Superstition: न खुदा मिला बिसाले सनम

Superstition: खजाने के लिए मासूम जाकिर की बलि देने वाले इमरान को खजाना नहीं मिला तो उसे बड़ा अफसोस हुआ. अपने इसी अपराधबोध की वजह से वह बेचैन रहने लगा. बेचैनी कम करने के लिए वह हज करने गया. उस के बाद भी…

उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ की कोतवाली के मोहल्ला पठानान में रहती थी संजीदा बेगम. उन के कुल 11 बच्चे थे. बच्चे बड़े होने लगे तो उन का घर छोटा पड़ने लगा. उन्होंने सोचा कि एक मकान और ले लिया जाए तो परिवार आराम से रह सकेगा. संजीदा बेगम के बड़े बेटे इमरान का फलों का कारोबार था. उन्होंने इमरान से कहा कि उन्हें एक मकान और खरीद लेना चाहिए. इस के बाद वह मकान के लिए जमीन की तलाश में लग गया. तभी उसे बहन से पता चला कि उस के पड़ोस में रहने वाली मुन्नी दरजिन का मकान बिक रहा है. उस की बहन गुलफ्शां बाबरी मंडी में रहती थी. उस ने वह मकान अपनी मां संजीदा बेगम के नाम से खरीद लिया.

वह मकान काफी पुराना था, इसलिए संजीदा बेगम उसे अपने हिसाब से बनवाना चाहती थीं. उन्होंने अपने हिसाब से मकान बनवाना शुरू भी कर दिया. मकान बनाने का ठेका उन्होंने आमिर को दिया, जो अपने साथियों बाबू, इरफान, शहजाद और राजू के साथ मकान तोड़वाने लगा. यह जनवरी, 2014 की बात है. संजीदा बेगम को क्या पता था कि यह मकान ले कर उस ने अपने लिए मुसीबत खड़ी कर ली है. मकान का काम अभी शुरू ही हुआ था कि 11 मार्च, 2014 को इमरान अपने छोटे भाई शाजेब के साथ कोतवाली पहुंचा. उस ने कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी को बताया कि उस के निर्माणाधीन मकान के एक कमरे में एक 11-12 साल के बच्चे की लाश पड़ी है, जिस की गरदन काट कर हत्या की गई है.

इमरान ने बताया था कि सुबह करीब 8 बजे जब वह अपने छोटे भाई शाजेब के साथ मकान का ताला खोल कर अंदर गया तो उस ने पीछे के कमरे में एक लाश देखी, जिस की सूचना देने वह सीधे कोतवाली आ गया. इमरान की बात सुन कर कोतवाली प्रभारी ने मामला दर्ज करा कर मामले की जांच के लिए एसएसआई ओमप्रकाश राणा को सौंप दी. ओमप्रकाश राणा कुछ सिपाहियों के साथ इमरान के निर्माणाधीन मकान पर पहुंच गए. मकान के सामने काफी लोग जमा थे. उस दिन मौसम काफी खराब था. काले घने बादल छाए हुए थे. दिन में भी रात जैसे हालात थे, हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. ओमप्रकाश राणा टार्च ले कर उस कमरे में पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश के पास काफी खून फैला था, वहीं खून से सनी एक छुरी पड़ी थी.

मोहल्ले वालों से लाश की शिनाख्त कराई गई तो कोई पहचान नहीं पाया. इस का मतलब बच्चा किसी दूसरे मोहल्ले का रहने वाला था. उसे कहीं और से ला कर यहां मारा गया था. अब सवाल यह था कि बच्चे को कौन और कैसे मकान के अंदर ले आया, क्योंकि मकान में तो ताला बंद था. पुलिस को आशंका हुई कि कहीं बच्चे को कुकर्म के लिए तो यहां नहीं लाया गया? कुकर्म के बाद मार दिया गया हो. लेकिन जब लाश का बारीकी से निरीक्षण किया गया तो यह आशंका निराधार निकली. हत्या कुकर्म के उद्देश्य से नहीं की गई थी, क्योंकि उस के कपड़े एकदम दुरुस्त थे. चूंकि जिस मकान में लाश मिली थी, वह इमरान का था, इसलिए पुलिस ने उस से पूछताछ शुरू की.

उस ने बताया कि शायद बच्चे को दूसरे कमरे की खिड़की से अंदर लाया गया था, क्योंकि उस में अभी दरवाजे नहीं लगे थे. रोक के लिए पटरे लगा दिए गए थे. शायद किसी ने फंसाने के लिए यह काम किया है. ओमप्रकाश को इमरान की बातचीत और हावभाव से उस पर संदेह हो रहा था. वहां फैले खून से लग रहा था कि हत्या अभी कुछ देर पहले ही की गई है. बहरहाल पुलिस ने जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर ओमप्रकाश राणा पूछताछ कर रहे थे कि एक आदमी ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम साबिर है. मैं मुल्ला पाड़ा में रहता हूं. मेरा 11 साल का बेटा जाकिर सुबह करीब 6 बजे सो कर उठा, तब से गायब है. मैं उसे खोज रहा था कि मुझे पता चला कि यहां किसी बच्चे की लाश मिली है. मैं उसे देखना चाहता हूं.’’

राणा ने तुरंत पूछा, ‘‘तुम्हारे बेटे ने क्या पहन रखा था?’’

‘‘साहब, वह काले रंग की कमीज पहने था.’’

काले रंग की कमीज तो मृतक बच्चा भी पहने था. उम्र भी वही थी. कहीं वह लाश इसी के बेटे की तो नहीं, यह सोच कर ओमप्रकाश राणा ने कहा, ‘‘तुम पोस्टमार्टम हाउस चले जाओ. जा कर वहां लाश देख लो.’’

लाश देखने की बात से साबिर का कलेजा कांप उठा. पोस्टमार्टम हाउस जा कर उस ने लाश देखी तो वह लाश उस के बेटे जाकिर की ही थी. लाश देख कर वह दहाड़े मार कर रोने लगा. उस ने फोन कर के यह बात पत्नी परवीन को बताई तो घर में कोहराम मच गया. मोहल्ले वालों के साथ परवीन भी वहां पहुंची. बेटे की हत्या हो जाने से वह सीना पीटपीट कर रो रही थी. परवीन चीखचीख कर कह रही थी कि उस के बेटे की हत्या इमरान ने ही की है. लेकिन पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर इमरान जाकिर की हत्या क्यों करेगा? किसी ने जाकिर को इमरान के साथ आतेजाते भी नहीं देखा था.

पोस्टमार्टम के बाद जाकिर की लाश घर वालों को सौंप दी गई तो उन्होंने उसे दफना दिया. लेकिन परवीन ने प्रतिज्ञा कर ली कि कुछ भी हो, उस का सब कुछ बिक जाए, पर वह अपने बच्चे के कातिल का पता लगा कर रहेगी. मुल्ला पाड़ा जहां परवीन अपने परिवार के साथ रहती थी, बाबरी मंडी जहां जाकिर की लाश मिली थी, दोनों के बीच करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी. पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि बच्चा उतनी सुबह वहां कैसे पहुंच गया? या तो कोई उसे लालच दे कर ले गया या फिर किसी परिचित के साथ वहां गया. काफी सोचविचार के बाद भी हत्या की कोई वजह पुलिस की समझ में नहीं आ रही.

परवीन जिस एल्यूमिनियम की फैक्टरी में काम करती थी, वह हाफिज की थी, हाफिज इमरान के बहनोई रिजवान का भाई था. परवीन का कहना था कि उस के बेटे का कातिल इमरान ही है. पुलिस के पास सिफारिशें आ रही थीं कि इमरान सीधासादा आदमी है. हत्या जैसा घिनौना काम वह बिलकुल नहीं कर सकता. आखिर वह एक रिक्शे वाले के बेटे की हत्या क्यों करेगा? पुलिस को कोई वजह भी नजर नहीं आ रही थी. ओमप्रकाश राणा की समझ में बात नहीं आई तो हत्या के इस मामले की जांच खुद कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी करने लगे. मई में उन का ट्रांसफर हो गया. उन की जगह आए इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी. वह जब भी इमरान को पूछताछ के लिए कोतवाली बुलाते, उस के समर्थन में सैकड़ों लोग कोतवाली आ कर हंगामा करते और जांच को प्रभावित करने की कोशिश करते.

आखिर नवंबर महीने में इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर प्रेमपाल सिंह नागर को सौंप दी गई. तमाम प्रयास के बाद वह भी हत्यारे तक नहीं पहुंच सके. इस के बाद जांच एसआई सुरेशबाबू यादव के हाथ में आ गई. जांच करने वाले बदलते रहे, लेकिन न हत्यारा पकड़ में आ रहा था, न हत्या की वजह पता चल रही थी. परवीन लगातार पुलिस के पीछे पड़ी थी. वह काफी परेशान थी और सीधे कह रही थी कि जाकिर की हत्या इमरान ने ही की है. हालांकि वजह उसे भी पता नहीं थी. परवीन के 7 बच्चे थे, जिन में 5 बेटियां और 2 बेटे. बड़ा बेटा था गुलशन और छोटा जाकिर, जिस की हत्या हो गई थी.

साबिर रिक्शा चलाता था. इस के अलावा शादीब्याह में बैंडबाजा वालों के साथ काम करता था. उस के दोनों बेटे भी बारातों में बाजा बजाने का काम करते थे. इस तरह उस के परिवार का गुजर हो रहा था. किसी से भी उस की कोई दुश्मनी नहीं थी. जिस दिन जाकिर की हत्या हुई थी, साबिर ने ही उसे 6 बजे जगाया था.

जाकिर उन दिनों मोहल्ले के ही बिहारीलाल स्कूल में सातवीं में पढ़ रहा था. सुबह जिस समय जाकिर घर से निकला था, परवीन सो रही थी. उठते ही उस ने पूछा था कि जाकिर कहां है? शायद उस ने कोई बुरा सपना देखा था. जाकिर कहीं नहीं दिखाई दिया तो उस ने साबिर से कहा, ‘‘जाकिर के साथ कुछ बुरा हो गया है.’’

साबिर ने कहा, ‘‘चिंता मत करो, क्रिकेट खेलने गया होगा, आ जाएगा.’’

परवीन 11 बजे तक पागलों की तरह बेटे को ढूंढती रही, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. इस के बाद उसी ने साबिर को फोन कर के बताया कि जाकिर तो नहीं मिला, लेकिन पता चला है कि बाबरी मंडी में किसी बच्चे की लाश मिली है. जा कर उसे देख लो. पत्नी की इस बात पर साबिर घबरा गया. वह बाबरी मंडी स्थित इमरान के घर पहुंचा तो वहां पुलिस मौजूद थी. उस ने ओमप्रकाश राणा को अपने बेटे के गायब होने के बारे में बताया तो उन्होंने उसे लाश की शिनाख्त के लिए पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया था.

पुलिस मामले की जांच कर रही थी, लेकिन परवीन और साबिर पुलिस की इस जांच से संतुष्ट नहीं थे. संतुष्ट होते भी कैसे, पुलिस उन के बेटे के कातिल को ढूंढ नहीं पा रही थी. उसी बीच सितंबर, 2014 में इमरान अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने चला गया. परवीन ने पुलिस का पीछा नहीं छोड़ा था. वह लगातार कोतवाली के चक्कर लगा रही थी. उस के बेटे को क्यों मार दिया गया, यह बात रहरह कर उसे साल रही थी. यही सोचते हुए अचानक उस के मन में आया कि कहीं जाकिर की बलि तो नहीं दी गई? उस ने यह बात मामले की जांच कर रहे ओमप्रकाश राणा को भी बताई.

इस के बाद वह एक बार फिर से पूछताछ करने पहुंचे. इस बार उन्होंने संजीदा बेगम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि मकान की खुदाई करते समय 5 मिट्टी के घड़े मिले थे, जिन में से 2 में कोयला और 3 में मिट्टी भरी थी. शायद किसी ने उन्हें फंसाने के लिए बच्चे को उस के घर ले जा कर मारा है. दूसरी ओर परवीन का कहना था कि उस के बेटे की तांत्रिक क्रिया कर के बलि दी गई थी. पुलिस को भी अब इमरान पर शक होने लगा था, लेकिन बिना किसी ठोस सबूत के उसे गिरफ्तार करना पुलिस के लिए मुश्किल था.

पुलिस ने राजमिस्त्री आमिर से भी पूछताछ की थी. उस ने बताया था कि घटना वाले दिन जब वह मजदूरों के साथ काम करने पहुंचा था तो इमरान और शाजेब वहां मौजूद थे. उन्होंने कहा था कि आज काम नहीं होगा. उस ने खुदाई से घड़े निकलने की बात स्वीकार की थी. कहते हैं कि कुदरत सब कुछ देखती है और अपना करिश्मा दिखा कर रहती है. जून, 2015 की बात है. परवीन का भाई कल्लन आया हुआ था. कल्लन बदायूं में रहता था. अचानक इमरान अपने भाई शाजेब के साथ उस के घर पहुंचा. उन्हें देख कर परवीन के माथे पर बल पड़ गए. साबिर ने उन्हें बैठाया.

इस के बाद इमरान ने कहा, ‘‘मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं. मेरे हाथों बहुत बड़ा गुनाह हो गया है. मैं लालच में आ गया था. एक बाबा ने मुझे बताया था कि मेरे घर में काफी धन गड़ा है. अगर बच्चे की बलि दी जाए तो मुझे वह धन मिल सकता है. इस के बाद मैं ने अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर जाकिर की बलि दे दी थी. उस के बाद भी धन नहीं मिला और एक बच्चे की जान चली गई.’’

इमरान अपने हाथों हुए गुनाह की माफी मांग रहा था और बदले में 10 लाख रुपए देने की बात कर रहा था. सभी उस की बात चुपचाप सुनते रहे. उस के बाद परवीन ने कहा, ‘‘ठीक है, सोचसमझ कर बताऊंगी.’’

इमरान ने कहा, ‘‘इस में सोचनेसमझने की क्या बात है, 10 लाख रुपए कम नहीं होते.’’

परवीन बोली, ‘‘अगर मैं आप को 10 लाख रुपए दूं तो क्या तुम मेरे बेटे को लौटा दोगे.’’

‘‘अगर मैं ऐसा कर सकता तो जरूर करता, पर मुझे अफसोस है कि मैं ऐसा कर नहीं सकता. मेरे हाथों जो गुनाह हुआ है, वह मुझे चैन नहीं लेने दे रहा है. हम हज भी कर आए हैं, पर मन को तसल्ली नहीं मिल रही है. तुम लोग मुझे माफ कर दो. मैं तुम लोगों के जवाब का इंतजार करूंगा.’’

इमरान के जाने के बाद घर में सन्नाटा पसर गया. जाकिर तो अब वापस आ नहीं सकता था. साबिर जैसे गरीब आदमी के लिए 10 लाख रुपए कम नहीं थे. लेकिन परवीन के लिए रुपए से बढ़ कर बच्चा था. उस ने तय कर लिया कि वह बेटे के कातिलों को सजा दिला  कर रहेगी. 5 जून, 2015 को परवीन ने कोतवाली जा कर सारी बात ओमप्रकाश राणा को बता दी. अब पुलिस को गिरफ्तारी का रास्ता मिल गया. हैदर रजा जैदी पुलिस बल के साथ इमरान के घर पहुंचे और उसे गिरफ्तार कर के कोतवाली ले आए. इमरान वैसे ही अपराधबोध से ग्रसित था. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस पूछताछ में जाकिर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इमरान फलों का व्यापारी था. उस ने बाबरी मंडी में मुन्नी दरजिन का मकान खरीदा और बनवाने के लिए उस की खुदाई कराने लगा. मकान काफी बड़ा था. उस की दीवारें काफी चौड़ी थीं. अचानक खुदाई में मिट्टी के घड़े निकलने लगे, जिन में कोयला और मिट्टी भरी थी. मिट्टी के घड़ों का निकलना हैरान करने वाला था. इमरान को लगा, मकान में जरूर कहीं खजाना गड़ा है. उस ने तांत्रिकों से पूछताछ शुरू की तो किसी तांत्रिक ने बताया कि घड़ों के मिलने का मतलब है कि उस मकान में खजाना गड़ा है, लेकिन वह खजाना तभी मिलेगा, जब किसी बच्चे की बलि दी जाए.

खजाना पाने के लिए इमरान बच्चे की बलि देने को तैयार हो गया. वह अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर किसी ऐसे बच्चे की तलाश में जुट गया, जिस की बलि दी जा सके. 1 फरवरी, 2014 को मुल्ला पाड़ा में सवेरे उन्हें जाकिर दिख गया तो उन्होंने उसे 10-10 के 4 नोट दे कर कहा कि वह उन का एक काम कर दे तो वे उसे और रुपए देंगे. जाकिर राजी हो गया तो वे उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर अपने बन रहे नए मकान पर ले आए. मकान में वे उसे तीसरे कमरे में ले गए, जहां काफी अंधेरा था. शाजेब ने उसे बातों में उलझा लिया तो इमरान ने उस के गले पर छुरी चला दी. बच्चे की मौत हो गई. उसी समय मकान पर काम करने वाले राजमिस्त्री और मजदूर आ गए. इमरान और शाजेब डर गए. उन्होंने बाहर आ कर काम करने वाले मजदूरों से कहा कि मेरी दादी बीमार हैं, इसलिए आज काम नहीं होगा.

राजमिस्त्री और मजदूर चले गए, लेकिन इमरान और शाजेब ने जो अपराध किया था, उस से वे डरे हुए थे कि अगर किसी को पता चल गया तो वे पकड़े जाएंगे. उन्हें पुलिस और जेल का डर सताने लगा था. सुबह का समय था, रात से पहले वे लाश को वहां से निकाल नहीं सकते थे. आखिर इमरान ने तय किया कि वह खुद थाने जा कर पुलिस को बताएगा कि किसी ने उस के मकान में एक बच्चे की हत्या कर दी है. जब उन्होंने सुबह आ कर मकान का दरवाजा खोला तो अंदर उन्हें बच्चे की लाश मिली.

इस के बाद इमरान ने वही किया. वह पैसे वाला और रसूखदार आदमी था. इसलिए शक होने के बावजूद पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी. लेकिन बच्चे की बलि देने के बाद भी जब कोई खजाना नहीं मिला तो उसे काफी अफसोस हुआ. अपने गुनाहों की माफी के लिए वह अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने गया. उस ने वहां उलेमाओं से बात की तो उन्होंने सलाह दी कि वह मृतक बच्चे के मांबाप से माफी मांगे और उन्हें हरजाने के रूप में धनराशि दे तो उसे चैन मिल सकता है.

उलेमाओं की सलाह पर इमरान भाई के  साथ परवीन के घर गया. दरअसल अपराधबोघ से वह बेचैन था. वह बच्चे के गरीब मांबाप को धन दे कर माफी चाहता था. लेकिन बच्चे के मांबाप को तो अपने निर्दोष बेटे के लिए इंसाफ चाहिए था. उन्होंने उसे माफ नहीं किया और पुलिस को सारी बात बता दी. इमरान को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि शाजेब फरार हो गया. पुलिस ने इमरान को जेल भेज दिया. बाद में शाजेब ने भी आत्मसमर्पण कर दिया. वह नाबालिग था, इसलिए उसे बालसुधार गृह भेज दिया गया. सेशन कोर्ट से इमरान की जमानत खारिज हो चुकी है. अब उस ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए अपील की है. Superstition

—कथा पुलिस सूत्रों और जाकिर के घर वालों के बयान पर आधारित

 

Hindi Crime Story: रजनी को भाया प्रेमी का धमाल

Hindi Crime Story: रजनी उर्फ कुंजावती अपने भाईबहनों में सब से बड़ी ही नहीं बल्कि कदकाठी से भी ठीक ठाक थी. इसलिए अपनी उम्र से काफी बड़ी लगती थी. उस का परिवार उत्तर प्रदेश के शहर इटावा में रहता था. उस के पिता किसान थे. जैसे ही वह जवान हुई तो उस के मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में लग गए.

उन्हें इस बात का डर था कि कहीं रजनी के कदम बहक गए तो उन की इज्जत पर दाग लग जाएगा. उन्होंने रजनी की शादी के लिए ग्वालियर जिले के महाराजपुरा कस्बे के गांव गुठीना में रहने वाले सुलतान माहौर को पसंद कर लिया. फिर जल्द ही उन्होंने उस की शादी सुलतान के साथ कर दी.

रजनी सुंदर तो थी ही, दुलहन बनने के बाद उस की सुंदरता में पहले से ज्यादा निखार आ गया. रजनी जैसी सुंदर पत्नी पा कर सुलतान बेहद खुश था. दोनों के दांपत्य की गाड़ी खुशहाली के साथ चलने लगी. समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और रजनी 3 बच्चों की मां बन गई. लेकिन कुछ दिनों बाद आर्थिक परेशानियों ने परिवार की खुशी पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया. शादी से पहले सुलतान छोटामोटा काम कर के गुजरबसर कर लेता था, लेकिन 3 बच्चों का बाप बन जाने से घर के खर्चे भी बढ़ गए थे. वहीं रजनी की बढ़ती ख्वाहिशों ने उस के खर्चों में काफी इजाफा कर दिया था.

आर्थिक परेशानी से उबरने के लिए  वह एक शोरूम में रात के समय चौकीदारी भी करने लग गया था. इस दौरान उसे शराब पीने की भी लत लग गई, जिस की वजह से वह पैसे शराबखोरी में उड़ा देता था. इस के चलते घर की माली हालत डांवाडोल होने लगी थी. यहां तक कि उस ने कई लोगों से कर्ज ले लिया था. उधर जब से कोविड के कारण लौकडाउन लगा, तब से सुलतान की मजदूरी और चौकीदारी का काम भी छूट गया था. इस के बावजूद वह लोगों से पैसा उधार ले कर शराब पी लेता था और हद तो तब हो गई जब अपनी पत्नी रजनी उर्फ कुंजावती को शराब के नशे में जराजरा सी बात पर पीटना शुरू कर देता था.

पति की ये आदतें रजनी को काफी सालती थीं. सुलतान के पड़ोस में अजीत उर्फ छोटू कोरी रहता था. वह रजनी को भाभी कहता था, इसलिए दोनों में हंसीमजाक होता रहता था. रजनी को अजीत से मजाक करने में किसी तरह का संकोच नहीं होता था. एक दिन दोनों हंसीमजाक कर रहे थे तो रजनी ने कहा, ‘‘देवरजी, कब तक इस तरह हंसीमजाक कर के दिन काटोगे? कहीं से घरवाली ले आओ.’’

‘‘भाभी, घरवाली मिलती तो जरूर ले आता. जब तक कोई नहीं मिल रही आप से हंसीमजाक कर संतोष करना पड़ रहा है.’’ अजीत ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जब तक घरवाली नहीं मिल रही तो इधरउधर से जुगाड़ कर लो.’’ रजनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अजीत की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘कौन फिक्र करता है भाभी भूखे आदमी की. जिस का पेट भरा रहता है, उसे ही हर कोई पूछता है,’’ अजीत ने शरमाते हुए कहा.

‘‘क्या तुम ने कभी किसी से अपनी परेशानी का जिक्र कर के देखा है?’’

‘‘कोई फायदा नहीं भाभी, लोग मेरी हंसी ही उड़ाएंगे.’’ वह बोला.

‘‘अजीत, जब तक तुम किसी से कहोगे नहीं, कोई तुम्हारी मदद कैसे करेगा?’’ रजनी ने कहा.

‘‘भाभी, अगर आप से कहूं तो क्या आप मेरी मदद करना पसंद करेंगी? भलाबुरा कहते हुए गालियां जरूर देंगी,’’ अजीत ने रजनी के चेहरे पर नजरें गड़ा कर कहा.

रजनी ने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘एक बार कह कर तो देखो. अरे, मैं तुम्हारी मुंहबोली भाभी हूं अजीत, भला पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो क्या बाहर वाला मदद करने आएगा.’’

अब इस से भी ज्यादा रजनी क्या कहती. अजीत इतना भी नासमझ नहीं था कि वह रजनी की बात का मतलब न समझ पाता.

‘‘जरूर भाभी, मौका मिलने पर कह दूंगा.’’ वह मुसकराते हुए बोला.

संयोग से अगले दिन अजीत को पता चला कि सुलतान किसी काम से बाहर गया है. उस दिन अजीत का मन अपने काम में नहीं लगा रहा था. दिन भर उसे रजनी की याद सताती रही. शाम होने पर घर आने पर वह रजनी की एक झलक देखने को बेचैन हो उठा.

रजनी भी पति की गैरमौजूदगी में अजीत को रिझाने के लिए जैसे ही सजसंवर कर दरवाजे पर आई  तो उस की नजर अजीत पर पड़ी. अजीत भी रजनी को देख कर बिना वक्त जाया किए उस के घर पर जा पहुंचा.

अजीत को अचानक इस तरह आया देख कर रजनी ने हंसते हुए कहा, ‘‘देवरजी, आज आप अपने काम से जल्दी लौट आए?’’

‘‘क्या बताऊं भाभी, आज मेरा मन काम में जरा भी नहीं लगा.’’

‘‘क्यों?’’ रजनी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘सच बताऊं?’’

‘‘हां, मुझे तो सचसच बताओ.’’

‘‘भाभी, जब से तुम्हें और तुम्हारी सुंदरता  को देखा है, मेरा मन किसी काम में लगता ही नहीं है. आप सच में बेहद खूबसूरत है.’’

‘‘ऐसी सुंदरता किस काम की, जिस की कोई कदर ही न हो,’’ रजनी ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘क्या भैया तुम्हारी कोई कदर नहीं करते भाभी?’’

‘‘सब कुछ जानते हुए भी अनजान मत बनो, तुम तो जानते हो कि मेरे वो रात में चौकीदारी करते हैं, सो रात को घर से बाहर रहते हैं. ऐसे में मेरी रातें कैसे गुजरती हैं, वो तो मुझे ही पता है.’’

‘‘भाभीजी, जिस स्थिति से आप गुजर रही हैं, ठीक वही स्थिति मेरी है. मैं भी रात भर करवटें बदलता रहता हूं. अगर आप मेरा साथ दें तो हम दोनों की समस्या खत्म हो सकती है,’’ यह कहते हुए अजीत ने रजनी को अपनी बांहों में भर लिया.

पुरुष सुख से वंचित रजनी चाहती तो यही थी, मगर उस ने हावभाव बदलते हुए बनावटी गुस्से में कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे. बच्चे देख लेंगे.’’

‘‘बच्चे तो अपनी मौसी के बच्चों के साथ बाहर खेल रहे हैं. भाभी, आप ने तो मेरा सुखचैन सब छीन रखा है,’’ अजीत ने कहा.

‘‘नहीं अजीत, छोड़ो मुझे. मैं बदनाम हो जाऊंगी, कहीं की नहीं रहूंगी मैं.’’ वह बनावटी बोली.

‘‘नहीं भाभी, अब यह संभव नहीं है. कोई बेवकूफ ही होगा जो रूपयौवन के इस प्याले के इतने नजदीक पहुंच कर पीछे हटेगा,’’ इतना कह कर अजीत ने बांहों का कसाव बढ़ा दिया.

दिखाने के लिए रजनी न…न…न करती रही, जबकि वह स्वयं अजीत के जिस्म से बेल की तरह लिपटी जा रही थी. इस के बाद वह पल भी आ गया, जब दोनों ने मर्यादा भंग कर दी. एक बार मर्यादा मिटी तो यह सिलसिला चल निकला. जब भी उन्हें मौका मिलता, इच्छाएं पूरी कर लेते. दोनों पड़ोस में रहते थे, इसलिए उन्हें मिलने में कोई परेशानी भी नहीं होती थी. रजनी अब कुछ ज्यादा ही खुश रहने लगी थी, क्योंकि उस का प्रेमी मौका मिलने पर बिस्तर पर धमाल मचाने आ जाता था.

अब उस की आर्थिक परेशानी भी दूर हो गई थी. रजनी खर्चे के लिए अजीत से जब भी रुपए मांगती, वह बिना नानुकुर के चुपचाप निकाल कर रजनी के हाथ पर रख देता था. रजनी और अजीत के बीच अवैध संबंध बने तो उन की बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अब दोनों एकदूसरे का खयाल भी कुछ ज्यादा ही रखने लगे थे, इसलिए आसपड़ोस वालों को शक होने लगा.

लोग इस बात को ले कर चर्चा करने लगे. नतीजा यह निकला कि इस बात की जानकारी सुलतान को भी हो गई. सुलतान ने लोगों की बातों पर विश्वास न कर के खुद सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया. वह जानता था कि यदि इस बारे में पत्नी से पूछताछ करेगा तो वह सच बात बताएगी नहीं, बल्कि होशियार हो जाएगी. सच पता लगाने के लिए वह एक दिन बाहर जाने के बहाने घर से निकला और छिप कर रजनी और अजीत पर नजर रखने लगा.

एक दिन दोपहर के समय उस ने रजनी और अजीत को रंगेहाथों पकड़ लिया. गुस्से में  उस ने रजनी की जम कर पिटाई कर दी. रजनी के पास सफाई देने को कुछ नहीं था, इसलिए वह भविष्य में कभी ऐसा न करने की कसम खाते हुए माफी मांगने लगी. गुस्से में सुलतान ने अजीत को भी कई थप्पड़ जड़ दिए. साथ ही चेतावनी दी कि आज के बाद वह उस के घर के आसपास भी दिखाई दिया तो ठीक नहीं होगा.

रजनी सुलतान की सिर्फ पत्नी ही नहीं, उस के 3 बच्चों की मां भी थी, इसलिए बच्चों के भविष्य की फिक्र करते हुए उस ने दोबारा ऐसी गलती न करने की चेतावनी दे कर उसे माफ कर दिया. यह बात सच है कि जिस महिला का पैर एक बार बहक चुका हो, उसे संभालना मुश्किल होता है. यही हाल रजनी का भी था. कुछ दिनों तक अपनी कामोत्तेजना पर जैसेतैसे काबू रखने के बाद वह फिर चोरीछिपे अजीत से मिलने लगी.

इस का पता सुलतान को चला तो उस ने रजनी को काफी बुराभला कहा. इस के बाद रजनी का अजीत से मेलजोल कुछ कम हो गया, लेकिन बंद नहीं हुआ. जब मिलने में परेशानी होने लगी तो एक दिन रजनी ने अजीत से कहा, ‘‘मुझ से तुम्हारी दूरी बरदाश्त नहीं होती. अब मैं सुलतान के साथ नहीं रहना चाहती.’’

‘‘अगर ऐसा है तो उसे ठिकाने लगा देते हैं. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. वह शराब पीता ही है, खाना खा कर बेसुध हो जाता है, इसलिए उस की हत्या करना भी आसान है.’’

इसी के साथ दोनों ने सुलतान की हत्या की योजना बना ली.

5 जून, 2021 की रात सुलतान शराब पी कर बेसुध सो गया. सोने से कुछ समय पहले ही उस ने रजनी के साथ मारपीट की थी. पति के सोने के बाद रजनी ने प्रेमी अजीत को फोन कर के बुला लिया. मगर जैसे ही अजीत आया सुलतान की नींद खुल गई. रजनी और अजीत ने सुलतान को पकड़ा और उस के गले में रस्सी का फंदा बना कर उस का गला घोंट दिया. इस के बाद अजीत काफी डर गया तो वह अपने घर भाग गया, मगर रजनी कशमकश में फंस गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?

आखिर उस का मन नहीं माना तो वह घर के पास में रहने वाली अपनी बहन के घर चली गई. यहां पर रजनी की मां भी आई हुई थी. उस ने हिचकियां लेले कर रोते हुए बहन और मां को बताया कि उस के पति ने आत्महत्या कर ली है. इन लोगों को रजनी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. शायद इसी वजह से एक बार तो लगा कि वह फूटफूट कर रो पड़ेगी, लेकिन किसी तरह खुद को संभालते हुए आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या आप लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है?’’  बाद में यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई.

सुबह होते ही गंधर्व सिंह ने महाराजपुरा थानाप्रभारी प्रशांत यादव को फोन कर इस घटना की सूचना दे दी. थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ आत्महत्या कर लेने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गुठीना जैसे छोटे से गांव में इस तरह की घटना घट गई और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुई.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रशांत यादव  एसआई जितेंद्र मवाई के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. चलने से पहले उन्होंने इस की सूचना सीएसपी रवि भदौरिया को भी दे दी थी. प्रशांत यादव घटनास्थल का निरीक्षण शुरू करने वाले थे कि सीएसपी भदौरिया भी आ पहुंचे. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो सीएसपी लौट गए. उन के जाने के बाद  थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर सुलतान की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

रजनी और उस के प्रेमी ने जिस रस्सी से फंदा बना कर सुलतान का गला घोंटा था, वह भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले ली. उस के बाद थानाप्रभारी ने गंधर्व सिंह की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. थानाप्रभारी इस केस की जांच में जुट गए. उन्होंने इस बारे में मृतक की पत्नी रजनी से पूछताछ की. थाने पहुंचते ही रजनी डर गई और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने प्रेमी अजीत के साथ मिल कर पति को ठिकाने लगाया था.

पुलिस ने 6 जून, 2021 को ही रजनी के प्रेमी अजीत को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने ही सुलतान की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों ने सुलतान की हत्या की जो सनसनीखेज कहानी सुनाई, वह परपुरुष की बांहों में सुख तलाशने वाली औरत के अविवेक का नतीजा थी. पूछताछ  और सारे साक्ष्य जुटाने के बाद  पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. रजनी के साथ उस का 3 वर्षीय सब से छोटा बेटा भी जेल गया है.

रजनी ने जो सोचा था, वह पूरा नहीं हुआ. वह एक हत्या की अपराधिन बन गई. उस के साथ उस का पे्रमी भी. जो सोच कर उन दोनों ने सुलतान की हत्या की, वह अब शायद ही पूरा हो, क्योंकि यह तय है कि दोनों को सुलतान की हत्या के अपराध में सजा होगी. Hindi Crime Story

Hindi Crime Stories: आशिकी में पति दफन

Hindi Crime Stories: जिस सुख और आनंद के लिए सुदेवी ने प्रेमी के साथ साजिश रच कर पति को ठिकाने लगवा दिया, क्या वह सुख उसे मिल सका…

एसपी (रूरल) सुरेंद्रनाथ तिवारी थाना महराजगंज निरीक्षण के लिए आए थे, तभी एक लड़का और एक औरत थाने पहुंची. दोनों काफी घबराए हुए थे. उन्हें देख कर ही लग रहा था कि वे किसी बड़ी मुसीबत में हैं. सुरेंद्रनाथ की नजर उन पर पड़ी तो उन्होंने दोनों को अपने पास बुला कर पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है? जो भी परेशानी हो, सचसच बताओ?’’

लड़का हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘हुजूर, मेरा नाम दिनेश है.’’ इस के बाद औरत की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘यह मेरी भाभी सुदेवी है. हम लोग थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर से आए हैं. 21 अप्रैल को मेरा बड़ा भाई हरिश्चंद्र थाना महराजगंज के गांव जाना के रहने वाले अपने साढू मंगू के यहां गया था, तब से उस का कुछ पता नहीं है. हम ने उसे हर जगह खोज लिया है. मंगू ने ही भैया को गांव में लगने वाला मेला देखने को बुलाया था.’’

सुरेंद्रनाथ तिवारी को लगा कि सुदेवी भी कुछ कहना चाहती है, इसलिए उन्होंने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम भी कुछ कहना चाहती हो क्या? लेकिन एक बात का ध्यान रखना, जो भी कहना, सचसच कहना.’’

‘‘जी हुजूर,’’ सुदेवी बोली, ‘‘21 अप्रैल को जब मैं कन्नौज में अपनी बुआ की बेटी के यहां थी तो उन्होंने फोन कर के बताया था कि वह जाना में साढू के यहां मेला देखने आए हैं. आज घर लौटने को कहा था. लेकिन जब वह घर नहीं लौटे और फोन पर भी बात नहीं हुई तो मैं 23 अप्रैल को जाना गई और जीजा और उन के घर वालों से उन के बारे में पता किया. उन लोगों ने बताया कि उन्हें उस दिन शाम को सर्वेश के साथ देखा गया था.’’

‘‘यह सर्वेश कौन है?’’ एसपी साहब ने पूछा.

‘‘हुजूर, सर्वेश मेरे बहनोई का भतीजा है. मेरे ऊपर उस की नीयत खराब थी, जिस की वजह से एक बार मेरे पति ने उसे डांटा भी था. मुझे लगता है कि सर्वेश ने ही उन का अपहरण कर लिया है या फिर मार डाला है.’’

मामला गंभीर था, इसलिए सुरेंद्रनाथ तिवारी ने थानाप्रभारी जीवाराम को आदेश दिया कि तुरंत जाना जा कर सर्वेश को पकड़ कर सख्ती से पूछताछ करें, जिस से हरिश्चंद्र के बारे में पता लग सके. जीवाराम ने एसआई आर.के. सिंह, सरिता मिश्रा, सिपाही बृजेशचंद्र शर्मा, आशित कुमार तथा राजेंद्र कुमार सिंह को साथ लिया और जाना जा कर सर्वेश के घर छापा मारा. सर्वेश उस समय घर पर ही था, इसलिए जीवाराम उसे पकड़ कर थाने ले आए. थाने में जब उस से हरिश्चंद्र के बारे में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. लेकिन वह परेशान जरूर हो उठा. उस के चेहरे पर आई घबराहट से थानाप्रभारी ने भांप लिया कि यह झूठ बोल रहा है.

उन्होंने उस पर दबाव बनाने के लिए कहा, ‘‘तुम्हारे झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं है, सुदेवी ने हमें सब बता दिया है. इसलिए तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम भी सब कुछ सचसच बता दो.’’

इस पर सर्वेश ने कहा, ‘‘साहब, हरिश्चंद्र को तो मैं ने मार दिया है. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जिस सुदेवी ने वादा किया था कि हत्या के इस राज को वह किसी को नहीं बताएगी. उसी ने आप से सब बता दिया. साहब,  हरिश्चंद्र की हत्या मैं ने सुदेवी के कहने पर ही की थी. हम दोनों के बीच नाजायज संबंध थे. हत्या की साजिश हम दोनों ने मिल कर रची थी. हत्या करने के बाद मैं ने सुदेवी को बताया भी था कि हरिश्चंद्र को ठिकाने लगा दिया है.’’

सुदेवी उस समय थाने में ही थी. जीवाराम ने उसे बुला कर जब बताया कि सर्वेश ने हरिश्चंद्र का कत्ल कर दिया है तो वह दहाडे़ मार कर रोने लगी. तब जीवाराम ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘त्रियाचरित्र करने की जरूरत नहीं है. सर्वेश ने हमें यह भी बता दिया है कि तू ने ही साजिश रच कर हरिश्चंद्र की हत्या कराई है.’’

इस के बाद सुदेवी ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो सर्वेश की निशानदेही पर पुलिस ने जाना गांव के बगल से बहने वाले नाले के पास से हरिश्चंद्र का शव बरामद कर लिया. लाश सड़ चुकी थी. वहीं झाडि़यों से वह खून सनी ईंट भी बरामद कर ली गई, जिस से हत्या की गई थी. घटनास्थल की सारी औपचारिक काररवाई निपटा कर थाना महराजगंज पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. सर्वेश और सुदेवी ने हरिश्चंद्र की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था, इसलिए थाना महराजगंज पुलिस ने मृतक के छोटे भाई दिनेश की ओर से सर्वेश और सुदेवी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस पूछताछ में हरिश्चंद्र की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह एक औरत द्वारा आशिकी में अपना ही सिंदूर उजाड़ने की वाली थी.

कानपुर शहर से 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर बसा है कस्बा शिवराजपुर. इसी कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. इसी रामबाबू की बेटी है सुदेवी. सुदेवी शादी लायक हुई थी तो उस ने उस की शादी कानपुर के थाना बिठूर के गांव हिंगूपुर के रहने वाले छोटेलाल के बड़े बेटे हरिश्चंद्र से कर दी थी. छोटेलाल का खातापीता परिवार था. यह 10-12 साल पहले की बात है. सुदेवी ने जो चाहा था, उसे ससुराल में वह सब कुछ मिल गया था, इसलिए वह खुश थी. सब से बड़ी बात यह थी कि हरिश्चंद्र उसे हद से ज्यादा प्यार करता था. यही हर लड़की का सपना होता है. सुदेवी सचमुच भाग्यशाली थी. पति ही नहीं, ससुराल का हर आदमी उसे बहुत प्यार करता था.

हंसीखुशी से 5 साल बीत गए. इस बीच सुदेवी 2 बेटों, गोल्डी और निखिल की मां बन गई. 2 बच्चों की जिम्मेदारियां बढ़ीं तो हरिश्चंद्र को आय बढ़ाने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ने लगी. वह अधिक कमाई के चक्कर में ज्यादा से ज्यादा घर से बाहर रहने लगा. बस, पति का साथ न मिलने की वजह से सुदेवी के कदम बहक गए. हुआ यह कि बरसात में हरिश्चंद्र का घर गिर गया. घर बनवाने के लिए उस ने जाना के रहने वाले अपने साढू गंगू से कोई राजमिस्त्री बताने को कहा तो उस ने कहा, ‘‘साढूभाई राजमिस्त्री तो घर में ही है. हमारा भतीजा सर्वेश बहुत अच्छा राजमिस्त्री है. आजकल वह बड़ेबड़े ठेके ले रहा है. वैसे तो वह खाली नहीं है, लेकिन घर का काम है, इसलिए उसे समय तो निकालना ही पड़ेगा. तुम जब कहो, मैं उसे भेज दूं.’’

‘‘ठीक है भाई, आप ने हमारी एक बहुत बड़ी समस्या हल कर दी. बरसात खत्म होते ही मकान बनवाना शुरू कर दूंगा.’’

28 वर्षीय सर्वेश हृष्टपुष्ट युवक था. वह काम भले राजमिस्त्री का करता था, लेकिन रहता ठाठ से था. सर्वेश रिश्तेदार था. इसलिए हरिश्चंद्र के यहां काम करने आया तो घर में ही रहताखाता और सोता था. सुदेवी उस की मौसी लगती थी, इसलिए वह उस से खूब बातें करता था. मौकेबेमौके हंसीठिठोली भी कर लेता था. सुदेवी भी उस की लच्छेदार बातों में खूब रस लेती थी. बातों ही बातों में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे. धीरेधीरे सर्वेश और सुदेवी के बीच की दूरियां सिमटती चली गईं. दोनों रिश्ते को भूल कर खुल कर हंसीमजाक और छेड़छाड़ करने लगे. कुंवारा सर्वेश जहां मौसी से स्त्री सुख पाने को लालायित रहने लगा था, वहीं पति की उपेक्षा का शिकार सुदेवी सर्वेश की जवानी पर मर मिटी थी.

आग दोनों तरफ लगी थी. बस उन्हें मौके की तलाश थी. एक दिन सुबह से बरसात हो रही थी, जिस की वजह से काम बंद था. हरिश्चंद्र किसी काम से ठिबूर चला गया था और बच्चे भी स्कूल चले गए थे. दोपहर को सर्वेश आंगन में आया तो सुदेवी पेटीकोट और ब्लाउज पहने नहा रही थी. भीगे कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे. उन कपड़ों में सुदेवी का अंगअंग साफ झलक रहा था. सुदेवी इस बात से अनजान थी कि उसे कोई देख रहा है. अचानक सर्वेश उस के सामने आ कर खड़ा हो गया तो उसे फटकारने या शरमाने के बजाय सुदेवी उसे अजीब नजरों से ताकने लगी.

सर्वेश के लिए यह एक तरह का इशारा था. इशारा समझते ही सर्वेश ने बाहर का दरवाजा बंद किया और सुदेवी को उठा कर कमरे में ले आया. इस के बाद मर्यादा की सारी सीमाएं टूट गईं और रिश्ते तारतार हो गए. सर्वेश के साथ यौवन का आनंद मिलने के बाद सुदेवी ने पति हरिश्चंद्र की ओर से मुंह मोड़ लिया. वह हरिश्चंद्र की उपेक्षा करने लगी. बातबात में उस से लड़नेझगड़ने लगी. इस की वजह यह थी कि उसे सर्वेश से जो शारीरिक सुख मिल रहा था, वैसा सुख हरिश्चंद्र काफी दिनों से नहीं दे सका था. सर्वेश हट्टाकट्टा जवान था, जबकि हरिश्चंद की जवानी ढल चुकी थी.

धीरेधीरे सर्वेश सुदेवी की जिंदगी में पूरी तरह से आ गया. घर के लोग इस सब से बेखबर थे. कोई सोच भी नहीं सकता था कि ऐसा भी हो सकता है. लेकिन जो सोचा नहीं जा सकता था, वैसा हो रहा था. जब भी दोनों को मौका मिलता वे एक हो जाते. यह भी सच है कि एक न एक दिन पाप का घड़ा ऐसा ही अवश्य भरता है. सुदेवी और सर्वेश के साथ भी हुआ. एक दिन रात में हरिश्चंद्र की नींद खुली तो सुदेवी बिस्तर से गायब थी. उतनी रात को पत्नी कहां गई, हरिश्चंद्र सोच में पड़ गया, क्योंकि दरवाजा भी अंदर से बंद था. वह सर्वेश के कमरे में गया तो वह भी नहीं था. इस के बाद हरिश्चंद्र को शक हुआ. कुछ सोच कर वह छत पर गया तो वहां का नजारा देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. सुदेवी और सर्वेश आपत्तिजनक स्थिति में थे.

हरिश्चंद्र को देखते ही सर्वेश तो भाग खड़ा हुआ, लेकिन सुदेवी कहां भाग कर जाती. हरिश्चंद्र ने उस की जम कर पिटाई की. शोर सुन कर घर वाले आ गए. जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो सब ने सिर पीट लिया. इस के बाद हरिश्चंद सुदेवी पर नजर रखने लगा और सर्वेश के घर आने पर सख्त पाबंदी लगा दी. अब दोनों का मिलना असंभव हो गया, लेकिन फोन पर उन की बातें हो जाती थीं. जब कभी हरिश्चंद्र गांव से बाहर जाता, सुदेवी फोन कर के सर्वेश को बुला लेती. लेकिन हरिश्चंद्र को बच्चों से सर्वेश के आने की खबर मिल ही जाती. तब वह सुदेवी की जम कर पिटाई करता. उस समय सुदेवी रोते हुए यही कहती, ‘‘तुम्हारी जितनी इच्छा हो मार लो, लेकिन याद रखना, एक दिन इस का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’

पत्नी की इस धमकी पर हरिश्चंद्र को और भी गुस्सा आ जाता. उस हालत में वह उस की और पिटाई करता. लेकिन सुदेवी के सिर से सर्वेश के प्यार का भूत नहीं उतरा तो नहीं उतरा. वह सर्वेश की इस कदर दीवानी हो गई थी कि उस के लिए पति को मिटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद उस ने सर्वेश के साथ मिल कर एक ऐसी योजना बनाई, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. उसी योजना के तहत सुदेवी खुद तो बुआ की बेटी की शादी में शामिल होने कन्नौज चली गई. जाने से पहले उस ने बड़ी बहन श्यामदुलारी को फोन कर के कह दिया था कि वह मेला देखने के बहाने उस के पति हरिश्चंद्र को अपने गांव जाना बुला ले. क्योंकि उन का मूड आजकल ठीक नहीं है.

छोटी बहन के कहने पर श्यामदुलारी ने मोबाइल पर हरिश्चंद्र से बात की तो वह मेला देखने के लिए जाने को राजी हो गया. 21 अप्रैल, 2015 को हरिश्चंद्र साढू गंगू के घर पहुंच गया. साढू के घर हरिश्चंद्र का सामना सर्वेश से हुआ तो उस ने लपक कर उस के पैर छू लिए और कुशलक्षेम पूछी. हर साल की तरह उस दिन जाना में मेला लगा था और रात में नौटंकी का कार्यक्रम था. सर्वेश और सुदेवी में मोबाइल पर लगातार बातें हो रही थीं. उस ने सुदेवी को बता दिया था कि बकरा (हरिश्चंद्र) हलाल होने के लिए आ गया है.

योजना के अनुसार, सर्वेश हरिश्चंद्र को मेला दिखाने ले गया. शाम तक दोनों मेला देखते रहे. उस के बाद वह उसे शराब के ठेके पर ले गया. सर्वेश ने खुद तो कम शराब पी, जबकि हरिश्चंद्र को ज्यादा पिलाई. इस के बाद टहलने के बहाने वह हरिश्चंद्र को गांव के बाहर बहने वाले नाले के पास ले गया और वहां धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. हरिश्चंद्र जैसे ही जमीन पर गिरा, उस की गरदन पर पैर रख कर तब तक दबाए रहा, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. मरने के बाद सर्वेश ने हरिश्चंद्र के चेहरे को ईंट से कुचल कर विकृत कर दिया और लाश को वहीं गड्ढे में दफना दिया. रात 11 बजे सर्वेश ने फोन कर के सुदेवी को बता दिया कि उस ने कांटे को निकाल दिया है.

इसी के साथ उस ने सुदेवी से अनुरोध किया कि वह गांव आ जाए, क्योंकि वह उस से मिलने के लिए तड़प रहा है. 23 अप्रैल को सुदेवी पति की खोज के बहाने जाना पहुंची. बहनबहनोई को उस ने पति के लापता होने की जानकारी दे कर पति को खोजने के बहाने सर्वेश के साथ मौजमस्ती करती रही. कुछ दिनों बाद वह घडि़याली आंसू बहाते हुए हिंगूपुर आ गई और जब ससुराल में हरिश्चंद्र के लापता होने की बात बताई तो सभी सन्न रह गए. हरिश्चंद्र के छोटे भाई दिनेश को शक हुआ कि भाई के लापता होने में भाभी सुदेवी का हाथ हो सकता है, इसलिए उस ने पहले तो भाभी को खूब खरीखोटी सुनाई, उस के बाद रिपोर्ट दर्ज करवाने को कहा. देवर के दबाव में सुदेवी डर गई और रिपोर्ट दर्ज कराने को राजी हो गई.

27 अप्रैल, 2015 को सुदेवी दिनेश के साथ थाना महराजगंज पहुंची और सर्वेश पर पति के अपहरण या मार डालने का आरोप लगा कर रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. इस के बाद सर्वेश पकड़ा गया तो सारा राज सामने आ गया. पूछताछ के बाद 28 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने सर्वेश और सुदेवी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें स्वीकृत नहीं हुई थीं. Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: ढोंगी गुरू का अपराधिक अतीत

True Crime Story: कविता रानी को पूरा विश्वास था कि स्वामी सच्चिदानंद उस का परलोक सुधार देगा. परलोक सुधारने की कौन कहे, उस ने उस का सारा धन तो हड़प ही लिया, जान भी ले ली. पंजाब के जनपद नवांशहर में थाना काठगढ़ के तहत एक गांव है मत्तो. यहां के किराना दुकानदार सोमनाथ के 7 भाईबहनों में सब से छोटी थी कविता रानी, जिस की शादी मोहल्ला शिवनगर निवासी सुरेंद्र कुमार से हुई थी. कालांतर में इस दंपति के 2 बेटे हुए, जिन्हें ले कर सुरेंद्र स्पेन चला गया था. पति और बेटों के जाने के बाद कवितारानी नवांशहर के अपने मकान में अकेली रह गई थी.

सोमनाथ बहन का हालचाल लेने के लिए अकसर उस के घर जाया करते थे. पहली दिसंबर, 2009 को शाम 6 बजे उन्हें स्पेन से कविता के बड़े बेटे अजय का फोन आया, ‘‘मामाजी, पिछले 2-3 दिनों से मम्मी को फोन कर रहा हूं, उन से बात नहीं हो पा रही है. आप जा कर जरा मां को देख आएं.’’

अजय की बात ने सोमनाथ को भी चिंता में डाल दिया. वह तुरंत नवांशहर के लिए रवाना हो गए. वहां पहुंच कर उन्होंने देखा, घर के बाहरी गेट पर ताला लटक रहा है. 2 लड़कों ने उन के पास आ कर बताया कि वे कालेज स्टूडैंट हैं और सामने वाले घर में किराए पर रहते हैं. उन में से एक ने उन्हें चाबी सौंपते हुए कहा, ‘‘2-3 दिनों पहले यह चाबी हमें यहां पड़ी मिली थी. शायद आंटीजी के कहीं जाते वक्त उन के हाथ से छूट कर गिर गई है. हम आप को पहचानते हैं, आप आंटीजी के भाई हैं न?’’

दोनों लड़कों ने अपने नाम अजीत चौहान और ऋषि चौहान बताते हुए कविता के घर की ओर इशारा कर के एक साथ कहा, ‘‘यह चाबी हमें इसी गेट के ताले की लग रही है. हम ने इसे उठा कर अपने पास रख लिया था कि आंटीजी के आने पर उन्हें दे देंगे.’’

सोमनाथ ने लड़कों को साथ ले कर गेट का ताला खोला. वे भीतर गए तो सामने के कमरे में भी ताला लगा था, साथ ही अंदर से तेज बदबू आ रही थी. सोमनाथ समझदार आदमी थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बदबू लाश की है. उन के मन में आया, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर उन की बहन मरी पड़ी हो और यह बदबू उसी की लाश से आ रही हो?’

यह बात मन में आते ही सोमनाथ दोनों लड़कों को साथ ले कर थाने जा पहुंचे. थानाप्रभारी राजकुमार ने उन से तहरीर ले कर मामला दर्ज करवाया और पुलिसपार्टी के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. पुलिस ने ताला तोड़ा और मुंह पर कपड़ा लपेट कर भीतर गई. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था और उस के बीच चादर में लिपटी कविता की लाश पड़ी थी. लग रहा था कि मामला लूटपाट के लिए कत्ल का है. कविता के गले में उसी का दुपट्टा कस कर मारा गया था. अपनी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया. रात काफी हो जाने की वजह से काररवाई रोक कर पुलिस ने घर को सील कर दिया.

अगली सुबह पुलिस ने घर को फिर से खोल कर वहां की तलाशी ली तो एक ड्राइविंग लाइसेंस हाथ लगा, जो स्वामी सच्चिदानंद के नाम से था. पासपड़ोस के लोगों ने लाइसेंस देख कर बताया कि यह बहुत मशहूर आदमी है, टीवी के साधना चैनल पर इस के नियमित प्रवचन आते हैं. पता चला कि यह बक्करखाना क्षेत्र में किराए का घर ले कर रहता था. वहीं अपना डेरा बना कर वह प्रवचन दिया करता था, जिसे सुनने के लिए काफी लोग आया करते थे, जिन में कविता रानी भी थी. स्वामी को संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने उस के यहां छापा मारा. पता चला कि स्वामीजी उस रात एक स्थानीय जागरण में व्यस्त थे, जहां से फारिग होने के बाद सुबह ही अपने कुछ शिष्यों के साथ कुरुक्षेत्र चले गए थे.

जागरण आयोजकों ने पुलिस को बताया कि उस रात स्वामीजी थोड़ीथोड़ी देर के लिए 2 बार जागरण में आए थे. मतलब यह रात भर वह जागरण में नहीं रहे थे. पुलिस ने अपना सारा ध्यान स्वामी सच्चिदानंद पर जमा दिया, साथ ही उन के बारे में पता करने के लिए मुखबिरों का भी सहारा लिया गया. मुखबिरी के आधार पर 7 दिसंबर, 2009 को स्वामी को उस वक्त बंगा रेलवे फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया, जब वह अपनी इंडिका कार से अपनी एक शिष्या के साथ कहीं जा रहा था.

विधिवत गिरफ्तारी के बाद सच्चिदानंद को अदालत पर पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ से स्वामी सच्चिदानंद की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी: जिला गुरदासपुर का बड़ा कस्बा है कादियां. यहां के मोहल्ला धर्मपुरा के रहने वाले तिलकराज भारद्वाज छिटपुट काम कर के अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. उन की 7 औलादें थीं, जिन में दूसरे नंबर का था सत्येंद्र कुमार. बचपन ही से उसे एक्टिंग का शौक था.

जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, उस के मन में एक्टर बनने की इच्छा प्रबल होती गई. सत्येंद्र की यह इच्छा तो पूरी नहीं हुई, लेकिन दसवीं पास करने के बाद उसे पंजाब सरकार के रेवेन्यू विभाग में पटवारी की नौकरी जरूर मिल गई. यह अलग बात है कि अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं था. उसे जहां कहीं किसी फिल्म की शूटिंग होने की बात पता चलती, वह छुट्टी ले कर वहां पहुंच जाता. अपनी इसी सनक के चलते एक बार वह छुट्टी ले कर मुंबई गया तो काफी दिनों बाद लौटा. परिणामस्वरूप उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. इस के बाद वह किसी अन्य काम की तलाश में दिल्ली चला गया. यहांवहां भटकते हुए एक दिन वह पानी पीने के लिए एक ऐसे डेरे में चला गया, जहां एक संत का प्रवचन चल रहा था.

वहां बहुत भीड़ थी. पानी की तो छोडि़ए, वहां तरहतरह के पकवान मुफ्त में बांटे जा रहे थे. पेट भर खाने के बाद सत्येंद्र वहीं पसर गया. जितना बढि़या खाना उसे वहां खाने को मिला था, उस से भी कहीं ज्यादा मजा आया उसे प्रवचन सुनने में उस ने देखा कि श्रद्धालु न केवल संतजी के पैरों में माथा टेक रहे थे, बल्कि अच्छीभली रकम भी चढ़ा रहे थे. बस, यहीं से सत्येंद्र का दिमाग दूसरी दिशा में सोचने लगा. उसे लगा कि इस अंधविश्वासी देश में नाम और दाम कमाने का इस से बेहतर जरिया कोई दूसरा नहीं हो सकता.

पूछताछ में सत्येंद्र ने पुलिस को बताया, ‘‘वाकजाल फैलाने में मैं कुशल था ही, मेरी वाणी में भी ओज था. ऊपर वाले ने चेहरामोहरा भी आकर्षक दिया था. अपनी बात कहने का तरीका भी मुझे काफी हद तक आ गया था. बस थोड़ी जरूरत थी धर्म शास्त्रों की जानकारी की. बिना देरी किए मैं धर्मकर्म का ज्ञान जुटाने लगा. बाबाओं के प्रवचन पूरे ध्यान से सुनने लगा. टीवी चैनलों पर खरीदे गए वक्त में बाबा प्रवचन देने आते तो मैं ध्यान से उन का तौरतरीका देखता और पूरे मनोयोग से उन के प्रवचनों को सुनता.

‘‘आखिर मैं ने तय कर लिया कि मैं इसी धंधे को अपना कर नाम और दाम कमाऊंगा. इस के लिए मैं ने सब से पहले अपने लिए गेरुआ वस्त्र सिलवाए. फिर धार्मिक ग्रंथ खरीद कर उन का अध्ययन शुरू कर दिया. थोड़ीबहुत तैयारी कर के सन् 2004 में मैं छोटेमोटे धार्मिक समारोहों में प्रवचन देने लगा. आत्मविश्वास से भरे मेरे प्रवचन लोगों को पसंद आने लगे. अब मैं ने अपने आप को स्वामी सच्चिदानंद कहलवाना शुरू कर दिया था.’’

सत्येंद्र के बताए अनुसार, पता नहीं यह उस की आवाज का जादू था या उस के आकर्षक व्यक्तित्व का कमाल कि उस के प्रवचनों की धाक जमने लगी. धीरेधीरे उस का सर्कल बढ़ने लगा. जल्दी यह स्थिति आ गई कि उस के कार्यक्रमों में धर्मभीरु लोगों की अच्छीखासी भीड़ जुटने लगी. चढ़ावे के रूप में काफी पैसा भी आने लगा. लोगों की अंधश्रद्धा को देखते हुए उस ने अपना नाम स्वामी सतिंदरानंद की जगह स्वामी सच्चिदानंद रख लिया. क्योंकि इस नाम में कुछ ज्यादा आकर्षण था. उस के दिन तेजी से बदलने लगे. उन्हीं दिनों उस का संपर्क दिल्ली के गणेशनगर निवासी चमनलाल मोंगा से हुआ. उस का अपना कारोबार था. जल्दी ही वह उस का शिष्य बन कर दिनरात उस की सेवा करने लगा. मोंगा को किसी बात की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन वह इस लोक में रहतेरहते अपना परलोक सुधारना चाहता था.

मोंगा ने इस बारे में जब स्वामी सच्चिदानंद से बात की तो उस ने उसे यह कह कर डरा दिया कि वह परलोक की चिंता छोड़े, अभी तो उस का यह लोक भी नहीं संवरा. इस पर उस ने सच्चिदानंद के पैर पकड़ लिए. तब उस ने उसे झांसे में लेने का प्रयास करते हुए कहा कि उस के एकलौते बेटे की उम्र केवल 3 महीने रह गई है. यही नहीं, उस की एकलौती बेटी भी उस की इस तरह दुश्मन बन जाएगी कि वह कहीं का नहीं रहेगा. इस पर मोंगा बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए सच्चिदानंद के पैरों पर नोटों की गड्डियां रख कर बर्बाद होने से बचाने की प्रार्थना करने लगा.

स्वामी सच्चिदानंद ने मोंगा को जो बातें बताईं थीं, उन्हें सच साबित करने के लिए उस ने जाल बिछाना शुरू कर दिया. उस ने मोंगा की जवान बेटी को बुला कर उसे अपने जाल में फंसा लिया. जब लड़की वश में हो गई तो उस ने उसे कुछ इस तरह से उकसाया कि उस ने अपने पिता समेत 11 लोगों पर गैंगरेप का केस दर्ज करवा दिया और खुद उस के साथ उस के डेरे में रहने लगी. साधना चैनल पर सच्चिदानंद का जो कार्यक्रम आता था, उस का सारा खर्च चमनलाल मोंगा उठाता था, लेकिन उस ने उस का चमन उजाड़ कर उस की बेटी को अपनी शिष्या बना लिया था.

फिर 2008 के अंत में वह उसे साथ ले कर नवांशहर चला गया. यहां आ कर उस ने प्रचार किया कि उस का एक भाई जज है. अपना प्रभाव जमाने के लिए उस ने यह भी प्रचारित किया कि पहले वह भी जज था, लेकिन मोहमाया त्याग कर उस ने साधु का चोला पहन लिया है. नवांशहर में वह खूब मशहूर हो गया. बक्करखाना रोड पर किराए का मकान ले कर सच्चिदानंद ने अपना डेरा बना लिया और रोज प्रवचन करने लगा. उस के यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी. इन्हीं में कविता रानी भी थी, जो उस से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गई थी. उस का पति और बेटे विदेश में थे. करने को उस के पास कुछ था नहीं. वह भी परलोक सुधारने की गरज से उस के यहां जाने लगी थी और उस की शिष्या बन गई थी. बहाने बना कर उस ने उस से करीब 6 लाख रुपए ऐंठ लिए थे.

एक दिन कविता को विश्वास में ले कर सच्चिदानंद ने उस से कहा कि उस से खार खाने वाले लोंगों ने उस पर झूठे मुकदमे कर दिए हैं, जिन्हें खत्म करवाने के लिए उसे 20 लाख रुपए चाहिए. इस से कविता को उस पर शक हो गया. परिणाम यह हुआ कि उस ने उस से अपना पिछला पैसा मांग लिया. तब सच्चिदानंद को लगा कि उस का पांसा उल्टा पड़ गया है. कुछ दिन तो वह उसे टालता रहा, लेकिन जब वह उस के पीछे ही पड़ गई तो उसे लगा कि कविता अपना पैसा वापस ले कर ही रहेगी. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए सच्चिदानंद ने एक योजना बनाई. 28 नवंबर, 2009 को उस ने फोन कर के कविता से कहा कि पैसों का इंतजाम हो गया है, आज वह उसे उस के पूरे 6 लाख रुपए दे देगा.

साथ ही यह भी कहा कि जागरण की वजह से वह थोड़ा व्यस्त है, इसलिए रात में 10, साढ़े 10 बजे पैसा देने आएगा, क्योंकि सुबह उसे कुरुक्षेत्र जाना है. इस तरह जागरण के बीच से उठ कर वह कविता के यहां जा पहुंचा. कविता बेसब्री से उस का इंतजार कर रही थी. जैसे ही वह भीतर पहुंचा, उस ने सीधेसीधे अपने 6 लाख रुपए मांगे. उस ने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं, मैं ने तो पूरे 6 लाख रुपए का इंतजाम कर लिया था. लेकिन जगराता में झगड़ा हो जाने से किसी ने मेरी जेब से पैसे निकाल लिए.’’

‘‘देखो, तुम्हारा यह झूठफरेब मेरे आगे चलने वाला नहीं है. तुम सीधेसीधे मेरे 6 लाख रुपए निकालो वरना मैं तुम्हारी शिकायत पुलिस से करूंगी.’’

कविता के मुंह से इतना निकला था कि स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र ने पूरे जोर से उस की नाक पर घूंसा मारा. वह बेहोश सी हो कर नीचे गिरने को हुई, तभी उस ने उस के गले में पड़ा दुपट्टा उस की गरदन पर कस दिया. जरा सी देर में वह मौत की नींद सो गई. सच्चिदानंद ने उस की लाश चादर में लपेट कर एक तरफ रख दी. उस के बाद कमरे का सामान इस तरह बिखेर दिया, जैसे वहां किसी ने लूटपाट की हो. यह उस का दुर्भाग्य ही था कि यह सब करते समय उस का ड्राइविंग लाइसेंस वहां गिर गया. उस ने कविता के दोनों सैलफोन भी उठा लिए थे, जिन्हें बाद में उस ने तोड़ दिए थे.

कविता को ठिकाने लगाने के बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद इत्मीनान से जा कर जागरण में बैठ गया, ताकि उस पर किसी को शक न हो. सुबह 6 बजे अपने चेलों को ले कर वह कुरुक्षेत्र चला गया. बाद में दिल्ली वाली अपनी शिष्या को भी उस ने वहीं बुला लिया. इस के बाद वह जालंधर और अमृतसर में घूमता रहा. आखिर बंगा फाटक से गुजरते हुए वह पकड़ा गया. कथित स्वामी सच्चिदानंद के साथ पकड़ी गई उस की शिष्या से भी पुलिस ने पूछताछ की. लेकिन वह कविता की हत्या के षडयंत्र में शामिल नहीं थी. वह तो खुद ढोंगी स्वामी के जाल में फंसी हुई थी, जिस ने उस के दबाव में अपने पिता तथा अन्य लोगों पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा दिया था.

इस मामले में उस की कोई भूमिका न पाए जाने पर पुलिस ने उसे उस के अभिभावकों के हवाले कर दिया. 10 दिसंबर, 2009 को अभियुक्त सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया गया. इस के ठीक एक महीने बाद कथित स्वामी सच्चिदानंद को जब पेशी पर अदालत ले जाया जा रहा था तो रास्ते में पुलिस वालों को गच्चा दे कर वह फरार हो गया. पंजाब पुलिस ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन वह आदमी दोबारा उन के हत्थे नहीं चढ़ा. देखतेदेखते साढ़े 5 साल का लंबा अरसा गुजर गया.

मगर जैसी कि कहावत है, 100 दिन चोर के 1 दिन साधु का. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सैल ने 6 जुलाई, 2015 को कथित स्वामी सच्चिदानंद को बेगमपुर इलाके के एक मकान से गिरफ्तार कर लिया. स्पैशल सैल के डीसीपी राजीव रंजन, एसीपी संदीप ब्याला और इंसपेक्टर संजय नागपाल ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो अपनी उक्त कहानी बताने के बाद उस के आगे की दास्तान इस तरह से सुनाई: दरअसल ढोंगी सत्येंद्र उर्फ सच्चिदानंद नवांशहर में बहुत बुरी तरह फंस गया था. उस के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हो गया था. पुलिस ने उसे पकड़ कर जेल भी भिजवा दिया था. चूंकि उस के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे, इसलिए वह भाग निकला. वहां से भागने के बाद सच्चिदानंद उत्तराखंड पहुंच कर साधुओं की एक टोली में शामिल हो कर उन की सेवा करने लगा. अपना रंगरूप भी उस ने साधुओं जैसा ही बना लिया था.

कुछ दिनों बाद वह उत्तरकाशी चला गया, जहां किस्मत से विश्वनाथ मंदिर में उसे पुजारी की नौकरी मिल गई. दिल्ली में उस की शिष्या यानी प्रेमिका थी कल्पना. एक दिन साधु वेश में ही वह दिल्ली जा कर उस से मिला. कल्पना उस की प्रेम दीवानी थी. नवांशहर में भी वह उस के साथ पकड़ी गई थी, मगर पुलिस ने उसे शुरू ही में निर्दोष मान कर उस के कुछ रिश्तेदारों के हवाले कर दिया था. सच्चिदानंद को कत्ल केस में गिरफ्तार कर के हवालात में डाल दिया गया. वहां से उस के फरार हो जाने के बारे में कल्पना को कुछ पता नहीं था. पता चलने पर भी न उस ने इस बात का बुरा माना और न जरा भी घबराई, बल्कि उस के साथ उत्तरकाशी में रहने को तैयार हो गई.

जबकि सच्चिदानंद के लिए फिलहाल यह संभव नहीं था. विश्वनाथ मंदिर से उसे इतना पैसा नहीं मिलता था कि वह अपने साथसाथ कल्पना का भी खर्च उठा पाता. दूसरी ओर वह कल्पना को छोड़ना भी नहीं चाहता था. इसलिए अतिरिक्त धन कमाने के लिए उस ने अलग से कोई धंधा करने की सोची. नए धंधे के रूप में उस ने पंजाब में स्मैक सप्लाई करना शुरू कर दिया. इस से उसे मोटी कमाई होने लगी तो वह विश्वनाथ मंदिर को छोड़ कर दिल्ली में ही रहने लगा. अब वह एक तरफ मादक पदार्थों की तस्करी कर रहा था तो दूसरी तरफ दिल्ली के कई इलाकों में प्रवचन कर के अपने आडंबर को भी जारी रखे हुए था. बीचबीच में वह धर्मांध लोगों को चूना लगाने से भी बाज नहीं आ रहा था. इन ठगियों से उस ने कई लोगों की संपत्तियां भी हथिया ली थीं.

कथित स्वामी सच्चिदानंद अपने सभी काम पूरी होशियारी से कर रहा था. फिर भी मादक पदार्थों की तस्करी करते 14 अक्तूबर, 2014 को वह पंजाब में पठानकोट पुलिस के हत्थे चढ़ गया. चूंकि वह साधु लिबास में था और मादक पदार्थों की मात्रा भी कुल 250 ग्राम थी, इसलिए उस ने पुलिस को यही बताया कि यह नशा वह अपने निजी इस्तेमाल के लिए रखे हुए था. जो भी हो, पुलिस ने उस की बातों में आ कर उस से सख्त पूछताछ नहीं की, वरना उस के द्वारा किए गए कत्ल जैसे संगीन अपराध का तभी खुलासा हो जाता और वह जालंधर की उसी जेल में सलाखों के पीछे होता, जहां से अदालत ले जाते वक्त फरार हुआ था.

खैर, पठानकोट पुलिस ने सच्चिदानंद से नरमी का व्यवहार करते हुए उस का कस्टडी रिमांड न ले कर उसे अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. इस का फायदा उठा कर एक दिन उस ने वहां से भी फरार होने की सोची. एक दिन जेल के अपने सैल में लेटे हुए उस ने यह कह कर जोरों से चिल्लाना शुरू कर दिया कि उस के पेट में जोरों का दर्द हो रहा है. जेल अधिकारियों ने तत्काल उसे अस्पताल में भरती करवाने की व्यवस्था कर दी. अस्पताल में उस की निगरानी के लिए 2 सिपाही भी तैनात किए गए. आखिर वह उन्हें चकमा दे कर पहली ही रात अस्पताल से फरार हो गया.

वहां से वापस दिल्ली पहुंच कर वह कल्पना के साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा, साथ ही स्वामी सच्चिदानंद के रूप में प्रवचनों के कार्यक्रम भी करता रहा. लेकिन पता नहीं कैसे पुलिस ने उस के आपराधिक अतीत का पता लगा कर उसे गिरफ्तार कर लिया. दिल्ली पुलिस ने अपनी पूछताछ पूरी कर सत्येंद्र उर्फ स्वामी सच्चिदानंद को न्यायिक हिरासत में भेजने की व्यवस्था करने के अलावा पंजाब पुलिस को उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. पठानकोट पुलिस की एक टीम दिल्ली जा कर उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले आई. इस बार उन्होंने स्वामी सच्चिदानंद उर्फ सत्येंद्र से गहन एवं व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में भी उस ने वही सब बताया था, जो वह पहले ही दिल्ली पुलिस को बता चुका था.

पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में गुरदासपुर की सैंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां से नवांशहर पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले गई. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi True Crime: जुर्म बोलता है

Hindi True Crime: पत्नी की मौत के बाद डा. अशोक सिंघल अपनी दोस्त रीना से अपने मन की बात कर लेते थे, लेकिन डा. अशोक के एकलौते बेटे अंकित को पिता की यह दोस्ती पसंद नहीं थी. फिर वह ऐसा जुर्म कर बैठा कि…

डा. अशोक सिंघल लंबीचौड़ी जिस आलीशान कोठी में रहते थे, उस कोठी के सामने 21 मई की सुबह पुलिस की कई गाडि़यां आ कर रुकीं. उन की कोठी के सामने अचानक आई पुलिस को देख कर आसपड़ोस के लोग चौंके कि आखिर ऐसी क्या बात हो गई जो सुबहसुबह इतनी पुलिस आई है. पुलिस की गाडि़यों के आते ही कोठी के अंदर से विलाप करने की आवाज भी आने लगी. माजरा समझ में न आने पर लोग आपस में कानाफूसी करने लगे. पुलिस के पीछेपीछे कुछ लोग कोठी में पहुंचे तो पता चला कि किसी ने डा. अशोक सिंघल की हत्या कर दी है.

उन की हत्या की बात सुन कर लोग हैरत में पड़ गए. क्योंकि वह निहायत सज्जन इंसान थे. उसी दौरान डौग स्क्वायड और फोरेंसिक एक्सपर्ट्स की टीमें भी वहां पहुंच गई थीं. यह वारदात उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ की पौश कालोनी शास्त्री नगर के एच ब्लौक में घटी थी. थानाप्रभारी हरशरण शर्मा ने कोठी का मुआयना किया तो देखा कि डा. अशोक सिंघल का खून से लथपथ शव कोठी के बाहरी हिस्से में बने बैडरूम में फर्श पर पड़ा था. देख कर लग रहा था जैसे किसी भारी चीज से उन के सिर पर प्रहार किया गया है. उन का सिर फटा हुआ था. मौके पर इधरउधर खून बिखरा हुआ था.

लाश बिस्तर पर नहीं थी, इस से लगता था कि मरने से पहले उन्होंने हत्यारे से संघर्ष किया था. बैडरूम के अलावा साथ लगे कमरे का सामान भी बिखरा पड़ा था. कमरे में रखी अलमारी के कपड़े बाहर पड़े थे तथा लौकर भी खुला था. अलमारी वाले कमरे से ही लगा हुआ उन के बेटे अंकित का कमरा था, लेकिन बदमाशों ने उसे खोला तक नहीं था. जिस कमरे में लाश पड़ी थी, वहीं पर डा. अशोक सिंघल का मोबाइल फोन व लैपटौप रखा था. वहीं पर खून से सनी एक अंगूठी भी पड़ी थी. सारे सबूतों को पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया. क्राइम सीन देख कर पहली नजर में लग रहा था कि उन की हत्या लूटपाट की खातिर की गई थी.

मामला गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना अधिकारियों को भी दे दी थी. सूचना मिलने पर एसएसपी डी.सी. दुबे, एसपी (सिटी) ओमप्रकाश सिंह और सीओ (सिविल लाइंस) विनीत भटनागर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मौके पर पहुंचा खोजी कुत्ता कोठी के दरवाजे से बाहर सड़क तक जा कर वापस आ गया और कोठी में ही घूमता रहा. उस ने 3 बार ऐसा किया. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम ने लौकर समेत अन्य स्थानों से सावधानीपूर्वक प्रिंट एकत्र कर लिए. दरवाजे के पीछे एक बेसबौल बैट रखा था. हो सकता है, उस से वारदात को अंजाम दिया गया हो, यह सोच कर टीम ने उस के ऊपर से भी फिंगरप्रिंट उठा लिए.

इस कोठी में 58 वर्षीय डा. अशोक सिंघल अपने बेटे अंकित, पुत्रवधू दीप्ति व उस की 4 महीने की बेटी ओजस्वी के साथ रहते थे. अशोक सिंघल आयुर्वेद के डाक्टर थे. साथ ही उन का दवाओं का भी कारोबार था. जिस की सप्लाई मेरठ के आसपास के जिलों में होती थी. एमबीए पास उन का बेटा भी उन के साथ कारोबार से जुड़ा था. अशोक की एक बेटी आस्था थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. वारदात की सूचना पर वह भी वहां आ गई थी. वह शहर में ही रहती थी. पुलिस ने वहां मौजूद बेटे अंकित से प्रारंभिक पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘पापा बैडरूम में सोते थे, जबकि मैं दीप्ति के साथ कोठी के ऊपरी हिस्से में बने कमरे में सोता था.

आज तड़के करीब साढ़े 4 बजे दीप्ति बेटी के लिए दूध गरम करने नीचे आई, क्योंकि किचन नीचे ही है. जब वह बैडरूम की तरफ पहुंची तो लकड़ी का दरवाजा खुला हुआ था, लेकिन बैडरूम में अंधेरा था.

‘‘उस ने कई आवाजें दीं, लेकिन बैडरूम से कोई आवाज नहीं आई. तब दीप्ति ने बिजली बोर्ड से लाइट का स्विच औन किया. कमरे में रौशनी होते ही उस की नजर बैड से होते हुए फर्श पर गई तो वह भौचक्की रह गई. वहां पर पापा खून से लथपथ पड़े थे.

‘‘वह रोती हुई ऊपर आई और मुझे जगा कर यह बात बताई. पत्नी की बात सुन कर मेरे होश उड़ गए. मैं तुरंत तेज कदमों से नीचे आया तो वास्तव में बैडरूम में पापा की लाश पड़ी थी. पापा की हत्या की जानकारी मैं ने फोन द्वारा अपने रिश्तेदारों को दी, उस के बाद पुलिस को फोन किया?’’

पुलिस ने ऊपर के कमरे में सोने की वजह मालूम की तो उस ने बताया, ‘‘दरअसल, पापा को सिगरेट पीने की आदत थी. वह अकसर रात में कई बार सिगरेट पीते थे. इस से मुझे और मेरी पत्नी को परेशानी होती थी. इसलिए रात का खाना वगैरह खा कर हम दोनों ऊपर के कमरे में सोने के लिए चले जाते थे.’’

उस ने यह भी बताया कि पापा ड्राइंगरूम का दरवाजा खुला रख कर सोते थे और कोठी का मुख्य दरवाजा भी अंदर से बंद रहता था, परंतु पत्नी के मुंह से पापा की हत्या की बात सुनने के बाद जब वह नीचे आया तो देखा कि मुख्य दरवाजा बंद तो था, लेकिन उस का कुंडा नहीं लगा था. उन के चीखने की आवाज भी किसी ने नहीं सुनी थी. पुलिस अधिकारियों ने क्राइम सीन को पुन: समझा. जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं. एक तो यह कि सिर पर किसी भारी चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला हत्या का ज्यादा लग रहा था, न कि लूटपाट में हुई हत्या का. हालांकि अंकित लौकर से करीब एक लाख रुपए की नकदी गायब होने की बात कह रहा था, जबकि महंगा मोबाइल फोन व लैपटौप कमरे में ही रखे थे. आमतौर पर बदमाश ऐसी चीजें नहीं छोड़ते. इस के अलावा लूटपाट करने वालों ने अंकित के कमरे को खोला तक नहीं था, जबकि उस के दरवाजे पर ताला नहीं था.

तीसरी बात यह कि वारदात में किसी एक ऐसे नजदीकी व्यक्ति का हाथ होने की संभावना लग रही थी, जो घर की स्थिति को जानता था. वह व्यक्ति यह बात तक जानता था कि डा. अशोक दरवाजा खुला रख कर सोते हैं. बहरहाल, कातिल जो भी था, उस ने जुर्म को छिपाने की हर संभव कोशिश की थी. पुलिस ने मौके से जो अंगूठी बरामद की थी, वह भी डा. अशोक की नहीं थी. अंकित ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया. पुलिस को लगा कि वह शायद हत्यारे की होगी. घटनास्थल की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद डा. अशोक की लाश को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

इस के साथ ही अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. मामला संगीन था, इसलिए एसएसपी डी.सी. दुबे ने केस के खुलासे के लिए थानाप्रभारी हरशरण शर्मा की अध्यक्षता में एक टीम का गठन कर दिया. टीम का निर्देशन एसपी ओमप्रकाश सिंह कह रहे थे. अपराध शाखा भी टीम को जांच में सहयोग कर रही थी. अगले दिन पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह सिर पर घातक प्रहार बताया गया था. मौत का समय रात 10 बजे से 2 बजे के बीच का था. इसलिए पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की रात 10 बजे से ले कर 3 बजे तक की फुटेज देखी. लेकिन इस से कोई सुराग नहीं मिला. फुटेज में कोई भी शख्स आताजाता दिखाई नहीं दिया.

पुलिस ने अंकित से पूछताछ की, लेकिन वह गमजदा था और बीमार भी, इसलिए वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. पुलिस को लग रहा था कि डाक्टर की हत्या किसी नजदीकी व्यक्ति ने ही की है, इसलिए पुलिस ने उन के पड़ोसियों, रिश्तेदारों के अलावा परिचितों से भी पूछताछ कर के जानना चाहा कि उन के यहां किनकिन लोगों का ज्यादा आनाजाना था. इस पूछताछ में पुलिस को यह पता चला कि उन के पास कभीकभी एक महिला आया करती थी. वह महिला कौन थी, इस बारे में पता नहीं चल सका. देखतेदेखते 2 दिन गुजर गए, लेकिन उस महिला का पता न लगा. उधर मामले का खुलासा न होने पर कुछ संभ्रांत लोगों ने एसएसपी डी.सी. दुबे से मुलाकात की और हत्या का जल्द खुलासा करने की मांग की. इस के बाद पुलिस टीम ने पारिवारिक बिंदु पर जांच केंद्रित कर दी.

पुलिस ने परिजनों के मोबाइल नंबर ले कर उन की काल डिटेल्स निकलवाईं. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि डा. अशोक एक नंबर पर सब से ज्यादा बातें किया करते थे. उस नंबर की जांच हुई तो वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर की रहने वाली एक महिला रीना का निकला. रिश्तेदारों और पड़ोसियों से भी पता चला कि डा. अशोक के पास एक महिला आती थी. कहीं वह महिला वही तो नहीं है, जिस से वह फोन पर ज्यादा बातें करते थे, जानने के लिए पुलिस टीम बिजनौर में रीना के घर गई और उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई. कई तरह से की गई पूछताछ के बाद पुलिस को यह जानकारी मिली कि रीना से डा. अशोक की दोस्ती तो थी लेकिन उन की हत्या में उस का कोई हाथ नहीं था. रीना ने यह भी बताया कि इस मित्रता को ले कर डा. अशोक से अपने बेटे अंकित का विवाद भी होता रहता था. यह बात डा. अशोक ने उस से बताई थी.

रीना द्वारा दी गई यह जानकारी बड़े काम की थी. पुलिस का शक अब परिवार के इर्दगिर्द ही घूमने लगा, यह भी संभव था कि बेटा ही पिता का कातिल बन गया हो, लेकिन पुलिस को यकीन नहीं हो रहा था कि कोई बेटा ऐसा कांड कैसे कर सकता है. एक और अहम बात यह थी कि अंकित ने हत्या की खबर अपने पड़ोसियों तक को नहीं दी थी. पुलिस के पहुंचने पर ही पड़ोसियों को हत्या का पता चला था. पुलिस ने कुछ बिंदुओं पर एक बार फिर अंकित से पूछताछ की. उस ने बिना डरे सफाई से सभी सवालों के जवाब दिए. पिता से एक महिला की मित्रता के विरोध की बात तो उस ने स्वीकार की, लेकिन उन की हत्या करने की बात नकार दी. थानाप्रभारी हरशरण शर्मा ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हारे पिता की किसी से कोई ऐसी रंजिश थी, जो हत्या की वजह बनी हो?’’

‘‘मेरी जानकारी में उन का कोई विवाद नहीं था. यदि होता तो वह मुझे जरूर बताते.’’ अंकित ने आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया.

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो फिर हत्या कौन कर सकता है?’’

‘‘सर, मैं कह रहा हूं, यह काम लुटेरों का है. घर में यदि लुटेरे नहीं आए तो फिर लौकर से रुपए कैसे गायब हुए. वे पैसे मैं ने ही उस शाम को लौकर में रखे थे.’’ अंकित ने जवाब दिया.

अंकित अपनी जगह ठीक हो सकता था, लेकिन सीसीटीवी फुटेज के आधार पर इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता था. जब कोठी में कोई आया ही नहीं तो लूट कैसे हो गई. पुलिस को अंकित के खिलाफ ऐसे कोई मजबूत सबूत नहीं मिल रहे थे, जिन के आधार पर उसे थाने ले जा कर सख्ती से पूछताछ की जा सके. पुलिस टीम जांच में उलझ गई. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज एक बार ध्यान से फिर देखी. इस का नतीजा पहले जैसा ही निकला. उस में कोई भी मृतक की कोठी की तरफ आताजाता नहीं दिखा. इंस्पेक्टर हरशरण शर्मा ने एसपी ओमप्रकाश सिंह व सीओ विनीत भटनागर को जांच से अवगत कराया.

पुलिस अधिकारियों ने विचारविमर्श किया. सीसीटीवी कैमरे की इस सच्चाई को किसी भी सूरत में झुठलाया नहीं जा सकता था. अब सब से बड़ा सवाल यह था कि जब उन की कोठी में कोई बाहरी व्यक्ति आया ही नहीं तो डा. अशोक की हत्या किस ने की? पुलिस ने अंकित को ही शक के दायरे में रख कर जांच में परिवर्तन किया. इस बार पुलिस ने अंकित के मोबाइल फोन की लोकेशन हासिल कर ली. पता चला कि 21 मई की तड़के करीब साढ़े 4 बजे उस के मोबाइल की लोकेशन कोठी से दूर पाई गई. यह बेहद चौंकाने वाली बात थी. साफ था कि अंकित तड़के कोठी से बाहर गया था. वह क्यों गया था, इस का जवाब उस से पूछताछ के बाद ही मिल सकता था. जबकि उस ने बताया था कि पत्नी के जगाने पर उसे पिता की हत्या का पता चला था.

मोबाइल की लोकेशन को पुख्ता करने के लिए पुलिस टीम ने इस बार रात 3 बजे के बाद की सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस फुटेज से पता चला कि अंकित सुबह 4 बजे के बाद अपनी कार ले कर कोठी से गया था और आधे घंटे बाद ही वापस आ गया था. उस के झूठ की पोल खुल गई थी. अब उस के खिलाफ पुलिस को पुख्ता सबूत मिल गए थे. शक व सबूतों के जाल में वह पूरी तरह फंस चुका था. बिना देर किए 26 मई, 2015 को पुलिस ने पूछताछ के लिए उसे हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. पुलिस ने इस बार सबूतों के आधार पर उस से मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की. वह पुलिस की बात को झुठला नहीं सका. आखिर सच बोलते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, अपने पिता को अकेले मैं ने ही मारा है. मुझे बहुत गुस्सा आ गया था.’’

उस से गहराई से पूछताछ की गई तो इस हत्याकांड के पीछे दरकते रिश्तों की चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई. सरल स्वभाव के डा. अशोक सिंघल आयुर्वेदिक दवाओं का कारोबार करते थे. उन के 2 बच्चे थे, एक बेटा अंकित और दूसरी बेटी आस्था. कुछ सालों पहले वह बेटी का विवाह कर चुके थे. अंकित भी पिता के काम में हाथ बंटाता था. कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन की भरपाई कभी नहीं होती. इंसान बाहर से तो खुश नजर आता है, लेकिन अंदर से वह परेशान रहता है. अशोक सिंघल के साथ भी कुछ ऐसा ही था. डा. अशोक की जिंदगी दिखावे के तौर पर यूं तो खुशहाल थी, लेकिन उन की जिंदगी में एक ऐसा गम था, जो उन्हें अकसर परेशान किया करता था. दरअसल उन की पत्नी मीनाक्षी की कई सालों पहले मृत्यु हो गई थी. इस के बाद वह अकेले से हो गए थे. किसी तरह उन की जिंदगी बीत रही थी.

2 साल पहले उन्होंने अंकित का विवाह दीप्ति से कर दिया. दीप्ति एमबीए की पढ़ाई कर रही थी. अंकित को शराब पीने की लत थी. पिता ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं सुधरा तो उन्होंने इसे नियति मान लिया. डा. अशोक अपनी दवाओं की सप्लाई के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों के अलावा उत्तराखंड भी जाया करते थे. इसी दौरान जनवरी, 2015 में उन की मुलाकात बिजनौर की एक महिला रीना से हुई. रीना एक हर्बल कंपनी में दवाओं की सप्लाई का काम करती थी. अशोक की जिंदगी में पत्नी के गुजर जाने के बाद नीरसता छाने लगी थी.

रीना से उन्हें भावनात्मक लगाव हो गया. रीना भी उन से स्नेह करती थी. दोनों के बीच अकसर मोबाइल पर भी बातें होने लगी थीं. वक्त के साथ दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थीं. इस से डा. अशोक के जीवन में खुशी जरूर आ गई थी. रीना चूंकि कंपनी के काम से बाहर जाती रहती थी और डा. अशोक का काम भी बाहर घूमने का था, इसलिए दोनों साथसाथ घूमते थे. इस दौरान वे एकसाथ होटल में ही रुकते थे. जिन जगहों पर डा. अशोक दवा सप्लाई करते थे, वहां के लोगों से अंकित का भी संपर्क था. उन्हीं लोगों से अंकित को यह बात पता चल गई कि उस के पिता की किसी महिला से दोस्ती हो गई है और दोनों साथसाथ घूमते हैं.

अंकित को यह बात बरदाश्त नहीं हुई. उस ने पिता से इस मुद्दे पर एक दिन बात की. तब उन्होंने अंकित को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम काम पर ध्यान दो अंकित. क्या बात अच्छी है क्या बुरी, यह मैं तुम से ज्यादा समझता हूं.’’ पिता के इस जवाब से वह चुप तो हो गया, लेकिन अंदर ही अंदर कुढ़ गया. क्योंकि वह उन का कर भी क्या सकता था. इस के बाद उसे जैसेजैसे पिता की रीना से मेलमुलाकातों का पता चलता गया, वैसेवैसे उस का अपने पिता से मनमुटाव बढ़ता गया. रीना से संबंधों को ले कर दोनों के बीच कई बार विवाद भी हुआ. इसी तनाव में उस ने ज्यादा शराब पीनी शुरू कर दी. इसी बीच वह पीलिया की बीमारी से ग्रस्त हो गया. बीमारी बढ़ गई तो डा. अशोक ने उसे शहर के एक नामी अस्पताल में भरती करा दिया. अस्पताल में एक महीने रहने के बाद वह ठीक हो सका.

जिस समय वह अस्पताल में भरती था, उस दौरान रीना उस के पिता के साथ कोठी में भी रुकी थी. अंकित को यह पता चला तो उसे नागवार लगा. अंकित को इस बात का डर था कि उस के पिता रीना के साथ कहीं शादी न कर लें. यदि उन्होंने ऐसा कर लिया तो वह उन की दौलत की हकदार हो जाएगी. मई के पहले सप्ताह में अंकित अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आ गया. अशोक को सिगरेट पीने की आदत थी. वह रात को भी जाग कर कई दफा सिगरेट पीने बैठ जाते थे. इस से अंकित और उस की पत्नी परेशान हो जाते थे. इसलिए अंकित व दीप्ति ऊपर वाले कमरे में जा कर सो जाया करते थे.

रीना को ले कर पितापुत्र में तकरार इतनी बढ़ गई थी कि उन्होंने एकदूसरे से बात करनी छोड़ दी थी. कुछ दिनों बाद डा. अशोक बाहर गए. अंकित को पता चल गया कि उन के साथ रीना भी गई थी. अब की बार अंकित ने तय कर लिया कि पिता के लौटने पर वह उन से दो टूक बात करेगा. डा. अशोक अपने बिजनेस टूर से वापस आए तो 19 मई की शाम को अंकित ने उन से दो टूक कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि उस महिला से आप दूर हो जाएं.’’

यह सुन कर डा. अशोक आगबबूला होते हुए बोले, ‘‘तुम मेरे बेटे हो, इसलिए अपनी हद में रहो, वरना घर से बाहर का रास्ता दिखा दूंगा.’’

‘‘बेटा होने के नाते ही कह रहा हूं कि आप को यह बात शोभा नहीं देती. आप अपनी मर्यादा का ध्यान रखें.’’ अंकित ने तेवर दिखाए. बेटे के तेवर देख कर अशोक को भी ताव आ गया. उन्होंने अंकित के गाल पर थप्पड़ रसीद करते हुए चेतावनी दी, ‘‘खबरदार, आज के बाद इस मुद्दे पर बात मत करना और सुबह होते ही बीवीबच्चों को ले कर घर से निकल जाना. अब मैं तुझे अपने साथ नहीं रख सकता.’’

पिता के इस व्यवहार पर अंकित खून का घूंट पी कर ऊपर चला गया. उस के पिता द्वारा घर से निकालने की चेतावनी ने उस के होश उड़ा दिए. उस ने ऊपर जा कर शराब पी. वह पिता की आदत से वाकिफ था कि उन्होंने उस से जो कहा है, वह कर भी देंगे. यही बात सोच कर उसे उस रात ठीक से नींद नहीं आई. करीब 3 बजे आंख खुली तो वह पिता से फाइनल बात करने नीचे आ गया. बैडरूम का दरवाजा खुला था. उधर बेटे के रवैये से अशोक भी परेशान थे. शायद उन्हें भी नींद नहीं आ रही थी. वह बैठे सिगरेट पर सिगरेट पिए जा रहे थे.

अंकित ने एक बार फिर रीना के मुद्दे पर उन से बात शुरू की. लेकिन इस बार उन के बीच बात इतनी बढ़ गई कि दोनों के बीच मारपीट हो गई. उसी दौरान अंकित ने कमरे में रखा बेसबौल बैट उठा कर पिता के सिर पर कई वार कर दिए. उन के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. अशोक ने अपने बचाव के लिए संघर्ष भी किया. आखिर उन्होंने तड़प कर दम तोड़ दिया. इस दौरान अंकित की अंगूठी वहीं गिर गई. गुस्से में अंकित ने पिता की हत्या तो कर दी. लेकिन हत्या का इल्जाम उस के ऊपर न आए, इस के लिए उस ने लूट का ड्रामा रचने की प्लानिंग की. सोचविचार के बाद उस ने कमरे में लूटपाट दिखाने के लिए सामान फैला दिया. लौकर से रुपए भी निकाल लिए.

हत्या के वक्त उस के कपड़े खून से सन गए थे. उस ने बाथरूम में हाथपांव धोए. फ्रेश हो कर उस ने अपने कपड़े बदले और खून से सने कपड़े एक पौलीथिन में रख लिए. उस ने बेसबौल बैट भी साफ किया और उसे घर में ही छिपा कर रख दिया. वह कार निकाल कर कपड़ों वाली पौलीथिन फेंकने चला गया. इत्तफाक से उस समय किसी सिक्योरिटी गार्ड ने उसे नहीं देखा. कार से वह सूरजकुंड इलाके में पहुंचा और पौलीथिन नाले में फेंक कर वापस आ गया. उस ने वापस आ कर लौकर से निकाले रुपए भी कोठी में कहीं छिपा दिए. फिर ऊपर जा कर आंखें बंद कर के चुपचाप लेट गया. इतना कुछ हो गया था, लेकिन नींद में होने की वजह से दीप्ति को कुछ पता नहीं चल सका.

तड़के बच्ची का दूध गरम करने के लिए दीप्ति नीचे आई तो अपने ससुर की लाश देख कर वह चीखती हुई वापस अपने कमरे में पहुंची. पत्नी के रोने पर वह जागा. पुलिस केवल उस से ही ज्यादा पूछताछ न करे, इसलिए उस ने अपने रिश्तेदारों को फोन कर के सब से पहले बुलाया, फिर दीप्ति के मोबाइल से पुलिस को सूचना दी. इस के पीछे उस की सोच यह थी कि वह नहीं चाहता था कि उस का मोबाइल नंबर पुलिस को पता चले. पुलिस के आने के बाद वह घटना से पूरी तरह अंजान बना रहा. लूट के लिए हत्या होने की बात पर जोर देता रहा. पुलिस के सवालों का भी उस ने चालाकी से आत्मविश्वास के साथ सामना किया. उस ने अपने जुर्म को छिपाने की लाख कोशिश की, लेकिन पकड़ में आ ही गया.

अंकित ने जब अपना अपराध स्वीकार कर लिया, तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर के उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बेसबौल बैट व खून सने कपड़े बरामद कर लिए. पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. अंकित ने पिता को प्यार से समझाने में नातेरिश्तेदारों की मदद ले कर विवेक का परिचय दिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. अंकित का कहना था कि उसे पिता की हत्या करने का पछतावा है, वह जोश में होश खो कर एक बड़ा अपराध कर बैठा. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. उस की जमानत नहीं हो सकी थी. Hindi True Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, रीना परिवर्तित नाम है.)

 

Uttar Pradesh Crime Story: खुले दिल वाली औरत

Uttar Pradesh Crime Story: 3 शादियां करने के बाद भी सरस्वती अपने दिल को काबू में नहीं कर सकी. उस का दिल पड़ोस के ओमवीर पर आ गया. इस नए प्रेमी के साथ उस ने ऐसी साजिश रची कि…

रामपुर बुजुर्ग गांव में सुबहसुबह रोने बिलखने की आवाज सुन कर लोगों की नींद टूट गई. वह आवाज किसी महिला की थी. लोग सोचने लगे कि पता नहीं क्या हो गया जो वह महिला इस तरह रो रही है. लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई और वे अपनेअपने घरों से बाहर निकल कर उस तरफ जाने लगे, जिधर से रोने की आवाज आ रही थी. वह आवाज रामस्वरूप के घर की तरफ से आ रही थी. इसलिए लोगों का उस के घर के बाहर जुटना शुरू हो गया. बाद में पता चला कि रामस्वरूप की मौत हो गई है. रामस्वरूप की पत्नी सरस्वती रोते हुए कह रही थी कि उस के पति ने आत्महत्या कर ली है. उस की लाश कमरे में एक चारपाई पर पड़ी थी. रामस्वरूप की मां मोरकली और भाई ऋषिपाल भी वहां खड़े आंसू बहा रहे थे.

वहां मौजूद लोगों में से किसी ने फोन कर के रामस्वरूप के आत्महत्या करने की जानकारी भमोरा थाने को दे दी. जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी राकेश सिंह यादव गांव रामपुर बुजुर्ग में रामस्वरूप के घर पहुंच गए. यह गांव उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के अंतर्गत आता है. पुलिस को देखते ही सरस्वती दहाड़े मार कर रोने लगी. थानाप्रभारी ने सरस्वती को दिलासा देते हुए चुप कराया. इस के बाद उस से रामस्वरूप की मौत के बारे में बात की. उस ने रुंधे गले से बताया कि थकान होने की वजह से रात को वह बच्चों के साथ सो गई थी. सुबह आंखें खुलीं तो उस ने पति की लाश धोती के फंदे से लटकी देखी. इस हाल में उस ने जल्दी से धोती को बीच से काट दिया और लोगों को बुलाया.

थानाप्रभारी ने लाश का मुआयना किया तो देखा कि रामस्वरूप की लाश चारपाई पर चित अवस्था में पड़ी थी. उस के शरीर पर कमीज और केवल अंडरवियर था. गले पर किसी रस्सी के बांधने जैसे निशान थे. पुलिस ने मृतक के छोटे भाई ऋषिपाल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रामस्वरूप ने 2 दिन पहले ही अपने हिस्से की जमीन बेची थी. इसलिए फांसी लगा कर आत्महत्या करने का कोई कारण समझ में नहीं आ रहा. ऋषिपाल की बातों से थानाप्रभारी को दाल में काला नजर आने लगा. चूंकि उस समय सरस्वती बुरी तरह बिलख रही थी, इसलिए उस से पूछताछ करनी जरूरी नहीं समझी. उन्होंने लाश का पंचनामा करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए बरेली के जिला अस्पताल  भेज दिया. यह बात 17 दिसबंर, 2014 की है.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो थानाप्रभारी राकेश सिंह यादव रिपोर्ट पढ़ कर हैरान रह गए. रिपोर्ट में बताया गया था कि रामस्वरूप की मौत गला घुटने से हुई थी. जिस तरह उस के गले पर रस्सी के बांधने का निशान था. उस से यही लगता था कि सोते समय उस के गले में रस्सी बांध कर उस का गला घोंटा गया था. पुलिस को यह मामला हत्या का लगा. जबकि उस की पत्नी इसे आत्महत्या बता रही थी. केस की गुत्थी सुलझाने के लिए थानाप्रभारी उस के घर पहुंचे. घर में सरस्वती तथा उस की सास मोरकली मिलीं. उन्होंने सरस्वती से पूछताछ शुरू की तो उस ने वही कहानी बताई, जो घटना वाले दिन बताई थी. इस के अलावा उस ने इस बार एक नई बात बताई कि उस का पति अपने छोटे भाई ऋषिपाल तथा मां के भी हिस्से की 8 बीघा जमीन बेचना चाहता था.

पहले तो वे दोनों इस के लिए राजी थे. लेकिन जब जमीन लिखने की बात आई तो दोनों मुकर गए. इस के बाद शर्मिंदगी के मारे उन्होंने आत्महत्या कर ली. सरस्वती के बयान की तसदीक करने के लिए पुलिस ने ऋषिपाल और उस की मां मोरकली से पूछताछ की तो दोनों ने बताया कि रामस्वरूप ने केवल अपने ही हिस्से की जमीन श्रीपाल को बेची थी. उन के हिस्से की जमीन बेचने की तो कोई चर्चा ही नहीं हुई. इस से पुलिस को यही लगा कि सरस्वती ने जो कुछ बताया, वह सरासर झूठ था. ऋषिपाल ने आरोप लगाया कि रामस्वरूप की हत्या में उस की पत्नी सरस्वती और उस के तीनों भाइयों रामवीर, भगवानदास तथा जानकी प्रसाद का हाथ है. इन सभी के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने की तहरीर उस ने 9 जनवरी, 2015 को थाने में दे दी. इस के बाद पुलिस ने उन चारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

सरस्वती का मायका बरेली जिले के कैंट थाने के पालपुर गांव में था. उस के भाइयों की तलाश में पुलिस अगले दिन ही पालपुर गांव पहुंच गई. रामवीर, भगवानदास तथा जानकी घर पर ही मिल गए. तीनों को हिरासत में ले कर पुलिस टीम थाने लौट आई. तीनों से पूछताछ शुरू की तो तीनों ने खुद को बेगुनाह बताया. उन्होेंने बताया कि रामस्वरूप ने अपनी 8 बीघा जमीन का बैनामा 15 दिसबंर, 2014 को कराया था तो उस दिन वे उस के साथ थे. अगले दिन 16 दिसबंर की शाम को वे अपने घर लौट आए थे. उस समय तक रामस्वरूप बिलकुल ठीक था और सभी से हंसबोल रहा था. इस के बाद रात में उस की मौत कैसे हो गई, उन्हें नहीं पता?

थानाप्रभारी को शक हो गया कि हो न हो, जमीन की बिक्री से मिले रुपयों को पाने के लिए उन लोगों ने रामस्वरूप की हत्या कर दी और रात में ही अपने घर लौट गए हों. इस के बाद सरस्वती ने लोगों को दिखाने के लिए रोनेचिल्लाने का नाटक करना शुरू कर दिया हो. इसी बात को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने तीनों भाइयों से सख्ती से पूछताछ करनी शुरू की. सरस्वती को जब पता चला कि पुलिस उस के भाइयों से सख्ती कर रही है तो वह घबरा गई. अपने भाइयों को पुलिस से बचाने के लिए उस ने थानाप्रभारी राकेश सिंह यादव को फोन कर के बताया कि वह पति की हत्या के बारे में कुछ अहम बातें बताना चाहती है. सरस्वती की बात सुन क र थानाप्रभारी 11 जनवरी, 2015 की सुबह सरस्वती के घर पहुंच गए.

सरस्वती ने पति की हत्या के बारे में उन्हें जो कुछ बताया उसे सुन कर वह हैरान रह गए. सरस्वती ने बताया कि पति की हत्या उसी ने अपने प्रेमी ओमवीर साहू के साथ मिल कर की थी. उस के तीनों भाई बेकुसूर हैं, उन्हें हत्या के बारे में कुछ पता नहीं है. वे उस दिन शाम को ही अपने गांव पालपुर लौट गए थे. इस तरह अचानक केस खुलने पर थानाप्रभारी ने राहत की सांस ली. उन्होंने उसी समय सरस्वती को गिरफ्तार कर थाने ले आए. उस के तीनों भाई बेकुसूर थे, इसलिए उन्हें रिहा कर दिया. एक पुलिस टीम उस के प्रेमी ओमवीर को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर भेजी गई, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. उसी दौरान पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि ओमवीर गांव के बाहर मोड पर अपने कुछ साथियों के साथ मौजूद है. यह सूचना मिलते ही टीम उसी जगह पहुंच गई. मुखबिर की सूचना सही निकली. ओमवीर अपने दोस्तों के साथ गपशप करता मिल गया.

पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. ओमवीर को इस बात की बिलकुल भी जानकारी नहीं थी कि उस की प्रेमिका सरस्वती पुलिस गिरफ्त में है और वह अपना गुनाह कुबूल कर चुकी है. इसलिए जब उस से रामस्वरूप की हत्या के बारे में पूछा गया तो वह खुद को बेगुनाह बताता रहा. लेकिन जब थाने में उस का सामना सरस्वती से कराया गया तो उस का चेहरा सफेद पड़ गया. उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सरस्वती और ओमवीर से की गई पूछताछ में रामस्वरूप की हत्या के पीछे अवैध संबंधों की जो दास्तान उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के कैंट थाने का एक गांव है पालपुर. पतिराम इसी गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी सोनादेवी के अलावा 3 बेटे और एक बेटी सरस्वती थी. वह किसी तरह मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार का भरणपोषण कर रहा था. घर की आर्थिक तंगी की वजह से वह बच्चों को पढ़ालिखा भी नहीं सका. वक्त गुजरने के साथसाथ बच्चे भी बड़े होते गए. सरस्वती 3 भाइयों की एकलौती बहन थी. इसलिए भाई उसे पलकों पर बिठा कर रखते थे. सरस्वती जवान हुई तो गांव के ही कुछ लड़के उस पर डोरे डालने लगे. वे उस के घर के आसपास चक्कर काटने लगे. लड़कों को देख कर सोनादेवी बेटी पर नजर रखने लगी. पतिराम तो सारा दिन घर से बाहर रहता था.

उसे इन सब बातों की जानकारी नहीं थी. एक दिन सोनादेवी ने पति को इस की जानकारी दी. पतिराम गरीब था, इसलिए उस ने किसी से पंगा लेने के बजाय बेटी के हाथ पीले करने की सोची. वह उस के लिए लड़का देखने लगा. उस के एक रिश्तेदार ने उसे बरेली के ही सीबीगंज थानाक्षेत्र के मथुरापुर गांव के एक युवक ओमप्रकाश के बारे में बताया. पतिराम ने ओमप्रकाश के बारे में जांच की तो पता चला कि वह मेहनती है. उस का घर परिवार भी ठीक था. वह बेटी के लिए सही लगा तो उस ने उस के साथ सरस्वती की शादी कर दी. यह 10 साल पहले की बात है.

शादी के बाद कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक था, परंतु बाद में उन दोनों के बीच छोटीछोटी बातों को ले कर झगड़े होने शुरू हो गए. अभी उन की शादी को एक साल पूरा भी नहीं हुआ था कि सरस्वती को लगा कि अब उस का ओमप्रकाश के साथ गुजारा होना मुश्किल है. इसी दौरान उस की मुलाकात बदायूं जिले के मोहल्ला टिकटगंज निवासी पप्पू से हुई. पप्पू बनठन कर रहने वाला युवक था. दोनों के बीच नजदीकी इतनी बढ़ गई कि सरस्वती पति ओमप्रकाश को छोड़ कर पप्पू के साथ रहने लगी. करीब एक साल बाद सरस्वती ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम स्वाति रखा गया. सरस्वती पति को छोड़ कर पप्पू के पास इसलिए आई थी कि उस के साथ उस की जिंदगी हंसीखुशी से कटेगी. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. एक दिन जब वह सो कर उठी तो पप्पू अपने बिस्तर पर मृत मिला. पप्पू की मौत के बाद सरस्वती की जिंदगी में जैसे अंधेरा छा गया था.

पप्पू की मौत के 1-2 महीने बाद ही पप्पू के घर वालों ने सरस्वती के ऊपर आरोप लगाने शुरू कर दिए कि पप्पू की मौत स्वाभाविक नहीं हुई, बल्कि उस ने खाने में जहर दे कर उस की हत्या की थी. सरस्वती इस का लाख विरोध करती रही. उस की बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. मामला पुलिस तक तो नहीं गया, लेकिन घर वालों ने उस का ससुराल में रहना दूभर कर दिया. रोजरोज की किचकिच से तंग आ कर एक दिन वह बेटी को ले कर अपने मायके आ गई. बरेली के ही भमोरा थानाक्षेत्र के रामपुर बुजुर्ग गांव में रछपाल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी मोरकली के अलावा 2 बेटे थे, रामस्वरूप और ऋषिपाल. रछपाल की गांव में खेती की काफी जमीन थी, कुल मिला कर वह साधनसंपन्न थे. दोनों बच्चे बड़े हुए तो सब को उन की शादी की चिंता हुई.

चूंकि रामस्वरूप बड़ा था, इसलिए उस की शादी के रिश्ते आने शुरू हुए तो रामस्वरूप लड़की में सौ कमियां निकाल कर शादी करने से इनकार कर देता. गांव में अपनी हैसियत को देखते हुए रछपाल को उम्मीद थी कि बेटे के लिए कोई अच्छा सा रिश्ता अवश्य आएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जब रामस्वरूप हर रिश्ते में कोई न कोई कमी निकालने लगा तो उस के लिए रिश्ते आने बंद हो गए. समय के साथ उस की उम्र भी बढ़ती गई. अब उसे कोई अपनी लड़की नहीं देना चाहता था. इस से उस के घर वाले भी परेशान रहने लगे कि इस की शादी कैसे हो. यही हाल रहा तो यह कुंवारा ही रह जाएगा. ऐसी हालत में उन्होंने तय कर लिया कि किसी भी हालत में उस का घर बसाने की कोशिश करेंगे. अब वह तलाकशुदा या गरीब परिवार की महिला तक से उस का घर बसाने की बात करने लगे.

इसी बीच एक दिन किसी परिचित ने उन्हें पालपुर की सरस्वती के बारे में बता कर कहा कि वह एक बेटी की मां है और मायके में रह रही है. अगर वह कहें तो उस से शादी की बात चलाई जाए. अंधा क्या चाहे दो आंखें, रछपाल ने तुरंत हामी भर दी. इस बार रामस्वरूप कुछ नहीं बोला. सरस्वती के भाई भी बहन की शादी रामस्वरूप से करने के लिए तैयार हो गए. एक सादे समारोह में सरस्वती और रामस्वरूप की शादी हो गई. सरस्वती की यह तीसरी ससुराल थी. उस ने अपने व्यवहार से सभी लोगों का दिल जीत लिया. रामस्वरूप तो सरस्वती का दीवाना था. वह उस की बातों पर आंखें मूंद कर विश्वास करने लगा. वह भी बहुत खुश थी. रामस्वरूप से सरस्वती को 2 बच्चे हुए. बेटा गौरव तथा बेटी गुडि़या.

समय के साथ सरस्वती का घर में दखल बढ़ता गया. यह देख कर उस की सास मोरकली को आभास होने लगा कि यदि बहू को नहीं रोका गया तो जल्दी ही पूरे घर में सिर्फ उस का ही सिक्का चलने लगेगा. इसलिए मोरकली ने उसे बातबात पर टोकना शुरू कर दिया. सरस्वती को सास की दखलंदाजी पसंद नहीं थी. लिहाजा उन दोनों के बीच झगड़ा होने लगा. घर में रोजरोज ही कलह होने लगी. रामस्वरूप भी मां के बजाय पत्नी का पक्ष लेता था. रछपाल और मोरकली ने देखा कि उन का बेटा ही बीवी का गुलाम बन कर अच्छेबुरे को नहीं पहचान रहा तो उन्होंने बेटाबहू को अलग कर दिया. फिर वह गांव में ही दूसरे घर में रहने लगा. अलग होने पर सरस्वती बहुत खुश हुई. क्योंकि अब उसे ज्यादा जनों का काम नहीं करना पड़ता था.

रामस्वरूप के पड़ोस में हरिबाबू का परिवार रहता था. वह आबकारी विभाग में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी कमलेश तथा 6 बच्चे थे. इन में चार लड़के और 2 लड़कियां थीं. वह साधनसंपन्न थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए. वह उन की शादियां करते गए. शादी के लिए उन का सब से छोटा बेटा ओमवीर ही बचा था.पड़ोसी होने की वजह से रामस्वरूप और हरिबाबू के परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना बना रहता था. ओमवीर सरस्वती को भाभी कहता था. वह उस से उम्र मे कई साल छोटा था. 28 साल की सरस्वती अपनी उम्र से छोटे ओमवीर से अकसर हंसीमजाक करती रहती थी. ओमवीर को भी यह सब अच्छा लगता था. वह भी मौका ताड़ कर सरस्वती के दिल की थाह लेने लगा. वह उस के मजाक करने का मतलब समझ चुका था. इसलिए उस के मन में भी चाहत पैदा हो गई. वह भी उसी के अंदाज में उस से मजाक करने लगा.

रामस्वरूप और ओमवीर की उम्र में इतना अंतर था कि रामस्वरूप ने उसे गोद खिलाया था. इसलिए सरस्वती का झुकाव ओमवीर की तरफ हो गया. ओमवीर जब भी उस के घर आता सरस्वती के चेहरे की रौनक बढ़ जाती. एक दिन जब रामस्वरूप घर में नहीं था, तभी ओमवीर ‘भाभीभाभी…’ पुकारता हुआ उस के घर में आया तो देखा कि सरस्वती आईने के सामने खड़ी शृंगार कर रही थी. ओमवीर दबे पांव उस के पीछे खड़ा हो गया. लेकिन सरस्वती ने उसे आईने में देख लिया था. वह चहकते हुए बोली, ‘‘आओ ओमवीर इधर बैठो.’’ सरस्वती ने कुरसी की तरफ इशारा किया.

वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. ओमवीर सरस्वती के पास कुरसी पर बैठ गया. उस समय उस के दिल की धड़कनें तेज हो गईं. सरस्वती ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा, ‘‘ओमवीर, मैं तुम्हें कैसी लगती हूं?’’

‘‘भाभी, तुम कितनी खुबसूरत हो, यह बात मेरे दिल से पूछो. तभी तो मैं तुम्हारी खुबसूरती का दीदार करने यहां चला आता हूं.’’ अपनी तारीफ सुनते ही सरस्वती ओमवीर के करीब आ गई. वह उस के गले में बांहें डालते हुए बोली, ‘‘सच, क्या मैं इतनी सुदंर हूं?’’

उस के नजदीक आते ही ओमवीर की धड़कनें बढ़ गईं. उस का शरीर जैसे तपने लगा. अब वह अपनी भाभी के इरादे समझ चुका था. वह भी अपनी कुरसी से खड़ा हो गया. उस ने भी झट से उस के गाल पर चुम्मा लेते हुए कहा, ‘‘सचमुच तुम बहुत खुबसूरत हो,’’

सरस्वती भी खिलाड़ी थी. उस ने मौके का फायदा उठाना मुनासिब समझा और अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया. फिर क्या था, थोड़ी ही देर में उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. सरस्वती को ढलती उम्र के पति की जगह ओमवीर का साथ अच्छा लगा. इस के बाद तो पति के जाते ही सरस्वती उसे फोन कर के उसे अपने घर में बुला लेती. जब पति की गैरमौजूदगी में ओमवीर के सरस्वती के घर कुछ ज्यादा चक्कर लगने शुरू हो गए तो पड़ोसियों को शक हो गया. यह बात रामस्वरूप के कानों में भी पहुंची, मगर पत्नी पर अंधविश्वास की वजह से उस ने लोगों की बातों को गंभीरता से नहीं लिया.

सरस्वती के चक्कर में ओमवीर अपने कामधंधे पर भी ध्यान नहीं दे रहा था. इस के अलावा वह रामस्वरूप के घर के काम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता था. ओमवीर के घर वालों को यह सब अच्छा नहीं लगता था, इसलिए वे उसे रामस्वरूप के घर जाने को मना करते थे, लेकिन वह घर वालों की बातों पर ध्यान न दे कर उस के घर चला जाता था. रामस्वरूप की रेलवे लाइन के नजदीक 8 बीघा जमीन थी. वह ज्यादा उपजाऊ नहीं थी. दिसंबर, 2014 में एक दिन सरस्वती ने पति से उस जमीन को बेच कर कोई अच्छा सा ध्ांधा करने को कहा. पहले तो रामस्वरूप को बीवी की बात अटपटी लगी. मगर जब सरस्वती ने जिद की तो उसे बीवी की बात माननी पड़ी. इस बारे में उस ने अपने तीनों सालों से बात की तो उन्होंने भी अपनी बहन की बात में हां मिला दिया. पत्नी और ससुराल वालों की बातों में आ कर रामस्वरूप ने अपनी 8 बीघा जमीन बेचने का फैसला कर लिया.

रामस्वरूप ने भी सोचा कि जमीन बेच कर वह शहर में कोई अच्छा धंधा कर लेगा. उस ने यह बात पत्नी को बताई कि यहां रह कर धंधा करने से कोई फायदा नहीं है. अगर शहर में जा कर कोई धंधा करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा. शहर में रहने से बच्चों की पढ़ाई भी ठीक से हो जाएगी. पति के मुंह से शहर जाने की बात सुन कर सरस्वती को पांव तले से धरती खिसकती हुई दिखाई दी. वह किसी भी हालत में ओमवीर से दूर नहीं जाना चाहती थी. इस के लिए पहले तो उस ने जमीन बेचने के बाद भी पति को गांव में रहने के लिए मनाना शुरू किया, मगर जब वह नहीं माना तो वह इस का कोई समाधान निकालने में लग गई.

इसी बीच रामस्वरूप की गैरमौजूदगी में जब ओमवीर उस से मिलने पहुंचा तो सरस्वती ने उस से कहा, ‘‘रामस्वरूप जमीन बेच कर शहर में रहने की बातें कह रहा है. यदि ऐसा हो गया तो हम दोनों एकदूसरे से दूर हो जाएंगे.’’

‘‘बताओ, इस क ा उपाय क्या है?’’ ओमवीर गंभीर हो कर बोला.

‘‘उपाय यह है कि जमीन बेचने के बाद उसे ठिकाने लगा दिया जाए. हमारे पास पैसे भी आ जाएंगें और हमारे बीच का रोड़ा भी हट जाएगा.’’ सरस्वती ने अपने मन की बात कही.

ओमवीर भी सरस्वती से दूर नहीं होना चाहता था, इसलिए वह सरस्वती के साथ मिल कर रामस्वरूप की हत्या करने के लिए तैयार हो गया. 15 दिसंबर, 2014 को रामस्वरूप की जमीन का बैनामा होना तय हुआ था, इसलिए सरस्वती के तीनों भाई जानकीप्रसाद, रामवीर और भगवानदास पालपुर से रामपुर बुजुर्ग आ गए. जमीन का बैनामा होने के बाद 16 दिसंबर की शाम को तीनों भाई गांव लौट गए. जमीन बेचने से जो रकम मिली थी, वह रामस्वरूप ने सरस्वती को रखने के लिए दे दी थी.

16 दिसंबर की रात को खाना खाने के बाद रामस्वरूप ने थोड़ी देर बच्चों से बातें की. इस के बाद बिस्तर पर जा कर सो गया. योजना के मुताबिक आधी रात होने पर ओमवीर अपने घर की मुंडेर फांद कर उस के घर में आ गया. उस समय सरस्वती जाग रही थी. वह भी बेचैनी से उसी के आने का इंतजार कर रही थी. ओमवीर के आने के बाद उस ने पति को हिलाडुला कर देखा. वह गहरी नींद में था. पति को गहरी नींद में देख कर सरस्वती ने ओमवीर को आंखों से इशारा किया. ओमवीर अपने साथ प्लास्टिक की रस्सी का टुकड़ा लाया था. प्रेमिका का इशारा मिलते ही उस ने प्लास्टिक की रस्सी रामस्वरूप के गले में लपेटी और पूरी ताकत से खींचने लगा. कुछ देर छटपटाने के बाद रामस्वरूप ने दम तोड़ दिया.

रामस्वरूप की हत्या करने के बाद ओमवीर और सरस्वती ने शारीरिक संबंध बनाए. प्रेमी को खुश करने के बाद सरस्वती ने जमीन बेचने से मिली रकम में से कुछ ओमवीर को दे दी. इस हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए सरस्वती ने सुबह होते ही रोनापीटना शुरू कर दिया और उस ने पति के आत्महत्या करने की कहानी गढ़ दी. लेकिन उस का गुनाह छिप न सका. थानाप्रभारी राकेश सिंह ने सरस्वती और ओमवीर को हत्या के केस में गिरफ्तार कर सक्षम न्यायालय में पेश किया. वहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

True Crime Hindi: अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का

True Crime Hindi: नेहा मौडलिंग के जरिए बौलीवुड में एंट्री के लिए स्ट्रगल कर रही थी. लेकिन दोस्त से पति बने प्रिंस ने उसे प्यार का ऐसा सिला दिया कि…

दक्षिणपूर्वी दिल्ली के हरिनगर कालोनी की रहने वाली 21 वर्षीय नेहा मिश्रा मुंबई में रह कर मौडलिंग कर रही थी. वह कई छोटीमोटी ऐड फिल्मों में काम कर चुकी थी और बौलीवुड फिल्मों में एंट्री पाने के लिए स्ट्रगल कर रही थी. अपने घर वालों को बताए बिना उस ने करीब 5-6 महीने पहले दिल्ली के रीयल एस्टेट कारोबारी प्रिंस तेवतिया से एक मंदिर में शादी कर ली थी. लेकिन शादी के बाद नेहा को यह बात अपने घर वालों को बतानी ही पड़ी. बेटी के फैसले पर प्रदीप मिश्रा आहत तो हुए लेकिन उन्होंने सोचा कि जब बेटी ने प्रिंस को अपनी मरजी से चुना है तो उस की खुशी की खातिर उन्होंने उस की पसंद पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी. इस के बाद प्रिंस तेवतिया ने भी नेहा के घर आना शुरू कर दिया.

करीब 3 महीने पहले नेहा की तबीयत खराब हो गई तो वह मुंबई से पिता के यहां दिल्ली आ गई थी. उस से मिलने के लिए प्रिंस उस के यहां जाता रहता था. 16 अप्रैल, 2015 को भी वह नेहा के यहां गया था. 2 दिनों से वह नेहा के यहां ही था. 17-18 अप्रैल की रात को नेहा और प्रिंस एक कमरे में सोए हुए थे जबकि नेहा के मातापिता और भाईबहन दूसरे कमरे में सो रहे थे. आधी रात के बाद हुई तेज आवाज से प्रदीप मिश्रा की नींद खुल गई. वह आवाज गोली चलने जैसी थी. उन्होंने पत्नी रोमा को भी जगा दिया. वह आवाज उन की बेटी नेहा के कमरे से आई थी, इसलिए उन की घबराहट बढ़ गई.

दोनों पतिपत्नी बेटी के कमरे की तरफ जाने ही वाले थे कि तभी बेटी के कमरे का दरवाजा खुल गया. उस का पति प्रिंस दरवाजा खोलते हुए बाहर निकला. वह घबराया हुआ था. इस से पहले कि प्रदीप मिश्रा उस के कमरे से आई गोली चलने जैसी आवाज के बारे में उस से पूछते, प्रिंस खुद ही बोल पड़ा, ‘‘मैं ने नेहा को गोली मार दी है.’’

इतना सुनते ही प्रदीप और उन की पत्नी के जैसे होश ही उड़ गए. वह तेज कदमों से बेटी के कमरे में गए. उन्होंने देखा तो नेहा बेड पर पड़ी थी और उस के पेट के निचले हिस्से से खून निकल रहा था. रोमा मिश्रा ने बेटी को हिलायाडुलाया. उस में कोई हलचल नहीं दिखी तो वह जोरजोर से रोने लगीं. बेटी की हालत देखते ही प्रदीप मिश्रा आटोरिक्शा बुलाने के लिए तेजी से निकल गए ताकि उसे जल्द अस्पताल पहुंचाया जा सके. तभी प्रिंस भी घायल नेहा को दोनों बाहों में थामे चौथी मंजिल से नीचे उतर आया. रोमा के रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी जाग गए थे. वे भी अपनेअपने घरों से गली में आ गए थे. सभी लोग आपस में कानाफूसी कर रहे थे. कोई भी यह नहीं समझ पा रहा था कि आखिर पति ने नेहा को गोली क्यों मारी?

कुछ ही देर में प्रदीप मिश्रा एक आटोरिक्शा वाले को बुला लाए. प्रदीप मिश्रा और उन की पत्नी आटो में बैठ गए और बेटी को उन्होंने अपनी गोद में लिटा लिया. वे उसे एम्स के ट्रामा सेंटर के लिए ले कर चल पड़े जबकि प्रिंस तेवतिया ने उन से यह कह दिया कि वह अपनी कार से ट्रामा सेंटर पहुंच रहा है. नेहा के पेट से खून रिस रहा था. खून रोकने के लिए प्रदीप ने उस के घाव पर एक कपड़ा भी रख दिया था ताकि खून रुक सके. पत्नी को आटो में लिटाने के बाद प्रिंस अस्पताल नहीं गया बल्कि वहां से फरार हो गया. उधर प्रदीप मिश्रा घायल बेटी को ले कर ट्रामा सेंटर पहुंचे तो डाक्टरों को यह पुलिस केस लगा. इसलिए अस्पताल प्रशासन ने इस की सूचना ट्रामा सेंटर बिल्डिंग में ही स्थित पुलिस चौकी में दे दी.

चूंकि यह मामला दक्षिणपूर्वी दिल्ली के सनलाइट थानाक्षेत्र का था, इसलिए पुलिस चौकी से सूचना थाने को दे दी गई. थाने में सूचना मिलते ही एसआई शैलेंद्र सिंह कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह को ले कर ट्रामा सेंटर पहुंच गए. वहां डाक्टर नेहा के इलाज में जुटे थे. नेहा मिश्रा की हालत नाजुक बनी हुई थी. वह उस समय बयान देने की स्थिति में नहीं थी. वहां पर उस के पिता प्रदीप मिश्रा मौजूद थे. उन्होंने अपने दामाद द्वारा नेहा को गोली मारने वाली बात पुलिस को बता दी. उन्होंने यह भी बता दिया कि वह गोली मार कर फरार हो गया है. एसआई शैलेंद्र सिंह ने पूरी जानकारी से थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल को अवगत करा दिया.

थानाप्रभारी सब से पहले घटनास्थल पर गए जहां नेहा की छोटी बहन और भाई मिला. जिस कमरे में नेहा को गोली मारी गई थी, उसे उन्होंने बाहर से बंद कर दिया, जिस से वहां कोई भी आजा न सके और उस कमरे का कोई सुबूत नष्ट न हो. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी घटना की सूचना दे कर मौके पर बुला लिया. टीम ने मौके से सुबूत इकट्ठे किए. पुलिस को घटनास्थल से कारतूस के 2 खोखे भी मिले. घटनास्थल की आवश्यक काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी एक पुलिसकर्मी को मौके पर छोड़ कर नेहा का बयान लेने के लिए खुद एम्स ट्रामा सेंटर चले गए.

अस्पताल में जो डाक्टर नेहा का इलाज कर रहे थे, उन्होंने थानाप्रभारी को बताया कि गोली नेहा के पेट के निचले हिस्से में लगी है. उस का काफी मात्रा में खून निकल चुका है और अभी भी गोली उस के शरीर में है. हालत में सुधार आने के बाद ही वह बयान दे सकेगी. नेहा के पिता प्रदीप मिश्रा ने थानाप्रभारी को भी बता दिया कि नेहा को गोली उस के पति प्रिंस तेवतिया ने ही मारी थी और वह गोली मार कर फरार हो गया. प्रदीप मिश्रा ने उन्हें प्रिंस का पता भी बता दिया था. थाने लौट कर थानाप्रभारी ने प्रदीप मिश्रा की तरफ से प्रिंस तेवतिया के खिलाफ जान से मारने की नीयत से गोली मारने का केस दर्ज कर लिया. अगली सुबह इलैक्ट्रौनिक मीडिया में मौडल को पति द्वारा गोली मारने की खबर प्रमुखता से प्रसारित हुई तो जिले के पुलिस अधिकारी भी हरकत में आ गए.

डीसीपी मंदीप सिंह रंधावा ने थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल की अध्यक्षता में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में सराय कालेखां चौकी के इंचार्ज ललित कुमार, एसआई शैलेंद्र सिंह, हेडकांस्टेबल विपिन सांगवान, विनोद, गोपाल, कांस्टेबल देवेंद्र, प्रवीण आदि को शामिल किया गया. टीम का निर्देशन न्यू फ्रैंड्स कालोनी के एसीपी अनिल यादव को सौंपा गया. टीम के ऊपर अभियुक्त प्रिंस की गिरफ्तारी का दबाव बढ़ रहा था. पुलिस ने दिल्ली के दक्षिणपुरी की गली नंबर-10 स्थित उस के घर पर दबिश दी. लेकिन वहां पर प्रिंस के बजाय रमेश नाम का व्यक्ति मिला. उस ने बताया कि यह मकान प्रिंस के पिता श्यामलाल तेवतिया ने 5-6 साल पहले उसे बेच दिया था. मकान बेच कर वे कहां चले गए, इस का उसे कुछ पता नहीं.

प्रिंस ने नेहा को यही बताया था कि वह दक्षिणपुरी की गली नंबर-10 के मकान नंबर-217 में रहता है. जबकि उस के पिता उस मकान को कई साल पहले बेच चुके थे. आखिर प्रिंस ने अपनी पत्नी से इतना बड़ा झूठ क्यों बोला था, यह बात पुलिस नहीं समझ पाई. पुलिस के पास प्रिंस तेवतिया का फोटो था ही. उस फोटो के माध्यम से पुलिस ने स्थानीय लोगों से पूछताछ की. इस तफ्तीश में पुलिस को चौंकाने वाली जानकारी मिली. पुलिस को पता चला कि प्रिंस रीयल एस्टेट का कारोबारी और आपराधिक प्रवृत्ति वाला है. उस के खिलाफ दिल्ली के अंबेडकरनगर थाने में कई मुकदमे दर्ज हैं.

साल 2010 में उस ने एक व्यक्ति की चाकू मार कर हत्या कर दी थी. इस की वजह सिर्फ यह थी कि उस की प्रिंस के पिता श्यामलाल से कहासुनी हो गई थी और उस ने श्यामलाल को थप्पड़ मार दिया था. उस थप्पड़ के बदले उसे मौत मिली. हत्या के इस केस में प्रिंस जेल गया. 2014 में जेल से आने के बाद वह आयानगर में रहने वाले बदमाश रोहित चौधरी के संपर्क में आया. फिर उस के साथ ही अपराध करने लगा. रोहित थाना महरौली में एक हत्या के मामले में वांछित है. बाद में प्रिंस बदमाशों के बीच शूटर के नाम से मशहूर हो गया. वह अपने पास अकसर पिस्टल रखता था.

बताया जाता है कि प्रिंस गुस्सैल स्वभाव का है. छोटीछोटी बात पर वह अपना आपा खो बैठता है. बात इसी साल की है. एक बार वह अपनी कार से कहीं जा रहा था. हौर्न बजाने के बावजूद भी एक कार वाले ने उसे साइड नहीं दी तो कुछ देर बाद उस ने ओवरटेक कर के उस कार वाले पर गोली चला दी. इत्तफाक से वह गोली उसे नहीं लगी. इस मामले की रिपोर्ट अंबेडकरनगर थाने में दर्ज करा दी गई थी. पुलिस को पता चला कि प्रिंस तेवतिया का फेसबुक पर भी एकाउंट है. फेसबुक खंगालने पर पुलिस को यह जानकारी मिली कि उस की जितेश नाम के एक शख्स के साथ अच्छी दोस्ती है. जितेश भी आपराधिक प्रवृत्ति का है. जितेश स्नैचिंग और लूटपाट करता था.

बताया जाता है कि अपने केसों की सुनवाई के सिलसिले में जितेश का अकसर साकेत कोर्ट जाना लगा रहता था. वहीं पर एक वकील की शालिनी नाम की असिस्टैंट से जितेश की अच्छी जानपहचान हो गई थी. बाद में दोनों में दोस्ती हो गई. इन की दोस्ती की खबर जितेश की पत्नी को हुई तो उसे बहुत बुरा लगा. उस ने पति को समझाया कि वह शालिनी से न मिले. लेकिन जितेश नहीं माना तो एक दिन वह पति को ले कर शालिनी के घर पहुंच गई और उसे खरीखोटी सुनाते हुए हाथापाई भी की. जब बात बढ़ गई तो जितेश ने हवाई फायर भी किया. जितेश और अन्य के खिलाफ इस मामले की रिपोर्ट थाना अंबेडकरनगर में दर्ज हुई.

इसी जांच की कड़ी में पुलिस को यह भी पता चला कि मार्च, 2015 में प्रिंस ने मालवीय नगर क्षेत्र में किसी को गोली मारी थी. इस घटना के बाद वह अपने दोस्त जितेश के साथ ही कहीं रह रहा था. प्रिंस ने अपना मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ कर रखा था इसलिए यह पता नहीं लग पा रहा था कि वह कहां रह रहा है. किसी तरह पुलिस को जितेश का मोबाइल नंबर मिल गया. उस मोबाइल की लोकेशन से पता चला कि वह रोहिणी सेक्टर-7 में कहीं रह रहा है. पुलिस टीम रोहिणी सेक्टर-7 पहुंच गई. सर्विलांस टीम के सहयोग से जांच करतेकरते पुलिस टीम इस सेक्टर के जी-21/326 फ्लैट पर पहुंच गई. उस फ्लैट में 2 लड़के मिले.

पुलिस के पास केवल प्रिंस का ही फोटोग्राफ था, उसी के आधार पर यह पता लगा कि उन दोनों में से प्रिंस कोई नहीं है. जितेश को वह नहीं जानती थी. उन दोनों लड़कों में से कोई जितेश तो नहीं है, जानने के लिए पुलिस ने उन दोनों से ही सख्ती से पूछताछ की. लेकिन उन में से कोई भी जितेश नहीं निकला. पुलिस ने उन लड़कों को प्रिंस तेवतिया का फोटो दिखाया तो उन्होंने तुरंत कहा कि एक लड़का और लड़की के साथ यह इसी ब्लौक में अकसर दिखाई देता है. उस ने यह भी बताया कि इन के पास एक मारुति रिट्ज कार भी है. यह जानकारी पा कर पुलिस को थोड़ी तसल्ली हुई.

जितेश के फोन की लोकेशन और इन दोनों लड़कों से मिली जानकारी के बाद पुलिस को इतना तो यकीन हो गया था कि प्रिंस सेक्टर-7 के जी ब्लौक में ही कहीं रहता है. उन लड़कों से उस रिट्ज कार का नंबर भी मिल गया, जिस से ये लोग आतेजाते थे. पुलिस सादे कपड़ों में थी. वह उसी ब्लौक में अलगअलग गलियों में खड़े हो कर रिट्ज कार संख्या डीएल3सी 4302 के आने का इंतजार करने लगी. शाम के समय हेडकांस्टेबल विनोद ने उक्त नंबर की कार एक गली में आती हुई देखी तो उस ने फोन द्वारा इस की सूचना दूसरी गली में तैनात थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल को दे दी. हेडकांस्टेबल विनोद ने कार का पीछा किया तो वह कार फ्लैट नंबर जी-20/30 के पास आ कर रुक गई. उस कार से 2 युवक और एक युवती उतर कर फ्लैट में दाखिल हो गए.

कुछ ही देर में पूरी पुलिस टीम उस फ्लैट के पास आ गई. टीम ने उस फ्लैट में दबिश दी तो वहां से 2 युवक और एक युवती मिले.  पूछताछ में उन युवकों ने अपने नाम प्रिंस तेवतिया व जितेश बताए. उन के साथ जो युवती मिली वह जितेश की पत्नी थी. पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया. पूछताछ के लिए पुलिस उन्हें थाने ले आई. यह 20 अप्रैल, 2015 की बात है. चूंकि जितेश और उस की पत्नी थाना अंबेडकरनगर के एक केस में वांछित थे इसलिए उन्हें हिरासत में लेने की सूचना अंबेडकरनगर थाने को दी तो वहां की पुलिस जितेश और उस की पत्नी को कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के अपने साथ ले गई. थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल ने एसीपी अनिल यादव की मौजूदगी में प्रिंस तेवतिया से मौडल नेहा मिश्रा को गोली मारने की बाबत पूछताछ की तो इस घटना के पीछे की एक दिलचस्प कहानी सामने आई.

नेहा मिश्रा दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना सनलाइट कालोनी के हरिनगर में रहने वाले प्रदीप मिश्रा की बड़ी बेटी थी. नेहा के अलावा प्रदीप मिश्रा के एक बेटा और एक बेटी और थी. कैटरिंग का काम करने वाले प्रदीप मिश्रा मूलरूप से उड़ीसा के जिला भद्रक के गांव उलग के रहने वाले थे. काफी दिनों पहले वह काम की तलाश में दिल्ली आए थे. दिल्ली आ कर उन्होंने हलवाई का काम किया. बाद में वह कैटरिंग के धंधे से जुड़ गए. काम जम गया तो वे अपनी पत्नी रोमा को भी दिल्ली ले आए. उन के 3 बच्चे हुए जिन में 2 बेटियां और 1 बेटा था. प्रदीप मिश्रा साधनसंपन्न थे इसलिए वह अपने तीनों बच्चों को एक नामी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे थे.

बड़ी बेटी नेहा जितनी खूबसूरत थी, पढ़ाई में भी उतनी ही तेज थी. नेहा के फिगर की उस की सहेलियां बड़ी तारीफ करती थीं. वे उसे दीपिका पादुकोण कह कर बुलाती थीं. अपनी तारीफ पर नेहा भी इतराए बिना नहीं रहती थी. नेहा को फिल्में और टीवी देखने का बहुत शौक था. वह जब भी कोई फिल्म या नाटक देखती तो टीवी या सिल्वर स्क्रीन पर आने की लालसा करती. उस की यह चाहत दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थी. वह फिल्मों या टीवी धारावाहिकों में काम करने के सपने देखने लगी. मगर उस के लिए यह काम आसान नहीं था. क्योंकि उस के नातेरिश्तेदारों या परिचितों में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था, जिस से उसे अपनी मंजिल पाने में सहयोग मिल सके.

अब उसे एक ही रास्ता दिखाई दे रहा था, वह रास्ता था मौडलिंग का. वह जानती थी कि तमाम हीरोइनें मौडलिंग के जरिए ही बौलीवुड में पहुंच कर अपना मुकाम हासिल कर चुकी हैं. इसलिए 10+2 परीक्षा पास करने के बाद उस ने अपने मन की बात अपने घर वालों को बताई और उन की अनुमति के बाद वह अपनी एक जानकार के साथ दिल्ली की एक मौडलिंग एजेंसी चली गई. नेहा का चेहरा फोटोजेनिक था.  इसलिए फोटोग्राफर ने फोटो शूट के लिए उसे 2 दिन बाद आने को कहा. 2 दिन बाद नेहा फिर से उस स्टूडियो में पहुंची तो फोटोग्राफर ने उस के कई फोटो खींचे. वहां हुए अपने फोटोसेशन के फोटो देख कर नेहा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. फोटोग्राफर ने फोटो में उस का जो व्यक्तित्व उभारा था, उसे देख कर वह दंग रह गई.

वह फोटो देख कर नेहा का आत्मविश्वास जागा. उसे लगा कि उस का चेहरा और फिगर कई हीरोइनों से काफी अच्छी और आकर्षक है. दिल्ली में मौडलिंग के दौरान ही उस की मुलाकात अर्पित नाम के एक प्रोड्यूसर से हुई जो मुंबई में काम करता था और दिल्ली आताजाता रहता था. अर्पित का मुंबई में एक स्टूडियो भी था. नेहा का फोटोजेनिक चेहरा देख कर अर्पित बेहद खुश हुआ. उस ने नेहा को अपनी मुंहबोली बहन बनाया. उस ने नेहा से कहा कि तुम जैसी खूबसूरत लड़कियों की जरूरत तो मुंबई में है. कोशिश करने पर वहां तुम्हें कहीं न कहीं काम मिल ही जाएगा. नेहा भी तो यही चाहती थी. उस के कहने पर वह मुंबई चली गई.

मुंबई में अर्पित ने नेहा का पोर्टफोलियो तैयार किया. इस के बाद उस के पोर्टफोलियो तमाम म्यूजिक व ऐड कंपनियों को भेजे. इस का नतीजा यह निकला कि एक ऐड कंपनी में नेहा को काम करने का मौका मिल गया. वह कंपनी सूरत की कई साड़ी कंपनियों के ऐड तैयार करती थी. नेहा को पहली बार किसी व्यावसायिक विज्ञापन में काम करने का मौका मिला था. इसलिए उस ने पूरे मन लगा कर काम किया. इस के बाद उसे एकदो ऐड फिल्में और मिलीं तथा उस ने कई रियलिटी शो में भी भाग लिया. अब नेहा बहुत खुश थी. उसे लग रहा था कि इसी तरह उसे काम मिलता रहा हो सिल्वर स्क्रीन पर चमकने का उस का सपना जल्द ही पूरा हो जाएगा. अर्पित भी उस के लिए बहुत मेहनत कर रहा था. वह उसे एकता कपूर के बालाजी प्रोडक्शन के एक सीरियल में कोई ढंग का रोल दिलाने की कोशिश कर रहा था.

चूंकि अर्पित नेहा का कैरियर बनाने में लगा था इसलिए नेहा उसे अपने सगे भाई से भी ज्यादा महत्त्व देती थी. वह बीचबीच में अपने घर दिल्ली भी आती रहती थी. दिल्ली आ कर वह अपने पुराने दोस्तों से भी मिलती थी. उन के साथ वह खूब हंसीठिठोली करती थी. उसी दौरान अपनी एक दोस्त की मार्फत उस की मुलाकात प्रिंस तेवतिया नाम के युवक से हुई. प्रिंस तेवतिया के पिता मूलरूप से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के निलोखेड़ा गांव के रहने वाले थे. वह दिल्ली विकास प्राधिकरण में नौकरी करते थे. प्रिंस के अलावा उन के एक बेटा और एक बेटी थी. 23 साल का प्रिंस भी हैंडसम था. वह प्रौपर्टी खरीदने व बेचने का धंधा करता था. इस धंधे में उसे अच्छीखासी कमाई हो जाती थी, जिस से वह बनठन कर रहता था.

इस के अलावा वह आपराधिक प्रवृत्ति का भी था. उस के ऊपर हत्या, हत्या का प्रयास, मारपीट आदि के कई मुकदमे चल रहे थे. गुस्सैल स्वभाव का प्रिंस अकसर अपने साथ रिवाल्वर रखता था. छोटी सी बात पर ही वह गोली चला देता था. इसलिए वह अपने दोस्तों के बीच शूटर के नाम से जाना जाता था. नेहा प्रिंस से मिल कर बहुत प्रभावित हुई. पहली मुलाकात में ही दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए थे. जब भी उन्हें मौका मिलता वे फोन पर बातें करते थे. बातों ही बातों में उन की दोस्ती और गहरी होती गई. नेहा जब भी मुंबई से आती, प्रिंस के साथ कार से सैरसपाटे करती थी. इसी दौरान वे एकदूसरे के बेहद करीब पहुंच गए. वे एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

प्रिंस की तरफ प्यार के कदम बढ़ाने से पहले नेहा उस के बैकग्राउंड के बारे में कुछ नहीं जानती थी. उस की नजरों में तो प्रिंस एक शरीफ व होनहार युवक था. तभी तो उस ने अपना दिल उस के हवाले कर दिया था. उसे लगा कि प्रिंस के साथ उस की लाइफ हंसीखुशी से कटेगी इसलिए उस ने अपने मीत को प्रियतम बनाने का फैसला कर लिया. प्रिंस भी उसे दिलोजान से चाहता था. कुछ दिनों तक उन के प्यार की गाड़ी ऐसे ही चलती रही. दोनों ही शादी करना चाहते थे इसलिए उन्होंने एक मंदिर में शादी कर ली. यह बात 5-6 महीने पहले की है. नेहा ने इस शादी की खबर अपने घर वालों तक को नहीं दी थी.

चूंकि वह मौडलिंग के पेशे से जुड़ी थी इसलिए उस ने प्रिंस से कह दिया था कि वह शादी वाली बात प्रचारित न करे ताकि उस के प्रोफेशन पर कोई फर्क न पड़े. पत्नी की बात को ध्यान में रखते हुए प्रिंस ने शादी की बात अपने घर वालों के अलावा किसी को नहीं बताई. नेहा का लक्ष्य हिंदी फिल्मों में एंट्री पाना था, इसलिए वह शादी के बाद अकसर मुंबई में ही रहती थी. उस का जल्दीजल्दी दिल्ली आना संभव नहीं था. प्रिंस के सामने अब एक ही रास्ता बचा था कि वह खुद भी मुंबई जाए. लेकिन उस के लिए ऐसा संभव नहीं था क्योंकि दिल्ली में उस का कारोबार जमाजमाया था. पत्नी के मुंबई रहने पर वह उस से मिलने के लिए बेचैन रहता था.

करीब 3 महीने पहले नेहा की तबीयत खराब हो गई तो वह अपने पिता के यहां दिल्ली आ गई थी. उसी दौरान उस ने अपनी मां को बता दिया था कि उस ने दिल्ली के प्रिंस तेवतिया से शादी कर ली है. यह सुन कर रोमा चौंक गईं. उन्होंने बात पति को बताई तो उन्हें भी आघात पहुंचा. जवान बेटी पर नाराज होने के बजाय उन्होंने उस से इतना जरूर कहा कि शादी से पहले कम से कम वह प्रिंस के बारे में उन्हें बता तो देती. जांचनेपरखने के बाद वह फिर सामाजिक रीतिरिवाज से शादी कर देते. नेहा मुंह लटकाए ऐसे ही बैठी रही, वह कुछ नहीं बोली.

खैर, जो होना था हो चुका था. इस में अब वह कुछ नहीं कर सकते थे. इस के बाद प्रिंस ने भी उनके यहां आना शुरू कर दिया. प्रिंस नहीं चाहता था कि नेहा मौडलिंग करे इसलिए वह बारबार मुंबई से दिल्ली लौटने के लिए कहता था. वह चाहता था कि नेहा उस के घर पर ही रहे लेकिन अपने कैरियर को ध्यान में रखते हुए नेहा ऐसा करने को तैयार नहीं थी. एक दिन नेहा ने प्रिंस के फोन की मेमोरी खंगाली तो उस में अनेक मैसेज ऐसे मिले जो लड़कियों या महिलाओं द्वारा भेजे गए थे. इस बारे में नेहा ने प्रिंस से पूछा तो उस ने बताया कि वह उस की दोस्त हैं. लेकिन नेहा को शक हो गया कि प्रिंस के उन के साथ जरूर ही दूसरी तरह के रिश्ते होंगे. यानी नेहा के दिमाग में शक के कीड़े ने जन्म ले लिया. प्रिंस ने लाख सफाई दी लेकिन नेहा कहां मानने वाली थी.

प्रिंस 16 अप्रैल, 2015 को भी हरिनगर में स्थित नेहा के घर गया. 2 दिन वह वहीं रहा. 17-18 अप्रैल की रात को उस ने नेहा के कमरे में शराब पी. फिर खाना खाने के बाद वह सोने के लिए नेहा के कमरे में चला गया. घर के बाकी लोग दूसरे कमरे में सो गए. आधी रात तक नेहा और प्रिंस बातें करते रहे. उसी दौरान प्रिंस ने नेहा से कहा, ‘‘नेहा, मैं तुम से कई बार कह चुका हूं कि तुम मौडलिंग छोड़ दो. लेकिन तुम मेरी बात मान ही नहीं रही.’’

‘‘देखो प्रिंस, मैं बौलीवुड में एंट्री करने के लिए स्ट्रगल कर रही हूं. मुझे मुंबई में जम जाने दो, फिर तुम भी वहीं रहना.’’ नेहा बोली.

‘‘नहीं, मुझे यह सब पसंद नहीं है. मुझे मालूम है कि फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश लिए कितनी लड़कियां मुंबई जाती हैं और उन्हें वहां क्याक्या करना पड़ता है. फिल्मों में काम मिलना इतना आसान नहीं होता, जितना तुम समझ रही हो. मेरा काम ठीकठाक चल रहा है इसलिए तुम यह सब छोड़ कर मेरे घर चलो. मैं तुम्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होने दूंगा.’’ प्रिंस ने समझाया. लेकिन नेहा पर तो दूसरी तरह का भूत सवार था. इसलिए उस ने साफ कह दिया कि वह मौडलिंग हरगिज नहीं छोड़ेगी. दोनों के बीच बात बढ़ी तो नेहा ने कह दिया, ‘‘मेरे मुंबई में रहने पर तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तुम्हारे कई लड़कियों से संबंध हैं.’’

‘‘जिस तरह तुम मेरे लिए कह रही हो उसी तरह तुम्हारे भी कई बौयफ्रैंड हैं. तुम भी उन के साथ मटरगश्ती करती होगी इसलिए मुंबई नहीं छोड़ना चाहती.’’ प्रिंस ने भी आरोप लगाया.

‘‘तुम्हें इस तरह की फालतू बकवास करते हुए शर्म नहीं आती. मैं इस तरह की लड़की नहीं हूं जैसा तुम सोच रहे हो.’’ नेहा ने उसे झिड़का.

‘‘अब तुम यह बताओ कि तुम मेरे घर चलोगी या नहीं.’’ पिं्रस ने गुस्से में पूछा तो नेहा ने भी गुस्से में कह दिया, ‘‘नहीं, मैं अभी न तो मौडलिंग छोड़ूंगी और न ही तुम्हारे घर जाऊंगी.’’

प्रिंस गुस्से में तमतमाया हुआ था. उस ने पैंट से पिस्तौल निकाला और नेहा पर गोली चला दी. गोली नेहा के पेट के निचले हिस्से में लगी. उस ने उस पर दूसरी गोली चलानी चाही तभी नेहा ने हिम्मत कर के उस की पिस्तौल छीनने की कोशिश की. उसी दौरान ट्रिगर दब गया और गोली छत पर जा लगी. कुछ ही पल में नेहा के पेट से खून बहने लगा. उस की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह बेड पर गिर कर बेहोश हो गई. उधर गोली की आवाज सुन कर दूसरे कमरे में सो रहे प्रदीप मिश्रा की नींद टूट गई. उन्होंने पत्नी रोमा को जगाया. चूंकि गोली की आवाज नेहा के कमरे की ओर से आई थी, इसलिए वह उस के कमरे की तरफ भागे.

उधर प्रिंस ने गुस्से में अपनी पत्नी को गोली मार तो दी, लेकिन उस की हालत देख कर वह घबरा गया था. उस ने जल्दी से दरवाजा खोला तो सामने खड़े अपने सासससुर को नेहा को गोली मारने वाली बात बता दी. यह बात सुन कर प्रदीप मिश्रा और उन की पत्नी तेज कदमों से बेटी के कमरे में गए तो बिस्तर पर लहूलुहान पड़ी बेटी को देख कर वे घबरा गए. तभी प्रदीप मिश्रा दौड़ेदौड़े आटो बुलाने के लिए निकल पड़े तो प्रिंस बांहों में नेहा को उठा कर चौथी मंजिल से नीचे ले गया. जैसे ही प्रदीप आटो लाए, उस ने नेहा को आटो में लिटा दिया और खुद वहां से फरार हो गया.

प्रिंस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ भादंवि की धारा 307 और 25, 27, 54, 59 आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर के 21 अप्रैल, 2015 को साकेत कोर्ट में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस की निशानदेही पर वारदात में प्रयुक्त पिस्तौल और एक जीवित कारतूस बरामद किया. इस के बाद उसे 22 अप्रैल को महानगर दंडाधिकारी अशोक कुमार की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. उधर एम्स ट्रामा सेंटर में भरती नेहा की हालत सीरियस बनी हुई थी. डा. कुट्टी शारदा विनोद की टीम ने 20 अप्रैल को उस का औपरेशन कर पेट से गोली निकाली. इस के बाद धीरेधीरे उस की हालत में सुधार होता गया तो 28 अप्रैल, 2015 को उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर घर भेज दिया.

इस हादसे के बाद नेहा मिश्रा बेहद डरीसहमी हुई है. जिस प्रिंस को उस ने अपना सब कुछ मान लिया था, उस से उसे ऐसा दर्द मिलने की उम्मीद नहीं थी. पुलिस द्वारा जब नेहा को प्रिंस की आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी मिली तो वह चौंक गई. अब नेहा को अपने फैसले पर पछतावा हो रहा है. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी ओमप्रकाश लेखवाल कर रहे हैं. True Crime Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों व नेहा के बयान पर आधारित. कथा में शालिनी व अर्पित परिवर्तित नाम हैं.

 

Real Crime Story: इश्क में फिर बहा खून

Real Crime Story: पासपड़ोस में रहने के कारण दीपक और जावित्री को एकदूसरे से कब प्यार हो गया, पता ही नहीं चला. एक दिन जावित्री के पिता वीरपाल ने उन दोनों को ऐसी हालत में देखा कि वह अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं कर सका और फिर…

जावित्री जैसे ही स्कूल जाने के लिए साइकिल से निकली, रास्ते में इंतजार कर रहे दीपक ने अपनी साइकिल उस के पीछे लगा दी. जावित्री ने दीपक को पीछे आते देखा तो उस ने साइकिल की गति और तेज कर दी. दीपक ने भी अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाई और कुछ देर में जावित्री की साइकिल के आगे अपनी साइकिल इस तरह खड़ी कर दी कि अगर जावित्री ने पूरी ताकत से ब्रेक न लगाई होती तो उस की साइकिल से टकरा जाती. साइकिल संभालते हुए जावित्री खीझ कर बोली, ‘‘देख नहीं रहे हो मैं स्कूल जा रही हूं. एक तो वैसे ही देर हो गई है, ऊपर से तुम ने रास्ता रोक लिया. अभी किसी ने हम दोनों को इस तरह देख लिया तो बिना मतलब का बात का बतंगड़ बनने लगेगा.’’

‘‘जिसे जो कहना है, कहता रहे. मुझे किसी की परवाह नहीं है.’’ दीपक ने अपनी यह बात इस तरह अकड़ कर कही, जैसे सचमुच उसे किसी का कोई डर नहीं है.

जावित्री को स्कूल जाने के लिए देर हो रही थी. इसलिए वह बेचैन थी. उस ने दीपक को देखा, उस के बाद विनती के स्वर में बोली, ‘‘दीपक, मुझे सचमुच देर हो रही है, बिना मतलब स्कूल में झूठ बोलना पड़ेगा. अभी जाने दो, मैं तुम से बाद में मिल लूंगी, तब जो बात कहनी हो, कह देना’’

जावित्री की विनती पर दीपक नरम पड़ गया. साइकिल हटाते हुए उस ने जावित्री के सुंदर मुखड़े को देखते हुए कहा, ‘‘जावित्री, तुम मेरी आंखों में देखो, प्यार का सागर लहराता नजर आएगा. तुम्हें पता है, तुम्हारे प्यार में मैं सब कुछ भूल गया हूं. दिनरात सिर्फ तुम्हारी ही यादों में खोया रहता हूं.’’

‘‘वह सब ठीक है दीपक, लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि हम एक ही गांव में रहते हैं. हमारे और तुम्हारे घरों के बीच ज्यादा दूरी भी नहीं है. अगर हम दोनों इसी तरह प्यारमोहब्बत की पींगे बढ़ाते रहे तो मोहल्ले वालों से यह बात छिपी नहीं रहेगी. तुम मेरे पापा को तो जानते ही हो, वह बातबात में गुस्सा हो जाते हैं. कही उन्हें हम दोनों के प्रेम की भनक लग गई तो मैं बदनाम हो जाऊंगी. उस के बाद मेरे पापा मेरी क्या गत बनाएंगे, तुम सोच भी नहीं सकते.’’

‘‘जावित्री, मैं तुम्हें सपने में भी बदनाम करने के बारे में नहीं सोच सकता. तुम मेरा प्यार हो और प्यार के लिए लोग न जाने क्याक्या करते हैं. एक तुम हो कि जरा सी बदनामी से डर रही हो. मैं तुम से मिलने और 2 बातें करने के लिए कितने तिकड़म भिड़ाता हूं. तब कहीं जा कर तुम से मुलाकात होती है. जबकि तुम बदनामी का बहाना कर के मुझ से पीछा छुड़ाना चाहती हो. मैं तुम्हें भला क्यों बदनाम होने दूंगा. तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं ने तय कर लिया है कि मैं शादी तुम्हीं से करूंगा. तुम्हारे अलावा मेरी दुलहन कोई दूसरी नहीं हो सकती. तब बदनामी कैसी?’’

दीपक की बातों के जवाब मे लंबी सांस ले कर जावित्री बोली, ‘‘अच्छा अब बस करो. मुझे स्कूल जाना है. वैसे ही देर हो चुकी है. अब और देर मत करो.’’

कह कर जावित्री साइकिल पर चढ़ी और चल पड़ी तो दीपक ने पीछे से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अभी तो प्यार की शुरुआत है, इसलिए मिलने के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करो.’’

जावित्री बिना कुछ बोले चली गई. दीपक अकसर जावित्री के स्कूल जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का रास्ता रोकता और कभी प्रेम से तो कभी थोड़ा गुस्से से अपने प्रेम का मनुहार करता. उत्तर प्रदेश के महानगर बरेली के फतेहगंज पश्चिमी थाना कस्बा के मोहल्ला लोधीनगर में वीरपाल मौर्य रहता था. उस के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, जिस पर खेती कर के वह अपने परिवार का भरणपोषण कर रहा था. परिवार में पत्नी कमला देवी और 4 बेटियां थीं. सभी अववाहित थीं. जावित्री सब से छोटी थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खुबसूरत और चंचल थी. घर में सब से छोटी होने की वजह से मांबाप भी उसे ज्यादा प्यार करते थे.

जावित्री उम्र के उस पायदान पर खड़ी थी, जब शरीर में अनेक बदलाव आते हैं और दिल में उमंग की लहरें हिचकोले लेने लगती हैं. लोग उसे गहरी नजरों से देखने लगे थे. वह उन नजरों को पहचानने भी लगी थी. लेकिन दीपक उन सब से अलग था, उस की नजरें हमेशा उसे प्यार से देखती थीं. उस की आंखों में उस के लिए अलग तरह की चाहत थी. दीपक भी कम स्मार्ट और खूबसूरत नहीं था. वह भिठौरा मोहल्ले में रहता था. जावित्री और उस के घर के बीच की दूरी दो, ढाई सौ मीटर रही होगी. दीपक के पिता कांताप्रसाद मौर्य उर्फ पप्पू मेहनतमजदूरी करते थे. घर में पिता के अलावा मां रामवती और 2 बड़े भाई थे.

वीरपाल और कांताप्रसाद का ही नहीं, पूरे परिवार का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. इसी आनेजाने में जवान हो रही जावित्री पर दीपक की नजर पड़ी तो बरबस वह उस की ओर खिंचने लगा. घर में अन्य लोगों के होने की वजह से दीपक जावित्री से मन की बात कर नहीं पाता था. इसलिए वह इस फिराक में रहने लगा कि जावित्री अकेले में मिल जाए. संयोग से एक दिन ऐसा ही मौका उस के हाथ लग गया. जावित्री के घर वाले किसी समारोह में शामिल होने के लिए गए थे. जावित्री घर पर ही रह गई थी. इस बात का पता चलते ही किसी बहाने से दीपक उस के घर पहुंच गया. दरवाजे पर दस्तक दी तो जावित्री ने दरवाजा खोला. दीपक को देखते ही वह बोली, ‘‘सभी लोग शादी में गए हैं, घर में कोई नहीं है.’’

जावित्री की बात खत्म होते ही दीपक ने कहा, ‘‘जावित्री, मैं घर वालों से नहीं, सिर्फ तुम से मिलने आया हूं. चाचा से मिलना होता तो बाहर ही मिल लेता.’’

‘‘ठीक है, अंदर आ जाओ और बताओ मुझ से क्या काम है?’’ बगल होते हुए ही जावित्री बोली.

दीपक अंदर आ कर कमरे में खड़ा हो गया. तभी जावित्री ने कहा, ‘‘अब बताओ, मुझ से क्या काम है?’’

दीपक जावित्री को घूरते हुए बोला, ‘‘दरअसल, मैं बहुत दिनों से तुम से अकेले में मिलना चाहता था. क्योंकि मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिल नहीं माना तो तुम से मिलने चला आया.’’

दीपक आगे कुछ और कहता, जावित्री को हंसी आ गई. उस ने हंसते हुए ही कहा, ‘‘आतेजाते तुम मुझे जिस तरह से देखते थे, उसी से मुझे तुम्हारे दिल की बात का पता चल गया था.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी मुझे पंसद करती हो. तुम्हारी बातों से तो यही लगता है कि जो मेरे दिल है, वही तुम्हारे दिल में भी है.’’

दीपक कुछ और कहता, जावित्री झट से बोली, ‘‘मम्मीपापा के आने का समय हो रहा है. वह कभी भी आ सकते हैं, इसलिए तुम अभी यहां से चले जाओ. मुझे जैसे ही मौका मिलेगा, मैं तुम से बात कर लूंगी.’’

जावित्री के यह कहने के बावजूद भी दीपक वहीं खड़ा रहा और उस की खूबसूरती का बखान करता रहा. जावित्री को इस बात का डर था कि कहीं उस के मम्मीपापा न आ जाएं, इसलिए उस ने दीपक का हाथ पकड़ कर उसे  बाहर कर के अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. लेकिन जातेजाते दीपक ने जावित्री को याद करा दिया कि उस ने बाहर मिलने का वादा किया है. जावित्री वादे को नहीं भूली और अगले दिन स्कूल जाते समय रास्ते में हमेशा की तरह दीपक दिखाई दिया तो इशारे से समझा दिया कि स्कूल से लौटते समय वह उस से मिलेगी. दीपक समय से पहले ही जावित्री के लौटने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का बेसब्री से इंतजार करने लगा.

जावित्री स्कूल से लौटी तो दीपक से उस की मुलाकात हुई. दीपक के प्यार को स्वीकार करते हुए उस ने कहा, ‘‘हमें इस बात का खयाल रखना होगा कि हमारे प्यार को किसी की नजर न लगे. इस के लिए हमें सावधान रहना होगा. दीपक जावित्री के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोला, ‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, कौन प्रेमी चाहेगा कि उस की प्रेमिका की रुसवाई हो. तुम मुझ पर पूरा भरोसा रखो, मैं कोई भी ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से तुम्हारा सिर नीचा हो.’’

समय बीतता रहा, लोगों की नजरों से बच कर दोनों मिलते रहे. जल्दी ही दोनों का प्यार इतना गहरा हो गया कि वे एकदूसरे के लिए कुछ भी कर सकते थे, यहां तक कि जान भी दे सकते थे, पर एकदूसरे से कतई अलग नहीं हो सकते थे. लेकिन उन के यह प्रेमिल संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. दोनों के ही घर वालों तक उन के संबंधों की बात पहुंच गई. रिश्तेदारों को पता चला तो वे भी नाराज हो उठे. उस दिन जिंदगी में पहली बार वीरपाल ने बेटी को मारने के लिए हाथ उठाया. उस ने जावित्री की खूब पिटाई की. कमला ने किसी तरह पति को शांत कर के जावित्री को सामने से हटाया.

इस के बाद वीरपाल सीधे कांताप्रसाद के घर गया और उसे हिदायत दी कि वह दीपक को रोके वरना ठीक नहीं होगा. दीपक मिला तो वीरपाल ने उसे भी समझाया, लेकिन वह नहीं माना. इस के बाद वीरपाल और उस का भाई राजेंद्र तनाव में रहने लगे. उन्हें चिंता थी कि जावित्री और दीपक के प्रेमसंबधों की बात खुल गई तो समाज में उन की बड़ी बदनामी होगी. लेकिन ऐसी बातें कहां छिपती हैं. घर वालों ने दीपक पर अंकुश लगाने की कोशिश की तो पूरे समाज में बात फैल गई. एक दिन वीरपाल के चाचा प्रेमशंकर दीपक को रोक कर समझाने लगे तो वह उस से भिड़ गया. इस पर प्रेमशंकर ने उसे थप्पड़ मार दिया. उस समय तो दीपक खून का घूंट पी कर चला गया. लेकिन अगले दिन जब प्रेमशंकर घर के बाहर बैठे थे तो दीपक अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा और बेल्टों से उन्हें जम कर पीटा. इस तरह उस ने अपने अपमान का बदला ले लिया.

प्रेमशंकर ने थाना फतेहगंज पश्चिमी में दीपक और उस के दोस्तों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए तहरीर दी, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की. प्रेमशंकर के साथ घटी घटना की जानकारी वीरपाल को हुई तो उस ने कुछ दिनों बाद दीपक के दोस्तों से मारपीट की. अब तक जावित्री और दीपक का मिलना आम हो गया था. इस बात से वीरपाल बेहद खफा रहता था. ढाई महीने पहले उस ने वार्ड मेंबर को बीच में डाल कर एक पंचायत बुलाई. पंचायत ने दीपक को जावित्री से मिलने से मना किया तो उस ने भरी पंचायत में कह दिया कि यह संभव नहीं है. वह जावित्री से हरगिज दूर नहीं रह सकता. इस पर वीरपाल भड़क उठा और पंचायत के सामने ही दीपक को लातघूंसों से मारा.

इस के बाद दीपक दिल्ली चला गया. मार्च में होली पर घर लौटा तो 10 दिनों के लिए कांवर लेने हरिद्वार चला गया. वहां से वह 15 मार्च को लौटा. उस का एक दोस्त था सोनू, जो ट्रैक्टर मैकेनिक था और वीरपाल के मकान में किराए पर रहता था. 24 मार्च को उस की बेटी का नामकरण संस्कार था, जिस में दीपक को भी निमंत्रण दिया गया था. 24 मार्च की रात दीपक दावत में पहुंचा, लेकिन वहां से वह लौट कर नहीं आया. दावत में जावित्री भी थी, वह भी गायब हो गई थी. अगले दिन दोनों के घर वालों ने उन की तलाश शुरू की. जब वे नहीं मिले तो दोनों के घर वाले थाना फतेहगंज पश्चिम पहुंचे. वीरपाल ने दीपक के खिलाफ जावित्री के अपहरण की रिपोर्ट लिखवाई तो कांताप्रसाद ने वीरपाल, राजेंद्र, प्रेमशंकर और कमला देवी के खिलाफ दीपक के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. एकदूसरे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा कर वे अपनेअपने घर लौट आए.

6 अप्रैल को भिठौरा के एक तालाब में एक बोरा तैरता दिखाई दिया, जिस में से इंसानी पैर बाहर निकले थे. मोहल्ले वालों ने इस बात की जानकारी थाना फतेहगंज पश्चिमी पुलिस को दी. थानाप्रभारी अखिलेश सिंह यादव छुट्टी पर थे, इसलिए थाने का प्रभार देख रहे एसआई अवधेश कुमार पुलिस बल के साथ उस तालाब के किनारे पहुंचे. उन्होंने बोरे को तालाब से निकलवाया तो उस में से एक लड़की की लाश बरामद हुई. लोगों ने उस लाश की शिनाख्त जावित्री के रूप में की. लाश के साथ बोरे से 8 ईंटें भी बरामद हुईं. अनुमान लगाया गया कि लाश को पानी में डुबोने के लिए लाश के साथ बोरे में ईंटें भी रखी गई थीं. लाश सड़ गई तो बोरा तालाब की सतह पर आ गया. जावित्री के घर वाले भी वहां मौजूद थे.

पुलिस ने उन से पूछताछ की तो वे जावित्री की हत्या का आरोप दीपक पर लगाने लगे. उसी बीच एसआई अवधेश कुमार के इशारे पर सिपाहियों ने वीरपाल के मकान का मुआयना किया तो वहां से पुलिस को जो सुराग मिले, वे कुछ और ही कहानी कह रहे थे. एक तो जिस तालाब में जावित्री की लाश मिली थी, वह वीरपाल के मकान के ठीक पीछे था. इस के अलावा जिस तरह के बोरे में जावित्री की लाश मिली थी, उसी तरह के धान भरे हुए बोरे वीरपाल के घर में रखे थे. बोरे से ईंटें बरामद हुई थीं, उसी मार्का की ईंटें वीरपाल के घर में लगी थीं. लेकिन पुलिस ने उस समय वीरपाल से कुछ नहीं कहा, उन्होंने घटनास्थल की अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इसी बीच घटना की जानकारी मिलने पर थानाप्रभारी अखिलेश यादव थाने आ गए. उन्होंने पूरी घटना पर गंभीरता से विचार किया. इस के बाद पुलिस ने वीरपाल और उस के भाई राजेंद्र को हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी. वीरपाल का कहना था कि दीपक ने उस की बेटी की हत्या की है. लेकिन जब सुबूतों का हवाला देते हुए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने जावित्री की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. हत्या में उस का भाई राजेंद्र और लाश ठिकाने लगाने में उस का साढ़ू राजाराम और साथी टेनी उर्फ अरविंद ने साथ दिया था. राजाराम और टेनी भिठौरा में ही रहते थे. पुलिस ने उसी दिन टेनी को भी गिरफ्तार कर लिया. राजाराम घर से फरार था.

उस ने थानाप्रभारी को बताया कि दीपक खुद गायब नहीं हुआ, बल्कि उसे गायब कर के उस की हत्या कर दी गई है. जो बाप अपनी बेटी की हत्या कर सकता है, उस के लिए दीपक का कत्ल करना कोई बड़ी बात नहीं है. इस के बाद पुलिस ने 8 अप्रैल को सभी से अलगअलग पूछताछ की तो उन्होंने दीपक और जावित्री की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

24 मार्च को दीपक सोनू के यहां दावत में पहुंचा तो वहां जावित्री से उस की मुलाकात हो गई. दीपक ने उसे इशारे से पीछे आने को कहा. जावित्री सब की नजरें बचा कर उस के पीछेपीछे चली गई. उधर वीरपाल को जावित्री नहीं दिखी तो उस ने दीपक के बारे में पता किया. वह भी वहां नहीं था. वह समझ गया कि दीपक उस की बेटी को अपने साथ कहीं ले गया है. उस ने वहां मौजूद अपने भाई राजेंद्र को यह बात बताई और उसे साथ ले कर उस की खोज में निकल पड़ा. कुछ ही दूरी पर उन्हें एक खंडहर में दोनों आपत्तिजनक स्थिति में मिल गए. उन्हें उस स्थिति में देख कर उन का खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने दीपक को पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. जावित्री घर की ओर भागी कि वह लोगों को दीपक को बचाने के लिए बुला लाए. वीरपाल और राजेंद्र ने दीपक को पीटपीट कर अधमरा कर दिया.

इस के बाद ईंटों से उस का सिर और चेहरा कुचल कर मार डाला. तभी जावित्री लौट कर आ गई. उस ने दीपक को मरा पाया तो वह बगावत पर उतर आई. उस ने कहा कि वह सब कोबता देगी कि दीपक की हत्या उन्होंने की है. वह उन्हें सजा दिलवा कर रहेगी. इस पर दोनों भाइयों ने जावित्री को पकड़ लिया और बेल्ट से उस का गला कस कर उसे भी मार डाला. रात 12 बजे वीरपाल ने मोहल्ले में ही रहने वाले साढू राजाराम और उस के साथ काम करने वाले टेनी को फोन कर के बुलाया. दोनों के आने पर उस ने उन्हें पूरी बात बता कर मदद मांगी. इस के बाद वह घर गया और धान के 2 बोरे ले आया. एक बोरे में उस ने जावित्री की लाश भरी और दूसरे में दीपक की.

जावित्री की लाश वाला बोरा वीरपाल, राजाराम और टेनी घर ले गए और उस में 8 ईंटें डाल कर बोरे का मुंह बंद करके घर के पीछे वाले तालाब में फेंक दिया. वजन की वजह से बोरा तलहटी में बैठ गया. इस के बाद टेनी अपने घर चला गया. राजाराम वहां से अपने छोटे भाई के घर गया और मोटरसाइकिल ले आया. राजाराम और राजेंद दीपक के लाश वाले बोरे को ले कर मोटरसाइकिल से नेशनल हाईवे पर मीरगंज के पहले भखड़ा नदी के पुल पर ले गए और ऊपर से ही बोरे को नीचे फेंक दिया. नदी सूखी थी, इसलिए लाश जमीन पर जा गिरी. वे घर लौट आए और घर से फावड़ा ले कर फिर वहां पहुंचे. नदी में बने टापू पर करीब तीन फुट गहरा गड्ढा खोद कर उस में दीपक की लाश वाला बोरा गाड़ दिया और घर लौट आए.

वीरपाल ने तो अपने हिसाब से सब कुछ बड़े अच्छे तरीके से किया था. लेकिन बेटी की लाश ने पानी के ऊपर आ कर उस की चुगली कर दी तो पुलिस के हाथ उस तक पहुंच ही गए. उस की निशानदेही पर पुलिस ने भखड़ा नदी में बने मिट्टी के टापू से दीपक की लाश बरामद कर ली और पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस ने दीपक के अपहरण के मुकदमे में हत्या और साक्ष्य छिपाने की धाराएं जोड़ कर सभी अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त ईंटें, बेल्ट और फावड़ा बरामद कर लिया. 9 अप्रैल को पुलिस ने वीरपाल, राजेंद्र और टेनी को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 10 अप्रैल को पुलिस ने राजाराम को भी गिरफ्तार कर कर के जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime News: भोली सी दुलहन – शादी के 7 दिनों बाद पति का मर्डर

UP Crime News:  यह घटना रिश्तों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. शादी के महज़ 7 दिनों बाद एक नवविवाहिता ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या करवा दी. सोचने वाली बात यह है कि ऐसा क्या हुआ कि नईनई शादी के बावजूद पत्नी ने इतना बड़ा कदम उठा लिया? क्या था इस पूरे मामले के पीछे छिपा सच? जानने के लिए पढ़ें पूरी कहानी.

यह शर्मनाक मामला यूपी के बस्ती जिले के परसरामपुर थाना क्षेत्र के बेदीपुर गांव का है. यहां शादी के सिर्फ 7 दिनों बाद रुखसाना ने अपने पति अनीश की हत्या अपने प्रेमी रिंकू से करवा दी. अनीश को गंभीर हालत में अयोध्या के अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पुलिस जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए, जिन्होंने सभी को हैरान कर दिया.

आप को बता दें कि 20 नवंबर, 2025 गुरुवार शाम अनीश अपने घर के बाहर टहल रहा था. तभी रिंकू बहाने से उस के पास आया. इस के बाद वह उसे कुछ दूरी तक बातों में उलझा कर ले गया और गोली मार दी. गंभीर रूप से घायल अनीश को पहले श्रीराम चिकित्सालय अयोध्या ले जाया गया, फिर हालत गंभीर होने पर उसे मैंडिकल कालेज रेफर कर दिया गया, लेकिन डॉक्टर उसे बचा नहीं पाए.

पुलिस ने वारदात के समय आसपास मौजूद लोगों से पूछताछ के बाद आरोपी की तलाश शुरू की. पुलिस ने 20 नवंबर, 2025 की ही देर रात को आरोपी रिंकू सिंह को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस की थोड़ी सख्ती के बाद उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया और हत्या की पूरी कहानी बताई.

अनीश की शादी 13 नवंबर, 2025 को रुकसाना से हुई थी, लेकिन रुकसाना का पहले से ही रिंकू सिंह से अफेयर चल रहा था. शादी के बाद भी दोनों आपस में बात करते रहे. 19 नवंबर को रुकसाना ने प्रेमी रिंकू सिंह के साथ मिलकर अनीश की हत्या की साजिश रची. रिंकू ने अनीश को रास्ता पूछने के बहाने रोक लिया और माथे पर गोली मार दी. जिस से अनीश की मौके पर ही मौत हो गई.

एसपी अभिनंदन ने बताया कि पुलिस ने रुकसाना और उस के प्रेमी रिंकू सिंह को गिरफ्तार कर लिया है .रुकसाना का रिंकू के साथ कई सालों से प्रेमप्रसंग चल रहा था. उन्होंने बताया कि रुकसाना ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति अनीश की हत्या की साजिश रची. पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेज दिया है. UP Crime News

एक लाश ने लिया प्रतिशोध