सोनिया नारंग : राजनीतिज्ञों को भी सिखाया सबक

जिंदगी में कुछ कर गुजरने का जज्बा ले कर जब कोई महिला ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपना वर्चस्व कायम करती है तो उस की एक अलग ही छवि निखर कर आती है, बेखौफ, दबंग और ईमानदार अफसर की छवि. जिस के लिए उस का कर्तव्य पहले होता है, बाकी सब बाद में.

जोश और जुनून से लबरेज सोनिया नारंग भी उन्हीं विशेष अफसरों में अपनी खास उपस्थिति दर्ज कराती हैं जिन के लिए आम से ले कर खास व्यक्ति तक के लिए कानून की एक ही परिभाषा है. फिर चाहे वो खास अफसरशाही पर हुकूमत चलाने वाले नेता ही क्यों न हों.

सोनिया नारंग का जन्म और परवरिश चंडीगढ़ में हुई. उन के पिता भी प्रशासनिक अधकारी थे. उन से प्रेरणा ले कर सोनिया ने बचपन से ही सिविल सर्विस जौइन करने को अपना लक्ष्य बना लिया था. इस लक्ष्य को पाने की तैयारी उन्होंने हाईस्कूल के बाद से ही शुरू कर दी थी. 1999 में पंजाब यूनिवर्सिटी से समाजशास्त्र में गोल्ड मेडल पाने वाली सोनिया नारंग की लगन और मेहनत रंग लाई. वह कर्नाटक कैडर के 2002 बैच की आईपीएस बन गईं.

उन के कैरियर की पहली पोस्टिंग 2004 में कर्नाटक के गुलबर्ग में हुई. सोनिया ने जौइंन करते ही अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे. 2006 की बात है. तब सोनिया नारंग दावणगेरे जिले की एसपी थीं. होनाली में हो रहे एक प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस और बीजेपी के दो बड़े नेता व उन के समर्थक आपस में भिड़ गए.

इस बात की सूचना मिलते ही सोनिया नारंग मौके पर जा पहुंची. तब तक प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतर आए थे और दोनों दलों के नेता आपस में उलझे हुए थे. मामला गंभीर होता देख सोनिया नारंग ने लाठी चार्ज का आदेश दे दिया. इस पर भाजपा नेता रेनुकाचार्य ने पीछे हटने से मना कर दिया और एसपी सोनिया नारंग से ही उलझ कर अभद्रता पर उतर आए.

तब सोनिया नारंग ने एमएलए रेनुकाचार्य को कानून का सबक सिखाने के लिए सब के सामने थप्पड़ जड़ दिया.

इस बेइज्जती पर भाजपा नेता बुरी तरह से बौखला गए. कई दिन तक हंगामा होता रहा, लेकिन एसपी सोनिया निडरता से अपनी बात पर अडिग बनी रहीं. बाद में यही भाजपा नेता रेनुकाचार्य मंत्री बन गए थे.

सोनिया नारंग ने अपने हौसले और मजबूत इरादों का परिचय तब भी दिया था जब कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 16 करोड़ के खदान घोटाले में उन का नाम भी शामिल कर दिया था.

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मुख्यमंत्री ने विधानसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में 16 करोड़ के खदान घोटाले से जुड़े अधिकारियों में सोनिया नारंग का नाम भी सर्वजनिक किया. मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने सदन को बताया कि खदान घोटाले में आईपीएस सोनिया नारंग का नाम भी सामने आया है. सरकार उन के खिलाफ काररवाई पर विचार कर रही है.

मुख्यमंत्री सिद्दारमैया पर भी भारी इस के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में तूफान सा मच गया. एक बेदाग छवि की आईपीएस अधिकारी का नाम किसी घोटाले में लिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण था. लेकिन सोनिया नारंग घोटाले से उठी आंधी के बीच भी अविचल रहीं.

उन्होंने सीएम द्वारा लगाए गए आरोप के बाद न तो सफाई देने की जरूरत समझी और न ही अन्य अधिकारियों की तरह सदन के सदस्यों से मिल कर अपना पक्ष रखने की. इस सब की बजाय सोनिया नारंग ने सीएम के आरोप के खिलाफ मजबूती से मोर्चा खोल दिया और सीधे प्रेस के लिए स्टेटमेंट जारी किए.

सोनिया ने कहा, ‘मेरी अंतरात्मा साफ है. आप चाहें तो किसी भी तरह की जांच करा लें. मैं इस आरोप का न सिर्फ खंडन करती हूं, बल्कि इस का कानूनी तरीके से हर स्तर पर विरोध भी करूंगी.’ उन्होंने ऐसा ही किया भी. सोनिया नारंग ने बेबाकी से अपनी बात रखते हुए बताया, ‘मैं इस तरह के किसी भी आरोप को सिरे से खारिज करती हूं. मैं ने उन इलाकों में अपने कैरियर के दौरान कभी काम ही नहीं किया है, जहां पर खनन घोटाले की बात की जा रही है.’

कानून को सर्वोपरि मानने वाली सोनिया ने किसी भी अवैध खनन को बढ़ावा देने या खनन माफिया से सांठगांठ करने से स्पष्ट रूप से इनकार करते हुए तत्कालिन मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के आरोप का पुरजोर विरोध किया था. मुख्यमंत्री से सीधे टकराने का साहस सोनिया नारंग जैसी दबंग और ईमानदार आईपीएस ही कर सकती थीं. आखिरकार उन का विश्वास जीता और उन्हें इस मामले में क्लीन चिट भी मिली.

यही वजह है कि कर्नाटक के लोग सोनिया नारंग पर अटूट विश्वास करते हैं. यहां तक कि निष्पक्ष जांच के लिए उन्हें सीबीआई से ज्यादा भरोसा अपनी अफसर सोनिया पर है.

ऐसा ही एक मामला तब सामने आया था जब सोनिया नारंग कर्नाटक लोकायुक्त की एसपी थीं. लोकायुक्त जस्टिस वाई भास्कर राव के बेटे अश्विन राव और कुछ रिश्तेदारों पर राज्य के संदिग्ध भ्रष्ट अफसरों से फिरौती वसूली का रैकेट चलाने का आरोप लगा था.

पीडब्ल्यूडी के एक एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को झूठे मामले में फंसाने की धमकी दे कर एक करोड़ रुपए मांगे गए थे. उक्त इंजीनियर को जांच से बचने के लिए 25 लाख रुपए तुरंत देने को कहा गया था. तब इंजीनियर ने इस बात की शिकायत लोकायुक्त पुलिस एसपी सोनिया नारंग से की.

उन्होंने मौखिक शिकायत के आधार पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले की विधिवत जांच कर के अपनी रिपोर्ट लोकायुक्त के रजिस्ट्रार को सौंप दी. इस पर केस खुल कर सामने आया. परिणामस्वरूप  जस्टिस वाई भास्कर राव को इस्तीफा देना पड़ा और उन के बेटे सहित 11 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया.

एक प्रशासनिक अधिकारी की बेटी और एक आईपीएस की पत्नी सोनिया नारंग को उन के मजबूत हौसले, बुलंद इरादे और ईमानदारी के लिए जाना जाता है. इसी से पे्ररित हो कर उन के जीवन पर कन्नड़ भाषा में ‘अहिल्या’ नाम की फिल्म बनी है.

पंजाब यूनिवर्सिटी से समाज शास्त्र में 1999 की गोल्ड मेडलिस्ट सोनिया नारंग चंडीगढ़ में पली बढ़ीं. किशोरावस्था से उन्होंने एक ही सपना देखा था सिविल सर्विस जौइन करने का जिसे साकार करने के लिए उन्होंने हाईस्कूल के बाद से ही तैयारी शुरू कर दी थी. उन की

लगन और मेहनत रंग लाई, सोनिया कर्नाटक कैडर के 2002 बैच की आईपीएस बन गईं.

उन के कैरियर की पहली पोस्टिंग 2004 में कर्नाटक के गुलबर्गा में हुई. जिस में उन्हें चुनावों के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई थी. सोनिया नारंग ने जौइन करते ही अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे. 2006 की बात है. तब सोनिया नारंग दावणगेरे जिले की एसपी थीं. होनाली में एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस और बीजेपी के दो बड़े नेता और उन के समर्थक आपस में भिड़ गए.

इस बात की सूचना मिलते ही सोनिया नारंग मौके पर जा पहुंचीं. तब तक प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतर आए थे और दोनों दलों के नेता आपस में उलझे हुए थे. मामला गंभीर होता देख सोनिया नारंग ने लाठी चार्ज का आदेश दे दिया. इस पर भाजपा नेता रेनुकाचार्य ने पीछे हटने से मना कर दिया और एसपी सोनिया से ही भिड़ बैठे.

तब सोनिया नारंग ने तत्कालीन एमएलए रेनुकाचार्य को सबक सिखाने के लिए सब के सामने थप्पड़ जड़ दिया. इस बेइज्जती पर भाजपा नेता बौखला गए. कई दिन तक हंगामा होता रहा, लेकिन एसपी सोनिया अपनी बात पर अडिग बनी रहीं. बाद में रेनुकाचार्य मंत्री बन गए थे.

सोनिया नारंग ने अपने मजबूत इरादों से तब भी परिचित कराया था जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 16 करोड़ के खदान घोटाले में उन का नाम भी शामिल किया था. मुख्यमंत्री ने विधानसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में 16 करोड़ के खदान घोटाले से जुड़े अधिकारियों में सोनिया नारंग का नाम भी सार्वजनिक किया था. मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने सदन को बताया कि खद्यान घोटाले में आईपीएस सोनिया नारंग का नाम सामने आया है और सरकार उन के खिलाफ काररवाई पर विचार कर रही है.

इस के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे में तूफान सा मच गया. लेकिन सोनिया नारंग ने इस आंधी के बीच अविचल रहते हुए सीएम के आरोपों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया और खुल कर विरोध किया. उन्होंने कहा, ‘मैं इस तरह के किसी भी आरोप को सिरे से खारिज करती हूं. मैं ने उन इलाकों में अपने कैरियर के दौरान कभी काम ही नहीं किया है जहां पर खनन घोटाले की बात की जा रही है.’

सोनिया नारंग ने सीएम द्वारा लगाए गए आरोप के बाद न तो सफाई देने की जरूरत समझी और न ही सदन के सदस्यों से मिल कर अपना पक्ष रखने की. उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री के खिलाफ उसी शैली में मोर्चा खोल कर अपना विरोध जाहिर किया.

एक प्रशासनिक अधिकारी की बेटी और एक आईपीएस की पत्नी सोनिया नारंग को उन के मजबूत हौसले, बुलंद इरादे और ईमानदारी के लिए जाना जाता है. सोनिया नारंग के जीवन पर कन्नड़ भाषा में अहिल्या नाम की फिल्म बनी है. देश को ऐसे ही अधिकारियों की जरूरत है, जो नेताओं के हथकंडों से न डर कर अपने फर्ज को अहमियत दें.

पंजाब यूनिवर्सिटी से समाज शास्त्र में 1999 की गोल्ड मेडलिस्ट सोनिया नारंग चंडीगढ़ में पली बढ़ीं. किशोरावस्था से उन्होंने एक ही सपना देखा था सिविल सर्विस जौइन करने का जिसे साकार करने के लिए उन्होंने हाईस्कूल के बाद से ही तैयारी शुरू कर दी थी. उन की लगन और मेहनत रंग लाई, सोनिया कर्नाटक कैडर के 2002 बैच की आईपीएस बन गईं.

उन के कैरियर की पहली पोस्टिंग 2004 में कर्नाटक के गुलबर्गा में हुई. जिस में उन्हें चुनावों के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई थी. सोनिया नारंग ने जौइन करते ही अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे. 2006 की बात है. तब सोनिया नारंग दावणगेरे जिले की एसपी थीं. होनाली में एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस और बीजेपी के दो बड़े नेता और उन के समर्थक आपस में भिड़ गए.

इस बात की सूचना मिलते ही सोनिया नारंग मौके पर जा पहुंचीं. तब तक प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतर आए थे और दोनों दलों के नेता आपस में उलझे हुए थे. मामला गंभीर होता देख सोनिया नारंग ने लाठी चार्ज का आदेश दे दिया. इस पर भाजपा नेता रेनुकाचार्य ने पीछे हटने से मना कर दिया और एसपी सोनिया से ही भिड़ बैठे.

तब सोनिया नारंग ने तत्कालीन एमएलए रेनुकाचार्य को सबक सिखाने के लिए सब के सामने थप्पड़ जड़ दिया. इस बेइज्जती पर भाजपा नेता बौखला गए. कई दिन तक हंगामा होता रहा, लेकिन एसपी सोनिया अपनी बात पर अडिग बनी रहीं. बाद में रेनुकाचार्य मंत्री बन गए थे.

सोनिया नारंग ने अपने मजबूत इरादों से तब भी परिचित कराया था जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 16 करोड़ के खदान घोटाले में उन का नाम भी शामिल किया था. मुख्यमंत्री ने विधानसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में 16 करोड़ के खदान घोटाले से जुड़े अधिकारियों में सोनिया नारंग का नाम भी सार्वजनिक किया था. मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने सदन को बताया कि खद्यान घोटाले में आईपीएस सोनिया नारंग का नाम सामने आया है और सरकार उन के खिलाफ काररवाई पर विचार कर रही है.

इस के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे में तूफान सा मच गया. लेकिन सोनिया नारंग ने इस आंधी के बीच अविचल रहते हुए सीएम के आरोपों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया और खुल कर विरोध किया. उन्होंने कहा, ‘मैं इस तरह के किसी भी आरोप को सिरे से खारिज करती हूं. मैं ने उन इलाकों में अपने कैरियर के दौरान कभी काम ही नहीं किया है जहां पर खनन घोटाले की बात की जा रही है.’

सोनिया नारंग ने सीएम द्वारा लगाए गए आरोप के बाद न तो सफाई देने की जरूरत समझी और न ही सदन के सदस्यों से मिल कर अपना पक्ष रखने की. उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री के खिलाफ उसी शैली में मोर्चा खोल कर अपना विरोध जाहिर किया.

एक प्रशासनिक अधिकारी की बेटी और एक आईपीएस की पत्नी सोनिया नारंग को उन के मजबूत हौसले, बुलंद इरादे और ईमानदारी के लिए जाना जाता है. सोनिया नारंग के जीवन पर कन्नड़ भाषा में अहिल्या नाम की फिल्म बनी है. देश को ऐसे ही अधिकारियों की जरूरत है, जो नेताओं के हथकंडों से न डर कर अपने फर्ज को अहमियत दें.

सुपर कौप सौम्या सांबशिवन : हिमाचल की शेरनी

जब भी जांबाज महिला आईपीएस अफसरों का नाम आता है तो शिमला में 1947 से 2017 तक 53वीं एसपी रह चुकीं सौम्या सांबशिवन को नहीं भूला जा सकता. वह स्वभाव से सौम्य हैं, लेकिन दिल से दबंग.

केरल की रहने वाली सौम्या बनना चाहती थीं लेखिका, लेकिन बन गईं एसपी. जाहिर है, ऐसे में मन गलत के प्रति विद्रोह तो करेगा ही, विद्रोह होगा तो दबंगई भी होगी. गनीमत यह है कि उन्हें पढ़ने का शौक है और यह शौक विद्रोह को रोकता है. फिर भी वह अपराधियों के लिए खौफनाक तो हैं ही.

इंजीनियर पिता की एकलौती बेटी सौम्या ने बायोस्ट्रीम से ग्रेजुएशन करने के बाद एमबीए में दाखिला लिया था. एमबीए हो गया तो उन्होंने 2 साल तक एक मल्टीनेशनल बैंक में नौकरी की. इस बीच वह यूपीएससी की तैयारी करती रहीं. 2010 में उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास की और आईपीएस बन कर 11 महीने की ट्रेनिंग में चली गईं. उन्हें हिमाचल कैडर मिला था. विभागीय ट्रेनिंग के लिए उन्हें शिमला भेजा गया, जहां वह डिप्टी एसपी की पोस्ट पर रहीं. फिर उन्हें एडिशनल एसपी बनाया गया.

एसपी के तौर पर उन की पहली पोस्टिंग सिरमौर में हुई. सिरमौर में ड्रग का बोलबाला था. ड्रग्स की तसकरी और बिक्री भी होती थी और लोग ड्रग्स लेते भी थे. झाडि़यों में ड्रग की खाली रेपर पुडि़या पड़ी मिलती थीं. सब से पहले सौम्या ने नशेडि़यों की धरपकड़ कर के ड्रग लेने वालों पर लगाम लगाई.

इस के लिए उन्होंने पकड़े गए नशेडि़यों की वीडियोग्राफी कराई और बताया इस की डौक्यूमेंट्री बना कर देश भर में दिखाई जाएगी. इस से होने वाली बदनामी से लोग डरे. उन्होंने नशेडि़यों के ठिकानों को भी जेसीबी से हटवा दिया और उस का भी वीडियो बनवाया.

नशेडि़यों के अड्डे बने खंडहर भवनों में कांचकली (खुजली वाला पाउडर) का छिड़काव करा दिया गया ताकि वे वहां जाएं तो खुजातेखुजाते पागल हो जाएं. सिरमौर में चला अपनी तरह का यह पहला अभियान था, जिसे जनता का भरपूर समर्थन मिला. उन्होंने देवीनगर में कृपालशिला और गुरुद्वारे के पास नशेडि़यों के छिप कर बैठने के अड्डों को भी नेस्तनाबूद करवा दिया.

सौम्या के अनुसार एक ब्लाइंड मर्डर की तफ्तीश के लिए वह झाडि़यों में गई थीं, जहां नशीली दवाइयों के रेपर, नशे के लिए प्रयोग होने वाली सामग्री आदि मिली. तभी उन्होंने फैसला कर लिया था कि नशे के खिलाफ अभियान चलाएंगी. संदिग्ध नशेडि़यों पर नजर रखने के लिए उन्होंने पावटा में 75 सीसीटीवी कैमरे भी लगवाए.

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इस के बाद उन्होंने नशा बेचने, सप्लाई करने वाले तसकरों को घेरा. अपने प्रयासों से सौम्या ने सिरमौर को ड्रग्स मुक्त तो किया ही. नशेडि़यों की लत छुड़वाने के लिए जिलेभर में नशा मुक्ति केंद्र भी बनवाए. इसी बीच उन्होंने कई ब्लाइंड केस सुलझाए. तिहाड़ जेल से फरार एक ऐसे पेशेवर हत्यारे को भी पकड़ा जो कत्ल कर के खुला घूम रहा था.

पढ़ने लिखने की शौकीन सौम्या को साहित्य, कविताओं और मुशायरों का खूब शौक है. एक बार तो वह सिरमौर से सैकड़ों किलोमीटर दूर देवबंद में होने वाले लेडीज मुशायरे में शामिल होने पहुंच गईं. उन का कहना था कि पुलिस के काम में दिमाग के साथ दिल की मजबूती भी बेहद जरूरी है और यह मजबूती, शक्ति साहित्य से ही मिल सकती है.

कविताएं सदियों से मनुष्य को प्रेरित करती रही हैं, ये मानव के अंदर छुपी संभावनाओं को सामने लाने का बढि़या माध्यम हैं. साहित्य आदमी को सरल भी बनाता है और मजबूत भी.

एक तरफ सौम्या का यह सरल रूप सामने आया तो दूसरी तरफ उन्होंने सिरमौर में, खास कर नहान में खनन माफियाओं की नाक में ऐसी नकेल डाली कि खनन कार्य ही बंद करवा दिए. एक ही दिन में सौम्या ने 21 वाहन व जेसीबी मशीनें जब्त कीं, 40 वाहनों के चालान काटे और 1,47000 रुपए का जुर्माना वसूला.

सौम्या सब से ज्यादा चर्चाओं में तब आईं जब एक प्रदर्शन के दौरान उन्होंने बदतमीजी करने पर एक विधायक को न केवल थप्पड़ जड़ा, बल्कि जेल भी भेजा. उन का कहना था, इतनी छूट किसी को नहीं दी जा सकती. चाहे वह कोई भी क्यों न हो.

सिरमौर की सीमाएं 2 अलगअलग राज्यों से लगती हैं, इस नजरिए से इस जिले को संवेदनशील माना जाता है. लेकिन सौम्या ने अपराधियों में पुलिस का इतना खौफ भर दिया कि उन्हें ड्रग, शराब और मानव तसकरी बंद करनी पड़ी.

लड़कियों की रोल मौडल

सौम्या के पास लड़कियों से छेड़छाड़ की बहुत शिकायतें आती थीं. ऐसे मामलों में छेड़छाड़ के कुछ मामलों को तो रोका जा सकता था, लेकिन हर जगह पुलिस मौजूद नहीं रह सकती थी. इस के लिए उन्होंने सोचना शुरू किया. दरअसल बचाव के लिए पेपर स्प्रे एक तो हर जगह मिलता नहीं है, दूसरे महंगा भी होता है. कई बार मौका नहीं मिलता तो लड़कियां इस का इस्तेमाल भी नहीं कर पातीं. तीसरे इस का असर भी ज्यादा देर नहीं रह पाता.

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सौम्या ने इस बारे में सोचना शुरू किया तो थोड़ी सी मेहनत से उन्हें रास्ता मिल गया. उन्होंने मिर्च, रिफाइंड और नेल पौलिश से एक अलग तरह का तरल पदार्थ बनाया. यह इतना कारगर था कि एक बार स्प्रे करने से मनचले आधे घंटे से पहले नहीं उठ सकते थे.

उन्होंने इस का एक वीडियो बनाया और कालेज और स्कूलों की लड़कियों को ट्रेनिंग देनी शुरू की. यह काम उन्होंने हाईस्कूल से डिगरी कालेजों में पढ़ने वाली लड़कियों के बीच किया. साथ ही उन्हें खास तरह की खाली बोतलें दीं ताकि लिक्वेड को उस में भर कर अपने साथ रख सकें.

सौम्या की इस पहल को उद्योग संगठनों और प्रदेश के कुछ उद्योगपतियों ने सहयोग दिया और रीफिल की जाने वाली खाली स्प्रे बोतलें उपलब्ध कराईं. एसपी ने फैसला किया वह देश की बेटियों के लिए इस नए तरीके को यू ट्यूब के जरीए सार्वजनिक करेंगी, ताकि वे कम खर्च में अपनी सुरक्षा कर सकें. एसपी सौम्या की यह मुहिम काम आई और सिरमौर में छेड़छाड़ की घटनाएं बंद हो गईं.

शिमला ट्रांसफर

इसी बीच शिमला के कोटखाई में गुडि़या गैंग रेप और हत्या के मामले को ले कर शिमला में लौ एंड और्डर की स्थिति बिगड़ी तो सुपरकौप सौम्या का ट्रांसफर शिमला कर दिया गया.

दरअसल, शिमला से 58 किलोमीटर दूर कोटखाई में 4 जुलाई, 2017 को एक स्कूली छात्रा लापता हो गई थी. 2 दिन बाद जंगल में उस की लाश मिली. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता चला कि छात्रा के साथ गैंग रेप के बाद उस की हत्या की गई थी, वह भी 2 दिन पहले.

सवाल उठा जंगली जानवरों के होते 2 दिन तक लाश सहीसलामत कैसे पड़ी रही. इसे ले कर हंगामा हुआ तो पुलिस ने एक स्थानीय युवक सहित 5 मजदूरों को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन लोग इस से संतुष्ट नहीं थे. हंगामा बढ़ते देख पुलिस ने जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी.

उस समय हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह की सरकार थी. लोग जांच से संतुष्ट नहीं हुए. इसी बीच 18 जुलाई को पकड़े गए एक युवक सूरज की हवालात में मौत हो गई. इस से हंगामा और बढ़ गया. लोग सड़कों पर उतर आए. आरोप था कि सूरज की मौत पुलिस टार्चर से हुई है.

लौ एंड और्डर को बिगड़ता देख मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने शिमला के एसपी डब्ल्यू डी नेगी को हटा कर 19 जुलाई, 2017 को सिरमौर की तेजतर्रार और ईमानदार आईपीएस सौम्या सांबशिवन को शिमला का नया एसपी तैनात कर दिया. साथ ही मामले की जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति दे दी.

जांच शुरू हुई तो सीबीआई ने अन्य लोगों के साथ नई एसपी सौम्या सांबशिवन का भी बयान लिया. इस के बाद सीबीआई ने हवालात में सूरज की मौत (हत्या) के मामले में सूबे के आईजी जहूर एच जैदी, एसपी डब्ल्यू डी नेगी और डीएसपी मनोज जोशी सहित 5 पुलिस वालों को आरोपी बनाया.

सीबीआई जांच के दौरान यह बात सामने आई कि आईजी जहूर एच जैदी ने एसपी सौम्या पर बयान बदलने के लिए बारबार दबाव बनाया था.

सौम्या के लिए जब काम करना मुश्किल हो गया तो उन्होंने 10 दिसंबर, 2017 को पुलिस हेडक्वार्टर धर्मशाला फोन कर के डीजीपी से शिकायत की तो जैदी के फोन आने बंद हुए. डीजीपी ने यह बात मुख्यमंत्री को बताई तो जैदी को निलंबित कर दिया गया.

सूरज की हत्या के आरोपी पुलिस वालों पर शिमला की सीबीआई अदालत में केस चलना शुरू हुआ, लेकिन वहां के वकीलों ने इन लोगों की पैरवी करने से इनकार कर दिया. बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो सर्वोच्च अदालत ने इस केस को चंडीगढ़ ट्रांसफर करने का आदेश दिया.

शिमला की एसपी सौम्या सांबशिवन ने इस मामले में आईजी जहूर एच जैदी पर मानसिक रूप से प्रताडि़त करने का आरोप लगाते हुए अदालत में कहा कि आईजी इस केस में मेरा बयान बदलवाना चाहते हैं.

सौम्या के इस बयान से हिमाचल की सियायत में हलचल मच गई. तब नए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि सरकार ऐसे अधिकारियों पर बड़ी काररवाई करेगी जो केस के गवाहों पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री ठाकुर का कहना था कि हम कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रहे हैं. इस मामले में किसी ने सबूतों या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश तो यह बरदाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने बताया कि एसपी सौम्या सांबशिवन ने आईजी जैदी द्वारा दबाव बनाए जाने की बात डीजीपी से कही थी और डीजीपी ने मुझे बताया. उन्होंने जैदी को चेतावनी भी दी थी. इस के बाद जैदी ने उन्हें फोन करना बंद कर दिया था. लेकिन यह मामला फिर से उठ खड़ा हुआ. सूरज और गुडि़या मामले में उन्होंने सौम्या पर जो दबाव बनाया, उस के लिए जैदी को 3 बार सस्पैंड किया गया. लेकिन उन्हें नियमों के तहत ही फिर से नियुक्ति दी गई.

सरकारी खेल

इस बीच सौम्या सांबशिवन का ट्रांसफर कर के उन्हें पुलिस ट्रेनिंग कालेज भेज दिया गया. बाद में उन्हें वहां से भी ट्रांसफर कर के पंडोह में आईआरबी 3 का कमांडेंट बना दिया गया था. बाद में सौम्या ने फिर चंडीगढ़ कोर्ट में बयान दिया कि सुनवाई से पहले उन पर इतना दबाव डाला गया कि वह परेशान हो गईं और इस स्थिति में उन के लिए काम करना मुश्किल हो गया.

जैदी साहब सितंबर 2019 में उन के मोबाइल, शिमला औफिस के लैंडलाइन पर बात करने की लगातार कोशिश कर रहे थे. उन्होंने शिमला हेडक्वार्टर, वाट्सएप काल और सबौर्डिनेटर के फोन पर भी बात की.

सौम्या ने अपने मानसिक तनाव का जिक्र करते हुए आगे कहा कि दिनप्रतिदिन परिस्थितियां इतनी मुश्किल होती गईं कि उन के पीएसओ, स्टेनो ने फोन उठाना बंद कर दिया. ऐसी स्थिति में कोई कैसे काम कर सकता है.

अधिकारी कितना बड़ा और पावरफुल हो, लेकिन अपने सीनियर के सामने या उस के बारे में कुछ कहने से पहले 10 बार सोचता है, भविष्य की चिंता करता है. लेकिन सौम्या उन में से नहीं थीं जो डर जातीं. उन्होंने कोर्ट में कहा, ‘जैदी साहब ने मुझ से फोन पर कहा, ‘मैं वकीलों की एक टीम और 30 पेज की प्रश्नावली का सामना करने को तैयार हूं. उम्मीद है आप यह सूचना सीबीआई को नहीं देंगी.’

मजबूरी में उन्हें 10 दिसंबर, 2019 को धर्मशाला हेडक्वार्टर फोन कर के यह सूचना तत्काल डीजीपी को देनी पड़ी. इस के बाद उन का फोन आना तो बंद हो गया, लेकिन मेरे पीएसओ से मेरी लोकेशन जानने की कोशिश की गई. इस पर कोर्ट ने सीबीआई को सौम्या के कोर्ट आनेजाने के लिए सुरक्षा व्यवस्था करने को कहा. सौम्या के बयान से यह बात साबित हो रही थी कि जैदी सहित कोटखाई मामले से जुड़े अन्य पुलिस अधिकारियों ने कहीं न कहीं लापरवाही बरती थी और अब खुद को बचाने के लिए गवाहों पर उन के पक्ष में बयान देने के लिए दबाव बना रहे थे. जैदी कौन सा बयान बदलवाना चाहते थे, यह बात क्लीयर नहीं हो पाई.

बहरहाल यह केस अभी भी चल रहा है. आगे क्या होगा कहा नहीं जा सकता. सौम्या सांबशिवन जहां भी रहीं अपनी ड्यूटी बखूबी निभाई, वह भी पूरी ईमानदारी से.

इसी बीच गतवर्ष अक्तूबर, 2020 में जब बिहार में 3 चरणों में चुनाव होने थे तो सौम्या को आदेश मिला कि बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी उन की होगी. इस के लिए उन्हें राज्य कमांडर का दर्जा दिया गया था. तब भी वह पंडोह में आईआरबी 3 की कमांडेंट थीं.

आदेश मिलते ही वह हिमाचल के 600 जवानों के साथ निश्चित तारीख पर बिहार के लिए रवाना हो गईं. इन जवानों में पंडोह, बनगढ़ (ऊना) व कोलर (सिरमौर) की आईआरबी की 6 कंपनियां थीं. ये लोग सहारनपुर से टे्रन पकड़ कर बिहार के लिए रवाना हुए.

बिहार में शांतिपूर्ण चुनाव कराना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन सौम्या ने यह चुनौती स्वीकार की और पूरी भी की. फिलहाल सौम्या हिमाचल के पंडोह में आईआरबी 3 (भारतीय आरक्षित वाहिनी) की कमांडेंट हैं. उन की ईमानदारी और बेखौफ दबंग अधिकारी की छवि कभी नहीं बदलेगी. क्योंकि वह इसीलिए पुलिस फोर्स में आई हैं कि कानूनव्यवस्था को बनाए रखें और देशहित में काम करें.

जज्बे को सलाम 

ईमानदारी, मेहनत और लगन से काम करने वाले पुलिस अधिकारी हों या आम लोग जहां भी जाते हैं. कुछ अलग कर के अपनी छाप छोड़ ही देते हैं. सौम्या सांबशिवन भी उन ही में से हैं. शिमला में जब उन का पंगा अपने सिनियर औफिसर आईजी से हुआ था तो राजनीतिक दबाव के चलते उन का तबादला कांगड़ा जिले के दरोह पुलिस प्रशिक्षण कालेज में कर दिया गया था, जहां उन्हें प्रिंसिपल बनाया गया था. वहां जाते ही उन्होंने अपने सहयोगी अफसरों से कहा, ‘हम मानकों के साथ इस कालेज की प्रतिष्ठा को न केवल बनाए रखेंगे बल्कि बेहतर से बेहतर काम करेंगे.’

सौम्या ने केवल कहा ही नहीं बल्कि स्वयं को साबित कर के भी दिखाया. उन्होंने जून 2018 के चयनित कांस्टेबलों के बैच के लिए कंप्यूटर और सामान्य संचार साधनों का प्रबंध कराया ताकि उन्हें मौजूदा दौर की जरूरी शिक्षा दी जा सके. इस बैच में 682 कांस्टेबल और 3 पूर्व सैनिक थे. इस बैच के सभी प्रशिक्षार्थी बुनियादी कंप्यूटर और सामान्य संचार माध्यमों में प्रशिक्षित हो कर पासिंग आउट परेड के बाद नियुक्ति के लिए विभिन्न थानों को भेजे गए थे.

भारत सरकार की संस्था ब्यूरो फौर पुलिस एंड डेवलपमेंट द्वारा किए गए अध्ययन के बाद कांगड़ा जिले को पुलिस प्रशिक्षण कालेज दरोह को राष्ट्रीय स्तर का सर्वश्रेष्ठ केंद्र (कांस्टेबल श्रेणी) घोषित किया था. प्रशिक्षण केंद्र को केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 20 लाख का नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र दिया गया था.

कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो जिंदगी की हर राह उपलब्धि बन जाती है. अपने सेवा काल के दौरान राह में आने वाली हर बाधा, रुकावट को अपनी उपलब्धि में बदलने वाली सौम्या सांबशिवन एक बेमिसाल अफसर तो हैं ही, साथ ही ईव टीजिंग का शिकार लड़कियों की स्नेहशील गार्जियन भी हैं.

अनीता प्रभा : हौसलों की उड़ान

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों… कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां प्रभात शर्मा पर सटीक बैठती हैं. इन पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए अनीता प्रभा ने अपने दृढ़ आत्मविश्वास, अटूट लगन और अथक परिश्रम से असंभव को भी संभव कर दिखाया.

मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के एक छोटे से कस्बे के पारंपरिक परिवार में जन्मी अनीता प्रभा जिंदगी में कुछ खास करना चाहती थीं. लेकिन पारिवारिक बंदिशों के चलते 10वीं के बाद उन की पढ़ाई बंद हुई तो वह भाई के पास ग्वालियर चली गईं और वहां से 12वीं पास की. इस के बाद मात्र 17 साल की उम्र में उन की शादी 10 साल बड़े लड़के से कर दी गई.

ससुराल के हालात कुछ अच्छे नहीं थे. अनीता ने ससुराल में जिद कर के ग्रैजुएशन करना शुरू कर दिया. लेकिन वक्त यहां भी आड़े आ गया. फाइनल ईयर के एग्जाम से पहले उन के पति का एक्सीडेंट हो गया, जिस की वजह से अनीता एग्जाम नहीं दे पाईं. फाइनल ईयर के एग्जाम उन्होंने अगले साल क्लियर किए. 4 साल में ग्रैजुएशन करने का नुकसान यह हुआ कि अनीता प्रोबेशनरी बैंक आफिसर की पोस्ट के लिए रिजेक्ट कर दी गईं.

घर की आर्थिक हालत दयनीय देख अनीता प्रभा ने ब्यूटीशियन का कोर्स किया और ब्यूटीपार्लर में काम करना शुरू कर दिया. इस से आर्थिक मदद तो होने लगी परंतु जिंदगी का सफर इतना आसान कहां था. अनीता प्रभा और उन के पति की उम्र में ही नहीं, सोच में भी अंतर था. यही वजह थी कि दोनों में टकराव शुरू हो गया.

अनीता प्रभा ने घरेलू हालात से निपटते हुए 2013 में विवादों से घिरे व्यापमं की फौरेस्ट गार्ड की परीक्षा दी. यह परीक्षा उन्होंने 4 घंटे में 14 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर के दी थी. उन की मेहनत रंग लाई और दिसंबर 2013 में उन्हें बालाघाट में पोस्टिंग मिल गई.

लेकिन अनीता यहीं नहीं रुकीं. उन्होंने अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए व्यापमं के सबइंस्पेक्टर पोस्ट के लिए परीक्षा दी. लेकिन इस के फिजिकल टेस्ट में सफल नहीं हो सकीं. उन्होंने हिम्मत न हारते हुए दूसरी बार प्रयास किया और 2 महीने पहले ओवरी ट्यूमर का औपरेशन कराने के बावजूद फिजिकल टेस्ट पास कर के सबइंस्पेक्टर बन गईं.

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उन्होंने बतौर सूबेदार जिला रिजर्व पुलिस लाइन में जौइन किया. इस की ट्रेनिंग के लिए वह सागर चली गईं. इसी दौरान उन के तलाक का केस भी कोर्ट में चला गया था. दूसरी तरफ व्यापमं की तैयारी करते हुए अनीता प्रभा ने मध्य प्रदेश स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा दी. उस के रिजल्ट का इंतजार न कर के अनीता सागर के लिए रवाना हो गईं.

ट्रेनिंग के दौरान ही एमपीपीएससी के रिजल्ट आए. जिस में अनीता महिला वर्ग में 17वें नंबर पर थीं. यह एक महत्त्वाकांक्षी लड़की की अभूतपूर्व जीत थी. वह डीएसपी रैंक के लिए चयनित हो गई थीं. इस जीत का उत्सव मनाते हुए अनीता प्रभा ट्रेनिंग छोड़ कर वापस लौट आईं और अपने डीएसपी पद के जौइनिंग और्डर का इंतजार करने लगीं.

किसी फिल्म सरीखी लगने वाली यह कहानी एक ऐसी लड़की की है, जिस ने बाल विवाह का दंश झेला. समाज और परिवार की रुढि़वादी परंपराओं को सहा लेकिन अपने हौसले को पस्त नहीं होने दिया और न ही अपने सपने को मरने दिया. उस ने कांटों भरी डगर पर चल कर अपना लक्ष्य हासिल कर लिया.

लेकिन राह यहीं खत्म नहीं हुई. अनीता प्रभा का सपना और ऊंचा मुकाम हासिल करना था यानी डिप्टी कलेक्टर के पद तक पहुंचना, जिस के लिए वह प्रयासरत भी हैं. जो भी हो, इतना संघर्ष कर के मात्र 25 वर्ष की आयु में राजपत्रित पद पर पहुंचना एक अभूतपूर्व सफलता है, जो युवाओं के लिए प्रेरणास्पद भी है और अनुकरणीय भी.

सुपरकौप मेरिन जोसेफ : देश से विदेश तक

जून 2019 में जब मेरिन जोसेफ की नियुक्ति बतौर डिस्ट्रिक्ट पुलिस सुपरिंटेंडेंट केरल के जिला कोल्लम में हुई तो वह महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों को ले कर सब से ज्यादा चिंतित थीं. ऐसे अपराधों का ग्राफ काफी बढ़ा हुआ था. मेरिन को लगा कि वहां ऐसे अपराधों को मामूली समझ कर दरकिनार कर दिया जाता होगा. पुराने केसों पर ठीक से काररवाई नहीं की गई होगी, मुलजिम पकड़े नहीं गए होंगे. इसीलिए उन्होंने ऐसे केसों की पुरानी फाइलें मंगवाईं.

मेरिन ने जब उन केस फाइलों की स्टडी की तो उन में एक फाइल सुनील भद्रन की भी थी. केस के अनुसार सुनील भद्रन सऊदी अरब के रियाद की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में टाइल्स लगाने का काम करता था. वह 2017 में छुट्टी ले कर केरल आया और अपने एक दोस्त के घर ठहरा.

दोस्त ने उस का परिचय अपनी बहन के परिवार से कराया. सुनील की नजर दोस्त की 13 साल की भांजी पर पड़ी तो उस की नीयत खराब हो गई. उस ने दोस्त की बहन के परिवार से संबंध बढ़ाने शुरू कर दिए.

सुनील ने अपने टारगेट को बहकाफुसला कर नजदीकियां बढ़ाईं. उसे खानेपीने, पहनने की चीजें ला कर देना शुरू किया. बहकाने के लिए रियाद के किस्से सुनाने लगा.

रियाद ले जाने के सपने दिखाने लगा. जब लड़की बहकावे में आ गई तो वह आए दिन उस के साथ बलात्कार करने लगा. यह सिलसिला शायद आगे भी चलता रहता, लेकिन बच्ची ने इसे बुरा काम समझ कर घर वालों से शिकायत कर दी. यह खबर सुन कर सुनील भद्रन फरार हो गया.

पुलिस ने बच्ची के मामा से पूछताछ की, उसे जलील किया. खोजबीन में पता चला कि सुनील रियाद भाग गया है. पुलिस सिर पीट कर रह गई. इस बीच लड़की के मामा ने शर्म के मारे आत्महत्या कर ली.

बदनामी के डर से 13 वर्षीय नाबालिग पीडि़ता को उस के घर वाले घर में रखने को तैयार नहीं थे. मजबूरी में पुलिस ने उसे कोझीकोड के सरकारी महिला मंदिर रेस्क्यू होम भेज दिया. बाद में उस नाबालिग ने भी आत्महत्या कर ली.

बात उच्चाधिकारियों तक पहुंची तो उन्होंने 2018 में इंटरपोल को सूचना भेज कर मदद मांगी. लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. केस की जांच और रेपिस्ट की गिरफ्तारी लटकी रही. इस चक्कर में 2 परिवार बरबाद हो गए थे. जबकि केस की जांच रूकी पड़ी थी.

केस फाइल पढ़ कर मेरिन जोसेफ को बहुत दुख हुआ. महिला और बच्चों के प्रति अपराधों को ले कर मेरिन काफी संवेदनशील थीं. उन्होंने कई केस सुलझाए भी थे.

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उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो भी हो, सुनील भद्रन को सऊदी अरब से ला कर सजा दिलाएंगी. लेकिन समस्या यह थी कि मेरिन को यह जानकारी नहीं थी कि इस के लिए क्याक्या करना होता है.

उन्होंने जानकारी हासिल की तो पता चला कि 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह के बीच प्रत्यर्पण संधि पर समझौता हुआ था. यानी प्रत्यर्पण संधि के हिसाब से सुनील को भारत लाया जा सकता था.

मेरिन जोसेफ ने इस बारे में उच्चाधिकारियों से बात की तो उन्होंने कहा कि इस मामले में इंटरपोल ही मदद कर सकता है. नोटिस भी भेजा गया पर कोई जवाब नहीं आया. ‘मैं उसे इंडिया ला कर रहूंगी’.

मेरिन ने कहा तो कई लोगों ने उन का मजाक उड़ाया. लेकिन मेरिन ने हिम्मत नहीं हारी. पुलिस हैडक्वार्टर से ले कर गृह मंत्रालय तक जो भी हो सकता था, उन्होंने किया. अपने स्तर पर तो वह प्रयासरत थी ही.

दरअसल बला की खूबसूरत और 25 साल की नाजुक सी लड़की मेरिन के बारे में लोग यह नहीं जानते थे कि वह अंदर से वह कितनी मजबूत और दृढ़निश्चयी हैं. क्योंकि मेरिन को देख कर कोई भी उन्हें मौडल या फिल्मों की हीरोइन तो समझ सकता था, लेकिन यह किसी के लिए भी अनुमान लगाना मुश्किल था कि वह आईपीएस अफसर हैं.

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आईपीएस बनने की कहानी

20 अप्रैल, 1990 को केरल के एर्नाकुलम, तिरुवनंतपुरम में जन्मी मेरिन पैदा भले ही केरल में हुई थीं, लेकिन उन की परवरिश दिल्ली में हुई. उन के पिता अब्राहम जोसेफ कृषि मंत्रालय में प्रिंसिपल एडवाइजर थे और मां मीना जोेसेफ एक मिशनरी स्कूल इकनौमिक्स की टीचर थीं.

मेरिन जोसेफ ने कौन्वेंट जीसस ऐंड मेरी स्कूल से पढ़ाई की थी, जिस के बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कालेज से बीए औनर्स की डिग्री ली. पढ़ाई के दौरान ही मेरिन की दोस्ती साइकोलौजी की पढ़ाई कर रहे क्रिस अब्राहम से हुई जो बाद में प्यार में बदल गई. दोनों ने तय किया कि शादी करेंगे लेकिन सैटल होने के बाद.

ग्रैजुएशन करने के बाद मेरिन ने मुखर्जीनगर, दिल्ली के एक प्राइवेट कोचिंग सेंटर से यूपीएससी की कोचिंग की. फिर 2012 में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी. उन का पहला ही प्रयास सफल रहा. उन की 188वीं रैंक आई.

मेरिन को 4 औप्शन दिए गए, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस और पीसीएस. मेरिन ने आईपीएस को चुना. उन्हें केरल कैडर मिला. इस के बाद उन्हें ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद की सरदार वल्लभभाई पटेल नैशनल पुलिस अकादमी भेजा गया, जहां अगले 11 महीने तक उन्होंने लंबी ऊंची जंप, तैराकी, घुड़सवारी और हथियार चलाने की ट्रेनिंग ली, जिस में भागदौड़ भी शामिल थी.

इस ट्रेनिंग के बाद उन्होंने गृहराज्य पुलिस में 6 माह का पुलिस का आंतरिक कामकाज सीखा. फिर गृह मंत्रालय ने उन्हें एडिशनल सुपरिंटेंडेंट के पद पर नियुक्त कर दिया था. इस बीच 2 फरवरी, 2015 को मेरिन जोसेफ ने अपने कालेज टाइम के प्रेमी क्रिस अब्राहम से शादी कर ली थी. वह साइकियाट्रिस्ट बन चुके थे.

बहरहाल, जून 2019 में मेरिन जोसेफ ने सुनील को भारत लाने के लिए भरपूर प्रयास किया तो उन की मेहनत रंग लाई. सऊदी अरब की इंटरपोल शाखा और रियाद प्रशासन ने उन्हें सऊदी अरब आने की अनुमति दे दी. यह मेरिन जोसेफ की पहली जीत थी. 17 जुलाई, 2019 को मेरिन अपनी टीम के साथ सऊदी अरब के लिए रवाना हो गईं. वहां स्थानीय प्रशासन और इंटरपोल टीम की मदद से सुनील भद्रन उन की पकड़ में आ गया.

20 जुलाई, 2019 को मेरिन जोसेफ अपनी टीम और रेपिस्ट सुनील भद्रन को साथ ले कर एयरपोर्ट के बाहर निकलीं तो लोगों ने उन का भव्य स्वागत किया. कानूनी औपचारिकताओं के बाद सुनील को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस के बाद मेरिन जोसेफ मीडिया में छा गईं. उन की खूब वाहवाही हुई. क्योंकि 2010 में हुई संधि के 9 साल बाद किसी अपराधी को पहली बार भारत लाया गया था, वह भी एक महिला आईपीएस द्वारा, उस के अपने प्रयासों से.

दरअसल, मेरिन जोसेफ चाहती थीं कि पुलिस विभाग यह न समझे कि कोई महिला अधिकारी यह या कोई बड़ा काम नहीं कर सकती. हालांकि इस के पहले उन्होंने कई बड़े काम किए थे, कई केस सुलझाए थे. दुर्गम जगहों पर ड्यूटी की थी. फिलहाल मेरिन जोसेफ केरल पुलिस हेडक्वार्टर तिरुवनंतपुरम में बतौर पुलिस सुपरिंटेंडेंट (हेडक्वार्टर) तैनात हैं.

महाराष्ट्र की पहली लेडी सुपरकौप मर्दानी आईपीएस

मामला 26 साल पुराना जरूर है. लेकिन आज भी इस घिनौने अपराध को जानसुन कर रूह कांप जाती है. जलगांव का सैक्स स्कैंडल उस दौर का सब से बड़ा सैक्स स्कैंडल था, जिस ने राजनीति में भूचाल ला दिया था. और महिला आईपीएस अधिकारी मीरा बोरवंकर के नाम का डंका बज गया था.

1994 के उस दौर में महाराष्ट्र स्टेट सीआईडी के हैड अरविंद ईनामदार थे. मीरा बोरवंकर सीआईडी में क्राइम ब्रांच की इंचार्ज थीं. उन दिनों क्राइम ब्रांच का काम  संगठित अपराध और गैंगस्टरों को खत्म करना था. मीरा बोरवंकर तब तक महाराष्ट्र के कई जिलों में चर्चित पुलिस अधीक्षक रह चुकी थीं. उन्होंने कई कुख्यात अपराधियों की नाक में नकेल डाली थी.

आकर्षक और सौम्य व्यक्तित्व की मीरा इसलिए भी चर्चाओं में थीं, क्योंकि वह महाराष्ट्र की पहली और उन दिनों की एकलौती महिला आईपीएस अफसर थीं. आमतौर पर तब महिलाओं की छवि घर परिवार का पालनपोषण करने और घर की रसोई संभालने वाली नारी के रूप में होती थी. लेकिन मीरा ने आईपीएस बनने के बाद अपराधियों की कमर तोड़ कर इस छवि को बदलने का काम किया था.

दरअसल, सीआईडी को लगातार शिकायत मिल रही थी कि जलगांव में प्रभावशाली लोगों का एक ऐसा गिरोह सक्रिय है जो स्कूली लड़कियों व कामकाजी महिलाओं को अपने जाल में फंसा कर उन का शारीरिक शोषण करता है.

इसी दौरान लड़कियों की वीडियो भी तैयार कर ली जाती है, जिस से लड़कियों को ब्लैकमेल कर के उन्हें बड़ेबड़े कारोबारियों, नौकरशाहों और राजनेताओं के बिस्तर की शोभा बनने को मजबूर किया जा सके.

लेकिन बदनामी के डर से कोई भी पीडि़त लड़की न तो पुलिस के सामने आ रही थी और न ही सीआईडी को किसी तरह का सबूत मिल रहा था.

अरविंद ईनामदार ने अपनी टीम के एसपी स्तर के 2 अफसरों दीपक जोग और मीरा बोरवंकर को इस सैक्स  स्कैंडल के आरोपियों को पकड़ने का जिम्मा सौंपा.

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दीपक जोग को इस मामले में बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिल सकी. लेकिन मीरा ने महिला होने के नाते इस अपराध को बेहद गंभीरता से लिया और खुद इस केस की छानबीन में जुट गईं.

मीरा ने एक तेजतर्रार टीम का गठन किया और शहर में जिस्मफरोशी का धंधा करने वाले लोगों के बीच में टीम के लोगों की घुसपैठ करवा दी. अपराध ऐसा था जिस में न तो कोई शिकायत करने वाला था, न ही किसी अपराधी का चेहरा सामने था.

लेकिन मीरा ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी टीम के लोगों को उस वक्त तक इस प्रयास में लगे रहने के लिए कहा, जब तक असल अपराधियों के चेहरे सामने नहीं आ जाते.

इसी प्रयास के दौरान उन की टीम ने एक लड़की को पेश किया जो देह व्यापार की दलदल में फंस चुकी थी. जब लड़की को मीरा के सामने लाया गया तो उन्होंने बड़े प्यार और चतुराई से उन लोगों के नाम उगलवा लिए जिन के कारण वह देह व्यापार के धंधे में आई थी.

नाम, पते सब हासिल हो गए थे. लेकिन लड़की के बयान के अलावा कोई ऐसा सबूत नहीं था कि उन प्रभावशाली लोगों पर हाथ डाल कर उन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया जा सके. मीरा ने सीआईडी के मुखिया अरविंद ईनामदार से मशविरा किया तो उन्होंने सलाह दी कि पहले ठोस सबूत इकट्ठा करो फिर उन लोगों पर हाथ डालना.

इस के बाद मीरा ने छद्मवेश में महिला पुलिसकर्मियों को उस गिरोह के भीतर शामिल करा दिया. धीरेधीरे गिरोह के खिलाफ सबूत एकत्र होने लगे. जल्दी ही गिरोह के चंगुल में फंसी लड़कियों की लंबी फेहरिस्त तैयार हो गई. उन तमाम प्रभावशाली लोगों के चेहरे भी सामने आ गए जो सैक्स रैकेट के इस बड़े सिंडीकेट में शामिल थे.

फिर शुरू हुआ इन की धरपकड़ के बाद सफेदपोशों के चेहरों को बेनकाब करने का अभियान. मीरा बोरवंकर ने जैसे ही बड़ेबड़े कारोबारियों, सरकारी अफसरों, राजनीति से जुडे़ लोगों के साथ जरायम की दुनिया से जुड़े लोगों पर हाथ डालना शुरू किया तो पूरे देश में हड़कंप मच गया.

मीरा पर लोगों को छोड़ने की सिफारिशों का दबाव बढ़ने लगा. और तो और अपने खुद के विभाग के बड़े अफसरों ने भी मीरा पर धमकी भरा दबाव बना कर कहा कि इतने प्रभावशाली लोगों पर हाथ डाल कर वह अपने लिए दुश्मन पैदा कर रही हैं. वे सब तो अपने प्रभाव से छूट जाएंगे, लेकिन इस की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है.

लेकिन मीरा किरण बेदी को अपना आदर्श मान कर पुलिस महकमे में आई थीं, जिन्होंने देश की लौह महिला कही जाने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कारवां में शामिल गाड़ी तक का चालान कर दिया था.

मीरा ने कोई दबाव नहीं माना. क्योंकि जलगांव में यह धंधा कई दशकों से चला आ रहा था. खास बात यह कि गिरोह के लोग 10 से 12 साल तक की लड़कियों का यौनशोषण कर रहे थे. शिकार महिलाओं की संख्या भी 300 के लगभग थी.

ब्लैकमेलिंग के डर से लड़कियां उन की शिकायत भी नहीं करती थीं. इस गिरोह ने स्कूल और कालेज की लड़कियों को देह व्यापार के व्यवसाय में ढकेला था. जानेमाने राजनीतिज्ञ, बिजनैसमैन और अपराधियों द्वारा महिलाओं से बलात्कार किया जाता था. साथ ही ये लोग उन की फिल्म बना कर उन्हें ब्लैकमेल किया करते थे.

मीरा ने अपने अधिकारियों को विश्वास में ले कर जलगांव में सैक्स रैकेट चलाने वाले करीब 2 दरजन से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें मीडिया के सामने बेनकाब किया. इन में कई बड़े व्यापारी, सरकारी अफसर, बड़े नेता और जुर्म की दुनिया से जुड़े बड़ेबड़े लोग शामिल थे.

इस गिरोह का खुलासा होने के बाद पूरे देश में हंगामा हो गया. मीरा बोरवंकर अचानक इस ताकतवर गिरोह का भंडाफोड़ करने के बाद मीडिया की सुर्खियों में छा गईं. देश के लोग खासतौर से महिलाओं के लिए वह ऐसी सुपरकौप बन गईं जिन्हें कोई भी मुश्किल नहीं डिगा पाई थी.

जलगांव सैक्स स्कैंडल को हुए 26 साल से अधिक का समय बीत चुका है. मीरा बोरवंकर भी अब पुलिस महकमे से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं, लेकिन आज भी वह देश में पुलिस विभाग की लेडी सुपरकौप के नाम से मशहूर हैं और रहेंगी.

सब से बड़ी बात यह थी कि जिस समय उन्होंने देश के इस बहुचर्चित केस का खुलासा किया था उस समय वह गर्भवती थीं. इस स्कैंडल का खुलासा करने में मीरा ने अहम रोल निभाया था. वह देश भर की मीडिया की सुर्खियों में छाई रहीं.

कई लोगों ने साल 2014 में आई रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म ‘मर्दानी’ देखी होगी. लोगों को शायद यह बात पता नहीं होगी यह फिल्म मीरा बोरवंकर के जीवन से ही प्रेरित थी.

देश की बागडोर असल मायने में उन ईमानदार अफसरों के हाथों में ही होती है जो पूरी निष्ठा के साथ अपना फर्ज निभाते हुए कानूनव्यवस्था चाकचौबंद रखते हैं. जिस तरह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी नौकरशाही से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है. ऐसे में मीरा जैसे कुछ अफसर ऐसा काम कर जाते हैं, जो लोगों के लिए मिसाल बन जाता है.

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महाराष्ट्र में ‘लेडी सुपरकौप’ के नाम से मशहूर आईपीएस अफसर मीरा बोरवंकर की कहानी पुलिस विभाग में कुछ ऐसी ही मिसाल पेश करती है.

पिता से मिली बहादुरी की सीख

मीरा बोरवंकर के पिता ओ.पी. चड्ढा बौर्डर सिक्योरिटी फोर्स में थे. उन का जन्म और पढ़ाई पंजाब के फाजिल्का जिले में हुआ. उन्होंने अपनी पढ़ाई डीसी मौडल स्कूल फाजिल्का में की थी. मीरा के पिता ओ.पी. चड्ढा की पोस्टिंग फाजिल्का में ही थी. इसी दरमियान मीरा ने मैट्रिक तक शिक्षा फाजिल्का में पाई.

इस के बाद 1971 में उन के पिता का तबादला हुआ तो उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई जालंधर से की. लायलपुर खालसा कालेज से उन्होंने अंगरेजी साहित्य में एमए किया. वह बहुमुखी प्रतिभा की छात्रा थीं. वह नीति विश्लेषण कानून प्रवर्तन में मिनेसोटा, अमेरिका के विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए गईं.

1971-72 के दौरान जब मीरा कालेज में थीं, तब किरण बेदी आईपीएस बन चुकी थीं और देश भर में उन के कारनामों का डंका बज रहा था.

मीरा पढ़ाई के साथ स्पोर्ट्स, म्यूजिक और दूसरी गतिविधियों में भी अव्वल थीं. यही कारण था कि एक दिन उन की एक शिक्षिका ने उन से कहा कि मीरा तुम किरण बेदी की इतनी बड़ी फैन हो, उन की तारीफ करती नहीं थकतीं. तुम्हारे भीतर भी आईपीएस बनने के सारे गुण हैं. तुम यूपीएससी की तैयारी क्यों नहीं करतीं.

बस मीरा के भीतर टीचर की यह बात घर कर गई. उन्होंने आईपीएस बनने की ठान ली और पुलिस की सेवा में जाने का मन बना लिया. मीरा ने यूपीएससी की तैयारियां शुरू कर दीं. पहली बार में ही मीरा ने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली.

मीरा ने फिर से यूपीएससी की परीक्षा दी और सफल रहीं, लेकिन इस बार उन्होंने आईपीएस को चुना. ट्रेनिंग के समय वह अकेली महिला थीं. यह उन के लिए कठिन था, क्योंकि उन्हें ट्रेनिंग में कोई रियायत नहीं मिलती थी.

उन की पोस्टिंग बहुत जगहों पर हुई परंतु पुरुषों को एक लेडी औफिसर के नीचे काम करना अच्छा नहीं लगता था. पुलिस सेवा में महिलाओं की उपस्थिति केवल एक या दो प्रतिशत होने के बावजूद मीरा अपने समकक्ष पुरुष अधिकारियों से कहीं ज्यादा सक्रिय और अलग तरह से काम करती थीं. उन के नेतृत्व में 300 औफिसर्स काम करते थे.

लेकिन मीरा ने कभी अपने मातहत पुरुष अधिकारियों के अहं को ठेस नहीं लगने दी, न ही उन्हें कभी छोटा होने का अहसास कराया. यही कारण रहा कि मीरा को अपने पूरे पुलिस कार्यकाल में पुरुष साथी अफसरों का भरपूर सहयोग मिला.

मीरा 1981 बैच में आईपीएस चुनी गई थीं. उन की शादी रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अभय बोरवंकर से हुई थी. अभय रिटायर होने के बाद फिलहाल अपना बिजनैस संभाल रहे हैं, जिस में मीरा भी उन का हाथ बंटाती हैं.

मीरा बोरवंकर महाराष्ट्र पुलिस के इतिहास में पहली महिला अधिकारी रही हैं, जो मुंबई क्राइम ब्रांच की कमिश्नर बनी थीं.

1987-1991 तक मीरा डिप्टी कमिश्नर औफ पुलिस के रूप में सेवा देती रहीं. वे औरंगाबाद में डिस्ट्रिक्ट सुपरिंटेंडेंट औफ पुलिस के स्वतंत्र प्रभार में रहीं और सतारा के चार्ज में 1996-1999 तक रहीं. 1993-1995 तक उन्होंने स्टेट क्राइम ब्रांच की भी बागडोर संभाली.

मीरा मुंबई में सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा और नई दिल्ली की एंटी करप्शन ब्रांच में डीआईजी के रूप में भी तैनात रहीं. 2013 में वह पुणे की पुलिस कमिश्नर बनीं.

इस दौरान वह जहां भी रहीं, उन्होंने अंडरवर्ल्ड के खिलाफ जोरदार मुहिम चला कर उस की कमर तोड़ दी.  मुंबई में नियुक्तिके दौरान माफिया राज को खत्म करने में उन का अहम रोल रहा. उन्होंने दाऊद इब्राहिम कासकर और छोटा राजन गैंग के कई सदस्यों को सलाखों के पीछे भेजा. उन्होंने उन दिनों के बहुचर्चित तेलगी घोटाले में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था.

जांबाज अफसर थीं मीरा

मीरा ने नौकरी के शुरुआती समय में ही अपने तेवरों से साफ कर दिया था कि वह हर हाल में गुंडा राज का खात्मा कर के रहेंगी. अपनी बेहतरीन सेवाओं और जांबाजी के लिए वह लेडी सुपरकौप के नाम से मशहूर हो गई थीं. ईमानदारी, बेहतरीन सेवा और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें 1997 में राष्ट्रपति पुरस्कार तथा वर्ष 2001-02 में पुलिस कैरियर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.

इस के अलावा उन्हें 2016 में पूर्ण विश्वविद्यालय का जीवन साधना गौरव पुरस्कार, 2014 में  फिक्की एफएलओ और गोल्डन महाराष्ट का वुमन अचीवर अवार्ड, 2008 में मिनेसोटा विश्वविद्यालय से यूएसए का अंतरराष्टीय नेतृत्व पुरस्कार, 2006 में बौंबे मैनेजमेंट एसोसिएशन द्वारा मैनेजमेंट वुमन अचीवर अवार्ड से सम्मानित किया था.

2004 में उन्हें उत्कृष्ट पुलिस सेवा के लिए यशवंतराव चह्वाण मुक्त विश्वविद्यालय, नासिक से रुक्मणी पुरस्कार से नवाजा गया. 2002 में उन्हें लोकसत्ता दुर्गा जीवन पुरस्कार दिया गया था. आज वह देश की अनेक युवतियों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत हैं.

मीरा ने सतारा में एक ऐसे डकैती केस को सुलझाया था, जिस की उन दिनों देशभर में चर्चा हुई थी. मीरा ने इस केस का इतनी चतुराई से खुलासा किया था कि पूरा पुलिस विभाग उन के दिमाग का लोहा मान गया था. पुलिस डिपार्टमेंट में उन की छवि एक ईमानदार और बहादुर अफसर की थी.

अक्तूबर, 2017 में मीरा बोरवंकर 36 साल की पुलिस सेवा के बाद महानिदेशक एनसीआरबी और ब्यूरो औफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के पद से रिटायर हुई थीं. लेकिन इस से पहले महाराष्ट्र के एडीजीपी जेल के पद पर रहते हुए उन्होंने मुंबई में हुए 26/11 हमलों के दोषी अजमल आमिर कसाब और 1993 मुंबई अटैक के दोषी याकूब मेमन को सफलतापूर्वक फांसी दिलवाई थी.

वह उन 5 अधिकारियों में शामिल थीं, जो मेमन की फांसी के समय जेल परिसर में मौजूद थे. मीरा की देखरेख में ही उसे फांसी दी गई थी. कसाब के मामले का जिक्र करते हुए मीरा ने बताया था कि तब इस बात का पूरा खयाल रखा गया था कि फांसी की जानकारी किसी तरह मीडिया तक न पहुंचने पाए. मीडिया की नजरों से बचने के लिए वह अपने गनर की बाइक पर बैठ कर मुंह और यूनिफार्म को छिपा कर यरवदा जेल पहुंची थीं.

भले ही मीरा पुलिस की वर्दी से दूर हो गई हों, लेकिन महाराष्ट्र के पुलिस महकमे में आज भी उन की बहादुरी और कारनामों के चर्चे जीवंत हैं.

आयरन लेडी संजुक्ता पराशर : महिला सशक्तिकरण अवार्ड से सम्मानित

15 महीने में 16 एनकाउंटर करना कोई छोटी बात नहीं होती. लेकिन कानून की रक्षा के लिए सिर पर कफन बांध कर निकलने वालों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं. ये वे लोग होते हैं, जो फर्ज और देश के लिए सिर पर कफन बांध कर निकलते हैं और इस के लिए मर भी सकते हैं. असम की आयरन लेडी के नाम से मशहूर संजुक्ता पराशर उन्हीं में से हैं.

सन 2008-09 में टे्रनिंग के बाद संजुक्ता पराशर की तैनाती असम के माकुम में असिस्टैंट कमांडेंट के रूप में हुई थी. उन की पोस्टिंग के कुछ ही दिन हुए थे कि उदालगिरी बोडो और बांग्लादेशियों के बीच जातीय हिंसा हुई तो संजुक्ता पराशर को उस जातीय हिंसा को रोकने के लिए भेजा गया.

इस औपरेशन को उन्होंने खुद लीड किया और केवल 15 महीने में 16 आतंकवादियों को मार गिराया. साथ ही 64 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. एके 47 रायफल हाथ में ले कर जंगलों में वह न सिर्फ कौंबिंग करती थीं, बल्कि सब से आगे चलती थीं.

संजुक्ता नईनई पुलिस अधिकारी थीं, पर अपनी हिम्मत से उन्होंने उस जातीय हिंसा को तो समाप्त किया ही, उन्होंने अपनी टीम के साथ कुछ ऐसा किया कि उग्रवादी उन के नाम से कांपने लगे.

देश की आंतरिक सुरक्षा का मामला हो या फिर सीमा पर दुश्मनों से डट कर मुकाबले की बात हो, हमेशा हमारे जेहन में रौबदार पुरुष जवानों के ही चेहरे उभरते हैं. लेकिन अब यह मिथक टूटने लगा है. देश की बेटियां अब पुलिस से ले कर सेना तक में अपना लोहा मनवा रही हैं.

असम की इस प्रथम लेडी आईपीएस ने बहुत कम समय में अपनी बहादुरी से मीडिया में ही नहीं, आम आदमी के दिल तक में अपनी जगह बना ली है.

असम की आयरन लेडी के नाम से मशहूर आईपीएस अधिकारी संजुक्ता पराशर ने देश के पूर्वी राज्य असम में पिछले कई सालों तक बोडो उग्रवादियों के खिलाफ मोर्चा ही नहीं संभाला, बल्कि उन्होंने जिस तरह जंगलोें में ढूंढढूंढ कर आतंकवादियों को गिरफ्तार किया, इस से इस पुलिस अफसर ने बहादुरी की एक नई मिसाल पेश की है.

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41 वर्षीया आईपीएस संजुक्ता पराशर असम की ही रहने वाली हैं. उन के पिता दुलालचंद बरुआ असम में सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे और मां मीरा देवी स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करती थीं.

बचपन से ही संजुक्ता को खेलकूद का शौक था. उन्हें तैराकी बहुत अच्छी आती है. इस के लिए उन्हें स्कूल में कई पुरस्कार भी मिले. मां ने उन की इन खूबियों को निखारा. वह हमेशा संजुक्ता को समझाती थीं कि वह किसी से कम नहीं है.

मां ने उन्हें एक बेटे की तरह ही मौके दिए. उन्होंने ही संजुक्ता को हिम्मत और सम्मान के साथ जीना सिखाया. उसी का नतीजा है कि आज वह सिर उठा कर चल रही हैं.

असम के गुवाहाटी के होली चाइल्ड स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद संजुक्ता आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गईं, जहां उन्हें अलगअलग राज्यों से आए छात्रों से मिलने का मौका मिला. यहां उन के लिए बहुत कुछ नया था.

दिल्ली में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के इंद्रप्रस्थ कालेज से राजनीति विज्ञान से ग्रैजुएशन किया. नंबर कम होने से इंद्रप्रस्थ कालेज में उन का दाखिला ही नहीं हो रहा था, लेकिन फिर हुआ तो आगे चल कर उसी लड़की ने यूपीएससी की परीक्षा में 85वीं रैंक हासिल की.

इंद्रप्रस्थ कालेज से ग्रैजुएशन करने के बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से इंटरनैशनल रिलेशन में मास्टर डिग्री ली और यूएस फौरेन पौलिसी में एमफिल और पीएचडी की. पीएचडी करने के बाद वह सन 2004 में आब्जर्वर रिसर्च में काम करने लगीं.

बचपन से ही वह आईपीएस बन कर देश और जनता की सेवा करना चाहती थीं, इसलिए आब्जर्वर रिसर्च में काम करने के साथसाथ वह संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तैयारी भी कर रही थीं. वह रोजाना करीब 5 से 6 घंटे पढ़ाई करती थीं. उन की मेहनत रंग लाई और सन 2006 में उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली.

अच्छी रैंक की वजह से उन्हें अपनी इच्छा से कैडर चुनने की छूट दी गई. संजुक्ता पराशर जब असम में अपनी स्कूली पढ़ाई कर रही थीं, तभी से वह अपने राज्य में हो रही आतंकवादी घटनाओें और भ्रष्टाचारियों की गतिविधियों से दुखी थीं. इसलिए उन्होंने अच्छी रैंक लाने के बावजूद आईएएस बन कर आराम की नौकरी करने के बजाय आईपीएस बन कर असम में काम करने का निर्णय लिया.

इस के लिए उन्होंने असम मेघालय कैडर चुना. क्योंकि आईपीएस बन कर वह कुछ अच्छा करना चाहती थीं. पुलिस अफसर बन कर उन्होंने किया भी यही.

एक महिला होने के नाते असम के अशांत इलाके में काम करना आसान नहीं था, पर संजुक्ता ने दिलेरी के साथ इसे स्वीकार किया. 2008 में ही उन्होंने असम-मेघालय कैडर के आईएएस अधिकारी पुरु गुप्ता से शादी की. इस समय उन के 2 बेटे हैं, जिन की देखभाल उन की मां करती हैं.

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व्यस्तता की वजह से वह 2 महीने मेें एक बार ही अपने परिवार से मिल पाती हैं. पुलिस अधिकारी होने के साथसाथ वह मां भी हैं, पर काम की वजह से उन्हें परिवार से दूर रहना पड़ता है.

उदालगिरी में जातीय हिंसा पर काबू पाने के बाद उन की पोस्टिंग आतंकवादग्रस्त इलाके में ही कर दी गई.

वहां संजुक्ता उग्रवादियों के पीछे हाथ धो कर पड़ गईं. उन्हें जोरहट जिले का एसपी बनाया गया तो हाथ में एके-47 ले कर असम के जंगलों में सीआरपीएफ के जवानों को लीड करती थीं.

संजुक्ता पराशर ने अपनी टीम पर हमला करने वाले उग्रवादियों की धरपकड़ तो की ही, साथ ही उन उग्रवादियों को भी पकड़ा, जो जंगल को अपने छिपने के लिए इस्तेमाल करते थे. इस तरह की जगहों पर औपरेशन को लीड करना बहुत मुश्किल होता है. यह बहुत ही दुर्गम इलाका है, जहां मौसम में तो नमी रहती है, कब बारिश होने लगे, कहा नहीं जा सकता. साथ ही नदी, झील और जंगली जानवरों का भी खतरा रहता है.

नदी और झील पार कर दूसरे छोर तक पहुंचना बहुत कठिन काम होता है. इस के अलावा स्थानीय निवासी भी उग्रवादियों को पुलिस की गतिविधियों की सूचना देते रहते हैं.

2011 से 2014 तक जोरहट की एसपी रहते हुए संजुक्ता पराशर ने औपरेशन को खुद ही लीड करते हुए सन 2013 में 172 तो 2014 में 175 आतंकवादियों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे पहुंचाया. इस के बाद सन 2015-16 में सोनितपुर की एसपी रहते हुए उन्होंने अपने 15 महीने के औपरेशन में 16 आतंकवादियों को मार गिराया तो 64 को गिरफ्तार किया. जबकि सोनितपुर के जंगलोें में आतंकवादियों को खोज निकालना बहुत जोखिम का काम था.

पर उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और उग्रवादियों के बीच अपने नाम का लोहा मनवा कर ही रहीं. उन्होंने तमाम उग्रवादियों को गिरफ्तार तो किया ही, इन आतंकियों के पास से उन्होंने भारी मात्रा में गोला, बारूद भी बरामद किया. मणिपुर के चंदेल में 18 सीआरपीएफ के जवानों के शहीद होने के बाद संजुक्ता पराशर को उन की टीम के साथ उस इलाके में पैट्रोलिंग के लिए भेजा गया. इस का नतीजा यह निकला कि इस बहादुर आईपीएस की टीम ने मई, 2016 में मलदांग में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट औफ बोडोलैंड शाक विजिट के 4 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया.

इस की वजह यह थी कि जिस जगह पर अन्य पुलिस अधिकारी जाने से डरते थे, संजुक्ता पराशर वहां बेखौफ हो कर औपरेशन चलाती थीं. यही वजह थी कि उन का नाम सुन कर उग्रवादी कांपने लगे थे, उन्हें जान से मारने की धमकी देने लगे थे. बाजारों में भी उन के खिलाफ पैंफ्लेट चिपकाए गए, पर उग्रवादियों की इन धमकियों से न कभी वह डरीं और न कभी इस की परवाह की.

वह अपने आतंकवाद विरोधी अभियान में उसी तरह लगी रहीं. आतंकवादियों के लिए वह बुरे सपने की तरह थीं.

महिला होने के बावजूद संजुक्ता पराशर का नाम सुन कर बड़े से बड़े दहशतगर्दों की दहशत दम तोड़ देती थी. क्योंकि वह बड़ा से बड़ा जोखिम भरा काम करने से जरा भी नहीं घबराती थीं. इस की वजह यह है कि संजुक्ता के लिए महिला होना किसी तरह की कमजोरी नहीं है.

अपनी इसी बहादुरी की वजह से संजुक्ता पराशर आज लड़कियों की रोल मौडल बन गई हैं. सन 2017 में उन की पोस्टिंग नैशनल इनवैस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) में एसी के रूप में 4 साल के लिए कर दी गई. तब से वह एनआईए में ही काम कर रही हैं.

अपने काम से हमेशा संतुष्ट रहने वाली संजुक्ता पराशर को एक बात का अफसोस है कि जब वह सोनितपुर की एसपी थीं, तब वह एक बिजनेसमैन को नहीं बचा पाईं थीं. इसे वह अपने जीवन का सब से मुश्किल केस भी मानती हैं.

दरअसल, एक गैंग ने उस बिजनेसमैन को हनीट्रैप में फांस कर अपहरण कर लिया था. अपहरण में उसी का गनमैन और एक कालगर्ल शामिल थी. फिरौती के लिए जिस नंबर से फोन किए जा रहे थे, वह सिम फरजी नामपते पर लिया गया था. इसलिए पुलिस को अपहर्ताओं तक पहुंचने में काफी समय लग गया और पुलिस जब तक उन तक पहुंचती, तब तक अपहर्ताओं ने बिजनेसमैन की हत्या कर दी थी.

साल 2017 में संजुक्ता पराशर को भोपाल और उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में हुए 7 धमाकों की जांच के लिए नैशनल इनवैस्टीगेशन एजेंसी में बतौर टीम हैड नियुक्त किया गया था. तब से वह एनआईए में तैनात हैं.

संजुक्ता को महिला सशक्तिकरण के लिए दिल्ली महिला आयोग ने अवार्ड भी दिया था.

अब तक 75 : दिल्ली का सुपरकौप संजीव यादव

संजीव यादव दिल्ली पुलिस के वह सुपरकौप हैं, जिन के नाम से बड़ेबड़े बदमाश थरथर कांपते हैं. स्पैशल सेल के डीसीपी संजीव अब तक 75 बदमाशों को मौत के घाट उतार चुके हैं. फिल्म बटला हाउस में जौन अब्राहम ने उन्हीं का किरदार निभाया था. संजीव का अपराधों के विरूद्ध अभियान…

एसीपी संजीव यादव को जामिया नगर स्थित बटला हाउस की बिल्डिंग एल 18 के मकान नंबर 108 तक पहुंचने में 20 मिनट का समय लगा था. लेकिन उस से पहले ही उन की टीम के बहादुर इंसपेक्टर मोहनचंद्र शर्मा और हैडकांस्टेबल आतंकवादियों की गोलियों से जख्मी हो चुके थे. जिन्हें स्पैशल सेल की टीम के लोग अस्पताल ले गए थे.

संजीव यादव को बटला हाउस पहुंचने से पहले जब मोहनचंद्र शर्मा की आतंकवादियों से हुई मुठभेड़ और उन के घायल होने की सूचना मिली थी तो उन्होंने अपने डीसीपी आलोक वर्मा तथा जौइंट कमिश्नर करनैल सिंह को भी इस की सूचना दे दी थी.

इसी बीच उन्होंने अपनी गाड़ी के पीछे चल रहे स्टाफ को संदेश दे दिया कि बुलेटप्रूफ जैकेट पहन लें और हथियारों से लैस हो मुठभेड़ के लिए तैयार रहें.

तैयारी पूरी थी, बटला हाउस में आतंकवादियों के छिपे होने वाले मकान पर पहुंच कर उन्होंने अपने स्टाफ के साथ धावा बोल दिया, जहां भीतर से हुई फायरिंग के कारण इंसपेक्टर मोहनचंद्र शर्मा घायल हुए थे.

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बुलेटप्रूफ  जैकेट पहने एसीपी संजीव यादव ने जान जोखिम में डाल कर मकान नंबर 108 में जब प्रवेश किया तो उन की टीम पर अंदर छिपे आतंकवादियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की, लेकिन किस्मत अच्छी थी कि गोली किसी को लगी नहीं. जवाब में संजीव यादव की टीम ने भी क्र्रौस फायरिंग की. गोलीबारी का यह सिलसिला करीब 7-8 मिनट तक चला और जब सब कुछ शांत हो गया तो पुलिस टीम ने मकान की तलाशी ली.

अंदर जा कर देखा तो कमरे में सामने 2 लाशें पड़ी थीं और कुछ हथियार व गोलियों के खाली कारतूस भी थे. बाथरूम में घायल हालत में एक युवक मिला, जिस ने अपना नाम नाम सैफ बताया. साथ ही उस ने लाशों की पहचान आतिफ अमीन और साजिद के रूप में की. उस ने यह भी बताया कि वे सब आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के लिए काम करते हैं.

19 सिंतबर, 2008 की सुबह जामिया नगर के बटला हाउस में हुए इस एकाउंटर से ठीक एक हफ्ते पहले यानी 13 सितंबर, 2008 को दिल्ली में 5 अलगअलग जगहों पर हुए सीरियल बम ब्लास्ट में 30 लोगों की मौत हुई थी. उसी ब्लास्ट की जांच और धरपकड़ करते हुए स्पैशल सेल को ब्लास्ट में शामिल कुछ संदिग्ध लोगों के इस मकान में छिपे होने की जानकारी मिली थी.

स्पैशल सेल के इंसपेक्टर मोहनचंद्र शर्मा इसी सूचना को वैरीफाई करने के लिए बटला हाउस की एल 18 नंबर बिल्डिंग के मकान नंबर 108 में अपनी टीम के साथ पहुंचे थे. लेकिन बिना स्वचालित हथियार और बुलेटप्रूफ जैकेट पहने सर्च के लिए गई टीम को पता नहीं था कि मकान के भीतर खूंखार आतंकवादी घातक हथियारों के साथ मौजूद हैं. पुलिस के मकान में घुसते ही दहशतगर्दों ने पुलिस पर ताबड़तोड़ गालियां चला दीं, जिस में मोहनचंद्र शर्मा व हवलदार बलवंत घायल हो गए.

आतंकवादियों की गोलियां लगने के कुछ घंटों के बाद ही इंसपेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत हो गई थी. बाद में एसीपी संजीव यादव मौके पर पहुंचे और उन्होंने मोर्चा संभाला. मकान के भीतर छिपे आतंकियों से लोहा लिया और इस एनकाउंटर में 2 आतंकवादी मारे गए. सैफ नाम के एक आतंकवादी को घर में ही पकड़ लिया गया था. बाद में एक आतंकवादी जीशान को पुलिस ने उसी शाम पकड़ लिया.

एसीपी संजीव यादव ने जिस बहादुरी के साथ बटला हाउस एनकाउंटर को लीड किया था, ताबड़तोड़ छापेमारी कर इस वारदात में शामिल अपराधियों की धरपकड़ की थी और विवादों का सामना करते हुए जिस मानसिक प्रताड़ना को सहा था, उसी बहुचर्चित एनकाउंटर पर कुछ सालों बाद डायरेक्टर निखिल आडवानी ने ‘बटला हाउस’ के नाम से फिल्म बनाई थी. फिल्म में अभिनेता जौन अब्राहम ने तत्कालीन एसीपी संजीव यादव का किरदार निभाया था.

इस फिल्म में संजीव यादव का किरदार निभाने से पहले अभिनेता जौन अब्राहम ने जब असल जिंदगी के डीसीपी (बाद में) संजीव कुमार यादव से मुलाकात की तो वह यह जान कर दंग रह गए थे कि करीब 75 मुठभेड़ों में अपराधियों से 2-2 हाथ करने वाले संजीव यादव ने बाटला हाउस मुठभेड़ के विवाद के बीच मानसिक प्रताड़ना के एक बुरे दर्दनाक दौर का सामना किया था. संजीव यादव यहां तक हतोत्साहित हो गए थे कि मन में आत्महत्या करने तक का ख्याल आया था. क्योंकि बाटला हाउस एनकांउटर के बाद उन्हें स्पैशल सेल से हटा दिया गया था.

बाटला हाउस फिल्म में एक सीन है, जिस में जौन अपनी पिस्तौल को नष्ट कर के अपनी पत्नी को दे देते हैं. क्योंकि वह डर गए थे कि वह उस पिस्तौल से खुद को भी गोली मार सकते थे. उन्होंने पिस्तौल के सभी हिस्सों को घर के अलगअलग हिस्सों में रखवा दिया था.

अभिनेता जौन अब्राहम ने संजीव यादव से मिलने के बाद महसूस किया था कि एक कठोर मिजाज सुपर कौप असल जिंदगी में बेहद शर्मीला और शांत स्वभाव का इंसान भी हो सकता है.

संजीव यादव दिल्ली पुलिस के उन जांबाज अफसरों में से एक हैं, जिन का नाम सुन कर बदमाश दिल्ली के आसपास फटकने से भी कन्नी काटते हैं. दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल में कार्यरत डीसीपी संजीव यादव देश के इकलौते ऐसे पुलिस अफसर हैं, जिन को उन के काम के लिए 9 गैलेंट्री अवार्ड यानी राष्ट्रपति वीरता पदक मिल चुके हैं.

दिल्ली पुलिस में सुपर कौप के नाम से पहचान बना चुके डीसीपी संजीव यादव दिल्ली पुलिस की शान और ऐसी धरोहर हैं, जिन की मौजूदगी पूरे शहर को महफूज रहने का भरोसा देती है.

कुख्यात अपराधी हो या आतंक फैलाने वाले दहशतगर्द, इस सुपर कौप की नजर में एक बार जो चढ़ गया समझो उस का काम तमाम हो गया. पुलिस विभाग में काम करते हुए जांबाजी से अपराधियों के हौसले पस्त करने की सीख उन्हें विरासत में मिली है.

संजीव यादव पिछले काफी सालों से स्पैशल सेल में पहले एसीपी रहे. इस के बाद अब बतौर डीसीपी तैनात हैं. स्पैशल सेल के साथ उन्होंने लंबे वक्त तक क्राइम ब्रांच में भी काम किया. संजीव यादव जहां भी रहे, आतंक फैलाने से ले कर अपराध करने वालों के बीच खौफ पैदा करते रहे हैं.

यूपी के बलिया के रहने वाले संजीव यादव एक रसूखदार परिवार में पैदा हुए थे. पिता नंदजी यादव उत्तर प्रदेश पुलिस में थे और एसपी पद से रिटायर होने के बाद जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए थे.

संजीव कुमार यादव के सब से बड़े भाई विनोद यादव डिप्टी एसपी से रिटायर होने के बाद फिलहाल गोरखपुर में रह रहे हैं और एक निजी बैंक में डिप्टी मैनेजर हैं. विनोद यादव से छोटे प्रमोद कुमार यादव सबरजिस्ट्रार हैं, जबकि उन से छोटे राजीव डिप्टी डायरेक्टर (रोजगार) व अजय कुमार यादव सेना में कर्नल हैं.

दिल्ली पुलिस में आने से पहले संजीव यादव मध्य प्रदेश पुलिस में डीएसपी रह चुके हैं. 1998 में दिल्ली पुलिस में बतौर दानिप्स संजीव यादव एसीपी सेलेक्ट हुए तो उन्होंने मध्य प्रदेश पुलिस की नौकरी छोड़ दी.

पुलिस विभाग में काम करते हुए अपराध और अपराधियों का खात्मा करने का जज्बा सुपर कौप संजीव यादव को इसी पारिवारिक विरासत से मिला है. दिल्ली पुलिस में 1998 में एसीपी के रूप में भरती होने के बाद संजीव यादव की सब से पहली नियुक्ति मध्य जिले के औपरेशन सेल में हुई थी.

बटला हाउस एनकांउटर के बाद उठे विवाद के कारण उन्हें क्राइम ब्रांच में भेज दिया गया था. यहां भी उन्होंने अपराधियों के खिलाफ अपना अभियान लगातार जारी रखा.

लेकिन दिल्ली में 2010 में हुए आतंकी हमले के बाद देश की सुरक्षा और जेहादियों के खिलाफ बेहतरीन नेटवर्क के कारण संजीव यादव को फिर से स्पैशल सेल में बुला कर स्पैशल सेल में डीसीपी बना दिया गया. इस के बाद उन्हें आईपीएस कैडर मिला.

स्पैशल सेल में संजीव यादव ने अब तक 42 केस अपने हाथ में लिए हैं, जिस में से 32 का फैसला आ चुका है और अदालत से आरोपियों को सजा मिली है. इन में 2004, 2008, 2010 और 2012 के आतंकी हमले वाले केस भी शामिल हैं.

संजीव यादव आतंकवादियों से ले कर कुख्यात अपराधियों के निशाने पर हैं, इसीलिए खुफिया विभाग की सलाह पर सरकार ने उन्हें जेड कैटेगरी का सुरक्षा कवच दिया हुआ है. आतंकवादियों के खिलाफ औपरेशन हो या किसी खतरनाक गैंगस्टर के खिलाफ अभियान, संजीव कभी अपनी जान की परवाह नहीं करते और औपरेशन को खुद ही लीड करते हैं, रणनीति बनाते हैं और टीम का मनोबल बढ़ाते हुए साथ ले कर चलते है.

दिल्ली में एक गैंगस्टर के लिए चलाया गया उन का औपरेशन उन के कैरियर का सब से बड़ा एनकाउंटर औपरेशन था.

जून, 2018 का वाकया है. संजीव यादव उन दिनों दिल्ली पुलिस की स्पैशल सेल में नार्दर्न रेंज के डीसीपी की कमान संभाल रहे थे. एक दिन उन्हें अपने एक खबरी से सूचना मिली की कुख्यात इनामी बदमाश राजेश भारती और उस के गैंग के कुछ लोग छतरपुर के चानन होला इलाके में एक फार्महाउस में आने वाले हैं.

संजीव ने अपने मातहत तेजतर्रार पुलिस अफसरों की 5 टीमें गठित की और उन्हें उस इलाके में हर रास्ते पर इस तरह से तैनात कर दिया कि जब राजेश भारती को घेरा जाए तो वह भागने में कामयाब न हो सके.

सादे कपड़ों में टीमों को बाइक और गाडि़यों में बैठा कर ऐसे लगाया गया, जिस से बदमाश अपनी गाडि़यों से पुलिस की गाडि़यों में टक्कर मार कर भी भागे तो वे पकड़े जाएं. उन की टीमों ने छतरपुर इलाके में अपना पूरा जाल बिछा दिया था.

उस के बाद शुरू हुआ राजेश भारती के आने का इंतजार. 31 घंटे तक बिना पलक झपकाए संजीव यादव अपनी टीम के साथ टकटकी लगाए राजेश भारती के आने का रास्ता देखते रहे. जिस फार्महाउस पर नजर रखी जा रही थी, वह एक प्रौपर्टी डीलर का था.

चूंकि खबर एकदम पुख्ता थी कि राजेश भारती वहां जरूर आएगा, इसलिए पूरा दिन इंतजार करने के बाद संजीव यादव अपनी टीमों के साथ मुस्तैदी से वहीं डटे रहे. सब ने बिस्कुट, नमकीन के साथ पानी पी कर रात गुजारी, लेकिन वहां से हटे नहीं.

किसी तरह सुबह हुई तो खबरी से एक बार फिर फोन पर संपर्क साधा गया. उस ने बताया कि आज राजेश भारती हर हाल में  वहां पहुंचेगा. संजीव की सभी टीमें इस सूचना पर अलर्ट हो गईं.

दोपहर होतेहोते शिकार के आने का इंतजार खत्म हो गया. फार्महाउस के बाहर एक एसयूवी आ कर रुकी, जिस की पिछली सीट पर राजेश भारती बैठा था. एसयूवी को उमेश उर्फ डौन ड्राइव कर रहा था. एसयूवी के साथ सफेद रंग की एक दूसरी कार भी थी जिस में 4 लोग सवार थे.

गाडि़यों के फार्महाउस के बाहर पहुंचते ही पहले से घेराबंदी कर चुकी पुलिस की टीमों ने चारों तरफ से दोनों गाडि़यों की ओर आगे बढ़ना शुरू कर दिया. थोड़ा नजदीक पहुंचते ही संजीव यादव ने कोर्डलैस लाउडस्पीकर से बदमाशों को सरेंडर करने की चेतावनी दी. लेकिन उन्होंने सरेंडर करने के बजाय भागने का फैसला किया और अपनी गाडि़यां तेज गति से दौड़ा दीं.

संजीव यादव इस तरह के बदमाशों से पहले भी कई बार लोहा ले चुके थे, इसलिए जानते थे कि ऐसा हो सकता है. इसीलिए उन्होंने बदमाशों को दबोचने के लिए 3 स्तरीय घेराबंदी की थी. पहला घेरा तोड़ कर भागे बदमाशों को पीछे से घेरने के साथ आधा किलोमीटर की दूरी पर घेराबंदी कर के खड़ी टीम ने घेर लिया.

बदमाशों की दोनों गाडियां करीब एकडेढ़ किलोमीटर तक पुलिस को छकाती रहीं. लेकिन त्रिस्तरीय घेराबंदी इतनी पुख्ता थी कि बदमाश 2 मिनट बाद ही चौतरफा इस तरह घिर गए कि उन के सामने 2 ही रास्ते थे कि या तो सरेंडर कर दें या मुकाबला करें.

लेकिन खुद को फंसा देख बदमाशों ने सरेंडर करने की जगह पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. बदमाशों की फायरिंग के जवाब में संजीव का इशारा मिलते ही उन की टीम ने भी फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की टीम स्वचालित हथियारों से लैस थी.

पूरा इलाका ताबड़तोड़ गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. मुश्किल से 3 मिनट लगे 31 घंटे से चले आ रहे औपरेशन को खत्म होने में. बदमाशों की ओर से करीब 50 और पुलिस की तरफ से 100 राउंड फायरिंग हुई. एनकाउंटर में राजेश कंडेला उर्फ भारती, संजीत विद्रोही, गुड़गांव निवासी उमेश उर्फ डौन तथा दिल्ली के घेवरा का वीरेश राणा उर्फ विक्कू वहीं पर ढेर हो गए.

संजीव यादव की टीम के 8 जवान भी गोली लगने से घायल हुए थे. जिन 4 बदमाशों को गोली लगी थी, उन की मौके पर ही मौत हो चुकी थी. इस के बावजूद उन्हें भी अस्पताल भेजा गया.

दरअसल अपराधी राजेश भारती ने दिल्ली के एक बिजनैसमैन को फोन कर के 50 लाख रुपए की रंगदारी मांगी थी. इसी की शिकायत मिलने के बाद संजीव यादव ने राजेश भारती और उस के गुर्गों की कुंडली खंगाल कर उन के पीछे अपने खबरियों की टीम लगाई थी.

गांव में घरेलू रंजिश के कारण अपराध की डगर पर चलते हुए राजेश भारती के खिलाफ अपराध के 15 संगीन मामले दर्ज थे. भारती की गिरफ्तारी पर दिल्ली पुलिस की तरफ से एक लाख का ईनाम भी घोषित किया गया था. राजेश भारती दिल्ली के उन टौप टेन अपराधियों में से एक था, जो रंगदारी से ले कर तमाम तरह के गुनाहों को अंजाम दे रहे थे. लेकिन संजीव यादव की नजर में चढ़ते ही उस के गुनाहों के साथ जिदंगी का भी खात्मा हो गया.

संगठित अपराध व आतंकवादियों के खिलाफ सब से दमदार मुहिम चलाने वाली दिल्ली पुलिस की 2 यूनिटों स्पैशल सेल तथा क्राइम ब्रांच में रहते हुए संजीव यादव अब तक 75 एनकांउटरों को अंजाम दे चुके हैं. उन्होंने कई पाकिस्तानी और कश्मीरी आतंकवादियों को मुठभेड़ में धराशायी किया तो बहुतों को गिरफ्तार किया.

कई नामचीन गैंगस्टर उन की गोली का शिकार बने तो कई ईनामी बदमाशों को उन्होंने हथकड़ी पहनाई. उन्होंने ही दिल्ली के सब से बड़े गैंगस्टर 5 लाख के ईनामी कुख्यात सोनू दरियापुर को 2017 में मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया था.

ड्रग्स सिंडीकेट चलाने वालों के खिलाफ तो डीसीपी संजीव यादव ने मानों मुहिम ही छेड़ी हुई है. उन के नेतृत्व में 4 दरजन से अधिक देशीविदेशी नशे के तसकर और कई सौ करोड़ की ड्रग्स पकड़ी जा चुकी है.

संजीव यादव की जांबाजी से सिर्फ दिल्ली की जनता ही महफूज नहीं है. उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश व पूर्वांचल के साथ बिहार के भी कई दुर्दांत अपराधियों का खात्मा कर के इन राज्यों की पुलिस व जनता को राहत दिलाई है.

24 अक्तूबर, 2013 की रात को वसंत कुंज में होटल ग्रैंड के पास हुई एक मुठभेड़ में सुरेंद्र मलिक उर्फ नीटू दाबोदिया और उस के साथी आलोक गुप्ता और दीपक गुप्ता मारे गए थे. इस गिरोह ने अपना पीछा कर रही दिल्ली पुलिस के एक एसीपी मनीष चंद्रा की स्कौर्पियो को अपनी कार से टक्कर मार दी थी और अपनी गाडि़यों से उतर कर अलगअलग दिशा में भागते हुए पुलिस पर जबरदस्त तरीके से गोलियां दागी थीं.

डीसीपी संजीव यादव की अगुवाई में इन बदमाशों का पीछा कर उन की टीम के इंसपेक्टर ललित मोहन नेगी, हृदय भूषण और रमेश चंदर लांबा व सबइंसपेक्टर सुखबीर सिंह ने अपनी जान पर खेलते हुए सभी बदमाशों को बसंतकुंज के होटल ग्रैंड के पास एनकाउंटर में धराशायी किया था. यह 13 अक्तूबर, 2013 की रात की बात है.

इस मुठभेड़ में सुरेंद्र मलिक उर्फ नीटू दाबोदिया, आलोक गुप्ता और इन का साथी दीपक गुप्ता मारे गए थे. दिल्ली शहर में बदमाशों के खिलाफ इस बहादुरी के लिए संजीव यादव समेत इन सभी चारों पुलिस वालों को राष्ट्रपति का पुलिस मैडल मिला था.

इसीलिए पुलिस विभाग में संजीव यादव को दिल्ली का सुपर कौप कहा जाता है. वैसे तो संजीव यादव अपनी पिस्तौल से सिर्फ बदमाशों पर ही निशाना लगाते हैं. लेकिन उन का एक शौक ऐसा है, जिस के बारे में शायद लोगों का ज्यादा जानकारी न हो.

संजीव यादव अचूक निशानेबाज हैं. उन्होंने साल 2018 में 45वीं दिल्ली स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में एक गोल्ड व 2 ब्रोंज मैडल जीते थे. साथ ही 10 मीटर एयर पिस्टल और 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल में 2 ब्रोंज मेडल अपने नाम किए.

खास बात ये है कि जिस उम्र में शूटर शूटिंग से रिटायरमेंट ले लेते हैं, डीसीपी संजीव यादव ने उस उम्र में शूटिंग शुरू की और अपनी मेहनत से पुलिस की व्यस्त जिंदगी से वक्त निकाल कर यह कारनामा कर दिखाया.

शूटिंग की कई प्रतियोगिताओं में मैडल जीतने के बाद उन का चयन भारत की राष्ट्रीय शूटिंग टीम में साउथ एशियन गेम्स 2019 के लिए हुआ और वे भारत की तरफ से शूटिंग में हिस्सा लेने के लिए नेपाल गए.

संजीव यादव की तमाम उपलब्धियों में उन की पत्नी शोभना यादव की भी अहम भूमिका है जो उन्हें सदैव प्रेरित करती हैं. शोभना यादव उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले की हैं. पत्रकारिता के प्रति उन का रुझान कालेज के दिनों में हुआ था, लिहाजा पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद सब से पहले उन्होंने आईटीवी नाम के एक लोकल न्यूज चैनल में काम किया. कुछ महीनों बाद उन्हें पहला ब्रेक इंडिया टीवी में मिला. यहीं से उन को प्रसिद्धि मिली. उन्होंने इस चैनल के साथ काफी दिनों तक काम किया.

बटला हाउस एनकाउंटर के समय वह लाइव रिपोर्टिंग कर रही थीं, यह जानते हुए भी कि उन का पति ही एनकाउंटर को लीड कर रहा है. दर्शकों को उन्होंने इस बात का अहसास तक नहीं होने दिया. उस वक्त वह कितनी टेंशन में रही होंगी, इस का अंदाजा लगाया जा सकता था.

संजीव कुमार यादव और उन की पत्नी शोभना यादव एक बेटे व एक बेटी के मातापिता हैं.

मजबूत इरादों वाली श्रेष्ठा सिंह

यूपी के बुलंदशहर में आयरन लेडी के नाम से मशहूर श्रेष्ठा सिंह का लक्ष्य एकदम स्पष्ट था और उसे पाने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत भी की थी. जिस की चमक उन के व्यक्तित्व में बखूबी झलकती थी. इसीलिए प्रशिक्षण के बाद जब उन की पहली पोस्टिग स्याना में बतौर सीओ हुई तो उन का कानून का पालन करने का लक्ष्य इरादों की मजबूती बन गया.

23 जून, 2017 को स्याना में चेकिंग के दौरान भाजपा, नेता प्रमोद लोधी को पुलिस ने बिना हेलमेट और बिना कागजात की बाइक चलाते हुए रोक लिया. जब चालान करने की बात आई तो नेता जी श्रेष्ठा सिंह से उलझ बैठे.

प्रमोद लोधी जिला पंचायत सदस्या प्रवेश के पति थे और स्वयं भी नेता थे. लेकिन श्रेष्ठा सिंह ने उन की किसी भी धमकी की परवाह नहीं की. उन्होंने सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई जिस के बाद प्रमोद लोधी को गिरफ्तार कर लिया गया.

उन्हें कोर्ट में पेशी के लिए ले जाया गया तो वहां बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक पहुंच कर नारेबाजी करने लगे. तब श्रेष्ठा सिंह ने हंगामा कर रहे नेताओं और समर्थकों से कहा कि वे लोग मुख्यमंत्री जी के पास जाएं और उन से लिखवा कर लाएं कि पुलिस को चेकिंग का कोई अधिकार नहीं है. वो गाडि़यों की चेकिंग न करें.

इस मामले के 8 दिन बाद ही श्रेष्ठा ठाकुर का तबादला स्याना से बहराइच (नेपाल बौर्डर से सटे) कर दिया गया था. जिस की जानकारी उन्होंने अपने एएस ठाकुर नाम के फेसबुक अकाउंट पर देते हुए लिखा,‘मैं खुश हूं. मैं इसे अपने अच्छे कामों के पुरस्कार के रूप से स्वीकार कर रही हूं.’

आगे की लाइन में उन्होंने अपना लक्ष्य भी स्पष्ट करते हुए लिखा, ‘जहां भी जाएगा, रोशनी लुटाएगा. किसी चराग का अपना मकां नहीं होता.’

कानपुर में पलीबढ़ी श्रेष्ठा ने कानून की अहमियत शिक्षा प्राप्ति के दौरान ही समझ ली थी. जब उन के साथ 2 बार छेड़छाड़ की घटना हुई थी. पुलिस ने मदद के नाम पर औपचारिकता भर निभा दी थी.

तभी श्रेष्ठा ठाकुर ने अपना लक्ष्य तय कर लिया था, एक पुलिस अधिकारी बनने का और अधिकारी बनने के बाद उन्होंने जता दिया कि कानून की धाराएं आम से ले कर खास व्यक्ति तक के लिए एक जैसी हैं. जो उन में भेदभाव करता है, कानून का वह रक्षक अपनी वर्दी के साथ इंसाफ नहीं करता.

मारवाड़ के लुटेरों पर पुलिस का दांव – भाग 3

टी.वी. पेरियापांडियन दीवार फांदने के बजाय जब लोहे के गेट पर चढ़ कर कूदने का प्रयास कर रहे थे, तब गेट के बाहर खड़े इंसपेक्टर मुनिशेखर अपनी पिस्टल को अनलौक कर रहे थे कि अचानक एक्सीडेंटल गोली चल गई, जो टी.वी. पेरियापांडियन को लगी. वह गेट से गिर गए और उन की मौत हो गई. इसी बीच मौका पा कर नाथूराम फरार हो गया था.

दरअसल, चेन्नै पुलिस को अनुमान नहीं था कि वहां 9-10 लोग होंगे. उस का मानना था कि नाथूराम 1-2 लोगों के साथ छिपा होगा. चेन्नै के थाना मदुरहोल थाने के इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन दबंग और बहादुर पुलिस अफसर थे.  यह दुर्भाग्य ही था कि उन की मौत अपने ही साथी की गोली से हो गई.

पाली के एसपी दीपक भार्गव के अनुसार, चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर मुनिशेखर को चार्जशीट में भादंवि की धारा 304ए का आरोपी बनाया जाएगा. तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट चेन्नै पुलिस को भेजी जाएगी. चेन्नै पुलिस इंसपेक्टर मुनिशेखर पर विभागीय काररवाई करेगी.

17 दिसंबर को पुलिस ने चेन्नै में हुई ज्वैलरी लूट की वारदात के मुख्य आरोपी नाथूराम जाट की पत्नी मंजू देवी को गिरफ्तार कर लिया था. वह जोधपुर के पीपाड़ शहर के पास मालावास गांव में अपने धर्मभाई के घर छिपी हुई थी. मंजू को चेन्नै से आई पुलिस टीम पर हमले के आरोप में पकड़ा गया था.

कथा लिखे जाने तक नाथूराम और अन्य आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस लगातार छापे मार रही थी. नाथूराम के खिलाफ पाली के थाना जैतारण में मारपीट के 4 और जोधपुर के थाना बिलाड़ा में एक मुकदमा पहले से दर्ज है. वह कई सालों से अपने गांव में नहीं रहा था. वह चेन्नै बेंगलुरु आदि शहरों में रहता था.

नाथूराम और दीपाराम के पकड़े जाने के बाद चेन्नै में महालक्ष्मी ज्वैलर्स के शोरूम में हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट का मामला भले ही सुलझ जाए, लेकिन चेन्नै पुलिस के लिए माल की बरामदगी चुनौती रहेगी. जोधपुर में गिरफ्तार चोरी के आरोपी दिनेश जाट को चेन्नै पुलिस प्रोडक्शन वारंट पर चेन्नै ले गई.

इसी तरह 29 अगस्त, 2017 को विशाखापट्टनम में एक ज्वैलर से 3 किलोग्राम सोना लूट लिया गया था. लूट की इस वारदात में ज्वैलर के पास काम करने वाला राकेश प्रजापत शामिल था.

वह राजस्थान के जिला पाली के रोहिट के पास धींगाणा का रहने वाला था. लूट के बाद वह पाली आ गया था. यहां बाड़मेर रोड पर होटल चलाने वाले हनुमान प्रजापत से उस की पुरानी जानपहचान थी. हनुमान के मार्फत राकेश ने लूट का सारा सोना श्रवण सोनी को बेच दिया.

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मामले की जांच करते हुए आंध्र प्रदेश पुलिस जोधपुर पहुंची और 3 नवंबर को झालामंड मीरानगर निवासी रामनिवास जाट को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद जोधपुर जिले के थाना बोरानाड़ा के गांव खारडा भांडू के रहने वाले ज्वैलर श्रवण सोनी को पकड़ा गया.

श्रवण सोनी को ले जाने पर उस के घर वालों ने थाना बोरानाड़ा में उस के अपरहण का मामला दर्ज करा दिया था. बोरानाड़ा पुलिस ने जांचपड़ताल की तो श्रवण सोनी के आंध्र प्रदेश पुलिस की कस्टडी में होने की बात पता चली.

आंध्र प्रदेश पुलिस ने रामनिवास, श्रवण सोनी, हनुमान प्रजापत और राकेश प्रजापत को हिरासत में ले कर सोना बरामद कर लिया था. लेकिन कागजों में न तो उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया था और न ही सोने की बरामदगी दिखाई गई थी, जबकि राकेश प्रजापत को बाकायदा हथकड़ी लगा कर रखा गया था. लेकिन उसे गिरफ्तार नहीं दिखाया गया था.

आंध्र प्रदेश की पुलिस टीम द्वारा रामनिवास को लूट के मामले में आरोपी न बनाने और उस की कार जब्त न करने के लिए डेढ़ लाख रुपए मांगे गए थे, साथ ही मौजमस्ती के लिए लड़कियों का इंतजाम करने को भी कहा गया था. पुलिस टीम का कहना था कि उस ने यह कार विशाखापट्टनम से लूटे गए 3 किलोग्राम सोने को बेच कर खरीदी थी.

आंध्र प्रदेश पुलिस ने 5 नवंबर को रामनिवास और श्रवण सोनी को कुछ शर्तों पर छोड़ दिया था और श्रवण सोनी से 6 नवंबर को 2 लाख रुपए लाने को कहा था. इस से पहले आंध्र प्रदेश पुलिस ने रामनिवास के एटीएम से 20 हजार रुपए निकलवा कर रख लिए थे.

छूटते ही रामनिवास सीधे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के कार्यालय पहुंचा और आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा रिश्वत मांगने की शिकायत कर दी. एसीबी ने 80 हजार रुपए दे कर रामनिवास को आंध्र प्रदेश पुलिस के पास भेज कर शिकायत की पुष्टि की. इस के बाद 6 नवंबर को विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश से आई 4 लोगों की पुलिस टीम को 80 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों गिरफ्तार कर लिया गया.

इन में विशाखापट्टनम जिले की क्राइम ब्रांच के सबडिवीजन नौर्थ के इसंपेक्टर आर.वी.आर.के. चौधरी, विशाखापट्टनम के थाना परवाड़ा के एसआई एस.के. शरीफ, थाना एम.आर. पेटा के एसआई गोपाल राव और थाना वनटाउन के कांस्टेबल एस. हरिप्रसाद शामिल थे. ये चारों जोधपुर में बाड़मेर रोड पर बोरानाड़ा स्थित एक होटल में रुके हुए थे.

गिरफ्तारी के अगले दिन 7 नवंबर को चारों लोगों को अदालत में पेश किया गया, जहां से अदालत के आदेश पर सभी को जेल भेज दिया गया. पूरी टीम के गिरफ्तार होने की सूचना मिलने पर 3 किलोग्राम सोने की लूट के मामले की जांच के लिए विशाखापट्टनम से दूसरी टीम भेजी गई. यह टीम 7 नवंबर को जोधपुर पहुंची. इस टीम ने सोने की लूट के सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

जुर्म की दुनिया की लेडी डौन – भाग 4

लेकिन अपने चाहने वालों और गरीबों पर वह मेहरबान रही, जिस से उसे गौडमदर का खिताब मिल गया.

संतोक बेन देश की पहली लेडी डौन थी जिस की जिंदगी पर विनय शुक्ला ने फिल्म ‘गौडमदर’ साल 1999 में बनाई थी, जिस में उस का रोल शबाना आजमी ने निभाया था. यह फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई थी, जिसे 6 नैशनल अवार्ड सहित एक फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला था.

अपने खौफ और रसूख को संतोक ने राजनीति में भी इस्तेमाल किया और साल 1990 में वह जनता दल के टिकट पर कुतियाना सीट से 35 हजार वोटों से जीत कर विधायक भी चुनी गई थी.

उस का एक बेटा कांधल जडेजा कुतियाना सीट से ही एनसीपी के टिकट पर जीत कर विधायक बना. साल 2011 की होली के पहले संतोक की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी.

खतरनाक सायनाइड किलर केमपंमा

सायनाइड मल्लिका के.डी. केमपंमा बेंगलुरु के नजदीक कमालीपुरा गांव की रहने वाली सीरियल किलर थी, जिस ने कितनों को सायनाइड दे कर मौत की नींद सुलाया. इस की सही गिनती किसी के पास नहीं.

के.डी. केमपंमा ने हत्या करने का नायाब लेकिन पुराना तरीका चुन रखा था. वह अपने शिकार को एकांत में बुलाती थी और वहां उस की हत्या कर उसे लूट लेती थी.

जुर्म करने के लिए वह उन महिलाओं को चुनती थी, जो पारिवारिक या दूसरे कारणों से परेशान रहती थीं और मन्नतें मांगने व पूजापाठ करने मंदिर जाया करती थीं.

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के.डी. इन के सामने खुद को एक जानकार तांत्रिक की तरह पेश करती थी और पूजापाठ कर परेशानी दूर करने का झांसा दे कर शिकार को किसी वीरान मंदिर बुलाती थी और वहीं सायनाइड खिला कर हमेशा के लिए परेशान जिंदगी से ही छुटकारा दिला देती थी.

गिरफ्तार होने के बाद उसे मौत की सजा सुनाई गई थी. लेकिन बाद में उसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया था. बेहद गरीब घर की केमपंमा ने एक दरजी से शादी की थी और खुद चिटफंड कंपनी चलाती थी.

पर रातोंरात अमीर बनने के लालच में साल 1999 में उस ने पहली हत्या की थी और फिर मुड़ कर नहीं देखा. साल 2008 में गिरफ्तार होने तक उस का खासा खौफ बेंगलुरु में रहा.

कोठों की बादशाहत वाली सायरा बेगम

सायरा बेगम कोठे वाली के नाम से इसलिए मशहूर हुई थी कि उस ने देह व्यापार के धंधे में तकरीबन 5 हजार लड़कियों को धकेला.

हैदराबाद की रहने वाली इस मौसी सायरा बेगम की दिल्ली के बदनाम रेडलाइड इलाके जीबी रोड पर बादशाहत लंबे समय तक कायम रही. उस पर दरजनों आपराधिक मामले भी दर्ज हुए थे. देह व्यापार के धंधे से सायरा ने करोड़ों रुपए कमाए.

साल 2016 में जब वह गिरफ्तार हुई तो पता चला कि 6 कोठे तो उस के जीबी रोड पर ही हैं और दिल्ली में ही आलीशान फार्महाउस के अलावा बेंगलुरु में भी उस के बेशकीमती 3 फ्लैट हैं. उस के बैंक खातों में ही करोड़ों रुपए जमा थे. सायरा का पति अफाक हुसैन इस धंधे में उस का साथ देता था.

ये लोग पूर्वोत्तर भारत और नेपाल से लड़कियां ला कर उन से धंधा कराते थे. जिस सायरा ने कोई 5 हजार लड़कियों को देह धंधे के दलदल में धकेला, खुद उस की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं.

मांबाप की मौत के बाद वह साल 1990 में दिल्ली रोजगार की तलाश में आई थी, लेकिन वह नहीं मिला तो वह कालगर्ल बन गई.

बेरोजगारी और दुश्वारियां झेल चुकी सायरा को कभी मजबूर गरीब लड़कियों की हालत पर तरस नहीं आया, जो कम उम्र लड़कियों को जल्द जवान बनाने के लिए हारमोंस के इंजेक्शन भी देती थी. लड़कियों को इस धंधे में लाने के लिए उस ने गिरोह भी बना लिया था, जिस की वह डौन थी.

इन का भी बजता था डंका

इसी तरह खूबसूरती की वजह से रूबीना सिराज सैय्यद ने अपराध की दुनिया में हीरोइन नाम से पहचान बनाई. कभी जानीमानी ब्यूटीशियन रही रूबीना ने पैसों के लालच में छोटा राजन से हाथ मिला लिया. उस ने अपनी खूबसूरती से कइयों को काबू किया.

पुलिस वाले भी उस की खूबसूरती पर लट्टू हो जाते थे. इसी का फायदा उठा कर 70 के दशक में वह जेल में बंद छोटा शकील के गुर्गों तक हथियार और नशे का सामान पहुंचाती थी. महाराष्ट्र सरकार ने उस की आपराधिक गतिविधियों की वजह से उस पर मकोका भी लगाया था.

दूध बेचने वाली शशिकला ने पैसों के लालच में ड्रग्स की तसकरी शुरू की और जल्द ही मुंबई में कुख्यात हो गई. अपराध की दुनिया में उसे बेबी नाम से जाना जाने लगा.

वर्ष 2015 में मुंबई पुलिस ने जब उसे गिरफ्तार किया, तब तक ड्रग्स की तसकरी से वह 100 करोड़ रुपए की संपत्ति खड़ी कर चुकी थी. शशिकला उर्फ बेबी को मुंबई का सब से बड़ा ड्रग्स माफिया माना जाता है.

बेला आंटी को तो मुंबई की सब से बड़ी शराब माफिया के रूप में जाना जाता था. 70 के दशक में जब अवैध शराब के खिलाफ सख्ती बढ़ी, तब भी बेला आंटी ने ट्रकों में भर कर पूरी मुंबई में अवैध शराब की तसकरी की.

अधिकारियों का मुंह बंद कराने के लिए बेला ने उन्हें मोटी रिश्वत दी. उस ने शराब की तसकरी जारी रखने के लिए तब के गैंगस्टरों, अधिकारियों और राजनेताओं सब को डरा रखा था.

किसी में हिम्मत नहीं थी कि अवैध शराब की तसकरी में लगी उस की गाडि़यों को कोई रोक सके. यहां तक कि उस वक्त का अंडरवर्ल्ड डौन वर्धाभाई भी उसे अपने एरिया धारावी में शराब की तसकरी करने से नहीं रोक सका था.

भारत के मोस्टवांटेड दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर वो नाम है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं. दाऊद इब्राहिम के भारत से भागने के बाद मुंबई में उस के अवैध धंधों की बागडोर बहन हसीना पारकर ने ही संभाली. अपराध की दुनिया में उस की पहचान गौडमदर औफ नागपाड़ा और अप्पा मतलब बड़ी बहन के तौर पर रही है.

इस में कोई संदेह नहीं कि उस में मुंबई के अपराध जगत में एकछत्र राज किया है. वर्ष 2014 में हार्ट अटैक से उस की मौत हो गई.द्य