Detective Story in Hindi : जुर्म की आवाज

Detective Story in Hindi. किसी भी कामयाब जासूस के लिए तेज दिमाग और त्वरित बुद्धि होना जरूरी होता है. मोंक ऐसा ही जासूस था. तभी तो उस ने कीसले की कार को देख कर ही अनुमान लगा लिया कि वह कत्ल कर के भागी है.

उस दिन हम लोग न्यूजर्सी रोड पर बिलबोर्ड के पीछे मोर्चा जमाए बैठे थे. कोई तेज रफ्तार गाड़ी आती, तो हम उसे रोक कर चालान काट देते. यह बड़ा बोरिंग काम था. क्योंकि तेज रफ्तार गाडि़यां कम ही आती थीं. हमारी परेशानी यह थी कि हमें अपना टारगेट पूरा करना था.

इस टारगेट के तहत हमें तेज रफ्तार गाडि़यों के ड्राइवर्स को पकड़ कर साढ़े 3 सौ डौलर्स के चालान काटने थे. एंडरयान मोंक और मैं यानी नेल थामस सोमवार की सुबह से पहाडि़यों के बीच से गुजरने वाली डबल लेन रोड पर मौजूद थे. यह पुरानी सड़क थी. ऐसी सड़क पर रफ्तार पर काबू रखना मुश्किल होता है.

इस जगह हमें 3 हफ्ते हो गए थे. मेरा काम अपराध के सुराग ढूंढना था. जबकि मोंक एक पुलिस कंसलटेंट और जासूस था. मैं मोंक का दोस्त भी था और शागिर्द भी. दरअसल मैं एक अच्छा जासूस बनने की धुन में उस के असिस्टेंट के तौर पर उस से जुड़ गया था.

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हम यहां पुलिस चीफ रेमंड डशर और उन की बीवी फे्रंकी की मेहरबानी की वजह से आए थे. रेमंड एक जमाने में सानफ्रांसिसको के होमीसाइड जासूस रह चुके थे. फ्रेंकी मोंक के साथ काम कर चुकी थी. रेमंड बहुत ज्यादा व्यस्त चल रहे थे. उन दोनों ने कानून की मदद करने की बात कह कर हमें यहां गाडि़़यां चेक करने के लिए बुलाया था.

मैं इस से पहले भी कत्ल के कई केस हल करने में मोंक की मदद कर चुका था. पर कभी भी मेरे नाम से कामयाबी के झंडे नहीं गड़े थे. मैं मोंक के नाम के बाद ही अपना नाम देख कर खुश हो जाता था. मेरे लिए गर्व की बात यह थी कि मोंक के साथ रह कर मुझे भी पुलिस की वरदी पहनने को मिलती थी.

उस वक्त मोंक पैसेंजर सीट पर बैठा था, गन उस के हाथ में थी. वह अगले शिकार के इंतजार में था और अपनी फिलासफी सुना रहा था. मैं उस की हर बात ध्यान से सुनता था, क्योंकि उस की बातों में काम की कोई न कोई बात जरूर रहती थी. 2 दिनों बाद हमें अपने जरूरी कामों से सानफ्रांसिसको जाना था. वहां रेमंड ने हमें अपने डिपार्टमेंट में जौब की औफर दी थी, जो हम दोनों ने मंजूर कर ली थी.

मैं मोंक की बातें सुन रहा था कि इसी बीच लाल रंग की एक रेंजरोवर उस बिलबोर्ड के पास से तेजी से गुजरी, जिस के पीछे हमारी गाड़ी खड़ी थी.

गाड़ी के टायरों और निचले हिस्से पर कीचड़ लगा था. मोंक ने जल्दी से अपनी गन नीचे करते हुए कहा, ‘‘हमें इस गाड़ी का पीछा करना है.’’

मैं ने छत पर लगी बत्तियां जलाईं और सायरन का बटन दबा दिया. इस के साथ ही हमने लाल गाड़ी का पीछा शुरू कर दिया. चंद सेकेंड में हम उस कार के करीब पहुंच गए. हम ने ड्राइवर को रुकने का इशारा किया. इशारा समझ कर उस ने गाड़ी सड़क के किनारे रोक दी. कार चलाने वाली एक औरत थी और उस की कार पर न्यूजर्सी की नेमप्लेट लगी थी.

मोंक ने मुंह बनाते हुए उस गाड़ी की तरफ देखा. गाड़ी के बंपर पर कीचड़ के साथसाथ पेड़ की डालियां और पत्ते चिपके हुए थे. मैं जानता था कि मोंक को गंदगी से सख्त नफरत है, इसीलिए उस की त्यौरियां चढ़ी हुई थीं.

मैं ने जल्दी से गाड़ी का नंबर अपने कंप्यूटर में टाइप किया, तो मुझे जरा सी देर में पता चल गया कि वह गाड़ी सिमेट की रहने वाली कीसले ट्यूरिक के नाम पर रजिस्टर्ड है. इस से पहले कभी भी उस गाड़ी का चालान नहीं हुआ था. न ही वह किसी हादसे से जुड़ी थी. मैं गाड़ी से बाहर आ कर ड्राइविंग सीट पर बैठी औरत के करीब पहुंच गया.

मोंक गाड़ी के पिछले हिस्से की तरफ पहुंचा और इतनी बारीकी से देखने लगा, जैसे वहां बैंक से लूटी गई रकम या कोकीन का जखीरा अथवा अगवा की हुई कोई लड़की मौजूद हो. कार की पिछली सीट उठी हुई थी, लेकिन वहां सिरके की एक बोतल के अलावा कुछ नहीं था. निस्संदेह सिरका रखना गैरकानूनी नहीं था.

औरत ने अपनी गाड़ी का शीशा नीचे किया, तो मेरी नाक से एक अजीब सी बदबू टकराई. गाड़ी के अंदर चमड़ा मढ़ा हुआ था. शायद ये उसी की बदबू थी. उस औरत की उम्र करीब 30 साल थी और वह देखने में काफी खूबसूरत थी. उस ने लंबी आस्तीन वाली फलालेन की शर्ट और पुरानी सी जींस पहन रखी थी.

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उस औरत की आंखों के नीचे और नाक पर की कुछ स्किन सुर्ख नजर आ रही थी. जिस का मतलब था कि वह चश्मा लगाती थी. मैं ने नम्रता से कहा, ‘‘गुड मानिंग मैडम, क्या मैं आप का लाइसेंस देख सकता हूं? प्लीज रजिस्टे्रशन बुक भी दीजिए.’’ उस ने दोनों चीजें मेरी तरफ बढ़ा दीं. उसी वक्त मैं ने उस की हथेली पर अंगूठे से जरा नीचे एक छाला देखा, पर मैं ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया.

‘‘क्या बात है औफिसर…?’’ उस ने पूछा.

उस का लाइसेंस देखने के बाद इस बात की तसदीक हो गई कि वह कीसले ट्यूरिक ही है. मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या तुम्हें पता है कि इस सड़क पर गाड़ी की रफ्तार कितनी होनी चाहिए?’’

‘‘55.’’ वह बोली.   ‘‘क्या तुम जानती हो, तुम किस स्पीड से गाड़ी चला रही थी?’’   उस ने पूरे विश्वास से कहा, ‘‘55.’’

मेरी समझ में नहीं आया कि जब उस की स्पीड ठीक थी, तो उसे रोकने की वजह क्या है? मैं ने पीछे मुड़ कर मोंक से कहा, ‘‘इस की रफ्तार तो ठीक थी, फिर गाड़ी क्यों रुकवाई?’’ उस ने झुंझला कर कहा, ‘‘देखते नहीं, इस की गाड़ी पर कीचड़ लगा है और पिछले हिस्से के हुक में प्लास्टिक बैग का एक टुकड़ा भी फंसा है.’’

‘‘पर इस से ट्रैफिक कानून का तो कोई उल्लंघन नहीं होता.’’ मैं ने कहा. इसी बीच कीसले बोल उठी, ‘‘क्या मैं जा सकती हूं औफिसर?’’ मैं ने उस का लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन कार्ड उस की तरफ बढ़ाया, तो उस की उंगली पर हल्का सा सफेद दाग नजर आया, जिस से पता चलता था कि उस ने हाल ही में अपनी शादी की अंगूठी उतारी थी.

‘‘औफिसर जरा हटें, मुझे जाने दें.’’   ‘‘हां.’’ मैं ने चौंकते हुए कहा, ‘‘तुम जा सकती हो.’’

‘‘नहीं. तुम नहीं जा सकती.’’ पीछे से मोंक की तेज आवाज सुनाई दी. मैं ने ठंडी सांस भर कर कहा, ‘‘तुम सिमेट वापस आने के बाद अपनी गाड़ी धुलवा लेना. मेरे साथी को गंदगी से सख्त नफरत है.’’   ‘‘जी जरूर.’’ औरत ने जल्दी से कहा.

‘‘हम इसे यहां से जाने और कार धुलवाने की इजाजत हरगिज नहीं दे सकते.’’ मोंक ने आगे आ कर सख्त लहजे में कहा, तो मैं हैरान हुआ. मैं ने पूछा, ‘‘क्यों?’’   ‘‘क्योंकि इस से अहम सुबूत भी धुल जाएंगे.’’ वह बोला.

‘‘कैसे सुबूत? यही कि कार पर कीचड़ लगा है?’’ मैं ने विरोध किया, तो मोंक ने जैसे धमाका किया, ‘‘नहीं, इस ने अपने शौहर का कत्ल किया है.’’

अभी मोंक की जुबान से ये शब्द निकले ही थे कि कीसले ने गाड़ी स्टार्ट की और तूफान की सी तेजी के साथ भगा कर ले गई. मैं ने जल्दी से पीछे हट कर रूमाल से चेहरा साफ किया.

उस का इस तरह भागने का मतलब था कि एक तरह से वह अपना जुर्म कुबूल कर रही थी. कीसले के भागने से मैं हैरान परेशान था. मोंक ने झुंझला कर कहा, ‘‘अब खड़े क्यों हो, वह हम से बच कर भाग रही है.’’

मैं लपक कर गाड़ी में जा बैठा और गाड़ी का सायरन चालू कर दिया. हम कीसले की कार के पीछे रवाना हो गए. मेरी आंख में शायद धूल के कण चले गए थे, जो बड़ी तकलीफ दे रहे थे. मैं बारबार रूमाल से आंख पोंछ रहा था. मोंक ने रेडियो औन कर के यह खबर रेमंड को दे दी कि हम एक कातिल का पीछा कर रहे हैं.

मोंक ने उस औरत के लिए खुले रूप से कातिल शब्द इस्तेमाल किया था. इस का मतलब था कि मोंक को उस के कातिल होने का पक्का यकीन था.

हालांकि इस से पहले वह कभी भी कत्ल के किसी केस में नाकाम नहीं हुआ था. फिर भी उस का इतना आत्मविश्वास मुझे उलझन में डाल रहा था. हम तेजी से उस लाल कार के करीब पहुंचते जा रहे थे, जो 90 की स्पीड से दौड़ रही थी. हमारी स्पीड भी 90 के ऊपर थी. मैं ने मोंक से पूछा, ‘‘क्या हम कीसले को पकड़ पाएंगे?’’

‘‘तुम बिलकुल फिक्र मत करो नेल, हम उसे पकड़ लेंगे.’’ मोंक ने बड़े आत्मविश्वास से कहा. कीसले की कार के आगे एक ट्रक चल रहा था. उस ने उसे ओवरटेक करने की कोशिश की. सामने से 2 कारें आ रही थीं. उन्होंने उसे बचाने की कोशिश की, तो एक कार सड़क के किनारे बनी मुंडेर से टकरा गई, जबकि दूसरी कार पूरी तरह दाईं तरफ घूम गई.

इसी बीच लाल कार हमारी नजरों से ओझल हो गई. मैं ने स्पीड बढ़ाई, तो थोड़ी देर बाद वह कार फिर नजर आ गई. मैं ने मोंक ने कहा, ‘‘तुम्हें यह खयाल क्यों आया कि कीसले ने अपने शौहर का कत्ल किया है. क्या इस की कार के पिछले हिस्से में कोई लाश थी, जो मुझे नजर नहीं आई?’’

‘‘नहीं, लाश अंदर नहीं थी. वह लाश को पहले ही  ठिकाने लगा चुकी है. उस ने लाश को काले रंग के बड़े से प्लास्टिक के थैले से डाला था. फिर घसीटती उसे हुई एक कब्र तक ले गई थी. इतना ही नहीं, उस ने लाश को दफन करने के बाद कब्र पर पानी भी छिड़का था.’’

कीसले ने एक होंडा कार को ओवरटेक किया, जिस के फलस्वरूप कार के ड्राइवर को गाड़ी सड़क के एक तरफ उतारनी पड़ी. मुझे भी अपनी स्पीड कम करनी पड़ी. मैं ने मोंक से पूछा, ‘‘तुम यह सब इतने यकीन से कैसे कह सकते हो? तुम्हारी बातों से तो ऐसा लगता है, जैसे तुम चश्मदीद गवाह हो.’’

‘‘मैं अपनी आंखें खुली रखता हूं, इसलिए.’’ मोंक बोला.   ‘‘ठीक है, पर तुम अगर मुझे हकीकत बताओगे, तो मुझे भी पता चल जाएगा. आखिर तुम्हारे साथ मैं भी भागदौड़ कर रहा हूं.’’ मैं ने रूखे लहजे में कहा.

मोंक ने व्यंग्य से मुसकराते हुए मुझे देख कर कहा, ‘‘इस लाल गाड़ी पर लगी कीचड़ से जाहिर होता है कि यह जंगल में गई थी. कार के पिछले बंपर से थोड़ा कीचड़ हटा हुआ है, इस का मतलब जब उस ने कार की डिक्की से प्लास्टिक के थैले में रखी लाश बाहर निकाली होगी, तो रगड़ से उस जगह का कीचड़ साफ हो गया होगा. पिछले हुक में प्लास्टिक के बैग का टुकड़ा भी फंसा हुआ है, जिस से पता चलता है कि डिक्की से प्लास्टिक बैग में रखी हुई कोई चीज निकाली गई है.’’

‘‘पर इस से यह तो साबित नहीं होता कि उस ने अपने शौहर को कत्ल कर के उस की लाश ठिकाने लगाई है.’’ मैं ने पूछा. तब तक हम लाल गाड़ी के काफी करीब पहुंच गए थे. मोंक ने गाड़ी पर नजरें जमाते हुए कहा, ‘‘तुम ने देखा होगा कि उस की अंगुली में शादी की अंगूठी नहीं थी, जो ये बताती है कि दोनों की आपस में नहीं बनती थी. उस की हथेली का छाला साबित करता है कि उस ने हालफिलहाल ही बेलचे से खुदाई की है.’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो, यह मैं ने भी देखा था.’’   ‘‘उसे चमड़े के दस्ताने पहन कर खुदाई करनी चाहिए थी.’’ मोंक बोला.

‘‘उस के बजाए उस ने रबर के दास्ताने पहन रखे होंगे, जो हाथों को कीचड़ और पानी से बचा सकते थे, लेकिन खुदाई के दौरान बेलचे के दस्ते की रगड़ से नहीं बचा सके. उस ने लंबी आस्तीनों की शर्ट, जींस व काला चश्मा पहन रखा था, जो उस के चेहरे के लिहाज से छोटा था. इसी वजह से उस की नाक और आंखों के नीचे का हिस्सा लाल सा हो गया था. लाश को दफन करने के बाद उस ने चश्मे, बेलचे और दास्तानों से तो छुटकारा पा लिया, लेकिन वह सिरके की वह बोतल फेंकना भूल गई, जिस पर तेजाब के धब्बे लगे थे. वैसे इस का वारदात से सीधा ताल्लुक नहीं है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘सिरके की बोतल कार में क्यों रखी थी?’’

इस पर मोंक बोला, ‘‘अगर कीसले के हाथों पर तेजाब लग जाता तो उस का असर खत्म करने के लिए सिरका बहुत फायदेमंद होता है.’’

मैं हैरतजदा सा उस की बातें सुन रहा था. जो मोंक ने देखा था, मैं ने भी वही सब देखा था, पर उस ने कितनी अकलमंदी से हर चीज का ताल्लुक कत्ल से जोड़ लिया था और उस की हर बात हकीकत सी लगती थी. निस्संदेह उस का दिमाग बहुत तेज था. इसीलिए वह जानामाना जासूस था. मुझ में मोंक की तरह चीजों को वारदात से जोड़ने की योग्यता नहीं थी. मैं ने थोड़ी रफ्तार बढ़ाई और कीसले की गाड़ी तक पहुंच गया.

मैं ने गाड़ी उस की कार के आगे रोकी. हम दोनों अपनी कार से बाहर आ गए. हम ने अपने हथियार निकाल लिए और उन का रुख कार की तरफ कर दिया. वह कार में अपनी सीट पर बैठी रही.

‘‘अपने हाथ ऊपर उठाओ और कार से बाहर आओ.’’ मैं ने सख्ती से कहा, तो वह हैरान सी कार के बाहर आ गई. मोंक की पिस्तौल उस पर तनी हुई थी, इसलिए मैं ने अपनी पिस्तौल होलस्टर में रख ली और उसे हथकड़ी डालते हुए कहा, ‘‘तुम्हें कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया जा रहा है.’’

‘‘मैं नहीं मानती, तुम यह कैसे कह सकते हो कि मैं ने कत्ल किया है?’’   ‘‘हम पुलिस वाले हैं, सोचसमझ कर हाथ डालते हैं.’’ मोंक ने कहा.

सूचना पा कर रेमंड 20 मिनट में वहां पहुंच गए. जबकि फोरेंसिक टीम और पैरामैडिकल स्टाफ उन से पहले ही वहां पहुंच गए थे. इन्हें मैं ने बुलवाया था. ऊंचे ओहदे पर होने के बावजूद रेमंड का रवैया बड़ा दोस्ताना था. उन्होंने दोनों कारों को देखा. दोनों में काफी टूटफूट हो चुकी थी. कीसले को एंबुलेंस में बैठा लिया गया था.

रेमंड ने एंबुलेंस में बैठी कीसले पर नजर डाली. फिर वह मोंक से मुखातिब हुआ. ‘‘कमाल हो गया, किसी को मालूम भी नहीं कि कोई कत्ल हुआ है और तुम ने कातिल को पकड़ लिया. यह काम सिर्फ तुम ही कर सकते हो.’’

‘‘शुक्रिया चीफ.’’ मोंक ने उस के व्यंग्य पर ध्यान नहीं दिया.   ‘‘लेकिन मोंक तुम्हारे पास कोई सुबूत नहीं है. अगर लाश मिल जाती तो गिरफ्तारी हो सकती है, ऐसे नहीं.’’ रेमंड ने कहा.

‘‘उस का इस तरह गाड़ी ले कर भागना उस का जुर्म साबित करता है.’’ मैं ने कहा, तो रेमंड बोले, ‘‘नहीं गाड़ी ले कर भागने के कई कारण हो सकते हैं. तुम इसे इकबाले जुर्म नहीं कह सकते.’’

‘‘चीफ जब हम ने उस पर कत्ल का इल्जाम लगाया, तो उस ने हैरान हो कर कहा था, ‘तुम्हें कैसे पता चला?’   रेमंड ने बात काटी, ‘‘अगर यह इकबाले जुर्म है तो क्या उस ने तुम्हें बताया कि लाश कहां दफन है?’’

‘‘नहीं, न तो उस ने जुर्म कुबूल किया और न ही यह बताया कि उस के शौहर की लाश कहां दफन है?’’ मैं ने कहा, तो मोंक ने दखल दिया, ‘‘मैं साबित कर सकता हूं कि इस औरत ने अपने शौहर का कत्ल किया है.’’

मोंक ने डिटेल में बताया, ‘‘औरत की हथेली पर छाला, शादी की अंगूठी का न होना, सिरके की बोतल, काले बैग का टुकड़ा और गाड़ी के बंपर पर लगा कीचड़, ये सारे सुबूत हैं.’’

मोंक की बातें सुनने के बाद रेमंड सोच में पड़ गए. पलभर बाद बोले, ‘‘मोंक मैं तुम से सहमत हूं. पर इन सब तथ्यों पर न तो हम कत्ल का केस बना सकते हैं और न कत्ल की बात साबित कर सकते हैं. अच्छा यह बताओ, जब कीसले की गाड़ी की रफ्तार ज्यादा नहीं थी तो तुम ने गाड़ी क्यों रोकी?’’

‘‘उस की कार बहुत गंदी थी.’’ मोंक ने जवाब दिया, तो रेमंड अपना सिर पीटते हुए बोले, ‘‘मोंक गाड़ी गंदी होना गैरकानूनी नहीं है, इस के लिए हम कोई एक्शन नहीं ले सकते. मुझे लगता है कि तुम मेरी नौकरी खत्म करवा कर दम लोगे. यह बहुत अमीर औरत है और हम पर दावा दायर कर सकती है. वैसे भी उसे कातिल साबित करने के लिए हमारे पास कोई सुबूत नहीं हैं.’’

‘‘मि. रेमंड, क्या लाश मिलने पर आप की तसल्ली हो सकती है?’’ मोंक ने पूछा.

‘‘हां मोंक, लाश मिलने से हमारी पोजीशन मजबूत हो जाएगी.’’ रेमंड ने कहा, तो मोंक बोला,  ‘‘मुमकिन है, इस सिलसिले में कीसले मुंह न खोले, लेकिन उस की कार सब बता देगी.’’

मोंक कुछ सोचते हुए कीसले की कार की तरफ बढ़ा. मैं और रेमंड उस के पीछे थे. रेमंड ने जल्दी से कहा, ‘‘बिना वारंट के हम उस की गाड़ी का जीपीएस सिस्टम नहीं देख सकते मि. मोंक.’’

‘‘मुझे यह जानने की जरूरत नहीं है कि कार कहां से आ रही है.’’ मोंक ने पूरे विश्वास से कहा. फिर वह घूमघूम कर बारीकी से गाड़ी की जांच करने लगा.

गाड़ी पर निगाह जमाएजमाए उस ने कहा, ‘‘गाड़ी के निचले हिस्से और टायरों पर जो कीचड़ लगा है, उस पर पत्ते भी हैं. इस का मतलब यह कि गाड़ी जंगल की तरफ गई थी. जब हम ने कार रोकी थी तो उस पर लगा कीचड़ गीला थी. हवा, मौसम और गर्मी को देखते हुए यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है कि कब्र यहां से 5-6 मिनट की ड्राइव के फासले पर होगी.’’

‘‘चलो मान लिया कि लाश यहां से 5 मिनट के फासले पर है, पर उस तक पहुंचा कैसे जाएगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘स्नेक की तलाश करने के बाद हम वहां तक पहुंच सकते हैं.’’   ‘‘बीच में यह स्नेक कहां से आ गया?’’ रेमंड ने जल्दबाजी में पूछा.

‘‘कीसले ने स्नेक पर गाड़ी चढ़ा दी थी और वह टायरों के नीचे कुचल कर मर गया. मुझे इस की अगलीपिछली साइड के पहियों पर स्नेक के टुकड़े नजर आ रहे हैं.  शायद वह गाड़ी के नीचे आने के पहले मर चुका था.’’

‘‘पर तुम यह कैसे कह सकते हो कि स्नेक लाश दफन कर के वापस लौटते समय कीसले की गाड़ी से कुचला गया?’’

‘‘स्नेक के गोश्त के पीस कीचड़ के ऊपर लगे हैं, नीचे नहीं. इस का मतलब पहले कीचड़ लगा फिर स्नेक कुचला गया. अगर हम मरे हुए स्नेक को तलाश लें, तो मालूम हो जाएगा कि हम सही दिशा की तरफ जा रहे हैं.’’

‘‘लेकिन इस से यह कैसे जान सकेंगे कि वहां से आगे कहां जाना है?’’ रेमंड ने पूछा तो मोंक ने कार के पहिए की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘इस से अंदाजा होता है कि कीसले कार बहुत तेज रफ्तार से चला रही थी. जब वह एक तंग और कच्चे रास्ते पर मुड़ी, तो उस की कार किसी झाड़ या खंभे से टकरा गई, जिस से दाईं ओर की लाइट टूट गई.

‘‘इस टूटी हुई लाइट के अंदर भी कीचड़ लगा है. इस का मतलब लाइट कीचड़ में जाने के पहले टूटी थी. अब हमें बस, यह करना है कि हाईवे पर 5 किलोमीटर वापस जा कर एक मरे हुए स्नेक, कच्ची धूल भरी सड़क और किसी ऐसे खंभे या झाड़ को तलाशना है, जिस पर कार के रंग के लाल निशान हो. हमें अपनी सही दिशा मिल जाएगी. वहां हमें लाइट के टुकड़े और कीचड़ पर गाड़ी के टायरों के निशान भी मिल जाएंगे.’’

इस पर रेमंड बोले, ‘‘फिर तुम लोग यहां क्या कर रहे हो? लाश की तलाश क्यों नहीं शुरू करते? जब मिल जाए तो मुझे खबर कर देना.’’

हम ने जल्दी से गाड़ी स्टार्ट की और उस तरफ चल पड़े, जिधर कब्र होने का अंदाजा था. 20 मिनट में हम ने वह कब्र तलाश कर ली. अगले 10 मिनट में हमें एक गैस स्टेशन के पीछे कचरे के ड्रम में तेजाब की बोतल, बेलचा, दस्ताने और चश्मा भी मिल गया. वह गैस स्टेशन कच्ची सड़क से करीब 1 किलोमीटर दूर था.

शौहर की लाश मिलने के बाद भी कीसले ने जुबान नहीं खोली. वह बारबार वकील को बुलाने को कहती रही. रेमंड हम सब को साथ ले कर सिमेट के लिए रवाना हो गए. रास्ते में मोंक के सवालों ने कीसले को सच बोलने पर मजबूर कर दिया. कीसले का शौहर नारमन एक मशहूर आर्किटैक्ट था. वह खुद भी अच्छे जौब पर थी. इन लोगों का सिमेट में एक खूबसूरत बंगला था, पास में 4 कीमती कारें थीं. पतिपत्नी के दोस्तों के साथ शराब की शानदार महफिलें जमती थीं.

घटना से एक दिन पहले सुबह को नाश्ते पर नारमन ने कीसले को बताया कि वह पूरी तरह दिवालिया हो गया है. वह चोरीछिपे जुआ खेलने का आदी था और यह सोच कर बड़ीबड़ी बाजी खेलता था कि शायद किस्मत साथ दे दे और उस का नुकसान पूरा हो जाए. लेकिन उस की यह उम्मीद पूरी नहीं हुई और वह दलदल में फंसता चला गया. यहां तक कि इस के चलते वह दिवालिया हो गया.

इस से ज्यादा बुरी खबर यह थी कि जुए में लगातार हारने की वजह से नारमन का बैंक एकाउंट, जिस में कीसले की भी जमापूंजी थी, एकदम खाली हो गया था. शेयर्स और कीमती चीजें भी बिक गई थीं. इस से भी बुरी बात यह थी कि उस ने अपनी कंपनी में 3 लाख डौलर्स का गबन किया था. इस मामले में नारमन का जेल जाना तय था. उस के जेल जाने के बाद देनदारी के सारे मामले और तकाजे कीसले को अकेले बिना पैसे के भुगतने पड़ते.

इस खौफनाक हकीकत को जान कर कीसले की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. पहले तो उस की समझ में नहीं आया कि क्या करे? फिर वह गुस्से और हताशा में उठ कर किचन में गई. वहां से वह भारी फ्राइंगपैन उठा कर लाई और पीछे से नारमन के सिर पर 2 बार जोरदार वार किए. दूसरे वार ने नारमन की जान ले ली.

कीसले उस की लाश को घसीटते हुए गैराज में ले गई और उसे कचरा रखने वाली खाली थैली में डाल कर उस के मुंह पर एक डोरी बांध दी. इस के बाद  उस ने लाश गाड़ी में रखी और उसे ठिकाने लगाने के लिए रवाना हो गई. कीसले में इतनी ताकत थी कि बिना किसी की मदद के वह सब कुछ कर सकती थी. अगर ऐसा न होता तो उसे लाश के टुकड़े करने पड़ते.

पति की हत्या के बाद कीसले ने कंप्यूटर खोल कर नेट के जरिए ये मालूम किया कि लाश ठिकाने लगाने का बेहतरीन तरीका क्या है? उसे पता चला कि लाश दफन करने के बाद अगर उस पर तेजाब छिड़क दिया जाए तो वह जल्दी गल जाती है.

अब सवाल यह था कि लाश को कहां दफन करे? उसे याद आया कि कुछ साल पहले उस के शौहर ने एक प्लाट लेने का इरादा किया था. पर कीमत पर बात नहीं बन पाई थी और वह जमीन नहीं ले सका था.

वह जगह जंगल के किनारे बिलकुल सुनसान थी. वहां लाश के देख लिए जाने के चांसेज न के बराबर थे. लिहाजा वह बाजार जा कर वहां से लाश ठिकाने लगाने का जरूरी सामान ले आई.

रात गए उस ने अपनी गाड़ी निकाली और लाश को उसी जगह ले जा कर दफन कर दिया, वापस आते हुए उस ने रास्ते में गैस स्टेशन के पीछे कचरा घर में बेलचा, चश्मा और तेजाब की बोतल वगैरह फेंक दी.

‘‘दरअसल किसले ने सोचा था कि सब लोग यही समझेंगे कि नारमन गिरफ्तारी और बदनामी से बचने के लिए कहीं छिप गया है. किसी को इस बात का शक भी नहीं होगा कि उस की परेशान बीवी ने उसे मार डाला है. ऐसे केस में बीवी के मारने का खयाल भी किसी के दिल में नहीं आता, पर किस्मत ने उस का साथ नहीं दिया.

कीसले को ले कर हम पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचे, जहां उस का वकील इंतजार में बैठा था. वह एक बड़ा महंगा और काबिल वकील था. पर जब उसे मालूम हुआ कि कीसले बयान दे चुकी है और उस ने जुर्म भी कुबूल कर लिया है, तो  उस ने उस के मुकदमे की पैरवी करने से साफ इनकार कर दिया. रेमंड जानते थे कि ऐसी स्थिति में कोई भी वकील उस का केस नहीं लेगा. इसलिए उन्होंने उस के लिए सरकारी वकील का इंतजाम कर दिया.

इस दौरान हम ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर के रेमंड के औफिस में जमा कर दी. उसे देख कर रेमंड ने कहा, ‘‘तुम दोनों मेरी बुद्धिमत्ता की दाद दो कि मैं ने कैसे आउट औफ वे जा कर तुम दोनों को यहां बुला लिया.’’

इस पर मोंक ने हंसते हुए कहा, ‘‘इस में आप की बीवी की मरजी भी शामिल है, क्योंकि वह मेरी तफ्तीश और मुजरिम पकड़ने की योग्यता से बहुत प्रभावित हैं. वैसे हमें अपने साथ रखने से आप भी तो फायदे में हैं. अब आप को कत्ल की खबर से पहले ही कातिल मिल जाएंगे.’’ कमरे में हम तीनों का कहकहा गूंज उठा. Detective Story in Hindi

— मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित

MP Murder Mystery : जंगल में मंगल के लिए मर्डर 

MP Murder Mystery. आनंद प्रियंका को जंगल में मंगल मनाने के लिए ले गया था, लेकिन उस के विरोध की वजह से वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका. इस के बाद ऐसा क्या हुआ कि आनंद को प्रियंका का मर्डर करना पड़ा.

मध्य प्रदेश के जिला बैतूल की परसी सतपुड़ा की पहाडि़यों में दूरदूर तक फैली वनसंपदा और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए तैनात फौरेस्ट औफिसर दिनरात जंगल पर पैनी नजर रखते हैं. इस के लिए वे जंगल में गश्त करते रहते हैं. 16 नवंबर, 2015 को भी रोज की तरह फौरेस्ट औफिसर एम.एस. राणा और डिप्टी रेंज फौरेस्ट औफिसर अजीत ठाकुर भौंरा बीट इलाके में सघन चेकिंग अभियान के लिए गश्त पर निकले थे.

अधिकारियों की यह टीम घने जंगल में सूखी नदी ढाबे के सामने वाले जंगल में गश्त कर रही थी, तभी मुख्यमार्ग से लगभग 200 मीटर अंदर उन्हें एक मानव कंकाल पड़ा दिखाई दिया. मानव कंकाल का इस तरह मिलना गंभीर मामला था, इसलिए उन्होंने इस बात की सूचना तुरंत थाना शाहपुरा पुलिस को दे दी. सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी राजेंद्र दुर्बे मौके पर पहुंचे और उस मानव कंकाल को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि कंकाल किसी 25-26 साल की युवती का था, जिस की मौत लगभग एक महीने पहले हुई थी. कंकाल के सिर की हड्डियां बुरी तरह से टूटी हुई पाई गई थीं, इसलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट में युवती की हत्या की आशंका व्यक्त की गई थी.

दूसरी ओर कंकाल मिलने की सूचना जब बैतूल के एसपी राकेश जैन को मिली तो उन्होंने इस बात को गंभीरता से लिया और मामले की तह तक पहुंचने के लिए थाना शाहपुरा पुलिस को इस मामले की गंभीरता से जांच का आदेश दिया.

आगे की जांच के लिए मृतका की पहचान जरूरी थी, जो इतनी आसान नहीं थी. लेकिन संयोग से जैसे ही जंगल में युवती के कंकाल के मिलने की खबर अखबारों में छपी, सारणी के शोभापुरी कालोनी का रहने वाला प्रदीप थाना शाहपुरा पहुंचा और थानाप्रभारी राजेंद्र दुर्बे से मिल कर बताया कि उस की 27 वर्षीया बहन प्रियंका पिछले साल 10 अक्तूबर, 2015 से लापता है. उस ने थाने में उस की गुमशुदगी भी दर्ज करा रखी है.

पुलिस ने प्रदीप को कंकाल के पास से मिले कपड़े और दूसरी अन्य चीजें दिखाईं तो उस ने उस सामान की पहचान अपनी बहन प्रियंका के सामान के रूप में कर दी. इस का मतलब जंगल में मिला मानव कंकाल उस की बहन प्रियंका का था.

प्रदीप ने पुलिस को बताया था कि उस की बहन प्रियंका पहले इंदौर में नौकरी करती थी. लेकिन कुछ दिनों बाद वह नौकरी छोड़ कर घर आ गई थी. 10 अक्तूबर को वह कोई प्रतियोगी परीक्षा देने भोपाल गई थी. उसे उसी दिन लौट आना था, लेकिन वह लौट कर नहीं आई.

उस ने मोबाइल पर संपर्क करना चाहा, लेकिन काफी कोशिश के बाद भी संपर्क नहीं हो सका. रात करीब साढ़े 10 बजे प्रियंका का फोन आया कि वह बुधनी के जंगल में है. वह वहां कैसे पहुंची और क्या कह रही, प्रदीप यह पूछना चाहता था. लेकिन उस के सवाल करने से पहले ही फोन कट गया.

उस ने पलट कर फोन किया तो उस का स्विच औफ हो चुका था. जब उस का फोन भी नहीं लगा और न वह लौट कर आई तो प्रदीप अपने घर वालों के साथ तीन दिनों तक जंगल में उस की तलाश करता रहा. जब प्रियंका का कुछ पता नहीं चला तो 14 अक्तूबर, 2015 को उस ने थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी.

प्रदीप के अनुसार, प्रियंका का कंकाल उस की गुमशुदगी के लगभग 40 दिनों बाद मिला था. शिनाख्त होने के बाद जांच में तेजी आ गई. जांच को आगे बढ़ाने के लिए थाना शाहपुरा पुलिस ने सब से पहले प्रियंका के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि जिस रात प्रियंका लापता हुई थी. उस दिन शाम के 5 बजे से रात के 1 बज कर 39 मिनट तक उस के नंबर पर लगातार एक मोबाइल नंबर से बातें हुई थीं.

पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह मंडीदीप के पास इंडस टाउन के रहने वाले अनिल का निकला. पुलिस ने अनिल को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस से पुलिस को कोई खास जानकारी नहीं मिली. पुलिस ने प्रियंका के घर वालों से पूछताछ की तो उन का कहना था कि वे अनिल को नहीं जानते. लेकिन प्रियंका की लगातार उस से फोन पर बात हुई थी.

इस का मतलब अनिल और प्रियंका में कोई न कोई संबंध जरूर था. लेकिन पूछताछ और जांच के बाद पुलिस ने अनिल को निर्दोष पाया तो उसे क्लीनचिट दे दी थी.

इस के बाद प्रियंका की हत्या का मामला ठंडे बस्ते में चला गया. लेकिन 7 महीने बाद अचानक प्रियंका का लापता मोबाइल इटारसी के रेलवे स्टेशन इलाके में चालू हो गया तो आरोपी को पकड़ने के लिए भौंरा चौकीप्रभारी कमलेश रघुवंशी, हैडकांस्टेबल शंकर मीणा, सिपाही पूनम तिवारी और गजराज को ले कर इटारसी रेलवे स्टेशन के आसपास की खाक छानने लगे.

काफी मेहनत के बाद यह पुलिस टीम उस आदमी तक पहुंच गई, जिस के पास प्रियंका का मोबाइल फोन था, उस का नाम आनंद तिवारी उर्फ रामस्वरूप चंडाल था. पूछताछ में उस ने बताया था कि वह मूलरूप से सागर जिले के बीना के पास बसे गुनगा गांव का रहने वाला था. इस समय वह इटारसी में रह रहा था.

पहले तो आनंद ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि प्रियंका के साथ जबरदस्ती करने के चक्कर में उस ने प्रियंका की हत्या कर दी थी.

इस की वजह यह थी कि प्रियंका ने उस के साथ संबंध बनाने से मना तो किया ही, बाद में पुलिस में शिकायत करने की धमकी दे दी थी, इसीलिए भारी पत्थर से सिर कुचल कर उस ने उस की हत्या कर दी थी.

इस के बाद थाना शाहपुर पुलिस ने आनंद की निशानदेही पर झाडि़यों से खून सना वह पत्थर बरामद कर लिया था, जिस से प्रियंका की हत्या की की गई थी. पूछताछ में आनंद ने प्रियंका की हत्या की जो कहानी सुनाई थी, इस प्रकार थी.

10 अक्तूबर, 2015 की शाम आनंद इटारसी जाने के लिए भोपाल रेलवे स्टेशन पर खड़ा था, तभी उस की नजर प्रियंका पर पड़ी. प्रियंका को अकेली देख कर उस ने उस से बात करने की कोशिश की तो ऐतराज करने के बजाय प्रियंका जल्दी ही उस से खुल गई. प्रियंका को सारणी जाना था, इसलिए आनंद ने उस से अपने साथ इटारसी चलने को कहा.

उस ने उस से कहा कि वहां से वह उसे सड़क के रास्ते उस के घर पहुंचा देगा. प्रियंका उस के साथ जाने को तैयार हो गई. इस की वजह यह थी कि उस समय बैतूल जाने के लिए वहां कोई सीधी ट्रेन नहीं थी. आनंद उसे इटारसी ले आया और वहां से उसे 4 पहिया वाहन से ले कर भौंरा स्थित सूखी नदी ढाबे पर पहुंचा.

दोस्त से मिलने के बहाने आनंद ने प्रियंका को गाड़ी से उतार लिया और जंगल के अंदर ले गया, जहां उस ने प्रियंका से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. आनंद की इस हरकत पर वह भड़क उठी. आनंद ने उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की, लेकिन उस के विरोध की वजह से वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका.

अंत में आनंद ने हार मान ली और अपने कपड़े पहनने लगा. तभी प्रियंका ने पुलिस में शिकायत करने की धमकी दी तो वह डर गया. उसे लगा कि अब इसे खत्म कर देने में ही भलाई है, इसलिए उस ने वहीं पड़ा एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस के सिर पर पटक कर उस की हत्या कर दी. प्रियंका की हत्या कर के वह उस का मोबाइल और अन्य सामान ले कर इटारसी चला गया.

घटना के 8-9 महीने बीत जाने के बाद आनंद को लगा कि पुलिस को इस हत्या के बारे में कुछ पता नहीं चला है, इसलिए उस ने प्रियंका का मोबाइल चालू कर लिया. तब उसे पता नहीं था कि उस की यह गलती उसे इतनी भारी पड़ जाएगी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने आनंद तिवारी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

Kanpur Crime Case : अपनों के दिया जखम

Kanpur Crime Case. साढ़ू का भाई होने के नाते धरमपाल सिंह प्रकाश का बड़ा मानसम्मान करते थे. घर आनेजाने में जब प्रकाश को लगा कि धरमपाल के पास बहुत पैसा है तो उस ने उन से पैसा वसूलने के लिए उन के एकलौते बेटे का अपहरण  कर हत्या कर दी. लेकिन जिस पैसे के लिए उस ने यह सब किया, क्या वह उसे मिला?

कानपुर दक्षिण के मोहल्ला किदवईनगर के वाई-1 ब्लौक में रहने वाली कुसुमलता का 11 साल का बेटा आशुतोष उर्फ आशु श्वेता द्विवेदी के यहां से ट्यूशन पढ़ कर नहीं लौटा तो उन्होंने अपनी बेटी तान्या को उस के बारे में पता करने भेजा. पता चला कि आशुतोष पढ़ने तो गया था, लेकिन पेनपेंसिल भूल जाने की बात कह कर उन के यहां से निकला तो लौट कर नहीं आया.

तान्या ने यह बात मां को बताई तो कुसुमलता घबरा गईं, क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. आशुतोष इतनी देर कभी घर के बाहर नहीं रहा था. उन्होंने तुरंत पति को फोन कर के घर आने को कहा. उन के पति धरमपाल सिंह पंजाब नेशनल बैंक की चकेरी शाखा में मैनेजर थे. अब तक आशुतोष के गायब होने की खबर पूरे मोहल्ले में फैल चुकी थी, इसलिए उन के घर मोहल्ले वालों की भीड़ लग गई.

धरमपाल सिंह जैसे ही घर पहुंचे, उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. उन्होंने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘मैनेजर साहब, मेरी बात ध्यान से सुनिए. मैं ने तुम्हारे बेटे आशुतोष का अपहरण कर लिया है. अगर अपने बेटे की सहीसलामत वापसी चाहते हैं तो 25 लाख रुपए का इंतजाम कर लीजिए.’’

इतना कह कर फोन काट ही नहीं दिया गया, बल्कि बंद कर दिया गया. आशुतोष के अपहरण की बात सुन कर सभी घबरा गए. कुसुमलता तो जोरजोर से रोने लगी. धरमपाल ने पत्नी को धैर्य बंधा कर 100 नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना दी तो थोड़ी ही देर में थाना नौबस्ता के थानाप्रभारी राजीव द्विवेदी, इंसपेक्टर अजय प्रताप सिंह, सीओ (गोविंदनगर) विशाल पांडेय तथा एसपी (दक्षिण) संजय कुमार यादव पुलिस बल के साथ धरमपाल सिंह के घर आ पहुंचे. यह 8 जून, 2016 की शाम की बात है.

पुलिस पूरी रात धरमपाल सिंह, उन के घर वालों तथा आशुतोष को ट्यूशन पढ़ाने वाली श्वेता द्विवेदी से पूछताछ करती रही. पुलिस ने धरमपाल सिंह के घर और श्वेता द्विवेदी के घर के बीच लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी. फुटेज में सिर्फ सफेद रंग की एक एसेंट कार जरूर दिखाई दी, लेकिन अपहर्ताओं के बारे में कोई जानकारी हासिल नहीं हो सकी.

अपहर्ताओं ने रात सवा 7 बजे तथा साढ़े 11 बजे भी फोन कर के धरमपाल को धमकाते हुए फिरौती की रकम मांगी, लेकिन यह नहीं बताया कि रकम कब, कहां और कैसे पहुंचानी है. अगले दिन सुबह सवा 10 बजे अपहर्ताओं ने फोन कर के धरमपाल से कहा कि मीडिया और पुलिस को सूचना दे कर उन्होंने ठीक नहीं किया. अब वह अंजाम भुगतने को तैयार रहें. यह सुन कर धरमपाल रो पड़े.

पुलिस अधिकारियों ने उन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा कि वह अपहर्ताओं की धमकी से बिलकुल न डरें. पुलिस उन के बेटे को सहीसलामत वापस लाएगी. इस के बाद धरमपाल की तहरीर पर थाना नौबस्ता में आशुतोष के अपहरण का मुकदमा अज्ञात अपहर्ताओं के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

आशुतोष के अपहरण की खबर अखबारों की सुर्खियां बनीं. एक बैंक अधिकारी के बेटे के अपहरण का मामला था, इसलिए एसएसपी शलभ माथुर ने आशुतोष को सहीसलामत बरामद करने तथा अपहर्ताओं को गिरफ्तार करने के लिए एक हाईटेक पुलिस टीम बनाई, जिस में शहर के 4 एसपी, 6 सीओ और 30 तेजतर्रार दारोगाओं को शामिल किया गया. टीम के सहयोग के लिए एसटीएफ, क्राइम ब्रांच एवं सर्विलांस टीम को भी लगाया गया.

इस पुलिस टीम ने घर वालों, ट्यूशन पढ़ाने वाली श्वेता द्विवेदी से जहां घंटों पूंछतांछ की, वहीं सर्विलांस टीम अपहर्ताओं के उस नंबर के बारे में पता करने लगी, जिस से फिरौती के लिए फोन किए गए थे.

पता चला कि सिम शिवली से फर्जी आईडी पर लिया गया था और पहले दिन फोन फतेहपुर से किया गया था. दूसरे दिन जो फोन किया गया था, उस की लोकेशन किसाननगर के आसपास की थी. पुलिस ने मेहनत तो बहुत की, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.  अपहर्ताओं ने फर्जी आईडी से सिम और मोबाइल खरीदे थे, इसलिए पुलिस ने अकबरपुर कस्बा स्थित प्री ऐक्टिवेटेड सिम के डिस्ट्रीब्यूटर सर्वेश कम्युनिकेशन के मालिक सर्वेश उर्फ अनुज को थाने ला कर ऐसे रिटेलरों के बारे में जानकारी ली, जिन्हें उस ने प्री ऐक्टिवेटेड सिम दिए थे.

इस के बाद पुलिस ने उन सभी रिटेलरों को थाने ला कर पूछताछ की तो उन में से एक रिटेलर बंटी उर्फ रोहित सिंह, जिस की अकबरपुर में माती रोड पर संजयनगर में बंटी टेलीकौम के नाम से दुकान थी, उस ने पुलिस को कुछ लोगों के नाम बताए, जिन्हें उस ने प्री ऐक्टिवेटेड सिम दिए थे.

उन में से एक प्रकाश भी था, जो धरमपाल के साढ़ू का भाई था और अकबरपुर कोतवाली के पास एक दारोगा के मकान में किराए पर अपनी पत्नी रौनक के साथ रहता था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की. लेकिन कोई सुराग न मिलने की वजह से उसे छोड़ दिया.

इस की एक वजह यह भी थी कि घर वालों ने उस पर शक जाहिर नहीं किया था. इसी तरह 5 दिन बीत गए, पुलिस कुछ नहीं कर सकी. इस बीच अपहर्ताओं ने फोन करने बंद कर दिए, जिस से उन तक पहुंचना और कठिन हो गया. लेकिन शलभ माथुर रातदिन एक किए हुए थे.

धरमपाल सिंह, उन की पत्नी कुसुमलता और बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. अब उन का पुलिस से विश्वास उठने लगा था. दिन बीतने के साथ कुसुमलता की मानसिक हालत बिगड़ती जा रही थी. अब तक मिली असफलता से पुलिस को लगा कि धरमपाल का कोई करीबी अपहरण में शामिल है, जो हमदर्दी जता कर धरमपाल के घर से पलपल की जानकारी ले रहा है.

जब पुलिस ने इस बारे में धरमपाल तथा उन के घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि कुसुमलता की बहन सुमनलता का देवर प्रकाश और उस की पत्नी रौनक रोज हमदर्दी जताते हुए कभी सुमनलता से तो कभी धरमपाल की बेटियों से पुलिस काररवाई के बारे में पता करते थे.

दरअसल, कुसुमलता का बहनोई सिद्धार्थ, जो बीएसएफ में था, आशुतोष के अपहरण की खबर पा कर 3 दिन पहले कानपुर आ गया था. वह पत्नी सुमनलता के साथ धरमपाल के घर ही ठहरा था. प्रकाश और रौनक भाभी सुमनलता को फोन कर के हमदर्दी जताते हुए घर की गतिविधियों तथा पुलिस काररवाई के बारे में पता कर लेते थे.

प्रकाश और रौनक पर पुलिस को शक हुआ तो पुलिस ऐक्शन में आ गई. 17 जून, 2016 की सुबह साढ़े 3 बजे पुलिस टीम ने थाना अकबरपुर कोतवाली पुलिस तथा एसपी (देहात) पुष्पांजलि की मदद से प्रकाश के घर छापा मारा. पुलिस फोर्स देख कर प्रकाश कांप उठा और डर की वजह से उस ने दरवाजा नहीं खोला. पुलिस दरवाजा तोड़ कर प्रकाश और उस की पत्नी रौनक को गिरफ्तार कर अकबरपुर कोतवाली ले आई.

अकबरपुर कोतवाली में जब पुलिस ने प्रकाश और रौनक से पूछताछ की तो डर की वजह से प्रकाश ने पैसों के लिए आशुतोष का अपहरण करने और उस के द्वारा पहचान लिए जाने पर उस की हत्या करने का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि अपहरण और हत्या के इस मामले में उस की पत्नी रौनक, गौरैयापुर निवासी उस की महिला मित्र संध्या की मां सुनीता, दोस्त शेरा, विशाल और अतीक शामिल थे. गौरैयापुर के प्रधान रामबाबू को भी इस अपहरण की जानकारी थी और उस ने मदद भी की थी.

आशुतोष की हत्या हो जाने की बात सुन कर पुलिस सकते में आ गई. इस के बाद पुलिस टीम ने प्रकाश की निशानदेही पर शेरा और विशाल को अकबरपुर की पुलिस लाइन के एक क्वार्टर से तथा सुनीता को गौरैयापुर स्थित उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. जबकि अतीक और ग्रामप्रधान रामबाबू घर से फरार हो गए थे, इसलिए पकड़े नहीं जा सके.

पूछताछ में प्रकाश, शेरा और विशाल ने बताया कि उन लोगों ने 10 जून को ही आशुतोष की गला घोंट कर हत्या कर दी थी और शव को बलाई के जंगल के पास एक पुलिया के नीचे फेंक दिया था. उन की पोल न खुल जाए, इसलिए रात में उस पर पैट्रोल डाल कर जला दिया था, जो जलने से बच गया था, उसे समेट कर सेंगुर नदी में फेंक दिया था.

पुलिस अभियुक्तों को ले कर 20 किलोमीटर दूर बलाई के जंगल के पास स्थित पुलिया पर पहुंची तो वहां जलाए जाने के निशान मिले. वहां एक लीटर की प्लास्टिक की बोतल भी मिली, जिस में पैट्रोल लाया गया था. फौरेंसिक टीम ने जलाए जाने के स्थान से मिट्टी का नमूना सुरक्षित कर लिया.

इस के बाद पुलिस ने अपहरण व हत्या में प्रयुक्त प्रकाश की एसेंट कार तथा मोटरसाइकिल बरामद कर ली. उस के घर से टूटा हुआ वह मोबाइल फोन और सिम भी बरामद कर लिए गए, जिन का उपयोग फिरौती मांगने के लिए किया गया था.

इस के बाद पुलिस अभियुक्तों को थाना नौबस्ता ले आई. चूंकि अभियुक्तों ने अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए पुलिस ने प्रकाश, शेरा, विशाल, अतीक, रामबाबू, रौनक तथा सुनीता के खिलाफ आशुतोष के अपहरण एवं हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. प्रकाश द्वारा बेटे के अपहरण और हत्या की जानकारी मिलने पर धरमपाल सिर पकड़ कर बैठ गए. जब उन्होंने पत्नी से कहा कि अब वह उन के आशु को वापस नहीं ला सकते तो यह सुन कर कुसुमलता बेहोश हो कर गिर पड़ी. इस के बाद तो घर में कोहराम मच गया.

पासपड़ोस के लोग भी आ गए. चीखपुकार सुन कर सब समझ गए कि आशुतोष की हत्या हो चुकी है. वहां आए सभी लोगों की आंखें नम हो गईं. पुलिस जांच एवं अभियुक्तों के बयानों के आधार पर आशुतोष के अपहरण और हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

कानपुर (दक्षिण) में थाना नौबस्ता का एक मोहल्ला है किदवाईनगर. इसी मोहल्ले के वाई-1 ब्लौक में धरमपाल सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कुसुमलता के अलावा 3 बेटियां और एकलौता बेटा आशुतोष उर्फ आशु था. धरमपाल सिंह पंजाब नेशनल बैंक की चकेरी शाखा में मैनेजर थे. उन की आर्थिक स्थिति काफी ठीकठाक थी.

आशुतोष 3 बेटियों के बाद पैदा हुआ था, इसलिए वह घर भर का दुलारा था. धरमपाल सिंह खुद पढ़ेलिखे थे, इसलिए वह बेटे आशुतोष को भी पढ़ालिखा कर किसी काबिल बनाना चाहते थे.

यही वजह थी कि उन्होंने आशुतोष का एडमीशन क्षेत्र के चर्चित सुभाष पब्लिक स्कूल में कराया था. इस साल वह छठवीं में पढ़ रहा था. पड़ोस में रहने वाली श्वेता द्विवेदी के घर वह ट्यूशन भी पढ़ने जाता था.

कुसुमलता की छोटी बहन सुमनलता की शादी कानपुर देहात के कस्बा अकबरपुर के रहने वाले धनीराम के बेटे सिद्धार्थ के साथ हुई थी. सिद्धार्थ बीएसएफ में नौकरी करते थे. धनीराम कानपुर देहात पुलिस लाइन में हैड कांस्टेबल थे. वह रिटायर हुए तो कानपुर के जरौली में मकान बनवा कर रहने लगे.

उन के 5 बेटों में प्रकाश सब से छोटा था. वह उन का बिगड़ैल बेटा था. उस का मन पढ़ाई में कम खुराफात में ज्यादा लगता था. उस ने जैसेतैसे इंटर पास कर के पढ़ाई छोड़ दी. इसी बीच उस की मुलाकात रौनक से हुई.

रौनक कस्बा अकबरपुर के मोहल्ला नयागंज की रहने वाली थी. उन की यह मुलाकात प्यार में बदली तो सन 2013 में घर वालों की मर्जी के बिना दोनों ने प्रेमविवाह कर लिया. इस बात से नाराज हो कर धनीराम ने प्रकाश को घर से निकाल दिया. वह अकबरपुर आ गया और अंबेडकरनगर में रामऔतार संखवार का मकान किराए पर ले कर रौनक के साथ रहने लगा.

दोनों ही महत्वाकांक्षी थे, इसलिए पैसों के लिए वे जुआ और सट्टे का धंधा करने के साथसाथ ब्याज पर भी पैसे देने लगे. कुछ समय बाद प्रकाश पुरानी गाडि़यों के खरीदनेबेचने का भी धंधा करने लगा. उस के पास स्वयं की एसेंट कार और मोटरसाइकिल थी. वह ठाठबाट से रहता था, इसलिए आसपड़ोस के लाग उसे सभ्य और धनाढ्य समझते थे.

रिश्तेदारी होने की वजह से प्रकाश और रौनक बैंक मैनेजर धरमपाल के घर भी आतेजाते थे. चूंकि प्रकाश बहन का देवर था, इसलिए कुसुमलता दोनों का खूब आदरसत्कार करती थी. आतेजाते आशुतोष भी प्रकाश और रौनक से घुलमिल गया था. वह उसे चाचू कहता था.

जनवरी, 2016 में धरमपाल ने प्रकाश से कुछ पैसा जमीन में इनवैस्ट करने को कहा तो उस ने अकबरपुर में उन्हें 6 लाख रुपए में एक प्लौट दिला दिया. इस से प्रकाश को लगा कि धरमपाल के पास बहुत पैसा है. उन से कैसे पैसा वसूला जाए, इस बात पर प्रकाश ने विचार किया तो उस के दिमाग में आया, क्यों न धरमपाल के 11 साल के बेटे आशुतोष का अपहरण कर फिरौती वसूली जाए.

इस के लिए उस ने अपने साथी शेरा, विशाल, अतीक, सुनीता और रौनक से बात की तो सभी साथ देने को तैयार हो गए. शेरा और विशाल पुलिस लाइन स्थित सर्विस क्वार्टर में रहते थे, क्योंकि इन के पिता वहां नौकरी करते थे. हीरागंज निवासी अतीक प्रकाश का बचपन का दोस्त था. वह उस के साथ गाडि़यों की खरीदफरोख्त का काम करता था.

गौरैयापुर निवासी सुनीता को प्रकाश ने 50 हजार रुपए देने का वादा किया था, जिस से वह बच्चे को अपने घर में रखने को राजी हो गई थी. इस के बाद अतीक और प्रकाश ने अपने दोस्त बंटी से 3 सिम और 3 चाइना मौडल हैंडसेट मोबाइल फोन ढाई हजार में खरीदे. सारी तैयारी कर के प्रकाश ने जून के प्रथम सप्ताह में धरमपाल के घर की रेकी शुरू कर दी.

वह पता लगाने लगा कि धरमपाल घर से कब निकलते हैं, कब वापस आते हैं? आशुतोष घर से कब ट्यूशन पढ़ने जाता है. उस समय उस के साथ कौन होता है? रेकी करने के बाद 7 जून को प्रकाश शेरा और अतीक के साथ अपनी एसेंट कार से आया और आशुतोष के ट्यूशन जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो गया. लेकिन उस दिन आशुतोष ट्यूशन पढ़ने गया ही नहीं, जिस से उस की योजना फेल हो गई.

8 जून, 2016 की शाम को भी 3 बजे प्रकाश अपने साथी शेरा और विशाल के साथ एसेंट कार से आया और आशुतोष के ट्यूशन पढ़ने जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो गया. लगभग साढ़े चार बजे आशुतोष अपनी बहन के साथ आता दिखाई दिया. बहन उसे श्वेता द्विवेदी के घर छोड़ कर चली गई. तान्या के जाने के कुछ देर बाद आशुतोष घर की ओर भागता दिखाई दिया तो प्रकाश और उस के साथियों ने उसे पकड़ कर कार में डाला और भाग निकले.

गाड़ी में बैठते ही आशुतोष ने कार चला रहे प्रकाश को पहचान कर कहा, ‘‘चाचू, हमें कहां ले जा रहे हो?’’

प्रकाश मुंह पर अंगौछा बांधे था, इस के बावजूद आशुतोष के पहचान लेने पर प्रकाश, शेरा और विशाल सन्न रह गए. उसी समय उन्होंने उसे मौत के घाट उतारने का निश्चय कर लिया. अकबरपुर पहुंचने के पहले ही शेरा और विशाल ने 3 बार धरमपाल को फिरौती के लिए फोन किया. अगले दिन अतीक ने मुंबइया स्टाइल में धरमपाल को फोन कर के धमकाया.

प्रकाश ने रात को आशुतोष को अपने घर रखा. आशुतोष ने उस से पूछा कि वह उसे वहां क्यों लाया है तो प्रकाश ने कहा, ‘‘तुम्हारे पापा से कुछ पैसे लेने हैं. वह पैसे ले कर आएंगे तो तुम्हें ले जाएंगे.’’

प्रकाश की इस बात से आशुतोष संतुष्ट हो गया. रौनक ने उसे खाना दिया, लेकिन उस ने खाना नहीं खाया, केवल बिस्कुट और चिप्स खाए. 9 जून को प्रकाश ने आशुतोष को अपने साथियों की मदद से अपनी महिला मित्र संध्या की मां सुनीता के घर गौरैयापुर पहुंचा दिया. उस ने सुनीता से कहा था कि वह आशुतोष को परेशान नहीं करेगी.

ग्रामप्रधान रामबाबू को बच्चे के संबंध में जानकारी हुई तो उस ने विरोध किया. लेकिन अपहर्ताओं ने उसे लालच दे कर जुबान बंद रखने के लिए राजी कर लिया. पुलिस की तेजी देख कर प्रकाश और उस के साथियों को पकड़े जाने का डर सताने लगा तो उन्होंने मासूम आशुतोष की हत्या करने का निश्चय कर लिया.

10 जून की दोपहर प्रकाश, शेरा, विशाल और अतीक गौरैयापुर पहुंचे और आशुतोष को अपनी एसेंट कार में बैठा कर अकबरपुर की ओर चल पड़े. कार में बैठते ही आशुतोष रोने लगा तो प्रकाश ने उसे थप्पड़ मार दिया. इस पर उस ने कहा, ‘‘मुझ क्यों रहे हो चाचू? आप जितना पैसा कहेंगे, मैं पापा से दिलवा दूंगा.’’

इस पर भी प्रकाश का दिल नहीं पसीजा और उसी समय चलती कार में विशाल ने आशुतोष के गले में दुपट्टा डाल कर कस दिया तो उस की मौत हो गई.

इस के बाद लाश ले जा कर बलाई के जंगल की पुलिया के नीचे फेंक दिया. लाश को नष्ट करने के लिए रात में पैट्रोल डाल कर जला दिया और राख ले जा कर सेंगुर नदी में फेंक दिया. प्रकाश ने सिम और मोबाइल तोड़ कर अपने घर में छिपा दिए.

जहां लाश जलाई गई थी, वहां से कुछ दूरी पर पुलिस को एक खोपड़ी मिली है. पुलिस को लगा कि यह खोपड़ी आशुतोष की हो सकती है. लेकिन एक्सरे रिपोर्ट में खोपड़ी किसी 30 साल के आदमी की निकली. पुलिस खोपड़ी का डीएनए टेस्ट कराना चाहती है. अगर डीएनए टेस्ट धरमपाल से मिल गया तो अभियुक्तों को सजा दिलाने में पुलिस को मदद मिलेगी.

पूछताछ एवं सारे साक्ष्य जुटा कर 18 जून को थाना नौबस्ता पुलिस ने अभियुक्तों प्रकाश, शेरा, विशाल, रौनक और सुनीता को कानपुर की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक अभियुक्त अतीक, रामबाबू फरार थे.  Kanpur Crime Case

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Alwar Murder Case : बेरहम हत्यारा

Alwar Murder Case. राजस्थान के अलवर शहर में अलगअलग समय और अलगअलग स्थानों पर मानव अंग मिलने से सनसनी फैल गई थी. लोगों को लगा कि यह किसी सनकी हत्यारे का काम है, लेकिन जब पुलिस ने जांच की तो पूरी कहानी सामने आ गई…

उस दिन दिवाली थी और तारीख थी 30 अक्तूबर, 2016. शाम होते ही अलवर शहर जगमगाने लगा था. हर घर रोशन हो चुका था. चौराहे और इमारतें सजावट की रोशनी से झिलमिला रही थीं. रात गहराते ही शहर की गलीमोहल्लों में पटाखे चलने लगे थे. आसमान में आतिशबाजी की सतरंगी छटा बिखरी हुई थी. दिवाली के मौके  पर कानूनव्यवस्था एवं शांति बनाए रखने के लिए पुलिस के जवान शहर में गश्त कर रहे थे.

रात करीब पौने 12 बजे का समय रहा होगा, जब शहर कोतवाली थाने की पुलिस को सूचना मिली कि स्कीम नंबर-1 आर्यनगर में कबूतर पार्क के पास किसी का कटा हुआ पैर पड़ा है, जिसे कुत्ते नोच रहे हैं. कबूतर पार्क कोतवाली से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर था. पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची तो वहां जांघ तक कटा एक अधजला पैर 2 पौलीथिन में बंधा हुआ पड़ा मिला. पैर से दुर्गंध नहीं आ रही थी, लेकिन यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि इस पैर को कब काटा गया था.

अलबत्ता यह जरूर पता चल गया था कि वह किसी का दाहिना पैर है. पैर की अंगुलियों में बिछिया थीं. नाखूनों पर नेल पौलिश लगी थी. इस से पुलिस को यह विश्वास हो गया कि पैर किसी महिला का है.

पुलिस ने आसपास पूछताछ की, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. इस के बाद कानूनी काररवाई कर के पैर को राजीव गांधी सामान्य अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया गया. उसी रात शहर कोतवाली में इस मामले की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. पैर पौलीथिन की जिन 2 थैलियों में रखा था, उन्हें पुलिस ने जब्त कर लिया था. इन थैलियों में एक थैली पर ‘सांगानेरी हाउस’ स्पैशलिस्ट इन ट्रैडिशनल सूट्स, ब्लौक प्रिंटिंग टाई डाई आयटम्स, तिलक मार्केट, अलवर लिखा था.

अगले दिन 31 अक्तूबर को गोवर्धन पूजा थी. बाजारों में सुबह से ही चहलपहल शुरू हो गई थी. इसी बीच सुबह करीब 9.50 बजे कोतवाली थाना पुलिस को फोन पर सूचना मिली कि चावंड पाड़ी मोहल्ले में एक कटा हुआ हाथ पड़ा है. खबर मिलते ही थानाप्रभारी राम सिंह मौके पर जा पहुंचे. वहां विनोद झालानी के मकान के सामने सड़क पर एक कटा हुआ हाथ पड़ा मिला. यह दाहिना हाथ था.

पुलिस इस सिलसिले में पूछताछ कर ही रही थी कि तभी थानाप्रभारी के साथ गए सिपाहियों को वहां से थोड़ी दूरी पर चावंड माता के मंदिर के पास वाले गंदे नाले के पास कटा हुआ एक और हाथ नजर आया. यह बायां हाथ था. उस हाथ को कुत्तों ने नोच डाला था.

50 मीटर की दूरी में कटे हुए 2 मानव हाथ मिलने और इस से 9-10 घंटे पहले एक महिला का पैर मिलने से पुलिस को शक हुआ कि बाकी मानव अंग भी आसपास हो सकते हैं. कोतवाली प्रभारी राम सिंह ने मौके से ही एसपी राहुल प्रकाश और अन्य अधिकारियों को इस मामले की जानकारी दे दी. कटे हुए 2 हाथ और एक पैर मिलने से एसपी को यह अंदाजा हो गया कि किसी महिला की हत्या की गई है और उस के अंग काट कर शहर में अलगअलग जगहों पर फेंक दिए गए हैं.

एसपी ने मामले की गंभीरता को समझते हुए एडिशनल एसपी पारस जैन और सीओ (उत्तर) जय सिंह नाथावत को मौके पर भेजा. इन पुलिस अधिकारियों ने वहां पहुंच कर जांचपड़ताल की, साथ ही आसपास के लोगों से पूछताछ भी की. लेकिन न तो हाथपैर की शिनाख्त हुई और न ही यह पता चला कि कटे हाथ कब फेंके गए थे.

इसी दौरान पुलिस को एक और सूचना मिली. इस सूचना में बताया गया था कि स्कीम नंबर-1 आर्यनगर के मकान नंबर-231 के सामने सड़क पर कटा हुआ एक पैर पड़ा है. पुलिस अधिकारियों ने चावंड पाड़ी में मिले दोनों कटे हाथ जब्त कर के सामान्य अस्पताल की मोर्चरी में रखवाने के लिए भेज दिए और वहां से स्कीम नंबर-1 चले गए.

वहां अनिल गुप्ता के मकान नंबर 231 के सामने सड़क पर एक पैर पड़ा था. यह बायां पैर था और कुत्तों ने नोच रखा था. यह जगह कबूतर पार्क के पास ही थी, जहां दिवाली की रात दाहिना पैर मिला था. पुलिस ने यह पैर भी जब्त कर के मोर्चरी भिजवा दिया.

10-12 घंटे के दौरान शहर में 4 अलगअलग स्थानों पर 2 कटे पैर व 2 कटे हाथ मिलने की खबर पूरे शहर में आग की तरह फैल गई थी. लोगों ने वाट्सऐप सोशल मीडिया पर कटे मानव अंगों के फोटो डाल दिए. इस से शहर में सनसनी फैल गई. सनसनी फैलने की वजह यह थी कि शहर में इस तरह की वारदात पहले कभी सुनने में नहीं आई थी. अलवर तो दूर, पूरे राजस्थान में इस तरह की सनसनीखेज वारदात शायद ही कभी सुनने को मिली हो. अलबत्ता कई साल पहले नोएडा के पास निठारी में इस तरह की घटनाएं जरूर सामने आई थीं.

मामला गंभीर था. त्यौहार के मौके पर शहर में इस तरह 4 जगह मानव अंग मिलने की घटना से एसपी राहुल प्रकाश परेशान हो उठे. उन्होंने अपने मातहत अधिकारियों को बुलाया और उन से चारों जगह मिले अंगों के बारे में पूरी जानकारी ली. 2 हाथ और 2 पैर मिलने से एसपी को यह अंदाजा जरूर हो गया था कि किसी महिला की हत्या कर के शव के टुकड़े अलगअलग जगहों पर फेंके गए हैं. लेकिन अभी तक न तो सिर मिला था और न ही धड़.

एसपी ने सब से पहले पुलिस के जवानों को सिर और धड़ की तलाश में लगाने के निर्देश दिए, ताकि लोगों से शिनाख्त कराई जा सके कि कटे अंग किस के हैं. एसपी के निर्देश पर पुलिस की 5 टीमें गठित की गईं. इन टीमों को शहर में कचरे के ढेरों और बडे़ नालों के आसपास सिर व धड़ की तलाश में लगाया गया. इस काम में सफाईकर्मियों की भी मदद ली गई.

दूसरी ओर पुलिस ने शहर से लापता हुए लोगों के बारे में भी जानकारी जुटानी शुरू कर दी. शहर सहित आसपास के पुलिस थानों में पिछले 15 दिनों में लापता हुए लोगों की जो रिपोर्ट दर्ज हुई थीं, उन के बारे में भी जांचपड़ताल शुरू की गई. पुलिस ने लापता लोगों की दर्ज रिपोर्ट को सूचीबद्ध कर के उन के नामपतों के आधार पर घरघर जा कर पूछताछ की.

इस में पता चला कि ज्यादातर लापता लोग अपने घर लौट चुके हैं, लेकिन रिपोर्ट दर्ज कराने वालों ने पुलिस को इस की जानकारी नहीं दी थी. इस के अलावा पुलिस पूरीपूरी रात शहर के हर इलाके में गश्त करती रही. रात को घूमते मिले हर व्यक्ति से पूछताछ की गई. उन के नामपते नोट किए गए.

31 अक्तूबर की रात शांति से निकल गई. एक नवंबर का दिन भी निकल गया. पुलिस को कहीं से भी कोई मानव अंग मिलने की सूचना नहीं मिली. पुलिस को कचरे के ढेरों एवं नालों के आसपास भी ऐसा कुछ नहीं मिला. लापता संदिग्ध लोगों के घरों के तलाशी अभियान में भी पुलिस को कोई कामयाबी नहीं मिली. पुलिस ने दिवाली की रात कबूतर पार्क के पास मिले दाहिने पैर के साथ मिली पौलीथिन पर लिखे सांगानेरी हाउस के पते पर भी जा कर पूछताछ की, लेकिन कोई हल नहीं निकला.

2 नवंबर की सुबह हो गई. एसपी राहुल प्रकाश अपने आवास पर इसी मामले पर सोचविचार कर रहे थे. अनुभव के आधार पर वे मान रहे थे कि यह वारदात किसी साइको किलर की हो सकती है. किलर मानसिक रूप से विक्षिप्त भी हो सकता है. जिस तरह चारों हाथपैर अलगअलग काट कर फेंके गए थे, उस से लगता था कि वह निर्दयी भी रहा होगा. क्योंकि यह काम कोई सामान्य इंसान नहीं कर सकता था. अलबत्ता अब तक यह बात साफ हो गई थी कि अंग किसी महिला के हैं. इसलिए अनुमान लगाया गया कि महिला उस हत्यारे की पत्नी या प्रेमिका थी. निर्दयता से काटे गए अंगों से यह अनुमान भी लगाया जा रहा था कि हत्यारा उस महिला से बहुत ज्यादा नफरत करता था.

मानव अंग घरों में सब्जी काटने वाले चाकू से काटने संभव नहीं थे, इसलिए यह अनुमान लगाया गया कि महिला की हत्या के बाद किसी धारदार और पैने औजार से अंग काटे गए होंगे. मामले की जांच में जुटे अधिकारी अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे थे. इसी बीच 2 नवंबर को सुबह करीब साढ़े 7 बजे सूचना मिली कि रंगभरियों की गली में एक दुकान के सामने मानव धड़ पड़ा है. पुलिस मौके पर पहुंची, वहां धड़ के रूप में एक कंकाल सा पड़ा मिला. धड़ से मांस व आंतें वगैरह गायब थीं. पुलिस ने उस कंकालनुमा धड़ को जब्त कर के सामान्य अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दिया.

पुलिस अधिकारी इस मामले पर नए सिरे से विचार करने के लिए जुटे ही थे कि एक और सूचना आ गई. इस सूचना में बताया गया था कि राम मार्केट, ढकपुरी मोहल्ले में पौलीथिन में मांस के टुकड़े पड़े हैं. पुलिस ने मौके पर पहुंच कर मांस के टुकड़े जब्त कर लिए. मांस के टुकडे़ उसी कंकालनुमा धड़ का हिस्सा माने गए, जो सुबह रंगभरियों की गली में मिला था. पुलिस ने उन टुकड़ों को भी अस्पताल की मोर्चरी में भेज दिए.

उसी दिन दोपहर करीब सवा 3 बजे कंपनी बाग के पीछे सेढ़ का टीला के पास कुछ बच्चे खेल रहे थे. तभी उन्हें प्लास्टिक के एक छोटे बोरे में कटा हुआ मानव सिर नजर आया. बच्चों ने इस की जानकारी आसपास के लोगों को दी. उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी. मौके पर पुलिस को प्लास्टिक के बोरे में क्षतविक्षत मानव सिर मिला. सिर में केवल हड्डियां नजर आ रही थीं. उस के पास ही लंबे बालों का गुच्छा भी पड़ा मिला. कटा हुआ सिर कई दिन पुराना लग रहा था. चेहरा भी क्षतविक्षत था, जिस से पहचान नहीं हो पा रही थी.

लंबे बालों का गुच्छा मिलने से यह अनुमान लगाया गया कि सिर किसी महिला का है. बाल भी उसी महिला के होंगे. जिस जगह पर सिर मिला था, वहां पर लोग कचरा डालते थे. पुलिस पूछताछ में लोगों ने बताया कि उस दिन सुबह नगर परिषद के कर्मचारी वहां से कचरा उठा कर पूरी तरह सफाई कर के गए थे. दोपहर में कटा सिर मिलने से यह अंदाजा लगाया गया कि कटा हुआ सिर प्लास्टिक के बोरे में रख कर सुबह 8-9 बजे से दोपहर 2-3 बजे के बीच फेंका गया था. वहीं रंगभरियों की गली में सुबह ही कंकालनुमा धड़ मिलने से यह अनुमान लगाया गया कि उसे रात को किसी समय फेंका गया था.

30 अक्तूबर की रात से 2 नवंबर की शाम तक 4 दिनों के दौरान शहर में 7 अलगअलग स्थानों से मानव अंग मिल चुके थे. सिर व धड़ मिलने के साथ मानव शरीर के सभी अंग मिल चुके थे. 4 दिनों से शहर में महिला के अंग काट कर शहर में अलगअलग जगहों पर फेंकने से लोगों में दहशत फैलने लगी थी. लोग तरहतरह की चर्चाएं कर रहे थे. कोई इसे किसी तांत्रिक का कारनामा बता रहा था तो कोई कह रहा था कि अलवर में कनपटीमार जैसा कोई नया सनकी किलर आ गया है. कोई इसे नरपिशाच का कारनामा बता रहा था.

पुलिस अधिकारी भी हैरानपरेशान थे. जांचपड़ताल में हत्यारे का कोई सुराग नहीं मिल रहा था. अभी तक न तो कटे अंगों की शिनाख्त हुई थी और न ही यह पता चला था कि महिला की हत्या कितने दिनों पहले की गई थी. यह भी आशंका थी कि संभव है, एक से ज्यादा व्यक्ति की हत्या की गई हो. पुलिस के लिए यह मामला चुनौती बनता जा रहा था.

जयपुर रेंज के आईजी हेमंत प्रियदर्शी इस मामले को ले कर बेहद परेशान हो उठे. वे जयपुर से रोजाना मामले की मौनिटरिंग कर रहे थे. आईजी ने साइको किलर को पकड़ने के लिए फोरैंसिक लैब हैदराबाद के अधिकारियों से मार्गदर्शन ले कर अलवर के एसपी राहुल प्रकाश को दिशानिर्देश दिए.

एसपी राहुल प्रकाश ने 2 नवंबर की रात पुलिस अधिकारियों की बैठक ले कर इस मामले के सभी बिंदुओं पर विचारविमर्श किया. इस में यह बात भी निकल कर सामने आई कि हत्यारे ने किसी छोटे वाहन यानी दुपहिया, साइकिल या रिक्शा में रख कर या पैदल चल कर अलगअलग जगहों पर मानव अंग फेंके होंगे.

इस का कारण यह था कि ढकपुरी व रंगभरियों की गली में जिन स्थानों पर मानव अंग मिले थे, वहां कार आदि चौपहिया वाहन नहीं पहुंच सकते थे. इस से यह भी अनुमान लगाया गया कि हत्यारा शहर का ही कोई व्यक्ति है. कुछ अंग ऐसी जगहों पर मिले थे, जहां दिन भर आवागमन रहता था. व्यापक चर्चा के बाद नए सिरे से जांच करने के लिए स्पैशल टीम बनाई गई.

पुलिस दल ने उन सभी जगहों का दोबारा जा कर निरीक्षण किया, जहांजहां मानव अंग मिले थे. उन जगहों का पूरा मैप बनाया गया. ये सातों स्थान 2 किलोमीटर की परिधि में थे. आर्यनगर और चावंड पाड़ी के बीच भी आधा किलोमीटर का ही फासला था. रंगभरियों की गली व ढकपुरी और राम मार्केट पुराने शहर के हिस्से थे. पुलिस ने इन सभी क्षेत्रों में एक्टिव मोबाइल नंबरों की डिटेल्स निकलवाईं. इस के अलावा जहांजहां मानव अंग मिले थे, उन के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की भी खोजबीन की गई.

इस खोजबीन में करीब 30 जगहों पर कैमरे लगे मिले. पुलिस ने इन की फुटेज निकलवाई. इस के अलावा मृतका के पैरों की माप भी ली गई. उस के पैरों में 5 नंबर का जूता या चप्पल आ सकती थीं. पुलिस ने कई संदिग्ध लोगों से भी पूछताछ की. इस व्यापक छानबीन का निष्कर्ष निकाल कर पुलिस ने शहर के उन इलाकों में डोर टू डोर सर्वे शुरू करने का निर्णय लिया, जहां मानव अंग मिले थे.

3 नवंबर को सुबह से ही पुलिस ने डोर टू डोर सर्वे शुरू कर दिया. इस काम में शहर के सभी थानों के सैकड़ों पुलिसकर्मियों को लगाया गया. पुलिस ने यह अभियान शुरू किया ही था कि एक और नई सूचना आ गई. सूचना पर पुलिस दल बांसवाली गली पहुंचा, वहां एक पौलीथिन में बंधे महिला के स्तन, खाल व मांस के टुकड़े मिले, जिन से दुर्गंध नहीं आ रही थी. इस से यह अनुमान लगाया गया कि महिला के ये अंग फ्रिज में रखे रहे होंगे. पांचवें दिन मिले ये अंग भी पुलिस ने अस्पताल की मोर्चरी भिजवा दिए.

बांसवाली गली शहर की पुरानी आबादी में थी. यह जगह भी उसी 2 किलोमीटर के दायरे में थी. पुलिस ने डोर टू डोर सर्वे में इसी 2 किलोमीटर के दायरे पर सारा फोकस कर दिया. एकएक घर में जा कर पुलिस ने महिलाओं के बारे में जानकारी ली. उन के नामपते नोट किए.

इसी दिन दोपहर करीब ढाई बजे पुलिस की एक टीम सक्कापाड़ी मोहल्ले में एक पुराने मकान पर पहुंची. इस घर में एक युवक और करीब 3 साल की एक बच्ची मिली. युवक ने अपना नाम योगेश मल्होत्रा उर्फ चूचू बताया. उस की उम्र 35 साल थी. चूचू से उस की पत्नी के बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह घरों में झाड़ूपोंछे का काम करती है और शाम 4 बजे तक आएगी. पुलिस ने चूचू का मोबाइल नंबर नोट कर लिया.

शाम 4 बजे पुलिस दल दोबारा चूचू के मकान पर पहुंचा तो वहां ताला लटक रहा था. पुलिस ने पड़ोसियों और आसपास के अन्य लोगों से पूछताछ की तो यह तो पता नहीं चला कि चूचू कहां गया है, लेकिन चौंकाने वाली कई बातों की जानकारी जरूर मिली. 5 दिनों से चुप बैठे लोगों ने पुलिस को बताया कि चूचू की पत्नी आरती धनतेरस के दिन से दिखाई नहीं दे रही है.

पड़ोसियों ने यह भी बताया कि धनतेरस की शाम पतिपत्नी में झगड़ा हुआ था. रात को उन के मकान से केरोसिन के जलने की बदबू भी आई थी और धुआं भी उठता देखा गया था. लेकिन आसपास के लोग इसलिए नहीं बोले कि चूचू के घर में हर रोज झगड़ा होता था. लोगों ने बताया कि चूचू को मोपेड पर प्लास्टिक के बोरे में सामान ले जाते भी देखा गया था. उस के मकान में एक तहखाना होने की बात भी पता चली.

मोहल्ले वालों से ही पुलिस को पता चला कि चूचू करीब साढ़े 4 साल पहले आरती को पटना से ले कर आया था. आरती उस की दूसरी पत्नी थी. इस से पहले वह 2 शादियां कर चुका था. चूचू शादीपार्टियों में स्टाल लगाने के साथ रंगपेंट का भी काम करता था. उस के 2 भाई थे. उस के पिता व भाई की मौत हो चुकी थी. सक्कापाड़ी में उस का खुद का मकान था. उस की 3 बहनें भी थीं.

पुलिस की अब तक की जांचपड़ताल से सारी कडि़यां जुड़ती नजर आने लगी थीं. इसलिए शक की सुई पूरी तरह चूचू पर आ कर टिक गई. यह भी तय हो गया कि दोपहर में पुलिस के डोर टू डोर सर्वे के बाद वह मकान में ताला लगा कर फरार हो गया था.

एसपी के निर्देश पर पुलिस दल ने चूचू के पड़ोसियों से उस के रिश्तेदारों के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस का अनुमान था कि चूचू अपनी करीब 3 साल की बेटी को साथ ले कर गया है या फिर उस ने उसे किसी रिश्तेदार के घर छोड़ दिया है. यह भी आशंका थी कि वह बेटी को मकान में बंद कर गया हो. पुलिस ने ऐहतियात के तौर पर 2 जवान चूचू के मकान पर तैनात कर दिए.

दूसरी ओर पुलिस ने चूचू के मोबाइल की टावर लोकेशन तलाश की. उस के मोबाइल की लोकेशन हरियाणा की आ रही थी. इस आधार पर पुलिस की टीमें हरियाणा रवाना की गईं. पुलिस ने 4 नवंबर को तड़के चूचू को हरियाणा के हिसार से उस की बहन लाली के घर से पकड़ लिया.

चूचू के साथ उस की 3 साल की बेटी भावना भी थी. चूचू ने अपनी पत्नी आरती की हत्या की बात मान ली. उस समय तक चूचू की बहन लाली को इस बात का पता नहीं था कि उस का भाई अलवर में भाभी की हत्या कर के हिसार में उस के घर आया है.

पुलिस दल चूचू व उस की बेटी को अलवर ले आया. अलवर ला कर पुलिस थाने में चूचू से मनोवैज्ञानिक तरीक से गहन पूछताछ की गई. चूचू ने पुलिस को बताया कि 30 अक्तूबर को दिवाली के दिन सुबह उस का अपनी पत्नी आरती से झगड़ा हुआ था. वजह यह थी कि आर्थिक तंगी के चलते आरती उस मकान को लिखवाना चाहती थी. जबकि चूचू कुछ दिन बाद मकान बेचना चाहता था. आरती से उस का पहले भी कई बातों को ले कर झगड़ा होता रहता था.

उस ने पुलिस को बताया कि उस की पत्नी आरती 25 साल की थी. वह काफी सुंदर थी. इसलिए उसे पत्नी के चरित्र पर भी शक था. रोजरोज के झगड़ों व चरित्र पर शक के कारण उस ने आरती से पीछा छुड़ाने का फैसला लिया था.

दिवाली की शाम पौने 7 बजे जब पूरा शहर त्यौहार मना रहा था, चूचू ने अपनी पत्नी आरती पर घर में केरोसिन छिड़क कर आग लगा दी थी. इस से आरती जल गई. कुछ देर बाद उस ने दम तोड़ दिया. आरती की मौत के बाद उस ने बेटी भावना को दूध पिला कर व बिस्कुट खिला कर सुला दिया. इस के बाद वह अलवर शहर के खपटा पाड़ी मोहल्ले में रहने वाली अपनी बहन काला के पास पहुंचा और सारी बात बता कर उस से मदद मांगी.

बहन काला ने उस की मदद करने से इनकार कर दिया. इस के बाद चूचू वापस घर लौट आया. उस ने घर के दरवाजे बंद कर लिए. पूरा मोहल्ला दिवाली की खुशियां मनाने में मशगूल था. चूचू सोचने लगा कि लाश को ठिकाने कैसे लगाया जाए? काफी सोचविचार के बाद उस ने फैसला किया कि आरती के अंगों को काट कर अलगअलग कर दिया जाए और फिर उन्हें एकएक कर के फेंका जाए. उस ने उसी रात छुरी से आसपास की खाल काटने के बाद हाथपैर काट कर अलग कर दिए. इस के बाद उस ने आरती की गरदन काटी और जोर से मरोड़ कर अलग कर दी.

दिवाली की रात को ही वह सब से पहले आरती का दायां पैर पौलीथिन में रख कर अपनी टीवीएस मोपेड से कबूतर पार्क पहुंचा. पार्क के पास कोई नहीं था. मौका देख कर उस ने वह पैर सड़क के पास फेंक दिया. वह वापस अपने घर आया और पौलीथिन में दूसरा पैर रख कर मोपेड से स्कीम नंबर एक में फेंक आया. घर आ कर वह तीसरी बार में आरती के दोनों हाथ अलगअलग पौलीथिन में डाल कर चावंड पाड़ी में फेंक आया तो सिर को उस ने कंपनी बाग के पीछे सेढ़ का टीला के पास एक नाली में फेंक दिया.

घर आ कर उस ने रात में ही आरती के धड़ की छाती और पेट की चमड़ी को चाकू से उतार कर एक पौलीथिन में डाल लिया. उसी में उस ने उस के दोनों स्तनों को भी काट कर रख लिया. इस के बाद उस ने छाती और पेट के अंदर हाथ डाल कर गुर्दे एवं आंतें खींच कर बाहर निकालीं और उन्हें चाकू से काट कर पौलीथिन में रख कर फ्रिज में रख दी. धड़ पर उस ने बर्फ तोड़ कर डाल दी, जिस से बदबू न आए.

2 दिनों बाद सुबह करीब 5 बजे उस ने फ्रिज में रखीं तीनों पौलीथिन निकाली और राम मार्केट, ढकपुरी वाली गली में फेंक आया. धड़ को चावल के कट्टे में र्ख कर रंगभरियों की गली में सड़क पर फेंक दिया. अंत में स्तनों और कूल्हे के मांस वाली पौलीथिन को उस ने साथ ले जा कर बांसवाली गली में फेंक दिया. इस तरह चूचू ने 8 जगहों पर आरती के शरीर के अंग फेंके. आरती के अंगों को काटने के लिए उस ने चाकू के अलावा आरी का भी उपयोग किया था.

चूचू मांसाहारी था, इसलिए मीट लेने बकरा मंडी जाता रहता था. उस ने बकरा मंडी में कसाइयों को छुरी से बकरे की खाल उतारते देखा था. उसी से उसे आइडिया आया था और उस ने आरती के शरीर की खाल उतार कर उस के टुकड़े किए थे.

चूचू को अपनी पत्नी की हत्या कर के उस के टुकड़े करने का कोई मलाल नहीं था. उस के चेहरे पर किसी तरह की शिकन भी नहीं थी. न ही कोई डर और न ही अफसोस. ऐसी जघन्य वारदात के बाद भी चूचू पूरी तरह सामान्य दिखाई दे रहा था. उस की चालढाल या व्यवहार से किसी को इस बात का अहसास नहीं हुआ था कि शहर में जगहजगह मानव अंग मिलने से पूरे शहर में जो दहशत थी, वह उसी की करतूत थी.

चूचू इतना शातिर था कि जब शहर में किसी जगह मानव अंग मिलते थे तो वह वहां पहुंच जाता था और लोगों से इस विषय पर बात करता था. वह कहता था कि पुलिस अभी तक कबाड़ी के हत्यारे का पता नहीं लगा सकी तो इस महिला के हत्यारे तक कैसे पहुंचेगी? उस की बातों और तर्कों से किसी को उस पर कभी शक नहीं हुआ.

पुलिस को बताए अनुसार, चूचू की पहली पत्नी छोड़ कर चली गई थी. उस के बाद 4, साढ़े 4 साल वह आरती को पटना से 25 हजार रुपए में खरीद कर लाया था और हिसार में उस से शादी की थी. आरती से उसे एक बेटी हुई थी, जिस का नाम उस ने भावना रखा था. चूचू के 5 भाईबहन थे. पहले उस के पिता की मौत हुई, उस के बाद मां भी चली गई. उस के एक भाई की भी मौत हो चुकी थी. उस की 2 बहनें हिसार में और एक अलवर में रहती है. उस के परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी. चर्चा यह भी है कि पहले वह वेश्यावृत्ति के काम में लिप्त था. इसी के चलते उस के घर लोगों का आनाजाना लगा रहता था.

4 नवंबर को जब पुलिस हिरासत में चूचू को सक्कापाड़ी मोहल्ला स्थित उस के घर लाया गया तो मोहल्ले वालों की भीड़ लग गई. लोग ‘मारो मारो, फांसी दो’ के नारे लगाने लगे. पुलिस ने चूचू की निशानदेही पर अधजले कपड़े, केरोसिन की कैन, प्लास्टिक का अधजला पाइप, चाकू, छुरी व अन्य औजार बरामद किए. जयपुर से डा. राहुल शर्मा के नेतृत्व में आई एफएसएल टीम ने घटनास्थल का निरीक्षण कर आवश्यक साक्ष्य जुटाए.

मां आरती की हत्या और पिता चूचू की गिरफ्तारी से 3 साल की मासूम बच्ची भावना बेसहारा हो गई है. उसे तो यह भी नहीं मालूम कि उस की मां अब इस दुनिया में नहीं है. 3 दिनों तक यह बच्ची महिला पुलिस कांस्टेबलों के संरक्षण में रही. उस के बाद 6 नवंबर को पुलिस ने उसे बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष श्रवण सिंघल के समक्ष पेश किया, जहां से उसे मदर टेरेसा होम भेज दिया गया.

इस से पहले पुलिस ने 5 नवंबर को चूचू को मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया. मजिस्ट्रैट ने उसे 2 दिनों के रिमांड पर पुलिस को सौंप दिया. पुलिस ने आरती के कटे हुए अंगों का पोस्टमार्टम कराया.

इन अंगों की सुपुर्दगी व दाहसंस्कार के लिए पुलिस ने आरती के पटना में रहने वाले परिजनों से संपर्क किया, लेकिन 2 दिनों तक इंतजार करने के बाद भी पटना से कोई नहीं आया तो 7 नवंबर को पुलिस ने नगर परिषद के सहयोग से आरती के अंगों का दाहसंस्कार कर दिया. पुलिस के बारबार संपर्क करने पर आरती के घर वालों ने अपना मोबाइल ही बंद कर लिया था.

2 दिनों की रिमांड अवधि पूरी होने के बाद पुलिस ने 7 नवंबर को चूचू को फिर से अदालत में पेश किया तो पुलिस के आग्रह पर उसे और 2 दिनों के रिमांड पर दे दिया गया. बाद में रिमांड अवधि पूरी होने पर 9 नवंबर को पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

एसपी राहुल प्रकाश ने शहर में सनसनी फैलाने वाली इस वारदात का परदाफाश करने वाली पुलिस टीम को 2-2 हजार रुपए का नकद पुरस्कार देने की घोषणा की है. इस पुलिस टीम में एएसपी मुख्यालय पारस जैन, सीओ (सिटी) जय सिंह नाथावत के अलावा एसआई, एएसआई से ले कर कांस्टेबल स्तर के 20 जवान शामिल थे.

Crime Story Hindi: पुलिस की गिरफ्त में पुलिस

Crime Story Hindi: खूबसूरत महिलाओं के साथ रंगरेलियां मनाने के चक्कर में कई लोग हनीट्रैप में कुछ इस तरह फंस जाते हैं कि पुलिस के पास जाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते. आशीष के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ लेकिन समय रहते ही उन की बुद्धि काम कर गई और वह एक बड़ी मुसीबत से बच गए.

आशीष अपनी दुकान पर बैठे थे, उसी समय उन के मोबाइल पर किसी अज्ञात नंबर से केवल हाय लिखा हुआ वाट्सऐप मैसेज आया. वह उसे कोई तवज्जो न दे कर अपने काम में लग गए. कुछ देर बाद उसी नंबर से वाट्सऐप पर 2-3 खूबसूरत लड़कियों के फोटो आए. सुंदर लड़कियों के फोटो देख कर उन की जिज्ञासा बढ़ी तो उन्होंने उस नंबर पर फोन किया, जिस नंबर से मैसेज और फोटो आए थे.

दूसरी ओर किसी लड़की ने फोन उठाया तो आशीष ने पूछा, ‘‘आप के नंबर से मेरे पास 2-3 लड़कियों के फोटो भेजे गए हैं. क्या मैं जान सकता हूं कि ये फोटो मुझे क्यों भेजे गए हैं?’’

‘‘सौरी सर, दरअसल ये फोटो मुझे किसी और को भेजने थे, गलती से आप के नंबर पर चले गए. वैसे सर, अगर आप अन्यथा न लें तो क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन और कहां से बोल रहे हैं?’’ लड़की ने कहा.

‘‘मेरा नाम आशीष है और रानीबाग इलाके में मेरी कार एसेसरीज की दुकान है.’’ आशीष ने उसे अपने बारे में बताया.

कुछ लोग आदतन लड़कियों के फोन को ज्यादा तवज्जो देते हैं. ऐसे लोगों के फोन पर अगर किसी लड़की का फोन आ जाए तो वे उस से ज्यादा से ज्यादा देर तक बात करने की कोशिश करते हैं. आशीष भी ऐसे ही लोगों में थे.

‘‘ओके सर.’’ आशीष की हकीकत जान कर लड़की ने कहा.

‘‘वैसे मैडम, क्या मैं जान सकता हूं कि आप कौन हैं और कहां से बोल रही हैं?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘जी मेरा नाम प्रीति है और मैं भी दिल्ली में ही रहती हूं. दरअसल, आप के मोबाइल पर जिन लड़कियों के फोटो आए हैं, वे मुझे किसी और को भेजने थे. वैसे अगर आप भी शौकीन हों तो उन में से कोई लड़की पसंद कर सकते हैं.’’ प्रीति ने मीठे स्वर में कहा.

37 साल के आशीष इतने नासमझ नहीं थे कि प्रीति की बातों का मतलब न समझ पाते. वह चूंकि बीवीबच्चों वाले थे, इसलिए मन ललचाने के बावजूद उन्होंने जल्दबाजी में कोई कदम उठाना उचित नहीं समझा. उन्होंने प्रीति को टालने के लिए कहा, ‘‘मैडम, अभी मैं काम में बिजी हूं, जब भी जरूरत होगी, आप को बता दूंगा.’’

‘‘ठीक है सर, आप जब भी चाहें बेझिझक बता दें. एक बार हमारी सेवा लेने के बाद आप की तबीयत खुश हो जाएगी.’’ कह कर प्रीति ने फोन काट दिया.

इस के बाद प्रीति और आशीष के बीच दोस्ती हो गई. दोनों वाट्सऐप पर अकसर बातें करने लगे. 5-6 महीने तक उन के बीच इसी तरह बातें चलती रहीं. एक बार प्रीति ने एक पता दे कर उन्हें मिलने के लिए बुलाया, पर व्यस्तता की वजह से वह जा नहीं सके. 14 मार्च, 2016 को भी आशीष की वाट्सऐप पर प्रीति से बात हुई. प्रीति ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘आप आए नहीं?’’

‘‘आ कर क्या करें, कोई बढि़या चीज तो आप के पास है नहीं. अगर कोई बढि़या माल हो तो बताइए?’’ आशीष ने कहा.

‘‘हमारे पास बढि़या माल भी है, अभी फोटो भेजती हूं.’’ प्रीति ने कहा.

कुछ देर बाद आशीष के वाट्सऐप पर एक लड़की की फोटो आई. वह लाल रंग का स्लीवलैस टौप पहने थी और वाकई खूबसूरत लग रही थी. फोटो देखते ही आशीष उस पर फिदा हो गए. उन्होंने उसी वक्त प्रीति को फोन कर के कहा, ‘‘मैडम, यह लड़की मुझे पसंद है.’’

‘‘आशीष साहब, इस की एक बार की कीमत 3 हजार रुपए है.’’ प्रीति ने कहा.

कीमत सुन कर आशीष चौंक गए क्योंकि इतने कम पैसों में इतनी सुंदर कालगर्ल नहीं मिल सकती. आशीष ने तुरंत कहा, ‘‘कोई बात नहीं मैडम, जब चीज पसंद आ जाए तो हम कीमत नहीं देखते. आप इसे हमारे पास रानीबाग भेज दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, लड़की वहां नहीं जा सकती. दरअसल वह कालेज स्टूडेंट है. अपने घर वालों से कोई बहाना कर थोड़ीबहुत देर के लिए घर से निकल सकती है. ऐसा कीजिए, आप 3 बजे तक रोहिणी सेक्टर-15 में बंसल भवन के पास पहुंच जाइए. तब तक लड़की को मैं अपने फ्लैट में बुला लूंगी. आप को हम पिक कर लेंगे.’’

आशीष ने बात करते हुए दुकान में लगी दीवार घड़ी की तरफ देख कर कहा, ‘‘मैडम, 3 तो बजने वाले हैं. मैं इतनी जल्दी रोहिणी कैसे पहुंच पाऊंगा?’’

‘‘कोई बात नहीं सर, सवा 3-साढ़े 3 तक पहुंच जाइए. हम आप को वहीं मिलेंगे.’’ प्रीति बोली.

आशीष की दुकान पर मौजूद लड़के एक कार में एसेसरीज लगाने में जुटे थे. आशीष को सैक्टर-15 पहुंचने की जल्दी थी. उन्होंने लड़कों से कहा कि वह किसी से मिलने जा रहे हैं, थोड़ी देर में लौट आएंगे. इस के बाद वह अपनी कार से रोहिणी सेक्टर-15 के लिए रवाना हो गए. करीब आधे घंटे बाद वह बंसल भवन के नजदीक पहुंचे तो वहां 2 लड़कियां खड़ी मिलीं. उन में से एक तो वही थी, जिस की फोटो प्रीति ने उन्हें भेजी थी. प्रीति को उन्होंने देखा नहीं था. उस से केवल फोन पर ही बातें हुई थीं. इसलिए वह समझ गए कि दूसरी लड़की प्रीति ही होगी.

फिर भी संतुष्टि के लिए उन्होंने कार से उतर कर प्रीति का नंबर मिलाया और उन दोनों लड़कियों की ओर देखने लगे. नंबर मिलाते ही उन दोनों में से एक ने काल रिसीव करते हुए फोन कान से लगाया तो आशीष ने अपना एक हाथ उठा कर इशारा किया तो दोनों लड़कियां उन की कार के नजदीक आ गईं. उन में से एक लड़की ने अपना परिचय प्रीति और दूसरी का परिचय शिखा के रूप में दिया.

कार को वहीं पार्किंग में लगवा कर प्रीति आशीष को रोहिणी सेक्टर-15 के ही एक फ्लैट में ले जा कर बोली, ‘‘यहां कोई समस्या खड़ी हो सकती है, इसलिए यहां से कहीं और चलना होगा.’’

‘‘कहां?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘यहीं रोहिणी के सेक्टर-2 में हमारा फ्लैट है, वहीं चलते हैं.’’ प्रीति बोली.

आशीष ने कार से चलने का प्रस्ताव रखा तो प्रीति बोली, ‘‘साथ चलना ठीक नहीं है, आप अपनी कार से सेक्टर-2 स्थित अवंतिका हौस्पिटल के पास पहुंचिए, हम वहीं मिलेंगे.’’

आशीष कार से सेक्टर-2 की तरफ चल दिए. सेक्टर-2 के अवंतिका हौस्पिटल से कहां जाना है, यह उन्हें पता नहीं था. इसलिए निश्चित जगह पर पहुंच कर उन्होंने प्रीति को फोन लगाया. इस पर प्रीति ने उन्हें सेक्टर-2 के ब्लौक-ए स्थित एक फ्लैट पर आने को कहा. कार खड़ी कर के आशीष ए-ब्लौक में प्रीति द्वारा बताई गई जगह पहुंच गए. वहां प्रीति उन्हें मिल गई. वह उन्हें साथ ले कर एक फ्लैट में पहुंची. उस फ्लैट में 2 कमरे थे. प्रीति ने आशीष से 3 हजार रुपए ले कर उन्हें शिखा के साथ दूसरे कमरे में भेज दिया. आशीष के लिए खुद पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था. उन्होंने फटाफट दरवाजा बंद किया और शिखा को अपनी बांहों में समेट लिया.

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है जनाब, थोड़ा सब्र रखिए.’’ कहते हुए शिखा ने आशीष की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए.

‘‘नहीं शिखा, मैं अब और बरदाश्त नहीं कर सकता,’’ कह कर आशीष ने खुद ही अपने कपड़े उतार दिए. शिखा भी प्राकृतिक अवस्था में आ गई. आखिर आशीष ने अपनी हसरत पूरी कर ली.

इस के बाद शिखा फटाफट कपड़े पहन कर कमरे से बाहर निकल गई. उस के बाहर जाते ही 5 लोग उस कमरे में घुस आए. उन में से एक दिल्ली पुलिस की वर्दी पहने था, जिस की नेमप्लेट पर सुभाषचंद लिखा था. उन में से 2 लोग अपनेअपने मोबाइलों से आशीष की अर्द्धनग्नावस्था की वीडियो बनाने लगे. अचानक आए उन लोगों को देख आशीष के होश उड़ गए. आशीष समझ गए कि ये पुलिस के लोग हैं और वह बुरी तरह फंस गए हैं. पुलिस की वर्दी वाला एएसआई सुभाषचंद था. उस ने कहा, ‘‘रेड में तुम रंगेहाथों पकड़े गए हो.’’

‘‘सर, मुझ से क्या गलती हो गई?’’ आशीष ने डरते हुए पूछा.

‘‘जब तुम रेप के आरोप में जेल जाओगे तो गलती का खुद ही पता चल जाएगा.’’ पुलिस वाले ने धमकाते हुए कहा.

‘‘सर, मैं ने किसी के साथ रेप नहीं किया. वह लड़की तो खुद मुझे यहां ले कर आई थी.’’ आशीष ने सफाई दी.

‘‘चुप रह. उस लड़की का बयान और हमारी बनाई वीडियो फिल्म तुझे सजा दिलाने के लिए काफी है. अब तू खुद सोच ले कि तेरी इस करतूत की वजह से तेरी कितनी बदनामी होगी.’’ पुलिस वाले ने आशीष को हड़काया.

आशीष बुरी तरह डरे हुए थे. वह उन लोगों के सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे. यह देख कर एएसआई सुभाषचंद ने कहा, ‘‘देख भई, तेरे खिलाफ बड़ा पक्का मामला बन रहा है. इस से बचने का एक ही तरीका है. लेकिन उस के लिए तुझे 15 लाख खर्च करने पड़ेंगे. क्योंकि जिस लड़की के साथ तूने रेप किया है, उसे काफी पैसे देने होंगे, वरना वह नहीं मानेगी.’’

‘‘सर, यह रकम तो बहुत ज्यादा हैं. इतने पैसे मैं कहां से लाऊंगा?’’ आशीष ने कहा.

‘‘यह बात तो तुझे उस के साथ कमरे में जाने से पहले सोचनी चाहिए थी.’’ एएसआई ने कहा.

‘‘सर, यह ऐसे नहीं मानेगा, इसे थाने ले चलो. वहां पर इस के घर वालों और रिश्तेदारों को बुला कर इस की करतूत बताई जाएगी तो यह समझेगा.’’ साथ में खड़े उस के साथी ने कहा.

‘‘नहीं सर, ऐसा मत करिए. मैं बरबाद हो जाऊंगा. आप यहीं मामला निपटा लीजिए.’’ आशीष ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘तो चल, 10 लाख दे दे. मामला रफादफा कर देंगे.’’ सुभाषचंद ने कहा.

आशीष पुलिस के लफड़े से बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 10 लाख रुपए देने की हामी भर ली. उन लोगों ने आशीष से कहा कि 3 लाख रुपए अभी दे दे, बाकी कल ले लेंगे. लेकिन उस समय आशीष के पास इतने पैसे नहीं थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह 3 लाख रुपए का इंतजाम कहां से करें. मुसीबत के उस समय में उन्हें अपना दोस्त वैभव याद आया. उस की दिल्ली के मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में फैक्ट्री थी. वह अपनी फैक्ट्री में है या नहीं, यह जानने के लिए उन्होंने उसे फोन किया. वैभव उस समय फैक्ट्री में ही था.

वे पांचों लोग आशीष के साथ मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंच गए. आशीष ने अपनी कार दोस्त की फैक्ट्री के बाहर खड़ी कर दी. एएसआई सुभाषचंद और उस के साथी उस की कार में बैठे रहे. जबकि वह अपने दोस्त के पास चले गए. उन्होंने अपने दोस्त वैभव को खुद के फंसने की पूरी कहानी बता दी. वैभव समझ गया कि आशीष मुसीबत में फंस गया है लेकिन उस समय उस के पास भी 3 लाख रुपए नहीं थे. उस ने किसी तरह एक लाख रुपए का इंतजाम कर के उसे दे दिए. आशीष ने एक लाख रुपए कार में बैठे एएसआई सुभाषचंद को देते हुए कहा कि बड़ी मुश्किल से एक लाख का इंतजाम हो पाया है. इस के लिए भी मुझे अपनी कार गिरवी रखनी पड़ी है.

‘‘इतने से काम नहीं चलेगा. बात 3 लाख की हुई है. पूरी रकम का इंतजाम आज ही करना होगा.’’ उन में से एक शख्स ने कहा.

‘‘मैं ने काफी कोशिश की, लेकिन 3 लाख का इंतजाम नहीं हो पाया. आप मुझे कल तक का टाइम दो. मैं कल तक 2 लाख रुपए का जुगाड़ कर दूंगा.’’ आशीष ने अनुरोध किया.

‘‘2 लाख नहीं, बाकी के सारे पैसे भी कल ही देने होंगे. पैसे कहां पहुंचाने हैं, यह बात हम तुझे फोन कर के बता देंगे. और हां, ज्यादा स्याणा बनने की कोशिश मत करना, वरना तेरी वीडियो फिल्म हमारे मोबाइल में है.’’ उन के एक साथी ने कहा.

इस के बाद वे पांचों वहां से चले गए. आशीष ने राहत की सांस ली. तब तक शाम हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने फोन कर के अपनी दुकान पर काम करने वाले लड़के से कह दिया कि दुकान बंद कर के चाबी अपने साथ ले जाए और सुबह जल्दी आ कर दुकान खोल ले. इस के बाद वह भी वेस्ट पटेलनगर के पास शादी खामपुर गांव स्थित अपने घर चले गए. अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन उन का चेहरा मुरझाया हुआ था. पत्नी ने इस की वजह जाननी चाही तो उन्होंने झूठ बोल दिया कि काम की वजह से थकान हो गई है.

खाना खाने के बाद आशीष जब बिस्तर पर लेटे तो उन की आंखों से नींद गायब थी. उन्हें बस यही चिंता सता रही थी कि कल उन लोगों को पैसे कहां से ला कर देंगे. अगर पैसों का इंतजाम नहीं हुआ तो उन्हें रेप के इलजाम में जेल जाना पड़ेगा. रात भर उन के दिमाग में इसी तरह के विचार घूमते रहे. सुबह को वह रानीबाग स्थित अपनी दुकान पर चले गए. आशीष दुकान पर पहुंचे ही थे कि एक अनजान नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी ओर से एएसआई सुभाषचंद की आवाज आई, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या नहीं?’’

यह सुन कर आशीष घबरा कर बोले, ‘‘सर, अभी नहीं हुआ है. मैं उसी के इंतजाम में लगा हूं.’’

‘‘जल्दी इंतजाम कर ले. पैसे ले कर तुझे आज ही शाम 7 बजे मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया के अनुकंपा बैंक्वेट हौल के पास आना है.’’ कह कर एएसआई सुभाषचंद ने फोन काट दिया.

आशीष को शाम 7 बजे से पहलेपहले पैसों का जुगाड़ करना था. उन्होंने मार्केट में अपने जानने वालों से बात की, पर पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, आशीष की चिंता बढ़ती जा रही थी. तमाम कोशिशों के बाद भी पैसों का इंतजाम नहीं हो सका. फिर भी वह शाम 7 बजे से पहले ही निर्धारित जगह पर पहुंच गए. तभी पहले वाले नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. आशीष ने कह दिया कि वह अनुकंपा बैंक्वेट हौल के सामने खड़े हैं. कुछ देर बाद 20-22 साल का एक युवक उन के पास आया. वह उसे देखते ही पहचान गए. वह युवक कल सुभाषचंद के साथ था. उस युवक ने अपना नाम अमित बताते हुए आशीष से पैसे मांगे.

आशीष ने उस के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं ने बहुत कोशिश की, तमाम लोगों के पास गया और कई से फोन पर भी बात की, लेकिन कहीं भी बात नहीं बनी. आप मुझे थोड़ा वक्त और दे दो.’’

‘‘नहीं, अब तुझे कोई टाइम नहीं मिलेगा. क्या करेगा, कहां से पैसे लाएगा, हमें नहीं पता. जैसे भी हो, पैसे ले कर आज रात साढ़े 9 बजे बाहरी रिंग रोड स्थित काली माता मंदिर पर पहुंच जाना. यह तुझे आखिरी मौका मिल रहा है.’’

यह सुन कर आशीष मानसिक तनाव में आ गए. उन के पास ढाई घंटे का समय बचा था. इन ढाई घंटों में वह इतनी मोटी रकम कहां से लाएं, यह बात उन की समझ में नहीं आ रही थी. अपना दुखड़ा रोने के लिए वह फिर से अपने दोस्त वैभव की फैक्ट्री में चले गए. वैभव को आशीष की हालत पर तरस आ रहा था, पर उस के पास इतनी मोटी रकम नहीं थी. आखिर उस ने आशीष को पुलिस के पास जाने की सलाह दी. आशीष के पास पुलिस में शिकायत ले कर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. काफी सोचनेसमझने के बाद वह दोस्त को साथ ले कर बाहरी जिले के थाना रोहिणी (दक्षिणी) चले गए.

थाने में मौजूद थानाप्रभारी संजय शर्मा को आशीष ने पूरी बात बता दी. थानाप्रभारी को जब यह पता चला कि उस गैंग में दिल्ली पुलिस का एक एएसआई भी शामिल है तो उन्हें आश्चर्य हुआ. वह एएसआई असली है या फरजी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था. उन्होंने पूरे मामले से बाहरी जिले के डीसीपी विक्रमजीत सिंह को अवगत करा दिया.

चूंकि उन लोगों ने आशीष को पैसे ले कर उसी रात साढ़े 9 बजे काली माता मंदिर पर बुलाया था, इसलिए उन्हें रंगेहाथों पकड़ने का अच्छा मौका था. डीसीपी विक्रमजीत सिंह ने एसीपी उमेश सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी संजय शर्मा, सबइंसपेक्टर रजनीश, हैडकांस्टेबल राजकुमार और कांस्टेबल कुलवीर को शामिल किया गया.

एएसआई सुभाषचंद द्वारा जिस नंबर से आशीष को फोन किया गया था, पुलिस के कहने पर आशीष ने उसी नंबर पर फोन किया, ‘‘हैलो सर, मैं आशीष बोल रहा हूं.’’

तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हां भई, बोल. पैसों का इंतजाम हो गया क्या?’’

‘‘जी, 9 लाख तो नहीं हो पाए, पर मैं बड़ी मुश्किल से 4 लाख का इंतजाम कर पाया हूं.’’ आशीष ने पुलिस के निर्देशानुसार कहा.

‘‘ठीक है, तू पैसे ले कर वहीं काली माता मंदिर पर पहुंच, हम वहीं मिलेंगे.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई.

बात हो जाने के बाद पुलिस टीम सादा कपड़ों में काली मंदिर पर पहुंच गई. इस के कुछ देर बाद ही आशीष भी अपनी कार से वहां पहुंच गए. अपने हाथ में बैग थामे जैसे ही वह कार से उतरे, एएसआई सुभाषचंद और अमित उन के पास पहुंच गए. उस समय सुभाषचंद पुलिस वर्दी में नहीं था. आशीष ने जैसे ही सुभाष के हाथ में बैग दिया, थाना रोहिणी (दक्षिणी) की पुलिस टीम ने दोनों को हिरासत में ले लिया.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. अन्य अभियुक्त फरार न हो जाएं, इसलिए एसीपी उमेश सिंह ने इस पुलिस टीम में मंगोलपुरी थाने के सबइंसपेक्टर रोबिन त्यागी, हैडकांस्टेबल दिनेश, सुभाष और कांस्टेबल वीरेंद्र को शामिल कर उसी दिन नांगलोई, कंझावला में दबिशें दे कर कंझावला से टिंकू उर्फ साहिल, नांगलोई से ललित सिंह और आजम खान को गिरफ्तार कर लिया. रैकेट में शामिल युवतियों शिखा और प्रीति के घरों पर भी दबिश डाली गई, लेकिन वे फरार हो चुकी थीं. पुलिस ने पांचों अभियुक्तों से पूछताछ की तो पता चला कि इन का सरगना सुभाषचंद ही था. वह फरजी पुलिस वाला नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस के कम्युनिकेशन विभाग का एएसआई था. उस की पोस्टिंग बाहरी जिला के थाना मंगोलपुरी में थी.

मूलरूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला सुभाषचंद करीब 26 साल पहले दिल्ली पुलिस में भरती हुआ था. बाद में उस ने सुल्तानपुरी में अपना मकान बना लिया था और परिवार के साथ दिल्ली में ही रहने लगा था. उस की मुलाकात जेजे कालोनी सावदा, नांगलोई के रहने वाले टिंकू से हुई. टिंकू साप्ताहिक बाजारों में दुकान लगाता था. टिंकू की दोस्ती कृष्णा पार्क देवली, खानपुर के रहने वाले अमित से थी. टिंकू के 2 दोस्त और थे आजम खान और अमित. आजम एक निजी अस्पताल में डायलिसिस मशीन का टेक्नीशियन था और अमित बाल बियरिंग मैकेनिक था.

ये सभी जल्द से जल्द पैसे कमाने की सोचते रहते थे. 6 महीने पहले ही अमित की प्रीति उर्फ मनीषा से शादी हुई. इसलिए उस का भी खर्च बढ़ गया था. वह आए दिन अखबारों में हनीटै्रप द्वारा लोगों को ठगने की खबरें पढ़ता रहता था. मोटी रकम कमाने के लिए उसे यह काम सही लगा. क्योंकि इस तरह एक ही झटके में मोटी रकम ऐंठी जा सकती थी. यह बात उस ने अपने दोस्तों को बताई. फिर उन लोगों ने इस बारे में मंगोलपुरी थाने में तैनात एएसआई सुभाषचंद से बात की. पैसों के लालच में वह भी उन का साथ देने को तैयार हो गया. असली पुलिस वाले के शामिल होने पर सभी की हिम्मत बढ़ गई.

योजना तो बन गई, लेकिन समस्या यह थी कि किसे फांसा जाए. इस के लिए इन लोगों ने कुछ कालगर्ल्स से संपर्क कर के किसी तरह उन लोगों के फोन नंबर हासिल कर लिए, जो उन के पास मौजमस्ती के लिए आते थे. ग्राहकों को फंसाने की जिम्मेदारी अमित की पत्नी प्रीति उर्फ मनीषा ने संभाली. शिकार फंसाने के लिए वह पहले लोगों से वाट्सऐप पर दोस्ती करती थी. दोस्ती के जरिए वह फंसने वाले से अनौपचारिक बातें भी करने लगती थी. फिर उस के पास कुछ लड़कियों के फोटो भेज कर उन्हें पसंद करने के लिए कहती थी. फंसा हुआ ग्राहक जब किसी लड़की के साथ जाने को तैयार हो जाता था तो उसी दौरान वे लोग उस के आपत्तिजनक फोटो खींच लेते थे. उसी को मुद्दा बना कर ये लोग उस से मोटी रकम ऐंठते थे.

इसी तरह उन्होंने वेस्ट पटेलनगर के शादी खामपुर गांव के रहने वाले आशीष को फांसा था. उस से उन्होंने 15 लाख रुपए मांगे. मामला 10 लाख रुपए में तय हो गया. इस से पहले कि उन की मंशा पूरी हो पाती, 5 अभियुक्त पुलिस के शिकंजे में फंस गए. गिरफ्तार हुए अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने 30 हजार रुपए नकद, 4 मोबाइल फोन, एक डिजिटल कैमरा बरामद किया. पुलिस ने 16 मार्च, 2016 को अभियुक्त सुभाषचंद, ललित सिंह, टिंकू, अमित और आजम को गिरफ्तार कर महानगर दंडाधिकारी रविंद्र सिंह के समक्ष पेश किया. पुलिस ने अमित, ललित और सुभाषचंद को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. जबकि आजम व टिंकू को जेल भेज दिया गया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने तीनों अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ कर के उन्हें 18 मार्च, 2016 को पुन: कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक प्रीति और शिखा पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सकी थीं. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. आशीष और वैभव परिवर्तित नाम हैं.

 

Bangalore Crime News: प्यार का खौफनाक अंत. प्रपोजल के बहाने प्रेमी को जिंदा जलाया

Bangalore Crime News: प्यार करने वाले रिश्तों में तकरार होना आम बात है, लेकिन कभीकभी यही तकरार इतना खतरनाक रूप ले लेती है कि इंसान बदले की आग में कुछ भी कर बैठता है. एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया, जिस ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया. यहां एक प्रेमिका ने प्यार के नाम पर ऐसा खौफनाक खेल खेला, जिस की कल्पना करना भी नमुमकिन है. प्रपोजल के बहाने उसने अपने ही प्रेमी को जिंदा जला दिया.

यह सनसनीखेज घटना कर्नाटक के बेंगलुरु शहर से जुड़ी बताई जा रही है. 27 साल की प्रेरणा ने अपने प्रेमी किरण को एक खास सरप्राइज देने के बहाने घर बुलाया. घर में उस समय कोई और मौजूद नहीं था, जिस का फायदा उठाते हुए उस ने पूरी साजिश को अंजाम दिया. शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगा, लेकिन धीरेधीरे हालात डरावने होते चले गए.

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बताया जाता है कि प्रेरणा ने किरण की आंखों पर पट्टी बांध दी और उस के हाथपैर कुरसी से कस कर बांध  दिए. जब किरण ने इस का विरोध किया तो उस ने इसे ‘फारेन स्टाइल प्रपोजल’ कहकर उसे भरोसे में लिया. प्यार में भरोसा करने वाले किरण को जरा भी अंदाजा नहीं था कि अगले ही पल उसकी जिंदगी खत्म होने वाली है.

कुछ ही देर बाद प्रेरणा ने उस पर पेट्रोल डाल दिया और आग लगा दी. बंधे होने की वजह से किरण खुद को बचा नहीं सका और मौके पर ही उस की दर्दनाक मौत हो गई. यह पूरी घटना इतनी भयावह थी कि जिस ने भी सुना, उस की रूह कांप उठी. जांच में सामने आया कि दोनों करीब एक साल से रिलेशनशिप में थे और एक ही टेलीकाम कंपनी में काम करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से उन के रिश्ते में खटास आ गई थी.

प्रेरणा इस बात से नाराज थी कि किरण उसे नजरअंदाज कर रहा था और शादी से बच रहा था. यही नाराजगी धीरेधीरे खतरनाक साजिश में बदल गई. घटना के बाद प्रेरणा ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की और कहा कि वह बाथरूम में थी, बाहर आ कर उस ने किरण को आग में जलता हुआ पाया. लेकिन जांच के दौरान यह कहानी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी. सीसीटीवी फुटेज और अन्य सबूतों ने सच्चाई उजागर कर दी.

पुलिस के मुताबिक, घर में पहले से पेट्रोल मौजूद था, जिस से साफ है कि हत्या की योजना पहले ही बना ली गई थी. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि आरोपी ने इस पूरी घटना का वीडियो भी अपने मोबाइल में रिकौर्ड किया. जब किरण आग में जल रहा था, तब भी वह वीडियो बनाती रही, जो इस अपराध की निर्दयता को साफ दिखाता है.

फिलहाल पुलिस ने प्रेरणा को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी है. शुरुआती जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि हत्या उसी ने की है. अब पुलिस इस मामले के हर पहलू को खंगाल रही है, ताकि इस खौफनाक वारदात के पीछे की पूरी सच्चाई सामने लाई जा सके. Bangalore Crime News

Uttar Pradesh Crime: ज्योति जो बुझ गई

Uttar Pradesh Crime: ज्योति का कमाने वाला पति था, 3 बच्चे थे, घर में किसी चीज की कमी नहीं थी लेकिन स्वार्थी राजेश के कहने में आ कर उस ने जो किया, उस से उस की खुद की जान तो गई ही, अपना और राजेश का घर भी बरबाद कर दिया.

आदमी में महत्त्वाकांक्षाएं कभीकभी ऐसा जुनून पैदा करती हैं कि कुछ पाने की चाह में उस के पास जो होता है, वह भी गंवा बैठता है. ज्योति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. वह उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के पंचवटी रोड स्थित यशोदानगर के रहने वाले कालका सिंह चौहान के बड़े बेटे जितेंद्र की पत्नी थी. उन का दूध का कारोबार था, जिसे अब उन का बड़ा बेटा जितेंद्र संभालता था.

ज्योति तहसील करहल के गांव तिलियानी के रहने वाले रिटायर्ड फौजी महेंद्र सिंह की बेटी थी. ससुराल में किसी चीज की कमी नहीं थी. वह बीए पास थी. शादी से पहले वह नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. अच्छी ससुराल मिल जाने की वजह से उस ने नौकरी वाली बात भुला भले दी थी, लेकिन मन से निकाल नहीं पाई थी, जिस की वजह से कभीकभी उसे लगता था कि वह जो करना चाहती थी, कर नहीं पाई.

ज्योति जितेंद्र के 2 बेटों और 1 बेटी की मां बन चुकी थी. घर के कामों को करते हुए कभीकभी उसे लगता कि जिंदगी इसी तरह खाना बनाते, बरतन धोते और घर वालों की चाकरी करते बीत जाएगी. कभी वह मन की बात पति से कहना चाहती तो उस के पास समय ही नहीं होता था कि वह पत्नी के मन की बात को सुनता. लेकिन समय को किस ने देखा है. कभी भी कुछ भी हो सकता है. वह कभी भी करवट ले सकता है और आदमी को कुछ भी करने का मौका दे सकता है.

करीब 4 साल पहले जितेंद्र ने अपने मकान का एक हिस्सा अपने दोस्त राजेश को किराए पर दे दिया. वह आगरा के फतेहाबाद के श्रीकृष्णपुरा के रहने वाले बीरी सिंह का बेटा था. दोस्त होने के नाते जितेंद्र ने उसे दूध के अपने कारोबार में पार्टनर बना लिया था. राजेश ने कारोबार में काफी मेहनत की, जिस से जल्दी ही उस की हैसियत जितेंद्र के घर में सदस्य जैसी हो गई. उस का खानापीना, उठनाबैठना, सब जितेंद्र के घर होने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि उसे जितेंद्र के घर के अंदर की बातें पता चल गईं.

कुछ ही दिनों में राजेश को लगा कि जितेंद्र और उस की पत्नी ज्योति के बीच कुछ ऐसा है, जो पतिपत्नी के बीच नहीं होना चाहिए. वह शादीशुदा था और जब भी मौका मिलता था, पत्नी से मिलने घर जाता रहता था. लेकिन घर से दूर रह कर उसे पत्नी की कमी तो खलती ही थी. उस ने महसूस किया कि ज्योति उदास रहती है. उस ने उस से उदासी का कारण पूछा तो वह टाल गई. राजेश को पता था कि ज्योति पढ़ीलिखी और स्मार्ट महिला है. उस के घर वालों की कुछ मजबूरियां रही होंगी, तभी उस की शादी एक कम पढ़ेलिखे लड़के से कर दी थी है.

दरअसल, ज्योति अब तक घर के कामों से ऊब गई थी. वह कुछ करना चाहती थी, लेकिन जितेंद्र का कहना था कि उसे किस चीज की कमी है, जो वह नौकरी करना चाहती है. इस से ज्योति को लगता था कि पति उस की भावनाओं की कद्र नहीं करता. राजेश का घर के अंदर तक आनाजाना था. पत्नी से दूर रहने की वजह से वह ज्योति के प्रति सहानुभूति दिखा कर उस से कुछ हासिल करना चाहता था. इसलिए एक दिन उस ने ज्योति से कहा, ‘‘भाभी, मैं देखता हूं, जितेंद्र भाई को तुम्हारी जो कद्र करनी चाहिए, वह नहीं करते. जबकि तुम सुंदर और स्मार्ट तो हो ही, उन से ज्यादा पढ़ीलिखी भी हो. आखिर तुम कुछ करना चाहती हो तो इस में बुरा क्या है? वैसे मुझे यह सब कहना तो नहीं चाहिए था, लेकिन तुम्हें परेशान देख कर कह दिया.’’

ज्योति को लगा, राजेश ठीक ही कह रहा है. वह सुंदर और स्मार्ट है, पढ़ीलिखी भी है. अगर वह चाहे तो कुछ कर सकती है. लेकिन जितेंद्र करने नहीं देता. शायद वह उसे इसी तरह नौकरानी बना कर रखना चाहता है. उस दिन दोपहर का खाना ले कर वह राजेश के कमरे में पहुंची तो राजेश ने कहा, ‘‘अरे भाभी, तुम ने क्यों तकलीफ की? मैं खाना लेने आ ही रहा था.’’

‘‘मैं ही ले कर आ गई तो क्या हो गया?’’ राजेश के कमरे में पड़ी कुरसी पर बैठते हुए ज्योति ने कहा, ‘‘अच्छा यह बताओ कि क्या मैं कुछ कर सकती हूं? घर का काम खत्म होने के बाद समय काटे नहीं कटता है.’’

‘‘भाभीजी, तुम पढ़ीलिखी हो, टीचर बन सकती हो, ब्यूटीपार्लर खोल सकती हो, जो भी चाहो, कर सकती हो.’’

‘‘तुम्हें मेरे ऊपर इतना विश्वास है?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, मैंने कहा न कि तुम सुंदर और पढ़ीलिखी हो, कुछ भी कर सकती हो. जितेंद्र तुम्हें परख नहीं पाया.’’

‘‘लेकिन तुम ने परख लिया?’’ ज्योति ने हंसते हुए कहा.

ज्योति का मन राजेश के इर्दगिर्द भटकने लगा तो पति से नफरत सी होने लगी. जल्दी ही वह राजेश के प्रति आकर्षित हो उठी. इस के बाद उस की नजरें बदल गईं तो राजेश को भांपते देर नहीं लगी. आखिर एक दिन उस ने ज्योति से मन की बात कह ही दी, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘प्यार, वह भी मुझ से? अरे मैं तुम्हारे दोस्त की पत्नी हूं और उन के 3 बच्चों की मां भी.’’

‘‘अब भाभी, तुम पर दिल आ गया तो मैं क्या करूं. मैं उस के हाथों मजबूर हूं. मैं तुम्हें ले कर परेशान रहता हूं. काम में भी मन नहीं लगता. अगर तुम ने ना कर दिया तो शायद मैं यहां न रह पाऊं.’’ राजेश ने कहा.

राजेश ने जाने की बात की तो ज्योति का दिल धड़क उठा. उस ने कहा, ‘‘मुझे कुछ सोचने का समय दो.’’

‘‘सोचना क्या है? मेरा दिलोदिमाग सब बेचैन है. मेरी रातों की नींद और दिन का चैन लुटा हुआ है. अगर यही हाल रहा तो मैं पागल हो जाऊंगा.’’

ज्योति ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज रात जितेंद्र बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘जितेंद्र बाहर जाए या घर में रहे, इस से मुझे क्या मिलेगा?’’ राजेश ने उत्सुकता से पूछा.

ज्योति ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘लगता है, तुम बुद्धू ही हो. इसीलिए मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आई. आज रात में मिलूंगी.’’

राजेश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इतनी आसानी से काम बन जाएगा, उस ने सोचा भी नहीं था. फिर उस रात राजेश ने दोस्त के दांपत्य में सेंध लगा दी. जितेंद्र को पता ही नहीं चला कि दोस्त आस्तीन का सांप बन गया है. पत्नी और दोस्त दोनों ही बेवफा हो गए थे. वह 2 दिनों के लिए बाहर गया था. लौट कर आया तो सब बदल गया था. रात को पलंग पर ज्योति रहती तो उस के पास थी, लेकिन साथ नहीं रहती थी.

कुछ ही दिनों में जितेंद्र को लगने लगा कि उस के घर में कुछ गड़बड़ है. क्योंकि ज्योति उस की उपेक्षा करने लगी थी. लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा था कि इस की वजह क्या है. पर ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी कहां रहती हैं. पत्नी और दोस्त के हावभाव से उसे शक होने लगा. पिछले कुछ दिनों से वह देख रहा था कि राजेश को वह काम से बाहर भेजना चाहता तो वह कोई न कोई बहाना कर के घर में ही रहना चाहता था. लेकिन बिना सबूत के कुछ कहना ठीक नहीं था.

अब तक ज्योति को लगने लगा था कि आखिर उस के और राजेश के इस संबंध का भविष्य क्या है? इस की वजह यह थी कि अब वह राजेश को दिल से चाहने लगी थी और आगे की जिंदगी उसी के साथ बिताना चाहती थी. इसलिए एक दिन उस ने राजेश से पूछ लिया, ‘‘राजेश, हम इस तरह कब तक चोरीछिपे मिलते रहेंगे.’’

‘‘जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दो, इस में बुरा क्या है.’’ राजेश ने कहा.

‘‘अब मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. यह लुकाछिपी मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘लेकिन ज्योति मैं पत्नीबच्चों वाला हूं, उन का क्या होगा?’’

‘‘मैं उन के बारे में क्यों सोचूं? मैं ने पति को दिल से निकाल दिया है, इसलिए अब तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. इस के लिए तुम्हें कुछ तो करना ही होगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कुछ सोचता हूं.’’ राजेश ने कह तो दिया, लेकिन वह जानता था कि पत्नी के रहते वह ज्योति के लिए कुछ नहीं कर सकता. वैसे भी वह ज्योति को ले कर जरा भी गंभीर नहीं था. उस ने तो मौजमस्ती के लिए उस से संबंध बनाए थे.

इस मामले में बात आगे बढ़ती, संयोग से एक दिन जितेंद्र ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. राजेश को तो उस ने खरीखोटी सुना कर भगा दिया, जबकि ज्योति की जम कर पिटाई कर दी. राजेश के जाने के बाद से ज्योति परेशान रहने लगी थी. आखिर एक दिन राजेश का फोन आया तो उस ने अपने दिल की बात उस से कही. तब राजेश ने कहा, ‘‘ज्योति, मुझे भले ही तुम्हारे घर से निकाल दिया गया है, लेकिन मैं तुम्हें दिल से नहीं निकाल पाया हूं.’’

राजेश के लिए परेशानी तब खड़ी हो गई, जब उस की पत्नी विमला को उस के  और ज्योति के संबंधों का पता चल गया. उसे शक तो पहले से ही था, लेकिन जब पति के मोबाइल में उस ने ज्योति का फोटो देखा तो विश्वास हो गया. वह समझ गई कि पति धोखा दे रहा है. उस ने राजेश से साफ कह दिया, ‘‘अगर तुम ने ज्योति से संबंध खत्म नहीं किए तो मैं जान दे दूंगी. उस के बाद तुम जेल की हवा खाते रहना.’’

एक ओर पत्नी थी, दूसरी ओर प्रेमिका. दोनों के बीच फंसा राजेश बेचैन हो उठा. उधर राजेश के जाने के बाद से जितेंद्र को लगता था कि सब ठीक हो चुका है, लेकिन ज्योति तो पहले से ज्यादा उग्र हो उठी थी. राजेश से मिलने के लिए ही उस ने घर में कहा कि वह बीएड करना चाहती है. जितेंद्र ने सोचा कि अगर ज्योति का मन पढ़ाई में लग जाता है तो वह राजेश को भूल जाएगी. इसलिए उस ने बीएड करने के लिए ज्योति का दाखिला शमसाबाद स्थित एनडी कालेज में करा दिया.

बीएड तो एक बहाना था, ज्योति ने राजेश से मिलने और उस पर शादी का दबाव डालने के लिए यह सब किया था. जबकि राजेश ने सिर्फ मजा लेने के लिए उस से संबंध बनाए थे. ज्योति अब उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. एक दिन उस ने फोन कर के कहा, ‘‘राजेश अगर तुम्हें लगता है कि मैं मजाक कर रही हूं तो यह तुम्हारी भूल है. मैं सचमुच तुम से शादी करना चाहती हूं. अगर तुम ने धोखा दिया तो मैं तुम्हें जेल भी भिजवा सकती हूं.’’

ज्योति के तेवर देख कर राजेश डर गया. अब वह सोचने लगा कि ज्योति से कैसे छुटकारा पाए, क्योंकि अब उस की वजह से उस की गृहस्थी बरबाद होने वाली थी. दूसरी ओर उस की वजह से जितेंद्र भी उस की जान का दुश्मन बन सकता था. इसलिए उस ने सोचा कि अगर ज्योति को ठिकाने लगा दिया जाए तो सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इस के बाद उस ने ज्योति को फोन कर के कहा, ‘‘ज्योति, तुम ऐसा करो, फतेहाबाद आ जाओ, यहीं बैठ कर आपस में बात करते हैं कि कैसे क्या किया जाए.’’

20 अक्तूबर, 2016 को कालेज जाने के बहाने ज्योति घर से निकली. दोपहर बाद उस ने जितेंद्र को फोन किया कि बैंक बंद होने की वजह से वह पैसा नहीं निकाल पाई, इसलिए रात में किसी सहेली के पास हौस्टल में रुक जाएगी. कल सुबह घर आ जाएगी. इस के बाद ज्योति का मोबाइल बंद हो गया. अगले दिन वह न घर आई और न फोन पर बात हो सकी तो घर वालों को चिंता हुई. जितेंद्र ने कालेज और हौस्टल जा कर पता किया, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

इस के बाद ज्योति की तलाश शुरू हुई. राजेश से भी पूछा गया, लेकिन उस ने जानने से साफ मना कर दिया. काफी तलाश के बाद भी जब ज्योति का कुछ पता नहीं चला तो इटावा कोतवाली में जितेंद्र ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. जितेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ज्योति कहां चली गई. अब पुलिस वाले भी उस की तलाश में लग गए थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. कभीकभी गुनाह सिर चढ़ कर बोलता है. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ. 6 नवंबर, 2016 को राजेश जितेंद्र के घर पहुंचा और मुंह लटका कर बोला, ‘‘जितेंद्र भाई, भाभी का कुछ पता चला?’’

‘‘नहीं, लेकिन कभी न कभी तो पता चल ही जाएगा.’’

‘‘वह कुछ तो कह कर गई होंगी?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘अब इस का क्या फायदा? जब लौट कर आएंगी, तभी पता चलेगा कि वह कहां गई थीं.’’ जितेंद्र ने कहा.

‘‘देखो जितेंद्र, तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुम से पूरी सहानुभूति है. कुछ गलतियां जरूर मुझ से हुई हैं, पर मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं. मैं यहां तुम को कुछ बताने आया हूं. फोन पर बताता तो तुम पता नहीं क्या सोचते. ज्योति भाभी को फतेहाबाद में देखा गया है, पर यकीन मानो वह मेरे पास नहीं आई थीं. तुम्हें तो पता ही है कि आजकल मैं चौकीदारी की नौकरी कर रहा हूं. छुट्टी मुश्किल से मिलती है, वरना मैं तुम्हारी मदद जरूर करता.’’

राजेश की बातों से जितेंद्र को उस पर शक हुआ. उस ने तुरंत कोतवाली पुलिस को फोन कर के बुला लिया. पुलिस राजेश को हिरासत में ले कर कोतवाली ले आई और जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने ज्योति की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद कोतवाली पुलिस राजेश को ले कर फतेहाबाद पहुंची और सीओ ए.के. सिंह से मिली. उन की उपस्थिति में राजेश की निशानदेही पर वह जहां चौकीदारी करता था, वहां खुदाई कराई गई तो ज्योति की सड़ीगली लाश बरामद हो गई. पत्नी की लाश देख कर जितेंद्र फूटफूट कर रोने लगा.

थाना फतेहाबाद में अपराध संख्या 334/15 पर राजेश के खिलाफ ज्योति की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया गया. इस के बाद उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस तरह ज्योति की महत्वाकांक्षा उसे तो ले डूबी ही, 2 घर भी बरबाद हो गए. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Crime: बदचलन बहू

Family Crime: न जाने कितनों को हवालात की हवा खिलाने वाले मोहन सक्सेना बहू की बदचलनी से इस कद्र आजिज आ गए कि यह जानते हुए भी कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, उन्होंने कानून हाथ में ले ही लिया. नतीजतन अब वह बेटे के साथ जेल में है.

मध्य प्रदेश पुलिस में असिस्टैंट सबइंसपेक्टर मोहन सक्सेना के दिन का चैन और रातों की नींद गायब थी. सोतेजागते, उठतेबैठते उन्हें एक ही शख्स नजर आता था, वह था उन का पुराना ड्राइवर अंकित चौरसिया. अंकित बिना किसी डर और लिहाज के उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा था. गुस्से, खीझ और बेबसी में मोहन सक्सेना दांत पीस कर रह जाते थे. उन्हें कभीकभी इस बात का डर सताने लगता कि कहीं उन्हें इस तनाव में फिर से लकवा न मार जाए या  हार्टअटैक न आ जाए.

59 वर्षीय मोहन सक्सेना की तैनाती शाजापुर की पुलिस लाइन में थी. वह अगले ही साल रिटायर होने वाले थे. एक उम्र पुलिस की नौकरी करने वाले मोहन सक्सेना की जिंदगी में कई तरह के उतारचढ़ाव आए. लेकिन जिंदगी की ढलती शाम में वह जो कुछ देख रहे थे, वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था. इस की वजह थी उन की बहू नेहा. शाजापुर में उन का अपना अलग रुतबा था, जिस की वजह वरदी या पुलिस की नौकरी ही नहीं, बल्कि एक इज्जतदार कायस्थ परिवार का मुखिया होना भी था. बहू द्वारा किए जा रहे कृत्य से उन्हें अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती नजर आ रही थी. लेकिन वह करें क्या उन की समझ में नहीं आ रहा था.

क्योंकि लाख समझानेबुझाने और चेतावनी देने पर भी न नेहा मान रही थी और न ही अंकित रास्ते पर आ रहा था. उन के सुनने में तो यहां तक आया कि अंकित ने अपने मोबाइल फोन में नेहा के साथ बिताए अंतरंग दृश्यों की कुछ फोटो तक खींच रखी हैं जिन्हें वह अपने दोस्तों को दिखाता रहता है. ऐसी बेबसी में अकसर वह उस घड़ी को कोसते थे, जब उन्होंने अंकित को शरीफ मानते हुए अपने यहां ड्राईवरी की नौकरी पर रखा था. दरअसल मोहन सक्सेना का बेटा नितिन दिमागी तौर पर कुछ कमजोर है. यह बात सारा शाजापुर जानता था.

अपने रिटायर होने से पहले उन्होंने उस की शादी अपने बराबर वाले घर में कर दी थी. बेटा कुछ करता है, यह दिखाने के लिए उन्होंने एक कार खरीद ली थी, जो बतौर टैक्सी चलती थी. अंकित को यही गाड़ी चलाने के लिए रखा गया था. शुरूशुरू में तो सबकुछ ठीकठाक चला. सवारियां मिल जातीं तो अंकित गाड़ी ले कर चला जाता और न मिलती तो शहर में इधरउधर घूम कर वक्त काटता. उधर नितिन को अपने लिए जमाए जा रहे इस ट्रैवलिंग के कारोबार से कोई खास लेनादेना नहीं था. इतना ही नहीं, उस की दिलचस्पी तो अपनी पत्नी में भी नहीं थी, जो खासी खूबसूरत, आकर्षक और चंचल थी. उस की पति से बिलकुल पटरी नहीं बैठती थी.

अंकित ने इसी बात का फायदा उठाया. वह नेहा को चाहने लगा और उस से करीबी संबंध बनाने की जुगत में लग गया. अपने बातूनी स्वभाव से उस ने उसे प्रभावित करना शुरू कर दिया. बातों का दायरा बढ़तेबढ़ते प्यार के मुकाम तक पहुंच गया और फिर एक दिन ऐसा भी आ गया, जब दोनों के संबंध बन गए. इस के बाद सिलसिला बन गया. दोनों ने ही बूढ़े मोहन सक्सेना का किसी भी स्तर पर कोई लिहाज नहीं किया.

पिछले साल एकाएक मोहन सक्सेना को लकवा मार गया तो अंकित को उन के घर आनेजाने के ज्यादा मौके मिल गए. सक्सेना परिवार के सारे काम वह वक्त पर ईमानदारी से कर देता था. लेकिन नेहा के आकर्षण से खुद को नहीं बचा सका. नेहा भी खूबसूरत और मजाकिया स्वभाव के अंकित के प्रेमजाल में फंसने से खुद को नहीं रोक पाई थी. उस के संस्कार इस कथित प्यार या व्यभिचार के आगे ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाए.

लकवाग्रस्त मोहन सक्सेना का लंबा इलाज चला तो उस बुरे वक्त में कई मामलों में नितिन की भूमिका अंकित निभा रहा था, इसलिए मोहन उस के एहसान तले दबते जा रहे थे. इलाज के अलावा वह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का भी सहारा ले रहे थे. यानी वह हर हालत में ठीक हो जाना चाहते थे. और इस सब से जल्द ही वह ठीक भी हो गए.

शाजापुर एक छोटा सा कस्बा है, इसलिए मोहन सक्सेना की बहू के प्रेमसंबंधों की चर्चा लोग चटकारे लेले कर करने लगे. यह बात जब मोहन सक्सेना के कानों में पड़ी तो वह बौखला उठे. एक बार तो उन्हें कान सुनी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि नेहा शरीफ घर की थी. उस के मांबाप ने उसे बेहतर संस्कार दिए थे. रही बात अंकित की तो कल के इस छोकरे की क्या मजाल जो उन की बहू की तरफ आंख उठा कर भी देखे. लेकिन पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने कई संस्कारवान बहूबेटियों का त्रियाचरित्र देखा था और अंकित जैसे रंगीले मजनूं भी देखे थे.

लिहाजा दिमाग में आया शक दूर करने के लिए उन्होंने खुद चोरीछिपे दोनों की निगरानी शुरू कर दी. नितिन से तो उन्हें कोई उम्मीद करना बेकार लग रहा था. दिमागी कमजोरी के चलते वह गुस्से और जल्दबाजी में बगैर सोचेसमझे कोई ऐसा कदम उठा सकता था, जो काफी महंगा पड़ता. इसलिए उन्होंने इस बारे में नितिन को कुछ नहीं बताया. आखिर एक दिन उन्होंने खुद अपनी आंखों से अंकित और बहू नेहा को अपने ही घर में आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया तो मारे गुस्से के उन का शरीर जल उठा. उन्हें विश्वास हो गया कि बाहर उन के बहू और अंकित के बारे में जो बातें की जा रही हैं, निराधार नहीं थीं. उन का मन कर रहा था कि वह अंकित को ऐसी सजा दें कि कोई भी उन के घर की तरफ नजर उठाने की हिम्मत न करे.

लेकिन वह कानून को अपने हाथ में लेना नहीं चाहते थे और अदालत या बाहर की दुनिया तक खुद बात ले जाएं तो जगहंसाई के साथ उन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली बात होती. किसी तरह जहरीला घूंट पी कर वह चुप रहे. लेकिन अगले दिन उन्होंने दोनों को खूब लताड़ा. अंकित को उन्होंने नौकरी से हटा दिया, साथ ही नेहा को भी सख्त लहजे में समझा दिया कि आइंदा वह उस लड़के से मिलेगी तो अच्छा नहीं होगा.

ससुर के गुस्से को देख कर नेहा उस समय सहम जरूर गई थी, लेकिन अंकित की यादों को वह दिल से निकाल नहीं पाई. वह ससुर से नजरें बचा कर उस से घर से बाहर मिलने लगी. यानी आशिक का लगाव ससुर की वरदी पर भारी पड़ा. आशिक से बाहर मिलने की बात भी मोहन सक्सेना से ज्यादा दिनों तक छिप नहीं सकी. वह परेशान थे कि बहू का क्या करें, जो यह उस लड़के का पीछा छोड़ दे. उसी समय अचानक मोहन सक्सेना के दिमाग में तांत्रिक बाबा उर्फ संजय व्यास का खयाल आया. उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी. वह खुद भी मानते थे कि उन का लकवा तांत्रिक बाबा ने ही ठीक किया था.

कुछ साल पहले तक संजय व्यास शाजापुर के ही एक सरकारी बैंक में चपरासी था. बाद में वह नौकरी छोड़ कर कस्बे में छोटे किले के पास स्थित बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर तंत्रक्रियाओं द्वारा लोगों का इलाज करने लगा था. इस तरह तथाकथित तांत्रिक बन कर वह लोगों की जेबें ढीली करने लगा था. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी थी. देखते ही देखते वह शहर में इतना मशहूर हो गया कि हर गुरुवार को उस के पास हैरानपरेशान लोगों की भीड़ लगने लगी थी. संजय का यह कारोबार चल निकला तो उस ने हुलिया भी बदल लिया. वह हरे रंग के कपड़े पहनने लगा. उस के गले में तरहतरह की मालाएं और अंगुलियों में हरे, काले, लाल आदि रंगों वाले  नगों की अंगूठियां चमकने लगीं.

अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए मोहन उस तथाकथित तांत्रिक उस की शरण में आने लगे. उन्होंने बहू के देहरी लांघने वाली बात तांत्रिक को बता कर कहा कि किसी भी तरह वह कुछ ऐसा कर दें कि बहू का प्रेमी अंकित की तरफ से मन उचट जाए. तांत्रिक संजय ने उन्हें भरोसा दिया कि वह अपनी सिद्धियों के बल पर ऐसा कर देगा कि नेहा उस लड़के का नाम तक नहीं लेगी. इस काम के लिए उस ने मोहन सक्सेना से मोटी रकम भी ली.

इसी तांत्रिक के पास अंकित भी पहुंच गया. अंकित ने उस से कहा कि उस की प्रेमिका नेहा अब उस से दूरियां बना रही है. वह ऐसा कुछ कर दे कि वह पति को छोड़ कर उस के पास आ जाए. बातचीत से तांत्रिक को पता लग गया कि इस का चक्कर मोहन सक्सेना की बहू से चल रहा है. वह उस के पास इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए आए थे. तांत्रिक के लिए मोहन सक्सेना या अंकित में से कोई भी उस का सगा नहीं था. उस का मकसद तो दोनों से पैसे कमाना था. इसलिए उस ने अंकित से भी मोटे पैसे ले लिए. इस तरह तांत्रिक संजय दोनों से ही पैसे ऐंठता रहा.

बाद में मोहन को पता चला कि अंकित भी संजय बाबा के पास आता है तो उन का माथा ठनका. वह भागेभागे संजय बाबा के पास पहुंचे. उन्होंने पैसों का लालच दे कर बाबा से अंकित के बारे में पूछा तो उस ने मनुहार के बाद बता दिया कि अंकित नेहा को अपने वश में करवाने के लिए आता है. मोहन सक्सेना अब अंकित से तुरंत छुटकारा पाना चाहते थे. इस बारे में उन्होंने तांत्रिक संजय से बात की. बातचीत के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब तंत्रमंत्र से तो बात संभलने वाली नहीं, लिहाजा अंकित की हत्या कर दी जाए.

वैसे कई बार यह बात मोहन सक्सेना के मन में आई थी, लेकिन अपने पुलिसिया तजुर्बे से वह जानते थे कि किसी का कत्ल कर कानून से बच पाना आसान काम नहीं होता. इसलिए वह यह अपराध नहीं करना चाहते थे. पर अब उन्हें तांत्रिक संजय का साथ मिल रहा था, इसलिए वह तैयार हो गए. तांत्रिक संजय व्यास अंकित की हत्या के लिए तैयार हो गया. इस के लिए उस ने मोहन सक्सेना से 15 हजार रुपए की मांग की तो उन्होंने झट से पैसे दे दिए. क्योंकि जिस काम के लिए वह अपनी अब तक की सारी कमाई खर्च करने को तैयार थे, वह काम काफी सस्ते में हो रहा था.

दूसरी ओर अंकित को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि संजय और मोहन के बीच क्या खिचड़ी पक चुकी है. वह तो यह सोच कर खुश हो रहा था कि तांत्रिक की वशीकरण क्रिया के बाद नेहा हमेशा के लिए उस के पास चली आएगी. इसलिए तांत्रिक उस से जोजो काम करने के लिए कहता था, वह वैसा ही कर रहा था. एक दिन संजय बाबा ने उस से कहा कि एक विशेष तांत्रिक क्रिया करनी जरूरी है, जो शाजापुर में नहीं, बल्कि दूसरी किसी जगह पर करनी होगी. अंकित तुरंत तैयार हो गया. उसे लगा कि इस क्रिया के बाद नेहा उस के साथ भागने को तैयार हो जाएगी. फिर दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे.

संजय ने उसे बताया था कि यह काम 16 जनवरी शनिवार को करना ठीक रहेगा. अंकित तैयार हो गया. उस ने संजय को बताया कि वह ठीक वक्त पर गाड़ी ले कर आ जाएगा. इस के बाद पूजा के लिए चले चलेंगे. अंकित उस समय शाजापुर की ही एक संभ्रांत महिला निर्मला गौर के यहां ड्राइवर की नौकरी कर रहा था. उस दिन उस ने निर्मला से यह कह कर उन की कार मांग ली कि वह कुछ दोस्तों के साथ उज्जैन जाना चाहता है. निर्मला को इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. उन्होंने कार की चाबियां अंकित को दे दीं.

16 जनवरी की सुबह अंकित तांत्रिक बाबा के पास पहुंच गया. तांत्रिक उसे बैरसिया होते हुए विदिशा रोड पर स्थित भोजापुरा के जंगल में ले गया. यह जंगल आमतौर पर सुनसान रहता है. इस जंगल में हत्या करने की सलाह दरअसल में मोहन सक्सेना ने ही दी थी, ताकि इतनी दूर लाश मिलने पर उस की शिनाख्त न हो सके. जंगल में एक जगह पर बैठ कर संजय व्यास अंकित से पूजा करवाने लगा. कुछ देर बाद तांत्रिक संजय ने कहा, ‘‘इस सिद्धि के लिए तुम्हें अपने सारे कपड़े उतारने पड़ेंगे.’’

पहले तो अंकित तांत्रिक की इस बात पर चौंका, पर यह क्रिया प्रेमिका को पाने के लिए की जा रही थी, इसलिए वह तैयार हो गया. पूजा वाली जगह से कुछ दूरी पर मोहन सक्सेना अपने बेटे नितिन के साथ छिपे बैठे थे. अंकित जब पूरी तरह पूजा में डूब गया तो तांत्रिक संजय का इशारा पा कर दोनों आहिस्ते से अंकित के पीछे आ गए. मोहन ने मौके का फायदा उठाते हुए लोहे की रौड का एक भरपूर वार उस के सिर पर कर दिया, इस के बाद नितिन और तांत्रिक भी उस पर टूट पड़े. तीनों को जब उस के मरने की तसल्ली हो गई तो योजना के मुताबिक उन्होंने एक बड़े पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया, जिस से लाश की पहचान न हो पाए.

अंकित की हत्या करने के बाद तांत्रिक संजय और नितिन बैरसिया होते हुए वापस आए तो मोहन पहले इंदौर गए, फिर शाजापुर आए. इस दौरान तीनों ने अपने मोबाइल बंद रखे. क्योंकि मोहन सक्सेना जानते थे कि जांचपड़ताल में मोबाइल की लोकेशन पता चल जाती है. इसलिए उन्होंने यह अहतियात बरती थी. 17 जनवरी, 2016 की सुबह गांव वाले जंगल की तरफ गए तो उन्होंने वहां लाश देखी. इस की खबर उन्होंने बैरसिया थाने को दी तो एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर पुलिस टीम घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. मौके पर जितने लोग खड़े थे, पुलिस ने उन से उस निर्वस्त्र लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर चेहरा कुचला हुआ होने की वजह से कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. वहां कोई ऐसा सामान भी नहीं मिला, जिस से लाश की शिनाख्त हो सकती.

पुलिस को लाश से कुछ दूरी एक आई-20 कार लावारिस हालत में खड़ी मिली. पर उस की नंबर प्लेट्स गायब थीं. कार खोल कर तलाशी ली गई तो उस के दस्तावेज मिल गए. कागजों से पता चला कि वह कार शाजापुर की निर्मला गौर नाम की महिला के नाम है. कार की नंबर प्लेट गायब होने पर पुलिस को शक हुआ कि हो न हो, कार का इस हत्या के मामले से जरूर कोई संबंध है.

पुलिस जब शाजापुर में निर्मला गौर के पास पहुंची तो उन्होंने बता दिया कि कार उन का ड्राइवर अंकित ले गया था. उन्होंने ड्राइवर अंकित का हुलिया पुलिस को बताया तो कदकाठी से वह लाश के हुलिए जैसा ही था. उन्होंने पुलिस को अंकित का पता बताया तो पुलिस अंकित के घर पहुंच गई और लाश की शिनाख्त के लिए उस के घर वालों को पोस्टमार्टम स्थल पर ले गई. घर वालों ने लाश की शिनाख्त अंकित के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस हत्यारों का पता लगाने में जुट गई. जांच में पुलिस को मृतक जानकारी मिली. उन के ही महकमे के एएसआई मोहन सक्सेना के यहां नौकरी करता था और उस का उन की बहू नेहा के साथ चक्कर चल रहा था. पुलिस को मुखबिर से यह भी जानकारी मिली थी कि 16 जनवरी, 2016 की रात तांत्रिक बाबा संजय व्यास को कार में अंकित के साथ देखा गया था.

तांत्रिक संजय को पुलिस ने थाने बुलवा लिया. उस से अंकित के बारे में पूछताछ की गई तो वह किसी तरह की जानकारी होने से इंकार करता रहा. पर जैसे ही उसे यह बताया गया कि पिछली रात उस के मोबाइल की लोकेशन बैरसिया के आसपास थी तो वह घबरा गया. इस के बाद उस ने अंकित की हत्या की सच्चाई बता दी. तांत्रिक के बयान पर पुलिस ने मोहन और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंकित नेहा से शादी करने की हसरत दिल में लिए दुनिया से चला गया और नेहा अब मायके में है. शाजापुर में किसी को उस से सहानुभूति नहीं है, उलटे लोग उसे ही इस कांड की वजह मान रहे हैं. अपनी सेवा अवधि में कइयों को हवालात पहुंचा चुके मोहन सक्सेना अब खुद अपने बेटे नितिन के साथ जेल की हवा खा रहे हैं, साथ में तथाकथित तांत्रिक संजय व्यास भी है, जिस की कलई खुलने पर लोग उसे भी कोस रहे हैं. Family Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, नेहा परिवर्तित नाम है)

 

True Crime Story: बौंबशैल बौंडिट संदीप कौर

True Crime Story: भारतीय मूल की संदीप कौर अपनी अलग सोच और चाहत के चलते शराब पीने के साथसाथ मोटी रकम के लिए कैसीनो में जुआ भी खेलने लगी थी. इसी लत ने उसे लुटेरी बना दिया और वह अकेली ही नायाब तरीके से बैंकों में डकैती डालने लगी. लेकिन एक दिन वह पकड़ी गई और उसे…

6 जून, 2014 की बात है. 24-25 साल की संदीप कौर ने अपने आई पैड पर एक बैंक की लोकेशन देख कर उसे लूटने की योजना बनाई. कैलिफोर्निया की सांटा क्लैरिटा वैली में बैठी संदीप कौर लूट की योजना बना कर उस के अच्छेबुरे हर पहलू पर विचार कर रही थी. यह जगह लौस एंजिलस से उत्तरपश्चिम की तरफ 38 किलोमीटर की दूरी पर है. वैसे डकैती के पेशे में आने से पहले उस ने इस बारे में काफी अध्ययन किया था. उसी से उसे पता चला था कि उस इलाके के बैंकों में पहले से डकैतियां हुई थीं. उन के अपराधी पकड़े नहीं गए थे. लेकिन वह यह सच्चाई भी अच्छी तरह जान गई थी कि कुछ बैंक लुटेरे भागते समय पुलिस की गोली से मारे भी गए थे.

पहली बात ने संदीप को उत्साहित जरूर किया था, लेकिन दूसरी बात उसे बुरी तरह भयभीत कर गई थी. कुछ देर के लिए उसे घबराहट हुई. डकैती के अलावा उस के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं था. इसलिए उस ने किसी तरह अपनी घबराहट से पीछा छुड़ा लिया. खुद को संभालते हुए उस ने केवल डकैती के तरीकों पर विचार किया. वह एक नर्स थी, लेकिन वह उस रूप में बैंक लूटना चाहती थी, जिस से कोई भी उसे पहचान न सके.

उस ने वहीं एकांत में बैठ कर अपने सिर पर एक आकर्षक विग फिट कर के अपना हुलिया बदला. आंखों पर उस ने निहायत खूबसूरत चश्मा लगा लिया. अपनी वेशभूषा भी उस ने बदल ली. अब उस का हुलिया पूरी तरह बदल गया था. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह नर्स है. बैंक से पैसा लूटने जा रही 5 फुट 3 इंच की इस लड़की के पास कोई हथियार नहीं था. जैसे ही वह बैंक के नजदीक पहुंची, उस ने अपनी जैकेट की जिप पौकेट से कागज का टुकड़ा निकाल कर उस पर जल्दी से कुछ लिखा. फिर उसे तह कर के अपनी जेब में रख लिया.

इस के बाद वह बैंक के मुख्य गेट से सीधी चीफ कैशियर के पास पहुंची. उस वक्त वहां कोई ग्राहक वगैरह नहीं था. उस ने अपनी जेब से कागज का वही टुकड़ा निकाल कर कैशियर की ओर फेंकते हुए सधे शब्दों में पूरी नाटकीयता से कहा, ‘‘मैडम, मैं एक बड़े क्रिमिनल गैंग की मैंबर हूं. हम लोग पूरा बैंक लूटते हैं. लेकिन फिलहाल मुझे केवल एक हजार डौलर की जरूरत है. चुपचाप मुझे यह रकम दे दो वरना मैं इस बैंक को बम से उड़ा दूंगी. मेरी इस ड्रैस पर बम का कोई असर नहीं होगा, जबकि तुम मारी जाओगी.’’

कैशियर एक प्रौढ़ महिला थी. उस ने कागज की तह खोल कर उसे पढ़ा. उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘टिकटौक, आई हैव ए बौंब.’

महिला कैशियर डर गई. उस ने उस कागज को इधरउधर छिपाने की कोशिश करते हुए देखा. आसपास के बैंककर्मी अपने कामों में व्यस्त थे. किसी ग्राहक का ध्यान भी उस तरफ नहीं था. तभी कैशियर ने एक लिफाफा उठाया, सावधानी से उस में डौलर भरे और लिफाफा संदीप कौर के हवाले करते हुए धीमे से कहा, ‘‘किसी का कोई नुकसान करने की जरूरत नहीं है, रहमदिली सीखो. मैं ने अपनी नौकरी खतरे में डाल कर भी तुम्हारी जरूरत पूरी कर दी है. अब तुम कैशकैबिन की बगल से होती हुई पिछले दरवाजे से बाहर निकल जाओ.’’

संदीप कौर बड़े इत्मीनान से बैंक से बाहर निकली और अपनी गाड़ी में बैठते ही गटगट कर के बोतल का पूरा पानी पी गई. इस के बाद उस ने चैन की सांस ली और वहां से चली गई. संदीप कौर कोई विदेशी नहीं, बल्कि मूलरूप से भारत की ही रहने वाली थी. उस का जन्म 11 नवंबर, 1989 को चंडीगढ़ में हुआ था. परिवार में मातापिता के अलावा एक छोटा भाई था जितेंद्र. जितेंद्र के जन्म के कुछ अरसा बाद ही यह परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया था. फिर यह परिवार भारत को अलविदा कह कर अमेरिका चला गया था. इन लोगों की योजना वहीं बसने की थी. सैन जौस इलाके में भारतीयों की भरमार है. इन लोगों ने भी वहीं अपने रहने का ठिकाना बना लिया.

वहां के तमाम लोग एकदम अपनों जैसे लगते थे, लेकिन संदीप कौर चाह कर भी इस वातावरण में एडजस्ट नहीं कर पा रही थी. उसे सब पराया सा लगता था. अकसर वह खुद को अजनबी महसूसकरती थी. 9/11 के अटैक्स के बाद जैसे अनेक लोग उन्हें शक की निगाह से देखने लगे थे. जिस स्कूल में संदीप कौर और उस के भाई का दाखिला करवाया गया था, वहां के अंग्रेज विद्यार्थी अकसर उन्हें आतंकवादियों के बच्चे कह कर चिढ़ाते थे. इस सब से तंग आ कर संदीप कौर और जितेंद्र अकसर बीच में ही स्कूल छोड़ कर घर आ जाया करते. स्कूल प्रबंधन ने इसे गंभीरता से लेते हुए सजा के तौर पर इन्हें इस स्कूल से सस्पैंड कर के ईस्टर्न हिमालयाज के बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया.

इतना ही नहीं, जब भी छुट्टियों में वे घर आते उन के लिए मोबाइल फोन व टेलीविजन के इस्तेमाल पर मनाही लगा दी जाती. उन्हें अपने किसी दोस्त वगैरह से भी नहीं मिलने दिया जाता. जरा सी गलती कर दिए जाने पर उन्हें कुरसी उठा कर घंटों तक खड़े रहने की सजा दे दी जाती. एक दफा संदीप की मां काफी बीमार हो गईं. उन दिनों संदीप 14 साल की थी. इलाज के लिए वह अपनी मां को अस्पताल ले जाती थी. वहीं पर उस की एक नर्सिंग मैनेजर से अच्छी दोस्ती हो गई. उन्होंने संदीप को नर्स का कोर्स करने की सलाह दी. तैयारी के लिए उन्होंने संदीप को अपने पास से कई पुस्तकें भी दीं.

विपरीत हालातों में भी संदीप ने मेहनत से पढ़ाई की. पढ़ाई में वह बहुत होशियार थी. इसलिए 15 साल की उम्र में कालेज में दाखिला लेने वाली वह इस क्षेत्र की पहली लड़की थी. 19 साल की उम्र में वह नर्स बन गई. इस के बाद उस की एक निजी मैडिकल संस्थान में 6 हजार यूएस डौलर प्रति महीने की नौकरी लग गई. संदीप की देखभाल से मां पूरी तरह स्वस्थ हो गईं. इस बीच संदीप से उन की अपेक्षाएं भी बहुत बढ़ गईं. वह उस से अकसर यही कहतीं, ‘‘बेटी, तुम इतनी होशियार और मेहनती हो कि खूब पैसा कमा कर अमीर बन सकती हो. अपना खुद का घर खरीद कर अपने परिवार वालों को बेहतर जिंदगी दे सकती हो. तुम जैसी समझदार, होनहार लड़की के लिए यह जरा भी मुश्किल नहीं है.’’

यह सारे सपने मात्र 6 हजार डौलर महीने की नौकरी में पूरे हो नहीं सकते थे. इस के अलावा संदीप कौर अपनी कमाई का कुछ हिस्सा बीमा कंपनियों में निवेश करने लगी. आमदनी बढ़ाने के लिए वह ओवर टाइम करने लगी. जीतोड़ मेहनत कर के उस ने अपनी महीने की कमाई 20 हजार डौलर प्रतिमाह कर ली. इसी दौरान संदीप की कई हमउम्र अमेरिकन लड़कियों से दोस्ती हो गई. इन के संग वह पार्टियों व क्लबों में जाने लगी. जबकि उस की मां हमेशा ही इन बातों के खिलाफ थीं. मां की आंखों में धूल झोंकने को संदीप कौर अपनी नर्सिंग ड्रैस के नीचे क्लब कौस्ट्यूम पहन लिया करती. इस तरह वह एक तरह से दोहरी जिंदगी जीने लगी. अब उस पर मां की लगाई पहले जैसी पाबंदियां लागू नहीं हो पा रही थीं. इसलिए घर में काफी कलह होने लगी थी.

परेशान हो कर संदीप कौर 20 साल की उम्र में अपना घर छोड़ कर साक्रामैंटो चली गई, जहां उस ने अन्य कामों के साथ ‘बैचलर औफ साइंस इन नर्सिंग’ की पढ़ाई भी शुरू कर दी. काम का जुनून ऐसा था कि स्थानीय काऊंटी जेल में वह बीमार कैदियों की देखभाल करने, उन का रक्तचाप चैक करने और दवाएं बांटने भी जाती थी. एक जवान लड़की का ऐसा सेवाभाव देख कर कैदी और जेल के कर्मचारी उस से बहुत प्रभावित थे.

नवंबर, 2010 में 21 साल की उम्र में संदीप की जिंदगी में जैसे आमूलचूल परिवर्तन आया. अमेरिका में शराब पीने की यह लाइसैंसशुदा उम्र होती है. भारत की तरह पीनेपिलाने वाले सिलसिले को वहां बुरा भी नहीं माना जाता. लिहाजा अपने दोस्तों की संगत में क्लब जा कर संदीप कौर भी शराब पीने लगी. इतना ही नहीं, चमकदमक वाली यह दुनिया उसे काफी पसंद आने लगी. अब तक परिवार वाले उसे जिन बातों के लिए मना करते थे, वह वही खुल कर करने लगी. क्योंकि अब उस पर किसी का कोई अंकुश नहीं था, वह पूरी तरह आजाद हो चुकी थी.

एक दफा संदीप ने एक कैसिनो में जुआ खेला. पहले ही गेम में वह 4 हजार डौलर जीत गई. एक झटके में मोटी रकम जीत कर वह खुश हुई. इस के बाद वह लगातार जीतती गई. अब उसे अपनी नौकरी की कमाई कम लगने लगी. उसे लगने लगा कि वह तो पैदा ही इसी काम के लिए हुई है. वह रोजाना जुआ खेलने लगी. हारना जैसे उस के फितरत में नहीं था. वह लगातार जीतती गई. देखतेदेखते उस के पास इतना पैसा आ गया, जिस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

लेकिन एक बार हवा का रुख उस के खिलाफ हो गया. इस का नतीजा यह हुआ कि वह लगातार जुए में हारने लगी. जिस गति से उस के पास पैसा आया था, उस से कहीं ज्यादा रफ्तार से वह पैसा उस का साथ छोड़ गया. जुआ और तनाव की वजह से संदीप कौर ने न केवल अपनी नर्स की नौकरी छोड़ी, बल्कि नर्सिंग से जुड़ी आगे की पढ़ाई भी त्याग दी. इस के बावजूद उसे इस बात का आत्मविश्वास था कि अगर वह एक बाजी खेले तो उस का हारा हुआ सारा पैसा वापस आ सकता है. वह जीतने के लिए और जुआ खेलना चाहती थी. मगर इस के लिए भी पैसा चाहिए था, जो अब उस के पास नहीं था.

उस ने कोई बहाना कर के अपनी एक कजिन से कुछ पैसे उधार लिए. इन पैसों से उस ने कैसिनों में बाजी खेली. लेकिन किस्मत इस दफा भी दगा दे गई. उधार ली हुई यह रकम भी वह एक ही झटके में हार गई. अवसाद की स्थिति से निजात पाने के लिए उस ने आत्महत्या करने का मन बना लिया. एक दिन वह परेशान सी हालत में बैठी थी, तभी एक अजनबी ने उस के पास आ कर उस के सिर पर हाथ रखते हुए आत्मीयता से कहा, ‘‘घबराओ नहीं बेबी, तुम हारने के लिए नहीं जीतने के लिए पैदा हुई हो. और हां, निराश कभी मत होना.’’

संदीप कौर ने उस आदमी को आश्चर्य से देखते हुए पूछा, ‘‘आप कौन हैं और मुझे कैसे जानते हैं?’’

‘‘बस, यही समझ लो कि मैं तुम्हारा बहुत बड़ा शुभचिंतक हूं. मैं तुम्हें तब से देखता आ रहा हूं, जब तुम पहली बार यहां आई थीं और पहली दफा के दावों से यहां सभी को हैरत में डाल दिया था. लेकिन अब तुम अपने अति आत्मविश्वास का शिकार हो कर खुद को बरबाद कर बैठी हो. वरना तुम हारने वालों में से नहीं हो. मैं तो अब भी यही कह रहा हूं कि हार शब्द को तुम अपनी डिक्शनरी से निकाल फेंको. मत भूलो कि तुम जीत की पर्याय हो.’’

संदीप कौर को इन बातों से बल मिला. उस के दिमाग में वही चित्र घूमने लगे जब वह लगातार बाजियां जीती थी. अब वह अवसाद से बाहर आ कर बाजी लगाने को तैयार हो गई. लेकिन उस के पास उस समय पैसे नहीं थे. पर जिस व्यक्ति ने उस की हिम्मत बंधाई थी, वही उसे पैसे देने के लिए तैयार हो गया. उस व्यक्ति ने पहले ही कह दिया था कि उसे न तो इन पैसों पर कोई ब्याज चाहिए और न ही दूसरा कोई लाभ. उस ने बस इतनी सी शर्त रखी कि बाजी लगाने को वह उसे जो भी पैसा देगा, उसे उसी रोज वापस चाहिए.

‘‘वह तो सर, मैं 15 मिनट में वापस कर दूंगी.’’ संदीप ने फिर से अति आत्मविश्वास का सहारा लिया. वह बोली, ‘‘आप मेरी जिंदगी में एक फरिश्ते की तरह आए हैं तो आप की मूल रकम के अलावा अलग से भी अच्छी खासी रकम आप को दूंगी. बस मुझे जी भर खेलने दीजिएगा.’’

‘‘ओके.’’ कहते हुए उस व्यक्ति ने उस के आगे नोटों के बंडल रख दिए.

‘‘फिलहाल मुझे इतने ही चाहिए,’’ कह कर संदीप कौर ने 20 हजार डौलर उठा लिए.

उस ने बाजी लगाई, पर वह हार गई. जिस व्यक्ति ने उसे पैसे दिए थे, वह उस के पास ही खड़ा था. संदीप ने उस की ओर देखते हुए इशारा किया तो उस ने उसे 45 हजार डौलर और दे दिए. इस के बाद संदीप लगातार 16 घंटों तक एक ही जगह बैठ कर जुआ खेलती रही. कई दफा वह हारी, कई दफा जीती भी. जुए में वह इतनी तल्लीन थी कि उस ने कुछ खाया तक नहीं, बस 2-4 बार पानी जरूर पी लिया था. रकम उसे उसी व्यक्ति से लगातार मिलती रही, जो बढ़तेबढ़ते काफी बड़ी रकम बन गई और जुए की अंतिम बाजी में संदीप पूरा पैसा हार गई.

जिस शख्स से उस ने मोटी रकम उधार ली थी, उस रकम को हासिल करने के लिए वह उस के साथ कैसा व्यवहार करेगा, उस की बुरी परिकल्पनाएं उस के मनमस्तिष्क पर हावी होने लगी थीं. उस ने देखा कि इस दौरान उस शख्स ने अपने कई साथियों को भी फोन कर के वहां बुला लिया था. कुछ देर पहले तक जिस शख्स को वह फरिश्ता समझ रही थी, वही व्यक्ति संदीप को राक्षस लगने लगा था. संदीप को फिलहाल बचने की यही तरकीब सूझी कि वह वाशरूम जाने का बहाना कर के वहां से भाग ले. इस में उसे सफलता मिली और वह सुरक्षित अपनी मां के पास जा पहुंची, जो यूनियन सिटी जाने की तैयारी में थीं. संदीप भी उन के साथ इस नए पते पर जा कर रहने लगी. यह मई, 2012 की बात है.

उसे मालूम था कि अगर उस के जुआ खेलने की जानकारी उस की मां को लग गई तो वह बदनामी के डर से आत्महत्या कर सकती हैं. इसलिए संदीप ने कसम खा ली कि आइंदा वह कभी जुआ नहीं खेलेगी. उस ने फिर से नर्स की नौकरी कर ली. अब वह पहले से ज्यादा यानी सप्ताह में 96 घंटे काम कर के अतिरिक्त पैसा कमाने लगी. संदीप कौर ने तो सोचा था कि इस नए पते की किसी को जानकारी नहीं है, पर न जाने कैसे 11 दिसंबर, 2012 को इस नए पते पर भी उस के नाम गिरफ्तारी वारंट आ गया. वारंट के अनुसार, वह कैसिनो की पेमेंट किए बिना वहां से भाग गई थी.

लाख छिपाने की कोशिश करने के बाद भी उस की गलत हरकतों की जानकारी उस की मां को पता लग ही गई. मां ने उसे खूब लताड़ा. उन्होंने उसे सलाह दी कि चाहे जैसे भी हो, वह अपना सब कर्ज उतारने की कोशिश करे. मेहनत तो संदीप पहले ही कर रही थी. उस ने और ज्यादा मेहनत की. कैसिनो वालों से थोड़ी मोहलत ले कर किसी तरह उन का कर्जा निपटा कर एक मुसीबत से छुटकारा पा लिया. दूसरा कर्जा उस शख्स का उस के ऊपर रह गया था, जिस ने उसे जुआ खेलने के लिए भरपूर पैसे दिए थे. कर्जे की वह तलवार अभी भी उस की गरदन पर थी. पर गनीमत यह थी कि अभी तक उन लोगों से उस का फिर से आमनासामना नहीं हुआ था.

संदीप के साथ एक अन्य बात भी हुई, जिस ने उसे बेचैन कर दिया. जब भी वह मां से पिता के बारे में पूछती, वह अकसर उसे यही बतातीं कि बिजनैस के सिलसिले में वह अकसर टूअर पर रहते हैं. कई दफा मां ने यह भी बताया कि वह देर रात को घर लौटे थे, मगर जरूरी फोन आ जाने पर सुबह ही फिर चले गए. लेकिन संदीप कौर को किसी तरह पता चल गया कि उस के मम्मीपापा के बीच तो अरसा पहले तलाक हो गया था.

आखिर संदीप भी एक दफा फिर घर से परे हो गई. लासवेगास में रहते हुए एक साल तक उस ने इतनी मेहनत कि कि अपनी कजिन का पैसा भी चुका दिया. यह खुशखबरी देने के लिए वह अपनी मां के पास गई तो मां ने बताया कि अब वह उस की शादी करना चाहती हैं. उसे कुछेक लड़के दिखाए गए, जिन में से कोई भी उसे पसंद नहीं आया. आखिर सितंबर, 2013 में वह अपनी पसंद के एक लड़के के साथ घर से गायब हो गई. मगर अप्रैल, 2014 में यह रिश्ता खत्म हो गया. वह फिर से अकेली हो गई थी. जुए वाला मोटा कर्ज अभी भी उस के सिर पर ज्यों का त्यों था.

25 मई, 2014 सोमवार की बात है. अपने एक दोस्त से मिलने संदीप फ्रीमौंट एरिया गई थी. जब वह वहां से वापस लौट रही थी, तभी उस ने गौर किया कि काले रंग की एक वैन उस की कार का पीछा कर रही थी. डर की वजह से संदीप कौर ने अपनी कार की गति बढ़ा दी, पर काले रंग की वैन ने ओवरटेक कर के संदीप की कार रोक ली. संदीप ने अपनी कार का शीशा नीचे कर के इस बदतमीजी का सबब जानना चाहा तो उस वैन में बैठे एक शख्स ने गरदन बाहर निकालते हुए कहा, ‘‘हमें तुम से बात करनी है, तुम संदीप हो.’’

‘‘क्या बात करनी है?’’ संदीप ने पूछा.

‘‘देखो, जुआ खेलने के लिए तुम ने जिस आदमी से मोटा कर्ज लिया था, वह एक भला आदमी है. मगर उसूल का पक्का भी है. कर्ज देता है तो वह वापस ले कर रहता है. उस का दायरा बहुत बड़ा है, जिस में हर किस्म के लोग हैं. अपना पैसा वापस लेने के लिए वह कुछ भी कर सकता है.’’

‘‘मतलब, छंटा हुआ बदमाश है वह और तुम कह रहे हो कि भला आदमी है.’’ संदीप बोली.

‘‘शटअप. वह शरीफ है, तभी तो तुम्हें इतना वक्त दे दिया और उस की शराफत का फायदा उठाने में तुम ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. तुम वहां से ऐसे भागी, जैसे कभी पकड़ी नहीं जाओगी.’’ उस शख्स ने चिल्लाते हुए कहा.

‘‘मैं मानती हूं, मुझे उस का पैसा देना है और देर कर भी रहूंगी. वह भी ब्याज सहित. मैं इसी सब के इंतजाम में तो लगी हूं.’’ वह बोली.

‘‘तो इंतजाम हुआ?’’

‘‘नहीं, अभी नहीं हुआ.’’

‘‘आगे होगा भी नहीं.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रहे हो?’’

‘‘इसलिए कि इतने दिनों में नहीं हो पाया तो अब कहां से होगा.’’

‘‘मैं अभी अपने कुछ दोस्तों को फोन कर के पैसे मंगवाती हूं.’’ कहते हुए संदीप ने कई जगह फोन मिला कर पैसों की दरकार की. पर कहीं से कुछ नहीं मिला.

‘‘अब बोलो.’’ वह आदमी व्यंगात्मक लहजे में बोला.

फिर वह अपनी वैन से उतर कर संदीप की कार में घुसते हुए उस के बगल वाली सीट पर बैठ गया. उस ने वैन के ड्राइवर को पीछे आने को कहा और संदीप को अपनी कार आगे बढ़ाने को कहा. मरती क्या न करती. संदीप ने कार आगे बढ़ा दी. थोड़ा आगे चलने पर उक्त शख्स ने एक अलग अंदाज में कहना शुरू किया, ‘‘देखो, मेरी बात ध्यान से सुनो, तुम ऐसी स्थिति में हो जहां से मोटी रकम लौटाना तुम्हारे बस की बात नहीं है. और यह सोच लो कि उसे पैसे नहीं मिले तो वह अपने असली रूप में आ कर तुम्हारे साथसाथ तुम्हारी फैमिली को भी खत्म करा सकता है. अब वह तुम्हारे नाम से भी चिढ़ता है.’’

इन बातों ने संदीप के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं. भय से उस का पूरा जिस्म कांपने लगा. उक्त शख्स ने उस से गाड़ी रुकवा कर अपनी सीट पर आने को कहा और खुद कार चलाने लगा. करीब 10 मिनट खामोश रह कर वह गाड़ी को एक आथोराइज्ड पार्किंग स्थल पर ले गया. वहां गाड़ी रोकते हुए बोला, ‘‘देखो संदीप, तुम्हारी परेशानी मैं समझ रहा हूं. ऐसे में तुम्हारे बचाव का एक धुंधला सा रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है. तुम पैसा नहीं दे सकती तो हमारे लिए काम करो. मगर तुम्हें काम वही करना पड़ेगा, जो हम तुम से कहेंगे. इनकार करने की कोई गुंजाइश नहीं होगी.’’

संदीप ने सोचना शुरू किया. उसे लगा कि ये लोग या तो उसे ड्रग सप्लाई का काम करने को कहेंगे या फिर उस से वेश्यावृत्ति करवाएंगे. मगर उस शख्स ने जब काम बताया तो वह इन दोनों से अलग काम निकला. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें बैंक रौबरी करनी होगी. हर लूट में जितना पैसा तुम्हारे हाथ लगेगा, उस में से एक तिहाई तुम अपने लिए रख लेना और बाकी हमें दे दिया करना. हम तुम से तब तक ही पैसा लेंगे, जब तक हमारातुम्हारा हिसाब साफ नहीं हो जाता. इस के बाद हम तुम से एक पैसा भी नहीं लेंगे.’’

काम बड़ा रिस्की था. इसलिए संदीप ने इस बारे में सोचने के लिए वक्त मांगा, जो उसे दे दिया गया. सोचने के साथसाथ उस ने इस विषय से जुड़ी तमाम सामग्री जुटाते हुए उस का व्यापक अध्ययन भी किया. इस से काम की एक बात उस के हाथ लगी कि यहां के कुछ इलाके ऐसे थे, जहां के बैंकों में डकैती डालने वाले अधिकांश अपराधी पकड़े नहीं गए थे. इस जानकारी ने उस की हिम्मत और बढ़ा दी. उस ने डकैती के प्रचलित ढंग न अपना कर अपने अलग तरीके अख्तियार करने की भी सोची.

अपने इसी अलग तरीके से उस ने 6 जून, 2014 को सांटा क्लैरिटा वैली के पास स्थित एक बैंक से एक हजार यूएस डौलर लूट लिया. यह काम इतनी आसानी और इत्मीनान के साथ हुआ था, जिस की उसे भी उम्मीद नहीं थी. उस ने मोटी रकम लूटने के बजाय कम रकम को ही लूटने का सिलसिला जारी रखा. इस का उसे एक फायदा यह मिल रहा था कि छोटी रकम की वजह से कोई हंगामा खड़ा नहीं होता था. इस के बाद अपने इसी तरीके से संदीप ने वैलेंसिया नामक जगह पर स्थित एक बैंक से पहली वारदात से दोगुने रुपए लूटे. बल्कि बैंक से निकलते वक्त उस ने एक जगह काउंटर पर पड़ी करेंसी के कुछ बंडल भी उठा लिए. उस की यह हरकत वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में भी कैद हो गई तो भी वह पकड़ी नहीं गई.

फिर तो उस ने बेधड़क हो कर कितने बैंक लूटे, इस की उसे भी खबर नहीं. कई बैंक वाले तो छोटी रकम की वजह से चुप्पी साध गए थे. पुलिस वाले बैंक डकैतों से काफी परेशान थे. उन की कार्यप्रणाली के अनुसार, उन्हें अलगअलग नाम दिए गए थे. इन में एक का नाम रखा गया था गीजार बैंडिट. यह इस क्षेत्र का नंबर वन सीरियल बैंक रौबर माना जाता था. दूसरे नंबर पर महिला आती थी, जिसे ‘बौंबशैल बैंडिट’ नाम दिया गया था. यह संदीप कौर थी. अब तक वह भी इस काम से ऊब चुकी थी. 31 जुलाई, 2014 को उस ने पक्का मन बनाया कि आज वह अंतिम दफा बैंक में लूट करेगी, इस के बाद हमेशा के लिए यह काम छोड़ देगी.

सेंट जौर्ज के यूएस बैंक की एक शाखा ने ड्राइव थ्रू टैलर की सुविधा दे रखी थी. इसलिए इस के ग्राहकों को बैंक के भीतर जाने की बहुत कम जरूरत पड़ती थी. उस रोज शाम के 4 बज कर 50 मिनट पर संदीप ने अलग तरह से सिर ढांपा, चेहरे पर सर्जिकल मास्क चढ़ाया और सनग्लासेज पहन कर बैंक में प्रवेश किया. अपने चिरपरिचित तरीके से उस ने कैशियर के पास पहुंच कर उस की तरफ कागज की परची फेंकी, जिस पर लिखा था, ‘मुझे 50 हजार की नकदी सौंपने को तुम्हारे पास 2 मिनट का वक्त है. ऐसा न किया तो यहां बम फटेगा.’

कैशियर डर गया. उस ने तुरंत पैसा निकाल कर उस के हवाले कर दिया. जिसे ले कर संदीप अपनी सिल्वर निशान गाड़ी पर सवार हो कर वहां से भाग ली. बैंक मैनेजर ने यह सब देख लिया था. उन्होंने तुरंत पुलिस के 911 नंबर पर फोन कर के बौंबशैल के ताजा कारनामे की बात बताते हुए यह भी जानकारी दी कि वह किस नंबर की कार से भागी है.

सेंट जौर्ज पुलिस डिपार्टमेंट के तेजतर्रार औफिसर मार्क बीहल को कंट्रोल रूम के जरिए इस घटना की सूचना मिली. उस समय वह पास ही के फायर स्टेशन पर थे. उन्हें यह भी बताया गया था कि बैंक लुटेरे के पास घातक हथियार भी हो सकते थे, इसलिए वे सावधानी रखें. मार्क बीहल ने आगेपीछे की न सोचते हुए तत्काल अपनी जौज चार्जर पैट्रोल गाड़ी ‘फ्री वे’ की ओर दौड़ा दी. एक्जिट-टू पर पहुंच कर उन्होंने यह सोचते हुए अपनी गाड़ी रोक दी कि संदिग्ध कार भी वहीं से हो कर जाएगी. कुछ ही देर में वाकई सूचना में बताए गए कलर और नंबर की गाड़ी वहां से निकली. मार्क बीहल ने अपनी गाड़ी उस के पीछे लगा दी.

अब तक मामला पूरी तरह फ्लैश हो गया था. पुलिस की कितनी टीमें बौंबशैल को काबू करने के लिए सक्रिय हो गईं. आखिर कुछ देर बाद संदीप को चारों तरफ से घेर कर काबू कर लिया गया. उस से उस समय किसी तरह की कोई पूछताछ के बजाय उसे क्लार्क डिटैंशन सैंटर के छोटे प्रीजन सैल में बिठादिया गया. वहां उस ने अपनी कलाई की नसें काटने की कोशिश की तो उसे साइकी सैल में नग्न कर के बंद कर दिया गया. इस के बाद उसे इसी अवस्था में यहीं पर रखते हुए उस का थोड़ा बहुत मानसिक उपचार किया गया.

14 अगस्त को एफबीआई के स्पैशल एजेंट सेथ फुटलिक ने संदीप से पूछताछ की. अब तक वह काफी चिड़चिड़ी हो चुकी थी. मगर उसे अपने किए पर कोई पश्चाताप नहीं था. वह पुलिस को कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुई. एक समाचार पत्र ने संदीप के ऊपर सचित्र विस्तृत आलेख छाप दिया. संदीप के बारे में पढ़ कर अनेक लोगों को उस से हमदर्दी होने लगी. ऐसे लोग उसे कड़ी सजा न देने की अपील अखबार में छपवाने लगे.

आखिर उस के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई. सेंट जौर्ज की फिफ्थ डिस्ट्रिक्ट फोर्ट के जिला जज टेड स्टीवार्ट के यहां उस पर मुकदमा चला. जे विनवार्ड को उस का डिफैंस अटौर्नी नियुक्त किया गया था. जिन्होंने मुकदमे की अंतिम सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश से कहा, ‘‘मी लौर्ड, अपराधी बुरे होते हैं तो अच्छे भी होते हैं. संदीप कौर इतनी पढ़ीलिखी है कि वह समाज के पूरी तरह काम आने के काबिल है. वह अपनी कथित सभ्यता के जाल में फंस गई थी.’’

इस पर प्रौसीक्यूटिंग अटौर्नी पाल कोहलेर ने एक तरह से दहाड़ते हुए कहा, ‘‘किस जाल की बात की जा रही है. इस बाबत उन लोगों से पूछ कर देखें, जो इस अपराधिनी के ट्रैप में फंस कर लुटते गए. 130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ी भगाती यह संदीप कौर सड़क पर अन्य लोगों के लिए खतरा बन जाती थी. इस ने लगातार अपराध करते हुए भोलेभाले कर्मियों को लूटते वक्त कभी उन पर तरस नहीं खाया.’’

7 अप्रैल, 2015 को केस का फैसला सुनाते हुए जज महोदय ने बैंक रौबरी के 4 केसों में संदीप कौर को एक साथ 66 महीनों तक जेल में रहने की सजा सुना दी. इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए संदीप ने कहा, ‘‘यह सजा मेरे लिए एक रिलीफ है. मैं इस सजा को पूरी ईमानदारी से निभाऊंगी.’’

फिलहाल एक अलग खबर यह है कि हंसल मेहता के निर्देशन में संदीप कौर की जीवनगाथा से प्रेरित फिल्म बननी शुरू हो गई है, जिस में संदीप का किरदार कंगना रनौत निभा रही हैं. बकौल कंगना यह फिल्म बायोपिक न हो कर एक ऐसी भारतीय लड़की की कहानी है, जो अमेरिका जा कर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाती है. कंगना का मानना है कि यह रोल उन के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है. True Crime Story