ गए. जयपुर में आरजेएस परीक्षा की कोचिंग करने के लिए जब वह एक कोचिंग सेंटर में गए तो दृष्टिहीन होने की वजह से संचालक ने कहा कि वह एडमिशन ले कर क्या करेंगे, घर जाएं, अपना पैसा और समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं? ब्रह्मानंद शर्मा ने उस से एक मौका देने को कहा. उन का हौसला और जज्बा देख कर कोचिंग संचालक ने कहा, ‘‘एक घंटे में सेक्शन 144 याद कर के आओ, उस के बाद तुम्हारे एडमिशन के बारे में सोचेंगे.’’

ब्रह्मानंद शर्मा ने कोचिंग के बाहर ही भतीजे से सेक्शन 144 सुना और करीब 1 घंटे बाद उन्होंने उसे संचालक को ज्यों का त्यों सुना दिया. उन की बुद्धि को देख कर कोचिंग सेंटर का संचालक हैरान रह गया. इस के बाद उन्हें कोचिंग में दाखिला मिल गया. इस बीच ब्रह्मानंद शर्मा ने राजस्थान न्यायिक सेवा भर्ती परीक्षा 2011 के लिए आवेदन कर दिया और जीजान से परीक्षा की तैयारी में जुट गए. उन की मेहनत रंग लाई और परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो ब्रह्मानंद शर्मा की 83वीं रैंक आई. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. उन्हें अपने सपने पूरे होते नजर आने लगे, लेकिन किस्मत को अभी उन की एक परीक्षा और लेनी थी. राजस्थान में शानदार रैंक आने के बावजूद दृष्टिहीन होने की वजह से उन की ट्रेनिंग पर रोक लगा दी गई.

इस के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा. हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने ब्रह्मानंद शर्मा की नियुक्ति की सिफारिश की. एक साल की ट्रेनिंग के बाद उन्होंने चित्तौड़गढ़ में न्यायिक मजिस्टै्रट का पदभार संभाला. ब्रेल लिपि कंप्यूटर और सहायक की मदद से उन्होंने पहले ही दिन एक अनुभवी जज की तरह सुनवाई कर फैसले भी किए. ब्रह्मानंद शर्मा कहते हैं कि हौसला हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है. किसी को भी विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए. हालात से लड़ कर आगे बढ़ें तो सफलता जरूर आप के कदम चूमेगी.

रंगमंच पर कोई रीटेक नहीं होता. उस समय गलतियां सुधारने का भी मौका नहीं मिलता. मंच पर जो अभिनय किया जाता है, उसे सामने बैठा दर्शक सीधे देखता है. कलाकार के पास या फेल होने का फैसला दर्शक करते हैं. लेकिन जयपुर के दृष्टिहीन बच्चे किस तरह अपने अभिनय की प्रस्तुति करते हैं, उसे देख कर आप चौंके बिना नहीं रह सकते. इन बच्चों को तराशा है मशहूर रंगकर्मी भारतरत्न भार्गव ने. राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर में हिंदी के प्रोफेसर रह चुके भारतरत्न भार्गव संगीत नाटक एकेडमी नई दिल्ली के उपसचिव रहे हैं. थिएटर के क्षेत्र में भारतरत्न भार्गव देशभर की जानीमानी हस्ती हैं. बीबीसी लंदन और आल इंडिया रेडियो के लिए भी वह सेवाएं दे चुके हैं.

आजकल वह कला और रंगमंच को समर्पित जयपुर के संस्थान नाट्यकुलम में कुलगुरु के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ढेर सारे अवार्ड और पुरस्कारों से सम्मानित भारतरत्न भार्गव ने अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया है. मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर पर उन्होंने एक किताब लिखी है- रंग हबीब, जिसे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा ने प्रकाशित किया है.

भारतरत्न भार्गव बताते हैं, ‘मैं करीब डेढ़ साल पहले कुछ दृष्टिबाधित बच्चों के संपर्क में आया. वे खेलखेल में भावभंगिमाएं बना रहे थे. मैं ने तभी ठान लिया कि इन्हें रंगमंच की बारीकियां सिखाऊंगा. शुरुआत की तो लोगों ने मजाक उड़ाया. लोग कहते रहे कि जिन्हें खुद नहीं दिखता, उन्हें देखने कौन आएगा? लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी और ये बच्चे मेरी कल्पना से भी आगे निकले. आम रंगकर्मी जो अहसास व्यक्त नहीं कर पाते, वैसा ये बच्चे कर दिखाते हैं. शायद इन का मन ही वह आंख हैं, जो इन्हें सब कुछ सिखा देता है.

‘शुरुआत में मैं इन बच्चों को भावभंगिमाएं सिखाने के लिए अंगुलियों से इन के चेहरों पर भाव उकेरता था. अभिनय करते समय ये दृष्टिहीन बच्चे स्टेज से गिर न जाएं, इस के लिए संगीत की मदद ली. ढोलक, मंजीरे की ताल आदि सुन कर अब ये बच्चे समझ जाते हैं कि मंच पर कब चलना है, कहां रुकना है. इसलिए अब ये अभिनय करते हुए गिरते नहीं हैं. इन्हीं में से कुछ बच्चों को संगीत का क्लू देने के लिए प्रशिक्षित किया. बेजान आंखों को सपने देने से इन्हें एक नई ऊर्जा मिलती है.’

78 साल के भारतरत्न भार्गव जब इन दृष्टिहीन बच्चों को अभिनय सिखाते हैं तो अच्छाभला अभिनेता भी उन का समर्पण देख कर हैरान रह जाता है. चांदी से चमकते सिर व दाढ़ी के बालों के बीच उन के चेहरे पर वह तेज होता है, जिसे उन के दृष्टिहीन शिष्य भले ही नहीं देख पाते, लेकिन उन की सिखाई बातों को तुरंत ग्रहण कर लेते हैं.

फोटोग्राफी एक ऐसी कला है, जिस में आंखों के द्वारा देखे गए नजारों को कैमरे में कैद किया जाता है. जाहिर है, कोई भी फोटोग्राफर उसी वस्तु के फोटो खींचता है, जो उसे उपयोगी लगती है. लेकिन पश्चिम बंगाल के कुछ फोटोग्राफर ऐसे हैं, जो पूरी तरह दृष्टिहीन हैं. इन दृष्टिहीन बच्चों द्वारा की गई फोटोग्राफी देख कर आप हैरान रह जाएंगे. इन दृष्टिहीन बच्चों को फोटोग्राफी में पारंगत किया है जयपुर की फोटोग्राफर पद्मजा शर्मा उर्फ गुनगुन और चंदन एस. राठौड़ ने. गुनगुन तथा चंदन एस. राठौड़ बताते हैं कि पहले यह प्रयास उन्होंने जयपुर के दृष्टिबाधित बच्चों को ले कर करना चाहा, पर अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सका. बाद में पश्चिम बंगाल के सियराफुली कस्बे की सोसायटी फौर ब्लाइंड के संपर्क में आए. सन 2014 के अप्रैल महीने में गुनगुन व राठौड़ ने मिल कर इस सोसायटी के 5 बच्चों की फोटोग्राफी कार्यशाला की.

यह कार्यशाला 7 दिनों तक चली. इस कार्यशाला का विचार शिप औफ थीसिस फिल्म देख कर आया था. उस फिल्म में एक दृष्टिहीन फोटोग्राफर होती है. इसी विचार को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने कई ब्लाइंड सेंटरों पर बात की, लेकिन बात नहीं बनी. कुछ लोगों को लगता था कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. कुछ लोग यह कह कर मना कर देते थे कि इस से कोई फायदा नहीं होगा. कुछ लोग कहते थे कि ऐसा हो ही नहीं सकता. कुछ लोग क्राफ्ट या म्यूजिक की क्लास लगवाने की सलाह देते थे. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

पश्चिम बंगाल के सोसायटी फौर ब्लाइंड सेंटर पर ही कार्यशाला की. इस बीच वह ब्लाइंड फोटोग्राफरों के बारे में भी पढ़ते रहे, उन की तसवीरें देखीं, तसवीरों तक पहुंचने की यात्रा को जानने की कोशिश करते रहे. कार्यशाला में पहले दिन उन्होंने सूरदास को पढ़ा. सूरदासजी देख नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने कितने सारे दृश्य लिखे हैं. इसी तरह बच्चों को ध्वनि और अहसास के सहारे फोटो खींचने के बारे में बताया. उन्होंने इन बच्चों के हाथ में औटो मोड डिजिटल कैमरे दे कर उस की सारी तकनीकी प्रक्रिया समझाई. फिर औब्जेक्ट को छू कर उस से एक निश्चित दूरी बना कर फोटो खींचना सिखाया. इस के बाद आवाज सुन कर उस दिशा में क्लिक करना सिखाया. आवाज के आधार पर फोटो खींचने का उन का प्रयास बेहद उत्साहजनक रहा.

ये बच्चे पहले कैमरे को उसी अंदाज में आंख पर लगाते हैं, जैसे आम लोग करते हैं. इस के बाद बटन पर अंगुली सेट करते हैं और उस के बाद आवाज की दिशा में क्लिक कर के दृश्य को कैमरे में कैद कर लेते हैं. अब तो ये बच्चे फोटोग्राफी में इतने पारंगत हो गए हैं कि कभी मैदान, कभी पहाड़, तो कभी पानी के नजारों तक को कैमरे में अपने अंदाज में उतार लेते हैं. सोसायटी फौर ब्लाइंड के 5 बच्चों फणी पाल, मिलन शर्मा, अंजन शेरेन, टिंकू हाजरा और दुलीचंद राय के खींचे गए फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में इसी साल 12 से 16 फरवरी तक लगाई गई थी.

दृष्टिहीन बच्चों द्वारा अपनी शब्दभेदी ताकत से केवल आवाज सुन कर खींची गई तसवीरों की प्रदर्शनी जयपुर के हजारों लोगों ने देखी. जो भी इस प्रदर्शनी को देखने आया, वह इन बच्चों की अनूठी पहल को देख कर दंग रह गया. दर्शकों के मन में ढेर सारे सवाल और यह जानने की इच्छा थी कि आखिर इन दृष्टिहीन बच्चों ने कैसे इतनी अच्छी तसवीरें खींची? दर्शकों के इन सवालों के जवाब भी वहां मौजूद इन बच्चों ने ही दिए.

कहानी दृष्टिहीन फोटोग्राफरों की चल रही है तो मुंबई में एक ऐसा शख्स भी है, जो नामी फिल्म कलाकारों को उन की महक के सहारे कैमरे में कैद करता है. इस फोटोग्राफर का नाम है भावेश पटेल. हाल ही में बौलीवुड एक्ट्रैस कैटरीना कैफ का एक वीडियो यू ट्यूब पर आया है, जिस में वह एक परफ्यूम के लिए शूट कर रही हैं. इस में कैटरीना की फोटोग्राफी भावेश ने की है. भावेश नेत्रहीन हैं. वह इस वीडियो में कह रहे हैं, ‘मैं जब भी फोटोग्राफ खींचता हूं, वह महक ही होती है, जो उस की तसवीर मेरे मन में बना देती है और उस के बाद मुझे करना होता है बस एक क्लिक.’

वीडियो में दिखाया गया है कि भावेश के खींचे फोटोग्राफ देख कर कैटरीना कैफ मुसकरा कर कहती हैं, ‘दे आर अमेजिंग’. बहरहाल, ये नेत्रहीन, मूकबधिर अपने जज्बे से एक नई कहानी लिख कर लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं. फिर भी यह चिंता की बात है कि भारत में सन 2011 की जनगणना के अनुसार, 50 लाख 32 हजार 463 नेत्रहीन हैं. इन में पुरुषों की संख्या 26 लाख 38 हजार 516 एवं महिलाओं की संख्या 23 लाख 93 हजार 947 है. सरकार को चाहिए कि इन नेत्रहीनों के समुचित विकास के लिए ठोस नीति बनाए. Hindi Stories