मोहब्बत का खूनी अंजाम – भाग 3

अक्तूबर, 2017 की बात है. विभांशु दशहरे का मेला घूमने गया था. फोन कर के उस ने रुचि को भी मेले में बुला लिया था. काफी देर तक साथसाथ मेला घूमने के बाद दोनों अपनेअपने घरों को रवाना हुए. प्रेमिका से विदा होते विभांशु ने उसे फ्लाइंग किस दिया. रुचि ने मुसकरा कर इस का जवाब दे दिया.

इत्तफाक से उसी समय श्यामनारायण भी कहीं से उधर आ पहुंचा. उस ने दोनों को किस लेते देते देख लिया था. यह देख कर उस का खून खौल उठा. उस ने आव देखा न ताव, कुछ ग्रामीणों को आवाज लगा दी.

ग्रामप्रधान की आवाज सुन कर गांव के तमाम लोग वहां पहुंच गए. प्रधान ने विभांशु पर गांव की लड़की को छेड़ने का आरोप लगाया. इस के बाद तो ग्रामीण भड़क गए. विभांशु वहां से भागा तो उन्होंने दौड़ कर उसे दबोच लिया. इस के बाद उस की जम कर पिटाई की.

पिटाई के बाद भी उन्होंने विभांशु को नहीं छोड़ा बल्कि प्रधान श्यामनारायण ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया. जीयनपुर के थानाप्रभारी ने विभांशु को लड़की छेड़ने के आरोप में जेल भेज दिया. इस तरह प्रधान ने विभांशु को जेल भिजवा कर अपनी खुन्नस निकाल ली.

घर वालों को जब यह पता चला कि लड़की छेड़ने के आरोप में विभांशु जेल में बंद है तो वे परेशान हो गए. शर्म के मारे उन का चेहरा झुक गया. किसी तरह विभांशु के बड़े भाई वकील घनश्याम पांडेय ने उस की जमानत कराई. घर वालों ने विभांशु को खूब डांटा, साथ ही समझाया कि ये इश्कविश्क का चक्कर छोड़ कर पढ़ाई पर ध्यान दो. जब समय आएगा तो किसी अच्छी लड़की से शादी करा कर गृहस्थी बसा दी जाएगी.

परिवार के दबाव में आ कर उस समय तो कह दिया कि वह ऐसा कोई काम नहीं करेगा, जिस से परिवार की बदनामी हो लेकिन वह दिल से रुचि को निकाल नहीं पाया. साथ ही वह श्यामनारायण द्वारा जेल भिजवा देने वाली बात से काफी आहत था. उस ने तय कर लिया कि वह इस का बदला जरूर लेगा.

वह प्रधान श्यामनारायण से बदला लेने का मौका ढूंढने लगा. इसी बीच 4 दिसंबर, 2017 को ग्रामप्रधान श्यामनारायण पर किसी ने हमला कर दिया. प्रधान का पूरा शक विभांशु पर आ गया. प्रधान ने तय कर लिया कि वह विभांशु को सूद के साथ इस का भुगतान करेगा. जबकि वास्तविकता यह थी कि विभांशु का उस हमले से कोई लेनादेना नहीं था और न ही उस ने ऐसा किया था.

बहरहाल, इश्क की जलन ने एक नाकाम प्रेमी श्यामनारायण राय को इंसान से शैतान बना दिया था. वह विभांशु के खून का प्यासा हो गया. वह मौके की तलाश में था लेकिन उसे मौका नहीं मिल पा रहा था.

7 दिसंबर, 2017 की शाम 6 बजे रुचि ने विभांशु को फोन कर के मिलने के लिए आजमगढ़ बुलाया. प्रेमिका के बुलावे पर वह बेहद खुश था. तैयार हो कर वह बाइक ले कर रुचि से मिलने निकल गया. घर से निकलते समय उस ने घर वालों से यही कहा था कि वह शहर जा रहा है और थोड़ी देर में आ जाएगा.

विभांशु पहले अलहलादपुर में रहने वाले अपने दोस्त दीपक सिंह के घर गया. वहां उस ने बाइक खड़ी की ओर उस की स्विफ्ट डिजायर कार ले कर प्रेमिका से मिलने आजमगढ़ रवाना हो गया. यह बात पता नहीं कैसे प्रधान श्यामनारायण को पता चल गई. फिर तो उस की बांछें खिल उठीं. वह कल्याणपुर बांसगांव से पहले खालिसपुर गांव के पास घात लगा कर बैठ गया. रात 11 बजे के करीब विभांशु स्विफ्ट डिजायर कार ले कर गुजरा.

प्रधान ने गाड़ी में विभांशु को जाते देख लिया. प्रधान मोटरसाइकिल पर था. उस ने कार का पीछा किया और ओवरटेक कर के उसे रोक लिया. सुनसान जगह पर प्रधान को देख विभांशु का माथा ठनक गया. वह कार ले कर वहां से भागना चाहा लेकिन कार के आगे प्रधान और उस की बाइक थी, इसलिए वहां से नहीं भाग सका.

सड़क पर ही दोनों के बीच बहस छिड़ गई. बात काफी बढ़ गई. मामला गालीगलौज से हाथापाई तक पहुंच गया. प्रधान श्यामनारायण का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उस ने कार का दरवाजा खोल कर विभांशु को खींच कर बाहर निकाल लिया. उसी समय उस ने कमर से लाइसेंसी पिस्टल निकाली और उस के सिर में गोली मार दी.

गोली लगते ही विभांशु कटे पेड़ की तरह धड़ाम से सड़क पर गिर गया और मौके पर ही उस की मौत हो गई. इस के बाद प्रधान ने फोन कर के छोटे भाई सत्यम राय उर्फ रजनीश को मौके पर बुला लिया.

श्यामनारायण और सत्यम दोनों ने मिल कर उसे कार की पिछली सीट पर डाला फिर लाश ठिकाने लगाने के लिए गांव के बाहर ले गए.

वह कार को सड़क से नीचे खेत में ले गए. वहां से वह नहर की ओर ले जा रहे थे, तभी कार कुदारन तिवारी के खेत में जा कर फंस गई. वहां से कार नहीं निकली तो वह वहीं खेत में छोड़ दी और लाश भी कुछ आगे डाल दी. इस के बाद वे घर लौट आए और इत्मीनान से सो गए.

उन्हें विश्वास था कि पुलिस को उन पर शक नहीं होगा पर जब मृतक के भाई घनश्याम पांडेय ने नामजद रिपोर्ट लिखाई तो प्रधान श्यामनारायण पुलिस से बचने के लिए घर से निकल कर सगड़ी-खालिसपुर मार्ग पर जा कर खड़ा हो गया और उधर से आने वाले वाहन का इंतजार करने लगा. इस से पहले कि वह वहां से कहीं जाता, थानाप्रभारी विजयप्रताप यादव ने उसे मुखबिर की सूचना पर गिरफ्तार कर लिया.

प्रधान श्यामनारायण राय से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इस के 3 दिनों के बाद उस का छोटा भाई सत्यम राय उर्फ रजनीश भी बांसगांव से गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस कार में मिली महिला की सैंडिल और उल्टी के बारे में जांचपड़ताल कर रही थी. आरोपी रुचि राय फरार चल रही थी. पुलिस उस की तलाश में जुटी हुई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

धोखे में लिपटी मोहब्बत- भाग 3

शादी के बाद रंजना विनोद को साथ ले कर कई बार अपने घर आई थी. विनोद का परिचय उस ने मांबाप से खिलाड़ी मित्र के रूप में कराया था. एकदो दिन घर रह कर वह विनोद के साथ लौट जाती थी. विनोद को जीवनसाथी चुन कर रंजना खुश थी. वह भी उसे खुश रखने के लिए पैसा पानी की तरह बहाता था.

जिस सच्चाई को विनोद छिपा रहा था, आखिरकार एक दिन उस की कलई रंजना के सामने खुल ही गई. विनोद की सच्चाई खुलते ही रंजना के ख्वाबों का महल रेत के महल के समान भरभरा कर ढह गया. विनोद इतना बड़ा धोखा देगा, उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. इस के बाद रंजना ने विनोद से दूरियां बना लीं.

अपनी गलतियों पर परदा डालने के लिए विनोद ने रंजना से संपर्क कर के उसे भरोसा दिलाने की काफी कोशिश की, लेकिन रंजना उस की चिकनीचुपड़ी बातों में नहीं आई. इतना ही नहीं, वह अपना मोबाइल उस से वापस लेने की जिद पर अड़ गई. मोबाइल में उस की जिंदगी का अहम राज छिपा था, जबकि विनोद उसे मोबाइल लौटाने से इनकार कर रहा था.

मोबाइल न मिलने से रंजना काफी परेशान थी. एक दिन रंजना अपनी बड़ी बहन विमला के यहां गई. वह काफी परेशान और उदास थी. उस की परेशानी और उदासी देख कर विमला से रहा नहीं गया. उस ने इस का कारण पूछा तो रंजना की आंखों से आंसू टपकने लगे और वह बहन के गले लिपट कर रोने लगी. विमला समझ नहीं पाई कि आखिर ऐसी क्या बात है.

आखिर रंजना ने सारी बातें बेझिझक बता दीं. रंजना की बात सुन कर विमला के पैरों तले से जमीन खिसक गई. रंजना ने जो गलती की थी, वह माफ करने लायक नहीं थी. बड़ी बहन ने उस के गाल पर 2 थप्पड़ रसीद कर दिए, साथ ही उसे काफी भलाबुरा भी कहा.

खैर, जो होना था हो चुका था. अब सवाल उस के निदान का था. शाम के वक्त काम से जब उस का पति शंभू मंडल घर लौट कर आया और साली रंजना को देखा तो उस की खुशी दोगुनी हो गई. रात का खाना सब ने एक साथ खाया. शंभू खाना खाने के बाद कमरे में सोने गया. उस के पीछे विमला भी आ गई. उस ने पति से रंजना की सारी बातें बता दीं. पत्नी की बात सुन कर शंभू का खून खौल उठा.

उस से रहा नहीं गया तो उस ने उसी समय ससुराल फोन कर के रंजना की करतूत अपनी सास सरबी देवी और ससुर राधाकृष्ण उर्फ वकील मंडल से बता दी. हकीकत जान कर मांबाप भी सिर पकड़ कर बैठ गए. वे यह सोच कर परेशान थे कि जब रंजना की सच्चाई बिरादरी वालों को पता चलेगी तो वे कौन सा मुंह दिखाएंगे. उन्होंने यह कह कर सब कुछ शंभू मंडल पर छोड़ दिया कि वह जो उचित समझे, करे.

सुबह हुई तो शंभू ने सब से पहले रंजना से बात की. बातचीत करने के बाद उस ने कुछ सोचा और रंजना से कहा कि उसे परेशान होने की जरूरत नहीं है. सब पहले की ही तरह ठीक हो जाएगा. वह अपनी नौकरी पर लौट जाए और मन लगा कर काम करे. जीजा की बातें रंजना को ठीक लगीं. उस ने वैसा ही किया.

रंजना सीतामढ़ी नौकरी पर लौट आई. इस बीच विनोद ने उस से फोन कर बात करने की कोशिश की, लेकिन रंजना ने उस से बात करने से साफ मना कर दिया. इस के बाद विनोद मोबाइल में सेव शादी की तसवीरें सार्वजनिक करने की धमकी दे कर उसे मानसिक रूप से प्रताडि़त करने लगा.

रंजना परेशान हो गई और घर वालों को सारी बातें बता दीं. बेटी की परेशानी देख कर सबरी देवी परेशान हो गई. उस ने दामाद शंभू से जल्द से जल्द कोई उचित कदम उठाने को कहा. इस बारे में शंभू मंडल ने रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू, जो उसी के मोहल्ले में रहता था, से बात की. बिट्टू अपने इलाके का दबंग था.

बिट्टू और शंभू मंडल ने आपस में मिल कर रंजना की राह के कांटे को जड़ से उखाड़ने की योजना बना डाली. इस योजना में उन्होंने रंजना को भी शामिल किया. क्योंकि उस के बिना योजना को अंजाम नहीं दिया जा सकता था.

29 दिसंबर, 2016 को रंजना कालेज प्रशासन को धोखे में रख कर वहां से 2 दिनों की छुट्टी ले कर घर आई कि नया साल परिवार के साथ बिता कर लौट आएगी. घर आते समय उस ने किराए का कमरा खाली कर दिया था और सारा सामान ले कर भागलपुर चली आई थी.

30 दिसंबर को मां सबरी देवी और जीजा शंभू मंडल के कहने पर रंजना ने विनोद को नए साल को सेलिब्रेट करने के लिए भागलपुर बुलाया. रंजना के बुलाने पर विनोद 1 जनवरी, 2017 को भागलपुर आ गया.

अपने यहां आने की सूचना उस ने भागलपुर में रहने वाले अपने दोस्त संजय को दे दी थी. संजय विनोद के पास आ चुका था. विनोद को अपने साथ धोखे का अहसास तब हुआ, जब उस ने रंजना की जगह उस के बहनोई शंभू मंडल और बिट्टू को देखा.

शंभू मंडल और बिट्टू उसे रंजना के घर ले जाने के लिए अपने साथ ले कर निकले. लेकिन उसे वहां न ले जा कर तिलकामांझी थाने ले गए. संजय भी उन के साथ था. पहले से आगबबूला शंभू ने रास्ते में विनोद के गाल पर 4-5 थप्पड़ जड़ दिए थे. इस के बाद वह उसे थाने ले गया था.

थानाप्रभारी तिलकामांझी से उस ने मोबाइल चुराने की शिकायत की. विनोद के दोनों हाथ नहीं थे, उसे देख कर उन्होंने मामले को भांप लिया कि यह मामला चोरी का नहीं, बल्कि कुछ और है. जब थानाप्रभारी ने इस बाबत शंभू से पूछताछ की तो उस ने साली के मोबाइल चुराने की बात कही.

थानाप्रभारी के कहने पर उस ने अपनी साली रंजना की बात उन से करा दी. रंजना ने उन्हें बताया कि विनोद ने उस का मोबाइल चुराया नहीं है, बल्कि जबरन अपने पास रख लिया है और उसे लौटा नहीं रहा है. थानाप्रभारी ने विनोद से पूछा तो उस ने इस बात को सही बताया और रंजना का मोबाइल उसे लौटा दिया. मोबाइल ले कर दोनों थाने से चले गए और विनोद भी पटना लौट गया.

5 दिनों बाद 6 जनवरी, 2017 की शाम साढ़े 5 बजे के करीब शंभू मंडल ने विनोद को फोन किया. उस ने साली का जीवन बरबाद करने की बात कह कर उसे जान से मारने की धमकी दी.

विनोद शंभू मंडल की धमकी से डर गया. इस के ठीक आधे घंटे बाद शाम 6 बजे रामजी सिंह बेटे का हालचाल लेने के लिए फोन किया. ड्यूटी कर के औफिस से विनोद कमरे पर जा रहा था. पिता का फोन रिसीव कर के वह शंभू मंडल द्वारा जान से मारने की धमकी वाली बात बता कर रोने लगा.

वह काफी आतंकित लग रहा था. बेटे का रोना सुन कर उन्होंने उसे समझाया कि रोने के बजाए वह उसी समय उन के पास (बंगाल) आ जाए या फिर वही वहां आ जाएं. इस के बाद फोन कट गया. दरअसल विनोद ने रंजना से दूसरी शादी वाली बात घर वालों से छिपा ली थी. उस की इस नई कहानी से उस के घर वाले अनजान थे.

उस के एक घंटे बाद 7 बजे के करीब विनोद ने पिता को फोन कर के बताया कि वह भागलपुर रंजना की मां सबरी देवी से मिलने जा रहा है. उस के पास रंजना के मौसेरे भाई बिट्टू का फोन आया था. वह रंजना की मां से समझौता कराने की बात कह रहा था.

यह सुन कर रामजी सिंह का माथा ठनका. उन्होंने विनोद को वहां जाने से मना किया, लेकिन विनोद ने पिता की बात नहीं मानी और भागलपुर चला गया. वह औफिस से सीधे निकला था. फोन से ही उस ने अंकित को भागलपुर जाने की जानकारी दे दी थी. इसलिए उस के पास केवल बैग ही था. उस बैग में उस के सारे सर्टिफिकेट और टिफिन था.

7 जनवरी, 2017 की दोपहर 1 बजे भागलपुर पहुंच कर उस ने रामजी सिंह को फोन कर के अपने भागलपुर पहुंच जाने की सूचना दे दी. उस ने बिट्टू का वह नंबर भी उन्हें बता दिया था, जिस नंबर से उस ने उसे फोन किया था.

विनोद ने बिट्टू को फोन कर के बता दिया था कि वह भागलपुर पहुंचने वाला है. बिट्टू शंभू मंडल के साथ स्टेशन पहुंचा. दोनों ने उसे रिसीव किया. विनोद का बैग बिट्टू ने ले लिया था. तीनों एक ही मोटरसाइकिल पर बैठ कर रंजना के घर जाने के लिए निकले. लेकिन दोनों उसे वहां न ले जा कर सीधे कलवलिया नदी के किनारे ले गए. यह देख कर विनोद डर गया.

उस की समझ में आ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है. उस ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की, लेकिन उन के चंगुल से बच नहीं सका. शंभू और बिट्टू ने मिल कर उसे जमीन पर गिरा दिया. बिट्टू ने उस के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए, जबकि मजबूत जिस्म वाला शंभू मंडल हाथों से विनोद के मुंह को तब तक दबाए रहा, जब तक उस का जिस्म ढीला नहीं पड़ गया.

अपनी संतुष्टि के लिए दोनों ने विनोद कुमार सिंह को हिलाडुला कर देखा. उस के जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई. उस की लाश पहचानी न जा सके, इस के लिए शंभू मंडल ने साथ लाया तेजाब उस के चेहरे पर उड़ेल दिया और लाश को झाड़ी में फेंक दिया.

विनोद का सारा सामान उन्होंने नदी में डाल दिया और मोटरसाइकिल से अपने घर लौट गए. विनोद की हत्या की जानकारी उस ने सास सबरी देवी को दे दी थी. बेटी के रास्ते का कांटा साफ होने की खबर पा कर वह खुश थी. यह बात उस ने रंजना को नहीं बताई थी.

दूसरी ओर रामजी सिंह ने बेटे से बात करने के लिए शाम को जब उस के मोबाइल पर फोन किया तो उस के दोनों फोन बंद मिले. उन्होंने कई बार फोन किया, लेकिन हर बार उस का फोन बंद मिला तो वह घबरा गए.

2 दिनों बाद बेटे का पता लगाने वह पश्चिम बंगाल से पटना पहुंचे. उन्हें बेटे का कोई पता नहीं चला तो उन्होंने सचिवालय थाने में उस के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस हरकत में आई तो 17 दिनों से गायब विनोद की लाश भागलपुर में मिली.

नदी के किनारे झाड़ी के पास खेलते बच्चों की टोली ने सड़ीगली लाश देखी थी और शोर मचा दिया था. इस तरह मामला लोदीपुर थाने तक पहुंच गया.

23 जनवरी, 2017 को विनोद कुमार सिंह हत्याकांड के 4 आरोपी रंजना कुमारी, उस की मां सबरी देवी, पिता राधाकृष्ण उर्फ वकील और शंभू मंडल थाना लोदीपुर पुलिस की मदद से गिरफ्तार कर लिए गए. पांचवां आरोपी बिट्टू फरार था.

पूछताछ में शंभू मंडल ने पुलिस को बता दिया था कि विनोद का सारा सामान और मोबाइल उस ने नदी में फेंक दिया था. उस के बताए अनुसार पुलिस शंभू मंडल को भागलपुर ले गई, वहां विनोद के सामान की खोजबीन की, लेकिन उस का कोई सामान नदी से नहीं मिला.

पूछताछ के बाद चारों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. चारों आरोपी जेल में बंद हैं. सचिवालय पुलिस ने बाद में इस मुकदमे को अपहरण की धाराओं से हत्या की धाराओं में बदल दिया था.

कथा मृतक के परिजनों और पुलिस सूत्रों पर आधारित

शादी का झांसा देने वाला फरजी सीबीआई अधिकारी – भाग 3

समीर को पता नहीं कैसे भनक लग गई कि उस की पोल खुल गई है. वह अपना बैग ले कर घर से भागने की फिराक में था, तभी जेबा ने कहा, ‘‘समीर, हमें तुम्हारी असलियत का पता चल गया है. अब मैं तुम्हें पुलिस के हवाले करूंगी, जिस से तुम्हारी जिंदगी जेल में कटेगी.’’

समीर डर गया. उस ने कहा, ‘‘अगर तुम लोगों ने मेरी शिकायत पुलिस में की तो मैं तुम सभी को जान से मार दूंगा.’’

लेकिन उस की इस धमकी से न जेबा डरी और न उस के मम्मीपापा. याकूब मंसूरी ने अपने दोस्तों की मदद से समीर को पकड़ लिया और थाना अशोका गार्डन ले गए, जहां वह खुद को पुलिस अधिकारी होने का भरोसा दिलाता रहा और वादा करता रहा कि जेबा से ही शादी करेगा.

लेकिन शादी का झांसा दे कर शारीरिक शोषण करने के साथ लाखों रुपए ऐंठने वाले समीर की असलियत जेबा को पता चल गई थी, इसलिए उस ने उस की किसी बात पर भरोसा नहीं किया. मामले की नजाकत को भांपते हुए अशोका गार्डन पुलिस ने समीर को तुरंत हिरासत में ले लिया.

समीर को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने याकूब मंसूरी के घर में रखे उस के बैग को कब्जे में ले कर तलाशी ली तो उस में से राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, सीबीआई सहित कई संस्थानों की फरजी मोहरें मिलीं. यही नहीं, उस के पास से डीआईजी रैंक के पुलिस अधिकारी की वरदी भी मिली. समीर ने एक गलती यह की थी कि उस ने जो वरदी खरीदी थी, वह डीआईजी रैंक के पुलिस अधिकारी की थी. 3 स्टार और अशोक चक्र लगी वरदी को पुलिस ने कब्जे में ले लिया था. पूछताछ में उस ने बताया कि यह वरदी उस ने बिहार के भागलपुर से खरीदी थी.

शातिर दिमाग है ठग समीर खान

एएसपी हितेश चौहान के अनुसार, समीर अनवर खान बहुत ही शातिर दिमाग था. उस ने बड़ी चालाकी से शादी डाटकौम पर अपनी प्रोफाइल बना कर जेबा मंसूरी जैसी पढ़ीलिखी लड़की को अपने जाल में फांस लिया था. बाद में पता चला कि उस ने ऐसा ही कारनामा पंजाब में किया था. मध्य प्रदेश पुलिस ने पंजाब पुलिस से जानकारी हासिल की तो पता चला कि ऐसे ही मामले में वह वहां भी गिरफ्तार किया गया था. जमानत पर रिहा होने के बाद वह फरार हो गया था.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ के अनुसार, समीर मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी का रहने वाला था. उस ने दिखावे के लिए एमटेक में अप्लाई कर रखा था. उस के पिता मुंबई में झुग्गीझोपड़ी में रहते थे और फेरी में कपड़े बेच कर गुजरबसर करते थे. उस ने जेबा से बताया था कि वाराणसी में उस की तमाम जमीनजायदाद है, लेकिन यह सब झूठ था.

मजे की बात यह थी कि उस ने पंजाब में जो धोखाधड़ी की थी, उस में उस ने 40-50 लाख रुपए की चपत लगाई थी. लेकिन कहीं से भी नहीं लगता था कि इतना पैसा उस के पास होगा.

थाना अशोका गार्डन पुलिस ने समीर के खिलाफ भादंवि की धारा 170, 419, 420, 471, 472, 473, 376 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया था. कथा लिखे जाने तक समीर पुलिस रिमांड पर था. पुलिस उस से कई पहलुओं पर पूछताछ कर रही थी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में समीर ने जो बताया है, उस से जाहिर होता है कि वह छोटामोटा अपराधी नहीं है.

होटल प्रबंधन को भी लगाया लाखों का चूना

समीर कितना शातिरदिमाग है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह भोपाल के सब से मशहूर होटल नूरउससबा में 2 नवंबर, 2017  से 23 नवंबर, 2017 तक लड़की के साथ रुका रहा, लेकिन होटल प्रबंधन को उस की कारगुजारियों की तनिक भी भनक नहीं लगी. वह इतने बड़े होटल को लाखों का चूना लगा कर रफूचक्कर हो गया था.

अच्छा हुआ कि वक्त रहते जेबा मंसूरी को उस पर शक हो गया, वरना हाथ से निकलने के बाद फिर शायद ही कभी वह चंगुल में फंसता. नूरउससबा पैलेस होटल में 20 दिनों से ज्यादा रहने के बाद भी वह पैसे दिए बिना  वहां से फरार हो गया था. होटल प्रबंधन के बताए अनुसार, 2 नवंबर से 23 नवंबर, 2017 तक होटल में रहने और खानेपीने का बिल 2 लाख 15 हजार 311 रुपए बना था.

समीर ने चालाकी से काम लेते हुए होटल प्रबंधन को भरोसे में लेने के लिए 20 हजार रुपए एडवांस जमा करा दिए थे. उसे वहां 24 नवंबर तक रुकना था, लेकिन एक दिन पहले ही वह अपना बोरियाबिस्तर समेट कर वहां से चलता बना.

पंजाब में आईएएस बन कर कर चुका है फरजीवाड़ा

समीर के बताए अनुसार, उस ने पंजाब के कपूरथला में भी एक बीएससी की छात्रा के साथ जालसाजी की थी. वहां भी उस ने कुछ ऐसी ही कहानी गढ़ी थी. उस ने वहां बताया था कि उस का सिलेक्शन आईएएस में हो गया है. इस तरह उस के बहकावे में आ कर उस लड़की ने समीर से सन 2016 में निकाह कर लिया था. वहां उस ने अपना नाम शमशेर बताया था.

जब फरजी आईएएस का झूठ सामने आया तो कपूरथला के थाना फगवाड़ा पुलिस ने जनवरी, 2016 में शमशेर के खिलाफ धोखाधड़ी, दहेज अधिनियम और धमकाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया था. शमशेर उर्फ समीर वहां 2 महीने तक जेल में बंद रहा. उस की दादी ने जमानत कराई तो जेल से बाहर आते ही वह फरार हो गया.

अब देखना यह है कि मध्य प्रदेश के साथसाथ पंजाब पुलिस समीर उर्फ शमशेर को धोखाधड़ी, पैसे ऐंठने, शारीरिक शोषण और फरजी पदों का गलत इस्तेमाल करने के अपराध में कितनी सजा दिलवा सकती है. पुलिस यह भी पता कर रही है कि यह काम समीर अकेला ही करता था या उस के साथ और कोई भी था.

अनोखा चोर : इंसान को बनाया हथियार

अरुण कुमार हरदेनिया

सतना जिले के थाना बदेरा की सीमा पर बसे भगनपुर गांव में काफी शोरगुल से भरी सुबह थी. दरअसल, उस रात गांव में एक साथ 3 घरों के ताले तोड़ कर चोर लाखों का माल समेट कर ले गए थे.

शोर इन चोरियों का तो था ही, लेकिन उसी रात घटी एक दूसरी घटना के शोर की आवाज प्रदेश के पुलिस मुख्यालय तक पहुंच गई. वह घटना थी चौथे घर से एक किशोरी के गायब होने की.

वास्तव में सुबह 3 घरों में चोरी का हल्ला होने के बाद यह बात सामने आई कि किसी ने उस रात एक और घर में धावा बोला था लेकिन वहां से चोरों ने रुपयापैसा तो नहीं, जयकुमार की 13 वर्षीय बेटी श्यामली का ही अपहरण कर लिया था.

इसलिए घटना पर आश्चर्य के साथ गांव की मासूम बेटी के अपहरण हो जाने से लोगों में गुस्सा भी कम नहीं था. यह बात 12 जुलाई, 2022 की है.

घटना की खबर पा कर बदेरा थाने की एसएचओ राजश्री रोहित दलबल के साथ मौके पर पहुंच चुकी थीं. उन्होंने किशोरी के अपहरण होने की जानकारी एसपी (सतना) आशुतोष गुप्ता और एसडीपीओ लोकेश डाबर को दे दी.

चुनावी व्यस्तता के बीच एसपी और  एसडीपीओ भी भगनपुर पहुंच गए और पीडि़त परिवार से मिल कर उन्होंने घटना की पूरी जानकारी ली.

एसपी आशुतोष गुप्ता ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एसएचओ को जल्द ही काररवाई करते हुए बालिका को तलाश करने के निर्देश दिए. उन्होंने साइबर सेल के प्रभारी अजित सिंह सेंगर को भी इस केस की जांच में लगा दिया.

इस के अलावा एसपी आशुतोष गुप्ता ने मैहर से भी अतिरिक्त रिजर्व पुलिस फोर्स बुला ली. फिर पुलिस टीमें चोरी गई किशोरी की तलाश भदनपुर पहाड़, भदनपुर माइंस और गांव से लगे जंगल में करने लगीं. लेकिन श्यामली का पता नहीं चला.

पुलिस को जांच में पता चला कि जयकुमार की गांव के कुछ लोगों से कहासुनी हो गई थी. पुलिस ने इस ऐंगल पर भी जांच की.

गांव के 100 से ज्यादा लोगों से गहन पूछताछ की गई. लेकिन इस कवायद में किशोरी का कोई सुराग न मिलने पर गांव वालों का भी पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ने लगा. तब आसपास के जिलों की पुलिस भी किशोरी की तलाश में जुट गई.

दरअसल, एसपी आशुतोष गुप्ता जानते थे कि चोरों ने किशोरी को किसी गोपनीय जगह पर छिपा कर रखा होगा. किसी और सामान की चोरी होती तो पुलिस इंतजार भी कर सकती थी, लेकिन यह तो एक किशोरी की जान बचाने की बात थी.

यह फिरौती का मामला तो नहीं लग रहा था, क्योंकि जयकुमार के पास फिरौती का कोई फोन भी नहीं आया था. एसपी खुद पुलिस टीमों से संपर्क कर पलपल की खबर ले रहे थे. अलगअलग इलाकों में जा कर पुलिस टीमें अपहर्त्ताओं और किशोरी की तलाश में जुटी हुई थीं.

पुलिस बदमाशों पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही थी, जो 2 दिन बाद 14 जुलाई की सुबह उस वक्त सफल हो गई, जब अपहृत किशोरी श्यामली अचानक ही एक आटोरिक्शा में सवार हो कर भगनपुर बसस्टैंड पहुंच गई.

श्यामली के खुद वापस आने की खबर सुन कर सीएसपी श्री चौहान ने राहत की सांस ली. उन्होंने इस की सूचना एसपी आशुतोष गुप्ता को दे दी. उन के निर्देशानुसार उन्होंने पूरी ऐहतियात बरतते हुए पहले श्यामली की काउंसलिंग कराई. वह बहुत डरी और सहमी हुई थी.

श्यामली के सामान्य होने पर पुलिस ने पहले तो उस का भरोसा जीता फिर दोस्ताना माहौल में उस से पूछताछ की. इस में वह ज्यादा कुछ नहीं बता सकी, सिवाय इस के कि उसे जो आदमी उठा कर ले गया था, उस का नाम संतोष था. यह नाम उस ने तब सुना था, जब उस का एक दोस्त उसे इस नाम से पुकार रहा था.

केवल नाम से आरोपी तक पहुंचना आसान नहीं था, क्योंकि जिले भर में इस नाम के सैकड़ों लोग हो सकते थे.

आरोपी की तलाश को मुश्किल देख कर एसपी ने टीम को बैकट्रेस तकनीक पर काम करने के निर्देश दिए. बैकट्रेस तकनीक वह होती है, जिस में पुलिस घटना के अंतिम बिंदु से पीछे की तरफ बढ़ कर आरोपियों तक पहुंचने का रास्ता बनाती है.

इस मामले में अंतिम बिंदु वह था, जब आटो वाले ने श्यामली को भगनपुर बस स्टैंड पर उतारा था. इसलिए पीछे की तरफ चल कर आगे बढ़ने के लिए पुलिस ने पहले उस आटो वाले की तलाश की, जिस से श्यामली बस स्टैंड तक आई थी.

काफी प्रयास के बाद पुलिस ने उस आटो वाले को खोज कर जब उस से इस लड़की के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह इस किशोरी को मैहर से ले कर आया था, जहां यह किसी बस से उतरी थी.

यह जानकारी मिलने पर पुलिस ने आटो के बाद उस बस की तलाश शुरू की, जिस में बैठ कर किशोरी मैहर तक आई थी.

मां शारदा के इकलौते मंदिर के लिए पूरे देश में विख्यात मैहर के लिए सैकड़ों बसें रोज सवारी ले कर आती हैं. लेकिन पुलिस कमर कस कर काम कर रही थी, इसलिए एकएक बस ड्राइवर और कंडक्टर से पूछताछ की गई.

पुलिस की मेहनत रंग लाई और उसे वह बस भी मिल ही गई, जिस से किशोरी मैहर पहुंची थी. उस बस के कंडक्टर ने बताया कि मैहर से पहले झुकेही के पास एक लाल मोटरसाइकल पर सवार 2 युवकों ने इस बालिका को बस में मैहर के लिए बैठाया था.

इतना पता चलने पर पुलिस ने वापस किशोरी से पूछताछ कर यह जानकारी जुटाई कि दोनों युवक उसे मोटरसाइकल पर बैठा कर कितनी देर में उस सड़क तक ले कर आए थे, जहां से उसे बस में बैठाया गया. इस पर श्यामली ने कहा कि लगभग 10-15 मिनट का समय लगा था.

एसपी आशुतोष ने अनुमान लगाया कि किशोरी को झुकेही के आसपास 10-12 किलोमीटर के इलाके के किसी घर में रखा गया होगा. इसलिए पुलिस टीम किशोरी को ले कर झुकेही के आसपास के इलाकों की बस्ती में घूमने लगी. जहां एक जगह श्यामली ने उस घर की पहचान कर ली, जहां उसे एक रात रखा गया था.

पुलिस ने इस घर में रहने वालों की जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह घर राकेश का है.

पुलिस ने राकेश वर्मन और उस की पत्नी अनीता वर्मन से पूछताछ की तो उन दोनों ने बताया कि वह श्यामली को जानते तक नहीं हैं. वह उन के यहां इस से पहले कभी नहीं आई और न ही उसे कभी देखा.

उन दोनों की बातों से पुलिस को लग रहा था कि वे झूठ बोल रहे हैं, इसलिए दोनों को थाने ले आई. इसी बीच पुलिस को मुखबिरों से पता चला कि 2 दिन पहले राकेश का साला संतोष वर्मन राकेश के घर आया था. इस से पुलिस समझ गई कि पीछे चल कर आगे बढ़ने की उन की योजना कामयाब हो चुकी है.

राकेश और अनीता से पूछताछ के बाद पुलिस ने संतोष को कटनी जिले के खम्हरिया गांव में स्थित उस की ससुराल से हिरासत में ले लिया.

संतोष वर्मन ने अपना अपराध न सिर्फ स्वीकार कर लिया, बल्कि इस अपराध में शामिल 5 आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया. जिस के बाद श्यामली के अपहरण पूरी कहानी इस तरह से सामने आई—

संतोष वर्मन ने पुलिस को बताया कि श्यामली के अपहरण की उसकी कोई पूर्व योजना नहीं थी. वह श्यामली के घर में भी रुपयापैसा चुराने की नीयत से दाखिल हुआ था.

लेकिन घर में माल न मिलने पर खाली हाथ लौटते समय उस की नजर अचानक ही अपनी बहन के साथ गहरी नींद सो रही श्यामली पर पड़ी तो वह उस के भोले सौंदर्य पर मोहित हो गया. जिस से वह गहरी नींद में सो रही श्यामली को गलत मंशा से कंधे पर उठा लाया.

उस की योजना श्यामली के संग एक बार सैक्स संबंध बना कर उसे जंगल में छोड़ कर आगे निकल जाने की थी, इसलिए उस ने कुछ दूर जंगल में ले जा कर उस के संग बलात्कार किया.

मगर एक बार में उस का मन नहीं भरने पर वह श्यामली को बाइक पर बैठा कर कटनी में रहने वाले अपने दोस्त अजय निषाद के घर ले गया. यहां दिन के उजाले में संतोष ने श्यामली को देखा तो उसे हमेशा अपने साथ रखने का मन बना लिया.

इसलिए वह श्यामली को खुश कर उस का दिल जीतना चाहता था. इस के लिए संतोष श्यामली को बाजार ले गया, जहां उस के लिए कुछ कपड़े और चप्पल खरीद कर दिए. खरीदारी कराने के बाद उस ने धमकाने के अंदाज में श्यामली को समझाया कि वह अपने साथ घटी इस घटना के बारे में किसी से न बताए.

मासूम श्यामली तो वैसे ही डरी हुई थी, इसलिए संतोष की बात पर वह चुपचाप सिर हिलाती रही.

अगले दिन संतोष उसे बाइक पर बैठा कर कटनी जिले के कठिला में रहने वाली अपने बहन अनीता  के घर ले गया. इस दौरान बीच में पड़ने वाले जंगल में संतोष ने एक बार फिर श्यामली को डराधमका कर उस के साथ अपनी हवस बुझाई.

बहन के घर आ कर संतोष एक रात रुका. इसी बीच उसे पता चला कि अकेले सतना की ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों की पुलिस श्यामली की जोरशोर से तलाश कर रही है तो वह समझ गया कि उस का बचना अब मुश्किल है.

लेकिन फिर उसे लगा कि अगर किसी तरह से श्यामली वापस घर पहुंच जाए तो पुलिस इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल देगी.

इसलिए दूसरे दिन सुबह होते ही वह अपने भांजे रंजीत के साथ बाइक पर श्यामली को ले कर झुकेही आया और उसे भगनपुर जाने की पूरी बात समझा कर पैसा दे कर बस में बैठा दिया.

श्यामली संतोष के बताए अनुसार बस से मैहर उतरी और वहां से आटोरिक्शा में बैठ कर भगनपुर पहुंच गई. जिस के बाद पुलिस ने बैकट्रेस तकनीक पर काम करते हुए केवल नाम के सहारे आरोपी को खोज कर मुख्य आरोपी संतोष से जुड़े लोगों को पकड़ना शुरू कर दिया.

इस की भनक लगने पर पुलिस से बचने के लिए संतोष वर्मन भूमिगत हो गया, मगर पुलिस ने उसे उस की ससुराल में दबिश दे कर गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद संतोष के कटनी निवासी दोस्त अजय निषाद को भी गिरफ्तार कर लिया. जबकि संतोष के बहनोई राकेश वर्मन, बहन अनीता वर्मन और भांजे रंजीत वर्मन को पहले ही गिरफ्तार कर चुकी थी.

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ बदेरा थाने में आईपीसी की धारा 363, 365, 368, 457, 380, 376 (2) (एन), 376 (ए) (ब), 506 एवं पोक्सो एक्ट की धारा 5/6 एवं एससी/एसटी एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज कर न्यायालय में पेश किया, जहां से सभी आरोपियों को जेल भेज दिया गया.   द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, कथा में जयकुमार और श्यामली परिवर्तित नाम हैं

ट्रॉली बेग में सिमटा आयुषि का प्यार – भाग 4

देवरिया से बनवाया था रिवौल्वर का लाइसेंस

नितेश यादव ने जिस रिवौल्वर से गोली मार कर बेटी की हत्या की थी, उस का लाइसैंस साल 2003 में अपने नाम देवरिया से बनवाया था. यह लाइसैंस आल इंडिया के लिए मान्य था. उस समय नितेश लगभग 25 साल का था.

बेटी की गोली मार कर हत्या करने वाले नितेश यादव का उस के मोहल्ले में खौफ बना हुआ था. वह पूरे इलाके में खुद को पुलिसकर्मी बताते हुए लोगों पर रौब जमाता और मनमानी करता था. मोलड़बंद इलाके में जहां नितेश रहता है, वहां उस के 6 घर हैं. यहां एक घर में नितेश पूरे परिवार के साथ रहता है.

ग्राउंड फ्लोर पर उस के बुजुर्ग मातापिता रहते थे. वहीं पहली मंजिल पर नितेश अपनी पत्नी, बेटी व बेटे के साथ रहता था. इसी मोहल्ले में नितेश के चाचा का भी मकान है.

उस के पड़ोसियों ने बताया कि उस के मिलने वाले मोहल्ले के घरों के सामने अपनी गाडि़यां खड़ी कर देते थे. विरोध करने पर वह रिवौल्वर दिखा कर लोगों को धमकाता था कि वह पुलिस में है, कोई उस से उलझा तो गोली मार देगा.

नितेश के पिता गामा प्रसाद यादव गुरुग्राम में इंजीनियर थे. जब यहां जमीन के भाव कम थे तो उन्होंने 6 प्लौट खरीद लिए. एक पर अपना मकान बना कर वह परिवार के साथ रहने लगे. शेष 5 प्लौट्स पर नितेश ने मकान बनवाए और किराए पर उठा दिए.

नितेश के अपने पिता से भी अच्छे संबंध नहीं थे. उस की हरकतों से आजिज आ कर उन्होंने अपने मकान अपनी बेटी के नाम करने की धमकी दी. इस पर वह आगबबूला हो गया और पिता के साथ भी मारपीट कर डाली. मोहल्ले के लोग बीचबचाव करने पहुंचे तो नितेश ने उन्हें भी धमकी दी कि हमारे घरेलू मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है.

आयुषि ने दबाव बनाने के लिए खुद को बताया प्रैग्नेंट

22 साल की आयुषि ने अपनी मरजी से दूसरी जाति के युवक से शादी करने के बाद अपने मातापिता पर दबाब बनाने का प्रयास किया. क्योंकि मातापिता आयुषि को छत्रपाल से बात करने व मिलने से मना करते थे.

घटना वाले दिन जब उस का अपनी मां से झगड़ा हुआ, तब उस ने घर वालों पर दबाव बनाने के लिए कहा कि वह प्रैग्नेंट है. स्वयं को गर्भवती बताना ही उसे भारी पड़ा. इस बात को सुन कर नितेश अपने गुस्से को नहीं रोक सका और बेटी को गोली मार दी. जबकि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से पता चला कि आयुषि प्रैग्नेंट नहीं थी.

नितेश को अपने पिता गामा प्रसाद से दिल्ली व उस के आसपास खासी पैतृक संपत्ति मिली थी. जिस के बाद उस ने स्वयं भी जमीन आदि का कारोबार कर लिया. वह एक दुकान भी करता था.

नितेश कुमार यादव मूलरूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के गांव सुनारी का रहने वाला है. अपनी बेटी आयुषि की हत्या करने के बाद 18 नवंबर को उस के शव को देवरिया ले जा कर फूंकने की योजना थी.

पुलिस पूछताछ के दौरान अपनी योजना के बारे में उस ने बताया कि तड़के घर से देवरिया के लिए निकले थे. दंपति की योजना थी कि गांव जा कर बता देंगे कि बेटी का ऐक्सीडेंट हो गया था. दिन निकल आने और चैकिंग के डर से मथुरा में एक्सप्रैसवे की सर्विस रोड पर झाडि़यों में ट्रौली बैग को फेंक कर वापस चले गए.

आयुषि की हत्या के बाद दिल्ली के मोलड़बंद स्थित मकान से पुलिस और फोरैंसिक टीम द्वारा मृतका के खून के सैंपल के अलावा कपड़े, ट्रौली बैग, पोंछा जिस से फर्श का खून साफ किया गया था आदि सैंपलों को एकत्र किया गया. इन सैंपलों को राया पुलिस ने जांच के लिए एफएसएल लखनऊ भेज दिया गया.

इस के साथ ही पुलिस ने सबूत के तौर पर कार फोर्ड फिस्टा, आयुषि का मोबाइल फोन, नितेश का लाइसैंसी रिवौल्वर, उस का लाइसैंस तथा आयुषि की शादी का प्रमाणपत्र बरामद किया.

आरोपी पिता ने कार और रिवौल्वर को दिल्ली ले जा कर यमुना किनारे अधबने एक मकान में छिपा दिया था. जिस रिवौल्वर से गोली मारी थी, उस के लाइसैंस को पड़ोसी छोटेलाल यादव के घर में छिपा दिया था ताकि किसी को जानकारी न हो सके.

आयुषि की हत्या में प्रयोग की गई नितेश की रिवौल्वर और बुलेट को बैलिस्टिक जांच के लिए आगरा की विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेज दी. सीसीटीवी फुटेज के साथ ही मोलड़बंद स्थित घर व कार की फोरैंसिक रिपोर्ट भी तैयार की जा रही है. ताकि उसे न्यायालय में सबूत के रूप में प्रस्तुत किया जा सके.

पुलिस आयुषि के मोबाइल की भी जांच कर रही है. वह छत्रपाल के अलावा और किसकिस से बात करती थी? कौनकौन उस के संपर्क में था?

पुलिस काल डिटेल भी खंगाल रही है. जिस समय आयुषि की हत्या हुई, उस का मोबाइल फोन कहां था? जब मांबाप उस के शव को ठिकाने लगाने के लिए निकले, तब उन के मोबाइल की लोकेशन कहां थी? कोर्ट में पुलिस इसे भी साक्ष्य के रूप में उपयोग करेगी.

20 नवंबर, 2022 को नितेश व ब्रजबाला को हिरासत में लिया गया था. इस के बाद 21 नवंबर को पुलिस ने इस हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. पुलिस ने खुलासे के लिए लगभग 100 पुलिसकर्मियों की कुल 14 टीमें लगाईं व 300 सीसीटीवी कैमरे खंगाले.

बेटे आयुष की हत्याकांड में कोई भूमिका न पाए जाने पर उसे घर छोड़ दिया. 22 नवंबर, 2022 को पूर्वाह्न 11 बजे नितेश के पिता गामा प्रसाद यादव, आयुष व अन्य रिश्तेदारों के साथ राया थाने पहुंच गए थे.

उन्होंने नितेश से कोई बात नहीं की. वे रोते रहे, जबकि आयुष ने अपने मातापिता से बातचीत की. दोपहर बाद दोनों को एसीजेएम रमेश सिंह की अदालत में पेश किया गया. कोर्ट ने दोनों को 14 दिन की न्यायायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

छत्रपाल से पूछताछ के लिए पुलिस ने मोबाइल से संपर्क किया, पर उस से बात नहीं हो सकी. पुलिस का कहना है कि उसे पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा.

बीसीए की छात्रा आयुषि के हत्यारोपी मां और पिता को कड़ी सजा मिल सके, इस के लिए राया पुलिस ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है.

हत्याकांड के 27 गवाहों को पुलिस ने केस को मजबूत बनाने के तैयार कर लिया. शीघ्र ही पुलिस गवाहों के बयान दर्ज कर और तथ्य जुटा कर इस सनसनीखेज हत्याकांड में चार्जशीट दाखिल करेगी.

नितेश के चेहरे पर नहीं थी शिकन

बेटी आयुषि की हत्या करने वाले पिता नितेश यादव को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचने के बाद कोई बेचैनी नहीं थी. बेटी को खोने के बाद भी उस के चेहरे पर शिकन व पछतावे का कोई भाव नहीं था. न आयुषि की हत्या का कोई अफसोस था.

जेल अधिकारियों ने नितेश को मुलाहिजा बैरक में जबकि मां ब्रजबाला को महिला बंदी बैरक में रखा. मामला संवेदनशील होने के कारण जेल अधिकारी सतर्क रहे. जेल में दोनों ने ही खाना खाया.

मातापिता के लाड़प्यार में पलीबढ़ी आयुषि को इतना प्यार मिला कि वह उम्र के एक पड़ाव पर जा कर दूसरी जाति के युवक के प्यार के बंधन में बंध गई. जिसे घर वालों ने स्वीकार नहीं किया. मौडर्न कल्चर को अपना कर बीसीए की छात्रा आयुषि ने छत्रपाल गुर्जर से शादी तक कर ली. यह बात मातापिता को नागवार गुजरी. मां ने भी दुलराया पर आयुषि नहीं मानी. अब परिवार की बरबादी का आखिरी मंजर सब के सामने है.

सनसनीखेज आयुषि हत्याकांड के परदाफाश में त्वरित काररवाई पर एसपी (सिटी) मार्तंड प्रकाश सिंह को डीजीपी डी.एस. चौहान ने पुलिस महानिदेशक प्रशंसा चिह्न गोल्ड मेडल स्वीकृत किया गया है. खुलासे में जुटी राया पुलिस और स्वाट टीम को भी पुरस्कृत करने की घोषणा की.      द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

प्यार बना कंकाल : क्या हुआ खुशबू के साथ – भाग 3

गिरफ्तार आरोपी गौरव को ले कर पुलिस गांव पहुंची. गौरव की निशानदेही पर पिछले 2 साल से बंद पड़े उस के मकान को खोला गया. उस ने बताया कि खुशबू की हत्या कर उस की लाश को गड्ढा खोद कर मकान के एक कमरे में ही दबा दिया था.

गौरव के बताने पर उस कमरे के कोने में खुदाई शुरू की गई. लगभग 3 फीट खुदाई के बाद गड्ढे से लापता हुई खुशबू के कपड़े व कंकाल मिल गए. पुलिस ने मृतका के कंकाल के अवशेषों को एक पौलीथिन में एकत्र कर सील कर दिया.

कंकाल मिलते ही गांव में सनसनी फैल गई. कंकाल को देखते ही खुशबू के परिवार में कोहराम मच गया. वृद्ध मातापिता पछाड़ खा कर गिर गए. गांव वालों ने किसी तरह उन्हें तसल्ली दी.

खुशबू के दोनों भाइयों अंकुश व रवि का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. 2 साल से अपनी बहन को तलाशते वे पूरी तरह से टूट चुके थे. उन का रक्षाबंधन भी बहन के इंतजार में सूना गया था.

एसपी (ग्रामीण) कुमार रणविजय सिंह ने प्रैस कौन्फ्रैंस में घटना का परदाफाश करते हुए जानकारी दी कि खुशबू का प्रेमी गौरव व उस के पिता चंद्रभान को गिरफ्तार कर उन की निशानदेही पर मृतका का कंकाल आरोपियों के घर से बरामद हो गया है.

उन्होंने बताया कि केस खुलने में बिलंब हुआ है. पूर्व में थाने में तैनात इंसपेक्टर और विवेचकों द्वारा इस केस के संबंध में किए गए प्रयास की समीक्षा की जाएगी. यदि लापरवाही पाई गई तो वैधानिक काररवाई भी होगी.

गौरव ने बताया कि आज से करीब 4 साल पहले पड़ोस में रहने वाली खुशबू ने उस से कहा था कि उसे भी बाइक चलाना सिखा दो. उस की मां ने भी सहमति दे दी थी. गौरव ने खुशबू को बाइक चलानी सिखाई थी.

इसी दौरान उस से शारीरिक संबंध हो गए थे. खुशबू गौरव से प्यार करने लगी थी. जबकि गौरव खुशबू से प्यार नहीं करता था. केवल प्यार का नाटक कर उस की अस्मत से खेल रहा था.

गौरव के घर वालों को भी बाइक सिखाने वाली बात पसंद नहीं थी. वे लोग खुशबू को भी  पसंद नहीं करते थे. उन्हें मालूम था कि खुशबू अपने पति को छोड़ चुकी है. वह गौरव से शादी करने के लिए दबाव बनाने लगी थी, जबकि गौरव उस से शादी नहीं करना चाहता था. उस के घर वाले भी शादी के लिए तैयार नहीं थे.

21 नवंबर, 2020 की शाम खुशबू उस के घर आई थी. उसे पता था कि गौरव अगले दिन अपनी नौकरी पर जा रहा है. वह गौरव से जिद करने लगी कि वह उसे भी अपने साथ ले जाए और उस से शादी कर ले. गौरव और उस के घर वालों ने पहले ही खुशबू से छुटकारा पाने की योजना बना ली थी.

घर वालों ने खुशबू को समझाया कि यदि गौरव उसे अपने साथ इस तरह भगा कर ले जाएगा तो गांव में बहुत बदनामी होगी. गौरव व उस के घर वालों ने हर तरह से खुशबू को ऊंचनीच समझाई, लेकिन वह जिद पर अड़ी रही.

इस पर गौरव खुशबू को बात करने के बहाने से घर के अंदर वाले कमरे में ले गया. वहां उस ने अपने भाइयों के सहयोग से खुशबू की गला दबा कर हत्या कर दी. कमरे के ही एक कोने में 3 फीट गहरा गड्ढा खोद कर लाश को उस में दफना दिया.

इतना ही नहीं उस जगह पर भूसा डाल कर कूलर रख दिया. रात के समय खुशबू की मां आशा देवी बेटी को तलाशती हुई गौरव के घर आईं और खुशबू के बारे में पूछने लगीं. इस पर गौरव के घर वालों ने झूठ बोल दिया कि खुशबू उन के यहां नहीं आई. इस पर आशा देवी बिना शक किए वापस चली गई.

हत्या के डेढ़ घंटे बाद गौरव अपने घर से चला गया. इस के बाद उस के दोनों भाई व मां पड़ोसियों को यह बताते हुए अपने घर से चले गए कि गौरव की मौसी के लड़के का एक्सीडेंट हो गया है, वहां जा रहे हैं. जिस से गांव वालों को किसी प्रकार का उन पर शक न हो.

घर पर केवल गौरव का पिता चंद्रभान रह गया था. उस की मजबूरी यह थी घर पर 2 भैंसें थीं. चंद्रभान भी भीकम सिंह के परिवार के साथ खुशबू को तलाशने का नाटक करता  रहा.

इस बीच वह दोनों भैंसों को बेच कर मकान में ताला लगा कर फरार हो गया.

उस दिन से गौरव व उस के घर का कोई भी सदस्य गांव नहीं आया था. इस के साथ ही वे लोग एकदूसरे से मोबाइल पर पुराने नंबरों पर बात नहीं करते थे. बल्कि उन लोगों ने दूसरे सिमकार्ड खरीद लिए थे.

कुछ समय बाद गौरव छिपछिप कर अपने गांव व आसपास की जानकारी दोस्तों से ले लिया करता था कि गांव में खुशबू के बारे में कोई चर्चा तो नहीं होती है.

गौरव व उस के घर वालों के फरार होने पर आशा देवी व अन्य परिजनों को शक हुआ कि जरूर खुशबू को भगा कर ले जाने में गौरव का हाथ है. तभी पुलिस के डर से ही वे लोग फरार हो गए हैं. तब तीसरे दिन खुशबू की मां आशादेवी ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

पुलिस ने कंकाल बरामद करने के लिए नियमानुसार खुदाई की अनुमति ले कर सीओ अनिवेश कुमार सिंह, कार्यपालक मजिस्ट्रैट/तहसीलदार लालता प्रसाद व तहसील स्टाफ के साथ ही खुशबू के घर वालों के साथ वीडियोग्राफी कराते हुए खुदाई कराई.

इस के बाद कंकाल व कपड़े बरामद होने के बाद कंकाल को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भेजा.

पुलिस ने गौरव के घर से 2 फावड़े भी बरामद कर लिए, जिन से खुशबू की लाश दबाने के लिए गड्ढा खोदा गया था. पुलिस ने घर से कंकाल बरामद होने के बाद घर को सील कर दिया.

पुलिस का कहना है कि हत्या के मामले में गौरव और उस का परिवार शामिल था. गौरव अपने पिता चंद्रभान के साथ सिरसागंज आया था. वे लोग कीठौत के मकान को चोरीछिपे बेचने की फिराक में थे, तभी पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

पुलिस गौरव और उस के पिता चंद्रभान की गिरफ्तारी के बाद शेष आरोपियों भाई अक्षय, सौरभ व मां ज्ञानदेवी की सरगर्मी से तलाश कर रही थी. पुलिस ने गौरव व चंद्रभान सिंह को न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

बेटी के गम में पूरी तरह टूट चुकी मां आशा देवी ने भरी आंखों से कहा, ‘‘हम अपनी बेटी को तो खो चुके हैं, लेकिन जब तक हमारी बिटिया को इंसाफ नहीं मिल जाता, तब तक हम केस लड़ते रहेंगे.     द्य

बिछड़ा राही प्यार का : समीर के प्यार को क्यों ठुकरा दिया – भाग 3

गुलफ्शा की लाश का पोस्टमार्टम 3 नवंबर, 2022 को नहीं हो सका था. उस की हत्या का मामला एसआई अनंगपाल द्वारा वादी के तौर पर 4 नवंबर को थाने में धारा 302, 34 आईपीसी के तहत दर्ज करवाया. हत्या करने वाला अज्ञात था.

इस मामले को खोलने के लिए एसएसपी ने एसएचओ अमित कुमार खारी, इंसपेक्टर सुरेंद्रपाल सिंह, एसआई विनेश कुमार, संजीव सिंह चौहान, अनंगपाल राठी, कांस्टेबल नरेंद्र कुमार और कांस्टेबल इमरान सलमानी की टीम गठित की गई, जिसे अमित खारी के निर्देशन में काम करना था.

एसएचओ का अनुमान था कि गुलफ्शा का कोई चाहने वाला रहा है, जो उस से मिलने रात को चुपके से दरवाजे पर आया, जिसे स्वयं गुलफ्शा ने दरवाजा खोल कर अंदर प्रवेश करवाया.

उन के अनुमान से गुलफ्शा का जिस से टांका भिड़ा था, उसे उस ने ही बुलवाया. उस रात या पहले भी वह इसी प्रकार चोरीछिपे उसे घर में बुलाती रही होगी. वह कल रात भी गुलफ्शा के बुलाने पर आया. किसी बात पर उस का गुलफ्शा से झगड़ा हआ और उस ने गला घोट कर मार डाला.

विचारविमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि टीम के लोग प्रेमी वाले एंगल को ध्यान में रख कर अपनी जांच आगे बढ़ाएंगे.

इस के लिए पड़ोसियों से पूछताछ, गुलफ्शा की सहेलियां और उस का मोबाइल, इन 3 पौइंट्स पर काम करने के लिए टीम थाने से निकल गई. सभी को अलगअलग दिशानिर्देश दिए गए थे.

एसआई सुरेंद्र और विनेश ने नन्हे के पड़ोसियों से गुपचुप तरीके से गुलफ्शा के चरित्र के बारे में पूछताछ शुरू की तो एसआई अनंगपाल मृतका के मोबाइल फोन को हासिल करने के लिए सीधे नन्हे के घर पहुंच गए. फोन से स्थिति काफी साफ हो सकती थी. एसआई संजीव सिंह चौहान और कांस्टेबल नरेंद्र कुमार उन के साथ थे.

नन्हे के घर में अभी भी मातम का माहौल था. अनंगपाल ने नन्हे को एक तरफ बुला कर पूछा, ‘‘नन्हे, मुझे गुलफ्शा का मोबाइल फोन चाहिए.’’

‘‘सर, देखता हूं.’’ नन्हे ने कहा और कमरे में चला गया.

थोड़ी देर में ही वह वापस आ गया. उस के हाथ में मोबाइल था. उस ने मोबाइल अनंगपाल को देते हुए पूछा, ‘‘साहब, क्या गुलफ्शा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई है?’’

‘‘अभी नहीं, शाम तक आने की उम्मीद है. उस रिपोर्ट का हमें भी बेचैनी से इंतजार है.’’

अनंगपाल मोबाइल ले कर अपने साथियों के साथ कोतवाली लौट आए.

मोबाइल की जांच शुरू हुई तो उस में जिन नंबरों पर ज्यादा बातें हुई थीं, उन्हें टे्रस करने के लिए नंबर मिला कर एक कागज पर दूसरी ओर से बात करने वाले का नामपता पूछ कर दर्ज किया गया.

इन में 4 नंबर गुलफ्शा की सहेलियों के थे लेकिन एक नंबर पर बात करने से मालूम हुआ कि वह डासना गेट में रहने वाले किसी समीर सलमानी का था. गुलफ्शा इस नंबर पर ज्यादा बातें किया करती थी.

एसआई अनंगपाल को शक हुआ कि यह समीर नाम का शख्स ही गुलफ्शा का प्रेमी हो सकता है. अनंगपाल अपने साथियों के साथ इस शख्स से मिलने डासना गेट के लिए निकल पड़े.

डासना गेट के मसजिद कंपाउंड में समीर सलमानी का घर था. वह घर पर ही मिल गया. उसे साथ ले कर अनंगपाल कोतवाली लौट आए. रास्ते में समीर से कोई सवाल नहीं किया गया. उसे एसएचओ खारी के सामने बिठाया तो वह हैरानपरेशान था.

उस ने डरतेडरते पूछा, ‘‘सर, मैं ने क्या गुनाह किया है, जो मुझे यहां लाया गया है?’’

‘‘तुम्हारा नाम समीर ही है न?’’ एसएचओ ने प्रश्न किया.

‘‘जी सर, मैं ने घर पर और फोन पर भी अपना नामपता बता दिया था. मेरा नाम समीर सलमानी है. मेरे अब्बू का नाम शौकत सलमानी है.’’

‘‘तुम गुलफ्शा को जानते हो समीर? तुम्हारा नंबर हमें उस के मोबाइल फोन से मिला. हमें यह बताओ तुम्हारा उस से क्या संबंध है?’’

‘‘सर, वह मेरी प्रेमिका है. 2 साल से हमारा प्रेम प्रसंग चल रहा है.’’

‘‘ओह!’’ एसएचओ ने होंठों को सिकोड़ा, ‘‘हमारा अनुमान सही निकला, गुलफ्शा का कोई प्रेमी रहा है, वह तुम निकले. अब सीधी तरह यह बता दो, तुम ने गुलफ्शा को क्यों मारा?’’

‘‘क…क्या? गुलफ्शा को किसी ने मार डाला?’’ समीर ने घबरा कर पूछा.

‘‘किसी ने नहीं बेटा, तुम ने उस का गला दबाया है. बताओ, तुम ने ऐसा क्यों किया?’’ इस बार अनंगपाल ने सख्त स्वर में पूछा.

‘‘मैं ने गुलफ्शा को नहीं मारा साहब,’’ समीर कहते हुए फफक कर रोने लगा. रोते हुए ही बोला, ‘‘मैं गुलफ्शा को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था. गुलफ्शा भी मुझे सच्चे दिल से चाहती थी, वह मुझ से निकाह करना चाहती थी लेकिन उस के घर वाले इस के लिए तैयार नहीं थे.’’

‘‘क्यों? तुम दोनों तो एक ही मजहब से हो, जवान और देखने में हैंडसम भी हो. फिर गुलफ्शा के घर वालों को तुम से उस का निकाह करने में क्या दिक्कत थी?’’

‘‘गुलफ्शा का भाई तौहीद और उस की अम्मी का कहना था कि मैं छोटी जाति से हूं इसलिए यह निकाह संभव नहीं है.’’

‘‘छोटी जाति?’’ राठी ने उस के चेहरे पर गहरी नजरें जमा कर पूछा, ‘‘किस जाति के हो तुम?’’

4 साल बाद मिले कंकाल ने बयां की इश्क की कहानी – भाग 3

42 वर्षीय चंद्रवीर को पैतृक संपत्ति का काफी बड़ा हिस्सा बंटवारे में मिला था. वह उसी संपत्ति का थोड़ाथोड़ा हिस्सा बेच कर अपने परिवार का गुजरबसर कर रहा था. परिवार में 3 ही प्राणी थे— वह, उस की पत्नी सविता और बेटी दीपा (काल्पनिक नाम). चंद्रवीर घर में  किसी चीज की कमी नहीं होने देता था. उस की गृहस्थी की गाड़ी बड़े आराम से चल रही थी.

28 सितंबर, 2018 को चंद्रवीर लापता हो गया. सविता के बताने के अनुसार चंद्रवीर अपने खेत का एक बड़ा हिस्सा बेचने के इरादे से घर से निकला था. शाम ढल गई और अंधेरा जमीन पर उतर आया तो सविता के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. उस ने अपनी बेटी दीपा को साथ लिया और पति चंद्रवीर को उन जगहों पर तलाश करने निकल गई, जहांजहां वह उठताबैठता था.

सविता और दीपा ने हर संभावित जगहों पर पति की तलाश की, उस के विषय में पूछताछ की लेकिन हर जगह से उन्हें निराशा मिली. चंद्रवीर आज उन जगहों पर नहीं आया था. दोनों घर आ गईं. जैसेतैसे रात गुजर गई.

सुबह सविता ने अरुण को बुला कर बताया कि चंद्रवीर कल सुबह से घर से निकला है, अभी तक वापस नहीं लौटा है. उसे रिश्तेदारी में तलाश करो.

अचानक लापता हो गया चंद्रवीर

अरुण अपने साथ 2-3 लोगों को ले कर उन रिश्तेदारियों में गया, जहांजहां चंद्रवीर आनाजाना करता था. उस ने कितनी ही रिश्तेदारियों में मालूम किया, लेकिन चंद्रवीर कई दिनों से उन लोगों से मिलने नहीं आया था. 2 दिन की तलाश करने के बाद अरुण वापस आ गया.

उसे मालूम हुआ कि 3 दिन बीत जाने पर भी चंद्रवीर घर नहीं लौटा है. उस ने सविता को बताया कि चंद्रवीर किसी रिश्तेदारी में भी नहीं पहुंचा है. सुन कर सविता दहाड़े मार कर रोने लगी.

अब तक पूरे गांव में यह बात फैल चुकी थी कि चंद्रवीर 3 दिनों से लापता है. गांव वाले चंद्रवीर की तलाश में सविता की मदद के लिए इकट्ठे हो गए. पूरे गांव में चंद्रवीर को ढूंढा जाने लगा. नदी तालाब, खेत खलिहान हर जगह चंद्रवीर को खोजा गया, लेकिन वह नहीं मिला.

इन लोगों में चंद्रवीर का भाई भूरे भी था. भूरे से चंद्रवीर की बनती नहीं थी, वह चंद्रवीर के घर आताजाता नहीं था लेकिन चंद्रवीर था तो सगा भाई, इसलिए उस की तलाश में वह भी जान लड़ा रहा था.

चंद्रवीर जब 5 दिन की खोजखबर के बाद भी नहीं मिला तो 5 अक्तूबर, 2018 को भूरे ने गाजियाबाद के नंदग्राम थाने में चंद्रवीर के लापता होने की सूचना दर्ज करवा दी.

नंदग्राम थाने के तत्कालीन एसएचओ पुलिस टीम के साथ सिकरोड गांव में स्थित सविता के घर पहुंच गए. सविता 5 दिनों से आंसू बहा रही थी. दीपा भी पिता की याद में सिसक रही थी. वह एकदम बेसुध और बेहाल सी नजर आ रही थी.

एसएचओ ने सविता के सामने पहुंच कर उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘‘देखो रोओ मत, चंद्रवीर की तलाश करने में हम लोग पूरी जान लड़ा देंगे. तुम हमें यह बताओ कि चंद्रवीर के घर से जाने से पहले तुम्हारा क्या चंद्रवीर से झगड़ा हुआ था?’’

‘‘नहीं, मैं उन से आज तक नहीं लड़ी, वह भी मुझ से नहीं लड़ते थे. वह दिल के बहुत अच्छे और नेक इंसान थे. मुझे और अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे.’’ सविता ने आंसू पोंछते हुए कहा.

‘‘चंद्रवीर ने जाने से पहले तुम्हें बताया था कि वह कहां और क्यों जा रहा है?’’ एसएचओ ने दूसरा प्रश्न किया.

‘‘कहां जा रहे हैं, यह भी नहीं बताया था. मेरे सामने वह घर से नहीं निकले थे साहब, वह अंधेरे में ही निकल कर चले गए थे. हम मांबेटी तब सोई हुई थीं.’’

‘‘तुम्हें किसी पर संदेह है?’’

‘‘मेरे पति का अपने भाई भूरे से संपत्ति विवाद रहता था. मुझे लगता है कि वो अंधेरे में घर से नहीं गए, बल्कि उन्हें अंधेरे में गायब कर दिया गया है. यह काम भूरे ने किया है साहब. उस ने शायद मेरे पति की हत्या कर दी है.’’

‘‘यह पक्का हो, ऐसा तो नहीं कह सकते. जांच के बाद ही पता चलेगा कि क्या भूरे ने संपत्ति विवाद के कारण चंद्रवीर को लापता करने की हिमाकत की है.’’ एसएचओ ने कहा और उठ कर उन्होंने एसआई को भूरे को पकड़ कर थाने लाने का आदेश दे दिया.

चंद्रवीर के भाई से की पूछताछ

आवश्यक जानकारी जुटा लेने के बाद एसएचओ अकेले ही थाने लौट आए. एसआई अपने साथ 2 कांस्टेबल ले कर भूरे को हिरासत में लेने के लिए निकल गए थे.

थोड़ी देर में ही भूरे को ले कर एसआई और कांस्टेबल थाने आ गए. भूरे ने कभी थाना कचहरी नहीं देखा था. वह काफी डरा हुआ था. आते ही उस ने एसएचओ के पांव पकड़ लिए, ‘‘साहब, मुझे क्यों पकड़ा है आप ने? मैं ने ऐसा क्या अपराध किया है?’’

‘‘तुम ने अपने भाई चंद्रवीर को कहां लापता किया है भूरे?’’ एसएचओ ने उसे खुद से परे कर सख्त स्वर में पूछा.

‘‘मैं चंद्रवीर को कहां लापता करूंगा साहब, वह मेरा भाई है.’’

‘‘तुम्हारा अपने भाई से संपत्ति का विवाद था?’’

‘‘नहीं साहब,’’ भूरे तुरंत बोला, ‘‘हमारा आपस में संपत्ति का बंटवारा बहुत प्रेम से हुआ था. कौन कहता है कि हमारा संपत्ति का विवाद था?’’

‘‘सविता कह रही है,’’ एसएचओ ने भूरे को घूरते हुए कहा, ‘‘सविता का कहना है कि संपत्ति विवाद में तुम ने उस के पति को लापता किया है और उस की हत्या कर दी है.’’

यह सुनते ही भूरे ने सिर थाम लिया. कुछ देर तक वह स्तब्ध सा बैठा रहा फिर तैश में आ कर बोला, ‘‘सविता मुझ से जलती है साहब, वह मुझ पर झूठा आरोप लगा रही है. आप ही बताइए, मैं ने यह काम किया होता तो थाने में आ कर खुद उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट क्यों लिखवाता?’’

‘‘रिपोर्ट लिखवाने से तुम निर्दोष थोड़ी हो गए. हम तुम्हारे घर की तलाशी लेंगे.’’

‘‘बेशक तलाशी लीजिए साहब, मैं अपने मांबाप की कसम खा कर कहता हूं कि मैं निर्दोष हूं. चंद्रवीर कहां गया, मैं नहीं जानता.’’

एसएचओ को लगा भूरे सच कह रहा है लेकिन वह पूरी तसल्ली कर लेना चाहते थे. उन्होंने भूरे को साथ लिया और उस के घर की तलाशी ली. उन्हें उस के घर में ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिस से यह साबित होता कि भूरे ने चंद्रवीर की हत्या की है या उसे लापता किया है. उन्होंने भूरे को छोड़ दिया.

ट्रॉली बेग में सिमटा आयुषि का प्यार – भाग 3

मातापिता इस शादी के खिलाफ थे. उस समय उन्होंने इस का विरोध किया था. लेकिन आयुषि ने उन की एक न सुनी. आयुषि ने कहा, ‘‘पापा, मैं अब बड़ी हो गई हूं, अपने फैसले ले सकती हूं. अपना अच्छाबुरा सोच सकती हूं.’’

उस समय तक मातापिता को पता नहीं था कि आयुषि प्रेम विवाह कर चुकी है.

बाद में जब उन्हें पता चला तो पिता ने उसे समझाया, ‘‘बेटा, दूसरी जाति में शादी करने से हमारी समाज में बहुत बदनामी होगी. अगर तुम्हें शादी ही करनी है तो अपनी जाति में करो.’’

तब आयुषि ने कहा, ‘‘पापा, मैं छत्रपाल को बहुत प्यार करती हूं. वह भी मुझे बहुत चाहता है.’’

मां ब्रजबाला ने भी आयुषि के दूसरी जाति के लड़के से शादी करने का विरोध किया था और उसे काफी समझाया.

छत्रपाल से शादी करने के बाद आयुषि अपनी मरजी से जब चाहे, तब पति के पास चली जाती थी. कहने को आयुषि अब तक एक बार भी अपनी ससुराल भरतपुर नहीं गई थी. बेटी के इस तरह दूसरी जाति में शादी कर लेने और विद्रोही तेवर अपनाने से उस के मातापिता को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खोने की चिंता सताती थी. दिल्ली में नितेश यादव का मोलड़बंद एक्सटेंशन में दोमंजिला मकान है.

पिता ही निकला असली कातिल

17 नवंबर को दोपहर के 2 बजे का समय था. हत्या वाले दिन आयुषि अपने पति से मिलने गई थी और देर से लौटी थी. इसी बात को ले कर उस का मां से झगड़ा हुआ था. मां ने उस की शिकायत फोन पर नितेश से करने के साथ उसे घर बुला लिया.

आयुषि की इस स्वच्छंदता से पिता तैश में आ गया और अपना आपा खो बैठा. उस ने गुस्से में अपनी लाइसैंसी रिवौल्वर से 2 गोलियां आयुषि को मार दीं. एक गोली सिर में व दूसरी सीने में मारी.

होनहार बेटी को गोली मारते समय पिता का कलेजा और हाथ भी नहीं कांपे. मां ने भी अपने पति का पूरा साथ दिया.

उस समय आयुषि का भाई आयुष स्कूल गया हुआ था. वह 11वीं क्लास में पढ़ता है. उस के आने से पहले ही दोनों ने खून साफ किया और बाजार से पौलीथिन खरीद कर लाया. दोनों ने शव को पौलीथिन में पैक करने के बाद ट्रौली बैग में बंद कर दिया. इस ट्रौली बैग को मकान की पहली मंजिल के कमरे में रख दिया.

इस की पड़ोसियों, यहां तक कि बेटे को भी भनक तक नहीं लगी. बेटा लौट कर आया तो उस ने दीदी के बारे में पूछा. मां ने बताया कि वह कहीं चली गई है.

11 घंटे बाद फेंका आयुषि का शव

बेटे आयुष के स्कूल से आने के बाद उन्होंने सब कुछ ऐसा दिखाया गया कि कुछ हुआ ही न हो. उन्होंने देर रात तक बेटे के सोने का इंतजार किया. नितेश का घर कार्नर का है.

उस के घर में एक तरफ सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. इसलिए उस ने बेटे के सो जाने के बाद देर रात 3 बजे पीछे वाले दरवाजे से बेटी के शव का ट्रौली बैग निकाला. घर से कुछ मीटर की दूरी पर खड़ी कार तक वह खींच कर ट्रौली बैग ले गया.

बेटी के शव को दंपति ने 11 घंटे तक घर में ही रखा. नितेश और पत्नी ब्रजबाला ने कार में ट्रौली बैग को रखा और घर से 150 किलोमीटर दूर मथुरा जिले के राया इलाके में फेंक दिया. यह सब घर के पास और टोलनाका के सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गया था.

3 बजे दंपति कार में हाईवे हो कर निकले. कार को नितेश चला रहा था, जबकि कार की पीछे की सीट पर पत्नी ब्रजबाला ट्रौली बैग के साथ बैठी थी. इस बीच पिता नितेश इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि लाश को कहां ठिकाने लगाए.

फिर कातिल नितेश को यमुना एक्सप्रैसवे का किनारा सूझा. उस के बाद माइलस्टोन 108 पर स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र राया में सुबह करीब 7 बजे ट्रौली बैग को सर्विस रोड पर झाडि़यों में फेंक कर दंपति वापस दिल्ली लौट गए.

पुलिस ने नितेश यादव व उस की पत्नी ब्रजबाला के खिलाफ बेटी की हत्या व साक्ष्य छिपाने के अपराध आईपीसी की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

सिर में फंसी रह गई गोली

पिता नितेश ने आयुषि के सिर और छाती में गोलियां मारी थीं. सिर में गोली फंसी रह गई थी. जबकि छाती में लगी गोली फेफड़ों को चीरते हुए पार हो गई थी. इस बात का खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हुआ. आयुषि का पोस्टमार्टम 3 डाक्टरों के पैनल ने वीडियोग्राफी के बीच किया था. सिर से बरामद गोली को सील कर दिया गया.

आयुषि पढ़ाई में काफी तेज थी. वह नीट की प्रवेश परीक्षा पास कर चुकी थी, लेकिन साक्षात्कार के लिए नहीं गई थी. आयुषि की यह बात भी मातापिता को खराब लगी थी. क्योंकि परिजन उसे डाक्टर बनते देखना चाहते थे.

पोस्टमार्टम के बाद नितेश ने बेटी का अंतिम संस्कार यहीं करने की इच्छा व्यक्त की. तब पुलिस अभिरक्षा में लक्ष्मीनगर क्षेत्र में यमुना के दूसरे किनारे पर धु्रव घाट पर उस का अंतिम संस्कार किया गया.

आपा खो कर जिन हाथों से बेटी के हाथ पीले करने का संकल्प लिया था, उन्हीं हाथों से बेटी की जान लेने के बाद नितेश ने बेटी को मुखाग्नि दी. उस समय मां कुछ दूरी पर खड़ी रोती रही. जबकि आयुषि का छोटा भाई आयुष वहां मौजूद नहीं था.

आयुषि यादव और छत्रपाल गुर्जर की शादी की बात जहां आयुषि के घर वालों को पता थी, वहीं छत्रपाल गुर्जर के घर वाले शादी से बेखबर थे. उस ने अपनी शादी की बात मातापिता को नहीं बताई थी.

2 दिन पहले घर वालों को आयुषि की हत्या के बाद इस बात का पता चला था. वहीं आयुषि की मां ने घटना से 10 दिन पहले फोन पर छत्रपाल को धमकाया था कि मेरी बेटी से बात मत करना, वह तुम्हारी वजह से परेशान रहती है.