Hindi Stories: कातिल दरोगा

Hindi stories: फरियाद ले कर पुलिस चौकी पहुंची खूबसूरत ईशा को देख कर दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह इतना प्रभावित हुआ कि शादीशुदा होते हुए भी वह उसे चाहने लगा. इतना ही नहीं, खुद को अविवाहित बता कर उस ने ईशा से शादी भी कर ली. बाद में यही झूठ ऐसा जी का जंजाल बना कि वह एक खौफनाक अपराध कर बैठा. कानपुर के थाना काकादेव क्षेत्र में एक मोहल्ला है नवीन नगर. कौशलेश सचान अपनेपरिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विनीता के अलावा एक बेटा ऐश्वर्य राज, 2 बेटियां ईशा व प्रगति थीं. कौशलेश साधन संपन्न व्यक्ति थे. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

कौशलेश सचान की बड़ी बेटी का नाम वैसे तो ईशा था लेकिन घर में सब लोग उसे ईशू कहते थे. गोरी, तीखे नाकनक्श और बड़ीबड़ी आंखों वाली ईशा सुशील और विनम्र स्वभाव की थी. ईशा तनमन से जितनी खूबसूरत थी, पढ़नेलिखने में भी उतनी ही तेज थी. उस ने कानपुर के सरस्वती बालिका इंटर कालेज से प्रथम श्रेणी में इंटरमीडिएट और एएनडी कालेज में बीए पास किया. ईशा की इच्छा थी कि वह आईएएस बने. इसलिए प्रथम श्रेणी में बीए पास करने के बाद उस ने आईएएस की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू कर दी थी. लेकिन लगातार 3 साल तक परीक्षा देने के बाद भी वह सिविल सर्विस में न निकल सकी.

एक दिन ईशा अपनी मां विनीता के साथ जेके मंदिर गई. दर्शन करने के बाद जब वह गेट के बाहर निकली, तो एक झपटमार ने उस के गले की सोने की चेन खींच ली और साथ ही उस का पर्स भी छीन कर भाग निकला. बदहवास मांबेटी थाना नजीराबाद पहुंचीं. उस इलाके के चौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल उस समय थाने में ही थे. ईशा ने ज्ञानेंद्र सिंह को लूट की पूरी घटना बताई तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर के लुटेरे की तलाश शुरू कर दी. 3-4 दिन बाद ही ज्ञानेंद्र ने छोटे यादव नाम के लुटेरे को पकड़ लिया. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह की इस त्वरित काररवाई से ईशा काफी प्रभावित हुई.

बयान दर्ज कराने, लुटेरे और सामान की शिनाख्त करने के लिए ईशा को कई बार थाना नजीराबाद आनाजाना पड़ा. इसी आनेजाने में ईशा और दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. ज्ञानेंद्र सिंह जहां ईशा की खूबसूरती पर फिदा था, वहीं ईशा भी शरीर से हृष्टपुस्ट व स्मार्ट दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को देख कर उस की ओर आकर्षित हो गई थी. दोनों को एक अनजाना आकर्षण एकदूसरे की तरफ खींचने लगा था. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को ईशा कुछ ज्यादा ही पसंद आ गई थी, इसलिए उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया था. वह जब तब ईशा से बातें करने लगा. ईशा को भी उस की रसभरी बातों में प्यार झलकता था. वह भी उस से खूब बातें करने लगी. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें भी होने लगीं. बात आगे बढ़ी तो दोनों साथसाथ सैरसपाटे के लिए भी जाने लगे. ज्ञानेंद्र ईशा को फिल्म भी दिखाता और रेस्तरां में खाना भी खिलाता.

सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल मूल रूप से चित्रकूट जिले के मऊ थाना अंतर्गत आने वाले गांव छिवलहा का रहने वाला था. उस का सलेक्शन 2007 के बैच में हुआ था. उस की पहली पोस्टिंग कानपुर के किदवई नगर थाने की साकेत नगर पुलिस चौकी में हुई थी. इस के बाद वह कानपुर शहर और देहात के कई थानों में तैनात रहा. कुछ समय वह क्राइम ब्रांच में भी रहा. ज्ञानेंद्र सिंह नौकरी के अलावा प्लौटिंग का भी काम करता था. इस काम में उस ने खूब पैसा कमाया. उस के पास 4-5 लग्जरी कारें थीं, जिन्हें उस ने एक ट्रैवलिंग एजेंसी में लगवा रखा था. ज्ञानेंद्र सिंह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. उस की शादी मध्य प्रदेश स्थित सतना जिले की बछरांवा निवासी नीलम के साथ हुई थी.

पत्नी और बच्चों के साथ वह साकेत नगर, कानपुर में रह रहा था. जबकि ईशा से उस ने खुद को अविवाहित बताया था. एक रोज ज्ञानेंद्र सिंह ईशा के घर पहुंचा, तो उस वक्त वह घर में अकेली थी. उस के मातापिता किसी काम से माल रोड गए हुए थे, और भाईबहन कालेज में थे. ज्ञानेंद्र सिंह और ईशा कमरे में बैठ कर बातचीत करने लगे. बातोंबातों में ज्ञानेंद्र ने ईशा की खूबसूरती के कसीदे काढ़ने शुरू कर दिए. यह देख उस ने ज्ञानेंद्र की बेचैन आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘ज्ञानेंद्र, क्या सचमुच मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं? कहीं तुम मुझे खुश करने के लिए मेरी झूठी तारीफ तो नहीं कर रहे?’’

ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा को चाहत भरी नजरों से देखा, वह उसे ही अपलक निहार रही थी. ज्ञानेंद्र ने महसूस किया कि दिल की बात कहने का ऐसा मौका मुश्किल से ही मिलेगा. इसलिए वह ईशा की कलाई थामते हुए बोला, ‘‘ईशा, मुझे तुम से प्यार हो गया है. तुम्हारे बगैर सबकुछ सूनासूना सा लगता है. मुझे लगता है कि तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए ऐसी ही फीलिंग्स हैं. अगर ऐसा है तो प्लीज मेरा प्यार स्वीकार कर लो.’’

‘‘ज्ञानेंद्र, तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये शब्द सुनने के लिए कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपने दिल की बात कहने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि मैं तुम से कितना प्यार करती हूं. आई लव यू ज्ञानेंद्र.’’

उस दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया, इस के बाद जैसे दोनों की दुनिया ही बदल गई. समय के साथ उन की मोहब्बत दिन दूनी रात चौगुनी परवान चढ़ती गई. ज्ञानेंद्र जब ड्यूटी पर होता तो ईशा से मोबाइल पर बातें करता और जब समय मिलता तो उस के साथ घूमताफिरता. इस तरह दोनों एकदूसरे के इतना करीब आ गए कि उन्हें लगने लगा, अब एकदूसरे के बिना नहीं रहा जा सकता. अंतत: शुरुआत ईशा ने की. उस ने अपने दिल की बात घरवालों को बता कर ज्ञानेंद्र सिंह से शादी करने की इच्छा जाहिर की.

ईशा की बात सुन कर पहले तो उस की मां विनीता और पिता कौशलेश चौंके, लेकिन बाद में बेटी की खुशी के लिए राजी हो गए. दरअसल ईशा ने उन्हें समझाया था कि दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह उन की ही जातिबिरादरी का है. अच्छा कमाता है और पुलिस विभाग में अच्छे पद पर तैनात है. बेटी की मरजी जान कर वे लोग ईशा की शादी ज्ञानेंद्र से करने को राजी हो गए. सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र से बात की गई तो उस ने बताया कि कुछ कारणों से उस ने अपने घर वालों से संबंध विच्छेद कर रखा है इसलिए उस के परिवार का कोई सदस्य शादी में शामिल नहीं हो पाएगा.

बहरहाल, बातचीत के बाद कौशलेश ने 10 मार्च, 2013 को अपनी बेटी ईशा का विवाह ज्ञानेंद्र सिंह के साथ कर दिया. शादी के बाद ज्ञानेंद्र उसे साकेत नगर स्थित अपने घर ले गया. उस वक्त उस की पत्नी नीलम मायके गई हुई थी. इस के बाद ईशा ज्यादातर मायके में ही रही. वह उसे अपने घर तभी ले जाता था, जब नीलम मायके गई होती थी. बहरहाल, हंसीखुशी से एक वर्ष कब बीत गया, पता ही न चला. इसी बीच ईशा ने एक खूबसूरत बच्ची को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सान्या रखा. सान्या के जन्म से जहां ईशा के जीवन में बहार आ गई थी, वहीं ज्ञानेंद्र खोयाखोया सा रहने लगा था. दिखावे के तौर पर तो वह उसे प्यार करता था, लेकिन अंदर ही अंदर परेशान रहता था.

ईशा और ज्ञानेंद्र में पहली बार तकरार तब शुरू हुई जब वह अपनी बेटी सान्या का बर्थडे सर्टिफिकेट बनवाने नगर निगम पहुंची. दरअसल, ज्ञानेंद ने सर्टिफिकेट में पिता की जगह अपना नाम लिखवाने से मना कर दिया था. इस बात को ले कर ईशा और ज्ञानेंद्र में काफी विवाद हुआ. यहीं से ईशा को ज्ञानेंद्र पर शक हुआ. जब ईशा ने गुप्त रूप से ज्ञानेंद्र के संबंध में जानकारी हासिल की तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि ज्ञानेंद्र शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता है. वह अपनी पत्नी नीलम और बच्चों के साथ कानपुर में ही रहता है. वह उसे तभी अपने घर ले जाता है, जब नीलम मायके गई होती है.

उस दिन देर रात ज्ञानेंद्र सिंह घर आया तो ईशा ने उस से पूछा, ‘‘मैं कौन हूं तुम्हारी. पत्नी, प्रेमिका या रखैल?’’

‘‘यह तुम कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो? तुम पत्नी हो मेरी.’’ ज्ञानेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘झूठ बोल रहे हो, तुम शादीशुदा और 2 बच्चों के पिता हो. तुम्हारी पत्नी का नाम नीलम है, जिस के साथ तुम वैवाहिक जीवन बिता रहे हो. तुम फरेबी और धोखेबाज हो. प्यार का नाटक कर के तुम ने मुझे धोखा दिया और मुझ से शादी कर ली. लेकिन अब मैं चुप नहीं बैठूंगी. तुम्हारे खिलाफ लड़ाई लड़ूंगी. जरूरत पड़ी तो रिपोर्ट भी दर्ज कराऊंगी.’’

ज्ञानेंद्र सिंह समझ गया कि ईशा को असलियत का पता चल गया है, इसलिए उस ने माफी मांग ली. फिर बोला, ‘‘ईशा तुम मेरी दूसरी पत्नी बन कर रह सकती हो. मैं तुम्हें पूरा सम्मान दूंगा. कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. चाहो तो अपने और बेटी के नाम पर जितना चाहे पैसा जमा करा सकती हो. मैं खुशीखुशी जमा कर दूंगा.’’

‘‘मिस्टर ज्ञानेंद्र, पत्नी दूसरी पहली नहीं होती. पत्नी सिर्फ पत्नी होती है. अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो अपनी पत्नी नीलम को तलाक दे दो.’’

‘‘उसे तलाक देना आसान नहीं है.’’ ज्ञानेंद्र ने मजबूरी जाहिर की तो ईशा बोली, ‘‘मेरा क्या होगा. यह सोचा है तुम ने? अपनी पत्नी और बच्चों की चिंता थी तो मेरे साथ प्यार का स्वांग कर के धोखे से शादी क्यों की? अगर तुम ने नीलम को तलाक नहीं दिया तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा. मैं जहर खा कर जान दे दूंगी या फिर तुम्हारे खिलाफ धोखाधड़ी से शादी रचाने और शारीरिक शोषण करने की रिपोर्ट दर्ज कराऊंगी.’’

ईशा की धमकी सुन कर ज्ञानेंद्र सिंह अंदर तक कांप गया.वह तनाव में रहने लगा. ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियां बढ़ना स्वभाविक था. फलस्वरूप दोनों में आएदिन झगड़ा होने लगा. लड़झगड़ कर ईशा मायके आ गई. आखिरकार इस गंभीर समस्या के निदान के लिए दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा के कत्ल की योजना बना डाली. अपनी इस योजना में उस ने अपने साथी मनीष कठेरिया, उस के भाई बच्चा और मनीष के साथी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को शामिल कर लिया. मनीष कठेरिया किदवई नगर में रहता था. वह दबंग किस्म का आदमी था. साकेत नगर में उस की ‘टेलीकाम विला’ नाम से मोबाइल शौप तथा ‘बालाजी ट्रैवल्स’ के नाम से ट्रैवलिंग एजेंसी थी. इस के अलावा वह कमेटी भी चलाता था. पुलिस से दोस्ती करना उस का शौक था.

दर्जनों थानेदारों से उस के दोस्ताना संबंध थे. जिन्हें वह मुफ्त में मोबाइल फोन और आनेजाने के लिए लग्जरी गाडि़यां मुहैया कराता था. इस सेवा के एवज में वह अपने काम निकलवाता था. ज्ञानेंद्र सिंह जब साकेत नगर चौकी इंचार्ज था, तभी उस की दोस्ती मनीष से हुई थी. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती बढ़ती गई. अर्जुन जूही बारादेवी में रहता था और मनीष कठेरिया का दोस्त था. वह मनीष की ट्रैवलिंग एजेंसी में लग्जरी कार चलाता था. अर्जुन की प्रेमिका अवंतिका किदवई नगर में रहती थी. दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया था. मनीष कठेरिया ने ही अर्जुन और अवंतिका का परिचय दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह से कराया था. मनीष का भाई बच्चा गोविंद नगर में रहता था.

आर्थिक मदद के लिए वह मनीष के पास आता था. मनीष के कहने पर बच्चा हर काम करने के लिए तत्पर रहता था. मनीष की कमेटी का पैसा बच्चा ही वसूल किया करता था. वह हमेशा मारपीट पर आमादा रहता था. इसी बीच ज्ञानेंद्र सिंह का तबादला प्रतापगढ़ हो गया था. वहां वह आंसपुर (देवसरा) थाने में तैनात रहा. बाद में काम में लापरवाही बरतने के कारण उसे लाइन हाजिर कर दिया गया था. लाइन हाजिर होने के बाद वह पुलिस लाइन में ड्यूटी कर रहा था. ईशा की धमकी ने उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम कर दी थी. उसे पता था कि ईशा ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो उस की नौकरी तो जाएगी ही उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी. इसलिए वह जल्द से जल्द ईशा का काम तमाम करना चाहता था. इस के लिए वह बराबर अपने दोस्तों से संपर्क बनाए हुए था. उस ने उन से मिल कर ईशा की हत्या की योजना बना ली थी.

अपनी योजना के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह 17 मई, 2015 को ईशा के घर नवीन नगर, काकादेव पहुंचा. वहां उस ने ईशा की मां, मौसी, मामा व अन्य घरवालों से माफी मांगी और वादा किया कि वह ईशा को शारीरिक या मानसिक पीड़ा नहीं पहुंचाएगा और जैसा वह कहेगी, वैसा ही करेगा. उस के कहने पर पहली पत्नी नीलम को तलाक भी दे देगा. उस ने यह भी कहा कि अगर किसी वजह से वह नीलम को तलाक न दे सका तो ईशा व उस की बेटी के भरणपोषण के लिए मोटी रकम देगा. ईशा के घरवालों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया. 18 मई, 2015 की शाम 4 बजे दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह अपने साथी मनीष कठेरिया के साथ लग्जरी कार से ईशा के घर पहुंचा और उस की मां विनीता के पैर छू कर बोला, ‘‘मांजी, हम ईशा को कुष्मांडा देवी के दर्शन कराने ले जाना चाहते हैं. हमें आप की इजाजत चाहिए.’’

ईशा ज्ञानेंद्र की पत्नी थी, सो उन्हें क्या ऐतराज हो सकता था. लिहाजा उन्होंने ईशा को ज्ञानेंद्र के साथ जाने की इजाजत दे दी. ईशा व ज्ञानेंद्र को रात 8 बजे तक मंदिर से वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन जब दोनों रात 10 बजे तक वापस नहीं आए तो ईशा की मां विनीता सचान को चिंता हुई. उन्होंने ईशा और ज्ञानेंद्र से मोबाइल पर बात करनी चाही, लेकिन दोनों के मोबाइल स्विच्ड औफ थे. रात भर विनीता बेटी के आने का इंतजार करती रहीं, लेकिन वह वापस नहीं लौटी. सुबह को परेशानहाल विनीता सचान थाना काकादेव पहुंचीं. थाने पर उस समय थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव मौजूद थे. उन्होंने सारी बात बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगई. लेकिन विभाग का मामला होने की वजह से पुलिस ने उन्हें टरका दिया. इस पर विनीता सचान डीआईजी आशुतोष पांडेय से मिलीं और शक जताते हुए रिपोर्ट दर्ज कराने की विनती की.

डीआईजी आशुतोष पांडेय को मामला गंभीर लगा. अत: उन्होंने थानाप्रभारी उदय प्रताप को तत्काल रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दे दिया. आदेश मिलते ही उदय प्रताप ने विनीता सचान की ओर से भादंवि की धारा 364 के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. 20 मई को काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को कौशांबी के थाना महेवाघाट द्वारा एक युवती की सिर विहीन लाश मिलने की सूचना दी गई. शक के आधार पर थानाप्रभारी विनीता सचान, उन के पुत्र ऐश्वर्य राज व अन्य घरवालों के साथ महेवाघाट थाना पहुंचे. पुलिस ने लाश मोर्चरी में रखवा दी थी. विनीता सचान ने जब उस लाश को देखा तो वह फफक कर रो पड़ीं. यह लाश उन की बेटी ईशा की ही थी. विनीता ने लाश की पहचान ईशा के हाथ में बंधी कलाई घड़ी तथा बांह पर गुदे लव आकार के टैटू से की थी.

लाश की शिनाख्त होने पर महेवाघाट थाना पुलिस ने अपने यहां दर्ज हत्या के मामले को थाना काकादेव, कानपुर ट्रांसफर कर दिया. चूंकि ईशा की लाश की शिनाख्त हो चुकी थी, इसलिए काकादेव पुलिस ने अपहरण के इस मामले में धारा 302/201/120बी और जोड़ दी. साथ ही विनीता के बयान के आधार पर ज्ञानेंद्र सिंह के साथसाथ बच्चा, मनीष कठेरिया, अर्जुन और उस की कथित पत्नी अवंतिका को भी आरोपी बना दिया. चूंकि यह मामला पुलिस के एक दरोगा से जुड़ा था इसलिए डीआईजी आशुतोष पांडेय ने ईशा के हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने, कत्ल में प्रयुक्त हथियार और सिर बरामद करने के लिए एक विशेष पुलिस टीम बनाई. इस टीम में सीओ स्वरूप नगर आतिश कुमार, क्राइम ब्रांच के सीओ अमित कुमार राय, प्रभारी आर.के. सक्सेना तथा काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने ज्ञानेंद्र, बच्चा, मनीष कठेरिया तथा उस के साथी अर्जुन के ठिकानों पर ताबड़तोउ़ छापे मारे. लेकिन सभी आरोपी फरार थे. पुलिस टीम ने उन के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. साथ ही करीब एक दर्जन लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की. निर्दोष पाए जाने पर बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. पुलिस टीम को ईशा के मोबाइल की लोकेशन आगरा में मिली. पुलिस टीम आगरा गई और हाइवे के एक ढाबे के कर्मचारी से ईशा का मोबाइल बरामद कर लिया. उस कर्मचारी ने बताया कि कुछ लोग यह मोबाइल खाना खाने के बाद मेज पर छोड़ गए थे. पुलिस टीम को समझते देर नहीं लगी कि हत्यारोपियों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए ऐसा किया होगा.

25 मई, 2015 को पुलिस टीम ने हत्यारोपी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को छपेड़ा पुलिया, काकादेव से कार सहित गिरफ्तार कर लिया. अर्जुन अपनी प्रेमिका को स्विफ्ट डिजायर कार से घुमाने बिठूर जा रहा था. यह कार मनीष कठेरिया की थी. अर्जुन और अवंतिका के पास से ईशा का एक कंगन भी बरामद हुआ. पूछताछ में अर्जुन ने बताया कि घटना वाले दिन शाम 4 बजे ज्ञानेंद्र सिंह स्विफ्ट कार से ईशा के घर पहुंचा था. उस वक्त कार में मनीष और उस का भाई बच्चा भी मौजूद था. ईशा को साथ ले कर तीनों नौबस्ता आए. मनीष ने उसे व अवंतिका को फोन कर के वहीं बुला लिया.

सभी 6 लोग 2 गाडि़यों के साथ विधनू, घाटमपुर, फतेहपुर होते हुए कौशांबी की ओर बढ़े. रास्ते में एक सुनसान जगह पर ज्ञानेंद्र ने गाड़ी रोक दी. उसी वक्त मनीष ने ईशा को दबोच लिया और ज्ञानेंद्र ने तेज धार वाले चाकू से ईशा का सिर धड़ से अलग कर दिया. धड़ से खून का फव्वारा छूटा तो मनीष ने अपनी शर्ट उतार कर सिर को धड़ से बांध दिया. फिर ईशा के शरीर से कपड़े और जेवर उतार कर सिर को यमुना नदी में तथा धड़ को महेवाघाट यमुना पुल के पास फेंक दिया. तत्पश्चात गाड़ी की अदलाबदली कर के तथा कंगन दे कर उसे वापस भेज दिया गया. मनीष, बच्चा व दरोगा ज्ञानेंद्र दूसरी गाड़ी से कहीं चले गए. अर्जुन व अवंतिका का बयान दर्ज करने के बाद काकादेव पुलिस ने दोनों को जेल भेज दिया.

अब पुलिस टीम ने शातिर दिमाग ज्ञानेंद्र सिंह, उस के साथी मनीष कठेरिया व बच्चा को गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया. इस से घबरा कर 30 मई को मनीष कठेरिया ने सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे 3 दिनों की रिमांड पर ले लिया. मनीष से कोहना व किदवई नगर थाने में कड़ाई से पूछताछ की गई, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने उस की मां उषा को थाने बुलवा लिया. दोनों को आमनेसामने बैठा कर पुलिस टीम ने पूछताछ शुरू की. जबान न खुलने पर पुलिस ने उस की मां उषा को जेल भेजने की धमकी दी. इस धमकी से मनीष टूट गया और उस ने जबान खोल दी.

वह पुलिस टीम को महेवाघाट थाना क्षेत्र ले गया. वहां उस ने एक गड्ढे से मृतक ईशा का पर्स व सोने का एक कंगन बरामद करा दिया. पर्स में कुछ नकदी व जरूरी कागजात थे. पुलिस टीम ने यहीं से मनीष की खून से सनी शर्ट भी बरामद कर ली, जिसे उस ने हत्या के बाद खून रोकने के लिए इस्तेमाल किया था. बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने मनीष को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. मनीष को जेल भेजने के बाद पुलिस टीम ने ईशा की हत्या के मुख्य आरोपी दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को पकड़ने की कवायद शुरू की. एसएसपी शलभ माथुर ने उसे पकड़ने के लिए 12 हजार का ईनाम घोषित कर दिया था. लेकिन दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह पुलिस की हर युक्ति को धता बता कर 8 जून को कोर्ट में हाजिर हो गया. पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम हाथ मलती रह गई.

दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा आत्मसमर्पण की बात कानपुर कोर्ट में फैली तो वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वे झुंड बना कर सीजेएमएम कोर्ट जा पहुंचे. पुलिस जब ज्ञानेंद्र को ले जाने लगी तो वकील उस पर टूट पड़े और उसे लातघूंसों से जम कर पीटा, उन्होंने उस के कपड़े फाड़ दिए और मुंह पर थूका. बड़ी मसक्कत के बाद पुलिस उसे जेल ले जा सकी. कत्ल में इस्तेमाल हथियार और मृतका का सिर बरामद करने के लिए पुलिस टीम ने दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को 17 जून को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. काफी जद्दोजहद के बाद ज्ञानेंद्र सिंह ने मुंह खोला. वह पुलिस टीम को महेवाघाट, कौशांबी में यमुना नदी के दूसरी तरफ ले गया, जहां उस ने जमीन में गड़े सर्जिकल चाकू, ईशा का मंगलसूत्र, चेन और अंगूठी बरामद कराई. ईशा के सिर के संबंध में पूछने पर ज्ञानेंद्र ने बताया कि उसे यमुना नदी की तेज धारा में फेंक दिया गया था.

सिर को बरामद करने के लिए पुलिस ने यमुना नदी में जाल डलवाया, लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका था. पुलिस पूछताछ में ज्ञानेंद्र ने बताया कि ईशा उस पर पहली पत्नी नीलम को तलाक देने का दबाव बना रही थी. जिस से परेशान हो कर उस ने उसे ठिकाने लगा दिया. वह उसे मंदिर दर्शन कराने के बहाने ले गया था. रास्ते में कार के भीतर ही उस का काम तमाम कर दिया गया. फिर धड़ को महेवाघाट थाने के पास यमुना नदी के पास फेंक दिया गया और सिर यमुना नदी में. वारदात के वक्त मनीष कठेरिया, उस का भाई बच्चा, अर्जुन तथा उस की प्रेमिका अवंतिका उस के साथ थे.

19 जून, 2015 को काकादेव पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह को सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. अभियुक्त बच्चा फरार था. Hindi stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jawaharlal Nehru: फिर आया जिन्न बाहर नेहरू – बोस के रिश्तों का

लेखक – एम.जेड. बेग, Jawaharlal Nehru: देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा महान देशभक्त सुभाषचंद्र बोस के घर वालों की आईबी से जांच कराने के मामले ने राजनैतिक रूप लेना शुरू कर दिया है. जब बात उठी है तो नेताजी के रहस्यमय तरीके से गायब होने की भी इस बार जांच हो ही जानी चाहिए. पिछले दिनों एक पत्रिका में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिस में बताया गया था कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजाद हिंद फौज के संस्थापक और महान देशभक्त सुभाषचंद्र बोस के परिवार की निगरानी भारतीय खुफिया जांच एजेंसी आईबी से कराई थी और यह निगरानी नेहरू की मृत्यु के 4 साल बाद तक होती रही. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही भारतीय राजनीति में एक उबाल सा आ गया.

रिपोर्ट के अनुसार सन 1948 से ले कर 1968 तक आईबी के लोग नेताजी सुभाषचंद्र बोस  के परिवार वालों की निगरानी करते रहे. वे इस बात की पूरी रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजते थे कि नेताजी के रिश्तेदारों से मिलने कौन आया, कितनी देर रुका. उन के पते पर जो भी पत्र आता था, उसे पहले आईबी वाले खोल कर पढ़ते थे, उस के बाद ही वह पत्र संबंधित व्यक्ति तक पहुंचता था. नेताजी जैसे महान देशभक्त के परिवार के लोगों की निगरानी भारत सरकार द्वारा करवाना अवश्य ही अचरज भरी बात थी. वैसे तो सभी जानते हैं कि सुभाषचंद्र बोस और नेहरू व गांधी के बीच बहुत गहरे मतभेद थे. इस निगरानी प्रकरण को समझने के लिए हमें स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के घटनाक्रम को देखना होगा. क्योंकि इस सारे प्रकरण की असली जड़ें तो वहीं हैं.

23 जनवरी, 1897 को कटक के एक मशहूर वकील जानकीनाथ बोस के घर में पैदा हुए बच्चे को ही लोग आज सुभाषचंद्र बोस के नाम से जानते हैं. 14 भाईबहनों में नौवें नंबर के सुभाषचंद्र बोस शुरू से ही होनहार थे. हर इम्तहान में वह कामयाबी की एक नई दास्तान लिखते गए. यहां तक कि सन 1920 में भारत की सिविल सर्विस के लिए दिए गए इम्तहान में भी वह मैरिट में चौथे नंबर पर रहे, जोकि एक भारतीय के लिए बहुत बड़ी बात थी. लेकिन जलियांवाला बाग की घटना से व्यथित हो कर उन्होंने सिविल सर्विस छोड़ दी और 1921 में भारत लौट आए. भारत आ कर वह गांधीजी से प्रभावित हो कर कांग्रेस में शामिल हो गए. लेकिन जल्द ही उन के गांधीजी से वैचारिक मतभेद हो गए.

असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण जिस समय सुभाषचंद्र बोस जेल में थे, उस समय गांधीजी ने लार्ड इरविन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिस की एक शर्त थी कि असहयोग आंदोलन को वापस लेना होगा. यह बात सुभाषचंद्र बोस को नागवार लगी. यहीं से गांधीजी और सुभाषचंद्र बोस के बीच मतभेद उभर कर सामने आने लगे. सुभाषचंद्र बोस पूर्ण स्वतंत्रता से पहले असहयोग आंदोलन वापस नहीं लेना चाहते थे और ऐसी स्थिति में तो बिलकुल ही नहीं, जबकि उन्हीं दिनों भगत सिंह और उन के साथियों को फांसी दी गई थी. लार्ड इरविन और गांधीजी के समझौते के अनुसार, सन 1937 में हुए प्रांतीय असेंबलियों के चुनाव में कांग्रेस 7 राज्यों में विजयी हुई. सन 1938 के हरीपुरा में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया. कांग्रेस का अध्यक्ष बनते ही सुभाषचंद्र बोस ने भारत के भविष्य के लिए योजनाएं बनानी शुरू कर दीं.

सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पूर्ण स्वतंत्रता का नारा दिया. वह चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार को 6 महीने का इस बात का अल्टीमेटम दिया जाए कि या तो वह भारत को स्वतंत्र कर दे अन्यथा परिणाम भुगतने को तैयार रहे. यहीं से गांधी व नेहरू और नेताजी के बीच मतभेद हो गए. इस के विपरीत सुभाषचंद्र बोस की ख्याति और विश्वसनीयता भारत के जनमानस में बढ़ती गई. यह वह समय था, जब यूरोप में अशांति बढ़ती जा रही थी और आने वाले समय में एक और विश्वयुद्ध की संभावनाएं बढ़ती जा रही थीं. सुभाषचंद्र बोस की दूरगामी दृष्टि यह देख रही थी कि निकट भविष्य में युद्ध होगा और अंगरेज भारतीयों को भी इस युद्ध की भट्ठी में झोंक देंगे. इसलिए वह चाहते थे कि भारत जल्द से जल्द पूर्ण स्वतंत्र हो जाए जिस से होने वाले युद्ध की विभीषिका से भारतीय सुरक्षित रह सकें.

जबकि गांधीजी और नेहरू की सोच यह थी कि जिस तरह ब्रिटिश हुकूमत धीरेधीरे भारतीयों को अधिकार दे रही है, इसी तरह चलती रहनी चाहिए. गांधीजी ने नई साजिश रचनी शुरू कर दी. सुभाषचंद्र बोस का राजनीतिक प्रभाव कम करने के लिए 1939 में जब कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव का समय आया तो गांधीजी ने चाहा कि सुभाषचंद्र बोस चुनाव में भाग न लें. वह डा. पट्टाभि को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के पक्षधर थे. मगर सुभाषचंद्र बोस चुनाव में खड़े हुए और गांधीजी के भरपूर विरोध के बावजूद भी भारी मतों से दोबारा कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. डा. पट्टाभि सीतारमय्या की हार को गांधीजी ने अपनी हार माना, क्योंकि उन्हें जिताने में उन की प्रतिष्ठा दांव पर जो लगी थी.

सुभाषचंद्र बोस दोबारा अध्यक्ष चुन तो लिए गए, लेकिन बाकी पूरी कार्यकारिणी पर गांधीजी का प्रभाव था. इसलिए कांग्रेस कार्यकारिणी ने सुभाषचंद्र बोस की राह में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए. एक दिन तो ऐसा हुआ कि पूरी कार्यकारिणी ने त्यागपत्र दे दिया. सुभाषचंद्र बोस के लिए नई कार्यकारिणी का चुनाव कराना आसान नहीं था. हालात इतने बिगड़ गए कि उन के लिए काम तक करना मुश्किल हो गया. आखिर उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे कर कांग्रेस को भी अलविदा कह दिया. इस के बाद उन्होंने अपना एक अलग दल फारवर्ड ब्लौक का गठन किया. संगठन को मजबूत करने के लिए उन्होंने भारतीयों को इकट्ठा करना शुरू किया, ताकि एक बड़े संग्राम की शुरुआत की जा सके. इस से ब्रिटिश हुकूमत हरकत में आ गई. उन की गतिविधियों को देखते हुए हुकूमत ने उन्हें जेल में बंद कर दिया. जेल में उन का स्वास्थ्य खराब हो गया तो उन्हें उन के घर में ही नजरबंद कर दिया गया.

सन 1941 में सुभाषचंद्र बोस योजना बना कर कलकत्ता के अपने घर से गायब हो गए और अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंच गए. वहां वह उस समय के जरमन शासक एडोल्फ हिटलर से मिले. उस समय विश्वयुद्ध चल रहा था और सिंगापुर में रासबिहारी बोस ने भारत की आजादी के लिए एक सेना का गठन किया हुआ था, जिस को आजाद हिंद फौज के नाम से जाना जाता था. तब सन 1943 में सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से सिंगापुर आ गए और आजाद हिंद फौज की कमान उन्होंने संभाल ली. आजाद हिंद फौज को ले कर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारत की ओर पेशकदमी शुरू कर दी. उन्होंने इसी फौज की बदौलत अंडमान व निकोबार द्वीप समूह को अंगरेजी शासन से मुक्ति दिलाई. जनवरी, 1944 में आजाद हिंद फौज का मुख्यालय रंगून में स्थापित किया और 18 मार्च, 1944 को बर्मा की सीमा पार करते हुए आजाद हिंद फौज भारत पहुंच गई.

कहा जाता है कि विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश हुकूमत में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था. यानी धरती के इतने बड़े भूभाग पर अंगरेजों का शासन था कि कहीं न कहीं दिन होता ही था. इतना बड़ा साम्राज्य होने के कारण अंगरेज एक तरह से आलसी हो चुके थे. यही वजह थी कि जब जापानियों ने सिंगापुर पर आक्रमण किया तो अंगरेज वहां से बिना लड़े ही भाग खड़े हुए. बाद में भारतीय लोगों से सुसज्जित सेना को लड़ने के लिए सिंगापुर भेजा. भारतीय सेना ने जापानी सेना से लोहा लिया. नेताजी का अंदेशा सही साबित हुआ, क्योंकि उन का यही मानना था कि जब भी युद्ध होगा, अंगरेज स्वयं न लड़ कर भारतीयों को ही युद्ध के मोरचे पर भेजेंगे.

सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस से परिस्थितिवश विदा होने से एक बात साफ हो गई थी कि कांग्रेस में वही होगा, जो गांधीजी और नेहरू चाहेंगे. और शायद यही सोच आगे चल कर भारत के विभाजन की वजह बनी. क्योंकि सुभाषचंद्र बोस की कांग्रेस से विदाई और अंगरेज सरकार द्वारा उन्हें नजरबंद करने के बाद ही मुसलिम लीग और जिन्ना का उदय हुआ. सुभाषचंद्र बोस चाहते थे कि भारत में कुछ ऐसा ही हो, जैसा तुर्की के अतातुर्क मुस्तफा कमाल पाशा ने किया था. खिलाफत खत्म कर के वह देश में केवल एक भाषा चलाना चाहते थे, जिस से पूरा देश एक सूत्र में बंध जाए. देश में सारे धर्मों को बराबर सम्मान दिया जाना चाहिए और किसी को कोई आरक्षण नहीं, केवल योग्यता ही मापदंड हो. जबकि गांधीजी ने खिलाफत खत्म करने का विरोध किया.

सुभाषचंद्र बोस ने जब सिंगापुर में आजाद हिंद फौज की कमान संभाली तो उस समय जापानी आगे बढ़ते ही जा रहे थे और अंगरेज पीछे भागते जा रहे थे. अंगरेजों के भागने का सिलसिला उस वक्त थमा, जब अमेरिका ने 6 और 9 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए. इस के कुछ दिनों बाद ही अंगरेज सरकार ने घोषणा की कि 18 अगस्त, 1945 को ताइपे में जिस विमान में आग लगी थी, उस में नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी थे. यानी विमान में आग लगने से नेताजी की मृत्यु हो गई. इसी के साथ शुरू हो गया यह विवाद कि क्या सचमुच उस समय सुभाषचंद्र बोस उस विमान में मौजूद थे भी या नहीं?

15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र तो हो गया, मगर इस बात पर संशय बरकरार रहा कि नेताजी की मृत्यु हो चुकी है या वह अभी जीवित हैं. नेताजी का रहस्य जानने के लिए भारत सरकार ने कई बार आयोग बिठाए, मगर उन सब का नतीजा कुछ खास नहीं निकला. लोग दावे करते रहे कि नेताजी ताइपे विमान हादसे में नहीं मरे थे. कुछ लोग कहते थे कि वह जापान की हार के बाद मंचूरिया होते हुए रूस चले गए थे, जहां स्टालिन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. चूंकि ब्रिटिश शासन और नेहरू व स्टालिन तीनों ही नहीं चाहते थे कि सुभाषचंद्र बोस भारत आएं, जिस से कि इन तीनों के हित प्रभावी हों. क्योंकि वे जानते थे कि नेताजी की भारत में उपस्थिति एक राजनीतिक हलचल पैदा कर देगी. दूसरी तरफ कुछ लोगों का दावा था कि सुभाषचंद्र बोस फैजाबाद के एक आश्रम में गुमनामी बाबा की हैसियत से रह रहे हैं.

सच्चाई कुछ भी हो, मगर यह बात तय है कि आधिकारिक तौर पर 18 अगस्त, 1945 के बाद से उन का कोई पता नहीं है. इस सच्चाई को कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि भारतीय राजनीति में 1940-50 के दशक में यदि नेहरू को कोई चुनौती दे सकता था तो वह सुभाषचंद्र बोस ही थे. हाल ही में सामने आए दस्तावेजों से भी यह बात साबित होती है कि जवाहरलाल नेहरू भी शायद यह नहीं मानते थे कि वास्तव में सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु हो चुकी है. उन्हें डर था कि सुभाषचंद्र बोस कभी भी प्रकट हो सकते हैं. उन के सामने आने से नेहरू के लिए बहुत ही ज्यादा परेशानियां खड़ी हो जातीं.

नेहरू को सत्ता संभालने की जल्दी थी, इसलिए उन्होंने अपने हाथ में सत्ता लेते समय अंगरेज शासन से कई समझौते किए थे. उन में से एक यह भी था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी अगर आजाद हिंद फौज का कोई ऐसा व्यक्ति भारत सरकार के हाथ लगता है, जिस पर ब्रिटिश हुकूमत ने केस कर रखा है तो उस व्यक्ति को ब्रिटिश सरकार को सौंपना होगा. ऐसे व्यक्तियों में सुभाषचंद्र बोस का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. आज भारत को स्वतंत्र हुए 7 दशक होने को हैं. अब शायद इस बात का महत्त्व नहीं है कि सुभाषचंद्र बोस की विमान हादसे में मृत्यु हुई या नहीं? मगर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के रवैए से यह सवाल उठ खड़े होते हैं कि क्या वास्तव में भारत को स्वतंत्र कराने में कांग्रेस का हाथ था या इस के पीछे और कोई दूसरे कारण थे, जिस की वजह से अंगरेजों ने भारत को बहुत जल्दी में स्वतंत्रता प्रदान कर दी.

अब भारत सरकार को चाहिए कि नेताजी से संबंधित सारी जानकारी सार्वजनिक करे. क्योंकि भारतीयों का यह अधिकार है कि वह सच्चाई और सुभाषचंद्र बोस की महिमा को जाने.  एक बार इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटली, जोकि भारत की स्वतंत्रता के समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री थे, से भारत की आजादी के बाद जब बंगाल के राज्यपाल चटर्जी ने उन से सवाल किया था कि भारत को आजादी दिलाने में गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन की क्या भूमिका थी तो अटली का जवाब था कि बहुत ही कम. अर्थात कुछ और दूसरे कारण थे, जिन की वजह से अंगरेजों को भारत छोड़ना पड़ा. नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस के परिवार की निगरानी कराई या नहीं, मगर अब समय आ गया है कि सारी वास्तविकता लोगों के सामने लाई जाए.

 

Firozabad Crime: प्यार की राह का रोड़ा – पति को बनाया पराया

Firozabad Crime: घटना उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना टूंडला के गांव नगला राधेलाल की है. 30 अक्तूबर की सुबह जब हरभेजी सो कर उठी तो बराबर के कमरे में उन्हें कोई हलचल नहीं दिखी. उस कमरे में उन का बेटा गब्बर बहू विवेक कुमारी उर्फ लालपरी तथा पोते अनुज के साथ सोया था. गब्बर के 2 बच्चे हरभेजी के साथ ही सोए थे. हरभेजी जब गब्बर के कमरे में गईं तो अंदर का दृश्य देखते ही उन के मुंह से चीख निकल गई.

उन का 40 वर्षीय बेटा गब्बर पंखे से बंधे फंदे पर लटका हुआ था, उस के पैर कमरे के फर्श को छू रहे थे. गब्बर के चेहरे से खून टपक रहा था. मां हरभेजी ने बहू लालपरी को आवाज लगाई, लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. न ही वहां उस का बेटा अनुज था. बहू की तलाश की गई पर उस का कोई पता नहीं चला. इस घटना से परिवार में कोहराम मच गया. मां के रोने की आवाज सुन कर उन के और बेटे भी वहां आ गए. कुछ ही देर में मोहल्ले के लोग वहां जमा हो गए. उसी दौरान किसी ने आत्महत्या करने की सूचना पुलिस को फोन द्वारा दे दी.

सूचना पर थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय फोर्स सहित घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने शव के साथ मकान का भी निरीक्षण किया. सूचना मिलने पर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां आ गए. निरीक्षण के उपरांत पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि गब्बर ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उस की पीटपीट कर हत्या करने के बाद शव को फंदे पर लटकाया गया है. गब्बर के साथ कमरे में उस की पत्नी ही सोई थी, जो वहां से फरार थी, इसलिए पूरा शक पत्नी पर ही था. अब सवाल यह था कि शव को अकेले पत्नी पंखे पर नहीं लटका सकती. इस काम में किसी ने उस की मदद जरूर की होगी.

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो वहां एक ऐसी मैक्सी मिली, जिस पर खून लगा हुआ था. पता चला कि वह मैक्सी मृतक की पत्नी लालपरी की थी. लालपरी के कुछ कपड़े और अन्य सामान कमरे से गायब थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि वह पति की हत्या के बाद अपना सामान व अपने साथ सोए बच्चे को ले कर फरार हो गई है. पुलिस ने घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि रात को पतिपत्नी में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ था. झगड़े के समय लालपरी का प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा भी वहां मौजूद था. स्वामी टूंडला थाने के गांव बन्ना का रहने वाला था. उस समय परिवार के लोगों ने दोनों को समझाबुझा कर झगड़ा शांत करा दिया था. इस के बाद वे अपने कमरे में सोने के लिए चले गए थे.

मृतक के भाई योगेश ने पुलिस को बताया कि शादी के पहले से ही लालपरी के स्वामी से अवैध संबंध थे. मौके की जांच करने के बाद पुलिस ने गब्बर की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फिरोजाबाद भेज दी. पुलिस ने मृतक के भाई योगेश की ओर से विवेक कुमारी उर्फ लालपरी व उस के प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस नामजद आरोपियों की तलाश में जुट गई. पुलिस ने कई संभावित स्थानों पर दबिश भी दी, लेकिन उन का कोई पता नहीं लगा. तब पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैला दिया.

लालपरी की शादी गब्बर से हो जरूर गई थी लेकिन वह उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. वह अपने घर वालों की मरजी का विरोध भी नहीं कर सकी थी. यानी घर वालों की वजह से उस ने गब्बर से शादी कर जरूर ली थी लेकिन उस के दिल में तो उस का प्रेमी बसा था. यही वजह थी कि वह प्रेमी को शादी के बाद भी भुला न सकी. प्रेमी स्वामी उस के पति की गैरमौजूदगी में उस के घर आनेजाने लगा. जब पति काम पर चला जाता तो मौका देख कर लालपरी प्रेमी को फोन कर बुला लेती थी. इस के बाद दोनों ऐश करते थे लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी तो नहीं रहतीं.

लालपरी व स्वामी के संबंधों की जानकारी मोहल्ले के साथ ससुराल के लोगों को भी हो गई. इस की भनक जब गब्बर को लगी तो उस ने कई बार पत्नी को समझाया, लेकिन लालपरी की समझ में कुछ नहीं आया. इस बात को ले कर दोनों में कई बार झगड़ा भी हुआ, पर उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना जारी रखा. घटना के 3 सप्ताह बाद भी लालपरी और उस के प्रेमी स्वामी के बारे में पुलिस को कोई जानकारी नहीं मिली थी. 21 नवंबर, 2018 को पुलिस को एक जरूरी सूचना मिली कि लालपरी और उस का प्रेमी इस समय टूंडला से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित एफएच मैडिकल कालेज में मौजूद हैं. थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने एसआई नेत्रपाल शर्मा के नेतृत्व में तुरंत एक पुलिस टीम वहां भेज दी.

पुलिस को अस्पताल में स्वामी घायलावस्था में उपचार कराते मिला, जबकि उस की प्रेमिका लालपरी अस्पताल में उस की देखभाल कर रही थी. पता चला कि स्वामी एक सप्ताह पहले सड़क हादसे में घायल हो गया था. उस के सिर में गहरी चोट लगी थी. उस की प्रेमिका उसे गंभीर हालत में उपचार के लिए एफ.एच. मैडिकल कालेज ले कर आई थी. लेकिन उपचार के दौरान दोनों के बीच अस्पताल में ही किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था. झगड़े में वे दोनों गब्बर की हत्या को ले कर एकदूसरे पर आरोप लगा रहे थे.

करीब 3 सप्ताह पहले हुई गब्बर की हत्या की जानकारी मीडिया द्वारा अस्पताल के स्टाफ को मिल चुकी थी. उन की बातों से वहां के स्टाफ को यह शक हो गया कि गब्बर हत्याकांड में ये लोग शामिल हैं. इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी थी. पुलिस ने दोनों हत्यारोपियों को हिरासत में ले लिया. स्वामी और उस की प्रेमिका लालपरी को थाने ले जा कर उन से पूछताछ की गई. हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की खबर पा कर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां पहुंच गए. उन के सामने थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने लालपरी और स्वामी से पूछताछ की तो उन्होंने गब्बर की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने गब्बर की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी-

रोजाबाद जिले के गांव नगला राधेलाल के रहने वाले गब्बर की शादी करीब 9 साल पहले विवेक कुमारी उर्फ लालपरी से हुई थी. बाद में वह 3 बच्चों का बाप बन गया. गब्बर के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, उस से बमुश्किल परिवार का गुजारा होता था. तब खाली समय में गब्बर राजमिस्त्री का काम कर लेता था. शादी से पहले ही लालपरी के पैर बहक गए थे. बन्ना गांव के रहने वाले स्वामी उर्फ सुम्मा से उस का चक्कर चल रहा था. करीब एक साल पहले की बात है. लालपरी का अपने प्रेमी स्वामी के साथ रंगरेलियां मनाते हुए अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इस से गब्बर और उस के परिवार की बड़ी बदनामी हुई थी.

इस के बाद गब्बर को मोहल्ले के लोगों के ताने सुनने पड़े थे. गब्बर ने पत्नी से कहा कि वह स्वामी से संबंध खत्म कर ले, लेकिन वह इतनी बेशर्म हो चुकी थी कि उलटे पति से ही झगड़ने लगती थी. एक बार वह पति से झगड़ कर बन्ना स्थित कांशीराम कालोनी में जा कर रहने लगी थी. कुछ समय बाद जब लालपरी का गुस्सा शांत हो गया तो वह पति के घर लौट आई. वहां वह कुछ दिनों तक तो ठीक से रही लेकिन बाद में उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना फिर शुरू कर दिया. पति जब उसे टोकता तो उसे उस की बात बुरी लगती थी. एक तरह से उसे पति रास्ते का कांटा नजर आने लगा. उस कांटे से वह हमेशा के लिए निजात पाना चाहती थी, ताकि प्रेमी के साथ चैन से रह सके.

एक दिन उस ने इस सिलसिले में प्रेमी से बात करने के बाद पति को ठिकाने लगाने की तरकीब खोजी. लालपरी ने एक बार पति को मारने के लिए उस के खाने में जहर मिला दिया. जहर का असर होते ही गब्बर सिंह की हालत बिगड़ गई. घर वाले उसे इलाज के लिए तुरंत आगरा ले गए और उसे एक अस्पताल में भरती करा दिया. परिवार वालों को लालपरी पर शक तो था, लेकिन वे यह भी सोच रहे थे कि कहीं खाने में छिपकली तो नहीं गिर गई. बहरहाल, उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को नहीं दी. उन्होंने लालपरी से इस बारे में पूछताछ की तो उस ने कहा कि हो सकता है उस की लापरवाही से खाने में कोई छिपकली वगैरह गिर गई हो. इस के लिए लालपरी ने घर वालों से माफी मांग ली.

अस्पताल से पति के घर वापस आने के बाद लालपरी ने रोरो कर गब्बर से भी माफी मांग ली. यह सब लालपरी का ड्रामा था. सीधेसादे गब्बर ने पत्नी को इस घटना के बाद भी माफ कर दिया और खुद पत्नी की तरफ से बेफिक्र हो गया. लालपरी भले ही अपने मतलब के लिए पति से माफी मांग लेती थी, लेकिन हकीकत यह थी कि वह दबंग थी. सीधेसादे गब्बर पर वह अकसर हावी रहती थी. स्वामी से उस के संबंधों को ले कर पति जब उस पर नाराज होता तो वह उलटे उस की शिकायत थाने में कर आती थी. कई बार वह पति व ससुरालियों के खिलाफ मारपीट की थाने में शिकायत दर्ज करा चुकी थी. इस के चलते पति व ससुराल वाले उस का कोई विरोध नहीं कर पाते थे.

समाज को दिखाने के लिए उस ने करवाचौथ का व्रत भी रखा था. लेकिन वह अब पति से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी. इस बारे में उस ने अपने प्रेमी स्वामी के साथ एक अंतिम योजना तैयार कर ली थी. 29 अक्तूबर, 2018 को स्वामी लालपरी के घर आया. गब्बर ने स्वामी से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन पत्नी से झगड़ने लगा. स्वामी और घर वालों ने दोनों को समझा कर शांत कराया. उसी समय लालपरी ने स्वामी से कह दिया था कि इस कांटे को आज रात ही निकाल देना है. प्रेमिका की बात सुन कर स्वामी वहां से चला गया.

उस रात लालपरी अपने 6 साल के बेटे अनुज के साथ पति के कमरे में ही सोई थी. उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी नहीं लगाई. जब गब्बर गहरी नींद में सो गया तो लालपरी ने फोन कर के प्रेमी को बुला लिया. दोनों ने मिल कर सोते हुए गब्बर को दबोच लिया और मारपीट की, फिर गला दबा कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद इसे आत्महत्या का रूप देने के लिए दोनों ने उस की लाश पंखे पर लटका दी. उस ने अपने प्रेम संबंधों की राह में रोड़ा बने पति को हटा दिया. पुलिस ने स्वामी उर्फ सुम्मा और लालपरी से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया.

लालपरी ने प्यार की खातिर अपने घर को ही नहीं, अपनी मांग के सिंदूर को भी उजाड़ लिया. बच्चों के सिर पर भी मांबाप का साया नहीं रहा. बिलखते हुए बच्चों को देख कर लोग लालपरी को कोस रहे थे कि प्रेमी के साथ जाना था तो ऐसे ही चली जाती, पति को क्यों मार डाला. Firozabad Crime.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories: अपमान और नफरत की साजिश

Crime Stories: पहली मई, 2019 की बात है. दिन के करीब 12 बजे का समय था, जब महाराष्ट्र के अहमदनगर से करीब 90 किलोमीटर दूर थाना पारनेर क्षेत्र के गांव निधोज में उस समय अफरातफरी मच गई, जब गांव के एक घर में अचानक आग के धुएं, लपटों और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आनी शुरू हुईं. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर गांव वाले एकत्र हो गए. लेकिन घर के मुख्यद्वार पर ताला लटका देख खुद को असहाय महसूस करने लगे.

दरवाजा टूटते ही घर के अंदर से 3 बच्चे, एक युवक और युवती निकल कर बाहर आए. बच्चों की हालत तो ठीक थी, लेकिन युवती और युवक की स्थिति काफी नाजुक थी. गांव वालों ने आननफानन में एंबुलेंस बुला कर उन्हें स्थानीय अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन का प्राथमिक उपचार कर के उन्हें पुणे के सेसूनडाक अस्पताल के लिए रेफर कर दिया. साथ ही इस मामले की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी.

पुलिस कंट्रोल रूम से मिली जानकारी पर थाना पारनेर के इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने चार्जरूम में मौजूद ड्यूटी अफसर को बुला कर तुरंत इस मामले की डायरी बनवाई और बिना विलंब के एएसआई विजय कुमार बोत्रो, सिपाही भालचंद्र दिवटे, शिवाजी कावड़े और अन्ना वोरगे के साथ अस्पताल की तरफ रवाना हो गए. रास्ते में उन्होंने अपने मोबाइल फोन से मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

जिस समय पुलिस टीम अस्पताल परिसर में पहुंची, वहां काफी लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. इन में अधिकतर उस युवक और युवती के सगेसंबंधी थे. पूछताछ में पता चला कि युवती का नाम रुक्मिणी है और युवक का नाम मंगेश रणसिंग लोहार. रुक्मिणी लगभग 70 प्रतिशत और मंगेश 30 प्रतिशत जल चुका था. अधिक जल जाने के कारण रुक्मिणी बयान देने की स्थिति में नहीं थी. मंगेश रणसिंग भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं था.

इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने मंगेश रणसिंग और अस्पताल के डाक्टरों से बात की. इस के बाद वह अस्पताल में पुलिस को छोड़ कर खुद घटनास्थल पर आ गए.

घटना रसोईघर के अंदर घटी थी, जहां उन्हें पैट्रोल की एक खाली बोतल मिली. रसोईघर में बिखरे खाना बनाने के सामान देख कर लग रहा था, जैसे घटना से पहले वहां पर हाथापाई हुई हो.

जांचपड़ताल के बाद उन्होंने आग से बच गए बच्चों से पूछताछ की. बच्चे सहमे हुए थे. उन से कोई खास बात पता नहीं चली. वह गांव वालों से पूछताछ कर थाने आ गए. मंगेश रणसिंग के भाई महेश रणसिंग को वह साथ ले आए थे. उसी के बयान के आधार पर रुक्मिणी के परिवार वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी.

इस मामले में रुक्मिणी का बयान महत्त्वपूर्ण था. लेकिन वह कोई बयान दर्ज करवा पाती, इस के पहले ही 5 मई, 2019 को उस की मृत्यु हो गई. मंगेश रणसिंग और उस के भाई महेश रणसिंग के बयानों के आधार पर यह मामला औनर किलिंग का निकला.

रुक्मिणी की मौत के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया, जिसे ले कर सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग सड़क पर उतर आए और संबंधित लोगों की गिरफ्तारी की मांग करने लगे. इस से जांच टीम पर वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव बढ़ गया. उसी दबाव में पुलिस टीम ने रुक्मिणी के चाचा घनश्याम सरोज और मामा सुरेंद्र भारतीय को गिरफ्तार कर लिया. रुक्मिणी के पिता मौका देख कर फरार हो गए थे.

पुलिस रुक्मिणी के मातापिता को गिरफ्तार कर पाती, इस से पहले ही इस केस ने एक नया मोड़ ले लिया. रुक्मिणी और मंगेश रणसिंग के साथ आग में फंसे बच्चों ने जब अपना मुंह खोला तो मामला एकदम अलग निकला. बच्चों के बयान के अनुसार पुलिस ने जब गहन जांच की तो मंगेश रणसिंग स्वयं ही उन के राडार पर आ गया.

मामला औनर किलिंग का न हो कर एक गहरी साजिश का था. इस साजिश के तहत मंगेश रणसिंग ने अपनी पत्नी की हत्या करने की योजना बनाई थी. पुलिस ने जब मंगेश से विस्तृत पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने अपना गुनाह स्वीकार करते हुए रुक्मिणी हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह रुक्मिणी के परिवार वालों और रुक्मिणी के प्रति नफरत से भरी हुई थी.

23 वर्षीय मंगेश रणसिंग गांव निधोज का रहने वाला था. उस के पिता चंद्रकांत रणसिंग जाति से लोहार थे. वह एक कंस्ट्रक्शन साइट पर राजगीर का काम करते थे. घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. फिर भी गांव में उन की काफी इज्जत थी. सीधेसादे सरल स्वभाव के चंद्रकांत रणसिंग के परिवार में पत्नी कमला के अलावा एक बेटी प्रिया और 3 बेटे महेश रणसिंग और ओंकार रणसिंग थे.

मंगेश रणसिंग परिवार में सब से छोटा था. वह अपने दोस्तों के साथ सारा दिन आवारागर्दी करता था. गांव के स्कूल से वह किसी तरह 8वीं पास कर पाया था. बाद में वह पिता के काम में हाथ बंटाने लगा. धीरेधीरे उस में पिता के सारे गुण आ गए. राजगीर के काम में माहिर हो जाने के बाद उसे पुणे की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई.

वैसे तो मंगेश को पुणे से गांव आनाजाना बहुत कम हो पाता था, लेकिन जब भी वह अपने गांव आता था तो गांव में अपने आवारा दोस्तों के साथ दिन भर इधरउधर घूमता और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर गप्पें मारता. इसी के चलते जब उस ने रुक्मिणी को देखा तो वह उसे देखता ही रह गया.

20 वर्षीय रुक्मिणी और मंगेश का एक ही गांव था. उस का परिवार भी उसी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करता था, जिस पर मंगेश अपने पिता के साथ काम करता था. इस से मंगेश रणसिंग का रुक्मिणी के करीब आना आसान हो गया था. रुक्मिणी का परिवार उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. उस के पिता रामा रामफल भारतीय जाति से पासी थे. सालों पहले वह रोजीरोटी की तलाश में गांव से अहमदनगर आ गए थे. बाद में वह अहमदनगर के गांव निधोज में बस गए थे. यहीं पर उन्हें एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम मिल गया था.

बाद में उन्होंने अपनी पत्नी सरोज और साले सुरेंद्र को भी वहीं बुला लिया था. परिवार में रामा रामफल भारतीय के अलावा पत्नी, 2 बेटियां रुक्मिणी व 5 वर्षीय करिश्मा थीं.

अक्खड़ स्वभाव की रुक्मिणी जितनी सुंदर थी, उतनी ही शोख और चंचल भी थी. मंगेश रणसिंग को वह अच्छी लगी तो वह उस से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा.

मंगेश रणसिंग पहली ही नजर में रुक्मिणी का दीवाना हो गया था. वह रुक्मिणी को अपने जीवनसाथी के रूप में देखने लगा था. उस की यह मुराद पूरी भी हुई.

कंस्ट्रक्शन साइट पर रुक्मिणी के परिवार वालों का काम करने की वजह से मंगेश रणसिंग की राह काफी आसान हो गई थी. वह पहले तो 1-2 बार रुक्मिणी के परिवार वालों के बहाने उस के घर गया. इस के बाद वह मौका देख कर अकेले ही रुक्मिणी के घर आनेजाने लगा.

मंगेश रुक्मिणी से मीठीमीठी बातें कर उसे अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश करता. साथ ही उसे पैसे भी देता और उस के लिए बाजार से उस की जरूरत का सामान भी लाता. जब भी वह रुक्मिणी से मिलने उस के घर जाता, उस के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता. साथ ही उस के भाई और बहन के लिए भी खानेपीने की चीजें ले जाता था.

मांबाप की जानपहचान और उस का व्यवहार देख कर रुक्मिणी भी मंगेश की इज्जत करती थी. रुक्मिणी उस के लिए चायनाश्ता करा कर ही भेजती थी. मंगेश रणसिंह तो रुक्मिणी का दीवाना था ही, रुक्मिणी भी इतनी नादान नहीं थी. 20 वर्षीय रुक्मिणी सब कुछ समझती थी.

वह भी धीरेधीरे मंगेश रणसिंग की ओर खिंचने लगी थी. फिर एक समय ऐसा भी आया कि वह अपने आप को संभाल नहीं पाई और परकटे पंछी की तरह मंगेश की बांहों में आ गिरी.

अब दोनों की स्थिति ऐसी हो गई थी कि एकदूसरे के लिए बेचैन रहने लगे. उन के प्यार की ज्वाला जब तेज हुई तो उस की लपट उन के घर वालों तक ही नहीं बल्कि अन्य लोगों तक भी जा पहुंची.

मामला नाजुक था, दोनों परिवारों ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन दोनों शादी करने के अपने फैसले पर अड़े रहे.

आखिरकार मंगेश रणसिंग के परिवार वालों ने उस की जिद की वजह से अपनी सहमति दे दी. लेकिन रुक्मिणी के पिता को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. फिर भी वह पत्नी के समझाने पर राजी हो गए. अलगअलग जाति के होने के कारण दोनों की शादी में उन का कोई नातेरिश्तेदार शामिल नहीं हुआ.

एक सादे समारोह में दोनों की शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में दरार आने लगी. दोनों के प्यार का बुखार उतरने लगा था. दोनों छोटीछोटी बातों को ले कर आपस में उलझ जाते थे. अंतत: नतीजा मारपीट तक पहुंच गया.

30 अप्रैल, 2019 को मंगेश रणसिंग ने किसी बात को ले कर रुक्मिणी को बुरी तरह पीट दिया था. रुक्मिणी ने इस की शिकायत मां निर्मला से कर दी, जिस की वजह से रुक्मिणी की मां ने उसे अपने घर बुला लिया. उस समय रुक्मिणी 2 महीने के पेट से थी. इस के बाद जब मंगेश रणसिंग रुक्मिणी को लाने के लिए उस के घर गया तो रुक्मिणी के परिवार वालों ने उसे आड़ेहाथों लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया.

रुक्मिणी के परिवार वालों के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग नाराज हो गया. उस ने इस अपमान के लिए रुक्मिणी के घर वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे डाली.

बदमाश प्रवृत्ति के मंगेश रणसिंग की इस धमकी से रुक्मिणी के परिवार वाले डर गए, जिस की वजह से वे रुक्मिणी को न तो घर में अकेला छोड़ते थे और न ही बाहर आनेजाने देते थे.  रुक्मिणी का परिवार सुबह काम पर जाता तो रुक्मिणी को उस के छोटे भाइयों और छोटी बहन के साथ घर के अंदर कर बाहर से दरवाजे पर ताला डाल देते थे, जिस से मंगेश उन की गैरमौजूदगी में वहां आ कर रुक्मिणी को परेशान न कर सके.

इस सब से मंगेश को रुक्मिणी और उस के परिवार वालों से और ज्यादा नफरत हो गई. उस की यही नफरत एक क्रूर फैसले में बदल गई. उस ने रुक्मिणी की हत्या कर पूरे परिवार को फंसाने की साजिश रच डाली.

घटना के दिन जब रुक्मिणी के परिवार वाले अपनेअपने काम पर निकल गए तो अपनी योजना के अनुसार मंगेश पहले पैट्रोल पंप पर जा कर इस बहाने से एक बोतल पैट्रोल खरीद लाया कि रास्ते में उस के दोस्त की मोटरसाइकिल बंद हो गई है. यही बात उस ने रास्ते में मिले अपने दोस्त सलमान से भी कही.

फिर वह रुक्मिणी के घर पहुंच गया. उस समय रुक्मिणी रसोईघर में अपने भाई और बहन के लिए खाना बनाने की तैयारी कर रही थी. घर के दरवाजे पर पहुंच कर मंगेश रणसिंग जोरजोर दरवाजा पीटते हुए रुक्मिणी का नाम ले कर चिल्लाने लगा. वह ताले की चाबी मांग रहा था.

दरवाजे पर आए मंगेश से न तो रुक्मिणी ने कोई बात की और न दरवाजे की चाबी दी. वह उस की तरफ कोई ध्यान न देते हुए खाना बनाने में लगी रही.

रुक्मिणी के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग का पारा और चढ़ गया. वह किसी तरह घर की दीवार फांद कर रुक्मिणी के पास पहुंच गया और उस से मारपीट करने लगा. बाद में उस ने अपने साथ लाई बोतल का सारा पैट्रोल  रुक्मिणी के ऊपर डाल कर उसे आग के हवाले कर दिया.

मंगेश की इस हरकत से रुक्मिणी के भाईबहन बुरी तरह डर गए थे. वे भाग कर रसोई के एक कोने में छिप गए. जब आग की लपटें भड़कीं तो रुक्मिणी दौड़ कर मंगेश से कुछ इस तरह लिपट गई कि मंगेश को उस के चंगुल से छूटना मुश्किल हो गया. इसीलिए वह भी रुक्मिणी के साथ 30 प्रतिशत जल गया.

इस के बावजूद भी मंगेश का शातिरपन कम नहीं हुआ. अस्पताल में उस ने रुक्मिणी के परिवार वालों के विरुद्ध बयान दे दिया. उस का कहना था कि उस की इस हालत के लिए उस के ससुराल वाले जिम्मेदार हैं.

उस की शादी लवमैरिज और अंतरजातीय हुई थी. यह बात रुक्मिणी के घर वालों को पसंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने उसे घर बुला कर पहले उसे मारापीटा और जब रुक्मिणी उसे बचाने के लिए आई तो उन्होंने दोनों पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी.

अपमान और नफरत की आग में जलते मंगेश रणसिंग की योजना रुक्मिणी के परिवार वालों के प्रति काफी हद तक कामयाब हो गई थी. लेकिन रुक्मिणी के भाई और उस के दोस्त सलमान के बयान से मामला उलटा पड़ गया.

अब यह केस औनर किलिंग का न हो कर पति और पत्नी के कलह का था, जिस की जांच पुलिस ने गहराई से कर मंगेश रणसिंग को अपनी हिरासत में ले लिया.

उस से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 307, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद रुक्मिणी के परिवार वालों को रिहा कर दिया गया. Crime Stories

Real Crime Story: इश्क में फिर बहा खून

Real Crime Story: पासपड़ोस में रहने के कारण दीपक और जावित्री को एकदूसरे से कब प्यार हो गया, पता ही नहीं चला. एक दिन जावित्री के पिता वीरपाल ने उन दोनों को ऐसी हालत में देखा कि वह अपने गुस्से को कंट्रोल नहीं कर सका और फिर…

जावित्री जैसे ही स्कूल जाने के लिए साइकिल से निकली, रास्ते में इंतजार कर रहे दीपक ने अपनी साइकिल उस के पीछे लगा दी. जावित्री ने दीपक को पीछे आते देखा तो उस ने साइकिल की गति और तेज कर दी. दीपक ने भी अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाई और कुछ देर में जावित्री की साइकिल के आगे अपनी साइकिल इस तरह खड़ी कर दी कि अगर जावित्री ने पूरी ताकत से ब्रेक न लगाई होती तो उस की साइकिल से टकरा जाती. साइकिल संभालते हुए जावित्री खीझ कर बोली, ‘‘देख नहीं रहे हो मैं स्कूल जा रही हूं. एक तो वैसे ही देर हो गई है, ऊपर से तुम ने रास्ता रोक लिया. अभी किसी ने हम दोनों को इस तरह देख लिया तो बिना मतलब का बात का बतंगड़ बनने लगेगा.’’

‘‘जिसे जो कहना है, कहता रहे. मुझे किसी की परवाह नहीं है.’’ दीपक ने अपनी यह बात इस तरह अकड़ कर कही, जैसे सचमुच उसे किसी का कोई डर नहीं है.

जावित्री को स्कूल जाने के लिए देर हो रही थी. इसलिए वह बेचैन थी. उस ने दीपक को देखा, उस के बाद विनती के स्वर में बोली, ‘‘दीपक, मुझे सचमुच देर हो रही है, बिना मतलब स्कूल में झूठ बोलना पड़ेगा. अभी जाने दो, मैं तुम से बाद में मिल लूंगी, तब जो बात कहनी हो, कह देना’’

जावित्री की विनती पर दीपक नरम पड़ गया. साइकिल हटाते हुए उस ने जावित्री के सुंदर मुखड़े को देखते हुए कहा, ‘‘जावित्री, तुम मेरी आंखों में देखो, प्यार का सागर लहराता नजर आएगा. तुम्हें पता है, तुम्हारे प्यार में मैं सब कुछ भूल गया हूं. दिनरात सिर्फ तुम्हारी ही यादों में खोया रहता हूं.’’

‘‘वह सब ठीक है दीपक, लेकिन तुम्हें पता होना चाहिए कि हम एक ही गांव में रहते हैं. हमारे और तुम्हारे घरों के बीच ज्यादा दूरी भी नहीं है. अगर हम दोनों इसी तरह प्यारमोहब्बत की पींगे बढ़ाते रहे तो मोहल्ले वालों से यह बात छिपी नहीं रहेगी. तुम मेरे पापा को तो जानते ही हो, वह बातबात में गुस्सा हो जाते हैं. कही उन्हें हम दोनों के प्रेम की भनक लग गई तो मैं बदनाम हो जाऊंगी. उस के बाद मेरे पापा मेरी क्या गत बनाएंगे, तुम सोच भी नहीं सकते.’’

‘‘जावित्री, मैं तुम्हें सपने में भी बदनाम करने के बारे में नहीं सोच सकता. तुम मेरा प्यार हो और प्यार के लिए लोग न जाने क्याक्या करते हैं. एक तुम हो कि जरा सी बदनामी से डर रही हो. मैं तुम से मिलने और 2 बातें करने के लिए कितने तिकड़म भिड़ाता हूं. तब कहीं जा कर तुम से मुलाकात होती है. जबकि तुम बदनामी का बहाना कर के मुझ से पीछा छुड़ाना चाहती हो. मैं तुम्हें भला क्यों बदनाम होने दूंगा. तुम्हें मालूम होना चाहिए कि मैं ने तय कर लिया है कि मैं शादी तुम्हीं से करूंगा. तुम्हारे अलावा मेरी दुलहन कोई दूसरी नहीं हो सकती. तब बदनामी कैसी?’’

दीपक की बातों के जवाब मे लंबी सांस ले कर जावित्री बोली, ‘‘अच्छा अब बस करो. मुझे स्कूल जाना है. वैसे ही देर हो चुकी है. अब और देर मत करो.’’

कह कर जावित्री साइकिल पर चढ़ी और चल पड़ी तो दीपक ने पीछे से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अभी तो प्यार की शुरुआत है, इसलिए मिलने के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करो.’’

जावित्री बिना कुछ बोले चली गई. दीपक अकसर जावित्री के स्कूल जाने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का रास्ता रोकता और कभी प्रेम से तो कभी थोड़ा गुस्से से अपने प्रेम का मनुहार करता. उत्तर प्रदेश के महानगर बरेली के फतेहगंज पश्चिमी थाना कस्बा के मोहल्ला लोधीनगर में वीरपाल मौर्य रहता था. उस के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, जिस पर खेती कर के वह अपने परिवार का भरणपोषण कर रहा था. परिवार में पत्नी कमला देवी और 4 बेटियां थीं. सभी अववाहित थीं. जावित्री सब से छोटी थी. वह अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खुबसूरत और चंचल थी. घर में सब से छोटी होने की वजह से मांबाप भी उसे ज्यादा प्यार करते थे.

जावित्री उम्र के उस पायदान पर खड़ी थी, जब शरीर में अनेक बदलाव आते हैं और दिल में उमंग की लहरें हिचकोले लेने लगती हैं. लोग उसे गहरी नजरों से देखने लगे थे. वह उन नजरों को पहचानने भी लगी थी. लेकिन दीपक उन सब से अलग था, उस की नजरें हमेशा उसे प्यार से देखती थीं. उस की आंखों में उस के लिए अलग तरह की चाहत थी. दीपक भी कम स्मार्ट और खूबसूरत नहीं था. वह भिठौरा मोहल्ले में रहता था. जावित्री और उस के घर के बीच की दूरी दो, ढाई सौ मीटर रही होगी. दीपक के पिता कांताप्रसाद मौर्य उर्फ पप्पू मेहनतमजदूरी करते थे. घर में पिता के अलावा मां रामवती और 2 बड़े भाई थे.

वीरपाल और कांताप्रसाद का ही नहीं, पूरे परिवार का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. इसी आनेजाने में जवान हो रही जावित्री पर दीपक की नजर पड़ी तो बरबस वह उस की ओर खिंचने लगा. घर में अन्य लोगों के होने की वजह से दीपक जावित्री से मन की बात कर नहीं पाता था. इसलिए वह इस फिराक में रहने लगा कि जावित्री अकेले में मिल जाए. संयोग से एक दिन ऐसा ही मौका उस के हाथ लग गया. जावित्री के घर वाले किसी समारोह में शामिल होने के लिए गए थे. जावित्री घर पर ही रह गई थी. इस बात का पता चलते ही किसी बहाने से दीपक उस के घर पहुंच गया. दरवाजे पर दस्तक दी तो जावित्री ने दरवाजा खोला. दीपक को देखते ही वह बोली, ‘‘सभी लोग शादी में गए हैं, घर में कोई नहीं है.’’

जावित्री की बात खत्म होते ही दीपक ने कहा, ‘‘जावित्री, मैं घर वालों से नहीं, सिर्फ तुम से मिलने आया हूं. चाचा से मिलना होता तो बाहर ही मिल लेता.’’

‘‘ठीक है, अंदर आ जाओ और बताओ मुझ से क्या काम है?’’ बगल होते हुए ही जावित्री बोली.

दीपक अंदर आ कर कमरे में खड़ा हो गया. तभी जावित्री ने कहा, ‘‘अब बताओ, मुझ से क्या काम है?’’

दीपक जावित्री को घूरते हुए बोला, ‘‘दरअसल, मैं बहुत दिनों से तुम से अकेले में मिलना चाहता था. क्योंकि मैं तुम्हें चाहने लगा हूं. मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिल नहीं माना तो तुम से मिलने चला आया.’’

दीपक आगे कुछ और कहता, जावित्री को हंसी आ गई. उस ने हंसते हुए ही कहा, ‘‘आतेजाते तुम मुझे जिस तरह से देखते थे, उसी से मुझे तुम्हारे दिल की बात का पता चल गया था.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी मुझे पंसद करती हो. तुम्हारी बातों से तो यही लगता है कि जो मेरे दिल है, वही तुम्हारे दिल में भी है.’’

दीपक कुछ और कहता, जावित्री झट से बोली, ‘‘मम्मीपापा के आने का समय हो रहा है. वह कभी भी आ सकते हैं, इसलिए तुम अभी यहां से चले जाओ. मुझे जैसे ही मौका मिलेगा, मैं तुम से बात कर लूंगी.’’

जावित्री के यह कहने के बावजूद भी दीपक वहीं खड़ा रहा और उस की खूबसूरती का बखान करता रहा. जावित्री को इस बात का डर था कि कहीं उस के मम्मीपापा न आ जाएं, इसलिए उस ने दीपक का हाथ पकड़ कर उसे  बाहर कर के अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. लेकिन जातेजाते दीपक ने जावित्री को याद करा दिया कि उस ने बाहर मिलने का वादा किया है. जावित्री वादे को नहीं भूली और अगले दिन स्कूल जाते समय रास्ते में हमेशा की तरह दीपक दिखाई दिया तो इशारे से समझा दिया कि स्कूल से लौटते समय वह उस से मिलेगी. दीपक समय से पहले ही जावित्री के लौटने वाले रास्ते पर खड़ा हो कर उस का बेसब्री से इंतजार करने लगा.

जावित्री स्कूल से लौटी तो दीपक से उस की मुलाकात हुई. दीपक के प्यार को स्वीकार करते हुए उस ने कहा, ‘‘हमें इस बात का खयाल रखना होगा कि हमारे प्यार को किसी की नजर न लगे. इस के लिए हमें सावधान रहना होगा. दीपक जावित्री के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोला, ‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, कौन प्रेमी चाहेगा कि उस की प्रेमिका की रुसवाई हो. तुम मुझ पर पूरा भरोसा रखो, मैं कोई भी ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से तुम्हारा सिर नीचा हो.’’

समय बीतता रहा, लोगों की नजरों से बच कर दोनों मिलते रहे. जल्दी ही दोनों का प्यार इतना गहरा हो गया कि वे एकदूसरे के लिए कुछ भी कर सकते थे, यहां तक कि जान भी दे सकते थे, पर एकदूसरे से कतई अलग नहीं हो सकते थे. लेकिन उन के यह प्रेमिल संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रह सके. दोनों के ही घर वालों तक उन के संबंधों की बात पहुंच गई. रिश्तेदारों को पता चला तो वे भी नाराज हो उठे. उस दिन जिंदगी में पहली बार वीरपाल ने बेटी को मारने के लिए हाथ उठाया. उस ने जावित्री की खूब पिटाई की. कमला ने किसी तरह पति को शांत कर के जावित्री को सामने से हटाया.

इस के बाद वीरपाल सीधे कांताप्रसाद के घर गया और उसे हिदायत दी कि वह दीपक को रोके वरना ठीक नहीं होगा. दीपक मिला तो वीरपाल ने उसे भी समझाया, लेकिन वह नहीं माना. इस के बाद वीरपाल और उस का भाई राजेंद्र तनाव में रहने लगे. उन्हें चिंता थी कि जावित्री और दीपक के प्रेमसंबधों की बात खुल गई तो समाज में उन की बड़ी बदनामी होगी. लेकिन ऐसी बातें कहां छिपती हैं. घर वालों ने दीपक पर अंकुश लगाने की कोशिश की तो पूरे समाज में बात फैल गई. एक दिन वीरपाल के चाचा प्रेमशंकर दीपक को रोक कर समझाने लगे तो वह उस से भिड़ गया. इस पर प्रेमशंकर ने उसे थप्पड़ मार दिया. उस समय तो दीपक खून का घूंट पी कर चला गया. लेकिन अगले दिन जब प्रेमशंकर घर के बाहर बैठे थे तो दीपक अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचा और बेल्टों से उन्हें जम कर पीटा. इस तरह उस ने अपने अपमान का बदला ले लिया.

प्रेमशंकर ने थाना फतेहगंज पश्चिमी में दीपक और उस के दोस्तों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए तहरीर दी, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की. प्रेमशंकर के साथ घटी घटना की जानकारी वीरपाल को हुई तो उस ने कुछ दिनों बाद दीपक के दोस्तों से मारपीट की. अब तक जावित्री और दीपक का मिलना आम हो गया था. इस बात से वीरपाल बेहद खफा रहता था. ढाई महीने पहले उस ने वार्ड मेंबर को बीच में डाल कर एक पंचायत बुलाई. पंचायत ने दीपक को जावित्री से मिलने से मना किया तो उस ने भरी पंचायत में कह दिया कि यह संभव नहीं है. वह जावित्री से हरगिज दूर नहीं रह सकता. इस पर वीरपाल भड़क उठा और पंचायत के सामने ही दीपक को लातघूंसों से मारा.

इस के बाद दीपक दिल्ली चला गया. मार्च में होली पर घर लौटा तो 10 दिनों के लिए कांवर लेने हरिद्वार चला गया. वहां से वह 15 मार्च को लौटा. उस का एक दोस्त था सोनू, जो ट्रैक्टर मैकेनिक था और वीरपाल के मकान में किराए पर रहता था. 24 मार्च को उस की बेटी का नामकरण संस्कार था, जिस में दीपक को भी निमंत्रण दिया गया था. 24 मार्च की रात दीपक दावत में पहुंचा, लेकिन वहां से वह लौट कर नहीं आया. दावत में जावित्री भी थी, वह भी गायब हो गई थी. अगले दिन दोनों के घर वालों ने उन की तलाश शुरू की. जब वे नहीं मिले तो दोनों के घर वाले थाना फतेहगंज पश्चिम पहुंचे. वीरपाल ने दीपक के खिलाफ जावित्री के अपहरण की रिपोर्ट लिखवाई तो कांताप्रसाद ने वीरपाल, राजेंद्र, प्रेमशंकर और कमला देवी के खिलाफ दीपक के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया. एकदूसरे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा कर वे अपनेअपने घर लौट आए.

6 अप्रैल को भिठौरा के एक तालाब में एक बोरा तैरता दिखाई दिया, जिस में से इंसानी पैर बाहर निकले थे. मोहल्ले वालों ने इस बात की जानकारी थाना फतेहगंज पश्चिमी पुलिस को दी. थानाप्रभारी अखिलेश सिंह यादव छुट्टी पर थे, इसलिए थाने का प्रभार देख रहे एसआई अवधेश कुमार पुलिस बल के साथ उस तालाब के किनारे पहुंचे. उन्होंने बोरे को तालाब से निकलवाया तो उस में से एक लड़की की लाश बरामद हुई. लोगों ने उस लाश की शिनाख्त जावित्री के रूप में की. लाश के साथ बोरे से 8 ईंटें भी बरामद हुईं. अनुमान लगाया गया कि लाश को पानी में डुबोने के लिए लाश के साथ बोरे में ईंटें भी रखी गई थीं. लाश सड़ गई तो बोरा तालाब की सतह पर आ गया. जावित्री के घर वाले भी वहां मौजूद थे.

पुलिस ने उन से पूछताछ की तो वे जावित्री की हत्या का आरोप दीपक पर लगाने लगे. उसी बीच एसआई अवधेश कुमार के इशारे पर सिपाहियों ने वीरपाल के मकान का मुआयना किया तो वहां से पुलिस को जो सुराग मिले, वे कुछ और ही कहानी कह रहे थे. एक तो जिस तालाब में जावित्री की लाश मिली थी, वह वीरपाल के मकान के ठीक पीछे था. इस के अलावा जिस तरह के बोरे में जावित्री की लाश मिली थी, उसी तरह के धान भरे हुए बोरे वीरपाल के घर में रखे थे. बोरे से ईंटें बरामद हुई थीं, उसी मार्का की ईंटें वीरपाल के घर में लगी थीं. लेकिन पुलिस ने उस समय वीरपाल से कुछ नहीं कहा, उन्होंने घटनास्थल की अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इसी बीच घटना की जानकारी मिलने पर थानाप्रभारी अखिलेश यादव थाने आ गए. उन्होंने पूरी घटना पर गंभीरता से विचार किया. इस के बाद पुलिस ने वीरपाल और उस के भाई राजेंद्र को हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी. वीरपाल का कहना था कि दीपक ने उस की बेटी की हत्या की है. लेकिन जब सुबूतों का हवाला देते हुए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने जावित्री की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. हत्या में उस का भाई राजेंद्र और लाश ठिकाने लगाने में उस का साढ़ू राजाराम और साथी टेनी उर्फ अरविंद ने साथ दिया था. राजाराम और टेनी भिठौरा में ही रहते थे. पुलिस ने उसी दिन टेनी को भी गिरफ्तार कर लिया. राजाराम घर से फरार था.

उस ने थानाप्रभारी को बताया कि दीपक खुद गायब नहीं हुआ, बल्कि उसे गायब कर के उस की हत्या कर दी गई है. जो बाप अपनी बेटी की हत्या कर सकता है, उस के लिए दीपक का कत्ल करना कोई बड़ी बात नहीं है. इस के बाद पुलिस ने 8 अप्रैल को सभी से अलगअलग पूछताछ की तो उन्होंने दीपक और जावित्री की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

24 मार्च को दीपक सोनू के यहां दावत में पहुंचा तो वहां जावित्री से उस की मुलाकात हो गई. दीपक ने उसे इशारे से पीछे आने को कहा. जावित्री सब की नजरें बचा कर उस के पीछेपीछे चली गई. उधर वीरपाल को जावित्री नहीं दिखी तो उस ने दीपक के बारे में पता किया. वह भी वहां नहीं था. वह समझ गया कि दीपक उस की बेटी को अपने साथ कहीं ले गया है. उस ने वहां मौजूद अपने भाई राजेंद्र को यह बात बताई और उसे साथ ले कर उस की खोज में निकल पड़ा. कुछ ही दूरी पर उन्हें एक खंडहर में दोनों आपत्तिजनक स्थिति में मिल गए. उन्हें उस स्थिति में देख कर उन का खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने दीपक को पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. जावित्री घर की ओर भागी कि वह लोगों को दीपक को बचाने के लिए बुला लाए. वीरपाल और राजेंद्र ने दीपक को पीटपीट कर अधमरा कर दिया.

इस के बाद ईंटों से उस का सिर और चेहरा कुचल कर मार डाला. तभी जावित्री लौट कर आ गई. उस ने दीपक को मरा पाया तो वह बगावत पर उतर आई. उस ने कहा कि वह सब कोबता देगी कि दीपक की हत्या उन्होंने की है. वह उन्हें सजा दिलवा कर रहेगी. इस पर दोनों भाइयों ने जावित्री को पकड़ लिया और बेल्ट से उस का गला कस कर उसे भी मार डाला. रात 12 बजे वीरपाल ने मोहल्ले में ही रहने वाले साढू राजाराम और उस के साथ काम करने वाले टेनी को फोन कर के बुलाया. दोनों के आने पर उस ने उन्हें पूरी बात बता कर मदद मांगी. इस के बाद वह घर गया और धान के 2 बोरे ले आया. एक बोरे में उस ने जावित्री की लाश भरी और दूसरे में दीपक की.

जावित्री की लाश वाला बोरा वीरपाल, राजाराम और टेनी घर ले गए और उस में 8 ईंटें डाल कर बोरे का मुंह बंद करके घर के पीछे वाले तालाब में फेंक दिया. वजन की वजह से बोरा तलहटी में बैठ गया. इस के बाद टेनी अपने घर चला गया. राजाराम वहां से अपने छोटे भाई के घर गया और मोटरसाइकिल ले आया. राजाराम और राजेंद दीपक के लाश वाले बोरे को ले कर मोटरसाइकिल से नेशनल हाईवे पर मीरगंज के पहले भखड़ा नदी के पुल पर ले गए और ऊपर से ही बोरे को नीचे फेंक दिया. नदी सूखी थी, इसलिए लाश जमीन पर जा गिरी. वे घर लौट आए और घर से फावड़ा ले कर फिर वहां पहुंचे. नदी में बने टापू पर करीब तीन फुट गहरा गड्ढा खोद कर उस में दीपक की लाश वाला बोरा गाड़ दिया और घर लौट आए.

वीरपाल ने तो अपने हिसाब से सब कुछ बड़े अच्छे तरीके से किया था. लेकिन बेटी की लाश ने पानी के ऊपर आ कर उस की चुगली कर दी तो पुलिस के हाथ उस तक पहुंच ही गए. उस की निशानदेही पर पुलिस ने भखड़ा नदी में बने मिट्टी के टापू से दीपक की लाश बरामद कर ली और पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस ने दीपक के अपहरण के मुकदमे में हत्या और साक्ष्य छिपाने की धाराएं जोड़ कर सभी अभियुक्तों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त ईंटें, बेल्ट और फावड़ा बरामद कर लिया. 9 अप्रैल को पुलिस ने वीरपाल, राजेंद्र और टेनी को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 10 अप्रैल को पुलिस ने राजाराम को भी गिरफ्तार कर कर के जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Gorakhpur Crime: जानवर सी सोच वाला आदमी

Gorakhpur Crime: डा. पूनम और डा. धन्नी कुमार जो भी कर रहे थे, उदयसेन के भले के लिए कर रहे थे, लेकिन भाई और भाभी की अच्छाई भी उसे बुरी लगी. इस के बाद खुन्नस में उस ने जो किया, अब शायद उस की पूरी जिंदगी जेल में ही बीतेगी  गोरखपुर की अदालत संख्या-3 में अपर सत्र न्यायाधीश श्री पुर्णेंदु कुमार श्रीवास्तव कीअदालत में 4 हत्याओं का आरोपी उदयसेन गुप्ता फैसला सुनने के लिए कठघरे में खड़ा हुआ तो उस के चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी. सरकारी वकील जयनाथ यादव जहां सामने कठघरे में खड़े मासूम से दिखने वाले उदयसेन को शातिर अपराधी बता कर अधिक से अधिक सजा देने की गुहार लगा रहे थे, वहीं बचाव पक्ष के वकील रामकृपाल सिंह उसे निर्दोष बताते हुए साजिशन फंसाए जाने की बात कर रहे थे.

इस मामले में क्या फैसला सुनाया गया, यह जानने से पहले आइए हम यह जान लें कि यह उदयसेन गुप्ता कौन है और उस ने 4 निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की? हत्या जैसा जघन्य अपराध करने के बावजूद उसे अपने किए पर मलाल क्यों नहीं था? दिल दहला देने वाली इस कहानी की बुनियाद 12 साल पहले पड़ी थी. उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर की कोतवाली शाहपुर के बशारतपुर स्थित मोहल्ला रामजानकीनगर में चंद्रायन प्रसाद गुप्ता परिवार के साथ रहते थे. वह विद्युत विभाग में अधिशासी अभियंता थे. उन के परिवार में पत्नी शुभावती के अलावा 4 बच्चे, जिन में बेटी पूनम, बेटा संतोष, बेटी सुमन और बेटा अभय कुमार गुप्ता उर्फ चिंटु थे.

चंद्रायन प्रसाद के बच्चे समझदार थे, सभी पढ़ने में भी ठीक थे. पूनम पढ़लिख कर डाक्टर बन गई तो उस से छोटा संतोष बीटेक की पढ़ाई करने दिल्ली चला गया. पूनम के डाक्टर बनने के बाद उन्होंने जिला कुशीनगर के फाजिलनगर के रहने वाले डा. धन्नी कुमार गुप्ता के साथ उस का विवाह कर दिया. इस के बाद घर में मात्र 4 लोग ही रह गए. उस समय सुमन गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी कर रही थी तो अभय जुबली इंटर कालेज में बारहवीं में पढ़ रहा था. परिवार के दिन हंसीखुशी से कट रहे थे. 28 दिसंबर, 2006 को पूनम मांबाप का हालचाल जानने के लिए सुबह से ही फोन कर रही थी, लेकिन न मोबाइल फोन उठ रहा था और न ही लैंडलाइन. धीरेधीरे 10 बज गए और फोन नहीं उठा तो पूनम को चिंता हुई.

उस ने दिल्ली में बीटेक कर रहे छोटे भाई संतोष को फोन कर के पूरी बता कर कहा कि वह फोन कर के पता करे कि घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?

‘‘ठीक है, अभी पता कर के बताता हूं कि क्या बात है?’’ संतोष ने कहा और पिता के मोबाइल तथा घर के नंबर पर फोन किया. जब उस का भी फोन किसी ने रिसीव नहीं किया तो उस ने मोहल्ले के अपने परिचित प्रशांत कुमार मिश्रा को फोन कर के अपने घर भेजा कि वह पता कर के बताए कि घर वाले फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं. संतोष के कहने पर प्रशांत अपने साथी सोनू के साथ उस के घर पहुंचा और बाहर से जोरजोर से आवाज लगाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग भी इकट्ठा हो गए. कई बार आवाज लगाने पर भी अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो दोनों चारदीवारी फांद कर अंदर जा पहुंचे. बाहर बरामदे से कमरे के अंदर उन्हें जो भयानक दृश्य दिखाई दिया, उस से वे कांप उठे. मकान के अंदर चंद्रायन प्रसाद गुप्ता, उन की पत्नी शुभावती, बेटी सुमन और बेटा अभय खून से लथपथ पड़े थे.

प्रशांत ने घटना की सूचना मोबाइल फोन से संतोष को दी. घर के सभी लोगों की हत्या की बात सुन कर वह सन्न रह गया. उस ने चाचा रवींद्र प्रसाद गुप्ता को फोन किया. वह चौरीचौरा के रामपुर बुजुर्ग गांव में रहते थे. पड़ोसियों ने घटना की सूचना कोतवाली शाहपुर पुलिस को दी तो तत्कालीन कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) रामचंद्र यादव, सीओ हरिनाथ यादव, डौग स्क्वायड और फिंगर एक्सपर्ट की टीमों के साथ पहुंच गए. जांच में पुलिस ने पाया कि शुभावती और चंद्रायन प्रसाद की सांसे चल रही हैं, जबकि सुमन और अभय की मौत हो चुकी है. पुलिस ने दोनों को अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने घटनास्थल और लाशों का बारीकी से निरीक्षण कर के सारे साक्ष्य जुटाने के बाद दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. घटनास्थल की स्थिति से साफ था कि हत्यारों का उद्देश्य सिर्फ हत्या करना था. क्योंकि लूटपाट के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे. अगर थोड़ीबहुत लूटपाट हुई भी थी तो कोई बताने वाला नहीं था. चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन गायब था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटाने के बाद चंद्रायन प्रसाद के भाई रवींद्र प्रसाद की ओर से हत्याओं का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. कोतवाली प्रभारी कमलेश्वर सिंह ने जांच शुरू की. उम्मीद थी कि अगर दोनों में से कोई भी बच गया तो हत्यारों तक पहुंचने में आसानी रहेगी. लेकिन शुभावती ने अगले ही दिन दम तोड़ दिया.

चंद्रायन प्रसाद भी इस हालत में नहीं थे कि वह कुछ बता सकते. 6 महीने बाद नोएडा के एक अस्पताल में चंद्रायन प्रसाद ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया था. इस हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस की 2 टीमें गठित की गई थीं. जांच में पता चला कि मृतक सुमन को उस की सगी मौसी का बेटा प्यार करता था और वह उस से विवाह करना चाहता था. जबकि सुमन और उस के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. डेयरी कालोनी में रहने वाली मृतका सुमन की मौसी के बेटे को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. कई दिनों तक पुलिस उस से पूछताछ करती रही, लेकिन पुलिस को उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस को जब लगा कि वह निर्दोष है तो उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया गया.

घर वालों से पुलिस को कोई उम्मीद नहीं थी. यह हत्याकांड पुलिस के लिए चुनौती बना हुआ था. पुलिस के लिए उम्मीद की किरण चंद्रायन प्रसाद गुप्ता का मोबाइल फोन था. पुलिस उसी के चालू होने की राह देख रही थी. आखिर 19 जनवरी को वह मोबाइल चालू हो गया. पुलिस को सर्विलांस के माध्यम से पता चला कि उस की लोकेशन कुशीनगर के सुकरौली बाजार है. पुलिस ने वहां जा कर सत्यप्रकाश गुप्ता को पकड़ लिया. सत्यप्रकाश से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि यह मोबाइल फोन उस के साले उदयसेन गुप्ता ने उसे दिया था. इस के बाद फाजिलनगर से उदयसेन गुप्ता को हिरासत में ले लिया गया. पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाते ही उस ने कहा, ‘‘आप लोग काफी दिनों बाद सही आदमी तक पहुंचे हैं. मैं ने ही वे हत्याएं की थीं.’’

उदयसेन गुप्ता की बात सुन कर पुलिस दंग रह गई. पुलिस उसे गोरखपुर ले आई. थाने में की गई पूछताछ में उस ने उन हत्याओं के पीछे की जो वजह बताई, उस से साफ हो गया कि उस ने मात्र खुन्नस की वजह से वे हत्याएं की थीं. उस के बताए अनुसार हत्या के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के फाजिलनगर निवासी चांदमूरत गुप्ता के 3 बेटों में उदयसेन सब से बड़ा था. चांदमूरत काफी रसूख वाले थे. वह अकूत धनसंपदा के मालिक भी थे. उदयसेन शुरू से ही उग्र स्वभाव का था. वह गोरखपुर के मोहद्दीपुर में किराए का कमरा ले कर अकेला ही रहता था और पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से एमकौम की पढ़ाई कर रहा था.

चंद्रायन प्रसाद गुप्ता की बड़ी बेटी पूनम की शादी इसी उदयसेन गुप्ता के बड़े पिता के बेटे डा. धन्नी कुमार गुप्ता से हुई थी. उदयसेन के पिता 5 भाई थे. पांचों भाइयों का परिवार एक साथ एक में ही रहता था. परिवार में डा. धन्नी कुमार के पिता का काफी मानसम्मान था. उन की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता था. उदयसेन भाभी पूनम का काफी सम्मान करता था, इसलिए वह भी उसे बहुत मानती थीं. पैसे वाले बाप का बेटा होने की वजह से उदयसेन काफी बिगड़ा हुआ था. डा. धन्नी कुमार जब भी गोरखपुर आए, उदयसेन को घर से लाए रुपयों से अपने 4 दोस्तों के साथ मौजमस्ती करते देखा. इस के बाद उन्होंने इस बात की शिकायत अपने चाचा से कर दी. जब ऐसा कई बार हुआ तो उदयसेन को भाई से नफरत होने लगी.

भाई से चिढ़े उदयसेन ने एक दिन भाभी पूनम से कहा कि पापा बंटवारे के लिए कह रहे थे, लेकिन वह बड़े पापा से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि वह अपने अन्य भाइयों से डरते हैं कि कहीं उन के परिवार की हत्या कर के उन की संपत्ति न हड़प लें. पूनम ने यह बात डा. धन्नी कुमार को बताई तो क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपने पापा से बात की. तब उन्होंने चांदमूरत को बुला कर उन से बात की. बड़े भाई की बात सुन कर चांदमूरत को जैसे काठ मार गया, क्योंकि उन्होंने इस तरह की कोई बात कही ही नहीं थी. कहने की छोड़ो, इस तरह की बात उन्होंने सोची ही नहीं थी. बेटे की इस बेहूदगी से उन का सिर झुक गया था.

इस के लिए उन्होंने पूरे परिवार के सामने उदयसेन को जलील ही नहीं किया, बल्कि जम कर पिटाई भी की. इस के बाद उस से परिवार वालों से माफी भी मंगवाई. मरता क्या न करता, उदयसेन ने सब से माफी मांगी. लेकिन इस सब से उस ने खुद को काफी अपमानित महसूस किया. उदयसेन गोरखपुर आ गया. उस के साथ जो हुआ था, इस सब के लिए वह डा. धन्नी कुमार और डा. पूनम को दोषी मान रहा था. इसलिए उस ने उन से अपने अपमान का बदला लेने का मन बना लिया. वह उन दोनों की हत्या कर देना चाहता था. उस ने दोनों की हत्या की कई बार कोशिश भी की, लेकिन अपने इस खतरनाक मंसूबे में कामयाब नहीं हुआ.

भैया और भाभी की हत्या करने में असफल होने के बाद उस ने दोस्तों से मदद मांगी. तब उस के दोस्तों ने उसे समझाया कि यह सब जो भी हुआ है, वह पूनम भाभी की वजह से हुआ है, इसलिए सजा उसे ही मिलनी चाहिए. अगर तुम ने उस की हत्या कर दी तो उसे सजा का पता कैसे चलेगा, इसलिए तुम उस के किसी ऐसे को मार दो कि वह जब तक जिंदा रहे, उस की याद में तड़पती रहे. शातिर उदयसेन को पूनम के मायके वालों की याद आ गई. उस ने उस के मायके वालों को निशाने पर लिया और तय कर लिया कि जो भी करेगा, अकेले करेगा. उसे पता था कि पूनम के मायके में मातापिता और एक बहन तथा एक भाई रहता है. लेकिन कभी वह उन के यहां गया नहीं था. योजना बनाने के बाद पहली बार वह 27 दिसंबर, 2006 की शाम उन के यहां पहुंचा.

दामाद का चचेरा भाई था, इसलिए उसे काफी सम्मान दिया गया. बढि़या खाना बना कर खिलाया गया. खाने के बाद बैठक के बैड को खिसका कर एक फोल्डिंग बिछाई गई. फोल्डिंग पर अभय लेटा तो बैड पर उदयसेन सोया. चंद्रायन प्रसाद पत्नी के साथ अपने कमरे में चले गए तो सुमन अपने कमरे में जा कर सो गई. जब सभी सो गए तो उदयसेन उठा और चंद्रायन प्रसाद  के कमरे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी और साथ लाए पेचकस से अभय की हत्या कर दी. नफरत की आग में जल रहे उदयसेन ने अभय की हत्या तो कर दी, पर बाद में उसे खयाल आया कि अब उस की पूरी जिंदगी जेल में कटेगी, क्योंकि पूरे घर को पता है कि इस कमरे में अभय के साथ वही सोया था. खुद को जेल की सलाखों के पीछे जाने से बचाने के लिए उस ने सभी को खत्म करने का मन बना लिया.

इस के बाद उस ने चंद्रायन प्रसाद के कमरे के बाहर की सिटकनी खोली तो खट की आवाज सुन कर अंदर से उन्होंने पूछा, ‘‘कौन है?’’

जवाब में उदयसेन ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं उदयसेन, जरा देखिए तो अभय को न जाने क्या हो गया है?’’

बेटे के बारे में सुन कर चंद्रायन प्रसाद उस के कमरे में पहुंचे और झुक कर देखने लगे, तभी उदयसेन ने पेचकस से उन पर भी हमला कर दिया. वह जोर से चीखे तो उन की इस चीख से शुभावती और सुमन की आंखें खुल गईं. दोनों भाग कर कमरे में आईं तो देखा चंद्रायन प्रसाद फर्श पर पड़े तड़प रहे थे और उदयसेन उन की पीठ पर सवार उन की कनपटी पर पेचकस से वार कर रहा था. मांबेटी के होश उड़ गए. चंद्रायन प्रसाद को बचाने के लिए मांबेटी उदयसेन पर टूट पड़ीं. सुमन उस के बाल पकड़ कर खींचने लगी तो शुभावती कमीज पकड़ कर खींचने लगीं. इस तरह तीनों गुत्थमगुत्था हो गए. उदयसेन को लगा कि उस का बचना मुश्किल है तो उस ने मांबेटी पर भी हमला बोल दिया.

मांबेटी निहत्थी थीं और उस के पास पेचकश था. उसी से उस ने मांबेटी को भी बुरी तरह से घायल कर दिया. वे दोनों भी घायल हो कर फर्श पर गिर पड़ीं तो उस ने एकएक के पास जा कर देखा कि कौन जीवित है और कौन मर गया? चंद्रायन प्रसाद, सुभावती और सुमन की सांसें चल रही थीं. उदयसेन अपने खिलाफ कोई भी सुबूत नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने पैंट की जेब से ब्लेड निकाली और चारों का गला काटने की कोशिश की. जब उसे लगा कि चारों मर गए हैं तो उस ने बाथरूम में नहाया, क्योंकि उस के कपड़ों में ही नहीं, शरीर में भी खून लग गया था.

अपने कपड़े उस ने पौलीथिन में रख लिए और अभय के कपड़े पहन कर चारदीवारी फांद कर बाहर आ गया. चलते समय उस ने चंद्रायन प्रसाद का मोबाइल फोन और अलमारी में रखे कुछ रुपए और गहने निकाल कर पौलीथिन में रख लिए थे. रात उस ने रेलवे स्टेशन पर गुजारी. स्टेशन पर जाते हुए उस ने गहने निकाल कर कपड़ों की पोटली महाराजगंज की ओर जा रहे एक ट्रक पर फेंक दी थी. मोबाइल फोन का सिम निकाल कर उस ने रास्ते में फेंक दिया था. रात स्टेशन पर बिता कर सुबह 7 बजे वह मोहद्दीपुर स्थित अपने कमरे पर आ गया. सुबह अखबारों से पता चला कि चंद्रायन प्रसाद बच गए हैं तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. उस ने अस्पताल जा कर उन्हें मारने की कोशिश की, लेकिन पुलिस सुरक्षा सख्त होने की वजह से वह उन तक पहुंच नहीं सका.

उदयसेन गुप्ता ने अपना अपराध स्वीकार कर ही लिया था. पुलिस ने आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया. 9 सालों तक यह मुकदमा चला. पुलिस ने उस के खिलाफ ठोस सबूत पेश किए. उसी का नतीजा था कि उदयसेन को 4 हत्याओं का दोषी ठहराते हुए 30 मार्च, 2015 को आजीवन कारावास के साथ 1 लाख रुपए जुर्माना की सजा सुनाई गई. कथा लिखे जाने तक अभियुक्त उदयसेन जेल में बंद था. उस के वकील रामकृपाल सिंह उस की जमानत के लिए हाइकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे. Gorakhpur Crime

कथा अदालत के फैसले पर आधारित.

Hindi Crime Stories: एक थी प्रिया

Hindi Crime Stories: डा. प्रिया की शादी हुए 5 साल हो गए थे, लेकिन उन के और डा. कमल के संबंध पतिपत्नी की तरह नहीं बन पाए थे. आखिर इस की वजह क्या थी, आगे इस का परिणाम क्या हुआ?  दिल्ली के थाना नबी करीम पुलिस की जीप 18 अप्रैल की रात करीब 2 बजे पहाड़गंज स्थित होटल प्रेसीडेंसी पहुंची तो मैनेजर बाहर ही मिल गया. थानाप्रभारी जीप से जैसे ही उतरे, मैनेजर ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, हमारे होटल के कमरा नंबर 302 में ठहरी डा. प्रिया वेदी  के कमरे में कोई हलचल नहीं हो रही है. हमें डर लग रहा है कि उस में कोई अनहोनी तो नहीं हो गई?’’

‘‘डा. प्रिया वेदी कौन हैं, होटल में कब से ठहरी हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘वह अकेली ही थीं या उन के साथ कोई और भी था?’’

‘‘सर, आज ही दिन के साढ़े बारह बजे के आसपास वह अकेली ही आई थीं. सामान के नाम पर उन के पास एक ट्रौली बैग था. पहचान पत्र के रूप में उन्होंने राजस्थान ट्रांसपोर्ट अथौरिटी की ओर से जारी किया गया ड्राइविंग लाइसेंस दिया था.’’

‘‘वह जब से आईं, बाहर बिलकुल नहीं निकलीं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कमरे में जाने के बाद से उन्होंने न तो रूम अटेंडेंट को बुलाया है और न ही कमरे से बाहर निकली हैं. सर, जब वह यहां आई थीं तो कुछ तनाव में लग रही थीं. रिसैप्शन पर ही मैं ने उन्हें ठंडा पानी मंगा कर पिलाया था, ताकि वह रिलैक्स महसूस करें. मैं ने उन से पूछा भी था, पर उन्होंने कुछ बताया नहीं था. वैसे भी किसी से उस की व्यक्तिगत बातों के बारे में ज्यादा नहीं पूछा जा सकता.’’

‘‘इस बीच आप ने उन के बारे में पता करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘सर, आधी रात तक जब उन के कमरे से किसी तरह की सर्विस की कोई काल नहीं आई तो मैं ने रूम अटेंडेंट को भेजा कि जा कर मैडम से पूछ लो कि उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है. लेकिन बारबार बेल बजाने के बाद भी जब उन्होंने दरवाजा नहीं खोला तो मुझे शक हुआ और मैं ने पुलिस को सूचना दे दी.’’ मैनजर ने एक ठंडी सांस ले कर कहा.

‘‘चलो, मुझे वह कमरा दिखाओ, जिस में डा. प्रिया वेदी ठहरी हुई हैं.’’

मैनेजर पुलिस टीम को तीसरी मंजिल स्थित कमरा नबंर 302 पर ले गया. थानाप्रभारी ने कमरे का दरवाजा खुलवाने की काफी कोशिश की. जब दरवाजा खुलवाने की उन की हर कोशिश नाकामयाब हो गई तो उन्होंने कहा, ‘‘अब कमरे का दरवाजा तोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.’’

मैनेजर ने रिसैप्शन से 2-3 कर्मचारियों को बुलवा लिया तो उन्होंने कमरे के दरवाजे पर जोरजोर धक्के दिए, जिस से अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर जाने पर कमरे में पड़ा बैड खाली मिला. कमरे से अटैच बाथरूम खोला गया तो उस में डा. प्रिया खून से लथपथ पड़ी थीं. उन के एक हाथ की नस कटी थी तो दूसरे में ड्रिप लगी थी. होटल मैनेजर ने बताया कि यही डा. प्रिया वेदी हैं. थानाप्रभारी ने डा. प्रिया की नब्ज देखी तो वह थम चुकी थी. उन में जीवन का कोई भी लक्षण नहीं था. थाना नबी करीम पुलिस डा. प्रिया की लाश का निरीक्षण कर ही रही थी कि उन के मोबाइल की लोकेशन के आधार पर थाना डिफेंस कालोनी पुलिस भी उन के घर वालों के साथ होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई.

घर वालों ने भी उस लाश की शिनाख्त डा. प्रिया के रूप में कर दी. उन्होंने बताया कि यह दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट थीं और अपने पति डा. कमल वेदी के साथ एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहती थीं. पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो डा. प्रिया वेदी का लिखा साढ़े 3 पेज का एक सुसाइड नोट मिला. होटल के कमरे का हर सामान अपनी जगह रखा था. डा. प्रिया का भी सामान सुरक्षित था. इस से साफ लग रहा था कि यह हत्या का नहीं, खुदकुशी का ही मामला है. पुलिस ने जरूरी काररवाई के बाद डा. प्रिया वेदी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इतनी काररवाई निपटातेनिपटाते सुबह हो गई थी.

19 अप्रैल को पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने डा. प्रिया की लाश घर वालों को सौंप दी तो उसी दिन उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. अंतिम संस्कार में एम्स के भी कई डाक्टर शामिल हुए थे. वे डा. प्रिया की मौत को ले कर तरहतरह की बातें कर रहे थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि डा. प्रिया वेदी ने आत्महत्या की है. उन का कहना था कि वह बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थीं. साथी डाक्टरों से उन के काफी अच्छे संबंध थे. उन का कहना था कि उन्होंने अपने दिल में छिपे दर्द का  कभी किसी को अहसास नहीं होने दिया. डा. प्रिया एम्स में अगस्त, 2014 से एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के पद पर काम कर रही थीं. उन के पति डा. कमल वेदी भी एम्स में ही स्किन के डाक्टर थे. वह डा. कमल से एक साल जूनियर थीं.

होटल के कमरे में पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला था, उस में डा. प्रिया ने पति पर समलैंगिक होने का आरोप लगाया था. पुलिस की शुरुआती जांच में यह बात सामने भी आई है कि डा. प्रिया ने खुदकुशी करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट पर कई बातें लिखी थीं. डा. प्रिया ने फेसबुक पर लिखा था कि मैं पिछले 5 सालों से डा. कमल वेदी के साथ शादीशुदा जिंदगी बिता रही हूं, लेकिन हमारे शारीरिक संबंध नहीं बने, जो कि दांपत्य के लिए जरूरी होते हैं. शादी ही इसी के लिए होती है. मुझे एक फर्जी ईमेल आईडी मिली थी, जिस के द्वारा मेरे पति समलैंगिकों से बातें करते थे. मुझे जब इन सब बातों का पता चला तो मुझे प्रताडि़त किया जाने लगा.

उसी दिन डा. प्रिया के घर वालों ने दिल्ली के नबी करीम पुलिस थाने में डा. कमल के खिलाफ दहेज प्रताड़ना एवं अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज करा दिया. दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जांच में मिले साक्ष्यों एवं डा. प्रिया के घर वालों के बयान के आधार पर 19 अप्रैल को डा. कमल को गिरफ्तार कर लिया. डा. प्रिया कौन थीं, कितने संघर्षों के बाद डाक्टर बन कर उन्होंने पिता का सपना पूरा किया था? इतना संघर्ष कर के जीवन को संवारने वाली डा. प्रिया ने आखिर आत्महत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए हमें जयपुर से शुरुआत करनी होगी.

राजस्थान की राजधानी जयपुर, जो गुलाबी नगर के नाम से मशहूर है, के चांदपोल बाजार में एक छोटी सी गली है, जिसे गोविंदरावजी का रास्ता कहते हैं. इसी रास्ते में कान महाजन बड़ के पास रामबाबू वर्मा रहते हैं. वह टेलरिंग यानी कपड़ों की सिलाई की दुकान से गुजरबसर करते थे. उन के 3 बच्चे थे, सब से बड़ा बेटा विजय, उस से छोटी बेटी प्रिया और सब से छोटा बेटा लोकेश. उन के तीनों ही बच्चे पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार थे. रामबाबू वर्मा खुद तो ज्यादा नहीं पढ़ सके थे, लेकिन वह बच्चों को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे. यही उन का सपना भी था, जिसे पूरा करने के लिए वह जम कर मेहनत कर रहे थे. उन का चूनेमिट्टी का मकान था. सीमित आय थी. जाहिर है, घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे. कपड़ों की सिलाई की आमदनी से किसी तरह परिवार की दालरोटी चल रही थी. बच्चे पढ़ने लगे तो खर्च बढ़ता गया.

लेकिन रामबाबू ने हिम्मत नहीं हारी. वह बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन दूनी और रात चौगुनी मेहनत करने लगे. पत्नी भी उन का साथ देती थीं. इस तरह बच्चों की पढ़ाई के लिए पतिपत्नी न दिन देख रहे थे न रात. पतिपत्नी की दिनरात की मेहनत रंग लाई और बड़े बेटे विजय का सिलेक्शन मैडिकल में हो गया. प्रिया उस से छोटी थी. भाई के सिलेक्शन के बाद उस ने भी डाक्टर बनने का मन बना लिया. पढ़ाई में वह तेज थी ही, भाई का सपोर्ट मिला तो उस ने भी मातापिता को निराश करने के बजाय उन के सपनों में रंग भर दिया.

प्रिया ने प्रीमैडिकल टैस्ट पास कर लिया. बड़ा बेटा विजय मैडिकल की पढ़ाई कर ही रहा था. रामबाबू वर्मा के लिए 2 बच्चों की मैडिकल की पढ़ाई का खर्च वहन करना मुश्किल था. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बैंक से बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लिया, लेकिन उन की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आने दी. प्रिया का अजमेर के जेएलएन मैडिकल कालेज में दाखिला हुआ था. वह पूरी लगन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी. बीचबीच में वह घर भी आती रहती थी. इस तरह चांदपोल की गली में प्रिया आइडियल गर्ल बन गई थी. क्योंकि पुराने से मकान में रह कर गरीबी में पलबढ़ कर वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी.

आखिर वह दिन भी आ गया, जब प्रिया एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर के डाक्टर बन गई. रामबाबू वर्मा के लिए वह सब से ज्यादा खुशी का दिन था. उन का सब से बड़ा सपना पूरा हो गया था. बड़े बेटे विजय के डाक्टर बनने से ज्यादा खुशी उन्हें प्रिया के डाक्टर बनने से हुई थी. इस के बाद 24 अप्रैल, 2010 को उन्होंने प्रिया की शादी डा. कमल वेदी से कर दी. डा. कमल वेदी राजस्थान के सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ के रहने वाले महेश वेदी के बेटे थे. परिवार वालों की सहमति से दोनों की शादी धूमधाम से हुई थी. रामबाबू वर्मा के लिए खुशी की बात थी कि उन्हें डाक्टर बेटी के लिए डाक्टर दामाद भी मिल गया था. वह निश्चिंत थे कि बेटी को कोई परेशानी नहीं होगी.

दोनों की जोड़ी खूब जमेगी. प्रिया भी अपने ही पेशे का जीवनसाथी मिलने से खुश थी. वह जानती थी कि एक डाक्टर की भावना को दूसरा डाक्टर ही अच्छी तरह समझ सकता है. बेटी को डाक्टर बना कर और उस की शादी कर के रामबाबू वर्मा  एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए थे. अब उन के ऊपर छोटे बेटे लोकेश की जिम्मेदारी रह गई थी. लोकेश भी पढ़ाई में तेज था. वह बैंक की नौकरियों की तैयारी कर  रहा था. वह भी अपने प्रयासों में सफल हो गया और उसे बैंक में नौकरी मिल गई. फिलहाल वह कोटा में एक बैंक में प्रोबेशनरी अफसर है. डा. कमल वेदी को उसी बीच सन 2012 में दिल्ली के एम्स में नौकरी मिल गई. वह एम्स में स्किन के डाक्टर हैं. इस के बाद सन 2014 में डा. प्रिया भी एम्स में एनेस्थीसिया की सीनियर रेजीडेंट के रूप में तैनात हो गईं. पतिपत्नी को एम्स के आयुर्विज्ञाननगर में रहने के लिए मकान भी मिल गया था.

डा. प्रिया को भले ही एम्स में पति डा. कमल के साथ नौकरी मिल गई थी, लेकिन वह खुश नहीं थीं. डा. प्रिया के मायके वालों के अनुसार डा. कमल ने प्रिया को कभी पति का प्यार नहीं दिया. वह अपने वैवाहिक जीवन को ले कर परेशान रहती थी. जब इस बात की जानकारी रामबाबू को हूई तो उन्होंने कमल के पिता महेश वेदी से बात की. महेश वेदी ने रामबाबू को भरोसा दिलाया कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा. डा. कमल ने भले ही प्रिया के वैवाहिक जीवन के सुनहरे सपनों को चूरचूर कर दिया था, लेकिन प्रिया अपने पति कमल से बेहद प्यार करती थी. वह न तो पति को छोड़ना चाहती थी और न ही अपने परिवार को टूट कर बिखरने देना चाहती थी.

करीब ढाई साल पहले रामबाबू वर्मा को जब बेटी पर हो रहे जुल्मों की जानकारी मिली तो प्रिया ने उन्हें मां की कसम दिला  कर चुप करा दिया था. वह चुपचाप मानासिक और शारीरिक अत्याचार सहन करती रही. डा. प्रिया ने फेसबुक पर पोस्ट लिख कर अपना दर्द बयां किया था. उन्होंने लिखा था कि शादी के 6 महीने बाद ही मुझे यकीन हो गया था कि मेरा पति डा. कमल समलैंगिक है और उस के कई लोगों के साथ समलैगिक संबंध हैं. उनहोंने लोगों के नाम भी फेसबुक पर लिखे थे. उन्होंने जब कमल के लैपटौप में उस के समलैंगिक संबंधों के सबूत दिखाए तो कमल ने कहा कि किसी ने उस का एकाउंट हैक कर के इस तरह की चीजें डाल दी हैं.

डा. प्रिया ने आगे लिखा था कि मैं सच जान चुकी थी. फिर भी मैं कमल से बेहद प्यार करती थी, लेकिन वह मेरे प्यार को समझ नहीं पाए. अगर हमारे समाज में ऐसे लोग हैं तो कभी उन से शादी मत कीजिए. अपने जीवन के अंतिम समय से कुछ घंटे पहले डा. प्रिया ने फेसबुक पर जो स्टेटस अपडेट किया था, उस में डा. कमल को गुनहगार बताया था. उन का कहना था कि वह कमल से बेहद प्यार करती थीं, इस के बावजूद उस ने उसे छोटीछोटी चीज के लिए तरसाया. केवल एक महीने पहले उस ने खुद को समलैंगिक माना. इस सब के बावजूद वह उस की मदद करना चाहती थीं, लेकिन वह उसे टौर्चर करता रहा.

इसी फेसबुक पेज पर डा. प्रिया ने एक रात पहले के वाकए का जिक्र करते हुए लिखा था, ‘तुम ने मुझे इतना अधिक टौर्चर किया है कि अब तुम्हारे साथ सांस भी नहीं ले सकती. तुम इंसान नहीं, राक्षस हो, क्योंकि तुम ने मेरी खुशी छीन ली. तुम्हारे जैसे लोग केवल लड़की और उस के घर वालों की भावनाओं से खेलते हैं. डा. कमल, मैं ने तुम से कभी कुछ नहीं चाहा था, क्योंकि मैं तुम्हें बेहद प्यार करती थी, जबकि तुम ने कभी मेरे प्यार की अहमियत नहीं समझी. कमल तुम मेरे गुनहगार हो. 18 अप्रैल की सुबह डा. प्रिया जब उठीं तो बेहद तनाव में थीं. बीती रात ही डा. कमल ने उस से झगड़ा किया था. वह फ्रेश हुईं और एक ट्रौली बैग में जरूरी सामान रख कर कुछ देर वह सोचती रहीं, फिर एकाएक मन को कठोर कर के अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी होने की बात कह कर घर से निकल पड़ीं.

सुबह करीब साढ़े 9 बजे प्रिया ने जयपुर में अपने पिता को फोन किया कि प्लीज पापा, जल्दी आ जाओ. आप नहीं आओगे तो मेरा मरा मुंह देखोगे. उसी दिन सुबह करीब 11 बजे प्रिया ने कोटा में रहने वाले अपने छोटे भाई लोकेश को फोन कर के यही बातें कही थीं. प्रिया की बातों से उस के घर वालों की चिंता बढ़ गई थी. रामबाबू वर्मा तुरंत घर वालों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे. दूसरी ओर कोटा से छोटा भाई लोकेश भी अपने एक कजिन के साथ दिल्ली के लिए चल पड़ा था. रास्ते से उन्होंने कई बार प्रिया को फोन किए, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. इस बीच प्रिया का भी कोई फोन नहीं आया.

जब रामबाबू वर्मा, लोकेश और उन के अन्य रिश्तेदार दिल्ली पहुंचे तो रात हो चुकी थी. प्रिया के बारे में जब उन्हें कोई सही सूचना नहीं मिली तो सभी थाना डिफेंस कालोनी पहुंचे और प्रिया की गुमशुदगी दर्ज करने का अनुरोध किया. पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज कर प्रिया के मोबाइल के आधार पर उस की लोकेशन पता की तो वह पहाड़गंज इलाके में मिली. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि वह पहाड़गंज में होंगी. पुलिस ने प्रिया के पति डा. कमल एवं घर के अन्य लोगों से भी बात की. वे भी प्रिया के बारे में कुछ नहीं बता सके थे. इस के बाद पुलिस मिली मोबाइल लोकेशन के आधार पर रामबाबू वर्मा, लोकेश एवं डा. कमल आदि को साथ ले कर पहाड़गंज के होटल प्रेसीडेंसी पहुंच गई, जहां डा. प्रिया की लाश मिली.

पूछताछ में पता चला कि डा. प्रिया एवं डा. कमल के रिश्तों में इतनी दूरियां आ चुकी थीं कि इसी साल 26 जनवरी को जब जयपुर में प्रिया के छोटे भाई लोकेश की शादी थी तो उस में केवल प्रिया ही गई थी. लेकिन प्रिया ने अपने व्यवहार से किसी को इस बात की भनक नहीं लगने दी थी कि हालत यहां तक पहुंच चुकी है. बहरहाल, डा. प्रिया की मौत ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं. उस के घर वाले प्रिया को इंसाफ दिलाने की मांग कर रहे हैं. जयपुर के स्टैच्यू सर्किल पर प्रिया की याद में कैंडल मार्च भी निकाला गया. फेसबुक पर तेजी से वायरल होने के बाद डा. प्रिया का सुसाइड नोट उस में से हटा दिया गया. डा. प्रिया का वाल पोस्ट उस की मौत के बाद करीब साढ़े 3 हजार लोगों ने शेयर किया था. इस के बाद फेसबुक ने प्रिया की प्रोफाइल को रिमेंबरिंग प्रिया वेदी कर दिया, साथ ही उन का वाल पोस्ट फेसबुक से हटा दिया. Hindi Crime Stories

 

Crime Stories: एक और निर्भया

लेखक – कस्तूरी रंगाचारी    

Crime Stories: बलात्कार अक्षम्य अपराध है, लेकिन कभीकभी हकीकत जानने के बाद भी लोग इसे छिपाने की कोशिश करते हैं. इस से बलात्कारियों के हौसले बढ़ते हैं. विद्या के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा था, लेकिन…

कालेज से आते ही मैं ने और भइया ने मम्मी को परेशान करना शुरू कर दिया था. हम ने उन से गरमगरम पकौड़े बनाने के लिए कहा था. मम्मी पकौड़े बनाने की तैयारी कर रही थीं, तभी नीचे से तेजतेज आती आवाजें सुनाईं दीं.

‘‘ये कैसी आवाजें आ रही हैं?’’ कहते हुए रमेश भइया बालकनी की ओर भागे. उन के पीछेपीछे मैं और मम्मी भी बालकनी में आ गए. हम ने देखा, हमारी बिल्डिंग के नीचे एक जीप खड़ी थी, जिस से 4 लोग आए थे. वे स्वाति दीदी के फ्लैट के बाहर खड़े उन्हें धमका रहे थे. वे शक्लसूरत से ही गुंडेमवाली लग रहे थे. दरवाजा बंद था. इस का मतलब वह अंदर थीं, क्योंकि अब तक उन के औफिस से आने का समय हो गया था. यह बात पक्की थी कि वह उन गुंडों की धमकी को सुन रही थीं. कुछ देर तक नीचे से धमकाने के बाद भी जब दीदी बाहर नहीं आईं तो उन्हें लगा कि अब उन्हें उन के सामने आ कर धमकाना चाहिए. वे सीढि़यां चढ़ने लगे. उन के जूतों की आवाज स्वाति दीदी के दरवाजे की ओर बढ़ रही थी.

रमेश दरवाजे की ओर बढ़ तो मैं भी उस के पीछेपीछे चल पड़ी. मैं ने पीछे से पुकारा, ‘‘तुम दोनों कहां जा रहे हो?’’

‘‘वे सभी स्वाति दीदी के फ्लैट के सामने आ गए हैं,’’ रमेश ने हैरानी से कहा, ‘‘वह घर में अकेली होंगी. हमें उन की मदद के लिए जाना चाहिए, पता नहीं वे लोग क्या चाहते हैं? उन की बातों से साफ लग रहा है कि वे किसी अच्छे काम के लिए नहीं आए हैं.’’

‘‘तो क्या तुम दोनों उन गुंडेमवालियों से निपट लोगे?’’ मम्मी ने कहा.

‘‘भले ही निपट न पाएं, पर इन स्थितियों में कुछ तो करना ही होगा. हम घर में बैठ कर तमाशा तो नहीं देख सकते.’’ रमेश ने कहा.

मम्मी हमें रोक पातीं, इस से पहले ही हम दोनों दरवाजा खोल कर बाहर आ गए. जीप से आए चारों आदमी स्वाति दीदी के दरवाजे के सामने खड़े हो कर दरवाजा खोलने के लिए कह रहे थे. उन का सरगना दरवाजे पर ठोकर मारते हुए कह रहा था. ‘‘जल्दी दरवाजा खोल कर बाहर आओ, वरना हम दरवाजा तोड़ देंगे.’’

‘‘हमारे नेता को बदनाम करने का अंजाम तो तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा.’’ उस के पीछे खड़े दूसरे आदमी ने कहा.

अब तक मैं और रमेश वहां पहुंच चुके थे. रमेश ने कहा, ‘‘तुम लोग यहां क्या कर रहे हो, क्यों इतना शोर मचा रखा है?’’

उन में से एक आदमी ने पलट कर रमेश को घूरते हुए कहा, ‘‘तू अपना काम कर न, क्यों बेकार में बीच में पड़ रहा है.’’

रमेश भइया कुछ कहते, तब तक स्वाति दीदी का दरवाजा खुल गया. मैं ने उन की ओर देखा सलवार सूट पहने वह आराम से दरवाजे पर खड़ी थी. उस स्थिति में भी उन के चेहरे पर शांति झलक रही थी, साफ लग रहा था कि उन्हें इन लोगों से जरा भी डर नहीं लग रहा है. वह उन गुंडों की ओर देखते हुए मुसकरा रही थी. दरवाजे पर दीदी को देख कर उन चारों में से एक आदमी ने आगे आ कर कहा, ‘‘आप ने हमारे नेता का अपमान किया है, सरेआम उन की खिल्ली उड़ाई है. अब उस का अंजाम तो तुम्हें भुगतना ही होगा.’’

स्वाति दीदी उसी तरह खामोशी से खड़ी उन्हें देख रही थीं. उस आदमी की बात पूरी  होते ही उन्होंने पूछा, ‘‘कौन हैं तुम्हारे नेताजी, जिन का मैं ने अपमान कर दिया है?’’

‘‘मूलचंदजी, जिन्होंने कल रेप वाले मामले में बयान दिया था.’’

रेप की बात सुन कर मुझे लगा, जैसे किसी ने गरम सलाख मेरे शरीर पर रख दी हो. मन किया, यहां से चली जाऊं, लेकिन उस समय स्वाति दीदी उन चारों से घिरी थीं, इसलिए मजबूरन मुझे रुकना पड़ा. स्वाति दीदी ने बहुत ही ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा तो तुम लोग मूलचंद के आदमी हो.’’

‘‘जी. अब तुम्हें उन से माफी मांगनी होगी.’’

‘‘माफी किस बात की?’’

‘‘जब हमारे नेताजी ने कहा कि जिस लड़की के साथ बलात्कार हुआ, वह खुद इस के लिए जिम्मेदार थी, तो तुम ने हमारे नेताजी को गलत बताया. उस के बाद से सारे चैनल तुम्हारी इसी बात को बारबार दोहरा रहे हैं, जिस से हमारे नेताजी झूठे साबित हो रहे हैं. अखबारों ने इसे प्रमुखता से छापा है.’’

‘‘उन्होंने जो कहा, वह गलत था, इसलिए मैं ने विरोध किया है.’’

‘‘उन के खिलाफ मीडिया में बयान दे कर तुम ने हमारे नेता का अपमान नहीं किया?’’

‘‘मैं ने उन का अपमान नहीं किया, बल्कि उन्हें सही राह दिखाई है. 15 साल की लड़की के साथ बलात्कार हुआ है, जो दसवीं में पढ़ रही थी. उस समय वह ट्यूशन पढ़ कर घर आ रही थी. शाम के 5 बज रहे थे, दिनदहाड़े उन लोगों ने उस का अपहरण कर लिया और सुनसान में ले जा कर उस के साथ बलात्कार किया. ऐसे में उस बच्ची की गलती कैसे कही जा सकती है?’’

एक 15 साल की लड़की, जो स्कूल में पढ़ रही थी, उस के साथ बलात्कार हुआ था. वह मुझ से केवल एक साल छोटी थी. मुझे लगा, एक बार फिर वह गरम सलाखें मेरे शरीर पर रख दी गईं. मेरे मुंह से कुछ निकलने वाला था कि मैं ने मुंह पर अपना हाथ रख लिया. स्वाति दीदी ने हैरानी से मेरी ओर देखा, ‘‘बेटा, क्या बात है?’’

मैं ने एक आदमी को हटाते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं दीदी, मुझे घर जाना चािहए.’’

मैं अपने फ्लैट की ओर बढ़ी. मैं दरवाजे के पास पहुंची ही थी कि मैं ने सुना, स्वाति दीदी कह रही थीं, ‘‘क्या तुम्हारी कोई बहन स्कूल नहीं जाती है? उस के साथ ऐसा हो जाए तो? वैसे मैं तुम्हें बता दूं कि मैं ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर दिया है.’’

मैं घर आई तो मम्मी काफी शांत थीं. मुझे पता था कि पापा आएंगे तो वह हमारी शिकायत जरूर करेंगी कि हम लोगों ने उन की बात नहीं मानी और उन के मना करने के बाद भी हम स्वाति दीदी की मदद करने चले गए. जबकि वे गुंडे थे. मैं उन की ओर ध्यान दिए बगैर अपने कमरे में चली गई. रमेश मेरे आने के एक घंटे बाद आया. उस के आते ही मैं ने पूछा, ‘‘पुलिस आ गई थी?’’

‘‘नहीं, पुलिस नहीं आई. स्वाति दीदी ने पुलिस बुलाई ही कहां थी. वह तो उन्होंने गुंडों को सिर्फ डराने के लिए कहा था.’’ रमेश ने स्वाति दीदी की बुद्धि की सराहना करते हुए कहा, ‘‘जैसे ही उन्होंने पुलिस का नाम लिया, चारों गुंडे तुरंत भाग निकले थे.’’

रमेश ने बताया कि उन गुंडों के जाने के बाद स्वाति दीदी उसे अपने फ्लैट में ले गई थीं.

खूबसूरत और शांत स्वभाव की स्वाति दीदी 2 महीने पहले ही हमारे पड़ोस वाले फ्लैट में रहने आई थीं. रमेश उन से बहुत प्रभावित था, मुझे भी वह पसंद थीं. बातचीत से ही वह पढ़ीलिखी और बुद्धिमान लगती थीं. रमेश अपने और स्वाति दीदी के बीच हुई बातचीत बताने को बेचैन था. उस ने कहा, ‘‘जानती हो वह वकील और एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वह एक ऐसी सामाजिक संस्था की सदस्य हैं, जो रेप की शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने का काम करती है. इस के अलावा वह रेप की शिकार मासूमों को समाज में उन का स्थान दिलाने में भी मदद करती हैं. उन की संस्था का नाम है ए सेकेंड लाइफ यानी एएसएल.’’

थोड़ी खामोशी के बाद उस ने कहा, ‘‘रेप महिलाओं के साथ होने वाला सब से खतरनाक अपराध है. लेकिन इस बात को समझ कर रेप की शिकार मासूमों की काउंसलिंग करा कर उन में आत्मविश्वास वापस लाने में मदद करने के बजाय हम उन के बारे में अफवाहें फैला कर उन्हें बदनाम करते हैं.’’

‘‘रमेश, मुझे तुम्हारी इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’ कह कर मैं ने उसे चुप कराना चाहा, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि वह रेप के बारे में बातें करे. लेकिन रमेश ने मेरी बात पर ध्यान ही नहीं दिया. उस ने कहा, ‘‘एएसएल के सदस्य पीडि़त के साथ खड़े हो कर उस के जीवन को फिर से सामान्य बनाने की कोशिश करते हैं. हम सभी को भी यह काम करना चाहिए.’’

रमेश क्षण भर के लिए रुका. उसी बीच मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘मैं ने कहा न, इन बातों में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है. रेप कितने शर्म की बात है.’’

रमेश ने जैसे मेरी बात सुनी ही नही. उस ने आगे कहा, ‘‘मैं भी एएसएल का सदस्य बनने की सोच रहा हूं.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी रेप पीडि़तों की मदद करना चाहते हो? लगता है स्वाति दीदी से तुम्हें कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया है?’’ मैं ने कहा, ‘‘ओह माई गौड! रमेश, वह उम्र में तुम से काफी बड़ी हैं. तुम उन्हें दीदी कहने के बजाय उन का नाम ले रहे हो. मालूम है न, वह तुम से कम से कम 8 या 9 साल बड़ी होंगी?’’

‘‘उम्र का इस मामले से क्या संबंध?’’ रमेश जोर से हंसा, ‘‘उम्र तो एक गिनती है.’’

इस तरह मैं ने बात का रुख स्वाति दीदी की ओर मोड़ दिया और रेप की बात समाप्त करने में कामयाब हो गई. लेकिन अपने मन से इस बात को नहीं निकाल सकी कि जब पापा को इस बारे में पता चलेगा तो वह हमें डाटेंगे जरूर, क्योंकि हम ने ऐसे मामले में टांग अड़ाई थी, जिस का संबंध हम लोगों से बिलकुल नहीं था. हम ने खुद को खतरे में डाला था लेकिन न जाने क्या सोच कर मम्मी ने इस मामले में हम बहनभाई को बचा लिया था. मुझे रमेश पर खतरा मंडराता दिखाई देर रहा था. अब वह अक्सर स्वाति दीदी के घर जाने लगा था. वह उन के घर घंटों बैठा रहता. एएसएल की बैठकों में भी जाने लगा था. उस की इन हरकतों का मम्मीपापा में से किसी को पता नहीं था.

कभी आने में देर हो जाती तो वह कोई न कोई कहानी सुना देता, कभी कहता कि वह अपने किसी दोस्त की बर्थडे पार्टी में चला गया था तो कभी किसी सहपाठी की बीमारी का बहाना बना देता. उस के इन बहानों पर मुझे यह सोच कर कोफ्त होती कि बच्चे मातापिता को कितनी आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं. मांबाप को लगता है कि वे अपने बच्चों के बारे में सब कुछ जानते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि वे अपने बच्चों की असलियत के नजदीक तक नहीं पहुंच पाते. वे अपने असली बच्चों की आदतों, रुचियों, हरकतों के बारे में नहीं जान पाते. एक दिन सारे के सारे न्यूज चैनलों पर एक ही खबर दिखाई जा रही थी कि एक लड़की देर रात जब काम से घर लौट रही थी तो 4 लड़कों ने बस अड्डे से उस का पीछा किया. जब वह सुनसान जगह पर पहुंची तो वे उसे झाडि़यों में खींच ले गए और उस का मुंह बंद कर के उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया.

लेकिन वह बहादुर लड़की निर्भया की तरह थी. इतनी तकलीफ और दर्द में भी उस ने होश नहीं खोया. उस स्थिति में भी उस ने हर एक बलात्कारी की सूरत अपने दिमाग में बैठा लीथी. उस ने यह भी याद रखा कि वे क्या बातें कर रहे थे. उन में से किसी ने अपने साथी को चिंटू कहा तो दूसरे ने उसे डांट कर चुप करा दिया. उन में से एक के गाल पर लंबे घाव का निशान था, जबकि 2 लोगों ने अपने चेहरों पर उस के सामने ही कपड़ा बांधा था, लेकिन उस ने उन का चेहरा अच्छी तरह से देख लिया था. उन लफंगों की मनमरजी से लड़की की हालत बहुत खराब हो गई थी, जब उन्हें लगा कि लड़की बेहोश हो गई है या मर चुकी है, तब उन्होंने किसी जगह का नाम लिया था. उस जगह पर वे तब तक छिपे रहने की बात कर रहे थे, जब तक यह मामला ठंडा नहीं पड़ जाता.

चारों लड़कों के जाने के बाद, लड़की ने हिम्मत बटोरी और लड़खड़ाती हुई किसी तरह पास के एक मकान तक पहुंच गई. उस की हालत देख कर लोगों ने पुलिस बुलाई, जिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया. लड़की ने अपने ऊपर हुए जुल्म की पूरी कहानी विस्तार से सुना दी. साथ ही उन चारों लड़कों के हुलिए बता कर उन की आपस की बातचीत भी बता दी. इस के बाद पुलिस उन चारों की तलाश में लग गई. ऐसा लग रहा था जैसे समाचार चैनल और अखबार वालों के पास दूसरा कोई समाचार ही नहीं था. हर जगह बस उसी लड़की को ले कर हायतौबा मची थी. हर कोई सिर्फ रेप के बारे में ही बातें कर रहा था. स्टूडेंट्स और औरतें प्रदर्शन कर रही थीं, सभाएं कर रही थीं, कैंडल लाइट मार्च निकाले जा रहे थे. बहसें हो रही थीं कि औरतें कैसे सुरक्षित रह सकती हैं.

लोग इस बारे में भी चर्चा कर रहे थे कि क्या रेप करने वालों को फांसी की सजा देनी चाहिए, जिस से इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकें. जैसे ही कोई अभियुक्त पकड़ा जाता, शोरशराबा मचता. धीरेधीरे चारों अभियुक्त पकड़े गए. जैसेजैसे उस लड़की के बारे में टीवी और अखबारों में खबरें आ रही थीं, मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. हर कोई इतनी बेशर्मी से क्यों बातें कर रहा था, मेरी समझ में नहीं आ रहा था. स्वाति दीदी की संस्था भी इस मामले में लगी थी. दीदी और रमेश भी लगे हुए थे. एएसएल के सदस्य जुलूस निकाल रहे थे, मीडिया के माध्यम से बयान जारी किए जा रहे थे. अब तक रमेश को लगने लगा था कि वह अपनी हरकतों को मम्मीपापा से छिपा नहीं सकता, इसलिए एक दिन उस ने पापा को बता दिया कि वह एएसएल से जुड़ गया है और उस के कार्यक्रमों में भाग ले रहा है.

पापा ने मेरी ओर देख कर कहा, ‘‘यह तो अच्छी बात है. सामाजिक कार्यों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना ही चाहिए. तुम भी विरोध में भाग लो. इस बुराई के खिलाफ लड़ो और ऐसा बुरा काम करने वालों को सजा दिलवाओ.’’

मैं चुप बैठी रही. पापा को शायद मेरी इस चुप्पी पर हैरानी हुई कि मैं ने यह क्यों नहीं कहा कि रमेश के साथ जाऊंगी. इस की वजह यह थी कि रेप की बात सुन कर मेरा दिमाग घूम जाता था. अगले कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा. यही लग रहा था कि शहर में रेप के अलावा और कोई मुद्दा नहीं है. मैं इस सब से बहुत दूर रहती थी क्योंकि ‘रेप’ शब्द मुझे बीमार सा कर देता था, इसलिए मैं ने अखबार पढ़ना और टीवी देखना भी बंद कर दिया था. मैं उस जगह से हट जाती थी, जहां लोग रेप के बारे में बातें कर रहे होते थे. मैं उस दिन स्कूल भी नहीं गई थी, जिस दिन पुलिस यह बताने आने वाली थी कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा कैसे करनी चाहिए. मम्मी से मैं ने कह दिया था कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है.

एक शनिवार को रमेश ने मेरे कमरे में आ कर कहा, ‘‘वृंदा जल्दी तैयार हो जा. आज एएसएल एक सेमिनार करवा रहा है और हमें उस में अधिक से संख्या में पहुंचना चाहिए. इसलिए तुम भी चलो.’’

‘‘मैं नहीं जा सकती.’’ मैं ने बड़ी बेरुखी से कहा.

‘‘क्यों नहीं जा सकती भई? मैं देख रहा हूं इधर तुम कुछ बदलीबदली सी रहती हो. पहले तो तुम ऐसे कामों में मेरे साथ बड़े जोशोखरोश से भाग लेती थीं, अब ऐसा क्या हो गया, जो जाने से मना कर रही हो? जबकि यह लड़कियों का ही कार्यक्रम है.’’

‘‘मुझे पढ़ना है.’’

‘‘मुझ से बहाना बनाने की जरूरत नहीं है, तुम आलसी और स्वार्थी हो गई हो. तुम घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहती. किसी के दुख तकलीफ में उस का साथ नहीं देना चाहती.’’

‘‘तुम्हें जो सोचना है सोचते रहो, मुझे नहीं जाना तो नहीं जाना.’’

रमेश मुझे घूरता हुआ गुस्से में तेजी से मेरे कमरे से चला गया. उस पूरे दिन वह घर से बाहर ही रहा. मैं अपने कमरे में अकेली पड़ी रही, अगले दिन स्कूल की छुट्टी थी, इसलिए सोचा चलो पड़ोस में रहने वाली सहेली के यहां चली जाऊं. जैसे ही मैं दरवाजे से बाहर निकली एक आवाज ने मुझे रोक लिया. स्वाति दीदी अपने दरवाजे पर खड़ी थीं. मैं अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए उन की ओर मुड़ी. उन्होंने कहा, ‘‘वृंदा यहां आओ.’’

‘‘मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’’

‘‘दीदी, अभी मैं अपनी एक दोस्त से मिलने जा रही हूं.’’ मैं ने उन से बचने के लिए कहा.

‘‘चली जाना, पहले इधर आओ. आज तुम्हारे सकूल की छुट्टी है ना?’’

मैं मना नहीं कर सकी और चेहरे पर झूठी मुसकान लिए बोझिल कदमों से स्वाति दीदी के घर की ओर बढ़ी. वह बड़े प्यार से मुझे अंदर ले गई. अंदर पहुंच कर उन्होंने कहा, ‘‘तुम से बात किए हुए काफी समय हो गया. सुनाओ, आजकल क्या चल रहा है, तुम क्या कर रही हो?’’

‘‘कुछ खास नहीं, आजकल आप बहुत व्यस्त हैं न, इसलिए मैं आप के यहां नहीं आई.’’ मैं ने कहा.

लेकिन तुरंत ही मुझे अपने इन शब्दों पर अफसोस हुआ, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि वह रेप के बारे में बातें करें, पर मैं जो गलती कर गई थी, उस से तय था कि वह उस बात का उल्लेख जरूर करेंगी.

‘‘हां, आजकल मैं थोड़ा व्यस्त हूं. दरअसल वह भयानक रेप था,’’ स्वाति दीदी ने मुझ पर नजरें गड़ा कर कहा, ‘‘लेकिन तुम रेप के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में भाग क्यों नहीं लेती, क्या बात है वृंदा?’’ रमेश कह रहा कि तुम उस दिन स्कूल भी नहीं गई थीं, जिस दिन पुलिस तुम्हारे स्कूल में यह बताने आई थी कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा कैसे करनी चाहिए?’’

‘‘हां, नहीं गई थी.’’

‘‘क्यों? पुलिस ने जो बातें बताई थीं वे लड़कियों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण थीं. उस से लड़कियों को अपनी सुरक्षा करने में मदद मिलेगी.’’

अब मैं चुप नहीं रह सकी. मैं ने कहा, ‘‘सच दीदी, क्या ऐसा हो सकता है? लेकिन मुझे तो ऐसा नहीं लगता. अगर किसी इंसान या लड़के के अंदर छिपा वहशी जानवर किसी औरत या लड़की को नुकसान पहुंचाना चाहे तो ऐसा करने से क्या उसे रोका जा सकता है, क्या वह ऐसा नहीं करेगा?’’

स्वाति दीदी ने मेरी ओर हैरानी से देखा. उस के बाद एकएक शब्द पर जोर देते हुए बोलीं, ‘‘यह सच है कि शारीरिक रूप से पुरुष औरत से अधिक मजबूत होते हैं, लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि लड़कियां मजबूर और बेबस हैं. वह यह तो सीख ही सकती हैं कि अपनी सुरक्षा कैसे की जाए? अगर उन में लगन और इच्छाशक्ति है तो वह खुद को वहशी जानवरों से जरूर बचा सकती हैं.’’

‘‘नहीं बचा सकती दीदी. बहादुर से बहादुर और मजबूत से मजबूत लड़की भी ऐसा नहीं कर सकती. कोई और भी कुछ नहीं कर सकता. क्योंकि हर कोई उसे अपने नीचे दबाना चाहता है.’’

मेरी इन बातों से मेरा डर बाहर आ गया. मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैं ने जल्दी से खुद पर काबू पाने की कोशिश की, क्योंकि मुझे पता था कि अगर मैं चुप नहीं हुई तो दीदी को पता चल जाएगा कि मेरे साथ कुछ बुरा हो रहा है. लेकिन न मैं खुद पर काबू रख पाई और न दीदी को मूर्ख बना पाई, क्योंकि ये दोनों ही काम मेरे लिए बहुत मुश्किल थे. मेरी हालत देख कर वह जल्दी से उठ कर मेरे पास आईं और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘क्या बात है वृंदा, मुझे बताओ तुम्हारे साथ क्या हुआ? अगर तुम मुझे सब बता दोगी तो तुम्हारे दिल और दिमाग से बोझ हट जाएगा. उस के बाद तुम काफी आराम महसूस करोगी.’’

‘‘नहीं दीदी, मुझे कोई परेशानी नहीं है, मैं ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मैं तो किसी दूसरे के बारे में सोचसोच कर परेशान हूं.’’

‘‘यह सच नहीं है.’’ दीदी ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘तुम्हारे साथ जरूर कुछ हुआ है, जिसे तुम छिपा रही हो. तुम्हारे साथ, जरूर यौन हिंसा जैसा कुछ हुआ है. वृंदा, मुझे बताओ तुम्हारे साथ क्या हुआ है?’’

मैं कुछ बोल नहीं सकी, क्योंकि हिचकियां लेले कर रोने से मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे. दीदी ने खींच कर मुझे सीने से लगा लिया. वह धीरेधीरे मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘‘मुझे बताओ न वृंदा, क्या बात है? अपनी बात कह कर तुम बहुत शांति महसूस करोगी.’’

मैं ने खड़ी हो कर घबराई आवाज में कहा, ‘‘मुझे अब जाना चाहिए.’’

मैं दरवाजे की ओर बढ़ी, लेकिन आंखों में आंसू होने के कारण मुझे रास्ता दिखाई नहीं दिया, जिस से मैं लड़खड़ा गई. दीदी ने आगे बढ़ कर मेरा हाथ थाम लिया और मुझे सोफे पर बैठा कर गंभीर स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारे साथ भी बलात्कार जैसा कुछ हुआ है क्या?’’

अब मैं चुप नहीं रह सकती थी. मैं ने कहा, ‘‘नहीं दीदी, मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. लेकिन मेरी सब से अच्छी सहेली विद्या, जो मेरी क्लासमेट भी है. उस के साथ रेप हुआ है. एक नहीं, 2 लड़कों ने उस के साथ जबरदस्ती की है.’’

दीदी ने एक लंबी सांस ले कर जल्दी से पूछा, ‘‘कब और कैसे हुआ यह सब?’’

दीदी की प्रतिक्रिया से मुझे डर सा लग रहा था, मैं जल्दी से थूक गटक कर बोली, ‘‘दीदी, यह तीन महीने पहले की बात है. वह दोनों लड़कों में से एक लड़के, जिस का नाम महेश है को जानती थी. वह उस के पड़ोस के फ्लैट में ही रहता था. महेश उस का पड़ोसी ही नहीं था, उस के पिता विद्या के पिता के साथ भागीदारी में कारोबार करते हैं. वह उसे अक्सर छेड़ा करता था. लेकिन इस बात को न महेश के मातापिता जानते थे और न ही विद्या के.’’

‘‘विद्या ने कभी किसी से उस की शिकायत भी नहीं की?’’

‘‘नहीं, उस की चुप्पी ने महेश को हिम्मत बढ़ा दी और एक दिन मौका मिलने पर महेश ने दोस्त के साथ मिल कर उस के साथ जबरदस्ती कर डाली.’’

‘‘यह सब कैसे हुआ?’’ स्वाति दीदी ने पूछा.

अब तक मेरी आंखों के आंसू थम गए थे. मैं उन्हें सब बता देना चाहती थी, जो मेरे अंदर दबा था, वह भी जो अपराधबोध महसूस कर रही थी. मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘उस दिन वह स्कूल से घर आई तो उस के घर में ताला लगा था. उसे इस बात पर कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि कभीकभी ऐसा होता रहता था. उस की मम्मी कहीं जाती थी, तो ताला लगा कर चाबी महेश के घर छोड़ जाती थीं. विद्या ने चाबी लेने के लिए महेश के घर की डोरबेल बजा दी, क्योंकि उस समय महेश कालेज में होता था. घर में सिर्फ उस की मां ही होती थी.’’

‘‘लेकिन जब महेश ने दरवाजा खोला तो विद्या को झटका सा लगा. तभी महेश ने पलट कर कहा, ‘मम्मी, विद्या आई है चाबी लेने.’

विद्या को उस की मम्मी की आवाज सुनाई नहीं दी, इस के बावजूद किसी तरह का संदेह नहीं हुआ. महेश अंदर गया और वहीं से बोला, ‘‘विद्या तुम्हें मम्मी बुला रही हैं.’’

विद्या जैसे ही अंदर हौल में आई, महेश ने लपक कर दरवाजा बंद कर दिया. दरवाजा बंद करने की आवाज सुन कर विद्या पलटी. लेकिन अब वह फंस चुकी थी. उस के दिमाग में खतरे की घंटियां बजने लगीं. वह कुछ कर पाती या कहती, इस से पहले ही महेश उस के पास आया और उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘तुम मूर्ख की मूर्ख ही रहीं. तुम्हें बता दूं कि मेरी और तुम्हारी मम्मी दिनभर के लिए बाहर गई हैं. इस वक्त मैं अपने दोस्त के साथ घर में अकेला हूं. तुम उस से मिलोगी? सचिन, जरा यहां तो आना.’’

महेश के मुंह से शराब की बदबू आ रही थी. विद्या ने चीखना चाहा, लेकिन दूसरे लड़के को देख कर उस की चीख गले में घुट कर रह गई. वह हाथ में बीयर की बोतल लिए था यानी वह भी पिए हुए था.  मैं थोड़ी देर के लिए चुप हुई. उस के बाद फिर कहना शुरू किया, ‘‘दोनों लड़कों ने उसी हाल में विद्या के साथ मनमानी की. उस के बाद वे सलाह करने लगे कि अब उन्हें क्या करना चाहिए. सलाहमशविरे के बाद उन्होंने विद्या के फ्लैट का दरवाजा खोला और उसे अपने फ्लैट से उठा कर उस के फ्लैट में पहुंचा दिया. इस बीच सचिन बाहर खड़ा निगरानी करता रहा कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा. बिल्डिंग में हर मंजिल पर 2 ही फ्लैट हैं, इसलिए वे अपने उद्देश्य में आसानी से सफल हो गए.

‘‘विद्या को उस के फ्लैट में छोड़ कर जाने से पहले महेश ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो उसी की बदनामी होगी. पापा का साझे का जो कारोबार है वह भी बंद हो जाएगा. इसलिए उस ने किसी से कुछ नहीं कहा.’’ मैं ने स्वाति दीदी को पूरी बात बता दी.

‘‘जब उस ने तुम्हें यह बात बताई तो तुम ने उसे क्यों नहीं समझाया कि उसे यह बात अपने मातापिता को बता देनी चाहिए?’’ दीदी ने उत्तेजित लहजे में कहा, ‘‘जानती हो, उस के चुप रहने से महेश और सचिन मौका मिलने पर फिर वैसा कर सकते हैं.’’

मैं खामोश बैठी रही. दीदी ने कुछ देर तक मेरे बोलने का इंतजार किया, जब मैं नहीं बोली तो उन्होंने पूछा, ‘‘अब विद्या कैसी है, वह इस सदमे से उबर गई है या अभी उस पर उस का असर है?’’

मैं ने उन के सवाल का जवाब नहीं दिया तो दीदी ने जोर डालते हुए पूछा, ‘‘वृंदा, मुझे बताओ न इस घटना का उस पर क्या असर पड़ा है. वह पहले की तरह पढ़लिख और खेलकूद रही है?’’

मुझे अपना दम घुटता हुआ सा महसूस हुआ. मेरा सिर घूमने लगा और फिर से मेरी आंखों में आंसू बहने लगे. मैं ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘पहले के मुकाबले अब वह काफी चुपचुप रहती है, पढ़ाई में भी उस का ध्यान नहीं लगता. दरअसल, उस दोपहर उस के साथ जो हुआ, उस ने उस के बारे में मुझे बता तो दिया लेकिन साथ ही कहा कि इस बारे में मैं किसी को कुछ न बताऊं. इसलिए मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया.’’

‘‘और तुम चुप रह गईं,’’ दीदी ने ताना सा मारा, ‘‘तुम ने अपने दोस्त की मदद करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘मैं उस के साथ होने वाली जबरदस्ती के बारे में किसी से कैसे बता सकती थी? सचमुच मैं ने उसे पूरी तरह से बर्बाद होने दिया? मैं ने उस समय भी कुछ नहीं किया, जब मेरे सामने ही उस के साथ दोनों जुर्म ढा रहे थे. मदद करने के बजाय मैं ने शर्म से अपना चेहरा दोनों हाथों से छिपा लिया था. मदद के लिए गुहार लगाने के बजाय रो रही थी.’’

इस के बाद मैं ने दीदी को आगे की वह शर्मनाक घटना भी सुना दी, ‘‘उस दिन एक प्रोजेक्ट बनाने के लिए मैं स्कूल से सीधे विद्या के घर गई. उस के दरवाजे का ताला बंद था. वह चाबी लेने बराबर वाले फ्लैट में अंदर गई. मैं बाहर खड़ी हो कर इंतजार करने लगी. पलभर बाद मुझे उस की चीख सुनाई दी. मैं दरवाजे से सट कर खड़ी हो गई. अंदर महेश और सचिन जो बातें कर रहे थे, वे मुझे साफ सुनाई दे रही थीं. मुझे उन के मजे लेने की वे सिसकारियां भी सुनाई दे रही थीं, जो विद्या को नोचतेखसोटते हुए उन के मुंह से निकल रही थीं. मैं ने उन के भद्दे कमेंट्स भी सुने, जो वे विद्या के कपड़े उतारते हुए कर रहे थे.

‘‘मैं इस तरह सकते में आ गई कि मुझे सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी. विद्या का विरोध धीरेधीरे कमजोर पड़ता जा रहा था, और फिर उस की आवाज खामोश हो गई. उस के बाद उन्होंने वह सबकुछ किया जो उन्हें करना था.’’

‘‘तुम ने कुछ भी नहीं किया?’’ दीदी ने मरे से स्वर में पूछा, ‘‘तुम ने तब भी कुछ नहीं किया, जब यह सब कुछ हो रहा था?’’

‘‘हां, दीदी यह सच है कि मैं ने कुछ नहीं किया.’’ मैं ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘मुझे लकवा सा मार गया था. मैं ने आंखों से देखा तो नहीं, लेकिन जो कुछ भी हुआ, उसे कानों से सुना.’’

‘‘उस के बाद क्या हुआ?’’ दीदी ने उत्तेजित हो कर पूछा.

‘‘दीदी, मुझे होश तब आया जब महेश और सचिन ने विद्या को उस के फ्लैट में छोड़ने की बात की. वे उसे धमकी दे रहे थे कि अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो उस की इज्जत मिट्टी में मिला देंगे. भय के मारे मैं दौड़ती हुई सीढि़यां उतरने लगी. नीचे वाले फ्लोर पर आ कर मैं काफी देर कांपती हुई खड़ी रही. मैं दौड़ कर विद्या के फ्लैट के बाहर पहुंची और घंटी बजाई. विद्या ने दरवाजा नहीं खोला, तो मैं ने उस का नाम ले कर पुकारा. मेरी आवाज पहचान कर उस ने दरवाजा खोला.

‘‘जिस लड़की ने दरवाजा खोला, उस का नाम तो विद्या था, लेकिन मुझे विश्वास नहीं हो रहा था, वह विद्या ही है. उस के ऊपर जो कयामत गुजरी थी, उस से वह मृतक की तरह लग रही थी. मैं फूटफूट कर रोने लगी और उसे गले से लगा कर उस से माफी मांगने लगी कि मैं उस के लिए कुछ नहीं कर सकी.

मैं ने रोते हुए कहा, ‘‘मुझे बहुत दुख है विद्या कि मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकी. मुझे तुम्हारी मदद के लिए शोर मचाना चाहिए था, पुलिस को बुलाना चाहिए था.’’

‘‘भगवान का शुक्र है कि तुम ने ऐसा नहीं किया,’’ विद्या ने मरी सी आवाज में कहा, ‘‘और वादा करो कि आगे भी किसी से कुछ नहीं कहोगी.’’

‘‘लेकिन तुम्हें पुलिस के पास जाना चाहिए, मम्मीपापा से बताना चाहिए.’’

‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों… मान लो तुम्हें किसी तरह की बीमारी हो गई या गर्भवती हो गई तो…?’’

‘‘तुम मेरे साथ डाक्टर के पास चलना. मैं अपना इलाज करा लूंगी या अबार्शन करा लूंगी. इस के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है. लेकिन तुम किसी और से यह बात कहना मत.’’ मैं ने उस से वादा किया था. दीदी, इसलिए मैं ने किसी से कुछ नहीं बताया.

‘‘न विद्या गर्भवती हुई और न ही उसे किसी प्रकार की बीमारी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘लेकिन अभी भी वह उसी रेपिस्ट के पड़ोस में रहती है?’’

‘‘जी.’’

‘‘इस के बाद उस ने फिर दोबारा उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘जहां तक मुझे पता है, नहीं.’’

‘‘वह घर के अंदर कैसा महसूस कर रही है, तुम ने यह जानने की भी कोशिश नहीं की? तुम ने उसे किसी काउंसलर के पास जाने को भी नहीं कहा.’’

‘‘नहीं’’

‘‘उसे ही नहीं, तुम्हें भी काउंसलर के पास जाना चाहिए.’’

‘‘मुझे क्यों? मेरे साथ क्या हुआ है?’’

‘‘तुम भी अपने दोस्त के साथ हुए हादसे की वजह से सदमे में हो. तुम्हें अपराधबोध हो रहा है. तुम ने अपने दोस्त की मदद नहीं की. तुम्हें भी काउंसलिंग की जरूरत है.’’

मैं ने दीदी की ओर ताकते हुए कहा, ‘‘हां दीदी, मुझे और विद्या, दोनों को मदद की जरूरत है.’’

‘‘दीदी अपने काम पर लग गईं. उन्होंने सब से पहले मेरे मम्मीपापा और रमेश से वह सब कुछ बताया. मेरे मम्मीपापा हैरान रह गए. उन्हें जैसे होश ही नहीं रहा, जबकि भाई तो गुस्से से पागल हो गया. वह खुद पर आरोप लगाने लगा कि उस की समझ में यह बात क्यों नहीं आई कि मेरे व्यवहार में बदलाव आ गया है.’’

इस के बाद दीदी ने विद्या को बहाने से अपने घर बुलवाया. उस के आने पर दीदी और मेरे मम्मीपापा ने उस से बात की. पहले तो विद्या पागलों की तरह इस तरह की किसी बात से इनकार करती रही. लेकिन जल्दी ही वह टूट गई और मेरी मम्मी की बाहों में रोते हुए उस ने अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की पूरी कहानी सुना दी. दीदी ने उस की यह बात मान ली कि उस के मम्मीपापा को इस बारे में कुछ नहीं बताएंगी. लेकिन एएसल के सदस्यों ने महेश और सचिन को पकड़ कर कहा कि उन्होंने एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया है, इसलिए पुलिस से शिकायत कर के उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी. लेकिन वे अपना अपराध लिखित में स्वीकार कर के वादा करें कि अब वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें माफ किया जा सकता है.

दोनों ने वही किया, जैसा एएसएल के सदस्यों ने कहा. इस के बाद स्वाति दीदी ने दोनों की काउंसलिंग कराई. विद्या की भी काउंसलिंग कराई गई. कई सत्र के बाद विद्या रेप के सदमे से उबरी. इस से उस का खोया आत्मविश्वास वापस आ गया. अब मैं भी खुद को काफी बेहतर महसूस कर रही हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इस अपराधबोध से उबर सकूंगी कि मैं ने तब अपनी दोस्त की मदद नहीं की, जब उसे मेरी सब से ज्यादा जरूरत थी. Crime Stories

 

Suicide Case: कमला पसंद मालिक की बहू दीप्ति ने किया सुसाइड

Suicide Case: एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने पूरे भारत को झकझोर कर रखा दिया है. जहां देश के मशहूर पान मसाला कंपनी के मालिक ‘कमला पसंद’ और ‘राजश्री’ के मालिक कमल चौरसिया की बहू दीप्ति चौरसिया ने आत्महत्या कर ली. आखिर ऐसी क्या वजह थी कि इतनी बड़ी कंपनी की बहू को आत्महत्या करनी पड़ी. चलिए जानते हैं इस परिवार से जुड़ी पूरी स्टोरी को, जो आप को बताएगी पूरा सच.

यह दर्दनाक घटना दिल्ली के वसंत विहार से सामने आई है. यहां दीप्ति चौरसिया ने अपने घर में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली. शव को सबसे पहले उस के पति हरप्रीत चौरसिया ने फंदे पर लटका देखा. इस के बाद वह पत्नी को अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को दीप्ति के पास एक डायरी मिली, जिस में दीप्ति ने अपने पति से होने वाले झगड़े के बारे में लिखा था.

दीप्ति ने डायरी में लिखा, ‘अगर रिश्ते में प्यार और भरोसा नहीं तो फिर उस रिश्ते में जीने की वजह क्या है. अब मैं और सहन नहीं कर सकती.’

पुलिस के मुताबिक, दीप्ति का पूरा परिवार अलगअलग घरों में रहता है. आप को बता दें कि दीप्ति चौरसिया की शादी 2010 में हरप्रीत चौरसिया से हुई थी. बताया जा रहा है कि हरप्रीत ने 2 शादियां की थीं. दीप्ति का 14 साल का बेटा है. वहीं दूसरी पत्नी दक्षिण सिनेमा में काम करती है. उस की भी एक बेटी है. दीप्ति के भाई ऋषभ ने मीडिया को बताया है कि हरप्रीत के कई महिलाओं से अवैध संबंध हैं. 2011 में पता चला कि बहन के साथ जीजा और सास मारपीट करते थे. जब मारपीट हुई तो हम अपनी बहन को कोलकाता ले आए थे, लेकिन सास उसे वापस ले गई थी. फिर भी उस के साथ मारपीट की.

भाई ने बताया कि बहन मुझ से कहती थी मुझे रोज प्रताड़ित किया जाता है. भाई ने कहा मुझे नहीं पता कि मेरी बहन ने सुसाइड किया या मारी गई है. मैं ने अपनी बहन से 2 दिन पहले बात की थी. मुझे सिर्फ इंसाफ चाहिए. दक्षिणपश्चिम दिल्ली के वसंत विहार थाने की पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है. Suicide Case

Contract Killing: सुहाग मिटाने की सुपारी

Contract Killing: सुमन के संबंध धीरज से बने तो उसे अपना पति कांटे की तरह चुभने लगा. इस कांटे को निकालने के लिए उस ने ऐसी कोन सी चाल चली कि प्रेमी उस के झांसे में आ गया. उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के थाना मडराक के गांव नोहटी के रहने वाले सरदार सिंह का बड़ा बेटा रामजीलाल पढ़लिख कर जानवरों का इलाज करने लगा था तो उस से छोटा राजवीर खेती के कामों में उन की मदद करने लगा था. रामजीलाल की जानवरों के इलाज की दुकानदारी ठीकठाक चलने लगी तो उस के विवाह के लिए लोग आने लगे.

कई लड़कियां देखने के बाद घर वालों ने उस के लिए अलीगढ़ की सुमन को पसंद किया. शादी के बाद सुमन ससुराल आई तो जल्दी ही उस ने घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल लीं. जिस से गांव में उस की गिनती अच्छी बहुओं में होने लगी. उस के बाद राजवीर की भी शादी हो गई. उस की पत्नी तेजतर्रार थी, उस की घर में किसी से नहीं पटी तो राजवीर उसे ले कर अलग मकान में रहने लगा. धीरेधीरे परिवार बढ़ने लगा. रामजीलाल और सुमन 5 बच्चों के मातापिता बने, जिन में 3 बेटियां और 2 बेटे थे. सरदार सिंह गांव के खातेपीते किसान थे. उन के पास खेती की काफी जमीन थी. सुखीसंपन्न होने की वजह से सब कुछ बढि़या चल रहा था.

लेकिन समय कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता. रामजीलाल की डाक्टरी बढि़या चल रही थी. कमाई भी अच्छी थी. बच्चे अच्छे से पढ़लिख रहे थे. लेकिन रामजीलाल ने उसी बीच अधिक कमाई के लिए एक ऐसा काम शुरू किया, जो उन के लिए नुकसानदायक ही नहीं सिद्ध हुआ, बल्कि जिंदगी ले डूबा. साल भर पहले रामजीलाल ने ब्याज पर रुपए देने के लिए अपनी कुछ जमीन 9 लाख रुपए में बेच दी. उसी बीच उस की मुलाकात धीरज से हुई. वह पड़ोसी गांव देदामई के रहने वाले सत्यवीर का बेटा था. वह उस के गांव किसी जानवर के इलाज के लिए गया था.

धीरज को पता था कि रामजीलाल ब्याज पर रुपए देता है. इसलिए उस ने कहा, ‘‘तुम रुपए तो ब्याज पर देते ही हो, मेरी बहन की शादी है, अगर कुछ रुपए मुझे भी ब्याज पर दे देते तो मेरी बहन की शादी अच्छे से हो जाती.’’

रामजीलाल ने कुछ सोचविचार कर कहा, ‘‘इस तरह की बातें यहां नहीं हो सकतीं. ऐसा करो, तुम मेरे घर आ जाओ. वहां बैठ कर आराम से बातें करेंगे.’’

धीरज को लगा कि रामजीलाल उसे पैसा देना चाहता है, इसीलिए उस ने उसे घर बुलाया है. अगले दिन वह रामजीलाल के घर पहुंच गया. उस ने रामजीलाल से पूछा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने कुछ सोचा?’’

‘‘किस बारे में?’’ रामजीलाल ने पूछा.

‘‘अरे वही पैसे के बारे में. मैं ने आप से बहन की शादी के लिए कुछ पैसों के लिए कहा था न.’’

‘‘अच्छा पैसा, वह तो मिल जाएगा. बताओ कितना पैसा चाहिए?’’

‘‘डाक्टर साहब, अगर 3 लाख रुपए मिल जाते तो मेरा काम हो जाता.’’ धीरज ने कहा.

रामजीलाल ने ब्याज पर रुपए देने के लिए ही जमीन बेची थी. रुपए उस के पास थे ही, इसलिए उस ने कहा, ‘‘रुपए तो मैं दे दूंगा, लेकिन समय से ब्याज देने के साथ रुपए भी जल्दी लौटाने की कोशिश करना.’’

‘‘डाक्टर साहब पैसा जल्दी लौटा दूंगा तो मेरा ही फायदा होगा न, इसलिए मैं कोशिश करूंगा कि जितनी जल्दी हो सके, आप के कर्ज से मुक्ति मिल जाए.’’ धीरज बोला.

इस के बाद रामजीलाल ने पत्नी को बुला कर 3 लाख रुपए लाने को कहा तो उस ने पूछा, ‘‘इतने रुपयों का क्या करोगे?’’

रामजीलाल ने धीरज की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘इन्हें पैसों की जरूरत है, इसलिए मैं इन्हें ब्याज पर ये रुपए दे रहा हूं. बहन की शादी करने के बाद धीरेधीरे यह मेरे रुपए लौटा देंगे.’’

रामजीलाल रुपए ब्याज पर देता ही था, इसलिए सुमन ने कोई ऐतराज नहीं किया. वह अंदर गई और रुपए ला कर दे दिए. रामजीलाल ने लिखापढ़ी कर के धीरज को रुपए दे दिए. धीरज का काम हो गया तो वह खुश हो कर चला गया. रामजीलाल को अपनी दुकानदारी से ही समय नहीं मिलता था, इसलिए वह अपने खेतों को पट्टे पर देता था. दूसरी ओर धीरज खेत पट्टे पर ले कर खेती करता था. धीरज से संपर्क बना रहे, इस के लिए रामजीलाल ने अपने खेत उस को पट्टे पर दे दिए. इस तरह उस का रामजीलाल के यहां आनाजाना हो गया.

रामजीलाल सुबह निकल जाता था तो अकसर देर शाम को ही लौटता था. इस बीच घर के काम सुमन और बच्चों को देखने पड़ते थे. लेकिन जब से धीरज उस के घर आनेजाने लगा था, जरूरत पड़ने पर वह उस की मदद कर देता था. बदले में सुमन उसे चायनाश्ता करा देती थी. खाने का समय होता तो खाना भी खिला देती. ऐसे में ही किसी दिन धीरज ने कहा, ‘‘भाभी, आप कितना काम करती हैं. इस के बावजूद डाक्टर साहब आप की परवाह नहीं करते?’’

सुमन ने उसे तिरछी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो वह हमारी परवाह नहीं करते. हमारे लिए ही तो वह सुबह से शाम तक भागते रहते हैं. जब शादी हो जाएगी तो तुम्हें भी अपने परिवार के लिए इसी तरह भागदौड़ करनी पड़ेगी.’’

दरअसल, रामजीलाल के घर आतेजाते धीरज का दिल सुमन पर आ गया था. इसलिए वह उसे फंसाने के लिए चारा डालने लगा था. सुमन की इस बात से वह निराश तो हुआ, लेकिन हिम्मत नहीं हारा. एक दिन सुमन को घर का सामान खरीदने के लिए बाजार जाना था. वह तैयारी कर रही थी कि तभी धीरज आ गया. सुमन को तैयार होते देख उस ने पूछा, ‘‘कहीं जा रही हो क्या भाभी?’’

‘‘घर का सामान खरीदना है, बाजार जा रही हूं. डाक्टर साहब के पास तो समय है नहीं, इसलिए मुझे ही जाना पड़ रहा है.’’ सुमन ने कहा.

‘‘आप अकेली क्यों जा रही हैं. मैं चलता हूं न आप के साथ.’’

सुमन को भला क्यों ऐतराज होता. वह धीरज के साथ मोटरसाइकिल से बाजार पहुंच गईं. सामान खरीद कर थैला धीरज ने उठाया तो सुमन हंसते हुए बोली, ‘‘इतने दिन शादी के हो गए, डाक्टर कभी मेरे साथ बाजार नहीं आए.’’

‘‘आप न होती तो शायद डाक्टर को रोटी भी न मिलती.’’ धीरज ने कहा.

धीरज सुमन को ले कर घर पहुंचा तो सुमन ने कहा, ‘‘मैं खाना बनाने चल रही हूं. अब खाना खा कर जाना.’’

धीरज बाहर बरामदे में पड़ी चारपाई पर लेट गया. सुमन ने उसे पहले चाय पिलाई. उस के बाद खाना बना कर खिलाया. धीरज मन ही मन सोचने लगा कि सुमन के दिल में जरूर उस के लिए कोई नरम कोना है, तभी तो वह उस का इतना खयाल रखती है. सवाल यह था कि वह उस के दिल की बात जाने कैसे? उसी दौरान धीरज अलीगढ़ गया. वहां हाथ से बनी चीजों की प्रदर्शनी लगी थी. वह प्रदर्शनी देखने गया तो वहां उसे एक दुकान पर एक जोड़ी झुमके पसंद आ गए.  उस ने उन्हें खरीद लिया. अगले दिन दोपहर को वह रामजीलाल के घर पहुंचा तो सुमन घर में अकेली मिल गई. सुमन ने धीरज को बैठाया, चायपानी पिलाया. इस के बाद उस ने झुमके की पुडि़या सुमन को थमा दी. सुमन ने पुडि़या खोली, झुमके देख कर बोली, ‘‘झुमके तो अच्छे हैं. किस के लिए लाए हो?’’

‘‘आप भी भाभी कमाल करती हैं. आप के हाथ में दिए हैं तो आप के लिए ही होंगे. कौन मेरी लुगाई बैठी है कि उस के लिए लाऊंगा.’’

‘‘मेरे लिए क्यों खरीद लाए भई?’’ सुमन ने कहा.

‘‘अच्छे लगे, इसलिए खरीद लाया. अब जरा पहन कर दिखाइए.’’

सुमन हंसते हुए अंदर गई और झुमके पहन कर बाहर आई तो धीरज बोला, ‘‘अरे भाभी, यह तो आप पर बहुत फब रहे हैं.’’

‘‘क्यों झूठी तारीफ करते हो.’’ शरमाते हुए सुमन ने कहा.

‘‘सच कह रहा हूं भाभी, डाक्टर साहब देखेंगे तो वह भी यही कहेंगे.’’

सुमन ने आह भरते हुए कहा, ‘‘डाक्टर साहब के पास इतना समय कहां है कि वह मुझे देख कर मेरी तारीफ करें. वह तो सिर्फ जानवरों को देखते हैं और उन्हीं की तारीफ करते हैं.’’

धीरज मुसकराया, क्योंकि सुमन की कमजोर नस उस के हाथ में आ गई थी. उस की समझ में आ गया कि पतिपत्नी के बीच पतली सी दरार है, जिसे वह कोशिश कर के चौड़ी कर सकता है. इस के बाद धीरज सुमन के करीब जाने की कोशिश करने लगा. सुमन को भी उस का आनाजाना और उस से बातें करना अच्छा लगने लगा था. लेकिन धीरज को अपनी मंजिल नहीं मिल रही थी. उसी बीच रामजीलाल ने धीरज से अपने रुपए लौटाने को कहा. धीरज इस से परेशान हो गया, क्योंकि उस के पास लौटाने के लिए रुपए नहीं थे.

सही बात तो यह थी कि अब उस की नीयत खराब हो चुकी थी. वह रामजीलाल के रुपए नहीं लौटाना चाहता था. इसलिए वह सुमन को जरिया बना कर रामजीलाल के रुपए मारने के बारे में सोचने लगा. ऐसा तभी संभव था, जब सुमन उस के कब्जे में आ जाती. लेकिन दिल की बात वह सुमन से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. एक दिन दोपहर को धीरज सुमन के घर पहुंचा तो सुमन ने कहा, ‘‘क्या इधरउधर मारेमारे फिरते हो, शादी क्यों नहीं कर लेते?’’

‘‘शादी…? भाभी अभी कुछ दिनों पहले ही तो मैं ने अपनी बहन की शादी की है. आप को तो पता ही है कि उस के लिए मैं ने डाक्टर साहब से कर्ज लिया था. अभी वही नहीं दे पाया. पहले उस से तो उऋण हो जाऊं, उस के बाद अपने बारे में सोचूं.’’

डाक्टर साहब के पैसों की चिंता मत करो.’’ सुमन ने तिरछी नजरों से ताकते हुए कहा, ‘‘तुम मुझे बहुत डरपोक लगते हो. जो मन में है, वह भी नहीं कह सकते.’’

‘‘भाभी, मैं ने आप की बात का मतलब नहीं समझा.’’

‘‘रात को आना, डाक्टर साहब आज रात घर में नहीं रहेंगे, तब समझा दूंगी.’’ सुमन ने मुसकराते हुए कहा.

धीरज का दिल एकदम से धड़क उठा. वह भाग कर घर गया और नहाधो कर रात होने का इंतजार करने लगा. लेकिन सूर्य था कि अस्त ही नहीं हो रहा था. किसी तरह शाम हुई तो वह गांव से चल पड़ा. नोहटी पहुंचतेपहुंचते अंधेरा हो चुका था. रामजीलाल के घर पहुंच कर उस ने धीरे से दरवाजा खटखटाया. सुमन ने दरवाजा खोला तो वह चोरों की तरह अंदर आ गया. घर में सन्नाटा था. शायद बच्चे सो चुके थे. सुमन उस का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई. वासना से वशीभूत सुमन भूल गई कि वह पति से बेवफाई करने जा रही है. धीरज को पता था कि सुमन ने उसे यहां क्यों बुलाया है. वह पलंग पर बैठ गया तो उस से सट कर बैठते हुए सुमन ने कहा, ‘‘मुझे तुम से प्यार हो गया है धीरज.’’

‘‘लेकिन डाक्टर साहब, अगर उन्हें पता चल गया तो…?’’

‘‘किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. तुम भी तो मुझ से प्यार करते हो न?’’

धीरज ने कुछ कहने के बजाय सुमन को बांहों में समेट लिया तो वह उस से लिपट गई. इस के बाद दोनों ने वह गुनाह कर डाला, जिस का अंजाम आगे चल कर बुरा ही होता है. रात दोनों की अपनी थी, क्योंकि घर का मुखिया घर में नहीं था, इसलिए उन्हें कोई डर नहीं था. लेकिन वे जिस दलदल में उतर गए थे, उस से वे चाह कर भी बाहर नहीं आ सकते थे. सुबह होते ही धीरज चला गया. दोपहर को रामजीलाल आया तो सुमन औंधे मुंह चारपाई पर लेटी थी. उसे समझते देर नहीं लगी कि पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है. उसे क्या पता कि वह रात की थकान उतार रही है.

धीरेधीरे सुमन और धीरज का प्यार परवान चढ़ने लगा. मौकों की कमी नहीं थी. रामजीलाल जानवरों के इलाज के लिए दूसरे गांवों में जाता ही रहता था. उसी बीच सुमन धीरज को घर बुला कर रंगरलियां मना लेती. डाक्टर को भले ही कुछ पता नहीं चल रहा था, लेकिन अगलबगल वाले तो देख ही रहे थे. पड़ोसियों को समझते देर नहीं लगी कि रामजीलाल की गैरमौजूदगी में धीरज के आने का मतलब क्या हो सकता है.

आखिर एक दिन किसी पड़ोसी ने रामजीलाल को रोक कर कह ही दिया, ‘‘भाई, कामकाज में इतना बिजी रहते हो कि घर का भी खयाल नहीं रख सकते?’’

‘‘मैं समझा नहीं, आप कहना क्या चाहते हैं?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘मेरा मतलब धीरज से है, आजकल वह तुम्हारे घर के कुछ ज्यादा ही चक्कर लगा रहा है.’’

पड़ोसी की बात सुन कर रामजीलाल सन्न रह गया. वह तुरंत घर पहुंचा और सुमन से पूछा, ‘‘धीरज यहां आता है क्या?’’

‘‘नहीं तो, किस ने कहा?’’ सुमन ने लापरवाही से कहा.

‘‘अगर अब आए तो उसे मना कर देना. गांव में उसे ले कर तरहतरह की चर्चाए हो रही हैं. मैं नहीं चाहता कि बिना मतलब हमारी बदनामी हो.’’

सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया. रामजीलाल इस बात को ले कर काफी परेशान था. वह महसूस कर रहा था कि पिछले कुछ समय से सुमन का व्यवहार उस के प्रति उपेक्षापूर्ण रहने लगा है. कहीं वह गुमराह तो नहीं हो गई. लेकिन उस ने आंखों से कुछ नहीं देखा था, इसलिए कोई फैसला कैसे कर सकता था. सुमन ने फोन कर के धीरज को सतर्क कर दिया कि वह कुछ दिनों तक उस से मिलने न आए, क्योंकि डाक्टर को शक हो गया है. अगले कुछ दिन ठीकठाक गुजर गए तो रामजीलाल लापरवाह हो गया. इस के बाद सुमन ने एक दिन धीरज को फोन कर के बुला लिया, क्योंकि उस दिन रामजीलाल को बाहर जाना था.

लेकिन रास्ते में रामजीलाल की तबीयत खराब हो गई, जिस से वह आधे रास्ते से ही लौट आया. गांव में घुसते ही पड़ोसी ने बताया कि धीरज घर के अंदर है. बेचैन रामजीलाल पड़ोसी की छत से घर के अंदर घुसा तो सुमन को धीरज की बांहों में पाया. रामजीलाल ने धीरज को पकड़ना चाहा, लेकिन वह छुड़ा कर भाग गया. इस के बाद उस ने सुमन की जम कर पिटाई की. मारपीट कर गुस्सा शांत हुआ तो वह सिर थाम कर बैठ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह इस चरित्रहीन औरत का क्या करे. अगर वह उसे उस के मायके भेज देता है तो बच्चों का क्या होगा, अपना कामकाज छोड़ कर वह उस की रखवाली भी नहीं कर सकता था.

सुमन ने खुद को संभाला और सोचने लगी कि उसे क्या करना चाहिए? अब वह धीरज को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहती थी और रामजीलाल का घर भी नहीं छोड़ना चाहती थी. क्योंकि जो सुखसुविधा यहां थी, वह धीरज कभी नहीं दे सकता था. वह तो वैसे ही कर्जदार था. उस ने पति से माफी मांगते हुए कहा कि उस से गलती हो गई, अब ऐसी गलती फिर कभी नहीं होगी. रामजीलाल के पास पत्नी को माफ करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था, इसलिए उस ने पत्नी को माफ कर के समझाया कि इस सब से बदनामी तो होगी ही, अपना ही घर बरबाद होगा.

दूसरी ओर धीरज की अब सुमन से मिलने जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन सुमन ने उस से कहा कि वह उस के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती. उस के बिना उस का जीवन नीरस हो जाएगा. दोनों ने अब घर के बाहर मिलनेजुलने का प्रोग्राम बनाया. बहाना कर के सुमन अलीगढ़ चली जाती, जहां उस से मिलने के लिए धीरज आ जाता. लेकिन वहां भी गांव के कई लोगों की नजरों में वे आ गए, जिस से रामजीलाल को इस की जानकारी हो गई. उस का विश्वास पत्नी पर से उठ गया था, वह उस के साथ अक्सर मारपीट करने लगा. इस के बाद रामजीलाल ने धीरज से अपने रुपए लौटाने को कहा. जबकि धीरज अब उस के रुपए लौटाने के मूड में नहीं था. एक दिन सुमन और धीरज मिले तो सुमन ने कहा, ‘‘धीरज, चलो हम कहीं दूर जा कर अपनी दुनिया बसा लेते हैं.’’

‘‘हम अपनी दुनिया तो बसा लेंगे, पर खाएंगेपहनेंगे क्या? इस के लिए हमें कुछ और सोचना होगा.’’ धीरज ने कहा.

रामजीलाल की गृहस्थी में ग्रहण लग चुका था. गांव वाले चुगली करते रहते थे. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी इस चरित्रहीन पत्नी का क्या करे. उसे अपने बच्चों का भविष्य बरबाद होता दिखाई दे रहा था. पतिपत्नी के लड़ाईझगड़े का असर बच्चों पर भी पड़ रहा था. जबकि सुमन रामजीलाल से छुटकारा पाना चाहती थी. उसी बीच एक रात रामजीलाल ने सुमन को फोन से बातें करते सुना तो मोबाइल छीन कर नंबर चैक किया. वह नंबर धीरज का था. उस ने कहा, ‘‘इतना सब होने पर भी तुम बाज नहीं आ रही हो?’’

सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया तो रामजीलाल को गुस्सा आ गया. उस ने सुमन को पीटते हुए कहा, ‘‘चरित्रहीन औरत, अब तू विश्वास लायक नहीं रही.’’

इस के बाद रामजीलाल ने मोबाइल का सिम निकाल कर तोड़ दिया. इस पर सुमन ने कहा, ‘‘यह तुम ने अच्छा नहीं किया.’’

पत्नी की इस हिमाकत से रामजीलाल ने फिर उस की पिटाई कर दी. इस के बाद तो सुमन ने तय कर लिया कि अब वह रामजीलाल को जिंदा नहीं छोड़ेगी. अगले दिन उस ने धीरज को फोन किया, ‘‘अब तुम्हारा क्या इरादा है, साफसाफ बताओ?’’

‘‘मेरी हालत तुम जानती ही हो, तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं? डाक्टर अपने रुपए मांग रहा है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं?’’

‘‘देखो धीरज, मैं तुम्हारी वजह से रोजरोज तो पिट नहीं सकती, इसलिए अब फैसला लेने का समय आ गया है. या तो तुम मुझे छोड़ दो या फिर कुछ ऐसा करो कि हम चैन से जी सकें.’’

‘‘तुम्हीं बताओ मुझे क्या करना चाहिए?’’ धीरज ने पूछा.

‘‘तुम कुछ ऐसा करो कि तुम्हें डाक्टर के 3 लाख रुपए भी न लौटाने पड़ें और मुझे उस से छुटकारा भी मिल जाए. उस के बाद हम चैन की जिंदगी गुजार सकते हैं.’’

‘‘लेकिन यह होगा कैसे?’’

‘‘सब आराम से हो जाएगा, तुम अपने साथियों के साथ डाक्टर को ठिकाने लगा दो. यह हमारे बीच दीवार की तरह है, यह अब मुझे बरदाश्त नहीं हो रहा है.’’

‘‘लेकिन कोई मुफ्त में यह काम क्यों करेगा. पैसों की जरूरत होगी, जो मेरे पास है नहीं.’’

‘‘पैसे मैं दे दूंगी. ढाई लाख रुपए मेरे पास है.’’

सौदा बुरा नहीं था. धीरज मन ही मन खुश हो गया. कर्ज से भी छुटकारा मिल जाएगा और प्रेमिका के साथ उस की संपत्ति भी मिल जाएगी. वह मजे करेगा. रामजीलाल को जिंदगी से छुटकारा दिलाने की योजना बन गई. धीरज अब ऐसे लोगों को तलाशने लगा, जो उस का साथ दे सकें. उस ने अपने दोस्त दिलीप तोमर को पैसों का लालच दे कर तैयार कर लिया. दिलीप के अलावा उस ने अपने गांव के सौरभ चमन और चरन सिंह को भी शामिल कर लिया. इस के बाद डाक्टर रामजीलाल की मौत का फरमान जारी कर दिया गया. वह इस बात से पूरी तरह बेखबर था. वह तो मोबाइल का सिम तोड़ कर निश्चिंत था कि सुमन अब धीरज से बात नहीं कर पाएगी. लेकिन वह नहीं जानता था कि घायल शेरनी कितनी खतरनाक होती है.

दूसरी ओर सुमन अपने व्यवहार में बदलाव ला कर पति का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही थी. रामजीलाल को लगा कि सब कुछ ठीक हो गया है. जबकि अब मामला और बिगड़ गया था. सुमन अब जल्दी से जल्दी रामजीलाल को मरवा कर निश्चिंत हो कर धीरज के साथ मौज करना चाहती थी. 8 फरवरी, 2015 को रामजीलाल घर पर ही था. तभी कुछ लोगों ने आ कर कहा कि नहलोई के रामेश्वर पंडित की भैंस बीमार है. उसे देखने के लिए उसे चलना है. शाम का समय था, रामजीलाल ने कहा, ‘‘आज तो मैं नहीं चल सकता, कल सुबह आ जाऊंगा.’’

‘‘नहीं डाक्टर साहब, भैंस बहुत ज्यादा बीमार है. नहलोई कौन सा ज्यादा दूर है. फिर आप को मोटरसाइकिल से ही तो चलना है.’’ उन्होंने कहा तो रामजीलाल तैयार हो गया. उस ने सुमन से बैग लाने को कहा.

सुमन ने बैग थमाते हुए कहा, ‘‘जितनी जल्दी हो सके लौट आना.’’

दोनों लोग रामजीलाल की मोटरसाइकिल पर बैठ गए. मोटर-साइकिल चल पड़ी तो 2 अन्य लोग दूसरी मोटरसाइकिल से उस के पीछे लग गए. देदामई और नहलोई के बीच एक बंबा है. वहां धीरज को देख कर रामजीलाल का माथा ठनका. साथ आए लोगों ने उस की मोटरसाइकिल रोकवा ली और उसे घेर कर खड़े हो गए.

‘‘यह सब क्या है?’’ रामजीलाल ने पूछा.

लड़कों ने हंसते हुए कहा, ‘‘अभी पता चल जाएगा.’’

रामजीलाल समझ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है. उस ने भागने की कोशिश की, लेकिन लड़कों में से किसी ने उस की कनपटी पर गोली मार दी. रामजीलाल गिर गया तो उन्होंने ईंटों से उस की खोपड़ी फोड़ दी. जब रामजीलाल की मौत हो गई तो सभी भाग खड़े हुए. रामजीलाल की लाश रात भर वहीं पड़ी रही. मोटरसाइकिल एक ओर खड़ी थी. सुबह कुछ लोगों ने लाश देखी तो पहचान लिया कि यह तो डा. रामजीलाल की लाश है. तुरंत थाना सासनी पुलिस को सूचना दी गई. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अरविंद प्रताप सिंह पुलिस बल के साथ रवाना हो गए. रामजीलाल के घर वालों को भी सूचना दे दी गई थी. थोड़ी ही देर में पूरा गांव वहां पहुंच गया. लोग हैरान थे कि आखिर रामजीलाल जैसे सीधेसादे आदमी को किस ने मार दिया.

लाश के कपड़ों की तलाशी में पुलिस को कुछ रुपए, गैस की कापी, पर्स आदि मिले, जिस से स्पष्ट हो गया था कि मृतक की हत्या लूट के लिए नहीं की गई थी. उस की मोटरसाइकिल भी खड़ी थी. पंचनामा कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर पुलिस थाने आ गई और मृतक के भाई राजीवर की ओर से हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया. राजवीर से पूछताछ में पता चला कि देदामई के धीरज कश्यप को रामजीलाल ने 3 लाख रुपए उधार दिए थे, जिन्हें वह लौटा नहीं रहा था. इस के लिए रामजीलाल और धीरज में कहासुनी भी हुई थी.

थानाप्रभारी अरविंद प्रताप सिंह को हत्या की वजह काफी नहीं लगी. अंतिम संस्कार के बाद वह रामजीलाल के घर पहुंचे तो सुमन का चेहरा पीला पड़ गया. वह रोने का नाटक करने लगी. सुमन के हावभाव ने उन्हें शक में डाल दिया. अरविंद प्रताप सिंह ने मुखबिरों का सहारा लिया. जिन से पता चला कि धीरज घर से गायब है. उसी बीच एक मुखबिर ने बताया कि रामजीलाल की पत्नी और धीरज के बीच नाजायज संबंध थे, जिस का डाक्टर विरोध कर रहा था. अब थानाप्रभारी को डाक्टर की हत्या का मजबूत कारण मिल गया. धीरज के ठिकानों पर छापा मारा गया, लेकिन वह पकड़ में नहीं आया. कोई अपराधी आखिर पुलिस से कब तक बच सकता है. मुखबिर की सूचना पर 14 फरवरी, 2015 को अलीगढ़ से धीरज और उस के साथी दिलीप तोमर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में पहले तो धीरज पुलिस को गुमराज करता रहा, लेकिन एसपी दीपिका तिवारी ने जब सख्ती से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि सुमन के साथ उस के नाजायज संबंध थे. उसी ने डाक्टर की हत्या के लिए उकसाया था और ढाई लाख की सुपारी भी दी थी. इस के बाद उस ने दिलीप तोमर, सौरभ चमन और चरन सिंह के साथ मिल कर रामजीलाल की हत्या कर दी थी. सुमन को पता चला कि पुलिस ने धीरज को गिरफ्तार कर लिया है तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. पुलिस उस की गिरफ्तारी के लिए घर पहुंची तो वह रोने का नाटक करने लगी. उसे गिरफ्तार कर के थाने लाया गया तो उस ने भी धीरज के साथ अपने संबंधों को स्वीकार करते हुए बताया कि धीरज और उस के बीच पति कांटे की तरह गड़ रहा था, इसलिए उस ने उस कांटे को निकलवा दिया था.

उसे क्या पता था कि वह मौज करने के बजाय जेल चली जाएगी. पुलिस ने गिरफ्तार सुमन, धीरज और दिलीप तोमर को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया, बाकी अभियुक्तों की तलाश कर रही है. Contract Killing

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित