नोटिस का जवाब खून से : मैनेजर के पद ने ली जान – भाग 3

खुल गया हत्या का राज

संदेह पुख्ता करने के लिए पुलिस ने खुशी सेजवानी की फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार को कब्जे में ले कर जांच के लिए सांताक्रुज की फोरैंसिक लैब में भेज दिया. परीक्षण में कार की डिक्की के अंदर खून के कुछ धब्बे पाए गए, जिस का डीएनए किया गया तो वह कीर्ति के डीएनए से मैच हो गया.

इस के बाद तो उन दोनों पर शक की कोई गुंजाइश नहीं बची. अब स्थिति साफ हो चुकी थी. पुलिस ने खुशी सेजवानी और सिद्धेश से पूछताछ की तो उन्होंने कीर्ति की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. उस की हत्या की उन्होंने जो कहानी बताई, वह दिल दहला देने वाली थी—

27 वर्षीय सिद्धेश तम्हाणकर अपने पूरे परिवार के साथ परेल, मुंबई के लालबाग में रहता था. उस के पिता सीताराम तम्हाणकर नौकरी से रिटायर हो चुके थे. पूरे परिवार की जिम्मेदारी सिद्धेश के ऊपर थी. परिवार वालों का वह एकलौता सहारा था.

वह कंपनी में अपना काम ठीक से नहीं करता था. कंपनी के काम के बजाय उस का मन इधरउधर अधिक रहता था. कंपनी के सारे अकाउंट की जिम्मेदारी उस की थी, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी के प्रति जरा भी गंभीर नहीं था.

कीर्ति व्यास के काम को देखते हुए बीब्लंट कंपनी ने कीर्ति को जो जिम्मेदारियां दी थीं, वह उन का बड़ी ईमानदारी से पालन करती थी. अपने दूसरे सहयोगियों को भी वह कंपनी के प्रति निष्ठावान बनने की सलाह देती थी. वह खुद तो मेहनत करती ही थी, दूसरे कर्मचारियों से भी मेहनत करवाती थी जिस से कंपनी के कई लोग उस से खुश नहीं थे.

सिद्धेश तम्हाणकर भी उन्हीं में से एक था लेकिन कीर्ति को इस की कोई परवाह नहीं थी. कीर्ति ने 5 सालों में बीब्लंट कंपनी में अपनी एक खास जगह बना ली थी, जबकि कंपनी के अंदर 10-15 सालों से काम कर रहे लोग ऐसी जगह नहीं बना पाए थे. मेहनत की वजह से कीर्ति को कंपनी के कई अधिकार मिल गए थे. कंपनी की सीईओ और एमडी उस से काफी प्रभावित थीं.

कंपनी के सारे लोगों से कीर्ति का व्यवहार मधुर व सरल था. बाहर से आनेजाने वाले लोग भी कीर्ति को भरपूर मानसम्मान देते थे. लेकिन सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ऐसा नहीं था, क्योंकि कीर्ति ने जब कंपनी का काम संभाला था, तब से सिद्धेश तम्हाणकर की मनमानी पर रोक लग गई थी.

कीर्ति ने पहले तो सिद्धेश तम्हाणकर की काम के प्रति लापरवाही पर उसे कई बार समझाया, लेकिन सिद्धेश पर उस की बातों का कोई असर नहीं हुआ. उस का रवैया पहले जैसा रहा. वह कंपनी के कामों पर ध्यान नहीं देता था.

जलन बन गई ज्वाला

सरकार ने जब से जीएसटी लगाई तो सिद्धेश की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई. क्योंकि जीएसटी की गणना उस की समझ से परे थी. पहले तो थोड़ीबहुत लापरवाही चल जाती थी, लेकिन जीएसटी में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं थी. काम सही ढंग और समय से पूरा करना ही पड़ता था.

जीएसटी की कम समझ होने के कारण सिद्धेश के अकाउंट में बहुत सारी गलतियां तो होती ही थीं, काम भी समय से नहीं हो पाता था. इस से कंपनी के नुकसान के साथसाथ बदनामी का भी डर था. चेतावनी के बाद भी सिद्धेश ने जब अपने काम में सुधार नहीं किया तो कीर्ति ने उसे कंपनी से निकालने का नोटिस दे दिया.

इस नोटिस से सिद्धेश बौखला गया. नौकरी जाने के बाद उस का और उस के परिवार का क्या होगा, सोच कर वह परेशान रहने लगा. कोई रास्ता न देख उस ने उसी कंपनी में काम करने वाली अपनी दोस्त खुशी सेजवानी से सलाह की.

बाद में वह कंपनी के सीईओ व एमडी अनुधा अख्तर के पास गया. लेकिन बात नहीं बनी. इस पर उस ने अपनी नौकरी जाने के डर से कीर्ति व्यास के प्रति एक खतरनाक निर्णय ले लिया था. उस ने सोचा कि क्यों न कीर्ति को ही खत्म कर दिया जाए. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी. उसे लग रहा था कि कीर्ति के न रहने से शायद उस की नौकरी भी रहे. इस काम में उस की मदद करने के लिए खुशी भी तैयार हो गई.

37 वर्षीय खुशी सेजवानी बीब्लंट कंपनी में कोचिंग क्लासेज के मैनेजर के पद पर काम करती थी. कंपनी में जितना महत्त्व कीर्ति का था, उतना ही महत्त्व खुशी का भी था. सेजवानी मुंबई सांताक्रुज पश्चिम के एस.बी. रोड स्थित एक अपार्टमेंट में अपने एकलौते बेटे के साथ रहती थी.

उस के पति एक कामयाब बिजनैसमैन थे. काम के सिलसिले में वह अकसर बाहर ही रहते थे. परिवार संभ्रांत और संपन्न था. घर पर नौकरनौकरानी थे. किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धेश और खुशी की गहरी दोस्ती थी. इतने बड़े अपराध में खुशी सेजवानी ने सिद्धेश का साथ क्यों दिया, पुलिस इस बात की जांच कर रही है.

अपराध की राह पर सिद्धेश और खुशी

16 मार्च, 2018 को सिद्धेश की नौकरी का आखिरी दिन था. इस के पहले कि कीर्ति कंपनी में आ कर सिद्धेश पर काररवाई करती, सिद्धेश और खुशी योजनानुसार अपनी कार ले कर कीर्ति के घर के पास पहुंच गए. फिर खुशी ने कीर्ति को फोन कर के कहा कि वह किसी काम से भारतनगर आई थी. काम खत्म हो जाने के बाद अब औफिस जा रही है. अगर उसे भी औफिस चलना हो तो आ जाए, साथसाथ चले चलेंगे.

कीर्ति औफिस जाने की तैयारी कर ही रही थी. खुशी का फोन आने के बाद उस ने उस के साथ चलने की हामी भर दी और फटाफट तैयार हो कर उस की गाड़ी में पहुंच गई.

गाड़ी खुशी सेजवानी चला रही थी, कीर्ति उस के बराबर में बैठ गई. सिद्धेश पीछे वाली सीट पर बैठा था. कुछ दूर चलने के बाद खुशी सेजवानी ने कीर्ति को मनाने की काफी कोशिश की कि वह सिद्धेश को दिया नोटिस वापस ले ले, लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं हुई. तब पीछे की सीट पर बैठे सिद्धेश ने कीर्ति के गले में सीट बेल्ट डाल कर हत्या कर दी.

कीर्ति की हत्या करने के बाद खुशी ने कार अपने घर पर ला कर खड़ी कर दी और उस पर कवर डाल कर दोनों औफिस चले गए. मगर कंपनी के काम में उन का मन नहीं लग रहा था. उस दिन खुशी सेजवानी 4 बजे ही अपने औफिस से घर के लिए निकल गई. कार में शव होने के कारण सिद्धेश भी शाम 5 बजे के करीब खुशी के घर पहुंच गया.

मौका देख कर वे कीर्ति की लाश कार से निकाल कर घर के अंदर ले गए. फिर उसे ठिकाने लगाने के मकसद से उन्होंने लाश के 3 टुकड़े किए. फिर उन्हें कार की डिक्की में डाल कर चेंबूर के माहुल इलाके में ले गए. वहां आगे जा कर उन्होंने कीर्ति की लाश के तीनों टुकड़े नाले में डाल दिए. फिर उन्होंने कार की अच्छी तरह धुलाई करा ली.

बाद में कीर्ति के घर वालों के साथ वे दोनों भी उस की तलाश करने का नाटक करने लगे.

सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 5 मई, 2018 को उन की निशानदेही पर कीर्ति का बैग, मोबाइल फोन, कुछ नकदी भी बरामद कर ली. फिर उन दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 341, 363, 364 और 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस कीर्ति के शव के टुकड़ों को काफी कोशिशों के बाद भी बरामद नहीं कर पाई थी. माना जा रहा है कि वे टुकड़े नाले में बह कर कहीं आगे निकल गए होंगे. फिर भी पुलिस की कोशिश जारी है.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अतीक अहमद : खूंखार डौन की बेबसी – भाग 3

एक विधायक की हत्या के बाद भी अतीक सत्ताधारी सपा में बने रहा. इस हत्या के बाद बसपा के समर्थकों ने इलाहाबाद शहर में जम कर हंगामा किया और खूब तोड़फोड़ की.

2005 में इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर फिर उपचुनाव हुआ, जिस में राजू पाल की पत्नी पूजा पाल को बसपा की ओर से टिकट दिया गया. इस बार भी पूजा के सामने अतीक का भाई अशरफ ही था. उस समय तक पूजा के हाथ की मेहंदी भी नहीं उतरी थी.

कहा जाता है कि चुनाव प्रचार के दौरान पूजा मंच से अपने हाथ दिखा कर रोने लगती थी. लेकिन पूजा को जनता का समर्थन नहीं मिला और वह चुनाव हार गई.

अतीक का टूटा किला

इस बार अतीक का भाई अशरफ चुनाव जीत गया. ऐसा शायद अतीक के खौफ के कारण हुआ था. इस तरह एक बार फिर अतीक की धाक जम गई. वह खुद सांसद था ही, भाई भी विधायक हो गया था. उसी समय उस पर सब से ज्यादा आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए.

अतीक अहमद पर 83 से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हो चुके थे. परंतु हैरानी की बात यह थी कि उत्तर प्रदेश पुलिस अतीक अहमद को गिरफ्तार करने के बारे में सोच भी नहीं रही थी.

2007 के विधानसभा के चुनाव में एक बार फिर इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर बसपा ने राजू पाल की पत्नी पूजा पाल को चुनाव में उतारा. इस बार भी सामने अतीक का भाई अशरफ ही उम्मीदवार था. इस बार पहली दफा इलाहाबाद पश्चिमी  का अतीक अहमद का किला टूटा. पूजा पाल चुनाव जीत गई.

उत्तर प्रदेश में मायावती की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी तो मायावती ने अतीक अहमद को पहला टारगेट बनाया. मायावती के जहन में गेस्टहाउस कांड के जख्म हरे थे. इस मामले में बसपा सरकार के रहते मुलायम सिंह के इशारे पर अतीक ने गेस्टहाउस में ठहरी मायावती को बेइज्जत किया था.

एक के बाद एक कर सारे मामले खुलने लगे और मायावती सरकार ने एक ही दिन में अतीक अहमद पर सौ से अधिक मामले दर्ज करा कर औपरेशन अतीक शुरू कर दिया. अतीक भूमिगत हो गया तो उसे मोस्टवांटेड घोषित कर दिया गया और उस पर 20 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया गया.

देश के इतिहास में एक सांसद मोस्टवांटेड घोषित हो गया हो और उस पर 20 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया हो, यह शायद देश का पहला मामला था. इस से पार्टी की बदनामी होने लगी तो मुलायम सिंह ने उसे पार्टी से बाहर कर दिया.

गिरफ्तारी के डर से अतीक फरार था. उस के घर, औफिस सहित 5 संपत्ति को कोर्ट के आदेश पर कुर्क कर लिया गया.

जिस इलाहाबाद में अतीक की तूती बोलती थी, पूजा पाल ने चुनाव जीतते ही बसपा सरकार में उस की नाक में ऐसा दम किया कि जिस सीट से वह 5 बार विधायक बना था, उस सीट को ही नहीं, उसे इलाहाबाद जिले को ही छोड़ कर भागना पड़ा.

अतीक अहमद समझ गया था कि उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना खतरे से खाली नहीं होगा, इसलिए उस ने दिल्ली पुलिस के सामने योजना के तहत आत्मसमर्पण कर दिया. अतीक अहमद को उत्तर प्रदेश पुलिस दिल्ली से इलाहाबाद ले आई. अतीक के बुरे दिन शुरू हो चुके थे. पुलिस और विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने अतीक की ड्रीम निर्माण परियोजना अलीना सिटी को अवैध घोषित कर ध्वस्त कर दिया.

औपरेशन अतीक के ही तहत 5 जुलाई, 2007 को राजू पाल हत्याकांड के मुख्य गवाह उमेश पाल ने अतीक के खिलाफ धूमनगंज थाने में अपहरण और जबरन बयान दिलाने का मुकदमा दर्ज कराया.

इस के बाद 4 अन्य गवाहों की ओर से भी उस के खिलाफ मामले दर्ज कराए गए. 2 महीने में ही अतीक के खिलाफ इलाहाबाद, कौशांबी और चित्रकूट में कई मुकदमे दर्ज हो गए. पर सपा की सरकार बनते ही उस के दिन बहुरने लगे.

2012 का साल था. अतीक अहमद जेल में था और विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी थी. उस ने जेल में रहते हुए ही अपना दल की ओर से अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की. चुनाव का पर्चा दाखिल करने के बाद अतीक अहमद ने जमानत पर छूटने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. उसे जमानत मिल गई और वह जेल से बाहर आ गया.

बहुजन समाज पार्टी ने एक बार फिर पूजा पाल को अतीक के सामने खड़ा किया. संयोग से इस बार भी अतीक चुनाव हार गया. वह चुनाव भले ही हार गया, पर उस का अपराध का कारखाना बंद नहीं हुआ.

मुलायम सिंह ने एक बार फिर उसे अपनी पार्टी में सहारा दिया. इस बार उसे श्रावस्ती जिले से टिकट दिया गया. इस चुनाव में भी अतीक अहमद हार गया.

2016 में फिर एक बार मुलायम सिंह ने कानपुर कैंट से उसे उम्मीदवार बनाया. इस चुनाव का फार्म भरने के लिए अतीक 5 सौ गाडि़यों का काफिला ले कर कानपुर पहुंचा. जबकि वह खुद 8 करोड़ की विदेशी कार हमर में सवार था.

पूरे कानपुर में अतीक के इस काफिले ने चक्का जाम कर दिया था. मीडिया में उस के खिलाफ खूब लिखा गया. तब तक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव बन गए थे. उन्होंने अतीक अहमद को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

एक बार फिर हुआ गिरफ्तार

फरवरी, 2017 में पुलिस ने उसे इलाहाबाद कालेज में तोड़फोड़ करने के आरोप में गिरफ्तार किया. उस के बाद से वह जेल में ही है. अतीक पर अब तक लगभग 250 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं. मायावती के शासनकाल में एक ही दिन में उस पर 100 मुकदमे दर्ज हुए थे. बाद में जिन्हें हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था. अधिकतर मामलों में सबूत के अभाव और गवाहों के मुकरने से अतीक बरी हो गया था.

अतीक भले ही आतंक का पर्याय है, वह नेकदिल भी है. उस के पास जो भी मदद के लिए जाता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता.

उस पर 35 मुकदमे अभी भी चल रहे हैं. इन में कुछ अदालत में पैंडिंग हैं तो कुछ की अभी जांच ही पूरी नहीं हुई है. मजे की बात यह है कि अभी तक उसे किसी भी मामले में सजा नहीं हुई है. यह सब देख कर यही लगता है कि अतीक की जिंदगी कभी इस जेल में तो कभी उस जेल में कटती रहेगी. लेकिन विकास दुबे कांड के बाद योगी सरकार अतीक के आर्थिक साग्राज्य को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगी है.

2017 में उत्तर प्रदेश में जब से भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी है, तब से अतीक अहमद पर शिकंजा कसता गया. गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद योगी सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश के तमाम डौनों पर काररवाई करने की छूट दे देने से अब सरकार और पुलिस अतीक अहमद के गुंडों और उस की संपत्ति के पीछे पड़ गई है. रोज उस की कोई न कोई संपत्ति तोड़ी जा रही है.

रहस्यों में उलझी पुलिस अधिकारी की मर्डर मिस्ट्री – भाग 3

अदालत का आदेश भी नहीं माना पुलिस ने

28 अक्तूबर, 2016 को अदालत ने पुलिस को आदेश दिया कि मामला काफी संगीन है, इस की जांच डीसीपी रैंक के अधिकारी से करवाई जाए. अदालत की पहल पर मामला डीसीपी पोखरे को सौंप दिया गया. डीसीपी पोखरे ने एसीपी राजकुमार चाफेकर के साथ मामले की जांच तो की, लेकिन उस पर कोई काररवाई नहीं हुई और देखतेदेखते 2 महीने गुजर गए. मामला ज्यों का त्यों रहा.

पहली जनवरी, 2017 को अदालत ने पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए मामले की जांच के लिए एसीपी प्रकाश निलेवाड़ की देखरेख में एक स्पैशल टीम गठित करने को कहा और पूछा कि मामले से संबंधित औडियो वीडियो का रिकौर्ड होने के बाद भी काररवाई क्यों नहीं की गई.

अदालत के आदेश पर एसीपी प्रकाश निलेवाड़ ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच की जिम्मेदारी पीआई संगीता अलफांसो को सौंप दी. पीआई संगीता अलफांसो ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया. उन्होंने एक महीने की जांच के बाद 31 जनवरी, 2017 को अश्विनी बेंद्रे के अपहरण का मामला दर्ज कर लिया.

इस के पहले कि पीआई संगीता अलफांसो अश्विनी बेंद्रे के अपहर्त्ताओं पर कोई काररवाई करतीं, पीआई अभय कुरुंदकर को अपनी गिरफ्तारी का अहसास हो गया और फरवरी, 2017 में वह अदालत चला गया, जिस की वजह से मामले में रुकावट आ गई. जब तक अदालत का कोई आदेश आता, तब तक पीआई संगीता अलफांसो का ट्रांसफर हो गया. उन के जाने के बाद इस मामले की जांच 9 महीने के लिए फिर अटक गई. अभय कुरुंदकर ने अदालत में यह अरजी लगाई कि उस के ऊपर लगाए गए सारे आरोप झूठे और बेबुनियाद हैं. उसे साजिश के तहत फंसाया जा रहा है.

पीआई संगीता अलफांसो के ट्रांसफर के बाद एक बार फिर अश्विनी बेंद्रे के परिवार वालों का धैर्य टूट गया. 9 महीने के इंतजार के बाद इस बार उन्होंने मीडिया से संपर्क किया. पहले तो 15 दिनों तक मीडिया में कोई हलचल नहीं हुई.

मीडिया ने बदला केस का रुख

16 जनवरी, 2017 को इलैक्ट्रौनिक मीडिया ने अश्विनी बेंद्रे के साथ पीआई अभय कुरुंदकर द्वारा मारपीट का एक वीडियो वायरल कर पूरे देश में सनसनी फैला दी. दूसरे दिन प्रिंट मीडिया ने भी इसे सुर्खियों में छापा. इस के बाद तो यह मामला हाईप्रोफाइल हो गया और प्रशासन में हड़कंप मच गया.

सवालों के जवाबों में नवी मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत नगराले को झूठ बोलना पड़ा. उन्होंने एक प्रैस नोट जारी कर मामले को झूठा और बेबुनियाद बता दिया. पुलिस कमिश्नर के इस बयान पर अदालत नाराज हो गई, जिस के चलते एसीपी प्रकाश निलेवाड़ ने पीआई संगीता अलफांसो द्वारा तैयार की गई जांच रिपोर्ट के आधार पर पीआई अभय कुरुंदकर को औन ड्यूटी और उस के साथ ज्ञानेश्वर पाटिल को 8 दिसंबर, 2017 को हिरासत में ले लिया.

पीआई संगीता अलफांसो ने अपनी रिपोर्ट में ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजेश पाटिल उर्फ राजू पाटिल को पीआई अभय कुरुंदकर का सहयोगी बताया था. राजू पाटिल अभय कुरुंदकर  के हर अच्छेबुरे काम में उस के साथ रहता था. ज्ञानेश्वर पाटिल तत्कालीन मंत्री एकनाथ खड़से का भांजा था. वह जिला जलगांव, तालुका भुसावल के गांव तलवेल का रहने वाला था. एक बिजनैसमैन के अलावा वह वहां के भाजपा युवामोर्चा का नेता था.

हकीकत आ ही गई सामने

जिस दिन अश्विनी बेंद्रे गायब हुई थी, उस दिन अश्विनी और राजू पाटिल के मोबाइल फोन की लोकेशन साथसाथ मीरा रोड की थी. अभय कुरुंदकर का मकान भी मीरा रोड पर ही था. इस से मामला स्पष्ट था कि घटना मीरा रोड पर अभय के मकान में घटी थी और सबूत भायंदर खाड़ी में ले जा कर नष्ट किया गया था.

पीआई संगीता अलफांसो ने जब थाने में उस से पूछताछ की तो उस ने अपना गुनाह तो स्वीकार नहीं किया, लेकिन उस का बयान भी विश्वसनीय नहीं था. उस ने बताया कि जिस दिन अश्विनी गायब हुई थी, उस दिन वह मुंबई के अंधेरी स्थित एक होटल में अपने दोस्तों के साथ बैठ कर शराब पी रहा था.

इस के बाद वह खाना खाने के लिए बाहर निकला था. लेकिन कोई अच्छा होटल न मिलने के कारण वह अपने दोस्त पीआई अभय कुरुंदकर के घर चला गया था. अभय कुरुंदकर के विषय में पीआई संगीता अलफांसो को जो बात मालूम पड़ी थी, वह सीधे पीआई के खिलाफ जा कर अश्विनी बेंद्रे की हत्या की तरफ इशारा कर रही थी.

भायंदर खाड़ी के मछलीमारों ने पीआई संगीता अलफांसो को बताया था कि पीआई अभय कुरुंदकर लगभग एकडेढ़ साल पहले अकसर सुबहसुबह इधर आते थे. उन से वह किसी महिला के शव के बारे में पूछताछ किया करते थे. उन का कहना था कि वह एक महिला की गुमशुदगी की जांच कर रहे हैं. यदि उस महिला की उन्हें डेडबौडी मिले तो पहले उन से संपर्क करें.

एक बात और यह पता चली कि अश्विनी बेंद्रे के गायब होने के दूसरे दिन ही अभय कुरुंदकर ने अपने मकान की पुताई करवाई थी. अपनी फोक्सवैगन कार को भी उन्होंने अपने मकान से हटवा दिया था. अदालत के आदेश पर जब पीआई संगीता अलफांसो ने अभय कुरुंदकर के मकान की जांच की तो उन्हें दीवारों पर काले रंग के कुछ धब्बे नजर आए, जो पुताई के बाद भी पूरी तरह से दबे नहीं थे. उन्हें खुरचवा कर डीएनए टेस्ट के लिए सांताकु्रज की लैब में भेज दिया गया. उस की रिपोर्ट आने के बाद ही पता लगेगा कि वे खून के छींटे किस के हैं.

पीआई अभय कुरुंदकर की गिरफ्तारी के बाद जांच अधिकारी ने अश्विनी बेंद्रे के मामले से जुड़ी संदिग्ध लाल रंग की फोक्सवैगन कार नंबर एमएच10ए एन5500 भी खोज निकाली. यह कार सांगली घामड़ी रोड के जिम्नेश्वर कालोनी में रहने वाले रमेश चारुदत्त जोशी के नाम रजिस्टर थी. पुलिस टीम को अश्विनी बेंद्रे द्वारा लिखा गया एक नोट भी मिला, जिस में लिखा था, ‘मेरे हाथपैर तोड़ने और मुझे मार कर तुम्हारी मनोकामना पूरी हो जाएगी.’

ऐसे कई सबूत थे, जो अभय कुरुंदकर को अश्विनी बेंद्रे के मामले में दोषी ठहरा रहे थे. लेकिन इस के बाद भी अभय कुरुंदकर अपना अपराध स्वीकार नहीं कर रहा था. उस का कहना था कि वह इस मामले में निर्दोष है. जांच टीम ने परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर उस के और ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजू पाटिल के खिलाफ भादंवि की धारा 323, 364, 497, 506(2), 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. धारा 302 डीएनए रिपोर्ट आने के बाद जोड़ दी जाएगी.

लेकिन इस के पहले पीआई अभय कुरुंदकर और ज्ञानेश्वर पाटिल उर्फ राजू पाटिल का इकबालिया बयान जरूरी है. इस के लिए पुलिस टीम ने अदालत से उन के नारको टेस्ट की इजाजत मांगी है, जिस पर उन के वकीलों ने ऐतराज किया है. बहरहाल, मामला अदालत में विचाराधीन है. दोनों आरोपी कथा लिखने तक सलाखों के पीछे थे.

पीआई अभय कुरुंदकर की गिरफ्तारी से एपीआई अश्विनी बेंद्रे के घर वालों को इंसाफ की आशा जागी है लेकिन मामला इतना लंबा खिंचा, इस बात का जिम्मेदार उन्होंने नवी मुंबई पुलिस कमिश्नर हेमंत नगराले को ठहराया है. उन्होंने प्रैस वार्ता कर के उन पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें भी सहअभियुक्त बनाने की मांग की है.

उन का कहना है कि पीआई अभय कुरुंदकर ने अपने पद का दुरुपयोग किया और तफ्तीश में सहयोग नहीं किया. इतना ही नहीं, उन्होंने जांच अधिकारी का ट्रांसफर कर अभियुक्त को बचाने की कोशिश की. यह एक ऐसा प्रश्न है जिस का जवाब उन्हें आने वाले समय में देना पड़ सकता है.

कथा जनचर्चा और समाचार पर आधारित है

विहान अपहरण केस : औपरेशन सी रिवर ऐसे हुआ कामयाब – भाग 4

स्कूल बस को अगले पिकअप पौइंट से और बच्चे लेने थे. जैसे ही बस उस स्टाप पर पहुंची तो विहान का अपहरण करने के लिए उन्होंने बस के पास अपनी बाइक रोक दी. लेकिन इस से पहले कि वे कुछ कर पाते, बस वहां से निकल गई. बस के अगले स्टाप पर बच्चे को किडनैप करने के लिए जैसे ही वे आगे बढ़े, उसी समय राह चलते कुछ लोग बीच में आ गए. तब तक स्कूल बस आगे निकल गई.

इस के बाद स्कूल बस दिलशाद गार्डन सी ब्लौक फ्लैटों के पीछे के गेट के सामने रुकी. इस के सामने इहबास अस्पताल का गेट नंबर-1 है. रवि और पंकज बाइक से पीछा करते हुए वहां पहुंच गए. दहशत फैलाने के लिए उन्होंने बस के ड्राइवर नरेश थापा के पैर में गोली मारी. इस के बाद उन्होंने बस के गेट पर खड़ी आया को धक्का दे दिया. तभी उन्होंने गेट से ही विहान को आवाज लगाई तो विहान अपनी सीट से खड़ा हो गया. रवि और पंकज ने विहान को उठा कर अपनी बाइक पर बैठा लिया.

मोटरसाइकिल पर विहान को बीच में बैठा कर वे आनंदविहार होते हुए शालीमार सिटी, साहिबाबाद स्थित उसी फ्लैट पर ले गए जो नितिन ने 6 महीने पहले किराए पर लिया था. नितिन उन का फ्लैट पर ही इंतजार कर रहा था.

वहां ले जा कर उन्होंने विहान को इतना डराधमका दिया, जिस से वह सहमा हुआ रहे. उन का इरादा बच्चे को कोई नुकसान पहुंचाना नहीं था. वह तो किसी तरह उस के घर वालों से फिरौती वसूलना चाहते थे.

चोरी के फोन से मांगी थी फिरौती

तीनों बदमाशों का वैसे तो पुराना आपराधिक रिकौर्ड नहीं है, लेकिन वे थे बहुत शातिर. मोबाइल लोकेशन से वह पुलिस के हत्थे न चढ़ें, इसलिए उन्होंने वहां से 10 किलोमीटर दूर जा कर फिरौती की काल की थी. जिन मोबाइल फोनों से वे बातें करते थे, वह चोरी के थे. पंकज लड़की की आवाज निकालने में माहिर था, इसलिए विहान के घर वालों से वही बात करता था.

जिस फ्लैट में बच्चे को रखा गया था, वहां रात को केवल एक बदमाश बच्चे के साथ सोता था और 2 रात भर जागते हुए चौकस रहते थे. उन्होंने योजना तो फूलप्रूफ बनाई थी लेकिन मामला क्राइम ब्रांच के हाथ में पहुंचते ही उन के अरमानों पर पानी फिर गया. इस चक्कर में उन के साथी रवि को तो अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

पुलिस ने अपहर्त्ता पंकज और नितिन कुमार शर्मा से विस्तार से पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर 7.65 एमएम की 2 पिस्टल और मैगजीन बरामद कर लीं. दोनों को भादंवि की धारा 363, 307 और 25/27 आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर के कड़कड़डूमा न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

बच्चे की हत्या कर 37 दिनों तक घर में रखे रहा लाश

विहान अपहरण मामले की तरह जनवरी, 2018 के पहले हफ्ते में उत्तरपश्चिमी दिल्ली के स्वरूपनगर इलाके से एक और बच्चे का फिरौती के लिए अपहरण कर लिया गया था, लेकिन इस मामले में अपहर्त्ता ने सब से पहले बच्चे की हत्या कर के लाश एक सूटकेस में भर ली. उस सूटकेस को वह 37 दिनों तक अपने कमरे में रखे रहा. बदबू न आए, इस के लिए वह कमरे में परफ्यूम छिड़कता रहता था. बच्चे की लाश बरामद होने के बाद जब सच्चाई सामने आई तो सभी हैरान रह गए.

उत्तरपश्चिमी दिल्ली के थाना स्वरूपनगर क्षेत्र के नत्थूपुरा में करण सिंह की परचून की दुकान थी. उन की दुकान अच्छी चलती थी, जिस से उन्हें ठीक आमदनी हो जाती थी. करण सिंह अपना पूरा ध्यान अपने परिवार और बिजनैस पर ही लगाते थे. परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा आशीष उर्फ आशू और एक बेटी थी. अपनी मेहनत की बदौलत उन्होंने अपनी एक दुकान से परचून की 3 दुकानें कर ली थीं. उन का परिवार हर तरह से खुशहाल था.

लेकिन 7 जनवरी, 2018 को उन के परिवार में जो हुआ, उसे करण सिंह पूरी जिंदगी नहीं भुला सकेंगे. दरअसल हुआ यह कि 7 जनवरी रविवार को 7 वर्षीय आशीष अपनी बुआ के बेटे के साथ घर के बाहर खेल रहा था. खेलकूद कर वह शाम 4 बजे घर लौट आया. घर पहुंच कर उस ने अपनी बड़ी बहन से कहा, ‘‘गुंजन दीदी, साढ़े 5 बज गए क्या?’’

‘‘क्यों, क्या कहीं जाना है?’’ गुंजन ने पूछा.

‘‘हां, मुझे अवधेश चाचा के पास जाना है. वह मुझे साइकिल दिलाएंगे.’’ आशू बोला.

आशू की इच्छा थी कि उस के पास एक इतनी छोटी साइकिल हो, जिसे वह आसानी से चला सके. मोहल्ले के बच्चे स्कूल से लौटने के बाद गली में जब साइकिल चलाते थे तो उस का मन भी साइकिल चलाने को करता था. इस बारे में उस ने अपनी मम्मी और पापा से कई बार कहा था लेकिन वह कोई न कोई बहाना बना कर टाल जाते थे.

विकास दुबे : नेताओं और पुलिसवालों की छत्रछाया में बना गैंगस्टर – भाग 3

यूपी के कई जिलों में विकास दुबे के खिलाफ 60 मामले चल रहे थे. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी पर 25 हजार का इनाम रखा हुआ था. लेकिन सामने होने पर भी उसे कोई नहीं पकड़ता था.

कानपुर नगर से ले कर देहात तक में विकास दुबे की सल्तनत कायम हो चुकी थी. पंचायत, निकाय, विधानसभा से ले कर लोकसभा चुनाव के वक्त नेताओं को बुलेट के दम पर बैलेट दिलवाना उस का पेशा बन गया था. विकास दुबे के पास जमीनों पर कब्जे, रंगदारी, ठेकेदारी और दूसरे कामधंधों से इतना पैसा एकत्र हो गया था कि उस ने एक ला कालेज के साथ कई शिक्षण संस्थाएं खोल ली थीं.

बिकरू, शिवली, चौबेपुर, शिवराजपुर और बिल्हौर ब्राह्मण बहुल क्षेत्र हैं. यहां के युवा ब्राह्मण लड़के विकास दुबे को अपना आदर्श मानते थे. गर्म दिमाग के कुछ लड़के अवैध हथियार ले कर उस की सेना बन कर साथ रहने लगे थे. आपराधिक गतिविधियों से ले कर लोगों को डरानेधमकाने में विकास इसी सेना का इस्तेमाल करता था.

अपने गांव में विकास दुबे ने एनकाउंटर के डर से पुलिस पर हमला कर के 8 जवानों को शहीद तो कर दिया लेकिन वह ये भूल गया कि पुलिस की वर्दी और खादी की छत्रछाया ने भले ही उसे संरक्षण दिया था, लेकिन जब कोई अपराधी खुद को सिस्टम से बड़ा मानने की भूल करता है तो उस का अंजाम मौत ही होती है.

बिकरू गांव में पुलिस पर हमले के बाद थाना चौबेपुर में 3 जुलाई को ही धारा 147/148/149/302/307/394/120बी भादंवि व 7 सीएलए एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया था. साथ ही विकास दुबे के साथ उस के गैंग का खात्मा करने के लिए लंबीचौड़ी टीम बनाई गई थी. इस टीम को जल्द से जल्द औपरेशन विकास दुबे को अंजाम तक पहुंचाने के आदेश दिए गए.

पुलिस की कई टीमों ने इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस के सहारे काम शुरू कर दिया. दूसरी तरफ पुलिस ने अगले 2 दिनों के भीतर विकास दुबे की गिरफ्तारी पर 50 हजार रुपए का इनाम घोषित करने के बाद 3 दिन के भीतर उसे बढ़ा कर 5 लाख का इनामी बना दिया.

विकास दुबे के गांव बिकरू में बने किलेनुमा घर को बुलडोजर चला कर तहसनहस कर दिया गया था. गांव में विकास गैंग के दूसरे सदस्यों के घरों पर भी बुलडोजर चले. साथ ही विकास के गांव तथा लखनऊ स्थित घर में खड़ी कारों को बुलडोजर से कुचल दिया गया.

पुलिस की छापेमारी में सब से पहले विकास के साथियों की गिरफ्तारियां और मुठभेड़ में मारे जाने का सिलसिला शुरू हुआ. विकास के मामा प्रेम प्रकाश और भतीजे अतुल दुबे को उसी दिन मार गिराने के बाद एसटीएफ ने सब से पहले कानपुर से विकास के एक खास गुर्गे दयाशंकर अग्निहोत्री को गिरफ्तार किया.

पुलिस अभियान

उसी से मिली सूचना के बाद एसटीएफ ने 5 जुलाई को कल्लू को गिरफ्तार किया, जिस ने एक तहखाने और सुरंग में छिपा कर रखे हथियार बरामद करवाए. 6 जुलाई को पुलिस ने नौकर कल्लू की पत्नी रेखा तथा पुलिस पर हुए हमले में मददगार विकास के साढू समेत 3 लोगों को गिरफ्तार किया.

7 जुलाई को पुलिस ने विकास के गैंग में शामिल उस के 15 करीबी साथियों के पोस्टर जारी किए. इसी दौरान पुलिस को विकास की लोकेशन हरियाणा के फरीदाबाद में मिली. लेकिन एसटीएफ के वहां पहुंचने से पहले ही विकास गायब हो गया. लेकिन उस के 3 करीबी प्रभात मिश्रा, शराब की दुकान पर काम करने वाला श्रवण व उस का बेटा अंकुर पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

8 जुलाई को एसटीएफ ने हमीरपुर में विकास के बौडीगार्ड व साए की तरह साथ रहने वाले उस के साथी अमर दुबे को मुठभेड़ में मार गिराया. उस पर 25 हजार का इनाम था. अमर दुबे की शादी 10 दिन पहले ही हुई थी. उस की पत्नी को भी पुलिस ने साजिश में शामिल होने के शक में गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस को सूचना मिली थी कि उस रात पुलिस पर हुए हमले में अमर भी शामिल था. उसी दिन चौबेपुर पुलिस ने विकास के एक साथी श्याम वाजपेई को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया.

9 जुलाई को एसटीएफ जब फरीदाबाद में गिरफ्तार अंकुर, श्रवण तथा कार्तिकेय उर्फ प्रभात मिश्रा को ट्रांजिट रिमांड पर कानपुर ला रही थी, तो रास्ते में पुलिस की गाड़ी पंक्चर हो गई. मौका देख कर प्रभात मिश्रा ने एक पुलिसकर्मी की पिस्टल छीन कर भागने की कोशिश की. प्रभात को पकड़ने के प्रयास में मुठभेड़ के दौरान एनकाउंटर में उस की मौत हो गई.

उसी दिन इटावा पुलिस ने बिकरू गांव शूटआउट में शामिल विकास के एक और साथी 50 हजार के इनामी प्रवीण उर्फ बउआ दुबे को भी एनकाउंटर में मार गिराया. विकास के साथियों की ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां व एनकाउंटर हो रहे थे, लेकिन एसटीएफ को जिस विकास दुबे की तलाश थी, वह अभी तक पकड़ से बाहर था.

फरीदाबाद के एक होटल से फरार होने के बाद पुलिस सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उसे पूरे एनसीआर में तलाश रही थी, जबकि विकास दुबे पुलिस को चकमा दे कर मध्य प्रदेश के उज्जैन पहुंच गया था. वहां 9 जुलाई की सुबह उस ने नाटकीय तरीके से महाकाल मंदिर में अपनी पहचान उजागर कर दी और खुद को पुलिस के हाथों गिरफ्तार करवा दिया.

इस नाटकीय गिरफ्तारी की सूचना चंद मिनटों में मीडिया के जरिए न्यूज चैनलों के माध्यम से देश भर में फैल गई. उत्तर प्रदेश एसटीएफ की टीम उसी रात उज्जैन पहुंच गई. उज्जैन पुलिस ने बिना कानूनी औपचारिकता पूरी किए विकास दुबे को यूपी पुलिस की एसटीएफ के सुपुर्द कर दिया.

विकास का अंतिम अध्याय

मगर इस बीच एमपी और यूपी पुलिस ने विकास दुबे से जो औपचारिक पूछताछ की थी, उस में उस ने खुलासा किया कि उसे डर था कि गांव बिकरू आई पुलिस टीम उस का एनकाउंटर कर देगी. चौबेपुर थाने के उस के शुभचिंतक पुलिस वालों ने उसे यह इत्तिला पहले ही दे दी थी. तब उस ने अपने साथियों को बुला कर पुलिस को सबक सिखाने का फैसला किया.

विकास दुबे ने यह भी बताया कि वह चाहता था कि मारे गए सभी पुलिस वालों के शव कुएं में डाल कर जला दिए जाएं, ताकि सबूत ही खत्म हो जाएं. इसीलिए उस ने पहले ही कई कैन पैट्रोल भरवा कर रख लिया था.

विकास दुबे के साथियों ने शूटआउट में मारे गए 5 पुलिस वालों के शव कुएं के पास एकत्र भी करवा दिए थे, लेकिन जब तक वह उन्हें जला पाते तब तक कानपुर मुख्यालय से अतिरिक्त पुलिस बल आ गया और उन्हें भागना पड़ा.

यह बात सच थी, क्योंकि पुलिस को 5 पुलिस वालों के शव विकास के घर के बाहर कुएं के पास से मिले थे. विकास ने पूछताछ में बताया कि वह सीओ देवेंद्र मिश्रा को पसंद नहीं करता था. चौबेपुर समेत आसपास के सभी थानों के पुलिस वाले उस के साथ मिले हुए थे. लेकिन न जाने क्यों देवेंद्र मिश्रा हमेशा उस का विरोध करते थे.

ताकत और घमंड के नशे में चूर कुछ लोग यह भूल जाते हैं कि कुदरत हर किसी को उस के गुनाहों की सजा इसी संसार में देती है. यूपी एसटीएफ की टीम विकास दुबे को ले कर 4 अलगअलग वाहनों से सड़क के रास्ते उज्जैन से कानपुर के लिए रवाना हुई. मीडिया चैनलों की गाडि़यां लगातार एसटीएफ की गाडि़यों का पीछा करती रहीं. हांलाकि एसटीएफ ने लोकल पुलिस की मदद से कई जगह इन गाडि़यों को चकमा देने का प्रयास किया.

10 जुलाई की सुबह 6 बजे के आसपास कानपुर देहात के बारा टोल प्लाजा पर एसटीएफ का काफिला आगे निकल गया, काफिले के पीछे चल रहे मीडियाकर्मियों की गाडि़यों को सचेंडी थाने की पुलिस ने बैरीकेड लगा कर रोक दिया. मीडियाकर्मियों ने पुलिस से बहस की तो कहा गया कि रास्ता अभी के लिए बंद कर दिया गया है. इस के साथ ही हाइवे पर बाकी वाहन भी रोक दिए गए थे.

इस काफिले को रोके जाने के 15 मिनट बाद सूचना आई कि विकास दुबे को ले जा रही एसटीएफ की गाड़ी बारिश व कुछ जानवरों के सामने आने से कानुपर से 15 किलोमीटर पहले भौती में पलट गई.

पता चला कि गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे ने एक पुलिसकर्मी की पिस्टल छीन कर भागने का प्रयास किया था. तब तक पीछे से दूसरी गाडियां भी पहुंच गईं और विकास दुबे का पीछा कर आत्मसर्मपण के लिए कहा गया, लेकिन वह नहीं रुका और पुलिस पर फायरिंग कर दी.

लिहाजा पुलिस की जवाबी काररवाई में वह घायल हो गया, उसे हैलट अस्पताल भेजा गया. लेकिन वहां पहुंचते ही डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

विकास दुबे आदतन खतरनाक अपराधी था, जिस के सिर पर कई लोगों की हत्या का आरोप था, ऐसे अपराधी की मौत से किसी को भी हमदर्दी नहीं हो सकती. लेकिन अहम सवाल यह है कि खाकी और खादी के संरक्षण में गैंगस्टर बने विकास दुबे का अंत होने के बाद क्या उन लोगों के खिलाफ कोई काररवाई होगी, जिन्होंने उस के हौसलों को खूनी हवा दी थी?

– कथा पुलिस के अभिलेखों में दर्ज मामलों और पीडि़तों व जनश्रुति के आधार पर एकत्र जानकारी पर आधारित

मारवाड़ के लुटेरों पर पुलिस का दांव – भाग 2

पुलिस घबरा गई और हमलावरों का मुकाबला करने के बजाय वहां से भागने लगी. इसी बीच लोहे के गेट पर चढ़ रहे इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन को गोली लग गई, जिस से वह वहीं गिर गए. जबकि उन के साथी भाग गए थे. मौका पा कर हमला करने वाले सभी लोग वहां से भाग निकले. इस हमले में टीम के कुछ अन्य लोग भी घायल हो गए थे.

थोड़ी दूर जा कर जब पुलिस टीम को पता चला कि टी.वी. पेरियापांडियन साथ नहीं हैं तो सभी वापस लौटे. भट्ठे पर जा कर देखा तो टी.वी. पेरियापांडियन घायल पड़े थे.

उन्हें जैतारण के अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. अभी तक स्थानीय पुलिस को इस घटना की कोई जानकारी नहीं थी. स्थानीय पुलिस को जैतारण अस्पताल प्रशासन से इस घटना की जानकारी मिली. इस घटना की जानकारी एसपी दीपक भार्गव को भी मिल गई.

सूचना पा कर सारे पुलिस अधिकारी अस्पताल पहुंचे और चेन्नै पुलिस से घटना के बारे में पूछताछ की. पता चला कि छापा मारने के दौरान नाथूराम ने अपने 8-10 साथियों के साथ उन पर हमला किया था. इस हमले में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन उन के बीच फंस गए थे. इन्होंने उन की सरकारी पिस्टल छीन ली और उसी से उन्हें गोली मार दी, जिस से उन की मौत हो गई.

पाली के पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो चेन्नै से आई पुलिस ने उन्हें जो कुछ बताया, वह उन के गले नहीं उतरा. फिर भी थाना जैतारण में चेन्नै पुलिस की ओर से नाथूराम जाट, दीपाराम जाट और दिनेश चौधरी व अन्य लोगों के खिलाफ हत्या, जानलेवा हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पाली पुलिस को घटनास्थल पर गोली का एक खोखा मिला था, जो पुलिस की पिस्टल का था. एफएसएल टीम ने भी घटनास्थल पर जा कर जरूरी साक्ष्य जुटाए. पुलिस के लिए जांच का विषय यह था कि गोली किस ने और कितनी दूरी से चलाई. वह गोली एक्सीडेंटल चली थी या डिफेंस में चलाई गई थी. जैतारण पुलिस ने हमलावरों में से कुछ को पकड़ लिया, लेकिन नाथूराम नहीं पकड़ा जा सका था. पुलिस उस की तलाश में सरगर्मी से जुटी थी.

जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल में इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की लाश का पोस्टमार्टम मैडिकल बोर्ड द्वारा कराया गया. इस के बाद 14 दिसंबर को हवाई जहाज द्वारा उन के शव को चेन्नै भेज दिया गया. चेन्नै में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीसामी, उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम, डीजीपी टी.के. राजेंद्रन, पुलिस कमिश्नर ए.के. विश्वनाथन और विपक्ष के नेता एम.के. स्टालिन सहित तमाम राजनेताओं और पुलिस अफसरों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

इस मौके पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानीसामी ने दिवंगत इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन के घर वालों को 1 करोड़ रुपए की राशि बतौर मुआवजा और घायल पुलिसकर्मियों को एकएक लाख रुपए देने की घोषणा की. इस के बाद टी.वी. पेरियापांडियन के शव को उन के पैतृक गांव जिला तिरुनलवेली के मुवेराथली ले जाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

14 दिसंबर को चेन्नै पुलिस के जौइंट पुलिस कमिश्नर संतोष कुमार जैतारण पहुंचे और डीएसपी वीरेंद्र सिंह तथा चेन्नै के पुलिस इंसपेक्टर मुनिशेखर से घटना के बारे में जानकारी ली. घटनास्थल का भी निरीक्षण किया गया. इस के बाद एसपी दीपक भार्गव ने भी पाली जा कर घटना के बारे में तथ्यात्मक जानकारी ली और आरोपियों की गिरफ्तारी और लूटी गई ज्वैलरी की बरामदगी के बारे में चर्चा की.

society

इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की मौत की जांच के लिए पाली पुलिस के बुलाने पर जयपुर से पहुंचे बैलेस्टिक एक्सपर्ट ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. उन्होंने चेन्नै पुलिस के दोनों इंसपेक्टरों की पिस्टल, घटनास्थल तथा लाश के फोटोग्राफ और वीडियो फुटेज आदि राज्य विधिविज्ञान प्रयोगशाला जयपुर पर मंगवाए.

गोली की बरामदगी के लिए पाली पुलिस ने मेटल डिटेक्टर से घटनास्थल के आसपास जांच कराई, लेकिन गोली नहीं मिली. जबकि मृतक इंसपेक्टर की लाश में भी गोली नहीं मिली थी.

इस बीच 14 दिसंबर, 2017 को जोधपुर के थाना रातानाड़ा की पुलिस ने चेन्नै के महालक्ष्मी ज्वैलर्स के शोरूम में हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट के मुख्य आरोपी नाथूराम के साथी जोधपुर के बिलाड़ा निवासी दिनेश जाट को गिरफ्तार कर लिया था. दिनेश जाट बिलाड़ा थाने का हिस्ट्रीशीटर था. उस के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज थे. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी के लिए स्टैंडिंग वारंट भी जारी कर रखा था.

15 दिसंबर को जोधपुर रेंज के आईजी हवा सिंह घुमारिया भी जैतारण पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस बीच पाली पुलिस ने घटनास्थल पर जा कर मृतक इंसपेक्टर टी.वी. पेरियापांडियन की मौत का क्राइम सीन दोहराया.

चेन्नै एवं राजस्थान के पुलिस अधिकारियों और एफएसएल विशेषज्ञों की उपस्थिति में दोहराए गए क्राइम सीन में सामने आया कि जब टी.वी. पेरियापांडियन ने लोहे के गेट पर चढ़ कर भागने की कोशिश की थी, तब पहले गेट से बाहर निकल चुके चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर मुनिशेखर की पिस्टल से एक्सीडेंटल गोली चल गई थी. इसी गोली से पेरियापांडियन की मौत हुई थी.

चेन्नै पुलिस के इंसपेक्टर की मौत का सच सामने आने के बाद थाना जैतारण पुलिस ने 15 दिसंबर को हमलावर तेजाराम जाट, उस की पत्नी विद्या देवी और बेटी सुगना को गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन उन्हें हत्या का आरोपी न बना कर भादंवि की धारा 307, 331 व 353 के तहत गिरफ्तार किया गया था. चूना भट्ठे के उस कमरे में तेजाराम का परिवार रहता था.

हमलावर तेजाराम और चेन्नै पुलिस टीम से की गई पूछताछ में पता चला कि 12 दिसंबर की रात चेन्नै पुलिस ने जब चूना भट्ठे पर छापा मारा था, तब दोनों इंसपेक्टरों ने अपनी पिस्टल लोड कर रखी थीं.

पुलिस टीम जैसे ही अंदर हाल के पास पहुंची, पदचाप सुन कर तेजाराम जाग गया. पुलिस वालों को चोर समझ कर वह चिल्लाया तो हाल में सो रही उस की पत्नी, बेटियां व अन्य लोग जाग गए और उन्होंने लाठियों से पुलिस पर हमला कर दिया.

उस समय नाथूराम भी वहां मौजूद था. वह समझ गया कि ये चोर नहीं, चेन्नै पुलिस है, इसलिए वह भागने की युक्ति सोचने लगा. अचानक हुए हमले से घबराई चेन्नै पुलिस भागने लगी. इंसपेक्टर मुनिशेखर और अन्य पुलिस वाले तो दीवार फांद कर बाहर निकल गए.

बलात्कार, हत्या और साजिश : नेता खुद को बादशाह से कम नहीं समझते

राजनीति में किसी तरह के षडयंत्र से लाभ लेने वाले लोगों की कभी कमी नहीं रही. नेता को अपना विरोध कभी पसंद नहीं आता. ऐसे में करीबी से करीबी लोग भी दुश्मन बन जाते हैं. राजनैतिक लोगों पर आरोप भी लगते रहते हैं. कभीकभी इन आरोपों में सच्चाई भी होती है. अपनी पावर के गुरूर में कुछ नेता ऐसे काम कर बैठते हैं, जो उन के गले की फांस बन जाता है.

बलात्कार जैसे मुद्दे बेहद संवेदनशील होते हैं. अगर ऐसी घटनाएं साजिशन होने लगें तो असल घटनाओं पर यकीन करना भी मुश्किल हो जाएगा. उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में लड़की के बलात्कार और उस के पिता की हत्या से राजनीति का क्रूर चेहरा बेनकाब होता है. जरूरत इस बात की है कि साजिश का परदाफाश हो और पीडि़त को न्याय मिले. सच्चाई साबित होने से षडयंत्र बेनकाब होगा और आगे ऐसे मामलों को रोकने में मदद मिलेगी.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से यही कोई 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव का मामला कुछ ऐसा ही है. कविता के पिता और दोनों चाचा 15 साल पहले विधायक कुलदीप सेंगर के बेहद करीबी हुआ करते थे. गांव में कुलदीप के घर से कुछ घर छोड़ कर उन का भी मकान है.

कविता की 3 बहनें और एक भाई है. एक ही जाति के होने के कारण आपसी तालमेल भी अच्छा था. दोनों परिवार एकदूसरे के सुखदुख में शामिल होते थे. आपस में घनिष्ठ संबंध थे. दोनों ही परिवार माखी गांव के सराय थोक के रहने वाले थे. कविता के ताऊ सब से दबंग थे.

कुलदीप सेंगर ने युवा कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस का सिक्का कमजोर था तो वह सन 2002 में विधानसभा का पहला चुनाव बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बन गए.

कुलदीप के विधायक बनने के बाद कविता के घर वालों के साथ कुलदीप का व्यवहार बदलने लगा. अब वह उस परिवार से दूरी बनाने लगे थे. इस की अपनी वजहें भी थीं, जहां पूरा समाज कुलदीप को विधायकजी कहने लगा था, वहीं कविता के ताऊ कुलदीप को नाम से बुलाते थे.

कुलदीप ने अपनी छवि को बचाने के लिए इस परिवार से दूरी बनानी शुरू की. कविता के पिता और उन के दोनों भाइयों को लगा कि कुलदीप के भाव बढ़ गए हैं. उस में घमंड आ गया है. वह किसी न किसी तरह से उन को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे.

इस का नतीजा यह हुआ कि उन के बीच मनमुटाव बढ़ता गया. जब आपस में दुश्मनी बढ़ने लगी तो विरोधी भी इस दरार को चौड़ा करने में लग गए. एक तरफ जहां कविता का परिवार कुलदीप का विरोध कर रहा था, वहीं कुलदीप अपना राजनीतिक सफर आगे बढ़ाते गए. कुलदीप सिंह सेंगर का नाम उन्नाव जिले की राजनीति से उठ कर राजधानी लखनऊ तक पहुंचने लगा.

बारबार की जीत ने बढ़ाए विधायक कुलदीप सेंगर के हौसले

सत्ता के साथ संतुलन बनाए रखना कुलदीप भी सीख गए थे. अपने स्वभाव और ताकत से वह चुनाव जीतने का पर्याय बन चुके थे. ऐसे में वह दल बदल भी करने लगे. कुलदीप ने सन 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र से जीता और 2012 में इसी पार्टी से भगवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए. कुलदीप की पत्नी संगीता सेंगर भी उन्नाव में जिला पंचायत की अध्यक्ष बन गईं.

उस समय उन्नाव जिले को महिला सशक्तिकरण की मिसाल कहा जाता था, क्योंकि वहां जिला पंचायत अध्यक्ष ही नहीं डीएम और एसपी की कुरसी को भी महिला अधिकारियों ने संभाल रखा था. 3 बार के विधायक कुलदीप सिंह को उम्मीद थी कि अखिलेश सरकार में उन्हें मंत्री पद मिलेगा, पर ऐसा नहीं हुआ.

इतना ही नहीं, कुलदीप सेंगर को जब लगा कि उन्हें पार्टी में दरकिनार किया जाने लगा है तो व्यथित हो कर उन्होंने सपा छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. 2017 का विधानसभा चुनाव उन्होंने भाजपा के टिकट पर लड़ा और विधायक बने. बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र से विधायक बन जाने के बाद उन की भाजपा के वरिष्ठ नेताओं तक अच्छी पहुंच हो गई. अब उन का कद भी बढ़ गया था.

उधर विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और कविता के परिवार की रंजिश गहरी होती गई. उन्नाव जिले की पहचान दबंगों वाली है. अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की वहां बहुतायत है. माखी गांव को आसपास क्षेत्र के गांवों से संपन्न समझा जाता है. यहां कारोबार भी दूसरों की अपेक्षा अच्छा चलता है. कविता के ताऊ पर करीब एक दरजन मुकदमे माखी और दूसरे थानों में कायम थे. करीब 10 साल पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंटपत्थरों से हमला कर के कविता के ताऊ को मार दिया था.

कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप को ही माना था. तब से दोनों परिवारों के बीच दूरी और बढ़ गई. कविता के ताऊ की मौत के बाद उस के चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गए थे. वहां उन्होंने अपना इलैक्ट्रिक वायर का बिजनैस शुरू किया. उन पर करीब 10 मुकदमे थे. गांव में अब कविता के पिता अकेले रह गए. उन के ऊपर भी 2 दरजन मुकदमे कायम थे. नशा और मुकदमों का बोझ उन्हें बेहाल कर चुका था.

बलात्कार के आरोप के बावजूद पुलिस ने पूछताछ तक नहीं की विधायक से कविता और विधायक कुलदीप सेंगर के परिवार में दुश्मनी का खतरनाक मोड़ जून, 2017 में तब आया, जब कविता और उस के परिवार ने विधायक कुलदीप सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगाया. जानकारी के अनुसार जून, 2017 में राखी नामक महिला कविता को ले कर विधायक कुलदीप के पास गई. जहां विधायक ने उसे बंधक बना कर उस के साथ बलात्कार किया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर भी लगा.

घटना के 8 दिन बाद कविता औरैया जिले के पास मिली. कविता और उस के पिता ने इस बात की शिकायत थाने में की. तब पुलिस ने 3 आरोपी युवकों को जेल भेज दिया. पुलिस ने घटना में विधायक का नाम शामिल नहीं किया. कविता और उस का परिवार विधायक का नाम भी मुकदमे में शामिल कराना चाहते थे.

एक साल तक कविता और उस का परिवार विधायक के खिलाफ गैंगरेप का मुकदमा लिखाने के लिए उत्तर प्रदेश के गृह विभाग से ले कर उन्नाव के एसपी तक भटकता रहा. इस के बाद भी विधायक के खिलाफ एफआईआर नहीं हुई.

विधायक के खिलाफ मुकदमा न लिखे जाने के कारण कविता और उस के परिवार के लोगों ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत कोर्ट से मुकदमा लिखाए जाने की अपील की.

इस के बाद 3 अप्रैल, 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट की और मुकदमा वापस लिए जाने को कहा. कविता और उस के परिवारजनों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इस के साथ विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया.

पुलिस ने क्रौस एफआईआर लिखी पर एकतरफा काररवाई करते हुए केवल कविता के पिता को ही जेल भेज दिया. विधायक पक्ष के लोगों से पुलिस ने पूछताछ तक नहीं की.

कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उस के पिता की खूब पिटाई की. 8 अप्रैल, 2018 को कविता अपने परिवार के लोगों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास कालीदास मार्ग पहुंच गई. वहां उस ने आत्मदाह करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया और गौतमपल्ली थाने ले गई.

डीजीपी ने इस पूरे मामले की जांच उन्नाव की एसपी पुष्पांजलि को करने के निर्देश दिए. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर चोट के 14 निशान मिले.

उन्नाव के सीएमओ डा. एस.पी. चौधरी की अगुवाई में 3 डाक्टरों के पैनल ने पोस्टमार्टम किया. मृतक के पैर, हाथ, कमर, पीठ और पिंडली में चोट मिली. पेट में डंडे या किसी चीज से ताबड़तोड़ प्रहार होने पर आंत में घाव हो गया था. इस से वह सेप्टिसेमिया का शिकार हो गए, जो उन की मौत का कारण बना.

एक ओर बलात्कार का दर्द, दूसरी ओर पिता की मौत का गम

किसी लड़की के लिए इस से दर्दनाक क्या हो सकता है कि जिस समय वह न्याय की मांग ले कर मुख्यमंत्री से मिले, उसी समय उस का पिता मौत के मुंह में चला जाए. कविता के पिता की मौत के बाद सरकार भी हरकत में आ गई. एसपी पुष्पांजलि ने एकतरफा काररवाई करते हुए कविता के पिता को जेल भेजने के दोषी माखी थाने के थानाप्रभारी अशोक सिंह भदौरिया सहित 6 पुलिस वालों को तुरंत सस्पेंड कर दिया. इतना ही नहीं, मामले की जांच एसआईटी और क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई.

सत्ता में रहने वाले विधायक की हनक अलग होती है. उस के खिलाफ पुलिस में मुकदमा कायम करना आसान नहीं होता. कुलदीप सिंह सेंगर के मामले को देखें तो पूरी बात साफ हो जाती है. अपना विरोध करने वालों के साथ सत्ता की हनक में विधायक कुलदीप सेंगर ने जो कुछ किया, अब वह योगी सरकार के गले की फांस बन गया.

उन्नाव से ले कर राजधानी लखनऊ तक केवल पुलिस ही नहीं, जेल और अस्पताल तक में जिस तरह से विधायक के विरोधी के साथ बर्ताव हुआ, वह किसी कबीले की घटना से कम नहीं है.

आप ने ऐसे दृश्य फिल्मों में देखे होंगे जिन में अपने विरोधी की पिटाई पानी डाल कर की जाती थी. फिर मरणासन्न अवस्था में पीडि़त के ही खिलाफ मुकदमा कायम करा कर पुलिस की मिलीभगत से जेल भेज दिया जाता था. घायल को ले कर पुलिस सरकारी अस्पताल जाती, जहां उस का इलाज करने के बजाए जेल भेज दिया जाता. घायल को जेल में सही इलाज नहीं मिलता, जिस से वह तड़पतड़प कर मर जाता है.

यहां हकीकत में भी ऐसा ही हुआ. पुलिस से ले कर जेल और अस्पताल तक के लोग विधायक कुलदीप सेंगर की धौंस के आगे नतमस्तक बने रहे.

जेल में जाने के दूसरे ही दिन घायल की मौत हो गई. मौत के बाद जागी सरकार के दबाव में पुलिस विभाग ने अपने कर्मचारियों को भले ही सस्पेंड कर दिया, पर जिला जेल और अस्पताल के लोगों को कोई सजा नहीं दी गई.

अपना दामन बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी है. विधायक के भाई अतुल सिंह सेंगर को मारपीट के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है.

मामला मीडिया द्वारा उछालने के बाद 12 अप्रैल, 2018 को विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और सहयोग देने वाली महिला राखी के खिलाफ भादंवि की धारा 363, 366, 376, 505 और पोक्सो एक्ट में मुकदमा लिखा गया. कविता के पिता की मौत के बाद पूरा मामला हाईवोल्टेज ड्रामा में बदल गया. हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया.

पूरे घटनाक्रम को देखें तो इस में विधायक की धौंस पता चलती है. रेप कांड की शिकार कविता ने जिस राखी नाम की महिला के साथ विधायक के घर जाने की बात कही थी, उस ने नया खुलासा करते हुए बताया कि यह कविता विधायक से पहले उस के बेटे पर भी रेप का आरोप लगा कर जेल भिजवा चुकी है. कविता के साथ रेप की सच्चाई जो भी हो, पर उस के पिता की पिटाई और मौत के मामले में विधायक और उन के करीबी लोगों के खिलाफ तमाम सबूत मिल रहे हैं.

कविता के पिता की जेल में मौत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई. विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी से ले कर कांग्रेस तक ने सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. खुद विधायक कुलदीप सेंगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने आए. मुख्यमंत्री ने विधायक से मुलाकात नहीं कर के विधायक को यह संदेश दिया कि वह पुलिस जांच में सहयोग करें.

सरकार की सख्ती के बाद कविता के पिता से मारपीट के आरोपी विधायक के भाई अतुल सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. कविता ने इस के बाद भी अपनी लड़ाई जारी रखी है. कविता का कहना है कि पूरे मामले में विधायक भी दोषी है, उन की भी गिरफ्तारी होनी चाहिए.

सरकारी अधिकारी पूरे मामले में विधायक की भूमिका की भी जांच कर रहे हैं. सरकार ने एसआईटी गठित कर दी है. एसआईटी की जांच टीम के अधिकारी राजीव कृष्ण ने माखी गांव जा कर पूरा मामला समझा और अपनी जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी. इस के आधार पर पुलिस के साथ ही जिला अस्पताल के डाक्टर के खिलाफ भी कड़ी काररवाई करने के संकेत दिए.

उत्तर प्रदेश सरकार ने सीबीआई को पूरे मामले की जांच सौंप दी है, जिस से उन्नाव कांड को ले कर हो रही राजनीति के प्रभाव को दबाया जा सके और सरकार की छवि भी बची रहे.

विधायक कुलदीप सेंगर ने खुद एसएसपी लखनऊ के सामने पेश हो कर अपनी सफाई दी. दूसरी तरफ विधायक की पत्नी संगीता सेंगर उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओ.पी. सिंह से मिलीं और उन्हें बताया कि पूरा मामला राजनीतिक षडयंत्र से प्रेरित है. ऐसे में कविता और उन के पति का नारको टेस्ट कराया जाए.

संगीता ने यह भी दावा किया कि उन के पति और कविता की कभी मुलाकात ही नहीं हुई. भारी दबाव के कारण आखिर सीबीआई को आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को गिरफ्तार करना पड़ा. सीबीआई ने 13 अप्रैल, 2018 रात 10 बजे विधायक को गिरफ्तार कर लिया. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट इस पूरे मामले की जांच की निगरानी करेगा.

चीफ जस्टिस डी.बी. भोसले की बेंच ने सीबीआई से 2 मई को जांच की स्टेटस रिपोर्ट मांगी है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि सीबीआई कानून के तहत सख्ती से जांच करे.

घटना के बाद से लड़की को ले कर तमाम तरह के औडियो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे, जिन से पता चलता है कि घटना के पीछे दुश्मनी की वजह को रख कर एक राजनीतिक रंग भी दिया जा रहा है. सत्ता में शामिल खुद भाजपा 2 खेमों में बंट गई है. इन वजहों से जांच का सही पक्ष सामने आना मुश्किल लग रहा है. ऐसे में अब कोर्ट के फैसले से ही सच का पता चल सकेगा. ?

बलात्कार कानून के मद्देनजर पीड़ित और उस के पक्ष की हर पहचान छिपाने के लिए नाम नहीं लिखा गया है और कविता व राखी परिवर्तित नाम हैं.

बढ़ती गई विषबेल : क्यों हुआ माधुरी का क़त्ल

26 जून, 2018 की बात है. दिन के करीब 11 बज रहे थे. जयसिंहपुर पुलिस थाने के असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ किसी मामले को ले कर बातचीत कर रहे थे, तभी 11 वर्षीय बच्चे के साथ सूर्यकांत शिंदे वहां पहुंचा. उसे देख कर निकम और शिंदे गायकवाड़ स्तब्ध रह गए. उस की घायलावस्था और कपड़ों पर लगा खून किसी बड़ी वारदात की तरफ इशारा कर रहा था.

दोनों पुलिस अधिकारी सूर्यकांत शिंदे को अच्छी तरह से जानते पहचानते थे. इस से पहले कि वे सूर्यकांत शिंदे से कुछ पूछते उस ने पुलिस अधिकारियों को जो बताया, उसे सुन कर वे चौंक गए.

मामला काफी गंभीर और सनसनीखेज था. असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ ने सूर्यकांत शिंदे को तुरंत अपनी हिरासत में ले कर उसे उपचार के लिए जिला अस्पताल भेज दिया. फिर मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी. इस के बाद वह बिना कोई देर किए पुलिस टीम ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

मामला एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था की महिला कार्यकर्ता की हत्या का था. इस से पहले कि घटनास्थल पर पुलिस टीम पहुंच पाती, हत्या की खबर जंगल की आग की तरह पूरे गांव और इलाके में फैल चुकी थी, जिस से घटनास्थल पर काफी भीड़ एकत्र हो गई थी.

असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम ने पहले मौके पर जा कर घटनास्थल का मुआयना किया. अभी वह लोगों से पूछताछ कर ही रहे थे कि खबर पा कर कोल्हापुर के एसएसपी कृष्णांत पिंगले भी वहां पहुंच गए. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी.

पुलिस अधिकारियों ने जब घटनास्थल का निरीक्षण किया तो वहां दिल दहला देने वाला मंजर मिला. किचन में एक महिला का शव पड़ा हुआ था. शव के चारों तरफ खून ही खून फैला था. घटनास्थल का दृश्य दिल दहला देने वाला था. मृतका के शरीर और सिर पर कई घाव थे, जो काफी गहरे और चौड़े थे. खून से सनी कुल्हाड़ी भी वहीं पड़ी थी. लग रहा था कि मृतका पर उसी कुल्हाड़ी से हमला किया गया था.

फोरैंसिक टीम का काम खत्म होने के बाद एसएसपी कृष्णांत पिंगले ने मामले की जांच असिस्टेंट इंसपेक्टर शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ को करने का निर्देश दिया. पुलिस ने खून सनी कुल्हाड़ी अपने कब्जे में ले ली और लाश पोस्टमार्टम के लिए स्थानीय अस्पताल भेज दी. पता चला मृतका का नाम माधुरी था. इस बीच सूचना पा कर उस के घर वाले भी आ गए थे.

यह घटना महाराष्ट्र के जिला कोल्हापुर के उदगांव में घटी थी. चूंकि आरोपी सूर्यकांत शिंदे ने घटना के बारे में पुलिस को पहले ही बता दिया था, इसलिए पुलिस ने उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. सूर्यकांत शिंदे ने अपने ऊपर हुए हमले और पत्नी की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी.

सूर्यकांत और माधुरी का मिलन

42 वर्षीय सूर्यकांत शिंदे के पिता महादेव शिंदे गांव के एक साधारण किसान थे. वह सीधेसादे और नेकदिल इंसान थे. गांव वालों की मदद के लिए वह अकसर तैयार रहते थे, इसी वजह से गांव वालों के बीच उन के प्रति आदर और सम्मान था.

परिवार में उन की पत्नी आनंदी बाई के अलावा एकलौता बेटा सूर्यकांत था. वह हाईस्कूल तक ही पढ़ सका था. ज्यादा पढ़ालिखा न होने की वजह से उसे ठीक सी नौकरी नहीं मिली तो वह सांगली के एक बिल्डर के यहां सुपरवाइजर का काम करने लगा.

माधुरी पाटिल और सूर्यकांत शिंदे की मुलाकात करीब 18 साल पहले सांगली की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर हुई थी. माधुरी अपने परिवार के साथ सांगली के बैरणबाजार में रहती थी. परिवार के मुखिया लक्ष्मण पाटिल का निधन हो चुका था. मां मंगला पाटिल पर 2 बेटियों की जिम्मेदारी थी. बड़ी बेटी सविता की शादी हो चुकी थी. माधुरी की जिम्मेदारी बाकी थी.

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. पूरा परिवार खाने के टिफिन तैयार कर अपना गुजारा किया करता था. सूर्यकांत शिंदे जब कंस्ट्रक्शन साइट पर गया तो उस के खाने का बंदोबस्त माधुरी के टिफिन बौक्स से हो गया था.

माधुरी देखने में सुंदर और चंचल स्वभाव की आधुनिक विचारों वाली युवती थी. शिंदे की तरह वह भी ज्यादा पढ़लिख नहीं पाई थी लेकिन जितनी भी पढ़ी थी, उस के लिए काफी था. वह इतनी होशियार थी कि किसी से भी बेझिझक बात करती थी. वह जिस से भी एक बार बातें कर लेती, वह उस की तरफ खिंचा चला आता था.

यही हाल सूर्यकांत शिंदे का भी हुआ. वह माधुरी की पहली झलक में ही उस का दीवाना हो गया था. वह जब भी माधुरी के घर पर खाना खाने जाता था, उस की नजर खाने पर कम माधुरी पर ज्यादा रहती थी. टिफिन की तारीफ तो वह करता ही था, साथसाथ उसे अच्छी टिप भी दिया करता था.
शुरू में तो 20 वर्षीय माधुरी को सूर्यकांत शिंदे के इरादों का आभास नहीं हुआ, लेकिन वह जल्द ही उस की आंखों की भाषा समझ गई. धीरेधीरे माधुरी भी उस की ओर आकर्षित होने लगी. उसे अपने सपने और अरमान सूर्यकांत शिंदे में ही पूरे होते दिख रहे थे.

माधुरी जल्दी ही मन ही मन सूर्यकांत शिंदे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगी. विचार मिले तो दोनों ने शादी का फैसला कर लिया. यह बात जब दोनों के परिवार वालों को पता चली तो उन्होंने दोनों की शादी पर कोई ऐतराज नहीं किया. जल्दी ही साधारण तरीके से दोनों की शादी हो गई.

शादी के बाद सूर्यकांत शिंदे माधुरी के साथ अपने गांव में रहने लगा. इसी बीच सूर्यकांत के पिता की मृत्यु हो गई तो घर की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर आ गई. वह बखूबी अपनी जिम्मेदारी निभाने लगा. प्राइवेट नौकरी होने की वजह से सूर्यकांत सप्ताह में एक दिन ही आ पाता था. एक रात रुक कर वह अगले दिन वापस सांगली चला जाता था. घर में सिर्फ सूर्यकांत की बूढ़ी मां और भाई ही रह जाते थे.

बिखरने लगे माधुरी के अरमान

ऐसी स्थिति में माधुरी को अपने सारे सपने और अरमान बिखरते नजर आ रहे थे. ऊपर से पुराने खयालों की सूर्यकांत की बूढ़ी मां को माधुरी का आधुनिक विचारों वाला आचरण पसंद नहीं था. जिसे ले कर घर में कलह और सासबहू में अकसर लड़ाईझगड़े होने लगे.

पहले तो सूर्यकांत शिंदे ने माधुरी को समझाया. लेकिन जब उस ने साफ कह दिया कि वह सास के साथ हरगिज नहीं रहेगी तो सूर्यकांत माधुरी को ले कर शिरोल तालुका के चिपरी गांव में किराए के मकान में रहने लगा.

समय अपनी गति से चल रहा था. माधुरी एक बेटी और एक बेटे की मां बन गई. पतिपत्नी ने दोनों बच्चों को अच्छी परवरिश दी. बेटी 12वीं में पढ़ रही थी तो बेटा कक्षा 2 में था.

बच्चे बड़े हुए तो घर के खर्चे भी बढ़ गए, जबकि आमदनी सीमित थी. इस सब के चलते माधुरी को अपने खुद के खर्चों में कटौती करने की नौबत आ गई. उसे अपने सपने धूमिल होते नजर आने लगे. फलस्वरूप इसे ले कर उस की पति से नोंकझोंक शुरू हो गई, जो रोजाना के झगड़े में बदलती चली गई.

नतीजा यह हुआ कि दोनों के रिश्तों में दरार आ गई, जिस की वजह से सूर्यकांत शिंदे को मजबूरन कंस्ट्रक्शन साइट की नौकरी छोड़नी पड़ी. माधुरी को किनारे कर के वह गांव में अपनी बूढ़ी मां के साथ रहने लगा. माधुरी ने सास के साथ रहने से मना कर दिया था, इसलिए वह बच्चों को ले कर अपने मायके चली गई थी.

घर तो चलाना ही था, लिहाजा सूर्यकांत ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली. अब वह पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता था, लिहाजा उस ने अदालत में पत्नी से तलाक लेने की अर्जी दाखिल कर दी, जिस का माधुरी ने विरोध किया.

उस के विरोध पर कोर्ट ने तलाक के मामले को कुछ दिनों के लिए पेंडिंग में रख कर सूर्यकांत शिंदे को आदेश दिया कि वह माधुरी को गुजारा और रहने के लिए आधा घर दे. अदालत के आदेश के बाद माधुरी दोनों बच्चों के साथ आ कर रहने लगी.

दोनों के बीच गहराती गईं दरारें

माधुरी और सूर्यकांत शिंदे के बीच आई दरारें तब और गहरी हो गईं, जब वह संतोष माने और प्रमोद पाटिल के संपर्क में आई और उन की सामाजिक संस्था भूमाता ब्रिगेड व शिवाजी छत्रपति से जुड़ गई. प्रमोद पाटिल इस संस्था का संस्थापक और संतोष माने सक्रिय कार्यकर्ता था. एक तरह से संतोष माने प्रमोद पाटिल का दायां हाथ था. इस संस्था की पूरे कोल्हापुर जिले में कई शाखाएं थीं, जिस में हजारों कार्यकर्ता थे.

यह संस्था गरीब, लाचार महिलाओं की सहायता करती थी. साथ ही तमाम तरह के कार्यक्रमों का आयोजन और प्रोत्साहन वाले काम भी करती थी. संतोष माने ने माधुरी को करीब लाने के लिए उस के दिल में समाजसेवा का बीज बो दिया था.

दरअसल, माधुरी सुंदर और स्मार्ट थी. संतोष माने ने जब उसे देखा तो वह उस का दीवाना हो गया था. 2 बच्चे होने के बाद भी उस के शरीर का कसाव वैसे का वैसा ही था. संतोष माने उस के गांव के पड़ोस में ही रहता था. वैसे उस का विवाह हो चुका था और उस के 2 बच्चे भी थे. फिर भी जब से उस ने माधुरी को देखा था, वह उसी के बारे में सोचता रहता था. बहाने से उस ने माधुरी के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया.

गांव का पड़ोसी और एक प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था का सदस्य होने के कारण माधुरी उस की इज्जत करती थी. माधुरी और संतोष माने के बीच की दूरियां कम हुईं तो वह माधुरी की रगों में सामाजिक कार्यक्रमों के रंग भरने लगा. पहले तो माधुरी ने इस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन संतोष के काफी जोर देने पर वह संस्था के सामाजिक कार्यों में शरीक होने के लिए तैयार हो गई.

संतोष माने ने माधुरी को संस्था के संस्थापक प्रमोद पाटिल से मिलवाया. प्रमोद पाटिल ने माधुरी की दिलचस्पी देख कर उसे संस्था का जिला उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया. संस्था के सामाजिक कार्यों का दायरा बड़ा होने के नाते अब उसे संस्था के हर छोटेबड़े कार्यक्रमों और मीटिंगों में जाना पड़ता था.
व्यस्तता की वजह से माधुरी का समय अपने बच्चों के साथ कम और बाहर अधिक बीतने लगा. यह बात सूर्यकांत शिंदे को अच्छी नहीं लगी. उस ने कई बार माधुरी को बच्चों के प्रति सचेत कर के समझाया. लेकिन उस ने पति की बातों पर ध्यान नहीं दिया. वह संतोष माने के साथ अधिक रहने लगी, जिस का नतीजा यह हुआ कि माधुरी अपनी सीमा लांघ गई.

जब यह बात धीरेधीरे गांव और गलियों में होते हुए सूर्यकांत के कानों तक पहुंची तो उस का खून खौल उठा. उस ने भले ही माधुरी को तलाक का नोटिस दिया था, लेकिन अभी तक तलाक हुआ नहीं था. वह अभी भी कानूनी और सामाजिक तौर पर उस की पत्नी थी.

पत्नी की वजह से उस की और उस के परिवार की समाज में बुराई हो, वह सहन नहीं कर सकता था. जिस की वजह से माधुरी और सूर्यकांत शिंदे के बीच अकसर लड़ाईझगड़ा, मारपीट होने लगी.

बनने लगी अपराध की भूमिका

मामला पुलिस थाने तक जाता था लेकिन पुलिस इसे एक पारिवारिक झगड़ा समझ कर कोई काररवाई नहीं करती थी. माधुरी को परेशान देख कर संतोष माने से रहा नहीं गया तो उस ने प्रमोद पाटिल से मशविरा कर के सूर्यकांत शिंदे को आड़े हाथों लिया.

उस ने शिंदे को चेतावनी दी कि अगर वह माधुरी और उस के बीच दीवार बनने की कोशिश करेगा तो प्रमोद पाटिल और वह उसे हमेशाहमेशा के लिए माधुरी के रास्ते से हटा देंगे. लेकिन हुआ इस का उलटा.
26 जून, 2018 को सूर्यकांत शिंदे जब माधुरी के घर के अंदर गया तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस ने किचन के दरवाजे के सुराख से अंदर देखा तो माधुरी और संतोष माने आपत्तिजनक स्थिति में थे.
यह देख कर उस के होश उड़ गए. वह अपने आप को रोक नहीं सका और उन्हें भद्दीभद्दी गालियां देते हुए दरवाजा जोरजोर से पीटने लगा. आवाज सुन कर सूर्यकांत शिंदे की बूढ़ी मां और अन्य लोग भी वहां आ गए.

इस के पहले कि लोग कुछ समझ पाते, किचन का दरवाजा खुला और हाथ में कुल्हाड़ी लिए संतोष माने किचन से बाहर निकला. आते ही उस ने सूर्यकांत शिंदे पर हमला बोल दिया. सूर्यकांत ने कुल्हाड़ी का पहला वार अपने हाथों पर झेल लिया.

दूसरा वार करने से पहले ही सूर्यकांत संभल गया और उस ने संतोष माने को जोर से धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया. जिस से उस के हाथों से कुल्हाड़ी छूट गई और वह सूर्यकांत शिंदे ने उठा ली.
अपने ऊपर हुए हमले के कारण सूर्यकांत शिंदे भी अपना आपा खो बैठा था. उस ने संतोष माने पर कुल्हाड़ी का वार कर दिया. इस से पहले कि कुल्हाड़ी माने को लगती माधुरी बीच में आ गई और कुल्हाड़ी का सीधा वार माधुरी के सिर पर हुआ. तभी संतोष माने यह कहते हुए वहां से भाग निकला कि प्रमोद पाटिल उसे छोड़ेगा नहीं.

संतोष माने तो वहां से निकल गया लेकिन माधुरी पति के गुस्से का शिकार बन गई. शिंदे ने उस पर कई वार किए. कुछ ही देर में माधुरी की मौत हो गई. इस के बाद सूर्यकांत शिंदे अपने बेटे शिवराज को साथ ले कर जयसिंहपुर थाने पहुंच गया और उस ने पुलिस को पूरी बात बता दी. पुलिस ने उस का इलाज कराकर उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

सूर्यकांत शिंदे से पूछताछ करने के बाद जांच अधिकारी शाहाजी निकम और समीर गायकवाड़ ने भूमाता ब्रिगेड व छत्रपति शिवाजी सामाजिक संस्था के संस्थापक प्रमोद पाटिल और संतोष को सूर्यकांत शिंदे के ऊपर जानलेवा हमला करने और धमकी देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

प्रमोद पाटिल और संतोष माने की गिरफ्तारी पर भूमाता ब्रिगेड और शिवाजी छत्रपति सामाजिक संस्था के कार्यकर्ताओं के बीच में हड़कंप मच गया. शिरोल तालुका की अध्यक्ष तृप्ति देसाई ने कार्यकर्ताओं के साथ प्रमोद पाटिल और संतोष माने की गिरफ्तारी का विरोध किया, लेकिन कानून सब के लिए बराबर होता है, चाहे कोई समाज सेवक हो या खास आदमी.

नोटिस का जवाब खून से : मैनेजर के पद ने ली जान – भाग 2

बीब्लंट की फाइनैंस मैनेजर और लीगल एडवाइजर थी कीर्ति

इस कंपनी में कीर्ति व्यास लगभग 5 साल पहले आई थी. उस ने अपनी मेहनत और जिम्मेदारी से कंपनी के सीईओ और एमडी का दिल कुछ महीनों में ही जीत लिया था. कंपनी में उस की नियुक्ति फाइनैंस मैनेजर के पद पर हुई थी, लेकिन थोड़े ही दिनों में उसे कंपनी का लीगल एडवाइजर भी बना दिया गया था. कीर्ति की मेहनत से कंपनी को काफी लाभ हुआ था और टर्नओवर भी बढ़ गया था.

कंपनी के काम के प्रति वह जिम्मेदार और पाबंद तो थी ही, साथ ही वह वहां के कर्मचारियों के प्रति भी सख्त थी. काम में किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही उसे जरा भी पसंद नहीं थी. कंपनी की लीगल एडवाइजर और फाइनैंस मैनेजर होने के नाते वह किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थी. कंपनी के भले के लिए वह हर उस शख्स के प्रति सख्त थी जो लापरवाह रहता था. वह यह नहीं देखती थी कि कोई सीनियर है या जूनियर.

कीर्ति व्यास को गायब हुए अब तक 24 घंटे से अधिक हो चुके थे, लेकिन उस की कोई खबर नहीं मिली थी. घर वालों के सामने अब सिर्फ पुलिस के पास जाने का रास्ता बचा था. लाचार और मजबूर हो कर कीर्ति के पिता राजेंद्र व्यास अपने नातेरिश्तेदारों और कंपनी के कुछ लोगों के साथ थाना डी.बी. मार्ग पहुंचे. उन्होंने थानाप्रभारी से मिल कर उन्हें सारी बातें बताईं. थानाप्रभारी ने उन की बातें सुनने के बाद कीर्ति के अपहरण का मामला दर्ज करवा दिया.

मामला एक हाईप्रोफाइल कंपनी की अधिकारी से जुड़ा हुआ था, इसलिए थानाप्रभारी किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने अपने अधिकारियों के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को मामले की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर मामले की जांच तेजी से शुरू कर दी.

पुलिस ने कीर्ति के घर से ले कर औफिस तक सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, कीर्ति के फोन की काल डिटेल्स हासिल कर उस की कंपनी के सभी कर्मचारियों के बयान लिए. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.

वह मामले को जितना सुलझाने की कोशिश कर रहे थे, उतना ही वह उलझता जा रहा था. जैसेजैसे समय बढ़ता जा रहा था, वैसेवैसे उन के वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव भी बढ़ता जा रहा था. पुलिस अपने तरीके से मामले की जांच तो कर ही रही थी, लेकिन कीर्ति के घर वाले भी उस की तलाश में गलियों और उपनगरों में कीर्ति के पोस्टर ले कर भटक रहे थे.

वह उपनगरों के अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों की खाक छान रहे थे. कीर्ति के हजारों पोस्टर छपवा कर मुंबई के गलीमोहल्लों के साथ सभी सार्वजनिक जगहों और वाहनों पर चिपकवा दिए गए. प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया का भी सहारा लिया गया. लेकिन आशा की कोई किरण नजर नहीं आई.

सूरज हर दिन निकलता था. रात हर रोज होती थी. मगर कीर्ति के घर वालों का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था.

घर वालों का धैर्य जवाब देने लगा

जैसेजैसे कीर्ति व्यास के मामले को ले कर समय निकलता जा रहा था, वैसेवैसे कीर्ति के परिवार वालों का सब्र टूटता जा रहा था. जब एक महीने से अधिक का समय हो गया तो उन का धैर्य टूट गया. स्थानीय पुलिस से उन का भरोसा उठ चुका था. वे अपने परिवार के साथ पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर से मुलाकात कर मामले को क्राइम ब्रांच को सौंपने का निवेदन किया.

पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर इस मामले पर पहले से ही नजर बनाए हुए थे, उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए जौइंट पुलिस कमिश्नर संजय सक्सेना और डीसीपी (क्राइम) दिलीप सावंत को मामले की जांच की जिम्मेदारी सौंप दी. क्राइम ब्रांच ने मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी. अब तक इस संबंध में फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर पर काफी कुछ कहासुना जा चुका था.

बीब्लंट की मालिक सीईओ अनुधा भवानी अख्तर और बीब्लंट कंपनी को जानने वाले लोगों ने ट्वीट कर के कीर्ति के विषय में जानकारी देने की अपील के साथसाथ पुलिस की जांच पर तमाम प्रश्नचिह्न खड़े किए थे. यह हाईप्रोफाइल केस एक तरह से क्राइम ब्रांच की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था.

क्राइम ब्रांच यूनिट-2 के सीनियर पीआई प्रशांत राजे ने सहायक पीआई अर्जुन जगदाले, एपीआई सचिन माने, संतोष कदम, हैडकांस्टेबल संजीव गुडेवार, हृदयनाथ मिश्रा, प्रशांत सिढमे, प्रमोद शिर्के और राजेश सोनावाले के साथ इस मामले की कडि़यों को जोड़ना शुरू किया.

उन्होंने अपनी जांच की शुरुआत उन्हीं सूत्रों से की, जिन पर स्थानीय पुलिस कर चुकी थी. उन्होंने कीर्ति के घर वालों के बयान और कीर्ति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स का बारीकी से अध्ययन किया तो जांच में कई खामियां नजर आईं.

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कीर्ति के घर वालों के बयान के अनुसार कीर्ति सुबह सवा 9 बजे की विरार लोकल ट्रेन से ग्रांट रोड से अंधेरी जाया करती थी. लेकिन घटना वाले दिन सुबह उसे लेने के लिए उस की इमारत के नीचे ब्राउन कलर की एक फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार आई थी, जिस के कांच पर काले रंग की फिल्म चढ़ी हुई थी. इस से अंदर बैठे लोग दिखाई नहीं दे रहे थे. यह कार कीर्ति की कंपनी की मैनेजर खुशी सेजवानी की थी.

लेकिन उन्होंने जांच टीम को जो बयान दिया था, वह विश्वसनीय नहीं था. उन्होंने कहा था कि वह उस दिन कंपनी के अकाउंटेंट सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ग्रांट रोड अपने एक व्यक्तिगत काम से आई हुई थी.

लौटते समय उन्होंने कीर्ति को यह सोच कर अपने साथ लिया कि वह भी उन के साथ औफिस चली चलेगी. उस के साथ रहने से रास्ते का टाइम भी पास हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

रोड जाम होने के कारण कीर्ति ने यह कह कर उन की कार छोड़ दी कि वह औफिस के लिए लेट हो जाएगी. जबकि सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में ऐसा कुछ नहीं था. उस समय रोड साफ था.

जांच में यह भी पता चला कि उस दिन कीर्ति का मोबाइल फोन वरली के भारतनगर में बंद हुआ था. जिस समय उस का फोन बंद हुआ, उसी समय खुशी सेजवानी और सिद्धेश तम्हाणकर के फोन की लोकेशन भी भारतनगर में पाई गई.

पुलिस को इस बात पर शक हो गया कि जब वह ट्रेन से गई थी तो उस का मोबाइल वरली में क्या कर रहा था. और उन दोनों का फोन उस के साथ क्यों था. इन सब सवालों के जवाब के लिए सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी को क्राइम ब्रांच के औफिस बुलाया गया. लेकिन वे पुलिस के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, जिस से पुलिस को उन पर शक हो गया.