Aligarh News : पत्नी के समलैंगिक संबंधों के कारण में मारा गया पति

Aligarh News : 4 बच्चों की मां रूबी ने रजनी से बने समलैंगिक संबंधों के लिए अपने पति भूरी सिंह को रजनी के साथ मिल कर ठिकाने लगा दिया. बच्चों की तो छोडि़ए, अगर वह अपने और रजनी के भविष्य के बारे में सोचती तो…

जिला अलीगढ़, उत्तर प्रदेश. तारीख 10 मार्च, 2020. अलीगढ़ के थाना गांधीपार्क क्षेत्र की कुंवरनगर कालोनी. उस दिन होली थी. कुंवरनगर कालोनी के भूरी सिंह ने दोस्तों और परिचितों के साथ जम कर होली खेली. होली खेलने के बाद वह नहाधो कर सो गया. भूरी सिंह सटरिंग का काम करता था. शाम को सो कर उठने के बाद वह अपनी पत्नी रूबी से यह कह कर कि ठेकेदार से अपने रुपए लेने जा रहा है, घर से निकल गया. जब वह देर रात तक घर वापस नहीं आया तो पत्नी को उस की चिंता हुई. रात गहराने लगी तो रूबी ने किराएदार हरिओम की पत्नी रितू के मोबाइल से पति को फोन किया, लेकिन उस का फोन रिसीव नहीं हुआ.

दूसरे दिन 11 मार्च की सुबह 7 बजे लोगों ने कालोनी से निकलने वाले नाले में एक लाश उल्टी पड़ी देखी. इस जानकारी से कालोनी में सनसनी फैल गई. आसपास के लोग जमा हो गए. इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. कुछ ही देर में थाना गांधी पार्क के थानाप्रभारी सुधीर धामा पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. इसी बीच भूरी सिंह की पत्नी रूबी को किसी ने नाले में लाश मिलने की जानकारी दी. रूबी तत्काल वहां पहुंच गई. थानाप्रभारी ने लाश को नाले से बाहर निकलवाया. मृतक की शिनाख्त घटनास्थल पर पहुंची उस की पत्नी रूबी व छोटे भाई किशन लाल गोस्वामी ने भूरी सिंह गोस्वामी के रूप में की.

थानाप्रभारी ने इस घटना की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी थी. कुछ ही देर में एसपी (सिटी) अभिषेक कुमार फोरैंसिक टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पति की लाश देख रूबी बिलखबिलख कर रो रही थी. मोहल्ले की महिलाओं ने उसे किसी तरह संभाला. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, फिर फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए.  मृतक के मुंह पर टेप लगा था और उस के हाथपैर रस्सी से बंधे हुए थे. जांच के दौरान फोरैंसिक टीम ने देखा कि मृतक भूरी की गरदन पर चोट का निशान है. भूरी सिंह की हत्या किस ने और क्यों की, इस का जवाब किसी के पास नहीं था. सवाल यह भी था कि हत्यारे हत्या कर लाश को मृतक के छोटे भाई के घर के पास नाले में क्यों फेंक गए थे?

पुलिस का अनुमान था कि हत्यारे भूरी सिंह की हत्या किसी अन्य स्थान पर करने के बाद लाश को उस के छोटे भाई किशन गोस्वामी के घर के पास फेंक गए होंगे. होली का त्यौहार होने के कारण आवागमन कम होने से हत्यारों को लाश फेंकते किसी ने नहीं देखा होगा. पुलिस को मृतक की जेब से उस का मोबाइल भी मिल गया था. थानाप्रभारी ने रूबी से उस के पति के बारे में पूछताछ की. रूबी ने बताया, ‘मंगलवार रात 9 बजे पति के मोबाइल पर पेमेंट ले जाने के लिए ठेकेदार का फोन आया था. इस के बाद वह घर से निकल गए और फिर नहीं लौटे. काफी रात होने पर उन्हें फोन किया, लेकिन काल रिसीव नहीं हुई थी.’ परिवार वालों को यह जानकारी नहीं थी कि भूरी सिंह किस ठेकेदार के पास रुपए लेने गया था. पुलिस ने मौके की काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

दूसरे दिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आई तो पता चला कि भूरी सिंह की हत्या तार अथवा रस्सी से गला घोटने से हुई थी. मृतक के भाई किशनलाल गोस्वामी की तहरीर पर पुलिस ने मृतक भूरी सिंह की पत्नी रूबी, उस के किराएदार डब्बू, डब्बू की पत्नी रजनी और दूसरे किराएदार हरिओम और डब्बू के एक दोस्त आसिफ के विरुद्ध हत्या का केस दर्ज कर लिया. रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि मृतक भूरी सिंह की पत्नी रूबी के किराएदार डब्बू से अवैध संबंध थे. इस का भूरी सिंह विरोध करता था. इस बात को ले कर रूबी और भूरी सिंह में आए दिन झगड़ा होता रहता था. घटना से 10 दिन पहले भी रूबी व किराएदार डब्बू ने मिल कर भूरी सिंह को पीटा था.

घटना वाली रात डब्बू ने अपने दोस्त आसिफ को घर बुलाया और पांचों नामजदों ने मिल कर भूरी की हत्या कर दी. हत्या के बाद लाश को मकान से कुछ दूर नाले में फेंक दिया. सुबह रूबी ने अपने आप को साफसुथरा दिखाने के लिए पुलिस को कपोलकल्पित कहानी सुनाई थी कि भूरी सिंह ठेकेदार से पेमेंट लेने गया था, जो लौट कर घर नहीं आया. पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद जांच शुरू कर दी. सीओ (द्वितीय) पंकज श्रीवास्तव ने बताया कि मृतक की लाश से उस का मोबाइल बरामद हुआ था, जिस की मदद से कुछ तथ्य सामने आए. पुलिस केस की गहनता से जांच कर रही थी. नतीजतन पुलिस ने घटना के दूसरे दिन ही इस हत्या की गुत्थी सुलझा ली.

दरअसल, पुलिस ने भूरी सिंह की हत्या के आरोप में मृतक की पत्नी रूबी व उस के किराएदार डब्बू की पत्नी रजनी को हिरासत में ले कर पूछताछ की. शुरुआती पूछताछ में दोनों पुलिस को बरगलाने की कोशिश करने लगीं. लेकिन जब सख्ती हुई तो दोनों एकदूसरे को देख कर टूट गईं और अपना जुर्म कुबूल कर लिया. 12 मार्च को एसपी (सिटी) अभिषेक कुमार ने पुलिस लाइन में प्रैसवार्ता के दौरान जो कुछ बताया, वह चौंकाने वाला था. दरअसल, सभी समझ रहे थे कि भूरी सिंह की हत्या उस की पत्नी रूबी के किराएदार डब्बू से अवैध संबंधों के बीच रोड़ा बनने के चलते की गई थी, लेकिन हकीकत कुछ और ही थी, जिसे सुन कर पुलिस ही नहीं सभी हक्केबक्के रह गए.

भूरी सिंह की हत्या का कारण था 2 महिलाओं के समलैंगिक संबंध. रूबी और रजनी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. दोनों ने इस हत्याकांड के पीछे जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

भूरी सिंह की हत्या पूरी प्लानिंग के तहत की गई थी. इन दोनों महिलाओं ने ही उस की हत्या की पटकथा एक माह पहले लिख दी थी, जिसे अंजाम तक पहुंचाया होली के दिन गया. भूरी सिंह की पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उस का विवाह पत्नी की बहन यानी साली रूबी से करा दिया गया था. भूरी सिंह दूसरी पत्नी रूबी से उम्र में 11 साल बड़ा था. भूरी सिंह के पहली पत्नी से 3 बेटे व 1 बेटी थी. भूरी सिंह सीधेसरल स्वभाव का था. वह केवल अपने काम से काम रखता था. ऐसे व्यक्ति का सीधापन कभीकभी उस के लिए ही घातक साबित हो जाता है. भूरी सिंह जैसा था, उस की पत्नी रूबी ठीक उस के विपरीत थी. वह काफी तेज और चंचल स्वभाव की थी.

घर वालों ने उस की शादी भूरी सिंह से इसलिए की थी ताकि बहन के बच्चों की देखभाल ठीक से हो जाए. वह मजबूरी में भूरी सिंह का साथ निभा रही थी. अपनी ओर भूरी सिंह द्वारा ध्यान न देने से जवान रूबी की रातें करवटें बदलते कटती थीं. भूरी सिंह अपने बड़े भाई के मकान में किराए पर रहता था. पड़ोस में ही रजनी भी किराए के मकान में रहती थी. दोनों हमउम्र थीं. एकदूसरे के यहां आनेजाने के दौरान जानेअनजाने सोशल मीडिया पर अश्लील फोटो, वीडियो देखतेदेखते दोनों में नजदीकियां हो गईं, फिर दोस्ती गहरा गई.

दोनों के बीच समलैंगिक संबंध बन गए और एकदूसरे से पतिपत्नी की तरह प्यार करने लगीं. रूबी पत्नी तो रजनी पति का रिश्ता निभाने लगी. दोनों सोशल मीडिया की इस कदर मुरीद थीं कि अपना ज्यादातर समय मोबाइल पर बिताती थीं. दोनों अपने इस रिश्ते के वीडियो तैयार कर के टिकटौक पर भी अपलोड करती थीं. उन के कई वीडियो वायरल हो चुके थे. डब्बू और रजनी की शादी को 5 साल हो गए थे. उन का कोई बच्चा नहीं था. इसलिए भी दोनों महिलाओं के रिश्ते और गहरे हो गए. बाद में दोनों ने साथ रहने की कसमें खाते हुए कभी जुदा न होने का फैसला लिया.

इस बीच भूरी सिंह ने अपना मकान बनवा लिया था. रूबी और रजनी के बीच बने संबंध इस कदर प्रगाढ़ हो चुके थे कि घटना से एक साल पहले पति भूरी सिंह से जिद कर के रूबी ने अपने मकान की ऊपरी मंजिल पर एक कमरा और बनवा लिया था. फिर रजनी को उस के पति डब्बू के साथ किराएदार बना कर रख लिया, ताकि उन के संबंधों के बारे में किसी को पता न चल सके. एक ही मकान में रहने से अब दोनों महिलाएं बिना किसी डर के आपस में मिल लेती थीं. भूरी सिंह सटरिंग के काम के लिए सुबह ही निकल जाता था और देर शाम लौटता था. इस के चलते दोनों सहेलियों में पिछले 2 सालों में गहरे समलैंगिक संबंध बन गए थे. दोनों एकदूसरे से बिना मिले नहीं रह पाती थीं.

इन अनैतिक संबंधों को बनाए रखने के लिए दोनों काफी गोपनीयता बरतती थीं. फिर भी उन की पोल खुल ही गई. एक माह पहले ही भूरी सिंह को अपनी पत्नी रूबी  और किराएदार रजनी के बीच चल रहे अनैतिक संबंधों का पता चल गया. दोनों महिलाओं के बीच चल रहे प्रेम संबंधों का पता चलने के बाद भूरी सिंह के होश उड़ गए. वह परेशान रहने लगा. उस ने इन अनैतिक संबंधों को गलत बताते हुए विरोध किया. उस ने पत्नी रूबी को समझाया और रजनी से दूर रहने को कहा. इन्हीं संबंधों को ले कर दोनों में विवाद होने लगा. भूरी सिंह ने रूबी को सुधर जाने की हिदायत देते हुए कहा कि वह अपने मकान में रजनी को किराएदार नहीं रखेगा.

दूसरे दिन भूरी सिंह के काम पर जाने के बाद रूबी ने यह बात रजनी को बताई. भूरी सिंह उन के प्रेम संबंधों में बाधक बन रहा था, इस से दोनों परेशान हो गईं. काफी विचारविमर्श के बाद दोनों ने राह के रोड़े भूरी सिंह को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. इस के बाद भी दोनों के संबंध चलते रहे. हां, अब दोनों थोड़ी होशियारी से मिलती थीं. होली वाले दिन शाम को रूबी और रजनी ने भूरी सिंह को जम कर शराब पिलाई. इस के चलते भूरी सिंह नशे में बेसुध हो गया, तो दोनों ने उस के हाथपैर रस्सी से बांधे और मुंह पर टेप लगाने के बाद रस्सी से गला घोंट कर हत्या कर दी.

रात होने पर दोनों ने लाश को पड़ोस में रहने वाले छोटे भाई किशनलाल के घर के पास नाले में फेंक दिया ताकि शक भाई  के ऊपर जाए. बुधवार को कुंवर नगर कालोनी में नाले में उस का शव मिला. पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर रूबी ने अफवाह फैला दी कि उस का पति भूरी सिंह ठेकेदार से रुपए लेने की बात कह कर घर से निकला था, लेकिन देर रात तक जब घर वापस नहीं आया, तब उस ने किराएदार हरिओम की पत्नी रितू के फोन से काल थी. जबकि हकीकत वह स्वयं जानती थी. पुलिस ने इस हत्याकांड का खुलासा करने के साथ ही दोनों महिलाओं की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त रस्सी व टेप बरामद कर लिया. दोनों महिलाओं को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

हालांकि भारतीय दंड संहिता की धारा-377 को वैध कर दिया गया है यानी समलैंगिकता अब हमारे देश में कानूनन अपराध नहीं है, अर्थात आपसी सहमति से 2 व्यस्कों के बीच समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं रहा. लेकिन हमारे देश में अभी तक इसे पूरी तरह अपनाया नहीं गया है. इसी के चलते लोग अपने संबंधों को समाज में स्थापित करने के लिए अपराध की राह पर चल पड़ते हैं. भूरी सिंह हत्याकांड के पीछे भी यही कारण प्रमुख रहा. दोनों महिलाओं के अनैतिक संबंधों के चलते उन के परिवार उजड़ गए. भूरी सिंह की मौत के बाद उस के चारों अबोध बच्चे अनाथ हो गए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime : बदनामी से बचने के लिए पिता ने बेटे की हत्या को आत्महत्या का रुप दे दिया

UP Crime : मीट कारोबारी हाफिज मोहम्मद रईस ने बदनामी से बचने के लिए बेटे की हत्या को आत्महत्या बताने की कोशिश की, लेकिन वह न खुद को बचा पाया, न बेटी और उस के आशिक तौसीफ को. बीती ईद के दिन घटी यह घटना…

उस दिन मई 2020 की 25 तारीख थी. कानपुर शहर में सादगी से ईद का त्यौहार मनाया जा रहा था. लौकडाउन के कारण बाजार, सड़कों पर ज्यादा चहलपहल तो नहीं थी. लेकिन लोग एकदूसरे के घर जा कर गले मिल रहे थे और ईद की मुबारकबाद दे रहे थे. अनवरगंज थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय गश्त पर थे. दरअसल उन का थाना क्षेत्र मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला तो था ही, संवेदनशील भी था. अधिकारियों के आदेश पर पुलिस चप्पेचप्पे पर नजर गड़ाए हुए थी.

शाम लगभग 3 बजे दिलीप कुमार बिंद क्षेत्रीय गश्त कर थाने वापस आए. अभी वह अपने कक्ष में आ कर बैठे ही थे कि उन के मोबाइल पर काल आई. उन्होंने काल रिसीव करते हुए पूछा, ‘‘मैं थाना अनवरगंज से इंसपेक्टर दिलीप कुमार. आप कौन?’’

‘‘सर, मैं कुली बाजार से मीट कारोबारी हाफिज मोहम्मद रईस बोल रहा हूं. मेरे जवान बेटे मोहम्मद जफर ने आत्महत्या कर ली है. आप जल्दी आ जाइए.’’

थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद थकान महसूस कर रहे थे, फिर भी सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. रवाना होने से पहले उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी थी. हाफिज मोहम्मद रईस कुली बाजार का चर्चित मीट कारोबारी था. थाने में मीट कारोबारियों की लिस्ट में उस का नामपता दर्ज था. इसलिए पुलिस को उस के घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस समय उस के घर भीड़ जुटी थी. भीड़ को हटाते हुए बिंद ने घर के अंदर प्रवेश किया. मोहम्मद जफर की लाश बाथरूम में पड़ी थी. उस के गले में गहरा घाव था, उम्र रही होगी 22 साल.

दिलीप कुमार बिंद अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल तथा सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन बेग भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. साथ ही मृतक के घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ की. मृतक के पिता मोहम्मद रईस ने बताया कि उन का बेटा मोहम्मद जफर पिछले कई महीने से मानसिक रूप से बीमार था. इसी के चलते उस ने आज दोपहर बाद गले को ब्लेड से चीर कर आत्महत्या कर ली. घटना के समय वह अपनी बेगम के साथ ईद मिलन को घर से बाहर गए थे. वापस आए तो जफर की लाश बाथरूम में पड़ी देखी. उस के बाद मैं ने थाने को सूचना दी.

मृतक की मां वसीम बानो ने बताया कि वह अपनी बेटी तसलीम के साथ पड़ोस में ईद मिलन को गई थी. वापस आई तो शौहर से पता चला कि बेटे ने ब्लेड से गला चीर कर आत्महत्या कर ली है. साहब, जफर मानसिक रोगी था. इसी मानसिक अवसाद में उस ने आत्महत्या कर ली. इतना कह वह फूटफूट कर रोने लगी. वसीम बानो की बेटी तसलीम ने पूछताछ में कई बार बयान बदले. कभी वह कहती कि मां के साथ पड़ोस में गई थी, कभी कहती वह अकेले ही सहेली के घर गई थी. भाई जफर की मौत की जानकारी उसे अम्मीजान से मिली थी. उस ने यह भी कहा कि जफर मानसिक रोगी नहीं था. वह पूरी तरह से स्वस्थ था. उस ने आत्महत्या क्यों की, उसे पता नहीं है.

चूंकि घर के सभी लोग कह रहे थे कि मोहम्मद जफर ने आत्महत्या की है और पासपड़ोस के लोग भी कोई शंका जाहिर नहीं कर रहे थे, इसलिए पुलिस अधिकारियों को लगा कि शायद मोहम्मद जफर ने आत्महत्या ही की है. हालांकि मृतक के मांबाप, बहन के बयानों में विरोधाभास था और पुलिस अधिकारियों को कुछ संदेह भी हुआ था. फिर भी उन्होंने निरीक्षण के बाद शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया. दूसरे रोज शाम 5 बजे थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद को मृतक जफर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी तो वह चौंके. रिपोर्ट के अनुसार मोहम्मद जफर की मौत अधिक खून बहने से हुई थी. उस का गला किसी तेज धार वाले औजार से काटा गया था. गले का वैसा घाव ब्लेड से संभव न था. गले के अलावा उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था. न ही उस ने अल्कोहल की डोज ली थी.

थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने मृतक जफर की रिपोर्ट से एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल को अवगत कराया. उन्हें पहले ही परिवार के विरोधाभासी बयानों पर शक था. रिपोर्ट देखने के बाद उन्हें भी पक्का यकीन हो गया कि जफर की हत्या परिवार के ही किसी सदस्य ने की है. फिर साक्ष्य मिटा कर हत्या को आत्महत्या का रूप दिया गया है. उन्होंने सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन बेग की अगुवाई में दिलीप कुमार बिंद को जफर की हत्या का रहस्य सुलझाने का आदेश दिया. आदेश पाते ही दिलीप कुमार बिंद ने हकीकत का पता लगाने के लिए अपने क्षेत्र के एक खास खबरी को लगाया. एक दिन बाद ही उस ने थानाप्रभारी बिंद को एक चौंकाने वाली जानकारी दी. उस ने बताया कि मोहम्मद जफर न तो मानसिक रोगी था और न ही उसे कोई अन्य रोग था.

जफर की बहन तसलीम तथा पड़ोस में रहने वाले चचेरे भाई तौसीफ अहमद के बीच मोहब्बत पनप रही थी. जफर को दोनों के अवैध संबंधों की जानकारी थी और वह इस का विरोध करता था. इन्हीं नाजायज संबंधों के चलते जफर की हत्या हुई है. हत्या का रहस्य घर वालों के पेट में ही छिपा है. यदि कड़ाई से पूछताछ की जाए तो सारा भेद खुल सकता है. दिलीप कुमार बिंद ने नाजायज रिश्तों की जानकारी सीओ सैफुद्दीन बेग को दी तो वह बिंद को साथ ले कर दोबारा मोहम्मद रईस के घर जा पहुंचे. उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने अपनी जांच उस बाथरूम से शुरू की, जहां मोहम्मद जफर की लाश पड़ी मिली थी.

टीम प्रभारी प्रवीण कुमार ने बाथरूम का बेंजामिन टेस्ट किया तो वहां खून की एक भी बूंद का प्रमाण नहीं दिखा. इस के बाद टीम ने मकान के दूसरे बाथरूम का बेंजामिन टेस्ट किया तो वहां खून के प्रमाण मिले. टीम ने दोनों बाथरूम के बीच 2 जगहों पर शक के आधार पर टेस्ट किया तो वहां भी खून के प्रमाण मिले. जाहिर था शव को एक बाथरूम से दूसरे बाथरूम में लाया गया था. टीम प्रभारी प्रवीण ने मृतक के मांबाप, भाईबहन के हाथों का बेंजामिन टेस्ट किया तो खून के प्रमाण मिले. फोरैंसिक टीम की जांच से हत्या के पुख्ता सबूत मिले तो सीओ सैफुद्दीन बेग ने मोहम्मद रईस, उस की पत्नी वसीम बानो तथा बेटी तसलीम से अलगअलग सख्ती से पूछताछ की.

पूछताछ में मोहम्मद रईस टूट गया. उस ने बताया कि बच्चों के जेल जाने के डर से उस ने झूठ बोला था कि जफर ने आत्महत्या की है. जफर तो मर ही गया था, सच बोलता तो परिवार के 2 बेटे और बेटी जेल चले जाते. सच यह है कि मोहम्मद जफर ने अपनी बहन तसलीम को बाथरूम में चचेरे भाई तौसीफ अहमद के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. भेद खुलने के डर से तसलीम ने तौसीफ व उस के भाई सैफ के साथ मिल कर बकरा काटने वाले चाकू से जफर को गला रेत कर मार डाला था. मोहम्मद रईस के टूटते ही उस की पत्नी वसीम बानो तथा बेटी तसलीम ने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया. चूंकि हत्या में तसलीम का प्रेमी तौसीफ अहमद और उस का भाई सैफ भी शामिल था, अत: पुलिस ने उन दोनों को भी नाटकीय ढंग से पकड़ लिया.

दोनों को थाना अनवरगंज लाया गया. जब उन दोनों का सामना मोहम्मद रईस, वसीम बानो तथा तसलीम से हुआ तो वे समझ गए कि अब सच बताने में ही भलाई है. अत: उन दोनों ने सहज ही जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस अभी तक आलाकत्ल चाकू बरामद नहीं कर पाई थी. अत: थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने चाकू के संबंध में पूछताछ की तो तौसीफ ने बताया कि कत्ल करने के बाद चाकू को मकान के सीवर टैंक (मेन होल) में छिपा दिया था. यह बात पता चलते ही दिलीप कुमार बिंद तौसीफ अहमद को घटनास्थल पर ले गए. वहां उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. बरामदगी के बाद तौसीफ को वापस थाने लाया गया और चाकू को सीलमोहर कर दिया गया.

चूंकि सभी ने मोहम्मद जफर की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था और आला कत्ल (चाकू) भी बरामद करा दिया था, इसलिए थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने भादंवि की धारा 302/201 के तहत तसलीम, तौसीफ अहमद, सैफ, वसीम बानो तथा हाफिज मोहम्मद रईस के विरुद्व रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा पांचों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में इश्क में अंधी बहन द्वारा भाई को हलाल करने की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई. उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के अनवरगंज थाना क्षेत्र में मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला एक मोहल्ला है कुली बाजार. इसी कुली बाजार में बड़ी मसजिद के पास हाफिज मोहम्मद रईस अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी वसीम बानो के अलावा 2 बेटे तथा बेटी तसलीम थी.

मोहम्मद रईस मीट कारोबारी थे. इस कारोबार में उन के दोनों बेटे भी हाथ बंटाते थे. कुली बाजार में उन की चर्चित मीट की दुकान थी. कुली बाजार में ही उन का अपना निजी मकान था. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. वसीम बानो की बेटी तसलीम खूबसूरत थी, तन से ही नहीं मन से भी खूबसूरत. इसलिए उसे हर कोई पसंद करता था. बचपन में जहां वह अपनी चंचलता की वजह से सब को प्यारी लगती थी, वहीं जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वह अपने व्यवहार से सब की आंखों का तारा बनी हुई थी. अपने मिलनसार स्वभाव की वजह से वह सब का मन मोह लेती थी. युवा जहां उस की सुंदरता के दीवाने थे, वहीं बड़ेबूढ़े उस के स्वभाव से खुश रहते थे. पढ़नेलिखने में भी वह तेज थी. उस ने जुबली इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी.

तसलीम के पड़ोस में तौसीफ अहमद रहता था. रिश्ते में वह उस का चचेरा भाई था. अपने पिता के साथ वह भी मीट का कारोबार करता था. तौसीफ दिखने में स्मार्ट था. रहता भी ठाटबाट से था. तसलीम और तौसीफ रिश्ते में चचेरे भाईबहन थे और हमउम्र थे, सो उन में खूब पटती थी. दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. दोनों परिवारों के बीच आपसी लगाव था और दुख की घड़ी में एकदूसरे की मदद को भी तत्पर रहते थे. ईद, बकरीद जैसे त्यौहार दोनों परिवार मिलजुल कर मनाते थे.

एकदूसरे के घर आतेजाते तसलीम और तौसीफ एकदूसरे को चाहने लगे. तसलीम खूबसूरत थी, तो तौसीफ भी कम सुंदर न था. वह कमाता भी था. इसलिए तसलीम भी तौसीफ को पसंद करने लगी थी. घर आतेजाते तसलीम भी मुसकराते हुए तिरछी निगाहों से तौसीफ अहमद को निहारने लगी थी. एक अजीब सा आकर्षण दोनों को एकदूसरे की ओर खींचने लगा. लेकिन नजरें बेईमान थीं. वे एकदूसरे को ढूंढती थीं, निहारती भी थीं. लेकिन पकड़े जाने पर अनजान बनने का नाटक करती थीं. धीरेधीरे स्थिति यह आ गई कि बिना एकदूजे को देखे चैन नहीं मिलता था. फिर भी व्यवहार ऐसा करते थे, जैसे उन्हें एकदूसरे से कोई मतलब नहीं.

छिपछिप कर देखने में ही दोनों एकदूसरे को हद से ज्यादा चाहने लगे. साथ ही बेहतर भविष्य बनाने के सपने भी संजोने लगे. मगर अपनेअपने दिल की बात कहने की हिम्मत दोनो में नहीं थी. तसलीम जहां नारी सुलभ लज्जा के कारण खामोश थी, तो वहीं तौसीफ अहमद यह सोच कर अपने प्यार का इजहार नहीं कर पा रहा था कि कहीं दिल की बात कहने पर तसलीम नाराज न हो जाए. गुजरते वक्त के साथ दोनों की मूक मोहब्बत परवान चढ़ती गई. तसलीम तौसीफ को अपने दिल की बात कहने के लिए उतावली थी. नजरों ही नजरों में बात कर लेने से तौसीफ का मन नहीं भरता था. वह चाहता था कि तसलीम से अपने दिल की बात कह कर मोहब्बत का इजहार करे. लेकिन इस के लिए वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

इश्क भला कब तक बेजुबान बना रह सकता था. आखिर तौसीफ के दिल ने उसे मजबूर कर ही दिया. उधर तसलीम का भी यही हाल था. वह सोच रही थी कि तौसीफ जब उस से मोहब्बत करता है तो जुबान पर क्यों नहीं ला पा रहा. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझे पसंद ही न करता हो. एक रोज तसलीम किसी काम से चाची के घर गई तो वह घर पर नहीं थीं. तौसीफ ही घर में था. उस ने पूछा, ‘‘चाची नहीं दिख रही हैं. बाहर गई हैं क्या?’’

‘‘हां, वे घर का सामान खरीदने हटिया बाजार गई हैं.’’

‘‘ठीक है, मैं शाम को आ जाऊंगी.’’ कहते हुए तसलीम मुड़ी, तभी तौसीफ सामने आ गया, ‘‘तसलीम, कुछ देर ठहरो. मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं.’’ तौसीफ बोला

‘‘कहो, क्या कहना चाहते हो?’’ तसलीम थोड़ा लजातेशरमाते बोली.

‘‘पहले वादा करो कि मेरी बात सुन कर नाराज नहीं होगी.’’ तौसीफ ने आग्रह किया.

‘‘ठीक है, किया वादा, अब बोलो क्या बात है?’’

‘‘तसलीम, मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है. तुम्हारे बगैर सब कुछ सूना सा लगता है. क्या तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह है? अगर हो, तो मेरी मोहब्बत कबूल कर लो.’’

‘‘तौसीफ तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये अल्फाज सुनने को कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपनी मोहब्बत जाहिर करने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि जितना प्यार मैं तुम से करती हूं, तुम शायद उस का आधा भी नहीं करते होगे. आई लव यू तौसीफ, आई लव यू वेरी मच.’’

इस तरह दोनों के बीच इजहारे मोहब्बत हो गया. इस के बाद तो जैसे उन की दुनिया ही बदल गई. दोनों एक साथ हाटबाजार जाने लगे, रमणीक स्थलों पर साथसाथ घूमने लगे. तौसीफ अहमद, तसलीम पर दिल खोल कर पैसा खर्च करने लगा. वह जो भी डिमांड करती, तौसीफ उसे हंसीखुशी से पूरा करता. बातचीत करने के लिए उस ने उसे महंगा मोबाइल फोन भी खरीद कर दे दिया था. हालांकि पहले से उस के पास मोबाइल था. एक दिन दोपहर बाद तौसीफ तसलीम के घर पहुंचा तो वह घर पर अकेली थी. अब्बू और भाई लोग दुकान पर थे. अम्मी घर का सामान खरीदने बाजार गई थी. अच्छा मौका देख तौसीफ ने तसलीम को अपनी बांहों में बांध कर उस की उन्मादी आंखों में झांका, तसलीम भी मना नहीं कर पाई.

तसलीम की मौन स्वीकृति मिलते ही तौसीफ बेकाबू हो गया. तसलीम भी नाजुक रिश्तों और सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर उस की बांहों में झूल गई. तसलीम ने कोई विरोध नहीं किया तो तौसीफ आगे ही बढ़ता चला गया. फिर दोनों अलग हुए तो उन के चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि के भाव थे. दोनों एक बार पाप के कुंए में कूदे, तो फिर उन का उस से बाहर निकलने का मन नहीं हुआ. गलत काम कितना भी छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन उजागर हो ही जाता है. धीरेधीरे तौसीफ और तसलीम के अवैध संबंधों को ले कर पासपड़ोस में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस बात की भनक तसलीम के भाई मोहम्मद जफर को लगी तो उस ने बहन को फटकार लगाई, साथ ही तौसीफ के साथ झगड़ा भी किया.

जफर ने बहन के बहकते कदमों की शिकायत अपने मातापिता से भी की. इस पर हाफिज मोहम्मद रईस तथा उस की बेगम वसीम बानो ने तसलीम को अपनी इज्जत का वास्ता दे कर समझाबुझा कर सही रास्ते पर लाने की बहुत कोशिश की, पर तसलीम के बहके कदम नहीं थमे. घर वालों की नसीहतों का तसलीम पर कोई असर नहीं हुआ. वह तौसीफ से अपने संबंध उसी तरह बनाए रही. अलबत्ता पोल खुल जाने के डर से वे दोनों कुछ सावधान जरूर रहने लगे थे. उन दोनों को सब से ज्यादा डर मोहम्मद जफर से रहता था. वही दोनों की ताकझांक में लगा रहता था. जिस दिन उसे पता चल जाता कि तौसीफ घर आया था, उस रोज वह तसलीम को खरीखोटी सुनाता तथा तौसीफ के साथ भी झगड़ा करता. उस ने उन दोनों को चेतावनी दे रखी थी कि जिस दिन वह दोनों को रंगेहाथ पकड़ लेगा उस दिन अनर्थ हो जाएगा.

मोहम्मद जफर की इस धमकी से तसलीम अपने भाई को अपने प्यार का रोड़ा समझने लगी थी, उस से मन ही मन नफरत करने लगी थी. तौसीफ अहमद भी मोहम्मद जफर को अपना दुश्मन समझने लगा था. वह भी अंदर ही अंदर उस से नफरत करने लगा था. जफर के कारण दोनों का मिलन नहीं हो पाता था. अत: दोनों के दिलों में नफरत की आग तीव्र होती गई. मार्च 2020 में कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ा तो देश मे तालाबंदी हो गई. कानपुर शहर भी लौकडाउन हो गया. शहर का मुसलिम बाहुल्य क्षेत्र कुली बाजार हाट स्पौट घोषित कर दिया गया.

पुलिस ने गलियों को सील कर दिया, जिस से लोगों को घरों में कैद हो कर रहना पड़ा. इस का असर तसलीम और तौसीफ पर भी पड़ा. उन का मिलन पूरी तरह बंद हो गया. मिलन न होने से दोनों बेचैन रहने लगे. हालांकि मोबाइल फोन पर बतिया कर दोनों अपने दिल की लगी बुझा लेते थे. 25 मई, 2020 को ईद का त्यौहार था. प्रशासन ने सशर्त छूट दी थी. ईद का त्यौहार धूमधाम से तो नहीं मनाया जा रहा था, लेकिन घरों में लोग आजा रहे थे. तौसीफ भी ईद मिलन के बहाने तसलीम के घर पहुंचा. उस वक्त तसलीम घर में अकेली थी. उस के दोनों भाई पतंग उड़ाने चले गए थे. जबकि अम्मीअब्बू पड़ोस में ईद मिलन को गए थे.

लगभग 2 महीने बाद आमनासामना हुआ तो दोनों एकदूसरे से लिपट गए. दोनों की आंखों में प्यार का सागर उमड़ पड़ा. इसी बीच तौसीफ की शारीरिक प्यास जाग उठी. उस ने सूना घर देख कर तसलीम से प्रणय निवेदन किया तो लजातेशरमाते तसलीम मान गई. इस के बाद दोनों बाथरूम जा पहुंचे और शारीरिक प्यास बुझाने लगे. हड़बड़ाहट में वे घर का मुख्य दरवाजा बंद करना भूल गए थे. तसलीम और तौसीफ अभी बाथरूम में शारीरिक प्यास बुझा ही रहे थे कि तसलीम का भाई मोहम्मद जफर आ गया. उस ने दोनों को बाथरूम में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. यह सब उस के लिए नाकाबिले बरदाश्त था. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. वह गालीगलौज करते हुए तौसीफ से भिड़ गया.

तसलीम और तौसीफ को लगा कि मोहम्मद जफर आज दोनों की पोल खोल देगा और झगड़ा भी करेगा. अत: दोनों ने एकदूसरे को इशारा किया और फिर तसलीम बकरा काटने वाली छुरी ले आई. उस ने छुरी तौसीफ को थमाई और बोली, ‘‘तौसीफ, आज इसे हलाल कर ही दो. जिंदा बच गया तो पोल खोल देगा और दोनों को बदनाम कर देगा.’’

बहन का यह रूप देख कर मोहम्मद जफर घबरा गया और जान बचा कर दरवाजे की ओर भागा. तभी सामने से तौसीफ का छोटा भाई सैफ आ गया. उस ने भाई के इशारे पर उसे पकड़ लिया. दोनों भाई उसे पकड़ कर बाथरूम ले आए और फर्श पर पटक दिया. सैफ ने पैर दबोचे और तसलीम ने उस के हाथ पकड़े. इस के बाद तौसीफ अहमद ने जफर की छाती पर सवार हो कर चाकू से उस का गला रेत दिया. जफर कुछ देर तड़प कर ठंडा हो गया. हत्या करने के बाद तौसीफ व उस का भाई सैफ घर से भाग पाते, उस के पहले ही हाफिज मोहम्मद रईस व उन की पत्नी वसीम बानो आ गई. घर के अंदर बाथरूम में जवान बेटे की खून से रंगी लाश देख कर दोनों अवाक रह गए. वसीम बानो ने बेटी से पूछताछ की तो उस ने साफसाफ बता दिया कि जफर ने उसे तौसीफ के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया था, हम ने उसे मार डाला.

यह सुनते ही दोनों ने माथा पीट लिया. वे सोचने लगे बेटा तो मर ही गया है. अब पुलिस से सच्चाई बयां की तो परिवार के 2 बेटों के साथ बेटी भी जेल चली जाएगी. उन लोगों ने मोहम्मद जफर की हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए जफर के शव को सबमर्सिबल पंप चला कर लाश को तब तक धोया जब तक गले के घाव से रिस रहा खून बंद नहीं हो गया. उस के बाद शव को दूसरे बाथरूम में रख दिया. सारे सबूतों को मिटाने के बाद हाफिज मोहम्मद रईस ने थाना अनवरगंज पुलिस को अवसाद के चलते बेटे जफर द्वारा आत्महत्या की सूचना दी. पुलिस ने घर वालों की बात पर विश्वास कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पुलिस को हत्या का शक हुआ. दोबारा जांच शुरू की तो हत्या का परदाफाश हो गया और कातिल पकड़े गए.

30 मई, 2020 को थाना अनवरगंज पुलिस ने अभियुक्त तौसीफ अहमद, सैफ, हाफिज मोहम्मद रईस, वसीम बानो तथा तसलीम को कानपुर कोर्ट में पेश किया. जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Family Dispute : पत्नी ने साजिश रचकर पति को गोली से मरवाया

Family Dispute : राजनीति में पैसा भी है और पावर भी, लेकिन इन चीजों को पचाना सब के बस की बात नहीं होती. रणजीत जमीन से उठ कर एक खास मुकाम तक भी पहुंच गया और 2-2 महिलाओं से शादी भी रचा ली, लेकिन उस ने सोचा भी नहीं होगा कि…

बात सन 2000 की है. गोरखपुर के कैंट थाना क्षेत्र इलाके के चेतना तिराहे पर एक नुक्कड़ नाटक चल रहा था. नाटक के कलाकार ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे. ये लोग देशभक्ति से ओतप्रोत नाटक का मंचन करते हुए लोगों को जागरूक कर रहे थे. सामान्य कदकाठी और गेहुंआ रंग का एक युवक नाटक का निर्देशन कर रहा था. वही कलाकारों का लीडर था. उस का नाम था रणजीत कुमार श्रीवास्तव उर्फ रणजीत बच्चन. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से प्रेरित हो कर रणजीत ने अपने नाम के आगे बच्चन शब्द जोड़ लिया था. दरअसल, रणजीत रंगमंच का एक उम्दा कलाकार था. कला की दुनिया में वह नाम कमाना चाहता था, इसलिए सतत प्रयासरत था.

‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे सुन कर एक युवती के पांव थम से गए. उसे नाटक इतना भाया कि वह नाटक खत्म होने तक वहीं जमी रही. वह युवती पूर्वांचल मैराथन की प्रथम विजेता कालिंदी शर्मा थी, जो मूलरूप से कुशीनगर जिले के थाना नेबुआ में आने वाले भंडार बिंदौलिया की रहने वाली थी. उस वक्त वह गोरखपुर के शाहपुर इलाके के असुरन चौक के पास अपने मातापिता और 5 बहनों के साथ रह रही थी. नुक्कड़ नाटक के समापन के बाद कालिंदी ने कलाकारों से पूछा कि तुम्हारा लीडर कौन है? उन में से एक कलाकार ने रणजीत बच्चन की ओर इशारा कर के बताया कि वही हमारे लीडर हैं. नाटक का मंचन उन्हीं के निर्देशन में होता है.

कालिंदी शर्मा ने रणजीत बच्चन से मुलाकात की और अपने बारे में बताया. कालिंदी का परिचय जान कर रणजीत काफी प्रभावित हुआ. इस मुलाकात के बाद दोनों में दोस्ती हो गई. दरअसल, कालिंदी की चाहत थी कि वह देश के लिए कुछ करे. रणजीत की सोच भी यही थी कि वह कुछ ऐसा करे, जिस से उस का नाम हो. दोनों की एक ही सोच थी, कुछ बड़ा करने की. अब तक दोनों अलगअलग थे. दोनों की सोच एक जैसी निकली तो दोनों की दिशाएं एक हो गईं. इसी बीच कालिंदी के जीवन के साथ एक नया कीर्तिमान जुड़ गया था. मैराथन दौड़ में प्रथम आने के आधार पर उसे नेहरू युवा केंद्र के सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु 2 साल के लिए एनएसबी सदस्य बना दिया गया था. संस्थान की ओर से उसे समाज को जागरूक करने वाले कुछ कार्यक्रम करने को कहा गया था, उस में नुक्कड़ नाटक का भी कराया जाना था. विषय था सारक्षरता.

कालिंदी ने रणजीत के साथ मिल कर नाटक का प्रस्तुतीकरण कराया जिस से लोग काफी प्रभावित हुए. कालिंदी के इस काम से संस्थान के निदेशक खुश हुए. इस मंचन के बाद से कालिंदी के दिल में रणजीत के लिए सौफ्ट कौर्नर बन गया, कह सकते हैं कि वह रणजीत को चाहने लगी थी. 40 वर्षीया कालिंदी शर्मा 5 बहनों में सबसे बड़ी थी. उस के पिता परमात्मा शर्मा प्राइवेट नौकरी करते थे. उन की आमदनी बहुत कम थी. उसी से परिवार के भरणपोषण के साथसाथ बेटियों की पढ़ाई का खर्चा भी होता था. कालिंदी परमात्मा शर्मा की सब से बड़ी संतान थी. कालिंदी ने अपनी लगन और परिश्रम की बदौलत समाजशास्त्र से परास्नातक की डिग्री ली.

करीब 45 वर्षीय रणजीत कुमार श्रीवास्तव उर्फ रणजीत बच्चन मूलरूप से गोरखपुर के गोला थाना क्षेत्र के अहिरौली लाला टोला का रहने वाला था. उस के पिता ताराशंकर श्रीवास्तव सिंचाई विभाग में ट्यूबवेल आपरेटर थे. कहने को तो ताराशंकर मूलरूप से अहिरौली गांव के निवासी थे, लेकिन 4 दशक पहले उन्होंने अपना गांव छोड़ दिया था. वह परिवार सहित गोरखपुर आ कर बस गए थे. 20 साल पहले सन 2000 में ताराशंकर की मृत्यु हो गई थी. पिता की मृत्यु के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी तीसरे बेटे रघुवंश कुमार श्रीवास्तव के कंधों पर आ गई थी. बाद में उन के 2 बड़े बेटों पप्पू और राजेश की भी बीमारी से मौत हो गई. रघुवंश अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम देते रहे.

ताराशंकर की सभी संतानों में सब से कुशाग्र बुद्धि वाला उन का सब से छोटा बेटा रणजीत था. उस में कुछ नया करने की जिजीविषा रहती थी. होश संभालने के बाद जब वह कुछ समझदार हुआ तो बड़ा हो कर फिल्मी दुनिया में जाने की सोचने लगा. रणजीत गांव के कुछ युवकों की टोली बना कर नुक्कड़ नाटक किया करता था. इसी नुक्कड़ नाटक के जरिए उस की मुलाकात कालिंदी से हुई. सन 2002 के जनवरी में कालिंदी के मन में एक योजना आई. ॒यह योजना थी साइकिल यात्रा से देश में शांति का संदेश फैलाना. कालिंदी ने यह बात रणजीत को बताई तो वह खुश हुआ. रणजीत ने कालिंदी की साइकिल यात्रा पर मुहर लगा दी. रणजीत बच्चन ने कालिंदी सहित अपनी नाटक मंडली के 16 सदस्यों सहित यात्रा की तैयारी कर ली. टीम का नेतृत्व उस ने अपने हाथों में ले लिया.

4 फरवरी, 2002 को रणजीत बच्चन के नेतृत्व में साइकिल से भारत भ्रमण यात्रा शुरू हुई. आखिरी समय में सिर्फ कालिंदी और रणजीत बच्चन ही बचे रहे. 7 साल 10 महीने 14 दिन में दोनों ने भारत, नेपाल और भूटान सहित साइकिल से 1 लाख 32 हजार किलोमीटर की यात्रा तय कर के एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था. इस उपलब्धि के लिए लिम्का बुक औफ रिकौर्ड्स में दोनों के नाम दर्ज हुए. इसी यात्रा के दौरान फरवरी, 2005 में कालिंदी और रणजीत बच्चन ने महाराष्ट्र के नासिक में एक मंदिर में गंधर्व विवाह कर लिया था. लेकिन दोनों ने अपने प्रेम विवाह को घरपरिवार और समाज से छिपा कर रखा. फिर जब बात खुली तो 9 साल बाद 31 मार्च, 2014 को परिवार वालों ने इस शादी पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी.

साइकिल यात्रा के दौरान सरकार और लोगों से काफी पैसा मिला था. उन पैसों से रणजीत ने गोरखपुर के गुलरिहा थानाक्षेत्र के पतरका टोला में अपने नाम से एक जमीन खरीद ली. उस जमीन पर रणजीत अपनी मां के नाम पर कौशल्या देवी वृद्ध एवं अनाथ आश्रम खोलना चाहता था. योजना पर काम भी शुरू किया गया, लेकिन यह योजना पूरी हो पाती, इस से पहले ही उस की हत्या हो गई. नुक्कड़ नाटकों से न तो कोई मुकाम मिलने वाला था और न ही दौलत. रणजीत यह बात समझ गया था. फलस्वरूप उस ने अपनी दिशा बदल दी, लेकिन लक्ष्य वही रहा. उन दिनों प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी.

सत्ताधारी दल के साथ रहना मुफीद था, इसलिए रणजीत ने जुगाड़ लगा कर बसपा की सदस्यता ग्रहण कर ली. लेकिन उस ने जो सोचा था, वह नहीं हो सका. इस पर रणजीत ने बसपा छोड़ कर समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली. सन 2013 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होने वाला था. साइकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव चिह्न है. चुनाव में रणजीत ने कालिंदी के साथ मिल कर साइकिल यात्रा के जरिए सपा के लिए खूब प्रचार किया, जिस का परिणाम सकारात्मक निकला. चर्चा में बने रहने के लिए रणजीत कुछ न कुछ करता रहता था. इस के लिए वह कभी महापुरुषों की प्रतिमा सफाई अभियान, कभी इंसेफेलाइटिस जागरूकता तो कभी पल्स पोलियो अभियान चलाता रहता था. शोहरत हासिल करने के लिए उस ने पानी पर साइकिल तक चलाई थी, लेकिन उसे मनचाहा मुकाम नहीं मिला.

रणजीत बच्चन का सितारा उस समय बुलंदियों पर पहुंच गया, जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी थी. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने पर रणजीत को काफी महत्व मिला. उसे राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया गया. रणजीत और कालिंदी के काम से खुश हो कर अखिलेश यादव ने दोनों को 5-5 लाख का पुरस्कार भी दिया. रणजीत ने कालिंदी के हिस्से के भी पैसे खुद रख लिए थे. इस के बाद दोनों ने लखनऊ की ओसीआर बिल्डिंग के बी-ब्लौक के फ्लैट नंबर 604 आवंटित करा लिए था. राज्यमंत्री का दर्जा मिलने के बाद रणजीत बच्चन के शौक भी बढ़ गए थे. बाइक से चलने वाले रणजीत ने अब कार लेने का मन बना लिया था. नवंबर, 2014 के अंतिम सप्ताह में रणजीत ने ओएलएक्स पर एक एक्सयूवी कार देखी. कार उसे पसंद आ गई. वह कार लखनऊ के संजय श्रीवास्तव के नाम पर रजिस्टर्ड थी.

जय श्रीवास्तव की बेटी स्मृति वर्मा ने कार बेचने के लिए ओएलएक्स साइट पर डाल रखी थी. स्मृति वर्मा लखनऊ की विकास नगर कालोनी के आवास संख्या- 2/625 में रहती थी. साइट पर कार के साथ स्मृति का फोन नंबर भी था. बातचीत के बाद सौदा पक्का हो गया तो 27 नवंबर को रणजीत दोस्तों के साथ वाहन की डिलिवरी लेने लखनऊ स्थित स्मृति के घर विकास नगर पहुंच गया. रणजीत बच्चन ने जब दूधिया रंगत वाली बला की खूबसूरत स्मृति को देखा तो उसे अपलक देखता रह गया. एक ही नजर में स्मृति रणजीत की आंखों के रास्ते उस के दिल में उतर गई. उस ने तय कर लिया कि सौदा चाहे कितना भी मंहगा हो, तय कर के ही रहेगा. पेशगी के तौर पर रणजीत ने स्मृति को साढ़े 4 लाख रुपए नकद दे दिए. बाकी के रुपए कागजात हैंडओवर होने के बाद देना तय हुआ. इस पर स्मृति मान गई तो वह कार ले कर गोरखपुर आ गया.

इस के बाद स्मृति और रणजीत के बीच मोबाइल पर बातचीत होने लगी. बातोंबातों में रणजीत को पता चला कि स्मृति पिता के स्थान पर कोषागार विभाग में कनिष्ठ लेखाकार है. रणजीत ने जब से स्मृति को देखा था, उस का दिन का चैन और रात की नींद उड़ गई थी. उस के दिमाग में एक ही बात उछलकूद मचा रही थी कि चाहे जैसे भी हो, स्मृति को अपना बना ले. इस के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार था. जिन दिनों की यह बात है उन दिनों कालिंदी रणजीत के बच्चे की मां बनने वाली थी. लेकिन उसे इस की कोई परवाह नहीं थी. वह पूरी तरह से स्मृति के प्यार के रंग में डूब चुका था. इसी चक्कर में उस ने स्मृति से खुद को कुंवारा बताया था. उस ने अपनी लच्छेदार बातों से स्मृति के चारों ओर सम्मोहन का ऐसा जाल फैला दिया कि वह उसी जाल में घिर गई. रणजीत स्मृति से प्रेम करने लगा था, स्मृति भी उस से प्यार करती थी.

स्मृति वर्मा का रणजीत की ओर झुकाव तब हुआ, जब उसे पता चला कि सत्ता के गलियारे में उस की पहुंच बहुत ऊपर तक है. इतना ही नहीं, वह दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री है. प्रदेश सरकार में उस की अच्छी धाक है. रणजीत ने स्मृति के घर आनाजाना शुरू कर दिया था. बराबर आनेजाने से रणजीत ने स्मृति के अतीत के पन्नों को पढ़ लिया था, जिन में उस के जीवन के पन्नों पर कई दुख भरी कहानियां लिखी हुई थीं. राजधानी लखनऊ के विकासनगर में नायब तहसीलदार संजय श्रीवास्तव परिवार सहित रहते थे. पत्नी शोभना और 3 बच्चों में 2 बेटियां थीं, श्रुति और स्मृति और एक बेटा शिवांश. शोभना के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. सफेद दाग की वजह से संजय पत्नी को पसंद नहीं करते थे.

उन्होंने शोभना को तलाक दे दिया था. शोभना के पास 3 बच्चे थे. तीनों के पालनपोषण की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी. ऐसे में वह क्या करती, बच्चों को ले कर कहां जाती. तलाक के बावजूद शोभना बच्चों के साथ पति के ही घर में रहती थी. नायब तहसीलदार संजय श्रीवास्तव के घर में तलाकशुदा शोभना भी रह रही थी, लेकिन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं था. बाद में संजय श्रीवास्तव ने कानपुर की रहने वाली एक दूसरी महिला से शादी कर ली. उन्होंने शादी तो कर ली, लेकिन पत्नी को अपने घर नहीं ला सके. बच्चों और शोभना के दबाव के चलते संजय का जीवन रेत के महल सा हो गया था. इसलिए दूसरी पत्नी अकसर कानपुर में ही रहती रही.

पहली पत्नी शोभना के तीनों बच्चे धीरेधीरे बड़े होते रहे. इन में दूसरे नंबर की बेटी स्मृति खूबसूरत और जहीन थी. बात सन 2013 की है. नायब तहसीलदार संजय की बड़ी बेटी श्रुति अपने प्रेमी के साथ घर से अचानक भाग गई. बेटी के इस घिनौने कदम से संजय श्रीवास्तव की समाज में बहुत बदनामी हुई. बेटी की इस करतूत से बुरी तरह आहत तहसीलदार श्रीवास्तव ने सारी संपत्तियों की पावर औफ अटार्नी छोटी बेटी स्मृति के नाम कर दी ताकि उन के न रहने पर वह संपत्ति की देखभाल कर सके. आननफानन में तहसीलदार संजय ने स्मृति की शादी लखनऊ के एक बैंक मैनेजर के साथ तय कर दी थी.

तिलक की रस्म भी पूरी हो गई थी. चढ़ावे में नकदी और लाखों रुपए के कीमती गहने चढ़ाए गए. घर में शादी की जोरशोर से तैयारियां चल रही थीं, अचानक एक दुखद हादसे ने बहुत कुछ बदल दिया. तिलक की रस्म के कुछ दिनों बाद की बात है. रात का समय था. संजय श्रीवास्तव अपनी छत पर टहल रहे थे. अचानक वह रहस्यमय तरीके से छत से नीचे सड़क पर जा गिरे. सिर में आई गंभीर चोट की वजह से मौके पर ही उन की मौत हो गई. वह छत से कैसे गिरे, यह रहस्य आज भी बरकरार है. जहां खुशियां होनी चाहिए थीं, वहां मातम छा गया. पिता की मौत के बाद स्मृति की शादी टूट गई. लाखों रुपए नकद और लाखों के जेवरात ससुराल में फंसे रह गए. स्मृति के ससुराल वालों ने पैसे और जेवर लौटाने से मना कर दिया.

स्मृति के सामने ससुराल वालों से सामान वापस लेना चुनौती थी. ऐसे में रणजीत बच्चन स्मृति से टकरा गया. दोनों के बीच जब नजदीकियां बढ़ीं तो स्मृति ने अपनी आपबीती रणजीत से बता कर ससुराल से नकदी और गहने वापस दिलवाने की पेशकश की. उस ने यह भी कह दिया था कि जिस दिन वह गहने और नकदी दिलवा देगा उसी दिन वह उस की हो जाएगी. रणजीत के लिए स्मृति की शर्त जीतना कोई बड़ी बात नहीं थी. क्योंकि उस पास साम, दाम, दंड, भेद चारों शस्त्र थे, इसलिए थोड़ी चुनौतियों का सामना करते हुए उस ने स्मृति की ससुराल जा कर चारों शस्त्र आजमाए. भले ही जबरदस्ती सही, लेकिन उस ने नकदी और जेवरात वसूल कर स्मृति की झोली में डाल दिए.

रणजीत की इस दबंगई से खुश हो कर स्मृति ने उस से शादी करने के लिए हामी भर दी. आखिर 18 जनवरी, 2015 को रणजीत और स्मृति ने मंदिर में जा कर शादी कर ली. रणजीत ने यह राज पहली पत्नी कालिंदी से छिपाए रखा. रणजीत द्वारा स्मृति से शादी करने के 3 दिनों बाद 21 जनवरी को कालिंदी ने बेटे को जन्म दिया. कालिंदी के मां बनने की जानकारी मिलने के बाद भी रणजीत पत्नी को देखने हौस्पिटल तक नहीं आया. लेकिन रणजीत की सच्चाई न तो पहली पत्नी कालिंदी से छिप सकी और न ही दूसरी पत्नी स्मृति वर्मा से.

कालिंदी को जब रणजीत की दूसरी शादी की बात पता चली तो उस के पैरों तले से मानो जमीन ही खिसक गई. उसे रणजीत से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि जिस रणजीत के लिए उस ने अपने घर वालों से बगावत कर उसे अपना जीवन सौंप दिया था, वही हमसफर सितमगर निकलेगा. जब यह बात दूसरी पत्नी स्मृति को पता चली कि रणजीत पहले से ही शादीशुदा है तो उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. रणजीत ने उसे धोखा दिया था. उस ने एक साथ कई जिंदगियां दांव पर लगा दी थीं. पति की सच्चाई सामने आने के बाद स्मृति उसे छोड़ कर विकासनगर वापस लौट आई. उसे नाराज देख रणजीत के हाथपांव ठंडे पड़ गए.

स्मृति से रणजीत इतना प्यार करता था कि उस की जुदाई एक पल के लिए बर्दाश्त नहीं कर सकता था, वह सच्चाई जान कर उस से नाराज हो कर गई थी इसलिए रणजीत ने स्मृति को मनाने के लिए जमीनआसमान एक कर दिया. खैर, पहली पत्नी कालिंदी चुप बैठने वालों में से नहीं थी. पति के धोखा देने के एवज में उस ने रणजीत के खिलाफ गोरखपुर महिला थाने में एक तहरीर दी. कालिंदी के उठाए कड़े कदम से रणजीत की त्यौरियां चढ़ गईं. दोनों के प्यार ने अब नफरत और दुश्मनी का रंग ले लिया.

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि जहां देखो हत्या कर दो. कालिंदी अपनी और बच्चे की जान बचाने के लिए यहांवहां छिपती रही. जान का दुश्मन बना रणजीत कालिंदी को नहीं ढूंढ पाया. कालिंदी भागतेभागते थक चुकी थी. वह जानती थी कि रणजीत से जीत पाना आसान नहीं है. आखिर उस ने रणजीत के सामने घुटने टेक दिए. इस का सब से बड़ा कारण यह था कि उस के मायके वालों ने उस का साथ देना छोड़ दिया था. वे रणजीत की करतूतों से बेहद नाराज थे. ऐसे में कालिंदी के सामने एक ही सहारा बचा था, रणजीत के पास वापस लौटने का. आखिरकार कालिंदी बेटे आदित्य को ले कर रणजीत के पास लखनऊ आ गई, रणजीत ने भी सारे गिलेशिकवे भुला कर उसे माफ कर दिया.

कहते हैं एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं. सच भी यही है. कालिंदी के ओसीआर आते ही स्मृति ने रणजीत से दूरी बना ली. स्मृति से दूरियां रणजीत से सहन नहीं हो रही थीं. स्मृति की दूरियों से खुन्नस खाया रणजीत कालिंदी पर अपनी मर्दानगी और जुल्म की कहानी लातघूंसों से लिखता था और मोबाइल का स्पीकर औन कर के स्मृति को सुनाता था. वह यह दिखाने की कोशिश करता था कि वो उसे कितना प्यार करता है, इसी से अंदाजा लगा सकती है. जबकि बेटे की खातिर कालिंदी पति के जुल्मों को सह कर भी उफ तक नहीं करती थी.

कालिंदी पर एक और आपदा तब टूटी जब 2017 में उस के ढाई साल के बेटे आदित्य की मृत्यु हो गई. बेटे की मौत से कालिंदी ही नहीं रणजीत भी बुरी तरह से टूट गया. इस घटना के बाद से रणजीत का झुकाव अध्यात्म की तरफ हो गया और वह एक वस्त्र (गेरुआ वस्त्र) धारण करने लगा. इस दौरान वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापक चक्रपाणि महाराज के संपर्क में आया और संगठन का प्रदेश अध्यक्ष बन गया. बाद में रणजीत बच्चन ने अपना खुद का संगठन ‘विश्व हिंदू महासभा’ बनाया और खुद को उस का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया. कालिंदी उस की सहयोगी रही.

हिंदूवादी नेता की छवि बनाने के लिए वह भगवा कपड़े पहनने लगा. विभिन्न मंचों से हिंदुत्व पर बेबाक टिप्पणी करने लगा, जिस से उसकी छवि हिंदू नेता के रूप में उभरने लगी. अतिमहत्त्वाकांक्षी रणजीत का संगठन चल निकला. धीरेधीरे बेटे की मौत को वह भूलने लगा था. अब भी वह स्मृति की याद में पागल था. जबकि स्मृति उस से दूर हो चली थी. उस के जीवन में दूसरा पुरुष आ गया था, जिस का नाम दीपेंद्र सिंह था. सन 2017 में अमर नगर रायबरेली निवासी दीपेंद्र की स्मृति से मुलाकात उस के दफ्तर में हुई थी. वह किसी आवश्यक काम से वहां आया था. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें होती रहीं. दोनों पहले दोस्त, फिर दोस्त से प्रेमी बन गए. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे थे और शादी करना चाहते थे.

रणजीत से छुटकारा पाने के लिए स्मृति ने अदालत में तलाक की अर्जी दाखिल कर दी थी. रणजीत ने स्मृति को तलाक देने से साफ इनकार कर दिया था. वह जान चुका था कि स्मृति दीपेंद्र से प्यार करने लगी है. रणजीत ने खुले तौर पर स्मृति को धमकी दी कि वह दीपेंद्र का साथ छोड़ दे अन्यथा इसका अंजाम बहुत बुरा होगा. रणजीत के धमकाने का स्मृति पर कोई असर नहीं हुआ था. बावजूद इस के वह खुलकर दीपेंद्र से मिलती रही. यह बात रणजीत से सहन नहीं हो पा रही थी. दीपेंद्र को ले कर रणजीत और स्मृति के बीच विवाद बढ़ता गया. रणजीत स्मृति के पीछे जितनी तेज भागता गया, स्मृति उतनी ही तेजी से दीपेंद्र के पास आती गई. जबकि कालिंदी रणजीत के पीछे भाग रही थी.

बात 18 जनवरी, 2020 की है. उस दिन रणजीत और स्मृति की शादी की सालगिरह थी. लखनऊ के एक बड़े होटल में रणजीत ने दिन में एक पार्टी का आयोजन किया था. उस ने खासतौर पर स्मृति को आने के लिए आमंत्रित किया था. पार्टी में बड़ेबड़े लोग आए थे. समय बीत जाने के बाद भी स्मृति वहां नहीं पहुंची, तो रणजीत ने खुद को अपमानित महसूस किया. उसे स्मृति पर गुस्सा भी आया. उस ने मन ही मन स्मृति को सबक सिखाने की ठान ली. जैसेतैसे पार्टी खत्म कर के वह स्मृति के घर जा पहुंचा. संयोग से उस की मुलाकात घर पर ही हो गई. स्मृति को देखते ही रणजीत का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने आव देखा न ताव, गुस्से से तमतमाते हुए स्मृति के गालों पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया.

थप्पड़ इतना जोरदार था कि उसे दिन में तारे नजर आने लगे. उसे सावधान करते हुए रणजीत ने दीपेंद्र का साथ छोड़ने के लिए हिदायत दी और वापस लौट आया. रणजीत का यह थप्पड़ स्मृति को काफी नागवार गुजरा. उस ने यह बात दीपेंद्र से बताई और रणजीत को सदा के लिए रास्ते से हटाने का दबाव बनाया. दीपेंद्र स्मृति से टूट कर प्यार करता था. उस ने इस काम के लिए हामी भर दी. दीपेंद्र ने इस के लिए अपने चचेरे भाई जितेंद्र की मदद ली. जितेंद्र मनबढ़ किस्म का युवक था. उस के खिलाफ रायबरेली के कई थानों में गंभीर और संगीन आपराधिक मुकदमे दर्ज थे. जितेंद्र तैयार हो गया.

योजना बनने के बाद 29 जनवरी, 2020 को दीपेंद्र चचेरे भाई जितेंद्र को साथ ले कर अपनी गाड़ी से रायबरेली से लखनऊ पहुंचा और 3 दिनों तक शहर में रह कर उस ने रणजीत की रेकी की. वह घर से कब निकलता है, कब घर लौटता है. घर से निकलते समय उस के साथ कौनकौन होता है, वगैरह. दीपेंद्र और जितेंद्र ने 3 दिनों तक रेकी कर के रणजीत की पूरी कुंडली तैयार कर ली और रायबरेली लौट आए. 1 फरवरी, 2020 की रात दीपेंद्र और उस का भाई जितेंद्र ड्राइवर संजीत के साथ बोलेनो कार से लखनऊ आ कर एक होटल में ठहर गए.

2 फरवरी की सुबह साढ़े 5 बजे डेली रूटीन के तहत सब से पहले घर से कालिंदी मौर्निंग वाक के लिए निकली. उस के 2-4 मिनट के अंतराल पर रणजीत अपने पुराने परिचित और गोरखपुर निवासी आदित्य कुमार श्रीवास्तव उर्फ सोनू के साथ निकला. आदित्य कुछ दिन पहले एक ठेके के संबंध में रणजीत से मिलने आया था. रणजीत ने उसे वाक पर साथ चलने के लिए कहा, तो वह साथ हो गया. कालिंदी आगेआगे दौड़ती हुई जा रही थी और पीछे मुड़मुड़ कर देख रही थी कि रणजीत कहां तक पंहुचे. कालिंदी पहली बार ग्लोब पार्क की ओर निकली थी. रणजीत और आदित्य जब पार्क की ओर आते दिखे तो उस ने उन्हें हाथ हिला कर इशारा किया कि वह आगे बढ़ रही है.

कालिंदी दयानिधान पार्क की ओर दौड़ती हुई चली गई, जहां वह अक्सर जाया करती थी. इधर हजरतगंज चौराहे के पास दीपेंद्र कार से उतर गया. जितेंद्र थोड़ी दूर स्थित कैपिटल सिनेमा के पास उतरा और वहीं खड़ा हो गया. रणजीत आदित्य के साथ ओसीआर से निकल कर सीडीआरआई जा रहा था. उसी वक्त जितेंद्र ने उस का पीछा करना शुरू कर दिया था. वह शाल से अपना चेहरा ढके हुए था. जैसे ही दोनों ग्लोब पार्क के पास पहुंचे, जितेंद्र फुरती के साथ आगे बढ़ा और पिस्टल निकाल कर रणजीत पर तान दिया. उस ने दोनों से मोबाइल फोन मांगा तो रणजीत और आदित्य ने कोई मोबाइल चोर समझ कर अपनेअपने फोन उस की ओर बढ़ा दिए. जितेंद्र ने दोनों के फोन अपने कब्जे में कर लिए.

रणजीत और आदित्य कुछ समझ पाते, तब तक जितेंद्र ने रणजीत को लक्ष्य बना कर उस के सिर में .32 बोर की गोली मार दी. गोली लगते ही रणजीत वहीं जमीन पर गिर पड़ा. यह देख आदित्य अपनी जान बचा कर वहां से भागा, तो जितेंद्र ने उसे भी गोली मार दी. यह संयोग ही था कि गोली उस के बाएं हाथ में लगी. गोली मारने के बाद जितेंद्र वहां से भाग निकला और दीपेंद्र के पास जा पहुंचा. दीपेंद्र उस का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस ने बताया कि काम हो गया है. फिर उसी कार में सवार हो कर दोनों रायबरेली चले गए.

उसी दिन शाम को दीपेंद्र और जितेंद्र रायबरेली से इलाहाबाद पहुंचे. वहां से दोनों मुंबई भाग गए. बीच रास्ते में दीपेंद्र ने स्मृति को मैसेज कर के बता दिया था कि काम हो गया. यह सुन कर वह खुश हो गई. गोली से घायल आदित्य श्रीवास्तव की तहरीर पर हजरतगंज पुलिस ने भारतीय दंड विधान की धारा 302, 307 के तहत अज्ञात बदमाशों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. लखनऊ के पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय ने घटना का खुलासा करने के लिए 8 टीमें गठित कर दीं.

जांच की दिशा जर, जमीन और जोरू को ले कर तय की गई थी. पुलिस ने पहली पत्नी कालिंदी से पूछताछ शुरू की. कालिंदी से हुई पूछताछ से पता चला कि रणजीत ने दूसरी शादी विकास नगर सेक्टर-2/625 की रहने वाली स्मृति वर्मा से की थी. तकरीबन 4 दिनों की छानबीन के बाद पुलिस का पुख्ता शक दूसरी पत्नी स्मृति वर्मा पर जा टिका. पुलिस ने स्मृति को हिरासत में ले कर उस से कड़ाई से पूछताछ की, तो वह टूट गई और पूरी कहानी पुलिस को बता दी. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि रणजीत की हत्या उसी ने अपने प्रेमी दीपेंद्र से मिल कर कराई थी.

पूछताछ में उस ने दीपेंद्र के मुंबई चले जाने की बात बताई. उसी दिन हजरतगंज पुलिस टीम फ्लाइट से मुंबई पहुंची और वहां से दीपेंद्र को गिरफ्तार कर के लखनऊ ले आई. पता नहीं कैसे शूटर जितेंद्र को पुलिस के आने की भनक लग गई थी और वह वहां से फरार हो गया था. 6 फरवरी, 2020 को पुलिस ने रणजीत हत्याकांड के 3 आरोपियों— स्मृति वर्मा प्रेमी दीपेंद्र और ड्राइवर संजीत को गिरफ्तार कर लिया. कमिश्नर सुजीत पांडेय ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के घटना का खुलासा किया. 3 दिन बाद पुलिस मुठभेड़ के बाद हजरतगंज में शूटर जितेंद्र को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

कथा लिखे जाने तक चारों आरोपी जेल में थे. पुलिस ने अज्ञात की जगह चारों आरोपियों स्मृति बच्चन उर्फ स्मृति वर्मा, दीपेंद्र, शूटर जितेंद्र और चालक संजीत को नामजद कर दिया था. यही नहीं, धारा 302, 307 के साथसाथ केस में धारा 120बी और 7 सीएलए की धाराएं भी जोड़ दी थी. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने आरोपियों से रणजीत और आदित्य के मोबाइल फोन बरामद कर लिए थे.

—कथा वादी आदित्य, रणजीत की पहली पत्नी कालिंदी और पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Agra News : बेटे की शादी के रास्ते में मां बनी बाधा तो तकिए से मुंह दबाकर की हत्या

Agra News : पति की मौत के बाद लक्ष्मी देवी ने ही अपने एकलौते बेटे शिवम की परवरिश की थी. इस के बाद शिवम को पड़ोस में रहने वाली रानी से प्यार ही नहीं हुआ, बल्कि दोनों ने आर्यसमाज मंदिर में शादी भी कर ली. फिर ऐसा क्या हुआ कि शिवम को रानी के सामने ही अपनी मां की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा…

जब किसी को किसी से प्यार हो जाए, तो उस की हालत अजीब हो जाती है. सोतेजागते उस का ही खयाल, उस के ही सपने आते हैं. सीने में अजीब सी आग भरी होने का अहसास होता है. इतना ही नहीं, आंखों और नींद में रार मच जाती है. प्रेम दीवानी रानी का यही हाल था. जब तक वह अपने प्रेमी शिवम शर्मा को देख न लेती तब तक बेचैनी उसे सताती रहती थी. शिवम कहीं दूर नहीं रानी के घर के पास ही रहता था. बचपन से रानी उसे देखती आ रही थी. उस के प्रति मन में कभी किसी प्रकार की भावना नहीं आई थी. मोहल्ले में जैसे सब रहते थे, वैसे ही शिवम रहता था.

शिवम का थोड़ा महत्त्व इसलिए था कि दूसरे लोगों के मकान कुछ फासले पर थे, जबकि शिवम रानी के घर के पास ही रहता था. प्यार के लिए मुद्दत के इंतजार की जरूरत नहीं होती. यह तो कुदरत की वह नेमत है, जो किसी भी पल इंसान को मिल जाती है. गर्मियों की एक सुबह की बात है. कहीं जाने के लिए शिवम रानी के घर के सामने से गुजर रहा था. उस वक्त उस के जेहन में कल्पना तक नहीं थी कि कुछ क्षणों बाद उस के जीवन में एक नया मोड़ आने वाला है. गरमी के मौसम में लू चलने के कारण धूल बहुत उड़ती है. इसीलिए लोग घरों के सामने पानी की छिड़काव कर देते हैं, ताकि धूल न उड़े.

उस सुबह रानी भी पानी से भरी बाल्टी ले कर अपने घर के सामने छिड़काव करने के लिए दरवाजे पर आई. वह यह नहीं देख पाई कि सामने से शिवम निकल रहा है. उस ने बाल्टी के पानी से मग भरा और दरवाजे से बाहर फेंक दिया. फेंका गया पानी शिवम पर गिरा. कुछ पल के लिए वह चौंक गया और उस के पैर जहां के तहां ठिठक गए. रानी भी उसे देखती रह गई. मन में वह सोच रही थी कि यह उस से क्या हो गया. शिवम न जाने कहां जा रहा था, उस की एक गलती से उस के कपड़े भीग गए. शिवम अब उसे बहुत डांटेगा. रानी हैरान तब हुई, जब शिवम ने अपने गीले कपड़े झटके और रानी की आंखों में देख कर मुसकराने लगा. शिवम की मुसकराहट ने रानी के डर को दूर कर दिया, वह बोली, ‘‘मैं ने तुम्हें आते नहीं देखा था, गलती से पानी फेंक दिया, माफ  कर दो.’’

‘‘गरमी के इस मौसम में ठंडा पानी मन को तरावट देता है. थोड़ी देर के लिए ही सही, ताजगी और तरावट का मजा आ गया,’’ शिवम हंसने लगा, ‘‘रही कपड़े भीगने की बात तो उस की चिंता नहीं. मौसम ऐसा है कि कुछ कदम चलते ही गरम हवा कपड़े सुखा देगी.’’ वह एक बार फिर मुसकराया और अपनी राह चल पड़ा. शिवम की मुसकान में न जाने ऐसा क्या था कि तीर की तरह रानी के जिगर के पार हो गई. उस ने बाल्टी से पानी का मग भरा और अपने सिर पर उड़ेल लिया. रानी की मां ने यह तमाशा देखा तो वह चिल्लाई,‘‘दरवाजे पर खड़ी हो कर तू खुद को क्यों भिगो रही है, नहाना है तो घर के भीतर आ कर नहा ले.’’

‘‘मम्मी, मैं नहा नहीं रही, ठंडे पानी से कपड़े भिगो कर खुद को ताजगी और तरावट से भर रही हूं.’’ वह बोली. इस के बाद वह महसूस करने लगी कि जब शिवम भीगा होगा, तब उस ने ऐसा ही महसूस किया होगा. उस पल से एक अहसास ही नहीं जुड़े, दिल के तार भी जुड़ गए. बस इस के बाद शिवम बहुत तेजी से रानी के दिलोदिमाग पर छाता चला गया. शिवम का हाल भी रानी से अलग नहीं था. पानी फेंकने में हुई चूक के बाद उस का हैरान चेहरा और फैली आंखें शिवम के दिल में बस गई थीं. बस इसी एक बात ने उस की सोच को नई दिशा दे दी. शिवम ने रानी के बारे में सोचा तो वह यकायक अपनी सी लगने लगी. दिल भी उछल कर बोलने लगा कि हां उसे भी रानी से प्यार हो गया है.

ताजनगरी आगरा के जगदीशपुरा थाना क्षेत्र के वैशाली नगर, नगला गूजर में रमेश चंद्र शर्मा रहते थे. परिवार में उन की पत्नी लक्ष्मी देवी और इकलौता पुत्र शिवम शर्मा था. रमेश चंद्र पंडिताई का काम करते थे. उसी से परिवार का खर्च चलता था. करीब 12 साल पूर्व रमेश चंद्र की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी. अब लक्ष्मी देवी पर अपना और बेटे का पेट भरने और उसे अच्छी जिंदगी देने की जिम्मेदारी आ गई. पति की पंडिताई को करते देखते हुए लक्ष्मी भी उस में पारंगत हो गई थी. इसलिए पति की मृत्यु के पश्चात एक मंदिर की पुजारिन बन गई. वहां आने वाले चढ़ावे से अपना और बेटे का पेट पालने लगी.

25 साल के हो चुके शिवम ने केवल इंटरमीडिएट तक ही पढ़ाई की थी. उस ने कुछ दिन एक कपड़े की दुकान पर काम किया, फिर वहां से छोड़ दिया. बेरोजगारी में दिन काटने लगा. मां जो लाती उसी में वह गुजारा कर लेता. लक्ष्मी देवी के मकान के पास ही कालीचरण का मकान था. 20 वर्षीय रानी कालीचरण की ही बड़ी बेटी थी. रानी ने हाईस्कूल तक ही पढ़ाई की थी. पासपास रहने के कारण दोनों परिवार एकदूसरे से परिचित थे. बचपन से रानी और शिवम एकदूसरे को देखते आ रहे थे. किशोरावस्था को पार कर के युवावस्था में प्रवेश कर गए, तब भी उन के मन नहीं मचले. उस दिन पानी के मग ने दोनों के बीच एक बेनाम रिश्ता बना दिया. ऐसा बेनाम रिश्ता जिस में तड़प, बेचैनी, कसक और प्यार था.

उस दिन से शिवम और रानी की आंखें एकदूजे के दीदार की प्यासी रहने लगीं. शिवम फुरसत में होता तो वह अपने घर के चबूतरे पर बैठा होता. मन रानी के बारे में सोच रहा होता और प्यासी आंखें उस के द्वार पर टकटकी लगाए होतीं. शिवम को देखने के लिए किसी बहाने से रानी भी घर के बाहर आ जाती. दोनों की आंखें मिलतीं तो दोनों के लब खिल जाते. इस के साथ ही धड़कनों की गति बढ़ जाती. रानी और शिवम में बातचीत होनी सामान्य बात थी. पूरे मोहल्ले के सामने बात भी करते तो उन के रिश्ते पर कोई शक नहीं करता. कहते हैं कि न, जब प्यार होता है तो मन में चोर भी पैदा हो जाता है. रानी और शिवम के मन में भी चोर पैर जमाए बैठा था. सो एकांत में सामना होते ही मानो उन की हिम्मत जवाब देने लगती.

शिवम को भी डर लगता कि प्रेम निवेदन सुन कर रानी भड़क गई तो सिर पर इतने जूते पड़ेंगे कि वह गंजा हो जाएगा. कुछ दिन यूं ही आंखमिचौली चलती रही, फिर एक दिन मौका मिला तो शिवम ने हिम्मत कर के मन की बात कह दी, ‘‘रानी, मुझे तुम से प्यार हो गया है, अब तुम भी अपने प्यार को जता कर मेरे दिल की रानी बन जाओ.’’

शर्म से रानी के गाल गुलाबी हो गए. उस ने सिर झुका लिया और पैर के अंगूठे से जमीन खुरचने की नाकाम कोशिश करने लगी. रानी के अंदाज से वह समझ गया कि डरने की कोई बात नहीं. रानी भी उस से प्यार करती है. प्रेम तभी आनंद देता है जब उस का प्रदर्शन किया जाए. शिवम भी रानी के मुंह से उस के दिल का हाल सुनना चाहता था. इसलिए उसे बोलने के लिए उकसाया, ‘‘कहो न, तुम भी मुझ से प्यार करती हो?’’

रानी ने सिर उठा कर शिवम की आंखों में देखा, उस के बाद पुन: नजरें नीची कर लीं. मुसकराई, इकरार में सिर हिलाया और तेजी से उस के सामने से हट गई. शिवम का दिल बल्लियों उछलने लगा, वह समझ गया कि रानी को भी उस से प्यार है. मोहब्बत का इजहार और इकरार होते ही रानी व शिवम की प्रेम कहानी शुरू हो गई. कभी शिवम का सूना घर, कभी पार्क तो कभी सुनसान स्थान रानी और शिवम की मोहब्बत के खामोश गवाह बनने लगे. शिवम की मां मंदिर चली जाती तो घर में शिवम ही अकेला रह जाता था. ऐसे में रानी मिलने के लिए शिवम के घर आ जाती थी. वहां उस से घंटों बतियाती, प्यार भरी बातें करती.

एक रोज रानी सजसंवर कर शिवम के घर पहुंची. उस ने नया सूट पहन रखा था. शिवम के कमरे में दाखिल हुई तो उसे शिवम नहीं दिखा, वह बाथरूम में था. रानी ने आवाज लगाई, ‘‘शिवम!’’

‘‘कौन?’’ शिवम ने बाथरूम के अंदर से ही पूछा.

‘‘अच्छा तो जनाब मेरी आवाज भी नहीं पहचानते. आ कर बताऊं कौन हूं मैं?’’ रानी का लहजा शरारत भरा था.

‘‘बिलकुल आ जाओ, मैं कौन सा डरता हूं.’’ वह बोला.

रानी को लगा कि इस समय अन्य कोई वहां आ गया तो बदनामी होगी उस की. वह वापस मुड़ी और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. दरवाजा बंद करने के बाद उस ने बाथरूम के दरवाजे पर दस्तक दी तो शिवम ने उसे अंदर खींच लिया. शिवम मात्र अंडरवियर पहने हुए था. उस का पूरा शरीर पानी से भीगा हुआ था. शिवम की आंखों में शरारत नाच रही थी. उस ने रानी को करीब खींचा तो वह चिहुंक उठी, ‘‘छोड़ो मेरा सूट गीला हो जाएगा, आज ही पहना है इसे. मैं तो तुम्हें अपना सूट दिखाने आई थी कि तारीफ  क रोगे तुम मेरी.’’

‘‘तारीफ  तो मैं तुम्हारी हमेशा करता हूं, आज फिर से कह रहा हूं कि तुम से हसीन इस जहां में कोई नहीं है.’’ कहते हुए शिवम ने उस के होंठों को चूम लिया.

शिवम उस की तारीफ  करते हुए पहले भी ऐसा कुछेक बार कर चुका था. रानी शिवम के मन की यौन जिज्ञासाओं को समझती थी. इसलिए उस की हरकतों का बुरा नहीं मानती थी. वह जानती थी कि शिवम का मन इस से आगे कुछ और भी चाहता होगा, पर वह शिवम से यही कहती थी, ‘‘बेसब्र मत बनो, मैं तुम से प्यार करती हूं और शादी के बाद पूरी तरह तुम्हारी हो जाऊंगी, तब जो जी चाहे करना.’’

शिवम भी उस की भावनाओं को समझ कर खुद को रोक लेता था. लेकिन आज माहौल एकदम बदला हुआ था. शिवम के नग्न भीगे कसरती बदन को देख कर रानी की सोई हुई भावनाएं जाग उठी थीं. जब शिवम ने उस की पतली कमर में हाथ डाल कर जिस तरह उस के होंठों को चूमा तो उस के बदन में चिंगारियां चटखने लगी थीं. एक फुट के फासले पर खड़े शिवम के हाथ में रानी की कलाई थी और निगाहों में एक सवाल था. वह अपलक रानी के चेहरे को निहार रहा था. जबकि रानी की झुकी हुई आंखें चोरीचोरी उस के बदन को देख रही थीं. उस की नजरों के लक्ष्य को समझ कर शिवम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘जब तुम्हारा हूं तो मेरे शरीर का जर्राजर्रा तुम्हारा है इन पर तुम्हारा ही हक है.’’

रानी लजा गई. चेहरे पर हया की लाली फैली तो कांपते होंठों से उस ने कहा, ‘‘तुम बहुत शरारती होते जा रहे हो.’’

‘‘हुस्न का खजाना बांहों में हो तो बड़ेबड़े तपस्वी बेईमान हो जाते हैं.’’ कहते हुए शिवम रानी के एकदम करीब खिसक आया. उस ने अपने दोनों हाथ दीवार पर टिका कर उस ने रानी को अपनी जद में ले लिया. फिर धीरे से अपने होंठ उस के होंठों की तरफ  बढ़ाए.

‘‘नहीं शिवम यह ठीक नहीं है,’’ रानी ने उसे रोकना चाहा, लेकिन शिवम तब तक अपने जिस्म का बोझ उस पर डाल चुका था. तन की गरमी पा कर रानी का विरोध मंद पड़ गया. रानी भी खुद पर नियंत्रण न रख सकी. फिर दोनों पहली बार आनंद की एक नई दुनिया की सैर को निकल गए. मंजिल मिलने के बाद ही वह एकदूसरे से अलग हुए. रानी को हासिल करने के बाद शिवम उस का और भी दीवाना हो गया. उस की सुबह रानी से शुरू होती थी और शाम रानी पर खत्म होती थी. उन को अलग होने का बिलकुल भी मन नहीं होता था लेकिन लोकलाज के चलते शिवम अपने घर और रानी अपने घर जाने को मजबूर हो जाती.

दोनों विवाह कर के एक साथ जिंदगी बिताना चाहते थे लेकिन यह संभव नहीं था. क्योंकि वे एक जाति के नहीं थे. ऐसे में लक्ष्मी देवी कभी भी अपने बेटे शिवम को दूसरे कुल में शादी करने की अनुमति नहीं देती. लक्ष्मी देवी पुजारिन होने के कारण धार्मिक प्रवृत्ति की थी. वह हरगिज दोनों के रिश्ते को मंजूरी नहीं देती. अपनी मां के बारे में शिवम बखूबी जानता था. ऐसे में शिवम के दिमाग में उथलपुथल मचने लगी कि क्या करे, क्या न करे. उसे सिर्फ एक ही रास्ता सूझा कि वह आर्यसमाज मंदिर में रानी से शादी कर ले और उसे ले कर कहीं दूर चला जाए. रानी से  शिवम ने बात की तो उस का भी यही कहना था कि जब परिवार हमारे मन की करेंगे नहीं, हमारी खुशियों के बारे में नहीं सोचेंगे तो हम क्यों उन के बारे में सोचें. हम भी वही करेंगे जो हमें सही लगेगा.

आपसी सहमति के बाद दोनों ने आर्यसमाज मंदिर में विवाह कर लिया. विवाह कर के दोनों बहुत खुश थे. क्योंकि वह एक नई जिंदगी की शुरुआत जो कर रहे थे. विवाह करने के बाद शिवम ने कुछ सोच कर अपनी मां लक्ष्मी देवी को रानी के साथ विवाह करने के बारे में बताया तो लक्ष्मी देवी ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई, ‘‘निखट्टू घर में पड़ेपड़े मेरे दिए निवाले तोड़ता रहा, कभी एक पैसे का काम नहीं किया. अब ऊपर से चोरीछिपे शादी कर लेने की बात कर रहा है. पहले तुझे, अब उसे भी छाती पर बैठा कर खिलाऊं, ऐसा कभी नहीं हो सकता. वैसे भी मैं तेरी इस शादी को नहीं मानती.’’

‘‘आप मानो न मानो रानी से मेरी शादी हो चुकी है. मैं उसे हरगिज नहीं छोड़ सकता.’’ इतना कह कर शिवम वहां से चला गया. लक्ष्मी देवी बैठ कर सिसकने लगी और उस दिन को कोसने लगी, जब शिवम पैदा हुआ था. वह सिसकते हुए बोली, ‘‘ऐसे कपूत से तो निपूती रहती.’’

इस के बाद मांबेटे में शादी की बात को ले कर रोज झगड़ा होने लगा. दूसरी ओर रानी के घरवालों ने उस के लिए उपयुक्त वर देख कर उस का रिश्ता पक्का कर दिया. रानी इस से घबरा उठी. एक तरफ रानी की शादी तय हो गई, दूसरी ओर लक्ष्मी देवी उस को अपनाने को तैयार नहीं थी. ऐसे में दोनों घर से भाग कर कहीं और अपनी दुनिया बसाने के बारे में सोचने लगे. शिवम के पास कोई कामधाम तो था नहीं, जो पैसे होते. इसलिए शिवम ने फैसला किया कि वह घर में रखे रुपए और गहने चोरी से निकाल कर रानी के साथ भाग जाएगा. 6 मार्च, 2020 की शाम साढ़े 5 बजे लक्ष्मी देवी घर पर नहीं थी, वह मंदिर गई हुई थी. शिवम ने रानी को बुला लिया और घर में रखे पैसे और गहने निकालने लगा. तभी लक्ष्मी देवी घर वापस लौट आई. शिवम की हरकत देख कर वह बिफर पड़ी, ‘‘शिवम!’’

मां की आवाज सुन कर शिवम चौंक गया और एक झटके में खड़ा हो कर अपनी मां की तरफ  देखने लगा. उस के पास ही रानी भी खड़ी थी. बेटे शिवम को दुत्कारते हुए लक्ष्मी देवी बोली, ‘‘अब यही दिन तो दिखाना बाकी रह गया तुझे दुष्ट. खुद तो कभी कुछ कमाया नहीं और मेरी जिंदगी भर की पूंजी को चुरा कर उड़ाने पर आमादा है. आज तुझे तो मैं सबक सिखा कर ही रहूंगी. अभी मैं पुलिस को फोन करती हूं और तुम दोनों को अंदर करवाती हूं. जब जेल की हवा खाओगे, तब समझ में आएगा.’’

यह सुन दोनों घबरा उठे और एकदूसरे की ओर देखा. शिवम ने महसूस किया कि रानी जैसे उस से कह रही हो रोको अपनी मां को. शिवम ने सहमति में सिर हिलाया. फिर अपनी मां की ओर झपटा. मां के हाथ से मोबाइल छीन कर शिवम ने मां को बैड पर गिरा दिया. फिर बैड पर रखे तकिया से उस ने अपनी मां का कस कर मुंह दबा दिया, जिस से दम घुटने से लक्ष्मी देवी की मौत हो गई. अब शिवम को समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करे. उस ने रानी को उस के घर भेजा. फिर मकान के मेनगेट में लौक लगा कर वह भावना एस्टेट गया, वहां एक चाय की दुकान पर बैठा रहा.

वहां बैठने के दौरान उस ने रानी से कई बार फोन पर बात की. वह चाय की दुकान पर 5 घंटे बैठा रहा. रात 11 बजे वह घर पहुंचा, तब उस ने जगदीशपुरा थाने को मां की मौत हो जाने की सूचना दी. सूचना मिलने पर इंसपेक्टर राजेश कुमार अपने मातहतों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया तो लक्ष्मी देवी के शरीर पर किसी तरह की चोट के निशान नहीं दिखे. इस का मतलब यही था कि किसी चीज से गला घोंटा गया है. इंसपेक्टर राजेश कुमार ने शिवम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह घर पर नहीं था. अभी वह घर लौटा तो मां को इस हालत में पाया. घर में किसी अंजान व्यक्ति द्वारा वारदात किए जाने की शंका होते ही उस ने पुलिस को सूचना दी.

इन सब में इंसपेक्टर राजेश कुमार को अजीब बात यह लगी कि जिस बेटे की मां की मौत हुई थी उस बेटे को कोई गम नहीं था, चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं थी, यह आश्चर्य की बात थी. शिवम पर संदेह होने पर भी उन्होंने छेड़ा नहीं. अभी ऐसा कोई सुबूत उन के पास नहीं था, जिस से उसे गुनहगार ठहराया जा सके. उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. फिर थाने आ कर उन्होंने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में मृत्यु का कारण दम घुटना बताया गया था. मौत भी सूचना मिलने के पांच घंटे पहले होने की  बात बताई गई थी.

इस के बाद इंसपेक्टर राजेश कुमार ने शिवम के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना के समय शिवम की लोकेशन उस के घर की ही थी. काल डिटेल्स में एक नंबर पर इंसपेक्टर राजेश कुमार की नजर गई, उस नंबर पर शिवम की रोज कई बार बात होती थी. घटना वाले दिन भी देर रात तक कई बार उस नंबर पर बात की गई थी. उस नंबर की जांच की गई तो वह शिवम के पड़ोस में रहने वाली रानी का निकला. घटना के समय रानी के मोबाइल फोन की लोकेशन शिवम के साथ ही थी. 8 मार्च, 2020 को इंसपेक्टर राजेश कुमार ने शिवम और रानी को गिरफ्तार कर लिया. उन से थाने ला कर पूछताछ की गई तो दोनों ने हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया.

इस के बाद इंसपेक्टर कुमार ने हत्या में प्रयुक्त तकिया भी बरामद कर लिया, जिस से उन्होंने लक्ष्मी देवी का गला घोंटा था. आवश्यक कागजी खानापूर्ति करने के बाद शिवम और रानी को सक्षम न्यायालय में पेश किया गया, वहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

Maharashtra News : सैक्स रैकेट और अवैध धंधों से वसूली करने वाली प्रीति की हैरान करने वाली दास्तां

Maharashtra News : खिलाड़ी औरतों के लिए हनीट्रैप कमाई का सब से अच्छा माध्यम है. लेकिन यह जरूरी नहीं कि इस में कामयाबी मिलेगी ही, क्योंकि पुलिस भी अपराधों की गंध सूंघती रहती है. प्रीति ने नेताओं और पुलिस के कंधों पर हाथ रख कर करोड़ों कमाए, लेकिन…

लौकडाउन से अनलौक की ओर कदम बढ़ते ही महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में यूं तो अपराध की जबरदस्त ताक धिना धिन सुनी जा रही थी. हत्याओं का सिलसिला सा बन गया था. राज्य के गृहमंत्री के गृहनगर की इस हालत पर राजनीतिक तीरतलवार चलाने वाले तरकश कसने लगे थे. पुलिस और प्रशासन पर तोहमत लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. कोरोना योद्धा के तौर पर शाबासी लूट चुकी शहर पुलिस ऐसी किसी तोहमत को तवज्जो नहीं देना चाहती थी. दावा यही कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की न जरूरत थी न ही होनी चाहिए.

शहर पुलिस ने बड़ेबड़े अपराधियों के अपराध के आशियानों को कुछ समय में ही बड़े स्तर पर ध्वस्त कर दिया था. ऐसे में एक मामला अचानक चर्चा में हौट हुआ. यह मामला चार सौ बीसी के खेल में पकड़ी गई प्रीति का. राजनीति के गलियारे में चहलकदमी के साथ समाजसेवा का नया मौडल बनी घूमती उस महिला के बारे में बड़ी चर्चा ये थी कि कई पुलिस वाले साहब उस के दबेल यानी उस के दबाव में थे. लिहाजा उस ने शहर व शहर के आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर दबावतंत्र बना कर कइयों की जिंदगी में जहर घोल दिया. पुलिस कभी उस का सत्कार करती थी तो कभी उस से सत्कार कराती थी.

समाजसेवा के चोले में हनी ट्रैपर घटना 5 जून, 2020 की है. एक शिकायतकर्ता पांचपावली पुलिस स्टेशन में बेबस मुद्रा में मदद की याचना ले कर पहुंचा. शिकायतकर्ता का नाम था उमेश उर्फ गुड्डू तिवारी. पांचपावली क्षेत्र में ही रहने वाले गुड्डू ने बताया कि उस का जीवन एकदम सामान्य था. वह एक स्कूल का कर्मचारी है. हर माह मिलने वाले वेतन से उस के परिवार का हंसीखुशी गुजारा हो रहा था. लेकिन जब से वह प्रीति की सोहबत में आया, उस की दुनिया लुटने लगी. उमेश उर्फ गुड्डू ने उस वक्त को कोसा है, जब वह फेसबुक पर प्रीति से जुड़ा था.

प्रीति का आकर्षक फोटो देख गुड्डू ने उस पर सहज कमेंट किया था. उस कमेंट के जवाब में प्रीति ने फेसबुक पर ही गुड्डू को पर्सनल मैसेज भेज कर मोबाइल फोन नंबर का आदानप्रदान कर लिया. गुड्डू इस बात को ले कर भी खुद को दोष देता है कि एकदो बार फोन पर बात के बाद वह उस अनजानी महिला के सामने पूरी तरह से खुल गया. उस ने अपने घरपरिवार की बातें साझा कर दीं. यहां तक कि वैवाहिक जीवन में भी उस ने अरमानों के सूखे कंठ की वेदना को स्वर दे दिया. प्रीति ने गुड्डू को बताया कि नागपुर के जिस इलाके में वह रहता है, उस के पास ही वह भी रहती है. उस ने अपनी पहचान के दायरे के ट्रेलर के तौर पर कुछ लोगों के नाम गिनाए.

कुछ दिनों बाद दोनों के मिलने का सिलसिला मोहब्बत की परवाज भरने लगा. कभी प्रीति मिलने पहुंचती तो कभी गुड्डू को बुला लेती थी. एक दिन प्रीति ने गुड्डू से साफ कह दिया कि वह उस के साथ जीवन गुजारने को तैयार है. बशर्ते उसे अपनी पत्नी को तलाक देना होगा. भविष्य की योजना भी उस ने गुड्डू से साझा की. 50 वर्षीय गुड्डू जिंदगी के नए सफर पर चलने के लिए न केवल राजी हुआ बल्कि अति उत्साहित भी था. माल मिलते ही बदला रंग गुड्डू की शिकायत का लब्बोलुआब यह था कि प्रीति मनचाहा धन मिलते ही तेवर बदलने लगती थी. बतौर गुड्डू प्रीति ने उस से फ्लैट खरीदने के लिए रुपयों की मांग की थी. उस का कहना था कि जब तक गुड्डू की पत्नी का तलाक नहीं हो जाता, तब तक दोनों उस फ्लैट में मिलतेजुलते रहेंगे.

गुड्डू ने अग्रिम के तौर पर प्रीति को फ्लैट के लिए 2.60 लाख रुपए दे दिए. तय समय पर फ्लैट नहीं लिया गया तो गुड्डू ने रुपए वापस मांगे. बस यहीं से गुड्डू पर दबाव का नया सिलसिला चल पड़ा. फ्लैट के नाम पर लिए गए रुपए वापस लौटाना तो दूर प्रीति ने रुपयों की नई पेशकश रख दी. उस ने कहा कि सोशल मीडिया पर जितनी भी हौट बातें हुई हैं और फोन पर लाइव चैटिंग हुई है, उन का सारा हिसाब उस के पास है. अगर वह उस रिकौर्डिंग को पुलिस को सौंप दे तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. प्रीति की सीधी धमकी यह भी थी कि ज्यादा चूंचपड़ मत करना. मेरे हाथ काफी लंबे हैं. चुटकी बजा कर ऐसी जगह पर घुसेड़वा दूंगी, जहां से जीवन भर नहीं निकल पाएगा. और हां, अपनी इज्जत बचानी हो तो 5 लाख रुपए तैयार रखना.

प्रीति के ठग अंदाज का जिक्र करते हुए गुड्डू ने बताया कि उस ने डर के मारे प्रीति को 2.42 लाख रुपए और दिए, जिस से वह कहीं मुंह न खोले. लेकिन माल पाने के बाद तो वह और भी रंग बदलने लगी. रुपए और गिफ्ट ले कर यहांवहां बुलाने लगी. उस से दूर होने का प्रयास किया तो वह घर में आ कर पिटवा देने की धमकी देने लगी. कुछ ही दिनों में उस ने नकदी और गिफ्ट के रूप में 14.87 लाख रुपए ऐंठ लिए. आखिरकार उसे अपने बचाव में पुलिस की शरण लेनी पड़ी. पुलिस ने उस की शिकायत की शुरुआती पड़ताल करने के बाद प्रीति के खिलाफ भादंवि की धारा 420 व धारा 384 हफ्तावसूली के तहत केस दर्ज कर लिया.

मामला दर्ज करने के बाद पुलिस ने प्रीति के कामठी रोड स्थित प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट के घर पर छापेमारी की. प्रीति वहां से चंपत हो गई थी. पुलिस ने उस के घर से काफी सामान और दस्तावेज बरामद किए. खुला भेद तो पुलिस भी रह गई दंग जिस पांचपावली पुलिस स्टेशन में प्रीति का आनाजाना लगा रहता था, उसी थाने की पुलिस उस के कारनामों की फेहरिस्त देख कर दंग रह गई. रिकौर्ड खंगालने पर पता चला कि प्रीति धोखाधड़ी के मामले में जेल की यात्रा कर चुकी है. उस के आपराधिक क्षेत्र के छोटेबड़े लोगों से भी करीबी संबंध है. उस के खिलाफ शहर के सीताबर्डी पुलिस स्टेशन में भादंवि की धारा 420, 406, 468, 467, 506, 507, 34 के  तहत प्रकरण दर्ज है.

धोखाधड़ी का वह प्रकरण शहर में काफी चर्चित हुआ था. इस के अलावा भंडारा के पुलिस स्टेशन में भी भादंवि की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज था. शहर पुलिस के बड़े अधिकारियों के लिए यह जानकारी काफी चौंकाने वाली थी कि जिस महिला को वे केवल सामाजिक कार्यकर्ता समझ रहे थे वह ब्लैकमैलर है. यही नहीं वह पुलिस से संबंधों का नाजायज फायदा उठाती रहती है. शहर पुलिस की ओर से प्रीति के अपराधों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी गई. बाकायदा प्रैस नोट जारी कर आह्वान किया गया कि इस महिला ने किसी से धोखाधड़ी की हो, तो तत्काल पुलिस से संपर्क करे.

इस बीच प्रीति फरार हो गई थी. पुलिस उसे ढूंढती रही. करीब हफ्ते भर प्रीति बचाव का रास्ता खोजती रही. उस ने वकील के माध्यम से जिला सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. कोशिश यही थी कि पुलिस गिरफ्तारी से बचते हुए उसे न्यायालय से जमानत मिल जाए. लेकिन उस की कोशिशों पर पानी फिर गया. न्यायालय ने उस की अरजी खारिज कर दी. लिहाजा उस ने 13 जून को पांचपावली पुलिस स्टेशन में आत्मसमर्पण किया. उसे पुलिस तक पहुंचाने वालों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा पुलिस के कुछ नुमाइंदे भी शामिल थे.

गिरफ्तारी के बाद प्रीति को पुलिस रिमांड पर लिया गया. उस के खिलाफ पुलिस ने सबूत जुटाने शुरू किए. जांच में जुटी पुलिस यह जान कर दंग रह गई कि कुछ समय पहले तक मामूली मोपेड पर घूमने वाली प्रीति अब करोड़पति हो गई है. वह महंगी कारों से घूमती है. उस ने अपने करीबियों व रिश्तेदारों के नाम पर बेनामी संपत्ति खरीद रखी है. बंगला, खेती की जमीन के अलावा वह एक कंपनी की भी संचालक भी थी. अवैध वसूली के लिए उस ने बाकायदा एक संस्था रजिस्टर्ड करा रखी थी. लिहाजा पुलिस ने धर्मदाय आयुक्तालय, विजिलैंस विभाग के अलावा अन्य विभागों को पत्र लिख कर उस के बारे में आवश्यक जानकारी मांगी.

घर में हुआ अपमान तो कर लिया सुसाइड प्रीति के कारनामों की जानकारी जुटाई ही जा रही थी कि पुलिस अधिकारियों तक एक गुहार और पहुंची. गुहार यह कि एक व्यक्ति ने प्रीति और उस के साथियों के डर से सुसाइड कर लिया था. मृतक के परिवार को न्याय दिलाने के लिए यह शिकायत जूनी मंगलवारी निवासी वैशाली पौनीकर की थी. शिकायत के अनुसार वैशाली के पति सुनील पौनीकर ने अक्तूबर 2019 में सतीश सोनकुसरे से कुछ रकम कर्ज ली थी. सुनील पौनीकर मेस संचालक था. काम में घाटे के कारण उसे कर्ज लेना पड़ा था. सतीश सोनकुसरे ने कर्ज वापसी के लिए सुनील पर दबाव बनाया. लेकिन समय पर रुपए नहीं लौटा पाने पर उस ने प्रीति की मदद ली.

प्रीति यह भी दावा करती थी कि वह कर्ज वसूली का काम भी करती है. शहर के सारे बड़े पुलिस अफसर व नेता उस के पहचान के हैं. बतौर वैशाली पौनीकर, प्रीति ने सतीश सोनकुसरे से कर्ज वसूली की सुपारी ली थी. वह कुछ पुलिस कर्मचारियों की मदद से सुनील को प्रताडि़त करती थी. प्रीति की धमकी से किया सुसाइड एक दिन प्रीति सतीश सोनकुसरे और मंगेश पौनीकर को साथ ले कर सुनील के घर पर पहुंच गई. प्रीति ने सुनील को कर्ज नहीं लौटाने पर धमकी दी. उस के साथ कुछ पुलिस वाले भी थे, जो घर में आ कर मांबहन की गालियां दे गए. यहीं नहीं, वह बस्ती में नंगा घुमाने की धमकी दे रहे थे. धमकी और घिनौनी बातों से सुनील बुरी तरह आहत हुआ.

लिहाजा उस ने 27 नवंबर, 2019 की दोपहर ढाई बजे लकड़गंज थाना क्षेत्र के बाबुलवन प्राथमिक शाला के मैदान में जहर पी लिया. मेयो अस्पताल में उपचार के दौरान 30 नवंबर, 2019 को सुनील ने दम तोड़ दिया था. पुलिस ने आकस्मिक मौत का मामला दर्ज कर जांच जारी रखी. अब वैशाली पौनीकर की शिकायत पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर लकड़गंज थाने की पुलिस ने प्रीति व उस के साथियों के खिलाफ सुनील आत्महत्या मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण दर्ज कर तलाश शुरू कर दी. मेस संचालक को आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण लकड़गंज थाने में दर्ज हो ही रहा था कि जरीपटका थाने में एक और शिकायत पहुंची.

शिकायत यह थी कि आरोपी प्रीति ने धौंस दिखा कर 25 हजार रुपए ऐंठ लिए. शिकायतकर्ता पूर्णाबाई सडमाके का बेटा नीतेश वायुसेना में लिपिक था. 8 मार्च, 2019 को उस की प्रणिता से शादी हुई थी. शादी के 2 माह बाद ही प्रणिता की अपनी सास पूर्णाबाई से अनबन होने लगी. प्रणिता अपना सामान ले कर मायके चली गई. समझाने पर भी वह नहीं मानी. उस ने पुलिस के भरोसा सेल में पूर्णाबाई की शिकायत दर्ज करा दी. भरोसा सेल में पूर्णाबाई की प्रीति से भेंट हुई. प्रीति भरोसा सेल की एजेंट बन कर घूमती थी. उस ने विवाद निपटाने का झांसा दे कर पूर्णाबाई से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए नहीं देने पर उस के बेटे की नौकरी जाने का भय बताया. लिहाजा 17 अक्तूबर, 2019 को पूर्णाबाई ने प्रीति को 25 हजार रुपए दे दिए.

पूर्णाबाई ने प्रीति को फोन कर पूछताछ की. प्रीति ने बताया कि तुम्हारे बेटे का काम हो गया है. मैं ने मैडम को पैसे दे दिए हैं. बेटे से जुड़े मामले को ले कर एक बार पूर्णाबाई को भरोसा सेल की इंचार्ज इंसपेक्टर शुभदा शंखे ने पूछताछ के लिए बुलाया. उस दौरान पूर्णाबाई ने इंसपेक्टर शुभदा से सहज ही कह दिया कि मैं ने तो आप को 25 हजार रुपए दिए थे, फिर आप मुझ से इस तरह घुमावदार सवाल क्यों कर रही हो.  इंसपेक्टर शुभदा चौंकी. वह यह जान कर हैरान थी कि जिस प्रीति दास को वह सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सम्मान देती रही, वह तो उस के नाम पर ही अवैध वसूलियां करने लगी है. लिहाजा, इंसपेक्टर शंखे ने पूर्णाबाई को शहर पुलिस के जोन-5 के उपायुक्त नीलोत्पल के पास भेजा.

पूर्णाबाई की शिकायत पर जरीपटका पुलिस ने आरोपी प्रीति के खिलाफ हफ्ता वसूली का मामला दर्ज कर लिया. 2 दिन बाद शहर पुलिस के पास एक और शिकायत पहुंची. शिकायतकर्ता युवती उच्चशिक्षित थी. उस के अनुसार उस के साथ एक युवक ने विवाह का झांसा दे कर दुष्कर्म किया था. प्रीति दास ने युवती को यह कह कर मदद का आश्वासन दिया था कि उस की पुलिस के बड़े अधिकारियों से खासी पहचान है. वह दुष्कर्म के आरोपी को सजा दिलाएगी. इस कार्य के लिए उस ने युवती से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए मिलने के बाद प्रीति उस युवती से मिलती भी नहीं थी. ऐसे में एक रोज युवती ने प्रीति से तल्खी के साथ सवाल किया तो वह उसे धमकाने लगी. साथ ही यह औफर देने लगी कि उस की गैंग में शामिल हो जाए.

उस युवती का आरोप था कि प्रीति अकसर खूबसूरत युवतियों की मजबूरियों का फायदा उठाती है. युवतियों को पेश कर के वह रसूखदारों से मनचाहा माल वसूलती रहती है. 2 से 3 पुलिस कर्मचारी व अधिकारी को हनीट्रैप में फंसा देने का डर दिखा कर उसने कथित तौर पर लाखों की वसूली की है. उस ने यह भी बताया कि नागपुर में पश्चिम महाराष्ट्र के कई पुलिस अधिकारी बैचलर रहते हैं. उन का परिवार उन के गांव या शहर में है. लिहाजा उन्हें रात रंगीन कराने के एवज में प्रीति लगातार ब्लैकमेल करती रही है.

भंडारा पुलिस थाने में प्रीति के विरुद्ध दर्ज धोखाधड़ी के मामले में बताया गया कि वह नागपुर के बाहर के जिलों में खुद को बैंकर के तौर पर प्रचारित करती रही है. जरूरतमंदों को आसानी से लाखों का कर्ज दिलाने का झांसा देती रही है. उस के इस चक्रव्यूह में कुछ बैंक कर्मचारी व अधिकारी भी शामिल रहे हैं. दीवाने ही दीवाने प्रीति अपना पूरा नाम प्रीति ज्योतिर्मय दास लिखती है. 40 की उम्र की हो चली इस महिला के चेहरे से ही सादगी व शिष्टता झलकती है. लेकिन उस के शिकायतकर्ताओं की मानें, तो वह जैसी दिखती है वैसी है नहीं. उस की मित्रमंडली की फेहरिस्त में दीवाने ही दीवाने हैं.

उस के कारनामों के तराने न जाने कहांकहां गूंज रहे हैं. शिकायतकर्ता गुड्डू तिवारी की सुनें तो प्रीति कपड़ों की तरह रिश्ते बदलती है. लिबास ही नहीं, जरूरत हो तो वह जाति और धर्म भी बदल लेती है. कभी वह मसजिदों के इर्दगिर्द नजर आती है तो कभी गुरुद्वारे के आसपास. फर्राटेदार अंगरेजी तो बोलती ही है , मराठी और हिंदी में भी उस के तेवर तने रहते हैं. उस के जीवन में 4 लोगों के नाम प्रमुखता से जुड़े हैं. इन में एक मराठी, दूसरे कारोबारी हैं तो 2 मुसलिम हैं. चर्चा है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए उस ने संदीप दुधे, महेश गुप्ता, रफीक अहमद व मकसूद शेख से अलगअलग शादी रचाई. फिर उन को उस ने छोड़ दिया.

शिकायतकर्ता गुड्डू की शिकायत में इन नामों का जिक्र है. फिलहाल यह साफ नहीं हो पाया है कि प्रीति अपने पति से क्यों और कैसे दूर हुई. परिवार में उस की बुजुर्ग मां व बेटा है. खबर है कि प्रीति के पिता सेना में थे. पिता की मृत्यु के बाद उस की मां को अब पेंशन मिलती है. घर में अनुशासन व शिष्टाचार का पाठ तो मिलता रहा, लेकिन कहा जाता है कि प्रीति की हसरतों ने उसे नई राह पर ला दिया. उस की सोशल मीडिया पर साझा की गई एक तसवीर पर लिखा है, ‘मेरी सादगी ही गुमनाम रखती है मुझे, जरा सा बिगड़ जाऊं तो मशहूर हो जाऊं.’

उसे करीब से जानने वालों का कहना है कि वह आपराधिक प्रवृत्ति की नहीं थी. लेकिन शोहरत और दौलत पाने का जुनून कुछ ऐसा सवार है कि वह हर हद से गुजर जाने का दंभ भरती है. वह अपनी सोशल इमेज चमकाने का निरंतर प्रयास करती रही. हालत यह है कि अब भी कुछ लोग उसे धोखेबाज मानने को तैयार नहीं है. प्रीति एक भाजपा पार्षद की सामाजिक संस्था से भी जुड़ी थी. लौकडाउन में जरूरतमंदों को राहत सामग्री देने के अभियान में वह पूरी ताकत के साथ जुटी रही. लिहाजा उस संस्था से जुड़े नेता ने तो उसे निर्दोष ठहराने का अभियान ही शुरू कर दिया है. दावे के साथ सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है— हमारी ताई को फंसाया जा रहा है. उस ने कोई अपराध नहीं किया है.

यह भी सुना जा रहा है कि प्रीति स्वयं को बैंकर बताती रही है. वह खुद को एक राजनीतिक दल के पदाधिकारियों द्वारा संचालित एक बैंक की संचालक के रूप में भी प्रचारित करती रही है. सदर क्षेत्र में उस बैंक के कार्यालय में उस के कारनामों के किस्से हैं. बैंक का मैनेजर भी सिर पर हाथ धरे रहता है. बैंक अधिकारी बताते हुए सीज किए हुए वाहन सस्ते में दिलाने के दावे के साथ धोखाधड़ी करने के उस के किस्से भी सुने जा रहे हैं. खास बात है कि प्रीति अकसर सादे लिबास में रहती है. उस का बर्ताव उच्चशिक्षित सा आकर्षक है.

हमपेशेवर सहेलियों ने की चुगली यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रीति के कारनामों की चुगली उस की हमपेशेवर सहेलियों ने की. राजनीति से ले कर सामाजिक कार्यों में ऐसी कई नईपुरानी कार्यकर्ता हैं, जिन की पहचान वसूली एजेंट के तौर पर है. अब सब के काम और सोच के तरीके अलगअलग हो गए हैं. इन में से कुछ को केवल यह बात खटक रही है कि प्रीति कम समय में बहुतों की चहेती बन गई. नेता, पुलिस से ले कर अन्य क्षेत्र के बड़े लोग भी उस के साथ उठनेबैठने लगे. प्रीति का सोशल मीडिया पर इमेज चमकाने का तरीका भी कइयों की आंखों में चुभने लगा था.

लिहाजा प्रीति की चुगली भी होने लगी थी. कभी वह इंसपेक्टर स्तर के अफसर के साथ बदनाम होती तो कभी नेता के घर उस के नाम पर पारिवारिक झगड़ा होता था. बताते हैं कि चुगली के चक्कर में एक पुलिस वाले ने प्रीति से कुछ बातों को ले कर सवाल किए थे, जिस पर वह थाने में ही भड़क गई थी. उस ने उस अफसर को भी खरीखोटी सुनाते हुए ज्यादा चूंचपड़ नहीं करने को कहा था. थाने में सिपाहियों के सामने हुए उस अपमान को अफसर भूल नहीं पाया. शहर में हनीट्रैप के कारनामों में लिप्त कुछ महिलाओं के लिए भी प्रीति आंख का कांटा बनी है. उन्हें लगता है कि यह कल की आई महिला सब को पीछे छोड़ कर काफी आगे निकल चुकी है.

सैक्स रैकेट, भोजनालयों, अवैध धंधों के अड्डों से पुलिस के नाम पर वसूली कर गुजारा करने वालों के लिए यह बात और भी खटकने वाली है कि प्रीति तो सीधे पुलिस अफसरों की गाडि़यों में ही घूमने लगी. आइडियाज क्वीन प्रीति को पहचानने वाले उसे अवैध वसूली की आइडियाज क्वीन भी कहते हैं. अपनी सोशल इमेज बनाते हुए वह सत्कार कार्यक्रम का आयोजन करती रही है. चर्चा के अनुसार वह सत्कार के लिए ऐसे लोगों की तलाश करती रहती है जो कार्यक्रम में  शौल, श्रीफल मिलने के बदले 10 से 20 हजार रुपए खर्च कर सकें.

कार्यक्रम आयोजन के नाम पर सहयोग के तौर पर वह हजारों रुपए जमा कर लेती है. उन कार्यक्रमों में पुलिस के बड़े अधिकारी या अन्य क्षेत्र के सम्मानित लोगों को आमंत्रित करती रही है. सत्कार कराने के इस खेल में भी वह मोटी रकम बटोरती है. बड़े पुलिस अफसरों के लिए मुखबिरी कर के भी वह अपने स्वार्थ साधती रही है. इस के अलावा विविध मामलों को ले कर वह अफसरों व नेता, मंत्री को निवेदन सौंपने में भी आगे रही है. पुलिस मित्र के तौर पर शहर के सभी 33 पुलिस थानों में उस की खास पहचान है. अफसरों की निजी पार्टी के अलावा नेताओं की पर्सनल बैठकों में वह शामिल होती रही है.

खुशियों के मौकों पर मनपा के बड़े नेता भी उस के साथ ठुमके लगाते दिखे. लिहाजा कइयों को यही लगता है कि प्रीति की प्रीत केवल उस से है. उसे होनहार कार्यकर्ता मानने वालों की भी कमी नहीं है. सत्कार करनेकराने का दौर कुछ ऐसा चला है कि शहर में जिम्मेदार वर्ग कहलाने वाले सभी क्षेत्रों के प्रतिष्ठितों के साथ वह मंच साझा कर चुकी है. नगर सेवक, महापौर, विधायक स्तर के जनप्रतिनिधि उस की खास मित्रमंडली में शामिल हैं. वह सब से पहले अपने शिकार के बारे में जानकारी लेती है. मनचाही खुशियों का दाना फेंक कर शिकार फांसने का गुर वह जान चुकी है.

हनीट्रैप के मामलों में उत्तर नागपुर में ही एक गिरोह चर्चा में रहा है. प्रीति का नाम आते ही वह हवा हो गया था. इस के अलावा कुछ आपराधिक मामलों में उस का नाम थानों तक पहुंचा, लेकिन पुलिस के रिकौर्ड में दर्ज नहीं हो पाया. बहरहाल कहा जा रहा है कि प्रीति के चक्कर में दास बने लोगों की लंबी कतार है. इन में कई सफेदपोश लोग भी हैं. उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही सारी हकीकत सामने आने लगेगी.

 

Murder Stories : शादी के लिए जिद किया तो मंगेतर का कर डाला कत्ल

Murder Stories : भ्रामक बातें कई बार इंसान को इस स्थिति तक पहुंचा देती हैं कि वह उन बातों को सही मान कर कदम उठा लेता है. जो दूसरे के ही नहीं, उस के अपने लिए भी घातक साबित होते हैं. काश! शिवम रोशनी पर विश्वास कर लेता तो…

‘‘शि वम, तुम को केवल गलतफहमी है, मेरा तुम्हारे अलावा किसी से कोई संबंध नहीं है. जब एक बार हमारी शादी तय हो गई तो ऐसे कैसे छोड़ सकते हो? इस से मेरी बदनामी होगी.’’ 19 साल की रोशनी ने अपने मंगेतर शिवम को समझाने की कोशिश करते हुए कहा. रोशनी गांव के परिवेश में पलीबढ़ी थी, जहां लड़की का रिश्ता एक बार तय होने के बाद अगर टूट जाए तो सारी जिम्मेदारी लड़की पर डाल दी जाती है. सब उसी पर ही अंगुली उठाते हैं. इस से बचने के लिए लड़की हर तरह का समझौता करती है. गांव हो या शहर, अगर 2 लोगों में से किसी एक के मन में अविश्वास की रेखा खिंच जाए, तो फिर उस का मिटना आसान नहीं होता. शिवम की हालत भी कुछ ऐसी ही थी.

वह रोशनी की बात समझ तो रहा था पर उस की बात पर यकीन नहीं कर पा रहा था. उस ने कहा, ‘‘रोशनी, जो भी हो पर मेरा मन तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं कर पा रहा है. ऐसे में हम शादी जैसा बड़ा कदम कैसे उठा सकते हैं. अगर हम शादी कर भी लें तो हमारा जीवन सहज नहीं रह पाएगा. अविश्वास की रेखा जिंदगी भर कचोटती रहेगी.’’

‘‘शिवम, तुम कुछ भी कहो पर मैं इस रिश्ते को जीवन भर निभाने के लिए तैयार हूं. तुम्हें मेरी तरफ से कोई शिकायत नहीं मिलेगी.’’ रोशनी किसी भी तरह अपने रिश्ते को बचाने की कोशिश कर रही थी. उसे पता था कि शादी टूटने का सारा असर उसी पर पड़ेगा. घरबाहर सब उसी को दोष देंगे. पर शिवम टस से मस नहीं हो रहा था.

‘‘रोशनी, मैं किसी ऐसे रिश्ते में नहीं बंधना चाहता, जिस में मुझे जीवन भर पछताना पड़े. तुम मुझ पर ज्यादा दबाव मत डालो.’’ शिवम ने रोशनी को समझाते हुए कहा. रोशनी को उस की बातों से लगने लगा था कि अब वह समझाने से नहीं मानेगा. उस ने सोचा कि शायद वह कुछ डराधमका कर लाइन पर आ जाए. प्यार से न सही, हो सकता है कि डर से मान जाए.

‘‘शिवम, समझ लो मेरा जीवन तो खत्म हो गया. पर एक बात याद रखना, मैं इतनी कमजोर नहीं हूं. मैं तुम्हें भी चैन से नहीं बैठने दूंगी. मुझे यह बात कतई मंजूर नहीं है कि तुम मुझ पर कलंक लगा कर छोड़ दो. मैं आसानी से तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली.’’

रोशनी और शिवम की प्यार भरी जिंदगी में शक और अविश्वास की दरार पड़ चुकी थी. हरसंभव कोशिश के बाद भी वह दरार चौड़ी होती जा रही थी. रोशनी किसी भी कीमत पर अपने दामन पर कलंक नहीं लगवाना चाहती थी. रोशनी रावत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 25 किलोमीटर दूर गोसाईंगंज के चांद सराय गांव में रहने वाली पढ़ीलिखी लड़की थी. गांवों में अभी भी कम उम्र में ही शादी का चलन है. रोशनी के साथ भी यही हुआ. बालिग होते ही 19 साल की उम्र में उस की शादी शिवम रावत से तय हो गई.

शिवम भी गोसाईंगंज इलाके के ही गांव चमरतलिया का रहने वाला था. शादी तय होने के बाद शिवम और रोशनी फोन पर बातें करने लगे थे. धीरेधीरे दोनों की दोस्तों से भी बातें होने लगीं. ऐसे ही किसी दोस्त ने शिवम से कह दिया कि रोशनी के गांव में रहने वाले किसी लड़के से संबंध हैं. दुनिया भले ही चांद पर पहुंच जाए, आदमी नाम के जीव की सोच और समझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता. दोस्त की बातों से शिवम को यकीन हो गया कि रोशनी ऐसी ही होगी. शिवम ने यह भी नहीं सोचा कि जो आदमी उसे भड़का रहा है, या उसे बता रहा है, उस की मंशा क्या है.

गांवों में अभी भी कितने ही लोग ऐसी मानसिकता वाले होते हैं जो बनते रिश्ते बिगाड़ने की कोशिश करते हैं. जब शिवम ने यह बात रोशनी को बताई और रिश्ता तोड़ने की बात कही तो रोशनी डर गई. उस की आंखों के सामने अपना यह रिश्ता ही नहीं, पिता का घरपरिवार टूटता नजर आया. उस की आंखों में मातापिता के दुखी, निराश चेहरे घूमने लगे. उसे लगा कि केवल उस का रिश्ता ही नहीं टूट रहा, उस की हिम्मत, घरपरिवार का नाम और इज्जत भी मिट्टी में मिलने वाली है. रिश्ता भले ही किसी भी कारण से टूटे, गलती लड़की की मानी जाती है. दूसरी तरफ शिवम था, जो किसी भी हालत में यह सोचने को तैयार नहीं था कि उस की होने वाली पत्नी के चरित्र पर कोई अंगुली उठे.

रोशनी ने उसे समझाते हुए कहा था कि अगर हमारी शादी हो जाने के बाद कोई ऐसा आरोप लगाता तो क्या तुम मुझे छोड़ देते? शिवम ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया, जिस से रोशनी की आंखों में उम्मीद की लौ जलती. शादी के पहले आरोप लगी लड़की के साथ शादी करना शिवम के लिए आंख मूंद कर दूध में पड़ी मक्खी वाला दूध पीने जैसा था. इस के लिए वह राजी नहीं था. ऐसे में शिवम और रोशनी का रिश्ता शादी से पहले ही ऐसे दोराहे पर खड़ा हो गया, जहां कोई एक राह तय करना संभव नहीं था. इसी बीच अचानक 4 मई, 2020 को रोशनी अपने घर से गायब हो गई. उस के पिता बंसीलाल ने सब से पहले उसे हर जगह तलाश किया. जब कहीं से भी रोशनी की खबर नहीं मिली तो वह गोसाईंगंज थाने गए और इंसपेक्टर धीरेंद्र प्रताप कुशवाहा से मिल कर उन्हें बेटी के गायब होने की जानकारी दी.

पुलिस अपने हिसाब से रोशनी को तलाश करती रही. बंसीलाल भी अपने परिवार के साथ रोशनी को ढूंढते रहे. रोशनी का कहीं से कुछ पता नहीं चल पा रहा था. रोशनी के साथ ही उस का मोबाइल और कपड़े भी गायब थे. सब लोग यही सोच रहे थे कि रोशनी घर छोड़ कर भाग गई है. लेकिन किसी के पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं था. एकएक कर के दिन गुजर रहे थे पर रोशनी का पता नहीं चल रहा था. रोशनी की गुमशुदगी के 6 दिन बाद गोसाईंगंज पुलिस को सूचना मिली कि चमरतलिया के जंगल में किसी लड़की की लाश मिली है, जो पूरी तरह से कंकाल हो चुकी है.

पुलिस ने अपने इलाके की गायब लड़कियों के बारे में पता किया तो रोशनी की गुमशुदगी का मामला भी सामने आया. गोसाईंगंज पुलिस ने रोशनी के पिता बंसीलाल को बुला कर लाश को देखने के लिए कहा. लाश को देख कर कपड़ों वगैरह से बंसीलाल को लगा कि यह उन की बेटी रोशनी का ही अस्थिपंजर है. रोशनी की मौत का राज पता लगाना जरूरी था जबकि गोसाईंगंज पुलिस के लिए यह काम किसी चुनौती से कम नहीं था. पुलिस के पास रोशनी के गायब होने से ले कर उस की हत्या तक कोई सुराग नहीं था. यह ब्लाइंड मर्डर था. पुलिस को जो भी कड़ी मिल रही थी, वह पुलिस के किसी काम की नहीं थी.

मोहनलालगंज सर्किल के सीओ संजीव मोहन ने इंसपेक्टर गोसाईंगंज धीरेंद्र प्रताप कुशवाहा को जल्द से जल्द इस मामले की तह तक जाने का आदेश दिया. तेजतर्रार इंसपेक्टर धीरेंद्र प्रताप कुशवाहा अपनी टीम के साथ मामले को सुलझाने में लग गए. सब से पहले पुलिस ने रोशनी के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया. एक हफ्ते बाद 16 मई को रोशनी के मोबाइल पर चमरतलिया गांव के शिवम का नंबर एक्टिव दिखने लगा. पुलिस को इस बात का पक्का सबूत मिल गया कि रोशनी का मोबाइल शिवम के पास है. रोशनी के पिता के बताने पर रोशनी और शिवम के शादी के रिश्ते का भी खुलासा हो गया.

इस से पुलिस को पक्का यकीन हो गया कि रोशनी के बारे में शिवम को जानकारी होगी. पुलिस ने शिवम को पकड़ा तो उस के पास से रोशनी के कपड़े भी मिल गए. शिवम ने बताया कि जब रोशनी शादी के लिए जिद करने लगी तो उस ने उस की हत्या कर के लाश जंगल में छिपा दी और मोबाइल व कपड़े ले कर अपने घर चला आया. पुलिस ने शिवम के पास से रोशनी का मोबाइल फोन, कपड़े और घटना में प्रयोग की गई बाइक बरामद कर ली. शिवम ने रोशनी के फोन से उस का सिम निकाल कर तालाब में फेंक दिया था. कुछ दिन बाद जब उस ने रोशनी के मोबाइल में अपना सिम डाला तो सर्विलांस से पुलिस को पता चल गया. उस के बाद पुलिस ने शिवम को धर दबोचा.

पुलिस ने शिवम को रोशनी की हत्या और उस के शव को छिपाने के आरोप में जेल भेज दिया. शिवम ने अगर उस दिन रोशनी की बात मान ली होती तो उसे रोशनी की हत्या जैसा कदम नहीं उठाना पड़ता. रोशनी शिवम की पत्नी नहीं बनी थी, ऐसे में शिवम के पास उस के साथ शादी न करने का विकल्प था. शिवम अगर घरपरिवार के लोगों की सहमति से कोई कदम उठाता तो हालात ऐसे नहीं बनते. गुस्से में उठाए गए कदम ऐसे ही जीवन को नष्ट होने की कगार तक पहुंचा देते हैं.

परेशानी की बात यह है कि आज के युवा घरपरिवार और मांबाप से अपने मन की बात नहीं कहते. उन से बातें छिपाते हैं, जो कई बार अपराध की वजह बन जाती है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Extramarital Affair : ड्राइवर के साथ मिलकर बेवफा बीवी ने की फौजी पति की हत्‍या

Extramarital Affair : दीपक पट्टनदार मिलिट्री में थे. साल में 1-2 महीने की छुट्टी पर ही आ पाते थे. इसी वजह से उन की पत्नी अंजलि ने अपने कार ड्राइवर प्रशांत पाटिल से संबंध बना लिए. इतना ही नहीं, बल्कि उन के छुट्टी पर आने पर…

कर्नाटक के जिला बेलगांव के कस्बा होन्निहाल की रहने वाली अंजलि पट्टनदार का पति दीपक पट्टनदार जब 4-5 दिनों तक घर नहीं लौटा तो घर वालों को उस की चिंता सताने लगी. उन्होंने अंजलि पट्टनदार से दीपक के बारे में पूछताछ की. क्योंकि उस दिन दीपक पत्नी अंजलि और ड्राइवर प्रशांत पाटिल के साथ अपनी टाटा इंडिका कार से बाहर गया था. पूछने पर अंजलि ने बताया कि 28 जनवरी को जब वह गोडचिनमलकी से पिकनिक से लौट रही थी तो रात करीब साढ़े 9 बजे दीपक ने एक जगह कार रुकवाई और यह कहते हुए कार से नीचे उतर गए तुम कि तुम लोग घर जाओ, मुझे बेलगांव में कुछ जरूरी काम है, वह जल्दी ही घर आ जाऊंगा.

ससुराल वालों को अंजलि की बातों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि दीपक को अगर कोई काम होता तो निपटा कर अब तक घर आ गया होता. उस का फोन भी स्विच्ड औफ था, इसलिए उन्होंने अंजलि से कहा कि वह दीपक के बारे में सही जानकारी दे. ससुराल वालों के दबाव को देखते हुए अंजलि मरिहाल पुलिस थाने पहुंच गई और अपने पति दीपक पट्टनदार की गुमशुदगी दर्ज करवा दी. अपनी शिकायत में अंजलि ने वहां के ड्यूटी अफसर को वही बात बताई, जो उस ने ससुराल वालों को बताई थी. उस ने कहा, ‘‘उस दिन से आज तक मेरे फौजी पति घर नहीं  लौटे. ऐसे में मैं ससुराल वालों और परिवार को क्या बताऊं. सब लोग उन के न लौटने का जिम्मेदार मुझे मान रहे हैं.’’ कहते हुए अंजलि सिसकसिसक कर रोने लगी.

बहरहाल, ड्यूटी पर तैनात अधिकारी ने अंजलि को सांत्वना देते हुए उस के पति दीपक की गुमशुदगी दर्ज कर ली. दीपक का हुलिया और फोटो भी ले लिए और अंजलि को घर भेज दिया. पुलिस ने उसे भरोसा दिया. कि पुलिस जल्द ही दीपक पट्टनदार को ढूंढ निकालेगी. जबकि पुलिस यह बात अच्छी तरह जानती थी कि यह काम इतना आसान नहीं था. फिर भी पुलिस को अपना दायित्व तो निभाना ही था. मामले की गंभीरता को देखते हुए ड्यूटी अफसर ने फौजी दीपक पट्टनदार के लापता होने की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. थाना पुलिस ने लापता दीपक पट्टनदार की खोजबीन शुरू कर दी. दीपक का हुलिया और फोटो जिले के सभी पुलिस थानों को भेज दिए गए. यह 4 फरवरी, 2020 की बात थी.

एक तरफ जहां पुलिस दीपक की तलाश में लगी हुई थी, वहीं दूसरी तरफ दीपक के घर वाले अपनी जानपहचान, नातेरिश्तेदारों और उन के दोस्तों से लगातार संपर्क कर रहे थे. लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी दीपक के घर वालों और पुलिस को दीपक का कोई सुराग नहीं मिला. ऐसी स्थिति में घर वालों का विश्वास डगमगा रहा था. उन्हें यकीन हो गया था कि दीपक के अचानक गायब होने के पीछे कोई गहरा राज है, जिस का रहस्य दीपक की पत्नी अंजलि और ड्राइवर प्रशांत पाटिल के पेट में छिपा है. इस का संकेत दीपक पट्टनदार के भाई उदय पट्टनदार ने थाने के अधिकारियों को दे दिया था. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात जैसा ही रहा.

पुलिस अधिकारियों ने दीपक की पत्नी अंजलि और ड्राइवर प्रशांत पाटिल को कई बार थाने बुला कर पूछताछ भी की थी, लेकिन उन से दीपक के बारे में कोई सूचना नहीं मिली. 8-10 दिन और निकल जाने के बाद भी जब पुलिस दीपक के बारे में कोई पता नहीं लगा पाई तो उदय पट्टनदार और उस के घर वालों को लगने लगा कि दीपक के साथ कोई अनहोनी हुई है. जब धैर्य जवाब देने लगा तो वे लोग बेलगांव के एसपी लक्ष्मण निमबार्गी से मिले. उन लोगों ने कप्तान साहब को सारी कहानी सुनाई. एसपी लक्ष्मण निमबार्गी ने गुमशुदा फौजी दीपक पट्टनदार के घर वालों की बातों को बड़े ध्यान से सुना और थाना मरिहाल के थानाप्रभारी को शीघ्र से शीघ्र फौजी दीपक का पता लगाने के निर्देश दिए.

मामला एक प्रतिष्ठित परिवार और आर्मी अफसर की गुमशुदगी से संबंधित था. थानाप्रभारी विजय कुमार सिंतुर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में जांच शुरू कर दी. उन्होंने बिना किसी विलंब के इंसपेक्टर एम.वी. बड़ीगेर, वी.पी. मुकुंद, वी.एस. नाइक, आर.एस. तलेवार आदि के साथ मिल कर जांच की रूपरेखा तैयार की. सब से पहले उन्होंने केस का अध्ययन किया. इस के साथ ही साथ उन्होंने तेजतर्रार मुखबिरों को गुमशुदा दीपक पट्टनदार का सुराग लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी, जिस में उन्हें कामयाबी भी मिली.  मुखबिरों से मिली सूचना के आधार पर थानाप्रभारी विजय कुमार सिंतुर ने दीपक पट्टनदार की पत्नी अंजलि का बैकग्राउंड खंगाला तो कई चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं, जिस के बाद अंजलि पर उन का शक गहरा गया.

उन्होंने अंजलि को थाने बुला कर उस से पूछताछ शुरू की तो वह पहले जैसा ही बयान दे कर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही. इतना ही नहीं, वह अपनी ससुराल पक्ष के लोगों पर कई तरह के गंभीर आरोप लगा कर उन्हें पुलिस के राडार पर खड़ा करने की कोशिश कर रही थी. लेकिन इस बार वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हुई. क्योंकि पुलिस को अंजलि के चालचलन को ले कर कई तरह की जानकारी मिल चुकी थी, इसलिए वह पुलिस के शिकंजे में फंस ही गई. पुलिस ने उस के साथ जब थोड़ी सख्ती बरती तो उस के हौसले पस्त हो गए. अपना गुनाह स्वीकार करते हुए आखिर उस ने पति दीपक पट्टनदार की हत्या की कहानी पुलिस को बता दी. थानाप्रभारी के पूछताछ करने पर अंजलि ने पति दीपक की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंका देने वाली थी—

35 वर्षीय दीपक पट्टनदार सुंदर, स्वस्थ और महत्त्वाकांक्षी युवक था. उस के पिता का नाम चंद्रकांत पट्टनदार था. उस के परिवार में मांबाप के अलावा एक छोटा भाई उदय पट्टनदार के अलावा एक बहन थी. दीपक की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत थी. समाज में प्रतिष्ठा और मानसम्मान था. पढ़ाई पूरी करने के बाद दीपक ने अपनी किस्मत आजमाने के लिए इंडियन आर्मी का रुख किया तो उस का चयन हो गया. पहली पोस्टिंग के बाद जब वह अपने घर आया तो परिवार वालों ने उस की शादी अंजलि के साथ कर दी. 27 वर्षीय अंजलि के पास रूप भी था और यौवन भी. आर्मी जवान को पति के रूप में पा कर अंजलि खूब खुश थी. दीपक भी अंजलि का पूरापूरा ध्यान रखता था. उस की जरूरत की सारी चीजें घर में मौजदू रहती थीं.

इंडियन आर्मी में होने के कारण दीपक को अपने परिवार और पत्नी के साथ रहने के लिए बहुत ही कम समय मिलता था. वह साल में एकदो बार ही महीने 2 महीने के लिए घर आ पाता था. लेकिन इस से अंजलि का मन नहीं भरता था. छुट्टियों का यह समय तो पलक झपकते ही निकल जाता था. पति दीपक के जाने के बाद अंजलि को फिर वही अकेलापन, तनहाइयां घेर लेती थीं. उस का दिन तो किसी तरह गुजर जाता था लेकिन रात उस के लिए नागिन बन जाती थी. वह पूरी रात करवटें बदलबदल कर बिताती थी, जिस का फायदा अंजलि के चतुर चालाक ड्राइवर प्रशांत पाटिल ने उठाया. ड्राइवर प्रशांत पाटिल उसी के गांव का रहने वाला था. अंजलि और प्रशांत पाटिल के बीच की दूरियां जल्द ही दूर हो गईं.

अंजलि जब बनसंवर कर कहीं आनेजाने के लिए कार में बैठती थी, प्रशांत उस की सुंदरता और कपड़ों की खूबसूरती का पुल बांध देता था. मन ही मन उस के शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती थी. जब वह दीपक पट्टनदार का वह नाम लेता तो अंजलि का मन विचलित हो जाता था. एक कहावत है कि नारी मन की 2 कमजोरियां होती हैं. वह प्यार और अपनी प्रशंसा की अधिक भूखी होती है. यह बात प्रशांत अच्छी तरह से जानता था. अंजलि कभी प्रशांत पाटिल के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर मुसकराती तो कभी झेंप जाती थी.  समय अपनी गति से चल रहा था. एक तरफ जहां दीपक पट्टनदार अंजलि से दूर था, वहीं प्रशांत पाटिल उस के करीब आता जा रहा था. अंजलि का मन आकर्षित करने का वह कोई मौका नहीं छोड़ता था. धीरेधीरे अंजलि भी उस की तरफ आकर्षित होने लगी थी.

एक रात जब अंजलि की बेचैनी बढ़ी तो उस ने प्रशांत पाटिल को फोन कर सुबह ड्यूटी पर जल्दी आने के लिए कहा. सुबह जब प्रशांत पाटिल ड्यूटी पर आया तो अंजलि प्रशांत के मनपसंद कपड़े पहन कर कार में आ बैठी. कार जब घर के कंपाउंड से बाहर निकली तो अंजलि ने अपनी खामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘‘प्रशांत देखो आज, मैं ने तुम्हारी पसंद के कपड़े पहने हैं.’’

‘‘वही तो देख रहा हूं मालकिन, आज किस पर बिजली गिराएंगी. बताओ, कहां चलना है?’’ प्रशांत ने कहा.

‘‘बिजली किस पर गिरेगी, यह मैं बाद में बताऊंगी. पहले तुम मुझे अपनी मनपसंद जगह ले कर चलो, क्योंकि मैं ने आज तुम्हारे मनपसंद कपड़े पहने हैं. आज मैं केवल तुम्हारे लिए ही तैयार हुई हूं.’’

पहले तो प्रशांत पाटिल की समझ में अंजलि की रहस्यमय बातें नहीं आईं, लेकिन जब समझ में आईं तो अंजलि के अशांत मन का तूफान आ कर शांत हो चुका था. अंजलि प्रशांत के साथ पहले एक पार्क में गई. वहां अंजलि ने उसे साफसाफ बता दिया कि वह उसे कितना प्यार करती है. मालकिन का यह झुकाव देख कर प्रशांत भी फूला नहीं समा रहा था. उस के बाद अंजलि उसे एक होटल में ले गई और पतिपत्नी के नाम से 3 घंटे के लिए एक कमरा बुक किया. वहां दोनों ने अपनी सीमाओं को तोड़ दिया. एक बार जब मर्यादा की सीमाएं टूटीं तो फिर टूटती ही चली गईं. ज्योति जब से ड्राइवर प्रशात के संपर्क में आई, तब से अपने घर वालों से कटीकटी सी रहने लगी थी. घर के कामों में उस की कोई रुचि नहीं रह गई थी.

उस के मन में जब भी मौजमस्ती का तूफान उठता, वह घर वालों से कोई न कोई बहाना कर ड्राइवर प्रशांत के साथ कभी बेलगांव तो कभी गोकाक के लिए निकल जाती थी. कभी पार्कों में तो कभी मौल और कभी अच्छे होटलों में जा कर वह प्रशांत के साथ मौजमस्ती कर लौट आती थी.अंजलि के बदले हुए इस रूप से घर वाले अनभिज्ञ नहीं थे. वह जल्दी ही घर वालों की नजरों में आ गई. ये लोग जब अंजलि के बाहर जाने और लौटने पर सवाल उठाते तो वह उन पर बिफर पड़ती. उस ने यह कह कर सब का मुंह बंद कर दिया कि कार उस की, ड्राइवर उस का और पैसा उस के पति का है. जब वह इन चीजों का प्रयोग करती है तो उन के पेट में दर्द क्यों उठता है. उस का मन जहां करेगा, वहां जाएगी.

मामला नाजुक होने के कारण घर वाले तब तक खामोश रहे, जब तक दीपक घर नहीं आया. 29 दिसंबर, 2019 को दीपक 2 महीने की छुट्टी पर जब घर आया तो घर वालों ने उसे उस की पत्नी के विषय में सारी बातें बता कर उसे सचेत कर दिया. पहले तो दीपक को घर वालों की बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ. क्योंकि 7 साल के वैवाहिक जीवन में उसे कभी भी अंजलि के प्रति कोई शिकायत नहीं मिली थी. पूरा परिवार अंजलि के व्यवहार से खुश था. लेकिन बिना आग के धुआं तो उठता नहीं है. उसे यह बात जल्द समझ में आ गई. दीपक ने चुपचाप अंजलि पर नजर रखी तो अंजलि की बेवफाई जल्द ही उस के सामने आ गई.

हालांकि अंजलि और प्रशांत अपने संबंधों के प्रति काफी सावधानी बरतते थे. लेकिन वह इस में सफल नहीं हुए. दीपक को जल्द ही महसूस होने लगा कि अंजलि का उस के प्रति अब पहले जैसा व्यवहार और लगाव नहीं है. अंजलि के बदले हुए इस व्यवहार पर दीपक ने जब उसे आड़ेहाथों लिया तो अंजलि ने दीपक से माफी मांग कर उस समय तो मामला शांत कर दिया लेकिन अपने आप को वह समझा नहीं सकी. उस के दिल में प्रशांत पाटिल के प्रति जो लौ जल रही थी, वह बुझी नहीं थी. उस ने जब अपने मन में पति और प्रेमी की तुलना की तो उसे प्रेमी पति से ज्यादा प्यारा लगा.

लेकिन यह तभी संभव था जब पति नामक कांटा उस की जिंदगी से बाहर निकल जाता. इस विषय पर काफी मंथन के बाद अंजलि ने पतिरूपी कांटे को अपने और प्रेमी के बीच से निकाल फेंकने की एक गहरी साजिश रची. अपनी साजिश की बात अंजलि ने जब प्रशांत को बताई तो वह खुशीखुशी अंजलि की साजिश में शामिल ही नहीं हुआ, बल्कि अपने दोस्त नवीन कंगेरी और प्रवीण हिदेद को भी योजना में शामिल कर लिया. इस के बाद अंजलि ने पति को ज्यादा प्यार जताना शुरू कर दिया ताकि उसे शक न हो. घर का माहौल और दीपक का व्यवहार अपने अनुरूप देख कर अंजलि ने अपनी साजिश को अंतिम रूप देने के लिए पिकनिक का प्रोग्राम बनाया. पिकनिक के लिए गोडचिनमलकी फौल को चुना गया.

घटना के दिन अंजलि पति दीपक, ड्राइवर प्रशांत पाटिल और उस के 2 दोस्तों नवीन कंगेरी और प्रवीण हिदेद को साथ ले कर पिकनिक के लिए निकली. योजना के अनुसार, ड्राइवर प्रशांत ने गोडचिनमलकी के पहले ही एक सुनसान जगह पर कार रोड की साइड में खड़ी कर दी. साथ ही उस ने शराब पीने की भी इच्छा जाहिर की. एक ही गांव और जानपहचान होने के कारण दीपक उन्हें मना नहीं कर सका. उन लोगों ने खुद तो शराब पी ही, दीपक को भी जम कर पिला दी थी. शराब के नशे में मदहोश होने के बाद प्रशांत अपने दोनों दोस्तों की मदद से दीपक को जंगल के भीतर ले गया. जब तक काम खत्म नहीं हुआ, अंजलि कार में बैठी रही.

दीपक को जंगल के भीतर ले जाने के बाद प्रशांत पाटिल ने अपने साथ लाए चाकू से कई वार कर दीपक को मौत की नींद सुला दिया. इस के बाद उस के शव के 4 टुकड़े कर जंगल में फेंक दिए. दीपक पट्टनदार की हत्या कर उस की लाश ठिकाने लगाने के बाद सब अपनेअपने घर चले गए, जहां से मरिहाल पुलिस के हत्थे चढ़ गए. घर वालों के पूछने पर अंजलि ने वही बातें दोहरा दी थी, जो उस ने पुलिस अधिकारियों को गुमराह करने के लिए बताई थीं. मरिहाल पुलिस की गिरफ्त में आई अंजलि पट्टनदार, ड्राइवर प्रशांत पाटिल, नवीन कंगेरी और प्रवीण हिदेद से विस्तृत पूछताछ कर पुलिस ने 20 फरवरी, 2020 को उन की निशानदेही पर गोडचिनमलकी के जंगलों में जा कर दीपक के अस्थिपंजर बरामद कर लिए.

जिन्हें पोस्टमार्टम के लिए बेलगांव जिला अस्पताल भेज दिया गया और सभी अभियुक्तों को फौजी दीपक पट्टनदार की हत्या कर लाश ठिकाने लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें हिडंलगा जिला जेल भेज दिया गया.

 

UP News : पत्नी की हत्या कर शव पर एक क्विंटल का पत्थर बांधकर बांध में फेंका

UP News :कभीकभी अचानक ऐसा कुछ हो जाता है कि हम समझ तक नहीं पाते कि यह सब कैसे और क्यों हुआ. सच यह है कि यह वक्त की ताकत होती है, जो इंसान के कर्म के हिसाब से अपनी मौजूदगी का अहसास कराती है. भरत दिवाकर ने नमिता को ठिकाने लगाने की जो योजना बनाई थी, उस ने बनाते हुए सोचा भी नहीं होगा कि इस का उलटा भी हो सकता है. आखिर यह सब…,

15 जनवरी, 2020. उत्तर प्रदेश का जिला चित्रकूट. थाना भरतकूप के थानाप्रभारी संजय उपाध्याय अपने औफिस में बैठे थे. तभी भरतकूप के ही रहने वाले यशवंत सिंह उन के पास आए. यशवंत सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस के रिटायर्ड सबइंसपेक्टर थे. यशवंत सिंह ने थानाप्रभारी को अपना परिचय दिया तो उन्होंने उन को सम्मान से कुरसी पर बैठाया. इस के बाद उन्होंने उन से आने का कारण पूछा तो यशवंत सिंह ने कहा, ‘‘सर, एक बहुत बड़ी प्रौब्लम आ गई है.’’

‘‘बताएं, क्या बात है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कल से मेरी बेटी नमिता का कहीं पता नहीं चल रहा है. मुझे आशंका है कि उस के पति पूर्व ब्लौक प्रमुख भरत दिवाकर ने उस की हत्या कर के लाश कहीं गायब कर दी है.’’

‘‘क्या?’’ यह सुनते ही एसओ संजय उपाध्याय चौंके, ‘‘आप की बेटी की हत्या कर के लाश गायब कर दी?’’

‘‘हां सर, भरत भी कल से ही लापता है. उस का भी कहीं पता नहीं है.’’ यशवंत सिंह ने बताया.

‘‘ठीक है, आप एक तहरीर लिख कर दे दें. मैं मुकदमा दर्ज कर आवश्यक काररवाई करता हूं. इस बारे में जैसे ही मुझे कोई सूचना मिलती है, आप को इत्तला कर दूंगा.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

यशवंत सिंह ने अपने 35 वर्षीय दामाद भरत दिवाकर को नामजद करते हुए लिखित तहरीर दे दी. उस तहरीर के आधार पर पुलिस ने नमिता की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस ने जांचपड़ताल की तो मामला सही पाया गया. पड़ताल के दौरान एसओ उपाध्याय को पता चला कि 14 जनवरी, 2020 की रात करीब 10 बजे भरत दिवाकर को पत्नी नमिता के साथ गाड़ी में एक मिठाई की दुकान पर देखा गया था. उस के बाद से ही दोनों लापता थे. मामला गंभीर था. एसओ संजय उपाध्याय ने इसे बहुत संजीदगी से लिया. उन्होंने इस की सूचना एसपी अंकित मित्तल, एएसपी बलवंत चौधरी और सीओ (सिटी) रजनीश यादव को दे दी.

मामला समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व ब्लौक प्रमुख व उस की पत्नी के रहस्यमय ढंग से लापता होने से जुड़ा था. वैसे भी भरत दिवाकर कोई छोटामोटा आदमी नहीं था. वह खुद तो पूर्व ब्लौक प्रमुख था ही, उस की दादी दशोदिया देवी भी पूर्व ब्लौक प्रमुख थीं. दशोदिया देवी शहर की जानीमानी हस्ती थीं. इस परिवार का रुतबा था, शान थी, ऐसे में पुलिस का परेशान होना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं थी. भरत दिवाकर और उस की पत्नी नमिता का पता लगना जरूरी था. उसी दिन सुबह 11 बजे के करीब भरत दिवाकर की बहन सुमन के मोबाइल पर एक काल आई थी. काल भरत दिवाकर के ड्राइवर रामसेवक निषाद ने की थी. उस ने सुमन को बताया कि भरत भैया रात करीब 2-3 बजे बरुआ सागर बांध पर आए थे. उन की गाड़ी में बोरे में कोई वजनी चीज थी. उन के साथ मैं भी था.

हम दोनों बोरे में भरी चीज को ले कर बांध के किनारे पहुंचे. वहां पहले से एक नाव खड़ी थी. हम दोनों बोरे को ले कर नाव पर सवार हुए और आगे बढ़ गए. बोरा बांध में पलटते वक्त अचानक नाव पानी में पलट गई. अपनी जान बचा कर मैं तो किसी तरह तैर कर पानी से बाहर निकल आया, लेकिन भैया पानी में डूब गए. रामसेवक निषाद की बाद सुन कर सुमन हतप्रभ रह गई. उस ने यह बात अपनी मां चुनबुद्दी देवी से बताई तो मां के भी होश फाख्ता हो गए. बीती रात से मांबेटी भरत के घर लौटने का इंतजार कर रही थीं. लेकिन वह घर नहीं लौटा. उस का फोन भी नहीं लग रहा था.

भरत दिन में भले ही कहीं भी रहता हो, शाम होते ही घर लौट आता था. जब वह रात भर घर नहीं लौटा तो उस के घर वालों को चिंता हुई. वे लोग उस की तलाश में जुट गए. उस के सारे यारदोस्तों से फोन कर के पूछ लिया गया, लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं चला. जब सुबह 11 बजे रामसेवक ने फोन से सुमन को सूचना दी तो घर वाले समझे कि भरत के साथ अनहोनी हो चुकी है. फिर क्या था, घर में कोहराम मच गया, रोनापीटना शुरू हो गया. ऐसे में सुमन ने थोड़े संयम से काम लिया.

उस ने भाई के साथ हुई अनहोनी की जानकारी समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष अनूप कुमार को दे कर मदद की गुहार लगाई. क्योंकि उस समय सुमन को यही ठीक लगा. भरत के बांध में डूबने की जानकारी होते ही वह भी सकते में आ गया. जिस बरुआ सागर बांध में घटना घटी थी, वह भरतकूप थाना क्षेत्र में पड़ता था. अनूप ने इस की जानकारी भरतकूप थाने के एसओ संजय उपाध्याय को दे दी. एसओ संजय ने शिवराम चौकीप्रभारी अजीत सिंह को सूचित किया और मौके पर पहुंचने के आदेश दिए. अजीत सिंह के मौके पर पहुंचने के कुछ देर बाद एसओ संजय सिंह पुलिस टीम के साथ बरुआ सागर बांध पहुंच गए.

बांध के किनारे भरत दिवाकर की सफेद रंग की कार यूपी26डी 3893 लावारिस खड़ी मिली. कार की तलाशी ली गई तो उस में एक पैर की लेडीज चप्पल मिली. सुमन ने चप्पल पहचान ली. वह चप्पल उस की भाभी की थी. पुलिस ने बरामद चप्पल साक्ष्य के तौर पर अपने कब्जे में ले ली. नमिता और भरत दिवाकर के गायब होने की खबर जिले भर में फैल गई. धीरेधीरे बांध पर लोगों की भीड़ जमा होने लगी. थोड़ी देर में  एएसपी बलवंत चौधरी, सीओ रजनीश यादव, कोतवाल अनिल सिंह, सपा के जिलाध्यक्ष अनूप कुमार और भरत दिवाकर के घर वाले भी पहुंच गए.

एएसपी बलवंत चौधरी ने एक नाव की व्यवस्था कराई. नाव के साथ ही एक गोताखोर और एक बड़े जाल का इंतजाम भी करवाया गया. पूरा इंतजाम हो जाने के बाद उन्होंने भरत का पता लगाने के लिए नाव में सवार हो कर बांध में उतरने का फैसला किया. पुलिस गोताखोर के साथ पूरा दिन बांध की खाक छानती रही लेकिन न तो भरत का कोई पता चला और न ही नमिता का. उधर पुलिस ने भरत दिवाकर के ड्राइवर रामसेवक निषाद को हिरासत में ले कर पूछताछ जारी रखी थी. लगातार चली कड़ी पूछताछ के बाद रामसेवक पुलिस के सामने टूट गया. उस ने जुर्म कबूलते हुए पुलिस को बताया कि भरत ने अपनी पत्नी नमिता की हत्या कर दी थी.

वे दोनों उस की लाश को बोरे में भर कर ठिकाने लगाने के लिए बरुआ बांध लाए थे. लाश ठिकाने लगाने में मैं ने उन का साथ दिया. गाड़ी में से लाश निकाल कर हम ने एक बोरे में भर दी. फिर हम ने दूसरे बोरे में करीब एक क्विंटल का पत्थर भर कर नमिता की कमर में बांध दिए, ताकि लाश पानी के ऊपर न आ सके और उस की मौत का राज सदा के लिए इसी बांध में दफन हो कर रह जाए. रामसेवक के बयान से साफ हो गया था कि भरत दिवाकर ने ही अपनी पत्नी नमिता की हत्या की थी और लाश ठिकाने लगाने के चक्कर में वह पानी में गिर कर डूब गया था. खैर, उस दिन पुलिस की मेहनत का कोई खास परिणाम नहीं निकला. शवों की बरामदगी के लिए एसपी अंकित मित्तल ने इलाहाबाद के स्टेट डिजास्टर रिस्पौंस फंड (एसडीआरएफ) से संपर्क कर मदद मांगी.

अगली सुबह यानी 16 जनवरी, 2020 की सुबह 11 बजे एसडीआरएफ की टीम चित्रकूट पहुंची और अपने काम में जुट गई. बांध काफी बड़ा और गहरा था. टीम को सर्च करते हुए सुबह से शाम हो गई, इस बीच नमिता की लाश तो मिल गई, लेकिन भरत दिवाकर का कहीं पता नहीं चला. बांध से नमिता की लाश मिलने के बाद पुलिस को यकीन हो गया कि भरत की लाश भी इसी बांध में कहीं फंसी पड़ी होगी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के नमिता की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. अगले दिन पुलिस को नमिता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई.

रिपोर्ट में उस का गला दबा कर हत्या करने की पुष्टि हुई. यानी भरत दिवाकर ने नमिता की गला दबा कर हत्या की थी. अब सवाल यह था कि उस ने उस की हत्या क्यों की? इस का जवाब भरत से ही मिल सकता था, जबकि वह अभी भी लापता था. सच्चाई का पता लगाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती थी. आखिरकार नौवें दिन यानी 22 जनवरी को उस समय भरत दिवाकर का चैप्टर बंद हो गया, जब उस की लाश बांध के अंदर पानी में उतराती हुई मिली. इस से लोगों के बीच चल रही तरहतरह की अटकलों पर हमेशा के लिए विराम लग गया. नमिता हत्याकांड राज बन कर रह गया था. इस राज से परदा उठाना पुलिस के लिए लाजिमी हो गया था.

उधर पुलिस ने नमिता की लाश मिलने के बाद पति भरत दिवाकर और ड्राइवर रामसेवक निषाद के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर रामसेवक को गिरफ्तार कर लिया था. उस ने भरत दिवाकर के साथ नमिता की लाश ठिकाने लगाने में उस का साथ दिया था. रामसेवक और घर वालों से हुई पूछताछ के बाद नमिता हत्याकांड की कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व एसआई यशवंत सिंह भरतकूप इलाके में परिवार के साथ रहते हैं. पत्नी विमला देवी और पांचों बच्चों के साथ वह खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे. उन के बच्चों में 4 बेटियां और एक बेटा था. बेटियों में नमिता उर्फ मीनू तीसरे नंबर की थी. बेटा सब से बड़ा था. यशवंत सिंह ने उस की गृहस्थी बसा दी थी. चारों ननदों में से अर्चना की नमिता से ही अच्छी पटती थी. अर्चना नमिता की भाभी ही नहीं, अच्छी सहेली भी थी. वह अपने दिल की हर बात, हर राज भाभी से शेयर करती थी. भरत दिवाकर से प्रेम वाली बात जब नमिता ने अर्चना से बताई तो वह चौंके बिना नहीं रह सकी. ननद नमिता को उस ने बड़े प्यार से समझाया कि अपनी और घर की मानमर्यादा का खयाल जरूर रखे. कहीं कोई ऐसा कदम न उठाए जिस से जगहंसाई हो.

भाभी को उस ने विश्वास दिलाया कि वह कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिस से मांबाप का सिर समाज में झुके. उस के बाद उस ने भाभी से अपने प्यार की कहानी सिलसिलेवार बता दी थी. बात नमिता के कालेज के दिनों की है. उन्हीं दिनों कालेज में भरत दिवाकर भी पढ़ता था. कालेज में नमिता की खूबसूरती के खूब चर्चे थे. नमिता के दीवानों में भरत दिवाकर भी था, जो उस की खूबसूरती पर फिदा था. कालेज में आने के बाद भरत पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय नमिता के पीछे चक्कर काटता रहता था. आखिरकार नमिता कुंवारे दिल को कब तक अपने दुपट्टे के पीछे छिपाए रखती. अंतत: उस के दिल के दरवाजे पर भरत दिवाकर के प्यार का ताला लग ही गया.

खूबसूरत नमिता ने भरत की आंखों के रास्ते उस के दिल की गहराई में मुकाम बना लिया था. दिन के उजाले में भरत की आंखों के सामने मानो हर घड़ी नमिता की मोहिनी सूरत थिरकती रहती थी. नमिता के दिल में भी ऐसी ही हलचल मची थी, जैसे किसी शांत सरोवर में किसी ने कंकड़ फेंक कर लहरें पैदा कर दी हों. भरत दिवाकर और नमिता के दिलों में मोहब्बत की मीठीमीठी लहरें उठने लगीं. दोनों एकदूसरे की सांसों में समा चुके थे. चाहत दोनों ओर थी, सो धीरेधीरे बातें शुरू हुईं और फिर दोनों मिलने भी लगे. इस से चाहत भी बढ़ती गई और नजदीकियां भी. प्यार की इस बुनियाद को पक्का करने के लिए दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

प्यार की राह में नमिता ने कदम आगे बढ़ा तो लिया था, लेकिन उस के अंजाम को सोच कर वह सिहर उठी थी. वह जानती थी कि उस के प्यार पर उस के पिता स्वीकृति की मोहर नहीं लगाएंगे. अपने प्यार को पाने के लिए उसे घर वालों से बगावत करनी होगी. इस के लिए वह मानसिक रूप से तैयार थी. आखिरकार सन 2014 में नमिता ने घरपरिवार से बगावत कर के प्यार की राह थाम ली और भरत दिवाकर की दुलहन बन गई. भरत और नमिता ने कोर्टमैरिज कर ली. अनमने ढंग से ही सही भरत के घर वालों ने नमिता को स्वीकार कर लिया था.

बेटी द्वारा उठाए कदम से यशवंत सिंह की बरसों की कमाई सामाजिक मानमर्यादा धूमिल हो गई थी. पिता ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन का अपना खून अपनों को ही कलंकित कर देगा. जिस दिन बेटी ने अपनी मरजी से पिता की दहलीज लांघी थी, उसी दिन से उन्होंने सीने पर पत्थर रख कर नमिता से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया था. परिवार से उन्होंने कह दिया था कि आज के बाद नमिता हमारे लिए मर चुकी है. गलती से जिस ने भी उस से रिश्ता जोड़ने की कोशिश की, वह भी मरे के समान होगा. यशवंत सिंह के फैसले से सब डर गए और अपनेअपने दिलों से नमिता की यादों को सदा के लिए निकाल फेंका. उस दिन के बाद यशवंत सिंह के घर में नमिता नाम का चैप्टर बंद हो गया.

भरत दिवाकर नमिता को पा कर बेहद खुश था, नमिता भी खुश थी. दिवाकर की रगों में दशोदिया देवी के खानदान का खून दौड़ रहा था, जहां से राजनीति की धारा फूटती थी. लोग दशोदिया देवी की कूटनीति का लोहा मानते थे तो पौत्र कहां पीछे रहने वाला था. उसे जो पसंद आ जाता था, उसे हासिल कर के ही दम लेता था. इसी के चलते वह अपनी पसंद की दुलहन घर लाया था. भरत ने दादी से राजनीति का ककहरा सीख लिया था. राजनीति के अखाड़े में मंझा पहलवान बन कर उतरे भरत ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया. वह जानता था कि राजनीति अवाम पर हुकूमत करने के लिए एक सुरक्षा कवच है और बहुत बड़ी ताकत भी. वह इस ताकत को हासिल कर के ही रहेगा.

अपनी मेहनत और संपर्कों के बल पर उस ने पार्टी और कर्वी ब्लौक में अच्छी छवि बना ली थी. इस का परिणाम भरत के हक में बेहतर साबित हुआ. भरत दिवाकर कर्वी ब्लौक का प्रमुख चुन लिया गया. ब्लौक प्रमुख चुने जाने के बाद यानी सत्ता का स्वाद चखते ही उस के पांव जमीन पर नहीं रहे. सत्ता के गुरूर में भरत अंधा हो चुका था. इतना अंधा कि वह यह भी भूल गया था उस की एक पत्नी है, जिस ने अपने परिवार से बगावत कर के उस का दामन थामा था. पत्नी के प्रति फर्ज को भी वह भूल गया था. कल तक भरत जिस नमिता के पीछे भागतेभागते थकता नहीं था, अब उसे देखने के लिए उस के पास वक्त नहीं होता था. यह बात नमिता को काफी खलती थी. इस की एक खास वजह यह थी कि न तो उसे परिवार का प्यार मिल रहा था और न ही किसी का सहयोग.

घर भौतिक सुखसुविधाओं से भरा था. भरत के मांबाप ने नमिता को भले ही अपना लिया था, लेकिन उसे बहू का दरजा नहीं दिया गया था. कोई उस से बात तक करना पसंद नहीं करता था. ऐसे में पति का ही एक सहारा था. लेकिन वह भी सत्ता की चकाचौंध में खो गया था. अब नमिता को अपनी भूल का अहसास हो रहा था. मांबाप की बात न मान कर उस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी. अब वह वापस घर भी नहीं लौट सकती थी. पिता ने उस से सारे रिश्ते तोड़ कर सदा के लिए दरवाजा बंद कर दिया था.

नमिता को भविष्य की चिंता सताने लगी थी. चिंता करना इसलिए जायज था, क्योंकि वह भरत के बच्चे की मां बन चुकी थी. समय के साथ उस ने एक बेटी को जन्म दिया था, जिस का नाम तान्या रखा गया था. बेटी के भविष्य को ले कर नमिता चिंता में डूबी रहती थी. ससुराल की रुसवाइयां और पति की दूरियां नमिता के लिए शूल बन गई थीं. भरत कईकई दिनों तक घर से बाहर रहता था और जब लौटता था तो शराब के नशे में धुत होता था. पति का घर से बाहर रहना फिर भी नमिता ने सहन कर लिया था, लेकिन शराब पी कर घर आना उसे कतई बरदाश्त नहीं था.

एक रात वह पति के सामने तन कर खड़ी हो गई, ‘‘मैं नहीं जानती थी कि आप ऐसे निकलेंगे. आप ने मेरी जिंदगी नर्क से बदतर बना दी और खुद शराब की बोतलों में उतर गए. मैं सिर्फ इस्तेमाल वाली चीज बन कर रह गई हूं, जिसे इस्तेमाल कर के कपड़े के गट्ठर की तरह कोने में फेंक दिया गया है. कभी सोचा आप ने कि मैं आप के बिना कैसे जीती हूं?’’

दोनों हथेलियों से आंसू पोंछते हुए वह आगे बोली, ‘‘मैं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस के लिए मैं अपना सब कुछ न्यौछावर कर रही हूं, वह शराबी निकलेगा, सितमगर निकलेगा. अरे मेरा न सही कम से कम बेटी के बारे में तो सोचते, जो इस दुनिया में अभीअभी आई है. कैसे जालिम पिता हो आप, ढंग से गोद में उठा कर प्यार भी नहीं कर सकते?’’

नशे में धुत भरत चुपचाप खड़ा पत्नी की डांट सुनता रहा. उस से ढंग से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. शरीर हवा में झूमता रहा. फिर वह बिस्तर पर जा गिरा और पलभर में खर्राटें भरने लगा. नमिता से जब बरदाश्त नहीं हुआ तो उस ने अपनी नाक पल्लू से ढंक ली. फिर उसे घूरती हुई बोली, ‘‘मेरी तो किस्मत ही फूटी थी जो इन से शादी कर ली. उधर मायका छूट गया और इधर… कितनी बदनसीब हूं मैं जो किसी के कंधे पर सिर रख कर आंसू भी नहीं बहा सकती.’’

उस दिन के बाद पति और पत्नी के बीच तल्खी बढ़ गई. छोटीमोटी बातों को ले कर दोनों के बीच विवाद होने लगे. पतिपत्नी के साथ हाथापाई की नौबत आने लगी. अब तो जब भी भरत शराब के नशे में घर लौटता, अकारण ही पत्नी के साथ मारपीट करता. दोनों के रोजरोज की किचकिच से घर युद्ध का मैदान बन गया था. बेटे और बहू के झगड़ों से तंग आ कर मांबाप ने उन्हें घर छोड़ कहीं और चले जाने को कह दिया. मांबाप का तल्ख आदेश सुन कर भरत गुस्से में तिलमिला उठा. उस ने सारा दोष पत्नी के मत्थे मढ़ दिया कि उसी की वजह से घर में अशांति फैली है. गलत वह खुद था न कि नमिता. लेकिन पुरुष होने के नाते उस की नजर में गलत नमिता थी, सो वह नमिता को ही मिटाने की सोचने लगा.

नमिता से छुटकारा पाने के लिए भरत ने मन ही मन एक खतरनाक योजना बना ली. योजना को अंजाम देने के लिए उस ने मोहल्ले में ही थोड़ी दूरी पर किराए का एक कमरा ले लिया और पत्नी और बेटी को ले कर वहां शिफ्ट कर गया. अपनी खतरनाक योजना में उस ने अपने ड्राइवर और ठेका पट्टी की देखभाल करने वाले रामसेवक निषाद को मिला लिया. दरअसल भरत का 5 साल का ब्लौक प्रमुख का कार्यकाल पूरा हो चुका था, ब्लौक प्रमुख की कुरसी जा चुकी थी. उस के बाद उसे भरतकूप थानाक्षेत्र स्थित बरुआ सागर बांध का ठेका पट्टा मिल गया था. उस ने वहां बड़े पैमाने पर मछलियां पाल रखी थीं. मछलियों के व्यापार से उसे काफी अच्छी आय हो जाती थी. इस की देखरेख उस ने अपने विश्वासपात्र ड्राइवर रामसेवक को सौंप रखी थी. वह मछलियों की रखवाली भी करता था और मालिक की गाड़ी भी चलाता था. यह बात अक्तूबर 2019 की है.

राजनीति के मंझे खिलाड़ी भरत दिवाकर ने पत्नी नमिता से छुटकारा पाने की ऐसी योजना बना रखी थी कि किसी को उस पर शक ही न हो. उस ने ऐसा जाल इसलिए बिछाया था ताकि उस का राजनीतिक कैरियर बचा रहे. इस के बाद उस ने पत्नी को विश्वास में लेना शुरू कर दिया. भरत ने नमिता को यकीन दिलाते हुए कहा, ‘‘नमिता, बीते दिनों जो हुआ उसे भूल जाओ. अब से हम एक नई जिंदगी की शुरुआत करते हैं, जहां हमारे अलावा चौथा कोई नहीं होगा. जो हुआ, अब वैसा कभी नहीं होगा. इसीलिए मैं ने घर वालों से दूर हो कर यहां अलग रहने का फैसला किया है.’’

पति की बातें सुन कर नमिता की आंखें भर आईं. दरअसल, भरत चाहता था कि नमिता उस के बिछाए जाल में चारों ओर से घिर जाए. अपने मकसद में वह कामयाब भी हो गया था. भोलीभाली नमिता पति के छलावे को नहीं समझ पाई थी. अपनी योजना के अनुसार भरत ने 14 जनवरी, 2020 को बेटी तान्या को बड़ी साली के घर पहुंचा दिया. रात 8 बजे के करीब भरत नमिता से बोला, ‘‘एक दोस्त के यहां पार्टी है. पार्टी में शहर के बड़ेबड़े नामचीन लोग शामिल हो रहे हैं, तुम भी अच्छे कपड़े पहन कर तैयार हो जाओ. बहुत दिन से मैं ने तुम्हें कहीं घुमाया भी नहीं है. आज पार्टी में चलते हैं.’’

यह सुन कर नमिता खुश हुई. वह फटाफट तैयार हो गई. रात करीब 9 बजे दोनों अपनी कार से मुलायमनगर की एक मिठाई की दुकान पर पहुंचे. वहां से भरत ने मिठाई खरीदी. यहीं पर भरत से एक चूक हो गई. मिठाई खरीदते समय उस की और नमिता की एक साथ की तसवीर सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई. यही नहीं, वहां से निकलने के बाद दोनों ने एक होटल में खाना भी खाया. वहां भी खाना खाते समय दोनों सीसीटीवी में कैद हो गए. इसी सीसीटीवी फुटेज के जरिए पुलिस की जांच को गति मिली थी. बहरहाल, खाना खाने के बाद भरत और नमिता होटल से निकले. भरत ने ड्राइवर रामसेवक को इशारों में संकेत दिया कि कार बरुआ सागर बांध की ओर ले चले.

मालिक का इशारा पा कर उस ने यही किया. रामसेवक कार ले कर सुनसान इलाके में स्थित बांध की ओर चल दिया. भरत और नमिता कार की पिछली सीट पर बैठे थे. गाड़ी जैसे ही शहर से दूर सुनसान इलाके की ओर बढ़ी, तो निर्जन रास्ते को देख नमिता को पति पर शक हुआ क्योंकि उस ने पार्टी में जाने की बात कही थी. नमिता ने जैसे ही सवालिया नजरों से पति की ओर देखा तो वह समझ गया कि नमिता खतरे को भांप चुकी है. आखिर उस ने चलती कार में ही अपने मजबूत हाथों से नमिता का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. योजना के मुताबिक, भरत ने पहले से ही कार की पीछे वाली सीट के नीचे एक प्लास्टिक का बड़ा बोरा रख लिया था. यही नहीं, बरुआ सागर बांध में लाश ठिकाने लगाने के लिए दिन में ही एक नाव की व्यवस्था भी कर ली थी.

इस काम के लिए भरत ने हरिहरपुर निवासी नाव मालिक रामसूरत से एक नाव की व्यवस्था करने के लिए कह दिया था. बदले में उस ने रामसूरत को कुछ रुपए एडवांस में दे दिए थे. रामसूरत ने भरत से नाव के उपयोग के बारे में पूछा तो उस ने डांट कर चुप करा दिया था. सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. लाश ठिकाने लगाने के लिए भरत रात 12 बजे के करीब कार ले कर बरुआ सागर बांध पहुंचा. बांध से कुछ दूर पहले रामसेवक ने कार रोक दी. दोनों ने मिल कर कार में से नमिता की लाश नीचे उतारी और उसे बोरे में भर दिया. फिर बोरे के मुंह को प्लास्टिक की एक रस्सी से कस कर बांध दिया.

उस के बाद बोरे के एक सिरे को भरत ने पकड़ लिया और दूसरा सिरा रामसेवक ने. दोनों बोरे को ले कर नाव के करीब पहुंच गए. वहां दोनों ने एक दूसरे बोरे में करीब एक क्विंटल का बड़ा पत्थर भर दिया, जिसे लाश की कमर में बांध दिया गया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि लाश उतरा कर पानी के ऊपर न आने पाए और राज हमेशा के लिए पानी में दफन हो कर रह जाए. भरत दिवाकर और रामसेवक ने दोनों बोरों को उठा कर नाव में रख दिया. फिर दोनों नाव में इत्मीनान से बैठ गए. नाव की पतवार रामसेवक ने संभाल रखी थी. कुछ ही देर में दोनों नाव ले कर बीच मंझधार में पहुंच गए, जहां अथाह गहराई थी. भरत ने रामसेवक को इशारा किया कि लाश यहीं ठिकाने लगा दी जाए.

इत्तफाक देखिए, जैसे ही दोनों ने लाश नाव से गिरानी चाही, नाव में एक तरफ अधिक भार हो गया और वह पानी में पलट गई. नाव के पलटते ही लाश सहित वे दोनों भी पानी में जा गिरे. रामसेवक तैरना जानता था, इसलिए वह तैर कर पानी से निकल आया और बांध पर खड़े हो कर मालिक भरत की बाट जोहने लगा. घंटों बीत जाने के बाद जब वह पानी से बाहर नहीं आया तो रामसेवक डर गया कि कहीं मालिक पानी में डूब तो नहीं गए. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो वह अपने घर लौट आया और इत्मीनान से सो गया. अगली सुबह यानी 15 जनवरी को उस ने भरत की छोटी बहन सुमन को फोन कर के भरत के बरुआ सागर बांध में डूब जाने की जानकारी दी.

इधर बेटी के अचानक लापता होने से परेशान पिता यशवंत सिंह ने भरत दिवाकर को आरोपी मानते हुए भरतकूप थाने में शिकायत दर्ज करा दी. बाद में बरुआ सागर बांध से नमिता की लाश पाए जाने के बाद पुलिस ने भरत दिवाकर और रामसेवक निषाद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. घटना के 9 दिनों बाद उसी बरुआ सागर से भरत दिवाकर की भी सड़ीगली लाश बरामद हुई, जो भोलीभाली पत्नी नमिता की हत्या को राज बनाना चाहता था. प्रकृति में भरत दिवाकर को अपने तरीके से अनोखी मौत दे कर नमिता को हाथोंहाथ इंसाफ दे दिया.

—कथा में कुछ नाम परिवर्तित हैं. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime : शादी से इनकार करने पर प्रेमी ने प्रेमिका का गला कैंची से काट डाला

UP Crime : अगर किसी युवक या युवती का प्रेम मिलन हुआ हो, लेकिन बाद में राहें अलगअलग हो गई हों तो कभी आमनेसामने पड़ने पर उन की मोहब्बत के मुरझाए फूल फिर से मुसकराने लगते हैं. लेकिन शादीशुदा होने की स्थिति में यह घातक होता है. सोना और आशीष को भी पहली मोहब्बत का…

उस दिन मार्च, 2020 की 17 तारीख थी. शाम के 4 बजे थे. मकान मालकिन पुष्पा किचन में चाय बनाने जा रही थी. तभी किसी ने डोरबैल बजाई. पुष्पा ने दरवाजा खोला तो दरवाजे पर 2 महिलाएं खड़ी थीं. उन में एक जवान थी, जबकि दूसरी अधेड़ उम्र की थी. पुष्पा ने अजनबी महिलाओं को देख कर परिचय पूछा तो उन्होंने कोई जवाब न दे कर पर्स से एक फोटो निकाली और पुष्पा को दिखाते हुए पूछा, ‘‘क्या यह आप के मकान में रहता है?’’

पुष्पा ने फोटो गौर से देखी फिर बोली, ‘‘हां, यह तो आशीष है. अपनी पत्नी सोना के साथ पिछले 6 महीने से हमारे मकान में रह रहा है. उस की पत्नी सोना कहीं बाहर काम करती है. इसलिए सप्ताह में 2-3 दिन ही आ पाती है. आज वह 12 बजे घर आई थी. आशीष भी घर पर था, लेकिन आधा घंटा पहले कहीं चला गया है.’’

मकान मालकिन पुष्पा से पूछताछ करने के बाद दोनों महिलाएं वापस चली गईं. दरअसल, ये महिलाएं गीता और उन की बहू ज्योति थीं, जो सरायमीता पनकी, कानपुर की रहने वाली थीं. सोना गीता की बेटी थी और आशीष सोना का प्रेमी था. आशीष ने कुछ देर पहले ज्योति के मोबाइल पर काल कर के जानकारी दी थी कि उस ने उस की ननद सोना को मार डाला है और उस की लाश दबौली निवासी पुष्पा के मकान में किराए वाले कमरे में पड़ी है, आ कर लाश ले जाओ.  ज्योति ने यह बात अपनी सास गीता को बताई. फिर सासबहू जानकारी लेने के लिए पुष्पा के मकान पर पहुंची, लेकिन वहां हत्या जैसी कोई हलचल न होने से दोनों वापस लौट आई थीं.

चाय पीतेपीते पुष्पा के मन में आशीष को ले कर कुछ शंका हुई तो वह पहली मंजिल स्थित उस के कमरे पर पहुंची. कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद थी और अंदर से खून बह कर बाहर की ओर आ रहा था. खून देख कर पुष्पा चीख पड़ी. मालकिन की चीख सुन कर अन्य किराएदार कमल, सुनील, टिंकू तथा शिवानंद आ गए. इस के बाद पुष्पा ने कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर झांका तो उन की आंखें फटी रह गईं. कमरे में फर्श पर खून से लथपथ सोना की लाश पड़ी थी. लाश से खून रिस कर कमरे के बाहर तक आ गया था. सोना की लाश देख कर किराएदार भी भयभीत हो उठे. इस के बाद तो हत्या की खबर थोड़ी देर में पूरे दबौली (उत्तर) में फैल गई. लोग पुष्पा के मकान के बाहर जुटने लगे.

शाम लगभग 5 बजे पुष्पा ने थाना गोविंद नगर फोन कर के किराएदार आशीष की पत्नी सोना की हत्या की जानकारी दे दी. हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अनुराग सिंह ने इस घटना से अधिकारियों को अवगत कराया और पुलिस टीम के साथ दबौली (उत्तर) स्थित पुष्पा के मकान पर जा पहुंचे. मकान के बाहर भीड़ जुटी थी. लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. भीड़ को पीछे हटा कर थानाप्रभारी अनुराग सिंह पुलिस टीम के साथ मकान की पहली मंजिल स्थित उस कमरे में पहुंचे जहां लाश पड़ी थी. सोना की हत्या बड़ी निर्दयता से की गई थी. लाश के पास ही खून से सनी कैंची तथा मोबाइल पड़ा था. देखने से लग रहा था कि हत्या के पहले मृतका से जोरजबरदस्ती की गई थी. विरोध करने पर उस के पति आशीष ने कैंची से वार कर उस की हत्या कर दी थी. न केवल सोना के पेट में कैंची घोंपी गई थी, बल्कि उस के गले को भी कैंची से छेदा गया था.

थानाप्रभारी अनुराग सिंह अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसएसपी अनंत देव, एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता और सीओ (गोविंद नगर) मनोज कुमार गुप्ता भी वहां आ गए. अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया था. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और इंसपेक्टर अनुराग सिंह से घटना के संबंध में जानकारी हासिल की. फोरैंसिक टीम ने निरीक्षण कर घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए. कैंची, दरवाजा और मेज पर रखे गिलास से फिंगरप्रिंट उठाए. जमीन पर फैले खून का नमूना भी जांच हेतु लिया गया.

निरीक्षण के दौरान सीओ मनोज कुमार गुप्ता की नजर मेज पर रखे लेडीज पर्स पर पड़ी. उन्होंने पर्स की तलाशी ली तो उस में साजशृंगार का सामान, कुछ रुपए तथा एक आधार कार्ड मिला. आधार कार्ड में युवती का नाम सोना सोनकर, पिता का नाम मुन्ना लाल सोनकर, निवासी सराय मीता, पनकी कानपुर दर्ज था. गुप्ताजी ने 2 सिपाहियों को आधार कार्ड में दर्ज पते पर सूचना देने के लिए भेज दिया. एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने मकान मालकिन पुष्पा देवी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति देवकीनंदन की मृत्यु हो चुकी है. 2 बेटे हैं, अजय व राकेश, जो बाहर नौकरी करते हैं. मकान के भूतल पर वह स्वयं रहती है, जबकि पहली मंजिल पर बने कमरों को किराए पर उठा रखा है.

मकान में 4 किराएदार शिवानंद, कमल, सुनील व टिंकू पहले से रह रहे थे. 6 महीना पहले आशीष नाम का युवक एक युवती के साथ किराए पर कमरा लेने आया था. उस ने उस युवती को अपनी पत्नी बताया, साथ ही यह भी बताया कि उस की पत्नी सोना दूरदराज नौकरी करती है. वह सप्ताह में 2 या 3 दिन ही आया करेगी. मैं ने उसे रूम का किराया 1600 रुपए बताया तो वह राजी हो गया और किराएदार के रूप में रहने लगा. उस की पत्नी सोना सप्ताह में 2 या 3 दिन आती थी. पुष्पा ने बताया कि आज 12 बजे सोना आशीष से मिलने आई थी. उस के बाद कमरे में क्या हुआ, उसे मालूम नहीं. आशीष 3 बजे चला गया था. उस के जाने के बाद 2 महिलाएं उस के बारे में पूछताछ करने आईं.

लेकिन आशीष रूम में नहीं था, यह जान कर वे दोनों चली गईं. महिलाओं की बातों से मुझे कुछ शक हुआ, तो मैं आशीष के रूम पर गई. वहां कमरे के बाहर खून देख कर मैं चीखी तो बाकी किराएदार आ गए. उस के बाद मैं ने यह सूचना पुलिस को दे दी. घटनास्थल पर अन्य किराएदार कमल, सुनील, टिंकू व शिवानंद भी मौजूद थे. सीओ मनोज कुमार गुप्ता ने उन से पूछताछ की तो उन सब ने बताया कि आशीष ने उन से सोना को अपनी पत्नी बताया था. वह हफ्ते में 2-3 बार आती थी. कमरा बंद कर दोनों खूब हंसतेबतियाते थे, कभीकभी उन दोनों में तूतूमैंमैं भी हो जाती थी. आज सोना 12 बजे आई थी. बंद कमरे में दोनों का झगड़ा हो रहा था. तेज आवाजें आ रही थीं. लेकिन हम लोगों ने ध्यान नहीं दिया. घटना की जानकारी तब हुई, जब मकान मालकिन चीखी.

किराएदारों से पूछताछ में एक किराएदार कमल ने बताया कि आशीष ने एक बार बताया था कि वह कानपुर के गजनेर का रहने वाला है. सीओ मनोज कुमार गुप्ता अभी किराएदारों से पूछताछ कर ही रहे थे कि मृतका सोना की मां गीता, बहन बरखा, निशू, भाभी ज्योति तथा भाई विक्की, सूरज, सनी और पीयूष आ गए. सोना का शव देख सभी दहाड़ मार कर रोने लगे. किसी तरह पुलिस अधिकारियों ने उन्हें शव से अलग किया और फिर पूछताछ की. एसपी अपर्णा गुप्ता को मृतका की मां गीता ने बताया कि 3 साल पहले उन की बेटी सोना की आशीष से दोस्ती हो गई थी. दोनों एक ही फैक्ट्री में काम करते थे. जब उसे दोनों की दोस्ती की बात पता चली तो उस ने सोना का विवाह कर दिया.

लेकिन सोना की अपने पति व ससुरालियों से नहीं पटी, वह मायके आ कर रहने लगी. अपने खर्चे के लिए उस ने गोविंद नगर स्थित एक स्कूल में नौकरी कर ली. इस बीच आशीष ने सोना को फिर अपने प्रेम जाल में फंसा लिया और वह उसे अपने कमरे पर बुलाने लगा. कभीकभी वह घर भी आ जाता था. हम सब उसे अच्छी तरह जानते थे. पिछले कुछ दिनों से वह सोना पर शादी करने का दबाव डाल रहा था, लेकिन सोना शादी को राजी नहीं थी. आज भी आशीष ने सोना को अपने रूम में बुलाया और शादी का दबाव डाला. उस के न मानने पर आशीष ने जोरजबरदस्ती की और बेटी को मार डाला. सोना को मौत की नींद सुलाने के बाद आशीष ने मेरी बहू ज्योति के मोबाइल पर हत्या की सूचना दी कि आ कर लाश ले जाओ. तब उस के सभी बेटे काम पर गए थे.

वह बहू ज्योति को साथ ले कर दबौली आई और मकान मालकिन पुष्पा से मिली. लेकिन पुष्पा ने यह कह कर लौटा दिया कि आशीष अभी घर पर नहीं है. पुष्पा अगर हमें आशीष के कमरे तक जाने देती तो शायद उस की बेटी की जान बच जाती. पूछताछ के बाद एसपी अपर्णा गुप्ता ने थानाप्रभारी अनुराग सिंह को आदेश दिया कि वह मृतका के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजे और रिपोर्ट दर्ज कर के कातिल आशीष को गिरफ्तार करें. उस की गिरफ्तारी के लिए उन्होंने सीओ मनोज कुमार गुप्ता के निर्देशन में एक पुलिस टीम भी गठित कर दी. पुलिस अधिकारियों के आदेश पर थानाप्रभारी अनुराग सिंह ने घटनास्थल से बरामद खून सनी कैंची, सोना का मोबाइल फोन और पर्स आदि चीजें जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लीं.

इस के बाद मृतका के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल भेज दिया गया. थाने लौट कर अनुराग सिंह ने मृतका के भाई सूरज की तहरीर पर धारा 302 आईपीसी के तहत आशीष के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस टीम आशीष की गिरफ्तारी के प्रयास में जुट गई. पुलिस टीम ने मृतका सोना का मोबाइल फोन खंगाला तो आशीष का नंबर मिल गया, जिसे सर्विलांस पर लगा दिया गया. सर्विलांस से उस की लोकेशन गीतानगर मिली. पुलिस टीम रात 2 बजे गीतानगर पहुंची, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही आशीष का फोन स्विच्ड औफ हो गया, जिस से उस की लोकेशन मिलनी बंद हो गई. निराश हो कर पुलिस टीम वापस लौट आई.

निरीक्षण के दौरान एक किराएदार ने सीओ मनोज कुमार गुप्ता को बताया था कि आशीष कानपुर देहात के गजनेर कस्बे का रहने वाला है. इस पर उन्होंने एक पुलिस टीम को गजनेर भेज दिया, जहां आशीष की तलाश की गई. सादे कपड़ों में गई पुलिस टीम ने दुकानदारों व अन्य लोगों को आशीष की फोटो दिखा कर पूछताछ की. लेकिन फोटो में आशीष चश्मा लगाए हुए था, जिस की वजह से लोग उसे पहचान नहीं पा रहे थे. पुलिस टीम पूछताछ करते हुए जब मुख्य रोड पर आई तो एक पान विक्रेता ने फोटो पहचान ली. उस ने बताया कि वह अजय ठाकुर है जो कस्बे के लाल सिंह का छोटा बेटा है. आशीष के पहचाने जाने से पुलिस को अपनी मेहनत रंग लाती दिखी. पुलिस टीम लाल सिंह के घर पहुंची. पुलिस ने लाल सिंह को फोटो दिखाई तो वह बोला, ‘‘यह फोटो मेरे बेटे आशीष सिंह की है.

घर के लोग उसे अजय ठाकुर के नाम से बुलाते हैं. आशीष कानपुर में नौकरी करता है. मेरा बड़ा बेटा मनीष सिंह भी गीतानगर, कानपुर में रहता है. पर आप लोग हैं कौन और आशीष की फोटो क्यों दिखा रहे हैं. उस ने कोई ऐसावैसा काम तो नहीं कर दिया?’’

पुलिस टीम ने अपना परिचय दे कर बता दिया कि उन का बेटा सोना नाम की एक युवती की हत्या कर के फरार हो गया है. पुलिस उसी की तलाश में आई है. अगर वह घर में छिपा हो तो उसे पुलिस के हवाले कर दो, वरना खुद भी मुसीबत में फंस जाओगे. पुलिस की बात सुन कर लाल सिंह घबरा कर बोला, ‘‘हुजूर, आशीष घर पर नहीं आया है. न ही उस ने मुझे कोई जानकारी दी है.’’

यह सुन कर पुलिस ने लाल सिंह को हिरासत में ले लिया. चूंकि लाल सिंह का बड़ा बेटा गीतानगर में रहता था और आशीष के मोबाइल फोन की लोकेशन भी गीता नगर की ही मिली थी. पुलिस को शक हुआ कि अजय ठाकुर उर्फ आशीष सिंह अपने बड़े भाई के घर में छिपा हो सकता है. पुलिस टीम लाल सिंह को साथ ले कर वापस कानपुर आ गई और उस के बताने पर गीता नगर स्थित बड़े बेटे मनीष के घर छापा मारा. छापा पड़ने पर घर में हड़कंप मच गया. पिता के साथ पुलिस देख कर आशीष ने भागने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस टीम ने उसे दबोच लिया और थाना गोविंद नगर ले आई. थाना गोविंद नगर में जब आशीष सिंह से सोना की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. आशीष ने बताया कि शादी के पहले से दोनों के बीच प्रेम संबंध थे. सोना के घर वालों को पता चला तो उन्होंने उस की शादी कर दी, लेकिन सोना की पति से पटरी नहीं बैठी.

वह ससुराल छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी. उस के बाद दोनों के बीच फिर से अवैध संबंध बन गए. सोना के कहने पर ही उस ने किराए का कमरा लिया था, जहां दोनों का शारीरिक मिलन होता था. आशीष ने बताया कि घटना वाले दिन सोना 12 बजे आई थी. आशीष ने उस से कहा कि वह पति को तलाक दे कर उस से शादी कर ले. लेकिन वह नहीं मानी. इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ. झगड़े के बीच आशीष ने यह सोच कर प्रणय निवेदन किया कि यौन प्रक्रिया में गुस्सा शांत हो जाता है, लेकिन सोना ने उसे दुत्कार दिया. शादी की बात न मानने और प्रणय निवेदन ठुकराने की वजह से आशीष को गुस्सा आ गया और उस ने पास रखी कैंची उठा कर सोना के पेट में घोंप दी. फिर उसी कैंची से उस का गला भी छेद डाला. हत्या करने के बाद वह फरार हो गया था.

चूंकि आशीष सिंह ने सोना की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था और पुलिस आला ए कत्ल भी बरामद कर चुकी थी, इसलिए थानाप्रभारी अनुराग सिंह ने अजय ठाकुर उर्फ आशीष सिंह को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—

कानपुर महानगर के पनकी थाना क्षेत्र में एक मोहल्ला है सराय मीता. मुन्नालाल सोनकर अपने परिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहता था. मुन्नालाल सोनकर नगर निगम में सफाई कर्मचारी था. उसे जो वेतन मिलता था, उसी से परिवार का भरणपोषण होता था. मुन्नालाल अपनी बड़ी बेटी बरखा की शादी कर चुका था. बरखा से छोटी सोना 18 साल की हो गई थी. वह चंचल स्वभाव की थी. पढ़ाईलिखाई में मन लगाने के बजाए वह सजनेसंवरने पर ज्यादा ध्यान देती थी. नईनई फिल्में देखना, सैरसपाटा करना और आधुनिक फैशन के कपड़े खरीदना उस का शौक था. मुन्नालाल सीधासादा आदमी था. रहनसहन भी साधारण था. वह बेटी की फैशनपरस्ती से परेशान था.

सोना अपनी मां गीता के साथ दादानगर स्थित एक लोहा फैक्ट्री में काम करती थी. वहां से उसे जो वेतन मिलता था, उसे वह अपने फैशन पर खर्च करती थी. जिद्दी स्वभाव की सोना को बाजार में जो कपड़ा या अन्य सामान पसंद आ जाता, वह उसे खरीद कर ले आती. मातापिता रोकतेटोकते तो वह टका सा जवाब दे देती, ‘‘मैं ने सामान अपने पैसे से खरीदा है. फिर ऐतराज क्यों?’’

उस के इस जवाब से सब चुप हो जाते थे. सोना की अपनी भाभी ज्योति से खूब पटरी बैठती थी. सोना दादानगर स्थित जिस लोहा फैक्ट्री में काम करती थी, आशीष सिंह उसी में सुपरवाइजर था. वह मूलरूप से जिला कानपुर के देहात क्षेत्र के कस्बा गजनेर का रहने वाला था. उस का घरेलू नाम अजय था. लोग उसे अजय ठाकुर कहते थे. उस के पिता गांव में किसानी करते थे. सोना लोहा फैक्ट्री में पैकिंग का काम करती थी. निरीक्षण के दौरान एक रोज आशीष सिंह की निगाह खूबसूरत सोना पर पड़ी. दोनों की नजरें मिलीं तो दोनों कुछ देर तक आकर्षण में खोए रहे. जब आकर्षण टूटा तो सोना मुसकरा दी और नजरें झुका कर पैकिंग में जुट गई. नजरें मिलने का सुखद अहसास दोनों को हुआ.

अगले दिन सोना कुछ ज्यादा ही बनसंवर कर आई. आशीष उस के पास पहुंचा और इशारे से उसे अपने औफिस के कमरे में आने को कहा. वह उस के औफिस में आई तो आशीष ने उस से कुछ कहा, जिसे सुन कर सोना सकपका गई. वह यह कह कर वहां से चली गई कि कोई देख लेगा. सोना की ओर से हरी झंडी मिली तो आशीष बहुत खुश हुआ. आशीष सिंह पढ़ालिखा हृष्टपुष्ट युवक था. वह अच्छाखासा कमा भी रहा था. लेकिन वह शादीशुदा और एक बच्चे का बाप था. उस की पत्नी से नहीं बनी तो वह घाटमपुर स्थित अपने मायके में रहने लगी थी. आशीष सिंह ने सोना से यह बात छिपा ली थी. उस ने उसे खुद को कुंवारा बताया था.

सोना सजीले युवक आशीष से मन ही मन प्यार करने लगी और मां से नजरें बचा कर आशीष से फैक्ट्री के बाहर एकांत में मिलने लगी. दोनों के बीच प्यार भरी बातें होने लगीं. धीरेधीरे आशीष सोना का दीवाना हो गया. सोना भी उसे बेपनाह मोहब्बत करने लगी. प्यार परवान चढ़ा तो देह की प्यास जाग उठी. एक रोज आशीष सोना को अपने दादानगर वाले कमरे पर ले गया, जहां वह किराए पर रहता था. सोना जैसे ही कमरे में पहुंची, आशीष ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. आशीष के स्पर्श से सोना को बहकते देर नहीं लगी. आशीष जो कर रहा था, सोना को उस की अरसे से तमन्ना थी. इसलिए वह भी आशीष का सहयोग करने लगी. कुछ देर बाद आशीष और सोना अलग हुए तो बहुत खुश थे. इस के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया. जब भी मन होता, शारीरिक संबंध बना लेते.

आशीष कमरे में अकेला रहता था, जिस से दोनों आसानी से मिल लेते थे. लेकिन कहते हैं कि प्यार चाहे जितना चोरीछिपे किया जाए, एक न एक दिन उस का भेद खुल ही जाता है. एक शाम सोना और गीता एक साथ फैक्ट्री से निकली तो कुछ दूर चल कर सोना बोली, ‘‘मां, मुझे गोविंद नगर बाजार से कुछ सामान लेना है. तुम घर चलो, मैं आ जाऊंगी.’’

गीता ने कुछ नहीं कहा. लेकिन उसे सोना पर संदेह हुआ. इसलिए उस ने सोना का गुप्तरूप से पीछा किया और उसे आशीष के साथ रंगेहाथ पकड़ लिया. गीता ने सोना को फटकारा और भलाबुरा कहा. साथ ही प्रेम से सिर पर हाथ रख कर समझाया भी, ‘‘बेटी, आशीष ठाकुर जाति का है और तुम दलित की बेटी हो. आशीष के घर वाले दलित की बेटी को कभी स्वीकार नहीं करेंगे. इसलिए मेरी बात मानो और आशीष का साथ छोड़ दो, इसी में हम सब की भलाई है.’’

गीता का पति मुन्नालाल सफाईकर्मी था और शराब पीने का आदी. स्वभाव से वह गुस्सैल था. इसलिए गीता ने सोना की असलियत उसे नहीं बताई. इस के बजाए उस ने पति पर सोना का विवाह जल्द से जल्द करने का दबाव बनाया. इसी के साथ गीता ने सोना का फैक्ट्री जाना भी बंद करा दिया और उस पर कड़ी नजर रखने लगी. उस ने अपनी बहू ज्योति तथा बेटों को भी सतर्क कर दिया था कि वह जहां भी जाए, उस के साथ कोई न कोई रहे. मांभाइयों के कड़े प्रतिबंध के कारण सोना का आशीष से मिलन बंद हो गया. इस से सोना और आशीष परेशान हो उठे. दोनों मिलन के लिए बेचैन रहने लगे.

सोना को इस बात की भनक लग चुकी थी कि उस के घर वाले उस की शादी के लिए लड़का देख रहे हैं. जबकि सोना के सिर पर अब भी आशीष के प्यार का भूत सवार था. इधर मुन्नालाल की खोज भीमसागर पर समाप्त हुई. भीमसागर का पिता रामसागर दादानगर फैक्ट्री एरिया के मिश्रीलाल चौराहे के निकट रहता था. नहर की पटरी के किनारे उस का मकान था. रामसागर लकड़ी बेचने का काम करता था. उस का बेटा भीमसागर भी उस के काम में मदद करता था. मुन्नालाल ने भीमसागर को देखा तो उसे सोना के लिए पसंद कर लिया. हालांकि सोना ने शादी से इनकार किया, लेकिन मुन्नालाल ने उस की एक नहीं सुनी. अंतत: सन 2017 के जनवरी महीने की 10 तारीख को सोना का विवाह भीमसागर के साथ कर दिया गया.

भीमसागर की दुलहन बन कर सोना ससुराल पहुंची तो सभी ने उसे हाथोंहाथ लिया. सुंदर पत्नी पा कर भीमसागर भी खुश था, वहीं उस के मातापिता भी बहू की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. सब खुश थे, लेकिन सोना खुश नहीं नहीं थी. सुहागरात को भी वह बेमन से पति को समर्पित हुई. भीमसागर तो तृप्त हो कर सो गया, पर सोना गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही. न तो उस के जिस्म की प्यास बुझी थी, न रूह की.  उस रात के बाद हर रात मिलन की रस्म निभाई जाने लगी. चूंकि सोना इनकार नहीं कर सकती थी, सो अरुचि से पति की इच्छा पूरी करती रही.

घर वालों की जबरदस्ती के चलते सोना ने विवाह जरूर कर लिया था, पर वह मन से भीमसागर को पति नहीं मान सकी थी. अंतरंग क्षणों में वह केवल तन से पति के साथ होती थी, उस का प्यासा मन प्रेमी में भटक रहा होता था. 3-4 महीने तक सोना ने जैसेतैसे पति से निभाया, उस के बाद दोनों के बीच कलह होने लगी. कलह का पहला कारण सोना का एकांत में मोबाइल फोन पर बातें करना था. भीमसागर को शक हुआ कि सोना का शादी से पहले कोई यार था, जिस से वह चोरीछिपे एकांत में बातें करती है. दूसरा कारण उस की फैशनपरस्ती तथा घर से बाहर जाना था. भीमसागर के मातापिता चाहते थे कि बहू मर्यादा में रहे और घर के बाहर कदम न रखे.

लेकिन सोना को घर की चारदीवारी में रहना पसंद नहीं था. वह स्वच्छंद हो कर घूमती थी. इन्हीं 2 बातों को ले कर सोना का भीमसागर और ससुराल के लोगों से झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साल बीततेबीतते सोना ससुराल छोड़ कर मायके आ कर रहने लगी.  गीता ने सोना को बहुत समझाया और ससुराल भेजने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं मानी. 6 महीने तक सोना घर में रही, उस के बाद उस ने गोविंद नगर स्थित एक स्कूल में आया की नौकरी कर ली. वह सुबह 8 बजे घर से निकलती, फिर शाम 5 बजे तक वापस आती. इस तरह वह मांबाप पर बोझ न बन कर खुद अपना भार उठाने लगी.

एक शाम सोना स्कूल से लौट रही थी कि दादानगर चौराहे पर उस की मुलाकात आशीष से हो गई. बिछड़े प्रेमी मिले तो दोनों खुश हुए. आशीष उसे नजदीक के एक रेस्तरां में ले गया, जहां दोनों ने एकदूसरे को अपनी व्यथाकथा सुनाई. बातोंबातों में आशीष उदास हो कर बोला, ‘‘अरमान मैं ने सजाए और तुम ने घर किसी और का बसा दिया.’’

सोना के मुंह से आह सी निकली, ‘‘हालात की मजबूरी इसी को कहते हैं. घर वालों ने मेरी मरजी के बिना शादी कर दी. मैं ने मन से उसे कभी पति नहीं माना. साल बीतते उस से मेरा मनमुटाव हो गया और मैं उसे छोड़ कर मायके आ गई.’’ आशीष मन ही मन खुश हुआ. फिर बोला, ‘‘क्या अब भी तुम मुझे पहले जैसा प्यार करती हो?’’

‘‘यह भी कोई पूछने की बात है. सच तो यह है कि मैं तुम्हें कभी भुला ही नहीं पाई. सुहागरात को भी तुम्हारी ही याद आती रही.’’ इस के बाद सोना और आशीष का फिर मिलन होने लगा. दोनों के बीच शारीरिक रिश्ता भी बन गया. आशीष कभीकभी सोना के घर भी जाने लगा. गीता को आशीष का घर आना अच्छा तो नहीं लगता था, पर उसे मना भी नहीं कर पाती थी. हालांकि गीता निश्चिंत थी कि सोना की शादी हो गई है. अब आशीष जूठे बरतन में मुंह नहीं मारेगा. पर यह उस की भूल थी. सोना के कहने पर आशीष ने अगस्त, 2019 में दबौली (उत्तरी) में किराए पर एक कमरा ले लिया. कमरा पसंद करने सोना भी आशीष के साथ गई थी. उस ने मकान मालकिन को बताया कि सोना उस की पत्नी है. मकान में अन्य किराएदार थे, उन को भी आशीष ने सोना को अपनी पत्नी बताया था.

सोना अब इस कमरे पर आशीष से मिलने आने लगी. सोना के आते ही रूम का दरवाजा बंद हो जाता और शारीरिक मिलन के बाद ही खुलता. किसी को ऐतराज इसलिए नहीं होता था, क्योंकि उन की नजर में सोना उस की पत्नी थी. आशीष के रूम में आतेजाते सोना को एक रोज एक फोटो हाथ लग गई, जिस में वह एक युवती और एक मासूम बच्चे के साथ था. इस युवती और बच्चे के संबंध में सोना ने आशीष से पूछा तो वह बगलें झांकने लगा. अंतत: उसे बताना ही पड़ा कि वह शादीशुदा है और तसवीर में उस की पत्नी व बच्चा है.

लेकिन मनमुटाव के चलते पत्नी घाटमपुर स्थित अपने मायके में रह रही है. यह पता चलने के बाद सोना का आशीष से झगड़ा हुआ. लेकिन आशीष ने किसी तरह सोना को मना लिया. आशीष को लगा कि सच्चाई जानने के बाद सोना कहीं उस का साथ न छोड़ दे. इसलिए वह उस पर दबाव डालने लगा कि वह अपने पति को तलाक दे कर उस से शादी कर ले. लेकिन सोना ने यह कह कर मना कर दिया कि पहले तुम अपनी पत्नी को तलाक दो. तभी मैं अपने पति से तलाक लूंगी. इस के बाद तलाक को ले कर दोनों में अकसर झगड़ा होने लगा.

17 मार्च की दोपहर 12 बजे सोना दबौली स्थित आशीष के रूम पर पहुंची. आशीष ने उसे फोन कर के बुलाया था. सोना के आते ही आशीष ने रूम बंद कर लिया फिर दोनों में बातचीत होने लगी. बातचीत के दौरान आशीष ने सोना से कहा कि वह अपने पति से तलाक ले कर उस से शादी कर ले, पर सोना इस के लिए राजी नहीं हुई. उलटे पलटवार करते हुए वह बोली, ‘‘पहले तुम अपनी पत्नी से तलाक क्यों नहीं लेते, एक म्यान में 2 तलवारें कैसे रहेंगी?’’

तलाक को ले कर दोनों में गरमागरम बहस होने लगी. बहस के बीच आशीष ने प्रणय निवेदन किया, जिसे सोना ने ठुकरा दिया. इस पर आशीष जबरदस्ती पर उतर आया और सोना के कपड़े खींच कर उसे अर्धनग्न कर दिया. सोना भी बचाव में भिड़ गई. तलाक लेने से इनकार करने और शारीरिक संबंध न बन पाने से आशीष का गुस्सा आसमान पर जा पहुंचा. उस ने दीवार में बनी अलमारी में रखी कैंची उठाई और सोना के पेट में घोंप दी. सोना पेट पकड़ कर फर्श पर तड़पने लगी. उसी समय आशिष ने सोना के गले को कैंची से छेद डाला. सोना पेट पकड़ कर तड़पने लगी. उसी समय उस ने सोना के गले को कैंची से छेद डाला. कुछ देर बाद सोना ने दम तोड़ दिया.

सोना की हत्या करने के बाद आशीष ने कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद की और मकान के बाहर आ गया. बाहर आ कर उस ने सोना की भाभी ज्योति को सोना की हत्या की जानकारी दी, फिर फरार हो गया. इस घटना का भेद तब खुला, जब मकान मालकिन पुष्पा पहली मंजिल पर स्थित आशीष के कमरे पर पहुंची. पुष्पा ने इस घटना की सूचना थाना गोविंद नगर को दे दी. जांच में अवैध रिश्तों में हुई हत्या की बात सामने आई.  20 मार्च, 2020 को थाना गोविंद नगर पुलिस ने अभियुक्त आशीष सिंह को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट ए.के. सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Extramarital Affair : बेटे ने बाप के साथ मिल कर मां के प्रेमी का घोंटा गला

Extramarital Affair : अवैध संबंधों की परिणति कभी भी अच्छी नहीं होती. यह बात पुरुष भी जानता है और महिला भी. इस के बावजूद वे गलतियों पर गलतियां करते रहते हैं. यही गलती अखिलेश और अंजुम कर रहे थे, जिस का नतीजा…

20 तारीख के यही कोई सुबह के 6 बजे की बात है. कड़ाके की ठंड के साथसाथ कोहरे की चादर भी फैली हुई थी. पौ फटते ही धीरेधीरे अस्तित्व में आती सूरज की किरणों ने कोहरे से मुकाबला करना शुरू किया तो दिन का मिजाज बदलने लगा. ठंड कम होती गई और कोहरे की चादर झीनी. ग्वालियर के थाना हजीरा क्षेत्र के कांच मिल इलाके में बसी श्रमिकों की बस्ती में रहने वाले लोग नित्यक्रिया के लिए रेल पटरी के पास गए तो उन्हें वहां एक पुरुष की रक्तरंजित लाश पड़ी दिखाई दी. खून चूंकि जम कर काला पड़ गया था, इस से लग रहा था कि उसे मरे हुए 1-2 दिन हो गए होंगे. खबर फैली तो पैर कटी लाश के आसपास काफी भीड़ जमा हो गई.

एकत्र भीड़ में तरहतरह की चर्चाएं हो रही थीं. लोग उसे पहचानने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उसे कोई भी नहीं पहचान पाया. इस बीच किसी ने हजीरा थाने को फोन कर रेलवे लाइन पर लाश पड़ी होने की सूचना दे दी. कुछ ही देर में  थानाप्रभारी आलोक परिहार पुलिस टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. पुलिस को आया देख भीड़ लाश के पास से हट गई. थानाप्रभारी ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 45 वर्ष के आसपास थी. उस के गले में साफी लिपटी थी, जिस का एक भाग मुंह में ठुंसा था. इस से यह बात साफ हो गई कि उस की हत्या कहीं और की गई

थी, और बाद में लाश को यहां डाल दिया गया था. तलाशी में पुलिस को मृतक की जेबों से एक पर्स मिला, जिस में ड्राइविंग लाइसैंस और ग्वालियर नगर निगम का परिचय पत्र था. इन दोनों चीजों से मृतक की शिनाख्त हो गई. इस से पुलिस का काम आसान हो गया. मृतक का नाम अखिलेश था, परिचय पत्र और लाइसैंस में उस का पता लिखा था. अखिलेश नगर निगम की कचरा ढोने वाली गाड़ी चलाता था. मौके से पुलिस को मृतक के नामपते के अलावा कोई भी अहम सबूत हाथ नहीं लगा. ड्राइविंग लाइसैंस और परिचय पत्र को कब्जे में ले कर थानाप्रभारी आलोक परिहार ने 2 सिपाहियों को भेज कर मृतक के परिजनों को मौके पर बुलवा लिया. घर वाले अखिलेश की लाश देखते ही बिलखने लगे. आवश्यक लिखापढ़ी के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

थाने पहुंचते ही थानाप्रभारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया. मामला संगीन था, इसलिए एसपी नवनीत भसीन के आदेश पर एसपी (सिटी) रवि भदौरिया ने इस ब्लाइंड मर्डर के खुलासे के लिए हजीरा थानाप्रभारी आलोक परिहार की अगुवाई में एक टीम का गठन कर दिया. इस टीम का निर्देशन एएसपी पंकज पांडे कर रहे थे. अगले दिन पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. रिपोर्ट में मौत की वजह गला घोटा जाना बताया गया था. मौत का समय रात 11 बजे से 2 बजे के बीच का था. समय देख कर पुलिस को लगा कि अखिलेश की हत्या किसी नजदीकी व्यक्ति ने की होगी, इसलिए पुलिस ने उस के पड़ोसियों,

रिश्तेदारों के अलावा परिचितों से भी पूछताछ कर के जानना चाहा कि उस का किनकिन लोगों के यहां ज्यादा आनाजाना था. पूछताछ में पुलिस को पता चला कि अखिलेश पिछले 8 सालों से अवाडपुरा निवासी मुश्ताक के घर आताजाता था. घर में बैठ कर दोनों देर रात तक शराब पीते थे. पुलिस ने अखिलेश और मुश्ताक के घर वालों के मोबाइल नंबर ले कर उन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि अखिलेश एक नंबर पर सब से ज्यादा बातें किया करता था. उस नंबर की जांच हुई तो पता चला कि वह मुश्ताक के नाम पर था. लेकिन उस नंबर पर उस की पत्नी अंजुम भी बात करती थी.

हकीकत जानने के लिए पुलिस मुश्ताक के घर गई और उस की पत्नी अंजुम से पूछताछ की लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. दोनों ने यह बात स्वीकारी की अखिलेश से बात भी होती थी और वह घर भी आता था. कुछ लोगों से की गई पूछताछ में पुलिस को जानकारी मिली कि पिछले कुछ दिन से मुश्ताक को अखिलेश का घर आनाजाना खटक रहा था. सौरभ और छोटे खान भी उसे टेढ़ी नजर से देखते थे. खास कर सौरभ और छोटे खान को तो अखिलेश फूटी आंख पसंद नहीं था. जबकि अंजुम को बापबेटों की बातें कांटे की तरह चुभती थीं. इसी बात को ले कर अंजुम का अपने शौहर और बेटों से विवाद होता रहता था.

जानकारी काम की थी. पुलिस का शक अंजुम के पति और बेटों के इर्दगिर्द घूमने लगा. यह भी संभव था कि पति और बेटे मां के प्रेमी के कातिल बन गए हों. लेकिन इस बाबत पुख्ता सबूत हाथ न लगने से पुलिस असमंजस की स्थिति में थी. एक और अहम बात यह थी कि अखिलेश की हत्या की भनक पड़ोसियों तक को नहीं थी. पुलिस के पहुंचने पर ही पड़ोसियों के बीच इस बात को ले कर बहस छिड़ी कि आखिरकार मुश्ताक के घर पुलिस के आने की असल वजह क्या है. पुलिस ने कुछ बिंदुओं पर एक बार फिर अंजुम से अलग से पूछताछ की. उस ने बिना डरे बड़ी चतुराई के साथ सभी सवालों के जबाव दिए. अखिलेश से दोस्ती और परिवार में इस बात के विरोध की बात तो उस ने स्वीकार की, लेकिन अखिलेश की हत्या करने की बात नकार दी.

पुलिस ने जब अखिलेश के परिजनों से जानना चाहा कि उस की किसी से कोई ऐसी रंजिश थी, जो हत्या की वजह बनी हो. साथ ही यह भी पूछा कि अखिलेश का किसी के साथ कोई चक्कर तो नहीं चल रहा था. घर वालों ने बताया कि उन की जानकारी में अखिलेश का किसी से कोई विवाद नहीं था. पुलिस टीम ने अखिलेश की तथाकथित प्रेमिका अंजुम और उस के परिवार को शक के दायरे में रख कर जांच में परिवर्तन किया. इस मामले की कई दृष्टिकोण से जांच की गई. महीनों चली जांच में कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं मिला जो हत्यारों को कटघरे में खड़ा कर देता. लौट कर बात मुश्ताक और अंजुम पर आ कर ठहर जाती थी. अंतत: पुलिस ने एक बार फिर सर्विलांस ब्रांच की मदद ली. काफी मशक्कत के बाद एक ठोस सबूत हाथ लगा. सबूत यह कि अंजुम, मुश्ताक और अखिलेश के मोबाइल फोन की लोकेशन अवाडपुरा में पाई गई थी.

इस सबूत के बाद पुलिस टीम ने एक बार फिर मुश्ताक के घर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. एक फुटेज से पता चला कि हत्या वाले दिन अखिलेश मुश्ताक के घर आया तो था, मगर किसी भी फुटेज में वह वापस जाता हुआ दिखाई नहीं दिया. मुश्ताक और अंजुम ने उस के आने की बात से इनकार नहीं किया था. इसलिए उन्हें आरोपी नहीं माना जा सकता था. 2 ठोस सबूतों के बाद पुलिस ने बिना देर किए 7 मार्च को अंजुम को हिरासत में ले लिया और उसे थाने ले आई. थाने की देहरी चढ़ते ही अंजुम की सिट्टीपिट्टी गुम होनी शुरू हो गई. इस बार पुलिस ने उस से सबूतों के आधार पर मनोवैज्ञानिक ढंग से दबाव बना कर पूछताछ की.

अंजुम पुलिस की बात को झुठला नहीं सकी. आखिर उस ने सच बोलते हुए कहा, ‘‘साहब, अखिलेश को मैं ने और मेरे पति व बेटे ने पड़ोसी के साथ मिल कर मारा है.’’

अंजुम ने पुलिस को दिए बयान में अखिलेश की हत्या की जो कहानी बताई, वह काफी दिलचस्प निकली—

अखिलेश साहू नाका चंद्रबदनी माता वाली गली में रहता था और नगर निगम में कचरा ढोने वाली गाड़ी के चालक के पद पर कार्यरत था. उसे शराब पीने की लत थी. अखिलेश का शैलेंद्र के जरिए मुश्ताक से परिचय हुआ था. शैलेंद्र और मुश्ताक पड़ोसी थे. पहले अखिलेश खानेपीने के लिए शैलेंद्र के घर आताजाता था. मुश्ताक भी पीने का शौकीन था, इसलिए वह भी इन के साथ बैठने लगा. फिर कुछ दिन बाद अखिलेश के खर्च पर शराब की महफिल मुश्ताक के घर जमने लगी. अखिलेश के घर वालों ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं सुधरा तो घर वालों ने उस से इस बारे में बात करना ही छोड़ दिया.

अखिलेश रोजाना शाम की ड्यूटी पूरी कर के शराब पीने के लिए अवाडपुरा में मुश्ताक के घर चला जाता था. इसी दौरान उस की मुलाकात मुश्ताक की पत्नी अंजुम से हुई. जल्दी ही अखिलेश को अंजुम से भावनात्मक लगाव हो गया. अंजुम भी उस से लगाव रखने लगी थी. दोनों के बीच अकसर मोबाइल पर भी बातें होती थीं. भावनात्मक बातों का यह सिलसिला शरीरों पर जा कर रुका. एक बार दोनों के बीच की दूरी मिटी तो फिर यह आए दिन की बात हो गई. जब भी अंजुम और अखिलेश को मौका मिलता, बिना आगेपीछे सोचे हदें लांघ कर अपनी हसरतें पूरी कर लेते.

अंजुम और अखिलेश के बीच अवैध संबंध बने तो उन की बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अखिलेश अंजुम का हर तरह से खयाल रखने लगा था, इसलिए आसपड़ोस वालों को संदेह हुआ तो लोग दोनों के संबंधों को ले कर चर्चा करने लगे. नतीजा यह निकला कि लोग अखिलेश को देख कर मुश्ताक के बच्चों से कहने लगे, ‘तुम्हारा दूसरा बाप आ गया.’ अंजुम को उस के बडे़ बेटे सौरभ ने अखिलेश के साथ आपत्तिजनक हालत में देख लिया था. उस ने यह बात पिता को बता दी. मामले ने बेहद संगीन और नाजुक मोड़ अख्तियार कर लिया था, लिहाजा बापबेटे ने अंजुम को ऊंचनीच बता कर भविष्य में अखिलेश से कभी मेलमुलाकात न करने की कसम दिलाई.

अंजुम मुश्ताक की पत्नी ही नहीं, उस के बच्चों की मां भी थी, इसलिए बच्चों के भविष्य की चिंता करते हुए मुश्ताक ने दोबारा ऐसी गलती न करने की चेतावनी दे कर उसे माफ कर दिया. लेकिन जिस का पैर एक बार फिसल चुका हो, उस का संभलना मुश्किल होता है. यही हाल अंजुम और उस के प्रेमी अखिलेश का भी था. कुछ दिन शांत रहने के बाद अंजुम अपने वायदे पर टिकी न रह सकी. मौका पाते ही वह चोरीछिपे अखिलेश से मिलने लगी. इस बात का पता मुश्ताक को लगा तो अपना घर बचाने के लिए उस ने बड़े बेटे के साथ बैठ कर अखिलेश को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. इस योजना में मदद के लिए मुश्ताक के बड़े बेटे ने अपने दोस्त सलमान को भी शामिल कर लिया.

हालांकि बिना अंजुम की मदद के अखिलेश को ठिकाने लगा पाना सौरभ और मुश्ताक के बूते की बात नहीं थी. उन्होंने जैसेतैसे अंजुम को भी इस योजना में शामिल कर लिया. तय योजना के अनुसार 18 दिसंबर की रात अंजुम से फोन करवा कर अखिलेश को घर पर बुलाया गया. उस के आते ही मुश्ताक ने उसे जम कर शराब पिलाई. जब वह नशे में बेसुध हो कर गिरने लगा तो बापबेटे ने अंजुम के हाथों साफी से उस का गला घोटवा कर उस की हत्या करवा दी. इस काम में सौरभ और शौहर मुश्ताक ने भी मदद की. हत्या करने के बाद मुश्ताक और सौरभ रात में ही अखिलेश की लाश को ठिकाने लगाने की सोचते रहे, लेकिन रात ज्यादा हो जाने से उन का यह मंसूबा पूरा न हो सका. फलस्वरूप लाश को बाथरूम में छिपा दिया गया.

अगले दिन 19 दिसंबर को सौरभ घूमने जाने के बहाने अपने मामा की नैनो कार एमपी07सी सी3726 ले आया. जब मोहल्ले में सन्नाटा हो गया, तो रात 11 बजे अखिलेश की लाश को बाथरूम से निकाल कर मुश्ताक, सौरभ, अंजुम और सलमान ने मिल कर कार में इस तरह बैठाया कि अगर किसी की नजर पड़े तो लगे कि अखिलेश ज्यादा नशे में है. लाश को कार में डाल कर आरोपी अंधेरे में कांच मिल क्षेत्र में रेल की पटरी पर लाए और पटरी पर इस तरह रख दिया, जिस से लगे कि उस ने आत्महत्या की है. अपराध करने के बाद कोई कितनी भी चालाकी  से झूठ बोले, पुलिस के जाल में फंस ही जाता है.

अंजुम ने भी पुलिस को गुमराह करने की काफी कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी. पुलिस ने अंजुम के बेटे सौरभ की निशानदेही पर वह नैनो कार भी बरामद कर ली, जिस में उस ने और उस के पिता ने अखिलेश की लाश को रेलवे ट्रैक पर फेंका था. काफी खोजबीन के बाद भी अखिलेश का मोबाइल फोन नहीं मिल पाया. विस्तार से पूछताछ के बाद हत्या के चारों आरोपियों सौरभ, उस के पिता मुश्ताक खान, गोरे उर्फ सलमान और अंजुम के खिलाफ धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित