Crime Story: औनलाइन चलता सेक्स रैकेट

Crime Story: 22 जनवरी, 2021 की बात है. 12 साल की मानसी पास की दुकान से चिप्स लेने गई थी. जब वह काफी देर बाद भी घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. घर वाले उस दुकानदार के पास पहुंचे, जिस के पास वह अकसर खानेपीने का सामान लाती थी. उन्होंने उस दुकानदार से मानसी के बारे में पूछा तो दुकानदार ने  बताया कि मानसी तो काफी देर  पहले ही चिप्स का पैकेट ले कर जा चुकी है.

जब वह चिप्स ले कर जा चुकी है तो घर क्यों नहीं पहुंची, यह बात घर वालों की समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने आसपास के बच्चों से उस के बारे में पूछा, लेकिन उन से भी मानसी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानसी गई तो गई कहां. उन्होंने उसे इधरउधर तमाम संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. तब उन्होंने इस की सूचना पश्चिमी दिल्ली के थाना राजौरी गार्डन में दे दी. चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया. पुलिस ने मानसी के पिता की तरफ से गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली.

डीसीपी (पश्चिमी दिल्ली) उर्विजा गोयल को जब 12 वर्षीय मानसी के गायब होने की जानकारी मिली तब उन्होंने थाना पुलिस को इस मामले में तीव्र काररवाई करने के आदेश दिए. डीसीपी का आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच के लिए एएसआई विनती प्रसाद के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी.

एएसआई विनती प्रसाद ने सब से पहले लापता बच्ची के घर वालों से उस के बारे में विस्तार से जानकारी ली. इतना ही नहीं, उन्होंने घर वालों से यह भी जानना चाहा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. घर वालों ने उन से साफ कह दिया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से मानसी को तलाशने लगी. जिस जगह से मानसी गायब हुई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस के अलावा स्थानीय लोगों से भी बच्ची के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी निगरानी कर दी, लेकिन कहीं से भी मानसी के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस टीम को जांच करतेकरते करीब 2 महीने बीत चुके थे. जब बच्ची कहीं नहीं मिली तो पुलिस ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल को ध्यान में रखते हुए केस की जांच शुरू कर दी. यानी पुलिस को यह शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची जिस्मफरोशी गैंग के चंगुल में फंस गई हो. इस बिंदु पर जांच करते करते पुलिस टीम ने कई जगहों पर दबिशें दीं, लेकिन लापता बच्ची का सुराग नहीं मिला.

करीब 2 महीने बाद पुलिस को सूचना मिली कि मानसी का अपहरण करने के बाद उसे दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रखा गया है और वहीं पर उस से जिस्मफरोशी का धंधा कराया जा रहा है. यह सूचना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी. क्योंकि मानसी की उम्र केवल 12 साल थी और इस उम्र में उस बच्ची के साथ जिस तरह का कार्य कराने की जानकारी मिली, वह मानवता को शर्मसार करने वाली ही थी.

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जांच अधिकारी विनती प्रसाद ने यह खबर अपने उच्चाधिकारियों को दी फिर उन्हीं के दिशानिर्देश पर पुलिस टीम ने 17 मार्च, 2021 को मजनूं का टीला इलाके में एक घर पर दबिश दी. मुखबिर की सूचना सही निकली. मानसी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने मानसी को सब से पहले अपने कब्जे में लिया. इस के बाद पुलिस ने वहां 2 महिलाओं सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया.

पुलिस ने उन सभी से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बड़े स्तर पर एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराते थे और उन का धंधा ज्यादातर वाट्सऐप ग्रुप और इंटरनेट के माध्यम से चलता है. उन के पास से पुलिस ने 5 मोबाइल फोन बरामद किए. फोनों की जांच की गई तो तमाम वाट्सऐप ग्रुप में ऐसी लड़कियों के अनेक फोटो मिले, जिन से वे जिस्मफरोशी कराते थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए हुए उन चारों लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से संजय राजपूत और कनिका राय मजनूं का टीला के रहने वाले थे जबकि अंशु शर्मा  मुरादाबाद का और सपना गोयल मुजफ्फरनगर की.

ये सभी औनलाइन सैक्स रैकेट चलाते थे. जांच में पता चला कि इन लोगों के काम करने का तरीका एकदम अलग था. यह गिरोह सोशल साइट पर ज्यादा सक्रिय था. गैंग के लोग 150 से ज्यादा वाट्सऐप ग्रुप में सक्रिय थे. एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराने वाली लड़की के फोटो ये वाट्सऐप ग्रुप में शेयर करते थे. इस के बाद ग्रुप से जो कस्टमर इन के संपर्क में आता था, उस से यह पर्सनल चैटिंग करने के बाद पैसों की डील फाइनल करते थे. फिर औनलाइन ही पेमेंट अपने खाते में ट्रांसफर कराने के बाद कस्टमर के बताए गए स्थान पर ये लड़की को सप्लाई करते थे.

इस तरह यह गैंग देश के अलगअलग बड़े शहरों में लड़कियों की सप्लाई करते था. इतना ही नहीं, फाइव स्टार होटलों में भी इन के पास से लड़कियां सप्लाई की जाती थीं. आरोपियों ने बताया कि उन के गैंग के सदस्य अलगअलग जगहों से लड़कियां उन के पास लाते थे. मानसी का भी गैंग के 2 लोगों ने अपहरण उस समय किया था, जब वह दुकान पर गई थी. उस का अपहरण करने के बाद वह उसे अपने घर पर ले गए थे.

उन्होंने मानसी से कहा था कि आज उन के यहां पर जन्मदिन है इसलिए वह बच्चों को इकट्ठा कर के केक काटेंगे. उन्होंने मानसी को केक खाने को दिया. केक खाते ही मानसी को नशा हो गया. इस के बाद दोनों मानसी को मजनूं का टीला ले गए, वहां पर संजय राजपूत, अंशु शर्मा, सपना गोयल और कनिका राय मिली. 12 साल की बच्ची को देख कर ये चारों खुश हो गए कि अब इस से मोटी कमाई की जा सकती है. क्योंकि वह तो उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ रहे थे.

जब मानसी पर हल्का नशा सवार था, तभी उस के साथ रेप किया गया. होश आने पर मानसी दर्द से कराहती रही. इस के बाद भी इन लोगों को उस पर दया नहीं आई. उन्होंने उसी रात उसे किसी दूसरे ग्राहक के सामने पेश किया. इस तरह वह मानसी का शारीरिक शोषण करते रहे. जब वह विरोध करती तो ये लोग उसे प्रताडि़त करते थे. इस तरह मानसी इन लोगों के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी थी. वहां से निकलने का उस के पास कोई उपाय नहीं था.

आरोपियों के 2 अन्य साथी फरार हो चुके थे. पुलिस ने उन की तलाश में अनेक स्थानों पर दबिश दी, लेकिन उन का पता नहीं चला. आरोपी 35 वर्षीय संजय राजपूत, 21 वर्षीय अंशु शर्मा, 24 साल की सपना गोयल और 28 साल की कनिका राय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभियुक्तों के पास से बरामद की गई 12 वर्षीय मानसी को पुलिस ने उपचार के लिए अस्पताल में भरती करा दिया. मानसी ने अपने साथ घटी सारी घटना पुलिस को बता दी.

आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस गंभीरता से इस बात की जांच करने में जुट गई. इस गैंग के तार देश में किनकिन लोगों से जुड़े थे और इन्होंने अब तक कितनी लड़कियों का अपहरण किया था. Crime Story

(कथा में मानसी परिवर्तित नाम है)

Agra News: मिटा दिया साया – पिता बने भविष्य पर बोझ

Agra News: रात लगभग 2 बजे सुनील कुमार के घर में कोहराम मच गया. बरामदे में सुनील कुमार की लहूलुहान लाश पड़ी थी. लाश के पास में ही उस की पत्नी आशा देवी बैठी रो रही थी. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए. बेटे अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया कि रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था. अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचा. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया.

पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

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44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज और 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया.

पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था.

हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस थाने ले लाई. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वह वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी सुनील पर कोई असर नहीं हुआ.

इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी. संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली.

अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वह उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं. यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा.

सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए. उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया.

पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: अधूरी औरत

Hindi Stories: मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछली तरफ शीशम के पेड़ के नीचे बैठी देखा था…

स्वा स्थ्य विभाग ने मेरी बदली नसीरपुर कर दी. मुझे पता चला कि 3 घंटे का सफर बस से, और आगे एक घंटा तांगे से जाना होगा. मैं ने अपने आने की खबर भिजवा दी और कोई 2 बजे के करीब बस में सवार हो गया. मेरा खयाल था कि शाम तक गांव पहुंच जाऊंगा, मगर यह सब गलत हो गया. जिस बस में मैं सवार था, वह इतनी भरी हुई थी कि बाद में चढ़ने वाले लोगों को खड़े होने की भी मुश्किल से जगह मिली थी.

बरसात का मौसम था. मैं ने किताब निकाली और पढ़ने लगा. किताब में मैं इस कदर खोया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि बस कहांकहां रुकी. जब बस एक जगह अचानक झटके खाने के बाद रुक गई तो मुसाफिरों में खलबली सी मची और शोर होने लगा. तब मैं ने चौंक कर पूछा कि क्या मामला है? मालूम हुआ कि बस में खराबी आ गई है. क्लीनर खराब हुए पुर्जे को ठीक कराने के लिए वापस 6 मील ले जाएगा. मुसाफिरों में काफी बेदिली फैली, मगर अब इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं था. मुसाफिर बस से उतर कर इधरउधर टहलने लगे. मैं भी वक्त गुजारने के लिए इधरउधर घूमता रहा.

क्लीनर साहब की वापसी रात 9 बजे के करीब हुई और 10 बजे के करीब बस ने दोबारा सफर शुरू किया. जब बस बसअड्डे पर पहुंची तो वहां कोई तांगा मौजूद नहीं था. अब मेरे पास कस्बे तक पैदल मार्च करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने सामान कंधे पर डाला और पैदल ही चल पड़ा. अब तक देर इतनी हो गई थी कि बारबार यह खयाल आ रहा था कि कहीं चौकीदार क्लीनिक में इंतजार कर के चला न गया हो. उस वक्त मौसम अचानक खुशगवार हो गया था. ठंडी हवा चलने लगी, कभीकभी बिजली भी चमक उठती. बारिश किसी भी वक्त शुरू हो सकती थी.

मैं तेजतेज कदम उठाने लगा. जैसे ही कस्बा नजर आया, बूंदाबांदी शुरू हो गई. क्लीनिक कस्बे से बाहर पक्की इमारत में था. मैं तकरीबन दौड़ता हुआ क्लीनिक पहुंचा, मगर वही हुआ, जिस का डर था. चौकीदार इंतजार कर के जा चुका था. शायद उसे अब मेरे आने की उम्मीद नहीं रही होगी. मैं बरामदे में खड़ा हो कर सोचने लगा. थोड़े फासले पर एक हवेली नजर आई. बाकी मकान ज्यादातर कच्चे थे. अब तक बारिश काफी तेज हो गई थी. इस तरह बरामदे में खड़े हो कर रात गुजारना मुश्किल था. मैं ने सोचा, क्यों न हवेली में रात बिताई जाए.

मैं बारिश में भीगता हुआ हवेली पर जा पहुंचा और जोरजोर से गेट खटखटाने लगा. काफी देर तक किसी ने गेट नहीं खोला. दरअसल गेट से काफी आगे जा कर कमरे थे. इसलिए शायद आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी. मैं बारिश में भीग गया था. मैं हवेली के पीछे चला गया. वहां जानवर बंधे थे. मैं उन के बीच से गुजरता हुआ आगे बढ़ने लगा. अचानक मेरी नजर एक औरत पर पड़ी. वह अर्धनग्न अवस्था में शीशम के पेड़ के नीचे बैठी थी. आंखें उस ने बंद कर रखी थीं और होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदा रही थी. औरत जवान और खूबसूरत थी. मैं ने फौरन अपनी निगाहें फेर लीं और वापस हो लिया.

मैं सख्त हैरान था कि आधी रात के वक्त वह दरख्त के नीचे क्या कर रही थी. भूतप्रेत पर मुझे यकीन नहीं था. उस वक्त मैं ने मुनासिब नहीं समझा कि आगे बढ़ कर उस औरत से कुछ पूछूं. मैं वापस क्लीनिक पर आ गया. वह रात मैं ने बरामदे में बैठ कर बिता दी. इस बीच मेरे दिमाग पर उस औरत के बारे में जानने का भूत सवार हो गया. गांव नसीरपुर की जिंदगी किसी ऐसे गरम मकान में रहने की तरह थी, जिस की दीवारें नजर नहीं आतीं. ऐसा महसूस होता था, जैसे वह हुकूमत की भूलीबिसरी बस्ती हो. गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित था. मच्छर इस कदर थे कि चाहे कितनी भी मात्रा में कुनैन का इस्तेमाल क्यों न कर लो, बुखार जरूर हो जाता था. बुखार भी ऐसा, जो आदमी की सारी ताकत खत्म कर देता था.

शुरू में इक्कादुक्का मरीज बुखार की शिकायत ले कर आते रहे. क्योंकि ज्यादातर लोग डाक्टरी इलाज को मानते ही नहीं थे. इसी दौरान गांव की मसजिद के मौलवी साहब बहुत सख्त बीमार हो गए. उन की टांग पर एक पुराना जख्म था, जिस की वजह से उन्हें बुखार रहने लगा. सब लोग जहरबाद समझते रहे. मैं ने मौलवी साहब का इलाज किया. पहले एक छोटा सा औपरेशन किया, फिर इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए. मौलवी साहब की सेहत बहाल होने लगी. गांव से हो कर मेरी चर्चा आसपास के गांवों तक जा फैली तो दूरदूर से लोग आने लगे. इस से पहले गांव वालों का इलाज काका करता था.

काका गांव का नाई था. वह जर्राह भी था. यह सब कुछ उस ने अपने बाप से सीखा था. जर्राह से ज्यादा वह मुझे मालिशिया लगता था, क्योंकि वह ज्यादातर लोगों का इलाज मालिश से किया करता था. सिरदर्द में सिर की मालिश, पेट के दर्द में भी वह मरीज को लिटा कर तेल से पेट की मालिश करता था. चोट की हालत में भी मालिश करता. गांव वालों के इसरार पर उस ने दांत भी उखाड़ने शुरू कर दिए थे. जब 2-3 आदमियों के दांत उस ने गलत उखाड़ दिए तो मैं ने उस को जा कर समझाया कि अब बस कर दे.

एक वक्त में इतने ज्यादा काम तो शहर के डाक्टर भी नहीं करते. वहां भी अब हर बीमारी का स्पैशलिस्ट होता है. यही बड़े डाक्टर की पहचान है. उस ने दांत का डाक्टर बनने का खयाल छोड़ दिया और सिर्फ हड्डियों और जर्राही का स्पैशलिस्ट बनने पर संतोष कर लिया. उस गांव के चौधरी मलिक अल्लाहबख्श थे. गांव वालों का कहना था कि वह बहुत नेक इंसान थे. उस गांव के लोग ही नहीं, आसपास के गांव वाले भी उन की बड़ी इज्जत करते थे. उन की उम्र कोई 70 बरस के करीब थी. अब वह अक्सर बीमार रहते थे. 1-2 बार इलाज के सिलसिले में मुझे उन की खिदमत में हाजिर होना पड़ा था. वह मेरी बड़ी इज्जत करते थे. कभीकभी वैसे भी गपशप के लिए हवेली में बुला लेते थे.

हवेली में उन के बेटे से भी मुलाकात हुई. उस का नाम था मलिक असद. वह 30-35 बरस का मजबूत कदकाठी का आदमी था. उस के बाल घुंघराले और आंखें स्याह थीं. रंग सांवला था. चेहरा सख्त था. वह तबीयत का भी बड़ा जालिम था. मैं ने खुद उसे 1-2 बार हवेली में मजदूरों की पिटाई करते देखा था. गांव के लोग उस से डरते थे और उसे बुरा कहते थे. एक दिन बड़े चौधरी साहब ने बुला भेजा. नौकर ने मुझे एक बड़े से कमरे में ले जा कर बिठाया. उस कमरे में बहुत सी कुर्सियां और मोढ़े रखे थे. जब भी गांव का कोई मसला खड़ा होता, चौधरी वहीं सब को इकट्ठा करते थे. चौधरी साहब आए और बेंत से बनी आरामकुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी देर वह कुछ सोचते रहे, फिर बड़ी राजदारी से बोले, ‘‘डाक्टर पुत्तर, मेरी बहू बीमार है. अजीब सी बीमारी है. उसे कुछ पता नहीं चलता. कभी तो वह बिलकुल ठीक होती है, कभी वह पूरापूरा दिन कमरे में सोई पड़ी रहती है. जब जागती है तो सब से झगड़ने लगती है. मैं उस की वजह से बहुत परेशान हूं. मेरा दिल कहता है, तुम उस का इलाज कर सकते हो.’’

‘‘चौधरी साहब, आप अल्लाह पर भरोसा रखें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा. आप मुझे मरीज दिखाएं.’’

मैं वाकई दिल से बड़े चौधरी की इज्जत करता था. चौधरी साहब मुझे पहली बार हवेली के अंदर ले गए. वह एक बैडरूम था. कमरे में एक दीवान और 2-3 कुर्सियां पड़ी थीं. एक बैड था, जिस पर एक औरत लेटी थी. जैसे ही चौधरी साहब ने उसे सीधी किया, मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछवाड़े पेड़ के नीचे देखा था. मैं ने अपने आप पर काबू पाया और सोचने लगा कि यह औरत चौधरी की बहू है यानी मलिक असद की बीवी है. यह उस रात क्या कर रही थी? मेरी दिलचस्पी, जाहिर है, अपनी चिंता को पहुंच गई थी.

औरत बेसुध पड़ी थी. मैं ने और चौधरी साहब ने उसे जगाने की पूरी कोशिश की, मगर वह नहीं जागी. जाहिर तौर पर उसे कोई बीमारी नजर नहीं आ रही थी. बुखार भी नहीं था. मैं ने सुई चुभो कर देखी तो वह तकलीफ महसूस कर रही थी. ब्लडप्रेशर कुछ कम था, मगर उस की सूजी हुई आंखें मुझे शक में डाल रही थीं. मैं ने उस के खून का नमूना ले कर चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप फिक्र न करें. मैं खून टेस्ट करने के बाद ही आप को बता सकूंगा कि इन्हें क्या तकलीफ है. आप इस दौरान इन्हें कोई दवा न दें. खास ध्यान रखें कि यह कोई भी चीज न खाएं. सुबह इन को क्लीनिक भेज दें, तब तक ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट मेरे सामने होगी.’’

चौधरी साहब की हवेली से निकलने के बाद मेरे जेहन में यही बात बारबार आ रही थी कि यह औरत नशा जरूर करती है. मैं ने क्लीनिक आते ही खून टेस्ट करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं खुद उस गुत्थी को सुलझाना चाहता था. खून की रिपोर्ट से जाहिर हो गया कि चौधरी की बहू को नशे की लत पड़ चुकी थी. यह जान कर मुझे खुद भी अफसोस होने लगा. बहरहाल मैं खुद को कल के लिए तैयार कर चुका था. अगले दिन मैं शाम तक इंतजार करता रहा, मगर चौधरी की बहू क्लीनिक पर नहीं आई. इस का मतलब साफ था कि वह खुद आना नहीं चाहती थी और उसे अपनी इस आदत के जाहिर होने का अंदेशा था. लेकिन उस नशे से वह मौत के मुंह में जा सकती थी.

शाम को मैं चौधरी साहब से मिलने गया. उन्हें बताया कि मरीजा क्लीनिक पर नहीं आई तो वह बहुत हैरान हुए. उन्होंने नौकरानी को बुला कर बुराभला कहा और फिर खुद जा कर बहू को लिवा लाए. उस वक्त वह बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थी. उस के रखरखाव में एक खास शान थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं, जिन में एक खास किस्म की वहशत और गुस्सा था. उस के खुश्क होंठ एकदूसरे से जुडे़ थे. वह अपने चेहरे पर आई जुल्फों की लट सिर के झटके से बारबार पीछे की तरफ लौटाती रही. वह खामोश बैठी रही, जैसे किसी से बात करना ही न चाहती हो.

मैं ने जरा हौसले के साथ उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा, ‘‘अब आप की तबीयत कैसी है?’’

उस ने अपनी पलकें उठाईं और मेरी तरफ देखा. मैं आज तक उन आंखों को नहीं भूल सका. उस की आंखों में एक अजीब सी मस्ती थी, जैसे इंद्रधनुष आंखों में उतर आया हो. उस ने बड़ी अदा से कहा, ‘‘मेरी तबीयत पहले से बेहतर हो रही है. मुझे किसी दवा की जरूरत नहीं.’’

यह कह कर वह उठी और तेजी के साथ दरवाजे से बाहर निकल गई. मैं ने हैरत से चौधरी साहब की तरफ देखा. वह भी मेरी तरफ देख रहे थे. उन के चेहरे पर गुस्से और शर्मिंदगी के आसार साफ नजर आ रहे थे. मैं चूंकि सूरतेहाल को समझने लगा था, इसलिए मैं ने चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप की बहू को कोई घरेलू परेशानी है. है तो यह आप के घर का मसला, लेकिन डाक्टर के लिए यह सब जानना बहुत जरूरी होता है. आप जब तक मुझे सब कुछ बताएंगे नहीं, मेरे लिए उन का इलाज करना मुश्किल हो जाएगा.’’

पहले तो चौधरी साहब परेशान नजर आने लगे. जोरजोर से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, जैसे किसी फैसले पर पहुंच रहे हों. फिर उन्होंने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मेरी बहू दरअसल बांझ है. 5 साल शादी को हो गए हैं, मगर औलाद नहीं हुई. बेचारी बड़ी परेशान रहती है. जब से मलिक असद की दूसरी शादी की तैयारी की बात सुनी है, बहुत चिड़चिड़ी हो गई है. बातबात पर लड़तीझगड़ती है. कमरा बंद कर के दिन भर पड़ी रहती है.’’

‘‘चौधरी साहब, आप की बहू कोई दवा इस्तेमाल कर रही है, जो अगर जल्दी बंद न की गई तो बहुत देर हो जाएगी. इस से उस की जिंदगी को भी खतरा हो सकता है. आप पता कराएं कि वह क्या चीज खा रही है. घर के किसी न किसी शख्स को तो पता ही होगा. आखिर वह दवा या कोई और चीज कहीं से तो खरीदी जाती है.’’

मेरी बात सुन कर चौधरी साहब ने जोरजोर से ‘रज्जो…रज्जो…’ पुकारना शुरू कर दिया. एक लड़की भागीभागी दरवाजे से दाखिल हुई. रज्जो चौधरी साहब की नौकरानी का नाम था. वह घबराई हुई चौधरी साहब को देखने लगी. मैं ने उसे संभलने का मौका दिए बगैर जोर से कहा, ‘‘रज्जो, जो दवा तुम बीबीजी को ला कर देती हो, वह शीशी ले कर आओ.’’

वह बौखला कर बोली, ‘‘जी…नहीं, मैं नहीं ला कर देती. वह खुद मेरे साथ जा कर मलंग बाबा से लाती हैं. कसम कुरान की, मलंग बाबा पुडि़या पर दम कर के बीबी जी को देते हैं.’’

मेरा चलाया हुआ तीर निशाने पर सीधा जा लगा था. मैं ने नरम पड़ते हुए कहा, ‘‘जाओ, एक पुडि़या ला कर मुझे दिखाओ. खबरदार, बीबीजी को पता न लगे.’’

रज्जो ने चौधरी साहब की तरफ देखा. चौधरी साहब ने इशारा किया तो वह चली गई. कोई एक घंटे बाद रज्जो ने हमें वह पुडि़या लाकर दी. मैं उस पुडि़या को ले कर क्लीनिक आ गया. वह अफीम की पुडि़या थी. उस से साफ जाहिर था कि मलंग बाबा कोई धोखेबाज था और चौधरी की बहू को नशे की आदी बना रहा था. मैं उसी वक्त हवेली वापस आया, क्योंकि मलंग बाबा का अड्डा बंद कराना न सिर्फ नेकी का काम था, बल्कि लोगों को मौत के मुंह से निकालना भी था.

चौधरी साहब को जैसे ही सूरतेहाल मालूम हुई, उन्होंने तांगे का बंदोबस्त किया और हम पुलिस चौकी चल दिए. पुलिस चौकी कस्बे से 3 मील के फासले पर थी. चौकी का इंचार्ज चौधरी से परिचित था. उसे हालात बताए गए तो उस ने फौरन एक छापामार पार्टी के साथ रात को मलंग बाबा के अड्डे पर धावा बोल दिया.  मलंग बाबा और उस के 2 नौजवान साथी गिरफ्तार हुए. उन के अड्डे से अफीम बरामद हुई. अगले दिन पुलिस से पता चला कि मलंग बाबा जेल से भागा हुआ फरार कैदी था. एक साल से वह भेष बदल कर यह धंधा कर रहा था. गांव के लोगों को ताबीज के बहाने अफीम दे कर बेवकूफ बना रहा था. चौधरी की बहू से तो वह खूब रकम हथिया रहा था.

जैसे ही चौधरी की बहू की अफीम की खुराक बंद हुई, उस का सारा बदन टूटने लगा. बुखार में जिस्म तपने लगा. उस की आंखों में खौफ छा गया. वह मेरे पांव पड़ती कि मैं उस को अफीम दे दूं या मौत का टीका लगा दूं. उस के शरीर की दुर्दशा देख कर और बुखार की तपिश को कम करने के लिए मैं कभीकभी उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता, मगर जब वह जागती तो फिर वैसे ही तड़पने लगती. मैं ने और बड़े चौधरी साहब ने कई रातें उस के बिस्तर के पास बैठ कर गुजार दीं. इस बीच मैं ने देखा कि चौधरी का बेटा मलिक असद न तो उस की परवाह करता था और न ही उस के पास ठहरता था. यह मेरे लिए बड़ी हैरत की बात थी.

मेरे दिल में उस के लिए नफरत के जज्बात उभरने लगे. उन दिनों चौधरी साहब तख्तपोश पर बैठे रहते और मैं मरीजा के सिरहाने बेबस हो कर बैठा रहता. मेरे हाथ चौधरी साहब ने वैसे ही बांध रखे थे. मैं उसे अस्पताल नहीं ले जा सकता था, जहां उसे बचाने की कोशिश की जाती. मैं बाहर से किसी मदद का इंतजाम भी नहीं कर सकता था, क्योंकि यह चौधरी की इज्जत का मामला था. मैं सिर्फ अपनी जानकारी के मुताबिक इलाज करता रहा, मगर शायद अल्लाह ने चौधरी साहब की दुआएं सुन ली थीं. 10 दिनों के बाद उन की बहू की हालत में तब्दीली आनी शुरू हो गई. वह संभलने लगी. अब वह न तो जिद करती और न ही उठउठ कर भागती और न शोर मचाती. उसे सुकून आना शुरू हो गया.

अब उस ने मेरी तरफ बड़ी एहसानमंद निगाहों से देखना शुरू कर दिया. उस की हालत को पूरी तरह संभलने में 3 महीने लग गए. इस दौरान मैं हर रात चौधरी साहब की हवेली में जाता रहा. मैं ने महसूस किया कि छोटा चौधरी कईकई दिनों और रातों को घर से गायब रहता था. एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों से फारिग हुआ ही था कि चौधरी साहब की बहू अपनी नौकरानी के साथ क्लीनिक में तशरीफ ले आई. पहले तो वह कुछ देर खामोश बैठी रही, फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आपने मुझे दोबारा जिंदगी दी है, लेकिन आप ने ऐसा क्यों किया? मैं तो खुद अपनी जिंदगी खत्म करना चाहती थी. आप ने मुझे बचा कर मेरे दुख के सफर को और लंबा कर दिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप को अपना मसीहा कहूं या दुश्मन?’’

मिसेज मलिक असद की बातें सुन कर पहले तो मैं एक लम्हे के लिए चुप रह गया. लेकिन मैं ने बाद में हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मिसेज मलिक, मेरा कोई कमाल नहीं. कुदरत को यही मंजूर था. अल्लाह ने आप को दोबारा जिंदगी दी है. वही इस के भेद जानता है. वैसे आप इतनी मायूस क्यों हैं?’’

मिसेज मलिक ने मेरी तरफ देख कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने मुझे मौत के मुंह से निकाला है तो मैं आप को बताना चाहती हूं कि कई बार आदमी उन हालात से दोचार हो जाता है, जहां आगे कोई रास्ता नहीं होता. वह जीना नहीं चाहता. मैं किस के लिए जीऊं? आप को पता है कि औरत मां बन कर ही पूरी औरत बनती है.’’

मैं चाहता था कि वह अपने दिल का दर्द खुल कर कह दे. एक तो उस के अंदर का गुबार निकल जाएगा, दूसरे शयद इस मामले में मैं कोई मदद कर सकूं. मैं ने बात बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप बताएं आप को क्या दुख है? अल्लाह ने आप को सेहत बख्शी है तो आप की दूसरी तकलीफें भी रफा कर देगा.’’

मेरी बातों का यह असर हुआ कि उस ने बिलखबिलख कर रोना शुरू कर दिया. फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आज से 5 साल पहले बडे़ चौधरी साहब ने बड़े अरमानों से मुझे अपनी बहू बनाया था. मगर आज सोचती हूं कि काश, मेरी शादी न हुई होती. एक साल तो हंसीखुशी से गुजर गया, लेकिन उस के बाद मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. चौधरी के तमाम रिश्तेदार और गांव के तमाम लोगों की नजरें मुझे तीर की तरह चुभने लगीं.

‘‘जो लोग मेरे आगेपीछे फिरते थे, वही मुझे ताना देने लगे कि मैं बांझ हूं. पहले छोटा चौधरी, फिर घर वाले और जब बड़े चौधरी ने भी आंखें फेर लीं तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. मैं ने कोई पीरफकीर न छोड़ा. दूरदूर तक तावीज करवाए, मगर मेरे यहां बच्चा न हुआ.

‘‘फिर उस मलंग बाबा ने मुझे अफीम पर लगा दिया. मुझे भी नशे में रहना अच्छा लगने लगा. अब आप ने मुझ से वह भी छीन लिया. खुदा के लिए मुझे जहर ही दे दें. अगले माह छोटे चौधरी की दूसरी शादी होने वाली है. मैं इस से पहले अपने आप को खत्म करना चाहती हूं. अब आप खुद बताएं, मैं आप को हमदर्द कहूं या दुश्मन?’’

चौधरी की बहू की बातें सुन कर मेरे दिल में भी उस के बारे में हमदर्दी के जज्बात उभरने लगे. अगर खुदा ने उस को औलाद की दौलत नहीं दी तो इस में उस बेचारी का क्या कसूर? इस के बावजूद मैं ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप मायूस क्यों होती हैं? अल्लाह बड़ा कारसाज है. आप ने इस सिलसिले में कोई इलाज करवाया है? अब तो जमाना बहुत तरक्की कर गया है. आप शहर जा कर इलाज करवाएं. सब ठीक हो जाएगा इंशाअल्लाह.’’

मेरी बातें सुन कर मिसेज मलिक ने बड़ी उदासी से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब क्या फायदा? अब तो उस के दिन भी तय होने वाले हैं.’’

‘‘आप ऐसा करें कि शहर में एक तजुर्बेकार लेडी डाक्टर मेरी परिचित हैं. आप उन से जांच करवाएं और रिपोर्ट मुझे ला कर दें. आप इस काम के लिए फौरन, बल्कि कल ही शहर चली जाएं.’’

पहले तो मिसेज मलिक टालमटोल से काम लेती रहीं, मगर मेरे मजबूर करने पर उन्होंने वादा कर लिया.

तीसरे दिन मिसेज मलिक बड़ी खुशखुश मेरे क्लीनिक में आईं और लिफाफा मेरे हाथ में दे कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब बताएं कि मैं क्या करूं?’’

मैं ने लिफाफा खोला और रिपोर्ट पढ़ने लगा. साथसाथ मेरी हैरत में इजाफा होता चला गया, क्योंकि रिपोर्ट में डाक्टर ने लिखा था कि मिसेज मलिक में किसी किस्म का कोई नुक्स नहीं है. अगर औलाद नहीं हो रही है तो उन के शौहर की जांच करवाई जाए. इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद हम दोनों एकदूसरे की तरफ हैरत से देख रहे थे. मिसेज मलिक की आंखों में आंसू थे और मैं सोचने लगा था कि यह औरत नासमझी में अपने आप को कितनी बड़ी सजा दे रही थी, बल्कि अपनी जान तक देने पर तैयार थी. मैं ने मिसेज मलिक को तसल्ली दी.

अगले दिन मैं हवेली गया. मैं छोटे चौधरी से तनहाई में बात करना चाहता था, मगर पता चला कि वह हवेली में मौजूद नहीं था. मैं पैगाम दे कर लौट आया कि जब छोटे चौधरी आएं तो मुझे खबर भेज दें.

रात को छोटे चौधरी से मुलाकात हुई. मैं ने बड़ी नरमी से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘चौधरी साहब, आप के यहां औलाद नहीं हुई. आप को इस बारे में पता है कि इस की क्या वजह है?’’

यह सुनते ही चौधरी के तेवर बदलने लगे. उस के चेहरे की लकीरें गहरी होने लगीं और वह बड़े गुस्से से बोला, ‘‘डाक्टर, मुझे पता है, मेरी बीवी बांझ है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं. यह हमारा निजी मामला है.’’

‘‘नहीं चौधरी साहब, आप को यही तो गलतफहमी है. आप की बीवी बिलकुल ठीक है. वह बच्चा पैदा करने की पूरी खूबी रखती है. आप को अपना इलाज करवाना होगा.’’

मेरे यह कहने की देर थी कि चौधरी आगबबूला हो गया, ‘‘डाक्टर, यह बात अब दोबारा नहीं कहना, नहीं तो तुम्हारी लाश किसी को नहीं मिलेगी. और दित्तू, डाक्टर को हवेली से बाहर निकाल दे.’’

इस से पहले कि मैं कुछ कहता, 2 आदमियों ने मुझे बांहों से घसीट कर हवेली से बाहर कर दिया. मैं चौधरी की बेवकूफी पर अफसोस करता हुआ क्लीनिक वापस आ गया. सारी रात मुझे नींद नहीं आई. मैं सोचता रहा कि ये लोग कितने बेवकूफ हैं. इन के भले की बात भी इन को बुरी लगती है. अगले दिन मैं ने मिसेज असद मलिक से उन लोगों का पता पूछा, जहां चौधरी असद मलिक की शादी हो रही थी. वह कस्बा नसीरपुर गांव से 15 मील दूर था. लड़की का वालिद नंबरदार था. उम्र 60 साल थी. बीवी की मौत हो गई थी. 1 बेटी और 2 बेटों की शादी हो गई थी. सिर्फ 1 ही बेटी रह गई थी. मैं ने नंबरदार यूसुफ को अपना परिचय दिया तो वह बड़ी भलमनसाहत से पेश आया.

मैं ने नंबरदार से अर्ज की, ‘‘आप की बेटी की शादी मलिक असद से तय हो गई है और जल्दी ही शादी भी होने वाली है. आप की जानकारी में यह बात भी जरूर होगी कि चूंकि मलिक असद की पहली बीवी से औलाद नहीं है, इसीलिए वह दूसरी शादी कर रहे हैं. मगर मैं डाक्टर होने के नाते अपना फर्ज समझता हूं कि आप को सच्चाई से आगाह कर दूं. मलिक असद की बीवी बांझ नहीं है. वह पूरी तरह सेहतमंद है और औलाद पैदा करने के काबिल है. मेरे पास इस का सबूत मौजूद है. अगर आप इस बात को बुनियाद बना कर शादी कर रहे हैं तो अपनी बेटी की जिंदगी में कांटे बो रहे हैं. आप मेरी बात समझ गए होंगे. मैं ने अपना फर्ज अदा कर दिया है. अब आप जैसा मुनासिब समझें, फैसला करें.’’

मेरी बातें सुन कर नंबरदार परेशान हो गया. काफी देर चुपाचाप हुक्का पीता रहा. फिर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आप के कहने का मतलब है कि मलिक असद ही औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है?’’

‘‘मेरा मतलब है कि मलिक असद को इलाज की जरूरत है. अगर वह इलाज करवा ले तो उस की पहली बीवी से औलाद हो सकती है. अगर दूसरी शादी सिर्फ औलाद की खातिर हो रही है तो आप पहले छानबीन कर लें.’’

नंबरदार सिर झुका कर सोचता रहा. फिर कहने लगा, ‘‘ठीक है डाक्टर साहब, मैं ने आप की बात सुन ली है. आप की मेहरबानी कि आप ने ये बातें बता दीं. मैं सोच कर जवाब दूंगा.’’

मैं नंबरदार को सलाम कर के खुशखुश वापस आ गया. दूसरे दिन जब मैं ने मिसेज मलिक को सारी बातें बताईं तो वह भी बहुत खुश हुई और उस की आंखों में मेरे लिए शुक्रगुजारी के आंसू आ गए. मैं ने उसे समझाया कि बात अभी खत्म नहीं हुई. उसे बड़ी समझदारी और खिदमत से अपने शौहर का दिल जीतना होगा. उस के दिल में अपने लिए जगह बनानी होगी और उसे इलाज पर राजी करना होगा.

2 ही दिन गुजरे थे. मैं शाम के वक्त खेतों में सैर कर रहा था. शाम के वक्त मैं रोज गांव से बाहर निकल जाता था. हलकीहलकी ताजी हवा और पत्तों की सरसराहट से मुझे अजीब सा सुकून मिलता था. मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि एकदम मेरे सामने मलिक असद आ खड़ा हुआ. उस के साथ 2 आदमी और थे. दोनों आदमियों के हाथों में लाठियां थीं. मलिक असद की आंखों में गुस्सा भरा था—‘‘डाक्टर, मैं ने तुम्हें समझाया था कि यह बात दोबारा न करना, वरना तुम्हारी लाश नहीं मिलेगी. अब तैयार हो जाओ. तुम्हें मैं दूसरी दुनिया में पहुंचा दूंगा. तुम्हें मलिक असद का पता नहीं है.’’

उस ने अपने आदमियों को इशारा किया. बस मुझे इतना याद है कि एक लाठी मेरे सिर पर लगी. उस के बाद मुझे होश नहीं रहा. जब होश आया तो मैं अस्पताल के कमरे में एक बैड पर लेटा था. मेरे पास कमरे में बड़े चौधरी और उन की बहू थी. मुझे होश में आते देख कर बड़े चौधरी ने मेरे पांव पकड़ लिए और मिसेज मलिक असद सजदे में गिर गईं. चौधरी साहब कहने लगे, ‘‘पुत्तर डाक्टर, मुझे माफ कर दो. मैं बहुत शर्मिंदा हूं. तुम चाहो तो मेरे बेटे को पुलिस के हवाले कर दो. मगर यकीन करो, अगर मुझे इस का पता होता तो मैं अपने बेटे की जान ले लेता और तुम्हें नुकसान न पहुंचने देता.’’

इस दौरान मिसेज असद भी सजदे से उठ गई थीं. मेरी एक टांग पर पलस्तर चढ़ा था. मैं ने फाइल पढ़ी तो पता चला कि सिर के जख्म पर 10 टांके लगे थे और बाईं टांग टूट गई थी. इस के बावजूद मैं मुसकरा रहा था, ‘‘चौधरी साहब, आप का इस में कोई कसूर नहीं. मैं इस वाकये की कोई रिपोर्ट नहीं करना चाहता. मैं सिर्फ छोटे चौधरी से मिलना चाहता हूं.’’

मेरी बात सुन कर बड़े चौधरी की आंखों में आंसू आ गए. वह अपने आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर चले गए. मिसेज मलिक ने मुझे बताया, ‘‘आप से लड़ाई की इस घटना से पहले नंबरदार और उस के भाई हवेली में आए थे और मलिक असद के सामने बड़े चौधरी से कहने लगे थे, ‘आप के बेटे में नुक्स है. वह औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है. आप ने हम से गलतबयानी की है, बल्कि हमें धोखा दिया है. हम यह रिश्ता तोड़ने आए हैं.’

‘‘यह सुन कर मलिक असद उन से झगड़ पड़ा. अगर बड़े चौधरी न होते तो वे लोग भी जख्मी हो जाते. बडे़े चौधरी ने हालात को संभाला और उन से कहने लगे कि आप लोगों से मैं ने कोई झूठ नहीं बोला है, आप लोगों को यह बात किस ने बताई है?

‘‘जब नंबरदार ने आप का नाम बताया तो बड़े चौधरी चुप रह गए. इसी दौरान मलिक असद गुस्से में बाहर निकल गया. मुझे शक हुआ. मैं ने अपनी नौकरानी से कहा कि वह मलिक असद का पीछा करे. उस ने मुझे आ कर बताया कि उन लोगों ने आप को जख्मी कर दिया है.

‘‘मैं ने फौरन बड़े चौधरी को बताया और हम अपने आदमियों के साथ वहां पहुंचे तो आप की हालत काफी खराब थी. फौरन तांगा मंगवाया और सड़क पर आ कर गाड़ी का बंदोबस्त किया. यहां अस्पताल में आ कर भी हम बहुत परेशान रहे. आप को पूरे 6 दिनों बाद होश आया है. इस दौरान पुलिस भी हमें परेशान करती रही.’’

मैं मिसेज मलिक की बातें सुन कर मुसकराता रहा. मुझे पूरे 15 दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस दौरान मलिक असद को बड़े चौधरी लिवा लाए. वह भी अपने किए पर शर्मिंदा था. मैं उस से बहुत प्यार से मिला. मैं ने जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने मुझ पर बहुत ज्यादती की है. इस का यह असर हुआ कि वह दिनरात मेरे पास रहने लगा. मैं ने इस दौरान डाक्टर राशिद से उस की मुलाकात कराई और उन से सिफारिश की कि वह उस का इलाज करें. मैं ठीक हो कर गांव आ गया और अपने काम में खो गया. इस वाकए का यह असर हुआ कि मुझे चौधरी की हवेली में ही रहने के लिए जाना पड़ा. खानापीना भी वहीं होने लगा.

मलिक असद और उस की बीवी बड़ी खुशगवार जिंदगी बिताते रहे. मैं जब तक उस गांव में तैनात रहा, मिसेज मलिक ने मुझे सगी बहन का प्यार दिया. 2 सालों बाद मुझे पता चला कि मलिक असद के घर एक फूल सी बच्ची पैदा हुई है तो उस वक्त की मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं. Hindi Stories

लेखक – डा. फरहान  

UP Crime: जेल से बड़ा जुर्म – परिवार ही बना शिकार

UP Crime: 52 साल के सत्यपाल शर्मा को गांव में हर कोई जानता था. वे उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के गांव सिंघावली अहीर के रहने वाले थे और नजदीक के ही एक गांव खिंदौड़ा में बने आदर्श प्राइमरी स्कूल में हैडमास्टर थे. गांव में उन की खेतीबारी भी थी. उन के परिवार में पत्नी उर्मिला के अलावा एक बेटा सोनू व एक बेटी सीमा थी.

23 अप्रैल, 2016 की सुबह सत्यपाल शर्मा रोजाना की तरह मोटरसाइकिल से स्कूल गए थे. सुबह के तकरीबन पौने 10 बजे थे. लंच ब्रेक का समय था. सत्यपाल शर्मा स्कूल के बरामदे में कुरसी डाल कर बैठे हुए थे, तभी एक मोटरसाइकिल पर सवार 3 नौजवान स्कूल परिसर में आ कर रुके. उन में से एक नौजवान मोटरसाइकिल के पास ही खड़ा रहा, जबकि 2 नौजवान पैदल चल कर सत्यपाल शर्मा के नजदीक पहुंच गए.

उन्होंने नमस्कार किया, तो सत्यपाल शर्मा ने पूछा, ‘‘कहिए?’’

उन में से एक नौजवान ने पूछा, ‘‘क्या आप ही मास्टर सत्यपाल हैं?’’

‘‘जी हां, मैं ही हूं. आप लोग कहां से आए हैं?’’

‘‘हम तो नजदीक के गांव से ही आए हैं मास्टरजी.’’

सत्यपाल शर्मा ने उन्हें बैठने का इशारा किया, तो वे पास रखी कुरसियों पर बैठ गए. इस बीच तीसरा नौजवान भी टहलता हुआ वहां आ गया.

सत्यपाल शर्मा उन नौजवानों को पहचानते नहीं थे. वे कुछ जानसमझ पाते कि उस से पहले ही कुरसी पर बैठे दोनों नौजवान बिजली की सी फुरती से खड़े हुए और उन्होंने अपने हाथों में तमंचे निकाल लिए. सत्यपाल शर्मा सकते में आ गए. पलक झपकते ही एक नौजवान ने उन्हें निशाना बना कर गोली दाग दी. गोली उन के पेट में लगी और खून का फव्वारा छूट गया.

सत्यपाल शर्मा समझ गए थे कि वे नौजवान उन के खून के प्यासे हैं. वे जान बचाने के लिए चिल्लाते हुए परिसर में तेजी से भागे, लेकिन तकरीबन 50 मीटर ही भाग पाए थे कि बदमाशों ने उन पर 2 और फायर झोंक दिए. इस से वे लहूलुहान हो कर जमीन पर गिर पड़े. गोलियां चलने से स्कूल के टीचरों व बच्चों में चीखपुकार और भगदड़ मच गई. स्कूल चूंकि गांव के बीच में था, इसलिए आसपास के गांव वाले भी इकट्ठा होना शुरू हो गए.

यह देख कर गोली मारने वाले बदमाशों के पैर उखड़ गए. घिरने का खतरा देख कर मोटरसाइकिल वाला बदमाश अकेला ही भाग गया, जबकि एक बदमाश दीवार कूद कर खेतों की तरफ और तीसरा बदमाश गांव के रास्ते की तरफ भाग निकला. जो बदमाश गांव की तरफ भागा था, गांव वालों ने उस का पीछा कर कुछ ही दूर जा कर उसे पकड़ लिया था. गांव वालों ने पीटपीट कर उसे लहूलुहान कर दिया. उधर बदमाशों की गोली से घायल सत्यपाल शर्मा की मौके पर ही मौत हो गई.

इस सनसनीखेज वारदात की सूचना पा कर थाना सिंघावली अहीर के थाना प्रभारी सुभाष यादव अपने दलबल के साथ मौके पर पहुंच गए. हत्या की इस वारदात से गांव वालों में भारी गुस्सा था. लिहाजा, एसपी रवि शंकर छवि, कलक्टर हृदय शंकर तिवारी, एएसपी अजीजुलहक, सीओ कर्मवीर सिंह व दूसरे थानों का पुलिस बल भी वहां आ पहुंचा. पुलिस को मौके से एक तमंचा व खाली कारतूस बरामद हुए.

उधर सत्यपाल शर्मा की मौत की खबर से उन के परिवार में कुहराम मच गया था. उन की पत्नी उर्मिला व बेटा सोनू भी वहां आ पहुंचे थे. थाना पुलिस को गांव वालों के आरोपों के साथ विरोध का सामना करना पड़ रहा था. इस विरोध की भी वजह थी. लोगों का आरोप था कि कुछ दिनों पहले कुछ बदमाशों ने सत्यपाल शर्मा पर उन के घर पर हमला किया था. उन्होंने इस की शिकायत थाने में की थी और जान का खतरा बता कर सिक्योरिटी की मांग की थी, लेकिन थाना प्रभारी सुभाष यादव ने इस मामले में घोर लापरवाही दिखाते हुए नजरअंदाज कर दिया था.

पूछताछ में पुलिस को पता चला कि सत्यपाल शर्मा की जमीन को ले कर अपने ही परिवार के लोगों से रंजिश चली आ रही थी. इस रंजिश का शिकार हुए अपने बेटे सतीश के लिए सत्यपाल शर्मा इंसाफ की जंग लड़ रहे थे, इसीलिए उन की भी हत्या कर दी गई थी. गांव वालों का गुस्सा पकड़े गए बदमाश पर उतर रहा था. वह अधमरी हालत में पहुंच गया था. पुलिस ने उस से पूछताछ की, तो उस ने अपना नाम सोनू बताया, जबकि अपने साथियों के नाम गौरव व रोहित बताए.

सोनू गांव निरपुड़ा का रहने वाला था, जबकि गौरव उस का चचेरा भाई था और रोहित शेरपुर लुहारा गांव का रहने वाला था. पुलिस सोनू को अस्पताल में दाखिल कराती, उस से पहले ही उस की मौत हो गई. पुलिस ने सत्यपाल शर्मा व बदमाश सोनू की लाशों का पंचनामा कर के पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इस मामले में पुलिस ने सत्यपाल शर्मा के बेटे सोनू की तरफ से मारे गए व भागे बदमाशों के साथ ही विरोधी पक्ष के राजकरण, उस के भाई रामकिशन व आनंद, राजकरण के 2 बेटों पंकज पाराशर, दीपक, आनंद के बेटों मोहित, रोहित, बेटी पूजा, आनंद की पत्नी बबली, राजकरण की पत्नी कौशल्या, राजकरण के बेटे ईशान व रामकिशन के बेटे महेश के खिलाफ धारा 302 व 120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया.

मामला बेहद गंभीर था. एसपी रवि शंकर छवि ने थाना प्रभारी सुभाष यादव को तत्काल प्रभाव से सस्पैंड कर दिया और थाने का प्रभार चंद्रकांत पांडेय को सौंप दिया. उन्होंने आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश देने के साथ ही हत्या की साजिश का खुलासा करने के निर्देश भी दिए. पुलिस ने सत्यपाल शर्मा की पत्नी उर्मिला व बेटे सोनू के साथसाथ गांव वालों से भी पूछताछ की. मामला सीधेतौर पर रंजिश का था.

दरअसल, सत्यपाल शर्मा की राजकरण व आनंद से जमीन की डोलबंदी को ले कर तकरीबन 10 साल से रंजिश चली आ रही थी. इसी रंजिश में 4 जुलाई, 2014 को सत्यपाल शर्मा के  जवान बेटे सतीश की सुबह तकरीबन 8 बजे उस वक्त गोली मार कर हत्या कर दी गई थी, जब वह खेत में काम करने के लिए गया था. सत्यपाल शर्मा ने इस मामले में 11 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.

पुलिस ने इस मामले में आनंद व उस के बेटे मोहित को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. आनंद के कब्जे से हत्या में इस्तेमाल किया गया तमंचा व कारतूस भी बरामद हुए थे, जबकि बाकी आरोपियों को पुलिस ने जांच के दौरान क्लीनचिट दे दी थी. इस मामले में पुलिस मिलीभगत के आरोपों का सामना कर रही थी. बेटे सतीश की मौत से दुखी हो कर सत्यपाल शर्मा ने सोच लिया था कि वे उस के कातिलों को सजा दिला कर रहेंगे, इसलिए वे आएदिन कचहरी जा कर मुकदमे को मजबूत करने के लिए पैरवी करते थे. उन की पैरवी का ही नतीजा था कि जेल में बंद आरोपियों को जमानत नहीं मिल पा रही थी.

सत्यपाल शर्मा की इसी पैरवी से चिढ़ कर 26 मार्च की रात उन पर उस समय हमला किया गया था, जब वे घर पर थे. बदमाश गोली चला कर भाग गए थे. सत्यपाल शर्मा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. जब उन्होंने जान का खतरा बता कर पुलिस से सिक्योरिटी मांगी थी, तब थाना पुलिस ने न जाने किन वजहों से अपने फर्ज से मुंह मोड़ लिया था.

पुलिस दोनों पक्षों की रंजिश से वाकिफ थी. बाद में इस मामले में सत्यपाल शर्मा की तहरीर पर राजकरण व रोहित के खिलाफ धारा 452 व 523 के तहत मुकदमा तो लिख लिया गया था, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई थी. इस के बाद सत्यपाल शर्मा की हत्या हो गई थी.

पुलिस सत्यपाल शर्मा के हत्यारों की तलाश में जुट गई. अगले दिन पुलिस ने इस मामले में नामजद रोहित व उस की बहन पूजा को गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ की गई, तो एक चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि इस हत्या की योजना लाखों रुपए की सुपारी के बदले मेरठ जेल में बनाई गई थी. पुलिस ने जरूरी सुराग हासिल कर के उन दोनों को जेल भेज दिया और दूसरे आरोपियों की तलाश में लग गई.

26 अप्रैल, 2016 को पुलिस ने एक शूटर गौरव व एक औरत किरन को गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ हुई, तो पुलिस भी चौंक गई, क्योंकि आरोपी परिवार की औरतों से ले कर गिरफ्तार की गई औरत ने भी हत्या की इस साजिश में अहम भूमिका निभाई थी. पूछताछ में सत्यपाल शर्मा की हत्या का हैरान करने वाले सच सामने आया.

दरअसल, सत्यपाल शर्मा अपने बेटे सतीश की हत्या की जिस तरह से पैरवी कर रहे थे, उस से आनंद व उस के बेटे मोहित को चाह कर भी जमानत नहीं मिल पा रही थी. उन्होंने अपनी जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील कर दी थी. 31 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन की जमानत पर सुनवाई होनी थी. सत्यपाल शर्मा इस का कानूनी तरीके से विरोध कर रहे थे. आरोपियों को लगने लगा था कि सत्यपाल शर्मा के रहते उन्हें कभी जमानत नहीं मिल पाएगी और उन्हें सजा हो कर रहेगी.

सत्यपाल शर्मा के पैरवी बंद कर देने से उन की राह आसान हो सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था. आनंद की पत्नी बबली अपने पति व बेटे से अकसर जेल में मुलाकात के लिए जाती थी. उस ने आनंद व मोहित को उकसाया कि वे किसी भी तरह सत्यपाल का कोई इलाज करें. जितने रुपए कोर्टकचहरी में खर्च हो रहे हैं, उतने में तो उसे मरवाया जा सकता था. आनंद और मोहित को बबली की बात ठीक लगी. जेल की बदहाल जिंदगी से वे पहले ही परेशान थे. बबली अपनी जेठानी कौशल्या से इस संबंध में अकसर बात करती थी.

आनंद ने जेल में रहते बदमाश अमरपाल उर्फ कालू व अनिल से बात की. अमरपाल बागपत के ही छपरौली थाना क्षेत्र के शेरपुर लुहारा गांव का रहने वाला था, जबकि अनिल सूप गांव का बाशिंदा था. वे दोनों भी हत्या के मामले में मेरठ जेल में बंद थे. दोनों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे. आनंद व उस का परिवार सत्यपाल शर्मा को रास्ते से हटाना चाहता था. दोनों बदमाशों ने इस काम के लिए हामी भर ली. साढ़े 6 लाख रुपए में उन का सौदा तय हो गया.

अमरपाल ने इस मामले में अपने ही गांव के रोहित को जेल में बुलवा कर उस से बात की. उस से रुपयों के बदले में सत्यपाल शर्मा की हत्या करना तय हो गया. रोहित ने इस काम के लिए अपने दोस्तों सोनू राणा उर्फ शिशुपाल उर्फ अमरीकन व उस के चचेरे भाई गौरव को भी तैयार कर लिया. अमरपाल जेल में जरूर था, लेकिन उस के गैरकानूनी कामों को उस की पत्नी किरन उर्फ बाबू पूरा करती थी.

इस मामले में भी अमरपाल ने सुपारी के लेनदेन से ले कर हथियार मुहैया कराने  तक की जिम्मेदारी किरन को ही सौंप दी और उस की मुलाकात आनंद की पत्नी बबली से करा दी. सुपारी की रकम हत्या के बाद दी जानी थी. 11 अप्रैल को किरन, रोहित, गौरव व सोनू जेल में जा कर अमरपाल व अनिल से मिले. आनंद व उस की पत्नी बबली की भी उन से मुलाकात हुई और हत्या का प्लान तैयार कर लिया गया. इस के बाद रोहित अपने साथियों के साथ किरन के संपर्क में रहने लगा.

हत्या के लिए किरन ही उन्हें हथियार देने वाली थी. हत्या किस तरह करनी है, इस की पूरी कमान अब बबली व किरन ने संभाल ली थी. किरन अपने मायके मुजफ्फरनगर जिले के टयावा गांव में रह रही थी. अमरपाल के कई साथी, जो जेल से बाहर थे, किरन उन के संपर्क में थी. उन से बात कर के उस ने 3 तमंचों और कारतूसों का इंतजाम कर लिया था.

14 अप्रैल को रोहित, गौरव व सोनू बबली से उस के घर जा कर मिले. बबली ने उन्हें खर्च के लिए 10 हजार रुपए दिए. तीनों ने बबली व कौशल्या से सत्यपाल शर्मा के बारे में जानकारियां जुटा लीं. इस के बाद किरन ने उन्हें 3 तमंचे व 17 कारतूस सत्यपाल शर्मा की हत्या के लिए दे कर ताकीद कर दिया कि वह किसी भी सूरत में बचना नहीं चाहिए. इस के बाद कई दिनों तक उन्होंने रेकी कर के सत्यपाल शर्मा की पहचान के साथसाथ स्कूल आनेजाने का समय भी पता कर लिया.

23 अप्रैल को उन्होंने योजना को आखिरी रूप देने का फैसला किया. 22 अप्रैल की शाम को वे मोटरसाइकिल से बबली के घर पहुंच गए. किसी को शक न हो, इसलिए उन के सोने का इंतजाम एक ट्यूबवैल पर कर दिया गया. बबली और उस के बेटेबेटी ने उन के खानेपीने व सोने का भी इंतजाम किया था. 23 अप्रैल की अलसुबह वे वहां से निकल गए. उन्होंने सत्यपाल शर्मा को रास्ते में ही स्कूल जाते वक्त मारने की योजना बनाई. वे खिंदौड़ा वाले रास्ते की एक पुलिया पर खड़े हो गए. सत्यपाल शर्मा अपनी मोटरसाइकिल पर तेजी से आए और निकल गए, इसलिए उन का प्लान चौपट हो गया.

इस के बाद वे तीनों बदमाश इधरउधर टहलते रहे. बाद में उन्होंने स्कूल जा कर ही सत्यपाल शर्मा की हत्या करने का मन बनाया. सत्यपाल शर्मा को मारने में गलती न हो, इसलिए सोनू व रोहित ने पहले उन से नाम पूछा और इस के बाद उन तीनों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी. शोरशराबा होने पर वे घबरा गए और मजबूरन उन्हें अलगअलग रास्ते से भागना पड़ा. सोनू भीड़ के गुस्से का शिकार हो गया.

पुलिस ने गौरव की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल हुआ तमंचा व मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. इस के साथ ही पुलिस ने मुकदमे में किरन, उस के हिस्ट्रीशीटर पति अमरपाल व दूसरे बदमाश अनिल का नाम भी बढ़ा दिया. एसपी रवि शंकर छवि ने किरन व गौरव को मीडिया के सामने पेश कर के हत्याकांड का खुलासा किया. उन दोनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. UP Crime

Hindi Crime Stories: आधी रात के बाद हुस्न और हवस का खेल

Hindi Crime Stories: 18 नवंबर, 2016 की रात के यही कोई डेढ़ बजे मुंबई से सटे जनपद थाणे के उल्लासनगर के थाना विट्ठलवाड़ी के एआई वाई.आर. खैरनार को सूचना मिली कि आशेले पाड़ा परिसर स्थित राजाराम कौंपलेक्स की तीसरी मंजिल स्थित एक फ्लैट में काले रंग के बैग में लाश रखी है. सूचना देने वाले ने बताया था कि उस का नाम शफीउल्ला खान है और उस फ्लैट की चाबी उस के पास है.

35 साल का शफीउल्ला पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद की तहसील नगीनबाग के गांव रोशनबाग का रहने वाला था. रोजीरोटी की तलाश में वह करीब 8 साल पहले थाणे आया था, जहां वह उल्लासनगर के आशेले पाड़ा परिसर स्थित राजाराम कौंपलेकस के तीसरी मंजिल स्थित फ्लैट नंबर 308 में अपने परिवार के साथ रहता था. वह राजमिस्त्री का काम कर के गुजरबसर कर रहा था.

उस के फ्लैट से 2 फ्लैट छोड़ कर उस का मामा राजेश खान अपनी प्रेमिकापत्नी खुशबू उर्फ जमीला शेख के साथ रहता था. 10-11 महीने पहले ही खुशबू राजेश खान के साथ इस फ्लैट में रहने आई थी. वह अपना कमातीखाती थी, इसलिए वह राजेश खान पर निर्भर नहीं थी. राजेश खान कभीकभार ही उस के यहां आता था. ज्यादातर वह पश्चिम बंगाल स्थित गांव में ही रहता था.

18 नवंबर की दोपहर शफीउल्ला अपने फ्लैट पर जा रहा था, तभी इमारत की सीढि़यों पर उस की मुलाकात राजेश खान से हो गई. उस समय काफी घबराया होने के साथसाथ वह जल्दबाजी में भी था. लेकिन शफीउल्ला सामने पड़ गया तो उस ने रुक कर कहा, ‘‘शफी, अगर तुम मेरे साथ नीचे चलते तो मैं तुम्हें एक जरूरी बात बताता.’’

‘‘इस समय तो मैं कहीं नहीं जा सकता, क्योंकि मुझे बहुत तेज भूख लगी है. जो भी बात है, बाद में कर लेंगे.’’ कह कर शफीउल्ला जैसे ही आगे बढ़ा, राजेश खान ने पीछे से कहा, ‘‘यह रही मेरे फ्लैट की चाबी, रख लो. तुम्हारी मामी मुझ से लड़झगड़ कर कहीं चली गई है. मैं उसे खोजने जा रहा हूं. मेरी अनुपस्थिति में अगर वह आ जाए तो यह चाबी उसे दे देना. बाकी बातें मैं फोन से कर लूंगा.’’

राजेश खान से फ्लैट की चाबी ले कर शफीउल्ला अपने फ्लैट पर चला गया तो राजेश खान नीचे उतर गया.  करीब 12 घंटे बीत गए. इस बीच न राजेश खान आया और न ही उस की पत्नी खुशबू आई. शफीउल्ला को चिंता हुई तो उस ने दोनों को फोन कर के संपर्क करना चाहा. लेकिन दोनों के ही नंबर बंद मिले.

शफीउल्ला सोचने लगा कि अब उसे क्या करना चाहिए. वह कुछ करता, उस के पहले ही रात के करीब एक बजे उस के फोन पर राजेश खान का फोन आया. उस के फोन रिसीव करते ही उस ने पूछा, ‘‘तेरी मामी आई या नहीं?’’

‘‘नहीं मामी तो अभी तक नहीं आई. यह बताओ कि इस समय तुम कहां हो?’’ शफीउल्ला ने पूछा.

‘‘तुम्हें राज की एक बात बताता हूं. अब तुम्हारी मामी कभी नहीं आएगी, क्योंकि मैं ने उसे मार दिया है. इस में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए. मेरे फ्लैट के बैडरूम में बैड के नीचे काले रंग का एक बैग पड़ा है, उसी में तुम्हारी मामी की लाश रखी है. तुम उसे ले जा कर कहीं फेंक दो. जल्दबाजी में मैं उसे फेंक नहीं पाया. इस समय मैं ट्रेन में हूं और गांव जा रहा हूं.’’

खुशबू की हत्या की बात सुन कर शफीउल्ला के होश उड़ गए. उस ने उस बैग के बारे में आसपड़ोस वालों को बताया तो सभी इकट्ठा हो गए. उन्हीं के सुझाव पर इस बात की सूचना शफीउल्ला ने थाना विट्ठलवाड़ी पुलिस को दे दी थी.

एआई वाई.आर. खैरनार ने तुरंत इस सूचना की डायरी बनवाई और थानाप्रभारी सुरेंद्र शिरसाट तथा पुलिस कंट्रोल रूम एवं पुलिस अधिकारियों को सूचना दे कर वह कुछ सिपाहियों के साथ राजाराम कौंपलेक्स पहुंच गए. रात का समय था, फिर भी उस फ्लैट के बाहर इमारत के काफी लोग जमा थे. उन के पहुंचते ही शफीउल्ला ने आगे बढ़ कर उन्हें फ्लैट की चाबी थमा दी.

फ्लैट का ताला खोल कर वाई.आर. खैरनार सहायकों के साथ अंदर दाखिल हुए तो बैडरूम में रखा वह काले रंग का बैग मिल गया. उन्होंने उसे हौल में मंगा कर खुलवाया तो उस में उन्हें एक महिला की लाश मिली.

बैग से बरामद लाश की शिनाख्त की कोई परेशानी नहीं हुई. शफीउल्ला ने उस के बारे में सब कुछ बता दिया. लाश बैग से निकाल कर वाई.आर. खैरनार जांच में जुट गए. वह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि थानाप्रभारी सुरेंद्र शिरसाट, एसीपी अतितोष डुंबरे, एडिशनल सीपी शरद शेलार, डीसीपी सुनील भारद्वाज, अंबरनाथ घोरपड़े के साथ आ पहुंचे.

फोरैंसिक टीम के साथ पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाशों का निरीक्षण किया. अपना काम निपटा कर थोड़ी ही देर में सारे अधिकारी चले गए.

लाश के निरीक्षण में स्पष्ट नजर आ रहा था कि मृतका की बेल्ट से जम कर पिटाई की गई थी. उस के शरीर पर तमाम लालकाले निशान उभरे हुए थे. कुछ घावों से अभी भी खून रिस रहा था. उस के गले पर दबाने का निशान था. लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर के सुरेंद्र शिरसाट ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए उल्लासनगर के मध्यवर्ती अस्पताल भिजवा दिया.

घटनास्थल की पूरी काररवाई निपटा कर सुरेंद्र शिरसाट थाने लौट आए और सहयोगियों से सलाहमशविरा कर के इस हत्याकांड की जांच एआई वाई.आर. खैरनार को सौंप दी.

वाई.आर. खैरनार ने मामले की जांच के लिए अपनी एक टीम बनाई, जिस में उन्होंने एआई प्रमोद चौधरी, ए. शेख के अलावा हैडकांस्टेबल दादाभाऊ पाटिल, दिनेश चित्ते, अजित सांलुके तथा महिला सिपाही ज्योति शिंदे को शामिल किया.

पुलिस को शफीउल्ला से पूछताछ में पता चल गया था कि राजेश खान ने कत्ल कर के गांव जाने के लिए कल्याण रेलवे स्टेशन से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रैस पकड़ ली है. अब पुलिस के लिए यह चुनौती थी कि वह गांव पहुंचे, उस के पहले ही उसे पकड़ ले. अगर वह गांव पहुंच गया और उसे पुलिस के बारे में पता चल गया तो वह भाग सकता था.

इस बात का अंदाजा लगते ही पुलिस टीम ने जांच में तेजी लाते हुए राजेश खान के मोबाइल की लोकेशन पता की तो वह जिस ट्रेन से गांव जा रहा था, वहां से उसे गांव पहुंचने में करीब 10 घंटे का समय लगता.

पुलिस टीम किसी भी तरह उसे हाथ से जाने देना नहीं चाहती थी, इसलिए वाई.आर. खैरनार ने सीनियर अधिकारियों से बात कर के राजेश खान की गिरफ्तारी के लिए एआई ए. शेख और हैडकांस्टेबल माने को हवाई जहाज से कोलकाता भेज दिया. दोनों राजेश के पहुंचने से पहले ही हावड़ा रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए और उसे गिरफ्तार कर लिया.

26 साल के राजेश खान को मुंबई ला कर पूछताछ की गई तो उस ने खुशबू से प्रेम होने से ले कर उस की हत्या तक की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

राजेश खान पश्चिम बंगाल के जनपद मुर्शिदाबाद की तहसील नगीनबाग के गांव रोशनबाग का रहने वाला था. गांव में वह मातापिता एवं भाईबहनों के साथ रहता था. गांव में उस के पास खेती की जमीन तो थी ही, बाजार में कपड़ों की दुकान भी थी, जो ठीकठाक चलती थी. उसी दुकान के लिए वह कपड़ा लेने थाणे के उल्लासनगर आता था. वह जब भी कपड़े लेने उल्लासनगर आता था, अपने भांजे शफीउल्ला से मिलने जरूर आता था.

24 साल की खुशबू उर्फ जमीला से राजेश खान की मुलाकात उस की कपड़ों की दुकान पर हुई थी. वह उसी के गांव के पास की ही रहने वाली थी. उस की शादी ऐसे परिवार में हुई थी, जिस की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. वह जिन सपनों और उम्मीदों के साथ ससुराल आई थी, वे उसे पूरे होते नजर नहीं आ रहे थे. खुली हवा में सांस लेना घूमनाफिरना, मनमाफिक पहननाओढ़ना उस परिवार में कभी संभव नहीं था.

इसलिए जल्दी ही वहां खुशबू का दम घुटने लगा. खुली हवा में सांस लेने के लिए उस का मन मचल उठा. दुकान पर आनेजाने में जब उस ने राजेश खान की आंखों में अपने लिए चाहत देखी तो वह भी उस की ओर आकर्षित हो उठी.

चाहत दोनों ओर थी, इसलिए कुछ ही दिनों में दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. जल्दी ही उन की हालत यह हो गई कि दिन में जब तक दोनों एक बार एकदूसरे को देख नहीं लेते, उन्हें चैन नहीं मिलता. उन के प्यार की जानकारी गांव वालों को हुई तो उन के प्यार को ले कर हंगामा होता, उस के पहले ही वह खुशबू को ले कर मुंबई आ गया और किराए का फ्लैट ले कर उसी में उस के साथ रहने लगा. मुंबई में उस ने उस से निकाह भी कर लिया.

मुंबई पहुंच कर खुशबू ने आत्मनिर्भर होने के लिए एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी कर ली. इस से राजेश खान चिंता मुक्त हो गया. वह महीने में 10-15 दिन मुंबई में खुशबू के साथ रहता था तो बाकी दिन गांव में रहता था.

मुंबई आ कर खुशबू में काफी बदलाव आ गया था. ब्यूटीपार्लर में काम करने के बाद उस के पास जो समय बचता था, उस समय का सदुपयोग करते हुए अधिक कमाई के लिए वह बीयर बार में काम करने चली जाती थी. पैसा आया तो उस ने रहने का ठिकाना बदल दिया. अब वह उसी इमारत में आ कर रहने लगी, जहां शफीउल्ला अपने परिवार के साथ रहता था. वहां उस ने सुखसुविधा के सारे साधन भी जुटा लिए थे.

खुशबू के रहनसहन को देख कर राजेश खान के मन संदेह हुआ. उस ने उस के बारे में पता किया. जब उसे पता चला कि खुशबू ब्यूटीपार्लर में काम करने के अलावा बीयर बार में भी काम करती है तो उस ने उसे बीयर बार में काम करने से मना किया. लेकिन उस के मना करने के बावजूद खुशबू बीयर बार में काम करती रही. इस से राजेश खान का संदेह बढ़ता गया.

18 नवंबर की सुबह खुशबू बीयर बार की ड्यूटी खत्म कर के फ्लैट पर आई तो राजेश खान को अपना इंतजार करते पाया. उस समय वह काफी गुस्से में था. उस के पूछने पर खुशबू ने जब सीधा उत्तर नहीं दिया तो वह उस पर भड़क उठा. वह उस के साथ मारपीट करने लगा तो खुशबू ने साफसाफ कह दिया, ‘‘मैं तुम्हारी पत्नी हूं, गुलाम नहीं कि जो तुम कहोगे, मैं वहीं करूंगी.’’

‘‘खुशबू, तुम मेरी पत्नी ही नहीं, प्रेमिका भी हो. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. तुम अपनी ब्यूटीपार्लर वाली नौकरी करो, मैं उस के लिए मना नहीं करता. लेकिन बीयर बार में काम करना मुझे पसंद नहीं है. मैं नहीं चाहता कि लोग तुम्हें गंदी नजरों से ताकें.’’

‘‘मैं जो कर रही हूं, सोचसमझ कर कर रही हूं. अभी मेरी कमानेखाने की उम्र है, इसलिए मैं जो करना चाहती हूं, वह मुझे करने दो.’’ कह कर खुशबू बैडरूम में जा कर कपड़े बदलने लगी.

राजेश खान को खुशबू से ऐसी बातों की जरा भी उम्मीद नहीं थी. वह भी खुशबू के पीछेपीछे बैडरूम में चला गया और उसे समझाने की गरज से बोला, ‘‘इस का मतलब तुम मुझे प्यार नहीं करती. लगता है, तुम्हारी जिंदगी में कोई और आ गया है?’’

‘‘तुम्हें जो समझना है, समझो. लेकिन इस समय मैं थकी हुई हूं और मुझे नींद आ रही है. अब मैं सोने जा रही हूं. अच्छा होगा कि तुम अभी मुझे परेशान मत करो.’’

खुशबू की इन बातों से राजेश खान का गुस्सा बढ़ गया. उस की आंखों में नफरत उतर आई. उस ने चीखते हुए कहा, ‘‘मेरी नींद को हराम कर के तुम सोने जा रही हो. लेकिन अब मैं तुम्हें सोने नहीं दूंगा.’’

यह कह कर राजेश खान खुशबू की बुरी तरह से पिटाई करने लगा. हाथपैर से ही नहीं, उस ने उसे बेल्ट से भी मारा. इस पर भी उस का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो फर्श पर पड़ी दर्द से कराह रही खुशबू के सीने पर सवार हो गया और दोनों हाथों से उस का गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया.

खुशबू के मर जाने के बाद जब उस का गुस्सा शांत हुआ तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे जेल जाने का डर सताने लगा. वह लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को फ्लैट में ही छिपा कर गांव भाग जाने में अपनी भलाई समझी. उस का सोचना था कि अगर वह गांव पहुंच गया तो पुलिस उसे कभी पकड़ नहीं पाएगी.

उस ने बैडरूम मे रखे खुशबू के बैग को खाली किया और उस में उस की लाश को मोड़ कर रख कर उसे बैड के नीचे खिसका दिया. वह दरवाजे पर ताला लगा कर बाहर निकल रहा था, तभी उस का भांजा शफीउल्ला उसे सीढि़यों पर मिल गया, जिस की वजह से खुशबू की हत्या का रहस्य उजागर हो गया.

घर की चाबी शफीउल्ला को दे कर वह सीधे कल्याण रेलवे स्टेशन पहुंचा और वहां से कोलकाता जाने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव के लिए चल पड़ा.

राजेश खान से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ अपराध संख्या 324/2016 पर खुशबू की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मामले की जांच एआई वाई.आर. खैरनार कर रहे थे. Hindi Crime Stories

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

MP News: लालची मामा का शिकार हुई एक भांजी

MP News: मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले की सोहागपुर तहसील में जमीनों के दाम उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़े हैं, क्योंकि यह सैरसपाटे की मशहूर जगह पचमढ़ी के नजदीक है. इस के अलावा सोहागपुर से चंद किलोमीटर की दूरी पर एक और जगह मढ़ई तेजी से सैलानियों की पसंद बनती जा रही है. इस की वजह वाइल्ड लाइफ का रोमांच और यहां की कुदरती खूबसूरती है. सैलानियों की आवाजाही के चलते सोहागपुर में धड़ल्ले से होटल, रिसोर्ट और ढाबे खुलते जा रहे हैं.

दिल्ली के पौश इलाके वसंत विहार की रहने वाली 40 साला लीना शर्मा का सोहागपुर अकसर आनाजाना होता रहता था, क्योंकि यहां उस की 22 एकड़ जमीन थी, जो उस के नाना और मौसी मुन्नीबाई ने उस के नाम कर दी थी.

लीना शर्मा की इस जमीन की कीमत करोड़ों रुपए में थी, लेकिन इस में से 10 एकड़ जमीन उस के रिश्ते के मामा प्रदीप शर्मा ने दबा रखी थी. 21 अप्रैल, 2016 को लीना शर्मा खासतौर से अपनी जमीन की नपत के लिए भोपाल होते हुए सोहागपुर आई थी. 23 अप्रैल, 2016 को पटवारी और आरआई ने लीना शर्मा के हिस्से की जमीन नाप कर उसे मालिकाना हक सौंपा, तो उस ने तुरंत जमीन पर बाड़ लगाने का काम शुरू कर दिया.

दरअसल, लीना शर्मा 2 करोड़ रुपए में इस जमीन का सौदा कर चुकी थी और इस पैसे से दिल्ली में ही जायदाद खरीदने का मन बना चुकी थी. 29 अप्रैल, 2016 को बाड़ लगाने के दौरान प्रदीप शर्मा अपने 2 नौकरों राजेंद्र कुमरे और गोरे लाल के साथ आया और जमीन को ले कर उस से झगड़ना शुरू कर दिया.

प्रदीप सोहागपुर का रसूखदार शख्स था और सोहागपुर ब्लौक कांग्रेस का अध्यक्ष भी. झगड़ा इतना बढ़ा कि प्रदीप शर्मा और उस के नौकरों ने मिल कर लीना शर्मा की हत्या कर दी. हत्या चूंकि सोचीसमझी साजिश के तहत नहीं की गई थी, इसलिए इन तीनों ने पहले तो लीना शर्मा को बेरहमी से लाठियों और पत्थरों से मारा और गुनाह छिपाने की गरज से उस की लाश को ट्रैक्टरट्रौली में डाल कर नया कूकरा गांव ले जा कर जंगल में गाड़ दिया.

लाश जल्दी गले, इसलिए इन दरिंदों ने उस के साथ नमक और यूरिया भी मिला दिया था. हत्या करने के बाद प्रदीप शर्मा सामान्य रहते हुए कसबे में ऐसे घूमता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो. जाहिर है, वह यह मान कर चल रहा था कि लीना शर्मा के कत्ल की खबर किसी को नहीं लगेगी और जब उस की लाश सड़गल जाएगी, तब वह पुलिस में जा कर लीना शर्मा की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा देगा. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया.

लीना शर्मा की जिंदगी किसी अफसाने से कम नहीं कही जा सकती. जब वह बहुत छोटी थी, तभी उस के मांबाप चल बसे थे, इसलिए उस की व उस की बड़ी बहन हेमा की परवरिश मौसी ने की थी.

मरने से पहले ही मौसी ने अपनी जमीन इन दोनों बहनों के नाम कर दी थी. बाद में लीना शर्मा अपनी बहन हेमा के साथ भोपाल आ कर परी बाजार में रहने लगी थी. लीना शर्मा खूबसूरत थी और होनहार भी. लिहाजा, उस ने फौरेन ट्रेड से स्नातक की डिगरी हासिल की और जल्द ही उस की नौकरी अमेरिकी अंबैसी में बतौर कंसलटैंट लग गई. लेकिन अपने पति से उस की पटरी नहीं बैठी, तो तलाक भी हो गया. जल्द ही अपना दुखद अतीत भुला कर वह दिल्ली में ही बस गई और अपनी खुद की कंसलटैंसी कंपनी चलाने लगी.

40 साल की हुई तो लीना शर्मा ने दोबारा शादी करने का फैसला कर लिया, लेकिन शादी के पहले वह सोहागपुर की जमीन के झंझट को निबटा लेना चाहती थी, पर रिश्ते के मामा प्रदीप शर्मा ने उस के मनसूबों पर पानी फेर दिया. लीना शर्मा की हत्या एक राज ही बन कर रह जाती, अगर उस के दोस्त उसे नहीं ढूंढ़ते. जब लीना शर्मा तयशुदा वक्त पर नहीं लौटी और उस का मोबाइल फोन बंद रहने लगा, तो भोपाल में रह रही उस की सहेली रितु शुक्ला ने उस की गुमशुदगी की खबर पुलिस कंट्रोल रूम में दी.

पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रदीप शर्मा से संपर्क किया, तो वह घबरा गया और भांजी के गुम होने की रिपोर्ट सोहागपुर थाने में लिखाई, जबकि वही बेहतर जानता था कि लीना शर्मा अब इस दुनिया में नहीं है. देर से रिपोर्ट लिखाए जाने से प्रदीप शर्मा शक के दायरे में आया और जमीन के झगड़े की बात सामने आई, तो पुलिस का शक यकीन में बदल गया.

मामूली सी पूछताछ में प्रदीप शर्मा ने अपना जुर्म कबूल कर लिया, लेकिन शक अब लीना शर्मा की बहन हेमा पर भी गहरा रहा है कि वह क्यों लीना शर्मा के गायब होने पर खामोश रही थी? कहीं उस की इस कलयुगी मामा से किसी तरह की मिलीभगत तो नहीं थी? इस तरफ भी पुलिस पड़ताल कर रही है, क्योंकि अब उस पर सच सामने लाने का दबाव बढ़ता जा रहा है.

लीना शर्मा के दिल्ली के दोस्त भी भोपाल आ कर पुलिस के आला अफसरों से मिले और सोहागपुर भी गए. हेमा के बारे में सोहागपुर के लोगों का कहना है कि वह एक निहायत ही झक्की औरत है, जिस की पागलों जैसी हरकतें किसी सुबूत की मुहताज नहीं. खुद उस का पति भी स्वीकार कर चुका है कि वह एक मानसिक रोगी है. अब जबकि आरोपी प्रदीप शर्मा अपना जुर्म कबूल कर चुका है, तब कुछ और सवाल भी मुंहबाए खड़े हैं कि क्या लीना शर्मा का बलात्कार भी किया गया था, क्योंकि उस की लाश बिना कपड़ों में मिली थी और उस के जेवर अभी तक बरामद नहीं हुए हैं?

आरोपियों ने यह जरूर माना कि लीना शर्मा का मोबाइल फोन उन में से एक ने चलती ट्रेन से फेका था. लाश चूंकि 15 दिन पुरानी हो गई थी, इसलिए पोस्टमार्टम से भी बहुत सी बातें साफ नहीं हो पा रही थीं. दूसरे सवाल का ताल्लुक पुश्तैनी जायदाद के लालच का है कि कहीं इस वजह से तो लीना शर्मा की हत्या नहीं की गई है?

प्रदीप शर्मा ने अपनी भांजी के बारे में कुछ नहीं सोचा कि उस ने अपनी जिंदगी में कितने दुख उठाए हैं और परेशानियां भी बरदाश्त की हैं. लीना शर्मा अगर दूसरी शादी कर के अपना घर बसाना चाह रही थी तो यह उस का हक था, लेकिन उस की दुखभरी जिंदगी का खात्मा भी दुखद ही हुआ. MP News

Crime Story: जब एक बैनर ने पकड़वाया कातिल

Crime Story: पटना गया रेलवे लाइन के पास कई टुकड़ों में मिली लाश की गुत्थी को एक बैनर ने सुलझा दिया. 45 साला गीता की लाश के कुछ टुकड़े सरस्वती पूजा के लिए बने बैनर में लिपटे मिले थे. उस बैनर पर फ्रैंड्स क्लब, कुसुमपुर कालोनी, नत्थू रोड, परसा बाजार लिखा हुआ था. इस गुत्थी को सुलझाने के लिए सदर अनुमंडल पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार मंडल की अगुआई में जक्कनपुर थाना इंचार्ज अमरेंद्र कुमार झा और परसा बाजार थाना इंचार्ज नंदजी प्रसाद व दारोगा रामशंकर की टीम बनाई गई. पूछताछ के बाद पता चला कि उस बैनर को रंजन और मेकैनिक राजेश अपने साथ ले कर गए थे. पुलिस ने तुरंत राजेश को दबोच लिया. राजेश से पूछताछ करने के बाद कत्ल की गुत्थी चुटकियों में हल हो गई.

गीता का कत्ल उस के अपनों ने ही कर डाला था. कत्ल से ज्यादा दिल दहलाने वाला मामला लाश को ठिकाने लगाने के लिए की गई हैवानियत थी. गीता के पति उमेश चौधरी, बेटी पूनम देवी और दामाद रंजन ने मिल कर गीता का कत्ल किया था. रंजन और उस के दोस्त राजेश ने मिल कर लाश को 15 छोटेछोटे टुकड़ों में काटा. उमेश, पूनम और राजेश को पुलिस ने दबोच लिया है, जबकि रंजन फरार है. हत्या में इस्तेमाल किए गए 3 धारदार हथियार भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं.

रंजन और राजेश ने गीता की लाश को चौकी पर रखा और हैक्सा ब्लेड से सब से पहले सिर को धड़ से अलग किया. सिर को काटने के बाद खून का फव्वारा बहने लगा, तो खून को एक प्लास्टिक के टब में जमा कर लिया और टौयलेट के बेसिन में डाल कर फ्लश चला दिया. उस के बाद लाश के दोनों हाथपैरों को काटा गया.

गीता की बोटीबोटी काट कर उसे कई पौलीथिनों में बांध कर दूरदूर अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. धड़ को कुसुमपुर में ही पानी से भरे एक गड्ढे में फेंक दिया गया. सिर को जक्कनपुर थाने के पास गया फेंका गया. वहीं पर हत्या में इस्तेमाल किए गए गड़ांसे और हैक्सा ब्लेड वगैरह को फेंक दिया गया.

हाथपैरों के टुकड़ों को पटनागया पैसेंजर ट्रेन में रख कर रंजन और राजेश पुनपुन रेलवे स्टेशन पर उतर गए. पटना गया पैसेंजर ट्रेन जब गया स्टेशन पहुंची, तो रेलवे पुलिस ने एक डब्बे में लावारिस बैग बरामद किया. उस बैग में हाथपैर के टुकड़े मिलने से गया पुलिस ने 18 अप्रैल को पटना पुलिस को सूचित किया. पटना पुलिस को धड़ और सिर पहले ही मिल चुके थे. शरीर के सभी हिस्सों को जोड़ने के बाद पता चला कि वह एक ही औरत की लाश है.

हत्यारों द्वारा गीता के जिस्म के टुकड़ों को अलगअलग जगहों पर फेंकने की वजह से हत्या के मामले को 3 थानों में दर्ज कराना पड़ा. गया के जीआरपी थाने में हाथपैर मिलने का, परसा बाजार में सिर मिलने का और पटना के जक्कनपुर थाने में धड़ मिलने का मामला दर्ज किया गया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज कहते हैं कि अपराधी चाहे कितनी भी चालाकी कर ले, कोई न कोई सुबूत पुलिस के लिए छोड़ ही जाता है. गीता की हत्या करने वालों ने भी कानून की पकड़ से बचने के लिए पूरा उपाय किया था, पर उस के दामाद ने ऐसा सुबूत छोड़ दिया कि पुलिस आसानी से उन तक पहुंच गई.

कत्ल के 40 घंटे के भीतर पटना सदर पुलिस की टीम ने पूरे मामले का खुलासा कर दिया. 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गीता का कत्ल कर उमेश अपनी बेटी पूनम के साथ मसौढ़ी चला गया था. उस के बाद रंजन ने अपने साथ काम करने वाले दोस्त राजेश को घर पर बुलाया और उस की मदद से लाश को टुकड़ों में काट डाला. इस के बदले में रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था.

17 अप्रैल की रात को पूनम ने अपनी मां गीता को चिकन खाने के लिए घर पर बुलाया था. वहां उमेश और रंजन पहले से मौजूद थे. पूनम ने चिकन में नींद की गोलियां मिला दी थीं. खाना खाने के बाद गीता बेहोश हो गई. तकरीबन 5 घंटे के बाद गीता को होश आया, तो उसे काफी कमजोरी महसूस हो रही थी.

गीता ने कमरे में इधरउधर देखा, तो कोई नजर नहीं आया. किसी तरह से उस ने अपने मोबाइल फोन से तुरंत अपने प्रेमी अरमान को फोन किया और बताया कि उस की तबीयत काफी खराब लग रही है. इसी बीच गीता का दामाद रंजन कमरे में पहुंच गया और उस ने गीता को मोबाइल फोन पर किसी से बात करते हुए सुन लिया. रंजन ने गुस्से में आ कर गीता का गला दबा कर उसे मार डाला.

पुलिस की छानबीन में पता चला है कि गीता का अरमान नाम के शख्स से नाजायज रिश्ता था. इस वजह से पति और बेटी ने मिल कर उस की हत्या कर डाली. गीता हर महीने अपने पति उमेश से रुपए लेने पहुंच जाती थी और उस से उस की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा ले कर अपने प्रेमी अरमान को दे देती थी. पिछले 20 सालों से गीता और अरमान के बीच नाजायज रिश्ता था. गीता का पति उमेश सचिवालय के भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्टमैन था.

55 साल के उमेश की शादी 30 साल पहले मसौढ़ी के तरेगाना डीह की रहने वाली गीता से हुई थी. शादी के बाद गीता ससुराल में रहने लगी और उन के 3 बच्चे भी हुए. कुछ सालों के बाद उमेश लकवे का शिकार हो गया. पति की बीमारी का फायदा उठाते हुए गीता ने अपने पड़ोसी अरमान से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी और उस के बाद जिस्मानी रिश्ते भी बने. वह ज्यादा से ज्यादा समय अरमान के साथ ही गुजारती थी.

गीता की इस हरकत से उमेश और उस की बेटियां गुस्से में रहती थीं. उन्होंने कई दफा गीता को समझाने और परिवार को संभालने की बात की, पर गीता पर उन की बातों का कोई असर नहीं होता था. यही वजह थी कि गीता का इतनी बेरहमी से कत्ल किया गया.

गांव वालों के ताने सुन कर उमेश परेशान रहने लगा था और उस ने अपना पुश्तैनी घर भी छोड़ दिया था. उस के बाद उमेश ने कुसुमपुर वाला घर भी छोड़ दिया. कभीकभी वह मसौढ़ी में अपनी ससुराल वाले घर में रहता था, तो कभी पटना में रहता था.

एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि हत्यारों ने हत्या में इस्तेमाल किए गए गंड़ासे और हैक्सा ब्लेड को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. बैनर पर कुसुमपुर फ्रैंड्स क्लब का पता लिखा हुआ था. उसी पते के सहारे पुलिस कुसुमपुर पहुंची और फ्रैंड्स क्लब का पता कर के हत्यारों तक आसानी से पहुंच गई. Crime Story

UP Crime: होटल के कमरे में प्यार का खूनी अंत, लाश के साथ बीती पूरी रात

UP Crime: एक ऐसी खौफनाक घटना सामने आई है, जिस ने प्यार जैसे रिश्ते को शर्मसार कर दिया. जिस हाथ को थामकर साथ निभाने की कसमें खाई जाती हैं, उसी हाथ ने प्रेमिका की जान ले ली. यह कहानी है उस प्रेमी की, जो प्यार के नाम पर पनपी नफरत और गुस्से से हैवान बन गया. मामूली विवाद से शुरू हुआ झगड़ा इतना बढ़ गया कि प्रेमी ने  प्रेमिका को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया और उस की पसलियां तक तोड़ डालीं.

सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी वजह थी, जिस ने प्यार को हिंसा में बदल दिया? आइए जानते हैं इस दिल दहला देने वाली क्राइम स्टोरी की पूरी सच्चाई.

यह शर्मनाक घटना उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई है. 10 जनवरी, 2026 को सफाई कर्मचारी प्रवीण कुमार अपनी प्रेमिका आरती को एक होटल में ले गया. कमरे में दोनों ने साथ बैठकर शराब पी. नशे के दौरान किसी मामूली बात को ले कर दोनों के बीच विवाद हो गया. यह विवाद इतना बढ़ गया कि गुस्से में प्रवीण ने आरती पर लातघूंसे बरसाने शुरू कर दिए.

पुलिस के मुताबिक आरती और प्रवीण के बीच पिछले 3 सालों से प्रेम संबंध थे. आरती के पति की पहले ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे थे, जबकि प्रवीण भी अपनी पत्नी से अलग रह रहा था. पुलिस जांच में सामने आया कि शराब के नशे में आरती ने गुस्से में प्रवीण का चेहरा नोच लिया था. इसी बात से बौखलाकर प्रवीण ने उस पर बेरहमी से हमला किया. लगातार पिटाई के कारण आरती की कई पसलियां टूट गईं और अंदरूनी चोटों की वजह से उस की मौत हो गई. आरती ने खुद को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन आरोपी का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था.

हत्या के बाद प्रवीण पूरी रात शव के पास बैठा रहा. 11 जनवरी की सुबह जब वह होटल से निकलने लगा तो होटल के एक कर्मचारी ने उसे रोक लिया. महिला के बारे में पूछने पर प्रवीण गोलमोल जवाब देने लगा, जिस से उस कर्मचारी को शक हो गया.

इस के बाद में उस ने खुद पुलिस को फोन कर मैडिकल इमरजेंसी होने का नाटक किया, लेकिन सच सामने आ गया. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और उस से  पूछताछ जारी है. UP Crime

Emotional Story: मेरी ममता की आवाज

Emotional Story: लोगों ने बहुत कहा कि मुझे एक ही बेटी पैदा हुई है, लेकिन मैं मां थी, इसलिए मुझे पता था कि मुझे एक नहीं, 2 बेटियां पैदा हुई थीं. और मैं ने यह बात साबित भी कर दी, लेकिन इस में 9 साल लग गए.

शादी के 2 सालों बाद मैं ने जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था, लेकिन डिलीवरी के बाद जब मैं वार्ड में पहुंची तो मुझे बताया गया कि मेरे एक ही बच्ची पैदा हुई थी. जब मैं लेबर रूम में थी, तब प्रसव पीड़ा के बीच मुझे इतना तो अहसास था कि मैं ने 2 बच्चे पैदा किए थे. वहां किसी ने कहा भी था कि जुड़वां लड़कियां हुई हैं. जब मैं ने 2 लड़कियां पैदा की थीं तो एक कहां चली गई? मैं ने सास से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि एक ही लड़की पैदा हुई थी. मुझे सास पर ही शक हुआ, क्योंकि वह मुझ से पहले कई बार कह चुकी थीं कि मुझे लड़का ही चाहिए, इसलिए लड़का पैदा करना.

मुझे लगा कि सास ऐसे ही कह रही होंगी, इसलिए मैं तब कुछ नहीं बोली थी. लेकिन जब अस्पताल से बच्ची गायब हो गई तो मुझे उन की धमकी याद आ गई. लेकिन मैं वहां कर भी क्या सकती थी, इसलिए उस बच्ची के लिए बेजार रोतीबिलखती  रही, पर वहां मुझ पर किसी को तरस नहीं आया. सब यही कहते रहे कि मुझे एक लड़की ही पैदा हुई होगी, सास भला बच्ची क्यों गायब करेगी. मान लिया जाए कि उसे अगर पोते की चाहत थी तो वह एक ही क्यों, दोनों लड़कियों को गायब कर देती. लेकिन उन लोगों की बातें मेरे दिल को तसल्ली नहीं दे पा रही थीं. मुझे ताज्जुब इस बात पर हो रहा था कि एक अस्पताल के लेबर रूम से बच्ची को आखिर कैसे गायब कर दिया गया.

यह काम बिना नर्स की मिलीभगत के बिलकुल संभव नहीं था. लेकिन नर्स जसपाल के व्यवहार और सेवा भाव को देख कर उस पर अंगुली उठाना मेरे दिल को गवारा नहीं लग रहा था. बहरहाल, घर वाले मुझे आश्वस्त करते हुए अस्पताल से घर ले आए. मेरे न मानने से घर में क्लेश होने लगा. गनीमत यह थी कि ससुराल के अन्य लोगों की तरह पति अशोकजीत ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. इस का नतीजा यह निकला कि उस क्लेश की वजह से मुझे और पति को पुश्तैनी घर छोड़ कर किराए के घर में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. किराए के मकान में शिफ्ट होने के बाद हमें बहुत आर्थिक परेशानियां हुईं, इस के बावजूद भी पति ने पुश्तैनी घर में जाने से मना कर दिया. मेरी बात पर सास ने उन्हें बड़े कड़वे बोल बोले थे.

उन्होंने कहा था, ‘‘डायन भी 7 घर छोड़ देती है, लेकिन तेरी बहू ने तो मुझ पर तोहमत लगाने में डायनों को भी पीछे छोड़ दिया. उस ने मुझ पर यह आरोप तो लगा दिया, लेकिन अब मैं हकीकत में ऐसा ही कर के दिखाऊंगी. जिस बच्ची पर यह इतरा रही है, उसे मैं ऐसे गायब कर दूंगी कि सारी जिंदगी उसे नहीं ढूंढ पाएगी. पता नहीं एक कैसे पैदा कर दी, बात करती है 2-2 की.’’

घर में सास ने जो क्लेश किया था, उसे याद कर के अशोकजीत सिहर उठते थे. मां के रौद्र रूप की वजह से ही उन्होंने उस घर से दूर रहने का फैसला किया था. मुझे तो यही चिंता खाए जा रही थी कि मेरी एक बेटी तो पहले ही छिन गई, कहीं दूसरी भी न छिन जाए. कुछ दिनों बाद मेरे पति अशोक को भी लगने लगा कि मुझे 2 बेटियां पैदा होने की शायद गलतफहमी पैदा हुई थी. पति ने जब भी मुझे समझाना चाहा, मैं जोरजोर से रोने लगती. तब मैं कहती, ‘‘मां हूं मैं. इस बात की खबर मुझे नहीं, किसी और को होगी कि मुझे एक नहीं 2 बच्चे पैदा हुए. मैं अब भी पूरे दावे के साथ कह रही हूं कि तुम्हारी मां ने ही मेरी एक बेटी को गायब किया है.’’

अशोक मेरे दर्द को समझता था, इसलिए वह अकसर समझाने की कोशिश करता. लेकिन मैं उस अनदेखी बेटी को भुला नहीं पा रही थी. पति को जब लगा कि मैं बेटी वाली बात पर नरवस हो जाती हूं तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करनी ही बंद कर दी. वह मुझे खुश रखने की पूरी कोशिश करते. लेकिन मैं न कभी खुश रह पाई और न अपनी अनदेखी बेटी भुला पाई. वक्त का पहिया घूमता रहा. देखतेदेखते मेरी बेटी 9 साल की हो गई. इस की जुड़वा बहन भी आज इतनी ही बड़ी होगी. उस की याद में आंसू बहाते हुए मैं अपनी इस बेटी में दूसरी बेटी का रूप देखने की कोशिश करती. उस समय मैं भावुक भी हो उठती थी. उस बेटी को मैं भले ही भुला नहीं पा रही थी, लेकिन उसे वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी थी.

लेकिन एक दिन अजीब घटना घटी. बाजार में खरीदारी करते समय मुझे एक अनजान औरत मिली. मुझे देखते ही उस ने कहा, ‘‘अरे, तुम तो वही स्वीटी हो न, जिस ने सिविल अस्पताल में जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था, जिस में से एक बच्ची को नर्स ने बेच दिया था?’’

‘‘हां,’’ मैं हैरान हो कर बोली, ‘‘मगर तुम कौन हो, मेरा नाम तुम कैसे जानती हो? और तुम जिस बच्ची को बेचने की बात कह रही हो, तुम्हें कैसे पता चली?’’

‘‘मेरी छोड़ो, तुम अपनी बताओ कि क्या तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई थी?’’ उस ने पूछा, ‘‘तुम ने शोर तो बहुत मचाया था, इस से मुझे लगा था कि तुम्हें तुम्हारी बेटी मिल गई होगी?’’

‘‘मेरे शोर मचाने का कोई फायदा नहीं हुआ था. मेरी वहां किसी ने नहीं सुनी. लेकिन बहन एक बात बताओ, तुम्हें कैसे पता कि मेरी बेटी को नर्स ने बेचा था.’’ मैं ने उस महिला से बड़ी विनम्रता से पूछा.

‘‘नर्स जसपाल कौर को मैं ने बच्ची को किसी और के हाथों में सौंपते हुए अपनी आंखों से देखा था. उस ने जिस आदमी को बच्ची दी थी, उस ने नर्स को नोटों की गड्डी भी दी थी. जिन दिनों तुम अस्पताल में भरती थी, उन दिनों हमारी भी एक रिश्तेदार वहां भरती थी. मैं उसे देखने छोटी बहन के साथ रोजाना अस्पताल जाया करती थी. उसी आनेजाने से नर्स जसपाल कौर से हमारी जानपहचान हो गई थी.’’

उस महिला की बात से मुझे बल मिला. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस के आगे तुम ने वहां और क्या देखा था, मतलब जिसे मेरी बच्ची सौंपी थी, वह कौन था?’’

‘‘जिसे तुम्हारी बच्ची सौंपी थी उस शख्स को तो मैं नहीं जानती. लेकिन जिस समय नर्स उस आदमी को बच्ची सौंप रही थी, मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. उसी दौरान नर्स ने मुझे देख लिया था. तुम्हारा शोर खत्म होने के बाद नर्स मेरे पास आई थी. उस ने मुझे धमकाते हुए कहा था कि चुपचाप तमाशा देखती रहो. ध्यान रखो, अगर मैं फंस गई तो यही कहूंगी कि बच्ची उठा कर मैं ने उसे दिया था. तब उस के साथसाथ मैं भी जेल जाऊंगी.’’

‘‘बहन, तुम से मेरी एक गुजारिश है, बस नर्स जसपाल कौर का पता बता दो, अपनी बेटी को तो मैं पाताल से भी ढूंढ लाऊंगी.’’ मैं ने उस महिला से कहा.

‘‘वह तो अब भी सिविल अस्पताल में ही है. मगर देखो, इस मामले में मेरा कहीं भी जिक्र नहीं आना चाहिए वरना मैं अपनी कही बातों से साफ मुकर जाऊंगी.’’ उस ने कहा.

‘‘तुम इस की चिंता मत करो. मैं किसी से तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूंगी. मुझे अपनी बच्ची से मतलब है. पिछले 9 सालों से तड़प रही हूं मैं अपनी उस औलाद के लिए. उस नर्स ने मेरी बेटी को किस के हाथों बेचा है, बस इतना पता लग जाए.’’ मैं ने उसे भरोसा दिया.

बाजार से सामान ले कर मैं जल्दी से घर लौट आई. मैं ने नर्स जसपाल के पास सीधे जाना उचित नहीं समझा, क्योंकि उस ने उस समय बच्ची के बारे में कुछ नहीं बताया था तो अब 9 साल बाद क्यों बताती. अस्पताल के लोग उलटे मुझे ही बेवकूफ बनाते. इसलिए मैं सीधे थाने पहुंची. लेकिन थाना पुलिस ने मेरी बात को तवज्जो नहीं दी. उन्होंने कहा कि इतने पुराने मामले में वे बिना सबूत के कुछ नहीं कर सकते. निराश हो कर मैं घर लौट आई. इस बारे में मैं ने अशोक से बात की तो अगले दिन वह मुझे ले कर एसएसपी के यहां गए. हम ने अपनी पीड़ा उन से कही. उन्होंने हमारी बात ध्यान से सुनी. मेरा यह अजीबोगरीब मामला था.

क्योंकि एक मां 9 साल बाद अपनी उस बच्ची के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराना चाह रही थी, जिस की उस ने शक्ल तक नहीं देखी थी. एसएसपी साहब ने हमारे सामने ही कुछ पुलिस अफसरों को बुला कर इस बात पर चर्चा की. मीटिंग खत्म हो गई, लेकिन एसएसपी समझ नहीं पाए कि उन्हें इस मामले में क्या काररवाई करनी चाहिए. मैं ने जो शिकायत उन्हें दी थी. उस में नर्स जसपाल कौर के अलावा अपनी सास को भी नामजद करने की बात कही थी.

फिलहाल एसएसपी ने यह कह कर हमें वापस भेज दिया कि वह इस मामले पर गहराई से अध्ययन कर के ही कुछ कर पाएंगे. हमें लगा कि थाना पुलिस की तरह वह भी हमें टरका रहे हैं. अब इतने बड़े अफसर से हम कह भी क्या सकते थे. इसलिए भरे मन से घर लौट आए. उन के यहां जा कर अपनी बच्ची तक पहुंचने की जो थोड़ीबहुत आस मुझे हुई थी, उन की बातों से मुझ से वह भी दूर होती दिखाई देने लगी थी. लेकिन कुछ दिनों बाद एसएसपी ने हमें अपने औफिस में बुला कर एक बार फिर हमारी पूरी दास्तान गौर से सुनी. इस के बाद उन्होंने मेरी सास और नर्स जसपाल कौर को बुलवाया. उन्होंने उन दोनों से भी पूछताछ की. पूछताछ में दोनों ज्यादा देर तक झूठ नहीं बोल सकीं. आखिर उन्होंने कबूल कर लिया कि मुझे 2 बेटियां पैदा हुई थीं. उन में से एक को उन्होंने एक बेऔलाद आदमी को बेच दी थी.

अशोक को जब पता चला कि इस काम में उन की मां का भी हाथ था तो वह दंग रह गए. जब मैं उस समय सास पर बच्ची चोरी का आरोप लगा रही थी तब उन्होंने मुझ पर ही गलतफहमी होने का आरोप लगाया था. पूछताछ में मेरी बेटी को चोरी करने की उन्होंने जो कहानी बताई थी, इस प्रकार निकली. इंदरजीत सिंह को औलाद नहीं थी. वह नर्स जसपाल कौर को अच्छी तरह जानते थे. उस से वह कई बार मिल कर कह चुके थे कि किसी लावारिस बच्चे का मामला उस की जानकारी में आए तो वह उसे बता दे. वह उसे अपनी औलाद बना लेंगे. नर्स जसपाल ने उन से कहा था कि वह उन के लिए बच्चे का इंतजाम कर देगी, मगर इस के लिए मोटी रकम खर्च करनी होगी.

इंदरजीत कई फैक्ट्रियों के मालिक थे. उन के पास पैसों की कमी नहीं थी, इसलिए उन्होंने बच्चे के लिए मुंहमांगी रकम देने की हामी भर ली थी. बच्चा पैदा होने के लिए जब मुझे अस्पताल लाया गया तो मेरी सास एक ही रोना रोती रही थीं, ‘‘हाय रब्बा, देखना स्वीटी के कहीं लड़की न हो जाए, इसे तो बेटा ही होना चाहिए, तभी मेरा वंश चलेगा.’’

सास ने यही बात नर्स जसपाल कौर के सामने भी कही तो उस ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों बड़ी बी, लड़का न हो कर लड़की हो गई तो क्या करोगी?’’

‘‘अरी, शुभशुभ बोल. लड़की हो गई न तो उसे यहीं मार कर गाड़ दूंगी, अस्पताल की मिट्टी में.’’ मेरी सास ने नर्स जसपाल कौर से कहा.

मैं उस अस्पताल में चैकअप के लिए जाती रहती थी, इसलिए उस नर्स को पता था कि मेरे पेट में जुड़वां बच्चे हैं. तभी तो उस ने मेरी सास से सीधे कहा, ‘‘देख माई, तेरी बहू को होने हैं जुड़वां बच्चे. एक को ला कर मेरे हवाले कर देना, मुंहमांगी रकम दूंगी.’’

‘‘सुन मेरी बात. लड़कियां हुईं तो भले दोनों ले जाना, लड़के हुए तो नहीं ले जाने दूंगी एक को भी.’’

आखिर समय आने पर मैं ने जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया. मेरी सास वहीं थी. उस ने एक बच्ची उठा कर जसपाल के हवाले कर दी. यह काम उस ने इतनी होशियारी से किया कि किसी को कुछ पता नहीं चला. यह भी संभव था कि इस अपराध में अस्पताल के कुछ अन्य लोग पहले से मिले रहे हों. जसपाल के बुलाने पर इंदरजीत सिंह भी वहां पहुंचे हुए थे. उसे अच्छीखासी रकम दे कर वह बच्ची को अपने साथ ले गए. उन लोगों ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी थी कि मेरे शोर मचाने के बाद भी मेरी बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया. फिर तो यह मामला कुछ ऐसा टला कि नर्स जसपाल और इस मामले से जुड़े अन्य लोग इस तरह भूल गए कि कभी यह मामला खुल भी सकता है.

लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी. और आखिर यह मामला खुल ही गया. पूरे 9 साल बाद केस खुलने पर पुलिस ने इंदरजीत के यहां दबिश दी. वह सचमुच बहुत बड़े आदमी थे. उन की बहुत बड़ी कोठी थी. मैं ने जब उन के यहां पल रही लड़की को देखा तो मेरा दिल खिल उठा. उस लड़की की शक्ल मेरी दूसरी बेटी से हूबहू मिल रही थी. लेकिन वह जिस शानोशौकत से उन के यहां रह रही थी, उस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. इंदरजीत ने उस का दाखिला शहर के एक नामचीन स्कूल में करा रखा था. जमाने भर की सुखसुविधाएं उसे मुहैया थीं. हमें वह पहली बार देख रही थी, इसलिए पहचानने तक से उस ने मना कर दिया.

उस के लिए तो इंदरजीत सिंह और उन की पत्नी ही उस के असली मांबाप थे. जो सुविधाएं उसे वहां मिल रही थीं, हम उसे ताउम्र नहीं दे सकते थे. पुलिस टीम ने उन्हें एसएसपी के सामने पेश किया. पूरी बात सामने आने के बाद एसएसपी ने अशोक और मुझे विश्वास में ले कर समझाना शुरू किया कि हम लोग आगे जो भी निर्णय लें, ठंडे दिमाग से सोचसमझ कर पूरी गहराई से लें. खासकर इस बात का हम ध्यान रखें कि इंदरजीत सिंह के यहां पल रही बच्ची के भविष्य पर कोई आंच न आए. जब हम ने गहराई से सोचा तो हमारे दिमाग में बारबार यही बात आती रही कि हमारी दूसरी बेटी का भविष्य इंदरजीत के यहां ही सुरक्षित है. जो परवरिश इंदरजीत के यहां बच्ची को मिल रही है, वैसी उसे हमारे यहां कदापि नहीं मिल सकती.

इस के बाद मेरी ममता ने कुछ इस तरह उछाल मारा कि मामला दर्ज करवाने की बात मैं भूल गई. उसी समय मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरी दूसरी बेटी इंदरजीत के यहां रहती है, तभी उस का भविष्य संवर सकता है. इस से हमारा संबंध भी बना रहेगा और दोनों बहनें साथसाथ रह सकती हैं. बेटी के भविष्य को देखते हुए मैं ने और अशोक ने इतनी बड़ी कुर्बानी देने का फैसला कर लिया. इस के बाद अपनी सोच से इंदरजीत सिंह को अवगत कराया. खुश होते हुए उन्होंने हमारे प्रस्ताव को स्वीकार लिया. इस के बाद इंदरजीत के साथ कचहरी जा कर बच्ची को विधिवत गोद दिए जाने की औपचारिकताएं पूरी करवाईं.

इस एवज में मेरे पति और मैं ने इंदरजीत से कोई तोहफा लेने से इनकार कर दिया. पैसा लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था. लेकिन हां, इंदरजीत ने दोनों बच्चियों को बेहतरीन परवरिश का वादा किया और उन्होंने दोनों बच्चियों को एक बड़े स्कूल के हौस्टल में दाखिल करवा दिया. हर हफ्ते मैं पति के साथ दोनों बेटियों से मिलने जाती रही. दोनों ही पढ़ाई में होशियार थीं. यह क्रम कभी नहीं टूटा.

इसी तरह वक्त आगे बढ़ता गया. आज दोनों लड़कियां एमबीबीएस कर रही हैं. एमबीबीएस के बाद की उच्च शिक्षा के लिए उन का विदेश जाने का इरादा है. दोनों बेटियों की सफलता पर मैं और पति दोनों खुश हैं. हमें उम्मीद है कि वे आसमान की बुलंदियों को छुएंगी. मैं ने गलत किया या सही, मैं नहीं जानती. मगर किया वही, जो मेरी ममता ने मुझ से करवाना चाहा. Emotional Story

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Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल – फिल्मों की ही नहीं, ठगी की भी नायिका

Crime Story Hindi: लीना मारिया पौल ने दक्षिण भारतीय ही नहीं बौलीवुड में भी अपनी पहचान बना ली थी. लेकिन बालाजी के प्यार में पड़ कर उस ने अपना बनाबनाया कैरियर तो बरबाद किया ही, अपराध की राह भी पकड़ ली.

29 मई की सुबह 8 बजे के आसपास मुंबई के उपनगर गोरेगांव के पौश इलाके तिलक रोड स्थित बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स के नीचे एकएक कर के पुलिस की कई गाडि़यां आ कर रुकीं तो देखने वालों को हैरानी के साथ उत्सुकता भी हुई. इमारत में अचानक ऐसा क्या हो गया कि इतनी सुबह पुलिस की इतनी गाडि़यां आ गईं. कौन क्या सोच रहा है, पुलिस को इस से क्या मतलब था? वे अपनी गाडि़यों से उतरे और लिफ्ट से इमारत की 32वीं मंजिल पर जा कर एक फ्लैट की डोरबेल बजाई. जैसे ही फ्लैट का दरवाजा खुला, उस में रहने वाली एक युवती और उस के साथी युवक को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. आखिर कौन थी वह युवती और युवक, पुलिस ने उन्हें हिरासत में क्यों लिया था? यह सब इमारत वालों को अगले दिन तब पता चला, जब उन के बारे में अखबारों में विस्तार से छपा.

पता चला कि युवती का नाम लीना मारिया पौल और उस के साथ पकड़े गए युवक का नाम बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद शेखर था. लीना ने दक्षिण भारत की कई फिल्मों में ही नहीं, 1-2 हिंदी फिल्मों में भी काम किया था. दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. उन के ऊपर चेन्नई और मुंबई में करोड़ों रुपए की ठगी का आरोप था. दोनों को गिरफ्तार किया था मुंबई क्राइम ब्रांच के आर्थिक अपराध शाखा के सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी, शिवाजी फडतरे, इंसपेक्टर अशोक खेडकर, जगदीश कुलकर्णी, तनवीर शेख, सबइंसपेक्टर कदम ने. इन की मदद के लिए एक दरजन पुलिस कांस्टेबल भी थे.

दरअसल, इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे को सूचना मिली थी कि बहुमंजिली इमारत इंपीरियल हाइट्स की 32वीं मंजिल के एक फ्लैट में रहने वाली फिल्म अभिनेत्री लीना मारिया पौल बालाजी की मदद से लगभग एक साल से कुछ रसूखदारों की मदद से जालसाजी का एक बड़ा रैकेट चला रही है. एक कंपनी बना कर उस के जरिए तरहतरह की लुभावनी स्कीमों में लोगों की मेहनत की कमाई को कम समय में डबल ट्रिपल और चौगुना करने का लालच दे कर उन्हें ठगी का शिकार बना रही है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए सीनियर इंसपेक्टर दिनेश जोशी और शिवाजी फडतरे ने तत्काल इस की सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों जौइंट पुलिस कमिश्नर धनंजय कमलाकर और एडिशनल पुलिस कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी को दी. दोनों अधिकारियों ने पहले मामले का गहराई से अध्ययन किया, उस के बाद काररवाई करने के आदेश दिए. वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर ही दोनों पुलिस अधिकारियों ने टीम बना कर अभिनेत्री लीना मारिया पौल और बालाजी के फ्लैट पर छापा मार कर गिरफ्तार किया था. क्राइम ब्रांच के औफिस ला कर जब दोनों से पूछताछ की गई तो उन के द्वारा की जाने वाली ठगी की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

27 वर्षीया लीना मारिया पौल केरल के रहने वाले सी.एस. पौल की बेटी थी. वह दुबई स्थित मैस्को कंपनी में इंजीनियर थे, और परिवार को वहीं साथ रखते थे. इसलिए लीना वहीं पैदा ही नहीं, पलीबढ़ी भी. लीना ने बीडीएस (बैचलर औफ डैंटल सर्जरी) की पढ़ाई की. दांतों की डाक्टर बनने के बाद प्रैक्टिस करने या नौकरी करने के बजाय अचानक उस पर हीरोइन बनने का भूत सवार हो गया. दरअसल, लीना के मातापिता अकसर नातेरिश्तेदारों और घर वालों से मिलनेजुलने केरल आते रहते थे. मातापिता के साथ आनेजाने में लीना को भारत आनाजाना अच्छा लगने लगा. बाद में वह समझदार हो गई तो अकेली भी भारत आने लगी.

लीना खूबसूरत तो थी ही, उस की फिगर भी आकर्षक थी, इसलिए उस ने भारतीय फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनों से अपनी तुलना की तो उसे लगा कि वह भी हीरोइन बन सकती है. पैसा और शोहरत के लालच में डाक्टरी का पेशा छोड़ कर वह हीरोइन बनने के सपने देखने लगी. लीना ने अपनी इच्छा पिता को बताई तो उन्हें हैरानी हुई. उन्होंने लीना को समझाया कि यह सब इतना आसान नहीं है. लेकिन लीना ने तो ठान लिया था, इसलिए वह जिद पर अड़ गई. आखिर पिता को ही झुकना पड़ा. मजबूरी में ही सही, उन्होंने अनुमति दे दी. लीना दुबई से चेन्नई पहुंच गई. क्योंकि उसे लगता था कि दक्षिण भारतीय फिल्मों में उसे आसानी से काम मिल जाएगा.

लीना को पता था कि सीधे फिल्मों में काम मिलना आसान नहीं है. इसलिए वह चेन्नई पहुंच कर मौडलिंग के लिए हाथपैर मारने लगी. इस के लिए उस ने अपना पोर्टफोलियो तैयार करा कर बड़ीबड़ी एजेंसियों से संपर्क किया. इस सब की बदौलत उसे कुछ विज्ञापन मिले तो उस की खूबसूरती और आकर्षक फिगर कुछ दक्षिण भारतीय फिल्म मेकरों के सामने आई. अंतत: उसे दक्षिण भारत की कुछ फिल्में मिल ही गईं और तो वह बड़े परदे पर आ गई. उस की कुछ फिल्में बौक्स औफिस पर सफल भी रहीं. इस तरह लीना दक्षिण भारतीय फिल्मों की हीरोइन बन गई. चूंकि वह दक्षिण भारतीय फिल्मों तक सीमित नहीं रहना चाहती थी, इसलिए हिंदी फिल्मों में काम पाने की कोशिश करती रही.

उस की कोशिश सफल रही और फिल्म निर्माता सुजित सरकार की नजर पड़ गई. उन्होंने लीना को अपनी हिंदी फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में काम दे दिया. इस फिल्म में उसे लिट्टे के एक विद्रोही सदस्य की भूमिका करनी थी. फिल्म में हीरो थे जौन अब्राहम. कहते हैं, लीना की इस सफलता का राज था वे पार्टियां, जिन में वह अकसर जाया करती थीं. लीना फिल्मी पार्टियों की हौट गर्ल मानी जाती थी. शायद इसलिए जल्दी ही उस समय पुलिस की हिटलिस्ट में उस का नाम आ गया, जब वह चेन्नई और दिल्ली पुलिस के जौइंट औपरेशन में अपने बौयफ्रैंड बालाजी के साथ ठगी के आरोपों में पकड़ी गई.

बालाजी ने लीना को अपने प्यार के प्रभाव में कुछ इस तरह लिया था कि वह फिल्मों तक की डगर भूल कर उस के हर अच्छेबुरे कामों में उस का साथ देने लगी थी. उस ने लीना की जिंदगी ही नहीं, उद्देश्य तक बदल कर रख दिए थे. मूलरूप से बंगलुरु का रहने वाला बालाजी सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्व का युवक था. वह लोगों को अपना परिचय बड़े ही रुतबेदार अंदाज में देता था. वह खुद को कभी कर्नाटक कैडर का आईएएस अधिकारी तो कभी करुणानिधि का पोता बताता था. वह कभी अपना नाम शेखर रेड्डी तो कभी सुकेश चंद्रशेखर या बालाजी बताता था.

बालाजी ने लीना को किसी फाइवस्टार पार्टी में देखा था. उस समय उस ने लीना से खुद को पूर्व मुख्यमंत्री करणानिधि का पोता और एक बड़ा बिल्डर बताया था. उस ने लीना की फिल्में देखी थीं. साथ ही वह उसे पसंद भी करता था. इसीलिए जब वह उस से मिला तो उसे लीना से प्यार हो गया था. वह किसी भी हालत में लीना को पाना चाहता था. आखिर उस ने अपनी झूठी बातों से लीना को अपने प्रेमजाल में फांस ही लिया. लीना को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उस ने फिल्म निर्माता निर्देशक रामगोपाल वर्मा को अपना जिगरी दोस्त बताया था.

लीना ने बिना सोचेविचारे बालाजी की बातों पर विश्वास कर लिया. उसे लगा कि जिस रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में काम करने के लिए लड़कियां लालायित रहती हैं, बालाजी उसे उन की फिल्मों में आसानी से काम दिला देगा. इस के बाद उस की किस्मत चमक जाएगी. इस मुलाकात के बाद लीना की बालाजी से अकसर मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों में लीना उस के बारे में कुछ नहीं जान पाई. शायद वह उस से भी बड़ा ऐक्टर था.

लीना और बालाजी की मुलाकातें बढ़ीं तो जल्दी ही उन में गहरी दोस्ती हो गई. इस बीच बालाजी ने लीना को रामगोपाल वर्मा के अलावा और भी कई बौलीवुड की हस्तियों से मिलवाने का लालच दिया. लीना बालाजी के रहनसहन और बातचीत से काफी प्रभावित थी. इसलिए उन की यह दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. परिणामस्वरूप लीना ने अपना तनमन बालाजी को सौंप दिया. इस के बाद दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. बालाजी ने लीना को अपने प्यार के जाल में कुछ इस तरह फंसाया कि उस की यह सच्चाई जानने के बाद भी कि वह एक बड़ा जालसाज है, लीना उस से अलग नहीं हो पाई. सन 2013 में लीना और जौन अब्राहम द्वारा अभिनीत फिल्म ‘मद्रास कैफे’ रिलीज हुई.

फिल्म ठीक चली. लीना के अभिनय की काफी तारीफ हुई. अगर वह चाहती तो उसे फिल्मों में आगे भी अच्छी भूमिकाएं मिल सकती थीं. लेकिन बालाजी के साथ आने के बाद उस ने ऐसी कोई कोशिश ही नहीं की. उस ने खुद फिल्मों से नाता तोड़ लिया. क्योंकि जितनी मेहनत कर के लीना साल भर में कमाती थी, उतना पैसा तो बालाजी एक झटके में कमा लेता था. शायद इसी वजह से उस का फिल्मों से मोहभंग हो गया था. वह बालाजी के साथ उस के ठगी के कारोबार में उस की मदद करने लगी थी. लीना के साथ आने के बाद बालाजी का दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा था. लोगों पर अपना प्रभाव जमाने के लिए वह लीना को साथ रखता था.

लीना के साथ आने के बाद बालाजी ने बड़ीबड़ी हस्तियों को ठगी का शिकार बनाया. उन दिनों कोच्चि के रहने वाले कुछ बिजनैसमैनों ने अपने प्रोजैक्टों और शोरूम के बिजनैस प्रमोशन के लिए उस का उद्घाटन फिल्मी हस्तियों से करवाना शुरू किया. इन्हीं में एक नया नाम इमैनुवल सिल्क टैक्सटाइल कंपनी के मालिक बैजू साहब का भी था. बैजू साहब 2012 में चेन्नई में अपना एक शोरूम खोल रहे थे. वह अपने इस शोरूम का उद्घाटन किसी बड़ी फिल्मी हस्ती से कराना चाहते थे. इस बात की जानकारी बालाजी को हुई तो वह बैजू साहब से मिला, और उन्हें उन के शोरूम के उद्घाटन के लिए बड़ी अभिनेत्री कैटरीना कैफ का नाम सुझा कर 20 लाख रुपए का खर्च बताया.

बैजू साहब बालाजी से किसी फाइवस्टार पार्टी में मिल चुके थे. इसलिए बैजू ने सहज ही बालाजी पर विश्वास कर के 20 लाख रुपए दे दिए. इस के बाद कैटरीना कैफ को शोरूम के उद्घाटन के लिए लाने की बात कौन कहे, वह खुद ही गायब हो गया. कई दिनों तक बैजू साहब बालाजी को फोन करते रहे, लेकिन जब बालाजी का कुछ पता नहीं चला तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वह बालाजी द्वारा ठग लिए गए हैं. इस के बाद उन्होंने थाना कलसमरी जा कर बालाजी के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करा दी. इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर अब्दुल लतीफ को सौंपी गई.

एक ओर पुलिस बालाजी की तलाश कर रही थी, दूसरी ओर शातिरदिमाग बालाजी चेन्नई के अन्नानगर पश्चिम एक्सटेंशन में फ्यूचर टेक्निक प्राइवेट लिमिटेड नामक फरजी कंपनी खोल कर मोटा हाथ मारने की तैयारी में था. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित एम बाला सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को कंपनी का मैनेजिंग डायरैक्टर बना कर कैनरा बैंक से 19 करोड़ रुपए का लोन ले लिया. पैसा हाथ में आते ही वह लीना के साथ भूमिगत हो गया.

जब यह धोखाधड़ी सामने आई तो बैंक अधिकारियों के होश उड़ गए. बैंक का डिप्टी जनरल मैनेजर टीएस नालाशिवन ने बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 170 और 34 के तहत थाने में शिकायत दर्ज कराई. मामला एक बड़ी ठगी और सरकारी पैसों का था, इसलिए पुलिस ने तत्काल काररवाई करते हुए कंपनी के बेकुसूर मैनेजिंग डायरैक्टर टी.एस. सुब्रमण्यम और उन की पत्नी चित्रा सुब्रमण्यम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि असली ठग बालाजी पुलिस के हाथ नहीं लगा. पुलिस उसे तलाश रही थी. इस के बावजूद बालाजी चुप नहीं बैठा. उस ने चेन्नई स्थित स्काईलार्क टैक्सटाइल्स एंड आउटफिटर नामक कंपनी के मालिक चक्रवर्ती को अपने निशाने पर ले लिया. चक्रवर्ती राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका लेते थे. इस के लिए वह अधिकारियों से साठगांठ रखते थे.

लीना और बालाजी ने चक्रवर्ती को कर्नाटक राज्य के मैडिकल तथा ट्रांसपोर्ट डिपार्टमैंट के कर्मचारियों की वर्दियां तैयार कराने का ठेका दिलाने के नाम पर 63 लाख रुपए ऐंठ लिए थे. चक्रवर्ती से उस ने खुद को तमिलनाडु अरबन डेवलपमैंट प्रोजेक्ट का डायरैक्टर जयकुमार और लीना को अपनी सेक्रैटरी बताया था. खुद के ठगे जाने का एहसास होने पर चक्रवर्ती ने अपना सिर पीट लिया. हाथ मलते हुए वह 6 मई, 2013 को थाने पहुंचे और शिकायत दर्ज करा दी. उन की यह शिकायत लीना और बालाजी के खिलाफ धारा 420, 406, 419, 120बी के तहत दर्ज हुई थी.

इस तरह जब बालाजी और लीना के खिलाफ एक के बाद एक कई शिकायतें दर्ज हुईं तो चेन्नई पुलिस और सेंट्रल क्राइम ब्रांच पुलिस लीना और बालाजी के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. पुलिस का शिकंजा कसते देख दोनों चेन्नई छोड़ कर दिल्ली चले गए. दिल्ली में वे एक फार्महाउस किराए पर ले कर वीआईपी की तरह रहने लगे. लेकिन पुलिस की निगाहों से वे वहां भी नहीं बच सके और 27 मई, 2013 को एएटीएस द्वारा पकड़े गए.

एक साल तक जेल में रहने के बाद मार्च, 2014 में जब लीना और बालाजी जमानत पर बाहर आए तो वे मुंबई आ गए और यहां भी उन्होंने अपना पुराना जालसाजी का कारोबार शुरू कर दिया. लेकिन इस बार उन की सोच कुछ अलग तरह की थी. यहां उन्होंने महज एक साल में करीब एक हजार लोगों को अपनी ठगी का शिकार बना कर लगभग 10 करोड़ रुपए ठग लिए. लोगों को जाल में फंसाने के लिए बालाजी खुद को एक बड़ा बिजनैसमैन और बंगलुरु का सांसद बताता था.

रहने के लिए उस ने गोरेगांव के पौश इलाके में 3 हजार स्क्वायर फुट का एक आलीशान फ्लैट अपने ड्राइवर के नाम पर किराए पर लिया था, जिस की डिपौजिट 3 लाख रुपए और किराया 75 हजार रुपए था. आनेजाने के लिए महंगी लग्जरी विदेशी गाडि़यां थीं. इन्होंने अंधेरी के पौश इलाके लोखंडवाला के इनफिनिटी मौल में किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया नामक एक फरजी वित्तीय संस्था का औफिस खोला. लोगों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने घर और औफिस में लाखों रुपए इंटीरियर में खर्च किया. संस्था का चेयरमैन उन्होंने सलमान रिजवी को बनाया. उन की मदद के लिए स्टाफ भी रखा गया. कंपनी में निवेश कराने के लिए मोटे कमीशन पर एजेंटों की नियुक्ति की गई.

निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बालाजी और लीना खुद महंगी विदेशी गाडि़यों से 2-3 घंटे के लिए किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया के औफिस आते थे. इस के साथसाथ इस वित्तीय संस्था का प्रचारप्रसार कुछ इस तरह किया गया कि निवेशकों को सहज उन पर और उन की संस्था पर विश्वास हो गया. संस्था निवेशकों से 60 से ले कर 2 सौ और 15 सौ प्रतिशत तक अकल्पनीय ब्याज देने का वादा करती थी. इस के अलावा कंपनी की ओर से निवेशकों को उन के निवेश के आधार पर उपहारस्वरूप महंगी घड़ी, नैनो कार, कीमती चश्मा और विदेश घूमने का पैकेज दिया जाता था. साथ ही किसीकिसी को उस के द्वारा किए गए निवेश का 20 प्रतिशत तुरंत वापस कर दिया जाता था.

इस तरह के महंगे उपहारों के प्रचार से आकर्षित हो कर निवेशक खुदबखुद उस की कंपनी की ओर खिंचे चले आते थे. किसी निवेशक को संस्था और उन पर शक न हो, इस के लिए वे बाकायदा निवेशकों को उन के रिटर्न की गारंटी और बैंकों की ओर से फिक्स डिपौजिट की रसीद देते थे. यह अलग बात थी कि उन के द्वारा दी गई फिक्स डिपौजिट की रसीदें कैश नहीं होती थीं. क्योंकि उस के कैश होने की तारीख आने पर लीना अपनी अदाओं से और बालाजी अपनी प्रतिभा से निवेशकों को लालच दे कर उन्हें अपनी अन्य किसी स्कीम में पैसा लगाने के लिए तैयार कर लेते थे.

लीना और बालाजी ने किंग ग्रुप औफ लायन ओके इंडिया कंपनी के तहत कई अन्य लुभावनी स्कीमें भी चला रखी थीं. मसलन सुपर नंबर-5, स्पेशल हार्वेस्ट वीक, सुपर हार्वेस्ट प्लस वन, न्यू ईयर बोनस, क्रिसमस बोनस, वन प्लस वन, वन प्लस टू, गणेश स्पैशल, दुर्गा पूजा पोंगल स्पैशल और दीपावली गोल्डन डायमंड. लीना से डा. बोहरा की मुलाकात उस के इलाज के दौरान हुई थी. जब लीना के इलाज के लिए डा. बोहरा उस के फ्लैट पर गए तो उस के फ्लैट का डेकोरेशन और रहनसहन देख कर हैरान रह गए.

डाक्टर होने के नाते वह तमाम बिजनैसमैनों और उद्योगपतियों के घर गए थे, लेकिन उन्होंने इस तरह ठाठबाट से रहते हुए किसी को नहीं देखा था. लीना को देख डा. बोहरा चलने लगे तो लीना ने उन की फीस से 3 गुना फीस दी थी. इस से वह लीना और बालाजी से काफी प्रभावित हुए. वह उन के बारे में सोचने लगे कि इन का ऐसा कौन सा बिजनैस है, जो ये इस तरह शानोशौकत से रहते हैं. काफी सोचनेविचारने के बाद भी बात उन की समझ में नहीं आई.

अगले दिन जब वह लीना को देखने उन के घर गए तो उन्होंने बालाजी से उन के कारोबार के बारे में पूछ ही लिया. इस के बाद लीना और बालाजी ने उन्हें अपने कारोबार के बारे में बताया तो सच्चाई जान कर उन का मुंह खुला का खुला रह गया. यही नहीं, लीना और बालाजी ने उन से यह भी कहा कि अगर वह भी चाहे तो उन की तरह ठाठ से रह सकते हैं. उन के पास एक ऐसी स्कीम है, जिस में मात्र एक साल में 5 लाख रुपए का 15 लाख और 3 साल में 50 लाख हो सकते हैं.

डा. बोहरा पढ़ेलिखे और समझदार थे. वह अच्छी तरह जानते थे कि देश के सभी वित्तीय संस्थान रिजर्व बैंक के नियमानुसार काम करते हैं और रिजर्व बैंक में कोई ऐसी स्कीम नहीं है, जो मात्र एक साल में रकम को दोगुना और 3 गुना कर दे. इस के बावजूद डा. बोहरा ने आंख मूंद कर अपने 70 लाख रुपए लीना और बालाजी की फरजी कंपनी किंग औफ लायन ओके इंडिया में निवेश कर दिए. इस की वजह यह थी कि उन्हें विश्वास था कि जिस कंपनी के निदेशक मंडल में ‘मद्रास कैफे’ जैसी सुपरहिट फिल्म की अभिनेत्री के अलावा मशहूर फिल्मी हस्ती गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के घर के लोग शामिल हों, उस संस्था में रुपए डूबने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

इस के अलावा कंपनी ने विश्वास जमाने के लिए बैंकों की गारंटी और फिक्स डिपौजिट की रसीदें दी थीं, जिन में सारी शर्तें लिखी थीं. डा. बोहरा लीना और बालाजी के रहनसहन तथा बातव्यवहार से कुछ इस तरह प्रभावित हुए थे कि उन्होंने यह बात अपने दोस्तों और क्लीनिक में आने वाले कई संपन्न मरीजों को भी बताई. उन के कहने पर ही भारीभरकम ब्याज के लालच में कई लोगों ने लीना और बालाजी की संस्था में रुपए लगा दिए. उन के एक दोस्त डा. शेख ने तो 50 लाख रुपए निवेश किए ही, उन के कई अन्य जानपहचान वालों ने भी लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी में रुपए लगा दिए.

लीना और बालाजी जिस तरह करोड़ों रुपए कमा रहे थे, उसी तरह खर्च भी कर रहे थे. उन का मकसद सिर्फ मौजमस्ती करना था. वे अपने लिए महंगीमहंगी चीजें खरीदते थे. जिस का पेमेंट वह कैश में करते थे. वे बड़ीबड़ी विदेशी गाडि़यों में फाइव स्टार होटलों में जाते और वहां पार्टियां करते और अपनी फरजी कंपनी और स्कीमों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करते. लीना और बालाजी जहां बड़े और संपन्न लोगों का ध्यान अपनी कंपनी की ओर खींच रहे थे वहीं दूसरी तरफ उन की कंपनी के कर्मचारी और एजेंट मोटे कमीशन के लालच में मध्यमवर्गीय और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा ब्याज का लालच दे कर उन्हें लुटवा रहे थे.

ये वे लोग थे, जो अपना पेट काट कर अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए एकएक पैसा जोड़ कर जमा कर रहे थे. ऐसे लोगों को कम समय में उन की रकम को दोगुना करने का लालच दिया जा रहा था. उन का सोचना था कि ब्याज मिलेगा तो उन की परेशानियां दूर हो जाएंगी. लेकिन इस का मौका ही नहीं आता था. जब उन के पैसे वापस करने का समय आता था तो उस पैसे का कुछ हिस्सा दे कर बाकी पैसे और अधिक ब्याज के लालच में किसी अन्य स्कीम में लगवा लिया जाता था. इस से वे खुश हो जाते थे और खुशहाल जिंदगी के सपने देखने लगते थे.

लीना और बालाजी ने इस मामले में अपने घर में काम करने वाली नौकरानी यशोदाबेन हरिजन को भी नहीं बख्शा. लीना ने उस के 50 हजार रुपए और कई महीने का वेतन रोक कर अपनी कंपनी की किसी स्कीम में लगवा दिए थे. चेन्नई से मुंबई आने के बाद लीना की मुलाकात सब से पहले फिल्म गीतकार स्व. हसरत जयपुरी के पोते आदिल अख्तर हुसैन जयपुरी से जुहू के एक जिम में हुई थी. आदिल ने लीना की फिल्म ‘मद्रास कैफे’ देखी थी, जिस से वह उस से काफी प्रभावित थे. आदिल भी फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों में थे इसलिए लीना से जल्दी ही उन की दोस्ती हो गई.

दोस्ती घनिष्ठता में बदली तो लीना और बालाजी ने उन्हें अपनी योजना के बारे में बताया. आदिल पौश इलाके मौडल टाउन सोसायटी, गुलमोहर रोड जेवीसीडी स्कीम जुहू विलेपार्ले पश्चिम स्थित गजल विला में अपने मातापिता के साथ रहते थे. उन्होंने लीना और बालाजी को अपने पिता अख्तर हुसैन से मिलवा कर उन की योजना के बारे में बताया तो उन्हें भी खुशी हुई. बिना सोचेविचारे वह आदिल और अपने एक रिश्तेदार नासिर हुसैन जयपुरी तथा एक परिचित सलमान रिजवी के साथ उन की योजना में शामिल हो गए.

चूंकि स्व. हसरत जयपुरी का परिवार हाई प्रोफाइल था, इसलिए उस का उठनाबैठना भी वैसे ही लोगों में था. उन की वजह से तमाम लोग लीना और बालाजी की इस फरजी कंपनी पर विश्वास ही नहीं किया, बल्कि जुड़ भी गए. सलमान रिजवी तो उन के कहने पर मैनेजिंग डायरैक्टर बन गए. इन की वजह से फिल्मों से जुड़े लोगों ने भी लीना और बालाजी की संस्था में रुपए निवेश किए. लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेश चंद्रशेखर उर्फ जयकुमार न जाने कितने लोगों को शिकार बनाता, उस के पहले ही मुंबई की आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारियों को उस के इस गोरखधंधे की सूचना मिल गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया.

इस के बाद उन के फ्लैट और औफिस की तलाशी में उन के इस गोरखधंधे से जुड़े 4 सौ से अधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज और निवेशकों के ढेरों फार्म बरामद हुए. दिल्ली की ही तरह ही उन के पास 7 लग्जरी गाडि़यां, जिन में रोल्स रायस फैंटम, निसान जीटीआर, एस्टन मार्टिन, हमर, पजेरो, रेंज रोवर, मित्सुबिशी इवो, बीएमडब्लू 5300, लैंड क्रूजर जैसी गाडि़यां थीं. इन गाडि़यों को लीना पौल और बालाजी ने ओएलएक्स डौट कौम से खरीदा था. जिन का उन्होंने नगद भुगतान किया था.

इस के अलावा लीना पौल और बालाजी के फ्लैट से लगभग 1 करोड़ मूल्य की 117 विदेशी घडि़यां, 4 लाख 80 हजार रुपए के 12 महंगे मोबाइल फोन, लीना पौल के 78 हैंडबैग, 8 जैकेट, 37 सनग्लास, 43 ट्राउजर्स, 40 जोड़े जूते और नामीगिरामी कंपनियों के परफ्यूम, जिस की कीमत लाखों में थी, प्राप्त हुए हैं. इन लोगों ने बाथरूम में गोल्ड प्लेटेड नल लगवा रखे थे. बालाजी की अलमारी से 42 जींस, 200 टीशर्ट, 73 शर्ट और 80 जोड़े जूते मिले. उन की इन चीजों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये लोग कितनी शानोशौकत से रहते थे.

विस्तृत पूछताछ के बाद फिल्म अभिनेत्री से ठग बनी लीना मारिया पौल और बालाजी उर्फ शेखर रेड्डी उर्फ सुकेशचंद्रशेखर उर्फ जयकुमार, अख्तर हुसैन जयपुरी, आदिल अख्तर जयपुरी, नासिर हुसैन जयपुरी, सलमान रिजवी के खिलाफ अपराध क्रमांक 33/15 पर भादंवि की धारा 420, 120बी, 3, 5, प्राइज चिटफंड सर्क्युलेशन बैंकिंग ऐक्ट 3 एमपीआईडी के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से इन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक सभी अभियुक्त जेल में बंद थे. आगे की तफ्तीश क्राइम ब्रांच की आर्थिक अपराध शाखा के इंसपेक्टर अशोक खेडकर कर रहे थे. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित