Suspense Story Hindi: चाय की तरह – खून पीने वाले ड्रैकुला

Suspense Story Hindi: ड्रैकुला, पिशाच अथवा चुड़ैल जैसे शब्दों की अवधारणा सदियों से चली आ रही है. कहानियों के माध्यम से ये शब्द लोगों के मन में दहशत भी पैदा करते रहे हैं. लेकिन हकीकत में डै्रकुला, पिशाच या चुडै़ल जैसा कुछ नहीं होता. वैसे मानवीय खून पीने वाले ड्रैकुला आज भी इंसानों के बीच मौजूद हैं.

अगर आप मानते हैं कि इंसानी खून पीने वाले ड्रैकुला महज किस्सेकहानियों का हिस्सा हैं तोआप गलतफहमी में हैं. क्योंकि दुनिया में 1-2 नहीं बल्कि 20 लाख से ज्यादा चलतेफिरते ऐसे जिंदा लोग हैं, जो रोज या अकसर चाय या काफी की तरह इंसानी खून पीते हैं. जिस तरह तमाम लोगों को शराब, स्मैक या अफीम की लत होती है, वैसे ही इन्हें रोजाना खून पीने की लत होती है. इन की सब से मुखर मौजूदगी उस अमेरिका में ही है जो आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक सोच का गढ़ माना जाता है.

खून पीने वाले ये बिलकुल आम लोग हैं. इन में कोई क्लर्क है तो कोई बेकरी वाला तो कोई इमीग्रेशन महकमे का अधिकारी है तो कोई नर्स. कोई किसी स्कूल में कविताएं पढ़ाने वाली अध्यापिका है तो कोई मसाज करने वाली या कालगर्ल. यहां तक कि नियमित खून पीने वाले इन पिशाचों में पूरे रस्मोरिवाज से धार्मिक अनुष्ठान कराने वाला किसी धर्म का कोई व्यक्ति भी हो सकता है.

एक और हैरान करने वाली बात यह है कि न केवल दुनिया में नियमित खून पीने वाले लोग मौजूद हैं, बल्कि नियमित रूप से खून पिलाने वाले लोग भी मौजूद हैं. खून पिलाने वाले लोग भी बिलकुल हमारे आप के जैसे आम लोग ही हैं. दुनिया भर की तमाम कहानियों में भले ही ड्रैकुला, पिशाच या चुड़ैलें लोगों को मार कर उन का खून पीते हों, लेकिन हकीकत से इस का कुछ लेनादेना नहीं है. स्थिति यह है कि अब तो ज्यादातर ड्रैकुलाओं को सहमति से खून पिलाने वाले उपलब्ध हैं. यह बात खून पीने और पिलाने वाले की आपसी रजामंदी से तय होती है कि खून शरीर में से सीधे चीरा लगा कर पीया जाएगा या फिर सक्शन पाइप से गिलास में निकाल कर सिप करते हुए पीया जाएगा.

बीबीसी फ्यूचर के लिए इस विषय पर एक रिसर्च लेख लिखने वाले डेविड राबसन कहते हैं, ‘‘एक दिन अमेरिका के न्यू आरलींस के फ्रेंच क्वार्टर इलाके में मैं ने पाया कि जान एडगर ब्राउनिंग के ‘रक्तदान’ का एक खास सत्र शुरू होने वाला था. इसे चिकित्सीय अंदाज में शुरू किया गया. उन के एक जानकार ने एल्कोहल से उन की पीठ का एक हिस्सा साफ किया. फिर उन की पीठ पर डिस्पोजेबल छुरी से एक कट लगाया, जिस से शरीर से खून निकलने लगा. फिर उस ने उस निकलते खून को पीना शुरू कर दिया. इस तथाकथित ड्रैकुला ने ब्राउनिंग का थोड़ा सा खून पीने के बाद, खून पीना बंद कर दिया. उस ने उन के शरीर को फिर एल्कोहल से साफ किया और कटी हुई जगह पर पट्टी लगा दी.

क्योंकि पीने वाले के मुताबिक ब्राउनिंग के खून में मैटेलिक तत्वों की मात्रा कम थी, जिस से वह उस के टेस्ट के मुताबिक नहीं था. कह सकते हैं कि ड्रैकुला यूं ही किसी का खून नहीं पी लेते, वह खून उन के टेस्ट के अनुरूप भी होना चाहिए.’’

वास्तव में हर किसी के खून का स्वाद उस के खानपान, शरीर में पानी की मात्रा और ब्लडग्रुप से तय होता है. दरअसल, ब्राउनिंग, लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर हैं. वह न्यूआरलींस रियल वैंपायर समुदाय पर हो रहे शोध से जुड़े हैं. अमेरिका में ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें खून पीने की लत है. पहले ब्राउनिंग मानते थे कि ब्लड फीडिंग महज एक तरह की तांत्रिक गतिविधि या कोई धार्मिक कर्मकांड है. लेकिन तब तक वह उन लोगों से नहीं मिले थे, जो सीधे किसी इंसान के शरीर से उस का खून पीते हैं. ऐसे में जब उन्होंने ब्लड फीडिंग के लिए खुद को डोनर के तौर पर पेश किया तो उन का नजरिया ही बदल गया.

यहां यह बता देना भी जरूरी है कि खून पीने वाले लोगों में से ज्यादातर का अलौकिक शक्तियों पर कोई भरोसा नहीं होता. कहने का मतलब यह कि ये लोग अपनी खुद की इच्छा के लिए खून पीते हैं. फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे लोग एक खास तरह की मन:स्थिति के शिकार होते हैं. क्योंकि नियमित रूप से खून पीने वाले लोगों को अगर कभी खून नहीं मिलता या मिलने में देर हो रही होती है तो इन की हालत बड़ी विचित्र हो जाती है. ये थकान, सिरदर्द और असहनीय पेट दर्द का शिकार होने लगते हैं. दरअसल खून पीते वक्त इन के दिलोदिमाग में पूरी ताकत से यह बात बैठी होती है कि उन्हें केवल इंसानों का खून पीने से ही राहत मिल सकती है.

दुनिया में मौजूद जीवित ड्रैकुलाओं का किस्से कहानियों के ड्रैकुलाओं से कोई संबंध नहीं है. वर्तमान में पूरी दुनिया में इंसानी रक्त पीने वाले जो लोग मौजूद हैं, वे वितृष्णाओं और विकृतियों की देन हैं. ऐसे लोगों ने आधुनिक वैज्ञानिक विकास को भी बहुत होशियारी से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है. मसलन इंटरनेट से पहले के जमाने में ये लोग जहां अलगथलग पड़े हुए थे, वहीं आज इन लोगों के समूहों ने अपनी वेबसाइटें बना रखी हैं. वेब पन्ने बना रखे हैं. इन लोगों का नेटवर्क भी खासा विकसित है. इंसानी खून पीने के अपने अलगअलग तरीकों और अलगअलग तरह की आदतों की वजह से इन के कई रूप हैं.

मसलन खून पीने वाली नर्सें, बार स्टाफ, सेके्रटरी या फिर ऐसे ही कई अन्य पेशेवर लोग सामान्य नौकरियां करते हैं. दूसरी तरफ सेठ ड्रैकुला जो बहुत रईस हैं, जो अपने लिए हर दिन पसंदीदा किस्म के खून का इंतजाम करते हैं. खून पीने वाले पिशाचों या ड्रैकुलाओं में जहां कुछ शर्मीले स्वभाव के होते हैं, वहीं कई धार्मिक किस्म के होते हैं, जिन का संबंध अलगअलग धर्मों से होता है. ऐसे लोग अपना जीवन पूरे धार्मिक भाव से ईमानदारी के साथ गुजारते हैं. कई लोग हर रोज उसी तरह शाम को खून पीते हैं, जैसे कई दूसरे लोग शाम को शराब पीते हैं.

कइयों के बारे में किसी को पता भी नहीं चलता कि वे किसी ब्लड बैंक से चुपचाप ब्लड खरीदते हैं और आराम से घर बैठ कर पीते हैं. कई लोग खून को चाय में मिला कर पीते हैं तो कई इसे विभिन्न किस्म की जड़ीबूटियों के साथ पीते हैं. कई लोग ऐसे भी हैं, जो इंसान के साथसाथ कभीकभार जानवर का खून भी पी लेते हैं. खासकर तब जब इंसान का खून उपलब्ध नहीं हो पाता. कई ऐसे लोग भी होते हैं, जो बहुत परोपकारी होते हैं. खून पीने वाले आज के ड्रैकुला माइथोलौजी की कथाओं की तरह न तो कब्रिस्तान जाते हैं और न वहां रहते हैं, बल्कि नाइट क्लब जाते हैं.

कई नाइट क्लबों में भी चुपचाप खून परोसा जाता है. ब्राउनिंग जैसे शोधकर्ताओं  ने पाया कि ऐसे कई ‘वैंपायर’ भी होते हैं, जिन के लिए खून पीना एक मनोवैज्ञानिक जरूरत बन जाती है. अपने शोध के दौरान ब्राउनिंग की एक ऐसे किशोर से मुलाकात हुई, जो मुश्किल से 13-14 साल का था. उस ने ब्राउनिंग को बताया कि वह हमेशा कमजोर महसूस करता था, दोस्तों के साथ खेलते हुए थक जाता था. एक दिन उस का अपने किसी दोस्त से झगड़ा हो गया.

इस झगड़े में उस के दोस्त को चोट लग गई, खून बहने लगा और उसी दौरान वह खून उस के मुंह, दांतों में लग गया, जिस से उसे लगा कि अचानक उस के अंदर ताकत आ गई है. खून के स्वाद ने खून की भूख बढ़ा दी. अब वह नियमित खून पीता है. किसी शराबी की तरह जब तक वह खून नहीं पीता, उस के शरीर में वह स्फूर्ति नहीं आती. कुल मिला कर यह विकृति एक मनोवैज्ञानिक नशा ही है. मिलिए ब्लट से. 28 साल की ब्लट कैटशेन ड्रैकुलाओं को अपना खून पिलाती हैं. मगर यह ऐसा नहीं कहतीं. यह खुद को एक ब्लड डोनर बताती हैं. ब्लट अमेरिका के मैक्सिको प्रांत के लूसियाना शहर में रहती हैं. वह हमारे आप के जैसी ही बिलकुल सामान्य महिला हैं. भिखारियों के प्रति दयालु, बच्चों से प्यार करने वाली सभ्य महिला, अपने से बड़ों की इज्जत करने वाली.

कहने का मतलब बिलकुल सामान्य और खुशमिजाज. लेकिन वह टेक्सास में रहने वाले अपने एक वैंपायर दोस्त के घर भी जाती रहती हैं, ताकि उसे अपना खून पिला सकें. माइकल वैकमील नाम का उन का यह दोस्त नियमित रूप से उन का खून पीता है. यह जानने की इच्छा स्वाभाविक है कि आखिर अलगअलग वैंपायरों को ब्लट अपना खून कैसे पिलाती होंगी? पीठ से निकाल कर या वह कहती होंगी कि सीधे चीरा लगा कर वह खून पी लें. हकीकत यह है कि ब्लट दोनों ही तरह से खून पिलाती हैं.

कई बार खून पीने के लिए वैंपायर उन की पीठ पर कट लगाते हैं. इस के बाद सीधे मुंह लगा कर खून पी लेते हैं तो कई बार पहले सक्शन कप की मदद से खून शरीर से निकाला जाता है, फिर आसानी से बातचीत करते हुए पीया जाता है. खून किस तरीके से पीया जाना है, यह दोनों की रजामंदी से तय होता है. Suspense Story Hindi

लेखक – निनाद गौतम    

 

Family Dispute: भाभी के लिए भाई बना दुश्मन

Family Dispute: निठल्ले अंग्रेज सिंह की नीयत अपनी खूबसूरत भाभी पर ही नहीं, भाई की दौलत पर भी खराब थी. यह सब पाने के लिए उस ने दोस्तों की सलाह पर जो किया, वह किसी भी कीमत पर उचित नहीं था.  सखेतों का काम निपटा कर सुखविंदर सिंह ने दोपहर का खाना खाने के लिए घर जाने से पहले जानवरों के कमरे में जा कर उन का चारा वगैरह देख लिया था. पूरी तरह संतुष्ट हो कर वह घर के लिए चल पड़ा. उस के खेतों से कुछ दूरी पर कुलदीप सिंह के खेत थे. उस के आगे लखविंदर और जसबीर के खेत थे.

चूंकि कुलदीप दूर के रिश्ते में उस का भाई लगता था और गांव जाने का रास्ता उस के खेतों से था, इसलिए उस ने सोचा कि वह उस से भी पूछ ले कि अगर वह भी घर चल रहा है तो दोनों साथसाथ बातचीत करते चले जाएंगे. यही सोच कर सुखविंदर खेतों में बने कुलदीप के नलकूप वाले कमरे की ओर बढ़ा. जैसे ही वह नलकूप की टंकी के पास पहुंचा, उस के पैर जहां थे, वहीं रुक गए. उस का शरीर कांप उठा और मारे डर के उस का चेहरा पीला पड़ गया. एकाएक उस के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली.

नलकूप वाले कमरे के दरवाजे के ठीक बीचोबीच कुलदीप सिंह की लहूलुहान लाश पड़ी थी. उस के सिर, पेट और शरीर के अन्य अंगों से खून अभी भी रिस रहा था. कुलदीप को उस हालत में देख कर सुखविंदर घबरा गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह तेजी से गांव की ओर भागा. गांव पहुंच कर सीधे वह कुलदीप के घर पहुंचा और एक ही सांस में उस की पत्नी करमजीत कौर को पूरी बात बता दी. संयोग से उस समय करमजीत कौर का भाई रछपाल सिंह भी बहन से मिलने आया था. सुखविंदर की बात सुन कर करमजीत कौर भाई रछपाल, सुखविंदर और गांव के कुछ अन्य लोगों के साथ खेतों की ओर भागी.

नलकूप पर इन लोगों ने जो देखा, सब की सांसें अटक गईं. करमजीत तो दहाड़ मार कर पति के ऊपर गिर पड़ी. कुछ लोगों ने कुलदीप की नाड़ी देखी तो पता चला कि वह मर चुका है. तुरंत इस बात की जानकारी पुलिस को दी गई. यह घटना 9 सितंबर, 2015 की है. हत्या की सूचना मिलते ही थाना सुलतानपुर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह, एसआई जसप्रीत सिंह, एएसआई लखविंदर सिंह, हैडकांस्टेबल जसविंदर सिंह, वतन सिंह, सुखदेव सिंह और कमलजीत सिंह के साथ गांव माछीछोआ पहुंच गए. अब तक वहां लगभग पूरा गांव जमा हो चुका था.

हत्या की सूचना मिलने के तुरंत बाद हरप्रीत सिंह ने घटना की सूचना एसपी (डी) जगजीत सिंह सरोआ के साथसाथ क्राइम टीम को भी दे दी थी. इसलिए उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते क्राइम टीम भी पहुंच गई थी. हरप्रीत सिंह ने लाश का गहराई से निरीक्षण किया तो मृतक के सिर और पेट पर चोटों के गंभीर निशान नजर आए. शायद वे किसी तेजधार हथियार से किए गए थे. यही गंभीर चोटें मौत का कारण बनी थीं. उन्होंने आसपास का भी निरीक्षण किया कि शायद कोई ऐसी चीज मिल जाए, जिस की मदद से जांच आगे बढ़ सके.

बहरहाल, क्राइम टीम को जो सबूत मिले, उन्हें कब्जे में ले लिए तो हरप्रीत सिंह ने अन्य औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाना लौट कर उन्होंने मृतक की पत्नी करमजीत कौर की ओर से कुलदीप सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर दिया. इस के बाद इस अंधे कत्ल के खुलासे के लिए एसएसपी राजेंद्र सिंह ने सीआईए स्टाफ की एक टीम गठित कर दी.

काफी प्रयास के बाद भी पता नहीं चला कि कुलदीप की हत्या किस ने और क्यों की थी? पहले पुलिस ने इस हत्या को अवैध संबंधों से जोड़ कर देखा और अपने कुछ मुखबिरों को करमजीत कौर पर नजर रखने के लिए लगा दिया. मृतक कुलदीप की भी कुंडली खंगाली गई. पुलिस को संदेह था कि अवैध संबंधों में रोड़ा बनने की वजह से करमजीत कौर ने ही पति को मरवा दिया होगा. इस बात पर भी गौर किया जा रहा था कि कहीं कुलदीप के ही किसी से नाजायज संबंध न रहे हों और उस के घर वालों ने कुलदीप को रास्ते से हटा दिया हो.

थाना सुलतानपुर लोधी पंजाब के जिला कपूरथला के अंतर्गत आता है. इसी थाने का एक गांव है माछोछीआ, जिस में सरदार समुंद्र सिंह परिवार के साथ रहते थे. उन के पास काफी उपजाऊ जमीन थी, गांव में पक्का मकान था. खेतों से इतनी पैदावार हो जाती थी कि साल का खर्च निकालने के बाद भी उन के पास काफी कुछ बच जाता था, जिस में से गुरु का आदेश ‘वंड छक्को’ मान कर काफी पैसा वह गरीबों और जरूरतमंदों को दे देते थे. कुल मिला कर समुंद्र सिंह अपने नाम की ही तरह नेकदिल और दरियादिल थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे थे. बड़ा कुलदीप सिंह, उस से छोटा अंग्रेज सिंह और सब से छोटा रणजीत सिंह.

रणजीत सिंह थोड़ा मंदबुद्धि था. जबकि अंग्रेज सिंह काफी चालाक और शातिरदिमाग था. वह जिस तरह का दिखाई देता था, उस तरह का था नहीं. बड़ा कुलदीप सिंह पिता की ही तरह धार्मिक सोच वाला सीधासादा नेक इंसान था. दूसरों और जरूरतमंदों के काम आना उसे अच्छा लगता था. उस की व्यवहार कुशलता और स्वभाव की वजह से गांव में उस की बड़ी इज्जत थी. सभी उस से प्यार भी करते थे. जबकि उस के छोटे अंग्रेज सिंह को गांव का कोई भी आदमी पसंद नहीं करता था. तीनों भाई अपने पुश्तैनी मकान में एक साथ रहते थे.

हरप्रीत सिंह ने मृतक की पत्नी करमजीत कौर और गांव वालों से पूछाताछ की. सब का यही कहना था कि कुलदीप की किसी से न कोई दुश्मनी थी और न अदावत. वह सब के काम आने वाला इंसान था. लोग उस की बहुत इज्जत करते थे. मुखबिरों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मृतक और उस की पत्नी करमजीत कौर का चरित्र एकदम पाकसाफ था. ना तो मृतक के किसी औरत से नाजायज संबंध थे और न ही करमजीत कौर की किसी अन्य मर्द से बोलचाल थी. कुलदीप पूरा दिन अपने खेतों में व्यस्त रहता था. फालतू बातों के लिए पतिपत्नी के पास जरा भी समय नहीं था. मुखबिरों ने यह भी बताया था कि यह काम किसी बाहरी आदमी ने किया है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के रिश्तेदारों तथा अगलबगल के गांव वालों से भी पूछताछ की. लेकिन इस का भी कुछ नतीजा नहीं निकला. हर किसी ने मृतक की तारीफ ही की. किसी ने उस के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा. जब इस मामले की जांच आगे नहीं बढ़ सकी तो एसएसपी राजेंद्र कुमार ने तीन टीमें बना कर जांच में लगा दीं. थानाप्रभारी हरप्रीत सिंह ने इस मामले को चुनौती के रूप में लिया. उन्हें लगता था कि कहीं कोई ऐसी बात है, जो उन की नजरों के सामने नहीं आ रही है.

हरप्रीत सिंह ने मृतक के छोटे भाई अंग्रेज सिंह को बुला कर पूछाताछ की तो उस के बयानों में तमाम बातें विरोधाभासी मिलीं. वह किसी भी सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहा था. वह हर बात को घुमाफिरा कर ही कहता था. पूछताछ के बाद उन्होंने उसे जाने तो दिया, लेकिन उस पर नजर रखने के लिए अपने कुछ चालाक मुखबिरों को लगा दिया. 2 दिनों बाद ही मुखबिरों ने अंग्रेज सिंह के बारे में जो सूचनाएं दीं, उसे सुन कर हरप्रीत सिंह को लगा कि अब हत्यारे उन की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं हैं.

हरप्रीत सिंह अंग्रेज सिंह को पकड़ कर थाने ले आए और सख्ती से पूछताछ शुरु कर दी. हर अपराधी की तरह अंग्रेज सिंह भी खुद को निर्दोष बताता रहा. लेकिन हरप्रीत सिंह के पास जो सबूत थे, उन्हें सामने रख कर जब पूछताछ की तो वह टूट गया और उस ने भाई की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने कहा कि उसी ने अपने दोस्तों, बगीचा सिंह पुत्र निम्मा सिंह निवासी गांव थेहवाला, जसवंत सिंह पुत्र गुरबचन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, राजू पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव हुसैनपुर दुल्लेवाला, परविंदर सिंह पुत्र दर्शन सिंह निवासी गांव मुहालम, जिला फिरोजपुर तथा चरणजीत सिंह पुत्र सुच्चा सिंह निवासी गांव थेहवाला के साथ मिल कर भाई की हत्या की थी.

इस के लिए उस ने अपने इन दोस्तों को 2 लाख रुपए देने का वादा किया था, जिस में से एक लाख रुपए उस ने किसी से उधार ले कर दे भी दिए थे. उसी दिन हरप्रीत सिंह ने इस हत्या में शामिल लोगों के घरों पर छापे मारे, जिस में से बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पकड़ लिए गए. बाकी के 3 लोग फरार होने में सफल रहे. शायद उन्हें पुलिस की काररवाई की भनक लग गई थी. गिरफ्तार किए गए तीनों अभियुक्तों से पूछताछ में कुलदीप सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह हीनभावना से ग्रस्त एक ईर्ष्यालु भाई की घृणित मानसिकता का परिणाम था. कुलदीप सिंह और उस के छोटे भाई अंग्रेज सिंह की सोच में जमीनआसमान का अंतर था.

कुलदीप सिंह जहां धार्मिक सोच वाला दयालु आदमी था, वहीं अंग्रेज सिंह शैतानी सोच वाला ईर्ष्यालु आदमी था. तीसरा भाई रणजीत सिंह मंदबुद्धि था, इसलिए उसे परिवार की किसी चीज से कोई मतलब नहीं था. उस का ज्यादातर समय गुरुद्वारा में बीतता था. गांव वाले अकसर कुलदीप सिंह की बड़ाई किया करते थे. यह बात अंग्रेज को बिलकुल नहीं भाती थी. गांव में कोई समारोह होता तो कुलदीप सिंह को उस में सब से आगे रखा जाता. यह सब देख कर अंग्रेज सिंह जल उठता था. उसे इस बात पर गुस्सा आता था कि कुलदीप सिंह की तरह लोग उस की इज्जत क्यों नहीं करते.

एक दिन शराब पीते समय यही बात उस ने अपने दोस्त बगीचा सिंह से कही तो उस ने कहा, ‘‘उस के रहते तुझे कोई नहीं पूछेगा भाई, इसलिए तू उसे खत्म क्यों नहीं कर देता.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ अंग्रेज सिंह ने हैरानी से कहा.

‘‘भाई बढि़या आइडिया दे रहा हूं. तुझे भाभी बहुत अच्छी लगती है न? कब से तू उस के पीछे पड़ा है, लेकिन वह तुझे हाथ नहीं रखने दे रही है. कुलदीप को मार देगा तो वह तेरी हो जाएगी. इस के अलावा उस की जमीन भी तेरी हो जाएगी. तेरा छोटा भाई पागल ही है, उस के हिस्से की भी जमीन तुझे ही मिलेगी. इस तरह पूरी प्रौपर्टी का मालिक तू अकेला हो जाएगा.’’ बगीचा सिंह ने कहा.

अंग्रेज सिंह की आंखे हैरानी से फैल गईं. उस ने कहा, ‘‘यार बगीचा, तू ने यह बात पहले क्यों नहीं बताई. तू ने कितनी सच बात कही है, भाई के न रहने पर भाभी करमजीत कौर न खुद को संभाल पाएगी और न इतनी जमीन को. मजबूरन उसे मेरा सहारा लेना पड़ेगा. फिर तो मेरी चांदी ही चांदी हो जाएगी.’’

यह बात दिमाग में आते ही अंग्रेज सिंह भाई कुलदीप की हत्या की योजना बनाने लगा. 2 बार तो उस ने नलकूप की मोटर के स्टार्टर में बिजली का नंगा तार बांध दिया कि कुलदीप मोटर स्टार्ट करने आए तो करंट से उस की मौत हो जाए. लेकिन तार पर नजर पड़ जाने की वजह से कुलदीप बच गया. इस के बाद अंग्रेज ने कुएं के ऊपर रखा लकड़ी का पटरा हटा कर पतली सी प्लाई रख दी, जिस से कुलदीप उस पर चढ़े तो वह टूट जाए और कुलदीप सीधे कुएं में गिर जाए. नीचे पंखा लगा था, अगर कुलदीप उस पर गिरता तो मर जाता. लेकिन उस पर भी कुलदीप की नजर पड़ गई. उस ने उसे हटा कर मोटा पटरा रख दिया.

इस तरह कुलदीप सिंह को मारने की अंग्रेज सिंह की सारी कोशिशें विफल हो गईं. अपनी इन कोशिशों में असफल होने के बाद अंग्रेज सिंह ने कुलदीप की हत्या पैसे ले कर हत्या करने वालों से कराने पर विचार किया और बगीचा सिंह के माध्यम से उस ने राजू, परविंदर और चरणजीत सिंह को 2 लाख रुपए में बड़े भाई की हत्या की सुपारी दे दी. एक लाख रुपए उस ने एक आदमी से उधार ले कर एडवांस भी दे दिए. रुपए देने के बाद अंग्रेज सिंह ने पांचों को पिस्तौल खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश भेजा. ये सभी बरेली, अलीगढ़ आदि शहरों में घूम कर 7 सितंबर को लौट आए. इन्हें कहीं पिस्तौल नहीं मिली. आखिर में तय हुआ कि किसी तेजधार हथियार से कुलदीप सिंह की हत्या कर दी जाए.

9 सितंबर की दोपहर को जब कुलदीप सिंह खेतों का काम निपटा कर मोटर बंद करने के लिए नलकूप के कमरे में गया तो वहां बगीचा सिंह और परविंदर उर्फ पिंटू पहले से बैठे थे. कुलदीप मोटर बंद करने के लिए जैसे ही कमरे में घुसा, दोनों ने एकदम से कुलदीप पर हंसिया और चाकू से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से कुलदीप चकरा कर जमीन पर गिर पड़ा और कुछ देर तड़प कर मर गया. कुलदीप सिंह मर गया तो अंग्रेज सिंह बगीचा और परविंदर को अपनी मोटरसाइकिल से सुलतानपुर लोधी छोड़ आया. इस के बाद घर लौट कर वह इस तरह सामान्य बना रहा, जैसे उसे किसी बात का पता ही नहीं है.

इंसपेक्टर हरप्रीत सिंह ने मुखबिरों को तो अंग्रेज सिंह के पीछे लगाया ही था, उसी समय उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवा ली थी. इसी काल डिटेल्स से पता चला था कि कुलदीप के कत्ल वाले दिन 9 सितंबर को कुलदीप की हत्या से कुछ देर पहले और बाद में अंग्रेज सिंह ने 4-5 लोगों से 60-70 बार बात की थी. उन्हीं पांचों नंबरों से ही अंग्रेज सिंह के पांचों साथियों का पता चला था. बहरहाल, गिरफ्तार अंग्रेज सिंह, बगीचा सिंह और परविंदर का बयान लेने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान बगीचा सिंह और परविंदर की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया और चाकू बरामद कर लिया गया.

रिमांड खत्म होने पर 15 सितंबर को तीनों अभियुक्तों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में थे, किसी की जमानत नहीं हुई थी. बाकी बचे तीनों अभियुक्तों की पुलिस तलाश कर रही थी. कथा लिखे जाने तक वे पकड़े नहीं गए थे. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Story: इश्क की राह में भटकी औरत

Love Story: जिस महेश के लिए राधा ने पति से बेवफाई की, उसी महेश की नीयत जब उस की 14 साल की बेटी पर बिगड़ी तो भला राधा इस बात को कैसे बरदाश्त करती. फिर उस ने जो किया, क्या वह ठीक था

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर देहात के थाना झीझंक का एक गांव है महेवा. इसी गांव में राम सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे और एक बेटी राधा थी. राम सिंह घी का कारोबार करता था. वह गांवगांव जा कर लोगों के यहां से घी खरीदता और उसे ले जा कर कानपुर में बेच आता. इस से उसे जो फायदा होता, उसी से उस के परिवार की गुजरबसर होती थी.

राम सिंह की बेटी राधा सुंदर होने के साथसाथ थोड़ी चंचल भी थी. इसलिए सयानी होने पर गांव का हर लड़का उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लग गया था. जब यह सब राम सिंह ने देखा तो उसे लगा कि अब जल्दी ही राधा की शादी कर देनी चाहिए. उस ने उस के लिए लड़के की तलाश शुरू की तो उसे गांव बेलूपुर में एक लड़का मिल गया.

लड़के का नाम अजय था. उस के पिता लाखन सिंह के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. इसी वजह से उस की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी. बातचीत शुरू हुई तो राधा और अजय का रिश्ता तय हो गया. इस रिश्ते में अगर कोई खटकने वाली बात थी तो यह कि अजय सांवला था, जबकि राधा गोरी थी. इस के बावजूद अजय का पलड़ा भारी था, क्योंकि उस के पास 10 बीघा जमीन थी. जल्दी ही दोनों की शादी हो गई.

अजय तो सुंदर पत्नी पा कर खुश था, जबकि राधा अपने सांवले पति से खुश नहीं थी. शादी के पहले उस के मन में पति की जो छवि थी, अजय उस में कहीं भी फिट नहीं बैठता था. लेकिन अब विवाह हो गया था, इसलिए साथ तो रहना ही था. धीरेधीरे राधा एक बेटी अर्पिता और 2 बेटों जय तथा विजय की मां बन गई. 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी राधा में कोई बदलाव नहीं आया था. उस के मन में न तो बच्चों के प्रति वह मोह जागा था, जो एक मां को अपने बच्चों के प्रति होता है और न ही पति के प्रति वह चाहत जागी थी, जो जागनी चाहिए थी. पत्नी की इस उपेक्षा से अजय काफी दुखी था.

इस दुख को कम करने के लिए वह शराब पीने लगा. जब वह पक्का शराबी हो गया तो खेतीकिसानी से उस का मन हट गया. उसे लगता था कि आखिर वह किस के लिए मेहनत करे. जब वह पूरी तरह से निठल्ला हो गया तो मांबाप ने उसे अलग कर दिया. गांव में अजय का एक और अन्य मकान था, इसलिए मांबाप से अलग होने पर उसे कोई परेशानी नहीं हुई. वह पत्नी और बच्चों के साथ उसी मकान में रहने लगा. वह मेहनत कर नहीं सकता था, इसलिए बाप से मिली जमीन उस ने बटाई पर दे दी.

राधा 3 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अब भी उस की सुंदरता में जरा भी कमी नहीं आई थी. बल्कि शरीर भर गया था, इसलिए वह पहले से भी ज्यादा सुंदर लगने लगी थी. स्वभाव से हंसमुख और चंचल राधा का मन घरगृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि वह कभी अजय को पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाई. शायद इसी वजह से उस का मन भटकता रहता था. राधा की सुंदरता और चंचलता की वजह से गांव के महेश का दिल उस पर आ गया था. वह उस तक पहुंचने का तिकड़म भिड़ाने लगा था.

3 भाइयों में महेश सब से बड़ा था. उस के पिता भवानी सिंह ने उस का विवाह शिवली कस्बा की रहने वाली रजनी से कर दिया था. लेकिन अपनी आशिकमिजाजी की वजह से वह पत्नी का हो कर नहीं रह सका. वह इधरउधर मुंह मारता फिरता था. गांव की कई महिलाओं से उस के संबंध थे. लेकिन उन के बारे में कोई नहीं जान सका. राधा पर वह पूरी तरह से मोहित था. इसलिए उस तक पहुंचने के लिए उस ने उस के खेत बटाई पर ले लिए. इस से उसे राधा के घर आनेजाने में आसानी हो गई थी. वह जब भी राधा के घर जाता, मौका मिलने पर उस से हंसीमजाक करने से नहीं चूकता.

राधा भी उस से खुल कर हंसीमजाक करती थी. एक दिन महेश आया तो अजय घर में नहीं था. राधा को अकेली पा कर उस के दिल की धड़कन बढ़ गई. वैसा ही कुछ हाल राधा का भी था. उस ने इठलाते हुए कहा, ‘‘आओ देवरजी, कैसे आना हुआ?’’

‘‘खेतों पर काम कर रहा था, अचानक तुम्हारी याद आई तो मन मचल उठा. पहले तो उसे मनाने की कोशिश की, जब वह नहीं माना तो यह सोच कर चला आया कि चल कर प्यारी भाभी का दीदार कर लूं. कभीकभी सोचता हूं कि इतनी सुंदर भाभी कालेकलूटे अजय भैया के पल्ले कैसे पड़ गईं?’’

‘‘अपनाअपना नसीब है देवरजी. मेरी तकदीर में यही लिखा था.’’ राधा ने लंबी सांस ले कर कहा.

राधा के इस जवाब से महेश को लगा कि उस का तीर सही निशाने पर लगा है. वह उस के एकदम करीब आ कर बोला, ‘‘नसीब अपने हाथ में होता है भाभी, मैं आप से प्यार करता हूं. मैं कोई पराया तो हूं नहीं. वैसे भी मैं न जाने कब से तुम्हारी खूबसूरती का दीवाना हूं.’’

‘‘देवरजी, यह दीवानापन छोड़ो और अब चुपचाप चले जाओ. कहीं वह आ गए तो पता नहीं क्या सोचेंगे?’’ राधा ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

महेश ने उसे बांहों में भर कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चला तो जाऊंगा, पर खाली हाथ नहीं जाऊंगा. आज तो तुम्हारा प्यार ले कर ही जाऊंगा.’’

राधा को बांहों में भरते ही उस ने उस के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी. राधा ने उस की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया. इस की वजह यह थी कि वह भी यही चाहती थी. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भूखे भेडि़ए की तरह क्यों टूटे पड़ रहे हो, थोड़ा सब्र से काम लो, दरवाजा खुला है. वैसे भी तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक नहीं है.’’

महेश समझ गया कि राधा को कोई आपत्ति नहीं है. इस का उस ने पूरा फायदा उठाया और अपने तथा राधा के बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. इस तरह राधा के कदम एक बार बहके तो बहकते चले गए. मौका मिलते ही महेश राधा के घर आ जाता. राधा भी हर तरह से उस का सहयोग कर रही थी. इस की वजह यह थी कि वह उस के पति से हर मायने में इक्कीस था. महेश और राधा का यह अवैध संबंध चोरीछिपे सालों तक चलता रहा, किसी को पता नहीं चला. आखिर कब तक उन का यह गलत संबंध छिपा रहता. वे समय के साथ लापरवाह होते गए, परिणामस्वरूप एक दिन अजय ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उन के बीच यह खेल काफी दिनों से चल रहा है.

महेश चूंकि दबंग स्वभाव का था, इसलिए अजय ने उस से सीधे टकराना ठीक नहीं समझा. उस के जाने के बाद उस ने राधा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘शरम आनी चाहिए तुम्हें यह सब करते हुए. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद तुम नीचता पर उतर आई हो.’’

इस के बाद जब दोनों में तूतूमैंमैं शुरू हुई तो बात बढ़ती गई. इस के बाद अजय ने राधा की जम कर पिटाई कर दी. लेकिन इस पिटाई के बाद भी राधा ने महेश को नहीं छोड़ा. वह महेश की इतनी दीवानी हो चुकी थी कि जब उसे घर में उस से मिलने का मौका नहीं मिलता तो वह किसी न किसी बहाने खेतों पर जा कर उस से मिल लेती. जब इस का पता अजय को चलता तो वह शराब पी कर राधा और महेश को खूब गालियां देता.

ज्यादा शराब पीने की वजह से अजय बीमार पड़ गया. राधा ने कानपुर ले जा कर उस का इलाज कराया. समय पर सही इलाज मिलने से अजय ठीक हो गया. उस के इलाज में सारा पैसा महेश ने लगाया था, इसलिए वह उस के एहसान तले दब गया. अब उस ने महेश से समझौता कर लिया कि वह उस के और राधा के बीच में बाधा नहीं बनेगा. इस के बाद महेश ने उस की नौकरी झीझंक कस्बा में एक आढ़ती के यहां लगवा दी. अजय सुबह 11 बजे घर से निकलता तो शाम को ही वापस आता. कभीकभी काम ज्यादा होता तो वह आढ़त पर ही रुक जाता.

अब तक राधा की बेटी अर्पिता 14 साल की हो चुकी थी. वह भी मां की तरह सुंदर और चंचल थी. गांव के रिश्ते के नाते वह महेश को भइया कहती थी. मां और महेश के संबंधों की उसे जानकारी थी. लेकिन मां के डर की वजह से वह विरोध नहीं कर पाती थी. इस की एक वजह यह भी थी कि स्कूल की फीस से ले कर बाकी के उस के सारे खर्च महेश ही उठाता था. शायद इसीलिए वह अपनी जुबान बंद रखती थी.

एक दिन अजय ने घर से जाते समय राधा से कहा कि रात को वह घर नहीं आ पाएगा, इसलिए वह बच्चों के साथ खाना खा कर सो जाए. शाम ढलते ही राधा ने महेश को फोन कर के बता दिया कि वह जल्दी से घर आ जाए. आज की पूरी रात उन की अपनी है. क्योंकि अजय घर नहीं आएगा. राधा की बात सुन कर महेश बहुत खुश हुआ. रात 10 बजे के आसपास वह शराब के नशे में झूमता हुआ राधा के घर पहुंचा. अब तक राधा ने बच्चों को खिलापिला कर दूसरे कमरे में सुला दिया था. महेश ने आते ही राधा को बांहों में भरा और उस के साथ कमरे में चला गया.

आधी रात के बाद महेश लघुशंका के लिए कमरे से बाहर निकला तो उस की नजर दूसरे कमरे में सो रही अर्पिता पर पड़ी. उस को उस रूप में देख कर महेश की सांसें तेज हो गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा. उस के बाद लघुशंका कर के लौटा तो एक बार फिर उस की नजरें अर्पिता कर टिक गईं.

उस की नीयत खराब  होने लगी. वह राधा के कमरे में आया तो देखा राधा सो रही थी. अब तक उस की नीयत पूरी तरह खराब हो चुकी थी. वह लौटा और जा कर अर्पिता के बगल में लेट गया. उस ने अर्पिता से छेड़छाड़ की तो उस की नींद खुल गई. उस ने चीखना चाहा. लेकिन महेश ने उस के मुंह पर हाथ रख कर फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘चुप रह, मैं हूं महेश.’’

‘‘महेश भइया तुम? यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘चुप रह, मैं जो करने जा रहा हूं, इस में बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘नहीं भइया, यह गलत है. आप को जो करना है, मम्मी के साथ करो. मेरे साथ कुछ किया तो शोर मचा दूंगी.’’ अर्पिता ने धमकाया तो महेश डर गया और चुपचाप राधा के कमरे में चला गया.

अर्पिता राधा से ज्यादा सुंदर थी, इसलिए वह महेश के दिलोदिमाग में बस गई. अर्पिता को पाने के लिए वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. इस छेड़छाड़ का परिणाम यह निकला कि अर्पिता को भी मजा आने लगा. अब वह भी महेश के आने का इंतजार करने लगी. महेश अर्पिता के साथ कुछ कर पाता, इस से पहले ही एक दिन राधा ने उसे अर्पिता से छेड़छाड़ करते देख लिया. उस के बाद तो राधा महेश पर बिफर पड़ी, ‘‘मेरी फूल सी बच्ची को बरगलाने में तुम्हें शरम नहीं आई, मैं ने पति से बेवफाई कर के तुम्हारा साथ दिया, जबकि तुम मेरी ही बेटी को बरबाद करने पर तुले हो. कान खोल कर सुन लो, आज के बाद तुम ने उसे बरगलाने की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा.’’

राधा की धमकी का महेश पर कोई असर नहीं हुआ. उसे जब भी मौका मिलता, वह अर्पिता के साथ छेड़खानी कर बैठता. एक दिन तो हद हो गई, महेश ने राधा के सामने ही अर्पिता को अपनी बांहोें में भर लिया. इस के बाद तो राधा आपा खो बैठी. उस ने महेश और अर्पिता दोनों की पिटाई कर दी. इस के बाद राधा और महेश में जम कर कहासुनी हुई. राधा की समझ में आ गया कि महेश ऐसा सांप है, जो किसी भी दिन उस की बेटी को डंस सकता है, इसलिए उस ने इस सांप का फन कुचलने का निश्चय कर लिया.

14 दिसंबर, 2015 की सुबह राधा थाना झीझंक पहुंची और थानाप्रभारी आर.के. सिंह को बताया कि बेलूपुर के रहने वाले महेश ने उस के घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. उस की इस सूचना पर आर.के. सिंह पुलिस बल के साथ उस के घर जा पहुंचे. उस समय राधा के घर के बाहर भीड़ लग चुकी थी. भीड़ को हटा कर थानाप्रभारी वहां पहुंचे, जहां महेश फांसी के फंदे से झूल रहा था. महेश जीने की ग्रिल से लटका था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे. पहली ही नजर में फांसी लगाने जैसा कोई लक्षण नजर नहीं आ रहा था. न तो उस के मुंह से झाग निकला था और न ही मलमूत्र निकला था. शक होने पर आर.के. सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

उन्होंने राधा से पूछताछ की तो उस ने बताया कि महेश ने उस के खेत बटाई पर ले रखे हैं, इसलिए उस का उस के घर आनाजाना था. उस के पति अजय के नौकरी पर जाने के बाद महेश आया और उस की साड़ी का फंदा बना कर ग्रिल से झूल गया. उस ने महेश को न आते देखा और न फांसी पर झूलते देखा. आर.के. सिंह ने मृतक महेश के पिता भवानी सिंह से पूंछतांछ की तो फफकफफक कर रोते हुए उस ने बताया कि महेश की हत्या राधा और उस के पति अजय ने की है. पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश को फंदे पर लटकाया गया है. हत्या की वजह राधा और मेहश के बीच अवैध संबंध हैं.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो आर.के. सिंह चौंके. क्योंकि महेश की मौत गला दबाने से हुई थी. उस ने आत्महत्या नहीं की थी. चूंकि शक के घेरे में राधा और उस का पति अजय था, इसलिए वह उन्हें हिरासत में ले कर थाने ले आए और पूछताछ की. अजय ने बताया कि वह घर पर नहीं था, इसलिए महेश की हत्या किस ने की, उसे पता नहीं है. अजय ने हत्या करने से साफ मना कर दिया तो आर.के. सिंह ने राधा से पूछताछ की. पहले तो वह उन्हें गुमराह करती रही, लेकिन जब उस से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और महेश की हत्या का अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि उस के और महेश के बीच पिछले कई सालों से संबंध थे. उस के प्यार में अंधी हो कर उस ने पति तक से बेवफाई कर डाली. तब उसे पता नहीं था कि उस की यह बेवफाई उस की बेटी की जिंदगी पर भारी पड़ जाएगी. महेश उस की बेटी अर्पिता पर बुरी नजर डाल रहा था. राधा ने उसे कई बार समझाया, लेकिन वह नहीं माना. मजबूर हो कर उस ने साजिश रच कर 14 दिसंबर की सुबह 4 बजे जब अजय काम पर चला गया तो महेश को बुला लिया. आते ही महेश ने जैसे ही उसे पकड़ा, उस ने उस के नाजुक अंग को दांतों से काट लिया.

वह दर्द से तड़पने लगा तो वह उस की छाती पर सवार हो गई और साड़ी से उस का गला घोंट दिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए उस ने उस की लाश को फंदे से जीने की ग्रिल से लटका दिया. उस के बाद थाने जा कर पुलिस को सूचना दे दी. राधा के इसी बयान के आधार पर आर.के. सिंह ने मृतक के पिता भवानी सिंह की ओर से अपराध संख्या 347/2015 पर महेश की हत्या का मुकदमा राधा के खिलाफ दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

17 दिसंबर, 2015 को थाना झीझंक पुलिस ने राधा को कानपुर देहात की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक उस की जमानत नहीं हुई थी. चूंकि अजय निर्दोष था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया. Love Story

 

Hindi Crime Story: आशिकी का अंजाम

Hindi Crime Story: तुलसीराम से शादी हो जाने के बाद भी कीर्तिबाला ने पुराने प्रेमियों से मिलना जारी रखा. 3 बच्चों की मां बनने के बावजूद भी उस ने आशिकी का ऐसा खेल खेला कि उसे जेल जाना पड़ा.

23 सितंबर, 2015 की सुबह इंदौर के थाना ऐरोड्रम के थानाप्रभारी बलजीत सिंह अपने औफिस में पहुंचे ही थे कि लक्ष्मीबाई अपनी 9 साल की भतीजी चांदनी को ले कर उन के पास पहुंची. वह इलाके के ही अखंडनगर में रहती थी. उस का भाई तुलसीराम पिछले कई दिनों से लापता था. तुलसीराम शादीविवाह के कार्यक्रमों में खाना बनाने का ठेका लेता था. लक्ष्मीबाई के अनुसार, उस की भाभी कीर्तिबाला ने उसे बताया था कि तुलसीराम किसी शादी में खाना बनाने की बात कह कर गए हैं. जबकि यह बात सही नहीं है. हकीकत में कीर्तिबाला ने कुछ युवकों के साथ मिल कर तुलसीराम को मार डाला है और लाश को औटो में रख कर कहीं फेंक दिया है. मामला बेहद गंभीर था. थानाप्रभारी ने लक्ष्मीबाई से पूछा, ‘‘तुलसीराम की हत्या होने की बात तुम इतने दावे के साथ कैसे कह रही हो?’’

‘‘मैं यह सब इस आधार पर कह रही हूं कि मुझे इस बच्ची ने बताया है. यह तुलसीराम की बेटी है. इस ने अपनी आंखों के सामने पिता का कत्ल होते देखा है. आप इस से खुद मालूम कर सकते हैं.’’ लक्ष्मीबाई ने थानाप्रभारी को बताया.

बलजीत सिंह ने 9 साल की बच्ची चांदनी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछा तो उस ने पिता की हत्या किए जाने की सच्चाई उन्हें बता दी. इस के बाद बलजीत सिंह ने पूरे मामले से एसपी (सिटी) आर.एस. घुरैया को अवगत करा दिया. उन के निर्देश पर उन्होंने एक पुलिस टीम बनाई. इस पुलिस टीम ने सब से पहले तुलसीराम की पत्नी कीर्तिबाला को हिरासत में ले कर उस से पूछताछ की. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करती रही, लेकिन सख्ती करने पर उस ने पति की हत्या का राज उगल दिया. उस से की गई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस के प्रेमी विशाल जगताप, संजय सिंघल उर्फ चिंटू, संदीप जाधव और औटोचालक विशाल चालसे को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में जब पांचों अभियुक्तों का एकदूसरे से सामना हुआ तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उन की कहानी अब खत्म हो चुकी है. पुलिस ने उन सभी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए तुलसीराम की हत्या की जो कहानी बयां की, वह इस प्रकार थी. कीर्तिबाला मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी. उस के मातापिता दोनों ही काम पर जाते थे. घर की बड़ी बेटी होने की वजह से कीर्ति ही अपने अन्य भाईबहनों की देखभाल करती थी. कीर्ति जब जवानी में पहुंची तो मोहल्ले के आवारा किस्म के कई युवक उस पर डोरे डालने लगे. उन में से एक युवक कीर्ति का दूर का रिश्तेदार भी था. उस युवक का कीर्ति के घर काफी आनाजाना था.

कीर्ति उस पर विश्वास करती थी. वह मौका मिलने पर कीर्ति के साथ छेड़छाड़ करता था. लेकिन रिश्तेदार होने की वजह से कीर्ति ने न तो उस का विरोध किया और न ही इस की शिकायत अपने मांबाप से की. इस से उस युवक की हिम्मत बढ़ती गई. कीर्ति उम्र के जिस पड़ाव से गुजर रही थी, वह बड़ा ही फिसलनभरा होता है. उस रिश्तेदार की बातों में फंस कर कीर्ति फिसल गई. इस के बाद तो वह अपने मोबाइल पर उसे अश्लील फिल्में दिखाने लगा. उसी दौरान उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. इस के बाद यह सिलसिला बन गया.

फिर तो कीर्ति ऐसी बहकी कि उस के मोहल्ले के कई लड़कों से नाजायज संबंध हो गए. लेकिन जब बेटी के बहके कदमों की जानकारी मातापिता को हुई तो उन्होंने बिना देरी किए कीर्ति की शादी तुलसीराम के साथ कर दी. यह 10 साल पहले की बात है. तुलसीराम इंदौर के अखंडनगर में रहता था. वह शादीविवाह में ठेके पर खाना आदि बनवाने का काम करता था. उस के साथ इस काम में और भी लोग जुड़े थे. इसलिए उस के पास साल भर काम रहता था. इस से उसे अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. चूंकि अपने काम की वजह से वह रातों को घर से बाहर रहता था, इसलिए कीर्ति को उस का यह काम पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि पति ऐसा कोई काम करे, जिस से शाम को वह घर लौट आया करे.

इस बारे में कीर्ति ने बात की तो तुलसीराम कोई दूसरा काम करने के लिए राजी नहीं हुआ. वह अपना वही काम करता रहा. रातरात भर जागने के बाद तुलसी सुबह थकाहारा घर लौटता और गहरी नींद सो जाता. कीर्ति इसे पति की बेरुखी समझती. उसे तो कमउम्र में ही शारीरिक संबंध की लत लग गई थी. पति की बेरुखी पर उस ने जल्द ही अपने मायके के पुराने प्रेमियों से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. देखतेदेखते कीर्ति एक बेटी और 2 बेटों की मां बन गई. तुलसीराम के साथ कृष्णबाग कालोनी में रहने वाला संजय उर्फ चिंटू भी काम करता था. काम के सिलसिले में वह अकसर तुलसी के घर आताजाता रहता था. चिंटू अविवाहित था. कीर्ति के सौंदर्य ने उसे पहली ही नजर में अपना दीवाना बना दिया था. इसलिए वह जब भी उस के घर आता, उस से अधिक से अधिक बातें करने के फेर में रहता.

कीर्ति तो इस खेल की पुरानी खिलाड़ी थी. इसलिए वह जल्द ही उस की नजरों को भांप गई. ॐस ने भी उसे आमंत्रण देते हुए उस के मन की आग को हवा देनी शुरू कर दी. चिंटू जब कभी कीर्ति के घर आता, उस से हंसीमजाक करता. उस की हंसीमजाक का वह उसी के अंदाज में जवाब देती थी. इस से वे एकदूसरे के करीब आते चले गए और फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों की इच्छाएं पूरी हो गईं. उस दिन के बाद चिंटू और कीर्ति दुनिया से नजरें बचा कर इस अनैतिक रास्ते पर चल पड़े. चिंटू का एक दोस्त था विशाल जगताप. चिंटू ने कीर्ति के साथ अपने संबंधों की कहानी विशाल को सुनाई तो उस ने भी चिंटू के साथ कीर्ति के घर आनाजाना शुरू कर दिया. क्योंकि कीर्ति के किस्से वह भी अन्य लोगों से सुन चुका था.

इसलिए उस से संबंध बनाने की उस की भी लालसा जाग उठी थी. नएनए लड़कों से संबंध बनाने की कीर्ति की लत लग चुकी थी. उस ने जल्द ही विशाल को भी अपने सांचे में उतार लिया. फिर एक समय ऐसा आया कि चिंटू और विशाल अकसर कीर्ति के पास आने लगे. कीर्ति की बेटी चांदनी 9 साल की हो चुकी थी. इतनी बड़ी बेटी से कीर्ति को न कोई शरम थी और न कोई डर. वह बेटी को बाहर के कमरे में बैठा कर अपने प्रेमियों के साथ दरवाजा बंद कर के मौजमस्ती करती थी. लेकिन कहते हैं कि पाप ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता.

आखिर कीर्ति के अवैध संबंधों की जानकारी तुलसीराम को किसी तरह हो ही गई. पत्नी की सच्चाई जान कर तुलसीराम को बड़ा दुख हुआ. उस ने कीर्ति को समझाया. लेकिन वह कहां मानने वाली थी. तुलसीराम को इस बात की चिंता थी कि मां की गलत आदतों का असर बेटी चांदनी पर न पड़े. इसलिए वह बेटी को अकसर समझाता रहता था. चांदनी भी मां की हरकतों की जानकारी तुलसी को देती रहती थी, जिस से वह परेशान रहने लगा. तब उस ने न केवल कीर्ति पर सख्ती बरतनी शुरू की, बल्कि चेतावनी दी कि यदि उस ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह आत्महत्या कर लेगा.

इन बातों का कीर्ति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था. उस का अपने प्रेमियों से पहले की ही तरह मिलनाजुलना जारी रहा. रोज नए युवकों के साथ वक्त बिताना उस की जैसे आदत बन चुकी थी. पति की रोजरोज की किचकिच से वह उकता गई. एक तरह से उसे अब पति में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी. वह उस से निजात पाना चाहती थी, ताकि उस से कोई टोकाटाकी न कर सके. कीर्ति ने पति की लाखों रुपए की संपत्ति पहले ही अपने नाम करा ली थी. इस के बाद उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अपने प्रेमी विशाल से बात की. विशाल ने उस से वादा किया कि तुलसीराम की हत्या के बाद वह उस से शादी कर लेगा.

यह काम विशाल अकेले नहीं कर सकता था, लिहाजा उस ने इस काम को अंजाम देने के लिए अपने 2 दोस्तों, चिंटू और संदीप को भी राजी कर लिया. फिर योजना बना कर कीर्ति ने एक दिन विशाल, चिंटू और संदीप को अपने यहां बुला कर एक कमरे में छिपा दिया. रात को तुलसीराम घर लौटा तो खाना खाने के बाद वह बिस्तर पर जा कर लेट गया. थोड़ी देर में उसे नींद आ गई. तभी कीर्ति भी उस के पास जा कर लेट गई. कीर्ति ने पहले तो पति को हिलाडुला कर देखा कि वह सो रहा है या जाग रहा है? जब तुलसीराम ने कोई हरकत नहीं की तो उस ने फटाफट अपना दुपट्टा उतार कर पति के गले में लपेट दिया और उस के दोनों सिरे पलंग के दोनों ओर लटका दिए.

इस के बाद उस के आवाज देने पर उस के दोनों प्रेमी विशाल और चिंटू कमरे में आ गए. आते ही उन्होंने दुपट्टे के दोनों सिरे खींचने शुरू कर दिए तो संदीप तुलसीराम के पैरों पर बैठ गया. उसी समय तुलसीराम की बेटी चांदनी की आंखें खुल गईं. वह उन तीनों को पहचानती थी. पिता को तड़पता देख कर वह चीखी तो कीर्ति ने झट से उस का मुंह बंद कर लिया और 2 थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिए.

इस के बाद वह उसे किचन में ले गई. वह उसे डराते हुए बोली, ‘‘खबरदार, किसी को बताया तो तुझे भी मार डालूंगी.’’

मां की धमकी से बच्ची डर गई. तुलसीराम की हत्या करने के बाद उन्हें लाश ठिकाने लगानी थी. इस के लिए उन्होंने लाश को बांध कर विशाल के औटो में रख दिया. लाश को ये नैनोद के पास ले गए और वहीं पर बने एक ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर लाश उस में डाल दी. इन का सोचना था कि लाश वहां से काफी दूर बह जाएगी और पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाएगी.

बेटी कहीं मुंह न खोल दे, इसलिए कीर्ति अगले दिन भी उसे डराती रही. उसी दिन दोपहर के समय तुलसीराम का भाई शिवकुमार और बहनोई घर आए तो उन्होंने कीर्ति से तुलसीराम के बारे में पूछा. तब कीर्ति ने उन्हें बताया कि वह किसी शादी में खाना बनाने गए हैं. वहां मौजूद चांदनी उन्हें सचाई बताना चाहती थी, लेकिन जब उस ने कीर्ति की तरफ देखा तो मां ने आंखें तरेरी तो वह डर गई. कीर्ति ने पति को ठिकाने लगाने वाली बात अपनी मां वंदना को भी बता दी थी. नानी वंदना ने भी चांदनी को पीटा और कहा कि अगर उस ने किसी से कुछ बोला तो उसे भी मार कर कहीं फेंक देंगे. शाम को तुलसीराम की बहन लक्ष्मीबाई घर आई तो वह चांदनी को अपने घर ले गई. तब चांदनी ने बुआ को सारी बात बता दी.

अगले दिन सुबहसुबह लक्ष्मीबाई चांदनी को ले कर थाना ऐरोड्रम पहुंची और थानाप्रभारी बलजीत सिंह को पूरी कहानी बता दी. हत्या का खुलासा होने पर डीआईजी संतोष कुमार सिंह और एसपी (पश्चिमी) डी. कल्याण चक्रवर्ती भी थाने पहुंच गए. उन्होंने भी अभियुक्तों से पूछताछ की. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर तुलसीराम की लाश बरामद कर ली. पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा संकलन तक तुलसीराम के तीनों बच्चे अपनी बुआ के पास थे. पति की हत्या करने का कीर्ति को तनिक भी अफसोस नहीं था.

जेल जाते समय उस ने कहा कि उसे अब बच्चों से कोई मतलब नहीं है. जेल से छूटने के बाद वह विशाल के साथ शादी कर अपनी गृहस्थी नए सिरे से बसाएगी.

ExtraMarital Affair: अवैध संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

ExtraMarital Affair: विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

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अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

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वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी. ExtraMarital Affair

Crime Story: हम मर जाएंगे – परिवार वालों ने किया जुदा

Crime Story: 22 फरवरी की सुबह 6 बजे रामपुर गांव के कुछ लोग मार्निंग वाक पर निकले तो उन्होंने पानी की टंकी के पास लिंक मार्ग से 50 मीटर दूर खेत में एक युवक को बुरी तरह से जख्मी हालत में पड़े देखा. युवक की जान बचाने के लिए उन में से किसी ने थाना खानपुर पुलिस को सूचना दे दी.

सूचना प्राप्त होते ही खानपुर थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को भी सूचित कर दिया था. विश्वनाथ यादव जिस समय वहां पहुंचे, उस समय ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को परे हटाते हुए वह खेत में पहुंचे, जहां युवक जख्मी हालत में पड़ा था. युवक की उम्र 24 साल के आसपास थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी, जो आरपार हो गई थी. उस के एक हाथ में पिस्टल थी तथा दूसरी पिस्टल उस के पैर के पास पड़ी थी.

जामातलाशी में उस के पास से 2 मोबाइल फोन, आधार कार्ड तथा पुलिस विभाग का परिचय पत्र मिला, जिस में उस का नामपता दर्ज था. परिचय पत्र तथा आधार कार्ड से पता चला कि युवक का नाम अजय कुमार यादव है तथा वह बभरौली गांव का रहने वाला है. तुरंत उस के घर वालों को सूचना दे दी गई.

इंसपेक्टर विश्वनाथ यादव अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह, एएसपी गोपीनाथ सोनी तथा डीएसपी राजीव द्विवेदी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा युवक के पास से बरामद सामान का अवलोकन किया. देखने से ऐसा लग रहा था कि युवक ने आत्महत्या का प्रयास किया था. अब तक अजय के पिता रामऔतार यादव भी घटनास्थल आ गए थे. वह आत्महत्या की बात से सहमत नहीं थे.

चूंकि अजय यादव मरणासन्न स्थिति में था, अत: पुलिस अधिकारियों ने उसे इलाज हेतु तत्काल सीएचसी (सैदपुर) भिजवाया लेकिन वहां के डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और उसे बीएचयू ट्रामा सेंटर रैफर कर दिया. इलाज के दौरान अजय यादव की मौत हो गई. चूंकि अजय यादव सिपाही था, अत: उस की मौत को एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह ने गंभीरता से लिया. उन्होंने जांच के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया, जिस में क्राइम ब्रांच, सर्विलांस टीम तथा स्वाट टीम को शामिल किया गया.

इस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया, फिर बरामद सामान को कब्जे में लिया. सर्विलांस सेल प्रभारी दिनेश यादव ने अजय के पास से बरामद दोनों फोन की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि 22 फरवरी की रात 3 बजे एक फोन से अजय के फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भेजा गया था, जिस में लिखा था, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

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जिस मोबाइल फोन से मैसेज भेजा गया था, उस फोन की जानकारी की गई तो पता चला कि वह मोबाइल फोन इचवल गांव निवासी राजेश सिंह की बेटी सोनाली सिंह के नाम दर्ज था. जबकि फोन मृतक अजय की जेब से बरामद हुआ था. अजय और सोनाली का क्या रिश्ता है? उस ने 3 बजे रात को अजय को मैसेज क्यों भेजा? जानने के लिए पुलिस टीम सोनाली सिंह के गांव इचवल पहुंची और उस के पिता राजेश सिंह से पूछताछ की.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह आज सुबह से गायब है. हम ने सैदपुर कैफे से उस की औनलाइन एफआईआर भी कराई है. राजेश सिंह ने एफआईआर की कौपी भी दिखाई. राजेश सिंह की बात सुन कर पुलिस टीम का माथा ठनका. राजेश सिंह को गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज करानी थी, तो थाना खानपुर में करानी चाहिए थी. आनलाइन रिपोर्ट क्यों दर्ज कराई? दाल में जरूर कुछ काला था. यह औनर किलिंग का मामला हो सकता था. संभव था अजय और सोनाली सिंह प्रेमीप्रेमिका हों और इज्जत बचाने के लिए राजेश सिंह ने अपनी बेटी की हत्या कर दी हो.

ऐसे तमाम प्रश्न टीम के सदस्यों के दिमाग में आए तो उन्होंने शक के आधार पर राजेश सिंह के घर पर पुलिस तैनात कर दी. साथ ही पुलिस सानिया उर्फ सोनाली सिंह की भी खोज में जुट गई. अजय का मोबाइल फोन खंगालने पर उस का और सोनाली सिंह का विवाह प्रमाण पत्र मिला, जिस में दोनों की फोटो लगी थी.

प्रमाण पत्र के अनुसार दोनों 5 नवंबर, 2018 को कोर्टमैरिज कर चुके थे. इस प्रमाण पत्र को देखने के बाद पुलिस टीम का शक और भी गहरा गया. पुलिस टीम ने सोनाली सिंह के पिता राजेश सिंह व परिवार के 4 अन्य सदस्यों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. 23 फरवरी, 2021 की सुबह पुलिस टीम को इचवल गांव में राजेश सिंह के खेत में एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. पुलिस टीम तथा अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे और लाश का निरीक्षण किया.

मृतका राजेश सिंह की 25 वर्षीय बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. उस के सिर में गोली मारी गई थी. चेहरे को भी कुचला गया था. निरीक्षण के बाद पुलिस ने सोनाली सिंह के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गाजीपुर भेज दिया. शव के पास से पिस्टल या तमंचा बरामद नहीं हुआ, लेकिन एक जोड़ी मर्दाना चप्पल तथा टूटी हुई चूडि़यां जरूर मिलीं. चप्पलों की पहचान मृतक सिपाही अजय के घर वालों ने की. उन्होंने पुलिस को बताया कि चप्पलें अजय की थीं.

पुलिस टीम ने हिरासत में लिए गए राजेश सिंह से बेटी सोनाली सिंह की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो वह टूट गया और उस ने सोनाली सिंह तथा उस के प्रेमी अजय यादव की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. यही नहीं, उस ने हत्या में इस्तेमाल अजय यादव की बाइक यूपी81 एसी 5834 भी बरामद करा दी.

राजेश सिंह ने बताया कि उस की बेटी सानिया सिपाही अजय यादव से प्यार करती थी और दोनों ने कोर्ट में शादी भी कर ली थी. तब अपनी इज्जत बचाने के लिए उस ने दोनों को मौत की नींद सुलाने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम सिंह को शामिल किया. इस के बाद पहले सानिया की हत्या की फिर अजय की. उस के बाद दोनों के शव अलगअलग जगहों पर डाल दिए.

पुलिस अजय की हत्या को आत्महत्या समझे, इसलिए उस के एक हाथ में पिस्टल थमा दी तथा बेटी का मोबाइल फोन अजय की जेब में डाल दिया, ताकि लगे कि अजय ने पहले सोनाली सिंह की गोली मार कर हत्या की फिर स्वयं गोली मार कर आत्महत्या कर ली. बेटी के शव के पास अजय की चप्पलें छोड़ना, सोचीसमझी साजिश का ही हिस्सा था. राजेश के बाद अन्य आरोपियों ने भी जुर्म कबूल कर लिया.

थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने डबल मर्डर का परदाफाश करने तथा आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी एसपी डा. ओमप्रकाश सिंह को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थिति सभागार में प्रैसवार्ता की और आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश कर डबल मर्डर का खुलासा कर दिया.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थानाप्रभारी विश्वनाथ यादव ने मृतक के पिता रामऔतार यादव की तहरीर पर धारा 302 आईपीसी के तहत राजेश सिंह, अवधराज सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह तथा नीलम सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा सभी को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, उस में दोनों की हत्याओं की वजह मोहब्बत थी.

गाजीपुर जिले के खानपुर थाना अंतर्गत एक गांव है इचवल कलां. इसी गांव में ठाकुर राजेश सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी नीलम सिंह के अलावा बेटा दीपक सिंह तथा बेटी सानिया उर्फ सोनाली सिंह थी. राजेश सिंह के पिता अवधराज सिंह भी उन के साथ रहते थे. पितापुत्र दबंग थे. गांव में उन की तूती बोलती थी. उन के पास उपजाऊ जमीन थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

राजेश सिंह की बेटी सोनाली उर्फ सानिया सुंदर, हंसमुख व मिलनसार थी. पढ़ाई में भी तेज थी. वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजकीय डिग्री कालेज सैदपुर से बीए की डिग्री हासिल कर चुकी थी और बीएड की तैयारी कर रही थी. दरअसल, सानिया टीचर बन कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. इसलिए वह कड़ी मेहनत कर रही थी.

सानिया उर्फ सोनाली के आकर्षण में गांव के कई युवक बंधे थे. लेकिन अजय कुमार यादव कुछ ज्यादा ही आकर्षित था. सानिया भी उसे भाव देती थी. सानिया और अजय की पहली मुलाकात परिवार के एक शादी समारोह में हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हो गए थे. इस के बाद जैसे जैसे उन की मुलाकातें बढ़ती गईं, वैसेवैसे उन का प्यार बढ़ता गया.

अजय कुमार यादव के पिता रामऔतार यादव सानिया के पड़ोस के गांव बभनौली में रहते थे. वह सीआरपीएफ में कार्यरत थे. लेकिन अब रिटायर हो गए थे और गांव में रहते थे. उन की 5 संतानों में 4 बेटियां व एक बेटा था अजय कुमार. बेटियों की वह शादी कर चुके थे और बेटा अजय अभी कुंवारा था. रामऔतार यादव, अजय को पुलिस में भरती कराना चाहते थे, सो वह उस की सेहत का खास खयाल रखते थे. अजय बीए पास कर चुका था और पुलिस भरती की तैयारी कर रहा था. उस ने पुलिस की परीक्षा भी दी.

एक दिन अजय ने सानिया के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह गहरी सोच में डूब गई. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘अजय, मुझे तुम्हारा शादी का प्रस्ताव तो मंजूर है, लेकिन मुझे डर है कि हमारे घर वाले शादी को कभी राजी नही होंगे.’’

‘‘क्यों राजी नही होंगे?’’ अजय ने पूछा.

‘‘क्योंकि मैं ठाकुर हूं और तुम यादव. मेरे पिता कभी नहीं चाहेंगे कि ठाकुर की बेटी यादव परिवार में दुलहन बन कर जाए. मूंछ की लड़ाई में वह कुछ भी अनर्थ कर सकते हैं.’’

‘‘घर वाले राजी नहीं होंगे, फिर तो एक ही उपाय है कि हम दोनों कोर्ट में शादी कर लें.’’

‘‘हां, यह हो सकता है.’’ सानिया ने सहमति जताई.

इस के बाद 5 नवंबर, 2018 को सानिया उर्फ सोनाली और अजय कुमार ने गाजीपुर कोर्ट में कोर्टमैरिज कर के विवाह प्रमाण पत्र हासिल कर लिया. कोर्ट मैरिज करने की जानकारी सानिया के घर वालों को नहीं हुई, लेकिन अजय के घर वालों को पता था. उन्होंने सानिया को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया.

दिसंबर, 2018 में अजय का चयन सिपाही के पद पर पुलिस विभाग में हो गया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग अमेठी जिले के गौरीगंज थाने में हुई. अजय और सानिया की मुलाकातें चोरीछिपे होती रहती थीं. मोबाइल फोन पर भी उन की बातें होती रहती थीं. कोर्ट मैरिज के बाद उन का शारीरिक मिलन भी होने लगा था. इस तरह समय बीतता रहा.

जनवरी, 2021 के पहले हफ्ते में राजेश सिंह को अपनी पत्नी नीलम सिंह व बेटे दीपक सिंह से पता चला कि सानिया पड़ोस के गांव बभनौली के रहने वाले युवक अजय यादव से प्रेम करती है और दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली है. दरअसल, नीलम सिंह ने बेटी को देर रात अजय से मोबाइल फोन पर बतियाते पकड़ लिया था. फिर डराधमका कर सारी सच्चाई उगलवा ली थी. यह जानकारी नीलम ने पति व बेटे को दे दी थी.

राजेश सिंह ठाकुर था. उसे यह गवारा न था कि उस की बेटी यादव से ब्याही जाए, अत: उस ने सानिया की जम कर पिटाई की और घर से बाहर निकलने पर सख्त पहरा लगा दिया. नीलम हर रोज डांटडपट कर तथा प्यार से बेटी को समझाती लेकिन सानिया, अजय का साथ छोड़ने को राजी नहीं थी. 21 फरवरी को अजय की चचेरी बहन की सगाई थी. वह 15 दिन की छुट्टी ले कर अपने गांव बभनौली आ गया. सिपाही अजय के आने की जानकारी राजेश सिंह को हुई तो उस ने अपने पिता अवधराज सिंह, बेटे दीपक सिंह, भतीजे अंकित सिंह तथा पत्नी नीलम के साथ गहन विचारविमर्श किया.

जिस में तय हुआ कि पहले अजय व सानिया को समझाया जाए, न मानने पर दोनों को मौत के घाट उतार दिया जाए. अवैध असलहा घर में पहले से मौजूद था. योजना के तहत 22 फरवरी की रात 3 बजे राजेश सिंह व नीलम सिंह ने सानिया को धमका कर सिपाही अजय यादव के मोेबाइल फोन पर एक वाट्सऐप मैसेज भिजवाया, जिस में लिखा, ‘तत्काल मिलने आओ, नहीं तो हम मर जाएंगे.’

अजय ने मैसेज पढ़ा, तो उसे लगा कि सानिया मुसीबत में है. अत: वह अपनी मोटरसाइकिल से सानिया के गांव इचबल की ओर निकल पड़ा. इधर मैसेज भिजवाने के बाद राजेश सिंह, नीलम सिंह, दीपक सिंह, अवधराज सिंह व अंकित सिंह ने सानिया उर्फ सोनाली को अजय का साथ छोड़ने के लिए हर तरह से समझाया. लेकिन जब वह नहीं मानी तो राजेश सिंह ने उसे गोली मार दी. फिर लाश को घर में छिपा दिया.

कुछ देर बाद अजय आया, तो उसे भी समझाया गया. लेकिन वह ऊंचे स्वर में बात करने लगा. इस पर वे सब अजय को बात करने के बहाने गांव के बाहर अंबिका स्कूल के पास ले गए. वहां अजय सानिया को अपनी पत्नी बताने लगा तो उन सब ने उसे दबोच लिया और पिस्टल से उस के सिर में गोली मार दी और मरा समझ कर रामपुर गांव के पास सड़क किनारे खेत में फेंक दिया. एक पिस्टल उस के हाथ में पकड़ा दी तथा दूसरी उस के पैर के पास डाल दी. सानिया का मोबाइल फोन भी अजय की पाकेट में डाल दिया. इस के बाद वे सब वापस घर आए और सानिया का शव घर के पीछे गेहूं के खेत में फेंक दिया. अजय की चप्पलें भी शव के पास छोड़ दीं.

सुबह राजेश व नीलम ने पड़ोसियों को बताया कि उन की बेटी सानिया बिना कुछ बताए घर से गायब है. फिर सैदपुर कस्बा जा कर कैफे से औनलाइन एफआईआर दर्ज करा दी. उधर रामपुर गांव के कुछ लोगों ने युवक को मरणासन्न हालत में देखा तो पुलिस को सूचना दी. पुलिस ने काररवाई शुरू की तो डबल मर्डर की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

24 फरवरी, 2021 को थाना खानपुर पुलिस ने अभियुक्त राजेश सिंह, दीपक सिंह, अंकित सिंह, अवधराज सिंह तथा नीलम सिंह को गाजीपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: जिद्दी बीवी – पत्नी का कातिल पति

चेतन घोरपड़े और अर्चना घोरपड़े कोई नवदंपति नहीं थे. कई साल हो गए थे दोनों की शादी को. पतिपत्नी पिछले 3 सलों से कोल्हापुर जिले के तालुका शिरोल बाईपास स्थित जयसिंह सोसायटी में रह रहे थे. दोनों ही एमआईडीसी परिसर की एक गारमेंट कंपनी में काम करते थे.

कंपनी 2 शिफ्टों में चलती थी इसलिए उन दोनों का काम अलगअलग शिफ्टों में था. अर्चना सुबह 8 बजे काम पर जाती और शाम 5 बजे तक घर आ जाती थी. लेकिन चेतन का काम ऐसा नहीं था. उस को कभीकभी दोनों शिफ्टों में काम करना पड़ता था. दोनों खुश थे. उन की लवमैरिज की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. मगर इसी बीच कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था. दरअसल, 20 फरवरी, 2021 को अचानक 2 बजे के करीब एक ऐसी लोमहर्षक घटना घटी कि जिस ने भी देखा, उस का कलेजा मुंह को आ गया. कामकाज का दिन होने की वजह से सोसायटी के सभी पुरुष और महिलाएं अपनेअपने कामों के कारण घरों से बाहर थे.

सोसायटी में सिर्फ बच्चे, कुछ बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष ही थे. दोपहर का खाना खा कर सभी अपनेअपने घरों में आराम कर रहे थे कि तभी चीखनेचिल्लाने और बचाओ… बचाओ की आवाजें आने लगीं. आवाजें पड़ोस के रहने वाले चेतन घोरपड़े के घर से आ रही थीं. लोगों को आश्चर्य हुआ क्योंकि पतिपत्नी दोनों अकसर अपने काम पर रहते थे. अर्चना घोरपड़े के चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर लोग अपनेअपने घरों से बाहर आए तो उन्होंने देखा कि दरवाजा अंदर से बंद था. लोगों ने दरवाजा थपथपाया, आवाजें दीं. लेकिन अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई.

इस से लोगों ने समझा कि हो सकता है पतिपत्नी का कोई मामला हो, जिसे ले कर दोनों के बीच झगड़ा हो गया हो. वैसे भी पतिपत्नी के झगड़े आम बात होते हैं. बहरहाल, उन्होंने पतिपत्नी का आपसी मामला समझ कर खामोश ही रहना उचित समझा. तभी बाहर शांति देख कर चेतन घोरपड़े ने धीरे से दरवाजा खोला. उस के कपड़ों पर खून लगा था. इस के पहले कि पड़ोसी कुछ समझ पाते, चेतन दरवाजे की कुंडी लगा कर तेजी से सोसायटी के बाहर निकल  गया और वहां से सीधे शिरोल पुलिस थाने पहुंचा.

थाने की ड्यूटी पर तैनात एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने थाने में चेतन घोरपड़े को देखा तो वह स्तब्ध रह गए. उस का हुलिया और उस के कपड़ों पर पड़े खून के छींटे किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहे थे. एपीआई शिवानंद कुमार उस से कुछ पूछते, उस के पहले ही उस ने उन्हें जो कुछ बताया, उसे सुन कर उन के होश उड़ गए.

मामला काफी गंभीर था. एपीआई शिवानंद कुमार और उन के सहायकों ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. साथ ही साथ उन्होंने इस की जानकारी अपने सीनियर अधिकारियों के साथ पुलिस कंट्रोल रूम जयसिंहपुर को भी दे दिया.

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शिवानंद पुलिस टीम ले कर घटनास्थल की ओर निकल ही रहे थे कि अचानक चेतन घोरपड़े की तबीयत बिगड़ने लगी. उस की बिगड़ती तबीयत को देख कर एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ उसे तुरंत स्थानीय अस्पताल भेज दिया और खुद हैडकांस्टेबल डी.डी. पाटिल और सागर पाटिल को ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

जिस घर में घटना घटी थी, वहां पर काफी भीड़ एकत्र थी, जिसे हटाने में पुलिस टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी. भीड़ को हटा कर इंसपेक्टर शिवानंद कुमार जब घर के अंदर गए तो वहां का दृश्य काफी मार्मिक और डरावना था. फर्श पर एक लहूलुहान युवती का शव पड़ा था. उस के पास ही 2 महिलाएं बैठी छाती पीटपीट कर रो रही थीं. पूछताछ में मालूम हुआ कि वे दोनों महिलाएं मृतका की मां और सास थीं, जिन का नाम वसंती पुजारी और आशा घोरपड़े था. पुलिस टीम ने दोनों महिलाओं को सांत्वना दे कर घर से बाहर निकला और अपनी काररवाई शुरू कर दी.

अभी पुलिस घटना के विषय में पूछताछ कर ही रही थी कि वारदात की जानकारी पा कर कोल्हापुर के एसपी शैलेश वलकवड़े मौकाएवारदात पर आ गए. उन के साथ 2 फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के लोग भी थे. घर के अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था. पूरे फर्श पर खून ही खून फैला हुआ था. बैडरूम में युवती का शव पड़ा था, जिस की हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस की कलाई और गालों पर किसी तेज धारदार वाले हथियार से वार किए गए थे.

गले में मोबाइल चार्जर का वायर लिपटा था, जिसे देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस का गला घोंटने में इसी वायर का इस्तेमाल किया गया था. फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो का काम खत्म होने के बाद एसपी शैलेश वलकवड़े ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल की बारीकी से जांच की. इस के बाद उन्होंने जांचपड़ताल की सारी जिम्मेदारी एपीआई शिवानंद कुमार को सौंपते हुए उन्हें जरूरी निर्देश दिए.

एपीआई शिवानंद कुमार ने अपने सहायकों के साथ घटनास्थल पर पड़े ब्लेड और मोबाइल चार्जर के वायर को अपने कब्जे में ले लिया और मृतका अर्चना घोरपड़े के शव को पोस्टमार्टम के लिए जयसिंहपुर के जिला अस्पताल भेज दिया. वहां की सारी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के शिवानंद पुलिस थाने आ गए. साथ ही घटनास्थल पर आई मृतका की मां बसंती पुजारी को भी पुलिस थाने ले आए और उन की शिकायत पर अर्चना घोरपड़े के पति चेतन घोरपड़े के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया.

आगे की जांच के लिए उन्हें चेतन घोरपड़े के बयान का इंतजार था जो अभी अस्पताल में डाक्टरों की निगरानी में था. पत्नी की हत्या के बाद अपराधबोध के कारण उस ने आत्महत्या के लिए घर में रखा कीटनाशक फिनायल पी लिया था और फिर पुलिस थाने आ गया था. डाक्टरों के अथक प्रयासों के बाद चेतन घोरपड़े को जब होश आया तो उस से पूछताछ की गई. उस ने जो कुछ बताया, उस से घटना का विवरण सामने आया.

25 वर्षीय अर्चना पुजारी जितनी सुंदर और स्वस्थ थी, उतनी ही खुले मन और आधुनिक विचारों वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें करती और उस के साथ घुलमिल जाती थी, लेकिन अपनी हद में रह कर. उस की मीठी और सीधीसरल बातें हर किसी के मन को मोह लेती थीं. यही वजह थी जो उस की मौत का कारण बनी. उस के पिता रामा पुजारी की मृत्यु हो गई थी. घर की सारी जिम्मेदारी मां बसंती पुजारी के कंधों पर थी. घर की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी, इसलिए उस की शिक्षादीक्षा ठीक से नहीं हो पाई थी.

30 वर्षीय चेतन मनोहर घोरपड़े ने सजीसंवरी अर्चना पुजारी को अपने एक दोस्त की पार्टी में देखा था और उस का दीवाना हो गया था. जब तक वह उस पार्टी में रही, तब तक चेतन की आंखें उसी पर टिकी रहीं.

देर रात पार्टी खत्म होने के बाद चेतन घोरपड़े ने जब घर के लिए आटो लिया तब अपने दोस्त के कहने पर अर्चना पुजारी को उस के घर तक छोड़ते हुए गया. उस रात आटो के सफर में दोनों ने एकदूसरे को जानासमझा. दोनों ने बेझिझक एकदूसरे से बातें कीं. घर पहुंचने के बाद अर्चना पुजारी ने चेतन का शुक्रिया अदा किया और अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया और उस का भी ले लिया.

घर पहुंचने के बाद दोनों की एक जैसी ही स्थिति थी. रात भर दोनों सोच के दायरे में एकदूसरे के व्यक्तित्व को अपनेअपने हिसाब से टटोलते, तौलते रहे. दोनों की ही आंखों से नींद कोसों दूर थी. सारी रात उन की आंखों के सामने एकदूसरे का चेहरा नाचता रहा, जिस का नतीजा यह हुआ कि वे दोनों जल्दी ही एकदूसरे के करीब आ गए. फोन पर लंबीलंबी बातों के बाद मुलाकातों से शुरू हुई दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई और कुछ महीनों बाद दोनों ने शादी का निर्णय ले लिया.

उन के इस निर्णय से अर्चना पुजारी की मां को तो कोई ऐतराज नहीं था लेकिन चेतन की मां को इस शादी से आपत्ति थी. वह गैरजाति की लड़की को अपनी बहू बनाने के पक्ष में नहीं थी, लेकिन चेतन घोरपड़े की पसंद के कारण मां की एक नहीं चली. 2013 के शुरुआती महीने में अर्चना बहू बन कर चेतन के घर आ गई. चेतन ने अपने कुछ रिश्तेदारों की उपस्थिति में अर्चना से लवमैरिज कर ली.

लवमैरिज के बाद दोनों का सांसारिक जीवन हंसीखुशी से शुरू तो जरूर हुआ लेकिन कुछ ही दिनों के लिए. शादी के बाद से ही अर्चना और चेतन की मां की किचकिच शुरू हो गई थी. चेतन अकसर दोनों को समझाबुझा कर शांत कर देता था. लेकिन कब तक, आखिरकार उन के झगड़ों से परेशान हो कर चेतन घोरपड़े अपनी मां का घर छोड़ कर अर्चना के साथ जयसिंहपुर में किराए के घर में आ कर रहने लगा.

किराए के घर में आने के बाद अर्चना भी उसी कंपनी में सर्विस करने लगी, जिस में चेतन काम करता था. इस घर में आने के कुछ दिन बाद ही अर्चना का रहनसहन बदल गया था. हाथों में महंगा मोबाइल फोन, महंगे कपड़े उस के शौक बन गए. घूमनाफिरना, शौपिंग करना, ज्यादा समय फोन पर बातें करना उस की हौबी बन गई थी. चेतन जब भी उसे समझाने की कोशिश करता तो वह उस से उलझ जाती और उस की बातों पर ध्यान नहीं देती थी.

अर्चना की आए दिन की इन हरकतों से परेशान हो कर चेतन को लगने लगा था जैसे वह अर्चना से शादी कर के फंस गया है. अर्चना जैसी दिखती थी, वैसी थी नहीं. यह सोचसोच कर उस का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा था, जिसे शांत करने के लिए वह दोस्तों के साथ शराब पीने लगा था. इस से उस के घर का माहौल और खराब होने लगा था. अर्चना का खुले विचारों का होना और कंपनी के लोगों से हिलमिल जाना आग में घी का काम कर रहा था, जो अर्चना के चरित्र को कठघरे में खड़ा करता था.

इसी सब को ले कर चेतन घोरपड़े शराब के नशे में अर्चना के साथ अकसर झगड़ा और मारपीट करने लगा था. इस से परेशान हो कर अर्चना अपने मायके शिरोल चली जाती थी और वहीं से काम पर कंपनी आती थी. यह दूरियां तब और बढ़ गईं जब अर्चना अपनी शादी की सालगिरह के एक हफ्ते पहले चेतन से लड़ कर अपनी मां के पास चली गई और फिर वापस नहीं आई. इस बार चेतन घोरपड़े ने अर्चना से माफी मांग कर उसे घर लौट आने के लिए कहा लेकिन अर्चना ने उसे इग्नोर कर दिया.

वह अपने मायके शिरोल से लंबी दूरी तय कर के कंपनी आती थी लेकिन चेतन घोरपड़े की लाख मिन्नतों के बाद भी उस के पास नहीं आई और न ही शादी की सालगिरह की बधाई का फोन ही उठाया. लाचार हो कर चेतन घोरपड़े ने अर्चना को शादी की सालगिरह का मैसेज भेज कर शुभकामनाएं दीं. लेकिन उस का भी कोई जवाब नहीं आया तो मजबूरन शादी की सालगिरह के 2 दिन बाद वह अर्चना के मायके गया. जहां उस का स्वागत अर्चना की मां बसंती पुजारी ने किया और चेतन को काफी खरीखोटी सुनाई. साथ ही उसे पुलिस थाने तक ले जाने की धमकी भी दी.

फिर भी चेतन घोरपड़े ने अर्चना से अपनी गलतियों की माफी मांगते हुए उसे अपने घर चलने के लिए कहा. मगर अर्चना पर उस की माफी का कोई असर नहीं पड़ा. नाराज हो कर चेतन अपने घर लौट आया. जब इस बात की जानकारी उस के दोस्तों को हुई तो उन्होंने उस के जले पर नमक छिड़क दिया, जिस ने आग में घी का काम किया था. उन्होंने बताया कि अर्चना का किसी कार वाले से अफेयर चल रहा है जो उसे अपनी कार से कंपनी लाता और ले कर जाता है. इस से चेतन के मन में अर्चना के प्रति उपजे संदेह को और हवा मिल गई.

वह जितना अर्चना के बारे में गहराई से सोचता, उतना ही परेशान हो जाता. इस का नतीजा यह हुआ कि उस के मन में अर्चना के प्रति घोर नफरत भर गई. उसके प्यार का दर्द छलक गया और उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया. अपने निर्णय के अनुसार, घटना वाले दिन चेतन कंपनी में गया और अर्चना को कंपनी के बाहर बुला कर कुछ जरूरी काम के लिए घर चलने के लिए कहा. कंपनी में तमाशा न बने, इसलिए अर्चना बिना कुछ बोले उस के साथ घर आ गई.

घर आने के बाद दोनों के बीच जोरदार झगड़ा हुआ तो पहले से ही तैयार चेतन ने अपनी जेब से ब्लेड निकाल कर अर्चना के हाथों की कलाई काट दी. जब अर्चना चिल्लाई तो उस के गालों पर भी ब्लेड मार कर पास पड़े मोबाइल चार्जर से उस का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. अर्चना घोरपड़े की जीवनलीला खत्म करने के बाद अब उस के जीने का कोई मकसद नहीं बचा था. उस ने अपने जीवन को भी खत्म करने का फैसला कर अपनी चाची को फोन कर सारी कहानी बताई. फिर साफसफाई के लिए घर में रखी फिनायल पी कर पुलिस थाने पहुंच गया.

जांच अधिकारी एपीआई शिवानंद कुमार और उन की टीम ने चेतन मनोहर घोरपड़े से विस्तृत पूछताछ करने के बाद मामले को भादंवि की धारा 302, 34 के तहत दर्ज कर के चेतन को न्यायिक हिरासत में जयसिंहपुर जेल भेज दिया. Hindi Crime Story

UP Crime: रिश्तों पर लगा खून का दाग – बुआ ने भतीजी को टैंक में डुबोया

UP Crime: एक दिल दहला देने वाली वारदात ने रिश्तों की मर्यादा को चकनाचूर कर दिया. प्रेम संबंध के चलते एक महिला ने अपनी ही भतीजी की हत्या कर दी और भाभी पर जानलेवा हमला कर डाला. सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि बुआ का रिश्ता इतनी बेरहमी में बदल गया? आइए इस हत्याकांड की पूरी कहानी विस्तार से जानते हैं, जो आप को झकझोर कर रख देगी.

यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बसीकलां गांव से सामने आया है. यहां एक माना नाम की एक युवती ने पहले अपनी 4 साल की भतीजी को पानी के टैंक में डाल कर मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद सो रही भाभी फिरदौस पर चाकू से कई वार किए. इस हमले में भाभी के बच्चे भी घायल हो गए.

बताया जा रहा है कि घटना से 2 दिन पहले आरोपी युवती माना ने अपनी भाभी को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. उस ने रात के खाने में परिवार को नींद की गोलियां दे दीं, ताकि सभी गहरी नींद में सो जाएं. जब सब बेखबर थे, तब उस ने अपनी मासूम भतीजी इशारा को पानी के टैंक में डाल दिया, जहां दम घुटने से उस की मौत हो गई. इस के बाद उस ने गहरी नींद में सो रही भाभी फिरदौस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया.

हमले के दौरान घर में मौजूद फिरदौस के 3 छोटे बच्चे भी चाकू लगने से जख्मी हो गए. चीखपुकार सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि फिरदौस खून से लथपथ पड़ी है और उस की बेटी लापता है. तुरंत पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस टीम, डाग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंची और घायलों को अस्पताल भेजा गया. हालत गंभीर होने पर महिला को मेरठ रेफर किया गया.

जब पुलिस ने घर की तलाशी ली तो पानी के टैंक से बच्ची का शव बरामद हुआ. इस के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस ने शक के आधार पर बुआ माना को हिरासत में लिया और सख्ती से पूछताछ की, जिस में उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पूछताछ में माना ने बताया कि गांव के एक युवक से उस का लंबे समय से प्रेम संबंध था. परिवार को जानकारी मिलने पर उस का रिश्ता कहीं और तय कर दिया गया. इसी बीच उस का प्रेमी नौकरी के सिलसिले में चेन्नई चला गया. जब भी वह चोरीछिपे उस से फोन पर बात करती, तो भाभी उसे टोकती थी. इसी रंजिश में उस ने यह खौफनाक साजिश रची. फिलहाल पुलिस ने आरोपी माना को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की गहन जांच जारी है. UP Crime

Crime News: अपहरण के चक्कर में फंस गया मुंबई का किंग

Crime News:15 मई, 2017 की सुबह की बात है. समय 11-साढ़े 11 बजे सीकर जिले के शहर फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार अपनी ज्वैलरी की दुकान पर थे. उन की पत्नी पार्वती और बेटा ध्रुव ही घर पर थे. बेटी वर्षा किसी काम से बाजार गई थी. उसी समय अच्छी कदकाठी का एक सुदर्शन युवक उन के घर पहुंचा. उस के हाथ में शादी के कुछ कार्ड थे. युवक ने ललित के घर के बाहर लगी डोरबेल बजाई तो पार्वती ने बाहर आ कर दरवाजा खोला. युवक ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘नमस्ते आंटीजी, पोद्दार अंकल घर पर हैं?’’

पार्वती ने शालीनता से जवाब देते हुए कहा, ‘‘नमस्ते भैया, पोद्दारजी तो इस समय दुकान पर हैं. बताइए क्या काम है?’’

‘‘आंटीजी, हमारे घर में शादी है. मैं कार्ड देने आया था.’’ युवक ने उसी शालीनता से कहा.

युवक के हाथ में शादी के कार्ड देख कर पार्वती ने उसे अंदर बुला लिया. युवक ने सोफे पर बैठ कर एक कार्ड पार्वती की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आंटीजी, यह कार्ड पोद्दार अंकल को दे दीजिएगा. आप लोगों को शादी में जरूर आना है. बच्चों को भी साथ लाइएगा.’’

पार्वती ने शादी का कार्ड देख कर कहा, ‘‘भैया आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आंटीजी, आप नहीं पहचानतीं, लेकिन पोद्दार अंकल मुझे अच्छी तरह से पहचानते हैं.’’ युवक ने कहा.

पार्वती ने घर आए, उस मेहमान से चायपानी के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘चायपानी के तकल्लुफ की कोई जरूरत नहीं है, आंटीजी. अभी एक कार्ड आप के भांजे अश्विनी को भी देना है. मैं उन का घर नहीं जानता. आप अपने बेटे को मेरे साथ भेज देतीं तो वह उन का घर बता देता. कार्ड दे कर मैं आप के बेटे को छोड़ जाऊंगा.’’

बाहर तेज धूप थी. इसलिए पार्वती बेटे को बाहर नहीं भेजना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘आप कार्ड हमें दे दीजिए. शाम को अश्विनी हमारे घर आएगा तो हम कार्ड दे देंगे.’’

पार्वती की बात सुन कर युवक ने मायूस होते हुए कहा, ‘‘कार्ड तो मैं आप को दे दूं, लेकिन पापा मुझे डांटेंगे. उन्होंने कहा है कि खुद ही जा कर अश्विनी को कार्ड देना.’’

युवक की बातें सुन कर पार्वती ने ड्राइंगरूम में ही वीडियो गेम खेल रहे अपने 13 साल के बेटे ध्रुव से कहा, ‘‘बेटा, अंकल के साथ जा कर इन्हें अश्विनी का घर बता दे.’’

ध्रुव मां का कहना टालना नहीं चाहता था, इसलिए वह अनमने मन से जाने को तैयार हो गया. वह युवक ध्रुव के साथ घर से निकलते हुए बोला, ‘‘थैंक्यू आंटीजी.’’

ध्रुव और उस युवक के जाने के बाद पार्वती घर के कामों में लग गईं. काम से जैसे ही फुरसत मिली उन्होंने घड़ी देखी. दोपहर के साढ़े 12 बज रहे थे. ध्रुव को कब का घर आ जाना चाहिए था. लेकिन वह अभी तक नहीं आया था. पार्वती ने सोचा कि ध्रुव वहां जा कर खेलने या चायपानी पीने में लग गया होगा. हो सकता है, अश्विनी ने उसे किसी काम से भेज दिया हो. यह सोच कर वह फिर काम में लग गईं.

थोड़ी देर बाद उन्हें जब फिर ध्रुव का ध्यान आया, तब दोपहर का सवा बज रहा था. ध्रुव को घर से गए हुए डेढ़ घंटे से ज्यादा हो गया था. पार्वती को चिंता होने लगी. 10-5 मिनट वह सेचती रहीं कि क्या करें. कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने पति ललित पोद्दार को फोन कर के सारी बात बता दी. पत्नी की बात सुन कर ललित को भी चिंता हुई. उन्होंने पत्नी को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘ध्रुव कोई छोटा बच्चा नहीं है कि कहीं खो जाए या इधरउधर भटक जाए. फिर भी मैं अश्विनी को फोन कर के पता करता हूं.’’

ललित ने अश्विनी को फोन कर के ध्रुव के बारे में पूछा तो अश्विनी ने जवाब दिया, ‘‘मामाजी, मेरे यहां न तो ध्रुव आया था और ना ही कोई आदमी शादी का कार्ड देने आया था.’’

अश्विनी का जवाब सुन कर ललित भी चिंता में पड़ गए. वह तुरंत घर पहुंचे और पार्वती से सारी बातें पूछीं. उन्होंने वह शादी का कार्ड भी देखा, जो वह युवक दे गया था. कार्ड पर लियाकत सिवासर का नाम लिखा था. ललित को वह शादी का कार्ड अपने किसी परिचित का नहीं लगा. उन्होंने कार्ड पर लिखे मोबाइल नंबरों पर फोन किया तो वे नंबर फरजी निकले.

ललित को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. उन के मन में बुरे ख्याल आने लगे. उन्हें आशंका इस बात की थी कि कहीं किसी ने पैसों के लालच में ध्रुव का अपहरण न कर लिया हो. इस की वजह यह थी कि वह फतेहपुर के नामीगिरामी ज्वैलर थे. राजस्थान के शेखावटी इलाके में उन का अच्छाखासा रसूख था. बेटे के घर न आने से पार्वती का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था.

ललित ने अपने कुछ परिचितों से बात की तो सभी ने यही सलाह दी कि इस मामले की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए. इस के बाद दोपहर करीब ढाई बजे ललित ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. पार्वती से पूछताछ की गई. शुरुआती जांच से यही नतीजा निकला कि ध्रुव का अपहरण किया गया है.

अपहर्त्ता प्रोफेशनल अपराधी हो सकते थे. क्योंकि रात तक फिरौती के लिए किसी अपहर्त्ता का फोन नहीं आया था. पुलिस को अनुमान हो गया था कि अपहर्त्ता ने ध्रुव के अपहरण का जो तरीका अपनाया था, उस से साफ लगता था कि उन्होंने रेकी कर के ललित पोद्दार के बारे में जानकारियां जुटाई थीं.

पुलिस ने फिरौती मांगे जाने की आशंका के मद्देनजर पोद्दार परिवार के सारे मोबाइल सर्विलांस पर लगवा दिए. लेकिन उस दिन रात तक ना तो किसी अपहर्त्ता का फोन आया और ना ही ध्रुव को साथ ले जाने वाले उस युवक के बारे में कोई जानकारी मिली. पुलिस ने ललित के घर के आसपास और लक्ष्मीनारायण मंदिर के करीब स्थित उस की दुकान के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली, लेकिन उन से पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ.

पुलिस को अब तक केवल यही पता चला था कि ललित पोद्दार के घर जो युवक शादी का कार्ड देने आया था, उस की उम्र करीब 30 साल के आसपास थी. वह सफेद शर्ट पहने हुए था. अगले दिन सीकर के एसपी राठौड़ विनीत कुमार त्रिकमलाल ने ध्रुव का पता लगाने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों को दिशानिर्देश दिए. इस के बाद पुलिस ने उस शादी के कार्ड को आधार बना कर जांच आगे बढ़ाई.

परेशानी यह थी कि शादी के कार्ड पर किसी प्रिंटिंग प्रैस का नाम नहीं लिखा था, जबकि हर शादी के कार्ड पर प्रिंटिंग प्रैस का नाम जरूरी होता है. इस की वजह यह है कि राजस्थान सरकार ने बालविवाह की रोकथाम के लिए यह कानूनी रूप से जरूरी कर दिया है. पुलिस ने शादी के कार्ड छापने वाले प्रिंटिंग प्रैस मालिकों से बात की तो पता चला कि उस कार्ड में औफसेट पेंट का इस्तेमाल किया गया था.

उस पेंट का उपयोग फतेहपुर में नहीं होता था. सीकर में प्रिंटिंग प्रैस वाले उस का उपयोग करते थे. इस के बाद पुलिस ने सीकर, चुरू और झुंझुनूं के करीब डेढ़ सौ प्रैस वालों से पूछताछ की. इस जांच के दौरान एक नया तथ्य यह सामने आया कि ध्रुव के अपहरण से 4 दिन पहले से उसी के स्कूल में पढ़ने वाला छात्र अंकित भी लापता था. अंकित चुरू जिले के रतनगढ़ शहर का रहने वाला था. वह फतेहपुर के विवेकानंद पब्लिक स्कूल में पढ़ता था और हौस्टल में रहता था. गर्मी की छुट्टी में वह रतनगढ़ अपने घर गया था. वह 12 मई को दोपहर करीब सवा बारह बजे बाल कटवाने के लिए घर से निकला था, तब से लौट कर घर नहीं आया था.

तीसरे दिन आईजी हेमंत प्रियदर्शी एवं एसपी राठौड़ विनीत कुमार ने ध्रुव के घर वालों से मुलाकात की और उन्हें आश्वासन दिया कि ध्रुव का जल्द से जल्द पता लगा लिया जाएगा. उसी दिन यानी 17 मई को अपहर्त्ता ने ललित पोद्दार को फोन कर के बताया कि उन के बेटे ध्रुव का अपहरण कर लिया गया है. उन्होंने ध्रुव की उन से बात करा कर 70 लाख रुपए की फिरौती मांगी.

उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि अगर पुलिस को बताया तो बच्चे को मार दिया जाएगा. ललित ने समझदारी से बातें करते हुए अपहर्त्ता से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि नोटबंदी को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. भाइयों, परिवार वालों और रिश्तेदारों से पैसे जुटाने के लिए समय चाहिए. चाहे जितनी कोशिश कर लूं, 70 लाख रुपए इकट्ठे नहीं हो पाएंगे. बैंक से एक साथ ज्यादा पैसा निकाला तो पुलिस को शक हो जाएगा.

ललित ने अपहर्ता को अपनी मजबूरियां बता कर यह जता दिया कि वह 70 लाख रुपए नहीं दे सकते. बाद में अपहर्ता 45 लाख रुपए ले कर ध्रुव को सकुशल छोड़ने को राजी हो गए. अपहर्ताओं ने फिरौती की यह रकम कोलकाता में हावड़ा ब्रिज पर पहुंचाने को कहा. लेकिन बाद में वे फिरौती की रकम मुंबई में लेने को तैयार हो गए.

ललित का मोबाइल पहले से ही पुलिस सर्विलांस पर लगा रखा था. पुलिस को अपहर्ता और ललित के बीच हुई बातचीत का पता चल गया. इसी के साथ पुलिस को वह मोबाइल नंबर भी मिल गया, जिस से ललित को फोन किया गया था.

इसी बीच पुलिस ने शादी के उस कार्ड की जांच एक्सपर्ट से कराई तो पता चला कि वह एविडेक प्रिंटर से छपा था. शेखावटी के सीकर, चुरू व झुंझुनूं जिले में करीब 60 एविडेक प्रिंटर थे. इन प्रिंटर मालिकों से पूछताछ की गई तो पता चला कि वह कार्ड नवलगढ़ के एक प्रिंटर से छपवाया गया था. उस प्रिंटर के मालिक से पूछताछ में पता चला कि वह कार्ड फतेहपुर के किसी आदमी ने उस के प्रिंटर पर छपवाया था. उस आदमी से पूछताछ में पुलिस को अपहर्त्ता युवक के बारे में कुछ सुराग मिले.

इस के अलावा पुलिस ने 15 मई को ललित पोद्दार के मकान के आसपास घटना के समय हुई सभी मोबाइल कौल को ट्रेस किया. इस में मुंबई का एक नंबर मिला. यह नंबर साजिद बेग का था. काल डिटेल्स के आधार पर यह भी पता चल गया कि साजिद के तार फतेहपुर के रहने वाले अयाज से जुड़े थे.

जांच में यह बात भी सामने आ गई कि अपहर्ता मुंबई से जुड़ा है. इस पर पुलिस ने फतेहपुर से ले कर विभिन्न राज्यों के टोल नाकों पर जांच की और उन नाकों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस में सब से पहले शोभासर के टोल पर सफेद रंग की एसेंट कार पर जयपुर का नंबर मिला. अगले टोल नाके मौलासर पर इसी कार पर महाराष्ट्र की नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. आगे के टोल नाकों पर उसी कार पर अलगअलग नंबर प्लेट लगी हुई पाई गई. जांच में ये सारे नंबर फरजी पाए गए.

सीकर के एसपी ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर से बात कर के ध्रुव के अपहरण की पूरी जानकारी दे कर अपराधियों को पकड़ने में सहायता करने का आग्रह किया. इसी के साथ एसपी के दिशानिर्देश पर एडिशनल एसपी तेजपाल सिंह ने 3 टीमें गठित कर के 3 राज्यों में भेजी. सब से पहले रामगढ़ शेखावाटी के थानाप्रभारी रमेशचंद्र को टीम के साथ मुंबई भेजा गया. यह टीम मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच के साथ मिल कर आरोपियों की तलाश में जुट गई.

फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह ने लगातार जांच कर के ध्रुव के अपहरण में साजिद बेग और फतेहपुर के रहने वाले अयाज के साथ उस के संबंधों के बारे में पता लगाया.

एसपी ध्रुव के घर वालों को सांत्वना देने के साथ यह भी बताते रहे कि उन्हें अपहर्ता को किस तरह बातों में उलझा कर रखना है, ताकि पुलिस बच्चे तक पहुंच सके. पुलिस की एक टीम उत्तर प्रदेश और एक टीम पश्चिम बंगाल भी भेजी गई. पुलिस को संकेत मिले थे कि अपहर्ता धु्रुव को ले कर मुंबई, कोलकाता या कानपुर जा सकते हैं.

लगातार भागदौड़ के बाद सीकर पुलिस ने मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की मदद से 21 मई की आधी रात के बाद मुंबई के बांद्रा  इलाके से ध्रुव को सकुशल बरामद कर लिया. पुलिस ने उस के अपहरण के आरोप में साजिद बेग को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया था. इस के अलावा उस की 2 गर्लफ्रैंड्स को भी गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने वह एसेंट कार भी बरामद कर ली, जिस से ध्रुव का अपहरण किया गया था. सीकर पुलिस 22 मई की रात ध्रुव और आरोपियों को ले कर मुंबई से रवाना हुई और 23 मई को फतेहपुर आ गई.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में मुंबई से साजिद बेग और उस की गर्लफ्रैंड्स यास्मीन जान और हालिमा मंडल को गिरफ्तार किया था. पूछताछ के बाद फतेहपुर के रहने वाले अयाज उल हसन उर्फ हयाज को गिरफ्तार किया गया. इस के बाद सभी आरोपियों से की गई पूछताछ में ध्रुव के अपहरण की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

साजिद बेग पेशे से सिविल इंजीनियर था. वह बांद्रा, मुंबई में मछली बाजार में रहता था. उसे हिंदी, अंग्रेजी व मारवाड़ी का अच्छा ज्ञान था. वह मूलरूप से फतेहपुर का ही रहने वाला था. उस के दादा और घर के अन्य लोग मुंबई जा कर बस गए थे. फतेहपुर में साजिद का 2 मंजिला आलीशान मकान था. वह फतेहपुर आताजाता रहता था. उस की पत्नी भी पढ़ीलिखी है. उस का एक बच्चा भी है.

मुंबई स्थित उस के घर पर नौकरचाकर काम करते हैं. उस के पिता के भाई और अन्य रिश्तेदार भी मुंबई में ही रहते हैं. इन के लोखंडवाला, बोरीवली सहित कई पौश इलाकों में आलीशान बंगले हैं. वह मुंबई में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम करता था. मौजमस्ती के गलत शौक और व्यापार में घाटा होने की वजह से साजिद कई महीनों से आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उस पर करीब 30 लाख रुपए का कर्ज हो गया था. इसलिए वह जल्द से जल्द किसी भी तरीके से पैसे कमा कर अपना कर्ज उतारना चाहता था.

करीब 2 महीने पहले साजिद ने फतेहपुर के रहने वाले अपने बचपन के दोस्त अयाज उल हसन उर्फ हयाज को मुंबई बुलाया. वह 5 दिनों  तक मुंबई में रहा. इस बीच साजिद ने उस से पैसे कमाने के तौर तरीकों के बारे में बात की. इस पर अयाज ने कहा कि फतेहपुर में किसी का अपहरण कर के उस के बदले में अच्छीखासी फिरौती वसूली जा सकती है. हालांकि उस समय यह तय नहीं हुआ था कि अपहरण किस का किया जाएगा.

साजिद ने अयाज को यह कह कर फतेहपुर वापस भेज दिया कि वह किसी ऐसी पार्टी का चयन करे, जिस से मोटी रकम वसूली जा सके. अयाज फतेहपुर आ कर योजना बनाने लगा. अयाज ने पिछले साल फतेहपुर के ज्वैलर ललित पोद्दार के मकान पर पेंट का काम किया था. इसलिए उसे ललित के घरपरिवार की सारी जानकारी थी. उस ने साजिद को ललित के बारे में बताया.

इस के बाद दोनों ने ललित के बेटे ध्रुव के अपहण की योजना बना ली. उसी योजना के तहत शादी का फरजी कार्ड नवलगढ़ से छपवाया गया. इस के बाद कार्ड से कैमिकल द्वारा प्रिंटिंग प्रैस का नाम हटा दिया गया. योजनानुसार साजिद 10 मई को मुंबई से कार ले कर फतेहपुर आ गया और दरगाह एरिया में रहने वाले अपने दोस्त अयाज से मिला. इस के बाद ध्रुव के अपहरण की योजना को अंतिम रूप दिया गया.

15 मई को शादी का कार्ड देने के बहाने साजिद ललित के घर से उस के बेटे धु्रव को अश्विनी के घर ले जाने की बात कह कर साथ ले गया और उसे घर के बाहर खड़ी एसेंट कार में बैठा लिया. उस ने धु्रव से कहा कि गाड़ी में पैट्रोल नहीं है, इसलिए पहले पैट्रोल भरवा लें, फिर अश्विनी के घर चलेंगे.

फतेहपुर में पैट्रोल पंप से पहले ही साजिद ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी तो ध्रुव को शक हुआ. वह शीशा खोल कर ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाने लगा. इस पर साजिद ने उसे कोई नशीली चीज सुंघा दी, जिस से वह बेहोश हो गया.

ध्रुव को बेहोशी की हालत में पीछे की सीट पर सुला कर साजिद अपनी कार से मुंबई ले गया. बीचबीच में टोलनाकों से पहले उस ने 5 बार कार की नंबर प्लेट बदलीं.

साजिद ने अपहृत ध्रुव को मुंबई में अपनी 2 गर्लफ्रैंड्स के पास रखा. इन में एक गर्लफ्रैंड यास्मीन जान मुंबई के चैंबूर में लोखंड मार्ग पर रहती थी. तलाकशुदा यास्मीन को साजिद ने बता रखा था कि वह कुंवारा है. उस ने उसे शादी करने का झांसा भी दे रखा था. साजिद ने यास्मीन को धु्रव के अपहरण के बारे में बता दिया था. यास्मीन फिरौती में मिलने वाली मोटी रकम से साजिद के साथ ऐशोआराम की जिंदगी गुजारने का सपना देख रही थी. इसलिए उस ने साजिद की मदद की और धु्रव को अपने पास रखा.

साजिद की दूसरी गर्लफ्रैंड हालिमा मंडल मूलरूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली थी. वह पिछले कई सालों से बांद्रा इलाके में बाजा रोड पर रहती थी. उस के 2 बच्चे हैं. साजिद मुंबई पहुंच कर ध्रुव को सीधे हलिमा के घर ले गया था. उस ने उसे ध्रुव के अपहरण के बारे में बता दिया था. हालिमा ने भी फिरौती में मोटी रकम मिलने के लालच में साजिद का साथ दिया और ध्रुव को अपने पास रखा. वह ध्रुव को नींद की गोलियां देती रही, ताकि वह शोर न मचा सके.

फेसबुक पर एक पोस्ट में खुद को मुंबई का किंग बताने वाला साजिद इतना शातिर था कि ललित पोद्दार से या अयाज से बात करने के बाद मोबाइल स्विच औफ कर लेता था, ताकि पुलिस उसे ट्रेस न कर सके. ध्रुव को जहां रखा गया था, वहां से वह करीब सौ किलोमीटर दूर जा कर नए सिम से फोन करता था, ताकि अगर किसी तरह पुलिस मोबाइल नंबर ट्रेस भी कर ले तो उसी लोकेशन पर बच्चे को खोजती रहे.

साजिद के बताए अनुसार, टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिकों को देख कर उस ने ध्रुव के अपहरण की साजिश रची थी. सीरियलों को देख कर ही उस ने हर कदम पर सावधानी बरती, लेकिन पुलिस उस तक पहुंच ही गई. जबकि उस ने पुलिस से बचने के तमाम उपाय किए थे.

23 मई को पुलिस ध्रुव को ले कर फतेहपुर पहुंची तो पूरा शहर खुशी से नाच उठा. पुष्पवर्षा और आतिशबाजी की गई. 9 दिनों बाद बेटे को सकुशल देख कर पार्वती की आंखों से आंसू बह निकले. पिता ललित पोद्दार ने बेटे को गले से लगा कर माथा चूम लिया. सालासर मंदिर में लोगों ने फतेहपुर कोतवाली के थानाप्रभारी महावीर सिंह का सम्मान किया.

पुलिस ने ध्रुव के अपहरण के मामले में साजिद के अलावा यास्मीन जान, हालिमा मंडल और फतेहपुर निवासी अयाज को गिरफ्तार किया था. फतेहपुर के एक अन्य युवक की भी इस मामले में भूमिका संदिग्ध पाई गई. इस के अलावा उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर नसरत उर्फ नागा उर्फ चाचा का नाम भी ध्रुव के अपहरण में सहयोगी के रूप में सामने आया है.

नसरत उर्फ नागा उत्तर प्रदेश के सिमौनी का रहने वाला था. वह फिलहाल मुंबई के गौरी खानपुर में रहता है. साजिद काफी समय से उस के संपर्क में था. उस के साथ नागा भी आया था. उस ने नागा को सीकर में ही छोड़ दिया था.

ध्रुव के अपहरण के बाद नागा साजिद के साथ हो गया था. दोनों ध्रुव को ले कर मुंबई गए थे. नागा पर उत्तर प्रदेश और मुंबई में हत्या के 3 मामले और लूट, चाकूबाजी, हथियार तस्करी, गुंडा एक्ट आदि के दर्जनों मामले दर्ज हैं. वह हिस्ट्रीशीटर है. कथा लिखे जाने तक सीकर पुलिस इस मामले में नागा की तलाश कर रही थी. Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Honey Trap Case: सुनहरे जाल में फंसा डीआरडीओ का वैज्ञानिक

Honey Trap Case: धन और सुंदर रूपयौवन का लालच ऐसा है जिस से कोई बच नहीं सकता. शातिर किस्म के लोग कहीं धन दिखा कर तो कहीं सुंदर यौवन दिखा कर सुनहरा जाल फेंकते हैं और मनचाहा शिकार फांस ही लेते हैं. इस जाल में फंसने से विरला ही कोई हो जो बच सके. रामायण की कथा के नायक और त्रिकालदर्शी कहे जाने वाले राम ही जब सोने के हिरण के भ्रम में फंस कर अपनी पत्नी सीता को गंवा बैठे तो आम इंसान की क्या औकात है.

आजकल हनीट्रैप के मामले भी ऐसे ही हैं. आए दिन नए राम फंस रहे हैं पर यह मामला जरा गंभीर किस्म का है. देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. महाराष्ट्र एटीएस ने डीआरडीओ के सीनियर सिस्टम इंजीनियर निशांत अग्रवाल को गिरफ्तार कर पाकिस्तान की आईएसआई के लिए जासूसी करने का खुलासा किया है. निशांत फेसबुक पर पाकिस्तान की फर्जी महिला के जाल में फंस गया था. उसे हाल ही में युवा इंजीनियर का अवार्ड भी मिला था.

निशांत अग्रवाल पाकिस्तान की दो महिलाओं  के फर्जी नाम से बने फेसबुक अकाउंट से उन के जाल में फंसा हुआ था. उस की इन ‘महिलाओं’ से चैटिंग होती थी. चैटिंग के दौरान उस ने अपनी मिसाइल यूनिट से कई गोपनीय जानकारियां जुटानी शुरू कर दीं. इन में से कुछ जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचाने की बात सामने आई है.

निशांत मिसाइल यूनिट में सीनियर सिस्टम इंजीनियर है. वह नागपुर में डीआरडीओ की ब्रह्मोस यूनिट में कार्यरत था. उस के पास यहां की कई तकनीकी गोपनीय जानकारियां रहती थीं. गोपनीय जानकारियों को उस ने अपने निजी लैपटोप और मोबाइल में सेव कर रखा था.

उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र एटीएस उस से पूछताछ कर रही है. निशांत के अलावा जासूसी के शक में डिफेंस मैटेरियल एंड स्टोर्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेबलिशमेंट [डीएमएसआरडीई] कानपुर के दो वैज्ञानिकों से भी पूछताछ की गई. दोनों वैज्ञानिक ब्रह्मोस से संबंधित बेहद संवेदनशील पार्ट्स को विकसित करने वाली तकनीक से जुड़े हैं. एटीएस ने एक महिला वरिष्ठ वैज्ञानिक को हिरासत में लिया है. पूछताछ के बाद उस का लैपटोप भी सीज किया है. संस्थान के इन वैज्ञानिकों को भी फेसबुक के जरिए ट्रैप किया गया. एटीएस को शक है कि ब्रह्मोस से जुड़ी टैक्नोलौजी को लीक किया गया है.

पिछले दिनों बीएसएफ के जवान अच्युतानंद मिश्रा को भी पाकिस्तान के लिए जासूसी के इल्जाम में पकड़ा गया था. उसे इसी तरह जाल में फंसाया गया था. अच्युतानंद की गिरफ्तारी के बाद फेसबुक आईडी से कई दोस्तों की पड़ताल की गई तो निशांत का पता चला. जांच पड़ताल के दौरान पाकिस्तान की दो और महिलाओं के नाम से बनी फर्जी फेसबुक आईडी पर कई राज्यों के और लोग भी चैटिंग कर रहे हैं.

यूपी एटीएस का कहना है कि उस की जांच में पता चला है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई खूबसूरत लड़कियों की फर्जी फेसबुक आईडी बना कर केंद्रीय बलों और वैज्ञानिक संस्थानों के लोगों को प्रेमजाल में फंसा कर जासूसी करा रही है.

आईएसआई के लिए जासूसी करने के आरोप में डीआरडीओ के इंजीनियर निशांत अग्रवाल की गिरफ्तारी एक कर्मचारी पर ही नहीं, सरकार और समूचे समाज व्यवस्था पर सवाल उठाती है? डीआरडीओ देश की रक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान है. इस के एक वरिष्ठ अधिकारी पर जासूसी का आरोप बहुत गंभीर बात है.

सरकारी पद पर बैठने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह के लालच से दूर रहने की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है. ईमानदार, वफादार, कर्तव्यनिष्ठ रहने की न तो हमारे समाज ने ऐसी कोई ट्रेनिंग दी और न ही सरकार ने. कहने को उन के लिए नियमकायदे, आचारसंहिता बनी हुई है पर उस की परवाह कौन करता है.

लालच बुरी बला है, जैसी सूक्तियां सिर्फ दीवारों पर शोभा देती हैं. वास्तविक जीवन में इन सूक्तियों को लोग नहीं अपनाते. गिफ्ट, इनाम, धन दोगुना करने जैसे लालच में लोग आए दिन फंसते हैं.

हालांकि धर्म के प्रवचनों में तमाम तरह की अच्छी सीखें बताई गई हैं पर धर्म की अच्छी सीखें खुद ही एक तरह का जाल ही हैं जो भक्तों को फंसाता है और प्रवचनकर्ता, गुरु को फायदा पहुंचाता है. यह सुनहरी अच्छी सीखों का जाल गुरु, प्रवचनकर्ता ही फेंकता है जो भक्तों को धनदौलत त्याग करने की सलाह देता है और स्वयं स्वर्ण सिंहासन पर बैठता है, एसी गाड़ी में चलता है. धर्म सब से बड़ा सुनहरा जाल है.

जिम्मेदार पद पर बैठे कर्मचारी को कोई भी रूप यौवन, धन का लालच दे कर अपने जाल में फंसा ले, यह शासन, प्रशासन ही नहीं, समाज व देश के लिए भी गंभीरता से सोचने की बात है. Honey Trap Case