Hindi Stories: बस एक बेटा चाहिए

Hindi Stories: मेहनतमजदूरी कर के जीविका चलाने वाली शंकरी की 3 बेटियां थीं, चौथा बच्चा पेट में था. आखिर उस की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि वह बच्चे पर बच्चे पैदा किए जा रही थी. जिस तरह उस बूढ़े बरगद के पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था, उसी तरह उस के नीचे बायस्कोप लिए खड़ी उस औरत, जिस का नाम शंकरी था, की उम्र का भी अंदाजा लगाना आसान नहीं था. वह चला तो बायस्कोप रही थी, लेकिन उस का ध्यान लोहे के 4 पाइप खड़े कर के साड़ी से बने झूले में सो रही अपनी 2 साल की बेटी पर था.

अगर झूले में लेटी बेटी रोने लगती तो वह बायस्कोप जल्दीजल्दी घुमाने लगती. बायस्कोप देखने वाले बच्चे शोर मचाते तो वह कहती, ‘‘लगता है, बायस्कोप खराब हो गया है, इसीलिए यह तेजी से घूमने लगा है.’’

बायस्कोप का शो खत्म कर के शंकरी बेटी को गोद में ले कर चुप कराने लगती. लेकिन बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस से झगड़ने लगते. झगड़ते भी क्यों न, उन्होंने जिस आनंद के लिए पैसे दिए थे, वह उन्हें मिला नहीं था. औरत बच्चे के रोने का हवाला देती, फिर भी वे बच्चे न मानते. उन्हें तो अपने मनोरंजन से मतलब था, उस के बच्चे के रोने से उन्हें क्या लेनादेना था. शंकरी उन्हें समझाती, दोबारा दिखाने का आश्वासन भी देती, क्योंकि उसे भी तो इस बात की चिंता थी कि अगर उस के ये ग्राहक बच्चे नाराज हो गए तो उस की आमदनी बंद हो जाएगी. लेकिन उस की परेशानी यह थी कि वह बेटी को संभाले या ग्राहक. बेटी को भी रोता हुआ नहीं छोड़ा जा सकता था.

शंकरी के चेहरे पर मजबूरी साफ झलक रही थी. बच्चों की जिद पर मजबूरन उसे बच्ची को रोता छोड़ कर बायस्कोप के पास जाना पड़ता, क्योंकि बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस का ज्यादा देर तक इंतजार नहीं कर सकते थे. शंकरी की अपनी बच्ची रोती रहती और वह दूसरों के बच्चों का मनोरंजन कराती रहती. बच्ची रोरो कर थक जाती लेकिन वह उसे गोद में न ले पाती. वह उसे तभी गोद में उठा पाती, जब उस के ग्राहकों की भीड़ खत्म हो जाती. ग्राहकों के जाते ही वह दौड़ कर बच्ची को गोद में उठाती, प्यार करती और झट से साड़ी के पल्लू के नीचे छिपा कर दूध पिलाने लगती. तब उस के चेहरे पर जो सुकून होता, वह देखने लायक होता.

शंकरी ने बच्ची को प्यार करने के लिए अपना घूंघट थोड़ा खिसकाया तो थोड़ी दूर पर बेटी को मेला दिखाने आई संविधा की नजर उस के चेहरे पर पड़ी. उस का गोरा रंग धूप की तपिश से मलिन पड़ गया था. अभी भी गरम सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों के बीच से छनछन कर उस के चेहरे पर पड़ रही थीं. भूरे बालों को उस ने करीने से गूंथ कर मजबूती से बांध रखा था. आंखों में काजल की पतली लकीर, माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी, गोल चेहरा, जिस में 2 बड़ीबड़ी आंखें, जो दूध पीते बच्चे को बड़ी ममता से निहार रही थीं. कभीकभी उस की आंखें बेचैनी से उस ओर भी घूम जातीं, जो उस का बायस्कोप देखने के लिए उस के इंतजार में खड़े थे.

जैसे ही बेटी ने दूध पीना बंद किया, शंकरी के चेहरे पर आनंद झलक उठा. बच्ची अभी भी उस की गोद में लेटी थी और अधखुली आंखों से उसे ताकते हुए अपनी नन्ही हथेलियों से उस के माथे और गालों को सहला रही थी. औरत ने गौर से बच्ची को देखा, उस के चेहरे पर आनंद की जगह दुख की बदली छा गई. उस की आंखों से आंसू की 2 बूंदें टपक पड़ीं, जो बच्चे के चेहरे पर गिरीं. उस ने जल्दी से साड़ी के पल्लू से आंखों को पोंछा. बच्ची अब तक नींद के आगोश में चली गई थी.

शंकरी ने तमाशा देखने वालों को देखा. वे सभी उसे ही ताक रहे थे. उस ने बहुत हलके से बच्ची को झूले में लिटाया. बरगद के नीचे मक्खियों और कीड़ों की भरमार थी, इसलिए बच्ची को उन से बचाने के लिए एक बारीक कपड़ा उस के चेहरे पर डाल दिया, जिस से बच्ची आराम से सोती रहे. जैसे ही वह बच्ची के पास से हटी, बच्ची फिर रोने लगी. उस के रोने से वह बेचैन हो उठी. उस ने बायस्कोप के पास से ही रोती बच्ची को देखा, लेकिन मजबूरी की वजह से वह उसे उठा नहीं सकी. बायस्कोप देखने वाले बच्चों से पैसे ले कर उन्हें बैठा दिया. बच्ची रोती रही, 1-2 बार तो ऐसा लगा जैसे उस की सांस रुक गई है, लेकिन वह रोतीरोती सो गई.

थोड़ी देर बाद एक छोटी लड़की, जो 4 साल के आसपास रही होगी, सो रही बच्ची के पास से गुजरती हुई शंकरी के पास आ कर उस की साड़ी का पल्लू मुंह में डाल कर लौलीपाप की तरह चूसने लगी. वह शायद शंकरी की झूले में लेटी बेटी से बड़ी थी. उस की लार से शंकरी की साड़ी का पल्लू गीला हो गया. शंकरी की यह दूसरी बेटी घुटने तक लाल रंग का फ्रौक पहने थी. उस के पैर धूल से अटे हुए थे, आंखें पीली, मैलेकुचैले बाल, जो बूढ़े टट्टू की पूंछ की तरह बंधे हुए थे. उन में से कुछ खुले बाल उस के मटमैले चेहरे पर बिखरे हुए थे. लड़की ने शंकरी से उस के कान में फुसफुसा कर कुछ कहा. उस ने ऐसा न जाने क्या कहा कि शंकरी ने खीझ कर उसे कोहनी से झटक दिया. लड़की रोते हुए जमीन पर लेट गई, जिस से उस का पूरा शरीर धूल से अट गया.

तमाशा देखने वाले बच्चे इन सभी चीजों से बेपरवाह और बेखबर अपनी आंखें बायस्कोप के छोटे से गोल शीशे पर जमाए बक्से के अंदर का नजारा देख रहे थे, जो शायद उन्हें कुछ इस तरह मजा दे रहा था, जैसे वे सिनेमाहाल में कोई फिल्म देख रहे हों. यह उन के जोश और दीवानगी से पता चल रहा था. झूले में लेटी बच्ची एक बार फिर रोने लगी. शंकरी ने बगल में जमीन पर लोट रही बेटी को 5 रुपए का सिक्का दिखाया तो वह तुरंत  उठ कर खड़ी हो गई और शरीर पर चिपकी धूल को झाड़ते हुए मां के हाथ से सिक्का झपट लिया. उस के चेहरे पर आंसुओं की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं. हाथ में सिक्का आते ही वह उत्साह और खुशी से उछलतीकूदती रोती हुई छोटी बहन के पास आई और उसे झूले से उठा कर अपनी छोटी सी कमर के सहारे गोद में ले कर थोड़ी दूरी पर स्थित एक छोटी सी दुकान की ओर चल पड़ी.

शंकरी बायस्कोप जरूर चला रही थी, लेकिन उस का ध्यान कहीं और ही था. उसी समय उस के पास एक अन्य लड़की आई, जिस की उम्र बामुश्किल 6 साल रही होगी. उस की पीली रंग की सलवारसमीज मैल की वजह से काली पड़ चुकी थी. कुछ पल मांबेटी आपस में कानाफूसी करती रहीं, उस के बाद वह लड़की वहीं मां के पास बैठ गई और अपने धूल भरे पैर मजे से हिलाने लगी. लेकिन उस की पीली आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. वह पैर हिलाते हुए वहां घूमने आए ताजा चेहरे वाले बच्चों और उन के मांबाप को ललचाई नजरों से ताक रही थी, क्योंकि वे अपने बच्चों की बड़ी से बड़ी इच्छाएं पूरी कर रहे थे.

तमाशा देखने वाले बच्चे जब चले गए तो वह आ कर मां के पास बैठ गई. मां उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकराई. बायस्कोप देखने वाले बच्चे उस में देखे गए तमाशे के बारे में चर्चा करते हुए हंस रहे थे. उसी बीच हवा का एक ऐसा झोंका आया, जिस से उस औरत का आंचल उड़ गया. उस के उभरे हुए पेट पर संविधा की नजर पड़ी, शायद वह गर्भवती थी. संविधा ने उभार से अंदाजा लगाया, कम से कम 6 महीने का गर्भ रहा होगा. अपने कमजोर शरीर के पेट पर उस छोटे से उभार के साथ शंकरी मुश्किल से बेटी के साथ जमीन पर बैठ गई. उस की इस 6 साल की बेटी ने प्यार से उसे मां कहा तो वह बेटी की आंखों में झांकने लगी.

उसी समय धोतीकमीज पहने और सिर पर मैरून रंग की पगड़ी बांधे एक आदमी मांबेटी के पास आ कर बैठ गया. उस के बैठते ही लड़की उसे बापू कह कर उस से चिपक गई और उस के गालों तथा मूंछों को सहलाने लगी. लेकिन उस आदमी ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह शंकरी से बातें करने में व्यस्त था. संविधा को समझते देर नहीं लगी कि वह आदमी शंकरी का पति है. वह आदमी उसी को देख रहा था, जबकि उस की नजरें अपने चारों ओर घूमते लोगों पर टिकी थीं. लड़की अपनी बांहें बापू के गले में डाल कर झूल गई तो वह उसे झटक कर उठ खड़ा हुआ और मेले की भीड़ में गायब हो गया.

लड़की संविधा के पास आ कर खड़ी हो गई. उस की नजरें उस के हाथ में झूल रही पौलीथिन में रखे चिप्स के पैकेट पर जमी थीं. वह उन चीजों को इस तरह ललचाई नजरों से देख रही थी, जैसे जीवन में कभी इन चीजों को नहीं देखा था. उस की तरसती आंखों में झांकते हुए संविधा ने चिप्स का पैकेट उसे थमाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

अब उस की नजरें संविधा की बेटी के लौलीपाप पर जम गई थीं, जिसे वह चूस रही थी. वह उसे इस तरह देख रही थी, जैसे उस की नजरें उस पर चिपक गई हों. संविधा ने उस का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए कहा, ‘‘लौलीपाप खाओगी?’’

उस ने मुसकराते हुए हां में सिर हिलाया. संविधा ने पर्स में देखा कि शायद उस में कोई लौलीपाप हो, लेकिन अब उस में लौलीपाप नहीं था. संविधा को लगा, अगर उस ने लड़की से कहा कि लौलीपाप नहीं है तो उसे दुख होगा. इसलिए उस ने पर्स से 10 रुपए का नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, ‘‘जाओ, अपने लिए लौलीपाप ले आओ.’’

लड़की मुसकराते हुए 10 रुपए के नोट को अमूल्य उपहार की तरह लहराती हुई मेले की ओर भागी. लड़की के जाते ही संविधा शंकरी को देखने लगी. वह काफी व्यस्त लग रही थी. वह बायस्कोप देखने वालों को शो दिखाते हुए सामने से गुजरने वालों को बायस्कोप देखने के लिए आवाज भी लगा रही थी. 4 साल की उस की जो बेटी अपनी छोटी बहन को ले कर गई थी, अब तक मां के पास वापस आ गई थी. उस ने बरगद के पेड़ के चारो ओर बने चबूतरे पर छोटी बहन को बिठाया और अपना हाथ मां के सामने कर दिया, जिस में वह खाने की कोई चीज ले आई थी. शायद वह उसे मां के साथ बांटना चाहती थी. अब तक बड़ी बेटी भी आ गई थी. उस ने भी अपनी मुट्ठी मां के सामने खोल कर अंगुली से संविधा की ओर इशारा कर के धीमे से कुछ कहा.

शंकरी ने संविधा की ओर देखा. नजरें मिलने पर वह मुसकराने लगी. उस परिवार को देखतेदेखते अचानक संविधा के मन में उस के प्रति आकर्षण सा पैदा हो गया तो उस के मन में उन लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता पैदा हो गई. शायद शंकरी के लिए उस के दिल में दया पैदा हो गई थी. उस की स्थिति ही कुछ ऐसी थी, इसीलिए संविधा उस की कहानी जानना चाहती थी. धीरेधीरे संविधा शंकरी की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख शंकरी खड़ी हो गई. उसे लगा, शायद संविधा बेटी को बायस्कोप दिखाने आ रही है, इसलिए उस ने बायस्कोप का ढक्कन खोलने के लिए हाथ बढ़ाया. संविधा ने कहा, ‘‘मुझे इस मशीन में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो आप से मिलने आई हूं.’’

संविधा की इस बात से शंकरी को सुकून सा महसूस हुआ. वह चबूतरे पर खेल रही छोटी बेटी के पास बैठ गई. संविधा ने उस की तीनों बेटियों की ओर इशारा कर के पूछा, ‘‘ये तीनों तुम्हारी ही बेटियां हैं?’’

‘‘जी.’’ शंकरी ने जवाब दिया.

‘‘ये कितनेकितने साल की हैं?’’

शंकरी ने हर एक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘6 साल, 4 साल और सब से छोटी डेढ़ साल की है.’’

इस के बाद उस के उभरे हुए पेट पर नजरें गड़ाते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘शायद तुम फिर उम्मीद से हो?’’

‘‘जी.’’ उस ने लंबी सी सांस लेते हुए कहा.

‘‘कितने महीने हो गए?’’

‘‘6 महीने.’’

संविधा शंकरी को एकटक ताकते हुए उस की दुख भरी जिंदगी के बारे में सोचने लगी, शायद यह बच्चे पैदा करने को मजबूर है. यह कितनी तकलीफ में है. उस की परेशानियों को देखते हुए संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी उम्र कितनी होगी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, लेकिन विफल रही तो नजरें झुका लीं.

संविधा को आघात सा लगा. उस ने उस के दुख और मजबूरी भरे जीवन की अपने शानदार और ऐशोआराम वाले जीवन से तुलना की, तब उसे लगा कि इस दुनिया में शायद दुख ज्यादा और सुख कम है. उस ने पूछा, ‘‘आप हर साल एक बच्चा पैदा कर के थकी नहीं?’’

‘‘इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है.’’ शंकरी ने ठंडी आह भरते हुए जवाब दिया.

‘‘आप बहुत बहादुर हैं. मेरे वश का तो नहीं है.’’

‘‘मेरी मजबूरी है. मेरे पति चाहते हैं कि उन का एक बेटा हो जाए, जिस से उन के परिवार का नाम चलता रहे.’’

‘‘नाम चलता रहे..?’’ संविधा ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा. उस पर उसे तरस भी आया. क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस के जो बच्चे थे, उन्हें ही वह ठीक से पालपोस सकती. जबकि सिर्फ नाम चलाने के लिए वह बच्चे पर बच्चे पैदा करने को तैयार थी. संविधा को झटका सा लगा था. वह उस से कहना चाहती थी कि आजकल लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं रहा. दोनों बराबर हैं. उस की केवल एक ही बेटी है, जिस से वह और उस के पति खुश हैं. लड़कियां लड़कों से ज्यादा बुद्धिमान और प्रतिभाशाली निकल रही हैं. वे मातापिता की बेटों से ज्यादा देखभाल करती हैं. देखो न लड़कियां पहाड़ों पर चढ़ रही हैं, उन के कदम चांद पर पहुंच गए हैं.

लेकिन वह कह नहीं पाई. उस के मन में आया कि वह उस से पूछे कि अगर इस बार भी बेटी पैदा हुई तो..? क्या जब तक बेटा नहीं पैदा होगा, वह बच्चे पैदा करती रहेगी? अगर उसे बेटा पैदा ही नहीं हुआ तो वह क्या करेगी? इस तरह के कई सवाल संविधा के मन में घूम रहे थे. उस की गरीबी और बेटा पाने की चाहत के बारे में सोचते हुए उसे लगा, अगर यह इसी तरह बच्चे पैदा करती रही तो इस की हालत तो एकदम खराब हो जाएगी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘वह लोकगीत गाते हैं.’’ शंकरी ने कहा.

‘‘लोकगीतों का कार्यक्रम करते हैं?’’

‘‘नहीं, मेलों या गांवों में घूमघूम कर गाते हैं.’’

संविधा को याद आया कि जब वह मेले में प्रवेश कर रही थी तो कुछ लोग चादर बिछा कर ढोलक और हारमोनियम ले कर बैठे थे. वे लोगों की फरमाइश पर उन्हें लोकगीत और फिल्मी गाने गा कर सुना रहे थे.

संविधा समझ गई कि ये लोग कहीं बाहर से आए हैं. उस ने पूछा, ‘‘लगता है, तुम लोग कहीं बाहर से आए हो? अपना गांवघर छोड़ कर कहीं बाहर जाने में तुम लोगों को बुरा नहीं लगता?’’

‘‘हमारे पास इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है.’’

‘‘क्यों? जहां तुम लोग रहते हो, वहां तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है?’’

‘‘काम और कमाई होती तो हम लोग इस तरह मारेमारे क्यों फिरते?’’

‘‘लेकिन तुम लोग अपने यहां खेती भी तो कर सकते हो?’’ संविधा ने सुझाव दिया.

‘‘कैसे मैडम, हमारी सारी जमीनों पर दबंगों और महाजनों ने कब्जा कर लिया है. क्योंकि हम ने उन से जो कर्ज लिया था और उसे अदा नहीं कर पाए.’’

‘‘तुम लोगों ने अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए संघर्ष क्यों नहीं किया?’’

‘‘मैडम, हम बहुत कमजोर लोग हैं और वे बहुत शक्तिशाली. उन के पास पैसा भी है और ताकत भी. हम उन से दुश्मनी कैसे मोल ले सकते हैं.’’

‘‘लेकिन तुम लोग यह सब सह कैसे लेते हो?’’ ‘‘हम बहुत ही असहाय और बेबस लोग हैं.’’ शंकरी ने लंबी सांस ले कर जमीन पर खेल रही बच्ची का मुंह साड़ी के पल्लू से साफ करते हुए कहा.

संविधा के दिमाग में तमाम सवाल उठ रहे थे, लेकिन उसे लगा कि बुद्धिमानी इसी में है कि वह उस से उन सवालों को न पूछे. चेहरे से शंकरी अभी जवान लग रही थी, लेकिन हालात की वजह से चेहरा पीला और सूखा हुआ था. शायद ऐसा गरीबी और बच्चे पैदा करने की वजह से था. संविधा ने पूछा, ‘‘तुम्हारी शादी कितने साल में हुई थी?’’

‘‘मेरी…’’ उस ने अनुमान लगाने की कोशिश की, मगर नाकाम रही.

‘‘तुम यहां कब आई?’’

‘‘जब यह मेला शुरू हुआ.’’

‘‘तुम लोगों के दिन कैसे गुजरते हैं?’’

‘‘सुबह जहां रहते हैं, वहां की साफसफाई करते हैं. दोपहर को ही रात का भी खाना बना लेते हैं, क्योंकि हमारे पास उजाले की व्यवस्था नहीं है. उस के बाद अपने काम में लग जाते हैं. लड़कियां टोलियों में नाचनेगाने क काम करती हैं. शादीशुदा महिलाएं मेरी तरह बायस्कोप दिखाती हैं तो कुछ कठपुतली का नाच दिखाती हैं. कुछ मेहंदी लगाने का भी काम करती हैं.’’

संविधा ने इधरउधर देखा. दूरदूर तक कोई इमारत नहीं थी. मैदान पर मेले में आए दुकानदारों के तंबू लगे थे. मन में जिज्ञासा जागी तो उस से पूछा, ‘‘तुम पूरे दिन इसी तरह बिना आराम के काम करती हो. ऐसे में तुम्हारे बच्चों की देखभाल कौन करता है?’’

‘‘मेरी बड़ी बेटी इन दोनों बेटियों को संभाल लेती है.’’

‘‘इन का खानापीना और नहानाधोना?’’

‘‘बड़ी बेटी छोटी को नहला देती है, बीच वाली खुद ही नहा लेती है.’’

संविधा ने अपनी 8 साल की बेटी पर नजर डाली, उस के बाद शंकरी की एकएक कर के तीनों बेटियों को देखा. छोटी बेटी अभी भी मां के पास चबूतरे पर खेल रही थी. संविधा ने सोचते हुए एक लंबी सांस ली. कुछ देर वह शंकरी और उस की बेटियों को देखती रही. उस का दिल उन के लिए सहानुभूति से भर गया. उस ने पर्स से 10-10 रुपए के 2 नोट निकाले और खेल रही लड़कियों को थमा दिए. इस के बाद वह चलने लगी तो देखा, कुछ बच्चे उधर आ रहे थे. उन्हें आते देख कर शंकरी अपने बायस्कोप के पास जा कर खड़ी हो गई, लेकिन उस की नजरें चबूतरे पर खेल रही बेटी पर ही जमी थीं.

शाम को संविधा घर पहुंची तो उस के दिलोदिमाग में शंकरी और उस की बेटियां ही छाई थीं. वह भी एक औरत थी, इसलिए उस ने प्रार्थना की कि काश! उस के गमों का सिलसिला खत्म हो जाए और उस की इच्छा पूरी हो जाए. इस बार उसे बेटा पैदा हो जाए. Hindi Stories

अनुवाद: एम.एस. जरगाम

Crime Story Hindi: भैरवी क्रिया के चक्रव्यू में मोनिका

Crime Story Hindi: प्रतिष्ठित परिवार की मोनिका शादी के 5 साल बाद भी मां नहीं बन सकी तो वह एक तथाकथित तांत्रिक के चक्कर में फंस गई. उस तांत्रिक ने उसे भैरवी क्रिया के चक्रव्यूह में ऐसा फांसा कि मोनिका घर की रही न घाट की. अपने घर पर लोहड़ी मनाने के बाद मोनिका 14 जनवरी, 2015 को अपने पति के पास चली गई थी. उस का पति गुरदीप इंडियन नेवी में नौकरी करता था. वह उस समय मुंबई में रह रहा था. ससुराल में केवल सासससुर रह गए थे. मुंबई आने के बाद भी वह सासससुर से फोन पर बात कर के हालचाल लेती रहती थी. मोनिका का मायका राजपुरा की रौशन कालोनी में था. वहां उस की विधवा मां सुनीता रानी रहती थी.

29 जनवरी, 2015 को मोनिका ने अपने ससुर के मोबाइल पर फोन करना चाहा तो उन का फोन स्विच्ड औफ मिला. मोनिका ने कई बार उन का नंबर मिलाया, लेकिन हर बार फोन स्विच्ड औफ ही मिला. इस पर मोनिका ने अपनी मां सुनीता को फोन कर के कहा कि वह किसी मुद्दे पर अपने सासससुर से बात करना चाहती है, मगर उन का मोबाइल स्विच्ड औफ आ रहा है. उस ने अपनी मां से कहा कि वह उस की ससुराल जा कर पता लगाए कि वहां कोई फिक्र वाली बात तो नहीं है. उस वक्त रात काफी हो चुकी थी. सुनीता भी अपने घर में अकेली थीं, इसलिए अकेली होने की वजह से वह बेटी की ससुराल नहीं गईं.

अगले दिन घर और रसोई का काम निपटाने के बाद दोपहर करीब 11 बजे वह अपने समधी के यहां पहुंचीं तो घर के बाहर वाला लकड़ी का दरवाजा खुला था. वह ड्योढ़ी में पहुंचीं तो वहां एक जोड़ी चप्पलें उलटीसीधी पड़ी थीं, वहीं पर एक टोपी भी पड़ी थी. तभी उन्होंने तेज बदबू का भभका महसूस किया. सुनीता ने अपने समधी और समधिन को कई आवाजें दीं. जब अंदर से कोई जवाब नहीं आया तो वह उन के बैडरूम में चली गईं. वहां असहनीय बदबू फैली थी. तभी उन की नजर बैड पर गई तो वह चीख पड़ीं. वहां मोनिका के ससुर खेमचंद और सास कमलेश की लाशें पड़ी थीं. लाशें देखते ही वह तुरंत घर से बाहर निकल आईं और शोर मचा दिया.

शोर सुन कर पासपड़ोस के लोग वहां आ गए. सुनीता ने उन्हें समधी और समधिन की लाशें कमरे में पड़े होने की जानकारी दी. उसी दौरान अपनी बेटी मोनिका और अन्य रिश्तेदारों को भी उन्होंने इस मामले की खबर दे दी. वहां मौजूद लोगों में से किसी ने केएसएम पुलिस चौकी में फोन कर के इस डबल मर्डर की सूचना दे दी. डबल मर्डर की सूचना मिलते ही चौकी प्रभारी महिमा सिंह, हेडकांस्टेबल नाथीराम और भाग सिंह के साथ राजपुरी के बनवाड़ी इलाके में खेमचंद के घर पहुंच गए. वहां एक ही कमरे में 2 लाशें पड़ी देख कर वह भी चौंके. उन्होंने थाना सिटी के थानाप्रभारी शमिंदर सिंह को दोहरे हत्याकांड की जानकारी दी तो वह भी एसआई सतनाम सिंह, एएसआई राकेश कुमार, हेडकांस्टेबल जसविंदर पाल, कुलवंत सिंह और महिला कांस्टेबल परमजीत कौर को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

जिस मकान में यह घटना हुई थी, वह पुराने स्टाइल का मकान था. थानाप्रभारी जैसे ही  लकड़ी के बड़े दरवाजे से मकान में घुसे, असहनीय बदबू से बेहाल हो गए. नाक पर रूमाल रख कर वह आगे बढ़े तो उन्होंने बैडरूम में बिस्तर पर एक आदमी और एक औरत की लाश पड़ी देखी. पूछने पर पता चला कि मृतक 70 वर्षीय खेमचंद और उन की 65 वर्षीया पत्नी कमलेश हैं. लाशों के मुआयने में लग रहा था कि उन दोनों को गला घोंट कर मारा गया था. निस्संदेह उन की हत्या कई दिनों पहले की गई थी, क्योंकि लाशें गलने लगी थीं. बैडरूम का सामान भी इधरउधर बिखरा पड़ा था. अलमारियों का सामान बिखरा होने के साथसाथ लौकर भी खुला पड़ा था, जो पूरी तरह खाली था. पहली ही नजर में लग रहा था कि यह डबल मर्डर लूटपाट की खातिर हुआ होगा.

कमरे में फर्श पर कोल्डड्रिंक के खाली कैन, सिगरेट के टुकड़ों के अलावा वहां एल्युमिनियम की पन्नी भी पड़ी थी. ऐसी पन्नियों का उपयोग नशेड़ी नशीला पदार्थ लेने के लिए करते हैं. इस से यह बात जाहिर हो रही थी कि अपराधी अव्वल दर्जे के नशेड़ी थे. जिस इत्मीनान से यह सब हुआ था, उस से लग रहा था कि अपराधी संभवत: मृतकों के परिचित रहे होंगे. मामला गंभीर था, इसलिए सूचना मिलने पर पटियाला के एसएसपी गुरमीत चौहान, एसपी (डिटेक्टिव) जसकरण सिंह तेजा, डीएसपी (सिटी) राजेंद्र सिंह सोहल और सीआईए इंसपेक्टर विक्रमजीत सिंह बराड़ भी घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने भी लाशों और घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

मौके पर पहुंची डौग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम एवं एफएसएल टीम ने भी मौके की काररवाई पूरी की. घटनास्थल पर मौजूद सुनीता, जो राजपुरा की रौशन कालोनी में रहती थी, बताया कि मरने वाले उन के समधीसमधिन हैं. उन की बेटी मोनिका उन के बेटे कुलदीप से ब्याही है. दोनों की शादी 5 साल पहले हुई थी. सुनीता ने यह भी बताया कि मोनिका का पति गुरदीप इंडियन नेवी में नौकरी करता है और मुंबई में रहता है. मोनिका बीचबीच में अपने सासससुर की सेवा करने के लिए मुंबई से राजपुरा आती रहती थी. गुरदीप चाहता था कि मांबाप भी मुंबई में उस के साथ रहें, लेकिन वे वहां जाने को तैयार नहीं थे.

पुलिस ने पंचनामा कर के दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा कर सुनीता की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया. मौके से कोई ऐसा सुबूत नहीं मिला  था, जिस के सहारे हत्यारों तक पहुंचने में  पुलिस को मदद मिलती. पुलिस के लिए यह एक संगीन मामला था. एसएसपी गुरमीत चौहान ने इसे गंभीरता से लेते हुए एक विशेष टीम का गठन कर के इंसपेक्टर शमिंदर सिंह को आदेश दिया कि वह इस केस को जल्द से जल्द सुलझाए. टीम की अगुवाई डीएसपी राजेंद्र सिंह सोहल कर रहे थे.

घटनास्थल से जो सुबूत मिले थे, उन से घटना में किसी नशेड़ी के शामिल होने की उम्मीद थी, इसलिए पुलिस टीम ने इलाके के तमाम नशेडि़यों को उठा कर उन से पूछताछ शुरू की. मगर वे सब बेकसूर निकले. इस परिवार के अनेक परिचितों को भी संदेह के दायरे में रख कर उन से मनोवैज्ञानिक पूछताछ की गई, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात रहा. गुरदीप को अपने मातापिता की हत्या की खबर मिली तो वह भी पत्नी मोनिका के साथ राजपुरा आ गया. आते ही उस ने जिले के पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर के जल्द से जल्द केस का खुलासा कर हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग की.

पुलिस टीम के ऊपर इस केस को खोलने का काफी दबाव था. काफी कोशिश के बावजूद भी पुलिस को हत्यारों के बारे में कोई पता नहीं लगा तो पुलिस ने अपने मुखबिरों का सहारा लिया. 4 दिनों बाद एक मुखबिर ने पुलिस टीम को एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी. उस ने बताया कि मोनिका सिकंदर नाम के तांत्रिक के पास जाया करती थी. तांत्रिक भी उस के यहां आता था. कई बार तो वह तांत्रिक देर रात को भी उस के घर आता था और भोर में वहां से चला जाता था. इस जानकारी के बाद इंसपेक्टर शमिंदर सिंह को शक हो गया कि हो न हो, मोनिका और तांत्रिक के बीच कोई चक्कर रहा हो. संभव है, मोनिका ने ही अपने संबंधों में बाधक बने सासससुर को रास्ते से हटवा दिया हो.

इंसपेक्टर ने इस बारे में डीएसपी राजेंद्र सिंह सोहल से बात की तो उन्होंने सिकंदर सिंह को हिरासत में ले कर पूछताछ करने को कहा. सिकंदर सिंह पंजाब के जिला फतेहगढ़ साहिब के कस्बा नारायणगढ़ का रहने वाला था. पुलिस टीम उस के यहां दबिश डालने के लिए निकल गई. लेकिन तांत्रिक अपने घर से गायब मिला. उधर मोनिका भी भूमिगत हो गई थी. इस से ये लोग पूरी तरह शक के दायरे में आ गए. अब पुलिस ने उन्हें सरगर्मी से तलाशना शुरू कर दिया. पुलिस की मेहनत रंग लाई. 5 फरवरी, 2015 को एक गुप्त सूचना के आधार पर राजपुरा के एक मकान में दबिश दे कर वहां छिपे 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इन में मोनिका भी थी. अन्य 3 लोगों ने अपने नाम सिकंदर, गुरप्रीत और रणजीत बताए.

मौके पर हुई प्रारंभिक पूछताछ में उन तीनों ने खेमचंद व उन की पत्नी कमलेश रानी की हत्या किए जाने की बात भी स्वीकार कर ली. उन्होंने यह भी बताया कि दोनों कत्ल उन्होंने मोनिका के कहने पर ही किए थे  थाने में इन चारों से दोहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ की तो सैक्स अपराध की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली –

सिकंदर सिंह पंजाब के फतेहगढ़ साहिब के कस्बा नारायणगढ़ निवासी दलबीर सिंह का बेटा था. दलबीर सिंह फौजी थे और गांव में उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. वह चाहते थे कि सिकंदर भी भारतीय सेना में भरती हो कर देशसेवा करे. लेकिन सिकंदर को न फौज में जाना पसंद था और न ही खेतों में काम करना. वह आवारा घूमता रहता था. इसी बीच पता नहीं कैसे वह एक तांत्रिक के संपर्क में आया और फिर उस से थोड़ीबहुत तंत्रविद्या सीख कर खुद भी तांत्रिक बन गया. उस ने घर के एक कमरे में अपनी गद्दी जमा ली. पहले उस के पास स्थानीय लोग ही आते थे. धीरेधीरे उस का प्रचार होने लगा तो आसपास के क्षेत्रों से भी लोग अपनी समस्याएं ले कर उस के पास पहुंचने लगे.

मोनिका भी अपनी समस्या ले कर उस के पास आई थी. 5 साल पहले उस की शादी पंजाब के राजपुरा में स्थिति बनवाड़ी इलाके में रहने वाले खेमचंद के बेटे गुरदीप से हुई थी. गुरदीप इंडियन नेवी में नौकरी करता था. मोनिका की शादी हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन वह किसी वजह से मां नहीं बन पाई थी. मोनिका और गुरदीप ने अपना इलाज भी कराया और तांत्रिकों, मौलवियों से मिली, लेकिन उस की कोख नहीं भरी. किसी के द्वारा उसे तथाकथित तांत्रिक सिकंदर के बारे में पता चला तो वह अपनी समस्या के समाधान के लिए उस के पास पहुंच गई. खूबसूरत मोनिका को देख कर सिकंदर का मन डोल गया. उस ने पहले तो झाड़फूंक करने के अलावा उस से कुछ उपाय करवाए.

इस से मोनिका को कोई फायदा नहीं हुआ तो सिकंदर ने उसे एक दिन समझाया कि भैरवी क्रिया से वह निश्चित रूप से मां बन जाएगी. मगर यह क्रिया वह उस की अनुमति के बिना नहीं करेगा. इस का असर भी तभी होगा, जब वह उसे पूरा सहयोग करेगी. मोनिका उस की बात समझ तो चुकी थी, फिर भी उस ने उस क्रिया के बारे में उस से पूछा तो सिकंदर ने उसे विस्तारपूर्वक समझा दिया. सिकंदर ने कहा कि इस क्रिया में आधी रात के वक्त विशेष पूजा के दौरान पहले दोनों वस्त्रहीन होंगे, उस के बाद वह इसी अवस्था में उस की सवारी कर के संतान योग की विधि वाला पाठ करेगा.

मोनिका जानती थी कि यह क्रिया कर के वह पति को धोखा दे रही है, लेकिन संतान पाने के लिए वह सब कुछ करने को तैयार थी. लेकिन समस्या यह थी कि घर में सासससुर को छोड़ कर आधी रात में वह सिकंदर के यहां नहीं जा सकती थी. अपनी यह समस्या उस ने सिकंदर को बताई, साथ ही यह भी कहा कि अगर वह भैरवी क्रिया उस के घर पर ही आ कर करे तो ज्यादा ठीक रहेगा. जिस रात वह यह क्रिया करेगा, उस रात वह अपने सासससुर के खाने में नींद की गोलियां मिला देगी. जब वे गहरी नींद में सो जाएंगे तो यह क्रिया बिना किसी रुकावट के पूरी हो जाएगी.

सिकंदर उस की बात मान गया. तब निर्धारित रात को मोनिका ने ऐसा ही किया. सासससुर को नींद की गोली मिला खाना खिलाने के बाद उस ने सिकंदर को फोन कर दिया. जब तक वह मोनिका के घर पहुंचा, सासससुर गहरी नींद के आगोश में जा चुके थे. अब एक कमरे में मोनिका और सिकंदर निर्वस्त्र बैठे थे. कुछ देर मंत्र उच्चारण के बाद सिकंदर भैरवी क्रिया करने में लीन हो गया. क्रिया खत्म होने के बाद मोनिका निश्चिंत हो गई कि अब वह मां बन जाएगी. वह गर्भवती होगी या नहीं? यह बाद की बात थी. फिलहाल इस क्रिया से सिकंदर के लिए मौजमस्ती का एक नया द्वार खुल गया था. सिकंदर ने उसे बता दिया कि जब तक वह गर्भवती न हो जाए, यह क्रिया चलती रहेगी.

मोनिका अपने सासससुर के खाने में जो नींद की गोलियां मिलाती थी, एक रात पता नहीं कैसे उस दवा की मात्रा कम रह गई, जिस से मोनिका के सासससुर आधी रात में उस वक्त जाग गए, जब उन की बहू तांत्रिक सिकंदर के साथ वासना का खेल खेलने में लीन थी. दोनों ने बहू को इस हालत में देखा तो उन के होश उड़ गए. आहट होने पर तांत्रिक वहां से भाग गया. उस के भागने के बाद उन्होंने मोनिका को बहुत बुराभला कहा. साथ ही इस सब के बारे में अपने बेटे गुरदीप को बताने की धमकी भी दी. मोनिका डर गई. अपनी गलती मानते हुए उस ने सासससुर के पैरों पर गिर कर माफी मांगते हुए वादा किया कि वह भविष्य में ऐसी गलती कभी नहीं करेगी. इस सब में उस ने कसूर भी तांत्रिक का ही निकाल दिया.

बात उछलती तो बदनामी अपनी ही होती, यह सोच कर खेमचंद और कमलेश कड़वा घूंट पी कर फिलहाल चुप हो गए. उन्होंने बहू की हरकत बेटे को नहीं बताई. सासससुर तो चुप बैठ गए, मगर मोनिका चुप बैठने वालों में नहीं थी. उसे लगा कि सासससुर उस के रास्ते में बाधक बने रहेंगे. इसलिए उस ने उन्हें ठिकाने लगाने की ठान ली. इस बारे में उस ने सिकंदर से बात की तो वह यह काम करने को तैयार हो गया. क्योंकि उन के न होने पर उसे बेखौफ हो कर अय्याशी करने का मौका मिलता. पड़ोस के गांव बरौंगा के रहने वाले गुरप्रीत सिंह उर्फ काली व रणजीत सिंह से सिकंदर की दोस्ती थी. दोनों ही आवारा थे. पैसों का लालच दे कर सिकंदर ने दोनों को अपनी योजना में शामिल कर लिया.

मोनिका नहीं चाहती थी कि किसी को उस पर शक हो. इसलिए योजना बनाने के बाद वह लोहड़ी से अगले दिन अपने पति के पास मुंबई चली गई. 23 जनवरी, 2015 को सिकंदर ने अपने साथियों के साथ मिल कर खेमचंद व उन की पत्नी कमलेश रानी की हत्या कर दी. हत्या को लूट का रूप देने के लिए उन्होंने अलमारी व तिजोरी में रखे 25-30 हजार रुपयों के अलावा सारी ज्वैलरी भी निकाल ली और घर का सामान बिखेर दिया. वहां नशा लेने में प्रयोग की जाने वाली एल्युमिनियम की पन्नी व सिगरेट के टुकड़े भी डाल दिए. जिस से लगे की लूटपाट नशेडि़यों ने की है. पुलिस ने चारों अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर 4 दिनों की पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उन से चोरी किए 2 लाख रुपए के आभूषणों के अलावा नकदी भी बरामद कर ली.

रिमांड अवधि पूरी होने पर उन्हें फिर से न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. कथा संकलन तक विवेचनाधिकारी इंसपेक्टर शमिंदर सिंह ने इन आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में प्रस्तुत कर दिया था. Crime Story Hindi

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Cyber Fraud: एटीएम कार्डो से ठगी

Cyber Fraud: झारखंड के जिला जामतारा में करीब ढाई हजार ऐसे कोचिंग सेंटर हैं, जहां एटीएम के माध्यम से की जाने वाली ठगी सिखाई जाती है. मुरादाबाद पुलिस ने इस जिले के 2 ठगों को पकड़ा तो यह बात खुली. कृपया सावधान रहें आजकल सब से ज्यादा ठगी एटीएम के जरिए से होती है. कोई भी बड़ा अधिकारी ट्रांसफर के बाद जब नई जगह चार्ज लेता है तो अपने अधीन आने वाले विभागों, अफसरों और विभागीय फाइलों को अपने नजरिए से देखता, समझता है और जरूरी निर्देश देता है. गत दिनों मुरादाबाद आ कर डा. रामसुरेश यादव ने जब एसपी सिटी का पदभार संभाला तो उन्होंने भी यही किया. इस काररवाई में उन्हें पता चला कि मुरादाबाद में कई मामले ऐसे हुए हैं, जिन में ठगों ने फरजी बैंक अफसर बन कर एटीएम के माध्यम से कई लोगों के साथ ठगी की है.

ठगी के इस मामले को पुलिस की साइबर शाखा देख रही थी. डा. रामसुरेश यादव ने इस संबंध में एसएसपी लव कुमार से बात की. वह भी इस बात से सहमत हुए कि पुलिस को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल काररवाई कर के उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो फरजी बैंक अधिकारी बन कर लोगों से फोन पर उन के बैंक एकाउंट और एटीएम कार्ड की जानकारी लेते हैं और उन के एकाउंट से पैसा निकालते हैं. एसएसपी से बात होने के बाद डा. रामसुरेश यादव ने उन केसों का अध्ययन किया, जिन में लोगों को इस तरह ठगा गया था.

नागफनी थानाक्षेत्र में रहने वाले अधिवक्ता वैभव अग्रवाल और उन की पत्नी हेमलता का आईसीआईसीआई बैंक की सिविल लाइंस ब्रांच में जौइंट एकाउंट था. 14 मई को जब वह कोर्ट जा रहे थे तो करीब सवा 10 बजे उन के मोबाइल पर एक फोन आया. वैभव ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से फोन करने वाले ने खुद को आईसीआईसीआई बैंक का अफसर बता कर कहा कि उन्होंने बैंक को अपना पैन नंबर नहीं दिया है, इसलिए तत्काल पैन कार्ड की कौपी जमा करा दें. इस पर वैभव ने एकदो दिन में कौपी जमा कराने को कह दिया. फोन करने वाले ने कहा कि उन का खाता अपडेट करना है, जिस के लिए उन्हें कुछ जरूरी जानकारी चाहिए. उस वक्त वैभव की कुछ समझ में नहीं आया और उन्होंने पूछने वाले को वांछित जानकारी दे दी.

वैभव ने गाड़ी चलातेचलाते ट्रैपिँक की टेंशन में जानकारी तो दे दी, लेकिन उन्हें कुछ संदेह हुआ. संदेह होते ही वह बैंक की ओर दौड़े. बैंक जा कर उन्होंने मैनेजर फैजान अब्बासी से पूरी बात बता कर तुरंत खाता ब्लौक करने को कहा, लेकिन अब्बासी ने उन की बात पर ध्यान नहीं दिया. इस के बाद वैभव के फोन पर 4 मैसेज आए, जिन में उन के एकाउंट से 50-50 हजार रुपए निकाले जाने की जानकारी दी गई थी. उस समय वैभव के एकाउंट में 2 लाख 10 हजार रुपए पड़े थे, जिन में से 2 लाख रुपए निकाल लिए गए थे. इस के बाद वह फिर बैंक गए और बैंक मैनेजर को मोबाइल के मैसेज दिखा कर अविलंब खाता ब्लौक करने को कहा. आरोप के अनुसार, बैंक मैनेजर ने खाता ब्लौक करने में आनाकानी की.

इस पर वैभव ने अपने साथियों को सूचना दे कर बुला लिया. तत्पश्चात वह अधिवक्ता राकेश वशिष्ठ, धर्मवीर सिंह, आदेश कुमार को साथ ले कर थाना सिविल लाइंस पहुंचे और बैंक प्रबंधक फैजान अब्बासी के खिलाफ धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का आरोप लगा कर आईपीसी की धारा 420, 406 और आइटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. वैभव का कहना था कि अगर समय रहते उन का खाता ब्लौक कर दिया गया होता तो उन के साथ यह धोखाधड़ी नहीं होती. यह मामला चूंकि एक अधिवक्ता से जुड़ा था, इसलिए पुलिस भी तुरंत हरकत में आ गई. पुलिस ने तुरंत बैंक जा कर पूछताछ की तो बैंक ने स्टेट बैंक औफ इंडिया के 4 खातों के नंबर उपलब्ध कराए, जिन में वैभव के खाते से रकम ट्रांसफर की गई थी.

पुलिस ने स्टेट बैंक जा कर पूछताछ की तो पता चला कि उन खातों में ट्रांसफर हुई रकम निकाल ली गई है. ये सभी खाते झारखंड के थे. बाद में यह मुकदमा विवेचना के लिए साइबर सेल को ट्रांसफर कर दिया गया. इस मामले में साइबर विशेषज्ञों का मानना था कि शातिर ठगों ने पहले वैभव अग्रवाल के बैंक खाते में औनलाइन सेंध लगाई होगी, उस के बाद उन का कोड बदलने की प्रक्रिया अपनाई होगी. इस तरह का यह पहला मामला सामने आया था, वरना इस से पहले जो ठगियां हुई थीं, वे एटीएम की जानकारी ले कर हुई थीं.

इस से पहले स्टेशन के सामने रेलवे की डबल स्टोरी बिल्डिंग में रहने वाले नदरुल हसन को एटीएम कार्ड की जानकारी ले कर ठगा गया था. मई के पहले हफ्ते में रेलवे कर्मचारी नदरुल हसन के मोबाइल पर एक महिला का फोन आया. उस ने खुद को बैंक अधिकारी बताते हुए कहा, ‘‘देखिए, आप के बैंक एकाउंट में प्रौब्लम आ गई है. हमें उसे अपडेट करना है, वरना आप का एटीएम कार्ड काम करना बंद कर देगा.’’

यह सुन कर नदरुल घबरा गए. उन्होंने उस महिला को अपने बैंक एकाउंट से संबंधित सारी जानकारी दे दी. एटीएम कार्ड का सीक्रेट कोड भी बता दिया. इस के चंद मिनट बाद नदरुल हसन के मोबाइल पर उन के एकाउंट से 12,300 रुपए कटने का मैसेज आ गया. इस से वह समझ गए कि उन के साथ धोखाधड़ी हुई है. उन्होंने 3 मई, 2015 को इस मामले की रिपोर्ट थाना कोतवाली में लिखा दी. इस से पहले 2 दिसंबर, 2014 को भी थाना कटघर में एक ऐसी ही रिपोर्ट दर्ज हुई थी. यह रिपोर्ट सूरजनगर निवासी वीर सिंह ने लिखाई थी. दरअसल वीर सिंह को मुंबई से एक तथाकथित बैंक अफसर का फोन आया था. उस ने वीर सिंह से कहा था, ‘‘आप का एटीएम बंद होने वाला है. अगर आप चाहते हैं कि एटीएम काम करता रहे तो हमें आप का खाता अपडेट करना पड़ेगा.’’

‘‘इस के लिए मुझे क्या करना होगा?’’ वीर सिंह ने पूछा तो फोन करने वाले ने उन से उन के खाते और एटीएम के बारे में पूरी जानकारी मांग ली, एटीएम का सीक्रेट कोड भी. इस के 5 मिनट बाद ही वीर सिंह के मोबाइल पर उन के खाते से 46,400 रुपए कटने का मैसेज आ गया. ठगे जाने का अहसास हुआ तो वीर सिंह ने थाना कटघर में रिपोर्ट दर्ज करा दी. यही सब अनीता के साथ भी हुआ था. चांदपुर के हिंदू इंटर कालेज की शिक्षिका अनीता मुरादाबाद के जिला चिकित्सालय के परिसर में रहती हैं. 23 फरवरी, 2015 को अनीता के मोबाइल पर किसी तथाकथित बैंक अफसर का फोन आया. उस ने अनीता से कहा, ‘‘आप का एटीएम कार्ड बंद हो गया है. अगर आप चाहती हैं कि आप का एटीएम चालू रहे तो हमें आप का एकाउंट अपडेट करना पड़ेगा.’’

‘‘उस के लिए मुझे क्या करना होगा?’’ अनीता ने पूछा तो फोन करने वाले ने उन से उन का खाता नंबर से ले कर उन के एटीएम कार्ड से जुड़ी सारी जानकारी मांग ली. फोन बैंक से ही आया होगा, यह सोच कर अनीता ने सब कुछ बता दिया. इस के चंद मिनटों बाद ही उन के एकाउंट से 11,300 रुपए कट गए. फोन पर इस रकम के निकलने का मैसेज आया तो अनीता को ठगे जाने का अहसास हुआ. बाद में उन्होंने थाना कोतवाली में इस की रिपोर्ट लिखा दी. एसएसपी लव कुमार के आदेश पर ये सारे मामले जांच के लिए साइबर सेल को सौंप दिए गए थे. साइबर सेल ने अपने स्तर पर जांच की तो पता चला कि जिन नंबरों से फोन किए गए थे, वे सब झारखंड के थे. यानी यह काम झारखंड में बैठेबैठे किया जा रहा था.

जब इन मामलों की फाइलें नवनियुक्त एसपी सिटी रामसुरेश यादव के सामने आईं तो उन्होंने इन मामलों की तह तक जाने का फैसला किया. इस के लिए उन्होंने साइबर सेल और क्राइम ब्रांच की एक संयुक्त टीम बनाई. इस टीम में इंसपेक्टर देवप्रकाश शुक्ल, संजय कुमार सिंह, धर्मेंद्र यादव, एन.के. भटनागर, सबइंसपेक्टर राजकुमार शर्मा, रघुराज सिंह और साइबर सेल के ललित सैनी, दीपक कुमार और अंकित कुमार को शामिल किया गया. इस टीम ने यह पहले ही पता कर लिया था कि जिन नंबरों से ठगे गए लोगों को फोन किए गए थे, वे सब पटना से खरीदे गए थे.

पुलिस टीम 15 मई, 2015 को पटना के लिए रवाना हुई. पटना पहुंच कर मुरादाबाद की इस पुलिस टीम ने पटना रेलवे स्टेशन के सामने एमसी बुद्ध मार्ग पर जनरल स्टोर चलाने वाले यशोवर्धन पंकज को पकड़ा. उस की मोबाइल की दुकान और साइबर कैफे भी था. जिन सिम नंबरों से फोन आए थे, वे यशोवर्धन पंकज की दुकान से ही खरीदे गए थे. यशोवर्धन ने सिम खरीदने वालों के आईडी प्रूफ की कौपी पुलिस को मुहैया करा दी. लेकिन जब पुलिस टीम ने उन आईडी प्रूफों की छानबीन की तो वे सभी फरजी पाए गए. दरअसल पंकज शातिर व्यक्ति था. उस ने पुलिस के पहुंचने से पहले ही एंट्री रजिस्टर और कंप्यूटर रिकौर्ड गायब कर दिया था. बहरहाल पुलिस ने पंकज को पर्सनल बांड पर छोड़ दिया.

जब पंकज से कुछ हासिल नहीं हो सका तो पुलिस टीम ने मुरादाबाद फोन कर के कुछ जानकारियां लीं. पता चला कि रेलवे कालोनी में रहने वाले नदरुल हसन और सूरजनगर निवासी वीर सिंह के बैंक खातों से जो पैसा ट्रांसफर हुआ था, वह झारखंड के जिला जामतारा के करमाटांड स्थित स्टेट बैंक औफ इंडिया के खाताधारक सुधीर मंडल के खाते में औनलाइन गया था. यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम जिला जामतारा स्थित करमाटांड जा पहुंची. वहां स्थित स्टेट बैंक औफ इंडिया से सुधीर मंडल का पता मिल गया. वह गांव गुनीडीह का रहने वाला था. हालांकि वह जगह नक्सलवादी क्षेत्र में थी. लेकिन पुलिस टीम ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने गांव गुनीडीह जा कर सुधीर मंडल को धर दबोचा.

प्राथमिक पूछताछ में उस ने बताया कि इस काम में गांव सियाटांड निवासी नेपाल मंडल भी उस का साथ देता था. पुलिस टीम ने सियाटांड जा कर नेपाल मंडल को भी गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों से वे फरजी सिम तो बरामद हो ही गए, जिन से नदरुल हसन और वीर सिंह को फोन किए गए थे, साथ ही 4 मोबाइल फोन और औनलाइन खरीदा गया सोनी कंपनी का एक हैंडीकैम भी बरामद हुआ. साथ ही कई एटीएम कार्ड भी. पुलिस दोनों को जामतारा की अदालत में पेश कर के ट्रांजिट वारंट पर मुरादाबाद ले आई. पूछताछ के बाद दोनों को 21 मई को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. पुलिस के अनुसार, झारखंड के करमाटांड और नारायणपुर थानाक्षेत्र में एटीएम ठगों का गढ़ है. इस क्षेत्र के करीब ढाई हजार युवा एटीएम से ठगी के धंधे में लगे हैं, जिन में लड़कियां भी शामिल हैं.

इन लड़कियों की हिंदी और अंगरेजी पर अच्छी पकड़ है. यह एक ऐसा गढ़ है, जहां एटीएम के माध्यम से ठगी की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है यानी कोचिंग दी जाती है. कोचिंग में न केवल फोन पर बात करना सिखाया जाता है, बल्कि अफसरों की तरह बात करने के तरीके की बारीकियां भी सिखाई जाती हैं. यह एक ऐसा इलाका है, जहां एटीएम से ठगी कुटीर उद्योग का रूप ले चुकी है. पहले इस क्षेत्र के लोग जहरखुरानी गिरोह के रूप में काम करते थे. इस धंधे में पकड़धकड़ बढ़ गई तो ये लोग एटीएम ठगी के धंधे से जुड़ गए. इस इलाके में 10 साल से ले कर 30-35 साल तक के किशोर, युवा और जवान इस काम में लगे हुए हैं. इन लोगों को यहां एटीएम तोड़ू के नाम से जाना जाता है. सुबूत न होने से स्थानीय पुलिस इन का कुछ नहीं बिगाड़ पाती.

दरअसल, सौफ्टवेयर डेवलपमेंट का मुख्य केंद्र कोलकाता यहां से महज 150 किलोमीटर दूर है. वहां काम की तलाश में गए कुछ युवाओं ने यह तकनीक सीखी और अपने क्षेत्र में लौट कर लोगों को कोचिंग दी. अब ये लोग एयरटेल मनी, औक्सीजन वौलेट, वोडाफोन एमपेसा आदि का प्रयोग कर के एटीएम कार्डधारक के खाते की रकम ट्रांसफर कर लेते हैं. इस क्षेत्र के युवा घर बैठे इसी तरह हर महीने 20-30 हजार रुपए, कभी तो लाखों कमा लेते हैं. इन लोगों का यह धंधा पूरे भारत में चलता है. यही वजह है कि इस इलाके में आए दिन किसी न किसी प्रदेश की पुलिस आरोपियों की तलाश में आती रहती है. वैसे यहां के धंधेबाजों का उस्ताद कोलकाता निवासी पिंटू चौधरी को बताया जाता है, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं लग रहा है. Cyber Fraud

 

Crime Stories: पहली ही रात भागी दुल्हन

Crime Stories: 26 साल के छत्रपति शर्मा की आंखों में नींद नहीं थी. वह लगातार अपनी नईनवेली बीवी प्रिया को निहार रहा था. जैसे ही प्रिया की नजरें उस से टकराती थीं, वह शरमा कर सिर झुका लेती थी. 20 साल की प्रिया वाकई खूबसूरती की मिसाल थी. लंबी, छरहरी और गोरे रंग की प्रिया से उस की शादी हुए अभी 2 दिन ही गुजरे थे, लेकिन शादी के रस्मोरिवाज की वजह से छत्रपति को उस से ढंग से बात करने तक का मौका नहीं मिला था.

छत्रपति मुंबई में स्कूल टीचर था. उस की शादी मध्य प्रदेश के सिंगरौली शहर के एक खातेपीते घर में तय हुई थी और शादी मुहूर्त 23 नवंबर, 2017 का निकला था. इस दिन वह मुंबई से बारात ले कर सिंगरौली पहुंचा और 24 नवंबर को प्रिया को विदा करा कर वापस मुंबई जा रहा था. सिंगरौली से जबलपुर तक बारात बस से आई थी. जबलपुर में थोड़ाबहुत वक्त उसे प्रिया से बतियाने का मिला था, लेकिन इतना भी नहीं कि वह अपने दिल की बातों का हजारवां हिस्सा भी उस के सामने बयां कर पाता.

बारात जबलपुर से ट्रेन द्वारा वापस मुंबई जानी थी, जिस के लिए छत्रपति ने पहले से ही सभी के रिजर्वेशन करा रखे थे. उस ने अपना, प्रिया और अपनी बहन का रिजर्वेशन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस के एसी कोच में और बाकी बारातियों का स्लीपर कोच में कराया था. ट्रेन रात 2 बजे के करीब जब जबलपुर स्टेशन पर रुकी तो छत्रपति ने लंबी सांस ली कि अब वह प्रिया से खूब बतियाएगा. वजह एसी कोच में भीड़ कम रहती है और आमतौर पर मुसाफिर एकदूसरे से ज्यादा मतलब नहीं रखते. ट्रेन रुकने पर बाराती अपने स्लीपर कोच में चले गए और छत्रपति, उस की बहन और प्रिया एसी कोच में चढ़ गए. छत्रपति की बहन भी खुश थी कि उस की नई भाभी सचमुच लाखों में एक थी. उस के घर वालों ने शादी भी शान से की थी.

जब नींद टूटी तो…

कोच में पहुंचते ही छत्रपति ने तीनों के बिस्तर लगाए और सोने की तैयारी करने लगा. उस समय रात के 2 बजे थे, इसलिए डिब्बे के सारे मुसाफिर नींद में थे. जो थोड़ेबहुत लोग जाग रहे थे, वे भी जबलपुर में शोरशराबा सुन कर यहांवहां देखने के बाद फिर से कंबल ओढ़ कर सो गए थे. छत्रपति और प्रिया को 29 और 30 नंबर की बर्थ मिली थी.

जबलपुर से जैसे ही ट्रेन रवाना हुई, छत्रपति फिर प्रिया की तरफ मुखातिब हुआ. इस पर प्रिया ने आंखों ही आंखों में उसे अपनी बर्थ पर जा कर सोने का इशारा किया तो वह उस पर और निहाल हो उठा. दुलहन के शृंगार ने प्रिया की खूबसूरती में और चार चांद लगा दिए थे. थके हुए छत्रपति को कब नींद आ गई, यह उसे भी पता नहीं चला. पर सोने के पहले वह आने वाली जिंदगी के ख्वाब देखता रहा, जिस में उस के और प्रिया के अलावा कोई तीसरा नहीं था.

जबलपुर के बाद ट्रेन का अगला स्टौप इटारसी और फिर उस के बाद भुसावल जंक्शन था, इसलिए छत्रपति ने एक नींद लेना बेहतर समझा, जिस से सुबह उठ कर फ्रैश मूड में प्रिया से बातें कर सके. सुबह कोई 6 बजे ट्रेन इटारसी पहुंची तो प्लैटफार्म की रोशनी और गहमागहमी से छत्रपति की नींद टूट गई. आंखें खुलते ही कुदरती तौर पर उस ने प्रिया की तरफ देखा तो बर्थ खाली थी. छत्रपति ने सोचा कि शायद वह टायलेट गई होगी. वह उस के वापस आने का इंतजार करने लगा.

ट्रेन चलने के काफी देर बाद तक प्रिया नहीं आई तो उस ने बहन को जगाया और टायलेट जा कर प्रिया को देखने को कहा. बहन ने डिब्बे के चारों टायलेट देख डाले, पर प्रिया उन में नहीं थी. ट्रेन अब पूरी रफ्तार से चल रही थी और छत्रपति हैरानपरेशान टायलेट और दूसरे डिब्बों में प्रिया को ढूंढ रहा था. सुबह हो चुकी थी, दूसरे मुसाफिर भी उठ चुके थे. छत्रपति और उस की बहन को परेशान देख कर कुछ यात्रियों ने इस की वजह पूछी तो उन्होंने प्रिया के गायब होने की बात बताई. इस पर कुछ याद करते हुए एक मुसाफिर ने बताया कि उस ने इटारसी में एक दुलहन को उतरते देखा था.

इतना सुनते ही छत्रपति के हाथों से जैसे तोते उड़ गए. क्योंकि प्रिया के बदन पर लाखों रुपए के जेवर थे, इसलिए किसी अनहोनी की बात सोचने से भी वह खुद को नहीं रोक पा रहा था. दूसरे कई खयाल भी उस के दिमाग में आजा रहे थे. लेकिन यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी कि आखिरकार प्रिया बगैर बताए इटारसी में क्यों उतर गई? उस का मोबाइल फोन बर्थ पर ही पड़ा था, इसलिए उस से बात करने का कोई और जरिया भी नहीं रह गया था. एक उम्मीद उसे इस बात की तसल्ली दे रही थी कि हो सकता है, वह इटारसी में कुछ खरीदने के लिए उतरी हो और ट्रेन चल दी हो, जिस से वह पीछे के किसी डिब्बे में चढ़ गई हो. लिहाजा उस ने अपनी बहन को स्लीपर कोच में देखने के लिए भेजा. इस के बाद वह खुद भी प्रिया को ढूंढने में लग गया.

भुसावल आने पर बहन प्रिया को ढूंढती हुई उस कोच में पहुंची, जहां बाराती बैठे थे. बहू के गायब होने की बात उस ने बारातियों को बताई तो बारातियों ने स्लीपर क्लास के सारे डिब्बे छान मारे. मुसाफिरों से भी पूछताछ की, लेकिन प्रिया वहां भी नहीं मिली. प्रिया नहीं मिली तो सब ने तय किया कि वापस इटारसी जा कर देखेंगे. इस के बाद आगे के लिए कुछ तय किया जाएगा. बात हर लिहाज से चिंता और हैरानी की थी, इसलिए सभी लोगों के चेहरे उतर गए थे. शादी की उन की खुशी काफूर हो गई थी.

प्रिया मिली इलाहाबाद में, पर…

इत्तफाक से उस दिन पाटलिपुत्र एक्सप्रैस खंडवा स्टेशन पर रुक गई तो एक बार फिर सारे बारातियों ने पूरी ट्रेन छान मारी, लेकिन प्रिया नहीं मिली. इस पर छत्रपति अपने बड़े भाई और कुछ दोस्तों के साथ ट्रेन से इटारसी आया और वहां भी पूछताछ की, पर हर जगह मायूसी ही हाथ लगी. अब पुलिस के पास जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था. इसी दौरान छत्रपति ने प्रिया के घर वालों और अपने कुछ रिश्तेदारों से भी मोबाइल पर प्रिया के गुम हो जाने की बात बता दी थी.

पुलिस वालों ने उस की बात सुनी और सीसीटीवी के फुटेज देखी, लेकिन उन में कहीं भी प्रिया नहीं दिखी तो उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. इधर छत्रपति और उस के घर वालों का सोचसोच कर बुरा हाल था कि प्रिया नहीं मिली तो वे घर जा कर क्या बताएंगे. ऐसे में तो उन की मोहल्ले में खासी बदनामी होगी. कुछ लोगों के जेहन में यह बात बारबार आ रही थी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रिया का चक्कर किसी और से चल रहा हो और मांबाप के दबाव में आ कर उस ने शादी कर ली हो. फिर प्रेमी के साथ भाग गई हो. यह खयाल हालांकि बेहूदा था, जिसे किसी ने कहा भले नहीं, पर सच भी यही निकला.

पुलिस वालों ने वाट्सऐप पर प्रिया का फोटो उस की गुमशुदगी के मैसेज के साथ वायरल किया तो दूसरे ही दिन पता चल गया कि वह इलाहाबाद के एक होटल में अपने प्रेमी के साथ है. दरअसल, प्रिया का फोटो वायरल हुआ तो उसे वाट्सऐप पर इलाहाबाद स्टेशन के बाहर के एक होटल के उस मैनेजर ने देख लिया था, जिस में वह ठहरी हुई थी. मामला गंभीर था, इसलिए मैनेजर ने तुरंत प्रिया के अपने होटल में ठहरे होने की खबर पुलिस को दे दी.

एक कहानी कई सबक

छत्रपति एक ऐसी बाजी हार चुका था, जिस में शह और मात का खेल प्रिया और उस के घर वालों के बीच चल रहा था, पर हार उस के हिस्से में आई थी. इलाहाबाद जा कर जब पुलिस वालों ने उस के सामने प्रिया से पूछताछ की तो उस ने दिलेरी से मान लिया कि हां वह अपने प्रेमी राज सिंह के साथ अपनी मरजी से भाग कर आई है. और इतना ही नहीं, इलाहाबाद की कोर्ट में वह उस से शादी भी कर चुकी है. बकौल प्रिया, वह और राज सिंह एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं, यह बात उस के घर वालों से छिपी नहीं थी. इस के बावजूद उन्होंने उस की शादी छत्रपति से तय कर दी थी. मांबाप ने सख्ती दिखाते हुए उसे घर में कैद कर लिया था और उस का मोबाइल फोन भी छीन लिया था, जिस से वह राज सिंह से बात न कर पाए.

4 महीने पहले उस की शादी छत्रपति से तय हुई तो घर वालों ने तभी से उस का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था. लेकिन छत्रपति से बात करने के लिए उसे मोबाइल दे दिया जाता था. तभी मौका मिलने पर वह राज सिंह से भी बातें कर लिया करती थी. उसी दौरान उन्होंने भाग जाने की योजना बना ली थी. प्रिया के मुताबिक राज सिंह विदाई वाले दिन ही जबलपुर पहुंच गया था. इन दोनों का इरादा पहले जबलपुर स्टेशन से ही भाग जाने का था, लेकिन बारातियों और छत्रपति के जागते रहने के चलते ऐसा नहीं हो सका. राज सिंह पाटलिपुत्र एक्सप्रैस ही दूसरे डिब्बे में बैठ कर इटारसी तक आया और यहीं प्रिया उतर कर उस के साथ इलाहाबाद आ गई थी.

पूछने पर प्रिया ने साफ कह दिया कि वह अब राज सिंह के साथ ही रहना चाहती है. राज सिंह सिंगरौली के कालेज में उस का सीनियर है और वह उसे बहुत चाहती है. घर वालों ने उस की शादी जबरदस्ती की थी. प्रिया ने बताया कि अपनी मरजी के मुताबिक शादी कर के उस ने कोई गुनाह नहीं किया है, लेकिन उस ने एक बड़ी गलती यह की कि जब ऐसी बात थी तो उसे छत्रपति को फोन पर अपने और राज सिंह के प्यार की बात बता देनी चाहिए थी.

छत्रपति ने अपनी नईनवेली बीवी की इस मोहब्बत पर कोई ऐतराज नहीं जताया और मुंहजुबानी उसे शादी के बंधन से आजाद कर दिया, जो उस की समझदारी और मजबूरी दोनों हो गए थे.

जिस ने भी यह बात सुनी, उसी ने हैरानी से कहा कि अगर उसे भागना ही था तो शादी के पहले ही भाग जाती. कम से कम छत्रपति की जिंदगी पर तो ग्रहण नहीं लगता. इस में प्रिया से बड़ी गलती उस के मांबाप की है, जो जबरन बेटी की शादी अपनी मरजी से करने पर उतारू थे. तमाम बंदिशों के बाद भी प्रिया भाग गई तो उन्हें भी कुछ हासिल नहीं हुआ. उलटे 8-10 लाख रुपए जो शादी में खर्च हुए, अब किसी के काम के नहीं रहे.

मांबाप को चाहिए कि वे बेटी के अरमानों का खयाल रखें. अब वह जमाना नहीं रहा कि जिस के पल्लू से बांध दो, बेटी गाय की तरह बंधी चली जाएगी. अगर वह किसी से प्यार करती है और उसी से शादी करने की जिद पाले बैठी है तो जबरदस्ती करने से कोई फायदा नहीं, उलटा नुकसान ज्यादा है. यदि प्रिया इटारसी से नहीं भाग पाती तो तय था कि मुंबई जा कर ससुराल से जरूर भागती. फिर तो छत्रपति की और भी ज्यादा बदनामी और जगहंसाई होती.

अब जल्द ही कानूनी तौर पर भी मसला सुलझ जाएगा, लेकिन इसे उलझाने के असली गुनहगार प्रिया के मांबाप हैं, जिन्होंने अपनी झूठी शान और दिखावे के लिए बेटी को किसी और से शादी करने के लिए मजबूर किया. इस का पछतावा उन्हें अब हो रहा है. जरूरत इस बात की है कि मांबाप जमाने के साथ चलें और जातिपांत, ऊंचनीच, गरीबअमीर का फर्क और खयाल न करें, नहीं तो अंजाम क्या होता है, यह प्रिया के मामले से समझा जा सकता है. – कथा में प्रिया परिवर्तित नाम है. Crime Stories

Punjab News: यह कैसी इंसानी फिसरत

 Punjab News: घरपरिवार से दूर अकेला रह रहा राजेश पड़ोस में रहने वाली औरतों को बुरी नजर से ही नहीं देखता था, बल्कि मौका मिलने पर शरीरिक छेड़छाड़ भी कर लेता था. परेशान हो कर महिलाओं ने जब विरोध किया तो ऐसा क्या हुआ कि 3 घर बरबाद हो गए. मैं उन दिनों जिला संगरूर के शहर मलेरकोटला में बतौर थानाप्रभारी तैनात था. मलेरकोटला एक ऐतिहासिक नगर माना जाता है. सिख इतिहास में इस नगर का और नगर के नवाब का विशेष महत्त्व एवं योगदान रहा है. मानवता के रक्षक एवं सिखमुसलिम एकता के प्रतीक माने जाने वाले इस नगर में आज भी अमन और शांति है.

स्वयं को धन्य मानते हुए इस नगर में मैं शांति से नौकरी कर रहा था कि एक दोपहर 12 बजे के आसपास मुझे जो सूचना मिली, मैं उस से बेचैन हो उठा. सूचना के अनुसार बड़ाघर, ईदगाह रोड पर स्थित मामदीन मोहल्ला के वार्ड नंबर 4 में मोहम्मद सादिक, शौकत अली के मकान में हत्याएं हुई थीं. हत्या शब्द से ही डर लगता है, बात हत्याओं की आ जाए तो आम आदमी की छोड़ो, एक इंसपेक्टर होते हुए भी मैं घबरा गया था.

बहरहाल, सूचना मिलते ही मैं एक सबइंसपेक्टर, एक हेडकांस्टेबल और 2 सिपाहियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गया था. जिस मकान में वारदात हुई थी, उस के सामने मोहल्ले वालों की अच्छीखासी भीड़ जमा थी. मकान किसी परकोटे जैसा था. ऊंचीऊंची दीवारों वाले हवेलीनुमा उस मकान का किले जैसा विशाल फाटक अंदर से बंद था.

फाटक के नीचे से बहा खून बाहर गली तक आ गया था.  मौजूद लोगों से पूछने पर पता चला कि कुछ देर पहले अंदर से मारपीट और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आई थीं. उन आवाजों को सुन कर वे लोग वहां पहुंचे. उन्होंने फाटक खुलवाने के लिए बाहर लगी सांकल बजाई. दरवाजा तो नहीं खुला, फाटक के नीचे से खून जरूर बह कर बाहर आ गया. चूंकि उस मकान में कई लोग रहते थे, अगर कोई जीवित होता तो जरूर फाटक खोलता. इसी से उन लोगों ने अंदाजा लगाया कि लगता है अंदर रहने वाले सभी लोगों को मार दिया गया है. यही सोच कर उन्होंने हत्याओं की सूचना दे दी थी.

मैं ने सिपाहियों से कहा कि मोहल्ले से किसी की सीढ़ी ला कर मकान की दीवार पर लगा कर भीतर जाएं और अंदर से फाटक खोल दें, ताकि अंदर जा कर देखा जा सके कि यहां क्या हुआ था? सिपाहियों ने तुरंत एक सीढ़ी की व्यवस्था कर के फाटक खोल दिया. फाटक खुलते ही मैं ने देखा, फाटक के पास ही अंदर एक औरत की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. फाटक के नीचे से बह कर बाहर आने वाला खून उसी औरत का था. जांच आगे बढ़ाने से पहले मकान की संरचना को समझना जरूरी था. मकान मुगल शासनकाल के किसी मुसलिम अफसर या नगरसेठ की हवेली रहा होगा.

मुख्यद्वार यानी फाटक के बाद एक बेहद खूबसूरत बरामदा था, जिस के खत्म होने से पहले बाईं ओर एक बहुत बड़ा कमरा था. उस के ठीक सामने दाईं ओर भी वैसा ही एक कमरा था. बरामदा खत्म होने के बाद बाईं ओर कमरे के बजाय खुले आंगन में दीवारों के साथ खूबसूरत फूलों की क्यारियां बनी हुई थीं, जबकि दाईं ओर लाइन से 3 कमरे बने हुए थे. उस के बाद छत पर जाने के लिए सीढि़यां बनी थीं. उस के आगे सामने की दीवार से सटा लैट्रीन और बाथरूम बना था. मकान देख कर यही लगता था कि मकान में आनेजाने के लिए फाटक के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. मैं ने इस घटना की जानकारी अधिकारियों को देने के साथ फोरेंसिक टीम को भी बुला लिया था. इस के बाद मैं घटनास्थल का निरीक्षण करने लगा.

फाटक के पास बरामदे में पड़ी मृतका की उम्र 30-32 साल रही होगी. वह निहायत ही खूबसूरत और सलीके वाली औरत लग रही थी. मृतका के शरीर पर तेज धार वाले हथियार के कई घाव थे, जो काफी गहरे थे. लाश के पास ही चूडि़यों के कुछ टुकड़े पड़े थे. कुछ टुकड़े मृतका की कलाई में भी धंसे हुए थे, जहां से खून रिस रहा था. मृतका के सिर के बाल बिखरे हुए थे, पास ही बालों में लगाई जाने वाली क्लिप पड़ी थी. कुछ बरतन बरामदे में फैले हुए थे. वहां की स्थिति से साफ लग रहा था कि मृतका ने मरने से पहले खुद को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया था. लाश के निरीक्षण के दौरान मृतका की मुट्ठी में भी ढेर सारे बाल दबे दिखाई दिए. जिस कमरे के बाहर बरामदे में लाश पड़ी थी, उस कमरे में भी संघर्ष के निशान नजर आ रहे थे. कमरे के अंदर भी खून फैला हुआ था.

कमरे और बरामदे से खून सने पैरों के निशान दाईं ओर वाले कमरों की ओर गए हुए थे. निशानों का पीछा करते हुए जब मैं दूसरे कमरे में पहुंचा तो वहां भी एक 30-32 साल की महिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. उस महिला के शरीर पर भी तेजधार वाले हथियार के कई घाव थे. फर्श पर खून ही खून फैला था. उस कमरे में भी संघर्ष के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. खून सने पैरों के निशानों के आधार पर मैं तीसरे कमरे में पहुंचा तो वहां खून से लथपथ एक युवक औंधे मुंह फर्श पर पड़ा था. उस के आसपास फर्श पर खून फैला हुआ था. नजदीक से देखने पर उस की गरदन में एक हंसिया फंसा दिखाई दिया. खून गरदन से ही बह रहा था. मुझे उस में कुछ हरकत दिखाई दी तो मैं ने झट से उस की नब्ज पकड़ी. वह चल रही थी. इस का मतलब वह युवक जीवित था. मैं ने तुरंत उसे अस्पताल भिजवाया.

मेरी सूचना पर एसपी भूपिंदर सिंह विर्क, डीएसपी (डी) हरमिंदर सिंह, डीएसपी मलेरकोटला गुरप्रीत सिंह, फोरेंसिक टीम के साथ आ गए थे. अधिकारियों की उपस्थिति में फोरेंसिक टीम ने अपना काम कर लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल एवं लाशों का बारीकी से निरीक्षण किया. लाश के पास पड़ी चूडि़यों के टुकड़े, वहां बिखरे बरतनों में से एक लोटे पर खून लगा था, उसे कब्जे में ले लिया था. मृतका की मुट्ठी में दबे बाल भी सुबूत के लिए रख लिए गए थे. खून सने पैरों के जो निशान थे, फोरेसिंक टीम ने उन्हें बड़ी सफाई से उठा लिए थे. इस के अलावा अंगुलियों के निशान भी उठा लिए गए. खून सनी 3 जोड़ी चप्पलें मिली थीं, उन्हें भी जब्त कर लिया गया था. बाकी के सारे सुबूत जुटाने के बाद अन्य जरूरी काररवाई निपटाई और लाशों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पूछताछ द्वारा मिली जानकारी के अनुसार, वह मकान मोहम्मद सादिक का था, जिसे उस ने किराए पर उठा रखा था. जबकि वह खुद लोहभन में गुलजार अस्पताल के पास रहता था. मकान के बरामदे के बाईं ओर फाटक के पास जो लाश पड़ी थी, वह रिंकू की थी. वह बाईं ओर वाले कमरे में पति विजय और 2 बच्चों के साथ रहती थी. बरामदे के दाईं ओर वाले कमरे में 2 भाई रामा मंडल और सागर मंडल रहते थे. उस के आगे वाले कमरे में लालू साहू पत्नी बीना देवी और 4 बच्चों के साथ रहता था. उस कमरे में मिली लाश बीना देवी की थी. उस के आगे वाले तीसरे और अंतिम कमरे में राजेश गुप्ता अकेला ही रहता था. वही अपने कमरे में घायलावस्था में मिला था.

मकान में रहने वाले सारे किराएदार अलगअलग राज्यों के रहने वाले थे, जो कामधंधे की वजह से यहां आ कर रह रहे थे. लालू साहू मध्य प्रदेश का रहने वाला था तो रामा और सागर मंडल पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे. जबकि विजय बिहार के जिला बेगूसराय का रहने वाला था. अपने कमरे में घायल मिला राजेश गुप्ता उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर का रहने वाला था. इस मकान में रहने वाले किराएदार अपनेअपने काम से मतलब रखने वाले लोग थे. इन में राजेश ही एक ऐसा आदमी था, जो दूसरों के मामलों में दिलचस्पी रखता था. खास कर औरतों के मामले में वह कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेता था.

लालू साहू कबाड़ी का काम करता था. वह सुबह अपने गोदाम पर चला जाता था तो देर रात को ही घर लौटता था. विजय किसी फैक्ट्री में काम करता था. उस की 12 घंटे की ड्यूटी थी. वह सुबह साढ़े 7 बजे घर से निकलता तो रात साढ़े 8 बजे तक लौटता था. रामा और सागर मंडल मकानों में टाइल्स लगाने का काम करते थे, जिस से वे सुबह 7 बजे ही घर से निकल जाते थे तो उन के लौटने का कोई निश्चित समय नहीं था.  बाकी बचा राजेश, जो किसी कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड था. वह रात की ड्यूटी करता था, इसलिए जब अन्य पुरुष घर आते थे तो वह ड्यूटी पर चला जाता था और जब सभी अपनेअपने काम पर जाते थे तो वह वापस कमरे पर आ जाता था.

इस तरह दिन में वही अकेला मर्द उस मकान में रहता था. उस हवेलीनुमा मकान में दिन में केवल 3 लोग रहते थे, एक राजेश, दूसरी बीना और तीसरी रिंकू. क्योंकि इन के पति काम पर चले जाते थे तो बच्चे स्कूल चले जाते थे. पूछताछ में पता चला था कि राजेश दिलफेंक किस्म का युवक था, इसलिए ड्यूटी से आने के बाद अपने काम निपटा कर वह बीना और रिंकू के कमरों में ताकझांक किया करता था. वह जब तक जागता रहता, औरतों से छेड़छाड़ किया करता था. अश्लील फब्तियां कस कर दोनों की नाक में दम कर देता था.

राजेश की इन घटिया हरकतों की वजह से बीना और रिंकू ज्यादातर कमरों में बंद रहती थीं. लेकिन जरूरी कामों के लिए उन्हें कमरों से बाहर आना ही पड़ता था. घात लगा कर बैठा राजेश इसी मौके की तलाश में रहता था. पूछताछ में लालू और विजय ने बताया था कि कभीकभी तो वह अपने सारे कपड़े उतार कर अपने कमरे में डांस भी करने लगता था. ऐसा करने के लिए उसे मना किया जाता तो वह बेशरमी से हंसते हुए कहता, ‘‘यह मेरा कमरा है. मैं इस का किराया देता हूं, इसलिए अपने कमरे में मैं चाहे नंगा रहूं या कपड़े पहन कर घूमूं, इस में आप लोगों को क्या परेशानी है? अगर इस स्थिति में मैं आप लोगों को अच्छा लगता हूं तो आप लोग आराम से मेरे कमरे में आ सकती हैं. मैं जरा भी बुरा नहीं मानूंगा. पड़ोसी होने के नाते आप लोगों की सेवा करना मेरा धर्म बनता है.’’

इस तरह की बातें सुन कर रिंकू और बीना का दिमाग भन्ना उठता. उन का मन करता कि ईंट उठा कर उस के सिर पर दे मारें, जिस से उस का गंदा भेजा बाहर आ जाए. लेकिन चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर पा रही थीं. वे राजेश की शिकायत अपनेअपने पतियों से भी नहीं कर पा रही थीं. इस की वजह यह थी कि एक तो उन के पतियों का राजेश से झगड़ा हो जाता, जिस में किसी को भी चोट लग सकती थी. अगर चोट उन के पतियों को लग जाती तो उन के लिए मुसीबत खड़ी हो जाती. अगर कहीं चोट राजेश को लग जाती तो वह थाने चला जाता. उस के बाद उन के पतियों को पुलिस पकड़ ले जाती. यह भी उन के लिए मुसीबत बन जाती. इस के अलावा यह भी हो सकता था कि उनके पति उन्हीं पर संदेह करने लगते. दोनों ही औरतें असमंजस की स्थिति में थीं. इसलिए संभलसंभल कर कदम रख रही थीं.

लेकिन उस दिन तो हद ही हो गई. दोपहर का समय था. बीना घर के काम निपटा कर आराम करने के लिए लेट गई. रिंकू अपने कमरे में दरवाजा बंद किए लेटी थी. गरमियों के दिन थे और बिजली नहीं थी, इसलिए बीना ने कमरे का एक किवाड़ खुला छोड़ दिया था. थकी होने की वजह से लेटते ही उस की आंख लग गई. अचानक बीना को लगा कि कोई उस के शरीर से छेड़छाड़ कर रहा है. उस की आंखें खुलीं तो देखा राजेश उस की बगल में लेटा उस से छेड़छाड़ कर रहा था. वह उछल कर उठी और जोरजोर से राजेश को गालियां देने लगी. शोर सुन कर रिंकू भी बाहर आ गई. इस के बाद दोनों औरतें राजेश को भलाबुरा कहने लगीं. तब बेशरमी से हंसते हुए उस ने रिंकू से कहा, ‘‘चिल्लाती क्यों हो, तुम्हारी सहेली ने ही तो मुझे अपने कमरे में बुलाया था. अब इस में मेरा क्या दोष है?’’

राजेश की बात से दोनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. राजेश की धूर्तता से डर कर दोनों ने उस की शिकायत अपनेअपने पतियों से नहीं की. ऐसे आदमी का क्या भरोसा, कब क्या बक दे? डर के मारे दोनों चुप रह गईं. इस से राजेश की हिम्मत बढ़ गई. लेकिन जब राजेश की हरकतें बढ़ती ही गईं तो काफी सोचविचार कर दोनों ने अपनेअपने पतियों से कहा कि दिन में अकेली रहने पर राजेश उन्हें परेशान करता है. उन के साथ बदतमीजी भी करता है. विजय और लाल ने राजेश को समझाना चाहा तो उलटा वह उन्हीं के गले पड़ गया. वह जोरजोर से कहने लगा, ‘‘मैं तुम्हारी बीवियों को परेशान करता हूं या तुम्हारी बीवियां मुझे परेशान करती हैं. उन्हें संभाल कर रखो वरना अच्छा नहीं होगा.’’

दोनों सन्न रह गए. अपनी इज्जत बचाने की खातिर वे आगे कुछ नहीं बोले. इसलिए यह सब यूं ही चलता रहा. बीना और रिंकू काफी परेशान थीं और बेबस भी. आखिर उस दिन छेड़छाड़ की अति हो गई. रोज की तरह राजेश अपने कमरे में था. घर का काम निपटाने के बाद रिंकू नहाने के लिए बाथरूम की ओर जा रही थी. बीना अपने कमरे में कुछ कर रही थी. बाथरूम जाने के लिए राजेश के कमरे के सामने से ही जाना पड़ता था. रिंकू को बाथरूम की ओर जाते देख कर राजेश के शैतानी दिमाग में खुराफात सूझ गई. वह अपने कमरे से निकला और दबेपांव बाथरूम की ओर चल पड़ा.

रिंकू कपड़े उतार कर नहाने के लिए बैठने जा रही थी कि राजेश ने अचानक दरवाजे को इतनी जोर से धक्का दिया कि अंदर की सिटकनी टूट गई और दरवाजा खुल गया. रिंकू को उस हालत में पा कर वह उस से छेड़छाड़ करने लगा. डर और शरम से रिंकू का बुरा हाल था. पहले तो वह सकपकाई, लेकिन बाद में जोरजोर से चिल्लाने के साथ बाथरूम में रखी कपड़ा धोने वाली मुंगरी उठा कर उसे पीटने लगी. रिंकू की चीखें सुन कर बीना भी कमरे से बाहर आ गई थी. वस्तुस्थिति समझ कर वह भी बाथरूम पहुंची. राजेश का कौलर पकड़ कर बाथरूम से बाहर निकाला और चप्पल से पीटने लगी. तब तक रिंकू भी कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर आ गई थी. दोनों ने मिल कर राजेश की जम कर धुनाई कर दी.

इस तरह रिंकू और बीना इज्जत को बचाना मुश्किल हो गया तो रात में पतियों के वापस आने पर उन्होंने राजेश की अगलीपिछली सारी हरकतें उन से बता दीं. इस के बाद विजय और लालू ने राजेश की जम कर पिटाई की और उस की हरकतों की शिकायत थाने में कर दी. पुलिस राजेश को पकड़ कर थाने ले गई. थाने में भी उस की धुनाई की गई. इस के बाद राजेश ने गलती की लिखित माफी मांगी तो उसे छोड़ दिया गया. इस घटना के बाद कुछ दिनों तक तो राजेश शांत रहा, लेकिन उस के बाद फिर छोटीमोटी हरकतें करने लगा. उस दिन यानी जिस दिन हत्याएं हुई थीं, रोज की तरह सभी अपनेअपने कामों पर चले गए थे. रात की ड्यूटी कर के सुबह साढ़े 8 बजे के करीब राजेश कमरे पर लौटा. 9 बजे तक सभी बच्चे भी स्कूल चले गए. इस के बाद उस हवेलीनुमा मकान में रिंकू, बीना और राजेश ही रह गए. 12 बजे तक घर के काम निपटा कर रिंकू और बीना अपनेअपने कमरों में लेट गईं.

अगस्त का महीना था. हवा बंद थी, इसलिए उमस बहुत ज्यादा थी. ऊपर से बिजली भी नहीं थी. हवा आने के लिए बीना ने अपने कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था. अपने कमरे में बैठे राजेश के मन में न जाने क्या सूझी कि वह कमरे से निकला और बीना के कमरे के सामने जा कर खड़ा हो गया. खुले दरवाजे से उस ने भीतर झांक कर देखा तो बीना गहरी नींद सो रही थी. बेखबरी में उस का पेटीकोट घुटनों के ऊपर तक खिसक गया था. पलक झपकाए बिना राजेश कुछ देर तक बीना की नंगी टांगे देखता रहा. उस के बाद वह इस कदर उत्तेजित हो उठा कि दरवाजा धकेल कर कमरे में जा पहुंचा और भूखे भेडि़ए की तरह बैड पर सो रही बीना पर टूट पड़ा.

अचानक हुए इस हमले से बीना घबरा कर चिल्लाने लगी. राजेश ने जल्दी से अपना एक हाथ उस के मुंह पर रख कर धमकाया, ‘‘चुपचाप मुझे अपने मन की कर लेने दो. अगर चीखीचिल्लाई तो गला दबा कर दम निकाल दूंगा.’’

बीना को धमका कर राजेश उस के शरीर से छेड़छाड़ करने लगा. अचानक बीना ने पूरी ताकत लगा कर राजेश को धक्का दिया तो वह फर्श पर गिर पड़ा. लेकिन फुरती से उठ कर उस ने एक जोरदार थप्पड़ बीना के मुंह पर मारा. राजेश उत्तेजना में इस कदर अंधा हो चुका था कि उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. वह तेजी से बीना के कमरे से निकला और अपने कमरे से सब्जी काटने के लिए रखा हंसिया उठा लाया. बीना को डराने के लिए उस के सामने हंसिया लहराते हुए बोला, ‘‘खामोश, अगर मुंह से आवाज निकाली तो गला काट कर रख दूंगा.’’

लेकिन बीना पर राजेश की धमकी का कोई असर नहीं हुआ. वह खामोशी से अपनी इज्जत नहीं लुटवाना चाहती थी. इसलिए वह इज्जत बचाने के लिए संघर्ष करती रही. वह राजेश के चंगुल से खुद को छुड़ा कर बाहर की ओर भागना चाहती थी. जबकि राजेश की स्थिति यह थी कि जैसे किसी भूखे शेर के मुंह से मांस छीन लिया गया हो. उस ने बाहर की ओर भाग रही बीना पर हंसिये से प्रहार कर दिया. जहां हंसिया लगा था, वहां से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह फर्श पर गिर पड़ी. वह जोरजोर से चिल्लाने लगी. उस के गिरते ही राजेश तो उस पर लगातार कई वार कर दिए. अब तक उस की चीखपुकार सुन कर रिंकू भी आ गई थी. वहां की हालत देख कर उस की घिग्घी बंध गई.

बीना को राजेश से बचाने के लिए रिंकू कोई हथियार लेने के लिए अपने कमरे की ओर भागी. लेकिन राजेश पर उस समय खून सवार था, इसलिए वह भी उस के पीछे दौड़ा. रिंकू कोई चीज उठा पाती, इस का मौका दिए बिना ही राजेश ने हाथ में लिए हंसिये से उस पर वार कर दिया. रिंकू जान बचाने के लिए चीखते हुए कमरे से निकल कर फाटक की ओर भागी. लेकिन काल बने राजेश ने उसे बरामदे में घेर लिया और हंसिये से ताबड़तोड़ वार करने लगा. किसी कटे पेड़ की तरह लहरा कर रिंकू फर्श पर गिर पड़ी और तड़पतड़प कर थोड़ी देर में शांत हो गई. कुछ देर राजेश वहीं खड़ा रहा. इतनी देर में उस का जुनून शांत हो गया था. जब होश आया तो 2-2 लाशें और चारों ओर खून ही खून फैला देख कर उस की आत्मा तक कांप उठी.

वह कोई पेशेवर हत्यारा तो था नहीं, इसलिए यह सब देख कर उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. उसे आंखों के सामने फांसी का फंदा लहराता दिखाई दिया. पलभर में ही एक ऐसा जुनून आया, जो तूफान बन कर अपने पीछे तबाही छोड़ कर चला गया था. भविष्य की कल्पना मात्र से ही राजेश का शरीर कांप उठा. वह मकान के भीतर पागलों की तरह भागभाग कर अपने छिपने के लिए जगह ढूंढने लगा. जब उसे कोई जगह सुरक्षित नहीं दिखाई दी तो पुलिस से बचने के लिए वह हाथ में लिए हंसिये से अपनी गरदन पर वार करने लगा. पहला वार गहरा पड़ा, लेकिन उस के बाद वाले वार हलके होते गए. चौथा वार पहले वार पर पड़ा, जिस से घाव तो गहरा हो ही गया, पीड़ा की वजह से हाथ में ताकत न रहने की वजह से वह हंसिया निकाल नहीं सका, जिस से वह उसी में फंसा रह गया. राजेश बेहोश हो कर फर्श पर औंधे मुंह गिर पड़ा.

अब तक की पूछताछ से पता चला था कि राजेश द्वारा की गई दोनों महिलाओं की हत्याएं और आत्महत्या की कोशिश की वजह दुष्कर्म का प्रयास था. बहरहाल मैं दोनों महिलाओं के पतियों और मोहल्ले वालों के बयान दर्ज करने के बाद अस्पताल के लिए चल पड़ा. अस्पताल में पता चला कि राजेश की हालत काफी गंभीर थी, जिस की वजह से डाक्टरों ने उसे पटियाला के  राजेंद्रा अस्पताल के लिए रेफर कर दिया था. राजेंद्रा अस्पताल के डाक्टरों ने अथक प्रयास कर के राजेश को बचा लिया था. इस पूरे मामले में राजेश ही अकेला दोषी था. अगर उस की मौत हो जाती तो मामले की फाइल उसी दिन बंद हो जाती. लेकिन अब स्थिति बदल गई थी. राजेश बच गया था, इसलिए अब इस मामले को अदालत तक ले जाना था. मामले को मजबूत बनाने के लिए मैं साक्ष्य जुटाने लगा, जिस से मृत महिलाओं के परिजनों को न्याय मिल सके.

सिविल अस्पताल मलेरकोटला से राजेश की जो एमएलसी बनाई गई थी, उस के अनुसार राजेश की गरदन पर बाईं ओर तेजधार हथियार के 5 घाव थे. वह एमएलसी मुझे अधूरी लगी, इसलिए मैं ने पटियाला के राजेंद्रा अस्पताल से एक अन्य एमएलसी बनवाई, जिस में राजेश की बाईं आंख से ले कर गरदन तक तेजधार हथियार की 5 गंभीर चोटें थीं. बाएं हाथ पर कटे के 3 निशान और दाहिने हाथ पर भी चोट का एक निशान था, जो शायद छीनाझपटी में लग गया था. डाक्टरों की कोशिश से राजेश की हालत में तेजी से सुधार हो रहा था. अब वह बिना किसी की मदद के चलनेफिरने लगा था. लेकिन एक समस्या यह खड़ी हो गई थी कि गरदन पर हंसिये की चोट की वजह से उस की आवाज चली गई थी. अब वह बोल नहीं सकता था. आगे चल कर यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन सकती थी. अदालत में वह अपनी बात किस तरह कहेगा, यह सोचसोच कर मैं परेशान था.

बहरहाल, मैं ने रिंकू और बीना की हत्या तथा आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा राजेश के विरुद्ध दर्ज कर के सुबूत जुटाने शुरू कर दिए. एक दिन सवेरे पता चला कि राजेश निगरानी पर तैनात सिपाही को चकमा दे कर फरार हो गया है. मेरे लिए यह बहुत बड़ी परेशानी खड़ी हो गई थी. भले ही राजेश गंभीर रूप से घायल था, लेकिन उस ने जो जघन्य अपराध किया था, उस के लिए उसे सजा मिलनी ही चाहिए थी. मेरी नौकरी खतरे में पड़ गई थी. सब से बड़ी बात यह थी कि मेरी पूरी उम्र की बेदाग नौकरी के अंत में एक ऐसा कलंक लगने वाला था, जो लाख प्रयास के बाद भी नहीं छुड़ाया जा सकता था. मेरे रिटायरमेंट के मात्र 2 साल बाकी थे. बहरहाल अस्पताल में राजेश की निगरानी पर लगे सिपाही को लाइनहाजिर करा कर राजेश की तलाश में जगहजगह दबिश डालनी शुरू कर दी.

राजेश के भाई रामसंजीव गुप्ता को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. वह भी मलेरकोटला में ही रहता था. उस ने बताया कि कई सालों से वह राजेश से नहीं मिला था. राजेश की हरकतों की वजह से वह न तो उसे अपने घर में घुसने देता था और न ही उस से कोई संबंध रखता था. मैं ने राजसंजीव से उस के रिश्तेदारों के पते पूछ कर उन के यहां छापे मारे, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. शहर की मैं ने पहले ही नाकेबंदी करवा दी थी. उस की शिनाख्त के लिए इतना ही काफी था कि उस के सिर से ले कर गरदन तक पट्टियां लिपटी थीं. वह आसानी से पहचाना जा सकता था और शायद इसीलिए 2 दिनों बाद वह मोहम्मद अयूब नामक एक इज्जतदार आदमी के साथ थाने आ कर मेरे सामने खड़ा हो गया. शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था या उसे अपने असहाय होेने का अंदाजा लग गया था.

थाने में मैं ने राजेश से पूछताछ शुरू की. इशारों से उस ने वे सारी बातें बता दीं, जो लोगों ने मुझे जांच के दौरान बताई थीं. बहरहाल मैं ने उस का बयान ले कर 2 गवाहों के सामने उस के दस्तखत करवा लिए. अगले दिन मैं ने उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट श्री पुष्मिंदर सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. हतयाओं का हथियार अभियुक्त की गरदन से बरामद हो गया था. धारा 313 सीआरपीसी के तहत बयान अभियुक्त ने इशारों में दर्ज करवा दिए थे. खून आलूदा एवं फिंगरप्रिंट की रिपोर्ट आने के बाद मैं ने अदालत में आरोपपत्र पेश कर दिया.

लगभग 2 सालों तक तारीखें पड़ने के बाद इस केस की गवाहियां अतिरिक्त सत्र एवं न्यायाधीश श्री बी.के. मेहता की अदालत में शुरू हुईं.  इस मुकदमे में कुल 23 गवाह थे. इस मुकदमे में ठोस सुबूत फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने पेश किए. अभियुक्त के पैरों के निशान इस मुकदमे में सजा दिलाने के लिए अहम सुबूत थे. इस के अलावा अहम सुबूत थे मृतका रिंकू की मुट्ठी में मिले राजेश के सिर के बाल. अभियुक्त राजेश की ओर से मुकदमे की पैरवी मशहूर वकील नरपाल सिंह धारीवाल कर रहे थे, जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से अमरजीत शर्मा और हरिंदर सूद थे.

अभियुक्त राजेश गुप्ता ने सफाई में कुछ नहीं कहा था. जज साहब के आदेश पर राजेश को एक प्लेन पेपर दिया गया तो उस ने उस पर अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी घटना का विवरण लिख कर जज साहब को थमा दिया था कि वह किस प्रकार वासना में अंधे हो कर रिंकू और बीना को अपनी हवस का शिकार बनाना चाहता था. जब वह इस प्रयास में सफल नहीं हुआ तो उन की किस तरह हत्या कर दी. अपने इस अपराध के लिए उस ने अदालत से माफी भी मांगी थी. जज साहब ने इस मुकदमे में अभियुक्त राजेश गुप्ता को रिंकू और बीना की हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई थी. जुरमाना अदा न करने पर उसे 6 महीने की सजा और भोगनी थी.

जज साहब ने अपने फैसले में कहा था कि राजेश ने अपनी हवस पूर्ति के लिए 2 महिलाओं की हत्या कर के 2 परिवारों को बरबाद किया है. उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए. लेकिन यह अपराध करने के बाद पश्चाताप में अभियुक्त ने आत्महत्या की कोशिश की और स्वयं अपना अपराध स्वीकार करते हुए अदालत से माफी मांगी, इसलिए उस के लिए उम्रकैद की सजा उपयुक्त है. Punjab News

 

Agra News: प्यार ने कलंकित किया रिश्ता

Agra News: पंकज और रितु सगे मामाभांजी थे, इसलिए उन्होंने प्यार और शादी कर के जो सामाजिक अपराध किया, उस की सजा उन्हें मौत को गले लगा कर चुकानी पड़ी. उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर का एक छोटा सा कस्बा है खुतार. इसी कस्बे के रहने वाले प्रकाश नारायण श्रीवास्तव अध्यापक थे. उन की संतानों में एक बेटी मीना और 3 बेटे संतोष, राजीव तथा पंकज थे. बच्चों में मीना सब से बड़ी थी. उस के सयानी होते ही प्रकाश नारायण ने उस के विवाह के लिए भागदौड़ शुरू कर दी. काफी भागदौड़ के बाद प्रकाश नारायण को मीना के लिए लखीमपुर खीरी के गांव सैकिया का रहने वाला शांतिस्वरूप पसंद आ गया. वह किसान परिवार से था. इस तरह मीना की शादी शांतिस्वरूप के साथ हो गई.

मीना ससुराल में सुखी थी, इसलिए मांबाप निश्चिंत थे. कालांतर में मीना 1 बेटे बीरू और 3 बेटियों की मां बनी. लगभग 10 साल पहले मीना की बीमारी की वजह से मौत हो गई तो शांतिस्वरूप पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. बच्चे छोटेछोटे थे, इसलिए पत्नी के बिना वह घर संभाले या बाहर के काम देखें. बड़ी बेटी स्नेहा (बदला हुआ नाम) कुछ समझदार थी, इसलिए उस ने घर संभाल लिया था. सभी बच्चे अभी पढ़ ही रहे थे. सब से छोटी सुधा (बदला हुआ नाम) 6 साल की थी, जबकि मंझली रितु करीब 10 साल की. समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा और जख्म धीरेधीरे भरते गए.

शांतिस्वरूप की ससुराल खुतार और उन के गांव सैकिया के बीच 10-12 किलोमीटर की दूरी थी, इसलिए दोनों ओर से लोगों का आनाजाना लगा रहता था. प्रकाश नारायण का बड़ा बेटा यानी शांतिस्वरूप का बड़ा साला संतोष परचून की दुकान करता था, उस से छोटा राजीव पढ़लिख कर एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहा था. सब से छोटा पंकज डेकोरेशन का काम करता था. कुल मिला कर प्रकाश नारायण का परिवार व्यवस्थित हो चुका था, लेकिन बेटी की मौत का सदमा उन्हें कुछ ऐसा लगा कि उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था.

कौन जानता था कि समय के साथ ऐसा जलजला आएगा कि दोनों परिवारों की इज्जत का जनाजा निकल जाएगा. पंकज घर का सब से छोटा बेटा था, इसलिए सभी का लाडला था. मीना अपने इस छोटे भाई से बहुत प्यार करती थी, इसलिए बहन की मौत से पंकज को गहरा आघात लगा था. बहन के जीवित रहने पर वह उस के यहां अकसर जाया करता था, इसलिए बहन के बच्चों को भी अपने छोटे मामा पंकज से काफी लगाव था. रितु को ननिहाल में कुछ ज्यादा ही अच्छा लगता था, क्योंकि उसे लगता था कि तीनों मामा उसे हाथोंहाथ लिए रहते हैं. छोटे मामा तो उस की हर इच्छा पूरी करने को तैयार रहते हैं.

रितु का मामा के यहां आनाजाना लगा रहा. रितु 15 साल की हो गई. इस उम्र में आतेआते वह काफी खूबसूरत लगने लगी थी. ननिहाल में ज्यादातर समय उस का टीवी देखने में गुजरता था. टीवी के छोटे परदे पर नजर आने वाले लड़के उसे बहुत अच्छे लगते थे. कभीकभी उन में कोई लड़का उसे पंकज मामा जैसा लगता था. एक दिन टीवी देखते समय अचानक पंकज आ गया तो उस ने कहा, ‘‘मामा, आप बहुत स्मार्ट हैं, एकदम टीवी सीरियलों में आने वाले हीरो जैसे लगते हैं.’’

रितु, जो पंकज के सामने अभी बच्ची थी, अचानक उसे वह हीरो जैसा लगने लगा था. पंकज ने ध्यान से देखा, तब उसे लगा कि रितु अब बच्ची नहीं रही, वह जवान हो गई है. वह ऐसा क्षण था, जब वह भूल गया कि रितु उस की सगी बहन की बेटी यानी सगी भांजी है. उसी एक क्षण में उस का दिमाग कुछ तरह बदला कि उस की सोच ही बदल गई. पंकज के दिलोदिमाग पर रितु कुछ इस कदर छाई कि वह यह भूल गया कि रितु उस की सगी भांजी है. रितु उम्र में भी उस से बहुत छोटी थी. वह क्षण ऐसा था, जिस ने रिश्तों में ही नहीं, जिदंगी में ही आग लगा दी. आखिर इस की परिणति वही हुई, जैसा ऐसे रिश्तों में होता है. इस रिश्ते ने खुतार के सीने पर एक ऐसी कलंक कथा लिख डाली, जिस ने रिश्तों को ही नहीं, समाज को भी शर्मसार कर दिया.

बड़ेबुजुर्गों ने कहा है कि कदम बढ़ाने से पहले खूब सोचविचार लेना चाहिए. कहीं वह कदम गलत राह पर तो नहीं ले जा रहा. रितु के पास से अपने कमरे में आने के बाद पंकज विचारों में ऐसा खोया कि उसे समय का पता ही नहीं चला. शाम को रितु ने आ कर उस का कंधा पकड़ कर हिलाते हुए कहा, ‘‘उठो मामा, आज खाना नहीं खाना क्या?’’

रितु के मुलायम स्पर्श ने आग में घी का काम किया. पंकज झटके से उठा और रितु को बांहों में भर कर सीने से लगा लिया. रितु हैरान रह गई. वह इतनी बड़ी और समझदार हो चुकी थी कि स्पर्श के मायने पहचानने लगी थी. यह स्पर्श मामा का नहीं, बल्कि एक मर्द का था. उस का तन ही नहीं, मन भी झनझना उठा था. वह एकदम से घबरा गई. उस ने खुद को मामा की बांहों से आजाद किया और हांफती हुई बाहर आ गई. बाहर आते ही सामने नानी पड़ गईं. उस की हालत देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ रितु, हांफ क्यों रही है?’’

‘‘कुछ नहीं नानी, ऐसे ही.’’ कह कर वह नानी के कमरे में चली गई.

रात जैसेतैसे बीती. सुबह होते ही रितु ने कहा, ‘‘नानी, मुझे अपने घर जाना है. आप भिजवा दीजिए.’’

‘‘तू तो कह रही थी कि अभी हफ्ते भर रहूंगी. अचानक जाने का मन कैसे हो गया?’’ नानी ने पूछा.

‘‘मेरा पढ़ाई का नुकसान हो रहा है नानी, इसलिए मैं जाना चाहती हूं.’’ रितु ने कहा.

‘‘ठीक है, पंकज से कह देती हूं, वह तुझे पहुंचा देगा.’’ नानी ने कहा.

‘‘नहीं नानी, मैं पंकज मामा के साथ नहीं, राजीव मामा के साथ जाऊंगी.’’ रितु ने कहा.

पंकज कमरे में बैठा रितु की बातें सुन रहा था. झट से बाहर आ कर बोला, ‘‘अम्मा, मुझे थोड़ा काम है, इसलिए मैं इसे छोड़ने नहीं जा सकता.’’

रितु ने राहत की सांस ली. रितु शरम और डर की वजह से मामा की हरकत के बारे में किसी को कुछ नहीं बता सकी थी. अगर उस दिन रितु जरा भी हिम्मत कर गई होती तो शायद आज यह कलंक कथा न लिखी जाती. रितु चली गई. उस के जाने के बाद पंकज को लगा कि रितु के लिए उस के दिल के किसी कोने में ऐसी जगह बन गई है, जिसे अब कोई दूसरा नहीं भर सकता. हालांकि दिल और दिमाग में भारी कशमकश चल रही थी, पर दिल था कि मान ही नहीं रहा था. रितु 15 साल की थी, जबकि वह 28 साल का था.

आखिर दिल के हाथों मजबूर पंकज एक दिन रितु के घर जा पहुंचा. संयोग से जब वह वहां पहुंचा था, रितु घर में अकेली थी. यह मौका रिश्तों को दलदल में घसीटने के लिए काफी था. मामा को देख कर रितु कांप उठी, लेकिन पंकज ने उसे पास बिठा कर प्यार से समझाया, ‘‘रितु, डरने की कोई बात नहीं है. मैं जो कहने जा रहा हूं, वह तुम्हें सुनना ही पड़ेगा. मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. मैं ने इस बात पर बहुत सोचाविचारा, लेकिन आखिर में यही लगा कि अगर तुम मुझे नहीं मिली तो मैं जिंदा नहीं रह पाऊंगा.’’

रितु घबरा गई, ‘‘नहीं मामा, ऐसा मत करना.’’

‘‘अगर तुम कहती हो तो ठीक है. लेकिन सच बताओ, क्या मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता, क्या तुम्हें मुझ से प्यार नहीं है?’’

‘‘मामा, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन…’’

‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं, हां या ना में जवाब दो. अभी कोई जल्दी नहीं है, खूब सोचविचार कर फैसला कर लेना. लेकिन फैसला लेने से पहले इस बात का ध्यान रखना कि तुम मेरी यादों के सहारे जीना चाहोगी या साक्षात देखते हुए. जो भी फैसला लेना, फोन कर के बता देना.’’ कह कर पंकज ने उसे बांहों में समेटा, प्यार किया और चला गया.

रितु स्तब्ध बैठी रही. इस बार मामा का स्पर्श उसे भी कुछ अच्छा लगा था. वह जिस उम्र में थी, उस में फिसलने की संभावनाएं बहुत होती हैं. बिना मां की बेटी थी, न कोई रोकनेटोकने वाला था, न कोई राह दिखाने वाला. ऐसे में मामा ही अंगुली पकड़ कर दलदल में खींच रहा था. रितु ने ज्यादा सोचनेविचारने की जहमत नहीं उठाई और जीवन की नाव को तूफान के हवाले कर दिया.

2-3 दिनों बाद पंकज ने फोन किया, ‘‘रितु, मैं तुम से मिलने आना चाहता हूं.’’

‘‘…तो आ जाओ न.’’ रितु ने चहक कर कहा.

पंकज को लगा, जैसे किसी ने कानों में शहद घोल दिया हो. वह तुरंत सैकिया आ गया. इस के बाद वह रितु को उस दलदल में घसीट ले गया, जिस में घुसना तो आसान है, पर निकलना बहुत मुश्किल. मामाभांजी के बीच ऐसा रिश्ता बन गया, जिस की भनक घर वालों को ही नहीं, किसी को भी लग जाती तो हायतौबा मच जाती. इस के बाद रितु और पंकज का एकदूसरे के घर आनाजाना कुछ ज्यादा ही हो गया. उन का रिश्ता ऐसा था कि कोई संदेह भी नहीं कर सकता था. रितु की हर चाहत पंकज पूरी कर रहा था. सब यही समझते थे कि मामा को भांजी से कुछ ज्यादा ही प्यार है.

लेकिन सच कितने दिनों तक छिपा रहता. एक न एक दिन तो उसे उजागर होना ही था. जब पंकज का शांतिस्वरूप के घर आनाजाना कुछ ज्यादा ही हो गया तो उसे लगा, यह ठीक नहीं है. घर में बिना मां की 3 बेटियां थीं, इसलिए उन्होंने टोका, ‘‘पंकज, तुम्हें कुछ कामधाम है या नहीं, जब देखो यहीं डेरा डाले रहते हो. तुम्हारी वजह से रितु भी बेलगाम होती जा रही है. जब देखो, तब नानी के यहां जाने के लिए तैयार रहती है. पढ़ाई पर भी ध्यान नहीं देती.’’

‘‘जीजाजी, दीदी की याद आ जाती है, इसलिए चला आता हूं. अगर आप को मेरा आना अच्छा नहीं लगता तो अब नहीं आऊंगा.’’

‘‘भई, ऐसी कोई बत नहीं है. मेरे कहने का मतलब यह है कि अपने कामधंधे पर भी ध्यान दो. फालतू घूमने से कोई फायदा नहीं है.’’

पंकज समझ गया कि अब लोगों को उस पर शक होने लगा है, इसलिए उसे सतर्क हो जाना चाहिए. घर आ कर वह अपने कमरे में बैठा देर तक सोचता रहा. उस का प्यार जुनूनी होता जा रहा था. लेकिन घरपरिवार और समाज का भी डर सता रहा था. रिश्ता इतना नाजुक था कि वह रितु को अपना भी नहीं सकता था. जबकि दिल उसे छोड़ने को तैयार नहीं था. प्रेम की एकएक सीढ़ी चढ़ते हुए रितु और पंकज जिस शिखर की ओर जा रहे थे, वहां से फिसल कर आने का ही अंदेशा था. उन्हें मंजिल मिलना लगभग असंभव था, पर वे मंजिल पाने के लिए बेताब थे. जबकि मंजिल पाने की कोई राह नहीं थी. पंकज की उम्र 30 साल से अधिक हो चुकी थी. उस का कामकाज भी ठीक चल रहा था. उस की शादी के लिए भी लोग आ रहे थे. लेकिन शादी में वह रुचि नहीं दिखा रहा था. बड़े भाई ने दबाव डाला तो उस ने एक दिन साफसाफ कह दिया, ‘‘भैया, मैं शादी नहीं करूंगा.’’

‘‘तो क्या अकेले ही जिंदगी बिताओगे?’’

‘‘नहीं, अकेला तो नहीं रहूंगा, पर आप लोग मेरे लिए परेशान न हों.’’

पंकज के इस जवाब से घर के सब लोग सोचने को मजबूर हो गए कि पंकज शादी के लिए मना क्यों कर रहा है? उसी बीच शांतिस्वरूप ने संतोष को फोन कर के पंकज की शादी के लिए एक रिश्ता बताया तो उस ने कहा कि पंकज शादी नहीं करना चाहता. संतोष की बात से पंकज को ले कर कुछ आशंका हुई तो उस ने कहा, ‘‘भई पंकज का इरादा मुझे कुछ ठीक नहीं लगता. जब देखो, तब वह मेरे यहां पड़ा रहता है. रितु भी उस के कुछ ज्यादा ही मुंहलगी हो गई है. इधर वह पढ़ाई में भी ध्यान नहीं दे रही है.’’

बहनोई की बात पर संतोष के मन में भी संदेह पैदा हो गया. कहीं उस के इस इरादे के पीछे रितु तो नहीं है. आखिर शादी से मना क्यों कर रहा है? रितु और पंकज की प्रेमकहानी अब तक 5 साल पुरानी हो चुकी थी. इस बेईमान प्यार का अंजाम क्या होगा, कोई नहीं जानता था. रितु भी अपने भविष्य को ले कर परेशान थी, इसलिए एक दिन उस ने पंकज से पूछा, ‘‘अब आगे क्या होगा मामा?’’

‘‘आगे से मतलब..?’’ पंकज बोला.

‘‘मतलब यह कि आखिर इस तरह कब तक चलता रहेगा. तुम्हारा मेरे घर आना पापा को अच्छा नहीं लगता. उन्होंने साफसाफ तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उन के मन में हम लोगों को ले कर कुछ संदेह जरूर है.’’

‘‘लगता तो मुझे भी कुछ ऐसा ही है. मैं जल्दी ही कुछ करने की सोचता हूं.’’

‘‘क्या सोचोगे, हमारे सामने एक ओर कुआं है तो दूसरी ओर खाई. हमारे दोनों ओर खतरा है. अभी तो हमारे संबंधों के बारे में कोई कुछ नहीं जानता, लेकिन जिस दिन इस का खुलासा होगा, पहाड़ टूट पड़ेगा.’’

पंकज और रितु की दीवानगी बढ़ती जा रही थी. दोनों ही एकदूसरे को अपने अस्तित्व का हिस्सा मानने लगे थे, इसलिए जिंदगी एक साथ बिताना चाहते थे. पर यह उन के लिए आसान नहीं था. रितु तो उतनी समझदार नहीं थी, पर पंकज समझदार था. वह हमेशा इसी चिंता में डूबा रहता कि घर वालों से कैसे बताए कि वह अपनी सगी भांजी से प्यार करता है और उसी से शादी करना चाहता है. वह जानता था कि घर वालों की छोड़ो, समाज भी उसे इस रिश्ते की अनुमति नहीं देगा. जो भी सुनेगा, वही धिक्कारेगा. कभीकभी उसे लगता कि उसी ने रितु को गुमराह किया है. उस ने उस के साथ शारीरिक संबंध बना कर पवित्र रिश्ते को कलंकित किया है. लेकिन उस दिल का वह क्या करे, जिस ने मजबूर करा कर यह सब कराया है.

पंकज भांजी के साथ प्यार की राह में इतनी दूर आ चुका था कि किसी भी कीमत में वापस नहीं लौट सकता था. प्यार का जुनून सिर चढ़ कर बोल रहा था. आखिर एक दिन संतोष ने रितु को पंकज की बांहों में  देख लिया तो पूछा, ‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’

‘‘भैया, मेरी जिंदगी का यही सच है. मैं रितु से प्यार करता हूं और इसी के साथ शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘यह हरगिज नहीं हो सकता. हम समाज, अपने बहनोई और स्वर्गवासी बहन को क्या जवाब देंगे. तुम इतना नीचे गिर जाओगे, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था. अभी तो सिर्फ मुझे पता चला है, अगर घर के बाकी के लोगों को इस बारे में पता चलेगा तो वे क्या सोचेंगे. अच्छा होगा, तुम इस मामले को यहीं खत्म कर के हम सभी जिस तरह सिर उठा कर जी रहे हैं, उसी तरह जीने दो.’’ संतोष ने कहा. पंकज ने भाई को समझाने की बहुत कोशिश की कि वह रितु से बहुत प्यार करता है और उस के बिना जीवित नहीं रह सकता. पर वह बिलकुल नहीं माने. उन्होंने पंकज को खूब लताड़ा और उसी वक्त राजीव के साथ रितु को उस के घर भिजवा दिया. संतोष ने रितु को भले ही उस के घर भिजवा दिया, पर पंकज ने साफ कह दिया, ‘‘भले ही पूरी दुनिया उस की दुश्मन हो जाए, पर रितु से उसे कोई अलग नहीं कर सकता.’’

संतोष पंकज की इस धमकी से परेशान था. अगर किसी को भी उस की हरकत के बारे में पता चल गया तो उस का परिवार इस कदर बदनाम हो जाएगा कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. लोग थूकेंगे उस के परिवार पर. उस की यह परेशानी उस के चेहरे पर साफ झलक रही थी. आखिर एक दिन पत्नी ने पूछ ही लिया. तब बेचैन संतोष ने मन हलका करने के लिए सारी बात पत्नी को बता दी. वह भी सन्न रह गई. धीरेधीरे घर में इस बात की जानकारी सब को हो गई. लेकिन पंकज का घर में दबदबा था, इसलिए कोई भी उसे इस रिश्ते को खत्म करने के लिए विवश नहीं कर सका. हां, घर वालों का व्यवहार उस के प्रति जरूर बदल गया. इस से पंकज ने इतना जरूर महसूस किया कि अब धीरेधीरे उस की परेशानी बढ़ती ही जाएगी.

उस की जिंदगी पतंग जैसी हो गई थी. पता नहीं कब कट जाए. इसलिए उस ने पक्का इरादा बना लिया कि चाहे कुछ भी हो, वह रितु से शादी करेगा और दूर कहीं जा कर अपनी गृहस्थी बसा लेगा. इस के बाद उस ने फोन कर के रितु को बता भी दिया कि 18 फरवरी को भैया के बेटे के मुंडन के बाद वह उस के साथ घर छोड़ देगा. राजीव के बेटे के मुंडन पर रितु खुतार आई. मुंडन के बाद उस ने नानी से घर भिजवाने को कहा. वहीं खड़े पंकज ने कहा, ‘‘चलो, मैं तुम्हें छोड़ आता हूं.’’

घर के सभी लोग थके थे, इसलिए पंकज को अनुमति मिल गई. किसी को क्या पता था कि उन के मन में क्या है. दोनों घर से बाहर निकले और सीधे बसअड्डे पहुंचे. वहां से बस पकड़ी और शाहजहांपुर आ गए, जहां से ट्रेन द्वारा आगरा पहुंच गए.

पंकज और रितु ने शादी करने के इरादे से घर छोड़ दिया था. ट्रेन से वे सुबह 7 बजे ईदगाह स्टेशन पर उतरे और स्टेशन के पास ही होटल डी-लौरेट में कमरा बुक करा लिया. उन्हें तीसरी मंजिल पर कमरा नंबर 310 मिला था. होटल में पंकज ने रितु को अपनी पत्नी बताया था और आईडी के रूप में अपना ड्राइविंग लाइसेंस की कौपी जमा कराई थी. जब दोनों होटल पहुंचे थे, रिसैप्शन पर मैनेजर संजय कश्यप मौजूद थे. नहाधो कर दोनों ने कपड़े बदले और नाश्ता कर के मोहब्बत की निशानी ताजमहल देखने चले गए. रितु पंकज के साथ ताजमहल के पास पहुंची तो बोली, ‘‘लगता है, शाहजहां मुमताज को बहुत प्यार करता था.’’

‘‘हां, एकदम मेरी तरह रितु. अगर शाहजहां की तरह मैं भी अमीर होता तो अपने प्यार को अमर करने के लिए इसी तरह का रितुमहल बनवाता.’’

यह सुन कर रितु को हंसी आ गई. इस के बाद दोनों ताजमहल के अंदर पहुंचे. शाहजहां और मुमताज की कब्रों को देख कर रितु ने कहा, ‘‘ये तो मर कर भी एक साथ हैं.’’

माहौल गमगीन हो गया. पंकज ने कहा, ‘‘चलो, बाहर चल कर साथसाथ फोटो खिंचवाते हैं, जो जिंदगी भर हमें याद दिलाएंगे.’’

इस के बाद दोनों ने ताज के साए में कुछ फोटो खिंचवाए. वहां से वे बाजार गए, जहां कपडे़ वगैरह खरीदे. रात 9 बजे तक उन के कमरे का दरवाजा खुला रहा. इस के बाद दरवाजा बंद हुआ तो जब सुबह 10 बजे तक उन के कमरे का दरवाजा नहीं खुला तो सर्विस बौय गब्बर ने कई बार दरवाजा खटखटाया. जब अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो वह मैनेजर संजय कश्यप के पास पहुंचा. गब्बर ने जब मैनेजर संजय कश्यप को बताया कि कमरा नंबर 301 का दरवाजा काफी खटखटाने पर भी अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है तो संजय घबरा गए. भाग कर वह ऊपर पहुंचे. उन्होंने दरवाजे के की-होल से झांक कर देखा तो लड़की के पैर लटके दिखाई दिए.

माजरा समझ में आते ही वह सन्न रह गए. उन्होंने तुरंत होटल की मालकिन शारदा रानी को सारी बात बताई. शारदा रानी ने थाना रकाबगंज पुलिस को फोन कर के घटना की सूचना दी. सूचना मिलने के बाद सीओ असीम चौधरी और थाना रकाबगंज के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सतीशचंद्र यादव पुलिस बल के साथ होटल पहुंच गए. दूसरी चाबी से दरवाजा खोला गया तो अंदर की स्थिति देख कर सभी स्तब्ध रह गए. हरे रंग की नई रस्सी के दोनों छोरों पर फंदे बना कर पंखे के सहारे एक ओर एक लड़की लटकी हुई थी तो दूसरी ओर एक लड़का.

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली. पलंग पर कुछ फोटोग्राफ्स मिले, जो ताजमहल पर खिंचवाए गए थे. बैग से कुछ गहनों के साथ मंगलसूत्र, कुछ रुपए और एक सुसाइड नोट भी मिला. पुलिस ने मामले की वीडियोग्राफी करा कर दोनों लाशों को नीचे उतरवाया. लड़की की मांग में सिंदूर भरा था. वह पैरों में बिछिया भी पहने थी. पुलिस ने सुसाइड नोट देखा तो उस में लिखा था, ‘ये फोटो हमारे प्यार की निशानी हैं, जो हम ने ताजमहल पर साथसाथ खिंचवाए थे. आप ने हमें जिंदगी जीने का जो मौका दिया था, शायद हमारी किस्मत नहीं था.

‘हम लोगों के बारे में कोई नहीं जानता कि हम कहां हैं. फिर भी रितु का यही कहना है कि हम लोग किसी को मुंह नहीं दिखा सकते. जब उस का यही फैसला है तो हम भी उस के साथ हैं.

‘हमें 2 दिन की जो जिंदगी मिली, शायद वही हमारी किस्मत थी. जो भी चुरा के घर से ले गए थे, सब आप को लौटा रहे हैं. हम ने जिंदगी में जो गलत किया, उस की कीमत हम अपनी जान दे कर चुका रहे हैं. जब हम ही नहीं होंगे तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि कौन जीता है या मरता है. हमें माफ करना या न करना, आप की मरजी.’

उन्होंने अपने इस सुसाइड नोट में साथसाथ दफनाने के लिए भी लिखा था. उन का कहना था कि वे इस जन्म में नहीं मिल सके तो कम से कम साथसाथ मर कर अगले जन्म में तो एक हो सकेंगे. सुसाइड नोट में उन्होंने दस्तखत करने के साथ फोन नंबर भी लिखे थे. पुलिस ने सुसाइड नोट में दिए नंबरों पर फोन कर के पंकज और रितु के आत्महत्या करने की सूचना दी तो कोई कुछ कहने को ही तैयार नहीं हुआ. वे आगरा आने को भी राजी नहीं थे. लेकिन न जाने क्या सोच कर सभी आने को राजी हो गए.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. शाम तक घर वाले आगरा पहुंचे तो पता चला कि सुसाइड करने वाले दोनों सगे मामाभांजी थे. उन के रिश्ते के बारे में जान कर सभी दंग रह गए. पोस्टमार्टम के बाद पंकज और रितु के शव घर वालों को सौंप दिए गए. घर वालों ने लाशें ले जाने के बजाय आगरा के ही विद्युत शवदाह गृह में दोनों का अंतिम संस्कार करा दिया. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में संतोष ने बताया कि उस ने पंकज को फोन किया था. तब उस ने यह नहीं बताया कि वह आगरा है. उस ने अगले दिन घर आने को कहा था.

दरअसल, उस दिन रितु अपने घर नहीं पहुंची तो शांतिस्वरूप ने ससुराल फोन कर के पूछा. जब उन्हें बताया गया कि रितु तो पंकज के साथ कब का निकल चुकी है, तब उन्हें समझते देर नहीं लगी कि रितु पंकज के साथ भाग चुकी है. दोनों ने जो किया था, उस से दोनों के घर वाले काफी नाराज थे. लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि वे इस तरह मौत को गले लगा लेंगे. लेकिन आशंका तो थी ही. फिर वही हुआ भी. बदनामी से बचने के लिए सभी चुप थे, लेकिन पंकज और रितु ने आत्महत्या कर के रिश्ते को कलंकित करने का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीट दिया. दरअसल, पंकज और रितु ने शादी करने का निर्णय ले लिया था. वे शादी कर के घर वालों से इतनी दूर चले जाना चाहते थे, जहां उन्हें जानने वाला कोई न हो और वे खुशीखुशी रह सकें.

पंकज ने रितु की मांग में सिंदूर भर कर शादी भी कर ली. लेकिन शादी करने के बाद दोनों को लगा होगा कि वे चाहे जहां भी रहें, हमेशा अपराधबोध से ग्रसित रहेंगे. यही नहीं, उन के बच्चों को जब उन के असली रिश्ते के बारे में पता चलेगा तो वे भी उन्हें माफ नहीं करेंगे. घर से भागने के बाद उन के घर लौटने का रास्ता पूरी तरह से बंद हो चुका था. आगे भी उन्हें कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया. घरपरिवार और समाज से कट कर जीना भी आसान नहीं था. उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ तो वे डरे कि अब क्या होगा? कोई रास्ता न देख उन का जिंदगी से मोह भंग हो गया होगा.

मन में एक ही बात आई होगी कि इस जन्म में साथ नहीं जी सके तो मर कर अगले जन्म में तो मिल सकेंगे. अगले जन्म में मिलने की उम्मीद में उन्होंने फांसी लगा ली. पंकज और रितु ने रिश्तों को कलंकित करने की लक्ष्मणरेखा लांघी तो उस की सजा उन्हें जान दे कर चुकानी पड़ी. उन्होंने तो जान दे कर मुक्ति पा ली, लेकिन घर वालों को तो इस की सजा कम से कम 2 पीढि़यों तक भोगनी पड़ेगी. Agra News

 

Actress Murder Case: टुकड़ों में मिली अभिनेत्री की लाश

Actress Murder Case: राइमा इसलाम शिमू बांग्लादेश की एक जानीमानी अभिनेत्री थीं. उन्होंने न सिर्फ 50 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, बल्कि 2 दरजन से अधिक नाटकों में भी काम कर दर्शकों के दिलों में जगह बनाई. यह महज इत्तफाक की बात है कि जिन दिनों देश भर में अपने दौर की खूबसूरत और लोकप्रिय अभिनेत्री परवीन बाबी की जिंदगी पर बनी वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ की चर्चा हो रही थी, उन्हीं दिनों बांग्लादेश की परवीन जितनी ही सैक्सी, लोकप्रिय और सुंदर एक्ट्रेस राइमा इसलाम शिमू की दुखद हत्या की चर्चा भी उतनी ही शिद्दत से हो रही थी.

फर्क सिर्फ इतना था कि परवीन बाबी की लाश उन के घर में मिली थी, जबकि राइमा की एक सड़क पर मिली थी. यह सड़क बांग्लादेश की राजधानी ढाका के केरानीगंज अलियापुर इलाके में हजरतपुर ब्रिज के नजदीक है, जो कालाबागान थाने के अंतर्गत आता है. 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिली तो बांग्लादेश में सनाका खिंच गया क्योंकि वह कोई मामूली हस्ती नहीं थीं बल्कि घरघर में उन की पहुंच थी. अपनी अभिनय प्रतिभा के दम पर उन्होंने अपना एक बड़ा दर्शक और प्रशंसक वर्ग तैयार कर लिया था.

जिस हाल में राइमा की लाश मिली थी, उस से साफ जाहिर हो रहा था कि उन की बेरहमी से हत्या की गई है. इस हादसे ने एक बार फिर साफ कर दिया कि रील और रियल लाइफ में जमीनआसमान का फर्क होता है और आमतौर पर फिल्म स्टार्स, फिर वे किसी भी देश के हों, की जिंदगी उतनी हसीन और खुशनुमा होती नहीं जितनी कि उन के जिए किरदारों में दिखती है. यही राइमा के साथ हुआ कि हत्यारा कोई और नहीं बल्कि उन का बेहद करीबी शख्स था और हत्या की वजह कोई अफेयर, पैसों का लेनदेन, कोई विवाद या नशे की लत या फिर कोई दिमागी बीमारी भी नहीं थी.

45 वर्षीय राइमा साल 1977 में ढाका के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी थीं, जिन्हें बचपन से ही अभिनय का शौक था. ढाका से स्कूल और कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक्टिंग का कोर्स भी किया था. 19 साल की उम्र में ही उन्हें ‘बर्तमान’ फिल्म में काम करने का मौका मिल गया था. निर्माता काजी हयात की इस कामयाब फिल्म से वह फिल्म इंडस्ट्री में पहचानी जाने लगीं. फिल्म समीक्षकों ने तो उन की एक्टिंग को अव्वल नंबर दिए ही थे, दर्शकों ने भी उन्हें सराहा था. इस की वजह उन का ताजगी से भरा चेहरा और बेहतर एक्टिंग के अलावा उन की कमसिन अल्हड़पन और खूबसूरती भी थी.

पहली फिल्म कामयाब होने के बाद राइमा ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. देखते ही देखते उन्होंने बांग्लादेश के तमाम दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया. इन में इनायत करीम, शरीफुद्दीन खान, दीपू, देलवर जहां झंतु और चाशी नजरूल इसलाम प्रमुख हैं. सभी छोटेबड़े निर्देशकों के साथ राइमा ने 50 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया और टीवी पर भी अपना जलवा बिखेरा.

लोगों के दिलों में बसी थीं राइमा

छोटे परदे पर आना उन की व्यावसायिक मजबूरी भी हो गई थी, क्योंकि बांग्लादेश के लोग भी टीवी धारावाहिकों को ज्यादा तरजीह देने लगे हैं. राइमा ने कोई 25 धारावाहिकों में एक्टिंग की, जिस से घरघर उन की पहुंच और स्वीकार्यता बढ़ती गई. बांग्लादेश फिल्म इंडस्ट्री के लगभग सभी बड़े नायकों के साथ उन्होंने काम किया. खासतौर से अमित हसन, बप्पाराज रियाज, शाकिब खान, जाहिद हसन और मुशर्रफ करीम के साथ उन की जोड़ी खूब जमती थी.

राइमा आला कारोबारी दिमाग की मालकिन थीं, इसलिए उन्होंने खुद का प्रोडक्शन हाउस भी खोल लिया था. जिस के तहत कई टीवी सीरियल बने थे. अलावा इस के वह फिल्म पत्रकारिता भी ‘अर्थ कोथा द नैशनल बिजनैस मैगजीन’ के लिए करती थीं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी इस एक्ट्रेस को टीवी न्यूज चैनल एटीएन बांग्ला में सेल्स एंड मार्केटिंग में वाईस प्रेसिडेंट भी नियुक्त किया गया था. जल्द ही एक नामी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी टीएन इवेंट्स लिमिटेड के सीईओ की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई थी.

इतना ही नहीं, उन्होंने बांग्लादेश में ही अपना ब्यूटी सैलून भी शुरू कर दिया था, जिस का नाम रोज ब्यूटी सैलून है. ढाका का ग्रीन रोड इलाका राइमा के घर की वजह से भी पहचाना जाने लगा, जो दर्शकों और प्रशंसकों की नजर में किसी मन्नत या जन्नत से कम नहीं था. लेकिन कोई सोच भी नहीं सकता था कि लाखों लोगों का मनोरंजन करने वाली और दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली इस एक्ट्रेस की निजी जिंदगी किसी नर्क से कम बदतर नहीं थी और इस की वजह था उन का पति शखावत अली नोबेल, जो कभी उन पर जान छिड़का करता था. इन दोनों ने 16 साल पहले लव मैरिज की थी.

शौहर ही निकला कातिल

आम दर्शक इस से ज्यादा कुछ नहीं सोच पाता कि उस की चहेती एक्ट्रेस अपने महल जैसे घर के अंदर सदस्यों के साथ हंसखेल रही होगी, रोमांस कर रही होगी या फिर डायनिंग टेबल पर बैठी लंच या डिनर कर रही होगी. और कुछ नहीं तो पति और बच्चों के साथ आंचल हवा में लहराते लौन के झूले पर झूलती गाना गा रही होगी. उस के इर्दगिर्द रंगबिरंगे फूल और चहचहाते पक्षी होंगे. सर के ऊपर नीला खुला आसमान होगा. लेकिन ऐसा कुछ भी कम से कम राइमा की जिंदगी में तो नहीं था.

पिछले कुछ दिनों से वह बेहद घुटन भरी जिंदगी जी रही थीं. आलीशान घर के अंदर कलह स्थायी रूप से पसर चुकी थी जिस से उन के दोनों बच्चे सहमेसहमे से रहते थे. राइमा और शखावत कहने और देखने को ही साथ रहते थे और मियांबीवी कहलाना भी उन की सामाजिक मजबूरी हो चली थी. लेकिन रोजरोज की मारकुटाई और कलह आम बात हो चुकी थी. यह सब कितने खतरनाक मुकाम तक पहुंच चुका था, इस का खुलासा 17 जनवरी, 2022 को राइमा की लाश मिलने के बाद हुआ. अंदर से टूटी और थकी हुई यह एक्ट्रेस 16 जनवरी को मावा एक शूटिंग के लिए गई थी. लेकिन देर रात तक वापस घर नहीं लौटी तो घर वालों को चिंता हुई क्योंकि राइमा का फोन भी बंद जा रहा था.

कालाबागान थाने में उन की गुमशुदगी की सूचना दर्ज हुई. एक रिपोर्ट राइमा की बहन फातिमा निशा ने भी लिखाई थी. पुलिस ने राइमा की ढुंढाई शुरू की, लेकिन देर रात तक कोई कामयाबी नहीं मिली तो मामला सुबह तक के लिए टल गया. इस दौरान उन का भाई शाहिदुल इसलाम खोकान लगातार पुलिस वालों से बहन को ढूंढने की गुजारिश करते खुद भी राइमा की तलाश में इस उम्मीद के साथ लगा रहा कि कहीं से कोई सुराग मिल जाए. लेकिन उस के हाथ भी मायूसी ही लगी. 17 जनवरी की सुबह कुछ राहगीरों ने हजरतपुर ब्रिज के पास एक लावारिस संदिग्ध बोरे को देख इस की खबर पुलिस को दी. पुलिस ने आ कर जैसे ही बोरे को खोला तो उस में से बरामद हुई राइमा की लाश, जो 2 टुकड़े कर बोरे में ठूंसी गई थी.

गले पर चोट के निशान भी साफसाफ दिख रहे थे, जिस से स्पष्ट हो गया कि राइमा की हत्या हुई है और लाश को यहां फेंक दिया गया है. लेकिन हत्यारा कौन हो सकता है, यह सवाल पुलिस को मथे जा रहा था. राइमा की हत्या की खबर जंगल की आग की तरह फैली और फैंस जहांतहां इकट्ठा होने लगे. शव को पोस्टमार्टम के लिए सर सलीमुल्लाह मैडिकल कालेज भेज दिया गया.

पुलिस को शखावत पर शक तो था ही, लेकिन जैसे ही राइमा के भाई शाहिदुल इसलाम खोकान ने यह कहा कि शखावत एक ड्रग एडिक्ट है. वह अकसर मेरी बहन से कलह करता था. मैं ने उस की कार में खून देखा है. वह सुबह 8 से ले कर 10 बजे तक घर पर नहीं था. मुझे लगता है कि उसी दौरान उस ने राइमा की लाश फेंक दी.

फिल्मों जैसा कत्ल

शाहिदुल की शिकायत पर पुलिस ने शखावत को घेरा तो बिना किसी ज्यादा मशक्कत के उस ने सच उगल दिया. अब तक राइमा के फैंस जगहजगह मोमबत्तियां ले कर उन की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगे थे. सोशल मीडिया पर भी राइमा छाई हुई थीं. लोग श्रद्धांजलि देते राइमा के हत्यारे को गिरफ्तार करने की मांग और प्रदर्शन कर रहे थे. हिरासत में लिए गए शखावत ने बगैर किसी खास चूंचपड़ के अपना गुनाह कुबूल लिया. उस के बयान की बिनाह पर 6 लोग और गिरफ्तार किए गए, जिन में उन का ड्राइवर और एक नजदीकी दोस्त अब्दुल्ला फरहाद भी था. फरहाद को शखावत ने फोन कर बुलाया था.

पूछताछ में पता चला कि शखावत और फरहाद ने राइमा की हत्या 16 जनवरी को ही कर दी थी. वक्त था सुबह 7 बजे का. इन दोनों ने राइमा की लाश बोरे में भर दी और उसे प्लास्टिक की डोरी से सिल दिया. यह काम इत्मीनान से बिना किसी अड़ंगे के हो सके, इस के लिए उन्होंने घर पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड को नाश्ता लेने भेज दिया था. घटनास्थल से बरामद डोरी शखावत के गले का फंदा बनेगी, यह भी तय दिख रहा है क्योंकि जब पुलिस टीम घर पहुंची थी तो इस डोरी का पूरा बंडल वहां से बरामद हुआ था. जिस से शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी.

ये दोनों लाश को ठिकाने लगाने के पहले उसे मीरपुर ले गए थे, लेकिन वहां कोई उपयुक्त सुनसान जगह नहीं मिली तो वापस घर आ गए थे. राइमा की लाश उन लोगों के लिए बोझ बनती जा रही थी. मीरपुर से वापसी के बाद दोनों रात साढ़े 9 बजे के करीब हजरतपुर ब्रिज पहुंचे और लाश वाले बोरे को वहीं फेंक दिया, लेकिन हड़बड़ाहट और जल्दबाजी में गलती से डोरी वहीं छोड़ दी, जो उन के खिलाफ एक पुख्ता सबूत बन गई. लाश फेंकने के बाद घर आ कर दोनों ने सबूत मिटाने की गरज से कार को धोया और बदबू दूर करने के लिए उस में ब्लीचिंग पाउडर भी छिड़का. लेकिन इस के बाद भी खून के धब्बे पूरी तरह नहीं मिट पाए थे.

यानी राइमा शूटिंग पर गई है, यह झूठ जानबूझ कर फैलाया गया था, जिस से कत्ल को किसी हादसे में तब्दील किया जा सके या उस का ठीकरा किसी और के सिर फूटे, नहीं तो उसे तो ये लोग 16 जनवरी, 2022 को ही ऊपर पहुंचा चुके थे. गलत नहीं कहा जाता कि मुलजिम कितना भी चालाक हो, कोई न कोई सबूत छोड़ ही देता है फिर शखावत और फरहाद तो नौसिखिए थे, जो यह मान कर चल रहे थे कि उन्होंने बड़ी चालाकी से अपने गुनाह को अंजाम दिया है, इसलिए पकडे़ जाने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होगा. कुछ दिन हल्ला मचेगा और फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा.

पुलिस के सामने शखावत ने शरीफ बच्चों की तरह मान लिया कि राइमा से कलह के चलते उस ने उस का कत्ल किया, लेकिन हकीकत में वह अव्वल दरजे का शराबी और ड्रग एडिक्ट था, जो पत्नी को मार कर उस की सारी दौलत हड़प कर लेना चाहता था, जिस से ताउम्र मौज और अय्याशी की जिंदगी जी सके. पर अब उसे जिंदगी भर जेल की चक्की पीसना तय दिख रहा है. हो सकता है अदालत कोई रहम न दिखाते हुए शखावत को फांसी की सजा ही दे दे, जिस का कि वह हकदार भी है. Actress Murder Case

Hindi stories: अबू सलेम की आवाज पर धड़कता था इस अभिनेत्री का दिल

Hindi stories: 1993 में मुंबई बम धमाकों के मामले की सुनवाई कर रही टाडा अदालत अबू सलेम समेत 5 अन्य दोषियों को सजा सुना दी है. इस वजह से अबू सलेम तो चर्चा में हैं ही, एक्ट्रेस मोनिका बेदी का नाम भी सुर्खियों में आ गया है. मोनिका लंबे समय तक अबू सलेम की गर्लफ्रेंड रही थीं. इन दिनों वह बेशक फिल्मी दुनिया से दूर हैं, लेकिन एक समय वो भी था जब अबू की वजह से ही उन्हें फिल्में मिलनी शुरू हुई थी.

ये जानना दिलचस्प है कि एक अंडरवर्ल्ड डौन और एक स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस के बीच प्यार की ये कहानी कहां और कैसे पनपी. मोनिका बेदी मूल रूप से पंजाब की हैं. उन्होंने ब्रिटेन की आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की. डांस और माडलिंग में भी मोनिका को काफी दिलचस्पी थी. यही दिलचस्पी उन्हें मुंबई लाई और यहां आकर 1995 में उन्हें उनकी पहली फिल्म ‘सुरक्षा’ मिली.

कहा जाता है कि अबू सलेम से मोनिका की मुलाकात एक बौलीवुड पार्टी के दौरान हुई थी. लेकिन एक मुलाकात ने ही दोनों के बीच कुछ ऐसा आकर्षण पैदा किया कि फिर मुलाकातों का सिलसिला बढ़ गया.

मोनिका की मानें तो थोड़े वक्त के लिए ही सही, मोनिका का दिल अबू के लिए धड़का जरूर था. मोनिका के मुताबिक उन्हें नहीं पता था कि जिस शख्स के लिए उनका दिल धड़क रहा था वो अंडरवर्ल्ड का मोस्ट वान्टेड है. उन्हें नहीं पता था कि जिसके साथ वो प्यार कर बैठी हैं उसका असली नाम अबु सलेम है.

साल 1998 में मोनिका पहली दफा फोन पर सलेम के संपर्क में आईं. मोनिका दुबई में थीं, फोन पर उन्हें दुबई में एक स्टेज शो करने का आफर मिला. बस उसी के बाद वो अबू को चाहने लगीं. मोनिका सलेम की आवाज पर फिदा हो गई थीं. अबू सलेम भी मोनिका से बेहद प्यार करता था.

बताया तो यहां तक जाता है कि मोनिका को उनकी पहली हिट फिल्म ‘जोड़ी नंबर वन’ में भी सलेम ने ही काम दिलवाया था. बौलीवुड में मोनिका के लिए वह एक ऐसा दौर था, जब सब उनकी इज्जत करने लगे थे. हर कोई उन्हें खुश करने की कोशिश करता था. जबकि ये सब मोनिका की परफार्मेंस की वजह से नहीं, बौलीवुड में सलेम के खौफ की वजह से हो रहा था.

1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट के आरोपी अबू सलेम को साल 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था. बताया जाता है कि जब यह गिरफ्तारी हुई, तब होटल में उनके साथ मोनिका बेदी भी थीं.

सुनने में आया था कि इसके बाद मोनिका ने सलेम का साथ छोड़ दिया था और सरकारी गवाह बन गई थीं. बता दें कि मोनिका फर्जी पासपोर्ट के मामले में चार साल जेल में बीता चुकी हैं.

अपने हिस्से की सजा काटकर वह कई टीवी रिएलिटी शोज में भी नजर आ चुकी हैं. वह बिग बौस सीजन 2 के अलावा झलक दिखला जा में भी नजर आई थीं. उन्होंने यूनिवर्सल म्यूजिक के एक एलबम के लिए इक ओंकार भी गाया है. साल 2013 में उन्होंने स्टार प्लस के शो सरस्वतीचंद्र में नेगेटिव रोल भी किया था.

MP Crime: पैसों की भूखी एक प्रेमिका का हैरतअंगेज खेल

MP Crime: आज एक की बांहों में, तो कल दूसरे की बांहों में. इस तरह के कई प्रेमी देखने को मिल जाएंगे, पर कई लड़कों से इश्क लड़ा कर उन के पैसों पर ऐश करने का शौक रखने वाली लड़कियां कम ही मिलती हैं. विदिशा, मध्य प्रदेश की स्वीटी (बदला हुआ नाम) उन में से एक थी. उसे बौयफ्रैंड बनाने का शौक था. वह आए दिन नएनए बौयफ्रैंड बनाती थी. जिस की जेब उसे तंग लगने लगती, वह उस को अपनी जिंदगी से दूर कर देती थी.

हाल ही में स्वीटी ने गोपाल रैकवार को अपने हुस्न के जाल में फंसाया. कुछ समय तक उस के पैसों पर खूब ऐश की. जब उस ने महसूस किया कि गोपाल की जेब तंग हो रही है, तो उस ने एक बकरा काट कर बेचने वाले मोटे आसामी अकरम को हुस्न का चारा दिखा कर अपना आशिक बना लिया और उसे हलाल करने लगी. इस बात का पता गोपाल को चला. वह स्वीटी को अकरम से दूर रखने की कोशिश करने लगा. स्वीटी कम होशियार नहीं थी. उस ने दोनों हाथों में लड्डू हासिल करने के लिए अपने प्रेमियों के सामने दिल्ली सरकार के ईवनऔड वाले फार्मूले की तरह तारीख को आपस में बांट लेने का औफर रखा.

गोपाल को स्वीटी का औफर पसंद नहीं आया, तो उस की लाश शहर के बाहर एक कुएं में मिली. मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के लोहांगीपुरा की रहने वाली 19 साला स्वीटी दिखने में काफी खूबसूरत थी. उस के पिता की मौत कई साल पहले हो गई थी. उस की विधवा मां बच्चों की सही तरीके से देखभाल नहीं कर पा रही थी. वह मंडी में मजदूरी कर के अपने तीनों बच्चों का पेट पाल रही थी.

कहते हैं कि गरीब की बेटी जल्दी ही जवान हो जाती है. ऐसा ही स्वीटी के साथ भी हुआ. अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए उस ने अपने हुस्न को ही चारा बना लिया. उस ने खातेपीते घरों के लड़कों को पटाना शुरू किया. स्वीटी के हुस्न को पाने के लालच में कई लड़के बहुत कुछ लुटाने को तैयार थे. वह उन्हें हुस्न का स्वाद चखाती, इस के बदले में उन से मोटी रकम लेती. उस रकम से वह ऐश करती.

स्वीटी को मोटरसाइकिल चलाने का शौक था.  विदिशा और बीना की भीड़ भरी सड़कों पर तेज स्पीड में मोटरसाइकिल चला कर वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन चुकी थी. गोपाल खातेपीते घर से था. वह स्वीटी की खूबसूरती के जाल में फंस कर उस से प्यार करने लगा. वह उस पर मनमाना खर्च भी करने लगा. जब भी वे दोनों मोटरसाइकिल पर शहर में घूमने निकलते, तो स्वीटी गोपाल को पीछे बिठा कर मोटरसाइकिल खुद चलाती थी. उस वक्त गोपाल स्वीटी की कमर को कस कर पकड़ लेता था.

पूरे शहर में दोनों के प्यार की चर्चा हो रही थी. यह बात गोपाल के घर वालों तक भी पहुंच गई. उन्हें स्वीटी का स्वभाव बिलकुल भी पसंद नहीं था. वे स्वीटी को चालू किस्म की लड़की मानते थे. गोपाल के परिवार वालों ने समझाते हुए उसे स्वीटी से दूर रहने की हिदायत दी, पर गोपाल पर स्वीटी के प्यार का नशा बुरी तरह से चढ़ा हुआ था. इधर स्वीटी ने महसूस किया कि गोपाल का हाथ कुछ तंग होता जा रहा है. ऐसे में वह दूसरे प्रेमी की तलाश में लग गई. एक दिन स्वीटी की मुलाकात 28 साला अकरम से हुई. वह मांस बेचने का धंधा करता था. उस की कमाई अच्छी थी. स्वीटी ने उसे अपने हुस्न के जाल में फंसा लिया. वह उस पर दिल खोल कर खर्च करने लगा.

स्वीटी इस बात का ध्यान रखती थी कि उस की और अकरम की दोस्ती की खबर गोपाल को न लगे. इस के लिए वह गोपाल से भी मिलती रही. गोपाल से स्वीटी और अकरम की दोस्ती की खबर ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. उस ने स्वीटी पर अपना हक जताते हुए उसे अकरम से दूर रहने की हिदायत दी. स्वीटी ने गोपाल से कहा, ‘‘तुम मेरे मामले में दखलअंदाजी मत करो. मैं किस से मिलूंगी या नहीं मिलूंगी, यह मेरा पर्सनल मामला है. तुम अगर चाहते हो कि मेरा प्यार तुम्हें भी बराबर मिलता रहे, तो मेरे पास एक फार्मूला है. तुम दिल्ली सरकार के ईवनऔड फार्मूले की तरह तारीख तय कर लो. मैं उस दिन तुम्हारे पास रहूंगी और अगले दिन अकरम के साथ.’’

गोपाल को उस की बात पसंद नहीं आई. वह स्वीटी को हमेशा अपनी बांहों में रखना चाहता था. उस ने स्वीटी के फार्मूले को मानने से इनकार कर दिया. इधर गोपाल स्वीटी को रोकने में लगा था कि वह अकरम से न मिले. साथ ही, अकरम को भी वह बारबार मोबाइल कर के स्वीटी से दूर रहने की हिदायत देता रहा था. अकरम ने स्वीटी को फोन कर के कहा, ‘‘अपने आशिक गोपाल को संभाल ले, वरना मैं उसे ऊपर पहुंचा दूंगा.’’

स्वीटी को गोपाल अब सिरदर्द लगने लगा था, क्योंकि वह काफी टोकाटाकी करने लगा था. स्वीटी ने अकरम से कहा, ‘‘रोजरोज के झगड़े से अच्छा है कि गोपाल को निबटा ही दें.’’

अपनी प्रेमिका का आदेश मिलते ही अकरम ने 28 मार्च, 2016 की रात को गोपाल को अपनी दुकान पर बुलाया. अपने नौकर सुरेश पाल के साथ मिल कर उस ने गोपाल को जम कर शराब पिलाने के बाद उस की हत्या कर दी. अकरम ने यह सूचना स्वीटी को दे दी. गोपाल की हत्या की खबर सुन कर स्वीटी काफी खुश हुई. वह अकरम की दुकान पर पहुंच गई. वहां तीनों ने जम कर शराब पी और जश्न मनाया.

बाद में पुलिस ने हत्या के आरोप में अकरम, उस के नौकर सुरेश पाल व स्वीटी को गिरफ्तार कर लिया. इस केस की जांच कर रहे अधिकारी राजेश तिवारी का कहना है, ‘‘जवानी के जोश में नौजवानों को किसी बात का होश ही नहीं रहता है. लड़के खेलीखाई लड़की से मेलजोल बढ़ाते वक्त उस पर भरोसा न रखें, क्योंकि ऐसी लड़की अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकती है.’’ MP Crime

UP Crime story : बुआ के दिल ने जब भतीजे को छुआ

वेदराम बेहद सीधासादा और मेहनती युवक था. वह उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के एक चूड़ी कारखाने में काम करता था, जबकि उस के बीवीबच्चे कासगंज जिले के नगला लालजीतगंज में रहते थे. यह वेदराम का पैतृक गांव था. वहीं पर उस का भाई मिट्ठूलाल भी परिवार के साथ रहता था. जिला कासगंज के ही थाना सहावर का एक गांव है बीनपुर कलां. यहीं के रहने वाले आलम सिंह का बेटा नेकसे अकसर नगला लालजीतगंज में अपनी बुआ के घर आताजाता रहता था. उस की बुआ की शादी वेदराम के भाई मिट्ठूलाल के साथ हुई थी.

वेदराम की पत्नी सुनीता पति की गैरमौजूदगी में भी घर की जिम्मेदारी  ठीकठाक निभा रही थी. वह अपनी बड़ी बेटी की शादी कर चुकी थी. जिंदगी ने कब करवट ले ली, वेदराम को पता ही नहीं चला. पिछले कुछ समय से वेदराम जब भी छुट्टी पर घर जाता था, उसे पत्नी सुनीता के मिजाज में बदलाव देखने को मिलता था. उसे अकसर अपने घर में नेकसे भी बैठा मिलता था.

नेकसे हालांकि उस के भाई मिट्ठूलाल की पत्नी का भतीजा था, फिर भी वह यही सोचता था कि आखिर यह उस के घर में क्यों डेरा डाले रहता है. उस ने एकदो बार नेकसे को टोका भी कि बुआ के घर पड़े रहने से अच्छा है वह कोई कामकाज देखे. सुनीता ने भी नेकसे पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन वह जब भी आता था, वह उस की खूब मेहमाननवाजी करती थी. नेकसे के मन में क्या था, यह सुनीता को पता नहीं था. एक दिन नेकसे दोपहर में उस के घर आया और चारपाई पर बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगा. अचानक वह उस के पास आ कर बोला, ‘‘बुआ, तुम जानती हो कि तुम कितनी सुंदर हो?’’

नेकसे की इस बात पर पहले तो सुनीता चौंकी, उस के बाद हंसती हुई बोली, ‘‘मजाक अच्छा कर लेते हो.’’

‘‘नहीं बुआ, ये मजाक नहीं है. तुम मुझे सचमुच बहुत अच्छी लगती हो. तुम्हें देखने को दिल चाहता है, तभी तो मैं तुम्हारे यहां आता हूं.’’ नेकसे ने हंसते हुए कहा.

नेकसे की बातें सुन कर सुनीता के माथे पर बल पड़ गए. उस ने कहा, ‘‘तुम यह क्या कह रहे हो, क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘कुछ नहीं बुआ, तुम बैठो और यह बताओ कि फूफाजी कब आएंगे?’’ उस ने पूछा.

‘‘उन्हें छुट्टी कहां मिलती है. तुम सब कुछ जानते तो हो, फिर भी पूछ रहे हो?’’ सुनीता ने थोड़ा रोष में कहा.

‘‘तुम्हारे ऊपर दया आती है बुआ, फूफाजी को तो तुम्हारी फिक्र ही नहीं है. अगर उन्हें फिक्र होती तो इतने दिनों बाद घर न आते. वह चाहते तो गांव में ही कोई काम कर सकते थे.’’ यह कह कर नेकसे ने जैसे सुनीता की दुखती रग पर हाथ रख दिया था.

इस के बाद सुनीता के करीब आ कर वह उस का हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘बुआ, अब तुम चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा.’’

इतना कह कर नेकसे तो चला गया, लेकिन सुनीता के मन में कई सवाल छोड़ गया. वह सोचने लगी कि आखिर नेकसे का उस के यहां आनेजाने का मकसद क्या है? 28 साल का नेकसे देखने में ठीकठाक था. वह अविवाहित था. और अपने गांव के एक ईंट भट्ठे पर काम करता था. तनख्वाह तो ज्यादा नहीं थी, पर वहां उसे अच्छी कमाई हो जाती थी. बुआ के यहां आतेआते उस का दिल बुआ की देवरानी सुनीता पर आ गया था.

सुनीता पति की दूरी से बहुत परेशान थी. इसी का बहाना बना कर उस ने उस के दिल में जगह बनानी शुरू कर दी थी. रिश्ते की नजदीकियां रास्ते में बाधक थीं. नेकसे को इस बात का भी डर लग रहा था कि अगर सुनीता को बुरा लग गया तो परिवार में तूफान आ जाएगा. उस दिन नेकसे के जाने के बाद सुनीता देर तक उसी के बारे में सोचती रही कि आखिर नेकसे चाहता क्या है. उस रात सुनीता को देर तक नींद नहीं आई. नेकसे की बातचीत का अंदाज मन मोहने वाला था, लेकिन सुनीता उम्र और रिश्ते में नेकसे से बड़ी थी. मन में पति के प्रति गुस्सा भी आया, क्योंकि पति से दूरी के कारण ही उस का मन डगमगा रहा था.

उस ने तय कर लिया कि इस बार जब पति घर आएगा तो वह उस से कहेगी कि या तो वह गांव में रह कर कोई काम करे या फिर उसे भी अपने साथ ले चले. कुछ दिनों बाद वेदराम छुट्टी पर आया तो सुनीता ने कहा, ‘‘देखो, तुम्हारे बिना मेरा यहां बिलकुल भी मन नहीं लगता. या तो तुम यहीं कोई काम कर लो या फिर मैं भी बच्चों को ले कर फिरोजाबाद चल कर तुम्हारे साथ रहूंगी.’’

पत्नी की बात सुन कर वेदराम बोला, ‘‘लगता है, तुम पगला गई हो. तुम अपनी उम्र तो देखो. बच्चे बड़े हो रहे हैं और तुम्हें रोमांस सूझ रहा है.’’

‘‘तो क्या अब मैं बूढ़ी हो गई हूं?’’ सुनीता ने कहा.

‘‘नहीं…नहीं, ऐसा नहीं है. पर सुनीता यह मेरी मजबूरी है. मेरी तनख्वाह इतनी नहीं कि वहां किराए पर कमरा ले कर तुम्हें साथ रख सकूं. और तुम क्या सोच रही हो कि वहां मैं खुश हूं. नहीं, तुम्हारे बिना मैं भी कम परेशान नहीं हूं.’’

पति के जवाब पर सुनीता कुछ नहीं बोली. वेदराम 3 दिनों तक घर पर रहा, तब तक सुनीता काफी खुश रही. पर पति के जाने के बाद उस के जिस्म की भूख फिर सिर उठाने लगी. वह उदास हो गई. तब उस के दिलोदिमाग में नेकसे घूमने लगा. वह उस से मिलने को उतावली हो उठी. इतना ही नहीं, वह अपनी जेठानी के घर जा कर बोली, ‘‘दीदी, नेकसे आया नहीं क्या?’’

जेठानी ने कहा, ‘‘आया तो था, पर जल्दी में था. क्यों, कोई काम है क्या?’’

‘‘नहीं, मैं ने तो यूं ही पूछ लिया.’’ उदास मन से सुनीता वापस आने को हुई, तभी जेठानी ने कहा, ‘‘शायद वह कल आएगा.’’

जेठानी की बात सुन कर सुनीता का दिल बल्लियों उछलने लगा. उसे लग रहा था कि नेकसे उस से नाराज है, तभी तो वह उस के घर नहीं आया. अगले दिन अचानक उस के दरवाजे पर दस्तक हुई. उस ने दरवाजा खोला, सामने नेकसे खड़ा था.

‘‘तुम?’’ उसे देख कर सुनीता हैरानी से बोली.

‘‘हां, मैं ही हूं बुआ, लेकिन तुम मुझे देख कर इतना हैरान क्यों हो? बड़ी बुआ ने बताया कि तुम मुझे याद कर रही थीं, सो मैं आ गया. अब बताओ, क्या कहना है?’’ नेकसे ने घर में दाखिल होते हुए कहा.

सुनीता ने मुख्यद्वार बंद किया और अंदर आ कर नेकसे से बातें करने लगी. कुछ देर में सुनीता 2 गिलासों में चाय ले कर आई तो नेकसे ने पूछा, ‘‘फूफा आए थे क्या?’’

‘‘हां, आए तो थे, लेकिन 3 दिन रह कर चले गए.’’ सुनीता बेमन से बोली.

नेकसे को लगा कि वह फूफा से खुश नहीं है. उस ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा, ‘‘बुआ, मैं कुछ कहना चाहता हूं, पर डर लगता है कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ.’’

‘‘नहीं, तुम बताओ क्या बात है?’’

‘‘बुआ, सच तो यह है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो और मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’ नेकसे ने एक ही झटके में मन की बात कह दी.

नेकसे की बात पर सुनीता भड़क उठी, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? और हां, प्यार का मतलब जानते हो? अपनी और मेरी उम्र में फर्क देखा है. मैं रिश्ते में तुम्हारी बुआ लगती हूं.’’

‘‘हां, लेकिन इस दिल का क्या करूं, जो तुम पर आ गया है. अब तो दिलोदिमाग पर हमेशा तुम ही छाई रहती हो.’’ नेकसे ने कहा.

‘‘लगता है, तुम पागल हो गए हो. जरा सोचो, अगर घर वालों को यह सब पता चल गया तो मेरा क्या हाल होगा?’’ सुनीता ने कहा.

नेकसे चारपाई से उठा और सुनीता के पास जा कर उस के गले में बांहें डाल दीं. सुनीता ने इस का कोई विरोध नहीं किया. इस से नेकसे की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सुनीता भी खुद को नहीं रोक सकी तो मर्यादा भंग हो गई. जोश उतरने पर जब होश आया तो दोनों में से किसी के भी मन में पछतावा नहीं था.

सुनीता को अपना मोबाइल नंबर दे कर और फिर आने का वादा कर के नेकसे चला गया. उस दिन के बाद सुनीता की तो जैसे दुनिया ही बदल गई. पर कभीकभी उसे डर भी लगता था कि अगर भेद खुल गया तो क्या होगा. अब नेकसे का आनाजाना लगा रहने लगा. इसी बीच एक दिन वेदराम अचानक घर आ गया. उस की तबीयत खराब थी. पर उस समय घर पर नेकसे नहीं था. सुनीता डर गई कि कहीं पति की मौजूदगी में नेकसे न आ जाए, इसलिए उस ने नेकसे को फोन कर के सतर्क कर दिया. हफ्ते भर बाद वेदराम चला तो गया, पर सुनीता के मन में डर सा समा गया.

पड़ोसियों को सुनीता के घर नेकसे का आनाजाना अखरने लगा था. आखिर एक दिन पड़ोसन ने सुनीता को टोक ही दिया, ‘‘जवान लड़के का इस तरह घर आनाजाना ठीक नहीं है. अपनी जवान बेटी का कुछ तो खयाल करो.’’

सुनीता तमक कर बोली, ‘‘अपने घर का खयाल मैं खुद रख लूंगी. तुम हमारी फिक्र मत करो.’’

नेकसे उस के यहां बेखौफ और बिना रोकटोक आताजाता था. पड़ोसियों के मन में भी शक के बीज पड़ चुके थे. एक दिन जब वेदराम घर आया तो एक पड़ोसी ने कहा, ‘‘नेकसे तुम्हारी गैरमौजूदगी में तुम्हारे घर अकसर आता है. तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए.’’

इस बात से वेदराम को लगा कि जरूर कुछ गड़बड़ है. उस ने सुनीता से पूछा, ‘‘यह नेकसे का क्या चक्कर है?’’

पति की बात सुन कर सुनीता की धड़कनें बढ़ गईं, ‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, तुम्हारा रिश्तेदार है. कभीकभी यहां आ जाता है. इस में गलत क्या है?’’

‘‘घर में जवान बच्ची है. तुम उसे यहां आने के लिए मना कर दो.’’ वेदराम ने कहा.

‘‘अपनी बेटी की देखरेख मैं खुद कर सकती हूं, पर कभी सोचा है कि तुम्हारे बिना मैं कैसे रहती हूं.’’

‘‘तुम लोगों के लिए ही तो मैं बाहर रहता हूं. जरा सोचो क्या तुम्हारे बिना मुझे वहां अच्छा लगता है क्या?’’

वेदराम को सुनीता की इस बात से विश्वास होने लगा कि पड़ोसियों ने उसे उस की पत्नी और नेकसे के बारे में जो खबर दी है, वह सही है. वेदराम 2-4 दिन रुक कर अपने काम पर फिरोजाबाद चला गया. पर इस बार उस का काम में मन नहीं लगा. उसे लगता था, जैसे उस की गृहस्थी की नींव हिल रही है. एक दिन अचानक वह छुट्टी ले कर बिना बताए घर से आ गया. उस ने घर में कदम रखा तो घर में कोई बच्चा दिखाई नहीं दिया. उस ने कमरे का दरवाजा खोला तो सन्न रह गया. उस की पत्नी नेकसे की बांहों में थी. गुस्से में वेदराम ने डंडा उठाया और सुनीता की खूब पिटाई की. जबकि नेकसे भाग गया.

पिटने के बाद भी सुनीता के चेहरे पर डर नहीं था. वह गुर्रा कर बोली, ‘‘इस सब में मेरी नहीं, बल्कि तुम्हारी गलती है. मैं ने कहा था न कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती, पर तुम ने मेरी भावनाओं का खयाल कहां रखा.’’

वेदराम का गुस्सा बढ़ गया. वह हैरान था कि सुनीता ने रिश्तों का भी खयाल नहीं रखा. नेकसे तो उस के बेटे की तरह है. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, अब मैं आ गया हूं, सब संभाल लूंगा.’’

‘‘मैं आ गया हूं, से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘अब मैं नौकरी छोड़ कर हमेशा के लिए आ गया हूं. यहीं खेतीबाड़ी करूंगा. फिर देखूंगा तुझे.’’ वेदराम ने कहा.

पति के नौकरी छोड़ने की बात सुन कर सुनीता परेशान हो उठी. क्योंकि अब उसे नेकसे से मिलने का मौका नहीं मिल सकता था. उस ने नेकसे को सारी बात बता कर सतर्क रहने को कहा. अब वह किसी भी कीमत पर नेकसे को छोड़ने को तैयार नहीं थी. उस के मन में पति के प्रति नफरत पैदा हो गई.

वेदराम को अब इस बात का डर लगा रहता था कि सुनीता नेकसे के साथ भाग न जाए. अगर ऐसा हो गया तो समाज में उस की नाक ही कट जाएगी. लिहाजा उसे अपनी दुराचारी पत्नी से नफरत हो गई. बेटी भी जवान थी पर वह मां की ही तरफ से बोलती थी. उसे इस बात का भी डर था कि कहीं बेटी भी गुमराह न हो जाए.

वेदराम की चौकसी के बावजूद सुनीता और नेकसे मौका पा कर घर से बाहर मिलने लगे. यह बात भी वेदराम से ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. उस ने सुनीता को एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर वह कुछ भी मानने को तैयार नहीं थी. वेदराम समझ गया कि अब कोई बड़ा कदम उठाना ही पड़ेगा, वरना उस की गृहस्थी डूब जाएगी. घर का वातावरण काफी तनावपूर्ण रहने लगा था. नेकसे वेदराम की खुशियों के रास्ते में बाधा बन गया था. काफी सोचनेविचारने के बाद वेदराम को लगा कि इस समस्या का अब एक ही हल है कि रास्ते के कांटे को जड़ से निकाल दिया जाए.

दूसरी ओर रोजरोज पिटने से सुनीता को लगने लगा था कि अब वह पति के साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती. वह खुल कर नेकसे के साथ अपनी दुनिया बसाना चाहती थी.

वेदराम धीरेधीरे अपने इरादे को मजबूत कर रहा था. बेशक यह काम उस के लिए कठिन था. पर एक ओर चरित्रहीन पत्नी थी तो दूसरी ओर बेलगाम भतीजा. दोनों उस केगुस्से को हवा दे रहे थे. योजना के अनुसार, वेदराम उसी ईंट भट्ठे पर काम करने लगा, जहां नेकसे करता था. वेदराम जानता था कि नेकसे रात में भट्ठे पर ही सोता है. उसे लगा कि वह वहीं पर अपना काम आसानी से कर सकता है. वह भी भट्ठे पर ही सोने लगा और मौके की तलाश में लग गया.

नेकसे अपने फूफा वेदराम के इरादे से बेखबर था. जबकि वेदराम ने तय कर लिया था कि अपनी इज्जत पर हाथ डालने वाले को वह जिंदा नहीं छोड़ेगा. अपनी नौकरी के तीसरे दिन 5 दिसंबर, 2016 को वेदराम को मौका मिल गया. उस ने देखा, नेकसे अकेला सो रहा था. वह अपनी जगह से उठा और फावड़े से नेकसे पर प्रहार कर दिया. चोट नेकसे के कंधे पर लगी तो वह चीख कर उठा और भागने की कोशिश की. लेकिन वेदराम ने उस पर ताबड़तोड़ प्रहार कर दिए, जिस से वह वहीं पर मर गया.

नेकसे की हत्या करने के बाद वेदराम ने राहत की सांस ली, पर उस की दिमागी हालत ठीक नहीं थी. वह फावड़ा ले कर सीधे थाना सहावर पहुंचा और पुलिस को सारी बात बता दी. थानाप्रभारी रफत मजीद वेदराम से पूछताछ कर के उसे उस जगह ले गए, जहां उस ने नेकसे की हत्या की थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

पुलिस ने वेदराम के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. थानाप्रभारी रफत मजीद केस की तफ्तीश कर रहे थे. UP Crime story

कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित