डर के शिकंजे में : विनीता को क्यों देनी पड़ी जान – भाग 2

महाराष्ट्र की सामाजिक प्रथा के अनुसार लड़के वाले वर ढूंढने नहीं जाते, बल्कि वरपक्ष लड़की की तलाश करता है. ऐसे में जब वनिता के लिए ज्ञानेश्वर चव्हाण का रिश्ता आया तो वनिता के परिवार वालों ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था.

24 वर्षीय ज्ञानेश्वर चव्हाण सेना में था. उस की पोस्टिंग दिल्ली में थी. वह भी वनिता के गृह जनपद बीड़ का रहने वाला था. उस का परिवार संपन्न और संभ्रांत था. किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. ज्ञानेश्वर के पिता गांव के बड़े किसान थे.

सब कुछ तय होने के बाद वनिता के परिवार वालों ने अपने पुश्तैनी गांव पहुंच कर वनिता और ज्ञानेश्वर की सगाई कर जल्द ही शादी भी कर दी.

शादी के बाद जब ज्ञानेश्वर अपनी ड्यूटी पर लौटा तो वह कुछ दिनों के लिए पत्नी वनिता को भी अपने साथ ले गया. शुरुआती दौर का उन का दांपत्य जीवन काफी सुखमय रहा. जिस तरह ज्ञानेश्वर वनिता जैसी सुंदर पत्नी पा कर खुश था, उसी तरह वनिता भी ज्ञानेश्वर से शादी कर के खुद को भाग्यशाली समझ रही थी.

ज्ञानेश्वर सुबह अपनी ड्यूटी पर चला जाता था और वनिता अपने घर के कामों में व्यस्त हो जाती थी. देखतेदेखते 2-3 साल कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला. इस बीच वनिता एक बेटी और एक बेटे की मां बन गई.

समय अपनी गति से चल रहा था. दोनों बच्चे धीरेधीरे बड़े हो रहे थे. इस के पहले कि वे अपने बच्चों का दाखिला स्कूल में करवा पाते, अचानक ज्ञानेश्वर का ट्रांसफर हो गया. ज्ञानेश्वर के ट्रांसफर की वजह से वनिता को दिल्ली से मुंबई आना पड़ा.

वनिता मुंबई आ कर अपने भाई और मां के साथ रहने लगी थी. उस ने वहीं पास के एक अच्छे स्कूल में बच्चों का दाखिला करा दिया. समयसमय पर ज्ञानेश्वर वनिता और बच्चों से मिलने मुंबई आता रहता था.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. दोनों अपनी जिंदगी में खुश थे कि अचानक उन की जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया जिस ने वनिता और ज्ञानेश्वर के जीवन को तहसनहस कर दिया. वनिता की जिंदगी में रावसाहेब दुसिंग नाम के एक व्यक्ति की एंट्री हो गई. रावसाहेब से वनिता की मुलाकात सन 2010 में हुई थी.

45-46 साल का रावसाहेब दुसिंग आशिकमिजाज रंगीन तबीयत का आदमी था. वह अपनी पत्नी और 3 बच्चों के साथ मुंबई के सायन कोलीवाड़ा के प्रतीक्षानगर में रहता था. उस का पुरानी कारों को खरीदनेबेचने का कारोबार था. इस धंधे में उसे अच्छी कमाई होती थी.

अपराधी प्रवृत्ति के रावसाहेब दुसिंग का रहनसहन उस की सारी बुराइयों को दबा कर रखता था. वह ब्रांडेड कपड़ों के साथ हाथ में सोने का मोटा ब्रेसलेट, गले में वजनदार चेन पहने रहता था.

वनिता और रावसाहेब की मुलाकात वनिता की एक सहेली महानंदा के साथ राशन की दुकान पर हुई थी. उसी समय दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए थे. रावसाहेब तो वैसे भी आशिकमिजाज था. पहली मुलाकात में ही उस ने वनिता को अपने दिल में बसा लिया था, इसलिए उस ने नजदीकियां बढ़ाने के लिए वनिता से फोन पर बात करनी शुरू कर दी.

दोनों तरफ से बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो दायरा बढ़ता गया. फोन पर दोनों हंसीमजाक भी करने लगे.

एक दिन रावसाहेब ने उस से कहा, ‘‘वनिताजी, अगर आप को सेकेंडहैंड कार की जरूरत हो तो मुझे बता देना, मेरे पास बढि़या पुरानी कारें आती हैं. मैं आप को सस्ते दाम में दे दूंगा.’’

‘‘जी नहीं, मैं सेकेंडहैंड चीजों को यूज नहीं करती. मुझे नई चीजों में मजा आता है.’’ वनिता ने भी उसी के अंदाज में जवाब दिया.

वनिता की बातों के पीछे छिपे व्यंग्य को रावसाहेब अच्छी तरह समझ गया था. वह बोला, ‘‘अरे मैडम, एक बार सेकेंडहैंड को यूज कर के तो देखो. मैं वादा करता हूं कि आप नई चीजों को भूल जाओगी.’’

रावसाहेब की बात ने वनिता के मन को रोमांचित कर दिया. उस ने कहा, ‘‘अगर ऐसी बात है तो मैं उस का ट्रायल लूंगी. बोलो, कब आना है ट्रायल लेने.’’

‘‘जब आप चाहो,’’ रावसाहेब ने हंस कर कहा और मिलने की जगह भी बता दी.

तय समय के अनुसार रावसाहेब अपनी कार ले कर वनिता से मिला. वनिता के साथ कार से वह इधरउधर की सैर करता रहा. हंसीमजाक के साथ उन के 2-3 घंटे कब गुजर गए, पता नहीं चला. फिर वह वनिता को अपने एक दोस्त के खाली पड़े फ्लैट में ले कर गया.

फ्लैट के बैडरूम का माहौल देख कर वनिता को अपनी सुहागरात याद आ गई. वहां के माहौल में वह अपने आप को संभाल नहीं पाई. वैसे भी वह कई महीनों से पति के मिलन से दूर थी.

रावसाहेब तो वैसे ही मंझा हुआ खिलाड़ी था. वनिता उस से इतनी प्रभावित हो चुकी थी कि उस ने उस समय रावसाहेब की किसी बात को नहीं टाला. इस तरह उस दिन दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

उन के बीच एक बार जब मर्यादा की सीमा टूटी तो वह टूटती ही चली गई. इस के बाद तो जब भी मौका मिलता था, दोनों एकांत में मिल लेते थे.

पति ज्ञानेश्वर चव्हाण की अनुपस्थिति में वनिता और रावसाहेब के बीच यह खेल काफी दिनों तक चलता रहा. लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं. एक दिन किसी तरह ज्ञानेश्वर चव्हाण को यह जानकारी मिली तो उस ने रावसाहेब को आड़े हाथों लिया और उसे वनिता से दूर रहने की चेतावनी दी.

लेकिन रावसाहेब तो अपराधी प्रवृत्ति का था, इसलिए वह ज्ञानेश्वर की धमकी से नहीं डरा बल्कि ज्ञानेश्वर चव्हाण से उलझ बैठा.

जिस का नतीजा यह हुआ कि मामला थाने तक पहुंच गया. पुलिस ने दोनों को समझाया और चेतावनी दे कर छोड़ दिया.

इस के बाद भी उन का झगड़ा खत्म नहीं हुआ. कई बार लड़ाईझगड़ा होने के बाद भी रावसाहेब ने वनिता का पीछा नहीं छोड़ा, जबकि पति के समझाने के बाद वनिता ने प्रेमी से दूरी बना ली थी. वह उस से मिलना तो दूर फोन पर बात तक नहीं करती थी. पर रावसाहेब उसे छोड़ना नहीं चाहता था.

अफसाना एक दीपा का – भाग 2

दीपा ने किशोरावस्था में कदम रखा ही था कि उस के दीवाने भंवरों की तरह ज्ञान टेकरी और जेल रोड पर मंडराने लगे थे. खूबसूरत होने के साथसाथ दीपा अल्हड़ भी थे, इसलिए मांबाप और चिंतित रहने लगे थे. दीपा के 2 छोटे भाई भी घर में थे. लड़की मांबाप की इज्जत समझी जाती है. इस से पहले कि बेटी की वजह से मांबाप की इज्जत पर कोई आंच आए, मांबाप उस की शादी के लिए लड़का ढूंढने लगे.

अभी दीपा की उम्र महज 14 साल थी. मांबाप ने उस की शादी के लिए देवास जिले के गांव जलालखेड़ी में एक लड़का देख लिया, जिस का नाम राकेश वर्मा था. बात पक्की हो जाने पर उन्होंने राकेश वर्मा से दीपा की शादी कर दी. वह दीपा से 5 साल बड़ा था.

शादी के बाद राकेश की रातें गुलजार हो उठीं. वह दिनरात पत्नी के खिलते यौवन में डूबा रहता था. आमतौर पर भले ही शादी कम उम्र में हो जाए, फिर भी युवक जिम्मेदारी उठानी सीख जाते हैं. लेकिन राकेश के साथ उलटा हुआ. वह दिनरात बिस्तर पर पड़ा दीपा के जिस्म से खेला करता था.

शुरूशुरू में तो राकेश के घर वालों ने यह सोच कर कुछ नहीं कहा कि अभी बच्चा है, जब घरगृहस्थी के माने समझने लगेगा तो रास्ते पर आ जाएगा. लेकिन जब 5-6 साल गुजर गए और राकेश ने खुद कमानेखाने की कोई पहल नहीं की तो घर वाले उसे टोकने लगे.

सुधरने के बजाय राकेश और बिगड़ता चला गया और जल्द ही उसे शराब की लत लग गई. वह रोज शराब पीने लगा था. घर वालों ने उसे घर से तो नहीं निकाला लेकिन घर में ही रखते हुए उस का बहिष्कार सा कर दिया.

चारों तरफ से हैरानपरेशान राकेश अपनी नाकामी और निकम्मेपन की खीझ दीपा पर उतारने लगा. दीपा के जिस संगमरमरी जिस्म को सहलातेचूमते वह कभी थकता नहीं था, उस पर अब राकेश की पिटाई के निशान बनने लगे. दीपा भी कम हैरानपरेशान नहीं थी, पर उस के पास रोज की इस मारपिटाई से बचने का एक ही रास्ता था मायका, क्योंकि राकेश अब उस पर चरित्रहीनता का आरोप भी लगाने लगा था.

10 साल यानी 24 साल की उम्र तक दीपा पति के पास रही, फिर एक दिन अपने मायके आ गई. जिस से दीपा के मांबाप के सिर पर बोझ और बढ़ गया था. लेकिन थोड़ा सुकून उन्हें उस वक्त मिला, जब दीपा ने फ्रीगंज में साड़ी पर फाल लगाने और पीको करने की दुकान खोल ली.

दुकान चल निकली तो दीपा खुद के खर्चे उठाने लगी. पर जैसे ही लोगों को यह पता चला कि वह पति को छोड़ कर मायके में रह रही है तो फिर उस के दीवाने दुकान और घर के आसपास मंडराने लगे.

दिलीप बन गया पार्टटाइम पति

शुरुआत में उस ने कोशिश की कि वह किसी के चक्कर में न पड़े, लेकिन शरीर की मांग के आगे वह बेबस थी. कई लोगों ने प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष तरीके से उसे प्रपोज किया, लेकिन अब तक दीपा काफी सयानी और समझदार हो चुकी थी.

दीपा को एक ऐसे पुरुष की जरूरत थी, जो शारीरिक के साथसाथ भावनात्मक और आर्थिक सहारा और सुरक्षा भी दे सके. आसपास मंडराते लोगों को देख वह समझ जाती थी कि उन का मकसद क्या है.

इसी ऊहापोह में उलझी दीपा की मुलाकात एक दिन दिलीप शर्मा से हुई तो वह उसे हर तरह उपयुक्त लगा. शादीशुदा दिलीप दीपा की खूबसूरती और अदाओं पर मर मिटा था. उस की पत्नी गांव में रहती थी, इसलिए उज्जैन में किसी महिला से मिलनेजुलने पर उसे कोई अड़ंगा या पाबंदी नहीं थी.

दोनों की मेलमुलाकातें बड़े सधे ढंग से आगे बढ़ीं. दोनों ने एकदूसरे की जरूरतों को समझा और दोनों के बीच मौखिक अनुबंध यह हुआ कि दिलीप दीपा का पूरा खर्च उठाएगा, उसे अलग घर दिलाएगा और ज्यादा से ज्यादा वक्त भी देगा. एवज में दीपा उस के लिए हर तरह से समर्पित रहेगी.

दिलीप ने दीपा को किराए के मकान में शिफ्ट करा कर घरगृहस्थी का सारा सामान जुटा दिया और पार्टटाइम पति की हैसियत से रहने भी लगा. दिलीप के पास पैसों की कमी नहीं थी. वह उन लोगों में से था, जो एक पत्नी गांव में और एक शहर में रखना अफोर्ड कर सकते हैं. दीपा के साथ दूसरा फायदा उसे यह था कि उस से उस की पारिवारिक और सामाजिक जिंदगी और प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आ रही थी.

लिवइन के ये 8 साल अच्छे से कटे, लेकिन जैसा कि आमतौर पर ऐसे मामलों में होता है, इन दोनों के साथ भी हुआ. दिलीप का दिल दीपा से भरने लगा तो उस ने उस के पास आनाजाना कम कर दिया. पर अपने इस वादे पर वह कायम रहा कि जिंदगी भर दीपा का खर्च उठाएगा.

दीपा समझ रही थी कि प्रेमी का मन उस से भर चला है लेकिन अभी पूरी तरह उचटा नहीं है. पर दिक्क्त यह थी कि 14 साल की उम्र से ही सैक्स की आदी हो जाने के कारण वह अकसर रोजाना ही सैक्स चाहती थी, जो दिलीप के लिए संभव नहीं था.

इसी साल जनवरी में दिलीप ने उसे माधवनगर इलाके के वल्लभनगर में किराए के मकान में शिफ्ट कर दिया. मकान मालिक लक्ष्मणदास पमनानी को उस ने यही बताया कि दीपा उस की पत्नी है और वह खेतीबाड़ी के सिलसिले में गांव जाता रहता है. पर पड़ोसियों का माथा उस वक्त ठनका, जब कई अंजान युवक दीपा के पास दिलीप की गैरमौजूदगी में आनेजाने लगे. आजकल बिना वजह कोई किसी के फटे में टांग नहीं अड़ाना चाहता, इसलिए लोगों ने दीपा से कहा कुछ नहीं, बस देखते रहते.

दिलीप को इस बात की भनक थी, इसलिए उस ने दीपा को समझाया कि वह फालतू लोगों का अपने यहां आनाजाना बंद करे. लेकिन दीपा नहीं मानी. दिलीप ने भी उस से कोई जबरदस्ती नहीं की. दिलीप को अब दीपा से ज्यादा अपनी इज्जत की चिंता होने लगी थी.

ये सारी बातें जब धर्मेंद्र को पता चलीं तो वह बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं तिलमिलाया. दिलीप दीपा का पति नहीं है, यह जान कर उसे खुशी ही हुई. हैरतअंगेज तरीके से जल्द ही धर्मेंद्र और दिलीप में दोस्ती हो गई और दोनों दीपा के साथ बैठ कर दारूचिकन की दावत उड़ाने लगे.

अब दीपा 2 आशिकों की हो गई थी, जो उसे ले कर बजाय आपस में झगड़ने के उसे साझा कर रहे थे. पर वह यह नहीं समझ पा रही थी कि दोनों उस के शरीर और जवानी को भोग रहे हैं. दोनों में से कोई उसे प्यार नहीं करता. धर्मेंद्र और दिलीप को सहूलियत यह थी कि दीपा अब किसी एक पर भार नहीं थी.

प्यार में धोखा न सह सकी पूजा – भाग 2

आरोपियों की निशानदेही पर शव बरामद

पुलिस ने हत्यारोपी की निशानदेही पर कार, लोहे की रौड और सुहेल की बाइक भी बरामद कर ली थी. सुहेल की हत्या कर शव मुरादाबाद के थाना क्षेत्र छजलैट से बरामद किया गया था. उसी कारण उस के शव का पोस्टमार्टम भी मुरादाबाद में ही किया गया था. पोस्टमार्टम के बाद उस का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया.

पुलिस ने दिनरात एक करते हुए इस मर्डर केस का खुलासा किया तो लोग खुलासे पर भी सवाल उठाने लगे थे. इस खुलासे को ले कर लोगों को मत था कि इस मर्डर में 2 नहीं बल्कि कई लोग मौजूद रहे होंगे.

इसी बात को ले कर सुहेल के घर वालों ने कोतवाली के सामने ही धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिया था. उन लोगों की मांग थी कि इस मामले में लिप्त अन्य लोगों को भी शीघ्र गिरफ्तार किया जाए.

धरनाप्रदर्शन को देखते हुए माहौल खराब होने की आशंका के चलते आसपास के थानों और चौकियों से पुलिस फोर्स बुला ली गई. इस दौरान एसपी (क्राइम) डा. जगदीश चंद्र, एसपी (सिटी) हरवंश सिंह व सीओ बलजीत सिंह भी कोतवाली में मौजूद रहे. इस केस के खुलासे के बाद आरोपी भरत आर्या को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

भरत आर्या को जेल भेजने के बाद पुलिस इस अपराध में शामिल दिनेश टम्टा की खोज में लग गई. वह भी जल्द ही गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में उस ने अपना अपराध स्वीकारते हुए बताया कि इस मामले में गांव चोरपानी निवासी योगेश बिष्ट उर्फ यूवी बिष्ट व मनोज सिंह उर्फ मुन्नू नेपाली भी शामिल थे.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने तीसरे आरोपी योगेश बिष्ट को भी गिरफ्तार कर लिया. जबकि चौथा आरोपी मुन्नू नेपाली घर से फरार हो गया था.

सुहेल की दुकान पर भरत करता था काम

जिंदगी में कभीकभी ऐसा चक्रव्यूह भी बन जाता है जिस में घिर कर इंसान को अपनी जिंदगी भी दांव पर लगाने पर मजबूर होना पड़ता है. यह कहानी भी एक मजदूर से फौजी बनने तक की ऐसी ही कहानी है. जिस अपराध के कारण उस का जीवन संकट में फंस गया.

उत्तराखंड के जिला नैनीताल के कस्बा रामनगर के चोरपानी बुद्ध विहार कालोनी में हरीश राम अपने परिवार के साथ रहते हैं. वह पेशे से लुहार हैं. हरीश राम के 5 बच्चों में 2 बेटियां और 3 बेटे थे. हरीश राम जैसेतैसे लुहार का काम कर के अपने बच्चों का पालनपोषण कर पाते थे.

बच्चे कुछ समझदार हुए तो बाप के काम में हाथ बंटाने लगे थे. जीतोड़ मेहनत करने के बाद हरीश राम ने सब से बड़े बेटे और उस के बाद एक बेटी की शादी कर दी. 2 बच्चों की शादी के बाद तीसरे नंबर की बेटी पूजा और भरत आर्या का नंबर था. पूजा और भरत आर्या ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी. इस के बाद हरीश राम ने पूजा की पढ़ाई छुड़ा दी थी.

भरत आर्या का शुरू से ही फौजी बनने का सपना था. लेकिन उस नौकरी के लिए उस की गरीबी आड़े आ रही थी. जिसे पूरा करने के लिए उसे काफी मेहनत की जरूरत थी.

हरीश राम की दुकान के पास ही सुहेल सिद्दीकी ने काफी समय पहले स्टेशनरी की दुकान खोल रखी थी. सुहेल का परिवार रामनगर शहर में ही रहता था. वह 5 भाइयों में तीसरे नंबर का था.

हरीश राम के पास इतना काम नहीं था कि वह अपने सभी बच्चों को दुकान पर रख सकें. घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए भरत आर्या ने सुहेल की दुकान पर काम कर लिया था. साथ ही उस ने आर्मी में जाने के लिए तैयारी भी करनी शुरू कर दी थी.

पूजा की सुहेल से बढ़ गईं नजदीकियां

भरत आर्या का घर दुकान से कुछ दूर था, इसलिए पूजा ही भरत और पिता का खाना पहुंचाती थी. पूजा देखनेभालने में खूबसूरत और पढ़ीलिखी थी. वह जब कभी खाना ले कर आती तो सुहेल की दुकान पर काम में उस का हाथ बंटाने लगती थी.

सुहेल उस वक्त कुंवारा था. जब कभी पूजा उस की दुकान पर आती तो उस की नजरें उसी पर गड़ी रहती थीं. लेकिन पूजा ने उसे कभी भी ऐसी नजरों से नहीं देखा था.

लेकिन सच्चाई तो यह है कि लोहे को लोहे से घिसते रहो तो एक दिन ऐसा भी

आता है कि लोहे में भी निशान बन जाता है. सुहेल ने पूजा को चाहत भरी निगाहों से देखना शुरू किया तो वह उस की मंशा समझ गई.

पूजा एक पढ़ीलिखी और समझदार थी. वह यह भी जानती थी कि सुहेल मुसलमान है. लेकिन जब किसी के प्रति चाहत का बीज अंकुरित हो जाता है तो उसे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. यही पूजा के साथ हुआ.

पूजा उस वक्त नाबालिग थी. लेकिन सुहेल के प्यार की भावनावों में बह कर उस ने कांटों भरा रास्ता चुन लिया था. उसी वक्त भरत आर्या ने आर्मी की तैयारी करने के लिए सुहेल की दुकान का काम छोड़ दिया. फिर उस की जगह पर पूजा ही काम करने लगी थी. भरत आर्या के दुकान से हटते ही सुहेल की तो जैसे चांदी कट गई. अपने भाई के हटते ही पूजा भी टेंशन फ्री हो गई थी.

सुहेल ने मौके का फायदा उठाते हुए पूजा को पूरी तरह से अपने मोहपाश में फांस लिया था. दोनों के बीच प्यार का बीज अंकुरित होते ही प्यार की बेल भी हरीभरी होने लगी थी. पूजा गरीब घर से थी, जबकि सुहेल खातेपीते परिवार से. यही कारण रहा कि पूजा सुहेल के पीछे पागल हो गई थी. सुहेल ने पूजा के साथ शादी करने का वादा करते हुए उसे हसीन सपने दिखाए तो उस ने भी उस के साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं.

सुहेल ने जीवन भर साथ निभाने का किया था वायदा

भावनाओं की नींव पर जमे प्यार के रिश्तों की डोर जितनी मजबूत होती है, उस से कहीं ज्यादा कच्चे धागे की भांति कमजोर भी. यही कारण था कि पूजा ने सुहेल पर पूरा विश्वास किया और उस के साथ जीवन बिताने के लिए वह अपने परिवार से भी टकराने को तैयार हो गई थी. पूजा के घर वालों ने सुहेल के प्रति उस की दीवानगी देखी तो उसे समझाने की कोशिश की.

पूजा का भाई भरत आर्या ही सब से ज्यादा उस के संपर्क में था. क्योंकि उसे पूजा से बहुत प्यार था. कई बार उस ने अपने परिवार की इज्जत को देखते हुए उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन उस के समझाने का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ. सुहेल के प्रति बढ़ी प्यार की दीवानगी के सामने भाई के प्यार की नसीहत भी काट खाने को दौड़ने लगी थी.

सुहेल ने पूजा पर जादू ही ऐसा कर रखा था कि उस वक्त उसे उस के अलावा कोई नजर नहीं आता था. जब उसे लगने लगा कि पूजा पूरी तरह से उस के प्यार के जाल में फंस चुकी है तब वह अपनी हकीकत पर उतर आया.

एक दिन सुहेल ने पूजा को साथ लिया और एक होटल में पहुंच गया. पूजा ने सोचा कि शायद वह नाश्तापानी करने जा रहा होगा. होटल जा कर उसे पता चला कि उस ने पहले से ही वहां पर एक रूम बुक करा रखा है.

रूम में पहुंचते ही पूजा ने उस से सवाल किया, ‘‘सुहेल, यह क्या? आप मुझे होटल में किस लिए लाए हो?’’

‘‘पूजा, क्या तुम्हें अभी भी मुझ पर विश्वास नहीं? हम दोनों ने एक साथ मिल कर साथ जीनेमरने की कसमें खाई हैं तो फिर तुम परेशान क्यों हो? हम दोनों को अब कोई भी जुदा नहीं कर सकता. फिर हमें एकांत में मिलने से एतराज क्यों? हम थोड़ा नाश्तापानी कर के होटल छोड़ कर चले जाएंगे.’’

अफसाना एक दीपा का – भाग 1

34 वर्षीय दीपा वर्मा का भरापूरा गदराया बदन किसी भी मर्द की नीयत बिगाड़ने के लिए काफी था. वजह यह कि दीपा की आंखों में पुरुषों के लिए एक आमंत्रण सा होता था. जो पुरुष इस आमंत्रण को समझ स्वीकार कर लेता था, वह फिर उस के हुस्न और अदाओं से खुद को आजाद नहीं कर पाता था.

ऐसा ही कुछ उस से उम्र में 8-10 साल छोटे धर्मेंद्र गहलोत के साथ हुआ था. धर्मेंद्र प्रसिद्ध धर्मनगरी उज्जैन के देवास रोड पर अपनी पत्नी के साथ रहता था. पेशे से मांस व्यापारी इस युवक की जिंदगी सुकून से गुजर रही थी. अब से कोई 3 साल पहले वह दीपा से मिला था तो पहली नजर में ही उस पर फिदा हो गया था.

दीपा को देख कर धर्मेंद्र को यह तो समझ आ गया था कि वह शादीशुदा है. उसके गले में लटका मंगलसूत्र और मांग का सिंदूर उस के शादीशुदा होने की गवाही दे रहे थे.

उज्जैन का फ्रीगंज इलाका रिहायशी भी है और व्यावसायिक भी, इसलिए जो भी पहली दफा उज्जैन जाता है वह महाकाल और दूसरे मंदिरों के नामों के साथसाथ फ्रीगंज नाम के मोहल्ले से भी वाकिफ हो जाता है. शहर के लगभग बीचोंबीच बसे इस इलाके की रौनक देखते ही बनती है.

इसी इलाके में दीपा की साडि़यों पर फाल लगाने और पीको करने की छोटी सी दुकान थी, जिस से उसे ठीकठाक आमदनी हो जाती थी. करीब 3 साल पहले एक दिन धर्मेंद्र की पत्नी दीपा को अपनी साड़ी में फाल लगाने और पीको करने के लिए दे आई थी. उसे वहां से साड़ी लाने का टाइम नहीं मिल पा रहा था, इसलिए उस ने साड़ी लाने के लिए अपने पति धर्मेंद्र को भेज दिया. जब धर्मेंद्र दीपा की दुकान पर पहुंचा तो बेइंतहा खूबसूरत दीपा को देखता ही रह गया.

दीपा में कुछ बात तो थी, जो उसे देख धर्मेंद्र का दिल जोर से धड़कने लगा था. सामान्यत: बातचीत के बाद साड़ी ले कर जब उस ने दीपा को पैसे दिए तो उस की हथेली एक खास अंदाज में दबाने से वह खुद को रोक नहीं पाया.

धर्मेंद्र ने उस की हथेली दबा तो दी थी, लेकिन उसे इस बात का डर भी था कि कहीं दीपा इस बात का बुरा मान कर उसे झिड़क न दे.

दीपा ने इस हरकत पर कोई ऐतराज तो नहीं जताया बल्कि हंसते हुए यह जरूर कह दिया, ‘‘बड़े हिम्मत वाले हो जो पहली ही मुलाकात में हाथ दबा दिया.’’

इस जवाब से धर्मेंद्र का डर तो दूर हो गया पर दीपा के इस अप्रत्याशित जवाब से वह झेंप सा गया था. उसे यह समझ आ गया था कि अगर थोड़ी सी कोशिश की जाए तो यह खूबसूरत महिला जल्द ही उस के पहलू में आ जाएगी. कहने भर की बात है कि औरतें पहली नजर में मर्द की नीयत ताड़ जाती हैं पर यहां उलटा हुआ था. पहली ही नजर में धर्मेंद्र दीपा की नीयत ताड़ गया था.

धर्मेंद्र आया दीपा की जिंदगी में

दुकान से जातेजाते उस ने दीपा का मोबाइल नंबर ले लिया और उसे भी अपना नंबर दे दिया था. दीपा के हुस्न में खोए धर्मेंद्र को इस वक्त यह समझाने वाला कोई नहीं था कि वह कितनी बड़ी आफत को न्यौता दे रहा है. यही बात दीपा पर भी लागू हो रही थी, जो धर्मेंद्र के आकर्षक चेहरे और गठीले कसरती बदन पर मर मिटी थी.

जल्द ही दोनों के बीच मोबाइल पर लंबीलंबी बातें होने लगीं. ये बातें निहायत ही रोमांटिक होती थीं. जिस में यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किस को बहका और उकसा रहा है. दोनों शादीशुदा और खेलेखाए थे, इसलिए जल्द ही एकदूसरे से इतने खुल गए कि मिलने के लिए बेचैन रहने लगे.

सैक्सी बातें करतेकरते दोनों का सब्र जवाब देने लगा था. लेकिन पहल कौन करे, इस पर दोनों ही संकोच कर रहे थे. धर्मेंद्र ने पहल नहीं की तो एक दिन दीपा ने ही उसे फोन पर आमंत्रण भरा ताना मारा, ‘‘फोन पर ही सब कुछ करते रहोगे या फिर कभी मिलोगे भी.’’

बात अंधा क्या चाहे दो आंखें वाली थी. सो धर्मेंद्र ने मौका न गंवाते हुए कहा, ‘‘आ जाओ, आज ही मिलते हैं महाकाल मंदिर के पास.’’

इस मासूमियत पर दीपा जोर से हंस कर बोली, ‘‘मंदिर में क्या मुझ से भजन करवाना है. एक काम करो, तुम मेरे घर आ जाओ.’’ दीपा ने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि उसे अपने घर का पता भी दे दिया.

अब कहनेसुनने और सोचने को कुछ नहीं बचा था. धर्मेंद्र के तो मानो पर उग आए थे. वह बिना वक्त गंवाए दीपा के घर पहुंच गया, जहां वह सजसंवर कर उस का इंतजार कर रही थी. दरवाजा खुलते ही उस ने दीपा को देखा तो अपने होश खो बैठा. एक निहायत खूबसूरत महिला उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थी. वह भी बगैर किसी मांग या खुदगर्जी के. यह खयाल ही धर्मेंद्र को और मर्द बनाए दे रहा था.

दरवाजा बंद होते ही दोनों एकदूसरे से कुछ इस तरह लिपटे कि लंबे वक्त तक अलग नहीं हुए और जब अलग हुए तो एक अलग दुनिया में थे, जहां भलाबुरा, नैतिकअनैतिक, जायजनाजायज कुछ नहीं होता. होती है तो बस एक जरूरत जो रहरह कर सिर उठाती है.

चोरीछिपे बनाए गए नाजायज संबंधों का लुत्फ ही कुछ अलग होता है, यह बात दीपा और धर्मेंद्र की हालत देख कर समझी जा सकती थी. जब भी दीपा का मन होता, वह धर्मेंद्र को फोन कर के बुला लेती थी.

कुछ महीनों बाद धर्मेंद्र ने दीपा की निजी जिंदगी में भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. उसे हैरानी इस बात की थी कि कोई शादीशुदा औरत कैसे अपने पति के होते हुए उस की आंखों में धूल झोंक कर संबंध बना लेती है. इस दौरान धर्मेंद्र ने दीपा पर काफी पैसा लुटाया था.

दीपा का झूठ आया सामने

अपनी निजी जिंदगी से ताल्लुक रखते सवालों पर दीपा ज्यादा दिन खामोश नहीं रह पाई और उस ने आधी सच्ची और आधी झूठी कहानी धर्मेंद्र को यह बताई कि उस के पति का नाम दिलीप शर्मा है, जो नजदीक के गांव में खेती करते हैं और कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं. जाने क्यों धर्मेंद्र को दीपा झूठ बोलती लगी. अब उस के सामने दिक्कत यह थी कि वह अपनी मरजी या जरूरत के मुताबिक दीपा के पास नहीं जा सकता था क्योंकि उस का पति दिलीप कभी भी आ सकता था.

दीपा का बोला हुआ जो झूठ धर्मेंद्र के दिलोदिमाग में खटक रहा था, वह जल्द ही सामने आ गया. पता चला कि दिलीप शर्मा उस का असली पति नहीं है, बल्कि वह दिलीप की रखैल है, जिसे आजकल की भाषा में लिवइन कहा जाता है. यह खुलासा धर्मेंद्र के लिए एक तरह का झटका ही था, लेकिन जल्द ही इस का भी तोड़ निकल आया.

इस दिलचस्प तोड़ या समाधान को समझने के पहले दीपा की गुजरी जिंदगी जानना जरूरी है, जिसे देख कर कहा जा सकता है कि वह एक बदकिस्मत औरत थी. हालांकि इस बदकिस्मती की एक हद तक जिम्मेदार भी वही खुद थी.

उज्जैन के मशहूर काल भैरव मंदिर से हर कोई वाकिफ है क्योंकि वहां शराब का प्रसाद चढ़ता है. काल भैरव जाने वाला एक रास्ता जेल रोड कहलाता है, जहां जेल बनी हुई है. जेल अफसर भी यहां बनी कालोनी में रहते हैं. दीपा इसी जेल रोड की ज्ञान टेकरी के एक मामूली से परिवार में पैदा हुई थी.

कुदरत ने दीपा पर मेहरबान होते हुए उसे गजब की खूबसूरती बख्शी थी. उसे एक ऐसा रंगरूप मिला था, जिसे पाने के लिए तमाम महिलाएं तरसती हैं.

डर के शिकंजे में : विनीता को क्यों देनी पड़ी जान – भाग 1

4जून, 2019 की बात है. उस समय सुबह के यही कोई 10 बजे थे. नवी मुंबई के उपनगर पनवेल के इलाके में सुकापुर-मेथर्न रोड पर स्थित वीरपार्क होटल के मैनेजर गणेशबाबू अपने केबिन में बैठे थे. तभी होटल के एक वेटर ने आ कर उन से जो कहा, उसे सुन कर वह चौंक उठे.

वेटर ने उन्हें बताया कि कमरा नंबर 104 के कस्टमर ने दरवाजा अंदर से बंद कर रखा है. वह दरवाजा नहीं खोल रहा, जबकि उस ने कई बार दरवाजा भी खटखटाया और आवाजें भी दीं.

कमरे के अंदर कस्टमर था और वह दरवाजा नहीं खोल रहा था, यह बात चौंकाने वाली थी. तभी मैनेजर को याद आया कि कमरा नंबर-104 के कस्टमर को तो अब तक चैकआउट कर देना चाहिए था. क्योंकि उस ने कमरा सिर्फ 12 घंटे के लिए बुक किया था. फिर ऐसा क्या हुआ कि उस ने न तो कमरा खाली किया और न ही कोई सूचना दी.

मैनेजर ने कमरे के इंटरकौम पर उस कस्टमर से संपर्क करने की कोशिश की. लेकिन कई बार कोशिश करने के बाद भी जब कस्टमर ने कमरे में रखा इंटरकौम नहीं उठाया तो वह परेशान हो गए और स्वयं उस वेटर को ले कर कमरा नंबर 104 के सामने जा पहुंचे. उन्होंने कई बार कमरे की घंटी बजाई. साथ ही आवाज दे कर भी कमरे के अंदर ठहरे कस्टमर की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

आखिरकार उन्होंने कमरे की मास्टर चाबी मंगा कर कमरे का दरवाजा खोला. लेकिन कमरे के अंदर का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. कमरे में 2 लाशें थीं, उन में एक शव महिला का था जो बिस्तर पर था और दूसरा पुरुष का, जो पंखे से झूल रहा था.

मामला संगीन था, अत: उन्होंने बिना देर किए इस की जानकारी खांडेश्वर पुलिस थाने के प्रभारी नागेश मोरे को दे दी. मामला 2 लोगों की मौत का था, इसलिए थानाप्रभारी ने मामले की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी और इंसपेक्टर संदीप माने, वैभव लोटे और सहायक महिला पुलिस इंसपेक्टर सुप्रिया फड़तरे को साथ ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए.

जब तक पुलिस होटल वीरपार्क पहुंची तब तक होटल के कर्मचारी और वहां ठहरे कस्टमर कमरे के बाहर जमा हो चुके थे. होटल के मैनेजर गणेशबाबू ने थानाप्रभारी को बताया कि यह जोड़ा शाम के करीब 8 बजे आया था और सुबह 8 बजे तक उन्हें कमरा खाली कर देना था, मगर ऐसा नहीं हुआ. 2 घंटे और निकल जाने के बाद जब होटल के वेटर ने दरवाजा खटखटाया तो कोई जवाब नहीं मिला. मास्टर चाबी से दरवाजा खोला तो दोनों इसी अवस्था में मिले.

इस के बाद पुलिस कमरे के अंदर गई. पूरे कमरे का सरसरी तौर पर निरीक्षण किया. पुलिस ने मृत व्यक्ति के शव को पंखे से नीचे उतारा. पहले तो उन्हें लगा कि दोनों ने ही आत्महत्या की होगी, लेकिन जब दोनों शवों की बारीकी से जांच की तो मामले की हकीकत कुछ और ही निकली.

दोनों लाशें हत्या और आत्महत्या की तरफ इशारा कर रही थीं. महिला की उम्र यही कोई 30-32 साल के आसपास थी, जबकि पुरुष की उम्र 45-50 के करीब थी. महिला का चेहरा झुलसा हुआ था और गले पर निशान था.

होटल का रजिस्टर चैक करने पर पता चला कि महिला का नाम वनिता चव्हाण और पुरुष का नाम रावसाहेब दुसिंग था. आमतौर पर ऐसे लोग अपना नामपता सही नहीं लिखवाते, लेकिन होटल के मैनेजर ने बताया कि उन की आईडी में भी यही नाम है.

इस के बाद पुलिस ने आईडी ले कर उन के परिवार वालों को मामले की जानकारी दे दी.

उसी दौरान नवी मुंबई के डीसीपी अशोक दुधे और एसीपी रवि गिड्डे भी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन के साथ क्राइम ब्रांच और फोरैंसिक टीम भी थी. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल पर सबूत जुटाने शुरू कर दिए. टीम का काम खत्म होने के बाद पुलिस ने घटनास्थल की बारीकी से जांच की.

कमरे में नायलौन की रस्सी के अलावा 2 बोतल पैट्रोल और एक लीटर किसी कैमिकल का खाली डब्बा मिला.

रावसाहेब ने नायलौन की रस्सी में पंखे से लटक कर आत्महत्या की थी. जबकि कैमिकल का उपयोग वनिता का चेहरा झुलसाने में किया गया था. लेकिन ये लोग पैट्रोल क्यों ले कर आए थे, यह पता नहीं चला. पुलिस यही मान रही थी कि रावसाहेब शायद अपनी साथी महिला की हत्या कर सबूत नष्ट करना चाहता होगा, लेकिन उसे इस का मौका नहीं मिला था.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद दोनों शव पोस्टमार्टम के लिए पनवेल के रूरल अस्पताल भेज दिए. अब तक इस मामले की खबर मृतकों के परिवार वालों को मिल चुकी थी. वे रोतेबिखलते खांडेश्वर थाने पहुंच गए.

थानाप्रभारी ने अस्पताल ले जा कर दोनों शव दिखाए तो उन्होंने उन की शिनाख्त कर ली. बाद में पोस्टमार्टम होने पर शव घर वालों को सौंप दिए गए.

दोनों मृतकों के परिजनों से की गई पूछताछ और जांच के बाद मामले की जो कहानी सामने आई, उस का सार कुछ इस प्रकार था—

वनिता चव्हाण सुंदर व महत्त्वाकांक्षी महिला थी. उस का पुश्तैनी घर महाराष्ट्र के जनपद बीड़ के एक छोटे से गांव में था. मगर उस का परिवार रोजीरोटी की तलाश में मुंबई के उपनगर चैंबूर वाशी में आ कर बस गया था.

वनिता का बचपन मुंबई के खुशनुमा माहौल में बीता था. उस की शिक्षादीक्षा सब मुंबई में ही हुई थी. उस के पिता की मृत्यु हो गई थी. घर में बड़ा भाई और मां थी. घर की पूरी जिम्मेदारी उस के बड़े भाई के कंधों पर थी. इसीलिए भाई ने सोचा कि वह पहले बहन वनिता की शादी करेगा. उस के बाद अपने विषय में सोचेगा.

प्यार में धोखा न सह सकी पूजा – भाग 1

2अगस्त, 2022 को हर रोज की तरह सुहेल सिद्दीकी ने रात के 9 बजे अपनी दुकान बढ़ाई और घर के लिए निकल पड़ा. वह रोज दुकान से मात्र 20 मिनट में घर पहुंच जाता था, लेकिन उस दिन उसे घर पहुंचने में काफी देर हो गई तो उस के घर वालों ने उस के फोन पर काल की. लेकिन उस का मोबाइल बंद आ रहा था.

मोबाइल फोन बंद आने से उस के घर वाले परेशान हो उठे. उन की परेशानी का कारण था कि सुहेल ने दुकान बंद करते समयघर फोन कर बता दिया था कि वह घर के लिए निकल रहा है.

जब काफी देर इंतजार करने के बाद भी सुहेल घर नहीं पहुंचा तो उस के 2 छोटे भाई बाइक से उस की तलाश में निकल पड़े. लेकिन घर से दुकान तक वह उन्हें कहीं भी नहीं दिखा.

रात काफी हो चुकी थी. उस का मोबाइल भी बंद आ रहा था. मन में तरहतरह के सवाल उठे तो दोनों भाई सीधे रामनगर कोतवाली जा पहुंचे. कोतवाली पहुंच कर उन्होंने कोतवाल अरुण सैनी को भाई के गायब होने की सूचना दी.

सुहेल के गायब होने की सूचना पाते ही पुलिस सक्रिय हो उठी. कोतवाल अरुण सैनी ने तुरंत ही रामनगर की सभी पुलिस चौकियों के प्रभारियोें को इस मामले से अवगत कराते हुए सुहेल को तलाश करने के आदेश दे दिए.

उसी दौरान देर रात किसी ने जानकारी दी कि रात 9 बजे के आसपास सड़क पर किसी बाइक वाले की एक कार के साथ भिड़ंत हो गई थी, जिस से बाइक सवार घायल हो गया था. उस के बाद घायल बाइक सवार को कार वाला ही अपनी कार में डाल कर ले गया था.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने उस क्षेत्र में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तो सब कुछ सामने आ गया. सुहेल की दुकान से कुछ ही दूरी पर कार सवारों ने उस की बाइक पर टक्कर मार कर उसे गिरा दिया था. उस के बाद उस के साथ मारपीट करते हुए उन्होंने उसे कार में डाल लिया था. कार सवार उस की बाइक को भी साथ ले जाते नजर आए थे.

लेकिन रात का वक्त होने के कारण उन कार सवारों की पहचान नहीं हो पा रही थी. इस घटना के सामने आने के बाद पुलिस ने काफी कोशिश की, लेकिन किसी खास नतीजे पर नहीं पहुंची.

अगले दिन 3 अगस्त, 2022 को सुहेल के भाई जुनैद सिद्दीकी ने अपने भाई का अपहरण करने का आरोप लगाते हुए अज्ञात लोेगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. जुनैद ने पुलिस पूछताछ के दौरान बताया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. लेकिन काफी समय पहले ही चोरपानी के भरत आर्या का उन के भाई के साथ मनमुटाव जरूर हुआ था.

सुहेल के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस ने रामनगर के कई क्षेत्रों के रास्तों पर लगे सीसीटीवी की फुटेज निकाली. लेकिन कहीं से भी सुहेल या कार सवारों का कोई सुराग नहीं लगा.

सुहेल का पता लगाने के लिए पुलिस पर हर तरफ से दबाव बढ़ता जा रहा था. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कोतवाल अरुण सैनी ने कई पुलिस टीमें अलगअलग क्षेत्रों में लगा दी थीं. पुलिस ने हाथीडगर नहर, नरसिंहपुर, मालधन के जंगलों और आसपास की नहरों की खाक छानी, लेकिन कहीं भी सुहेल का पता नहीं चल सका.

इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने पूछताछ के लिए कई लोगों को हिरासत में लिया. जिन से कड़ी पूछताछ की जा रही थी. उसी दौरान 4 अगस्त, 2022 को पुलिस को सूचना मिली कि मालधन क्षेत्र में एक शव मिला है.

इस सूचना पर तुरंत ही पुलिस मालधन पहुंची. तुमडि़या डैम में शव की तलाश में गोताखोरों को उतारा गया. लेकिन कई घंटों की तलाशी के बाद भी कुछ नहीं मिला. जब इस मामले को हुए पूरे 48 घंटे गुजर गए तो लोग सुहेल की तलाश करने के लिए धरनाप्रदर्शन पर उतर आए.

पुलिस पर बढ़ते दबाव के कारण एसपी (सिटी) हरबंश सिंह ने 4 पुलिस टीमों को सुहेल की तलाश में लगा दिया. उस के साथ ही पुलिस ने शक के आधार पर 15 लोगों को उठाया लेकिन उन से भी कोई जानकारी नहीं मिल सकी.

इस सब के बाद पुलिस के पास एक ही रास्ता था भरत आर्या से कड़ी पूछताछ करना. सुहेल के घर वाले भी सब से ज्यादा उसी पर शक कर रहे थे. लेकिन सुहेल के साथ भरत आर्या का मनमुटाव हुए काफी लंबा अरसा बीत चुका था. वैसे भी भरत आर्या सेना में था और इस वक्त पठानकोट में तैनात था.

पुलिस चोरगलियां स्थित भरत आर्या के घर पर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. वह छुट्टी पर आया हुआ था. पुलिस ने भरत आर्या से पूछताछ करने के लिए उसे अपने साथ लिया और कोतवाली आ गई.

पूछताछ में भरत आर्या ने बताया कि वह 14 जुलाई को कुछ दिन की छुट्टी पर आया था. सुहेल से उस का कोई लेनादेना नहीं. न ही उस से उस की कोई बोलचाल थी.

सुहेल की तलाश में पुलिस सभी जगह हाथपांव मार चुकी थी. पुलिस यह भी जानती थी कि कोई भी आरोपी इतनी जल्दी से अपना जुर्म कुबूल नहीं करता. यही सोच कर पुलिस ने भरत आर्या के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो 2 अगस्त, 2022 की रात 9 बजे के आसपास उस के उस नंबर की लोकेशन घटनास्थल के आसपास ही मिली.

फौजी भरत ने स्वीकारा जुर्म

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस समझ गई कि भरत आर्या जो भी पुलिस को बता रहा था, वह सब झूठ था. पुलिस ने फिर से सुहेल के घर वालों से विस्तार से जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि सन 2017 में भरत आर्या की बहन सुहेल के संपर्क में आई थी, जिस के कुछ ही समय बाद उस ने खुदकुशी कर ली थी. उस वक्त भरत आर्या के घर वालों ने उस की मौत का जिम्मेदार सुहेल को ही ठहराया था.

जिस के बाद सुहेल और भरत आर्या के बीच मनमुटाव चला आ रहा था. हो सकता है कि उस ने ही अपनी बहन की मौत का बदला लेने के लिए सुहेल का अपहरण कर उस की हत्या कर दी हो.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने भरत आर्या से कड़ी पूछताछ की. पूछताछ के दौरान भरत आर्या ने अपना जुर्म कुबूलते हुए बताया कि इस हत्या में उस का दोस्त नारायणपुर मूल्या निवासी दिनेश टम्टा भी शामिल था.

पुलिस ने भरत आर्या से उस की लाश के बारे में पूछा तो उस ने पहले तो बताया कि उस की लाश तुमडि़या डैम में डाल दी थी. लेकिन पुलिस तुमडि़या डैम की पहले ही छानवीन करवा चुकी थी. वहां पर कोई लाश नहीं मिली थी.

उस के बाद पुलिस ने देर रात फिर से उस से कड़ी पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का शव मुरादाबाद के थाना क्षेत्र छजलैट में फेंक दिया था. लेकिन सुहेल की लाश को रात के अंधेरे में फेंका गया था. रात होने के कारण भरत आर्या उस जगह को ही भूल गया था.

उस के समाधान के लिए रामनगर पुलिस ने थाना छजलैट से संपर्क किया तो वहां से जानकारी मिली कि पुलिस के हाथ एक लावारिस प्लेटिना बाइक हाथ लगी है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने बाइक वाली जगह पर जा कर छानबीन की तो उस के पास ही गन्ने के खेत में एक लाश बरामद हुई. लेकिन उस लाश का चेहरा पूरी तरह से विकृत था. उस की पहचान भी नहीं हो पा रही थी. फिर उस की बाइक और उस के कपड़ों के आधार पर घर वालों ने उस की शिनाख्त सुहेल के रूप में की.

प्रेमिका से छुटकारा पाने की शातिर चाल – भाग 3

हेमंत दिमाग से माधुरी के साथ खेल रहा था, जबकि वह दिल की खुशी के चक्कर में अच्छाबुरा सोचे बिना डगमगा गई. वह उसे अपने इशारों पर नचा रहा था. माधुरी उस की हर बात मानती थी और हद दरजे का विश्वास करती थी. हेमंत के कहे अनुसार, माधुरी राहुल के साथ भागी भी और शादी भी कर ली. दोनों पकड़े भी गए. उन्हें पकड़वाने में हेमंत ने ही अहम भूमिका निभाई थी.

उस ने माधुरी से पीछा छुड़ाने की योजना मन ही मन पहले ही तैयार कर ली थी. इतना सब तमाशा होने के बाद वह घर आई तो उस ने हेमंत को शादी की बात याद दिलाई. बदनामी, परिवार की डांटफटकार माधुरी ने सिर्फ हेमंत से शादी करने के लिए सही थी. हेमंत उसे प्यार से समझाबुझा कर पीछा छुड़ाने के बजाए उस के सपनों को और भी ऊंचाई दे कर बरगलाने का काम करता रहा. उस के कहने पर माधुरी राहुल से पिता के मोबाइल से बातें करती रही.

22 दिसंबर को हेमंत ने माधुरी से कहा था कि अगले दिन वह घर से निकल कर गांव के बाहर तय जगह पर पहुंच जाए. उसे लगता था कि माधुरी ऐसा नहीं करेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. माधुरी उस के झूठे प्यार में अंधी हो चुकी थी. वह उस खेत पर पहुंच गई, जहां उस ने पहुंचने को कहा था. माधुरी ने यह बात हेमंत को फोन कर के बता भी दी. वह खेत गांव के किसान डंकारी सिंह का था. हेमंत ने पहले ही तय कर लिया था कि उसे क्या करना है. माधुरी उस के गले की फांस बन चुकी थी. शाम करीब 4 बजे वह खेत पर पहुंचा और माधुरी को कंबल तथा बाजार से ला कर खाना दे आया.

हेमंत ने उसे समझाने के बजाए बरगलाते हुए कहा, ‘‘माधुरी, मैं माहौल देख लूं. पहले तो राहुल को जेल भिजवाना जरूरी है. उस के बाद हम निकल चलेंगे. लेकिन तब तक तुम्हें यहीं रहना होगा.’’

माधुरी ने इस कड़ाके की ठंड में वह रात अकेली खेतों में बिताई. हेमंत उस के लिए खाना पहुंचाता रहा. किसी को उस पर शक न हो, इस के लिए वह माधुरी के घर वालों के साथ खड़ा रहा और उन्हें राहुल के खिलाफ भड़काता रहा. 2 दिन बीत गए. अब माधुरी को खेत में रहना मुश्किल लगने लगा. आखिर उस के सब्र का बांध टूट गया.

तीसरे दिन यानी 26 दिसंबर की शाम माधुरी हेमंत से चलने की जिद करने लगी तो प्यार जताने के बहाने उस ने दुपट्टे से उस का गला कस दिया. हेमंत का यह रूप देख कर माधुरी के होश उड़ गए. बचाव के लिए विरोध करते हुए उस ने हाथपैर भी चलाए, लेकिन हेमंत ने गले में लिपटा दुपट्टा पूरी ताकत से कस दिया था, जिस से छटपटा कर उस ने दम तोड़ दिया. हत्या कर के हेमंत ने अपने और माधुरी के मोबाइल का सिमकार्ड तोड़ दिया और घर आ गया. रात को वह बहाने से निकला और गड्ढा खोद कर लाश को दफना दिया. इस के बाद वह सामान्य जिंदगी जीने लगा.

लोगों के शक से बचने के लिए वह अपने काम पर भी जाता और माधुरी के पिता के साथ बैठ कर माधुरी को ले कर फिक्र भी जताता. हेमंत को पूरा विश्वास था कि वह कभी पकड़ा नहीं जाएगा. उसे लगता था कि दबाव में आ कर पुलिस राहुल और उस के दोस्तों को जेल भेज देगी. उस के बाद माधुरी की खोजबीन ठंडे बस्ते में चली जाएगी. इसीलिए उस ने माधुरी के घर वालों को पुलिस अधिकारियों के यहां प्रदर्शन करने के लिए उकसाया था.

यह अलग बात थी कि एसपी सुजाता सिंह की समझ से पुलिस ने किसी दबाव में काम नहीं किया और वह पकड़ में आ गया. यह भी सच है कि अगर पुलिस बारीकी से जांच न करती तो हेमंत कभी पकड़ा न जाता. उस की फरेबी फितरत और हैवानियत ने पूरे गांव को हैरान कर दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. माधुरी हेमंत जैसे शातिर के झांसे में न आई होती और बिना डगमगाए अपने भविष्य को संवारने में लगी होती तो यह नौबत कभी न आती.

हेमंत जैसे लोग अपनी घिनौनी सोच को पूरी करने के लिए भोलीभाली लड़कियों को फंसाने का काम करते हैं. जरूरत है, लड़कियों को ऐसे लोगों से सावधान रहने की.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित