Crime Story Hindi: पुलिस की गिरफ्त में पुलिस

Crime Story Hindi: खूबसूरत महिलाओं के साथ रंगरेलियां मनाने के चक्कर में कई लोग हनीट्रैप में कुछ इस तरह फंस जाते हैं कि पुलिस के पास जाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते. आशीष के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ लेकिन समय रहते ही उन की बुद्धि काम कर गई और वह एक बड़ी मुसीबत से बच गए.

आशीष अपनी दुकान पर बैठे थे, उसी समय उन के मोबाइल पर किसी अज्ञात नंबर से केवल हाय लिखा हुआ वाट्सऐप मैसेज आया. वह उसे कोई तवज्जो न दे कर अपने काम में लग गए. कुछ देर बाद उसी नंबर से वाट्सऐप पर 2-3 खूबसूरत लड़कियों के फोटो आए. सुंदर लड़कियों के फोटो देख कर उन की जिज्ञासा बढ़ी तो उन्होंने उस नंबर पर फोन किया, जिस नंबर से मैसेज और फोटो आए थे.

दूसरी ओर किसी लड़की ने फोन उठाया तो आशीष ने पूछा, ‘‘आप के नंबर से मेरे पास 2-3 लड़कियों के फोटो भेजे गए हैं. क्या मैं जान सकता हूं कि ये फोटो मुझे क्यों भेजे गए हैं?’’

‘‘सौरी सर, दरअसल ये फोटो मुझे किसी और को भेजने थे, गलती से आप के नंबर पर चले गए. वैसे सर, अगर आप अन्यथा न लें तो क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन और कहां से बोल रहे हैं?’’ लड़की ने कहा.

‘‘मेरा नाम आशीष है और रानीबाग इलाके में मेरी कार एसेसरीज की दुकान है.’’ आशीष ने उसे अपने बारे में बताया.

कुछ लोग आदतन लड़कियों के फोन को ज्यादा तवज्जो देते हैं. ऐसे लोगों के फोन पर अगर किसी लड़की का फोन आ जाए तो वे उस से ज्यादा से ज्यादा देर तक बात करने की कोशिश करते हैं. आशीष भी ऐसे ही लोगों में थे.

‘‘ओके सर.’’ आशीष की हकीकत जान कर लड़की ने कहा.

‘‘वैसे मैडम, क्या मैं जान सकता हूं कि आप कौन हैं और कहां से बोल रही हैं?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘जी मेरा नाम प्रीति है और मैं भी दिल्ली में ही रहती हूं. दरअसल, आप के मोबाइल पर जिन लड़कियों के फोटो आए हैं, वे मुझे किसी और को भेजने थे. वैसे अगर आप भी शौकीन हों तो उन में से कोई लड़की पसंद कर सकते हैं.’’ प्रीति ने मीठे स्वर में कहा.

37 साल के आशीष इतने नासमझ नहीं थे कि प्रीति की बातों का मतलब न समझ पाते. वह चूंकि बीवीबच्चों वाले थे, इसलिए मन ललचाने के बावजूद उन्होंने जल्दबाजी में कोई कदम उठाना उचित नहीं समझा. उन्होंने प्रीति को टालने के लिए कहा, ‘‘मैडम, अभी मैं काम में बिजी हूं, जब भी जरूरत होगी, आप को बता दूंगा.’’

‘‘ठीक है सर, आप जब भी चाहें बेझिझक बता दें. एक बार हमारी सेवा लेने के बाद आप की तबीयत खुश हो जाएगी.’’ कह कर प्रीति ने फोन काट दिया.

इस के बाद प्रीति और आशीष के बीच दोस्ती हो गई. दोनों वाट्सऐप पर अकसर बातें करने लगे. 5-6 महीने तक उन के बीच इसी तरह बातें चलती रहीं. एक बार प्रीति ने एक पता दे कर उन्हें मिलने के लिए बुलाया, पर व्यस्तता की वजह से वह जा नहीं सके. 14 मार्च, 2016 को भी आशीष की वाट्सऐप पर प्रीति से बात हुई. प्रीति ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘आप आए नहीं?’’

‘‘आ कर क्या करें, कोई बढि़या चीज तो आप के पास है नहीं. अगर कोई बढि़या माल हो तो बताइए?’’ आशीष ने कहा.

‘‘हमारे पास बढि़या माल भी है, अभी फोटो भेजती हूं.’’ प्रीति ने कहा.

कुछ देर बाद आशीष के वाट्सऐप पर एक लड़की की फोटो आई. वह लाल रंग का स्लीवलैस टौप पहने थी और वाकई खूबसूरत लग रही थी. फोटो देखते ही आशीष उस पर फिदा हो गए. उन्होंने उसी वक्त प्रीति को फोन कर के कहा, ‘‘मैडम, यह लड़की मुझे पसंद है.’’

‘‘आशीष साहब, इस की एक बार की कीमत 3 हजार रुपए है.’’ प्रीति ने कहा.

कीमत सुन कर आशीष चौंक गए क्योंकि इतने कम पैसों में इतनी सुंदर कालगर्ल नहीं मिल सकती. आशीष ने तुरंत कहा, ‘‘कोई बात नहीं मैडम, जब चीज पसंद आ जाए तो हम कीमत नहीं देखते. आप इसे हमारे पास रानीबाग भेज दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, लड़की वहां नहीं जा सकती. दरअसल वह कालेज स्टूडेंट है. अपने घर वालों से कोई बहाना कर थोड़ीबहुत देर के लिए घर से निकल सकती है. ऐसा कीजिए, आप 3 बजे तक रोहिणी सेक्टर-15 में बंसल भवन के पास पहुंच जाइए. तब तक लड़की को मैं अपने फ्लैट में बुला लूंगी. आप को हम पिक कर लेंगे.’’

आशीष ने बात करते हुए दुकान में लगी दीवार घड़ी की तरफ देख कर कहा, ‘‘मैडम, 3 तो बजने वाले हैं. मैं इतनी जल्दी रोहिणी कैसे पहुंच पाऊंगा?’’

‘‘कोई बात नहीं सर, सवा 3-साढ़े 3 तक पहुंच जाइए. हम आप को वहीं मिलेंगे.’’ प्रीति बोली.

आशीष की दुकान पर मौजूद लड़के एक कार में एसेसरीज लगाने में जुटे थे. आशीष को सैक्टर-15 पहुंचने की जल्दी थी. उन्होंने लड़कों से कहा कि वह किसी से मिलने जा रहे हैं, थोड़ी देर में लौट आएंगे. इस के बाद वह अपनी कार से रोहिणी सेक्टर-15 के लिए रवाना हो गए. करीब आधे घंटे बाद वह बंसल भवन के नजदीक पहुंचे तो वहां 2 लड़कियां खड़ी मिलीं. उन में से एक तो वही थी, जिस की फोटो प्रीति ने उन्हें भेजी थी. प्रीति को उन्होंने देखा नहीं था. उस से केवल फोन पर ही बातें हुई थीं. इसलिए वह समझ गए कि दूसरी लड़की प्रीति ही होगी.

फिर भी संतुष्टि के लिए उन्होंने कार से उतर कर प्रीति का नंबर मिलाया और उन दोनों लड़कियों की ओर देखने लगे. नंबर मिलाते ही उन दोनों में से एक ने काल रिसीव करते हुए फोन कान से लगाया तो आशीष ने अपना एक हाथ उठा कर इशारा किया तो दोनों लड़कियां उन की कार के नजदीक आ गईं. उन में से एक लड़की ने अपना परिचय प्रीति और दूसरी का परिचय शिखा के रूप में दिया.

कार को वहीं पार्किंग में लगवा कर प्रीति आशीष को रोहिणी सेक्टर-15 के ही एक फ्लैट में ले जा कर बोली, ‘‘यहां कोई समस्या खड़ी हो सकती है, इसलिए यहां से कहीं और चलना होगा.’’

‘‘कहां?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘यहीं रोहिणी के सेक्टर-2 में हमारा फ्लैट है, वहीं चलते हैं.’’ प्रीति बोली.

आशीष ने कार से चलने का प्रस्ताव रखा तो प्रीति बोली, ‘‘साथ चलना ठीक नहीं है, आप अपनी कार से सेक्टर-2 स्थित अवंतिका हौस्पिटल के पास पहुंचिए, हम वहीं मिलेंगे.’’

आशीष कार से सेक्टर-2 की तरफ चल दिए. सेक्टर-2 के अवंतिका हौस्पिटल से कहां जाना है, यह उन्हें पता नहीं था. इसलिए निश्चित जगह पर पहुंच कर उन्होंने प्रीति को फोन लगाया. इस पर प्रीति ने उन्हें सेक्टर-2 के ब्लौक-ए स्थित एक फ्लैट पर आने को कहा. कार खड़ी कर के आशीष ए-ब्लौक में प्रीति द्वारा बताई गई जगह पहुंच गए. वहां प्रीति उन्हें मिल गई. वह उन्हें साथ ले कर एक फ्लैट में पहुंची. उस फ्लैट में 2 कमरे थे. प्रीति ने आशीष से 3 हजार रुपए ले कर उन्हें शिखा के साथ दूसरे कमरे में भेज दिया. आशीष के लिए खुद पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था. उन्होंने फटाफट दरवाजा बंद किया और शिखा को अपनी बांहों में समेट लिया.

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है जनाब, थोड़ा सब्र रखिए.’’ कहते हुए शिखा ने आशीष की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए.

‘‘नहीं शिखा, मैं अब और बरदाश्त नहीं कर सकता,’’ कह कर आशीष ने खुद ही अपने कपड़े उतार दिए. शिखा भी प्राकृतिक अवस्था में आ गई. आखिर आशीष ने अपनी हसरत पूरी कर ली.

इस के बाद शिखा फटाफट कपड़े पहन कर कमरे से बाहर निकल गई. उस के बाहर जाते ही 5 लोग उस कमरे में घुस आए. उन में से एक दिल्ली पुलिस की वर्दी पहने था, जिस की नेमप्लेट पर सुभाषचंद लिखा था. उन में से 2 लोग अपनेअपने मोबाइलों से आशीष की अर्द्धनग्नावस्था की वीडियो बनाने लगे. अचानक आए उन लोगों को देख आशीष के होश उड़ गए. आशीष समझ गए कि ये पुलिस के लोग हैं और वह बुरी तरह फंस गए हैं. पुलिस की वर्दी वाला एएसआई सुभाषचंद था. उस ने कहा, ‘‘रेड में तुम रंगेहाथों पकड़े गए हो.’’

‘‘सर, मुझ से क्या गलती हो गई?’’ आशीष ने डरते हुए पूछा.

‘‘जब तुम रेप के आरोप में जेल जाओगे तो गलती का खुद ही पता चल जाएगा.’’ पुलिस वाले ने धमकाते हुए कहा.

‘‘सर, मैं ने किसी के साथ रेप नहीं किया. वह लड़की तो खुद मुझे यहां ले कर आई थी.’’ आशीष ने सफाई दी.

‘‘चुप रह. उस लड़की का बयान और हमारी बनाई वीडियो फिल्म तुझे सजा दिलाने के लिए काफी है. अब तू खुद सोच ले कि तेरी इस करतूत की वजह से तेरी कितनी बदनामी होगी.’’ पुलिस वाले ने आशीष को हड़काया.

आशीष बुरी तरह डरे हुए थे. वह उन लोगों के सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे. यह देख कर एएसआई सुभाषचंद ने कहा, ‘‘देख भई, तेरे खिलाफ बड़ा पक्का मामला बन रहा है. इस से बचने का एक ही तरीका है. लेकिन उस के लिए तुझे 15 लाख खर्च करने पड़ेंगे. क्योंकि जिस लड़की के साथ तूने रेप किया है, उसे काफी पैसे देने होंगे, वरना वह नहीं मानेगी.’’

‘‘सर, यह रकम तो बहुत ज्यादा हैं. इतने पैसे मैं कहां से लाऊंगा?’’ आशीष ने कहा.

‘‘यह बात तो तुझे उस के साथ कमरे में जाने से पहले सोचनी चाहिए थी.’’ एएसआई ने कहा.

‘‘सर, यह ऐसे नहीं मानेगा, इसे थाने ले चलो. वहां पर इस के घर वालों और रिश्तेदारों को बुला कर इस की करतूत बताई जाएगी तो यह समझेगा.’’ साथ में खड़े उस के साथी ने कहा.

‘‘नहीं सर, ऐसा मत करिए. मैं बरबाद हो जाऊंगा. आप यहीं मामला निपटा लीजिए.’’ आशीष ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘तो चल, 10 लाख दे दे. मामला रफादफा कर देंगे.’’ सुभाषचंद ने कहा.

आशीष पुलिस के लफड़े से बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 10 लाख रुपए देने की हामी भर ली. उन लोगों ने आशीष से कहा कि 3 लाख रुपए अभी दे दे, बाकी कल ले लेंगे. लेकिन उस समय आशीष के पास इतने पैसे नहीं थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह 3 लाख रुपए का इंतजाम कहां से करें. मुसीबत के उस समय में उन्हें अपना दोस्त वैभव याद आया. उस की दिल्ली के मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में फैक्ट्री थी. वह अपनी फैक्ट्री में है या नहीं, यह जानने के लिए उन्होंने उसे फोन किया. वैभव उस समय फैक्ट्री में ही था.

वे पांचों लोग आशीष के साथ मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंच गए. आशीष ने अपनी कार दोस्त की फैक्ट्री के बाहर खड़ी कर दी. एएसआई सुभाषचंद और उस के साथी उस की कार में बैठे रहे. जबकि वह अपने दोस्त के पास चले गए. उन्होंने अपने दोस्त वैभव को खुद के फंसने की पूरी कहानी बता दी. वैभव समझ गया कि आशीष मुसीबत में फंस गया है लेकिन उस समय उस के पास भी 3 लाख रुपए नहीं थे. उस ने किसी तरह एक लाख रुपए का इंतजाम कर के उसे दे दिए. आशीष ने एक लाख रुपए कार में बैठे एएसआई सुभाषचंद को देते हुए कहा कि बड़ी मुश्किल से एक लाख का इंतजाम हो पाया है. इस के लिए भी मुझे अपनी कार गिरवी रखनी पड़ी है.

‘‘इतने से काम नहीं चलेगा. बात 3 लाख की हुई है. पूरी रकम का इंतजाम आज ही करना होगा.’’ उन में से एक शख्स ने कहा.

‘‘मैं ने काफी कोशिश की, लेकिन 3 लाख का इंतजाम नहीं हो पाया. आप मुझे कल तक का टाइम दो. मैं कल तक 2 लाख रुपए का जुगाड़ कर दूंगा.’’ आशीष ने अनुरोध किया.

‘‘2 लाख नहीं, बाकी के सारे पैसे भी कल ही देने होंगे. पैसे कहां पहुंचाने हैं, यह बात हम तुझे फोन कर के बता देंगे. और हां, ज्यादा स्याणा बनने की कोशिश मत करना, वरना तेरी वीडियो फिल्म हमारे मोबाइल में है.’’ उन के एक साथी ने कहा.

इस के बाद वे पांचों वहां से चले गए. आशीष ने राहत की सांस ली. तब तक शाम हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने फोन कर के अपनी दुकान पर काम करने वाले लड़के से कह दिया कि दुकान बंद कर के चाबी अपने साथ ले जाए और सुबह जल्दी आ कर दुकान खोल ले. इस के बाद वह भी वेस्ट पटेलनगर के पास शादी खामपुर गांव स्थित अपने घर चले गए. अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन उन का चेहरा मुरझाया हुआ था. पत्नी ने इस की वजह जाननी चाही तो उन्होंने झूठ बोल दिया कि काम की वजह से थकान हो गई है.

खाना खाने के बाद आशीष जब बिस्तर पर लेटे तो उन की आंखों से नींद गायब थी. उन्हें बस यही चिंता सता रही थी कि कल उन लोगों को पैसे कहां से ला कर देंगे. अगर पैसों का इंतजाम नहीं हुआ तो उन्हें रेप के इलजाम में जेल जाना पड़ेगा. रात भर उन के दिमाग में इसी तरह के विचार घूमते रहे. सुबह को वह रानीबाग स्थित अपनी दुकान पर चले गए. आशीष दुकान पर पहुंचे ही थे कि एक अनजान नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी ओर से एएसआई सुभाषचंद की आवाज आई, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या नहीं?’’

यह सुन कर आशीष घबरा कर बोले, ‘‘सर, अभी नहीं हुआ है. मैं उसी के इंतजाम में लगा हूं.’’

‘‘जल्दी इंतजाम कर ले. पैसे ले कर तुझे आज ही शाम 7 बजे मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया के अनुकंपा बैंक्वेट हौल के पास आना है.’’ कह कर एएसआई सुभाषचंद ने फोन काट दिया.

आशीष को शाम 7 बजे से पहलेपहले पैसों का जुगाड़ करना था. उन्होंने मार्केट में अपने जानने वालों से बात की, पर पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, आशीष की चिंता बढ़ती जा रही थी. तमाम कोशिशों के बाद भी पैसों का इंतजाम नहीं हो सका. फिर भी वह शाम 7 बजे से पहले ही निर्धारित जगह पर पहुंच गए. तभी पहले वाले नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. आशीष ने कह दिया कि वह अनुकंपा बैंक्वेट हौल के सामने खड़े हैं. कुछ देर बाद 20-22 साल का एक युवक उन के पास आया. वह उसे देखते ही पहचान गए. वह युवक कल सुभाषचंद के साथ था. उस युवक ने अपना नाम अमित बताते हुए आशीष से पैसे मांगे.

आशीष ने उस के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं ने बहुत कोशिश की, तमाम लोगों के पास गया और कई से फोन पर भी बात की, लेकिन कहीं भी बात नहीं बनी. आप मुझे थोड़ा वक्त और दे दो.’’

‘‘नहीं, अब तुझे कोई टाइम नहीं मिलेगा. क्या करेगा, कहां से पैसे लाएगा, हमें नहीं पता. जैसे भी हो, पैसे ले कर आज रात साढ़े 9 बजे बाहरी रिंग रोड स्थित काली माता मंदिर पर पहुंच जाना. यह तुझे आखिरी मौका मिल रहा है.’’

यह सुन कर आशीष मानसिक तनाव में आ गए. उन के पास ढाई घंटे का समय बचा था. इन ढाई घंटों में वह इतनी मोटी रकम कहां से लाएं, यह बात उन की समझ में नहीं आ रही थी. अपना दुखड़ा रोने के लिए वह फिर से अपने दोस्त वैभव की फैक्ट्री में चले गए. वैभव को आशीष की हालत पर तरस आ रहा था, पर उस के पास इतनी मोटी रकम नहीं थी. आखिर उस ने आशीष को पुलिस के पास जाने की सलाह दी. आशीष के पास पुलिस में शिकायत ले कर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. काफी सोचनेसमझने के बाद वह दोस्त को साथ ले कर बाहरी जिले के थाना रोहिणी (दक्षिणी) चले गए.

थाने में मौजूद थानाप्रभारी संजय शर्मा को आशीष ने पूरी बात बता दी. थानाप्रभारी को जब यह पता चला कि उस गैंग में दिल्ली पुलिस का एक एएसआई भी शामिल है तो उन्हें आश्चर्य हुआ. वह एएसआई असली है या फरजी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था. उन्होंने पूरे मामले से बाहरी जिले के डीसीपी विक्रमजीत सिंह को अवगत करा दिया.

चूंकि उन लोगों ने आशीष को पैसे ले कर उसी रात साढ़े 9 बजे काली माता मंदिर पर बुलाया था, इसलिए उन्हें रंगेहाथों पकड़ने का अच्छा मौका था. डीसीपी विक्रमजीत सिंह ने एसीपी उमेश सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी संजय शर्मा, सबइंसपेक्टर रजनीश, हैडकांस्टेबल राजकुमार और कांस्टेबल कुलवीर को शामिल किया गया.

एएसआई सुभाषचंद द्वारा जिस नंबर से आशीष को फोन किया गया था, पुलिस के कहने पर आशीष ने उसी नंबर पर फोन किया, ‘‘हैलो सर, मैं आशीष बोल रहा हूं.’’

तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हां भई, बोल. पैसों का इंतजाम हो गया क्या?’’

‘‘जी, 9 लाख तो नहीं हो पाए, पर मैं बड़ी मुश्किल से 4 लाख का इंतजाम कर पाया हूं.’’ आशीष ने पुलिस के निर्देशानुसार कहा.

‘‘ठीक है, तू पैसे ले कर वहीं काली माता मंदिर पर पहुंच, हम वहीं मिलेंगे.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई.

बात हो जाने के बाद पुलिस टीम सादा कपड़ों में काली मंदिर पर पहुंच गई. इस के कुछ देर बाद ही आशीष भी अपनी कार से वहां पहुंच गए. अपने हाथ में बैग थामे जैसे ही वह कार से उतरे, एएसआई सुभाषचंद और अमित उन के पास पहुंच गए. उस समय सुभाषचंद पुलिस वर्दी में नहीं था. आशीष ने जैसे ही सुभाष के हाथ में बैग दिया, थाना रोहिणी (दक्षिणी) की पुलिस टीम ने दोनों को हिरासत में ले लिया.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. अन्य अभियुक्त फरार न हो जाएं, इसलिए एसीपी उमेश सिंह ने इस पुलिस टीम में मंगोलपुरी थाने के सबइंसपेक्टर रोबिन त्यागी, हैडकांस्टेबल दिनेश, सुभाष और कांस्टेबल वीरेंद्र को शामिल कर उसी दिन नांगलोई, कंझावला में दबिशें दे कर कंझावला से टिंकू उर्फ साहिल, नांगलोई से ललित सिंह और आजम खान को गिरफ्तार कर लिया. रैकेट में शामिल युवतियों शिखा और प्रीति के घरों पर भी दबिश डाली गई, लेकिन वे फरार हो चुकी थीं. पुलिस ने पांचों अभियुक्तों से पूछताछ की तो पता चला कि इन का सरगना सुभाषचंद ही था. वह फरजी पुलिस वाला नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस के कम्युनिकेशन विभाग का एएसआई था. उस की पोस्टिंग बाहरी जिला के थाना मंगोलपुरी में थी.

मूलरूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला सुभाषचंद करीब 26 साल पहले दिल्ली पुलिस में भरती हुआ था. बाद में उस ने सुल्तानपुरी में अपना मकान बना लिया था और परिवार के साथ दिल्ली में ही रहने लगा था. उस की मुलाकात जेजे कालोनी सावदा, नांगलोई के रहने वाले टिंकू से हुई. टिंकू साप्ताहिक बाजारों में दुकान लगाता था. टिंकू की दोस्ती कृष्णा पार्क देवली, खानपुर के रहने वाले अमित से थी. टिंकू के 2 दोस्त और थे आजम खान और अमित. आजम एक निजी अस्पताल में डायलिसिस मशीन का टेक्नीशियन था और अमित बाल बियरिंग मैकेनिक था.

ये सभी जल्द से जल्द पैसे कमाने की सोचते रहते थे. 6 महीने पहले ही अमित की प्रीति उर्फ मनीषा से शादी हुई. इसलिए उस का भी खर्च बढ़ गया था. वह आए दिन अखबारों में हनीटै्रप द्वारा लोगों को ठगने की खबरें पढ़ता रहता था. मोटी रकम कमाने के लिए उसे यह काम सही लगा. क्योंकि इस तरह एक ही झटके में मोटी रकम ऐंठी जा सकती थी. यह बात उस ने अपने दोस्तों को बताई. फिर उन लोगों ने इस बारे में मंगोलपुरी थाने में तैनात एएसआई सुभाषचंद से बात की. पैसों के लालच में वह भी उन का साथ देने को तैयार हो गया. असली पुलिस वाले के शामिल होने पर सभी की हिम्मत बढ़ गई.

योजना तो बन गई, लेकिन समस्या यह थी कि किसे फांसा जाए. इस के लिए इन लोगों ने कुछ कालगर्ल्स से संपर्क कर के किसी तरह उन लोगों के फोन नंबर हासिल कर लिए, जो उन के पास मौजमस्ती के लिए आते थे. ग्राहकों को फंसाने की जिम्मेदारी अमित की पत्नी प्रीति उर्फ मनीषा ने संभाली. शिकार फंसाने के लिए वह पहले लोगों से वाट्सऐप पर दोस्ती करती थी. दोस्ती के जरिए वह फंसने वाले से अनौपचारिक बातें भी करने लगती थी. फिर उस के पास कुछ लड़कियों के फोटो भेज कर उन्हें पसंद करने के लिए कहती थी. फंसा हुआ ग्राहक जब किसी लड़की के साथ जाने को तैयार हो जाता था तो उसी दौरान वे लोग उस के आपत्तिजनक फोटो खींच लेते थे. उसी को मुद्दा बना कर ये लोग उस से मोटी रकम ऐंठते थे.

इसी तरह उन्होंने वेस्ट पटेलनगर के शादी खामपुर गांव के रहने वाले आशीष को फांसा था. उस से उन्होंने 15 लाख रुपए मांगे. मामला 10 लाख रुपए में तय हो गया. इस से पहले कि उन की मंशा पूरी हो पाती, 5 अभियुक्त पुलिस के शिकंजे में फंस गए. गिरफ्तार हुए अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने 30 हजार रुपए नकद, 4 मोबाइल फोन, एक डिजिटल कैमरा बरामद किया. पुलिस ने 16 मार्च, 2016 को अभियुक्त सुभाषचंद, ललित सिंह, टिंकू, अमित और आजम को गिरफ्तार कर महानगर दंडाधिकारी रविंद्र सिंह के समक्ष पेश किया. पुलिस ने अमित, ललित और सुभाषचंद को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. जबकि आजम व टिंकू को जेल भेज दिया गया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने तीनों अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ कर के उन्हें 18 मार्च, 2016 को पुन: कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक प्रीति और शिखा पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सकी थीं. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. आशीष और वैभव परिवर्तित नाम हैं.

 

Bangalore Crime News: प्यार का खौफनाक अंत. प्रपोजल के बहाने प्रेमी को जिंदा जलाया

Bangalore Crime News: प्यार करने वाले रिश्तों में तकरार होना आम बात है, लेकिन कभीकभी यही तकरार इतना खतरनाक रूप ले लेती है कि इंसान बदले की आग में कुछ भी कर बैठता है. एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया, जिस ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया. यहां एक प्रेमिका ने प्यार के नाम पर ऐसा खौफनाक खेल खेला, जिस की कल्पना करना भी नमुमकिन है. प्रपोजल के बहाने उसने अपने ही प्रेमी को जिंदा जला दिया.

यह सनसनीखेज घटना कर्नाटक के बेंगलुरु शहर से जुड़ी बताई जा रही है. 27 साल की प्रेरणा ने अपने प्रेमी किरण को एक खास सरप्राइज देने के बहाने घर बुलाया. घर में उस समय कोई और मौजूद नहीं था, जिस का फायदा उठाते हुए उस ने पूरी साजिश को अंजाम दिया. शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगा, लेकिन धीरेधीरे हालात डरावने होते चले गए.

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बताया जाता है कि प्रेरणा ने किरण की आंखों पर पट्टी बांध दी और उस के हाथपैर कुरसी से कस कर बांध  दिए. जब किरण ने इस का विरोध किया तो उस ने इसे ‘फारेन स्टाइल प्रपोजल’ कहकर उसे भरोसे में लिया. प्यार में भरोसा करने वाले किरण को जरा भी अंदाजा नहीं था कि अगले ही पल उसकी जिंदगी खत्म होने वाली है.

कुछ ही देर बाद प्रेरणा ने उस पर पेट्रोल डाल दिया और आग लगा दी. बंधे होने की वजह से किरण खुद को बचा नहीं सका और मौके पर ही उस की दर्दनाक मौत हो गई. यह पूरी घटना इतनी भयावह थी कि जिस ने भी सुना, उस की रूह कांप उठी. जांच में सामने आया कि दोनों करीब एक साल से रिलेशनशिप में थे और एक ही टेलीकाम कंपनी में काम करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से उन के रिश्ते में खटास आ गई थी.

प्रेरणा इस बात से नाराज थी कि किरण उसे नजरअंदाज कर रहा था और शादी से बच रहा था. यही नाराजगी धीरेधीरे खतरनाक साजिश में बदल गई. घटना के बाद प्रेरणा ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की और कहा कि वह बाथरूम में थी, बाहर आ कर उस ने किरण को आग में जलता हुआ पाया. लेकिन जांच के दौरान यह कहानी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी. सीसीटीवी फुटेज और अन्य सबूतों ने सच्चाई उजागर कर दी.

पुलिस के मुताबिक, घर में पहले से पेट्रोल मौजूद था, जिस से साफ है कि हत्या की योजना पहले ही बना ली गई थी. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि आरोपी ने इस पूरी घटना का वीडियो भी अपने मोबाइल में रिकौर्ड किया. जब किरण आग में जल रहा था, तब भी वह वीडियो बनाती रही, जो इस अपराध की निर्दयता को साफ दिखाता है.

फिलहाल पुलिस ने प्रेरणा को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी है. शुरुआती जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि हत्या उसी ने की है. अब पुलिस इस मामले के हर पहलू को खंगाल रही है, ताकि इस खौफनाक वारदात के पीछे की पूरी सच्चाई सामने लाई जा सके. Bangalore Crime News

Uttar Pradesh Crime: ज्योति जो बुझ गई

Uttar Pradesh Crime: ज्योति का कमाने वाला पति था, 3 बच्चे थे, घर में किसी चीज की कमी नहीं थी लेकिन स्वार्थी राजेश के कहने में आ कर उस ने जो किया, उस से उस की खुद की जान तो गई ही, अपना और राजेश का घर भी बरबाद कर दिया.

आदमी में महत्त्वाकांक्षाएं कभीकभी ऐसा जुनून पैदा करती हैं कि कुछ पाने की चाह में उस के पास जो होता है, वह भी गंवा बैठता है. ज्योति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. वह उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के पंचवटी रोड स्थित यशोदानगर के रहने वाले कालका सिंह चौहान के बड़े बेटे जितेंद्र की पत्नी थी. उन का दूध का कारोबार था, जिसे अब उन का बड़ा बेटा जितेंद्र संभालता था.

ज्योति तहसील करहल के गांव तिलियानी के रहने वाले रिटायर्ड फौजी महेंद्र सिंह की बेटी थी. ससुराल में किसी चीज की कमी नहीं थी. वह बीए पास थी. शादी से पहले वह नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. अच्छी ससुराल मिल जाने की वजह से उस ने नौकरी वाली बात भुला भले दी थी, लेकिन मन से निकाल नहीं पाई थी, जिस की वजह से कभीकभी उसे लगता था कि वह जो करना चाहती थी, कर नहीं पाई.

ज्योति जितेंद्र के 2 बेटों और 1 बेटी की मां बन चुकी थी. घर के कामों को करते हुए कभीकभी उसे लगता कि जिंदगी इसी तरह खाना बनाते, बरतन धोते और घर वालों की चाकरी करते बीत जाएगी. कभी वह मन की बात पति से कहना चाहती तो उस के पास समय ही नहीं होता था कि वह पत्नी के मन की बात को सुनता. लेकिन समय को किस ने देखा है. कभी भी कुछ भी हो सकता है. वह कभी भी करवट ले सकता है और आदमी को कुछ भी करने का मौका दे सकता है.

करीब 4 साल पहले जितेंद्र ने अपने मकान का एक हिस्सा अपने दोस्त राजेश को किराए पर दे दिया. वह आगरा के फतेहाबाद के श्रीकृष्णपुरा के रहने वाले बीरी सिंह का बेटा था. दोस्त होने के नाते जितेंद्र ने उसे दूध के अपने कारोबार में पार्टनर बना लिया था. राजेश ने कारोबार में काफी मेहनत की, जिस से जल्दी ही उस की हैसियत जितेंद्र के घर में सदस्य जैसी हो गई. उस का खानापीना, उठनाबैठना, सब जितेंद्र के घर होने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि उसे जितेंद्र के घर के अंदर की बातें पता चल गईं.

कुछ ही दिनों में राजेश को लगा कि जितेंद्र और उस की पत्नी ज्योति के बीच कुछ ऐसा है, जो पतिपत्नी के बीच नहीं होना चाहिए. वह शादीशुदा था और जब भी मौका मिलता था, पत्नी से मिलने घर जाता रहता था. लेकिन घर से दूर रह कर उसे पत्नी की कमी तो खलती ही थी. उस ने महसूस किया कि ज्योति उदास रहती है. उस ने उस से उदासी का कारण पूछा तो वह टाल गई. राजेश को पता था कि ज्योति पढ़ीलिखी और स्मार्ट महिला है. उस के घर वालों की कुछ मजबूरियां रही होंगी, तभी उस की शादी एक कम पढ़ेलिखे लड़के से कर दी थी है.

दरअसल, ज्योति अब तक घर के कामों से ऊब गई थी. वह कुछ करना चाहती थी, लेकिन जितेंद्र का कहना था कि उसे किस चीज की कमी है, जो वह नौकरी करना चाहती है. इस से ज्योति को लगता था कि पति उस की भावनाओं की कद्र नहीं करता. राजेश का घर के अंदर तक आनाजाना था. पत्नी से दूर रहने की वजह से वह ज्योति के प्रति सहानुभूति दिखा कर उस से कुछ हासिल करना चाहता था. इसलिए एक दिन उस ने ज्योति से कहा, ‘‘भाभी, मैं देखता हूं, जितेंद्र भाई को तुम्हारी जो कद्र करनी चाहिए, वह नहीं करते. जबकि तुम सुंदर और स्मार्ट तो हो ही, उन से ज्यादा पढ़ीलिखी भी हो. आखिर तुम कुछ करना चाहती हो तो इस में बुरा क्या है? वैसे मुझे यह सब कहना तो नहीं चाहिए था, लेकिन तुम्हें परेशान देख कर कह दिया.’’

ज्योति को लगा, राजेश ठीक ही कह रहा है. वह सुंदर और स्मार्ट है, पढ़ीलिखी भी है. अगर वह चाहे तो कुछ कर सकती है. लेकिन जितेंद्र करने नहीं देता. शायद वह उसे इसी तरह नौकरानी बना कर रखना चाहता है. उस दिन दोपहर का खाना ले कर वह राजेश के कमरे में पहुंची तो राजेश ने कहा, ‘‘अरे भाभी, तुम ने क्यों तकलीफ की? मैं खाना लेने आ ही रहा था.’’

‘‘मैं ही ले कर आ गई तो क्या हो गया?’’ राजेश के कमरे में पड़ी कुरसी पर बैठते हुए ज्योति ने कहा, ‘‘अच्छा यह बताओ कि क्या मैं कुछ कर सकती हूं? घर का काम खत्म होने के बाद समय काटे नहीं कटता है.’’

‘‘भाभीजी, तुम पढ़ीलिखी हो, टीचर बन सकती हो, ब्यूटीपार्लर खोल सकती हो, जो भी चाहो, कर सकती हो.’’

‘‘तुम्हें मेरे ऊपर इतना विश्वास है?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, मैंने कहा न कि तुम सुंदर और पढ़ीलिखी हो, कुछ भी कर सकती हो. जितेंद्र तुम्हें परख नहीं पाया.’’

‘‘लेकिन तुम ने परख लिया?’’ ज्योति ने हंसते हुए कहा.

ज्योति का मन राजेश के इर्दगिर्द भटकने लगा तो पति से नफरत सी होने लगी. जल्दी ही वह राजेश के प्रति आकर्षित हो उठी. इस के बाद उस की नजरें बदल गईं तो राजेश को भांपते देर नहीं लगी. आखिर एक दिन उस ने ज्योति से मन की बात कह ही दी, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘प्यार, वह भी मुझ से? अरे मैं तुम्हारे दोस्त की पत्नी हूं और उन के 3 बच्चों की मां भी.’’

‘‘अब भाभी, तुम पर दिल आ गया तो मैं क्या करूं. मैं उस के हाथों मजबूर हूं. मैं तुम्हें ले कर परेशान रहता हूं. काम में भी मन नहीं लगता. अगर तुम ने ना कर दिया तो शायद मैं यहां न रह पाऊं.’’ राजेश ने कहा.

राजेश ने जाने की बात की तो ज्योति का दिल धड़क उठा. उस ने कहा, ‘‘मुझे कुछ सोचने का समय दो.’’

‘‘सोचना क्या है? मेरा दिलोदिमाग सब बेचैन है. मेरी रातों की नींद और दिन का चैन लुटा हुआ है. अगर यही हाल रहा तो मैं पागल हो जाऊंगा.’’

ज्योति ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज रात जितेंद्र बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘जितेंद्र बाहर जाए या घर में रहे, इस से मुझे क्या मिलेगा?’’ राजेश ने उत्सुकता से पूछा.

ज्योति ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘लगता है, तुम बुद्धू ही हो. इसीलिए मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आई. आज रात में मिलूंगी.’’

राजेश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इतनी आसानी से काम बन जाएगा, उस ने सोचा भी नहीं था. फिर उस रात राजेश ने दोस्त के दांपत्य में सेंध लगा दी. जितेंद्र को पता ही नहीं चला कि दोस्त आस्तीन का सांप बन गया है. पत्नी और दोस्त दोनों ही बेवफा हो गए थे. वह 2 दिनों के लिए बाहर गया था. लौट कर आया तो सब बदल गया था. रात को पलंग पर ज्योति रहती तो उस के पास थी, लेकिन साथ नहीं रहती थी.

कुछ ही दिनों में जितेंद्र को लगने लगा कि उस के घर में कुछ गड़बड़ है. क्योंकि ज्योति उस की उपेक्षा करने लगी थी. लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा था कि इस की वजह क्या है. पर ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी कहां रहती हैं. पत्नी और दोस्त के हावभाव से उसे शक होने लगा. पिछले कुछ दिनों से वह देख रहा था कि राजेश को वह काम से बाहर भेजना चाहता तो वह कोई न कोई बहाना कर के घर में ही रहना चाहता था. लेकिन बिना सबूत के कुछ कहना ठीक नहीं था.

अब तक ज्योति को लगने लगा था कि आखिर उस के और राजेश के इस संबंध का भविष्य क्या है? इस की वजह यह थी कि अब वह राजेश को दिल से चाहने लगी थी और आगे की जिंदगी उसी के साथ बिताना चाहती थी. इसलिए एक दिन उस ने राजेश से पूछ लिया, ‘‘राजेश, हम इस तरह कब तक चोरीछिपे मिलते रहेंगे.’’

‘‘जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दो, इस में बुरा क्या है.’’ राजेश ने कहा.

‘‘अब मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. यह लुकाछिपी मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘लेकिन ज्योति मैं पत्नीबच्चों वाला हूं, उन का क्या होगा?’’

‘‘मैं उन के बारे में क्यों सोचूं? मैं ने पति को दिल से निकाल दिया है, इसलिए अब तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. इस के लिए तुम्हें कुछ तो करना ही होगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कुछ सोचता हूं.’’ राजेश ने कह तो दिया, लेकिन वह जानता था कि पत्नी के रहते वह ज्योति के लिए कुछ नहीं कर सकता. वैसे भी वह ज्योति को ले कर जरा भी गंभीर नहीं था. उस ने तो मौजमस्ती के लिए उस से संबंध बनाए थे.

इस मामले में बात आगे बढ़ती, संयोग से एक दिन जितेंद्र ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. राजेश को तो उस ने खरीखोटी सुना कर भगा दिया, जबकि ज्योति की जम कर पिटाई कर दी. राजेश के जाने के बाद से ज्योति परेशान रहने लगी थी. आखिर एक दिन राजेश का फोन आया तो उस ने अपने दिल की बात उस से कही. तब राजेश ने कहा, ‘‘ज्योति, मुझे भले ही तुम्हारे घर से निकाल दिया गया है, लेकिन मैं तुम्हें दिल से नहीं निकाल पाया हूं.’’

राजेश के लिए परेशानी तब खड़ी हो गई, जब उस की पत्नी विमला को उस के  और ज्योति के संबंधों का पता चल गया. उसे शक तो पहले से ही था, लेकिन जब पति के मोबाइल में उस ने ज्योति का फोटो देखा तो विश्वास हो गया. वह समझ गई कि पति धोखा दे रहा है. उस ने राजेश से साफ कह दिया, ‘‘अगर तुम ने ज्योति से संबंध खत्म नहीं किए तो मैं जान दे दूंगी. उस के बाद तुम जेल की हवा खाते रहना.’’

एक ओर पत्नी थी, दूसरी ओर प्रेमिका. दोनों के बीच फंसा राजेश बेचैन हो उठा. उधर राजेश के जाने के बाद से जितेंद्र को लगता था कि सब ठीक हो चुका है, लेकिन ज्योति तो पहले से ज्यादा उग्र हो उठी थी. राजेश से मिलने के लिए ही उस ने घर में कहा कि वह बीएड करना चाहती है. जितेंद्र ने सोचा कि अगर ज्योति का मन पढ़ाई में लग जाता है तो वह राजेश को भूल जाएगी. इसलिए उस ने बीएड करने के लिए ज्योति का दाखिला शमसाबाद स्थित एनडी कालेज में करा दिया.

बीएड तो एक बहाना था, ज्योति ने राजेश से मिलने और उस पर शादी का दबाव डालने के लिए यह सब किया था. जबकि राजेश ने सिर्फ मजा लेने के लिए उस से संबंध बनाए थे. ज्योति अब उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. एक दिन उस ने फोन कर के कहा, ‘‘राजेश अगर तुम्हें लगता है कि मैं मजाक कर रही हूं तो यह तुम्हारी भूल है. मैं सचमुच तुम से शादी करना चाहती हूं. अगर तुम ने धोखा दिया तो मैं तुम्हें जेल भी भिजवा सकती हूं.’’

ज्योति के तेवर देख कर राजेश डर गया. अब वह सोचने लगा कि ज्योति से कैसे छुटकारा पाए, क्योंकि अब उस की वजह से उस की गृहस्थी बरबाद होने वाली थी. दूसरी ओर उस की वजह से जितेंद्र भी उस की जान का दुश्मन बन सकता था. इसलिए उस ने सोचा कि अगर ज्योति को ठिकाने लगा दिया जाए तो सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इस के बाद उस ने ज्योति को फोन कर के कहा, ‘‘ज्योति, तुम ऐसा करो, फतेहाबाद आ जाओ, यहीं बैठ कर आपस में बात करते हैं कि कैसे क्या किया जाए.’’

20 अक्तूबर, 2016 को कालेज जाने के बहाने ज्योति घर से निकली. दोपहर बाद उस ने जितेंद्र को फोन किया कि बैंक बंद होने की वजह से वह पैसा नहीं निकाल पाई, इसलिए रात में किसी सहेली के पास हौस्टल में रुक जाएगी. कल सुबह घर आ जाएगी. इस के बाद ज्योति का मोबाइल बंद हो गया. अगले दिन वह न घर आई और न फोन पर बात हो सकी तो घर वालों को चिंता हुई. जितेंद्र ने कालेज और हौस्टल जा कर पता किया, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

इस के बाद ज्योति की तलाश शुरू हुई. राजेश से भी पूछा गया, लेकिन उस ने जानने से साफ मना कर दिया. काफी तलाश के बाद भी जब ज्योति का कुछ पता नहीं चला तो इटावा कोतवाली में जितेंद्र ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. जितेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ज्योति कहां चली गई. अब पुलिस वाले भी उस की तलाश में लग गए थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. कभीकभी गुनाह सिर चढ़ कर बोलता है. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ. 6 नवंबर, 2016 को राजेश जितेंद्र के घर पहुंचा और मुंह लटका कर बोला, ‘‘जितेंद्र भाई, भाभी का कुछ पता चला?’’

‘‘नहीं, लेकिन कभी न कभी तो पता चल ही जाएगा.’’

‘‘वह कुछ तो कह कर गई होंगी?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘अब इस का क्या फायदा? जब लौट कर आएंगी, तभी पता चलेगा कि वह कहां गई थीं.’’ जितेंद्र ने कहा.

‘‘देखो जितेंद्र, तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुम से पूरी सहानुभूति है. कुछ गलतियां जरूर मुझ से हुई हैं, पर मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं. मैं यहां तुम को कुछ बताने आया हूं. फोन पर बताता तो तुम पता नहीं क्या सोचते. ज्योति भाभी को फतेहाबाद में देखा गया है, पर यकीन मानो वह मेरे पास नहीं आई थीं. तुम्हें तो पता ही है कि आजकल मैं चौकीदारी की नौकरी कर रहा हूं. छुट्टी मुश्किल से मिलती है, वरना मैं तुम्हारी मदद जरूर करता.’’

राजेश की बातों से जितेंद्र को उस पर शक हुआ. उस ने तुरंत कोतवाली पुलिस को फोन कर के बुला लिया. पुलिस राजेश को हिरासत में ले कर कोतवाली ले आई और जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने ज्योति की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद कोतवाली पुलिस राजेश को ले कर फतेहाबाद पहुंची और सीओ ए.के. सिंह से मिली. उन की उपस्थिति में राजेश की निशानदेही पर वह जहां चौकीदारी करता था, वहां खुदाई कराई गई तो ज्योति की सड़ीगली लाश बरामद हो गई. पत्नी की लाश देख कर जितेंद्र फूटफूट कर रोने लगा.

थाना फतेहाबाद में अपराध संख्या 334/15 पर राजेश के खिलाफ ज्योति की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया गया. इस के बाद उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस तरह ज्योति की महत्वाकांक्षा उसे तो ले डूबी ही, 2 घर भी बरबाद हो गए. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Crime: बदचलन बहू

Family Crime: न जाने कितनों को हवालात की हवा खिलाने वाले मोहन सक्सेना बहू की बदचलनी से इस कद्र आजिज आ गए कि यह जानते हुए भी कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, उन्होंने कानून हाथ में ले ही लिया. नतीजतन अब वह बेटे के साथ जेल में है.

मध्य प्रदेश पुलिस में असिस्टैंट सबइंसपेक्टर मोहन सक्सेना के दिन का चैन और रातों की नींद गायब थी. सोतेजागते, उठतेबैठते उन्हें एक ही शख्स नजर आता था, वह था उन का पुराना ड्राइवर अंकित चौरसिया. अंकित बिना किसी डर और लिहाज के उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा था. गुस्से, खीझ और बेबसी में मोहन सक्सेना दांत पीस कर रह जाते थे. उन्हें कभीकभी इस बात का डर सताने लगता कि कहीं उन्हें इस तनाव में फिर से लकवा न मार जाए या  हार्टअटैक न आ जाए.

59 वर्षीय मोहन सक्सेना की तैनाती शाजापुर की पुलिस लाइन में थी. वह अगले ही साल रिटायर होने वाले थे. एक उम्र पुलिस की नौकरी करने वाले मोहन सक्सेना की जिंदगी में कई तरह के उतारचढ़ाव आए. लेकिन जिंदगी की ढलती शाम में वह जो कुछ देख रहे थे, वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था. इस की वजह थी उन की बहू नेहा. शाजापुर में उन का अपना अलग रुतबा था, जिस की वजह वरदी या पुलिस की नौकरी ही नहीं, बल्कि एक इज्जतदार कायस्थ परिवार का मुखिया होना भी था. बहू द्वारा किए जा रहे कृत्य से उन्हें अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती नजर आ रही थी. लेकिन वह करें क्या उन की समझ में नहीं आ रहा था.

क्योंकि लाख समझानेबुझाने और चेतावनी देने पर भी न नेहा मान रही थी और न ही अंकित रास्ते पर आ रहा था. उन के सुनने में तो यहां तक आया कि अंकित ने अपने मोबाइल फोन में नेहा के साथ बिताए अंतरंग दृश्यों की कुछ फोटो तक खींच रखी हैं जिन्हें वह अपने दोस्तों को दिखाता रहता है. ऐसी बेबसी में अकसर वह उस घड़ी को कोसते थे, जब उन्होंने अंकित को शरीफ मानते हुए अपने यहां ड्राईवरी की नौकरी पर रखा था. दरअसल मोहन सक्सेना का बेटा नितिन दिमागी तौर पर कुछ कमजोर है. यह बात सारा शाजापुर जानता था.

अपने रिटायर होने से पहले उन्होंने उस की शादी अपने बराबर वाले घर में कर दी थी. बेटा कुछ करता है, यह दिखाने के लिए उन्होंने एक कार खरीद ली थी, जो बतौर टैक्सी चलती थी. अंकित को यही गाड़ी चलाने के लिए रखा गया था. शुरूशुरू में तो सबकुछ ठीकठाक चला. सवारियां मिल जातीं तो अंकित गाड़ी ले कर चला जाता और न मिलती तो शहर में इधरउधर घूम कर वक्त काटता. उधर नितिन को अपने लिए जमाए जा रहे इस ट्रैवलिंग के कारोबार से कोई खास लेनादेना नहीं था. इतना ही नहीं, उस की दिलचस्पी तो अपनी पत्नी में भी नहीं थी, जो खासी खूबसूरत, आकर्षक और चंचल थी. उस की पति से बिलकुल पटरी नहीं बैठती थी.

अंकित ने इसी बात का फायदा उठाया. वह नेहा को चाहने लगा और उस से करीबी संबंध बनाने की जुगत में लग गया. अपने बातूनी स्वभाव से उस ने उसे प्रभावित करना शुरू कर दिया. बातों का दायरा बढ़तेबढ़ते प्यार के मुकाम तक पहुंच गया और फिर एक दिन ऐसा भी आ गया, जब दोनों के संबंध बन गए. इस के बाद सिलसिला बन गया. दोनों ने ही बूढ़े मोहन सक्सेना का किसी भी स्तर पर कोई लिहाज नहीं किया.

पिछले साल एकाएक मोहन सक्सेना को लकवा मार गया तो अंकित को उन के घर आनेजाने के ज्यादा मौके मिल गए. सक्सेना परिवार के सारे काम वह वक्त पर ईमानदारी से कर देता था. लेकिन नेहा के आकर्षण से खुद को नहीं बचा सका. नेहा भी खूबसूरत और मजाकिया स्वभाव के अंकित के प्रेमजाल में फंसने से खुद को नहीं रोक पाई थी. उस के संस्कार इस कथित प्यार या व्यभिचार के आगे ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाए.

लकवाग्रस्त मोहन सक्सेना का लंबा इलाज चला तो उस बुरे वक्त में कई मामलों में नितिन की भूमिका अंकित निभा रहा था, इसलिए मोहन उस के एहसान तले दबते जा रहे थे. इलाज के अलावा वह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का भी सहारा ले रहे थे. यानी वह हर हालत में ठीक हो जाना चाहते थे. और इस सब से जल्द ही वह ठीक भी हो गए.

शाजापुर एक छोटा सा कस्बा है, इसलिए मोहन सक्सेना की बहू के प्रेमसंबंधों की चर्चा लोग चटकारे लेले कर करने लगे. यह बात जब मोहन सक्सेना के कानों में पड़ी तो वह बौखला उठे. एक बार तो उन्हें कान सुनी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि नेहा शरीफ घर की थी. उस के मांबाप ने उसे बेहतर संस्कार दिए थे. रही बात अंकित की तो कल के इस छोकरे की क्या मजाल जो उन की बहू की तरफ आंख उठा कर भी देखे. लेकिन पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने कई संस्कारवान बहूबेटियों का त्रियाचरित्र देखा था और अंकित जैसे रंगीले मजनूं भी देखे थे.

लिहाजा दिमाग में आया शक दूर करने के लिए उन्होंने खुद चोरीछिपे दोनों की निगरानी शुरू कर दी. नितिन से तो उन्हें कोई उम्मीद करना बेकार लग रहा था. दिमागी कमजोरी के चलते वह गुस्से और जल्दबाजी में बगैर सोचेसमझे कोई ऐसा कदम उठा सकता था, जो काफी महंगा पड़ता. इसलिए उन्होंने इस बारे में नितिन को कुछ नहीं बताया. आखिर एक दिन उन्होंने खुद अपनी आंखों से अंकित और बहू नेहा को अपने ही घर में आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया तो मारे गुस्से के उन का शरीर जल उठा. उन्हें विश्वास हो गया कि बाहर उन के बहू और अंकित के बारे में जो बातें की जा रही हैं, निराधार नहीं थीं. उन का मन कर रहा था कि वह अंकित को ऐसी सजा दें कि कोई भी उन के घर की तरफ नजर उठाने की हिम्मत न करे.

लेकिन वह कानून को अपने हाथ में लेना नहीं चाहते थे और अदालत या बाहर की दुनिया तक खुद बात ले जाएं तो जगहंसाई के साथ उन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली बात होती. किसी तरह जहरीला घूंट पी कर वह चुप रहे. लेकिन अगले दिन उन्होंने दोनों को खूब लताड़ा. अंकित को उन्होंने नौकरी से हटा दिया, साथ ही नेहा को भी सख्त लहजे में समझा दिया कि आइंदा वह उस लड़के से मिलेगी तो अच्छा नहीं होगा.

ससुर के गुस्से को देख कर नेहा उस समय सहम जरूर गई थी, लेकिन अंकित की यादों को वह दिल से निकाल नहीं पाई. वह ससुर से नजरें बचा कर उस से घर से बाहर मिलने लगी. यानी आशिक का लगाव ससुर की वरदी पर भारी पड़ा. आशिक से बाहर मिलने की बात भी मोहन सक्सेना से ज्यादा दिनों तक छिप नहीं सकी. वह परेशान थे कि बहू का क्या करें, जो यह उस लड़के का पीछा छोड़ दे. उसी समय अचानक मोहन सक्सेना के दिमाग में तांत्रिक बाबा उर्फ संजय व्यास का खयाल आया. उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी. वह खुद भी मानते थे कि उन का लकवा तांत्रिक बाबा ने ही ठीक किया था.

कुछ साल पहले तक संजय व्यास शाजापुर के ही एक सरकारी बैंक में चपरासी था. बाद में वह नौकरी छोड़ कर कस्बे में छोटे किले के पास स्थित बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर तंत्रक्रियाओं द्वारा लोगों का इलाज करने लगा था. इस तरह तथाकथित तांत्रिक बन कर वह लोगों की जेबें ढीली करने लगा था. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी थी. देखते ही देखते वह शहर में इतना मशहूर हो गया कि हर गुरुवार को उस के पास हैरानपरेशान लोगों की भीड़ लगने लगी थी. संजय का यह कारोबार चल निकला तो उस ने हुलिया भी बदल लिया. वह हरे रंग के कपड़े पहनने लगा. उस के गले में तरहतरह की मालाएं और अंगुलियों में हरे, काले, लाल आदि रंगों वाले  नगों की अंगूठियां चमकने लगीं.

अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए मोहन उस तथाकथित तांत्रिक उस की शरण में आने लगे. उन्होंने बहू के देहरी लांघने वाली बात तांत्रिक को बता कर कहा कि किसी भी तरह वह कुछ ऐसा कर दें कि बहू का प्रेमी अंकित की तरफ से मन उचट जाए. तांत्रिक संजय ने उन्हें भरोसा दिया कि वह अपनी सिद्धियों के बल पर ऐसा कर देगा कि नेहा उस लड़के का नाम तक नहीं लेगी. इस काम के लिए उस ने मोहन सक्सेना से मोटी रकम भी ली.

इसी तांत्रिक के पास अंकित भी पहुंच गया. अंकित ने उस से कहा कि उस की प्रेमिका नेहा अब उस से दूरियां बना रही है. वह ऐसा कुछ कर दे कि वह पति को छोड़ कर उस के पास आ जाए. बातचीत से तांत्रिक को पता लग गया कि इस का चक्कर मोहन सक्सेना की बहू से चल रहा है. वह उस के पास इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए आए थे. तांत्रिक के लिए मोहन सक्सेना या अंकित में से कोई भी उस का सगा नहीं था. उस का मकसद तो दोनों से पैसे कमाना था. इसलिए उस ने अंकित से भी मोटे पैसे ले लिए. इस तरह तांत्रिक संजय दोनों से ही पैसे ऐंठता रहा.

बाद में मोहन को पता चला कि अंकित भी संजय बाबा के पास आता है तो उन का माथा ठनका. वह भागेभागे संजय बाबा के पास पहुंचे. उन्होंने पैसों का लालच दे कर बाबा से अंकित के बारे में पूछा तो उस ने मनुहार के बाद बता दिया कि अंकित नेहा को अपने वश में करवाने के लिए आता है. मोहन सक्सेना अब अंकित से तुरंत छुटकारा पाना चाहते थे. इस बारे में उन्होंने तांत्रिक संजय से बात की. बातचीत के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब तंत्रमंत्र से तो बात संभलने वाली नहीं, लिहाजा अंकित की हत्या कर दी जाए.

वैसे कई बार यह बात मोहन सक्सेना के मन में आई थी, लेकिन अपने पुलिसिया तजुर्बे से वह जानते थे कि किसी का कत्ल कर कानून से बच पाना आसान काम नहीं होता. इसलिए वह यह अपराध नहीं करना चाहते थे. पर अब उन्हें तांत्रिक संजय का साथ मिल रहा था, इसलिए वह तैयार हो गए. तांत्रिक संजय व्यास अंकित की हत्या के लिए तैयार हो गया. इस के लिए उस ने मोहन सक्सेना से 15 हजार रुपए की मांग की तो उन्होंने झट से पैसे दे दिए. क्योंकि जिस काम के लिए वह अपनी अब तक की सारी कमाई खर्च करने को तैयार थे, वह काम काफी सस्ते में हो रहा था.

दूसरी ओर अंकित को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि संजय और मोहन के बीच क्या खिचड़ी पक चुकी है. वह तो यह सोच कर खुश हो रहा था कि तांत्रिक की वशीकरण क्रिया के बाद नेहा हमेशा के लिए उस के पास चली आएगी. इसलिए तांत्रिक उस से जोजो काम करने के लिए कहता था, वह वैसा ही कर रहा था. एक दिन संजय बाबा ने उस से कहा कि एक विशेष तांत्रिक क्रिया करनी जरूरी है, जो शाजापुर में नहीं, बल्कि दूसरी किसी जगह पर करनी होगी. अंकित तुरंत तैयार हो गया. उसे लगा कि इस क्रिया के बाद नेहा उस के साथ भागने को तैयार हो जाएगी. फिर दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे.

संजय ने उसे बताया था कि यह काम 16 जनवरी शनिवार को करना ठीक रहेगा. अंकित तैयार हो गया. उस ने संजय को बताया कि वह ठीक वक्त पर गाड़ी ले कर आ जाएगा. इस के बाद पूजा के लिए चले चलेंगे. अंकित उस समय शाजापुर की ही एक संभ्रांत महिला निर्मला गौर के यहां ड्राइवर की नौकरी कर रहा था. उस दिन उस ने निर्मला से यह कह कर उन की कार मांग ली कि वह कुछ दोस्तों के साथ उज्जैन जाना चाहता है. निर्मला को इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. उन्होंने कार की चाबियां अंकित को दे दीं.

16 जनवरी की सुबह अंकित तांत्रिक बाबा के पास पहुंच गया. तांत्रिक उसे बैरसिया होते हुए विदिशा रोड पर स्थित भोजापुरा के जंगल में ले गया. यह जंगल आमतौर पर सुनसान रहता है. इस जंगल में हत्या करने की सलाह दरअसल में मोहन सक्सेना ने ही दी थी, ताकि इतनी दूर लाश मिलने पर उस की शिनाख्त न हो सके. जंगल में एक जगह पर बैठ कर संजय व्यास अंकित से पूजा करवाने लगा. कुछ देर बाद तांत्रिक संजय ने कहा, ‘‘इस सिद्धि के लिए तुम्हें अपने सारे कपड़े उतारने पड़ेंगे.’’

पहले तो अंकित तांत्रिक की इस बात पर चौंका, पर यह क्रिया प्रेमिका को पाने के लिए की जा रही थी, इसलिए वह तैयार हो गया. पूजा वाली जगह से कुछ दूरी पर मोहन सक्सेना अपने बेटे नितिन के साथ छिपे बैठे थे. अंकित जब पूरी तरह पूजा में डूब गया तो तांत्रिक संजय का इशारा पा कर दोनों आहिस्ते से अंकित के पीछे आ गए. मोहन ने मौके का फायदा उठाते हुए लोहे की रौड का एक भरपूर वार उस के सिर पर कर दिया, इस के बाद नितिन और तांत्रिक भी उस पर टूट पड़े. तीनों को जब उस के मरने की तसल्ली हो गई तो योजना के मुताबिक उन्होंने एक बड़े पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया, जिस से लाश की पहचान न हो पाए.

अंकित की हत्या करने के बाद तांत्रिक संजय और नितिन बैरसिया होते हुए वापस आए तो मोहन पहले इंदौर गए, फिर शाजापुर आए. इस दौरान तीनों ने अपने मोबाइल बंद रखे. क्योंकि मोहन सक्सेना जानते थे कि जांचपड़ताल में मोबाइल की लोकेशन पता चल जाती है. इसलिए उन्होंने यह अहतियात बरती थी. 17 जनवरी, 2016 की सुबह गांव वाले जंगल की तरफ गए तो उन्होंने वहां लाश देखी. इस की खबर उन्होंने बैरसिया थाने को दी तो एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर पुलिस टीम घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. मौके पर जितने लोग खड़े थे, पुलिस ने उन से उस निर्वस्त्र लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर चेहरा कुचला हुआ होने की वजह से कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. वहां कोई ऐसा सामान भी नहीं मिला, जिस से लाश की शिनाख्त हो सकती.

पुलिस को लाश से कुछ दूरी एक आई-20 कार लावारिस हालत में खड़ी मिली. पर उस की नंबर प्लेट्स गायब थीं. कार खोल कर तलाशी ली गई तो उस के दस्तावेज मिल गए. कागजों से पता चला कि वह कार शाजापुर की निर्मला गौर नाम की महिला के नाम है. कार की नंबर प्लेट गायब होने पर पुलिस को शक हुआ कि हो न हो, कार का इस हत्या के मामले से जरूर कोई संबंध है.

पुलिस जब शाजापुर में निर्मला गौर के पास पहुंची तो उन्होंने बता दिया कि कार उन का ड्राइवर अंकित ले गया था. उन्होंने ड्राइवर अंकित का हुलिया पुलिस को बताया तो कदकाठी से वह लाश के हुलिए जैसा ही था. उन्होंने पुलिस को अंकित का पता बताया तो पुलिस अंकित के घर पहुंच गई और लाश की शिनाख्त के लिए उस के घर वालों को पोस्टमार्टम स्थल पर ले गई. घर वालों ने लाश की शिनाख्त अंकित के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस हत्यारों का पता लगाने में जुट गई. जांच में पुलिस को मृतक जानकारी मिली. उन के ही महकमे के एएसआई मोहन सक्सेना के यहां नौकरी करता था और उस का उन की बहू नेहा के साथ चक्कर चल रहा था. पुलिस को मुखबिर से यह भी जानकारी मिली थी कि 16 जनवरी, 2016 की रात तांत्रिक बाबा संजय व्यास को कार में अंकित के साथ देखा गया था.

तांत्रिक संजय को पुलिस ने थाने बुलवा लिया. उस से अंकित के बारे में पूछताछ की गई तो वह किसी तरह की जानकारी होने से इंकार करता रहा. पर जैसे ही उसे यह बताया गया कि पिछली रात उस के मोबाइल की लोकेशन बैरसिया के आसपास थी तो वह घबरा गया. इस के बाद उस ने अंकित की हत्या की सच्चाई बता दी. तांत्रिक के बयान पर पुलिस ने मोहन और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंकित नेहा से शादी करने की हसरत दिल में लिए दुनिया से चला गया और नेहा अब मायके में है. शाजापुर में किसी को उस से सहानुभूति नहीं है, उलटे लोग उसे ही इस कांड की वजह मान रहे हैं. अपनी सेवा अवधि में कइयों को हवालात पहुंचा चुके मोहन सक्सेना अब खुद अपने बेटे नितिन के साथ जेल की हवा खा रहे हैं, साथ में तथाकथित तांत्रिक संजय व्यास भी है, जिस की कलई खुलने पर लोग उसे भी कोस रहे हैं. Family Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, नेहा परिवर्तित नाम है)

 

True Crime Story: बौंबशैल बौंडिट संदीप कौर

True Crime Story: भारतीय मूल की संदीप कौर अपनी अलग सोच और चाहत के चलते शराब पीने के साथसाथ मोटी रकम के लिए कैसीनो में जुआ भी खेलने लगी थी. इसी लत ने उसे लुटेरी बना दिया और वह अकेली ही नायाब तरीके से बैंकों में डकैती डालने लगी. लेकिन एक दिन वह पकड़ी गई और उसे…

6 जून, 2014 की बात है. 24-25 साल की संदीप कौर ने अपने आई पैड पर एक बैंक की लोकेशन देख कर उसे लूटने की योजना बनाई. कैलिफोर्निया की सांटा क्लैरिटा वैली में बैठी संदीप कौर लूट की योजना बना कर उस के अच्छेबुरे हर पहलू पर विचार कर रही थी. यह जगह लौस एंजिलस से उत्तरपश्चिम की तरफ 38 किलोमीटर की दूरी पर है. वैसे डकैती के पेशे में आने से पहले उस ने इस बारे में काफी अध्ययन किया था. उसी से उसे पता चला था कि उस इलाके के बैंकों में पहले से डकैतियां हुई थीं. उन के अपराधी पकड़े नहीं गए थे. लेकिन वह यह सच्चाई भी अच्छी तरह जान गई थी कि कुछ बैंक लुटेरे भागते समय पुलिस की गोली से मारे भी गए थे.

पहली बात ने संदीप को उत्साहित जरूर किया था, लेकिन दूसरी बात उसे बुरी तरह भयभीत कर गई थी. कुछ देर के लिए उसे घबराहट हुई. डकैती के अलावा उस के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं था. इसलिए उस ने किसी तरह अपनी घबराहट से पीछा छुड़ा लिया. खुद को संभालते हुए उस ने केवल डकैती के तरीकों पर विचार किया. वह एक नर्स थी, लेकिन वह उस रूप में बैंक लूटना चाहती थी, जिस से कोई भी उसे पहचान न सके.

उस ने वहीं एकांत में बैठ कर अपने सिर पर एक आकर्षक विग फिट कर के अपना हुलिया बदला. आंखों पर उस ने निहायत खूबसूरत चश्मा लगा लिया. अपनी वेशभूषा भी उस ने बदल ली. अब उस का हुलिया पूरी तरह बदल गया था. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह नर्स है. बैंक से पैसा लूटने जा रही 5 फुट 3 इंच की इस लड़की के पास कोई हथियार नहीं था. जैसे ही वह बैंक के नजदीक पहुंची, उस ने अपनी जैकेट की जिप पौकेट से कागज का टुकड़ा निकाल कर उस पर जल्दी से कुछ लिखा. फिर उसे तह कर के अपनी जेब में रख लिया.

इस के बाद वह बैंक के मुख्य गेट से सीधी चीफ कैशियर के पास पहुंची. उस वक्त वहां कोई ग्राहक वगैरह नहीं था. उस ने अपनी जेब से कागज का वही टुकड़ा निकाल कर कैशियर की ओर फेंकते हुए सधे शब्दों में पूरी नाटकीयता से कहा, ‘‘मैडम, मैं एक बड़े क्रिमिनल गैंग की मैंबर हूं. हम लोग पूरा बैंक लूटते हैं. लेकिन फिलहाल मुझे केवल एक हजार डौलर की जरूरत है. चुपचाप मुझे यह रकम दे दो वरना मैं इस बैंक को बम से उड़ा दूंगी. मेरी इस ड्रैस पर बम का कोई असर नहीं होगा, जबकि तुम मारी जाओगी.’’

कैशियर एक प्रौढ़ महिला थी. उस ने कागज की तह खोल कर उसे पढ़ा. उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘टिकटौक, आई हैव ए बौंब.’

महिला कैशियर डर गई. उस ने उस कागज को इधरउधर छिपाने की कोशिश करते हुए देखा. आसपास के बैंककर्मी अपने कामों में व्यस्त थे. किसी ग्राहक का ध्यान भी उस तरफ नहीं था. तभी कैशियर ने एक लिफाफा उठाया, सावधानी से उस में डौलर भरे और लिफाफा संदीप कौर के हवाले करते हुए धीमे से कहा, ‘‘किसी का कोई नुकसान करने की जरूरत नहीं है, रहमदिली सीखो. मैं ने अपनी नौकरी खतरे में डाल कर भी तुम्हारी जरूरत पूरी कर दी है. अब तुम कैशकैबिन की बगल से होती हुई पिछले दरवाजे से बाहर निकल जाओ.’’

संदीप कौर बड़े इत्मीनान से बैंक से बाहर निकली और अपनी गाड़ी में बैठते ही गटगट कर के बोतल का पूरा पानी पी गई. इस के बाद उस ने चैन की सांस ली और वहां से चली गई. संदीप कौर कोई विदेशी नहीं, बल्कि मूलरूप से भारत की ही रहने वाली थी. उस का जन्म 11 नवंबर, 1989 को चंडीगढ़ में हुआ था. परिवार में मातापिता के अलावा एक छोटा भाई था जितेंद्र. जितेंद्र के जन्म के कुछ अरसा बाद ही यह परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया था. फिर यह परिवार भारत को अलविदा कह कर अमेरिका चला गया था. इन लोगों की योजना वहीं बसने की थी. सैन जौस इलाके में भारतीयों की भरमार है. इन लोगों ने भी वहीं अपने रहने का ठिकाना बना लिया.

वहां के तमाम लोग एकदम अपनों जैसे लगते थे, लेकिन संदीप कौर चाह कर भी इस वातावरण में एडजस्ट नहीं कर पा रही थी. उसे सब पराया सा लगता था. अकसर वह खुद को अजनबी महसूसकरती थी. 9/11 के अटैक्स के बाद जैसे अनेक लोग उन्हें शक की निगाह से देखने लगे थे. जिस स्कूल में संदीप कौर और उस के भाई का दाखिला करवाया गया था, वहां के अंग्रेज विद्यार्थी अकसर उन्हें आतंकवादियों के बच्चे कह कर चिढ़ाते थे. इस सब से तंग आ कर संदीप कौर और जितेंद्र अकसर बीच में ही स्कूल छोड़ कर घर आ जाया करते. स्कूल प्रबंधन ने इसे गंभीरता से लेते हुए सजा के तौर पर इन्हें इस स्कूल से सस्पैंड कर के ईस्टर्न हिमालयाज के बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया.

इतना ही नहीं, जब भी छुट्टियों में वे घर आते उन के लिए मोबाइल फोन व टेलीविजन के इस्तेमाल पर मनाही लगा दी जाती. उन्हें अपने किसी दोस्त वगैरह से भी नहीं मिलने दिया जाता. जरा सी गलती कर दिए जाने पर उन्हें कुरसी उठा कर घंटों तक खड़े रहने की सजा दे दी जाती. एक दफा संदीप की मां काफी बीमार हो गईं. उन दिनों संदीप 14 साल की थी. इलाज के लिए वह अपनी मां को अस्पताल ले जाती थी. वहीं पर उस की एक नर्सिंग मैनेजर से अच्छी दोस्ती हो गई. उन्होंने संदीप को नर्स का कोर्स करने की सलाह दी. तैयारी के लिए उन्होंने संदीप को अपने पास से कई पुस्तकें भी दीं.

विपरीत हालातों में भी संदीप ने मेहनत से पढ़ाई की. पढ़ाई में वह बहुत होशियार थी. इसलिए 15 साल की उम्र में कालेज में दाखिला लेने वाली वह इस क्षेत्र की पहली लड़की थी. 19 साल की उम्र में वह नर्स बन गई. इस के बाद उस की एक निजी मैडिकल संस्थान में 6 हजार यूएस डौलर प्रति महीने की नौकरी लग गई. संदीप की देखभाल से मां पूरी तरह स्वस्थ हो गईं. इस बीच संदीप से उन की अपेक्षाएं भी बहुत बढ़ गईं. वह उस से अकसर यही कहतीं, ‘‘बेटी, तुम इतनी होशियार और मेहनती हो कि खूब पैसा कमा कर अमीर बन सकती हो. अपना खुद का घर खरीद कर अपने परिवार वालों को बेहतर जिंदगी दे सकती हो. तुम जैसी समझदार, होनहार लड़की के लिए यह जरा भी मुश्किल नहीं है.’’

यह सारे सपने मात्र 6 हजार डौलर महीने की नौकरी में पूरे हो नहीं सकते थे. इस के अलावा संदीप कौर अपनी कमाई का कुछ हिस्सा बीमा कंपनियों में निवेश करने लगी. आमदनी बढ़ाने के लिए वह ओवर टाइम करने लगी. जीतोड़ मेहनत कर के उस ने अपनी महीने की कमाई 20 हजार डौलर प्रतिमाह कर ली. इसी दौरान संदीप की कई हमउम्र अमेरिकन लड़कियों से दोस्ती हो गई. इन के संग वह पार्टियों व क्लबों में जाने लगी. जबकि उस की मां हमेशा ही इन बातों के खिलाफ थीं. मां की आंखों में धूल झोंकने को संदीप कौर अपनी नर्सिंग ड्रैस के नीचे क्लब कौस्ट्यूम पहन लिया करती. इस तरह वह एक तरह से दोहरी जिंदगी जीने लगी. अब उस पर मां की लगाई पहले जैसी पाबंदियां लागू नहीं हो पा रही थीं. इसलिए घर में काफी कलह होने लगी थी.

परेशान हो कर संदीप कौर 20 साल की उम्र में अपना घर छोड़ कर साक्रामैंटो चली गई, जहां उस ने अन्य कामों के साथ ‘बैचलर औफ साइंस इन नर्सिंग’ की पढ़ाई भी शुरू कर दी. काम का जुनून ऐसा था कि स्थानीय काऊंटी जेल में वह बीमार कैदियों की देखभाल करने, उन का रक्तचाप चैक करने और दवाएं बांटने भी जाती थी. एक जवान लड़की का ऐसा सेवाभाव देख कर कैदी और जेल के कर्मचारी उस से बहुत प्रभावित थे.

नवंबर, 2010 में 21 साल की उम्र में संदीप की जिंदगी में जैसे आमूलचूल परिवर्तन आया. अमेरिका में शराब पीने की यह लाइसैंसशुदा उम्र होती है. भारत की तरह पीनेपिलाने वाले सिलसिले को वहां बुरा भी नहीं माना जाता. लिहाजा अपने दोस्तों की संगत में क्लब जा कर संदीप कौर भी शराब पीने लगी. इतना ही नहीं, चमकदमक वाली यह दुनिया उसे काफी पसंद आने लगी. अब तक परिवार वाले उसे जिन बातों के लिए मना करते थे, वह वही खुल कर करने लगी. क्योंकि अब उस पर किसी का कोई अंकुश नहीं था, वह पूरी तरह आजाद हो चुकी थी.

एक दफा संदीप ने एक कैसिनो में जुआ खेला. पहले ही गेम में वह 4 हजार डौलर जीत गई. एक झटके में मोटी रकम जीत कर वह खुश हुई. इस के बाद वह लगातार जीतती गई. अब उसे अपनी नौकरी की कमाई कम लगने लगी. उसे लगने लगा कि वह तो पैदा ही इसी काम के लिए हुई है. वह रोजाना जुआ खेलने लगी. हारना जैसे उस के फितरत में नहीं था. वह लगातार जीतती गई. देखतेदेखते उस के पास इतना पैसा आ गया, जिस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

लेकिन एक बार हवा का रुख उस के खिलाफ हो गया. इस का नतीजा यह हुआ कि वह लगातार जुए में हारने लगी. जिस गति से उस के पास पैसा आया था, उस से कहीं ज्यादा रफ्तार से वह पैसा उस का साथ छोड़ गया. जुआ और तनाव की वजह से संदीप कौर ने न केवल अपनी नर्स की नौकरी छोड़ी, बल्कि नर्सिंग से जुड़ी आगे की पढ़ाई भी त्याग दी. इस के बावजूद उसे इस बात का आत्मविश्वास था कि अगर वह एक बाजी खेले तो उस का हारा हुआ सारा पैसा वापस आ सकता है. वह जीतने के लिए और जुआ खेलना चाहती थी. मगर इस के लिए भी पैसा चाहिए था, जो अब उस के पास नहीं था.

उस ने कोई बहाना कर के अपनी एक कजिन से कुछ पैसे उधार लिए. इन पैसों से उस ने कैसिनों में बाजी खेली. लेकिन किस्मत इस दफा भी दगा दे गई. उधार ली हुई यह रकम भी वह एक ही झटके में हार गई. अवसाद की स्थिति से निजात पाने के लिए उस ने आत्महत्या करने का मन बना लिया. एक दिन वह परेशान सी हालत में बैठी थी, तभी एक अजनबी ने उस के पास आ कर उस के सिर पर हाथ रखते हुए आत्मीयता से कहा, ‘‘घबराओ नहीं बेबी, तुम हारने के लिए नहीं जीतने के लिए पैदा हुई हो. और हां, निराश कभी मत होना.’’

संदीप कौर ने उस आदमी को आश्चर्य से देखते हुए पूछा, ‘‘आप कौन हैं और मुझे कैसे जानते हैं?’’

‘‘बस, यही समझ लो कि मैं तुम्हारा बहुत बड़ा शुभचिंतक हूं. मैं तुम्हें तब से देखता आ रहा हूं, जब तुम पहली बार यहां आई थीं और पहली दफा के दावों से यहां सभी को हैरत में डाल दिया था. लेकिन अब तुम अपने अति आत्मविश्वास का शिकार हो कर खुद को बरबाद कर बैठी हो. वरना तुम हारने वालों में से नहीं हो. मैं तो अब भी यही कह रहा हूं कि हार शब्द को तुम अपनी डिक्शनरी से निकाल फेंको. मत भूलो कि तुम जीत की पर्याय हो.’’

संदीप कौर को इन बातों से बल मिला. उस के दिमाग में वही चित्र घूमने लगे जब वह लगातार बाजियां जीती थी. अब वह अवसाद से बाहर आ कर बाजी लगाने को तैयार हो गई. लेकिन उस के पास उस समय पैसे नहीं थे. पर जिस व्यक्ति ने उस की हिम्मत बंधाई थी, वही उसे पैसे देने के लिए तैयार हो गया. उस व्यक्ति ने पहले ही कह दिया था कि उसे न तो इन पैसों पर कोई ब्याज चाहिए और न ही दूसरा कोई लाभ. उस ने बस इतनी सी शर्त रखी कि बाजी लगाने को वह उसे जो भी पैसा देगा, उसे उसी रोज वापस चाहिए.

‘‘वह तो सर, मैं 15 मिनट में वापस कर दूंगी.’’ संदीप ने फिर से अति आत्मविश्वास का सहारा लिया. वह बोली, ‘‘आप मेरी जिंदगी में एक फरिश्ते की तरह आए हैं तो आप की मूल रकम के अलावा अलग से भी अच्छी खासी रकम आप को दूंगी. बस मुझे जी भर खेलने दीजिएगा.’’

‘‘ओके.’’ कहते हुए उस व्यक्ति ने उस के आगे नोटों के बंडल रख दिए.

‘‘फिलहाल मुझे इतने ही चाहिए,’’ कह कर संदीप कौर ने 20 हजार डौलर उठा लिए.

उस ने बाजी लगाई, पर वह हार गई. जिस व्यक्ति ने उसे पैसे दिए थे, वह उस के पास ही खड़ा था. संदीप ने उस की ओर देखते हुए इशारा किया तो उस ने उसे 45 हजार डौलर और दे दिए. इस के बाद संदीप लगातार 16 घंटों तक एक ही जगह बैठ कर जुआ खेलती रही. कई दफा वह हारी, कई दफा जीती भी. जुए में वह इतनी तल्लीन थी कि उस ने कुछ खाया तक नहीं, बस 2-4 बार पानी जरूर पी लिया था. रकम उसे उसी व्यक्ति से लगातार मिलती रही, जो बढ़तेबढ़ते काफी बड़ी रकम बन गई और जुए की अंतिम बाजी में संदीप पूरा पैसा हार गई.

जिस शख्स से उस ने मोटी रकम उधार ली थी, उस रकम को हासिल करने के लिए वह उस के साथ कैसा व्यवहार करेगा, उस की बुरी परिकल्पनाएं उस के मनमस्तिष्क पर हावी होने लगी थीं. उस ने देखा कि इस दौरान उस शख्स ने अपने कई साथियों को भी फोन कर के वहां बुला लिया था. कुछ देर पहले तक जिस शख्स को वह फरिश्ता समझ रही थी, वही व्यक्ति संदीप को राक्षस लगने लगा था. संदीप को फिलहाल बचने की यही तरकीब सूझी कि वह वाशरूम जाने का बहाना कर के वहां से भाग ले. इस में उसे सफलता मिली और वह सुरक्षित अपनी मां के पास जा पहुंची, जो यूनियन सिटी जाने की तैयारी में थीं. संदीप भी उन के साथ इस नए पते पर जा कर रहने लगी. यह मई, 2012 की बात है.

उसे मालूम था कि अगर उस के जुआ खेलने की जानकारी उस की मां को लग गई तो वह बदनामी के डर से आत्महत्या कर सकती हैं. इसलिए संदीप ने कसम खा ली कि आइंदा वह कभी जुआ नहीं खेलेगी. उस ने फिर से नर्स की नौकरी कर ली. अब वह पहले से ज्यादा यानी सप्ताह में 96 घंटे काम कर के अतिरिक्त पैसा कमाने लगी. संदीप कौर ने तो सोचा था कि इस नए पते की किसी को जानकारी नहीं है, पर न जाने कैसे 11 दिसंबर, 2012 को इस नए पते पर भी उस के नाम गिरफ्तारी वारंट आ गया. वारंट के अनुसार, वह कैसिनो की पेमेंट किए बिना वहां से भाग गई थी.

लाख छिपाने की कोशिश करने के बाद भी उस की गलत हरकतों की जानकारी उस की मां को पता लग ही गई. मां ने उसे खूब लताड़ा. उन्होंने उसे सलाह दी कि चाहे जैसे भी हो, वह अपना सब कर्ज उतारने की कोशिश करे. मेहनत तो संदीप पहले ही कर रही थी. उस ने और ज्यादा मेहनत की. कैसिनो वालों से थोड़ी मोहलत ले कर किसी तरह उन का कर्जा निपटा कर एक मुसीबत से छुटकारा पा लिया. दूसरा कर्जा उस शख्स का उस के ऊपर रह गया था, जिस ने उसे जुआ खेलने के लिए भरपूर पैसे दिए थे. कर्जे की वह तलवार अभी भी उस की गरदन पर थी. पर गनीमत यह थी कि अभी तक उन लोगों से उस का फिर से आमनासामना नहीं हुआ था.

संदीप के साथ एक अन्य बात भी हुई, जिस ने उसे बेचैन कर दिया. जब भी वह मां से पिता के बारे में पूछती, वह अकसर उसे यही बतातीं कि बिजनैस के सिलसिले में वह अकसर टूअर पर रहते हैं. कई दफा मां ने यह भी बताया कि वह देर रात को घर लौटे थे, मगर जरूरी फोन आ जाने पर सुबह ही फिर चले गए. लेकिन संदीप कौर को किसी तरह पता चल गया कि उस के मम्मीपापा के बीच तो अरसा पहले तलाक हो गया था.

आखिर संदीप भी एक दफा फिर घर से परे हो गई. लासवेगास में रहते हुए एक साल तक उस ने इतनी मेहनत कि कि अपनी कजिन का पैसा भी चुका दिया. यह खुशखबरी देने के लिए वह अपनी मां के पास गई तो मां ने बताया कि अब वह उस की शादी करना चाहती हैं. उसे कुछेक लड़के दिखाए गए, जिन में से कोई भी उसे पसंद नहीं आया. आखिर सितंबर, 2013 में वह अपनी पसंद के एक लड़के के साथ घर से गायब हो गई. मगर अप्रैल, 2014 में यह रिश्ता खत्म हो गया. वह फिर से अकेली हो गई थी. जुए वाला मोटा कर्ज अभी भी उस के सिर पर ज्यों का त्यों था.

25 मई, 2014 सोमवार की बात है. अपने एक दोस्त से मिलने संदीप फ्रीमौंट एरिया गई थी. जब वह वहां से वापस लौट रही थी, तभी उस ने गौर किया कि काले रंग की एक वैन उस की कार का पीछा कर रही थी. डर की वजह से संदीप कौर ने अपनी कार की गति बढ़ा दी, पर काले रंग की वैन ने ओवरटेक कर के संदीप की कार रोक ली. संदीप ने अपनी कार का शीशा नीचे कर के इस बदतमीजी का सबब जानना चाहा तो उस वैन में बैठे एक शख्स ने गरदन बाहर निकालते हुए कहा, ‘‘हमें तुम से बात करनी है, तुम संदीप हो.’’

‘‘क्या बात करनी है?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘देखो, जुआ खेलने के लिए तुम ने जिस आदमी से मोटा कर्ज लिया था, वह एक भला आदमी है. मगर उसूल का पक्का भी है. कर्ज देता है तो वह वापस ले कर रहता है. उस का दायरा बहुत बड़ा है, जिस में हर किस्म के लोग हैं. अपना पैसा वापस लेने के लिए वह कुछ भी कर सकता है.’’

‘‘मतलब, छंटा हुआ बदमाश है वह और तुम कह रहे हो कि भला आदमी है.’’ संदीप बोली.

‘‘शटअप. वह शरीफ है, तभी तो तुम्हें इतना वक्त दे दिया और उस की शराफत का फायदा उठाने में तुम ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. तुम वहां से ऐसे भागी, जैसे कभी पकड़ी नहीं जाओगी.’’ उस शख्स ने चिल्लाते हुए कहा.

‘‘मैं मानती हूं, मुझे उस का पैसा देना है और देर कर भी रहूंगी. वह भी ब्याज सहित. मैं इसी सब के इंतजाम में तो लगी हूं.’’ वह बोली.

‘‘तो इंतजाम हुआ?’’

‘‘नहीं, अभी नहीं हुआ.’’

‘‘आगे होगा भी नहीं.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो?’’

‘‘इसलिए कि इतने दिनों में नहीं हो पाया तो अब कहां से होगा.’’

‘‘मैं अभी अपने कुछ दोस्तों को फोन कर के पैसे मंगवाती हूं.’’ कहते हुए संदीप ने कई जगह फोन मिला कर पैसों की दरकार की. पर कहीं से कुछ नहीं मिला.

‘‘अब बोलो.’’ वह आदमी व्यंगात्मक लहजे में बोला.

फिर वह अपनी वैन से उतर कर संदीप की कार में घुसते हुए उस के बगल वाली सीट पर बैठ गया. उस ने वैन के ड्राइवर को पीछे आने को कहा और संदीप को अपनी कार आगे बढ़ाने को कहा. मरती क्या न करती. संदीप ने कार आगे बढ़ा दी. थोड़ा आगे चलने पर उक्त शख्स ने एक अलग अंदाज में कहना शुरू किया, ‘‘देखो, मेरी बात ध्यान से सुनो, तुम ऐसी स्थिति में हो जहां से मोटी रकम लौटाना तुम्हारे बस की बात नहीं है. और यह सोच लो कि उसे पैसे नहीं मिले तो वह अपने असली रूप में आ कर तुम्हारे साथसाथ तुम्हारी फैमिली को भी खत्म करा सकता है. अब वह तुम्हारे नाम से भी चिढ़ता है.’’

इन बातों ने संदीप के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं. भय से उस का पूरा जिस्म कांपने लगा. उक्त शख्स ने उस से गाड़ी रुकवा कर अपनी सीट पर आने को कहा और खुद कार चलाने लगा. करीब 10 मिनट खामोश रह कर वह गाड़ी को एक आथोराइज्ड पार्किंग स्थल पर ले गया. वहां गाड़ी रोकते हुए बोला, ‘‘देखो संदीप, तुम्हारी परेशानी मैं समझ रहा हूं. ऐसे में तुम्हारे बचाव का एक धुंधला सा रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है. तुम पैसा नहीं दे सकती तो हमारे लिए काम करो. मगर तुम्हें काम वही करना पड़ेगा, जो हम तुम से कहेंगे. इनकार करने की कोई गुंजाइश नहीं होगी.’’

संदीप ने सोचना शुरू किया. उसे लगा कि ये लोग या तो उसे ड्रग सप्लाई का काम करने को कहेंगे या फिर उस से वेश्यावृत्ति करवाएंगे. मगर उस शख्स ने जब काम बताया तो वह इन दोनों से अलग काम निकला. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें बैंक रौबरी करनी होगी. हर लूट में जितना पैसा तुम्हारे हाथ लगेगा, उस में से एक तिहाई तुम अपने लिए रख लेना और बाकी हमें दे दिया करना. हम तुम से तब तक ही पैसा लेंगे, जब तक हमारातुम्हारा हिसाब साफ नहीं हो जाता. इस के बाद हम तुम से एक पैसा भी नहीं लेंगे.’’

काम बड़ा रिस्की था. इसलिए संदीप ने इस बारे में सोचने के लिए वक्त मांगा, जो उसे दे दिया गया. सोचने के साथसाथ उस ने इस विषय से जुड़ी तमाम सामग्री जुटाते हुए उस का व्यापक अध्ययन भी किया. इस से काम की एक बात उस के हाथ लगी कि यहां के कुछ इलाके ऐसे थे, जहां के बैंकों में डकैती डालने वाले अधिकांश अपराधी पकड़े नहीं गए थे. इस जानकारी ने उस की हिम्मत और बढ़ा दी. उस ने डकैती के प्रचलित ढंग न अपना कर अपने अलग तरीके अख्तियार करने की भी सोची.

अपने इसी अलग तरीके से उस ने 6 जून, 2014 को सांटा क्लैरिटा वैली के पास स्थित एक बैंक से एक हजार यूएस डौलर लूट लिया. यह काम इतनी आसानी और इत्मीनान के साथ हुआ था, जिस की उसे भी उम्मीद नहीं थी. उस ने मोटी रकम लूटने के बजाय कम रकम को ही लूटने का सिलसिला जारी रखा. इस का उसे एक फायदा यह मिल रहा था कि छोटी रकम की वजह से कोई हंगामा खड़ा नहीं होता था. इस के बाद अपने इसी तरीके से संदीप ने वैलेंसिया नामक जगह पर स्थित एक बैंक से पहली वारदात से दोगुने रुपए लूटे. बल्कि बैंक से निकलते वक्त उस ने एक जगह काउंटर पर पड़ी करेंसी के कुछ बंडल भी उठा लिए. उस की यह हरकत वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में भी कैद हो गई तो भी वह पकड़ी नहीं गई.

फिर तो उस ने बेधड़क हो कर कितने बैंक लूटे, इस की उसे भी खबर नहीं. कई बैंक वाले तो छोटी रकम की वजह से चुप्पी साध गए थे. पुलिस वाले बैंक डकैतों से काफी परेशान थे. उन की कार्यप्रणाली के अनुसार, उन्हें अलगअलग नाम दिए गए थे. इन में एक का नाम रखा गया था गीजार बैंडिट. यह इस क्षेत्र का नंबर वन सीरियल बैंक रौबर माना जाता था. दूसरे नंबर पर महिला आती थी, जिसे ‘बौंबशैल बैंडिट’ नाम दिया गया था. यह संदीप कौर थी. अब तक वह भी इस काम से ऊब चुकी थी. 31 जुलाई, 2014 को उस ने पक्का मन बनाया कि आज वह अंतिम दफा बैंक में लूट करेगी, इस के बाद हमेशा के लिए यह काम छोड़ देगी.

सेंट जौर्ज के यूएस बैंक की एक शाखा ने ड्राइव थ्रू टैलर की सुविधा दे रखी थी. इसलिए इस के ग्राहकों को बैंक के भीतर जाने की बहुत कम जरूरत पड़ती थी. उस रोज शाम के 4 बज कर 50 मिनट पर संदीप ने अलग तरह से सिर ढांपा, चेहरे पर सर्जिकल मास्क चढ़ाया और सनग्लासेज पहन कर बैंक में प्रवेश किया. अपने चिरपरिचित तरीके से उस ने कैशियर के पास पहुंच कर उस की तरफ कागज की परची फेंकी, जिस पर लिखा था, ‘मुझे 50 हजार की नकदी सौंपने को तुम्हारे पास 2 मिनट का वक्त है. ऐसा न किया तो यहां बम फटेगा.’

कैशियर डर गया. उस ने तुरंत पैसा निकाल कर उस के हवाले कर दिया. जिसे ले कर संदीप अपनी सिल्वर निशान गाड़ी पर सवार हो कर वहां से भाग ली. बैंक मैनेजर ने यह सब देख लिया था. उन्होंने तुरंत पुलिस के 911 नंबर पर फोन कर के बौंबशैल के ताजा कारनामे की बात बताते हुए यह भी जानकारी दी कि वह किस नंबर की कार से भागी है.

सेंट जौर्ज पुलिस डिपार्टमेंट के तेजतर्रार औफिसर मार्क बीहल को कंट्रोल रूम के जरिए इस घटना की सूचना मिली. उस समय वह पास ही के फायर स्टेशन पर थे. उन्हें यह भी बताया गया था कि बैंक लुटेरे के पास घातक हथियार भी हो सकते थे, इसलिए वे सावधानी रखें. मार्क बीहल ने आगेपीछे की न सोचते हुए तत्काल अपनी जौज चार्जर पैट्रोल गाड़ी ‘फ्री वे’ की ओर दौड़ा दी. एक्जिट-टू पर पहुंच कर उन्होंने यह सोचते हुए अपनी गाड़ी रोक दी कि संदिग्ध कार भी वहीं से हो कर जाएगी. कुछ ही देर में वाकई सूचना में बताए गए कलर और नंबर की गाड़ी वहां से निकली. मार्क बीहल ने अपनी गाड़ी उस के पीछे लगा दी.

अब तक मामला पूरी तरह फ्लैश हो गया था. पुलिस की कितनी टीमें बौंबशैल को काबू करने के लिए सक्रिय हो गईं. आखिर कुछ देर बाद संदीप को चारों तरफ से घेर कर काबू कर लिया गया. उस से उस समय किसी तरह की कोई पूछताछ के बजाय उसे क्लार्क डिटैंशन सैंटर के छोटे प्रीजन सैल में बिठादिया गया. वहां उस ने अपनी कलाई की नसें काटने की कोशिश की तो उसे साइकी सैल में नग्न कर के बंद कर दिया गया. इस के बाद उसे इसी अवस्था में यहीं पर रखते हुए उस का थोड़ा बहुत मानसिक उपचार किया गया.

14 अगस्त को एफबीआई के स्पैशल एजेंट सेथ फुटलिक ने संदीप से पूछताछ की. अब तक वह काफी चिड़चिड़ी हो चुकी थी. मगर उसे अपने किए पर कोई पश्चाताप नहीं था. वह पुलिस को कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुई. एक समाचार पत्र ने संदीप के ऊपर सचित्र विस्तृत आलेख छाप दिया. संदीप के बारे में पढ़ कर अनेक लोगों को उस से हमदर्दी होने लगी. ऐसे लोग उसे कड़ी सजा न देने की अपील अखबार में छपवाने लगे.

आखिर उस के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई. सेंट जौर्ज की फिफ्थ डिस्ट्रिक्ट फोर्ट के जिला जज टेड स्टीवार्ट के यहां उस पर मुकदमा चला. जे विनवार्ड को उस का डिफैंस अटौर्नी नियुक्त किया गया था. जिन्होंने मुकदमे की अंतिम सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश से कहा, ‘‘मी लौर्ड, अपराधी बुरे होते हैं तो अच्छे भी होते हैं. संदीप कौर इतनी पढ़ीलिखी है कि वह समाज के पूरी तरह काम आने के काबिल है. वह अपनी कथित सभ्यता के जाल में फंस गई थी.’’

इस पर प्रौसीक्यूटिंग अटौर्नी पाल कोहलेर ने एक तरह से दहाड़ते हुए कहा, ‘‘किस जाल की बात की जा रही है. इस बाबत उन लोगों से पूछ कर देखें, जो इस अपराधिनी के ट्रैप में फंस कर लुटते गए. 130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ी भगाती यह संदीप कौर सड़क पर अन्य लोगों के लिए खतरा बन जाती थी. इस ने लगातार अपराध करते हुए भोलेभाले कर्मियों को लूटते वक्त कभी उन पर तरस नहीं खाया.’’

7 अप्रैल, 2015 को केस का फैसला सुनाते हुए जज महोदय ने बैंक रौबरी के 4 केसों में संदीप कौर को एक साथ 66 महीनों तक जेल में रहने की सजा सुना दी. इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए संदीप ने कहा, ‘‘यह सजा मेरे लिए एक रिलीफ है. मैं इस सजा को पूरी ईमानदारी से निभाऊंगी.’’

फिलहाल एक अलग खबर यह है कि हंसल मेहता के निर्देशन में संदीप कौर की जीवनगाथा से प्रेरित फिल्म बननी शुरू हो गई है, जिस में संदीप का किरदार कंगना रनौत निभा रही हैं. बकौल कंगना यह फिल्म बायोपिक न हो कर एक ऐसी भारतीय लड़की की कहानी है, जो अमेरिका जा कर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाती है. कंगना का मानना है कि यह रोल उन के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है. True Crime Story

 

Superstition: न खुदा मिला बिसाले सनम

Superstition: खजाने के लिए मासूम जाकिर की बलि देने वाले इमरान को खजाना नहीं मिला तो उसे बड़ा अफसोस हुआ. अपने इसी अपराधबोध की वजह से वह बेचैन रहने लगा. बेचैनी कम करने के लिए वह हज करने गया. उस के बाद भी…

उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ की कोतवाली के मोहल्ला पठानान में रहती थी संजीदा बेगम. उन के कुल 11 बच्चे थे. बच्चे बड़े होने लगे तो उन का घर छोटा पड़ने लगा. उन्होंने सोचा कि एक मकान और ले लिया जाए तो परिवार आराम से रह सकेगा. संजीदा बेगम के बड़े बेटे इमरान का फलों का कारोबार था. उन्होंने इमरान से कहा कि उन्हें एक मकान और खरीद लेना चाहिए. इस के बाद वह मकान के लिए जमीन की तलाश में लग गया. तभी उसे बहन से पता चला कि उस के पड़ोस में रहने वाली मुन्नी दरजिन का मकान बिक रहा है. उस की बहन गुलफ्शां बाबरी मंडी में रहती थी. उस ने वह मकान अपनी मां संजीदा बेगम के नाम से खरीद लिया.

वह मकान काफी पुराना था, इसलिए संजीदा बेगम उसे अपने हिसाब से बनवाना चाहती थीं. उन्होंने अपने हिसाब से मकान बनवाना शुरू भी कर दिया. मकान बनाने का ठेका उन्होंने आमिर को दिया, जो अपने साथियों बाबू, इरफान, शहजाद और राजू के साथ मकान तोड़वाने लगा. यह जनवरी, 2014 की बात है. संजीदा बेगम को क्या पता था कि यह मकान ले कर उस ने अपने लिए मुसीबत खड़ी कर ली है. मकान का काम अभी शुरू ही हुआ था कि 11 मार्च, 2014 को इमरान अपने छोटे भाई शाजेब के साथ कोतवाली पहुंचा. उस ने कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी को बताया कि उस के निर्माणाधीन मकान के एक कमरे में एक 11-12 साल के बच्चे की लाश पड़ी है, जिस की गरदन काट कर हत्या की गई है.

इमरान ने बताया था कि सुबह करीब 8 बजे जब वह अपने छोटे भाई शाजेब के साथ मकान का ताला खोल कर अंदर गया तो उस ने पीछे के कमरे में एक लाश देखी, जिस की सूचना देने वह सीधे कोतवाली आ गया. इमरान की बात सुन कर कोतवाली प्रभारी ने मामला दर्ज करा कर मामले की जांच के लिए एसएसआई ओमप्रकाश राणा को सौंप दी. ओमप्रकाश राणा कुछ सिपाहियों के साथ इमरान के निर्माणाधीन मकान पर पहुंच गए. मकान के सामने काफी लोग जमा थे. उस दिन मौसम काफी खराब था. काले घने बादल छाए हुए थे. दिन में भी रात जैसे हालात थे, हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. ओमप्रकाश राणा टार्च ले कर उस कमरे में पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश के पास काफी खून फैला था, वहीं खून से सनी एक छुरी पड़ी थी.

मोहल्ले वालों से लाश की शिनाख्त कराई गई तो कोई पहचान नहीं पाया. इस का मतलब बच्चा किसी दूसरे मोहल्ले का रहने वाला था. उसे कहीं और से ला कर यहां मारा गया था. अब सवाल यह था कि बच्चे को कौन और कैसे मकान के अंदर ले आया, क्योंकि मकान में तो ताला बंद था. पुलिस को आशंका हुई कि कहीं बच्चे को कुकर्म के लिए तो यहां नहीं लाया गया? कुकर्म के बाद मार दिया गया हो. लेकिन जब लाश का बारीकी से निरीक्षण किया गया तो यह आशंका निराधार निकली. हत्या कुकर्म के उद्देश्य से नहीं की गई थी, क्योंकि उस के कपड़े एकदम दुरुस्त थे. चूंकि जिस मकान में लाश मिली थी, वह इमरान का था, इसलिए पुलिस ने उस से पूछताछ शुरू की.

उस ने बताया कि शायद बच्चे को दूसरे कमरे की खिड़की से अंदर लाया गया था, क्योंकि उस में अभी दरवाजे नहीं लगे थे. रोक के लिए पटरे लगा दिए गए थे. शायद किसी ने फंसाने के लिए यह काम किया है. ओमप्रकाश को इमरान की बातचीत और हावभाव से उस पर संदेह हो रहा था. वहां फैले खून से लग रहा था कि हत्या अभी कुछ देर पहले ही की गई है. बहरहाल पुलिस ने जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर ओमप्रकाश राणा पूछताछ कर रहे थे कि एक आदमी ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम साबिर है. मैं मुल्ला पाड़ा में रहता हूं. मेरा 11 साल का बेटा जाकिर सुबह करीब 6 बजे सो कर उठा, तब से गायब है. मैं उसे खोज रहा था कि मुझे पता चला कि यहां किसी बच्चे की लाश मिली है. मैं उसे देखना चाहता हूं.’’

राणा ने तुरंत पूछा, ‘‘तुम्हारे बेटे ने क्या पहन रखा था?’’

‘‘साहब, वह काले रंग की कमीज पहने था.’’

काले रंग की कमीज तो मृतक बच्चा भी पहने था. उम्र भी वही थी. कहीं वह लाश इसी के बेटे की तो नहीं, यह सोच कर ओमप्रकाश राणा ने कहा, ‘‘तुम पोस्टमार्टम हाउस चले जाओ. जा कर वहां लाश देख लो.’’

लाश देखने की बात से साबिर का कलेजा कांप उठा. पोस्टमार्टम हाउस जा कर उस ने लाश देखी तो वह लाश उस के बेटे जाकिर की ही थी. लाश देख कर वह दहाड़े मार कर रोने लगा. उस ने फोन कर के यह बात पत्नी परवीन को बताई तो घर में कोहराम मच गया. मोहल्ले वालों के साथ परवीन भी वहां पहुंची. बेटे की हत्या हो जाने से वह सीना पीटपीट कर रो रही थी. परवीन चीखचीख कर कह रही थी कि उस के बेटे की हत्या इमरान ने ही की है. लेकिन पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर इमरान जाकिर की हत्या क्यों करेगा? किसी ने जाकिर को इमरान के साथ आतेजाते भी नहीं देखा था.

पोस्टमार्टम के बाद जाकिर की लाश घर वालों को सौंप दी गई तो उन्होंने उसे दफना दिया. लेकिन परवीन ने प्रतिज्ञा कर ली कि कुछ भी हो, उस का सब कुछ बिक जाए, पर वह अपने बच्चे के कातिल का पता लगा कर रहेगी. मुल्ला पाड़ा जहां परवीन अपने परिवार के साथ रहती थी, बाबरी मंडी जहां जाकिर की लाश मिली थी, दोनों के बीच करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी. पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि बच्चा उतनी सुबह वहां कैसे पहुंच गया? या तो कोई उसे लालच दे कर ले गया या फिर किसी परिचित के साथ वहां गया. काफी सोचविचार के बाद भी हत्या की कोई वजह पुलिस की समझ में नहीं आ रही.

परवीन जिस एल्यूमिनियम की फैक्टरी में काम करती थी, वह हाफिज की थी, हाफिज इमरान के बहनोई रिजवान का भाई था. परवीन का कहना था कि उस के बेटे का कातिल इमरान ही है. पुलिस के पास सिफारिशें आ रही थीं कि इमरान सीधासादा आदमी है. हत्या जैसा घिनौना काम वह बिलकुल नहीं कर सकता. आखिर वह एक रिक्शे वाले के बेटे की हत्या क्यों करेगा? पुलिस को कोई वजह भी नजर नहीं आ रही थी. ओमप्रकाश राणा की समझ में बात नहीं आई तो हत्या के इस मामले की जांच खुद कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी करने लगे. मई में उन का ट्रांसफर हो गया. उन की जगह आए इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी. वह जब भी इमरान को पूछताछ के लिए कोतवाली बुलाते, उस के समर्थन में सैकड़ों लोग कोतवाली आ कर हंगामा करते और जांच को प्रभावित करने की कोशिश करते.

आखिर नवंबर महीने में इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर प्रेमपाल सिंह नागर को सौंप दी गई. तमाम प्रयास के बाद वह भी हत्यारे तक नहीं पहुंच सके. इस के बाद जांच एसआई सुरेशबाबू यादव के हाथ में आ गई. जांच करने वाले बदलते रहे, लेकिन न हत्यारा पकड़ में आ रहा था, न हत्या की वजह पता चल रही थी. परवीन लगातार पुलिस के पीछे पड़ी थी. वह काफी परेशान थी और सीधे कह रही थी कि जाकिर की हत्या इमरान ने ही की है. हालांकि वजह उसे भी पता नहीं थी. परवीन के 7 बच्चे थे, जिन में 5 बेटियां और 2 बेटे. बड़ा बेटा था गुलशन और छोटा जाकिर, जिस की हत्या हो गई थी.

साबिर रिक्शा चलाता था. इस के अलावा शादीब्याह में बैंडबाजा वालों के साथ काम करता था. उस के दोनों बेटे भी बारातों में बाजा बजाने का काम करते थे. इस तरह उस के परिवार का गुजर हो रहा था. किसी से भी उस की कोई दुश्मनी नहीं थी. जिस दिन जाकिर की हत्या हुई थी, साबिर ने ही उसे 6 बजे जगाया था.

जाकिर उन दिनों मोहल्ले के ही बिहारीलाल स्कूल में सातवीं में पढ़ रहा था. सुबह जिस समय जाकिर घर से निकला था, परवीन सो रही थी. उठते ही उस ने पूछा था कि जाकिर कहां है? शायद उस ने कोई बुरा सपना देखा था. जाकिर कहीं नहीं दिखाई दिया तो उस ने साबिर से कहा, ‘‘जाकिर के साथ कुछ बुरा हो गया है.’’

साबिर ने कहा, ‘‘चिंता मत करो, क्रिकेट खेलने गया होगा, आ जाएगा.’’

परवीन 11 बजे तक पागलों की तरह बेटे को ढूंढती रही, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. इस के बाद उसी ने साबिर को फोन कर के बताया कि जाकिर तो नहीं मिला, लेकिन पता चला है कि बाबरी मंडी में किसी बच्चे की लाश मिली है. जा कर उसे देख लो. पत्नी की इस बात पर साबिर घबरा गया. वह बाबरी मंडी स्थित इमरान के घर पहुंचा तो वहां पुलिस मौजूद थी. उस ने ओमप्रकाश राणा को अपने बेटे के गायब होने के बारे में बताया तो उन्होंने उसे लाश की शिनाख्त के लिए पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया था.

पुलिस मामले की जांच कर रही थी, लेकिन परवीन और साबिर पुलिस की इस जांच से संतुष्ट नहीं थे. संतुष्ट होते भी कैसे, पुलिस उन के बेटे के कातिल को ढूंढ नहीं पा रही थी. उसी बीच सितंबर, 2014 में इमरान अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने चला गया. परवीन ने पुलिस का पीछा नहीं छोड़ा था. वह लगातार कोतवाली के चक्कर लगा रही थी. उस के बेटे को क्यों मार दिया गया, यह बात रहरह कर उसे साल रही थी. यही सोचते हुए अचानक उस के मन में आया कि कहीं जाकिर की बलि तो नहीं दी गई? उस ने यह बात मामले की जांच कर रहे ओमप्रकाश राणा को भी बताई.

इस के बाद वह एक बार फिर से पूछताछ करने पहुंचे. इस बार उन्होंने संजीदा बेगम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि मकान की खुदाई करते समय 5 मिट्टी के घड़े मिले थे, जिन में से 2 में कोयला और 3 में मिट्टी भरी थी. शायद किसी ने उन्हें फंसाने के लिए बच्चे को उस के घर ले जा कर मारा है. दूसरी ओर परवीन का कहना था कि उस के बेटे की तांत्रिक क्रिया कर के बलि दी गई थी. पुलिस को भी अब इमरान पर शक होने लगा था, लेकिन बिना किसी ठोस सबूत के उसे गिरफ्तार करना पुलिस के लिए मुश्किल था.

पुलिस ने राजमिस्त्री आमिर से भी पूछताछ की थी. उस ने बताया था कि घटना वाले दिन जब वह मजदूरों के साथ काम करने पहुंचा था तो इमरान और शाजेब वहां मौजूद थे. उन्होंने कहा था कि आज काम नहीं होगा. उस ने खुदाई से घड़े निकलने की बात स्वीकार की थी. कहते हैं कि कुदरत सब कुछ देखती है और अपना करिश्मा दिखा कर रहती है. जून, 2015 की बात है. परवीन का भाई कल्लन आया हुआ था. कल्लन बदायूं में रहता था. अचानक इमरान अपने भाई शाजेब के साथ उस के घर पहुंचा. उन्हें देख कर परवीन के माथे पर बल पड़ गए. साबिर ने उन्हें बैठाया.

इस के बाद इमरान ने कहा, ‘‘मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं. मेरे हाथों बहुत बड़ा गुनाह हो गया है. मैं लालच में आ गया था. एक बाबा ने मुझे बताया था कि मेरे घर में काफी धन गड़ा है. अगर बच्चे की बलि दी जाए तो मुझे वह धन मिल सकता है. इस के बाद मैं ने अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर जाकिर की बलि दे दी थी. उस के बाद भी धन नहीं मिला और एक बच्चे की जान चली गई.’’

इमरान अपने हाथों हुए गुनाह की माफी मांग रहा था और बदले में 10 लाख रुपए देने की बात कर रहा था. सभी उस की बात चुपचाप सुनते रहे. उस के बाद परवीन ने कहा, ‘‘ठीक है, सोचसमझ कर बताऊंगी.’’

इमरान ने कहा, ‘‘इस में सोचनेसमझने की क्या बात है, 10 लाख रुपए कम नहीं होते.’’

परवीन बोली, ‘‘अगर मैं आप को 10 लाख रुपए दूं तो क्या तुम मेरे बेटे को लौटा दोगे.’’

‘‘अगर मैं ऐसा कर सकता तो जरूर करता, पर मुझे अफसोस है कि मैं ऐसा कर नहीं सकता. मेरे हाथों जो गुनाह हुआ है, वह मुझे चैन नहीं लेने दे रहा है. हम हज भी कर आए हैं, पर मन को तसल्ली नहीं मिल रही है. तुम लोग मुझे माफ कर दो. मैं तुम लोगों के जवाब का इंतजार करूंगा.’’

इमरान के जाने के बाद घर में सन्नाटा पसर गया. जाकिर तो अब वापस आ नहीं सकता था. साबिर जैसे गरीब आदमी के लिए 10 लाख रुपए कम नहीं थे. लेकिन परवीन के लिए रुपए से बढ़ कर बच्चा था. उस ने तय कर लिया कि वह बेटे के कातिलों को सजा दिला  कर रहेगी. 5 जून, 2015 को परवीन ने कोतवाली जा कर सारी बात ओमप्रकाश राणा को बता दी. अब पुलिस को गिरफ्तारी का रास्ता मिल गया. हैदर रजा जैदी पुलिस बल के साथ इमरान के घर पहुंचे और उसे गिरफ्तार कर के कोतवाली ले आए. इमरान वैसे ही अपराधबोध से ग्रसित था. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस पूछताछ में जाकिर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इमरान फलों का व्यापारी था. उस ने बाबरी मंडी में मुन्नी दरजिन का मकान खरीदा और बनवाने के लिए उस की खुदाई कराने लगा. मकान काफी बड़ा था. उस की दीवारें काफी चौड़ी थीं. अचानक खुदाई में मिट्टी के घड़े निकलने लगे, जिन में कोयला और मिट्टी भरी थी. मिट्टी के घड़ों का निकलना हैरान करने वाला था. इमरान को लगा, मकान में जरूर कहीं खजाना गड़ा है. उस ने तांत्रिकों से पूछताछ शुरू की तो किसी तांत्रिक ने बताया कि घड़ों के मिलने का मतलब है कि उस मकान में खजाना गड़ा है, लेकिन वह खजाना तभी मिलेगा, जब किसी बच्चे की बलि दी जाए.

खजाना पाने के लिए इमरान बच्चे की बलि देने को तैयार हो गया. वह अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर किसी ऐसे बच्चे की तलाश में जुट गया, जिस की बलि दी जा सके. 1 फरवरी, 2014 को मुल्ला पाड़ा में सवेरे उन्हें जाकिर दिख गया तो उन्होंने उसे 10-10 के 4 नोट दे कर कहा कि वह उन का एक काम कर दे तो वे उसे और रुपए देंगे. जाकिर राजी हो गया तो वे उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर अपने बन रहे नए मकान पर ले आए. मकान में वे उसे तीसरे कमरे में ले गए, जहां काफी अंधेरा था. शाजेब ने उसे बातों में उलझा लिया तो इमरान ने उस के गले पर छुरी चला दी. बच्चे की मौत हो गई. उसी समय मकान पर काम करने वाले राजमिस्त्री और मजदूर आ गए. इमरान और शाजेब डर गए. उन्होंने बाहर आ कर काम करने वाले मजदूरों से कहा कि मेरी दादी बीमार हैं, इसलिए आज काम नहीं होगा.

राजमिस्त्री और मजदूर चले गए, लेकिन इमरान और शाजेब ने जो अपराध किया था, उस से वे डरे हुए थे कि अगर किसी को पता चल गया तो वे पकड़े जाएंगे. उन्हें पुलिस और जेल का डर सताने लगा था. सुबह का समय था, रात से पहले वे लाश को वहां से निकाल नहीं सकते थे. आखिर इमरान ने तय किया कि वह खुद थाने जा कर पुलिस को बताएगा कि किसी ने उस के मकान में एक बच्चे की हत्या कर दी है. जब उन्होंने सुबह आ कर मकान का दरवाजा खोला तो अंदर उन्हें बच्चे की लाश मिली.

इस के बाद इमरान ने वही किया. वह पैसे वाला और रसूखदार आदमी था. इसलिए शक होने के बावजूद पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी. लेकिन बच्चे की बलि देने के बाद भी जब कोई खजाना नहीं मिला तो उसे काफी अफसोस हुआ. अपने गुनाहों की माफी के लिए वह अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने गया. उस ने वहां उलेमाओं से बात की तो उन्होंने सलाह दी कि वह मृतक बच्चे के मांबाप से माफी मांगे और उन्हें हरजाने के रूप में धनराशि दे तो उसे चैन मिल सकता है.

उलेमाओं की सलाह पर इमरान भाई के  साथ परवीन के घर गया. दरअसल अपराधबोघ से वह बेचैन था. वह बच्चे के गरीब मांबाप को धन दे कर माफी चाहता था. लेकिन बच्चे के मांबाप को तो अपने निर्दोष बेटे के लिए इंसाफ चाहिए था. उन्होंने उसे माफ नहीं किया और पुलिस को सारी बात बता दी. इमरान को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि शाजेब फरार हो गया. पुलिस ने इमरान को जेल भेज दिया. बाद में शाजेब ने भी आत्मसमर्पण कर दिया. वह नाबालिग था, इसलिए उसे बालसुधार गृह भेज दिया गया. सेशन कोर्ट से इमरान की जमानत खारिज हो चुकी है. अब उस ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए अपील की है. Superstition

—कथा पुलिस सूत्रों और जाकिर के घर वालों के बयान पर आधारित

 

Hindi Crime Story: रजनी को भाया प्रेमी का धमाल

Hindi Crime Story: रजनी उर्फ कुंजावती अपने भाईबहनों में सब से बड़ी ही नहीं बल्कि कदकाठी से भी ठीक ठाक थी. इसलिए अपनी उम्र से काफी बड़ी लगती थी. उस का परिवार उत्तर प्रदेश के शहर इटावा में रहता था. उस के पिता किसान थे. जैसे ही वह जवान हुई तो उस के मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में लग गए.

उन्हें इस बात का डर था कि कहीं रजनी के कदम बहक गए तो उन की इज्जत पर दाग लग जाएगा. उन्होंने रजनी की शादी के लिए ग्वालियर जिले के महाराजपुरा कस्बे के गांव गुठीना में रहने वाले सुलतान माहौर को पसंद कर लिया. फिर जल्द ही उन्होंने उस की शादी सुलतान के साथ कर दी.

रजनी सुंदर तो थी ही, दुलहन बनने के बाद उस की सुंदरता में पहले से ज्यादा निखार आ गया. रजनी जैसी सुंदर पत्नी पा कर सुलतान बेहद खुश था. दोनों के दांपत्य की गाड़ी खुशहाली के साथ चलने लगी. समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और रजनी 3 बच्चों की मां बन गई. लेकिन कुछ दिनों बाद आर्थिक परेशानियों ने परिवार की खुशी पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया. शादी से पहले सुलतान छोटामोटा काम कर के गुजरबसर कर लेता था, लेकिन 3 बच्चों का बाप बन जाने से घर के खर्चे भी बढ़ गए थे. वहीं रजनी की बढ़ती ख्वाहिशों ने उस के खर्चों में काफी इजाफा कर दिया था.

आर्थिक परेशानी से उबरने के लिए  वह एक शोरूम में रात के समय चौकीदारी भी करने लग गया था. इस दौरान उसे शराब पीने की भी लत लग गई, जिस की वजह से वह पैसे शराबखोरी में उड़ा देता था. इस के चलते घर की माली हालत डांवाडोल होने लगी थी. यहां तक कि उस ने कई लोगों से कर्ज ले लिया था. उधर जब से कोविड के कारण लौकडाउन लगा, तब से सुलतान की मजदूरी और चौकीदारी का काम भी छूट गया था. इस के बावजूद वह लोगों से पैसा उधार ले कर शराब पी लेता था और हद तो तब हो गई जब अपनी पत्नी रजनी उर्फ कुंजावती को शराब के नशे में जराजरा सी बात पर पीटना शुरू कर देता था.

पति की ये आदतें रजनी को काफी सालती थीं. सुलतान के पड़ोस में अजीत उर्फ छोटू कोरी रहता था. वह रजनी को भाभी कहता था, इसलिए दोनों में हंसीमजाक होता रहता था. रजनी को अजीत से मजाक करने में किसी तरह का संकोच नहीं होता था. एक दिन दोनों हंसीमजाक कर रहे थे तो रजनी ने कहा, ‘‘देवरजी, कब तक इस तरह हंसीमजाक कर के दिन काटोगे? कहीं से घरवाली ले आओ.’’

‘‘भाभी, घरवाली मिलती तो जरूर ले आता. जब तक कोई नहीं मिल रही आप से हंसीमजाक कर संतोष करना पड़ रहा है.’’ अजीत ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जब तक घरवाली नहीं मिल रही तो इधरउधर से जुगाड़ कर लो.’’ रजनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अजीत की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘कौन फिक्र करता है भाभी भूखे आदमी की. जिस का पेट भरा रहता है, उसे ही हर कोई पूछता है,’’ अजीत ने शरमाते हुए कहा.

‘‘क्या तुम ने कभी किसी से अपनी परेशानी का जिक्र कर के देखा है?’’

‘‘कोई फायदा नहीं भाभी, लोग मेरी हंसी ही उड़ाएंगे.’’ वह बोला.

‘‘अजीत, जब तक तुम किसी से कहोगे नहीं, कोई तुम्हारी मदद कैसे करेगा?’’ रजनी ने कहा.

‘‘भाभी, अगर आप से कहूं तो क्या आप मेरी मदद करना पसंद करेंगी? भलाबुरा कहते हुए गालियां जरूर देंगी,’’ अजीत ने रजनी के चेहरे पर नजरें गड़ा कर कहा.

रजनी ने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘एक बार कह कर तो देखो. अरे, मैं तुम्हारी मुंहबोली भाभी हूं अजीत, भला पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो क्या बाहर वाला मदद करने आएगा.’’

अब इस से भी ज्यादा रजनी क्या कहती. अजीत इतना भी नासमझ नहीं था कि वह रजनी की बात का मतलब न समझ पाता.

‘‘जरूर भाभी, मौका मिलने पर कह दूंगा.’’ वह मुसकराते हुए बोला.

संयोग से अगले दिन अजीत को पता चला कि सुलतान किसी काम से बाहर गया है. उस दिन अजीत का मन अपने काम में नहीं लगा रहा था. दिन भर उसे रजनी की याद सताती रही. शाम होने पर घर आने पर वह रजनी की एक झलक देखने को बेचैन हो उठा.

रजनी भी पति की गैरमौजूदगी में अजीत को रिझाने के लिए जैसे ही सजसंवर कर दरवाजे पर आई  तो उस की नजर अजीत पर पड़ी. अजीत भी रजनी को देख कर बिना वक्त जाया किए उस के घर पर जा पहुंचा.

अजीत को अचानक इस तरह आया देख कर रजनी ने हंसते हुए कहा, ‘‘देवरजी, आज आप अपने काम से जल्दी लौट आए?’’

‘‘क्या बताऊं भाभी, आज मेरा मन काम में जरा भी नहीं लगा.’’

‘‘क्यों?’’ रजनी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘सच बताऊं?’’

‘‘हां, मुझे तो सचसच बताओ.’’

‘‘भाभी, जब से तुम्हें और तुम्हारी सुंदरता  को देखा है, मेरा मन किसी काम में लगता ही नहीं है. आप सच में बेहद खूबसूरत है.’’

‘‘ऐसी सुंदरता किस काम की, जिस की कोई कदर ही न हो,’’ रजनी ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘क्या भैया तुम्हारी कोई कदर नहीं करते भाभी?’’

‘‘सब कुछ जानते हुए भी अनजान मत बनो, तुम तो जानते हो कि मेरे वो रात में चौकीदारी करते हैं, सो रात को घर से बाहर रहते हैं. ऐसे में मेरी रातें कैसे गुजरती हैं, वो तो मुझे ही पता है.’’

‘‘भाभीजी, जिस स्थिति से आप गुजर रही हैं, ठीक वही स्थिति मेरी है. मैं भी रात भर करवटें बदलता रहता हूं. अगर आप मेरा साथ दें तो हम दोनों की समस्या खत्म हो सकती है,’’ यह कहते हुए अजीत ने रजनी को अपनी बांहों में भर लिया.

पुरुष सुख से वंचित रजनी चाहती तो यही थी, मगर उस ने हावभाव बदलते हुए बनावटी गुस्से में कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे. बच्चे देख लेंगे.’’

‘‘बच्चे तो अपनी मौसी के बच्चों के साथ बाहर खेल रहे हैं. भाभी, आप ने तो मेरा सुखचैन सब छीन रखा है,’’ अजीत ने कहा.

‘‘नहीं अजीत, छोड़ो मुझे. मैं बदनाम हो जाऊंगी, कहीं की नहीं रहूंगी मैं.’’ वह बनावटी बोली.

‘‘नहीं भाभी, अब यह संभव नहीं है. कोई बेवकूफ ही होगा जो रूपयौवन के इस प्याले के इतने नजदीक पहुंच कर पीछे हटेगा,’’ इतना कह कर अजीत ने बांहों का कसाव बढ़ा दिया.

दिखाने के लिए रजनी न…न…न करती रही, जबकि वह स्वयं अजीत के जिस्म से बेल की तरह लिपटी जा रही थी. इस के बाद वह पल भी आ गया, जब दोनों ने मर्यादा भंग कर दी. एक बार मर्यादा मिटी तो यह सिलसिला चल निकला. जब भी उन्हें मौका मिलता, इच्छाएं पूरी कर लेते. दोनों पड़ोस में रहते थे, इसलिए उन्हें मिलने में कोई परेशानी भी नहीं होती थी. रजनी अब कुछ ज्यादा ही खुश रहने लगी थी, क्योंकि उस का प्रेमी मौका मिलने पर बिस्तर पर धमाल मचाने आ जाता था.

अब उस की आर्थिक परेशानी भी दूर हो गई थी. रजनी खर्चे के लिए अजीत से जब भी रुपए मांगती, वह बिना नानुकुर के चुपचाप निकाल कर रजनी के हाथ पर रख देता था. रजनी और अजीत के बीच अवैध संबंध बने तो उन की बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अब दोनों एकदूसरे का खयाल भी कुछ ज्यादा ही रखने लगे थे, इसलिए आसपड़ोस वालों को शक होने लगा.

लोग इस बात को ले कर चर्चा करने लगे. नतीजा यह निकला कि इस बात की जानकारी सुलतान को भी हो गई. सुलतान ने लोगों की बातों पर विश्वास न कर के खुद सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया. वह जानता था कि यदि इस बारे में पत्नी से पूछताछ करेगा तो वह सच बात बताएगी नहीं, बल्कि होशियार हो जाएगी. सच पता लगाने के लिए वह एक दिन बाहर जाने के बहाने घर से निकला और छिप कर रजनी और अजीत पर नजर रखने लगा.

एक दिन दोपहर के समय उस ने रजनी और अजीत को रंगेहाथों पकड़ लिया. गुस्से में  उस ने रजनी की जम कर पिटाई कर दी. रजनी के पास सफाई देने को कुछ नहीं था, इसलिए वह भविष्य में कभी ऐसा न करने की कसम खाते हुए माफी मांगने लगी. गुस्से में सुलतान ने अजीत को भी कई थप्पड़ जड़ दिए. साथ ही चेतावनी दी कि आज के बाद वह उस के घर के आसपास भी दिखाई दिया तो ठीक नहीं होगा.

रजनी सुलतान की सिर्फ पत्नी ही नहीं, उस के 3 बच्चों की मां भी थी, इसलिए बच्चों के भविष्य की फिक्र करते हुए उस ने दोबारा ऐसी गलती न करने की चेतावनी दे कर उसे माफ कर दिया. यह बात सच है कि जिस महिला का पैर एक बार बहक चुका हो, उसे संभालना मुश्किल होता है. यही हाल रजनी का भी था. कुछ दिनों तक अपनी कामोत्तेजना पर जैसेतैसे काबू रखने के बाद वह फिर चोरीछिपे अजीत से मिलने लगी.

इस का पता सुलतान को चला तो उस ने रजनी को काफी बुराभला कहा. इस के बाद रजनी का अजीत से मेलजोल कुछ कम हो गया, लेकिन बंद नहीं हुआ. जब मिलने में परेशानी होने लगी तो एक दिन रजनी ने अजीत से कहा, ‘‘मुझ से तुम्हारी दूरी बरदाश्त नहीं होती. अब मैं सुलतान के साथ नहीं रहना चाहती.’’

‘‘अगर ऐसा है तो उसे ठिकाने लगा देते हैं. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. वह शराब पीता ही है, खाना खा कर बेसुध हो जाता है, इसलिए उस की हत्या करना भी आसान है.’’

इसी के साथ दोनों ने सुलतान की हत्या की योजना बना ली.

5 जून, 2021 की रात सुलतान शराब पी कर बेसुध सो गया. सोने से कुछ समय पहले ही उस ने रजनी के साथ मारपीट की थी. पति के सोने के बाद रजनी ने प्रेमी अजीत को फोन कर के बुला लिया. मगर जैसे ही अजीत आया सुलतान की नींद खुल गई. रजनी और अजीत ने सुलतान को पकड़ा और उस के गले में रस्सी का फंदा बना कर उस का गला घोंट दिया. इस के बाद अजीत काफी डर गया तो वह अपने घर भाग गया, मगर रजनी कशमकश में फंस गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?

आखिर उस का मन नहीं माना तो वह घर के पास में रहने वाली अपनी बहन के घर चली गई. यहां पर रजनी की मां भी आई हुई थी. उस ने हिचकियां लेले कर रोते हुए बहन और मां को बताया कि उस के पति ने आत्महत्या कर ली है. इन लोगों को रजनी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. शायद इसी वजह से एक बार तो लगा कि वह फूटफूट कर रो पड़ेगी, लेकिन किसी तरह खुद को संभालते हुए आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या आप लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है?’’  बाद में यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई.

सुबह होते ही गंधर्व सिंह ने महाराजपुरा थानाप्रभारी प्रशांत यादव को फोन कर इस घटना की सूचना दे दी. थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ आत्महत्या कर लेने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गुठीना जैसे छोटे से गांव में इस तरह की घटना घट गई और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुई.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रशांत यादव  एसआई जितेंद्र मवाई के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. चलने से पहले उन्होंने इस की सूचना सीएसपी रवि भदौरिया को भी दे दी थी. प्रशांत यादव घटनास्थल का निरीक्षण शुरू करने वाले थे कि सीएसपी भदौरिया भी आ पहुंचे. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो सीएसपी लौट गए. उन के जाने के बाद  थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर सुलतान की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

रजनी और उस के प्रेमी ने जिस रस्सी से फंदा बना कर सुलतान का गला घोंटा था, वह भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले ली. उस के बाद थानाप्रभारी ने गंधर्व सिंह की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. थानाप्रभारी इस केस की जांच में जुट गए. उन्होंने इस बारे में मृतक की पत्नी रजनी से पूछताछ की. थाने पहुंचते ही रजनी डर गई और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने प्रेमी अजीत के साथ मिल कर पति को ठिकाने लगाया था.

पुलिस ने 6 जून, 2021 को ही रजनी के प्रेमी अजीत को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने ही सुलतान की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों ने सुलतान की हत्या की जो सनसनीखेज कहानी सुनाई, वह परपुरुष की बांहों में सुख तलाशने वाली औरत के अविवेक का नतीजा थी. पूछताछ  और सारे साक्ष्य जुटाने के बाद  पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. रजनी के साथ उस का 3 वर्षीय सब से छोटा बेटा भी जेल गया है.

रजनी ने जो सोचा था, वह पूरा नहीं हुआ. वह एक हत्या की अपराधिन बन गई. उस के साथ उस का पे्रमी भी. जो सोच कर उन दोनों ने सुलतान की हत्या की, वह अब शायद ही पूरा हो, क्योंकि यह तय है कि दोनों को सुलतान की हत्या के अपराध में सजा होगी. Hindi Crime Story

Hindi Crime Stories: आशिकी में पति दफन

Hindi Crime Stories: जिस सुख और आनंद के लिए सुदेवी ने प्रेमी के साथ साजिश रच कर पति को ठिकाने लगवा दिया, क्या वह सुख उसे मिल सका…

एसपी (रूरल) सुरेंद्रनाथ तिवारी थाना महराजगंज निरीक्षण के लिए आए थे, तभी एक लड़का और एक औरत थाने पहुंची. दोनों काफी घबराए हुए थे. उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे किसी बड़ी मुसीबत में हैं. सुरेंद्रनाथ की नजर उन पर पड़ी तो उन्होंने दोनों को अपने पास बुला कर पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है? जो भी परेशानी हो, सचसच बताओ?’’

लड़का हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘हुजूर, मेरा नाम दिनेश है.’’ इस के बाद औरत की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘यह मेरी भाभी सुदेवी है. हम लोग थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर से आए हैं. 21 अप्रैल को मेरा बड़ा भाई हरिश्चंद्र थाना महराजगंज के गांव जाना के रहने वाले अपने साढू मंगू के यहां गया था, तब से उस का कुछ पता नहीं है. हम ने उसे हर जगह खोज लिया है. मंगू ने ही भैया को गांव में लगने वाला मेला देखने को बुलाया था.’’

सुरेंद्रनाथ तिवारी को लगा कि सुदेवी भी कुछ कहना चाहती है, इसलिए उन्होंने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम भी कुछ कहना चाहती हो क्या? लेकिन एक बात का ध्यान रखना, जो भी कहना, सचसच कहना.’’

‘‘जी हुजूर,’’ सुदेवी बोली, ‘‘21 अप्रैल को जब मैं कन्नौज में अपनी बुआ की बेटी के यहां थी तो उन्होंने फोन कर के बताया था कि वह जाना में साढू के यहां मेला देखने आए हैं. आज घर लौटने को कहा था. लेकिन जब वह घर नहीं लौटे और फोन पर भी बात नहीं हुई तो मैं 23 अप्रैल को जाना गई और जीजा और उन के घर वालों से उन के बारे में पता किया. उन लोगों ने बताया कि उन्हें उस दिन शाम को सर्वेश के साथ देखा गया था.’’

‘‘यह सर्वेश कौन है?’’ एसपी साहब ने पूछा.

‘‘हुजूर, सर्वेश मेरे बहनोई का भतीजा है. मेरे ऊपर उस की नीयत खराब थी, जिस की वजह से एक बार मेरे पति ने उसे डांटा भी था. मुझे लगता है कि सर्वेश ने ही उन का अपहरण कर लिया है या फिर मार डाला है.’’

मामला गंभीर था, इसलिए सुरेंद्रनाथ तिवारी ने थानाप्रभारी जीवाराम को आदेश दिया कि तुरंत जाना जा कर सर्वेश को पकड़ कर सख्ती से पूछताछ करें, जिस से हरिश्चंद्र के बारे में पता लग सके. जीवाराम ने एसआई आर.के. सिंह, सरिता मिश्रा, सिपाही बृजेशचंद्र शर्मा, आशित कुमार तथा राजेंद्र कुमार सिंह को साथ लिया और जाना जा कर सर्वेश के घर छापा मारा. सर्वेश उस समय घर पर ही था, इसलिए जीवाराम उसे पकड़ कर थाने ले आए. थाने में जब उस से हरिश्चंद्र के बारे में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. लेकिन वह परेशान जरूर हो उठा. उस के चेहरे पर आई घबराहट से थानाप्रभारी ने भांप लिया कि यह झूठ बोल रहा है.

उन्होंने उस पर दबाव बनाने के लिए कहा, ‘‘तुम्हारे झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है, सुदेवी ने हमें सब बता दिया है. इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम भी सब कुछ सचसच बता दो.’’

इस पर सर्वेश ने कहा, ‘‘साहब, हरिश्चंद्र को तो मैं ने मार दिया है. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जिस सुदेवी ने वादा किया था कि हत्या के इस राज को वह किसी को नहीं बताएगी. उसी ने आप से सब बता दिया. साहब,  हरिश्चंद्र की हत्या मैं ने सुदेवी के कहने पर ही की थी. हम दोनों के बीच नाजायज संबंध थे. हत्या की साजिश हम दोनों ने मिल कर रची थी. हत्या करने के बाद मैं ने सुदेवी को बताया भी था कि हरिश्चंद्र को ठिकाने लगा दिया है.’’

सुदेवी उस समय थाने में ही थी. जीवाराम ने उसे बुला कर जब बताया कि सर्वेश ने हरिश्चंद्र का कत्ल कर दिया है तो वह दहाडे़ मार कर रोने लगी. तब जीवाराम ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘त्रियाचरित्र करने की जरूरत नहीं है. सर्वेश ने हमें यह भी बता दिया है कि तू ने ही साजिश रच कर हरिश्चंद्र की हत्या कराई है.’’

इस के बाद सुदेवी ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो सर्वेश की निशानदेही पर पुलिस ने जाना गांव के बगल से बहने वाले नाले के पास से हरिश्चंद्र का शव बरामद कर लिया. लाश सड़ चुकी थी. वहीं झाडि़यों से वह खून सनी ईंट भी बरामद कर ली गई, जिस से हत्या की गई थी. घटनास्थल की सारी औपचारिक काररवाई निपटा कर थाना महराजगंज पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. सर्वेश और सुदेवी ने हरिश्चंद्र की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए थाना महराजगंज पुलिस ने मृतक के छोटे भाई दिनेश की ओर से सर्वेश और सुदेवी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस पूछताछ में हरिश्चंद्र की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह एक औरत द्वारा आशिकी में अपना ही सिंदूर उजाड़ने की वाली थी.

कानपुर शहर से 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर बसा है कस्बा शिवराजपुर. इसी कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. इसी रामबाबू की बेटी है सुदेवी. सुदेवी शादी लायक हुई थी तो उस ने उस की शादी कानपुर के थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर के रहने वाले छोटेलाल के बड़े बेटे हरिश्चंद्र से कर दी थी. छोटेलाल का खातापीता परिवार था. यह 10-12 साल पहले की बात है. सुदेवी ने जो चाहा था, उसे ससुराल में वह सब कुछ मिल गया था, इसलिए वह खुश थी. सब से बड़ी बात यह थी कि हरिश्चंद्र उसे हद से ज्यादा प्यार करता था. यही हर लड़की का सपना होता है. सुदेवी सचमुच भाग्यशाली थी. पति ही नहीं, ससुराल का हर आदमी उसे बहुत प्यार करता था.

हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच सुदेवी 2 बेटों, गोल्डी और निखिल की मां बन गई. 2 बच्चों की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो हरिश्चंद्र को आय बढ़ाने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ने लगी. वह अधिक कमाई के चक्कर में ज्यादा से ज्यादा घर से बाहर रहने लगा. बस, पति का साथ न मिलने की वजह से सुदेवी के कदम बहक गए. हुआ यह कि बरसात में हरिश्चंद्र का घर गिर गया. घर बनवाने के लिए उस ने जाना के रहने वाले अपने साढू गंगू से कोई राजमिस्त्री बताने को कहा तो उस ने कहा, ‘‘साढूभाई राजमिस्त्री तो घर में ही है. हमारा भतीजा सर्वेश बहुत अच्छा राजमिस्त्री है. आजकल वह बड़ेबड़े ठेके ले रहा है. वैसे तो वह खाली नहीं है, लेकिन घर का काम है, इसलिए उसे समय तो निकालना ही पड़ेगा. तुम जब कहो, मैं उसे भेज दूं.’’

‘‘ठीक है भाई, आप ने हमारी एक बहुत बड़ी समस्या हल कर दी. बरसात खत्म होते ही मकान बनवाना शुरू कर दूंगा.’’

28 वर्षीय सर्वेश हृष्टपुष्ट युवक था. वह काम भले राजमिस्त्री का करता था, लेकिन रहता ठाठ से था. सर्वेश रिश्तेदार था. इसलिए हरिश्चंद्र के यहां काम करने आया तो घर में ही रहताखाता और सोता था. सुदेवी उस की मौसी लगती थी, इसलिए वह उस से खूब बातें करता था. मौकेबेमौके हंसीठिठोली भी कर लेता था. सुदेवी भी उस की लच्छेदार बातों में खूब रस लेती थी. बातों ही बातों में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे. धीरेधीरे सर्वेश और सुदेवी के बीच की दूरियां सिमटती चली गईं. दोनों रिश्ते को भूल कर खुल कर हंसीमजाक और छेड़छाड़ करने लगे. कुंवारा सर्वेश जहां मौसी से स्त्री सुख पाने को लालायित रहने लगा था, वहीं पति की उपेक्षा का शिकार सुदेवी सर्वेश की जवानी पर मर मिटी थी.

आग दोनों तरफ लगी थी. बस उन्हें मौके की तलाश थी. एक दिन सुबह से बरसात हो रही थी, जिस की वजह से काम बंद था. हरिश्चंद्र किसी काम से ठिबूर चला गया था और बच्चे भी स्कूल चले गए थे. दोपहर को सर्वेश आंगन में आया तो सुदेवी पेटीकोट और ब्लाउज पहने नहा रही थी. भीगे कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे. उन कपड़ों में सुदेवी का अंगअंग साफ झलक रहा था. सुदेवी इस बात से अनजान थी कि उसे कोई देख रहा है. अचानक सर्वेश उस के सामने आ कर खड़ा हो गया तो उसे फटकारने या शरमाने के बजाय सुदेवी उसे अजीब नजरों से ताकने लगी.

सर्वेश के लिए यह एक तरह का इशारा था. इशारा समझते ही सर्वेश ने बाहर का दरवाजा बंद किया और सुदेवी को उठा कर कमरे में ले आया. इस के बाद मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं और रिश्ते तारतार हो गए. सर्वेश के साथ यौवन का आनंद मिलने के बाद सुदेवी ने पति हरिश्चंद्र की ओर से मुंह मोड़ लिया. वह हरिश्चंद्र की उपेक्षा करने लगी. बातबात में उस से लड़नेझगड़ने लगी. इस की वजह यह थी कि उसे सर्वेश से जो शारीरिक सुख मिल रहा था, वैसा सुख हरिश्चंद्र काफी दिनों से नहीं दे सका था. सर्वेश हट्टाकट्टा जवान था, जबकि हरिश्चंद की जवानी ढल चुकी थी.

धीरेधीरे सर्वेश सुदेवी की जिंदगी में पूरी तरह से आ गया. घर के लोग इस सब से बेखबर थे. कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी हो सकता है. लेकिन जो सोचा नहीं जा सकता था, वैसा हो रहा था. जब भी दोनों को मौका मिलता वे एक हो जाते. यह भी सच है कि एक न एक दिन पाप का घड़ा ऐसा ही अवश्य भरता है. सुदेवी और सर्वेश के साथ भी हुआ. एक दिन रात में हरिश्चंद्र की नींद खुली तो सुदेवी बिस्तर से गायब थी. उतनी रात को पत्नी कहां गई, हरिश्चंद्र सोच में पड़ गया, क्योंकि दरवाजा भी अंदर से बंद था. वह सर्वेश के कमरे में गया तो वह भी नहीं था. इस के बाद हरिश्चंद्र को शक हुआ. कुछ सोच कर वह छत पर गया तो वहां का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. सुदेवी और सर्वेश आपत्तिजनक स्थिति में थे.

हरिश्चंद्र को देखते ही सर्वेश तो भाग खड़ा हुआ, लेकिन सुदेवी कहां भाग कर जाती. हरिश्चंद्र ने उस की जम कर पिटाई की. शोर सुन कर घर वाले आ गए. जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो सब ने सिर पीट लिया. इस के बाद हरिश्चंद सुदेवी पर नजर रखने लगा और सर्वेश के घर आने पर सख्त पाबंदी लगा दी. अब दोनों का मिलना असंभव हो गया, लेकिन फोन पर उन की बातें हो जाती थीं. जब कभी हरिश्चंद्र गांव से बाहर जाता, सुदेवी फोन कर के सर्वेश को बुला लेती. लेकिन हरिश्चंद्र को बच्चों से सर्वेश के आने की खबर मिल ही जाती. तब वह सुदेवी की जम कर पिटाई करता. उस समय सुदेवी रोते हुए यही कहती, ‘‘तुम्हारी जितनी इच्छा हो मार लो, लेकिन याद रखना, एक दिन इस का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’

पत्नी की इस धमकी पर हरिश्चंद्र को और भी गुस्सा आ जाता. उस हालत में वह उस की और पिटाई करता. लेकिन सुदेवी के सिर से सर्वेश के प्यार का भूत नहीं उतरा तो नहीं उतरा. वह सर्वेश की इस कदर दीवानी हो गई थी कि उस के लिए पति को मिटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद उस ने सर्वेश के साथ मिल कर एक ऐसी योजना बनाई, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. उसी योजना के तहत सुदेवी खुद तो बुआ की बेटी की शादी में शामिल होने कन्नौज चली गई. जाने से पहले उस ने बड़ी बहन श्यामदुलारी को फोन कर के कह दिया था कि वह मेला देखने के बहाने उस के पति हरिश्चंद्र को अपने गांव जाना बुला ले. क्योंकि उन का मूड आजकल ठीक नहीं है.

छोटी बहन के कहने पर श्यामदुलारी ने मोबाइल पर हरिश्चंद्र से बात की तो वह मेला देखने के लिए जाने को राजी हो गया. 21 अप्रैल, 2015 को हरिश्चंद्र साढू गंगू के घर पहुंच गया. साढू के घर हरिश्चंद्र का सामना सर्वेश से हुआ तो उस ने लपक कर उस के पैर छू लिए और कुशलक्षेम पूछी. हर साल की तरह उस दिन जाना में मेला लगा था और रात में नौटंकी का कार्यक्रम था. सर्वेश और सुदेवी में मोबाइल पर लगातार बातें हो रही थीं. उस ने सुदेवी को बता दिया था कि बकरा (हरिश्चंद्र) हलाल होने के लिए आ गया है.

योजना के अनुसार, सर्वेश हरिश्चंद्र को मेला दिखाने ले गया. शाम तक दोनों मेला देखते रहे. उस के बाद वह उसे शराब के ठेके पर ले गया. सर्वेश ने खुद तो कम शराब पी, जबकि हरिश्चंद्र को ज्यादा पिलाई. इस के बाद टहलने के बहाने वह हरिश्चंद्र को गांव के बाहर बहने वाले नाले के पास ले गया और वहां धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. हरिश्चंद्र जैसे ही जमीन पर गिरा, उस की गरदन पर पैर रख कर तब तक दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. मरने के बाद सर्वेश ने हरिश्चंद्र के चेहरे को ईंट से कुचल कर विकृत कर दिया और लाश को वहीं गड्ढे में दफना दिया. रात 11 बजे सर्वेश ने फोन कर के सुदेवी को बता दिया कि उस ने कांटे को निकाल दिया है.

इसी के साथ उस ने सुदेवी से अनुरोध किया कि वह गांव आ जाए, क्योंकि वह उस से मिलने के लिए तड़प रहा है. 23 अप्रैल को सुदेवी पति की खोज के बहाने जाना पहुंची. बहनबहनोई को उस ने पति के लापता होने की जानकारी दे कर पति को खोजने के बहाने सर्वेश के साथ मौजमस्ती करती रही. कुछ दिनों बाद वह घडि़याली आंसू बहाते हुए हिंगूपुर आ गई और जब ससुराल में हरिश्चंद्र के लापता होने की बात बताई तो सभी सन्न रह गए. हरिश्चंद्र के छोटे भाई दिनेश को शक हुआ कि भाई के लापता होने में भाभी सुदेवी का हाथ हो सकता है, इसलिए उस ने पहले तो भाभी को खूब खरीखोटी सुनाई, उस के बाद रिपोर्ट दर्ज करवाने को कहा. देवर के दबाव में सुदेवी डर गई और रिपोर्ट दर्ज कराने को राजी हो गई.

27 अप्रैल, 2015 को सुदेवी दिनेश के साथ थाना महराजगंज पहुंची और सर्वेश पर पति के अपहरण या मार डालने का आरोप लगा कर रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. इस के बाद सर्वेश पकड़ा गया तो सारा राज सामने आ गया. पूछताछ के बाद 28 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने सर्वेश और सुदेवी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें स्वीकृत नहीं हुई थीं. Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: ढोंगी गुरू का अपराधिक अतीत

True Crime Story: कविता रानी को पूरा विश्वास था कि स्वामी सच्चिदानंद उस का परलोक सुधार देगा. परलोक सुधारने की कौन कहे, उस ने उस का सारा धन तो हड़प ही लिया, जान भी ले ली. पंजाब के जनपद नवांशहर में थाना काठगढ़ के तहत एक गांव है मत्तो. यहां के किराना दुकानदार सोमनाथ के 7 भाईबहनों में सब से छोटी थी कविता रानी, जिस की शादी मोहल्ला शिवनगर निवासी सुरेंद्र कुमार से हुई थी. कालांतर में इस दंपति के 2 बेटे हुए, जिन्हें ले कर सुरेंद्र स्पेन चला गया था. पति और बेटों के जाने के बाद कवितारानी नवांशहर के अपने मकान में अकेली रह गई थी.

सोमनाथ बहन का हालचाल लेने के लिए अकसर उस के घर जाया करते थे. पहली दिसंबर, 2009 को शाम 6 बजे उन्हें स्पेन से कविता के बड़े बेटे अजय का फोन आया, ‘‘मामाजी, पिछले 2-3 दिनों से मम्मी को फोन कर रहा हूं, उन से बात नहीं हो पा रही है. आप जा कर जरा मां को देख आएं.’’

अजय की बात ने सोमनाथ को भी चिंता में डाल दिया. वह तुरंत नवांशहर के लिए रवाना हो गए. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा, घर के बाहरी गेट पर ताला लटक रहा है. 2 लड़कों ने उन के पास आ कर बताया कि वे कालेज स्टूडैंट हैं और सामने वाले घर में किराए पर रहते हैं. उन में से एक ने उन्हें चाबी सौंपते हुए कहा, ‘‘2-3 दिनों पहले यह चाबी हमें यहां पड़ी मिली थी. शायद आंटीजी के कहीं जाते वक्त उन के हाथ से छूट कर गिर गई है. हम आप को पहचानते हैं, आप आंटीजी के भाई हैं न?’’

दोनों लड़कों ने अपने नाम अजीत चौहान और ऋषि चौहान बताते हुए कविता के घर की ओर इशारा कर के एक साथ कहा, ‘‘यह चाबी हमें इसी गेट के ताले की लग रही है. हम ने इसे उठा कर अपने पास रख लिया था कि आंटीजी के आने पर उन्हें दे देंगे.’’

सोमनाथ ने लड़कों को साथ ले कर गेट का ताला खोला. वे भीतर गए तो सामने के कमरे में भी ताला लगा था, साथ ही अंदर से तेज बदबू आ रही थी. सोमनाथ समझदार आदमी थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बदबू लाश की है. उन के मन में आया, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर उन की बहन मरी पड़ी हो और यह बदबू उसी की लाश से आ रही हो?’

यह बात मन में आते ही सोमनाथ दोनों लड़कों को साथ ले कर थाने जा पहुंचे. थानाप्रभारी राजकुमार ने उन से तहरीर ले कर मामला दर्ज करवाया और पुलिसपार्टी के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. पुलिस ने ताला तोड़ा और मुंह पर कपड़ा लपेट कर भीतर गई. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था और उस के बीच चादर में लिपटी कविता की लाश पड़ी थी. लग रहा था कि मामला लूटपाट के लिए कत्ल का है. कविता के गले में उसी का दुपट्टा कस कर मारा गया था. अपनी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया. रात काफी हो जाने की वजह से काररवाई रोक कर पुलिस ने घर को सील कर दिया.

अगली सुबह पुलिस ने घर को फिर से खोल कर वहां की तलाशी ली तो एक ड्राइविंग लाइसेंस हाथ लगा, जो स्वामी सच्चिदानंद के नाम से था. पासपड़ोस के लोगों ने लाइसेंस देख कर बताया कि यह बहुत मशहूर आदमी है, टीवी के साधना चैनल पर इस के नियमित प्रवचन आते हैं. पता चला कि यह बक्करखाना क्षेत्र में किराए का घर ले कर रहता था. वहीं अपना डेरा बना कर वह प्रवचन दिया करता था, जिसे सुनने के लिए काफी लोग आया करते थे, जिन में कविता रानी भी थी. स्वामी को संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. पता चला कि स्वामीजी उस रात एक स्थानीय जागरण में व्यस्त थे, जहां से फारिग होने के बाद सुबह ही अपने कुछ शिष्यों के साथ कुरुक्षेत्र चले गए थे.

जागरण आयोजकों ने पुलिस को बताया कि उस रात स्वामीजी थोड़ीथोड़ी देर के लिए 2 बार जागरण में आए थे. मतलब यह रात भर वह जागरण में नहीं रहे थे. पुलिस ने अपना सारा ध्यान स्वामी सच्चिदानंद पर जमा दिया, साथ ही उन के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों का भी सहारा लिया गया. मुखबिरी के आधार पर 7 दिसंबर, 2009 को स्वामी को उस वक्त बंगा रेलवे फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपनी इंडिका कार से अपनी एक शिष्या के साथ कहीं जा रहा था.

विधिवत गिरफ्तारी के बाद सच्चिदानंद को अदालत पर पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ से स्वामी सच्चिदानंद की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: जिला गुरदासपुर का बड़ा कस्बा है कादियां. यहां के मोहल्ला धर्मपुरा के रहने वाले तिलकराज भारद्वाज छिटपुट काम कर के अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. उन की 7 औलादें थीं, जिन में दूसरे नंबर का था सत्येंद्र कुमार. बचपन ही से उसे एक्टिंग का शौक था.

जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, उस के मन में एक्टर बनने की इच्छा प्रबल होती गई. सत्येंद्र की यह इच्छा तो पूरी नहीं हुई, लेकिन दसवीं पास करने के बाद उसे पंजाब सरकार के रेवेन्यू विभाग में पटवारी की नौकरी जरूर मिल गई. यह अलग बात है कि अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं था. उसे जहां कहीं किसी फिल्म की शूटिंग होने की बात पता चलती, वह छुट्टी ले कर वहां पहुंच जाता. अपनी इसी सनक के चलते एक बार वह छुट्टी ले कर मुंबई गया तो काफी दिनों बाद लौटा. परिणामस्वरूप उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. इस के बाद वह किसी अन्य काम की तलाश में दिल्ली चला गया. यहांवहां भटकते हुए एक दिन वह पानी पीने के लिए एक ऐसे डेरे में चला गया, जहां एक संत का प्रवचन चल रहा था.

वहां बहुत भीड़ थी. पानी की तो छोडि़ए, वहां तरहतरह के पकवान मुफ्त में बांटे जा रहे थे. पेट भर खाने के बाद सत्येंद्र वहीं पसर गया. जितना बढि़या खाना उसे वहां खाने को मिला था, उस से भी कहीं ज्यादा मजा आया उसे प्रवचन सुनने में उस ने देखा कि श्रद्धालु न केवल संतजी के पैरों में माथा टेक रहे थे, बल्कि अच्छीभली रकम भी चढ़ा रहे थे. बस, यहीं से सत्येंद्र का दिमाग दूसरी दिशा में सोचने लगा. उसे लगा कि इस अंधविश्वासी देश में नाम और दाम कमाने का इस से बेहतर जरिया कोई दूसरा नहीं हो सकता.

पूछताछ में सत्येंद्र ने पुलिस को बताया, ‘‘वाकजाल फैलाने में मैं कुशल था ही, मेरी वाणी में भी ओज था. ऊपर वाले ने चेहरामोहरा भी आकर्षक दिया था. अपनी बात कहने का तरीका भी मुझे काफी हद तक आ गया था. बस थोड़ी जरूरत थी धर्म शास्त्रों की जानकारी की. बिना देरी किए मैं धर्मकर्म का ज्ञान जुटाने लगा. बाबाओं के प्रवचन पूरे ध्यान से सुनने लगा. टीवी चैनलों पर खरीदे गए वक्त में बाबा प्रवचन देने आते तो मैं ध्यान से उन का तौरतरीका देखता और पूरे मनोयोग से उन के प्रवचनों को सुनता.

‘‘आखिर मैं ने तय कर लिया कि मैं इसी धंधे को अपना कर नाम और दाम कमाऊंगा. इस के लिए मैं ने सब से पहले अपने लिए गेरुआ वस्त्र सिलवाए. फिर धार्मिक ग्रंथ खरीद कर उन का अध्ययन शुरू कर दिया. थोड़ीबहुत तैयारी कर के सन् 2004 में मैं छोटेमोटे धार्मिक समारोहों में प्रवचन देने लगा. आत्मविश्वास से भरे मेरे प्रवचन लोगों को पसंद आने लगे. अब मैं ने अपने आप को स्वामी सच्चिदानंद कहलवाना शुरू कर दिया था.’’

सत्येंद्र के बताए अनुसार, पता नहीं यह उस की आवाज का जादू था या उस के आकर्षक व्यक्तित्व का कमाल कि उस के प्रवचनों की धाक जमने लगी. धीरेधीरे उस का सर्कल बढ़ने लगा. जल्दी यह स्थिति आ गई कि उस के कार्यक्रमों में धर्मभीरु लोगों की अच्छीखासी भीड़ जुटने लगी. चढ़ावे के रूप में काफी पैसा भी आने लगा. लोगों की अंधश्रद्धा को देखते हुए उस ने अपना नाम स्वामी सतिंदरानंद की जगह स्वामी सच्चिदानंद रख लिया. क्योंकि इस नाम में कुछ ज्यादा आकर्षण था. उस के दिन तेजी से बदलने लगे. उन्हीं दिनों उस का संपर्क दिल्ली के गणेशनगर निवासी चमनलाल मोंगा से हुआ. उस का अपना कारोबार था. जल्दी ही वह उस का शिष्य बन कर दिनरात उस की सेवा करने लगा. मोंगा को किसी बात की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन वह इस लोक में रहतेरहते अपना परलोक सुधारना चाहता था.

मोंगा ने इस बारे में जब स्वामी सच्चिदानंद से बात की तो उस ने उसे यह कह कर डरा दिया कि वह परलोक की चिंता छोड़े, अभी तो उस का यह लोक भी नहीं संवरा. इस पर उस ने सच्चिदानंद के पैर पकड़ लिए. तब उस ने उसे झांसे में लेने का प्रयास करते हुए कहा कि उस के एकलौते बेटे की उम्र केवल 3 महीने रह गई है. यही नहीं, उस की एकलौती बेटी भी उस की इस तरह दुश्मन बन जाएगी कि वह कहीं का नहीं रहेगा. इस पर मोंगा बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए सच्चिदानंद के पैरों पर नोटों की गड्डियां रख कर बर्बाद होने से बचाने की प्रार्थना करने लगा.

स्वामी सच्चिदानंद ने मोंगा को जो बातें बताईं थीं, उन्हें सच साबित करने के लिए उस ने जाल बिछाना शुरू कर दिया. उस ने मोंगा की जवान बेटी को बुला कर उसे अपने जाल में फंसा लिया. जब लड़की वश में हो गई तो उस ने उसे कुछ इस तरह से उकसाया कि उस ने अपने पिता समेत 11 लोगों पर गैंगरेप का केस दर्ज करवा दिया और खुद उस के साथ उस के डेरे में रहने लगी. साधना चैनल पर सच्चिदानंद का जो कार्यक्रम आता था, उस का सारा खर्च चमनलाल मोंगा उठाता था, लेकिन उस ने उस का चमन उजाड़ कर उस की बेटी को अपनी शिष्या बना लिया था.

फिर 2008 के अंत में वह उसे साथ ले कर नवांशहर चला गया. यहां आ कर उस ने प्रचार किया कि उस का एक भाई जज है. अपना प्रभाव जमाने के लिए उस ने यह भी प्रचारित किया कि पहले वह भी जज था, लेकिन मोहमाया त्याग कर उस ने साधु का चोला पहन लिया है. नवांशहर में वह खूब मशहूर हो गया. बक्करखाना रोड पर किराए का मकान ले कर सच्चिदानंद ने अपना डेरा बना लिया और रोज प्रवचन करने लगा. उस के यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी. इन्हीं में कविता रानी भी थी, जो उस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गई थी. उस का पति और बेटे विदेश में थे. करने को उस के पास कुछ था नहीं. वह भी परलोक सुधारने की गरज से उस के यहां जाने लगी थी और उस की शिष्या बन गई थी. बहाने बना कर उस ने उस से करीब 6 लाख रुपए ऐंठ लिए थे.

एक दिन कविता को विश्वास में ले कर सच्चिदानंद ने उस से कहा कि उस से खार खाने वाले लोंगों ने उस पर झूठे मुकदमे कर दिए हैं, जिन्हें खत्म करवाने के लिए उसे 20 लाख रुपए चाहिए. इस से कविता को उस पर शक हो गया. परिणाम यह हुआ कि उस ने उस से अपना पिछला पैसा मांग लिया. तब सच्चिदानंद को लगा कि उस का पांसा उल्टा पड़ गया है. कुछ दिन तो वह उसे टालता रहा, लेकिन जब वह उस के पीछे ही पड़ गई तो उसे लगा कि कविता अपना पैसा वापस ले कर ही रहेगी. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए सच्चिदानंद ने एक योजना बनाई. 28 नवंबर, 2009 को उस ने फोन कर के कविता से कहा कि पैसों का इंतजाम हो गया है, आज वह उसे उस के पूरे 6 लाख रुपए दे देगा.

साथ ही यह भी कहा कि जागरण की वजह से वह थोड़ा व्यस्त है, इसलिए रात में 10, साढ़े 10 बजे पैसा देने आएगा, क्योंकि सुबह उसे कुरुक्षेत्र जाना है. इस तरह जागरण के बीच से उठ कर वह कविता के यहां जा पहुंचा. कविता बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. जैसे ही वह भीतर पहुंचा, उस ने सीधेसीधे अपने 6 लाख रुपए मांगे. उस ने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं, मैं ने तो पूरे 6 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया था. लेकिन जगराता में झगड़ा हो जाने से किसी ने मेरी जेब से पैसे निकाल लिए.’’

‘‘देखो, तुम्हारा यह झूठफरेब मेरे आगे चलने वाला नहीं है. तुम सीधेसीधे मेरे 6 लाख रुपए निकालो वरना मैं तुम्हारी शिकायत पुलिस से करूंगी.’’

कविता के मुंह से इतना निकला था कि स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र ने पूरे जोर से उस की नाक पर घूंसा मारा. वह बेहोश सी हो कर नीचे गिरने को हुई, तभी उस ने उस के गले में पड़ा दुपट्टा उस की गरदन पर कस दिया. जरा सी देर में वह मौत की नींद सो गई. सच्चिदानंद ने उस की लाश चादर में लपेट कर एक तरफ रख दी. उस के बाद कमरे का सामान इस तरह बिखेर दिया, जैसे वहां किसी ने लूटपाट की हो. यह उस का दुर्भाग्य ही था कि यह सब करते समय उस का ड्राइविंग लाइसेंस वहां गिर गया. उस ने कविता के दोनों सैलफोन भी उठा लिए थे, जिन्हें बाद में उस ने तोड़ दिए थे.

कविता को ठिकाने लगाने के बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद इत्मीनान से जा कर जागरण में बैठ गया, ताकि उस पर किसी को शक न हो. सुबह 6 बजे अपने चेलों को ले कर वह कुरुक्षेत्र चला गया. बाद में दिल्ली वाली अपनी शिष्या को भी उस ने वहीं बुला लिया. इस के बाद वह जालंधर और अमृतसर में घूमता रहा. आखिर बंगा फाटक से गुजरते हुए वह पकड़ा गया. कथित स्वामी सच्चिदानंद के साथ पकड़ी गई उस की शिष्या से भी पुलिस ने पूछताछ की. लेकिन वह कविता की हत्या के षडयंत्र में शामिल नहीं थी. वह तो खुद ढोंगी स्वामी के जाल में फंसी हुई थी, जिस ने उस के दबाव में अपने पिता तथा अन्य लोगों पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दिया था.

इस मामले में उस की कोई भूमिका न पाए जाने पर पुलिस ने उसे उस के अभिभावकों के हवाले कर दिया. 10 दिसंबर, 2009 को अभियुक्त सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया. इस के ठीक एक महीने बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद को जब पेशी पर अदालत ले जाया जा रहा था तो रास्ते में पुलिस वालों को गच्चा दे कर वह फरार हो गया. पंजाब पुलिस ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन वह आदमी दोबारा उन के हत्थे नहीं चढ़ा. देखतेदेखते साढ़े 5 साल का लंबा अरसा गुजर गया.

मगर जैसी कि कहावत है, 100 दिन चोर के 1 दिन साधु का. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सैल ने 6 जुलाई, 2015 को कथित स्वामी सच्चिदानंद को बेगमपुर इलाके के एक मकान से गिरफ्तार कर लिया. स्पैशल सैल के डीसीपी राजीव रंजन, एसीपी संदीप ब्याला और इंसपेक्टर संजय नागपाल ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो अपनी उक्त कहानी बताने के बाद उस के आगे की दास्तान इस तरह से सुनाई: दरअसल ढोंगी सत्येंद्र उर्फ सच्चिदानंद नवांशहर में बहुत बुरी तरह फंस गया था. उस के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हो गया था. पुलिस ने उसे पकड़ कर जेल भी भिजवा दिया था. चूंकि उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे, इसलिए वह भाग निकला. वहां से भागने के बाद सच्चिदानंद उत्तराखंड पहुंच कर साधुओं की एक टोली में शामिल हो कर उन की सेवा करने लगा. अपना रंगरूप भी उस ने साधुओं जैसा ही बना लिया था.

कुछ दिनों बाद वह उत्तरकाशी चला गया, जहां किस्मत से विश्वनाथ मंदिर में उसे पुजारी की नौकरी मिल गई. दिल्ली में उस की शिष्या यानी प्रेमिका थी कल्पना. एक दिन साधु वेश में ही वह दिल्ली जा कर उस से मिला. कल्पना उस की प्रेम दीवानी थी. नवांशहर में भी वह उस के साथ पकड़ी गई थी, मगर पुलिस ने उसे शुरू ही में निर्दोष मान कर उस के कुछ रिश्तेदारों के हवाले कर दिया था. सच्चिदानंद को कत्ल केस में गिरफ्तार कर के हवालात में डाल दिया गया. वहां से उस के फरार हो जाने के बारे में कल्पना को कुछ पता नहीं था. पता चलने पर भी न उस ने इस बात का बुरा माना और न जरा भी घबराई, बल्कि उस के साथ उत्तरकाशी में रहने को तैयार हो गई.

जबकि सच्चिदानंद के लिए फिलहाल यह संभव नहीं था. विश्वनाथ मंदिर से उसे इतना पैसा नहीं मिलता था कि वह अपने साथसाथ कल्पना का भी खर्च उठा पाता. दूसरी ओर वह कल्पना को छोड़ना भी नहीं चाहता था. इसलिए अतिरिक्त धन कमाने के लिए उस ने अलग से कोई धंधा करने की सोची. नए धंधे के रूप में उस ने पंजाब में स्मैक सप्लाई करना शुरू कर दिया. इस से उसे मोटी कमाई होने लगी तो वह विश्वनाथ मंदिर को छोड़ कर दिल्ली में ही रहने लगा. अब वह एक तरफ मादक पदार्थों की तस्करी कर रहा था तो दूसरी तरफ दिल्ली के कई इलाकों में प्रवचन कर के अपने आडंबर को भी जारी रखे हुए था. बीचबीच में वह धर्मांध लोगों को चूना लगाने से भी बाज नहीं आ रहा था. इन ठगियों से उस ने कई लोगों की संपत्तियां भी हथिया ली थीं.

कथित स्वामी सच्चिदानंद अपने सभी काम पूरी होशियारी से कर रहा था. फिर भी मादक पदार्थों की तस्करी करते 14 अक्तूबर, 2014 को वह पंजाब में पठानकोट पुलिस के हत्थे चढ़ गया. चूंकि वह साधु लिबास में था और मादक पदार्थों की मात्रा भी कुल 250 ग्राम थी, इसलिए उस ने पुलिस को यही बताया कि यह नशा वह अपने निजी इस्तेमाल के लिए रखे हुए था. जो भी हो, पुलिस ने उस की बातों में आ कर उस से सख्त पूछताछ नहीं की, वरना उस के द्वारा किए गए कत्ल जैसे संगीन अपराध का तभी खुलासा हो जाता और वह जालंधर की उसी जेल में सलाखों के पीछे होता, जहां से अदालत ले जाते वक्त फरार हुआ था.

खैर, पठानकोट पुलिस ने सच्चिदानंद से नरमी का व्यवहार करते हुए उस का कस्टडी रिमांड न ले कर उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. इस का फायदा उठा कर एक दिन उस ने वहां से भी फरार होने की सोची. एक दिन जेल के अपने सैल में लेटे हुए उस ने यह कह कर जोरों से चिल्लाना शुरू कर दिया कि उस के पेट में जोरों का दर्द हो रहा है. जेल अधिकारियों ने तत्काल उसे अस्पताल में भरती करवाने की व्यवस्था कर दी. अस्पताल में उस की निगरानी के लिए 2 सिपाही भी तैनात किए गए. आखिर वह उन्हें चकमा दे कर पहली ही रात अस्पताल से फरार हो गया.

वहां से वापस दिल्ली पहुंच कर वह कल्पना के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा, साथ ही स्वामी सच्चिदानंद के रूप में प्रवचनों के कार्यक्रम भी करता रहा. लेकिन पता नहीं कैसे पुलिस ने उस के आपराधिक अतीत का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया. दिल्ली पुलिस ने अपनी पूछताछ पूरी कर सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को न्यायिक हिरासत में भेजने की व्यवस्था करने के अलावा पंजाब पुलिस को उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. पठानकोट पुलिस की एक टीम दिल्ली जा कर उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले आई. इस बार उन्होंने स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र से गहन एवं व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में भी उस ने वही सब बताया था, जो वह पहले ही दिल्ली पुलिस को बता चुका था.

पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में गुरदासपुर की सैंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां से नवांशहर पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले गई. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.