Dhradun Crime: मौत का नजराना

Dhradun Crime: शादीशुदा गुरप्रीत कौर मकान मालिक के निठल्ले और आवारा बेटे आशीष के पे्रेमजाल में फंस गई. उस के खर्चे पर वह ऐश करने लगा और धीरेधीरे 2 लाख रुपए ले लिए. ऐसे बेमेल, गलत और स्वार्थी रिश्तों का आखिर क्या अंजाम हुआ?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के आर्मी एरिया को पार कर के प्रेमनगर से एक किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र शुरू हो जाता है. यहां चाय के बाग भी हैं और अन्य फसलें भी होती हैं. 5 फरवरी, 2016 की शाम सड़क के ठीक किनारे स्थित एक चाय के बाग में पुलिसकर्मियों और आम लोगों की भीड़ लगी थी.  वजह, किसी ने एक खूबसूरत महिला की बेरहमी से हत्या कर दी थी. वहां खून से लथपथ जिस महिला की लाश मिली, वह लाल रंग की जैकेट पहने थी. मृतका की उम्र करीब 35 साल थी और हत्यारे ने किसी तेज धार वाले हथियार से उस की गर्दन पर वार कर के उस की सांसों की डोर काट दी थी.

प्राथमिक जांचपड़ताल में पुलिस महिला की लाश के इर्दगिर्द ऐसे सबूतों को ढूंढ रही थी, जिस के सहारे कातिल तक पहुंचा जा सके. इसी सिलसिले में पुलिस महिला की जेबों की तलाशी भी ले चुकी थी, लेकिन कुछ नहीं मिला था. अलबत्ता पुलिस को वहां पड़ा एक लेडीज हेलमेट जरूर मिला था. संभवत: वह मृतका का ही था.

दरअसल, करीब 7 बजे किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को वहां लाश पड़ी होने की खबर दी थी. कंट्रोल रूम से सूचना फ्लैश होने के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया और क्षेत्र के थाना प्रेमनगर के थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट मय पुलिस बल के अविलंब वहां पहुंच गए. मामला सनसनीखेज था, इस तरह से किसी महिला की हत्या हो जाना कोई मामूली बात नहीं थी. इस की सूचना आला अधिकारियों को दी गई तो एसएसपी डा. सदानंद दाते, एसपी (सिटी) अजय सिंह, एएसपी मंजूनाथ व सीओ (सिटी) मनोज कत्याल समेत कई थानों की पुलिस घटनास्थल पर आ पहुंची. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया, लेकिन मौके पर कातिल तक पहुंचने लायक कोई सुराग नहीं मिल सका.

आसपास भी पुलिस ने तलाश की, लेकिन हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार वहां नहीं मिला. पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों से पूछा कि किसी ने हत्या करने वाले को तो नहीं देखा. लेकिन ऐसा कोई चश्मदीद नहीं नहीं था. अलबत्ता एक युवक ने इतना जरूर बताया कि उस ने स्कूटी वाले एक आदमी को वहां से भागते जरूर देखा था. पुलिस ने युवक से पूछताछ की. उस के अनुसार, वह टहलने के लिए निकला था. तभी उस ने किसी महिला के चीखने की आवाज सुनी. पहले उसे लगा कि महिला पर जंगली जानवर ने हमला किया है. लेकिन जब उस ने इस ओर स्कूटी स्टार्ट होने की आवाज सुनी तो वह यहां आया.

जब तक वह वहां पहुंचा, तब तक स्कूटी सवार वहां से जा चुका था. चूंकि रात का धुंधलका होने लगा था, इसलिए वह स्कूटी सवार को देख नहीं सका. इस के बाद उस ने 100 नंबर पर फोन कर दिया था. कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने एक युवकयुवती को स्कूटी से उस तरफ आते देखा था. मामला सीधे हत्या का था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारा किसी बहाने महिला को अपने साथ यहां लाया होगा और फिर चालाकी से उस की हत्या कर के भाग गया होगा. घटनास्थल से बरामद हुआ हेलमेट चूंकि लेडीज था, इस से यह संभावना अधिक थी कि स्कूटी मृतका की ही रही होगी, साथ ही यह भी कि हत्यारा उस का कोई खास जानकार रहा होगा, इसीलिए वह उस क्षेत्र में उस के साथ आई होगी.

इस बात की संभावना कतई नहीं थी कि महिला की स्कूटी लूटने के लिए उस की हत्या की गई होगी. अमूमन चोरी और लूट के लिए इस तरह हत्या के मामले पेश नहीं आते. निस्संदेह हत्यारे ने पूरी प्लानिंग के साथ वारदात को अंजाम दिया था. घटना के अंदाज से ऐसा लगता था कि हत्यारे के दिल में मृतका के प्रति गहरी नफरत थी.

हत्यारा चूंकि स्कूटी ले कर भागा था, इसलिए पूरे जिले में संदिग्ध व्यक्ति की तलाश में नाकेबंदी कर के अभियान चलाने के निर्देश दे दिए गए. हत्या के इस मामले में जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतका की शिनाख्त जरूरी थी. पुलिस ने उस के चेहरे के फोटो कराए और पूरे उत्तराखंड की पुलिस को व्हाट्सएप ग्रुप में भेज दिए. इस के साथ ही मृतका की लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

रात को करीब 9 बजे चैकिंग के दौरान पुलिस को शहर के सावलांकला क्षेत्र में एक स्कूटी लावारिस खड़ी मिली. पुलिस ने स्कूटी की डिग्गी खुलवा कर उस की तलाशी ली तो उस में से एक मोबाइल फोन मिला. इसी दौरान पर्वतीय क्षेत्र उत्तरकाशी में तैनात सबइंसपेक्टर कुलदीप पंत ने प्रेमनगर पुलिस को बताया कि शिनाख्त के लिए जिस महिला का फोटो वायरल हुआ है, कुछ समय पहले वह एक महिला के केस की पैरवी के सिलसिले में कोर्ट आती थी. उस का पूरा पता तो वह नहीं जानते, लेकिन इतना पता है कि वह रेसकोर्स इलाके में कहीं रहती थी. कुलदीप चूंकि वर्ष 2013 में देहरादून शहर की लक्खीबाग पुलिस चौकी के इंचार्ज रहे थे, इसलिए उन्हें यह जानकारी थी.

मोबाइल मिलने से पुलिस के लिए मृतका की शिनाख्त की राह आसान हो गई थी. पुलिस ने स्कूटी से बरामद मोबाइल को अनलौक करा कर उस का सिम नंबर हासिल करने के साथ कंपनी से पता किया कि वह किस के नाम था. पता चला कि वह नंबर गुरप्रीत कौर के नाम रजिस्टर्ड था. उस का पता सरकुलर रोड स्थित रैस्ट कैंप कालोनी था. पुलिस अविलंब उस पते पर पहुंची तो जानकारी मिली कि वह वहां अपने पति गुरमीत सिंह के साथ किराए पर रहती थी. वहां से थोड़ी दूर स्थित त्यागी रोड पर उस के मायके वाले रहते थे. पुलिस ने वहां जा कर बरामद शव की फोटो दिखाई तो उन्होंने गुरप्रीत की पहचान अपनी बेटी के रूप में कर दी.

इस के बाद पुलिस ने उस के भाई जगजीत की तरफ से रात पौने 12 बजे भादंवि की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस केस की विवेचना थानाप्रभारी यशपाल सिंह के सुपुर्द कर दी गई. अब सब से बड़ा सवाल यह था कि गुरप्रीत की हत्या क्यों और किस ने की थी? एसएसपी डा. सदानंद दाते ने इस मामले में अपने अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. हत्या के खुलासे के लिए एसपी (सिटी) अजय सिंह के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी गई, जिस में विवेचनाधिकारी के अलावा एसओजी इंचार्ज अशोक राठौड़, एआई धनराज सिंह, कैंट थानाप्रभारी राजेश शाह, पटेलनगर थानाप्रभारी बी.डी. उनियाल, बसंत विहार थानाप्रभारी अब्दुल कलाम व शहर कोतवाली प्रभारी एस.एस. बिष्ट आदि को शामिल किया गया.

अगले दिन यानी 6 फरवरी को पुलिस ने गुरप्रीत के नंबर की काल डिटेल्स हासिल की तो उस में अंतिम नंबर एक युवक का निकला. उस युवक का नाम आशीष उर्फ मोनू था. 27 वर्षीय आशीष रेसकोर्स इलाके के त्यागी रोड पर रहता था. उसे संदेह के दायरे में रख कर पुलिस ने तुरंत उस के घर दविश दी तो पता चला कि वह घर से बिना बताए शाम से ही गायब था. घर वालों से भी उस का संपर्क नहीं हुआ था. वहां काम की एक बात यह पता चली कि गुरप्रीत कौर पहले उस के यहां बतौर किराएदार रही थी, लेकिन कुछ महीने पहले उस ने मकान बदल दिया था.

इस से पुलिस का शक और भी बढ़ गया. पुलिस को यह मामला प्रेमप्रसंग का लगा. आगे की जांच में पुलिस को कुछ और भी अहम बातें पता चलीं, जो इसी ओर इशारा कर रही थीं. पुलिस आशीष की तलाश में जुट गई. इस के लिए इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस का भी सहारा लिया गया. इस से पता चला कि उस की न सिर्फ गुरप्रीत से बातें हुई थीं, बल्कि घटना के समय उस की लोकेशन भी गुरप्रीत के साथ थी. जांच आगे बढ़ी तो आशीष की लोकेशन देहरादून से करीब 28 किलोमीटर दूर मसूरी में मिलनी शुरू हुई. यह पता चलते ही एक पुलिस टीम मसूरी के लिए रवाना कर दी गई. तब तक शाम हो चुकी थी.

लोकेशन को ट्रैस करते हुए पुलिस कुल्हाड़ी चौकी स्थित होटल राज पैलेस पहुंची. पुलिस ने होटल का रजिस्टर चैक किया तो पता चला कि आशीष होटल के कमरा नंबर 7 में ठहरा हुआ है. पुलिस ने दरवाजा खुलवाया तो दरवाजा आशीष ने ही खोला. उस पर नजर पड़ते ही पुलिस चौंकी, क्योंकि उस की बाईं कलाई कटी हुई थी. खून बहने से वह लड़खडड़ा रहा था. आननफानन में पुलिस उसे वहां के सेंटमैररी अस्पताल ले गई. पुलिस टीम को कतई उम्मीद नहीं थी कि वह इस हाल में मिलेगा. प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने उसे देहरादून ला कर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया.

अब उस की हालत खतरे से बाहर थी. पुलिस ने औपचारिक पूछताछ के बाद उसे आराम करने दिया. अगली सुबह पुलिस ने आशीष से पूछताछ की तो प्यार, लालच, बेवफाई और नफरत में उलझी बेमेल मोहब्बत की एक चौंकाने वाली कहानी सामने आई. दरअसल, गुरप्रीत का परिवार देहरादून में ही रैस्टकैंप में रहता था. 10 साल पहले घर वालों ने उस का विवाह गुरमीत सिंह से कर दिया था. शादी के बाद गुरप्रीत एक बेटे की मां बनी. गुरमीत का औटो स्पेयर पार्ट्स का बिजनैस था. पतिपत्नी त्यागी रोड स्थित रेलवे कर्मचारी सुबोध कुमार के मकान में किराए पर रहते थे.

सुबोध के 3 बेटे थे, अविनाश, आशीष और अंकुश. पौलिटैक्निक का डिप्लोमा करने के बाद पढ़ाई से आशीष का मन उचट गया था. उस ने नौकरी की भी तलाश नहीं की. निठल्लेपन ने उसे आवारा बना दिया. एक वक्त ऐसा भी आया, जब वह घर वालों के हाथों से निकल गया. तेजतर्रार आशीष मनमर्जी करता था और सनकी किस्म का था. गुरप्रीत थोड़ा खुले विचारों वाली थी. किसी से भी हंसबोल लेती थी. गुरमीत बिजनैस के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते थे. उन के पीछे गुरप्रीत को कोई परेशानी नहीं होती थी. उस का मायका तो नजदीक था ही, सुबोध का भी परिवार उस का खयाल रखता था. घर चूंकि एक ही था, लिहाजा उस के पास आशीष का भी आनाजाना था. आशीष गुरप्रीत की तरफ आकर्षित हो गया.

2 साल पहले दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई, फिर यही दोस्ती प्यार में बदल गई. पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास का होता है. जहां विश्वास, समर्पण और सामाजिक मर्यादाओं को महत्त्व दिया जाता है, वहां रिश्ते की डोर मजबूत होती है. गुरप्रीत के मामले में ऐसा नहीं था. भावावेश में ही सही, आशीष के प्यार में पड़ कर उस ने न केवल अपने विश्वास के रिश्ते को कमजोर किया, बल्कि वह एक बड़ी भूल भी कर रही थी. गुजरते वक्त के साथ गुरप्रीत और आशीष की मोहब्बत परवान चढ़ती गई. जल्दी ही एक ऐसा समय भी आया, जब उन के बीच का रिश्ता मर्यादाओं की दीवार लांघ गया.

गुरप्रीत विवाहिता थी. आशीष के लिए उस ने पति से बेवफाई की थी. उस के साथ गुरप्रीत का रिश्ता सामाजिक और नैतिक तौर पर पूरी तरह गलत था. जीवन की पगडंडियां बहुत रपटीली होती हैं. जब कोई इंसान पतन की डगर पर उतरता है तो फिर उस की वापसी मुश्किल हो जाती है. गुरप्रीत बिना किसी अंजाम की परवाह किए खुद अपनी इच्छा से इस राह पर चल रही थी. इस तरह के रिश्तों में भले ही खुशियों का बगीचा नजर आता हो, परंतु वह वक्ती होता है. उस के नतीजे कब किस रूप में घातक हो जाएं, यह बात कोई नहीं जानता. सीधे तौर पर कहें तो कालांतर में ऐसे रिश्तों के परिणाम दुखदायक ही होते हैं.

आशीष और गुरप्रीत के प्यार का सिलसिला चलता रहा. गुरप्रीत पूरी तरह आशीष के मोहपाश में बंधी थी. उन दोनों के रिश्तों की भनक किसी को नहीं लग सकी. घर के अलावा दोनों बाहर जा कर भी मिलते थे. गुरप्रीत को विश्वास में ले कर अशीष ने उस का एटीएम कार्ड ले लिया था और धीरेधीरे उस में से 2 लाख रुपए निकाल लिए थे. दरअसल, आशीष को लगता था कि उसे बैठेबिठाए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मिल गई है. सन 2015 में जब गुरप्रीत और आशीष के रिश्ते की हकीकत सामने आई तो गुरमीत ने पत्नी को खूब डांटाफटकारा. गुरप्रीत ने वक्त की नजाकत को भांप कर अपने किए पर माफी मांग ली.

इस के बाद गुरमीत ने आशीष पर रुपए वापसी का दबाव बनाया तो काफी जद्दोजहद के बाद उस ने एक लाख रुपए वापस कर दिए और बाकी बाद में देने को कहा. अपनी गृहस्थी को बचाए रखने के लिए गुरमीत ने 3 महीने पहले सुबोध का मकान छोड़ कर ससुराल के नजदीक किराए पर रहना शुरू कर दिया, साथ ही गुरप्रीत को आगाह भी किया कि वह आशीष से कोई गलत रिश्ता न रखे और उस से अपने पैसे वापस मांगे.

अच्छा इंसान वही होता है, जो वक्त रहते अपनी गलतियों को सुधार ले. गलतियों को बारबार दोहराया जाए तो बुरे नतीजों का रूप ले लेती हैं. गुरप्रीत और आशीष दोनों ही इस बात से जानबूझ कर अंजान थे. कुछ दिनों तक गुरप्रीत और आशीष के बीच दूरियां रहीं, लेकिन मकान बदलने से दोनों के दिल नहीं बदले. इस के बाद भी दोनों मिलते रहे. गुरप्रीत पर पति का दबाव था कि वह आशीष से अपने पैसे वापस ले. इसलिए गुरप्रीत ने पैसों का तकाजा जारी रखा. इस बात पर आशीष से उस की बहस भी हुई. गुरप्रीत आजादख्याल महिला थी. आशीष से उस के आंतरिक रिश्ते थे, लेकिन उस की सोच के हिसाब से वह उस की गुलाम नहीं थी. बाद में उस के रिश्ते कुछ अन्य युवकों से भी हो गए. उस की खुफिया मुलाकातों का सिलसिला गुपचुप चलता रहा.

जब यह बात आशीष को पता चली तो उसे बहुत नागवार गुजरा. एक दिन मुलाकात हुई तो आशीष ने तेवर दिखाने की कोशिश की. इस पर गुरप्रीत ने उसे टका सा जवाब दे दिया, ‘‘मैं तुम्हारी गुलाम नहीं हूं आशीष, वैसे भी तुम मेरे ऊपर झूठा आरोप लगा रहे हो.’’

आशीष गुस्से में था. उस ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं गुरप्रीत, इसलिए तुम किसी दूसरे से मिलो यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता. जरूरत पड़ने पर मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.’’

‘‘जब तुम प्यार करते हो तो विश्वास भी करो, साथ ही यह भी कि अपनी हद मत भूलो.’’

उस दिन के बाद आशीष अवसादग्रस्त रहने लगा. काम वह कुछ करता नहीं था, खाली दिमाग शैतान का घर होता है. वह दिनरात गुरप्रीत के बारे में ही सोचता रहता था. तरहतरह के खयाल उस के मन को कचोटते रहते थे. सब से ज्यादा वह यही सोचता था कि गुरप्रीत किसकिस से मिल रही होगी.

गुरप्रीत आशीष की ब्याहता नहीं थी, बल्कि पति से बेवफाई कर के उस ने आशीष में खुशियों की नाजायज तलाश की थी. इस के बावजूद आशीष न सिर्फ गुरप्रीत पर अपना पूरा हक समझता था, बल्कि उसे लगता था कि उस ने उस के साथ बेवफाई की है. वह दिलोदिमाग से पूरी तरह गुरप्रीत से जुड़ा था. उस के लिए इस से भी ज्यादा तकलीफदेह बात यह थी कि वह पैसे वापसी के लिए तकाजा करती थी. आशीष अवसादग्रस्त हुआ तो उस ने मन ही मन आत्महत्या कर के अपनी जिंदगी खत्म करने की सोची. कुछ दिनों तक वह इसी उधेड़बुन में रहा.

इस के बाद उस ने यह सोच कर इस खयाल को अपने मन से निकाल दिया कि इस से तो गुरप्रीत और भी आजाद हो जाएगी. उसे कोई सबक नहीं मिल सकेगा. उसे खुद मरने के बजाय गुरप्रीत को ही बेवफाई का सबक सिखाना चाहिए. आशीष ने सोचा कि कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले उसे गुरप्रीत से बात करनी चाहिए. वह यह सब सोच रहा था कि एक दिन उस ने गुरप्रीत को किसी युवक के साथ घूमते देख लिया. यह देख कर उसे बहुत गुस्सा आया. एक दिन उस ने गुरप्रीत से मिलने की इच्छा जाहिर की तो वह चली आई.

गुरप्रीत किसी भी तरह आशीष से अपने पैसे वापस लेना चाहती थी. जबकि रिश्ते तोड़ कर यह मुमकिन नहीं था. आशीष मिला तो उस ने अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘तुम यह मत सोचना गुरप्रीत कि मुझे कुछ पता नहीं है. मैं जानता हूं, तुम अपनी आदतों को बदलने के लिए तैयार नहीं हो. मैं ने कल भी तुम्हें बाजार में एक युवक से मिलते देखा था.’’

उस की बात सुन कर गुरप्रीत गुस्सा हो गई, ‘‘देखो आशीष, यह मेरा निजी मामला है. तुम अपनी हद में रहो.’’

‘‘क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करतीं?’’

‘‘प्यार करती हूं, तभी तो तुम से मिलती हूं. मैं किस से मिलती हूं, तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि मैं तुम से किनारा तो कर नहीं रही. तुम्हें पूरा वक्त दे रही हूं.’’ कुछ पल रुक कर गुरप्रीत आगे बोली, ‘‘और हां, जितनी जल्दी हो सके, तुम मेरे पैसों का इंतजाम कर दो. तुम नहीं जानते मुझे तुम्हारी वजह से क्याक्या सुनने को मिलता है.’’

आशीष शातिर दिमाग युवक था. उसे गुस्सा तो बहुत आया, पर उस ने अपने गुस्से को जब्त करने में ही भलाई समझी. उस की हालत हारे जुआरी जैसी हो गई है. अपने गुस्से को दबा कर उस ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कुछ करूंगा.’’

उस रात आशीष को नींद नहीं आई. वह गुरप्रीत पर अपना हक समझ रहा था, जबकि वह उस के कहे अनुसार चलने को तैयार नहीं थी. वह चाहता था कि गुरप्रीत सिर्फ उसी की बनी रहे और वक्तबेवक्त उस पर पैसे भी खर्च करे. पर अब सब कुछ उस की सोच के विपरीत हो रहा था. नतीजतन वह गुरप्रीत से नफरत करने लगा.  निठल्लेपन का शिकार आशीष घर पर रह कर ज्यादातर आपराधिक घटनाओं पर आधारित सीरियल देखता रहता था. इसी से आइडिया ले कर उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अगर गुरप्रीत ने उस की बात नहीं मानी तो पूरी प्लानिंग के साथ वह उस की हत्या कर देगा.

इस के लिए जनवरी के अंतिम सप्ताह में उस ने एक चाकू खरीद कर अपने पास रख लिया. उस ने सोचा कि ऐसा कर के वह गुरप्रीत से प्रतिशोध भी ले लेगा और उसे उस के तकाजे से भी मुक्ति मिल जाएगी.  फरवरी की शाम आशीष ने तयशुदा प्लानिंग के तहत गुरप्रीत को फोन कर के मिलने की इच्छा जताई. उस ने उस से रेलवे स्टेशन आने को कहा. गुरप्रीत ने जब आने के लिए हामी भर ली तो आशीष अपनी मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. उधर गुरप्रीत अपने 8 वर्षीय बेटे शीतल से कुछ देर में वापस आने की बात कह कर अपनी स्कूटी से आशीष से मिलने पहुंच गई.

आशीष ने उस से प्रेमनगर के चाय बागान की तरफ घूमने चलने को कहा. गुरप्रीत उस पर भरोसा करती थी, इसलिए साथ जाने को तैयार हो गई. आशीष उस की स्कूटी पर पीछे बैठ गया और दोनों करीब आधे घंटे में चाय बागान के पास पहुंच गए.

आशीष ने अपने इरादे के बारे में गुरप्रीत को जरा भी शक नहीं होने दिया. अपने मोबाइल से उस ने गुरप्रीत के साथ सैल्फी खींची. इस के बाद वह मुद्दे पर आते हुए बोला, ‘‘क्या सोचा गुरप्रीत तुम ने?’’

‘‘किस बारे में?’’

‘‘तुम बदलोगी या नहीं?’’

वह उस के इस रवैये से बुरी तरह चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है, मुझे अभी वापस जाना है.’’

‘‘नहीं, आज तुम सीधे ऊपर ही जाओगी.’’ कहने के साथ ही आशीष के हाथ हरकत में आ गए. उस ने गुरप्रीत का गला पकड़ कर दबाया और जमीन पर पटक दिया. गुरप्रीत को उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उस के खतरनाक इरादों से अंजान गुरप्रीत संभल पाती, उस के पहले ही उस ने चाकू निकाला और उस के गले पर वार कर दिया.

इस से गुरप्रीत की चीख निकल गई. आशीष का वार घातक था. कुछ ही देर में तड़प कर गुरप्रीत की सांसों की डोर टूट गई. इस के बाद वह स्कूटी ले कर वहां से निकल गया. गुरप्रीत की चीख के बाद एकदो लोग वहां पहुंचे. उन्होंने ही पुलिस को इस हत्या की सूचना दी थी. गुरप्रीत की स्कूटी ले कर आशीष सीधा सेवलांकला गया और स्कूटी वहां छोड़ कर टैक्सी स्टैंड पहुंचा, जहां से वह मसूरी चला गया. वहां उस ने होटल में अपनी आईडी जमा कर के कमरा ले लिया. किसी को अंदाजा नहीं था कि वह कत्ल कर के आया है. उस ने रात में शराब पी और चिकन खाया. इस के बाद घंटों आराम किया. अगले दिन वह काफी परेशान रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. दिन भर उस ने आराम किया.

शाम को आशीष ने गुरप्रीत की खबर टीवी पर देखी तो अवसाद से ग्रस्त हो कर खुद भी अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला किया और अपनी बाईं कलाई की नसें काट लीं. संयोग से उसी समय पुलिस ने वहां पहुंच कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस के पहुंचने में देरी होती तो रक्तस्राव से उस की मौत हो सकती थी. विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने आशीष को अस्पताल से डिस्चार्ज करा लिया. होटल के प्रबंधक प्रकाश सिंह की तरफ से धारा 309 के अंतर्गत आशीष के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. पुलिस ने उस से गुरप्रीत की हत्या में इस्तेमाल चाकू के बारे में पूछताछ की तो उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. पुलिस ने उसे 7 फरवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

बाद में पुलिस ने 10 फरवरी को हत्यारोपी को एक दिन के रिमांड पर लिया. उस की निशानदेही पर उसी दिन मसूरी रोड स्थित डीयर पार्क की झाडि़यों से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू बरामद हो गया. फिलहाल वह जेल में है. गुरप्रीत अपने परिवार से बेवफाई कर के सनकी स्वभाव के आशीष के प्यार में न पड़ी होती तो शायद इस तरह की नौबत कभी न आती. आशीष जैसे युवक महिलाओं की भावनाओं से खेल कर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और उन्हें मौजमस्ती और कमाई का जरिया बना लेते हैं.

कानून आशीष को क्या सजा देगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक परिवार की खुशियों को उस ने हमेशा के लिए खत्म कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्र

Hindi Crime Story: दिल दौलत और दगाबाज दोस्त

Hindi Crime Story: टेड सैंडी को दिल से प्यार करता था जबकि सैंडी को उस की दौलत से प्यार था. इस में जब टेड का दोस्त रिक भी सैंडी के साथ मिल गया तो दोनों ने टेड की दौलत के लिए उसे ठिकाने लगा दिया.

उत्तरी अमेरिका के शहर लास वेगास को दुनिया का फन सिटी माना जाता है. वहां चौबीसों घंटे जुआ खेला जाता है, इसलिए वहां जुआ खेलने वालों का जमघट लगा रहता है. यहां सिर्फ जुआ ही नहीं खेला जाता सैक्स और फैशनेबल कपड़ों का भी व्यापार होता है. इस की वजह से यहां अपराधी भी बहुत हैं. यहां रातदिन टौपलेस लड़कियों के डांस शो और शराब के साथ जुआ चलता रहता है. इस शहर की रौनक सालोंसाल से ज्यों की त्यों बनी है. कसीनो में डूबी रातों, स्पा बाथ के जलवे और सैक्स का मजा लूटने यहां तमाम पर्यटक आते हैं.

कसीनो में पैसे वाले लोग हजारोंलाखों रुपयों की बाजियों में डूबे रहते हैं. एक तरफ बाजी जीतने वाले को खुशी होती है तो दूसरी ओर हजारोंलाखों हारने वाले पर भी ‘जीत’ का नशा छाया रहता है. कसीनो का मायाजाल ही ऐसा होता है कि हारने का भी गम नहीं होता. वह इसी उम्मीद में रहता है कि कभी उस का भी समय आ सकता है. 17 सितंबर, 1996 की रात निवेडा वैली पर काले बादलों का ऐसा साया मंडराया, जो कभी फीका नहीं पड़ा. निवेडा वासियों के दिल में अब घोड़ों, जुआ और लड़कियों के शौकीन टेड बिनियन की सिर्फ यादें ही रह गई हैं.

स्मार्ट, गणित में माहिर और बेशुमार दौलत का मालिक. टेड के पास इतनी दौलत थी कि नोट गिनने वाली मशीन भी थक जाए. खतरों से खेलने वाला, मौत से न डरने वाला, टेड आखिर में मारा गया. जो दौलत उसे जान से प्यारी थी, उसी दौलत की वजह से उसे जान गंवानी पड़ी. टेड बिनियन लड़कियों का भी खूब शौकीन था. उसे हर रोज एक नई लड़की की तलाश होती थी. पैसा उस के पास था ही, इसलिए हर रात उसे नई लड़की आसानी से मिल जाती थी. उस रात वह लड़की की ही तलाश में चिताह क्लब पहुंचा तो वहां उस की मुलाकात साथ वाली टेबल पर बैठी सैंडी मर्फी से हुई.

टेड बारबार उसी की ओर देख रहा था. उस के इस तरह देखने से सैंडी को अंदाजा हो गया कि वह क्या चाहता है. सैंडी को पता था कि टेड अरबपति है. टेड ने सैंडी को अपनी तरफ खींचने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने भाव नहीं दिया. तब उस ने उसे नोटों की गड्डी दिखाई. लेकिन सैंडी ने उसे लौटाते हुए कहा, ‘‘तुम ने मुझे समझा क्या है? तुम्हें क्या लगता है कि पैसे ले कर मैं तुम्हारे साथ चल दूंगी.’’

टेड ने सोचा था कि सैंडी भी अन्य लड़कियों की तरह होगी, लेकिन वह वैसी नहीं थी. जबकि यह उस की एक अदा थी, जिस की बदौलत वह टेड को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब हो गई थी. उस के इस अंदाज से टेड अंदर तक घायल हो गया था. लड़कियों को सिर्फ मौजमस्ती की चीज समझने वाले टेड के दिल में सैंडी अपनी इस अदा से उतर गई थी. जबकि सही बात यह थी कि सैंडी पैसों की तलाश में ही कैलिफोर्निया से लास वेगास आई थी. वह पैसों के लिए क्लबों में टौपलेस डांस करती थी. सैंडी की यह अदा टेड के लिए दिखावा भर थी. वह टेड की अमीरी और खुले दिल से अनजान नहीं थी. वह खुद उसे अपनी ओर खींचना चाहती थी. जिस में वह कामयाब भी हो गई थी.

इस के बाद उन्हें मिलते देर नहीं लगी. उन की मुलाकातें होने लगीं. एक लंबे समय के बाद सैंडी को पता चला कि टेड ही उस कसीनो का मालिक है, जहां वह काम करती थी. 2 सप्ताह में ही सैंडी की जिंदगी बदल गई थी. टेड की पत्नी को जब पति और सैंडी के प्रेम के बारे में पता चला तो उस की पत्नी डौरिस अपनी 15 वर्षीया बेटी को ले कर चली गई. उस ने तलाक का मुकदमा करने में भी देर नहीं की. टेड शराब तो पीता ही था, पत्नी के जाने के बाद हेरोइन भी लेने लगा.

डोरिस के घर से जाते ही जो सैंडी पैसों की खातिर हर रात क्लबों में जिस्म दिखाने का नाच करती थी, वह अरबपति के घर की मालकिन बन गई. एक तरह से उस के हाथ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी लग गई थी. लास वेगास ने उस की जिंदगी बदल दी थी. टेड सैंडी की अदाओं पर फिदा था. हर रात उस के साथ बाहर जा कर खाना खाता, कसीनो में जुआ खेलता और फिर रात भर सैंडी के साथ मजे लेता. यही उस की जिंदगी का नियम बन गया था.

सैंडी ने जिंदगी में जो चहा था, पा लिया था. अब टेड की बेशुमार दौलत सैंडी के हाथों में थी. उस की जिंदगी ने नया करवट तब लिया, जब उस की जिंदगी में टेबिश आया. रिक टेबिश लास वेगास सन 1991 में आया था. यहां उस ने अपनी ट्रांसपोर्ट कंपनी खोली थी. इस के बाद जल्दी ही उस की गिनती करोड़पतियों में होने लगी थी. पिएरो रेस्टोरेंट के रौसलेट में रिक की मुलाकात टेड से हुई तो जल्दी ही दोनों गहरे दोस्त बन गए. एक दिन टेड रिक को अपने घर ले गया तो वहां उस ने उसे सैंडी से मिलवाया. इस के बाद अक्सर तीनों की मुलाकातें होने लगीं.

टेड बिनियन अपने कारोबार में व्यस्त रहता था, जिस की वजह से सैंडी का झुकाव रिक की ओर हो गया. वह उस के साथ शौपिंग पर भी जाने लगी. इस तरह दोनों करीब आते गए. इस के बाद एक शाम जब दोनों घर में अकेले थे तो सैंडी ने कहा, ‘‘रिक, क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमारे बीच अपनापन इस हद तक बढ़ गया है कि अब इसे रिश्ते का नाम दे दिया जाना चाहिए.’’

‘‘कैसा रिश्ता?’’ रिक ने पूछा.

‘‘प्यार का रिश्ता,’’ सैंडी ने कहा, ‘‘तुम्हारे साथ होने पर दिल में कुछकुछ होने लगता है. सच कहूं, मेरा दिल बिलकुल खाली है. टेड को तो मेरे दिल ने सिर्फ नाम का पति माना है. उस बूढ़े में इतनी ताकत कहां है कि उसे पूरी तरह से पति मान लिया जाए. वह शरीर में आग तो लगा देता है, लेकिन बुझाना उस के वश की बात नहीं है.’’

रिक उस के कहने का मतलब समझ गया था. वह तो वैसे ही सैंडी पर फिदा था. इस तरह खुले आमंत्रण पर भला कैसे खुद को रोक पाता. उस ने सैंडी को बाहों में भर लिया. इस का नतीजा यह रहा कि दोनों के बीच जिस्मानी दूरी खत्म होते देर नहीं लगी. दोनों एकांत के साथी बने तो हर छोटीबड़ी बातों के भी राजदार बन गए. इस सब से बेखबर टेड का भी रिक पर विश्वास बढ़ता गया. यही वजह थी कि एक दिन टेड ने उस से पार्किंग के नीचे बने बेसमेंट में दबी चांदी के सिक्कों की बोरियों को कहीं दूसरी जगह ले जाने के बारे में सलाह मांगी. क्योंकि टेड अपनी बहन की दखलंदाजी से परेशान था. वह उस की दौलत हड़पना चाहती थी.

इस के बाद रिक की सलाह पर टेड ने चांदी के सिक्कों से भरी बोरियां लास वेगास से 60 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव पाहरूपम पहुंचा दी. टेड ने वहां जमीन खरीद कर इंजीनियर्स ग्रुप की मदद से एक तहखाना बनवाया था और उसी में अपनी दौलत रखवा दी थी. 17 सितंबर, 1998 की रात लास वेगास के मेट्रोपैलिटन डिपार्टमेंट में एक फोन आया, जिस में एक औरत कह रही थी कि उस के पति की तबीयत बहुत खराब है. उन्होंने सांस लेना बंद कर दिया है.

उस ने घर का पता बताया था 2406, पोलोकिनो लेन. यह टेड बिनियन का घर था. वह फोन सैंडी ने किया था. थोड़ी देर में घर के बाहर 3 जीपें आ कर रुकीं. इसी के साथ डाक्टरों की 2 टीमों के साथ पुलिस वालों की लाइन लग गई. भीतर से सैंडी चिल्लाई,  ‘‘आप लोग इन्हें बचा लो, यह मर जाएंगे, इन की सांस रुक गई है.’’

एक डाक्टर उसे चुप कराने लगा तो बाकी अंदर चले गए. रेंकल ने बाहर आ कर उस से पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘मैं उन की बीवी हूं.’’ सैंडी बोली.

‘‘आप की पति से आखिरी बार कब मुलाकात हुई थी?’’

‘‘आज सुबह.’’

रेंकल सैंडी को वहीं छोड़ कर अंदर टेड के पास पहुंचा. उस की नब्ज टटोली तो रुक चुकी थी. शरीर एकदम ठंडा हो चुका था. साफ था टेड मर चुका था. सैंडी भी आ गई और टेड की लाश से लिपट कर रोने लगी. पुलिसकर्मियों ने उसे पकड़ कर अलग किया और सांत्वना दिया. टेड को जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया. वहां सैंडी की तबीयत खराब हो गई तो उसे दवा दे कर सुला दिया गया. कुछ देर में रिक भी आ गया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में उस ने बताया कि वह टेड और सैंडी दोनों का दोस्त है. वह कारोबार के सिलसिले में शहर से बाहर जा रहा था. टेड की मौत का पता चला तो एयरपोर्ट से सीधे अस्पताल आ गया.

पुलिस ने अनुमान लगाया कि कैसीनों का लाइसैंस न मिलने से टेड ने आत्महत्या की होगी. सैंडी ने बताया कि देर शाम उस ने टेड के हाथ में बंदूक देखी थी. चाह कर भी उसे नींद नहीं आ रही थी. परेशानी की वजह से उन्होंने हेरोइन की ज्यादा डोज ले ली होगी? जांच करने वाली टीम ने पाया कि टेड बिनियन की मौत आत्महत्या नहीं थी, बल्कि उसे आत्महत्या दिखाने की कोशिश की गई थी. जांच में उस के कमरे से जो एक्सानेक्स की शीशी मिली थी, उस की अधिक डोज देने से टेड तड़पतड़प कर एक कमरे से दूसरे कमरे में भटका होगा. कमरा बंद होने की वजह से छलांग लगाने का भी कोई रास्ता नहीं था. इस दवा के कारण उल्टी भी हुई होगी, जिसे साफ किया गया होगा.

यह अपराध काफी गहराई तक सोच कर किया गया था. टेड बिनियन की मौत के 2 दिनों बाद 19 सितंबर, 1998 पुलिस को सूचना मिली कि 2 बड़ेबड़े भरे हुए ट्रक पाहरूम से बाहर जाते हुए देखे गए हैं. उन दोनों ट्रकों में से एक को रिक टेबिश चला रहा है, जबकि दूसरे को उस का साथी डेविड मेटसन. दोनों ट्रकों को पीछा कर के पकड़ लिया गया. उस समय तो रिक बहाना कर के बच गया था. उस ने कहा था कि टेड बिनियन ने उसे ये ट्रक मि. एंथनी के पास पहुंचाने को कहा था. लेकिन आगे की जांच में सैंडी और रिक शक के दायरे में आ गए. इस के बाद 14 जून, 1999 को सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में पता चला कि जिस रात टेड का कत्ल हुआ था, दोनों होटल पेनिनसुला में एक साथ दिखाई दिए थे. होटल का कमरा मिस्टर एंड मिसेज टेबिश के नाम से बुक कराया गया था. रात गुजारने के बाद दोनों सुबह वहां से एक साथ घर के लिए निकले थे. लेकिन उस समय सबूत न होने की वजह से वे छूट गए थे. करीब 4 सालों बाद अक्टूबर, 2004 में सैंडी मर्फी और रिक टेबिश को सबूतों के साथ पेशी के लिए कोर्ट में लाया गया, जहां दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. सैंडी ने माना कि उस ने टेड बिनियन के साथ शादी प्यार की वजह से नहीं, उस की दौलत की वजह से की थी. वह उस की दौलत हासिल करना चाहती थी. इस के बाद रिक उस की जिंदगी में आया तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया.

सैंडी की तरह रिक भी टेड की दौलत हड़पना चाहता था. सैंडी ने जब उस से टेड की दौलत हथिया कर शादी करने को कहा तो वह राजी हो गया. सैंडी जानती थी कि टेड हेरोइन के नशे का आदी है. इस के अलावा वह कई तरह की नशीली गोलियां भी खाता था. उस ने टेड को मारने के लिए इन्हीं चीजों का सहारा लेने का फैसला किया. रिक भी इस पर सहमत हो गया. घटना वाले दिन पहले दोनों ने दवा की हाई डोज दे कर टेड को मार दिया. उस के बाद दोनों ने जिस्मानी भूख मिटाई.

उन्होंने माना कि टेड बिनियन को जबरदस्ती 12 पैकेट हेरोइन खिलाई गई थी. उस के बाद एक्सानेक्स की 10 गोलियां उस के मुंह में ठूंस दी थी, ताकि उस की अरबों की दौलत के मालिक वे खुद बन सकें. दोनों के अपराध स्वीकार करने और सबूतों के आधार पर जज ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. उम्रकैद की सजा मिलने के बाद सैंडी और रिक ने कई बार जमानत की अर्जी दी, लेकिन उन्हे खारिज कर दिया गया. 2 जनवरी, 2010 को फिर सैंडी ने उम्र का हवाला देते हुए जमानत की अर्जी दाखिल की कि अभी उस की उम्र ही क्या है, अपने किए की वह काफी सजा भुगत चुकी है, इसलिए उस के भविष्य को ध्यान में रख कर उसे जमानत दी जाए. लेकिन इस बार भी उसे जमानत नहीं मिल सकी. दोनों की उम्रकैद की सजा बरकरार है. यह प्रकरण इतना विख्यात हुआ था कि हौलीवुड में इस पर फिल्म बनी थी. Hindi Crime Story

Moradabad Crime: सावधान – ऐसे दोस्तों से

Moradabad Crime: रईस मंसूरी और जमा खां के बीच गहरी दोस्ती थी. इसी दोस्ती की आड़ में रईस ने उस की बेटी से संबंध तो बनाए ही, अश्लील फिल्म भी बना ली. मजबूरी में जमा खां के बेटे ने जो किया, सामाजिक तौर पर क्या उसे उचित कहेंगे?

मुरादाबाद के मोहल्ला वारसीनगर के रहने वाले रईस मंसूरी का इनवर्टर बनाने और उस की मरम्मत करने का काम था. उस का यह काम काफी अच्छा चल रहा था. 15 दिसंबर, 2015 को इनवर्टर लगवाने के लिए उस के दोस्त जमा खां के बेटे आलम ने फोन किया. आलम शहर के ही मोहल्ला बखलान की चामुंडा वाली गली में रहता था. इनवर्टर लगाने के लिए वह रईस को 5 हजार रुपए पहले ही दे चुका था. लेकिन काम ज्यादा होने की वजह से रईस को आलम के यहां इनवर्टर लगाने का समय नहीं मिला था.

आलम ने 15 दिसंबर को रईस को फोन कर के अपने यहां जल्द इनवर्टर लगाने को कहा तो रईस ने उसे भरोसा दिया कि उसी दिन शाम को वह उस के यहां इनवर्टर जरूर लगा देगा. अपने वादे के अनुसार उसी दिन शाम को लगभग साढ़े 7 बजे रईस  अपनी स्कूटी से आलम के घर के लिए निकला. आलम के घर जाने वाली बात उस ने अपनी पत्नी नुसरत को बता दी थी. रईस को आलम के घर गए कई घंटे बीत गए. न तो वह लौटा और न ही उस ने फोन किया. इस से पहले जब कभी उसे देर होने लगती थी तो वह पत्नी को फोन कर देता था. घर आने में कितनी देर और लगेगी, यह जानने के लिए नुसरत ने फोन किया तो रईस का फोन बंद मिला.

नुसरत ने 2-3 बार पति को फोन किया, हर बार कंप्यूटर द्वारा फोन बंद होने की बात बताई गई. नुसरत परेशान हो गई कि उन्होंने फोन बंद क्यों कर दिया है? आधे घंटे बाद उस ने फिर फोन किया. इस बार भी फोन बंद मिला. पति से संपर्क न होने की बात उस ने अपने देवर अमीर को बताई. अमीर आलम को तो जानता ही था, उस ने उस का घर भी देखा था. अमीर भाई के बारे में पता लगाने आलम के घर पहुंचा. पूछने पर आलम ने बताया कि वह तो इनवर्टर लगा कर 8 बजे ही चले गए थे. अमीर घर लौट आया. अमीर और नुसरत रईस के बारे में पता लगाने लगे, लेकिन कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली.

रात भर दोनों परेशान होते रहे. सुबह होते ही रईस के घर वालों ने एक बार फिर उस की खोज शुरू कर दी. सभी रिश्तेदारों से फोन कर के उस के बारे में पूछा, लेकिन सभी ने कहा कि वह उन के यहां नहीं आया था. जब कहीं से रईस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो घर वाले चिंतित हो गए. 16 दिसंबर को अमीर हुसैन ने थाना मुरादाबाद पहुंच कर भाई रईस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. रईस के मामले में पुलिस कोई काररवाई करती, उस के पहले ही क्रिकेट खेलने वाले कुछ बच्चों ने रईस के बारे में पता कर लिया.

हुआ यह कि 16 दिसंबर की दोपहर को कुछ बच्चे शहर के किनारे से गुजरने वाली रामगंगा नदी के किनारे क्रिकेट खेल रहे थे. उन्हीं बच्चों में से किसी ने ऐसा शौट मारा कि गेंद पानी के किनारे जा कर गिरी. जैसे ही एक बच्चा गेंद लेने गया, उसे वहां एक आदमी का हाथ पड़ा दिखाई दिया. हाथ देख कर वह बच्चा डर गया और उस ने शोर मचा दिया. शोर सुन कर सभी बच्चे वहां आ गए. हाथ देख कर बच्चे क्रिकेट खेलना भूल कर शोर मचाने लगे. इस के बाद आसपास के खेतों में काम करने वाले भी आ गए. सभी इस बात को ले कर परेशान थे कि यह कटा हाथ किस का हो सकता है?

किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दे दी. वह इलाका थाना मुगलपुरा के तहत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना मुगलपुरा को दे दी गई. खबर मिलते ही मुगलपुरा के थानाप्रभारी अनिल कुमार वर्मा एसएसआई मनोज कुमार सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों को साथ ले कर रामगंगा नदी के किनारे पहुंच गए. हाथ के बालों को देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि यह हाथ किसी आदमी का है. पुलिस को लगा कि इस हाथ को कुत्ता वगैरह यहां खींच कर ले आया है. लाश भी यहीं आसपास ही होगी.

पुलिस वाले लाश को इधरउधर तलाशने लगे. वहां से कुछ दूरी पर रामगंगा पर बने पुल के नीचे 4 बोरे मिले. पुलिस ने उन बोरों को खोला तो उन में से आदमी के कटे अंग निकले. लेकिन उस में सिर और एक हाथ नहीं मिला. थानाप्रभारी ने यह सूचना एसएसपी नितिन तिवारी, एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव को दी तो दोनों पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने सिर और एक हाथ को आसपास बहुत ढूंढा, लेकिन वे नहीं मिले. शायद उन्हें कोई जंगली जानवर उठा ले गया था.

5 टुकड़ों में लाश मिलने की खबर थोड़ी देर में ही शहर में फैल गई. मीडिया वाले भी वहां पहुंच गए. एक दिन पहले ही थाना मुगलपुरा में रईस मंसूरी की गुमशुदगी दर्ज हुई थी. थानाप्रभारी ने गुमशुदगी वाला रजिस्टर चेक किया तो पता चला कि गुम हुए व्यक्ति की कदकाठी और हुलिया मरने वाले से मिल रहा था. यह गुमशुदगी अमीर ने दर्ज कराई थी. अमीर का फोन नंबर लिखा ही था, थानाप्रभारी ने उस नंबर पर फोन कर के उसे बुला लिया. अनिल कुमार वर्मा से बात होने के बाद अमीर अपनी भाभी नुसरत को ले कर रामगंगा के किनारे पहुंच गया. हालांकि लाश का सिर नहीं था, इस के बावजूद कपड़ों से अमीर और नुसरत ने उस की शिनाख्त रईस मंसूरी की लाश के रूप में कर दी.

पति के शरीर के 5 टुकड़े देख कर नुसरत रोरो कर बेहोश हो गई. अमीर समझ नहीं पा रहा था कि उस के भाई की किसी से ऐसी क्या दुश्मनी थी कि उस की हत्या कर उसे इस तरह टुकड़ों में काट कर यहां फेंक गया. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि हत्यारों ने उस के गुप्तांग को काट डाला था. हत्या करने से पहले रईस ने शराब भी पी थी. हत्या के इस सनसनीखेज मामले को सुलझाने के लिए एसएसपी ने एसपी (सिटी) डा. रामसुरेश यादव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम ने मृतक की पत्नी नुसरत और भाई अमीर से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रईस का किसी से कोई झगड़ा वगैरह नहीं था.

उस दिन शाम को वह आलम के घर इनवर्टर लगाने गया था. उस के बाद नहीं आया. इसी पूछताछ में पुलिस को पता चला कि नुसरत रईस की चौथी बीवी थी. रईस ने पहला निकाह अमरोहा की शबाना से किया था. उसे तलाक दे कर रईस ने गुइयाबाग निवासी नरगिस से दूसरा निकाह किया था. कुछ दिनों साथ रख कर रईस ने उसे भी छोड़ दिया था. इस के बाद रईस ने लालबाग निवासी रानी से निकाह किया. उसे भी छोड़ कर उस ने 8 साल पहले नुसरतजहां से निकाह किया, जिस से उसे 3 बच्चे थे. पुलिस ने मृतक रईस मंसूरी के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगाया तो वह बंद आ रहा था.

लेकिन जांच में पता चला कि उस के फोन की अंतिम लोकेशन 15 दिसंबर की शाम को उसी इलाके में थी, जहां आलम रहता था. इस से यह तो पता चल रहा था कि रईस आलम के यहां गया था, लेकिन वहां जाने के बाद उस का फोन बंद क्यों हो गया? पुलिस को यही पता लगाना था. पुलिस टीम बखलान के रहने वाले आलम के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पूछताछ के लिए पुलिस उसे थाने ले आई. अनिल कुमार वर्मा ने आलम से रईस की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू की तो वह यही कहता रहा कि उस के यहां इनवर्टर लगाने के बाद रईस चला गया था. इस के बाद वह कहां गया, उसे पता नहीं. वह खुद को बेकुसूर बता रहा था.

पूछताछ के दौरान ही एसएसआई मनोज कुमार सिंह को मुखबिर से पता चला कि मृतक रईस के आलम की बहन से नाजायज संबंध थे. यह बात उन्होंने अनिल कुमार वर्मा को बता दी. जिस तरह क्रूरता से रईस की लाश के टुकड़े कर के उस के गुप्तांग को काट कर फेंक दिया गया था, उस से अनिल कुमार वर्मा को लग रहा था कि हत्या के पीछे प्रेमप्रसंग का मामला है. मनोज कुमार सिंह की बात ने उन के शक को पुख्ता कर दिया. उन्हें लगा कि आलम झूठ बोल रहा है. इसलिए उन्होंने उस से थोड़ी सख्ती की तो वह सारी सच्चाई बताने को तैयार हो गया.

उस ने स्वीकार कर लिया कि रईस मंसूरी की हत्या उसी ने की थी. उस ने उस के सामने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे कि उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. आलम से पूछताछ में रईस मंसूरी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी. रईस मंसूरी और आलम के पिता जमा खां आपस में अच्छे दोस्त थे. कहा जाता है कि दोनों बिजली की लाइनों का तार चोरी किया करते थे. चोरी किए तार से जो पैसा मिलता था, उसे वे आपस में बांट लेते थे. इसी काम से वे अपनेअपने परिवारों को पाल रहे थे.

लेकिन जमा खां की पत्नी को जानकारी नहीं थी कि उस का पति बिजली के तार चोरी करता है. उसे तो जमा खां ने यही बताया था कि वह इलैक्ट्रिशियन है. करीब 15 साल पहले की बात है. रईस और जमा खां काशीपुर की तरफ बिजली के तार काटने गए थे. जमा खां ने पत्नी को बताया था कि उसे काशीपुर में बिजली फिटिंग का एक बड़ा काम मिला है, रईस के साथ वह उस काम को करने जा रहा है. उस की पत्नी रईस को जानती थी, क्योंकि वह उस के यहां आताजाता रहता था. उस ने कहा था कि वह वहां से कई दिनों बाद लौटेगा. लेकिन वह वहां से जिंदा नहीं लौट सका.

दरअसल, हुआ यह कि जब दोनों रात को काशीपुर के जंगल में 11 हजार वोल्ट की लाइन के तार काट रहे थे, तभी जमा खां को बिजली ने करंट मार दिया. वह खंभे से नीचे गिरा और उस की मौत हो गई. दोस्त को मरा देख कर रईस डर गया. कहीं वह पुलिस के चक्कर में न फंस जाए, वह उसे वहीं छोड़ कर घर चला आया. अगले दिन लोगों ने खेत में लाश देखी तो इस की सूचना पुलिस को दे दी. पुलिस मौके पर पहुंची तो लाश के पास बिजली के तार काटने के औजार देख कर पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यह बिजली के तार काटने वाला चोर है और बिजली के करंट की चपेट में आ कर मर गया है.

पुलिस ने आवश्यक काररवाई कर के लाश का पोस्टमार्टम कराया और शिनाख्त न होने के बाद अज्ञात मान कर उस का अंतिम संस्कार करा दिया. इस के बाद एक दिन जमा खां की पत्नी को बाजार में रईस मिला तो वह उसे देख कर चौंकी, क्योंकि उस का पति तो रईस के साथ काम करने काशीपुर गया था. तसलीमा ने उस से पति के बारे में पूछा तो रईस ने बताया कि उस की एक हादसे में मौत हो गई है.

पति की मौत की बात सुन कर तसलीमा चौंकी, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो, यह नहीं हो सकता?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं भाभी, करंट लगने से जमा खां की मौत हो गई है.’’ रईस ने कहा.

‘‘यह कैसे और कहां हो गया? तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’ तसलीमा ने पूछा.

‘‘हम दोनों बिजली का तार काटने काशीपुर गए थे. वहीं तार काटते समय उन्हें 11 हजार वोल्ट का करंट लग गया, जिस से वह खंबे से नीचे गिर गया और उस की मौत हो गई.’’ रईस ने बताया.

‘‘मेरे पति चोर नहीं थे, वह तो इलैक्ट्रिशियन थे. तुम झूठ बोल रहे हो.’’ तसलीमा रोते हुए बोली.

‘‘नहीं भाभी, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं. उन्होंने तुम्हें बताया होगा कि वह इलैक्ट्रिशियन हैं. हकीकत में हम दोनों तार काट कर बेचा करते थे.’’ रईस ने कहा.

‘‘मुझे तुम्हारी बात पर यकीन नहीं हो रहा. मैं काशीपुर जा कर वहां की पुलिस से मिलूंगी.’’ तसलीमा ने कहा.

‘‘तुम वहां जाना चाहती हो तो जरूर जाओ. लेकिन वहां जा कर तुम खुद भी फंस सकती हो. वहां की पुलिस ने जब जमा खां की लाश बरामद की थी, तब उस के साथ तार काटने के औजार भी मिले थे. जब तुम वहां जाओगी, पुलिस तुम से कहेगी कि एक चोर की बीवी हो कर तुम ने पुलिस को इस की खबर क्यों नहीं दी?’’ रईस ने उसे डराने के लिए कहा.

तसलीमा सीधीसादी औरत थी. वह रईस की बातों से डर कर काशीपुर नहीं गई और पति की मौत का गम सीने में दबा कर रहने लगी. उस समय उस का बेटा आलम 13 साल का था. रईस मंसूरी ने बाद में इनवर्टर का काम शुरू कर दिया. उस ने एकएक कर के 4 शादियां कीं. 3 बीवियों को वह तलाक दे चुका था, अब चौथी बीवी नुसरतजहां के साथ रह रहा था. पति के मरने के बाद तसलीमा को आर्थिक परेशानी हुई तो रईस ने उस की काफी मदद की. इस वजह से वह रईस की एहसानमंद हो गई. तसलीमा की बेटियां जवान हो चुकी थीं. रईस की नीयत उस की बड़ी बेटी पर खराब हो गई. वह उसे फंसाने की कोशिश करने लगा. उसे इस बात की भी शर्म नहीं आई कि वह उस के लंगोटिया यार की बेटी है. एक तरह से वह उस की बेटी की तरह है. लेकिन उस ने इस ओर ध्यान नहीं दिया.

उसे फंसाने के लिए वह उस की पसंद की चीजें खरीद कर देने लगा. आखिर एक दिन वह अपनी योजना में सफल हो गया. नाजायज संबंध बने तो यह सिलसिला काफी दिनों तक चला. उस ने उस के अंतरंग संबंधों की मोबाइल से फिल्म भी बना ली थी. तसलीमा के घर वालों को रईस मंसूरी पर इतना विश्वास था कि कोई उस के बारे में कुछ गलत सोच भी नहीं सकता था. इसी की आड़ में वह अपने मंसूबे पूरे कर रहा था. कुछ दिनों बाद तसलीमा की बेटी ने महसूस किया कि रईस से संबंध बना कर उस ने ठीक नहीं किया, क्योंकि वह उस की पिता की उम्र का है. उस से वह शादी भी नहीं कर सकती.

यह अहसास होने के बाद वह उस से दूरियां बनाने लगी. लेकिन रईस उस का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं था. उस ने जो वीडियो बना रखी थी, उसी के बल पर वह उसे ब्लैकमेल करने लगा. रईस ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उस वीडियो को इंटरनेट पर डाल देगा. इस धमकी से वह डर गई. इस तरह रईस उस का शारीरिक व मानसिक शोषण करने लगा. तसलीमा का बेटा आलम अब जवान हो चुका था. वह दुनियादारी समझने लगा था. अपने घर आने वाले रईस की गतिविधियां उसे अच्छी नहीं लगती थीं. क्योंकि वह जब भी उस के घर आता था, उस की बहन के आगेपीछे मंडराता रहता था.

वह रईस से तो कुछ कह नहीं कहा, क्योंकि वह उस के मरहूम पिता की उम्र का था. उस की अम्मी भी उस की बड़ी इज्जत करती थी. इसलिए उस ने बहन को ही डांटा कि वह रईस ज्यादा बातें न किया करे. आलम को पता नहीं था कि बात तो उस की बहन भी नहीं करना चाहती, पर रईस ने वीडियो फिल्म का ऐसा खौफ उस के दिल में बैठा दिया है कि ना चाहते हुए भी वह रईस की हर बात मानती है. एक दिन आलम के एक दोस्त ने अपने मोबाइल में उसे एक वीडियो दिखाई. वह वीडियो देख कर आलम का खून खौल उठा. उस वीडियो में उस की बहन रईस के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. उस के दोस्त को वह फिल्म रईस ने ही दी थी.

इस के बाद रईस आलम का दुश्मन बन गया. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह उसे उस के किए की सजा जरूर देगा. अपने दिल में उठ रहे गुस्से के सैलाब को उस ने जाहिर नहीं होने दिया और रईस को ठिकाने लगाने का उपाय खोजने लगा. आखिर उस ने एक खौफनाक योजना बना ही ली. आलम को अपने घर में इनवर्टर लगवाना था. चूंकि रईस इनवर्टर का काम करता था, इसलिए उस ने रईस को इनवर्टर लगाने के लिए 5 हजार रुपए दे दिए. रईस के पास काम ज्यादा था, इसलिए उस ने सोचा कि जिस दिन उसे टाइम मिलेगा, वह आलम के यहां जा कर इनवर्टर लगा देगा.

आलम ने रईस को फोन किया तो उस ने आलम से कह दिया कि 15 दिसंबर की शाम को वह उस के यहां इनवर्टर लगा देगा. आलम ने उसी दिन रईस को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. इस काम में उस ने अपने एक दोस्त शोएब को भी शामिल कर लिया. उस दिन शाम को वह रईस के आने का इंतजार करने लगा. शाम साढ़े 7 बजे तक रईस उस के यहां नहीं पहुंचा तो उस ने उसे फोन किया. फोन पर बात करने के कुछ देर बाद रईस अपनी स्कूटी से आलम के यहां पहुंच गया.

योजना के अनुसार, आलम ने शराब की एक बोतल पहले से ही खरीद कर रख ली थी. रईस ने जब उस के यहां इनवर्टर लगा दिया तो वह रईस को एक कमरे में ले गया. उस कमरे में मेज पर शराब की बोतल और नमकीन पहले से ही रखी थी.

आलम ने कहा, ‘‘इनवर्टर लगने की खुशी में मैं ने छोटी सी पार्टी रखी है.’’

रईस मना नहीं कर सका और आलम तथा शोएब के साथ शराब पीने बैठ गया. आलम ने तेज आवाज में डेक बजा दिया. जैसे ही उन का पीनेपिलाने का दौर खत्म हुआ, आलम अपनी जगह से उठा और कमरे में पहले से रखे हथौड़े से रईस के सिर पर जोरदार वार कर दिया. एक ही वार में रईस बिना कोई आवाज किए नीचे गिर गया. सिर से खून बहने लगा. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. हत्या के बाद उन के सामने समस्या लाश ठिकाने लगाने की थी. नाराज आलम ने उस की गरदन काट दी. इस के बाद उस ने लाश के टुकड़े कर के 4 बोरों में भर दिए और आधी रात को उन बोरों को एकएक कर के रामगंगा नदी के किनारे फेंक आया.

कमरे में जमीन पर जो खून फैला था, उसे भी उस ने मिट्टी सहित कुरच कर एक बोरे में भर दिया और उसे भी जामा मस्जिद के नाले में डाल आया. उस की स्कूटी को उस ने रामगंगा नदी के पार मजार के पास बने कुंड में फेंक दी. पूछताछ के बाद पुलिस ने आलम के साथी शोएब को भी गिरफ्तार कर लिया. आलम की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हथौड़ा, चाकू, आरी के ब्लेड, मृतक का मोबाइल फोन और स्कूटी बरामद कर ली. इस के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Moradabad Crime

(कथा पुलिस सूत्रों व अभियुक्त आलम के बयान पर आधारित. कथा में तसलीमा परिवर्तित नाम है)

 

Family Dispute: बुढ़ापे का सहारा बना कातिल

Family Dispute: हरिकिशन अपना करोड़ों का मकान अपनी तलाकशुदा बेटी को देना चाहते थे, जो उन के दोनों बड़े बेटों को इसलिए मंजूर नहीं था, क्यों उसी मकान में बनी दुकानों से उन की रोजीरोटी चलती थी. इस मामले में समझबूझ कर काम लिया गया होता तो बाप और बहन की हत्या में विजय और अजीत जेल में नहीं होते.

उम्र बढ़ने पर इंसान का शरीर तो कमजोर हो ही जाता है, कई तरह की बीमारियां भी घेर लेती हैं. 88 साल के हो चुके हरिकिशन वर्मा के साथ भी कुछ ऐसा ही था. हालांकि देखने में वह ठीकठाक लगते थे, लेकिन अंदर से वह कई तरह की बीमारियों से घिरे थे. वह शास्त्रीनगर के नीमड़ी गांव स्थित अपने घर में अपनी 50 साल की बेटी राजबाला के साथ रहते थे. उसी मकान में उन के बेटे अजीत और विजय अपनी ज्वैलरी शौप चलाते थे, लेकिन इन दोनों बेटों से उन का कुछ लेनादेना नहीं था. इस की वजह यह थी कि उन का उन से संपत्ति को ले कर विवाद चल रहा था. उन का छोटा बेटा अरविंद, जो उत्तरीपश्चिमी दिल्ली के सरस्वती विहार में रहता था, वही उन की देखभाल के लिए रोज आता था.

अरविंद सुबह ही पिता के पास पहुंच जाता और दिन भर उन की देखभाल करता था. शाम 6-7 बजे वह घर लौट जाता था. कई सालों से उस का यही नियम बना हुआ था. अरविंद 28 जनवरी, 2016 की सुबह करीब साढ़े 9 बजे नीमड़ी गांव स्थित पिता के घर पहुंचा. वह जब भी आता था, घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद मिलता था. दरवाजा खटखटाने के बाद बहन राजबाला कुंडी खोलती थी. 28 जनवरी को भी उस ने दरवाजा खटखटाया. 5 मिनट तक कुंडी नहीं खुली तो उस ने दोबारा दरवाजा खटखटाया. दोबारा भी कुंडी नहीं खुली और न ही अंदर से कोई आवाज आई तो वह सोचने लगा कि पता नहीं क्या बात है, जो अभी तक दरवाजा नहीं खुला.

उस ने आवाज देते हुए दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया. वह जैसे ही गैलरी में पहुंचा, उसे किचन के सामने राजबाला औंधे मुंह पड़ी दिखाई दी. बहन को उस हालत में देख कर वह घबरा गया. दौड़ कर उस ने बहन को सीधा किया तो शरीर अकड़ा एवं ठंडा था, नाक और मुंह से थोड़ा खून भी निकला हुआ था, जो सूख चुका था. बहन की हालत देख कर वह सहम उठा. उसे पिता की चिंता हुई तो आवाज देते हुए वह सामने वाले कमरे में गया. वहां टीवी चल रहा था और उस के पिता जो लुंगी बांधे रहते थे, वह बैड पर पड़ी थी. इस के बाद वह सामने वाले कमरे में गया तो वहां पिता रजाई में लिपटे हुए मिले. रजाई हटाई तो उन का शरीर भी ठंडा और अकड़ा हुआ था.

उन्हें पेशाब की जो नली लगी हुई थी, वह जस की तस लगी थी. बहन और पिता की हालत देख कर अरविंद चीखता हुआ बाहर आया और सभी को यह बात बताई. इस के बाद उस ने यह सूचना दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को दे दी. नीमड़ी गांव के नजदीक मुख्य रोड पर स्थित पैट्रोल पंप के पास अकसर पुलिस कंट्रोल रूम की वैन खड़ी रहती है. 100 नंबर पर कौल होते ही वैन नीमड़ी गांव पहुंच गई और हरिकिशन तथा उन की बेटी राजबाला को बाड़ा हिंदूराव अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

चूंकि यह क्षेत्र उत्तरी दिल्ली के थाना सराय रोहिल्ला के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना सराय रोहिल्ला को दे दी गई. हरिकिशन और उन के बेटों को थाना सराय रोहिल्ला के ज्यादातर पुलिसकर्मी जानते थे. इस की वजह यह थी कि हरिकिशन और उन के बेटे आए दिन झगड़े की शिकायतें ले कर वहां आते रहते थे. उन के बीच प्रौपर्टी को ले कर काफी समय से झगड़ा चल रहा था.

इसीलिए सूचना पा कर कार्यवाहक थानाप्रभारी साहिब सिंह लाकड़ा एसआई आलोक कुमार राजन, कांस्टेबल यशपाल को ले कर नीमड़ी गांव पहुंच गए. वहां से पता चला कि पुलिस कंट्रोल रूम की वैन हरिकिशन और राजबाला को हिंदूराव अस्पताल ले गई है तो कांस्टेबल यशपाल को घटनास्थल पर छोड़ कर साहिब सिंह लाकड़ा और एसआई आलोक कुमार हिंदूराव अस्पताल जा पहुंचे. साहिब सिंह ने वहां मौजूद मृतक हरिकिशन के बेटे अरविंद से बात करने के बाद इस घटना की जानकारी एसीपी मनोज कुमार मीणा और डीसीपी मधुर वर्मा को दे दी.

2-2 हत्याओं की बात थी, इसलिए डीसीपी मधुर वर्मा, डीसीपी द्वितीय असलम खां, एसीपी मनोज कुमार मीणा भी घटनास्थल का दौरा करने के बाद बाड़ा हिंदूराव अस्पताल पहुंच गए. सूचना पा कर हरिकिशन के अन्य दोनों बेटे विजय वर्मा और अजीत वर्मा, जिन से उन का झगड़ा चल रहा था, वे भी अस्पताल पहुंच गए थे. उन्होंने भी अपने पिता और बहन की हत्या पर दुख जताया. पिता और बहन की हत्या हुई थी, इसलिए दुख होना स्वाभाविक था. पुलिस ने इन दोनों भाइयों से भी बात की. उन्होंने बताया कि जिस मकान में पिता और बहन की हत्या हुई है, उन का वह मकान मेन बाजार में है.

उसी मकान में 2 दुकानें बनी हैं, जिन में वे महालक्ष्मी ज्वैलर्स के नाम से ज्वैलरी का धंधा करते हैं. वे रोजाना सुबह 10 बजे के करीब अपनी दुकानें खोलते हैं और रात 9 बजे बंद कर के सरस्वती विहार स्थित अपने फ्लैटों पर चले जाते थे.

आज जब वे अपनी दुकानों पर आए तो उन्हें पिता और बहन की हत्या की खबर मिली. जब उन्हें पता चला कि दोनों को बाड़ा हिंदूराव अस्पताल ले जाया गया है तो वे वहां आ गए.

‘‘आप दोनों बता सकते हैं कि इन की हत्या किस ने की होगी?’’ साहिब सिंह ने पूछा.

‘‘पता नहीं सर, यह किस ने किया है? इस बारे में हम किसी का नाम भी तो नहीं ले सकते, लेकिन इतना जरूर बता सकते हैं कि कल रात 9 बजे के करीब जब हम दुकान बंद कर के अपने घर के लिए निकले थे, तब दोनों ठीकठाक थे.’’ अजीत वर्मा ने कहा.

अजीत और विजय से बात करने के बाद साहिब सिंह घटनास्थल पर आए. घटनास्थल के निरीक्षण में उन्होंने पाया कि घर का सारा सामान अपनीअपनी जगह पर रखा है. इस से साफ था कि ये हत्याएं लूट की वजह से नहीं की गई थीं. उसी मकान के एक हिस्से में विजय और अजीत की ज्वैलरी की दुकानें थीं. हत्यारों को यदि लूटपाट करनी होती तो वे ताला तोड़ कर दुकानों का सामान ले जा सकते थे, लेकिन दुकानों के ताले बंद थे. अब सवाल यह था कि ये हत्याएं क्यों और किस ने कीं?

थाने पहुंच कर अरविंद ने पुलिस को बताया कि उस के पिता और बहन की हत्या उस के बड़े भाइयों, अजीत वर्मा और विजय वर्मा ने उन की संपत्ति हथियाने के लिए की हैं. संपत्ति को ले कर बापबेटों के बीच आए दिन झगड़ा होने की जानकारी पुलिस को थी ही, इसलिए जब अरविंद ने अपने दोनों सगे भाइयों पर हत्या का शक जताया तो पुलिस ने उस की शिकायत पर अजीत वर्मा और विजय वर्मा के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के इस बात की जानकारी डीसीपी को दे दी.

डीसीपी मधुर वर्मा ने हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए एसीपी मनोज कुमार मीणा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर साहिब सिंह लाकड़ा, एसआई आलोक कुमार राजन, राजीव कुमार, कांस्टेबल यशपाल, ताराचंद को शामिल किया गया. जिन दोनों भाइयों के खिलाफ मुकदमा दर्ज था, वे बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में थे. पुलिस टीम दोनों भाइयों अजीत वर्मा और विजय वर्मा को वहां से थाने ले आई. थाने में पूछताछ में दोनों भाइयों ने कहा कि प्रौपर्टी को ले कर पिता से उन का विवाद जरूर चल रहा था, लेकिन हत्या करने जैसी बात वे सोच भी नहीं सकते. अपने समय पर वे दुकानें बंद कर के स्कूटी से सरस्वती विहार चले गए थे.

उन का कहना था कि उन के छोटे भाई अरविंद को पिताजी बहुत ज्यादा चाहते थे, क्योंकि घर में वह सब से छोटा था. ज्यादा लाड़प्यार की वजह से वह बिगड़ गया था. कोई कामधंधा भी नहीं करता था. कहीं ऐसा तो नहीं कि पैसे की जरूरत पड़ने पर उस ने पिताजी से पैसे मांगे हों और पिताजी ने मना कर दिया हो तो उसी ने गुस्से में उन्हें मार दिया हो. राजबाला ने उसे देख लिया हो, तो उस ने उस की भी हत्या कर दी हो. अजीत वर्मा और विजय वर्मा ने पुलिस को जो बताया था, वह सच भी हो सकता था. इसलिए सच्चाई जानने के लिए पुलिस ने अरविंद वर्मा को भी थाने बुला लिया.

पड़ोसियों और दुकानदारों को जब पता चला कि जिन लोगों की हत्या हुई है, पुलिस उन्हीं के घर वालों को संदिग्ध मान कर पूछताछ कर रही है तो उन्हें यह बात बुरी लगी. दुकानें बंद कर के सभी इकट्ठा हुए और कहने लगे कि पुलिस इस मामले को गंभीरता से न ले कर घर वालों को ही परेशान कर रही है. इस बात से नाराज हो कर सभी पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. एसीपी मनोज कुमार मीणा और अन्य अधिकारियों ने भीड़ को समझाया और विश्वास दिलाया कि उन्हें कातिलों का सुराग मिल चुका है, इसलिए कातिल जल्द ही पुलिस की गिरफ्त में होंगे. पुलिस किसी निर्दोष को कतई नहीं फंसाती. उन के काफी समझाने के बाद भीड़ शांत हुई.

पुलिस पर मामले के खुलासे का दबाव बढ़ता जा रहा था. अरविंद और उस के दोनों भाई पुलिस की गिरफ्त में थे. पुलिस दोनों उन से अपने तरीके से पूछताछ कर रही थी. पुलिस ने पड़ोसियों से पूछताछ कर के यह जानने की कोशिश की कि हरिकिशन और उन की बेटी राजबाला की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी? इस पूछताछ में एक बात यह सामने आई कि हरिकिशन अकड़ वाले जिद्दी स्वभाव के आदमी थे. अगर कोई आदमी उन के घर के आगे गाड़ी खड़ी कर देता था तो वह उस से लड़ने को तैयार हो जाते थे. लेकिन ये झगड़े ऐसे नहीं थे, जिस से कोई उन की हत्या कर देता.

हरिकिशन का नीमड़ी गांव में 100 वर्ग गज का जो मकान था, वह वहां की मेन बाजार में था. मौजूदा समय में उस की कीमत करोड़ों रुपए में थी. इस से पुलिस को लग रहा था कि ये हत्याएं प्रौपर्टी को ले कर ही की गई हैं. तीनों भाई खुद को बेकसूर बता रहे थे. एसआई आलोक कुमार राजन जिस समय साहिब सिंह के सामने तीनों भाइयों से पूछताछ कर रहे थे, उसी समय इंद्रलोक चौकी के प्रभारी राजीव कुमार सीसीटीवी कैमरे की एक फुटेज ले कर आ गए. वह फुटेज हरिकिशन के मकान के सामने स्थित एक ज्वैलर्स की दुकान के सामने लगे सीसीटीवी कैमरे की थी.

पुलिस को उस फुटेज से पता चला कि अरविंद रोजाना सुबह 9-10 बजे के बीच पिता के पास आता था और शाम 7, साढ़े सात बजे तक वहां रहता था. 28 जनवरी को भी वह साढ़े 7 बजे के करीब मकान के मुख्य दरवाजे से बाहर निकलता दिखाई दिया था. पूछताछ में अरविंद ने बताया भी यही था. उसी फुटेज में साढ़े 8 बजे के करीब एक युवक हरिकिशन के मकान के मुख्य दरवाजे से तेजी से निकलता दिखाई दिया. एचडी क्वालिटी के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में वह युवक साफतौर पर घबराया हुआ दिख रहा था. उस के निकलने के कुछ देर बाद 2 लोग तेजी से उसी दरवाजे से निकले. वे दोनों हेलमेट लगाए हुए थे.

पुलिस ने वह फुटेज अरविंद को दिखाई तो उस ने उन लोगों को पहचान कर बताया कि हेलमेट लगा कर निकलने वाले उस के बड़े भाई अजीत और विजय हैं. उन से पहले जो युवक भागता हुआ निकला था, वह विजय का बेटा विकास है. अरविंद ने बताया कि विकास कभीकभी वहां आता था. घर से निकलते समय इतना घबराया हुआ क्यों था, यह बात उस की समझ में नहीं आई. उस दिन अजीत और विजय घर के अंदर से हेलमेट लगा कर निकले थे, जबकि इस के पहले वे अपना हेलमेट हाथ में ले कर निकलते थे और स्कूटी पर बैठने के बाद हेलमेट लगाते थे. पुलिस ने वह फुटेज अजीत और विजय को दिखाई तो उन्होंने यह तो माना कि हेलमेट लगाए हुए वही घर से निकले थे, लेकिन उस दिन वे घर के अंदर से हेलमेट लगा कर क्यों निकले, इस बात का वे कोई उचित जवाब नहीं दे सके.

पूछताछ के लिए पुलिस विजय के बेटे विकास को थाने ले आई. विकास को अलग ले जा कर जब उस से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने सारी सच्चाई पुलिस को बात दी. उस ने बताया कि उसी ने अपने पिता और चाचा के साथ मिल कर दादा और बूआ की हत्या की थी. बेटों द्वारा बाप और बहन के कत्ल की बात सुन कर पुलिस हैरान रह गई. क्योंकि एक बाप ने जिस तरह जीजान लगा कर अपने बेटों की परवरिश की थी, किसी लायक बनाया था, वही बेटे उन की जान ले लेंगे, ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था.

खैर, केस खुल चुका था. अजीत और विजय जो अब तक पिता और बहन की हत्या पर घडि़याली आंसू बहा रहे थे और खुद को बेकसूर बता रहे थे, उन की हकीकत सामने आ चुकी थी. पुलिस ने उन दोनों के सामने विकास से पूछताछ की. उस ने उन के सामने भी हत्या का खुलासा कर दिया. अब विजय और अजीत कैसे हत्या से मना कर सकते थे. लिहाजा उन्होंने भी स्वीकार कर लिया कि इस डबल मर्डर को उन्होंने ही अंजाम दिया था. उन्होंने बताया कि पिता और बहन ने उन के सामने ऐसे हालात खड़े कर दिए थे कि उन की हत्या करने के अलावा उन के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था.

विकास, विजय और अजीत से पूछताछ के बाद हरिकिशन और उन की बेटी राजबाला की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

हरिकिशन वर्मा मूलरूप से हरियाणा के जिला झज्जर के रहने वाले थे. सन 1950 के आसपास नौकरी की तलाश में वह दिल्ली आए तो सन 1953 में दिल्ली के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में उन की नौकरी लग गई. इस के बाद वह अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी को भी दिल्ली ले आए. हरिकिशन की ड्यूटी गुलाबी बाग के स्कूल में थी, इसलिए उन्होंने वहीं नीमड़ी गांव में किराए का कमरा ले लिया. हंसीखुशी के साथ उन का समय बीत रहा था. वह एकएक कर 4 बेटों आजाद, अजीत, विजय, अरविंद और 4 बेटियों सावित्री, सरला, राजबाला और चंद्रकला के पिता बने.

हरिकिशन के पिता हरलाल गांव में रहते थे. वह हरिकिशन के लिए अनाज वगैरह भेजते रहते थे. घर से सहयोग मिलने की वजह से हरिकिशन को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी. उसी दौरान उन के पिता ने नीमड़ी गांव में उन के लिए 100 वर्ग गज का एक प्लौट खरीद दिया था. वह प्लौट गांव की मुख्य सड़क के किनारे था. हरिकिशन उसी प्लौट में घर बनवा कर रहने लगे. उन्होंने अपने सभी बच्चों को पढ़ायालिखाया. बच्चे जैसेजैसे जवान होते गए, वह उन की शादियां करते गए. बड़े बेटे आजाद की युवावस्था में ही मौत हो गई थी. उस के बाद उन के 3 बेटे रह गए थे.

हरिकिशन ने उत्तरीपश्चिमी दिल्ली के सरस्वती विहार में एक 3 मंजिला मकान बना कर एकएक फ्लोर अपने तीनों बेटों को रहने के लिए दे दिया था, जिस में वे अपनेअपने परिवारों के साथ रहते थे. उन का नीमड़ी गांव में जो मकान था, उस में अजीत और विजय ने अलगअलग 2 दुकानें बना ली थीं, जिन में वे सोनेचांदी की ज्वैलरी का धंधा करते थे. हर मांबाप के लिए उस समय एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है, जब उन की बेटी शादीशुदा होने के बावजूद अपने मायके में आ कर रहने लगती है. राजबाला की यही समस्या थी, जिस की वजह से हरिकिशन काफी परेशान रहते थे. हरिकिशन सन 1988 में नौकरी से रिटायर हो चुके थे.

दरअसल, उन्होंने राजबाला की शादी फरीदाबाद में कर दी थी. शादी के बाद हर औरत की ख्वाहिश मां बनने की होती है. शादी के कई सालों बाद भी जब वह मां नहीं बनी तो वह मानसिक तनाव में रहने लगी. क्योंकि ससुराल में सभी उसे ताने देने लगे थे. हालात यहां तक पहुंच गए कि पति ने उसे तलाक दे दिया. तलाक के बाद राजबाला पिता के पास आ गई. जवान बेटी किस तरह अपनी जिंदगी काटेगी, इस बात की चिंता हरिकिशन और उन की पत्नी लक्ष्मी देवी को परेशान करती थी. दोनों एक बार बेटी का घर फिर से बसाने की कोशिश की और दिल्ली में ही एक आदमी से उस की शादी कर दी.

बेटी का घर फिर से बस गया तो वे निश्चिंत हो गए. सभी बच्चे अपनीअपनी घरगृहस्थी में खुश थे, इसलिए उन्हें किसी भी तरह की कोई चिंता नहीं थी. लेकिन उन की यह निश्चिंतता ज्यादा दिनों तक कायम नहीं नहीं रह सकी. बेटी राजबाला की उन्होंने जो दूसरी शादी की थी, उस से भी उस की जिंदगी में खुशहाली नहीं आ सकी. वजह वही रही कि यहां भी राजबाला की कोख सूनी रही. वह मां नहीं बनी तो उस की गृहस्थी में फिर से जहर घुलना शुरू हो गया.

ससुराल के और लोगों की बात तो दूर, पति भी बातबात पर ताने देने लगा. रोजरोज की बेइज्जती से राजबाला ऊब गई तो एक दिन ससुराल से मायके आ गई. यह सन 2003 की बात है. इस के बाद वह न ससुराल गई और न ही उस का पति उसे बुलाने आया. राजबाला ने इसे नियति का खेल मानते हुए हालातों से समझौता कर लिया और पिता के साथ ही रहने लगी. लक्ष्मी देवी राजबाला की बहुत चिंता करती थीं. इसी चिंता की वजह से वह बीमार रहने लगीं और सन 2004 में एक दिन चल बसीं.

हरिकिशन वर्मा ने तीनों बेटों को सरस्वती विहार में एकएक फ्लैट दे रखा था. उन्हें अब बेटी राजबाला की चिंता थी. उन के न रहने पर बेटे राजबाला की देखभाल करेंगे या नहीं, इस बात पर उन्हें संशय था. इसलिए वह नीमड़ी गांव वाला मकान राजबाला को देना चाहते थे, जिस से भविष्य में उसे किसी का मोहताज न रहना पड़े. नीमड़ी वाले मकान में 2 दुकानों और उन के पीछे वाले 2 कमरों पर विजय और अजीत का कब्जा था. मकान मुख्य बाजार में था, इस से काफी महंगा था. अजीत और विजय को जब पता चला कि उस के पिता यह मकान राजबाला के नाम करना चाहते हैं तो उन्होंने पिता से इस बात का विरोध किया.

हरिकिशन जिद्दी स्वभाव के थे ही. उन्होंने साफ कह दिया कि यह मकान उन का है, इसलिए वह इसे किसे देते हैं, यह उन की मरजी. पिता के इस दो टूक जवाब से दोनों भाइयों को लगा कि अगर उन्होंने मकान दूसरे के नाम कर दिया तो उन के हाथ से दुकानें निकल जाएंगी. तब वे सड़क पर आ जाएंगे. उन्होंने पिता की बात का जम कर विरोध किया और यहां तक कह दिया कि वे किसी भी हालत में यह घर किसी दूसरे के नाम नहीं करने देंगे. इसी बात को ले कर बापबेटों के बीच आए दिन झगड़ा होने लगा.

इस झगड़े से परिवार 2 हिस्सों में बंट गया. एक तरफ अजीत और विजय थे तो दूसरी तरफ हरिकिशन, उन की बेटी राजबाला और बेटा अरविंद. दोनों ही अपनीअपनी जिद पर अड़े थे. हरिकिशन ने भी ठान लिया था कि जो औलाद उन की बात नहीं मान रही, उसे वह अपनी जायदाद से फूटी कौड़ी नहीं देंगे. उन्होंने दोनों बेटों से अपनी दुकानें खाली करने को कह दिया. लेकिन वे दुकानें खाली करने को तैयार नहीं थे. तब हरिकिशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण ली. अजीत और विजय ने न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि चूंकि वे हरिकिशन वर्मा की जायज औलादें हैं, इसलिए इस पैतृक संपत्ति पर उन का भी अधिकार है.

जबकि हरिकिशन कहा था कि यह संपत्ति पैतृक नहीं है, इसे उन्होंने खुद खरीदी है. इसलिए इस संपत्ति पर वे अपना अधिकार नहीं जता सकते. अदालत ने फैसला सुनाया कि जिन दुकानों का अजीत और विजय उपयोग कर रहे हैं, हर महीने वे डेढ़डेढ़ हजार रुपए किराए के रूप में हरिकिशन को दें. यह बात करीब 9 साल पहले की है. इसी आदेश पर दोनों भाई पिता को निर्धारित धनराशि देते रहे. विजय और अजीत ने अपनी दुकानों के पीछे बने कमरों में चांदी के सिक्के बनाने की मशीनें लगवा ली थीं. बड़े ज्वैलर्स के और्डर पर वे चांदी के सिक्के बना कर पहुंचाते थे. इस से उन की आमदनी बढ़ गई थी. राजबाला और हरिकिशन दुकानों को खाली कराने के उपाय खोजते रहते थे. इसलिए दोनों भाई दुकानों के शटर में ताले हमेशा अंदर से लगाते थे.

अंदर से ताले लगा कर वे पीछे की गैलरी से होते हुए घर के मुख्य दरवाजे से निकलते थे. उसी समय राजबाला या हरिकिशन उन से किसी न किसी बात पर झगड़ा कर बैठते थे, जिस की शिकायत पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर होती थी. तब पुलिस मौके पर पहुंच कर दोनों पक्षों को समझाबुझा कर शांत कराती थी. जैसेजैसे हरिकिशन की उम्र बढ़ती जा रही थी और वह बीमार भी रहने लगे थे, इसलिए उन का छोटा बेटा अरविंद उन की देखभाल के लिए रोज सुबह उन के पास आ जाता था. दिन भर उन के पास रहता और शाम को सरस्वती विहार स्थित अपने घर चला जाता था. उस का रोज का यही क्रम था.

दिवाली या अन्य मौकों पर अजीत और विजय के पास चांदी के सिक्के बनाने के बड़े और्डर आते थे, जिन्हें पूरा करने के लिए वे रातदिन काम करते थे. इन के काम को प्रभावित करने के लिए राजबाला 100 नंबर पर फोन कर के शिकायत कर देती थी कि उस के भाई सिक्के बनाने में तेजाब का इस्तेमाल करते हैं, जिस की स्मैल से उस के बूढ़े पिता को सांस लेने में परेशानी होती है. इस शिकायत पर पुलिस आ कर उन का काम रुकवा देती थी. काम रुकने पर विजय और अजीत का नुकसान होता. इस तरह के फोन राजबाला अकसर करती रहती रहती थी. आए दिन के इस तरह के झगड़े से दोनों भाई परेशान रहते थे.

एक दिन विजय के हाथ पिता के इसी मकान की एक परची हाथ लग गई. वह परची गांव वजीरपुर के प्रधान द्वारा लिखी गई थी. पहले जब लोग कोई प्लौट या मकान खरीदते थे, गांव में इसी तरह की परचियों पर लिखापढ़ी हो जाती थी. हरिकिशन को भी प्लौट की इसी तरह की परची कटी थी. वह परची हरिकिशन के पिता हरलाल के नाम थी. लेकिन हरिकिशन ने उस परची पर कटिंग कर के अपना नाम लिख दिया था. विजय को इस परची से लगा कि नीमड़ी गांव वाला प्लौट उस के दादा हरलाल ने खरीदा था. यानी जिस प्लौट को हरिकिशन अपने द्वारा खरीदा बता रहे थे, वह उन के दादा का खरीदा था. जबकि दादा की संपत्ति परिवार के लोगों की मरजी के बिना किसी और को नहीं दी जा सकती थी.

उसी परची के आधार पर विजय ने तीसहजारी न्यायालय में इस्तगासा दाखिल कर प्लौट की उस परची पर कटिंग कर धोखाधड़ी करने वाले पिता हरिकिशन और भाई अरविंद के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की अपील की थी. यह सन 2009 की बात है. तत्कालीन महानगर दंडाधिकारी ज्योति कलेर के आदेश पर उस परची की फोरैंसिक जांच हुई तो यह बात सिद्ध हो गई कि परची पर कटिंग कर के हरिकिशन का नाम बाद में लिखा गया था. इस के बाद कोर्ट के आदेश पर हरिकिशन और उन के छोटे बेटे अरविंद के खिलाफ सराय रोहिल्ला थाने में भादंवि की धारा 420/467/468/120 बी के तहत रिपोर्ट दर्ज हो गई थी.

इस केस में हरिकिशन की गिरफ्तारी हुई तो अरविंद ने अपनी अग्रिम जमानत ले ली थी. यह मामला आज भी महानगर दंडाधिकारी श्री अजय कुमार मलिक की कोर्ट में चल रहा है, जिस की अगली तारीख 15 मार्च, 2016 है. कोर्ट में केस चलने के बावजूद इन लोगों के बीच चल रहा झगड़ा बंद नहीं हुआ. छोटीछोटी बातों पर झगड़ा कर के पुलिस को फोन करना आए दिन की बात थी, इसीलिए थाने का हर पुलिसकर्मी इन्हें अच्छी तरह से जानता था. झगड़े से विजय और अजीत का धंधा चौपट हो रहा था. उन पर लोगों का कर्ज भी हो गया था.

28 जनवरी, 2016 की शाम 6 बजे दोनों भाई इसी समस्या पर विचार कर रहे थे, तभी विजय का बेटा विकास आ गया. अपने पिता और चाचा की हालत देख कर वह भी परेशान हो गया. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इस समस्या का समाधान कैसे निकला जाए. अचानक विकास तैश में आ गया. उस ने कहा कि क्यों न इस समस्या की जड़ हरिकिशन और राजबाला को ही खत्म कर दिया जाए? उपाय अच्छा था. विजय और अजीत विकास की बात पर सहमत हो गए, लेकिन समस्या यह थी कि यह सब किया कैसे जाए.

विकास ने कहा, ‘‘यह बहुत आसान है. दादा और बूआ को गला दबा कर मार देते हैं. उस के बाद हम लोग निकल चलते हैं. यहां अरविंद चाचा भी आते हैं, वह दिन भर इन के पास रहते हैं. पुलिस जब पूछताछ करेगी तो हम अरविंद का नाम ले लेंगे. इस तरह एक तीर से 2 शिकार हो जाएंगे. लालच में आ कर तीनों ने हरिकिशन और उस की बेटी राजबाला की हत्या करने की पूरी योजना बना डाली. शाम 7 बजे के बाद जब अरविंद वहां से चला गया तो 8 बजे के करीब उन्होंने अपनी दुकानों के शटर गिरा कर अंदर से ताले बंद किए. इस के बाद वे तीनों गैलरी से होते हुए उन कमरों की तरफ गए, जहां हरिकिशन और राजबाला रहते थे.

राजबाला उस समय कमरे में बैठी टीवी देख रही थी. विजय उस के कमरे में इस तरह घुसा कि राजबाला को उस के आने की भनक तक नहीं लगी. विजय ने उस के पास पहुंच कर पहले एक हाथ से मुंह दबोचा और दूसरे हाथ से उस का गला दबाने लगा. राजबाला मजबूत जिस्म की थी. उस ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की. किसी तरह उस ने खुद छुड़ा भी लिया. वह कमरे से निकल कर बाहर के दरवाजे की ओर भागी तो विजय ने उसे पकड़ कर गिरा दिया और दोनों हाथों से गला घोंट दिया.

अजीत और विकास उस कमरे में गए, जिस में हरिकिशन सोते थे. हरिकिशन उस समय रजाई ओढ़े सो रहे थे. आते ही विकास ने हरिकिशन का मुंह वहां पड़ी धोती से दबाया तो हरिकिशन जाग गए. उन्होंने अपना बचाव करते हुए विकास को गाल पर एक चांटा मारा तो विकास की पकड़ ढीली पड़ गई. तभी अजीत ने विकास को हटा कर खुद पिता का मुंह और नाक हाथ से दबा दिया. हरिकिशन तड़पने लगे तो विकास ने उन के पैर दबोच लिए. कुछ देर में उन का शरीर ढीला पड़ गया तो उन्होंने उन की लाश रजाई में लपेट दी. उन्हें उम्मीद थी कि मकान के मुकदमे से जुड़े कागजात घर में रखी सेफ में रखे होंगे, इसलिए वे चाबी तलाशने लगे.

राजबाला के कमरे में उन्हें एक बैग मिला, जिस में उन्हें अलमारी की चाबी मिल गई. वह चाबी विजय ने अपने पास रख ली. दोनों हत्याएं करने के बाद पहले विकास निकला. वह घबराया हुआ इधरउधर यह देख रहा था कि उसे घर से निकलते कोई देख तो नहीं रहा. इस के कुछ देर बाद सिर पर हेलमेट लगा कर विजय और अजीत निकले. जाते समय वे दरवाजे को भिड़ा गए थे. तीनों ने यही सोचा था कि घर से निकलते हुए उन्हें किसी ने नहीं देखा, लेकिन उन के घर के सामने ज्वैलर्स की दुकान के बाहर उच्च क्वालिटी के लगे सीसीटीवी कैमरे ने देख लिया था, यह शायद उन्हें पता नहीं चला.

विकास मैट्रो से तो विजय और अजीत अपनी एक्टिवा से सरस्वती विहार स्थित अपने फ्लैटों पर चले गए थे. तीनों यही सोच रहे थे कि उन पर किसी को शक नहीं होगा. लेकिन उन की हकीकत कैमरे से सामने आ गई थी. पुलिस ने विजय, अजीत और विकास से पूछताछ कर 29 जनवरी को उन्हें तीस हजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी अजय कुमार मलिक के समक्ष पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. पुलिस ने सेफ की चाबी व अन्य सबूत इकट्ठे कर 31 जनवरी को उन्हें फिर से उन्हीं की अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों और अभियुक्तों से की गई बातचीत पर आधारित

 

Emotional Crime Story: इनाम या ब्लैकमेल

Emotional Crime Story: जिंदगी में अच्छे लोग भी मिलते हैं और बुरे भी. जिस लड़की ने अपनी हरकतों से मेरी नींद हराम कर दी थी, वह रिया निकलेगी, मैं ने सोचा भी नहीं था. लेकिन रिया के साथ जो हुआ था, उस ने ही कहां सोचा होगा. बहरहाल, हम मिले तो अच्छाई और बुराई दोनों सामने आ गई.  ट्रेन फुल स्पीड में दौड़ रही थी. बाहर हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. मैं खिड़की के पास ही बैठा था. कुछ देर तक तो रिमझिम फुहार अच्छी लगी,

पर जब पानी की बूंदें मेरी सीट पर गिरने लगीं तो मैं ने शीशा गिरा दिया. लोगों को मुझ से शिकायत रही है कि मुझे बोलना नहीं आता. ठीक ही कहते थे लोग. मैं 4 घंटे से चुपचाप बैठा था. आसपास बैठे यात्री आपस में बातें कर रहे थे. मैं या तो अपनी डायरी उलटपलट कर देखता था या फिर बीचबीच में न्यूजपेपर पढ़ लेता था. मेरे सामने वाली सीट पर एक महिला बैठी थी. मैं ने उस की साड़ी से ही समझ लिया था कि कोई महिला या लड़की है, अभी तक उस की शक्ल नहीं देखी थी. बात करने का तो सवाल ही नहीं था. जबकि वह सब से घुलमिल कर बातें कर रही थी.

इसी बीच वह उठ कर मेरी खिड़की के पास आ कर बोली कि थोड़ी सी खिड़की खोल देती हूं, घुटन सी महसूस हो रही है. मैं अपनी डायरी में कुछ लिखने की सोच रहा था, सो बिना सिर उठाए या उस की तरफ देखे मैं ने हूं कह दिया. खिड़की खोल कर वह अपनी सीट पर जा बैठी. थोड़ी देर में चाय वाला आया तो उस ने अपने लिए चाय ली और औपचारिकतावश आसपास के यात्रियों से भी चाय के लिए पूछा, मुझ से भी. मैं ने बिना उस की ओर देखे ना कह दिया.

खैर, उस ने 3 या 4 कप चाय ली. कितनी, मुझे ठीक से पता नहीं, पर सब के पैसे उसी ने दिए. मैं ने कनखियों से उसे पैसे देते देखा था. इस बीच मैं बाथरूम गया. लेकिन जब लौटा तो वह लड़की सीट पर नहीं थी. मैं यह तो बताना ही भूल गया कि मैं कोलकाता से पटना जा रहा था. जब तक मैं बाथरूम से निकल कर अपनी सीट पर आता, ट्रेन आसनसोल पर खड़ी थी और वह लड़की वहीं उतर गई थी.

थोड़ी देर में ट्रेन चली तो फिर मैं फिर से अपनी डायरी उठा कर पढ़ने लगा. उस में एक परची रखी थी. मैं ने पढ़ना शुरू किया तो दिमाग के तवे पर वैसे ही एक जोरदार छींटा सा लगा, जैसे डोसा बनाने वाले गरम तवे पर पानी के छींटे मारते वक्त होता है. उस पर लिखा था, ‘गिड्डू, तू घोंचू ही रहा. डायरी में जिंदगी को कैद करता है, इस से बाहर निकल कर जिंदगी जीना सीख ले.’

मेरी समझ में नहीं आया कि वह लड़की कौन हो सकती है. गिड्डू विशेषण मुझे हाईस्कूल में मिला था और घोंचू कालेज में. हालांकि दोनों में किसी का सही अर्थ आज तक मुझे खुद नहीं मालूम. पटना में स्कूल के कुछ दोस्तों ने मुझे बताया था कि नाटे को गिड्डू कहते हैं, हालांकि मैं उतना छोटा भी नहीं था. मैं ने उस के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई टाटा से की थी. इस का मतलब वह लड़की मेरे साथ स्कूल और कालेज दोनों में रही थी. मेरे बगल में बैठे यात्री ने मुझ से पूछा कि क्या मैं उस लड़की को जानता हूं तो मैं ने सिर हिला कर ना कहा. पर वह बोला कि वह तो बारबार आप की ओर देख कर मुसकरा रही थी, लेकिन आप ने एक बार भी उस की ओर नहीं देखा. न ही उस की चाय ली थी. मैं क्या कहता, इसलिए चुप रह गया.

खैर, मैं अपने घर पटना आ गया. मैं कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी जौइन करने के बाद कुछ दिनों के लिए पटना आया था. कोलकाता में फ्लैट लेने के बाद मुझे अपना बाकी सामान कोलकाता शिफ्ट करना था. पर मेरे जेहन में वह लड़की बैठी थी, कौन हो सकती थी वह? मैं ने ट्रेन में उस से बात तो नहीं की थी, अलबत्ता उसे बातें करते जरूर सुना था. इस बीच मेरे सेल पर 3 बार फोन आया और मेरे हैलो कहने पर उधर से भी एक लेडी हैलो बोलती थी, फिर फोन कट जाता था.

एक बार मैं ने हिम्मत कर के उस नंबर पर डायल किया तो उधर से आवाज आई, ‘‘गिड्डू, सौरी दीपक! मुझे फोन करने की हिम्मत कैसे कर ली? खैर, फोन किया है तो बताओ, तुम कोलकाता कब और किस ट्रेन से लौट रहे हो?’’ बिना कोई बात किए इस बार मैं ने फोन काट दिया. एक बार जब मैं घर पर नहीं था तो घर की लैंडलाइन पर फोन आया था. पिताजी ने फोन उठाया तो उस लड़की ने बताया, ‘‘अंकल, मैं दीपक के औफिस से बोल रही हूं. औफिस में कुछ अरजेंट काम है. आप बता सकते हैं वह कब आ रहे हैं?’’

अब तक मेरा नाम आप भी जान गए होंगे. जी हां, सही पकड़ा आप ने, मेरा नाम दीपक ही है. पिताजी ने तो मेरे बारे में बता दिया था, पर लड़की का नाम नहीं पूछा था. वह लड़की मेरे लिए पहेली बनती जा रही थी. बहरहाल, चौथे दिन मैं कोलकाता लौट आया था. मैं ने अपना सामान ट्रांसपोर्ट से बुक करा दिया था. मैं जब औफिस में पहुंचा तो थोड़ी देर बाद मेरे सेल पर फोन आया. उसी लड़की की आवाज थी.

‘‘क्यों, औफिस पहुंच गया?’’ और फोन कट गया. अब मुझे गुस्सा आने लगा था. मैं ने ठान लिया था कि इस लड़की तक किसी भी कीमत पर पहुंच कर रहूंगा. इसी उलझन में मुझे नींद भी नहीं आ रही थी कि एक बार फिर लड़की ने फोन कर के कहा, ‘‘क्यों, नींद नहीं आ रही है न?’’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था.

हर शुक्रवार को कंपनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर मीटिंग ले कर सप्ताह भर में हुए काम या उन में आने वाली कठिनाइयों की समीक्षा करते थे. उस मीटिंग में सभी इंजीनियर्स को जाना पड़ता था. इस बार की मीटिंग में मुझे थोड़ी डांट पड़ी थी, क्योंकि मेरे काम की प्रगति संतोषजनक नहीं थी. उसी दिन रात में उस लड़की ने फोन किया, ‘‘क्यों, मीटिंग में तैयारी कर के क्यों नहीं आते हो? कभीकभी मैनेजमेंट को ओवर रिपोर्टिंग कर के बचना सीखो. और हां, जो कमी रह गई है, अगले हफ्ते पूरी करो. अब ज्यादा तंग नहीं करूंगी. मेरा कोटा पूरा हो गया. जितना तुम ने तंग किया, उस का बदला ले लिया है.’’

‘‘जहां तक मुझे याद है मैं ने किसी को तंग नहीं किया, पर मेरा फोन नंबर तुम्हें कहां से मिला?’’ मैं ने कहा. संयोग से इस बार उस ने फोन काटा नहीं.

कुछ पल की खामोशी के बाद उस ने कहा, ‘‘फोन नंबर तो तुम्हारी डायरी में ट्रेन में ही मिल गया था. और हां, तुझे बोलना ही कहां आता था, जो मुझे तंग करता? अच्छा मैं ही बोलती हूं. कल दोपहर पार्कस्ट्रीट में ब्लू फौक्स में आ जाना, बोका कहीं का.’’ और फोन कट गया. अगले दिन शनिवार था. छुट्टी का दिन. इस आखिरी शब्द ‘बोका’ पर मेरा माथा ठनका. यह शब्द तो बंगाली बोलते हैं. एक तरह से यह उन का तकियाकलाम होता है. इस का मतलब यह लड़की बंगालिन है और मेरी ही कंपनी में है. हो सकता है, एमडी सचिवालय में ही हो. उस की बातों की टोन बंगाली थी. जबकि मेरे सेक्शन में एक भी बंगाली लड़की नहीं थी. एक रिया नाम की बंगाली लड़की दूसरे सेक्शन में थी.

पटना में हम लोग किराए के एक मकान में रहते थे. रिया भी पास वाले मकान में ही रहती थी. उस के पिता रेलवे में थे और उन की पोस्टिंग पटना में थी. हम दोनों की छत के बीच बस एक 3 फुट की रेलिंग थी. गरमियों में बहुत बार देर रात तक दोनों का परिवार छत पर ही रहता था. कभी सिर्फ हम दोनों ही रहते थे. वह बहुत चुलबुली और खुराफाती थी. कभी अकेले छत पर होता तो कमेंट्स करती थी. कभी होली में रंग फेंकती थी. एक बार जब छत पर अकेला था, उस ने एक पर्ची भी फेंकी थी, लिखा था ‘ना समझे वो अनाड़ी है.’ दूसरे दिन पर्ची पर लिखा था, ‘तेरी बनियान में 2 छेद हैं.’ मेरे कपडे़ छत पर सूखते वक्त देखा होगा उस ने.

एक बार तो लिखा, ‘लव यू बेबी’. पर मेरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती थी. 11वीं कक्षा के बाद उस के पिता का आसनसोल ट्रांसफर हो गया था. इस के अतिरिक्त मैं उस के बारे में कुछ नहीं जानता था. उस का चेहरा भी मुझे याद नहीं था. यह तो स्कूल की बात हुई. मैं सोचने लगा, कालेज में मुझे जो घोंचू विशेषण मिला, उस की जानकारी इस लड़की को कैसे मिली? फिर सोचा कल तो मिल ही रहे हैं, फिर माथापच्ची क्या करना. शनिवार को ठीक 12 बजे मैं ब्लू फौक्स के सामने खड़ा था. तभी टैक्सी से एक लड़की उतर कर मेरी ओर आई और उस ने पास आ कर कहा, ‘‘हाय, मैं रिया. मैं जानती हूं, तुम मेरा ही इंतजार कर रहे हो. चलो, अंदर बैठ कर बातें करते हैं. मैं ने एक टेबल बुक कर रखी है.’’

रिया ने एक एकांत कोने में टेबल बुक करा रखी थी. अब पहली बार मैं ने उस के चेहरे को देखा. मुझे धूमिल सा रिया का चेहरा याद आया. पर अब वह मैच्योर्ड और सुंदर लग रही थी. मैं ने कहा कि अब मैं अपना इंट्रोडक्शन दूं तो उस ने बीच में ही टोका, ‘‘नो मिस्टर दीपक.’’

मैं मुसकरा कर रह गया. वेटर और्डर लेने आया तो उस ने पहले कोल्डड्रिंक लाने को कहा, साथ में लंच भी और्डर कर दिया.

फिर रिया ने कहा, ‘‘शुरू तो मुझे ही करना होगा, तुम से तो हो नहीं सकेगा. तुम सोच रहे होगे, तुम तक मैं पहुंची कैसे?’’

मेरे हां कहने पर उस ने कहा, ‘‘बता चुकी हूं कि ट्रेन में तुम्हारी डायरी से तुम्हारा नंबर मिला था. मैं ने भी इसी कंपनी में एमडी सचिवालय में तकनीकी सहायक के पद पर हाल ही में जौइन किया है. वीकली मीटिंग में भाग लेने वालों में तुम्हारा नाम देखा था. इस तरह तुम तक आसानी से पहुंच गई.’’

तब तक वेटर कोल्डड्रिंक दे गया. हम दोनों ने साथसाथ कोल्डड्रिंक की सिप ली. इस बार मैं बोला, ‘‘तुम्हें मेरे स्कूल और कालेज के विशेषण कहां मिले? तुम तो मेरे सेक्शन में नहीं थी और न ही कालेज में?’’

‘‘घोंचू! सौरी अब नो मोर. तुम्हारे सेक्शन की लड़कियां मेरी भी सहेली थीं. मैं ने भी टाटा से ही इंजीनियरिंग की है. पर पहले अटेंप्ट में कंपीट नहीं कर सकी थी, पर दूसरे साल कंपीट कर गई थी और तुम से एक साल जूनियर हो गई. पर मैं आंखकान दोनों खुले रखती हूं.’’

इस बार मैं खुल कर हंसा. मैं ने पूछा कि मैं ने तो कभी तुम्हें तंग नहीं किया, तुम कैसे कहती हो कि मुझ से बदला ले रही हो. वह हंस कर बोली, ‘‘खाना आ चुका है. शुरू करो, साथ में बातें भी होती रहेंगी.’’ और हम ने खाना शुरू कर दिया.

रिया बोली, ‘‘यही तो शिकायत है तुम से. मैं तो चाहती थी कि तुम मुझे बारबार देखते और छेड़ते. जवाब में मैं भी तुम्हें छेड़ती. इस तरह हम करीब आ सकते थे. पर मैं तुम्हारा मौनव्रत नहीं तुड़वा सकी थी. पहल मैं ने ही की थी, पर तुम उदासीन रहे थे. जहां तक मुझे याद है, तुम ने एक बार भी मेरी तरफ ठीक से नहीं देखा होगा. मुझे लगा, तुम मुझे इग्नोर कर रहे हो. दूसरे लड़कों की तरह मुझे देख कर तुम ने न कभी आंख मारी, न सीटी बजाई. तुम्हारी इसी अदा पर मैं फिदा थी. तब मैं ने सोचा कि तुम्हें मैं ही ठीक करूंगी, पर तब तक पिताजी का ट्रांसफर हो गया था. अब जा कर आखिर पकड़े ही गए.’’

और वह इतना जोर से हंसी कि पास की टेबल पर बैठे लोग हमारी ओर देखने लगे थे. बाद में सौरी बोल कर वह झेंप गई थी. पता नहीं क्यों अब मेरा मन भी रिया के पास आने का करने लगा था. हमारा खानापीना खत्म हुआ, वेटर बिल ले आया. जब मैं ने जेब से पर्स निकाला तो रिया बोली, ‘‘नो..नो, मैं ने तुम्हें यहां बुलाया है तो बिल भी मैं ही दूंगी.’’

होटल से बाहर आ कर उस ने टैक्सी बुलाई तो मैं ने कहा, ‘‘चलो, कुछ देर विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क में बैठते हैं.’’

‘‘ये कौन बोला, चलो अच्छा हुआ, डायरी के पन्नों से बाहर निकल आए.’’ कह कर उस ने मेरा मजाक उड़ाया. खैर, हम विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क के एक वीरान कोने में जा बैठे. जब रिया ने पूछा कि बीवीबच्चे यहीं हैं कि पटना में तो मैं ने कहा कि अभी तो बैचलर ही हूं. फिर मैं ने पलट कर पूछा, ‘‘तुम ने शादी की?’’

रिया ने कहा, ‘‘नहीं, पर करीब एक साल तक जिस के साथ लिवइन में रही, उस से ब्रेकअप हो गया है. यही कोई एक सवा महीने पहले.’’

मैं कुछ देर खामोश रहा और सोचने लगा कि यह लड़की किस चीज की बनी है. इतना कुछ होने पर भी जिंदगी को खुशीखुशी जिए जा रही है. मैं ने महसूस किया कि रिया खामोश थी. इस के आगे मुझे उस के निजी जीवन के बारे में पूछने का साहस नहीं हुआ. मैं ने उस से कहा कि मेरा कोलकाता का मशहूर बोटैनिकल गार्डन देखने का मन है तो उस ने खामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘‘नो प्रौब्लम, कल संडे है. पूरा दिन हम जहां चाहें घूम सकते हैं. कल सुबह नाश्ता कर के 10 बजे यहीं मिलते हैं. मैं सैंडविच और कौफी बना कर साथ ले आऊंगी. वहीं गार्डन में लंच करेंगे, कैसा रहेगा?’’

‘‘परफेक्ट. तुम ने तो मेरे मन की बात कह डाली.’’ मैं ने कहा. इस के बाद मैं अपने फ्लैट पर आ गया. ब्रेकअप के बाद रिया अपनी ही कंपनी की एक लड़की के साथ फ्लैट शेयर करती थी. संडे को हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में गंगा के किनारे जा बैठे. मैं ने रिया से परिवार के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि परिवार में बस पिताजी हैं. मां का देहांत हो चुका है. जब उस ने मेरे बारे में पूछा तो मैं ने भी बता दिया कि मां ही है, जो मेरे साथ कोलकाता में रहेगी.

इस के बाद मैं ने ही उस से पूछा कि क्या ब्रेकअप पर पुनर्विचार की संभावना नहीं है. उस ने थोड़ा मुसकरा कर कहा, ‘‘तुम्हें बोलना आ गया है.’’ और आगे भी उसी ने कहा, ‘‘मुझे कायर और धोखेबाज आदमी से सख्त नफरत है. उस से तो बेहतर है, मैं अकेली ही जी लूंगी.’’

मैं ने कहा, ‘‘अकेले का सवाल क्यों? हो सकता है उस से बेहतर साथी मिल जाए. बुरा न मानो तो क्या मुझे बता सकती हो वह कौन है? मैं उस से मिल कर फिर से सब ठीक करने का प्रयास कर सकता हूं.’’

रिया ने मुझे ऐसा करने से मना कर दिया और कहा, ‘‘मैं तो खुली किताब हूं. मुझे तुम्हें बताने में कोई संकोच नहीं है.’’

उस ने बताया कि कंपनी ने उसे 6 महीने की ट्रेनिंग के लिए जर्मनी भेजा था. उसी बैच में मैनेजिंग डाइरेक्टर का बेटा रवि भी गया था. वहीं उस से दोस्ती भी हुई. भारत लौटने पर दोनों की पोस्टिंग नासिक में थी. वहां दोस्ती प्यार में बदल गई और उस के साथ रहने लगी थी. उस ने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही दोनों शादी कर लेंगे. इसी बीच रिया को गर्भ रह गया था. रवि ने उस से कहा कि वह शादी बाद में कर लेगा, पर उसे गर्भपात कराना होगा. लेकिन रिया को यह मंजूर नहीं था. यह बात एमडी साहब तक पहुंची तो आननफानन में पिछले माह रिया का ट्रांसफर कोलकाता ब्रांच में कर दिया गया.

रिया ने बताया कि कोलकाता में उसे डायरेक्टर ने अपने सेक्रेटरिएट में रखा था. उसे बुला कर काफी डांटा भी था. कहा था कि वैसे भी किसी दूसरे प्रांत और जाति की लड़की उन की बहू नहीं बन सकती. रिया ने भी दो टूक कह दिया था कि उसे रवि जैसे कायर की जरूरत नहीं है. जब हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में बैठे थे, तभी एमडी का पर्सनल सेक्रेटरी भी घूमता हुआ हमारे पास आ गया था. वह 2 मिनट इधरउधर की बातें कर के चला गया था. उस ने बौस को हम दोनों के बारे में बता दिया था. उन्होंने मुझे और रिया को एक साथ अपने चैंबर में बुलाया. उन्हें शायद गलतफहमी थी कि हम दोनों प्यार करते हैं.

वैसे अब मैं खुद उस से प्रभावित था और उसे चाहने लगा था. उन्होंने कहा कि अगर हम लोग शादी कर लें तो एकदो साल के लिए हमारी पोस्टिंग विदेश में करवा सकते हैं. रिया को यह बात बुरी लगी और वह बौस पर ही बरस पड़ी, ‘‘मैं समझ सकती हूं कि आप अपने बेटे की घिनौनी करतूत का ठीकरा दीपक के सिर फोड़ना चाहते हैं.’’

इतना सुन कर एमडी ने आगबबूला हो कर कहा, ‘‘मैं चाहूं तो तुम दोनों को नौकरी से निकाल सकता हूं.’’

इस बार न जाने मुझ में कहां से इतना साहस आ गया कि मैं बोला, ‘‘और अगर रिया चाहे तो आप और आप के बेटे दोनों को हवालात की हवा खिला सकती है. आप भूल जाएं कि आप बौस हैं तो जो जी में आए, कर सकते हैं. आप को इतनी सी समझ आ जाए तो आप का ही भला होगा.’’

रिया आश्चर्यचकित हो कर मेरी ओर देखे जा रही थी. मैं ने इशारे से उसे बाहर निकलने को कहा और हम दोनों बौस के औफिस से बाहर आ गए. रिया मुझे औफिस में ले गई. पहले तो उस ने पानी पीने को कहा, फिर 2 कप चाय और्डर की. फिर उस ने कहा, ‘‘तुम्हें बौस से उलझने की क्या जरूरत थी?’’

मैं ने कहा, ‘‘तो मैं उस खूसट को मनमानी करने देता? अब हमें बड़ा फैसला लेना होगा.’’

वह बोली, ‘‘हमें मतलब? मुझ से क्या चाहते हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘ऐसी हालत में लड़कियों को मां की सख्त जरूरत होती है. मुझे पूरा यकीन है कि मेरी मां मेरा साथ अवश्य देगी. हम दोनों 15 दिन की नोटिस के साथ इस्तीफा दे देते हैं. इस बीच हम लोग छुट्टी पर रहेंगे. अगर तुम्हें आजीवन साथ पसंद हो तो सब ठीक हो जाएगा. जब मैं फोन करूं, मेरे फ्लैट पर आ जाना. मैं इस हाल में तुम्हें अकेली नहीं छोड़ सकता. तुम्हें मुझ पर भरोसा है या नहीं?’’

‘‘पहले तो यह बता दूं कि मुझे तुम्हारा अचानक बदला रूप बहुत अच्छा लगा. पर सब कुछ जानते हुए भी तुम इस पचड़े में क्यों पड़ रहे हो?’’

मैं ने सिर्फ इतना कहा कि मेरी बात स्वीकार हो तो मेरे फोन करने पर मेरे फ्लैट पर आ जाना, तब तक मां भी आ जाएगी. और अपना त्यागपत्र दे कर मैं औफिस से निकल गया. घर आ कर मैं ने मां को फोन पर सारी बात बता कर कहा कि वह कल की गाड़ी से कोलकाता आ जाए. मां के आने पर मैं ने रिया को फोन कर के कल आने को कहा. अगले दिन सुबह रिया आई तो मैं ने उसे मां से मिलाया. मां ने मुझ से कहा कि मुझे थोड़ी देर अकेले में रिया से बात करने दो. दोनों ने काफी देर तक बातें कीं. मैं ने देखा कि दोनों की आंखें गीली थीं.

मां ने उसे कल फिर आने को कहा और वह चली गई. मैं ने रिया से फोन पर पूछा कि मां से क्या बातें हुईं तो उस ने कहा, ‘‘पहले तो मेरे परिवार के बारे में बात की. फिर कहा तुम तो हमें पंसद हो, पर इस बच्चे के कारण थोड़ी उलझन में हूं. मैं ने कहा कि आप एक मां हैं, भला कोई मां अपनी कोख गिराना चाहेगी? मुझे तो एक मर्द ने धोखा दिया है. मैं चाहती भी नहीं थी कि दीपक इस झंझट में पड़े. हो सके तो आप ही उसे समझाइए. इस पर मां भी रो पड़ी थीं. पता नहीं कल क्यों बुलाया है?’’

रिया के जाने के बाद मां ने मुझ से भी पूछा, ‘‘सब कुछ जान कर तुम रिया को अपनाने को तैयार हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है. बाद में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.’’

मैं ने फिर फोन कर के मां की बात रिया को बताई और उस से पूछा कि उसे तो कोई प्रौब्लम नहीं है. इस पर वह बोली, ‘‘दीपक मेरे लिए तो विन विन सिचुएशन (चित भी मेरी पट भी मेरी) है. पर तुम मेरी खातिर क्यों नौकरी छोड़ रहे हो?’’

रिया ने बताया था कि उस ने भी रूममेट से अपना इस्तीफा भिजवा दिया है. मैं ने कहा कि 3-4 दिनों के अंदर ही मंदिर में हम शादी कर लेंगे और घर पर ही 15-20 दोस्तों के साथ पार्टी करेंगे. रिया मेरे कंधे पर सिर रख कर सिसकने लगी. मैं ने उसे थपथपाते हुए अलग किया तो बोली, ‘‘मैं ने तो सोचा था कि सब मर्द एक से होते हैं, बल्कि मर्द को दर्द ही नहीं होता है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मर्द को भी दर्द होता है.’’

और चौथे दिन हमारी शादी हो गई. उस के अगले दिन हम ने घर पर पार्टी दी. मेरे नहीं चाहने पर भी रिया ने बौस को निमंत्रित किया था. उस ने कहा कि वह बौस को अहसास दिलाना और शर्मिंदा करना चाहती है कि इस दुनिया में उन के बेटे जैसा शैतान भी है तो दीपक जैसा इंसान भी. वे आए भी और उन्होंने बेटे की करतूत के लिए हम लोगों से माफी भी मांगी. साथ ही कहा भी, ‘‘तुम दोनों का इस्तीफा नामंजूर हो गया है और हां, मेरी तरफ से यह उपहार है.’’

वे 2 लिफाफे थे. एक लिफाफे में ट्रैवल एजेंट के नाम का चैक था, ताकि वह हमारे स्विट्जरलैंड टूर का वीसा, टिकट व अन्य खर्चों की व्यवस्था हमारी सुविधानुसार कर सके. दूसरे लिफाफे में काफी महत्त्वपूर्ण पेपर थे, जिन में रवि और उस के मातापिता के हस्ताक्षर थे. लिखा था कि रिया के होने वाले बच्चे पर उन का भविष्य में कोई अधिकार नहीं होगा. जातेजाते बौस ने एक बार फिर माफी मांगी और कहा, ‘‘दीपक, तुम ने 2 बड़े काम किए हैं. एक तो दोनों परिवारों की इज्जत बचाई और दूसरे समाज के लिए एक असाधारण मिसाल पेश की. इसलिए तुम्हें इनाम तो मिलना ही चाहिए. तुम्हारा प्रमोशन और्डर भी मैं ने साइन कर दिया है. इसे अन्यथा नहीं लेना.’’

और बौस ने हम सब को बाय कह कर विदा ले ली. पर रिया सोच रही थी कि यह इनाम था या ब्लैकमेल. Emotional Crime Story

 

Hindi Crime Story: मालकिन की इज्जत के साथ खेलता नौकर

Hindi Crime Story: शराब को भले ही सामाजिक बुराई माना जाता हो, लेकिन देश में शराब का अरबों का कारोबार चलता है. शाम ढलते ही शहरों के मयखानों, बार और नाइट क्लब आबाद होने लगते हैं.  शाम के तकरीबन साढ़े 7 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में नौचंदी थाना क्षेत्र के सूरजकुंड स्थित एक कैंटीननुमा मयखाने में शराब पीने वालों की भीड़ लगनी शुरू हो चुकी थी.

लोग मेजों पर खानेपीने का सामान सजाए बैठे थे. किनारे की एक मेज पर आमनेसामने 2 युवक बैठे शराब की चुस्कियां ले रहे थे. तभी अचानक 2 युवक उन के पास आ कर खड़े हो गए. उन के हाथों में पिस्तौलें थीं. उन में से एक युवक हवाई फायर करते हुए चिल्लाया, ‘‘अगर किसी ने भी शोरशराबा किया या भागा तो जिंदा नहीं बचेगा.’’

युवक की इस हरकत से वहां का माहौल दहशतजदा हो गया. लोग सकते में आ गए. कोई कुछ समझ पाता उस से पहले ही दोनों युवकों में से एक ने आमनेसामने बैठे युवकों में से एक ने उस के सिर, सीने और पेट को निशाना बना कर गोलियां चला दीं. गोलियां लगते ही युवक कुरसी पर लुढ़क गया.

इस के बाद दोनों युवक चले गए. टेबल पर रखा उस युवक का मोबाइल भी वे अपने साथ ले गए थे. गोलियां चलने से वहां अफरातफरी मच गई थी. किसी ने छिप कर जान बचाई तो किसी ने भाग कर. मृत युवक के साथ बैठा युवक भी भाग खड़ा हुआ था.

इसी बीच किसी व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दे दी थी. वारदात की सूचना पा कर पुलिस भी वहां पहुंच गई. निरीक्षण में पता चला युवक मर चुका है. पूछताछ में जानकारी मिली कि दोनों हमलावर मोटरसाइकिल से आए थे. उन्होंने मृतक पर करीब 25 राउंड गोलियां चलाई थीं. मारा गया युवक अपने साथी के साथ पल्सर मोटरसाइकिल नंबर यूपी-15 बीए-4351 से आया था, जो बाहर खड़ी थी.

घटनास्थल से पुलिस को कारतूस के कई खोखे मिले. मृतक की शिनाख्त तुरंत नहीं हो सकी. उस के सीने, पेट और सिर पर 10 से ज्यादा गोलियों के निशान थे, लेकिन वहां किसी अन्य व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई थी. इस का मतलब हमलावर सिर्फ उसे ही मारने आए थे. जिस तरह उस पर गोलियां चलाई गई थीं, इस का मतलब था कि हत्यारे उसे किसी भी कीमत पर जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे.

पुलिस को मृतक की जेबों की तलाशी में एक पर्स मिला, जिस में मिलें कागजों के आधार पर उस की शिनाख्त जुहेब आलम उर्फ साहिल खान के रूप में हुई. पुलिस ने पर्स में मिले पते पर उस की हत्या की सूचना दी तो थोड़ी देर में उस के घर वाले रोतेबिलखते हुए वहां आ पहुंचे.

पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक जुहेब शहर के ही थाना लालकुर्ती क्षेत्र के मैदा मोहल्ला स्थित जफर बिल्डिंग में रहने वाले सुलतान का बेटा था. उस के 2 भाई और थे, जुहेब एमबीए था और करीब 5 सालों से हापुड़ रोड स्थित कीर्तिका पब्लिकेशन में बतौर एकाउंटैंट नौकरी करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे तक ही घर लौट पाता था.

जिस तरह उस की हत्या की गई थी, उस से यही लगता था कि उस की किसी से गहरी रंजिश थी. पुलिस ने उस के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से भी जुहेब या परिवार की रंजिश होने से साफ मना कर दिया. लेकिन यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी, क्योंकि कोई तो वजह थी, जिस के चलते उस का कत्ल किया गया था.

पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल से भी पूछताछ की. उन्होंने भी अपनी जानकारी में जुहेब की किसी से रंजिश होने की बात से इनकार कर दिया. उन्होंने बताया था कि उस दिन जुहेब शाम करीब साढ़े 6 बजे उन के यहां से निकला था. कैंटीन में उस के साथ गया दूसरा युवक कौन था, इस की जानकारी पुलिस को नहीं मिल सकी. कत्ल का राज उस युवक के सीने में दफन हो सकता था.

यह 20 फरवरी, 2017 की घटना थी. इस मामले में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ और एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने घटना के खुलासे के लिए डीएसपी विकास जायसवाल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. जिस में थानाप्रभारी मोहन सिंह, सबइंसपेक्टर अफसर अली, हैडकांस्टेबल धर्मराज, कांस्टेबल सतीश और राकेश को शामिल किया गया.

पुलिस के हाथ ऐसा कोई सबूत नहीं लगा, जिस से कत्ल का राज खुल पाता. सभी पहलुओं पर गौर किया गया तो सुई मृतक के मोबाइल पर जा कर अटक गई. हत्यारे जुहेब का मोबाइल फोन अपने साथ ले गए थे. मतलब उस के मोबाइल में कोई गहरा राज छिपा था. यह मामला प्रेमप्रसंग का लग रहा था, अगले दिन पुलिस ने उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स की छानबीन से पता चला कि जुहेब का नोएडा की रहने वाली किसी युवती से संबंध था. दोनों की अकसर बातें होती रहती थीं. युवती दूसरे संप्रदाय की थी. पुलिस की एक कड़ी मिली तो उस ने जांच आगे बढ़ाई. हत्या की वजह यह प्रेमप्रसंग भी हो सकता था. संभवत: मोबाइल फोन में युवती के फोटोग्राफ रहे होंगे, इसीलिए हत्यारे उसे अपने साथ ले गए थे. एक पुलिस टीम नोएडा गई और उस ने युवती को खोज निकाला.

पूछताछ में पता चला कि युवती और जुहेब का संपर्क सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए हुआ था. बाद में दोनों में बातें होने लगी थीं. जुहेब उस से मिलने नोएडा भी जाया करता था. इस बात की जानकारी घर वालों को हुई तो युवती का अलग संप्रदाय की होने की वजह से खासा हंगामा हुआ.

फरवरी के पहले सप्ताह में जुहेब नोएडा गया तो युवती के घर वालों ने उसे काफी डांटाफटकारा. जुहेब ने उस वक्त भविष्य में उस से किसी तरह का संबंध न रखने का वादा किया. लेकिन वह उस से संबंध तोड़ नहीं सका. इन सब बातों से पुलिस को युवती के घर वालों पर शक हुआ. बेटी के संबंधों से नाराज हो कर वे हत्या करा सकते थे.

पुलिस ने उन से गहराई से पूछताछ की, लेकिन उम्मीदों पर तब पानी फिर गया, जब उन्होंने जुहेब को डांटने फटकारने की बात तो स्वीकारी, लेकिन हत्या में किसी भी तरह का हाथ होने से मना कर दिया. तथ्यों की कसौटी पर उन के बयान खरे पाए गए तो पुलिस खाली हाथ लौट आई.

पुलिस ने अपना ध्यान जुहेब के मोबाइल फोन पर केंद्रित किया. पुलिस यह जान कर हैरान रह गई कि वह अपने मोबाइल में 3 सिमकार्ड का इस्तेमाल करता था. पुलिस ने उस के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस की दोस्ती कई लड़कियों और महिलाओं से थी. एक चौंकाने वाली बात यह पता चली कि उस की जिस नंबर पर सब से अधिक बातें होती थीं, वह पब्लिकेशन हाउस की मालकिन का था. पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल की पत्नी नेहा (परिवर्तित नाम) से पूछताछ की.

नेहा ने बताया कि चूंकि उन का ज्यादातर काम जुहेब ही संभालता था इसीलिए उस की जुहेब से अकसर बातें होती थीं. पुलिस उस के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई, क्योंकि दोनों के बीच देर रात तक लंबीलंबी बातें होती थीं. इस का राज नेहा ही बता सकती थी. इस का मतलब कुछ ऐसा जरूर था, जिसे नेहा छिपा रही थी. पुलिस ने 3 अन्य महिलाओं से भी पूछताछ की,  जिन से जुहेब की बातचीत होती थी.

इस के बाद पुलिस को शक हुआ कि जुहेब की हत्या के तार अग्रवाल परिवार से ही जुड़े हैं. पुलिस अभी तक जुहेब के उस साथी तक नहीं पहुंच सकी थी, जिस के साथ वह उस दिन शराब पी रहा था. वह कातिलों से मिला हुआ भी हो सकता था. संभव था कि उसे योजना बना कर वहां लाया गया हो और हत्यारों को इस की सूचना दे दी गई हो.

पुलिस ने रास्तों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई तो एक फुटेज में जो युवक उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठा नजर आया, उस की पहचान असब उर्फ बिट्टू के रूप में हुई. वह पब्लिकेशन हाउस में बतौर ड्राइवर नौकरी करता था. खास बात यह थी कि घटना के बाद उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था.

अब तक अग्रवाल परिवार पूरी तहर शक के घेरे में आ गया था. अपनी मालकिन से नजदीकियां जुहेब की हत्या की वजह हो सकती हैं, यह सोच कर पुलिस ने अमित अग्रवाल से पूछताछ की. लेकिन उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस ने नेहा के युवा बेटे मयंक अग्रवाल की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना के समय उस का मोबाइल फोन बंद था, जबकि सीसीटीवी फुटेज के हिसाब से वह पब्लिकेशन के औफिस में ही था.

घटना के समय मोबाइल का बंद होना संदेह पैदा करता था. पुलिस ने जुहेब के कई दोस्तों से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि जुहेब की नेहा से न केवल खासी नजदीकियां थीं, बल्कि वह उस पर काफी मेहरबान रहती थी.

आखिर 24 फरवरी को पुलिस ड्राइवर असब तक पहुंच ही गई. उसे कस्टडी में ले लिया गया, साथ ही पुलिस ने पूछताछ के लिए मयंक अग्रवाल को भी कस्टडी में ले लिया. दोनों से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो ऐसा सच समने आया, जिसे जान कर पुलिस हैरान रह गई. महत्वाकांक्षी जुहेब जल्दी से जल्दी आगे बढ़ने की चाहत में बड़ी भूल कर बैठा था. वह घर की इज्जत और दौलत, दोनों से खेल रहा था. उस का यही खेल उस की जान पर भारी पड़ा.

अगले दिन पुलिस ने प्रैसवार्ता कर के पूरे मामले का खुलासा कर दिया. दरअसल, पब्लिकेशन हाउस में नौकरी के दौरान जुहेब की नेहा से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस की भी एक वजह थी. अमित अग्रवाल काम के सिलसिले में अकसर शहर से बाहर आतेजाते रहते थे. बेटा बाहर रह कर पढ़ रहा था. ऐसे में औफिस की जिम्मेदारी नेहा संभालती थी. यही नहीं, पब्लिकेशन के कागजों के अनुसार, मालकिन भी वही थी. वह आजादखयाल महिला थीं, जबकि जुहेब महत्त्वाकांक्षी और लच्छेदार बातों का बाजीगर था.

उस का यही अंदाज नेहा को भा गया. दोनों की उम्र में करीब 20 साल का फासला था. लेकिन आगे बढ़ने की ललक में जुहेब ने उम्र का फासला नजरअंदाज कर दिया था. वह जानता था कि कंपनी की असली मालकिन नेहा है, इसलिए मजे से नौकरी करने और आगे बढ़ने के लिए नेहा को अपने पक्ष में करना जरूरी है.

नेहा जितनी ज्यादा मेहरबान होगी, उस की जिंदगी में उतनी ही खुशियां आएंगी. यही सब सोच कर वह नेहा पर डोरे डालने लगा. उस की बातों में नेहा को भी रस आने लगा था. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में जुहेब नेहा का दिल जीतने में कामयाब हो गया.

जुहेब ने चालाकी दिखाई थी, लेकिन नेहा को तो समझदारी दिखाते हुए सतर्क हो जाना चाहिए था. पर वह खुद भी अंजाम की परवाह किए बिना उस के रंग में रंगने लगी थी. दोनों की बातें और मुलाकात रोज होती ही होती थी. इस के अलावा वे फोन पर भी बातें और चैटिंग करने लगे. भूल कुछ पलों के निर्णय पर निर्भर होती है. गलत निर्णयों के नतीजे बाद में कितने अच्छे और बुरे निकलेंगे, इस बात को पहले कोई नहीं सोचता. एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूट गई. इस के बाद यह आए दिन का सिलसिला बन गया.

समय अपनी गति से चलता रहा. अमित को दोनों की नजदीकियों पर शक हुआ. जुहेब का आचरण उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने उसे नौकरी से निकालने का प्रयास किया. लेकिन हर बार नेहा ढाल बन कर खड़ी हो गई.

कहते हैं कि अनैतिक संबंध छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. जब सब को यकीन हो गया कि दोनों के बीच अनैतिक संबंध हैं तो परिवार कलह का अखाड़ा बन गया. बात बढ़ती देख नेहा ने वादा किया कि वह अपनी गलती को सुधारने का प्रयास करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

कुछ दिनों की खामोशी के बाद दोनों फिर से मिलनेजुलने लगे, उन की राह गलत है, दोनों ही जानते थे, लेकिन अपने संबंधों को वे प्यार का नाम दे कर खुश थे. जुहेब की वजह से एक हंसतेखेलते परिवार में तूफान उठ खड़ा हुआ था. उसे ले कर घर में हमेशा तनाव रहने लगा था. अमित ने कई बार जम कर विरोध किया लेकिन जब स्थितियों में परिवर्तन नहीं आया तो एक दिन उन्होंने आत्महत्या के इरादे से अपने हाथ की नसें काट लीं. लेकिन समय से मिले उपचार की वजह से उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा.

जुहेब और नेहा, दोनों ही बदलने को तैयार नहीं थे. नेहा की मेहरबानियों का असर यह हुआ कि जुहेब की न सिर्फ तनख्वाह बढ़ती गई, बल्कि उस का ओहदा भी बढ़ता गया. एक साल पहले की बात है.

नेहा का बेटा मयंक एमबीए की पढ़ाई कर के घर लौट आया और उस ने बिजनैस संभालना शुरू कर दिया. वह दूर था तो उसे कुछ पता नहीं था. लेकिन घर आ कर उसे वे बातें भी पता चलने लगीं जो नहीं पता चलनी चाहिए थीं. सब कुछ जान कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई, वह जुहेब से नफरत करने लगा.

मयंक ने जुहेब की कई गलतियां पकड़ीं. जुहेब एकाउंटैंट था. हिसाबकिताब की सभी बारीकियां उस के हाथों में थीं. उस की नजर में जुहेब कंपनी को चूना लगा रहा था. उस ने नेहा से उस की शिकायतें कीं, लेकिन वह एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देती थी. एक दिन मयंक ने अपनी मां से इस मुद्दे पर स्पष्ट कहा, ‘‘जब आप को पता है कि जुहेब गलत है और वह कंपनी को चूना लगा रहा है तो उसे हटाने में क्या बुराई है? मैं उसे फूटी आंख नहीं देखना चाहता.’’

‘‘चाहती तो मैं भी यही हूं, लेकिन…’’ नेहा ने अपनी बात अधूरी छोड़ी तो मयंक ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘तुम जानते हो कि कंपनी का सारा काम उसे पता है. लेनदारियां भी उसे मालूम हैं. उसे हटाया गया तो कंपनी को काफी नुकसान हो सकता है. तुम पूरी तरह काम संभाल लो, उस के बाद उसे बाहर कर देंगे.’’

मां की बात सुन कर मयंक सोच में पड़ गया. एक हद तक उन की बात ठीक भी थी. कई सालों में जुहेब कंपनी के हिसाबकिताब की सभी बारीकियां जान गया था. नेहा की तरफ से उसे मिली छूट का ही नतीजा था कि वह बड़े हिसाब अपने हाथों में रखता था.

पूछने या कहने पर भी वह मयंक या उस के पिता को हिसाब नहीं देता था. बात भी उतनी ही बताता था, जितनी वह जरूरी समझता था. जोर देने पर वह मयंक के साथ मारपीट करने तक पर उतारू हो जाता था.

मयंक को शक था कि उस ने कंपनी में लाखों का घोटाला किया है. ऐसे में मयंक की तिलमिलाहट और बढ़ गई. जुहेब शानदार लाइफ स्टाइल में जीता था. एक दिन नेहा के मोबाइल में मयंक ने जुहेब की चैटिंग देख ली. दोनों की बातें शर्मसार करने वाली थीं. मयंक खून का घूंट पी कर रह गया. सब कुछ जान कर भी वह कुछ नहीं कर पा रहा था.

घर में आए दिन झगड़ा होता रहता था. जुहेब के प्रति मयंक के मन में नफरत तो थी ही, यह नफरत तब और बढ़ गई जब नेहा ने उसे गिफ्ट में स्कूटी दी. मयंक को लगा कि अगर वक्त रहते उस ने कुछ नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं, जब जुहेब उस के परिवार को न सिर्फ बर्बाद कर देगा, बल्कि बिजनैस पर भी कब्जा कर लेगा.

इज्जत और दौलत की बर्बादी वह अपनी आंखों से देख रहा था. उसे लगा कि जब तक जुहेब का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया जाएगा तब तक मां सुधरने वाली नहीं है. आखिर उस ने मन ही मन एक खतरनाक निर्णय ले लिया.

मयंक का एक मौसा था राजू उर्फ किशनपाल. वह मुजफ्फरनगर जिले के थाना रामराज क्षेत्र के गांव देवल का रहने वाला था. वह आपराधिक और दबंग प्रवृति का था. मयंक ने सारी बातें उसे बता कर जुहेब को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने को कहा तो वह बोला, ‘‘झगड़े की जड़ जुहेब को हटाने के लिए पेशेवर लोगों का इंतजाम करना होगा.’’

‘‘जो उचित लगे, आप करें जितना भी खर्चा होगा, मैं देने को तैयार हूं.’’ मयंक ने कहा.

राजू की पहचान ऐसे कई लोगों से थी, जो पैसे ले कर हत्या करते थे. उस ने मेरठ के शास्त्रीनगर के रहने वाले सारिक और नदीम से बात कर के उन्हें जुहेब की हत्या के लिए तैयार कर लिया. इस के बाद सभी ने मिल कर हत्या की योजना बना डाली.

योजना के तहत 20 फरवरी की सुबह राजू मेरठ आ कर मयंक से मिला. मयंक जानता था कि जुहेब और असब के बीच दोस्ती है, इसलिए उस ने असब को भी योजना में शामिल करने का फैसला किया. उस ने असब को औफिस से बाहर बुलवाया और उसे रुपयों का लालच दे कर अपने साथ शामिल कर लिया. तय हुआ कि असब जुहेब को सही ठिकाने पर ले कर जाएगा और फोन कर के राजू को इस बारे में बताएगा.

योजनानुसार राजू शूटरों के पास चला गया. सारिक और उस के साथी के पास पहले से ही हथियार थे. दिन में असब ने जुहेब से शाम को पीनेपिलाने की बात कही तो वह खुशीखुशी तैयार हो गया.

शाम को दोनों मोटरसाइकिल से शराब के ठेके पर पहुंचे तो असब ने फोन कर के राजू को सटीक जानकारी दे दी. इस के बाद राजू शूटर सारिक और नदीम के साथ वहां पहुंचा और चालाकी से जुहेब की पहचान करा दी. इस के बाद उन्होंने वारदात को अंजाम दे दिया.

असब वहां से निकला और बाहर आ कर राजू तथा शूटरों से मिला. शूटरों ने उसे एक पिस्टल छिपा कर रखने के लिए दी और खुद चले गए. असब भी अपने मोबाइल का स्विच औफ कर के घर चला गया.

मयंक ने सोचा था कि योजनाबद्ध तरीके से काम करने की वजह से पुलिस इस मामले में उलझ कर रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. जुहेब और नेहा की नासमझी से 2 परिवारों पर मुसीबत आ गई. जुहेब को अपनी जान गंवानी पड़ी तो नेहा के बेटे मयंक को जेल जाना पड़ा. समय रहते अगर दोनों सुधर गए होते तो यह नौबत नहीं आती.

असब की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त 32 बोर का पिस्टल और कारतूस बरामद कर लिए. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों में से किसी की जमानत नहीं हो सकी थी. फरार आरोपियों की सरगर्मी से तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Serial Killer: खौफनाक इरादों वाले सीरियल किलर्स

Serial Killers: भारत के कुछ खौफनाक सीरियल किलर्स के अपराधों के तौर तरीके और उन के द्वारा अंजाम दी गई वारदातों के बारे में सुन कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उन्होंने अपने शैतानी दिमाग से डर की जो दहशत फैलाई थी, उस से न केवल सामान्य लोगों की जिंदगी आतंक और भय से गुजरने लगी थी, बल्कि पुलिस महकमा भी सकते में आ गया था.

वैसे अपराधियों को कानूनी शिकस्त मिली, वे सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए. बावजूद इस के नए सिरे से अपराध की घटनाएं होती रहीं. वैसे खूंखार अपराधियों की बात करें तो उन में रमन राघव, चार्ल्स शोभराज, साइनाइड मोहन, देवेंद्र शर्मा, मोहिंदर सिंह पंढेर, एम. जयशंकर, डाक्टर डेथ और संतोष पोल के नाम प्रमुख हैं.

इन  में से कई अपराधियों पर फीचर फिल्में और टीवी सीरियल भी बन चुके हैं. जबकि एक सच्चाई तो यह भी है कि फिल्मों में उन के कुकर्मों और अपराधों को जितनी शिद्दत के साथ फिल्माया गया, वे उस से कहीं अधिक खूंखार और खौफनाक थे.

वैसे अपराधी देश के विभिन्न हिस्सों के रहे हैं. महानगर से ले कर छोटेमोटे कस्बाई इलाकों तक में उन का खौफ बना रहा है. उन में अधिकतर के अपराध सैक्स, हत्या और रेप जैसी वारदातों के रहे हैं.

रमन राघव : एक साइको किलर

मुंबई में 1960 के दशक का दौर था. तब बंबई नाम के इस महानगर में देश के कोनेकोने से लोग रोजगार की तलाश के लिए लगातार आ रहे थे. उन का वहां कोई ठौरठिकाना नहीं था, फिर भी उन के आने का सिलसिला बना हुआ था. वे महानगर में जहांतहां किसी तरह से रहने की जगह बनाते जा रहे थे, जहां सिर्फ सिर छिपाने की जगह थी. दैनिक क्रिया के लिए सार्वजनिक शौचालय थे. नहानेधोने के लिए भी वैसी खुले में कोई जगह थी. सोने के लिए सड़कों का फुटपाथ भी उन के लिए कम पड़ने लगा था.

रोजगार का इंतजाम हो जाने के बाद लोग जैसेतैसे चकाचौंध की जिंदगी में किसी तरह से गुजारा कर ले रहे थे. उन में अधिकतर गरीब और मजदूर किस्म के लोगों के छोटेछोटे परिवार थे. उन के नसीब में घरेलू परदा और सुरक्षा नाम मात्र की थी. वे कब किसी घटना या दुर्घटना के शिकार हो जाएं, कहना मुश्किल था. उन में या फिर उन से बाहर अपराधी किस्म के लोग भी थे, जिन की नजर भोलीभाली लड़कियों और अकेली औरतों पर रहती थी. ऐसा ही एक व्यक्ति रमन राघव था.

उस के बारे में बहुत अधिक रिकौर्ड तो नहीं है, सिवाय इस के कि उस ने कई जघन्य अपराध किए. हालांकि तब यह माना गया था कि वह दक्षिण भारत का रहने वाला था. 1965-66 के समय में मुंबई में फुटपाथ पर सोने वाले लोगों की हत्याओं की खबरों ने मुंबई पुलिस की नाक में दम कर रखा था. गरीब बस्तियों में उस के नाम का भय बना हुआ था. उस के ताबड़तोड़ अपराध ने सभी को सन्न कर दिया था. पुलिस उस के हुलिए तक से अनजान थी.

रात के अंधेरे में जब किसी बेसहारे की मौत हो जाती थी, तब पुलिस मरने वाले की शिनाख्त तो कर लेती थी, लेकिन उस हत्यारे तक नहीं पहुंच पाती थी. पुलिस को सभी कत्ल में एक जैसे तरीके के अलावा और कुछ नहीं मालूम हो पाया था. वह तरीका था लोगों के सिर पर किसी भारी चीज से हमला किया जाना. हत्यारा एक ही वार में व्यक्ति को मौत की नींद सुला देता था.

सिर्फ एक साल के अंदर ही करीब डेढ़ दरजन लोगों पर इस तरह के जानलेवा हमले हुए थे, जिन में 9 लोग मारे गए थे. इस अनजान हमलावर को पकड़ने में मुंबई पुलिस पूरी तरह से नाकाम थी. लोग शाम होते ही अपनेअपने घरों की ओर लौटने लगे थे. स्थिति यहां तक आ गई थी कि लोग अपनी सुरक्षा के लिए साथ में लकड़ी या डंडा रखने लगे थे. उस के बाद कुछ समय तक वारदातें नहीं हुईं.

पुलिस जांच में जुटी थी और कई घायलों की मदद से इस हमलावर का स्केच बनवाया गया, जिस के आधार पर मुंबई क्राइम ब्रांच पुलिस के 27 अगस्त, 1968 को इस खूंखार हत्यारे रमन राघव को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की. पुलिस पूछताछ में उस ने बताया कि 3 साल के अपने आपराधिक जीवन में करीब 40 लोगों को मौत के घाट उतार चुका था. जबकि पुलिस का मानना था कि यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है. पुलिस ने पूछताछ में यह भी पाया कि रमन ने फुटपाथ पर सोए बुजुर्ग महिला, पुरुष, युवा और बच्चों सभी को अपना शिकार बनाया.

पूछताछ के दौरान पुलिस ने जब उस की मैडिकल जांच करवाई, तब डाक्टरों के पैनल ने उसे मानसिक रूप से विकृत बताया. फिर निचली अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद उसे मौत की सजा सुना दी. इस सब के बीच रमन राघव ने सजा के खिलाफ कोई अपील भी नहीं की. हाईकोर्ट ने 3 मनोवैज्ञानिकों के पैनल से उस के मानसिक स्तर की फिर से जांच कराई.

मनोचिकित्सकों के पैनल द्वारा किए गए कई घंटों के इंटरव्यू के बाद निष्कर्ष निकला कि वह दिमागी रूप से बीमार है. ऐसे में उस की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया. इस के बाद उसे पुणे की यरवदा जेल में भेज दिया गया, जहां कई सालों तक उस का इलाज भी चला. साल 1995 में साइको किलर रमन राघव की किडनी की बीमारी के चलते सस्सून अस्पताल में मौत हो गई.

साल 2016 में उस की जीवनी पर एक हिंदी फिल्म ‘रमर 2.0’ भी बनी थी, जिस में मुख्य भूमिका रघुवीर यादव ने निभाई थी. फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी एक अहम किरदार में थे.

डा. देवेंद्र शर्मा : बेरहमी से 100 जानें लेने वाला हैवान

सीरियल किलर डा. देवेंद्र शर्मा की हैवानियत को दिल्ली, गुड़गांव, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोग 2 दशक बाद भी याद कर सिहर जाते हैं. उस के खौफनाक किस्सों में किडनी रैकेट, फरजी गैस एजेंसी और कारों की चोरी के कारनामे आज भी सब की जुबान पर हैं. लोगों का कहना है कि उस ने 100 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, जिन में कैब ड्राइवर और दूसरी गाडि़यों के ड्राइवर थे. उन की लाशों को यूपी की मगरमच्छों वाली नहर में फेंक दिया था.

साल 2002 और 2004 के बीच उस के कारनामे ज्यादा चर्चित हुए. वह कारें और दूसरे वाहनों को चुराया करता था. उस ने करीब 40 ड्राइवरों को मौत के घाट उतार दिया था. हैरानी की बात यह थी कि वह एक आयुर्वेदिक चिकित्सक था. अपने पेशे से अलग लगातार आय के अन्य साधनों पर नजर रखे हुए था. हत्याओं में से 50 को कुबूल करने के बाद उसे 2008 में मौत की सजा सुना दी गई थी. वह ऐसा सीरियल किलर था, जो 50 कत्ल करने के बाद उस की गिनती भूल गया था. बाद में उस ने माना कि वह 100 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है.

वह 2004 में पकड़ा गया था. फिर जेल में अच्छे बर्ताव के कारण उसे जनवरी 2020 में 20 दिन की पैरोल मिली थी. पैरोल खत्म होने के बाद भी वह जेल नहीं पहुंचा बल्कि वह दिल्ली के मोहन गार्डन में छिप कर रहने लगा. यहां वह एक बिजनसमैन को चूना लगाने वाला था, लेकिन पुलिस को उस के यहां होने की भनक लगी और आखिर में उसे पकड़ लिया गया. दिल्ली में पकड़े गए देवेंद्र को किडनी मामले का अपराधी करार दिया गया था.

देवेंद्र शर्मा डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजस्थान में निजी प्रैक्टिस करता था. उस में उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितने कि वह उम्मीद किए हुए था. साल 1984 में देवेंद्र शर्मा ने आयुर्वेदिक मेडिसिन में अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर के राजस्थान में क्लीनिक खोला था. फिर 1994 में उस ने गैस एजेंसी के लिए एक कंपनी में 11 लाख रुपए का निवेश किया था. लेकिन कंपनी अचानक गायब हो गई, फिर नुकसान के बाद उस ने 1995 में फरजी गैस एजेंसी खोल ली.

उस के बाद शर्मा ने एक गैंग बनाया, जो एलपीजी सिलेंडर ले कर जाते ट्रकों को लूट लेता था. इस के लिए वे लोग ड्राइवर को मार देते और ट्रक को भी कहीं ठिकाने लगा देते. इस दौरान उस ने गैंग के साथ मिल कर करीब 24 मर्डर किए. वह अपने पेशे से ही जुड़ कर पैसा कमाने का काम करने लगा. उस के पास उन मरीजों की संख्या अच्छीखासी थी, जिन की किडनी खराब हो चुकी थी. उन्हें वह आयुर्वेदिक दवाइयां दिया करता था. उस ने उपचार करते हुए देखा कि बहुतों की दोनों किडनियां खराब हैं, जिसे ट्रांसप्लांट करने की जरूरत है.

फिर क्या था, देवेंद्र शर्मा किडनी ट्रांसप्लांट गिरोह में शामिल हो गया. वह किडनी डोनर का इंतजाम करने लगा. कार के ड्राइवर को इस का निशाना बनाया और उन्हें मार कर जरूरतमंदों को उस की किडनी बेच कर मोटा पैसा बनाने लगा. इस काम में उसे दोहरा लाभ हुआ. किडनी बेचने के साथसाथ देवेंद्र शर्मा ने लूटी हुई कारों से भी पैसे कमाए. उस ने 7 लाख रुपए प्रति ट्रांसप्लांट के हिसाब से 125 ट्रांसप्लांट करवाए. ड्राइवर की बौडी को नहर में फेंकने के बाद कैब को यूज्ड कार बता कर बेच देता.

वह फरजी गैस एजेंसी भी चलाने लगा. अपनी फरजी गैस एजेंसी के लिए जब उसे सिलेंडर चाहिए होते तो वह गैस डिलिवरी ट्रक को लूट लेता था और उस के ड्राइवर को मार देता था. देवेंद्र ने पूरी गैंग तैयार कर रखी थी. वे गाडि़यों की लूट से ले कर लाश को  ठिकाने लगाने के लिए उसे उत्तर प्रदेश में कासगंज स्थित हजारा नहर में फेंक दिया करता था. इस नहर में बड़ी संख्या में मगरमच्छ रहते हैं.

साइनाइड किलर मोहन : 20 महिलाओं की हत्या

सीरियल किलर मोहन कुमार को साइनाइड किलर के नाम से भी जाना जाता है. मोहन कुमार को 20 महिलाओं की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने के बाद, वह उन्हें गर्भनिरोधक गोलियां खिलाता था. दरअसल, वे गर्भनिरोधक गोलियां नहीं, बल्कि साइनाइड की गोलियां हुआ करती थीं. उस ने ये जुर्म साल 2005 से 2009 के बीच किए थे. उस के बारे में कहा जाता है कि वह कई बैंक धोखाधड़ी और वित्तीय घोटालों में भी शामिल था. उसे दिसंबर 2013 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

मोहिंदर सिंह पंढेर : निठारी हत्याकांड

साल 2005 और 2006 के बीच दिल्ली के नोएडा इलाके में निठारी हत्याकांड काफी चर्चा में रहा था. इस खौफनाक घटना की पूरे देश में बहुत चर्चा हुई. मोहिंदर सिंह पंढेर और सुरिंदर कोली दोनों पर निठारी में 16 से अधिक बच्चों की हत्या और बलात्कार का आरोप था.मोहिंदर सिंह पंढेर दिल्ली के नोएडा का एक धनी व्यापारी था. 2005 से 2006 के बीच निठारी गांव के 16 लापता बच्चों की खोपड़ी उस के घर के पीछे एक नाले में मिली थी. उस इलाके के सभी लापता बच्चों की लाशें पंढेर के घर के पास ही मिली थीं.

पुलिस ने पंढेर और उस के नौकर सुरिंदर कोली को गिरफ्तार कर लिया. दोनों पर रेप, नरभक्षण और मानव अंगों की तस्करी का आरोप लगाया गया था. कुछ आरोप सही थे तो कई अफवाहें भी थीं. कोली और पंढेर दोनों को 2017 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

एम. जयशंकर : रेप और मर्डर

एम. जयशंकर पर 30 महिलाओं से रेप और 15 महिलाओं की हत्या का आरोप था. उस ने 2008 से 2011 के बीच रेप और हत्या की घटनाओं को अंजाम दिया था. उस ने तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में 30 बलात्कार, 15 हत्याएं और कई डकैती की घटनाओं को अंजाम दिया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बंगलुरु की एक जेल में बंद कर दिया गया था. हालांकि उसे  मानसिक रूप से बीमार भी बताया गया था. बाद में जेल से भागने के कई असफल प्रयासों के बाद एम. जयशंकर ने 2018 में आत्महत्या कर ली थी.

डाक्टर डेथ : महिलाओं को जिंदा दफनाने वाला

वैसे दुनिया भर में डाक्टर को प्राणरक्षक माना जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के सातारा में एक ऐसा डाक्टर सामने आया, जिसे ‘डाक्टर डेथ’ का नाम दिया गया. इस डाक्टर की कहानी इतनी खौफनाक थी कि उस के कारनामे उजागर होते ही सभी चौंक पड़े थे. डाक्टर ने पुलिस को बताया कि उस ने 5 औरतों को जिंदा दफना दिया था उन की कब्रों के ऊपर नारियल के पेड़ भी लगा दिए थे.

डाक्टर डेथ के इस सनकी रवैए का खुलासा 2016 में तब हुआ, जब उसे पुलिस ने एक कत्ल के मामले में गिरफ्तार किया था. महाराष्ट्र के पुणे से करीब 120 किलोमीटर दूर सातारा में रहने वाले इस कातिल डाक्टर की पहचान संतोष पोल के रूप में की गई थी. कातिल डाक्टर ने पुलिस को अपने कुबूलनामे में बताया कि वह साल 2003 से ऐसी वारदातों को अंजाम देता आया है.

संतोष पोल पेशे से एलेक्ट्रोपैथ डाक्टर था और उस के पास बैचलर औफ इलैक्ट्रोहोमियोपैथी मैडिसिन एंड सर्जरी (बीईएमएस) की डिग्री थी. इस के अलावा उस ने मुंबई के घोटवडेकर अस्पताल में 8 साल तक नौकरी भी की थी. वहां काम करने वाले वरिष्ठ डाक्टरों का मानना था कि वह मैडिकली सर्टिफाइड नहीं था. संतोष खुद को डाक्टर बताने के साथसाथ समाजसेवी और आरटीआई एक्टिविस्ट भी बताता था.

साल 2016 में वेलम गांव की आंगनबाड़ी कार्यकत्री मंगला जेधे लापता हो गई. उस के परिजनों ने इस का आरोप संतोष पर लगा दिया था. शिकायत में नामजद होने के बाद पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन सबूत नहीं होने की वजह से उसे छोड़ दिया गया. मामले की चल रही जांच में सामने आया कि मंगला के फोन की आखिरी लोकेशन संतोष पोल के फार्महाउस के पास दिखी और मंगला का फोन ज्योति नाम की नर्स के पास से बरामद किया गया.

इस के बाद पूछताछ में ज्योति ने बताया कि संतोष पोल ने ही मंगला जेधे की हत्या की और उस के शव को दफना दिया. उधर संतोष को जैसे ही यह सब पता चला तो वह मुंबई भाग गया. ज्योति के द्वारा बताई गई जगह पर खुदाई की गई, तो एक कंकाल बरामद हुआ और लैब रिपोर्ट्स में साबित हो गया कि वह कंकाल मंगला जेधे का ही था. गिरफ्तारी के बाद संतोष ने बताया कि उस ने 13 सालों में 5 महिलाओं और एक पुरुष की हत्या की है. इस के बाद पुलिस के जरिए चारों महिलाओं के कंकाल बरामद कर लिए गए, लेकिन एक पुरुष का कंकाल बरामद नहीं हुआ.

संतोष ने उस की लाश नदी में फेंक दी थी. उस ने बताया कि वह महिलाओं को नशे का इंजेक्शन देता था, फिर नशे की हालत में रहने के दौरान ही उन्हें फार्महाउस में दफना देता था. साथ ही लाशों के सड़ने की गंध छिपाने के लिए उस ने कुछ मुर्गियां भी पाल रखी थीं. पुलिस ने इस ‘डाक्टर डेथ’ के घर से नशीली दवाएं, इंजेक्शन, ईसीजी मशीन और आरटीआई से जुड़े कुछ दस्तावेज बरामद किए थे.

संतोष ने बताया था कि वह हर हत्या के बाद एक जेसीबी बुलाता था और नारियल के पेड़ों को लगाने के लिए गड्ढे खुदवाता था, लेकिन इन गड्ढों में लाशें दफना कर उन के ऊपर नारियल के पेड़ लगा दिया करता था. Serial Killer

Hindi Crime Story: उधार के पैसे और हत्या

Hindi Crime Story: अपने परिजनों के राजनीतिक रसूख के चलते कोई बिगड़ैल नवाब अगर पैसे उधार लेकर आंखें दिखाने लगे, पैसे देना ना चाहे, तो उसका परिणाम जतिन राय जैसा हो सकता है.

रायपुर के खमताराई थाना इलाके में जतिन राय अभी नाबालिग ही था. उम्र थी 20 वर्ष और पार्षद अंजनी विभार का भतीजा था. चाचा भी प्रदेश में सत्ता में धमक रखते हैं.

राजधानी रायपुर के थाना खम्हारडीह इलाके में एक सूटकेस से जतिन राय नाम के युवक की लाश मिली. पुलिस इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले प्रदीप नायक, सुजीत तांडी और केवी दिवाकर को गिरफ्तार तो कर लिया मगर संपूर्ण घटनाक्रम को देखें तो जहां यह घटना एक बड़ा संदेश देती है कि अगर परिजन राजनीति में है, प्रभावशाली है तो बच्चे किस तरह “बिगड़े नवाब” बन सकते हैं. दूसरी तरफ पुलिस हत्या जैसे गंभीर अपराध पर भी कैसा लचीला रुख अपनाती है और अगर राजनीतिक प्रभाव ना हो मुख्यमंत्री तक पहुंच नहीं हो तो कुंभकर्णी नींद में सोती रहती है.

अपनी मौत का सामान लेकर आया जतिन!

आरोपियों ने जो घटनाक्रम पुलिस के समक्ष बयां किया है उसके अनुसार जतिन राय को कहा गया था कि अपने साथ एक बड़ा सुटकेश ट्रॉली बैग लेकर आना. क्योंकि हमें कहीं बाहर जाना है. जतिन ने अपनी मां से बैग मांगा, उन्होंने बैग देने से मना कर दिया.दूसरी तरफ आरोपी बार-बार उसे कॉल कर बुला रहे थे.

जतिन ने आखिरकार अपने पड़ोसी अभय से एक बड़ा सूटकेस लिया और प्रदीप से मिलने के लिए निकला.आरोपी प्रदीप के बताए स्थान पर पहुंचने के बाद थोड़ी देर में अपने 20 हजार रुपए लौटाने को लेकर दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ. फिर प्रदीप ने अपने साथियों के साथ मिलकर जतिन की गला दबाकर हत्या कर दी. उसकी लाश को उसी सूटकेस में भर दिया जिसे लेकर वह पहुंचा था. वे आरोपी जतिन का स्कूटर लेकर चंडीनगर में सुनसान इलाके के कुएं में लाश भरे बैग को डाल कर आराम से अपने अपने घर चले गए.

राजनीतिक रसूख!

9 फरवरी 2021को जतिन के लापता होने की शिकायत खमतराई थाने में परिवार ने दर्ज करवाई गई . मगर 5 दिनों तक पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही जहां परिजनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. थाने तक महापौर एजाज मेंबर और पर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा आ पहुंचे. मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दरबार तक पहुंचा और पुलिस को तत्परता से आरोपियों को खोजने का निर्देश मिला.और कहते हैं न, जब पुलिस अपने पर आ जाए तो आरोपी बच नहीं सकते. इस घटनाक्रम में भी यही हुआ सख्ती बरतने पर प्रदीप, उसका साथी सूरज और केवी दिवाकर पुलिस के समक्ष सच स्वीकार कर लिया.

दरअसल, करीब एक महीने पहले हत्या के आरोपी प्रदीप ने अपनी बाइक गिरवी रखी थी. इसके बदले में उसे 30 हजार रुपए मिले थे. इसमें से 20 हजार रुपए मांगने पर प्रदीप ने जतिन को दिए थे. और अब इन रुपयों को जतिन लौटा नहीं रहा था. जब भी प्रदीप पैसा मांगता तो जतिन बहाने बनाने लगता और ऐसा व्यवहार करता कि रुपए तो नहीं मिलेंगे जो करना है कर लेना. हालांकि जतिन के परिवार वालों का कहना है कि प्रदीप, जतिन से चिढ़ता था, इसलिए उसकी हत्या की और अब झूठ ही रुपयों की देनदारी की बातें कर रहा है.

“क्राइम पेट्रोल” देख बनाया प्लान

इस सनसनीखेज हत्याकांड के संदर्भ में पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि इस हत्याकांड के पीछे जहां पैसों की लेनदेन थी, रुपए नहीं मिलने से नाराज प्रदीप को “क्राइम पेट्रोल” का एक एपिसोड देखकर यह सुझा कि क्यों ना जतिन राय को कुछ इस तरह सजा दे दी जाए. पुलिस के समक्ष यह भी सच सामने आ गया है कि प्रदीप घटना से पहले जतिन को लगातार फोन कर रहा था, वो उसे बुला रहा था, जतिन जाने से इनकार कर चुका था. मगर वह बार-बार दोस्ती की दुहाई दे रहा था.

जतिन जब प्रदीप के पास भनपुरी स्थित मकान में पहुंचा तो यहां दोस्तों ने उसका स्वागत किया और मिलकर शराब पार्टी की. प्रदीप ने जानबूझकर जतिन को ज्यादा शराब पिलाई. प्रदीप ने तीव्र आवाज में म्यूजिक चला रखा था ताकि किसी को कोई आभास ना मिले. इसके बाद हत्यारों ने मौका मिलते ही उसकी गला घोंट कर हत्या कर दी और जो सूटकेस जतिन लेकर आया था उसी में उसके शव को डालकर खम्हारडीह में फेंक दिया गया.

तीन दिन बाद कचरा बीनने वाले एक बच्चे की नजर कुएं में पड़े बैग और उसमें से निकले पैरों पर पड़ी थी. और मामला पुलिस तक पहुंचा. मगर पुलिस जांच में उदासीन रही जब जतिन राय के चाचा और परिजनों ने हंगामा किया तब जाकर पुलिस के उच्च अधिकारियों के कान में जूं रेंगी और मामले की जांच में में तेजी आई और अंततः मामले का खुलासा हुआ. Hindi Crime Story

Suspense Crime Story: दौलत की खातिर दांव पर लगी दोस्ती

Suspense Crime Story: 19मार्च, 2021 की रात 10 बजे शीला देवी अपने देवर आनंद प्रजापति के साथ जनता नगर चौकी पहुंचीं. उस समय इंचार्ज ए.के. सिंह चौकी पर मौजूद थे. उन्होंने शीला देवी को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम घबराई हुई क्यों हो? कोई गंभीर बात है क्या?’’

‘‘हां सर. हमें किसी अनहोनी की आशंका है.’’

‘‘कैसी अनहोनी? साफसाफ पूरी बात बताओ.’’

‘‘सर, दरअसल बात यह है कि रात 8 बजे मेरा बेटा शैलेश, उस का दोस्त अर्श गुप्ता व विनय घर पर नीचे कमरे में शराब पी रहे थे. कुछ देर बाद कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आईं. फिर वे लोग बाइक से कहीं चले गए.

‘‘उन के जाने के बाद मैं कमरे में गई, तो वहां खून से सनी चादर देखी. अनहोनी की आशंका से मैं घबरा गई. मैं ने इस की जानकारी पड़ोस में रहने वाले अपने देवर आनंद को दी, फिर उन के साथ सूचना देने आप के पास आ गई. आप मेरी मदद करें.’’

शीला देवी की बात सुनकर ए.के. सिंह को लगा कि जरूर कोई अनहोनी घटना घटित हुई है. उन्होंने यह सूचना बर्रा थानाप्रभारी हरमीत सिंह को दी फिर 2 सिपाहियों के साथ शीला देवी के बर्रा भाग 8 स्थित मकान पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के चंद मिनट बाद ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह भी आ गए. हरमीत सिंह ने ए.के. सिंह के साथ कमरे का निरीक्षण किया तो सन्न रह गए. कमरे के फर्श पर खून पड़ा था और पलंग पर बिछी चादर खून से तरबतर थी. कमरे का सामान भी अस्तव्यस्त था. खून की बूंदें कमरे के बाहर गली तक टपकती गई थीं.

निरीक्षण के बाद हरमीत सिंह ने अनुमान लगाया कि कमरे के अंदर कत्ल जैसी वारदात हुई है या फिर गंभीर रूप से कोई घायल हुआ है. शैलेश और उस का दोस्त या तो लाश को ठिकाने लगाने गए हैं या फिर अस्पताल गए हैं. कहीं भी गए हों, वे लौट कर घर जरूर आएंगे. अत: उन्होंने घर के आसपास पुलिस का पहरा लगा दिया तथा खुद भी निगरानी में लग गए. रात लगभग डेढ़ बजे शैलेश और उस का दोस्त अर्श गुप्ता वापस घर आए तो पुिलस ने उन्हें दबोच लिया और थाना बर्रा ले आए. दोनों के हाथ और कपड़ों पर खून लगा था. इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने पूछा, ‘‘तुम दोनों ने किस का कत्ल किया है और लाश कहां है?’’

शैलेश कुछ क्षण मौन रहा फिर बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपने बचपन के दोस्त विनय प्रभाकर का कत्ल किया है. वह बर्रा भाग दो के मनोहर नगर में रामजानकी मंदिर के पास रहता था. उस की लाश को मैं ने अर्श की मदद से रिंद नदी में फेंक दिया है. पैट्रोल खत्म हो जाने की वजह से हम ने विनय की मोटरसाइकिल खाड़ेपुर-फत्तेपुर मोड़ पर खड़ा कर दी और वापस लौट आए.’’

‘‘तुम ने अपने दोस्त का कत्ल क्यों किया?’’ थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने शैलेश से पूछा.

इस सवाल पर शैलेश काफी देर तक हरमीत सिंह को गुमराह करता रहा. पहले वह बोला, ‘‘साहब, नशे में गलती हो गई. हम ने उस का कत्ल कर दिया.’’

फिर बताया कि उस के मोबाइल फोन में उस की महिला मित्र की कुछ आपत्तिजनक फोटो थीं. उन फोटो को विनय ने धोखे से अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया था. वह उन फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेल कर रहा था, इसलिए हम ने उसे मार डाला. लेकिन थानाप्रभारी हरमीत सिंह को उस की इन दोनों बातों पर यकीन नहीं हुआ. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने सख्ती की तो दोनों टूट गए.

फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने 10 लाख रुपए की फिरौती मांगने के लिए विनय की हत्या की योजना बनाई थी. कुछ माह पहले संजीत हत्याकांड की तरह शव को ठिकाने लगाने के बाद उसी के मोबाइल फोन से उस के घर वालों को फोन कर फिरौती मांगने की योजना थी. उस ने दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की थी. लेकिन फिरौती मांगने के पहले ही वे पकड़े गए.

शैलेश व अर्श की जामातलाशी में उन के पास से 3 मोबाइल फोन मिले, जिस में एक मृतक विनय का था तथा बाकी 2 शैलेश व अर्श के थे. उन के पास एक पर्स भी बरामद हुआ जिस में मृतक का फोटो, आधार कार्ड तथा कुछ रुपए थे. बरामद पर्स मृतक विनय प्रभाकर का था. शैलेश व अर्श गुप्ता की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल बांका तथा लाश ठिकाने लगाने में इस्तेमाल मोटरसाइकिल बरामद कर ली. बांका उस ने अपने कमरे में छिपा दिया था और पैट्रोल खत्म होने से उस ने मोटरसाइकिल खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ी कर दी थी.

फिरौती और हत्या के इस मामले में थानाप्रभारी हरमीत सिंह कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे. क्योंकि इस के पहले संजीत अपहरण कांड में बर्रा पुलिस गच्चा खा चुकी थी. अपहर्त्ताओं ने फिरौती की रकम भी ले ली थी और उस की हत्या भी कर दी थी. इस मामले में लापरवाही बरतने में एसपी व डीएसपी सहित 5 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था. अत: उन्होंने घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी.

सूचना पा कर रात 3 बजे एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय थाना बर्रा पहुंच गए. उन्होंने घटना के संबंध में गिरफ्तार किए गए शैलेश व अर्श गुप्ता से विस्तार से पूछताछ की. फिर दोनों को साथ ले कर रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. इस के बाद कातिलों की निशानदेही पर नदी किनारे पड़ा विनय प्रभाकर का शव बरामद कर लिया.

विनय की हत्या बड़ी निर्दयतापूर्वक की गई थी. उस का गला धारदार हथियार से काटा गया था, जिस से सांस की नली कट गई थी और उस की मौत हो गई थी. मृतक विनय की उम्र 26 वर्ष के आसपास थी और उस का शरीर हृष्टपुष्ट था. 20 मार्च की सुबह 5 बजे बर्रा थाने के 2 सिपाही मृतक विनय के घर पहुंचे और उस की हत्या की खबर घर वालों को दी. खबर पाते ही घर व मोहल्ले में सनसनी फैल गई. घर वाले रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. वहां विनय का शव देख कर मां विमला तथा बहन रीता बिलख पड़ीं. पिता रामऔतार प्रभाकर तथा भाई पवन की आंखों से भी अश्रुधारा बह निकली. पुलिस अधिकारियों ने उन्हे धैर्य बंधाया.

पवन ने एसपी दीपक भूकर को बताया कल शाम साढ़े 7 बजे किसी का फोन आने पर उस का भाई विनय यह कह कर अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से घर से निकला था कि अपने दोस्त से मिलने जा रहा है. उस के बाद वह घर नहीं लौटा. रात भर हम लोग उस के घर वापस आने का इंतजार करते रहे. उस का फोन भी बंद था. सुबह 2 सिपाही घर आए. उन्होंने विनय की हत्या की सूचना दी. तब हम लोग यहां आए. लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि विनय की हत्या किस ने और क्यों की?

‘‘तुम्हारे भाई की हत्या किसी और ने नहीं, उस के बचपन के दोस्त शैलेश प्रजापति व उस के साथी अर्श गुप्ता ने की है. वह तुम लोगों से फिरौती के 10 लाख रुपए वसूलना चाहते थे. लेकिन शैलेश की मां ने ही उस का भांडा फोड़ दिया और दोनों पकड़े गए.’’

यह जानकारी पा कर पवन व उस के घर वाले अवाक रह गए. क्योंकि वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि शैलेश ऐसा विश्वासघात कर सकता है. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हाउस हैलट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह शैलेश के उस कमरे में पहुंचे, जहां विनय का कत्ल किया गया था. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जहां घटनास्थल का निरीक्षण किया, वहीं फोरैंसिक टीम ने भी बेंजाडीन टेस्ट कर साक्ष्य जुटाए.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल बांका भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने मृतक के भाई पवन को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201 तथा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत शैलेश प्रजापति तथा अर्श गुप्ता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हें न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की सनसनीखेज घटना का खुलासा हुआ.

कानपुर शहर का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-बर्रा. इस क्षेत्र के बड़ा होने से इसे कई भागों में बांटा गया है. रामऔतार प्रभाकर अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के भाग 2 में मनोहरनगर में जानकी मंदिर के पास रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटे पवन कुमार, विनय कुमार तथा बेटी रीता कुमारी थी. रामऔतार प्रभाकर आर्डिनैंस फैक्ट्री में काम करते थे. किंतु अब रिटायर हो चुके थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

फैक्ट्री में रामऔतार प्रभाकर के साथ सोमनाथ प्रजापति काम करते थे. सोमनाथ भी बर्रा भाग 8 में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शीला देवी के अलावा एकलौता बेटा शैलेश था. सोमनाथ भी रिटायर हो चुके थे. सोमनाथ बीमार रहते थे. उन्हें सुनाई भी कम देता था और दिखाई भी. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. रामऔतार और सोमनाथ इस के पहले अर्मापुर स्थित फैक्ट्री की कालोनी में रहते थे. 3 साल पहले दोनों ने बर्रा क्षेत्र में जमीन खरीद ली थी और अपनेअपने मकान बना कर रहने लगे थे. मकान बदलने के बावजूद दोनों की दोस्ती में कमी नहीं आई थी. दोनों परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

रामऔतार का बेटा विनय और सोमनाथ का बेटा शैलेश बचपन के दोस्त थे. दोनों एकदूसरे के घर आतेजाते थे. विनय ने हाईस्कूल पास करने के बाद आईटीआई से मशीनिस्ट का कोर्स किया था. वह नौकरी की तलाश में था. जबकि शैलेश ड्राइवर बन गया था. वह बुकिंग की कार चलाता था.

शैलेश का एक अन्य दोस्त अर्श गुप्ता था. वह फरनीचर कारीगर था और गुजैनी गांव में रहता था. अर्श और शैलेश शराब के शौकीन थे. अकसर दोनों साथ पीते थे और लंबीलंबी डींग हांकते थे. उन दोनों ने विनय को भी शराब पीना सिखा दिया था. अब हर रविवार को शैलेश के घर शराब पार्टी होती थी. तीनों बारीबारी से पार्टी का खर्चा उठाते थे.

एक शाम खानेपीने के दौरान विनय ने शैलेश व अर्श को बताया कि उस की बहन रीता की शादी तय हो गई है. 27 अप्रैल को बारात आएगी. शादी में लगभग 10-12 लाख रुपया खर्च होगा. पिता व भाई ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. शैलेश व अर्श मामूली कमाने वाले युवक थे. वह शार्टकट से लखपति बनना चाहते थे. इस के लिए शैलेश उरई में पान मसाला का कारोबार करना चाहता था. उरई में वह जगह भी देख आया था. लेकिन कारोबार के लिए उस के पास पैसा नहीं था.

पैसा कहां से और कैसे आए, इस के लिए शैलेश और अर्श ने सिर से सिर जोड़ कर विचारविमर्श किया तो उन्हें विनय याद आया. विनय ने बताया था कि उस के यहां बहन की शादी है और घर वालों ने 10-12 लाख रुपए का इंतजाम किया है. दौलत की चाहत में शैलेश व अर्श ने दोस्त के साथ छल करने और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपया वसूलने की योजना बनाई. संजीत हत्याकांड दोनों के जेहन में था. उसी तर्ज पर उन दोनों ने विनय की हत्या कर के उस के घर वालों से फिरौती वसूलने की योजना बनाई.

योजना के तहत 19 मार्च, 2021 की रात पौने 8 बजे शैलेश ने अर्श के मोबाइल से विनय प्रभाकर के मोबाइल पर काल की और पार्टी के लिए घर बुलाया. विनय की 5 दिन पहले ही लोहिया फैक्ट्री में नौकरी लगी थी. फैक्ट्री से वह साढ़े 7 बजे घर लौटा था कि 15 मिनट बाद शैलेश का फोन आ गया. पार्टी की बात सुन कर वह शैलेश के घर जाने को राजी हो गया.

रात 8 बजे विनय अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से बर्रा भाग 8 स्थित शैलेश के घर पहुंच गया. उस समय कमरे में शैलेश व अर्श गुप्ता थे और पार्टी का पूरा इंतजाम था. इस के बाद तीनों ने मिल कर खूब शराब पी. विनय जब नशे में हो गया तो योजना के तहत अर्श व शैलेश ने उसे दबोच लिया और उस की पिटाई करने लगे. विनय ने जब खुद को जाल में फंसा देखा तो वह भी भिड़ गया. कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. इसी बीच शैलेश ने कमरे में छिपा कर रखा बांका निकाला और विनय की गरदन पर वार कर दिया. विनय का गला कट गया और वह फर्श पर गिर पड़ा.

इस के बाद अर्श ने विनय को दबोचा और शैलेश ने उस की गरदन पर 2-3 वार और किए. जिस से विनय की गरदन आधी से ज्यादा कट गई और उस की मौत हो गई. हत्या करने के बाद उन दोनों ने शव को तोड़मरोड़ कर चादर व कंबल में लपेटा और फिर विनय की मोटरसाइकिल पर रख कर रिंद नदी में फेंक आए. वापस लौटते समय उन की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया, इसलिए उन्होंने बाइक को खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ा कर दिया. फिर पैदल ही घर आ गए.

घर पर उन के स्वागत के लिए बर्रा पुलिस खड़ी थी, जिस से वे पकड़े गए. दरअसल, शैलेश की मां शीला ने ही कमरे में खून देख कर पुलिस को सूचना दी थी, जिस से पुलिस आ गई थी. 21 मार्च, 2021 को थाना बर्रा पुलिस ने आरोपी शैलेश प्रजापति व अर्श गुप्ता को  कोर्ट में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: जो सिर्फ दिमाग चलाते हैं

Hindi Crime Story: एक एनजीओ संचालक ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम बना कर बौलीवुड फिल्म ‘स्पैशल 26’ की तरह एक बिल्डर के यहां छापा मार कर 21 लाख रुपए और गहने जिस तरह ठगे, हैरान करने वाली बात है. लेकिन क्या वे पुलिस से बच पाए?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों पर रोज की तरह उस दिन भी वाहनों की आवाजाही लगी थी. रात के लगभग 9 बजे दिल्ली नंबर की एक चमचमाती सफेद रंग की एलैंट्रा कार नंबर- डीएल 3सी एक्यू 0504 सहारनपुर चौक से राजपुर की ओर चली जा रही थी. कार में 4 आदमी और 2 औरतें सवार थीं. सभी ने सफेद रंग की पैंट और कमीज पहन रखी थी.

कार कारगी चौक पहुंच एक किनारे खड़ी हो गई. कार के रुकते ही वहां पहले से खड़े 2 लोग उस के नजदीक आए तो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक उन से मुखातिब हुआ, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘यस, लाइन क्लियर है. बस आप लोगों का ही इंतजार था.’’ कह कर वे दोनों भी कार में सवार हो गए. इस के बाद कार फिर चल पड़ी तो कुछ देर में वह पौश इलाके सरकुलर रोड पर कोठी नंबर 92 के सामने जा कर रुकी.

यह कोठी बिल्डर यशपाल टंडन की थी. यशपाल प्रौपर्टी का काम करते थे. इस के अलावा बड़ीबड़ी कमेटियां भी डालते थे, जिस में लाखों रुपए का लेनदेन होता था.

यशपाल का अपना औफिस भी था, जिस में वह सुबह से शाम तक बैठते थे. कोई नहीं जानता था कि उस दिन यशपाल का वास्ता एक बड़ी मुसीबत से पड़ने वाला था. कार में बाद में सवार हुए दोनों लोगों को छोड़ कर बाकी सभी कार से नीचे उतरे. उन में से एक के हाथ में ब्रीफकेस था. कार से उतरे लोग कोठी के गेट पर जा कर खड़े हो गए. उन्होंने डोरबैल बजाई तो कुछ सेकैंड बाद दरवाजे पर यशपाल टंडन खुद आए. उन के दरवाजा खोलते सब से आगे खड़े एक आदमी ने पूछा, ‘‘आप यशपाल टंडन?’’

‘‘जी हां, लेकिन आप कौन?’’ उन्होंने पूछा तो उसी आदमी ने रौब जमाते हुए सख्त लहजे में कहा, ‘‘हम लोग प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से हैं. आइए अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’

टंडन सकपका गए. एकाएक उन की कुछ समझ में नहीं आया. आने वालों के तेवर उन्हें ठीक नहीं लग रहे थे. उन्होंने हकलाते हुए कहा, ‘‘ल…ल…लेकिन इस तरह.’’

‘‘कहा न, चलो अंदर चल कर बात करते हैं.’’ कहने के साथ ही टीम का नेतृत्व कर रहे उस आदमी ने साथियों से कहा, ‘‘दरवाजा बंद कर के इन्हें अंदर ले आइए और बाहर खड़े लोगोें से कहिए कि बिना इजाजत कोई अंदर न आने पाए.’’

हालात अचानक बदल गए थे. टंडन चुपचाप उन के साथ अंदर आ गए. ड्राइंगरूम में आते ही उन्होंने टंडन को सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘मि. टंडन, हमें तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है. हमें शिकायत मिली है कि तुम्हारे पास बहुत ब्लैकमनी है.’’

‘‘ऐसा तो कुछ भी नहीं है सर, जरूर आप को किसी ने गलत सूचना दी है.’’ टंडन ने सफाई देनी चाही तो टीम का नेतृत्व कर रहा आदमी बड़े ही आत्मविश्वास से बोला, ‘‘हमारी इन्फौरमेशन गलत नहीं है. हम तुम पर तभी से नजर रख रहे हैं, जब तुम्हारे दोस्त विजय मनचंदा के यहां आयकर का छापा पड़ा था, उस समय तुम खुद भी तो वहां मौजूद थे.’’

उस की इस बात पर यशपाल चौंके, क्योंकि उस अधिकारी ने जो कहा था, वह एकदम सही था. दरअसल 4 महीने पहले उन के दोस्त विजय मनचंदा के यहां जब आयकर विभाग ने छापा मारा था, तब वह भी वहां मौजूद थे. इतना ही नहीं, आयकर विभाग ने उन का पहचान पत्र ले कर उन्हें गवाह भी बना लिया था. वह घबरा गए. यह सब उन की पत्नी भी देखसुन रही थीं. वह भी घबरा गईं. टंडन और उन की पत्नी को सोफे पर एक तरह से बंधक बना कर बैठा दिया गया.

‘‘मि. टंडन, हमें कोऔपरेट कीजिए.’’ सामने बैठे आदमी ने कहा तो टीम में शामिल युवा लड़कियां टंडन दंपति के इर्दगिर्द खड़ी हो गईं, जबकि बाकी लोग कोठी की तलाशी लेने लगे. करीब आधा घंटे तक जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उन्होंने सेफ की चाबी ले कर सारा सामान उलटपलट दिया. इस जांचपड़ताल में उन के हाथ संपत्ति के कुछ कागजात, नकदी और गहने लगे.

उन्हें जो भी मिला, वह सब एक स्थान पर रखते गए. उन के बारे में तरहतरह के सवाल भी करते रहे. टीम का नेतृत्व कर रहे अधिकारी ने यशपाल को गहरी नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘इन सब का हिसाब देने तुम्हें कल औफिस आना होगा. तुम्हारे खिलाफ एफआईआर तो होगी ही, जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी भी हो सकती है.’’

यशपाल के तो होश उड़ गए. उन्हें परेशान देख कर अधिकारी ने कहा, ‘‘हमारे पास एक बीच का रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ डरेसहमे यशपाल टंडन ने पूछा तो राजदाराना अंदाज में वह बोला, ‘‘अगर हमें 50 लाख रुपए मिल जाएं तो तुम आगे की काररवाई से बच सकते हो.’’

इस काररवाई से दहशत में आए यशपाल सोच में पड़ गए. गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में उन्होंने कहा, ‘‘सर, मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है. कुछ कम हो जाए तो मैं कोशिश कर सकता हूं.’’

‘‘ठीक है, रकम कम करेंगे तो हम इन्हें अपने साथ ले जाएंगे.’’ उस ने गहनों की ओर इशारा कर के कहा.

यशपाल इजाजत ले कर सोफे से उठे और घर में रखे 6 लाख रुपए निकाल कर उन्हें दे दिए.

लेकिन छापा मारने वाली टीम ने उन्हें लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि इतने में बात नहीं बनेगी. इस के बाद टंडन ने फोन कर के अपने किसी परिचित व्यापारी से 10 लाख रुपए मंगा कर लिए. यह रकम लेने टंडन खुद दरवाजे तक गए थे. इतने पर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने अपने किसी अन्य परिचित से 5 लाख रुपए और मंगा कर दिए.

टीम का मुखिया इतने पर भी संतुष्ट नजर नहीं आया. उस ने सारी नकदी और आभूषण एक बैग में रख लिए. इस के बाद चलने लगा तो कहा, ‘‘थोड़ी देर के लिए अपनी स्कूटी देना.’’

टंडन ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, हमारा कर्मचारी आ कर उसे दे जाएगा.’’

करीब सवा 2 घंटे की काररवाई के बाद पूरी टीम चली गई.

यशपाल टंडन के यहां ईडी का यह छापा 2 नवंबर, 2015 की रात पड़ा था. इस छापे से वह काफी परेशान थे. उन्होंने अपने परिचितों को फोन कर के इस छापे की जानकारी दी तो बिना पुलिस के रात में छापा मारना और स्कूटी मांग कर ले जाने वाली बात से उन लोगों को यह सब संदिग्ध लगा. जब यह साफ हो गया कि आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रात में छापा नहीं मारता तो लगा कि उन के साथ कोई बड़ी गड़बड़ हुई है. परिचितों से सलाहमशविरा कर के यशपाल टंडन ने इस की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी.

फरजी ईडी टीम द्वारा छापे के बहाने लाखों रुपए ले जाने की घटना की सूचना पा कर थाना कोतवाली के प्रभारी एस.एस. बिष्ट और लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह पुलिस बल के साथ टंडन की कोठी पर पहुंच गए. अधिकारियों को भी सूचित कर दिया गया था. इस घटना से जिला पुलिस में हड़कंप मच गया था. एसपी (सिटी) अजय सिंह और सीओ मनोज कत्याल भी मौके पर पहुंच गए थे. सभी ने यशपाल से पूछताछ की तो उन्होंने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यशपाल टंडन को छापे के बहाने शातिराना अंदाज में ठगा गया है. प्रवर्तन निदेशालय के क्षेत्रीय प्रमुख पी.के. चौधरी ने भी स्पष्ट कर दिया कि उन की किसी टीम ने छापा नहीं डाला है.

यशपाल बुरी तरह हताश हो गए. ठग पूरी तैयारी के साथ आए थे और बड़ी चालाकी से उन्हें ठग कर चले गए थे. मामला बेहद गंभीर था. थाना कोतवाली में यशपाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध संख्या- 304/2015 पर भादंवि की धारा 595, 419, 420, 120 बी, 406 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते को भी इस घटना की सूचना मिल गई थी. वह काफी हैरान थे. इस की वजह यह थी कि यह फिल्मी स्टाइल में किया गया अपनी तरह का एक अलग अपराध था. उन्होंने एसपी (सिटी) अजय सिंह से सलाह कर के इस मामले के खुलासे के लिए एक टीम का गठन करने का आदेश दिया.

इस स्पैशल औपरेशन ग्रुप की संयुक्त टीम में थानाप्रभारी एस.एस. बिष्ट, लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह, एसआई दिलबर सिंह, एएसआई सर्वेश कुमार, कांस्टेबल अरविंद भट्ट, मनमोहन सिंह, कुलवीर, सत्येंद्र नेगी, प्रमोद, गंभीर सिंह और महिला कांस्टेबल रजनी कोहली तथा सुमन को शामिल किया गया. इस का नेतृत्व खुद एसपी (सिटी) अजय सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम तुरंत अपने काम में लग गई. यशपाल टंडन से हुई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक्सपर्ट से एक आरोपी का स्कैच भी बनवा कर जारी कर दिया.

यशपाल ने कार का जो नंबर बताया था, पुलिस ने अगले दिन उस की जांच की तो वह पंजाब प्रांत की किसी मोटरसाइकिल का निकला. 2 बातें स्पष्ट होती थीं, एक तो यह कि यशपाल को ठीक से नंबर याद नहीं था या फिर कार में फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया गया था. यशपाल की स्कूटी पुलिस ने उसी दिन कारगी चौक से लावारिस अवस्था में खड़ी बरामद कर ली थी. उन की कोठी के बाहर बाईं ओर एसजीआरआर स्कूल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग चैक की, लेकिन उस से कार का नंबर पकड़ में नहीं आ सका.

राजधानी के मुख्य चौराहों पर भी सुरक्षा की दृष्टि से हाई डैफिनेशन कैमरे लगे हैं. पुलिस ने रात 9 से साढ़े 11 बजे तक की उन की फुटेज बारीकी से चैक की तो आशारोड़ी क्षेत्र के कैमरे में वह कार दिख गई, जिस में सवार हो कर कथित ईडी टीम के सदस्य आए थे. इस में कार का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. इस तरह पुलिस को नंबर मिल गया. अब तक कई दिन बीत चुके थे. चूंकि नंबर दिल्ली का था, इसलिए एसआई राकेश शाह के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली भेज दी गई.

दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने आरटीओ औफिस से कार के मालिक के बारे पता किया. पुलिस आरटीओ औफिस से मिले पते पर पहुंची तो वहां जो मिला, पता चला उस ने कार बेच दी थी. जिस व्यक्ति को उस ने कार बेची थी, पुलिस उस के पास पहुंची तो वहां भी निराश होना पड़ा, क्योंकि उस ने भी किसी अन्य को कार बेच दी थी. पुलिस टीम दिल्ली में ही डेरा डाले थी. कार आदर्शनगर निवासी पुष्पा को बेची गई थी. पुलिस खोजबीन करते हुए पुष्पा के यहां पहुंची तो उस ने बताया कि उस की कार को एक एनजीओ संचालक प्रदीप सिंह मांग कर ले गया था.

प्रदीप के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि वह अपने भाई बबलू और कुछ अन्य साथियों के साथ जहांगीरपुरी में एक औफिस खोल कर एनजीओ चलाता है. उस के यहां स्टाफ भी था. पुलिस ने पूछताछ कर के उस के बारे में जानकारी इकट्ठा कर ली. पुलिस को कार पुष्पा के यहां मिल गई थी. पुलिस को जो सुराग मिले थे, वे काम के थे. 25 नवंबर को पुलिस टीम जहांगीरपुरी स्थित फ्लैट नंबर डी 268 पर पहुंची. फ्लैट में औफिस चल रहा था. पुलिस को वहां प्रदीप तो नहीं मिला, उस के यहां काम करने वाली 2 लड़कियां मिल गईं.

ईडी के छापे में चूंकि 2 लड़कियां भी शामिल थीं, इसलिए पुलिस ने उन्हें शक के दायरे में रख कर पूछताछ शुरू कर दी. उन लड़कियों में एक श्रद्धानंद कालोनी निवासी बेबी पुत्री वीरेंद्र और दूसरी राखी पुत्री कल्लू थीं. दोनों बेहद साधारण परिवारों से थीं. वे दोनों कई महीने से इस एनजीओ में काम कर रही थीं. पुलिस ने उन से घुमाफिरा कर सवाल किए तो वे जवाब देने में उलझ गईं. उन्होंने जो सच बताया, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस फरजी छापे की योजना किस ने तैयार की थी, यह तो वे नहीं जानती थीं, लेकिन प्रदीप के साथ छापे में वे भी गई थीं. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर देहरादून आ गई. पुलिस प्रदीप के जहांगीरपुरी स्थित एमसीडी में फ्लैट नंबर 306 पर भी गई थी, लेकिन वहां ताला लगा था.

पुलिस ने दोनों लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 2 नवंबर को प्रदीप छापा मारने की बात कह कर उन्हें अपने साथ ले गया था. उस के साथ उस का भाई बबलू और 2 दोस्त भी थे, जबकि 2 लोग उन्हें देहरादून में मिले थे. बेबी और राखी प्रदीप एवं बबलू के अलावा किसी और को नहीं पहचानती थीं. पुलिस ने यशपाल टंडन से लड़कियों का आमनासामना कराया तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया. लड़कियों ने हैरान करने वाली बात यह बताई कि प्रदीप ने यह छापा फिल्म ‘स्पैशल-26’ की स्टाइल में मारा था. इस के लिए उस ने खुद तो रिहर्सल किया ही था, उन्हें भी रिहर्सल कराया था. उन्हें कई बार फिल्म भी दिखाई थी.

टीम असली लगे, इस के लिए उन्होंने सफेद रंग के कपड़े सिलवाए थे. अपनी बनाई योजना के अनुसार वे छापा मार कर चले गए थे. प्रदीप के पास ही पूरी रकम थी. छापा मारने के पहले जो 2 लोग देहरादून में मिले थे, वे देहरादून में ही रह गए थे. लड़कियों ने बताया था कि यशपाल टंडन ने टीम को पूरा सहयोग दिया था. उन्होंने खुद ही बताया था कि अमुकअमुक स्थान पर तलाशी लें. इस से यशपाल की भूमिका भी संदिग्ध हो गई थी.

यशपाल कमेटी डलवाते थे. हो सकता था कि घाटा दिखाने के लिए उन्होंने ही यह योजना बनाई हो. इस मुद्दे पर उन से भी पूछताछ की गई, लेकिन इस में उन का कोई हाथ नहीं निकला. अलबत्ता लड़कियों और उन के बयानों में थोड़ा विरोधाभास जरूर बना रहा. अभी मामले का खुलासा पूरी तरह नहीं हो सका था. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 26 नवंबर को अपने औफिस में प्रेसवार्ता कर के इस फरजी छापे का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने दोनों लड़कियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि वारदात में स्थानीय लोगों का भी हाथ जरूर था. पुलिस टीम प्रदीप की तलाश में जुटी थी, लेकिन अगले कई दिनों तक वह हाथ नहीं आया. पुलिस प्रदीप और उस के भाई के मोबाइल नंबरों की जांच कर रही थी. लेकिन वे बंद हो चुके थे. पुलिस हर सूरत में पूरे मामले का परदाफाश करना चाहती थी. एसपी (सिटी) अजय सिंह समयसमय पर टीम के काम की समीक्षा करते रहते थे. देखते ही देखते घटना को घटे डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन आरोपियों का कोई सुराग नहीं मिला. कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ लग जाए, इस के लिए पुलिस ने जेल में बंद राखी और बेबी से दोबारा पूछताछ की.

पुलिस आरोपियों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स पर भी काम कर रही थी. इस से कडि़यां जुड़ती चली गईं. इस कड़ी में एक नाम धर्मपाल भाटिया का सामने आया. धर्मपाल हरियाणा के जिला करनाल के हांसी रोड पर रहता था. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई और उस से पूछताछ के आधार पर देहरादून के थाना क्लेमन टाउन के गोकुल एन्कलैव में रहने वाले दीपक मनचंदा को भी 4 जनवरी, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दोनों से पूछताछ की. इन से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि यह पूरी योजना एक महिला द्वारा तैयार की गई थी तो हैरानी बढ़ गई. सभी लोगों ने योजना बना कर जिस तरह फिल्मी अंदाज में छापा मारा था, पुलिस उलझ कर रह गई थी. ठगी का शिकार हुए यशपाल टंडन का उन का अपना कलैक्शन एजेंट ही उन्हें दगा दे गया था. दरअसल, दीपक मनचंदा यशपाल के दोस्त विजय मनचंदा का भतीजा था. इसी नाते उन्होंने भरोसा कर के उसे अपने यहां कमेटी का पैसा जुटाने और अन्य कामों के लिए रख लिया था. दीपक ने खूब मेहनत कर के काम किया, जिस से यशपाल टंडन को उस पर पूरा भरोसा हो गया. वह उस के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करने लगे.

जरूरी नहीं कि इंसान जैसा दिखता है, ठीक वैसा हो ही. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह बुरी आदतों का शिकार था. उन में एक आदत अनापशनाप खर्च करना भी थी. यशपाल के लिए वह मोटी रकम इकट्ठा करता था. धीरेधीरे उस ने उन से 5 लाख रुपए उधार ले लिए. जब रुपए लौटाने की बात आई तो वह परेशान रहने लगा. दीपक मूलरूप से करनाल का ही रहने वाला था और कुछ सालों पहले ही देहरादून आया था. उस की जानपहचान धर्मपाल भाटिया और उस की पत्नी निशा उर्फ रेखा से थी. निशा तेजतर्रार महिला थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपनी परेशानी दोनों को बताने के साथ यह भी बताया कि उस का मालिक काफी दौलतमंद आदमी है.

‘‘तुम उसी से पैसा क्यों नहीं कमाते?’’ निशा ने रहस्यमय अंदाज में कहा.

‘‘वह कैसे?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘इस की तरकीब मैं तुम्हें बताऊंगी.’’ निशा ने कहा.

आश्वासन मिलने पर दीपक को थोड़ी राहत मिल गई. जहांगीरपुरी में रहने वाले प्रदीप और बबलू निशा के भाई थे. दोनों काफी शातिर थे. वे एनजीओ की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करते थे. निशा और धर्मपाल ने इस मुद्दे पर उन से बात की तो काफी सोचविचार कर उन्होंने फिल्म ‘स्पैशल 26’ की स्टाइल में यशपाल टंडन को लूटने की सोची.

इस के बाद उन्होंने दीपक से बात की तो उस ने यशपाल के बारे में सब कुछ बता दिया. उस ने यह भी बताया कि यशपाल चूंकि कमेटी के साथ ब्याज पर भी रुपए देने का काम करते हैं, इसलिए उन के पास बिना हिसाबकिताब की मोटी रकम होती है. प्रदीप और निशा को वह सौफ्ट टारगेट लगे. प्रदीप स्मार्ट युवक था और अधिकारियों वाले अंदाज में रहता था.

सभी ने मिल कर यशपाल को प्रवर्तन निदेशालय के फरजी छापे के जरिए अपना शिकार बनाने का फैसला किया. प्रदीप ने इस योजना  में अपने एक दोस्त पंकज तिवारी, भांजे रमन और एनजीओ में काम करने वाली बेबी और राखी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया. प्रदीप, उस का भाई, दोस्त, भांजा और दोनों लड़कियों ने कई बार ‘स्पैशल 26’ फिल्म देखी. प्रदीप को अधिकारी की भूमिका में रहना था, जबकि बाकी को टीम के सदस्य के रूप में. योजना बन गई तो तय दिन 2 नवंबर के एक दिन पहले ही धर्मपाल दीपक के पास देहरादून पहुंच गया.

अगले दिन प्रदीप ने बहाने से पुष्पा की कार मांगी और बबलू, पंकज, रमन, बेबी और राखी के साथ शाम को दिल्ली से चल कर करीब 8 बजे देहरादून पहुंच गया. यशपाल और दीपक तय योजना के तहत उन्हें रास्ते में मिल गए. सभी लोग यशपाल की कोठी पर पहुंचे. चूंकि यशपाल दीपक को पहचानते थे, इसलिए वह धर्मपाल के साथ बाहर कार ही में रुक गया. यशपाल को उन के फरजी ईडी होने का शक न हो, इस के लिए प्रदीप ने उन्हें उन के दोस्त के यहां पूर्व में पड़े आयकर विभाग के छापे का जिक्र किया. यह बात दीपक उसे पहले ही बता चुका था. उन्होंने बेहद शातिराना अंदाज में 21 लाख कैश और गहने ठग लिए. जातेजाते वे स्कूटी भी ले गए, जिसे उन्होंने कारगी चौक पर छोड़ दिया.

इस के बाद दीपक अपने घर चला गया. धर्मपाल करनाल और बाकी लोग दिल्ली. प्रदीप ने कहा कि वह माल का बंटवारा बाद में करेगा. लेकिन वह सभी से शातिर निकला और अपने भाई के साथ पूरी रकम ले कर फरार हो गया. उस ने सिर्फ बेबी और राखी को 6 हजार रुपए खर्च के लिए दिए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपियों का सामना यशपाल टंडन से कराया. वह अपने दोस्त के भतीजे द्वारा दी गई दगा से आहत थे. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 5 जनवरी, 2016 को आरोपियों को मीडिया के सामने पेश कर के केस का खुलासा किया और पुलिस टीम को ढाई हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.

पुलिस ने बाद में गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक जेल गए आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी अन्य आरोपी निशा उर्फ रेखा, प्रदीप, बबलू, पंकज और रमन की तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित